Skip to main content

Full text of "Shrimad Bhagawat Mahapuran Vol 2 Gita Press Gorakhpur"

See other formats


१०.१६ 
0: 


१७१ 


2117119 
१११ ११५६ १९४ धः {ॐ 


ऋ 
(अ १५.) [त 111 # छ ५ ४ ८ 


(9 
॥ 


वि 11 


# ¶ है ५: 
} १ 


क +® 


५११६ 
1 


क | 


११९४६११ 
५१७१०६१ 


[~क 
1 


ज चट 


{४ १ 
॥1॥ 
है 9 


3, 
४1 


(3 


‰ ङ्गं 1 


ध ॑ ं 11101 
1 


+1,५.५.५ - 11111 १ | 11.21 








(11 


9 
" 


४) 


१ 





# 
कै ॥ वि 
| 
4 त 
४१ +: 
१ त 
त 
। = 
नि 
५ 
त 
छ # 
। शै 
१ = 
् चै ॐ 
५ 
॥ ) 
क 
न क 
च 
र 
॥। 
च 
क 





„© © © € ^ १००९६ ८६ ©. 20996 ८ 06 


= 4, स छु 


,५* १. 


८१. £ १ (क ९१ 4 हि १. ५ = 
8: य ४०००००० * ५५००५ ५००००४५ ©दे नुमे गुनगगगनानुर्भणग 


19 


४ 


५ 
4 
न 
कक 
् 
॥ 


9 
€ 
#> | 
६. 
 # 4 
(4 
(4 
| = 
& 
६. 
4 
~ \ 
५ 
च 
4 
ड 
रः 
। 
श 
+ 
¶ 
र 
५ 
५ 
द 
# 
५ 
॥#| 
© 
#३ 
ई 
१ 
६ 
व. 
५ 
£ 
4 
€ 
च| 
।५ 
कैः 
श 
४. 
ब, 
#२ 
+4 
॥ ५ 
€ 
ह 
= 
म्‌ 
& 


21५4 २।णय्‌ 
याख्यासदितम्‌ ) 
कन्धपयन्तः ) 


द 
0 
शः 


€ 
या 
दरार 


~ सु 
< 
2 
{८ 
#9 


वरस्प्रणतत ` 


(देन्द 


च्य 
> < 
^ 4 --~ न्भ 
हि 
€4 


य 
रट 
| ~ = 


` म्िविदः 


श्रीराध्राकृष्णाभ्यां नम 
2 


सचिच्रं सर 


१० 923004075८227207432020000150009^~ 00 


( 
( नवमस्कन्धादारभ्य हा 


1 


> 2.)095909.795 


त 


भ्रीमद्धागवतम 


=+ छथ 1 1.1.111 
` 


01. 11111. 2१8 11.1.11. 1141-1. 4 =: 
| 


5 2 


#०)0©90 ९५८2500 


क ऋ ` ॐ ॐ ऋ क - क क ऋ ` ऋ 


© 059992993999979709909000990090923775000952070959१9259600399 


११ 


† ५: १ त 


. क क 


9298 


4 "~ 


र 
< ५ ~ ९ > ~ 


06 4 > 005९509 689९ ©% 
2 त 2 ४ 


4⁄0 (2 । 


>^ 9090950999759999१137120929990१29959599 


= | | च ऋ. 





(कत कोम जि जो अक्त यक 





# + , ~ हि > त त 0 द 
कै 
[नि 
| । ॥ . 
# 
क < # ॐ 
च 
भ 
च 
म = थ 
क 7 
र क 
| क 
7 र ि 4 
- क 








हिं 


© ४ # का 
यायिन न 





+ 4 


क 4 ' {> ॐ [4 ॥ > र | ¶ ॥ ८) +. [4 १॥ 


00 4 1 | । 
9. ;#.४, ५ षः +^ =. + < शि 
4 १८६ 68 
च " + 
[71 . 1 [ ् ५ प = 
न । 4. ( # 94 ५6 भ 








। £) 
7 
(न. क , 4१ # ॐ 





रै 



























^: दक ऋ र 
# पिके ॐ च 
= ^ पिः 


५ 
















, श्रीहरिः = - 
विषय-सची 
अध्याय विषय पृष्ठ-संख्मा अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या 
नवय स्कन्ध जाकर भविष्यवाणी करना ˆ ˆ ९३९ 
१-वेवसत मनुके पुत्र राओ सुद्युग्नकीक्था ` ˆ“ ३ ५-गोकुल्मै भगवान्‌ का जन्ममहोत्सव ` १४४ 
२-प्रषर्र आदि मनुके पोच पूर्वोका वदा --* ७ ~ ई द्रतना-उद्धार > 
२३-मह्प्रिं च्यवन ओर पुकन्याका चरित्र; राजा ७-रकट-भज्ञन्‌ आर तृणाव्तं-उद्ार ५ 
र्याति वदा --* १०  <-नामकरण-संस्कार ओर वाल-रीला ` १६१ 
५-नामाग ओर अम्बरीपकी कथा -** १४ ९-श्रीकृष्णका ऊखङते बोधा जाना ` १७६ 
५-दुर्वा्ताजीकी दुःखनिच्रत्ति २२ १०-यमलर्जनक्रा उद्धार | ˆ १८४ 
६-इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन; मान्धाता ओर ११-गोकुटते इृन्दावन जाना तथा वसार ओर 
¬ सौभरि ऋषिकी कथा ~" -** २६ बक्रासुरका उद्धार १९० 
।।  ७-राजा त्रिशङ्कु ओर दरिशवन्रकी कथा = ˆ“ ३२ ‹र-अनरा्रका उडार ५ = 
|  <-सगर-चरि् - ~" -- ३५ १३-त्रह्माजीका मोह ओर उसका नाश ``" २०४ 
 । <; ९्-मगीरथ-चरित्र ओर गङ्गावतरण ३९ १४-ग्रह्माजीके द्वारा भगवान्‌की स्तुति ˆ“ २१४ 
| ५ °-मगवान्‌ श्रीरामकी टीकाओंकरा वर्णन ५५ १५-धेलुकाञुरका _ उद्धार ओर ग्बाला्को 
` ११-भगवान्‌ श्रीरामकी शेष लीलार्ओका वर्णन ५३ काछियनागके विषे वचाना ` ~ 
:१२-इष्वाकुवंशके रोष राजाओंका वर्णन --" ५८ {दै-कालियपर इमा 
१३-राजा निभिके वराका वर्णन --~ ५९ १७-काल्यिके काञ्यिदहमे भानेकी कथा तथा 
१४- चन्द्रवंाका वर्णन "° “ --* ६२ भगवान्‌का ब्रजवासिर्योको दावानरसे बचाना ˆ ˆ ˆ २४१ 
१५-ऋ चीकः जमदग्नि ओर परञ्चरामजीका चरित --‡ ६७ १८ प्रडम्बाञ्र उद्धार त 
 . १६-परञ्यरामजीके द्वारा क्षत्रिय-संहार ओर १९-गोओं ओर गोपोौको दावानक्ते बचाना `ˆ" २४९ 
 . विश्वामित्रजीके दंशकी कथा धर ०-वर्षां ओर शरद्‌ ऋतुका वर्णन ˆ“ * २५२ 
 १७-क्षत्रनरद्धः रज -आदि राजाओंके वंशका वर्णन ७६ २१-वेणुगीत ~> २ 
 १८-ययाति-चरित्र --“ ७८ २२-चीरहरण 8६ 1 
ड १९-ययातिकरा गहत्याग ˆ** ८ २ ३-यज्ञपलिनर्योपर कृपा ५ "° २५८ 
 -२०पूस्के वंशः | राजा दुष्यन्त ओर भरतके २४--इन्द्र यज्ञ-निवारण -*“ -.* २८१. १ 
/ चरिचका वणन ॐ ० ~ ५-गोवघंनधारण ९,९.० ०५०. २८५१ ह 
 : २१-भरतवंशका वर्णन? राजा रन्तिदेवकी कथा ˆ** ९२ २६-नन्दबाबासे गोपोकी श्रीकृष्णके ग्रभावके विषयमे 
„ , २२-पाञ्चाङः कौरव ओर मगधदेशीय राजाअकि ब्रातचीत ` २८९ 
५। वंशका वणन ५ ˆ“* ९६ २७-श्रीकृष्णका अभिषेक ˆ" २९३ 
¦ २३-अनुः द्व्य, ठवसु ओर यदुके वंशका वणन १०१ २८-वरुणलोकसे नन्द्जीको छुड़ाकर छाना `ˆ" २९६ ज 
 २४-विद्भके वंशका वणन `ˆ --* १०४ २९ रासरीटाक्रा आरम्भ . ˆ" “** २९९ 
। ददाम स्कन्ध ( पूवं ) ३०-श्रीकृष्णके विरह गोपियोकी दशा ००३ 
१-मगवान्‌के द्वारा प्रथ्वीको आश्वासन वसुदेव- ३९-गोपिकागीत सः | 
देवकीका विवाह ओर कसके द्वारा देवक्रीके ३ २-भगवान्‌का प्रकट होकर गोपियोको सान्त्वना देना 
छः पर्रोकरी हत्या | > ६ ३ ३-महारास 3 भे | < न ००० 
 २-मगवान्‌का गर्म ओर देवता्ओद्रारा  ३४-खदर्शन ओर शङ्खचूडका उद्धार ` 
| हषण ५ ष्णका प्राक्य्य  . . ``" १२८ ३६-अरिषटाुरका उद्धार ओर कंषका भीअकूरजी- 
स < १. क क को व्रज्‌ भेज (॥। < ० > प, 





| "बः 


अ क | 


ॐ 9 
"" ` चक 





























(क ( ४) 
अध्याय ~ विस्‌ पृष्ठ-सख्या अध्याय विषम । पृ्ठ-संख्या 
+ २७-केशी ओर व्योमाघुरकरा उद्धार तथा नारदजीके ६८-कौर्वोप व्रट्रामजीक्रा कोप ओर साम्बा . 
8 द्वारा मगवान्‌क्री स्तुति `" ˆ" " ३५४ विवाह 1८ 
 \ ३८-अक्रूरजीक्री तरजयात्रा `` `` ` ३५९ ६९-देवरिं नारद जीका भगवानकी गदच्यां देखना ५५४ 
३९-श्रीङृष्ण-बल्रामका मथुरागमन ` ˆ“ ३६५ ७०-भगवान्‌ श्रीकृष्णकी नित्यचर्या ओर उनक्रे पास 
४०-अग्रूरजीके द्वार भगवान्‌ श्रीक्ृष्णकी स्तुति. ` ` ` ३५३ जरासन्धक्रे कैदी राजाभतकरि दृतका आना `" ५६० 
४१-श्रीक्ष्णकरा मधुराजीमे प्रवेश ` ˆ“ ३७८ ७ १-श्रीङृप्ण भगवन्‌ूका इन्दरपर्य पधारना = "ˆ" ५६७ 
४२-ऊुन्जापर कपाः, धनषभङ्ग ओर कंसकी धवराहट ३८४. ७२-पाण्डवेकरि राजसूय यका आयोजन ओर 
र २-ऊवन्यष्टरीडका उद्धार ओर अषखाडमे प्रवेश ` ˆ` ३८९ जरासन्धकरा उद्धार ।# ~ ~). 
४४-चाणूरः युष्टिक आदि पहट्वानोका तथा कत्तका ७३-जर।सन्धके जेख्ते द्ृटे हुए. राजार्थकी विदाई 
उद्धार शु (२ ओर भगवान्‌का इनद्रप्रख छोट आना `"" ५८० 
४५-श्रीकृष्ण-वररामका यज्ञोपवीत ओर युरुकुट ४-भगवान्‌को अग्रपूजा ओर 1 दाद्पाटटका उद्धार ५८४ 
प्रवेश ‰९१ ` ` ` ४०० ७८- राजसूय यज्ञक्री पूति आर दुयांधनका अपमानः ˆ ˆ ५९१ 
४६-उद्धवजीकी जयात्रा ~ ` ` ` ४०६ ७६-दाव्वके ताथ यादवोका युद्ध “५२8 
४७-उद्धव तथा गोपियोकी बातचीत ओर भ्रमरगीत ४१३ ७७-यास्व-उद्धार ८ ५९१ 
४८--मगवान्‌का कुन्जा ओर अक्रूरजीके धर जाना २६ ७८-दन्तवक् ओर विदूरथका उद्धार तथा तीथ- 
४भ-अक्रूरजीका-हस्तिनापुर जाना ४२९ यात्रा बहरामजीके हाथमे सूतजीक्रा वध ˆ" " ६०४ 
( ददाम स्कन्ध उत्तराधं ) ७९-वल्वल्का उद्धार ओर बटरामजीकी तीशयात्रा ६०८ 
५ ०-जरासन्धसे युद्ध ओर दारकाधुरीका निर्माण `ˆ" ४२९ ८० -श्रीकृप्णके द्वारा सुद्यामार्जका स्वागत (4६. 
4 {-क्राख्यवनका मस होना मचुकरुन्दकी कथा ६ ८१-सुदामाजीको देश्वयकी प्राप्ति अ ८ 
^ 4 र-दारकागमनः शीवख्यामजीका विवाह. तथा २-भगवान्‌ श्रीकृष्ण-वररामपे गोप-गोपिर्यो की भर॒ ६२३ 
४. शीङष्णकरे पा सक्रिमिणीजीका सन्देश केकर इ-भगवान्‌की पटरानियेकरे भथ द्रौपदीकी बातर्चत ६३० 
क ब्राह्मणका आना ~ ˆ ˆ " ४५५ ८४- वसुदेव जीका यज्ञोत्सव ६३७ 
६२ स्विमरणी-हरण ङ `" ४६० ८५-श्रीमगवान्‌क्रे द्वारा वसुदेवजीको गदयाज्ञानका 
५४-शिद्चपाख्के साथी राजाओंकी ओर -स्त्रमीकवी उपदेश तथा देवकीजीके छः पु्रौको छोटा काना ६४६ 
„ हार तथा शीकृष्ण-रकििमणी-विवाह ` ˆ" ४६७ <६्-सुमद्राहरण ओर भगवानका भिथिलापुरीम राजा 
। . -८५-परदयुम्नक्रा जन्म ओर शम्बयघुरका बध ˆ"" ४७४ ` जनक ओर श्रुतदेव त्राह्मणक्रे धर एक ही £ 
६६ स्यमन्तकमणिकी कथाः जाम्बवती ओर ~ धाथ जाना ५६ "^" ६५६1 
= सत्यमामाके सा भामाक्रे साथ श्रीक्कष्णकरा विवाह “ˆ * ४७९ ८७ -वेदस्तुति 4 "` ६६२ 
५७-स्यमन्तक-हरणः अतघन्वाका उद्धार जौर ८८-शिवजीका सङ्कटमोचन "` = `" ६८१ 
फिरसे द्वारका बुटाना ˆ “ˆ ४८४ ८ ९-श्वगुजीके दवारा तरिदेरवोक्र परीक्षा तथा मावान्‌का ` 
९८-भगव श्रीक्ष्णके अन्यान्य विवार्होक्री कथा ४९० मरे हुए त्राहाण-वाल्कोकरो वाप खना . ` -* -६८६ 
द-मौमासस्का उद्धार ओर सोलह हजार एक सौ ९०-भगवान्‌ कष्णके टी रा.विहारका वर्णन : ` ` ` ६९३ 
 राजक्रन्याओंके साथ भगवानूका विवाह `" ४९७ एकाद्रा स्कन्ध | 
०-- 7 "र, किमणी-सं त १ 2 तिर <: र इ १-यटुवंशक्रो ऋषिर्योका शाप ` ` ७०५ 
६१ -मगवानूकी संततिकरा वर्णन तथ अनिरुद्ध २-वयुदेवजीके पास श्रीनारदजीका आना ओर 
वमी १ ५४ उन्द राजा जनक तथा नौ योगीश्वरोका संवद्‌ 
प्पा-अनस्दड-मख्न प: ध र ^ 2८५ ` ` | सुनाना } ७०८ 
[न्‌ श्रीकृष्णके साथ व्ाणायुर्का यु द ` ५९२ रे-मायाः मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म 
-जावी कथा ` ८. : + ॥ ¢ 4 > 4. ओ कर्मयोगणका निल्पण ए ७१७ | 
पीक बजगमन ˆ““ ` ""“५३५ अवत अवतारोका वर्मन धः ७२६ (ए 
> पुरपरोको राति -ओौर `भगवान्‌की 
पजा [9 वणः ठ २ 2 2 ७३१ । 








7 "छ 

ध अ 

2 स 
(ॐ 


( ४), भ ह 
। १४. 
अभयाय विधय प्ृएठ-संख्या अध्याय ˆ त्रिष र-संर / | 
६-देवताओंकी भगवान्‌से सधाम सिधारनेके ल्ि ~ २ ९-भागवत-धर्मोक्रा.-निरूपण, सौर उद्वबलीका ` ` 
` प्रार्थना तथा यादवोको प्रभासक्षेत्र जानकी तेयारी बद्रिकाश्रमगमन १ त; 
करते देखकर उद्धवका भगवान्‌के पाठ आना ˆ ˆ ˆ ७३९ ३०-यदुकरुल्का संहार थः "° 
७-अवधूतोपाख्यान--शरथ्वीनि चेकरर कवूतरतक रे १-श्रीभगवान्‌का स्वधामगमनः ˆ - ह. 
ठ गुद्ओंक्री कथा ` " " ७४६ द्वाददा स्कन्ध -. | 
<-अवधूतोपाख्यान--अजगरसे लेकर पिङ्गरातक १-कलियुगके राजवं्थोका वर्णेन --" शदः 
ना गुरुअका कथा ००० ˆ ७५७ २-कलियुगके धर्म ०० ^ | 
-अवधूतपाख्यान ` कुररमै लेकर श्गोतक्र ˆ ३-राउयः युगधर्मं ओर कचियुगकरे दोस 1 
सात गुरञक्रा कथा १ ` ७६२ वचनेक्रा उपाय-- नामसङ्कीर्तन हि" ९१३ 
१०-ोकरिक तथा पारलोक्रिक मोगोको असारताका +-चार प्रकारके प्रस्य - = * --* ९२० 
निरूपण ` ७६९  ५-श्रीय्युकदेवजीकंा अन्तिम उपदेश °“ -९ ९ 
, १-्रद्धः मुक्त ओर भक्तजनोक्र खक्षण ` ˆ” ७७५ -परीश्षितक्री परमगति; जनमेजयका सपसत्र त~ ~ 
१२-सत्शङ्गकी महिमा ओर करम तथा ओर वेर्दोके शालाभेद ˆ" " "" र > 
कर्मत्यागकी विधि ` `" ७८२ ७-अथर्ववेदकी शाार्ण ओर पुरार्णेके लक्षण ˆ-* ९३८. ` ` 
१३-दंसरूपते सनकादिको दिये हए उपदे शका ८-मारकण्डेयजीकी तधस्या ओर वरःप्रा्ि " श 3 
वर्णन । “ˆ ७८६ ९-माकण्डेयजीका माया-दर्शन ` ˆ ““ ९४९1 
१४-भक्तियोगकी महिमा तथा ध्यानविधिका वणन ७९ र्‌ १०-मारकण्डेयजीको भगवान्‌ राकरश् वरदान ०“ ९९५५ { | 
१५-भिन-भिन्न तिद्धियाकरे नाम ओर लक्षण ` ७९८ ११ -भगवान्‌के अङ्ग; उपाङ्ग आर आयुर्धोका | । 
१६-भगवान्‌की विभूतिर्योका वर्णन ८९३ रहस्य तथा विभिन्न सूर्यगर्णोका वणन ˆ" ९६०. ^ 
१७-वर्णाश्रम-घम-निरूपण ˆ“ --“ ८०८ १ र₹-श्रीमद्धागवतकी संक्षिप्त विषय-सूची ˆ.“ ९६५. 
१८-वानप्रस ओर संन्यासीके धर्म -** ८१५ १३-विभिन्न पुरार्णोकी शछोक-संख्या ओर ६ 2 
१९-भक्तिः ज्ञान ओर यम-नियमादि साधर्नोक्रा वणन ८२२ शरीमद्धागवतकी महिमा  - "स 0 
२०- ज्ञानयोगः कर्मयोग ओर भक्तियोग -*" ८२८ भरीमद्धागवतमाहात्स्य ० ८१8 
२१-रुण-दोप-व्यवखाक्रा खल्प ओर रदृष्य ˆ` ` ८३२ परीक्षित्‌ ओर व शाण्डिल्य ५ \ 
२२-तत्छरोकी संल्या ओर पुरुष-परकृति-विवेक `" * ८४० ध व सा ओर स < 
७ > 9 १ न 0 
क 1 ८ 0 २-यपुना ओर शीकृष्णपल्लिर्योका संवादः कीतंनोतसव- । श] 

- क वततियोका नि ४5 मे उद्धबजीका प्रकट होना ` `" “ ९८२ ॐ 
२५ तीन एणोक इत्तिाका निरूपण ८६१ इ-भीमद्धागवतकीं परम्परा ओर उसक्रा माहारम्यः 1 
२६ -पुरूएवाकी बेरागयोक्ति `" ` -: ८8 ^ मागवत-श्रवणते श्रोता्ओंको भगवद्धामकी प्राति ९८६ `; । 
२७-क्रियायोगका वर्णन ~ `" ८६९ ४-श्रीमद्धागवतका सरूपः प्रमाणः श्रोता-वक्ताके वः. 
२८-परमा्थनिरूपण ६ ` * " ८७६ टक्षण; श्रवण-विधि ओर माहात्म्य ति ¢ । 

। अयनल ¦ । 


॥ श्रीहरिः ॥ 


 श्रीमद्धागवतक्ी आरती 


आरति अतिपावन  पुरानकी | 
धमे-भक्ति-विक्ञान-लानकी ॥ 


महापुरान भागवत निरमट । 
` शुक-मख-विगलित निगम-कस्प-फरु | 
परमानन्द-सुधा-रसमय कट । 

लीटा-रति-रस रसनिधानकी ॥ आ ° 
कलि-मर-मथनि त्रिताप-निवारिनि । 
जन्म-म्रत्युमय भव-भय-हारिनि । 
सेवत सतत. सकर सुख कारिनि । 


खमहोषधि हरि-चरित-गानकी ॥ आ ° 
विषय-विटास-विमोह-विनाशिनि | 
विमरु विराग विवेक . विकारिनि। 
भगवत्तत्तव-रहस्य प्रकारिनि । 
परम ज्योति परमात्म-ज्ञानकी ॥ आ 
परमहस-म॒नि-मनं उद्ासिनि । 
रसिक-हदय रस-रास विलासिनि । 
मुक्ति; सक्ति, रतिप्रम खदासिनि । 
अकिञ्नप्रिय जानकी ॥ आ ° 





चै ~ र | च) (८ (4 
।# » (2 ॥# 
(पः के नं त 
त) ०४ ~~: 71773. ५, 1; 
== , जै 


भ्रीराधाकरष्नाभ्यां नमः 


श्रीमद्धागवतमहापुराणम्‌ 


। ५.0 १ 
= १. र 
् (- ०,१.४.१.१।०.५ 
; 1 [; कै 


। ह 
५ स; > 
< ८ -& 


(ऋ ¢ प न 


"1 


(96. 
( न 


रोकशोकापहाराय रावणं ` रोकरावणम्‌ । 
रामो भूत्वावधीद्यस्तं गोविन्द्‌ विन्दतां मनः ॥ 


१३.२१. 





^$ न 





८ , ओ ककि जो कानिकरॐ  - - =  -=  - ~ = 9 


व ° प ` ` "^ यर) पेजः नककयस ~> भण्डः )+ 
न 





[ द. ~ 
क , = ह इ. 





् ४ "५. = 8 । 1 द च 9--. शक 


त ॐ 
1 क ६. ईय व - 4 = ~~ स == कन क = 
च 
६५ 


५ ५ । | & 


| = व ० 








}* 

(1* ¢ 
{1 न द्ध । 
4; ५ ९ [= 
{7४ व न । 

८ !; ट 

( | न 

१ 1 र 

© ॑ म र 

^ 1 12 
+“ , 4 
[ इ । + 8 ३ # ॥ - १ | न । | = क क क 9 -4 = ¢ “= १ > १ 3 । 





[1 निः # ॥ वि 
+ ॥ 7 | 
। # । ।; † 
# ॥  # ^ + , 
2 8 षी 
चै 
४ 
4 
ग १.१ »# ५ 
र ध \ १0 
॥ ~ करभि 


चै 
निः 
न 





| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 


श्रीसद्धागवदमहापुराणम्‌ 
































0 ए स । 
4 लकः शकन्छः ् ` 
+ { 
॥ 

। अथ प्रथमोऽध्यायः 

; वैवस्वत मके पुत्र राजा खद्युम्नकी कथा 

५ राजोवाच | राजा परीक्षितने पूछा- भगवन्‌ । आपने सब 


र मन्वन्तरं ओर उनमे अनन्त शक्तिराी भगवानके दारा 
मन्वन्तराणि सबौणिरं श्रुतानि मे । किये इए रेखर्यूरणं॒चर्त्रका वर्णन किया ओर चैन 


५ उनका श्रवण भी किया ॥ १ ॥ आपने कटा क्कि पिच्छ 
| बीयाण्यनन्तवीयख ॑ छनि क कल्पके अन्तमे द्रविड देशके खामी राजिं सत्यत्रतने 
, योऽसो सत्यव्रतो नाम राजिद्रबिडेश्वरः । मगवानकी सेवासे ज्ञान प्राप्त किया ओर वद्वी इस कल्पे 
| ज्ञानं योऽतीतकल्पान्ते ठेभे पुरुषसेवया 1} २ ॥ | वैवस्वत मनु इए । आपने उनके इष्वा आदि नरपति 
| स वे बिवखतः पुत्रो मनुरासीदिति शतम्‌ । पत्रोका भी वणन किंया ॥ २-३ ॥ ब्रहन्‌ | अ आप ` 
त्वत्तस्तस्य सुताशोक्ता इक्ष्वाङप्रयुखा सूपाः ॥ २ ॥ | कृपा करके उनके वंशा ओर वंशम होनेवालोका अल्ग- र. ॑ 


तेषां वंशं प्थग्‌ ब्रह्मन्‌ वंश्याुचरितानि च । = | भकग चछर वणन कीजिये । महामाग । इमारे दयम 


९  शभषतां हि नः । | सवदा हयी कथा घुननेकी उ्छुकता बनी रहती है ॥ ४ 
कीतेयख महाभ।ग नित्यं शशरूषतां हि नः 1। ० ॥। | रैवत मलुके वंशम जो हो खके ह, इसः स तत 
ये मूता ये भविष्याश्च भवन्त्यद्यतनाश्च ये। 


हां ओर अगे --उन स परक्तिकीतिं 
तेषां नः पूुण्यकीतीनां सवभा वद्‌ विक्रमाय्‌ ॥ ५ ॥ | पुरुपकि पराक्रमका ४ 1 
त जवान | खतजीक--लौनकादि ऋषिणे शरद 
एवं परीक्षिता राजञा सदि बरहमवादिनाम्‌ । | ऋषियोकी समामे राजा पोषके नवर 
ह प्रोवाच भगवाञ्छुकः परमधमषित्‌ 1 & ॥ | तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवा श्रीः देव जीन व ऽ ने | 
ट क = 19 वा 3 8  श्रीुक्देवजीने कहा-परक्षित्‌ ! तुम मलुंशका | 
श्रूयतां मानवा :.&2 क १ परतप | त = 1 विलात्दे तो कन्न 
शक्यते विस्तरत कयत ि्तस्त। =© ११९०९ वषशतं ए उसका व। न ° ना सकता ॥ ७ ॥ जो परम 


-----~ ~ व 
स निका 
न भले छ 


१. वश्याद्चारऽ | २. त्वः नु्रमात्‌ । = 












ज = 


+> 
„= 


# 
8 


 _ ` ~ 
> द, 
ष -. 














क ~ "ण 


कि 


| क । (4 


नरी ~ 


र . ~ भौमद्भागवत | अ० १ 


1 


वि भो भ भूतानामात्मा यः शरस प्रः । ~ -पुरु्र॒ परमात्मा छोटे-ब्डे सभी प्राणियोके आत्मा 


विचयं 8  ।। | प्रख्यके समय केवर वही थे; यह विश्च तथा ओर कुछ 
किश्चन ॥ < ् | 
स एवासी दिद्‌ विख कल्पान्तन्यनन भी नही था ॥ ८ ॥ महाराज | उनकी नाम्सि एक 


तख नामेः समभवत्‌ पडकोंशो हिरण्मयः । घुवणंमय कमल्कोश प्रकट हआ । उसीमे चतुर्मुख 

= सूः ~ जीका आविभाव हआ ॥ ९ ॥ ब्रह्माजीके मनसे 
महाराज स्वय॑भूधतुराननः ॥ ९ ॥ | तहा 

स £ मरीचि ओर मरीचिके पुत्र करयप हए । उनकी धर्मपत्नी 

मरीविमेनसस्तस्य जज्ञं तस्यापि कष्यपः । दक्षनन्दिनी अदितिसे विवखान्‌ ८ पूर्य ) का जन्म 


| पोऽस्व्यां बिवस्वानभवत्‌ सुतः॥१०।। | इवा ॥ १० ॥ विवघ्ठान्‌की सज्ञा नामक पत्नीसे श्राद्वदेव 
दाक्षायण्यां ततोऽ "पच्या षि छ मनुका जन्म हआ । परीक्षित्‌ | परम मनखी राजा 


। ततो मनुः श्राद्वदेवः सकज्ञायामास भारत । श्राद्वदेवने अपनी पत्नी श्वद्राके गर्भसे दस पुत्र उस्पन 
किये । उनके नाम ये-ईष्वाकु, चग, शर्याति, दिष्ट, 
धृष्ट, करूष, नरिष्यन्तः पृषध्र, नमग ओर कवि ॥ १ १-१२॥ 


इक्वाङघनरगरायातिदिषटधृष्टकरूषकान्‌ । वेवखत मनु परे सन्तानद्ीन थे | उस समय 


नरिष्यन्तं पषधं च नभगं च कविं विधुः ॥१२॥। स्व॑ समथं भगवान्‌ वसिष्ठे उन्हे सन्तान-प्रातति करानेके 











9 


अद्धायां जनयामास दस पूत्रान्‌ स आत्मवान्‌ ॥११॥ 


र व्यि मित्रावरुणका यज्ञ कराया था ॥ १३ ॥ यज्ञे 
मोः पूवं वसिष्ठो किल वै 

| \ अप्रजस्य मनाः पूव वसिष्ट भगवान्‌ कर । आरम्मर्मे केवर दूध पीकर रहनेषाटी वेवखखत मनुकी 
५4 ह पलार्थपकरेत्‌ दः धमपत्नी श्रद्ाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक 
मित्र भजा भः ५२) याचना की किं सुञ्चेकन्यादह्ी प्रप्तहो॥ १४॥ तब 

तत्र अद्धा मनोः पल्ली होतारं समयाचत । अध्वयुकी परेणासे होता बने इ९ त्राह्मणने श्रद्धाके कथनका 
| त त) स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्‌ कारका उच्चारण करते 
| दहित्रथेपागम्य श म्‌ इए यज्ञकुण्डमे आइति दी ॥ १५ ॥ ज्र दहोताने इस 


्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायंस्त त्‌ सुसमाहितः । प्रकार विपरीत कमं किया, तव यज्ञके फटश्छरूप पुत्रके 
स्थानपर्‌ इटा नामकी कन्या इई । उसे देखकर श्राद्धदेव 


हविषि व्यचरत्‌ तेन वषट्कारं गृणन्दिजः \\ ९५५ मलुका मन कुड विरोष प्रसन नही हा । उन्होने अपने 


हेतसदवयमित्चरिण कन्येला नाम साभवत्‌ । गुर वसिष्ठजीसे कहा ॥ १६ ॥ (भगवन्‌ | आपलोग 
= ० ॐ तो ब्रह्मवादी है, भापका कम॑ इस प्रकार विपरीत फल 
तां विरोक्य मुः प्राह नातिहृष्टमना गुरुम्‌ ।१६॥ | देनेवाका कसे शो गया १ अरे, यह तो बडे दुःखकी 
एः ४ भगवन्‌ किमिदं जातं कर्म वो ्ह्मवादिनाम्‌ । बात है । वेदिक कर्मका ेसा विपरीत फक तो कभी 
= नहीं होना चाहिये ॥ १७ ॥ आपलोगोका मन्तरज्ञान 
विषय यमहा कष्टं मवं स्याद्‌ ब्रह्मविक्रिया ॥१७) | तो रणं है दी; इसके अतिरिक्त आपलोग जितेन्दिय भी 
युयं मन्त्रविद्‌ युक्तासतपभा दुग्धकिरिविषाः द तथा तपस्याके कारण निष्पापदो चुके है । देषताओंमि 
अस॒त्यकी प्रापिके समान आपके संकल्पका यह उक्टा 
विुधेष्विव ॥१८॥ फर कसे इआ ¢ ॥ १८ ॥ परीक्षित्‌ ! हमारे बद्ध- 
| महः । | प्रपितामह भगवान्‌ नसिष्ठने उनकी यह बात सुनकर 

„ मात्मैघ ९ ° । २. पथु वस्व नाभागं । | 





















^  इविषि नष वाच बषभ | 
ध 








० १ 





मचम्‌ स्कन्ध । ~ ॥ 1 


क ्न्या्न्कान्या्यकन्दो्ककण्काग्कन्दाण्कन्कान्कन्कन्कन्कन्या्ान्यका्क्कष्यकव्कन्यण्कषकण्काण्दा्कयया्कययावण्रण्याग्योय ~ कचकयरण्‌ 


च, 


ौ) 
> 


स 











च [+ # [९ तमनवरति ५ ~ 
होतर्व्धतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम्‌ ` ११ | जन च्य किं होतृपन.्वििरीतं संकल्प किया है । इसब्धये 


एतत्‌ संकस्पवेषभ्यं होतस्ते व्यभिचारतः । 
तथापि साधयिष्ये ते सुश्रजास्त्वं खतेजक्षा ॥२०॥ 
एवं व्यवसितो राजन्‌ भगवान्‌ स महायश्चाः । 
अस्तौषीदादिपुरूषमिलायाः पुंस्त्वकाम्थया ॥२१।। 
तस्मे कामवरं तुष्टो भगवान्‌ हरिरीश्वरः । 
ददाविाभवत्‌ तैन सुद्युम्न; पुरुपषभः २२ 
स॒ एकदा महाराज विचरन्‌ स॒गयां बने । 
वृतः कतिपयामास्येर्॑षमारुद्य सैन्धवम्‌ ।२३॥। 
प्रगृह्य रुचिर चापं शराश्च परभाद्ुताच्‌ । 
दंरितोऽनुश्रगं वीरो जगम दिशयुत्तराम्‌ ॥२४॥ 
स ङुभारो बनं मेरोरधस्तात्‌ प्रविवेश ह । 
यत्रास्ते भगवाज्छर्बो रममाणः सहोमया २५ 
तसिन्‌ प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्नः परवीरहा । 
अपश्यत्‌ श्चियमात्मानम्वं च वडवां सृप \) २६। 
तथा तदल्गाः सवै आत्मलिङ्गविपयंयम्‌ 1 
दष्टा पिमनसोऽभूवय्‌ वीक्षमाणाः परस्परम्‌ ॥॥२७। 
राजोवाच 


कथमेवं गुणो देश; केन वा भगवन्‌ छृतः । 


प्रशमनं समाचक्ष्व परं कोतृहलं हि नः ॥२८॥ 
श्रीञ्युक उवाच - 


एकदा गिरिशं द्रष्ड्॒टषयस्तत्र सुव्रताः 1 


उन्ोनि वैवखत मनुसे कहा ॥ १९. ॥ “राजन्‌ ! तुम्हारे 
होन्राके विपरीत संकल्पसे दी हमारा संकल्प टीक-टीक 
ररा नहीं हआ । फिर भी अपने तपते प्रमावसे में तुं 
रेष पुत्र दूंगा ॥ २० ॥ परीक्षित्‌ ! परम यशस्वी भगवान्‌ 
वसिष्ठने रेखा निश्चय करके उस्‌ इय नामकी कन्याको 
ही पुरुष बना देनेके व्यि पुरूषोत्तम भगवान्‌ नारायणकी 
स्तुति की ॥ २१॥ स्शणिानु सवान्‌ श्रीहरिनि 
संतष्ट होकर उन्हं मँहर्मागा वह दिया, जिसके प्रभावसे 
वह कन्या ही सुदुम्न नाभक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी ॥२२॥ 


मह।राज ! एक बार राजा सदुम्न शिकार खेलनेके 
व्यि सिन्घुदेशके षोडेपर सवार होकर ङु मन्तियोकि 
पाथ वनम गये ॥ २३ ॥ वीर सुद्युम्न कवच पहनकर 
सरीर ह।थमे सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अदृस्त बाण केकर 
हरिनिका पीछा करते इए उत्तर दिशामे बहुत आगे बद 
गये ॥ २४ ॥॥ अन्तमं सुद्युम्न मेरपवेतकी तच्हटीके एक 
वनम चे गये । उस वनम भगवान्‌ शंकर पावेतीके 
साथ विहार करते रते हैँ ॥ २५५ ॥ उसमे प्रवेश करते 
दी बीर घुयुम्नने देखा किल दहो गया द्र जर 
घोडा घोड़ी हो गया है ॥ २६ ॥ परीक्षित्‌ । साथ ही 
उनके सब अनुचरोने भी अपनेको खीरूपम देखा । वे 
सब एकः-दूसरेका सह देखने लगे, उनका चित्त बहत 
उदाक्त हो गया ॥ २७ ॥ 


राजा परीक्षितने पृच्छा-मगवन्‌ 1 उष॒ भूलण्डमें 
ठेसा विचित्र गुण कैसे आ गया ९ किंसने उसे एसा 
बना दिया था १ भाप कृपा कर हमारे इस प्रर्नका 
उत्तर दीजिये; कर्कि हमे बड़ा कौतूहल हो रहा 
है ॥२८॥ 


श्रीद्यकदेवजीने कहा- परीक्षित्‌ । एक दिन सगवान्‌ 


शंकरका दरसन करनेके च्य बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि 






अक 


वि द 0 
ष || 


( 















अपने तेजसे दिशाभंका अन्धकार मिरते इर्‌ उस॒ ` 
वनभ गये ।॥ २९ ॥ उप॒ समय अम्बिका देवी वदीन 
थीं 1 ऋषि्योको सदसा आया देख वे व्यन्त खनित हो 


४ > ^ 
+ र 
(्- ~ म = 








दिशो वितिमिराभासाः छवन्तः सञ्चपागमन्‌ ,।२९।। 
वान्‌ विलोक्याम्बिका देवी विवासा वीडिता भूम्‌ | थौ । ऋषियोको सहता आया देख वे श्यनत कित्‌ हो 


= ---् 


क र 
=> ॥ ^ हैर # 
क रे च कक + ~ 
= चिः ति स धिव क १) 1 # ~ 
1; + र नपि ५ 1) ॥ "क, ~ ४ + ~ 
१ ११ + ` 4, ~ क 





ह. ६ | श्रीमद्भागवत 1 


(वि ध्य 
. ्-------------- 


^ न (8 १] गद । श, ट उन्होने भगवान्‌ शंकरी गोदसे उठकर 
रङ्ञात्‌ शतथाय नीरद मिष्तथ्‌ पयंधात्‌ ॥२०।॥ , गय । शट 
| ० बस ` धारण कर न्या ॥ ३० ॥ ऋषियोने भी देखा कि 


ऋषयोऽपि तयोवीय प्रसङ्गं रममाणया । £ | मगवान्‌ गोरीशंकर इस समय बिहार कर रे हं इसव्ये 
निषत्ताः भ्रययुलसान्नरनारायणाश्रमम्‌ ॥२१। बसे लौटकर वे भगवान्‌ नर-नारयणके आश्मप | 
तदिदं भगवानाह प्रियायाः प्रियकाम्यया चरे गये ॥ २१ ॥ उसी समय मवान्‌ शकने अपन | 














प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन कएनेके ल्यि कडा किं | 

सथानं यः प्रविशेदेतत्‌ स वे योषिद्‌ भवेदिति ।।२६॥ भ्र दिवा जो भी पुरुष इस खाने प्रतर करेगा, वही | 

तत छध्वं बनं तद्‌ वे परुषा बजंयन्ति हि। | सी हो जायगा ॥ ३२ ॥ परीक्षित्‌  तभीसे पुरुष उस | 

सा चानुचरसंयुक्ता बिंवचार वनाद्‌ बनस्‌ ॥३३॥ | ख नमे प्रवेश नहं करते । भव सुद्युम्न ली हो गये थे। ् 

~ इसन्थि वे अपने ल्ली बने इए अनुचरोके, साय एक . 

अथ तामाश्रमाभ्याशे चरनं प्रमदोत्तमाम्‌ । | वनसे दूसरे वनम विचरते को ॥ ३३.॥ उसी समय | 
सीभिः परिषतां वीय चकमे भगवान्‌ बुधः ।॥३४॥ | राक्तिशाटी लुधने देखा कि मेरे आश्चमके ध व 

, ~ + , > $ बहुत-सी कियोसे धिरी इई एक सुन्दरी खी विचर र । 

रः ^ १ है | उन्होने इच्छा की किं यह सुद प्राप्त हो जाय ॥२४॥ | 


^ स तखां जनयामास पुरूरवसमात्मजम्‌ ॥२५॥ | उस सुन्दरी ज्लीने भी चन्रकुमार बुधको पति बनाना छ 


एवं सरीत्वमलुप्राप्ः सुद्म्नो मानवो नृपः । चाहा । इसपर ब्रुधने उसके गम॑से पुरूरवा नामका पुत्र 
&ः ९ उत्पन्न किया ॥ २५ ॥. इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युन्न 
ससार खड्लाचाय वसिष्ठमिति शभ्रुम ॥३६॥ | ली हो गये । रेसा सुनते हँ कि उन्होने उस अवस्थामं 






















सतख तां दशां दृष्टा पया शरृशषपीडितः । | अपने इच्धुरोहित वसिष्ठजीकः। स्मरण किमा ॥ ३६ ॥ | 
$ क. = सुदयु्रकी यह दरा देखकर व्िष्ठजीके हदयमे कृपावशा 
> सुम्न ष्टी ख ० ९ पुस्त्वयु | |= ॥ (५ * 

"1 ।५॥ | जयन्त पीडा हर । उदनि युको एनः परुष बना | 
 तष्ट्तस्मं सर भगवानृषये भरियभावहय्‌ । देनेके स्यि भगवान्‌ शंकरकी आराधना + 


की ॥ ३७ ॥ मगवान्‌ शंकर वसिष्ठजीपर्‌ प्रसन्न | 
इए । परीक्षित्‌ । उन्हनि उनकी अभिकिषा परणं 
करनेके च्य अपनी वाणीको स्त्य रखते इए ही ॥ 


यह बत कठी ॥ २८ ॥ धवसिष्ठ | तुम्हारा यह्‌ यजमान ५ 
एक महीनेतक पुरुष रेणा ओर एक महीनेतकं खी । | 
इस व्यवस्थासे बुदयुन्न इच्छायुसार प्ध्यीका पालन | 


| करे ॥ ३९ ॥ इस प्रकार वसिष्ठजीके असुग्रहसे ग्यवस्था- 
पूर्वक अभीश पुरुषत्व खम करके ुदयुप्न पृथ्वीका पाटन 


९ | 

् | करने खगे । प्रतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं कती---` ¦ 
५५ स | थी ॥ ४० | उनके तीन पुत्र इए--उत्कक, गय ओर ५ 
बस >  ॥४१। ¶ | विप । परीक्षित्‌ | बे सब दक्षिणापथके राजा 


ह ~ यः ५ ५५ ॥ ४१ ॥ बहुत दिनके बाद. दृदधावस्था अनेपर 
$ य ----------------------~- ~ (4 | धि ¦ || ¢ > । 0 „क भ्र तेष्ठ ~ ९1 गरीके अधिपति घुयु्नने अपने पुत्र पुख्स्वा 


कः च र (4 ॥ ॐ 
र = त ता कै ~^ १५ ^“ = तरः क = 
षि १ भ | # ५१ [7 5 ^ १ & र +": र ~ # † इश्व द व मः ५ त 
] [ ,¶ ^ 1 4 ¶ ४० । ॥ =+ ~~ ~+ # क्कः “ न १ 4 कै ५.५ ~ =+ ॥- [8 क्यः र) ग ् 
` 4 ॥ 4 ४ (० ॥ क >+ न ~ प । 0 ^ प ~ ८ ९ 
। चथ # म > . चष इ [न ६ क्य नक्रं "4 क = ~" * 
4 ॥ 9 ॥ + 0 § | क| < । ६ 3 । ५ वद च =) = + § > ^ ५ (क क ४, 1 त ~: त १ 
क ण + क च ++ धी 34 त “ # 





# , 
ने 


०२] 


अण्न र कछ ररे 


नरवेम स्कन्धं ` ७ 





- अजा (१.१  ,, 1 














पुरूरवस उत्सूञ्य गां पूत्राय गतो वनम्‌ ॥४२)\ को राज्य दे दिया. खयं तपस्या करनेके व्ये 
वनकी यात्रा की ॥ ४२॥ 
५ - नव्य 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे इृकोपाख्याने 
प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ 


- - गय -द्च्््>~ 





` मन्यमानो हतं व्याघ्र पष परवीरहा \ 





अथ दितीयोऽध्यायः 


पृषथ्च आदि मञुके पोच पुजोका वरा 


श्रीज्चुक उवाच 
एवं गतेऽथ सुद्युम्ने मलुरवैवखतः सुते । 
पत्रकामस्तपस्तेपे युनायां सतं समाः \\ १॥ 
्रथुम्‌ 1 
इश्वाङ्पूर्जान्‌ पूत्रोर्छेभे खसदशान्‌ दश ॥। २ ॥ 
 प्बधरसतु मनोः पत्रो गोपालो गुरुणा इतः \ 


ततोऽयजन्भलुरदेवबमपस्याथं हरि 


पाठयामास भा यत्तो रात्यां बीरासनव्रतः ॥ २ ॥ 
एकदा प्राबिशद्‌ गों शैलो निरि वषेति । 
शयाना माव उत्थाय भीतास्ता बधर्टवेजे ६ ४॥ 
एकां जग्राह बरबान्‌ सा चुक्रोश भयातुरा । 
तखासतत्‌ क्रम्दित शवुतवा परषधोऽभिससार हं ॥ 4 । 
खङ्गमादाय तरकषा प्ररीनोडगण निशि । 
अजानज्नहनद्‌ बभ्रो; शिरः शादूरङ्कया ।। & ॥ 


~ = १ 


ीडयुकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ | इस्‌ प्रकार जब 
घुधुम्न तपस्या करनेके छ्य वनमें चले गये, तव वेवघठत 
मनुने पुत्रकी कामनासे यमुनाके तटपर सौ वर्धतक 
तपस्या की ॥ १] इसके बाद उन्होने सन्तानके 
व्यि सवेशक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीहरी आराधना की 
ओर अपने ही समान दस पुत्र प्राप्त किये, जिनमे सबसे बडे 
इक्ष्वाकु थे ॥ २ ॥ उन मयुपुत्रोमसे एकका नाम था 
पृषध्र । गुर्‌ वसिष्ठजीने उसे गायोंकी रक्षाम नियुक्त कर 
क्खा था, अतः वह रात्रिके समय बड़ी सावधानीसे 
वीर।सनसे बैठा रहता ओर गायांकी रक्षा करता ॥ २ ॥ 
एक दिन रातमं वर्षा ही रही थी । उस समथ गाथके 
डमे एक बाध घुस आया । उपसे डरकर सोयी इड 
गोरं उः खडी इई । वे गोशाकामे ही इधर-उधर भागने 
लगीं ॥ ® ॥ बख्वान्‌ बाघने एक गायको पकड ज्या | 
वह अत्यन्त भयभीत होकर चिल्छने लगी । उसका 
वह करन्दन सुनकर पृषध्र गायके पास दोड आया ॥ ५॥ 
एक तो रातका समय ओर द्रे घनघोर धघटाओंसे 
श्राच्छादित होनेके कारण तारे भी नहीं दीखतेये।. 
उसने हाथमे त्वार उठाकर अनजानमे ही बडे वेगसे 


| च वणो तिद्धिसौ ग्राहतस्ततः 1 गायका सिर काट दिया । वह समञ्ज रहा था किं यदी 
० त ५ | बाघ है ॥ ६ ॥ तल्वारकी नोकसे बाधका भी कान्‌ 
निथक्राम भृशं भीतो रक्तं पथि सत्सुजन्‌ ॥ ७ ॥। | कट गया, वह अयन्त भयभीत होकर रास्तेम खत ` 


गिराता इभा वहसे निकल मागा ॥ ७ ॥ र्दन , ` 


[हि ` ५ ` ष 
~ ~ ; 2 क, छ ५ । ~ ` # इ ५ 
। 
- चै 






८ 


तं शशाप इलाचायंः 
न क्षत्रबन्धुः शद्र्सं कमेणा भविताषना ॥ ९ ॥ 
| एवं शप्तस्तु गुरुणा प्रस्यगरहात्‌ कृताञ्जलिः । | 
अधारयद्‌ व्रतं वीर ऊर्ध्वरेता युनिभ्रियम्‌ ॥१०॥ 
बासुदेवे भगवति ` सात्मनि परेऽमरे । ” 
एकान्तित्वं गतो भक्त्या सवेभूतसुहत्‌ समः ॥११॥ 
विपक्तसङ्गः शान्तात्मा संयताशोऽपरिग्र्ः । 
यद्च्छयोपपन्नेनं कर्पयन्‌ वृत्तिमात्मनः ॥१२॥ 
आत्मन्यात्मानमाधाय ज्ञान त्तः समाहितः । 
विचचार महीमेतां जडान्धबधिराकृतिः ॥१२॥ 
एवंवृत्तो बनं गत्वा श्रा दावामित्थितम्‌ । 
= तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं भुनिः \\१४॥ 
` कविः कनीयान्‌ विषयेषु निःसणहो | 
वरिसुञ्य राज्यं सह बन्धुभिवंनम्‌ । 
निवेश्य चित्ते परुषं खरोचिषं 


विवेच दैलोशवयाः परं अतः ॥१५॥ 


---------------~--~-~--------------------------- ` ˆ~ आ यकन = + 











( भीकर 


९ 
कतामसमकाषतः । 

















कः च" 4 


॥ बसो ध . ध ध ¢ ी = - आओषबानोघवबरि हदु. 
= ता ` * ९ ८५१५. त्युत ` "4" 
। ष 2 च. ४ ~ 
॥ 


2. 
कस्या चाजबता 


० अ ण्र च + 14 
--+----- ~ - --- -ल 


१, शनः | 


. ¢. त | भीमद्भामवते 











[११ 





जाना स कात ज 
क आकः क कण आ क क > य नि ८ 


है, इसे उसे बड़ा दुःख इभ ॥ ८ ॥ यथपि पृष्रन 
जान-बृञ्चकर अपराध नही किंथा था, फिर भी कुल पुरोहित 
वसिष्ठजीने उसे शाप दिया कि (तुम इक्त कसे क्षत्रिय 
नही रोगे; जाओ, शचद्र हो जाओ ॥ ९ ॥ परषधरने अपने 
गुरुदेवका यह शाप अज्ञि बोधकर सीकार किया भौर 
इसके बाद सदाके लये सुनिर्योको प्रिय वगनेषाटे ने्ठिक 
ब्रह्मचर्य त्रतको धारण किया ॥.१० ॥ वह समस्त प्राणिो 
का अहैतुक हितैषी एवं सबके प्रति समान मावसे युक्त 
होकर भक्तिके द्वारा परम विद्ुद्ध सर्वात्मा भगवान्‌ 
वासुदेवका अनन्य प्रेमी हो भया ॥ ११ ॥ उक्तकी 
सारी आकक्ति्यौं मिट गयीं । इत्तर्यां शान्त हो गयीं । 
इन्द्रिय वशम हो गयीं । वह कभी किी प्रकारका सग्रह- 
पिह नहीं रखता था । जो कुछ देवधर प्रप ही 
जाता, उस्ीसे अपना जीवन निर्वाह कर ठेता ॥ १२॥ 
वह आत्मज्ञानसे संतुष्ट एवं अपने चित्तको परमात्मामं 
खितः करके प्रायः समाधिख रहता । कमी-कभी जड, 
अघे ओर बहरेके समन प्थ्वीपर्‌ विचरण करता ॥ १२३ ॥ 
इस प्रकारका जीवन व्यतीत करता इभ वह एक दिन 
वनम गया । वह उसने देखा किं दावानल धधकं रहा 
है | मननरीढ परष्र अपनी इन्दरियाक। उसी. अग्निम 
सम करके परब्रह्म परमात्माको प्रप्त हो गया ॥ १४॥ 

मनुका सबसे छोटा पुत्र था कविं । विषयांसे वहू 
भव्यन्त निशसपह था । वह राञ्य छोडकर अपने बन्धुओं 
कै साथ वनर्मे चला गया ओर अपने हृदयम खयंप्रकारा 
परमासमाको विराजमन कर किशोर अवश्यामं ही परम 
पदको प्राप्त हो गया ॥ १५ 














मनुपुत्र करूषसे कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्न इए | 


वे बड़े ही त्रा्मणमक्त, ध्प्रेभी एवं उत्तरापथे रक्षक 
थे ॥ १६ ॥ धृष्टके धाष्ट नामक क्षत्रिय इए । 
अन्तम बे इक्त ररीरसे ही ब्राह्मण बन.गये । चृगका 
त्र हआ घुमति, उसका पुत्र भूतज्योति ओर मूतज्योति 


का पुत्र वषु था ॥ १७ ॥ वघ्ुका पुत्र प्रतीक ओर. 


प्रतीकका पुत्र ओघवान्‌ । ओघवान्‌के पुत्रका नाम भी 
भोघवान्‌ ही च | उनके एक ओधवती नामकी कन्या 


रथैः = थ जिसका विवाह क हआ ॥१८ ॥ 
[चतरख्ना गारष्यन्तादश्चस्तसय ९ (१, (8 | 1 ८ नस्ष्यन्तसे दिष्यन्तर । नैः | षषः 3. 


1 
५ १,५०.३. ॥ |, ५ 
च 





सवं हिरण्मयं खासीद्‌ यत्‌ किश्चिच॑स्य श्लोभनम्‌ २७ 


` मरुतः परिवेष्टारो वि्वेदेवाः सभासदः ॥२८। 
मरुत्तस्य दमः पुत्रस्तस्यासीद्‌ रोञ्यवधेनः । 
सुधृतिस्तत्सुतो जज्ञे सौधृतेयो नरः सुतः ॥२९॥। 
` तत्सुतः केवलस्तखाद्‌ बन्धुमान्‌ वेगवा सततः 
` बन्धुसतस्याभवद्‌ यस्य ॒सणनिन्दुमंहीपतिः २० 
` तं मेजेऽरुम्बुषा देवी भजनीयगुणार्यम्‌ 





उत्पत्ति दुई ॥ १९ | इन्द्रसेनसे वीतिहोत्र, उससे सत्यश्रवा 
सत्यश्चवासे उरुश्रवा ओर उससे देवदततकी उत्पतति 
इई ॥ २० ॥ देवदत्तके अग्निवेश्य नामक पुत्र इए; 
जो खयं अग्निदेव ही थे । आगे चठ्कर्‌ वे दी कानीन 
एवं महर्षिं जातक्ण्यके नामसे विख्यात इए ॥ २१॥ 
परीक्षित्‌ | ब्राह्मणोका 'आन्निवरेस्यायनः गोत्र उन्दीसे चखा 
है । इस प्रकार नरिष्यन्तके वंशका मैने वणन किया 
जब दिष्टका वंदा खनो ॥ २२॥ ` 


बीतिहोत्रस्तिन्द्रसेनात्‌ तस्य सत्यश्रवा अभूत्‌ । 
उरुश्रवाः रुतस्तसख देवदत्तस्ततोऽभत्‌ ॥२०॥ 
ततोऽग्निवेश्यो भग्वानभ्निः खयमभूत्‌ सुतः ! 

कानीन इदि बिख्यातो जातूकर्ण्यो महानृषिः ।२१। 
ततो ब्रह्मङ्रं जातमाभ्रिरेश्यायनं चप 1 

नरिष्यन्तान्वयः प्रोक्तो दिष्टवंशमतः शृणु ।\२२॥ 
नाभागो दिष्टपुत्रोऽन्यः कमेणा वैश्यतां गतः । दिषटके पुत्रका नाम था नाभाग | यह उस नामाग- 
से अलग है, जिसका मै आगे वणन कगा । वह्‌ 
अपने कमंके कारण वेदय हो गया | उसका पुत्र 
इआ मलन्दन॒ ओर उसका वत्सप्रीति ॥ २३ ॥ 
वत्सुप्रीतिका प्राच ओर प्राद्यका पुत्र इआ भ्रमति । 


भलन्दनः सुतस्तस्य वत्सप्रीतिभलन्दनात्‌ ।।२३॥ 
वत्स॒भ्रीतेः सतः प्राशचश्तस्सुतं प्रमतिं विदुः । 
खनित्रः प्रमतेस्तसाच्वुषोऽथ विर्वि्चतिः ॥२५] 
विर्धिंश्चतिसुतो रम्भः खनिनेत्रोऽख धामिकः। 
करन्धमो महाराज तस्यासीदात्मजो सृप ।२५ 
तस्ाीक्ित्‌ सुतो यख मरु्तश्चकरषत्येूत्‌ । 


हए ॥ २४॥ विविंडातिकरे पुत्र रम्म ओर रम्भके पुत्र 
खनित्र-- दोनों दी परम धार्मिक इए । उनके पुत्र 
करन्धम ओर करन्धमके अवीक्षित्‌ । महाराज परीक्षित्‌ । 


संवर्तोऽयाजयद्‌ य॑ वे महायोग्यद्गिरःसुतः ॥२६॥ 
था ॥ २५-२६ ॥ मरुत्तका यज्ञ जैसा इआ, वैसा 
भौर किसीका नहीं इआ । उस यज्ञे समस्त छोटे-बडे 
पात्र अत्यन्त सुन्दर एवं सोनेके बने इए थे ॥ २७ ॥ 
उस यज्ञम ह्दर सोमपान करके मत्रले हो गये थे ओर 


मरुत्तस्य यथा यन्नो न तथान्यसख कथन । 


अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दश्षिणाभि्दिंजातयः । 


थे मरुद्रण ओर विश्वेदेव समासद्‌ ये ॥ २८ ॥ 










^+ न्मौ 


क. नज्या 


१४. ~~ कद ध क ~ व < 
के 8 (न च प काया सा क चाक वः (मि पक = ~ 
080 किः 3 4 9 = पि नि र "4 छे न णे 5 त 
1 (द ५ । ¬ ०164. ॥ लज. क ~ + 4: र च "+ ॥ छ कश्य क ५ क 
॥ *९ # = र , च च 
1 भ ४० ग, द । , >; ४ 4 श 4, क "~ ^ + > ४ ५१४ =श \ 
, - +> ह द्राज @ (५ ४.६ अ ^ + ६1 १५ ऊ (त (= 
|. र < प 1 + 
त ~ ` च "9 ५ , ¢ व+ 9.4 > चे य 6 9 = 
$| क | ~ ~ ५ द नर ^ ॥ भ (9 ` = ट = 4 न धि न इ 1) 6 ५. ; 0 >: 
= धि च ॥ - न + त यु ५ = # 
>. न 74 पु) । + 
7 + पि क + क), ४ 
: न नैः = ॐ = त्र 


€ 
कि~क ऋ 
हत कि 


प्रमतिके खनित्र, खनित्रके चाक्षुष ओर उनके विरविराति ` 


 अवीक्षितके पुत्र मरुत्त चक्रवती राजा इए । उनसे 
अद्धिराके पुत्र महायोगी संवत्तं ऋषिने यज्ञ॒ कराया 


# 9. [1 ४. 
(06 
क कनः, 


श ° । ॥ त # 8 ॥ त. += 4 ॥ 
त , +; 1, 2, ट. ववि । ` +; (क + ^ | 
+ + 10; - 0५ > ११ १६ +, 1 


| दक्षिणाञजपे ब्राह्मण तृप्त हो गये ये 1 उसमे परसने्राञे ` 


मरुत्तके पुत्रका नाम था दम । दमसे राज्यवर्धनः उससे . 
सुधृति ओर सुधृतिसे नर नामक पुत्रकी उत्ति इ३॥ २९॥ ` 
न्रसे केवकवेवलसे बन्धुमान्‌-बन्धुमानसे वेगवान्‌.वेगवान्‌- 
से बनधु भोर बन्धुसे राजा वणविनदुका जन्म हआ ॥३०॥ ` 
तृणबिन्दु आदश गुणोके भण्डार थे । अप्यराअमिं प 
रेष्ठ अलम्बुषा देवीने उनको वरण किया, जिससे उनके कई 



















[ नक) 














ङ ५ = 
~: . ` भगदधगत [अ० ३ 
। च्च्य वच्च --------------- च ्थ्व्थ्य्व्थ्व्व््व्व---" = 
भ्रादाय विदां परासषिगिशवरात्‌ पितुः ।,२२॥ | विया प्राप्त करके इडविडाके गभसे लोकपाल छुवेरको 
इ; ट ुत्ररूपमे उत्पन किया ॥ ३२ ॥ मारा तृणनिन्दुके 
बिगालः श्यबन्धु भूक तताः । अपनी धर्मपतीसे तीन पुत्र इए विशाल, दल्यवन्धु 
विशालो ब॑शदद्‌ राजा वैशाली निर्ममे पुम्‌ ।।३३॥ | ओर धर्केठ । उनमेते राजा विाक वंशधर इए शर 
हम उन्होने प्रैशाी नामकी नगरी बसाथी ॥ ३३ ॥ विशालसे 
मचन्द्रः सुतस्तसख धृम्राशषस्तखय चात्मजः । हेमचन्द्र हेमचन्ते भूाकष धूर्ते संयम ओर संपमसे 
तत्यत्रात्‌ संय एदासीत्‌ इृशाश्चः सहदेवजः ।॥ २४५] | दो पुत्र इए-- कदास ओर देवज ॥ ३४ ॥ कृशाशचके 
ॐ ् 7जमेवैर्डि पुत्रका नाम था सोमदत्त । उतने अश्वमेध यज्ञके द्वारा 
4, त सोपदतोऽमद्‌ ोऽधमेभरिस्पतिम्‌। यज्ञपति भगवान्‌की आराधना की ओर योगेश्वर स्तोका 
इष्टा परुषपरापारयां गतिं योगेश्वराभितः ॥३५॥ | आश्रय लेकर उत्तम गति प्रात कौ ॥ २५ ॥ सोभदत्त- ‡ 
सोम . < का पुत्र हआ घुमति ओर सुभतिसे जनमेजय । ये सब 
तमदतिस्तु समातस्तत्सता जनमेजयः । तृणबिन्दुकी कीतिको बदानेवकि विशाब्वरी राजा 
एते वैशालभूपालास्तणबिन्दोयंशोधरः ॥३६॥ । इए ॥ ३६ ॥ 
-न--=+क4<ङ---$ 
भ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितां 
र 
नवमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ 
अथ तृतीयोऽध्यायः ६ 
प महर्षिं च्यवन ओर खुकन्याका चरित्र, राजा शायोतिका वंश ॑ 
2 ५ क ्री्ुक उवाच भ्ीद्युकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ । मलुपुत्र 
2 ~ राजा शर्याति वेदोका निशवव्रान्‌ विद्वान्‌ था। उसने 4 














अङ्खिरा गोतरके ऋषियों यज्मे दूसरे दिना कम बतलाया 
था ॥ १॥ उसकी एक कमललोचना कन्था थी । उसका 
नाम था सुकन्या । एक दिन राजा दायाति अपनी ` 


 सकन्या नाम तखासीत्‌ कन्या कमरुरोचना। कल्याके साय नमे धूमते-धूमते च्यवन ऋषिके आश्रमपर्‌ . 





५ रा साध वनगतो गमच्च्यवनाश्रमम्‌ ॥ २॥ | जा प्ये ॥ २ ॥ सुकन्या अपनी सि्योके साय बनमे 
सा सखीभिः परिता विचिन्वत्द्विषय्‌ वने । | ूमूमकर दर्ोका सीन देख रदी थी । उने एक - ग्व 





कन्म दद्ो खचयते श ज्योतिषी कै छेदमेसे जुगनुक्ती तरह दो ज्योति दीख रही 
दैवचोदिता बाला ५ ञ्योति बै। | ६॥ २॥ देवक्षी दुक रेसी दी प्रेरणा थी, खुकन्याने - 
र ८ सक्‌ ततो बहु ॥ ४॥ बाठघुकम चपर्तासे एक कटिके द्वारा उन ज्योतिरयोकों 

† च्यः तत्क्षणात्‌ ण 415 ड लः 4 ₹ | (^ ८ नवो ध 


ज्क् - $ ~ 
न #-> क = ~ 
9 


५.५; ¬ . > = ४, क = 
- = प व + ० 
~! 1) त्‌ र ^ पूजन कि. क 
१ |. ‰ # # ५) १ म |> । (7 ॥ १, 
ह १ द्‌ ~ र~) ध + (र दद ब ॐ। 
* -- ~ नयनैः ॐ द्धः # ॐ 
द्र थ कः क 
न क ~क द एः 1 ॥ धि 
क > व क) ` 
कनि दः त 


कंडाश्च। २. १९ | 


। ०२ न्म स्कन्ध 
| 1 चच्च्व््न्व्व्व्व्व्व्व्वच्वच् 
 राजषिस्तथुपारक्ष्य पुरुषान्‌ विसितोऽत्रवीत्‌ | ५॥ | गया । राजधरं शयांतिकी-य्ट देखकर वड़ा आश्चयं हआ; 
< | उन्हनि अपने तेनिकोंसे कडा-॥ ५ ॥ (अरे, तुभलोगनि 
अप्यभद्र॒ न युष्माभिभांगंवख विचेष्टितम्‌ । कहीं महिं च्यवन नीके प्रति कोई अनुचित व्यत्रहयार तो 
| नदीं कर दिया १ मुञ्चे तो यह स्पष्ट जान पडता है कि ^“ 
हमल्ोगमिसे किसी-न-करिसीने उनके आश्रमर्मे कोई अनं 6 
सुकन्या प्राह पितर भीता कित्‌ कृतं मया । क्या है ॥ ६ ॥ तब सुकन्याने अपने पितासे रते 
डरते कहा कि "पिताजी ! मेने कुछ अपराध अव्य 
` द ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्ने कण्टकेन वं |७॥ | किया है | मने अनजाने दो उ्योतिर्यको क्सि छेद 


दहि पिजत दिया हैः || ७ ॥ अपनी कन्याकी यह बात सुनकर शयांति 
अ हत्तद्‌ वचः ता श्यातिजोतसाघ्वसः । घबरा गये । उन्दने धीरेधीरे स्तुति करके बोँबीमे 


` नि प्रसादयामास बरमीकान्तहितं शनैः ।। ८॥ | @ि" इए च्यन सुनिको ्रसन् किया ॥| ८ ॥ तदनन्तर 
- च्यवन सुनिका अभिप्राय जानकर उन्दने अपनी कन्या 
तदभिप्रायमाज्ञाय प्रादाद्‌ दुहितरं मुनेः । | उन्दं समपित कर दी ओर इ सङ्कटसे छटकर बडी ^ 


सावधानीसे उनकी अनुमति लेकर वे अपनी राजधानीं 
छृच्छान्युक्तस्तमामन्ज्य पुर प्रायात्‌ समाहितः ।९॥ | चरे आये ॥ ९ ॥ 








व्यक्तं कैनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम्‌ ॥ £ ॥ 


सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम्‌ । इर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन सुनिको अपने 

- | पतिक रूपमे प्राप्त करके बडी सावधानीसे उनकी सेवा 

प्रीणयामास चितज्ञा अप्रमत्तायुडृत्तिभिः ॥१०॥ | करती इं उन परसन करने लगी । बह उनवी मनो- 

¦ | वृत्तिको जानकर उसके अनुसार दही बरताव करती 
कस्यचित्‌ त्वथ काख नासत्यवाभ्रमागती। | थी ॥ १० ॥ कुछ समय बीत जानेपर उनके आश्रमपर ~ 

दोनों अश्चिनीकुमार आये । च्यवन सुनिने उनका यथोचित 

` . तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्वरौ ॥११॥ | सतार विया शौर कहा कि शाप दोन समर ह 
इसव्यि सुद्चे युवा अवस्था प्रदान कीन्यि । मेरा ख्य ` 
एवं अवस्था एेसी कर दीजिये, जिसे युवती ज्ञियाँ चाहती ` 
+ करियतां मे बयो सूपं प्रमदानां यदीप्सितम्‌ ॥१२॥ | £। जानता द किआपटोग सोमपानके अिकारी नै, 
रः | फिर मी मे आपको यज्ञम सोमरसका माग दगा ॥११-१२॥ ` 
„ 3 बरादमित्यु चतुविप्रमभिनन्य भिषक्तमौ । वेच-रिरोमणि अधिनीकुमारोने महषिं च्यवनका अभिनन्दन = 
९९५ | करके का, टीक है | ओर इसके बाद उनसे कहा ` 
, . निमजञतां भवानसिन्‌ हदे सिद्धविनिभिते ।॥१३॥ | कि यह सिद्धेकि द्वारा बनाया इआ कुण्ड है, अ" ` 
| इसम्‌ स्नान कीजिये, ॥ १३॥ वयन सुनिके खरीरको 
इत्युक्त्वा जरया ग्रस्तदेहा धमनिसन्ततः जुदापेे घेर रक्ला था । सत्र ओर नसे दील खी यी, , 
हरिया पड़ जाने एवं बाढ पक जानेके कारण वे देखनेमे १ 


ग्रहं ग्रदीष्ये सोम्य यज्ञे वामप्यसोमपोः । 





टिम जग्मू 


भरीमद्धागवत 


त 


क्वि र र 1 -जजवज-=---------~----------- ष्वणि = 1 "1 3 ) ज च, ` चकारः ऋः चि शः ऋ च ` चो = के जो पः चा ऋ क च पोः भि ज सो य क च पो कक भ ज भोः च चोः व्यः चकि ग्व च्व = @ भजक कका शकाः पा चः भक जी कि सो चका स की चको चिका 
ऋय चदा" क ए 
षर भ न्त 


परुषास्य उत्तस्थुरपीव्या वनिताप्रियाः 
पद्मस्रजः इण्डरिनस्तुख्यरूपाः सुवाससः ॥ १५. 


~ तान्‌ निरीक्ष्य वरारोहा सरूपान्‌ घयंवचंसः । 


। अजानती पतिं साप्ती अशिनो शरणं ययो ॥१६॥ 


1 
क 


दर्शयित्वा पतिं तस्यै पातिव्रत्येन तोषितौ । 


ऋषिमामन्त्य ययतुविमानेन त्रिविष्टपम्‌ ॥ १७}. 
यक्ष्यमाणोऽथ शर्यातिर्च्यवनखाश्रमं गतः । 


» 6 ध प 
` ददशं दु्ितुः पाच पुरर ्रथवर्चसम्‌ ॥१८। 


` राजा दुहितरं प्राह इतपादाभिबन्दनाम्‌ । 
जारिषश्ाप्रयुज्ञानो नातिप्रीतमना इव ॥१९॥ 
चिकीषितं ते किमिदं पतिस्त्वया 
प्रलम्भितो लोकनमस्टृतो निः । 
यत्‌ त्वं जराग्र्तमसत्यसम्मतं 
विहाय जारं भजसेऽप्ुमध्वगम्‌ ॥२०॥ 


केकर कुण्डमे प्रवेश किया | १४ ॥ उसी समय कुण्डसे 
तीने पुरुष बाहर निके । वे तीनां ही कमखोकी मालाः 
कुण्डल ओर सुन्दर वज्ञ पहने एक-से माम होते थे । 
वे बडे ह सुन्दर एषं ज्ियोंको प्रिय कगनेवाठे थे ॥ १५॥ 
प्रम साध्वी सुन्दरी घुकन्याने जव देखा किं ये तीनां ही 
एकः ` आकृतिके तथा सूर्यके समान तेजखी हँ, तब अपने 
परतिको न पह चानकर्‌ उसने . अशिनीक्रुपारयोकी रारण 
ठी ॥ १६ ॥ उप्के पातित्रस्यसे अधिनीकुमार बहत 
संतुष्ट इए । उन्होने उसके पतिको बतत दिया ओर 
फिर च्यवन सुनिसे आज्ञा केकर विमानके द्वारा वे खगैको 
चले गये ॥ १७ ॥ 

कुछ समयवे बाद यज्ञ करनेकी इच्छसे राजा शयांति 
च्यवन सुनिके आश्रमपर आये | बहा उन्हनि देखा किं 
उनकी कन्या सुकन्याके पास एक सुथके समान तेजखी 
पुरुष बैठा इआ है ॥ १८ ॥ छकन्याने उनके चरणोकी 
वन्दना की । शर्यातिने उसे आशीवांद नहीं दिया ओर 
कुछ अप्रसन-से होकर बोे--॥ १९ ॥ दुष्टे | यह्‌ तूने 
क्या किया १ क्या तूने सव्रके वन्दनीय च्यवन मुनिको 
धोखा दे दिया १ अव्य ही तूने उनको बृढा ओर 
अपने कामका न समक्नकर छोड़ दिया ओर अव तू इस 
राह चकते जार पुरुषकी सेत्रा कर रदी है ॥ २०॥ 
तेरा जन्म तो बडे ऊचे कुत हआ था । यह उल्टी 







यद्धि तुस्े कंसे प्राप्त इई १ तेरा यह व्यवहार तो कुमे 
कङ्क ल्गानेवाख है । अरे राम राम | त्‌ निल होकर 
जार पुरुषकी सेवा कर रही है ओर इस प्रकार अपने 
पिता शौर पति दोनोकि वंशको धोर नरकमें ले 
जा री हैः ॥ २१॥ राजा शर्यातिके इस प्रकार कहने- 
पर पवित्र सुसकानवाटी सुकन्याने ससकराकर कहा-- 
पिताजी | ये आपके जामाता खयं भृगुनन्दन महर्षि 
च्यवन ही हें” || २२ ॥ इसके बाद उक्तने अपने पिताये 
महभि च्यवनके यौवन ओर सौन्दर्थकी प्रापिका सारा 
दृततान्त कह सुनाया । वह सब्र सुनकर राजा शयाति 
अत्यन्त विस्मित इए । उन्होने बडे प्रेमसे अपनी पुत्रीको 
गङ्से खगा ल्या ॥ २३ ॥ 


` महर च्यवनने ^ महति व्यनने वीर्‌ शवयोतिसे सोमगङ्ञका अनु्ान दायातिसे सोमयज्ञका अनुष्ठान 


कथं मतिस्तेऽवगतान्यथा सतां 
+  इरप्रषते इरदूषणं विदम्‌ । 
बिभषिं जारं यदपत्रपा इलं 


पठि भेतुश्च नयखधस्तमः॥२१॥ 
एवं च्ुवाणं पितरं खयमाना शुचिसिता | 













अतमपरप्यधनाश्च्यवनः स्वेन तेजा ॥२४।। | कखाया ओर सोमपानके अधिकारी न हयोनेपर भी अपने 
प्रमावसे अधिनीकुमारे नो सोपपान कराया ॥ २४ ॥ ` 


हन्तु तमाददे वं सद्योमन्युरभपिंतः | 


सवज स्तम्भयामास थजमिन्द्रय भार्गवः ॥२५॥ 


व 
कै 


अन्वजानंस्ततः सवे ग्रहं सोमख चाधिनोः । 


भिषजाविति यत्‌ पूवं सोमाहुत्या बहिष्डृतौ ।२६॥ 
उन्तानभहिरानतो भूरिषेण इति त्रयः| 
शयातेरभवन्‌ पुत्रा आनर्तद्‌ रेवतोऽभवत्‌ \\२५७॥ 
साऽन्तःसूद्रे नगरीं विनिर्माय इुशखरीस्‌ 1 


आखितोऽथङक्त विषयानानतीदीनरिन्दम ।\२८॥ 


तस॒ पू्रशतं जज्ञे कङुभिज्येषटसु्तमम्‌ । 
कडक्यी रेवतीं कन्यां खामादाय विथु गतः ।\२९॥ 


कन्यां परष्टुं ब्रहमलोकमपादृतम्‌ । 


आवतंमाने गान्धर्वे शितोऽरब्धक्षणः षणम्‌ ॥२०॥ 


तदन्त आद्यमानम्य खाभिप्रायं न्यवेदयत्‌ । 


अहो राजन्‌ निरुद्ास्ते कालेन हृदि ये कृताः । 


1 तलपत्रपौ्नप्तणां गोत्राणि च न शृण्महे ॥२२॥ 


कालोऽभियातल्िणवचतर्युमविकसिितः । 


` तद्‌ गच्छ देवदेवांशो बरदेवो महाबलः ॥२३॥ 


कन्यारत्नमिदं राजन्‌ नररल्नाय देहि भोः । 


~~ ~ 


तर््त्वा भगवान्‌ जरह्मा प्रहस्य तमुवाच इ ।३१॥। 





द्र बहुत जल्दी क्रोध कर वेठते हैँ । इसव्थिये उनसे 
यह सदा न गया । उन्होने चिदृकर्‌ शयांतिको मारनेके 
ल्य वज्र उठाया | महर्भि च्यत्रनने वञ्रके साथ उनके 
हाथको वहीं सम्मित कर दिया ॥ २५॥ तब सुव 


देताओनि अधिनीकुमारोको सोमका भाग देना खीकार | 
क्र छया । उन लोगोँने वैय दहोनेके कारण पहले 


अश्चिनीकुमार्योका सोमपानसे बहिष्कार कर रक्खा 
या॥२६॥ 


परीक्षित्‌ | रायांतिके तीन पुत्र थे-उत्तानवर्ि, 


आनतं ओर भूरिषेण । आनतंसे खत इए ॥ २७॥ ` 
महाराज | रतने समुद्रके भीतर कुरास्यली नामकी एक ` 
नगरी बसायी थी । उसीमें रहकर वे आनतं आदि देशो ` 


का राज्य क्रते थे ॥ २८ ॥ उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र ये, 


जिनमे सबसे बडे ये कङुग्री । कठुर अपनी कल्या - 


रेवतीको लेकर उसके स्थि वर पूनेके उदेदयसे ब्रह्माजीके 
पास गये | उस समय व्रमलोकका रास्ता रेसे छोगोकि 


व्यि बेरोकटोक था । ब्रह्मलोके गाने.बजनेकी धूम ` 


मची इई थी । बातचीतक्े य्य अवसर न मिर्नेके 


कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये ॥ २९-२०॥ ` 


उत्स॒वके अन्तमं ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्हनि 


| अपना अभिप्राय निवेदन किया । उनकी बात दघुनकर `` 
मगान्‌ ब्रस्माजीने हसकर उनसे कहा ॥ ३१॥ महाराज | ` ह: 
तुमने अपने मनम जिन छोगेकि विषयमे सोच रक्वा था, ` 
वै सब तो कालके गाम चले गये । अब्‌ उनके पुत्र, ` 
पोत्र अथवा नातिरयोकी तो बात ही क्या है, गेत्रोके 


२५ श ४ नकन 
च | 4 


~$ 





नाम मी नदी सुनायी पढते ॥ ३२॥ इस स बीचमे 











साई चतुयुगीका समय बीत चुकता है । इसच्िं त तुम 2 








जाओ । शस समय मगतरान्‌ नारायणके अंशावतार महाब द र ~ 


भीतेन बा न 
१. "ष्ये शः स - 4 
(६ 






\ १७ 4 भीमद्धागवत | अ० ४ 
+6 ५ 


चरर्णोकी वन्दना की जौर अपने नगरमे चले आये । 
उनके धशाजेनि यक्षोके मयसे वह नगरी छोड दी थी 
“ त्यक्तं पुण्यजनवासाद्‌ भ्राठभिरदिक्ववथितः॥ २५ | ओर जद तदयं यो दी निवास कर रहे थे ॥ ३४-३५॥ 
‡॥ राजा कुद्यीने अपनी सर्ाङ्गुन्दरी पुत्री परम ब्याढी 
4 सुतां दच्वानवदाङ्गीं बलाय बरशारिने । बलरामजीको सप दी ओर खयं तपस्या कनेक च्वि 
मगान्‌ नरनारायणके आश्रम बद्रीवनकी ओर च 


 \ बदयाख्यं ग॑तो राजा तप्तुं नारायणाश्रमम्‌ ॥३६॥ , दिये ॥ २६ ॥ 


। इत्यादिष्टोऽभिवन्ाजं चपः सपुरमागतः 





ह 





इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे 


{ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ 
र 
- न्व 
अथ चतुर्थोऽध्यायः 
नाभाग जर भम्बरीषश्षी कथा 

श्रीक उवाच ध्ीटयुकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ । मलुपुत्र 
ॐ | सिम्‌ नमगका पुत्र था नामाग | जब वह दीधकार्तक ब्रह्म- 
नाभागो नभगापत्यं यं ततं भरातरः कविम्‌ । | चर्यका पालन करके ठटा, तप्र बडे मा्योनि अपनेसे 


2 । छोटे विंतु विद्रान्‌ माईको हिस्सेमं केरल पिताको दही 
यविष्ठ व्यभजन्‌ दायं बहमचारिणमामतम्‌ ।। १। | दिया ( सम्पत्ति तो उन्होने पहले ही आपसे बोँट ढी 
ध थी ) | १ ॥ उसने अपने मादयसे प्रछा-माईयो । 

। आतरोऽभाङ्क्त पि मह्य भजाम पितरं तव । आपलेगनि सुनने दिस्येमे क्या दिया है १ तत्र उन्होने 
(प ५. उत्तर दिया किं इम तुम्हारे हिस्सेमं पिता नीको ही तुम्हे 
८ त्वां ममाय इम्‌ पुत्रक तद च्याः ॥ ९ ॥ | देते है उने अपने पितासे जाकर कहा-- "पिताजी | 
। मेरे बड़े भाने हि्सेमं मेरे वि आपक्रो ही दिया 
इमे अङ्गिरसः सत्रमासतेऽय सुमेधसः है ।' पिताने कहा-धेटा | तुम उनकी बात ल्ल 

मानो ॥ २॥ देखो, ये बडे बुद्धिमान्‌ आङ्खिरस-गोत्रके 
षष्टं पृष्युपेत्याहः कवे युद्यनिति कमणि ॥ २॥ | ब्राह्मण इष समय एक बहत बडा यज्ञ कर रषे है | 
द परंतु मेरे विद्वान्‌ पुत्र | वे प्रत्येक छठे दिन अपने 
| रः तांस्त्वं शस्य क्ते दे वेधदेवे महात्मनः । कम॑मे भू कर बैठते है ॥ २ ॥ तुम उन महात्माअकि 
= ह. स गास जाकर उन्द वेशवदेषपम्बन्धी दो सूक्तं बतव्य॒दो; 
ते खयन खयंन्तो , धनं सत्रपरिदिषितमात्मनः ॥ ४॥ | जब वे सगं जाने करगे, तत्र यजसे बचा इआ अपना 

ध तेम सारा धन तुम्हे दे दंगे । इसव्ि अत्र तुम उन्दकि पाष 

दाखन्त तेऽथ थता तान तान्‌ गच्छ तथास्‌ छृतवाच्‌ यथा 1 | चरे जाथ ।' उसने अपने पिताके आश्ञातुपार वैसा 

 - ४ त ही विया । उन आद्गिरसगोत्री बाहमणेनि भी यक्ञका बचा 

परिशेषितम्‌ ॥ ५॥ इश धन उसे दे दिया ओर  खर्गमे चले गये ॥ ४-५॥ 

















^ + ज ५४ “ भ ति ५ ॥ > ~ । 
"थ = ¶ ३ > ५ "न, 4 #; प ह > ० च द. ॐ, ५ भ्व र ५ 
९ ष "त, छ ("न +, न्ड + ह # क # ४ 4 ५ 


र । ॥ ॐ ^ » ए 
॥ न्क" दु कज ' 4 क + 3 %- 4 ¢ > ५४४ 1 त =) 9 ह ४, 
व~ "८2 # 
~ + "क ५. क~ = क = ८ य ने # 4 । नये => 
त्नः = हक 9 49 ग." भद वक द प 
+ (न भक ++  2.^ ° "ॐ, र्यौ, ए ५ ष 
ते} + 1 + ४ 9.4 -) न (= भ 


#। ५ | | । र 4 । | क .- कः 8 शि , ( र ( न । १ त: १ । {4 ॑ 


अद्-जदः - तिर 
२ य । न ॥ "+ ९ 
+ # £ र द त १ (1 / 
> 4 ¢ ५४ ८८. -- +^ +> नि 
+ ५4 | र च न ८ क < क) ५ 
< च [| ५ क -५ म्रः च, 
[क * > हि ५ क ऋ, > चच | 9 ॥ ॥ क 
ष क 


शिण मै = ~; $~ - ह 


>~ 
> 


4 १ ४ 


भत्‌ ते पितावदद्‌ धम लं च सत्यं परमपसे । 


; भगवञ्छरोतुमिच्छामि राजस धीमतः 






` अ० ४] 





त कित्‌ सी रिष्यन्तं पुरुषः क्रष्णदश्चनः | = जव नाभाग उप्त धनको लेने लगा, तत्र उत्तर दिला ` 3 
| से एक काठे रंगका पुरुष आया । उक्षन क्हा-- ष ` 
यज्ञभूमे जो ङु वचा हओ है, वह सव्र धन 
मेरा हैः ॥ ६ ॥ = 

नामागने कहा-- (छयनि यह धन मुञ्चे दिया है, र 
इवे मेरा है । इक्तपर उक्त पुरुषने कडा-'हमारे ` ॥ 
रिवादके विषयमे तुम्हारे पितासे ही प्रन क्रिया जाय ॥ 
तब नाभागने जाकर पितासे प्रछा ॥ ७ ॥ पिंताने कशा- 
(एक बार दक्षप्रजापतिके यज्ञे ऋष्रिखोग यह निश्चय 
कर चुर ह कि यज्ञभूमिमे जो कुछ वच रहता है, वह 
सब रद्रदेवका हिस्सा है । इसव्ि वह धन तो 
महादेवजीको ही मिलना चाये ॥ ८॥ नाभागते ` 
जाकर्‌ उन काठे रगके पुरुष रुदमगवानको प्रणाम क्या 
ओर कहा कि श्रमो | यज्ञमूमिकी सभी वस्तुं भापकी है, ` 
मेरे पिताने एसा ही कडा है । मगवन्‌ । सुञ्से अपराध 

हआ, मे सिर ज्लकाकर आपसे क्षमा मँगता ह ॥९॥ 

तब मगवान्‌ दने कडा-^तुम्हारे पिताने धर्भके अनुकूढ ` 

निर्णय दिया है ओर तुमने भी मुङ्गसे सत्य द्यी क्डा ` 
दै । तुम वेदोका अर्थं तो पहठेसे ही जानते हो । अब ` 

म तम्हं सनातन ब्रहमतत्वका ज्ञान देता दं ॥ १० ॥ 

यहं यज्ञम बचा इञ मेरा जो अंश है, यह धन भी चै 

तम्हं ही दे रहा ह तम इसे खीकार करो | इतना 
कहकर सत्यप्रेमी भगवान्‌ रुदर अन्तधान हो गयं ॥ ११ ॥ 

| जो मनुष्य प्रातः शौर सायका एकापरचि्तसे इस्‌ 

आस्यानका स्मरण करता है, वह प्रतिमाशाटी एवं वेदज् ८ = 

तो होता ही है, साथ ही अपने खरूपको भी जान लेता 

है ॥ १२ ॥ नामागके पुत्र इर अम्बरीष ! वे भगवान्‌के 

बड़ प्रेमी एवं उदार धमासा ये । जो ब्रह्मराप क = 

कहीं रोका नही जा सका, वह भी अम्बरीषका खश 

न कर सका ॥ १३॥ "६ 


> 
१ २). 

व. 

2.4८ 0, ४ 

4 नक 

= 4 


उवाचोचरतोऽम्येत्य ममेदं वस्तुकं बसु ॥ ६ ॥ 
ममेदमृिभिरदत्तमिपि तहिं स मानवः । 


` खान्नो ते पितर प्रनः एषटवान्‌ पितरं तथा ॥ ७॥ 


यज्ञवास्त॒गतं सवेयुच्छिष्टमृषयः . कचित्‌ । 
चक्रु्विभागं रुद्राय स॒ देवः सर्वमर्हति ॥ ८॥ 
नाभागस्तं प्रणम्याह तवेश किरु वास्तुकम्‌ । 


$ 
इत्याह मे पिता ब्रह्मञ्छिरसा त्वां प्रसादये ।॥ ९॥ 


ददामि ते मन्त्रदशे ज्ञानं ब्रह्म सनातनम्‌ ॥१०॥ 
गृहाण द्रविणं दत्तं मत्सत्रे परिशेषितम्‌ । 
इत्युक्त्वान्तहिंतो रुद्रो भगवान्‌ सत्यवरसरः ॥११॥ 


य एतत्‌ संसरेत्‌ प्रातः सायं च सुसमाहितः । 







| 4 „0 भे द ४ (ॐ "क चन ॐ नै 
॥ ४. {9 क 4.91 
नै - >. १४७५ 4 # ४ त । ८५ च न । ४) ४ ५, | "क 1. 
, "न च 11 अ 9. 74 ५ ~9 ५ ५१,.१ द ५।। 





कषिभेवति मन्त्रज्ञो गतिं चैव तथाऽऽत्मनः ॥१२॥ । 





7 [+ # 
ट, ४ (व + 


नाभागादम्बरीषोऽभून्महाभागवत्‌ः छरती । 











नास्पृश्चद्‌ ब्ह्मशापोऽपि य॑ न प्रतिहतः कचित्‌ ।१३। 


च च 


छ ` चर स 
क षः ङ न ५ 
ह `, न २ शः ~+ ४ ह्र ~ जवी "ह चि -त 
राजोवाच 4 -मगवन्‌ ` ५३ च 4 >» च ६। र १३५, त ^ ॥ > ड स कक 
क्र छि, भे * ॥(. द अ, क क ¶ ०० ५ 
ह # क्षितने -< - = भ कक . 99 च +~ = 3 ; +>} क ४.६ [2 ष न. ४ ९ 
# [जा रीं 09 | & 4 4 ~ @, ५ 
ब्‌ # । ` " ^"; ॥ 1 ०.8. ] ५4 1 ह; =^. ` ॥ 
१८०. 6 > [लः क्र" 8 १, # किः 
४3, “अ += 
॥ धि लि ओ 1 +र 











+ न प + 
। + ह 1 
न दख # नि ` 
"द ठ क ठ 
निक्तो द, = 4 श > 
श्चि & ज ण ४ ष # बिगाड़ = # १ क 4 ] 
१ ह. 1 (. 
# ॥ ब्रह्मदण्ड / 9 ॐ 9 5 
६ भ त # | = 
| व. च्ष्द ची (> £ 
== - वक कै" वं क. ० >. १ कः भ > 
--------- ~~~ भटः कल --- - 
ग्द +~ च. दैः रे ,4 । । 
; ३ ३ क" न ^ 1 १ = न= 
~~ च+ 


ब 
४ 
[५ 
ज्ज 
> 
+ 9 
कि 
स 


क्कि उन्हें 
॥ । क 
क्रोधि च त्‌ ॥ ^ = ध 4 (0 
+~ > ~ ~~ होकर ५ 4 ५ "त (प भ ` ६ ४. 
६ .१ गगर, न पे 
कै नि * ~ "न 
3 ॐ + कटः 
4 भम्‌ = ४ नहीं च =^, ^, ऋ ४ 
हि ~. 1 ४ । ह 
| 2, ५ ऋ, र 
१ & ४, ४> ९ [8 ॐ 
+ भै ॥ जा # 0 ६। ॥ 1 ॥ # कै 
4 $ ४१५ क ५ 
प \ क र 4 क ^ ङ्ध ति ऋ 
५ क 
^ प ^ 
न्क 


~ ५ न 
~~ $ » म न 
=. $. 4 र ॐ 
ॐ भ 
7 + १ च 2 


(3. ¬ 











र श्रीचयुके उवाच ` 
अम्बरीषो महाभागः सपद्वीपवतीं महीम्‌ । 
अव्ययां च भियं रग्ध्वा विभवं चातुरं वि ॥१५॥ 
।  मेनेऽतिदरभं पुंसां सवं तत्‌ खप्नसंस्ततस्‌ । 
^ विदान्‌ विभवनिर्वाणं तमो विशति यत्‌ पुमान्‌ ।१६। 
` वासुदेवे भगवति तद्धक्तंषु च साधुषु । 
प्रापो भावं परं विशं येनेदं रोष्टवत्‌ स्पृतम्‌ ॥१७॥ 
स॒ वै मनः छष्णपद्‌रविन्दयो- 
 वचांति बैङुण्टगुणालुबणने । 
करौ हरेभन्दरिमाजेनादिषु 
श्रुतिं चश्चाराच्युतसत्कथोदये ।१८॥ 
युञखन्दरिङ्खारयदशंने दशो 
तद्भृत्यगात्रसपशेऽङ्खसङ्गमम्‌ । 
घराणं च तत्पादसरोजसोरमे 
भीमत्तरस्या रसनां तदपिते ॥१९॥ 
पादौ हरेः शेत्रपंदालुसपेणे 
शिरो हषीकेशपदाभिवन्दने। 
कामं च दास्ये न त॒ कामकाम्यया 
यथोत्तमश्छोकजनाश्रया रतिः ॥२०॥ 
+ वं सदा कमकलापमात्मनः 
परेऽधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे । 
सवीत्मभावं विदधन्महीमिमां 
 उचष्टपाभिहितः पशा इ ।२१॥ 
` | ` $नेऽधमेषैरधिय्तमीशवरं 
| महाविभूत्योपचिताङ्गदधिणेः । 







। १६. क श्रीमद्धामर्बतं | [अन्४ 





भरीदयक्षदेवजीने कदा- परीक्षित्‌ ! अम्बरीष बडे 
माग्यवीन्‌ ये । पृरध्वीके सातां द्वीप, अचल सम्पत्ति ओर 
अतुलनीय रेच्य उनको प्राप्त था । यद्यपि ये सब 
साधारण मलुष्योके ल्ि अत्यन्त दकम वस्तुए्‌ हँ; फिर 
भी वे इने खप्नतुस्य समक्षते ये; व्योकि वे जानते थे 
कि जिस धनवैमवके बोममे पड़कर मनुष्य घोर नरकमं 
जाता है, वह केवल चार दिनकी चांदनी है । उस्तका 
दीपक तो बुञञा-बञ्ञाया है ॥ १५-१६॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णे 
जीर उनके प्रेभी साधुओमे उनका परम प्रेम था । उस 
रमक प्राप्त हो जानेपर तो यह सारा विद्व र इसकी) 
समस्त सम्पत्तियं मिद्रीके ठेकेके समान जान पडती 
है | १७ ॥ उन्होंने अपने मनको श्रीकृष्णचन्द्रके चरणा- 
रविन्द युगठ्मे, बाणीको मगवदणानुवणंनमं, हाथो को श्रीहरिः 
मन्दिरके माजंन-सेवनम ओर अपने कार्नाको मगवान्‌, 
भच्युतकी मङ्गकपयी कथाके श्रवणमं लगा रक्खा था ॥ १८॥ 
उन्होने अपने नेत्र सुकुन्दमूतिं एवं मन्दिरोके ददानम 
अङ्ग-सङ्गं॑मगवद्क्तकि ररीरस्परोमे, नासिका उनके 
चरणकम्लपर चटी श्रीमती तुरुसीके दिव्य गन्धम ओर 
रसना ८ जिह्वा ) को भगवानके प्रति अर्पित नेवेब- 
प्रसादे संक्न कर दिया था॥ १९ ॥ अम्बरीषके 
पैर मगवान्‌के क्षेत्र आदिकी पैदल यात्रा करनेमं ही ल्गे 
रहते ओर वे सिसे भगवान्‌ श्रीकृष्णवे चरणकमर्काकी 
वन्दना किया करते | राजा अम्बरीषने माला, चन्दन 
आदि मोग-सामम्रीको भगवान्‌की सेवामें समपित कर 
दिया था । भोगनेकी इच्छासे नरह, बल्कि इसव्िये किं 
इससे वह मगवत्पेम प्राप्त हो, जो पवित्रकीतिं भगवान्‌वे 
निज-जनोमिं ही निवास करता है ॥ २० ॥ इस प्रकार 
उन्होने अपने सारे कमं यज्ञपुरुषः इन्दियातीत भगवान्‌के 
प्रतिं उन स्वात्मा एवं सवंखरूप समञ्चकर्‌ समर्पित कर 
दिये थे भर मगवद्रक्त ब्राहम्णोकी आश्ञाके अनुसार 
वै इस पृथ्वीका रासन करते थे ॥ २१॥ उन्होने 
(धन्व नामके निजंठ देरामे सरखती नदीके प्रवाहके 
सामने वसिष्ठ, असित, गोतम आदि मिन-मिन भाचार्यो- 
दवारा महान्‌ रेश्वयंके कारण सवाङ्गपयर्णं तथा बड़ी-बड़ी 


दक्षिणावाले अनेकां अश्वमेध यज्ञ॒ करके यज्ञापिपतिं 





क 





यद्य क्रतुषु गीवाणैः सदसा ऋत्विजो जनाः । 


ट 


त॒ल्यरूपाशानिमिषा व्यदस्यन्त सुवाससः ।॥२३॥। 
खर्गो न प्राथितो यख मनुजैरमरप्रियः . 


ˆ शृष्बद्धिरुपगायद्धिरु्तमश्छोकवेष्टितम्‌ २४ 


समद्धयन्ति तान्‌ कामा; खाराज्यपरिभाविताः । 


~ 


दुरभा नापि सिद्धानां युङन्दं हदि प्॑यतः ।२५॥ 


सृ इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पाथिवः । 


खधमेण हरिं प्रीणन्‌ सङ्गान्‌ सर्वाञ्छनैज॑हयौ ।।२६॥ 


गेषु दारेषु सुतेषु बन्धुषु 
दिपोत्तमखन्दनवार्निपत्तिषु । 

अष्षव्यरल्ञाभरणायुधादि- 
ष्वनन्तकोशेष्वकरोदसन्मतिम्‌ ॥२७॥ 


„, तसा अदाद्भर्थिक्रं प्रत्यनीकभयावहम्‌ । 
श 


- च्छु 
र, । 


` शएकान्तभक्तिभवेन प्रीतो भत्याभिरक्षणम्‌ ॥२८॥ 
आरिराधयिषुः कृष्णं महिष्या तुल्यसीरया । 
युक्तः सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीव्रतम्‌ ॥२९॥ 

व्रतान्ते कातिंके मासि भरिरात्रं सपोषितः । 




















मगवानूकी आराधनां की थी ॥ २२ ॥ उनके यज्ञम 
देवताजकि साय जव सदस्य ओर ऋलिज वंढ जाते थे 
तब उनकी पलक नहीं पड़ती थीं ओर वे अपने घुन्दर 
वज्र ओर वैसे ही रूपके कारण देवताके समान 


दिखायी पडते ये ॥ २३ ॥ उनकी प्रजा महात्माअकि 
दारा गाये इए भगवान्‌के उत्तम चस्रंका किसी समय 
बड़ प्रेमसे श्रवण करती ओर किसी समय उनका गान 
करती । इस प्रकार उनके राज्यके मनुष्य देवताअके 
अत्यन्त प्यारे खगंकी भी इच्छा नहीं करते ॥ २४ ॥ 
वे अपने हृदयम अनन्त प्रेमका दान करनेवाठे श्रीहरि- 
का नित्य.निरन्तर दशन करते रहते थे । इसु्िये उन 
लोगोको वह भोग-सामम्री भी हर्षित नही कर पाती थी; 
जो बड़े-बड़े सिद्धोको भी दुरम है । वे वस्तुं उनके 
आत्मानन्दवे सामने अत्यन्त तुच्छ ओर तिरस्क्रत 
थीं ॥ २५ ॥ राजा अम्बरीष इसु ग्रकार तपस्यासे युक्त 
भक्तियोग जीर प्रजापाल्नरूप खध्मके द्वारा भगवानूकतो 
प्रसन्न करने लगे ओर धीरेधीरे उन्होने सब प्रकारक 
भासक्तिरयोका परित्याग कर दिया ॥ २६ ॥ धर, खी; 
पुत्रः, माई-बन्धु, बडे-ब्डे हाथी, रथ, घोडे एवं पैदर्गोवी 
चतुरङ्गिणी सेना, अक्षय रनः, आमूषण नौर आयुध 
आदि समस्त वस्तुओं तथा कभी समाप्त न होनेवाछे 
कोराकि सम्बन्धमे उनका रेसा इ निश्चय था कि वे 
सबके सब असत्य है | २७ ॥ उनकी अनन्य प्रेममयी 


घुदशेन चक्रको नियुक्त कर दिय्‌। था, जो विरोधिर्योको 


है ॥ २८ ॥ 













मक्तिसे प्रसन्न होकर मगवानने उनकी रश्चके च्थिं ` 


मयमीत करनेवाा एवं मगवद्क्तोकी रक्षा करनेवाला 


5 = 

राजा अम्बरषकी पनी भी उन्हीके समान षमंदीक) ` ` ५ 
संसारसे विरक्त एवं भक्तिपरायण थीं । एक बार उन्होने र 
अपनी पलीके साय मगवान्‌ श्रीृष्णकी आराधना करने 
के ष्ि एकं वर्तक दवाद्ीप्रान एकादशी ब्रत केका ` 
| नियम ग्रहण किया ॥ ॥ त्रतकी समपि होनेपर ` 


र क ॥ ध | ५ 
ः 2 र "यः ¢ त 
० ४ | नवम्‌ स्कन्धं ५ 1 
~ 3 












महाभिषेकविभिना सर्वोपस्करसम्पदा । 


` यथावेऽभ्यवहाराय पादमलुपागतः ।३६। 


4 4. क 1 ~+ 
०" १५. क, त भ ।, ०. +^ १ 


@ 











्रीकृष्णकी प्रूना की ॥ २० ॥ उन्होने महाभिषेककी 
विर्धिसे सब प्रकारवी सामग्री ओर सम्पत्तिदरारा मगवान्‌- 
अभिषिच्याम्बराकलवैगन्धमास्याहंणादिभिः॥३१॥ । का अभिषेक किया ओर इदयसे तन्मय होकर वख; 
आमूषण, चन्दन, मात्म एवं अध्य आदिके द्वारा उनकी 
पूना की । यदपि महामाग्यवान्‌ त्राह्मणोको इस प्रूजाक्षी 
कोई आवद्यकता नही थी; खयं ही उनकी सारी 
कामना पूर्णं हो चुकी थी-वे धिद्ध थे-- तथापि राजा 
अम्बरीषने भक्तिमावसे उनका प्रूजन किया । तयश्वात्‌ 
पहले ब्राह्मणोको खादिष्ट ओर अत्यन्त गुणकारी भोजन 
कराकर उन छोगोके धर साठ करोड़ गोपं घु्न्ित 
करके भेज दीं । उन गौओकि सींग सुवणैसे ओर सुर 
चोदीसे मदे इए थे । सुन्दरसुन्दर वल्ञ उन्हे ओद 
दिये गये थे । वे गौरं बड़ी सुश्चीक, छोटी अवस्थाकी, 
देखनेमे सुन्दर, छडवाल्ग ओर सू दूध देनेशली थीं ¦ 
उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होने मेजवा 
दी थी ॥ २१-३ ॥ जब त्राह्मणोंको सव कुछ भिदः 
चुका, तब राजाने उन कगोंसे आज्ञा टेकर्‌ त्रतक्रा 
पारण करनेकी तैयाी की । उसी समय जाप ओर 
वरदान देनेमे समथं खयं दुर्वासाजी भी उनके यहां 
अतिथिवे रूपमे पधारे ॥ ३५॥ 
राजा अम्बरीष उन्हं देखते ही उठकर खड़े हो गये, 
आसन देकर बैठाया ओर विषिध सामभ्रियोंसे अतिथिके 
ख्पमे आये हए दुर्बासाजीकी पूना की । उनके चरणो 
मे प्रणाम करके अम्बरीषने मोजनके च्ि प्राना 
की ॥ ३६ ॥ दुवांसाजीने अम्बरीष्की ग्रार्थना खीकार 
कर टी ओर इसके बाद आवर्यक कममेसि निधत्त होनेवे 
व्व वे नदीतटपर चले गये । वे ब्रहमका ध्यान करते 
हए य्रुनाके पवित्र जल्पे स्नान करने लगे ॥ ३७ ॥ 
इधर द्वादशी केवकं षड़ीमर शेष रह गयी थी । धर्मज्ञ 
अम्बरीषने धमं-सङ्कटमे पड्कर ब्राहमणोके साथ पराम 
किया ॥ ३८ ॥ उन्होने कदा--श्राहमणदेवताभो । 
बरह्मणको बिना भोजन कराये खयं खा ञेना ओर 
दादरी रते पारण न करना- दोनों हयी दोष है । 
` क , इसच्यि इस समय जैसा करनेसे मेरी भत्र हो ौर 
टता सथु म भूयाद्यमावान्‌ मां स्पृशेत्‌ ।३९ | सुच पाप नके, एसा काम करना च्वियेः ॥ ३९ ॥ 


तद्गतान्तरभावेन पूजयामास केशवम्‌ । 


जाहणां ख महाभागान्‌ तिद्धाथानपि भक्तितः २३२. 










गवां समविषाणीनां रूप्याडघ्रणां सुवाससाम्‌ । 

पय;शीलवयोरूपचत्सोपस्फरसम्पद्‌[म्‌ ।२३३॥ 
ह शराहिणोद्‌ साधु विगरभ्यो गृहेषु न्यबदानि षट्‌ । 
भोजयित्वा िजानग्रे खादन्न गुणवत्तमम्‌ ॥३४॥ 


 लब्धकामेरलज्ञातः पारणायोपचक्रमे । 


तस्य तद्य॑तिथिः साक्षाद्‌ दुर्वासा भगवानभूत्‌ (२५) 
तमानर्चातिथिं भूपः प्रतयुत्थानासनारदणैः । 


प्रतिनन्य स तचाच्ां कतंमावश्यदं गतः । 


। ५ ^ 


 निममज बद ष्यायन्‌ कारिन्दीसरिरे शभे।३७। 
| हतीावशिष्टाया दद्यां पारणं प्रति । 
। चिन्तयामास धर्मजो दितैलद्रङ्कटे ॥२८॥ 










4 |; न क के 
४ ६. , „= ~ ~ ~ ष ~~ व 9 3 
क ` वश्व) | न ------ 
> ध चै +. क १4 ' त ( न "र रः 
भक धि मि ति १ ॥ नि च 
7 नि 6 । ~ ५ "उ ~ व ह |) त 
+ "१ © 1 ४ 4 ( [86 © (;12 ~  ॥ ५ त निम॑° । ५५१ यचो । - 
निष ध क “4 = 5 । स्ट, | व. । ~ । 
॥ ९* ० "°" । ३. त्‌ *.चिम० | ^ 
< न । 1 -०५- {ग्‌श्‌6. ५ ~: ग > ६ 
+ 1 कि म । + # * सन त ष `" + ~ ^ = किन । न 
ह ^ = क ^) ग ह ५4>-; श ज ५ 8. + क द ८०२९ > € -् र 
4.9 ` + >> न्क + 4 ~ न अ. + नि ~ त ~) ~ ~ 1 ७ ~ 1 , ४1 श 
५ १- > ५ । ध ~“ + +> = हक) । - । भक जन न्‌ शः व ~ ४ ध 
क क च मि क, ‰. भव~ = भः ४ ` 4१ र "भूति # ह क नधः 
ह 4 ^ "दः ध  र-9 द श 
१ > भ न 


ओमद्भागवत [ अ० ¢ 


"निषि 


। ` अ०४ | नवम्‌ स्कन्ध त `... = 
म्भा कैवरेनाथ करिष्ये व्रतपारणम्‌ | | तत्र ब्राह्मणको साय "विचार करके उन्न र्धा ~ 
ब्राहमणो | शरतियोमिं देसा कहा गया है कि जक्पी 


| गरहुरन्भक्षण विग्र द्यशषितं नाशितं च ततर्‌ ॥४०। | ठेना मोजन करना भी है, नहीं भी करना है । इसव्यि ` ` 
इस समय केवर जठ्से पारण किये केता हर ॥ ७०॥ 














; > 


इत्यपः प्रास्य राजपिथिन्तयन्‌ मनसाच्युतंम्‌ । एसा निश्चय करके मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते 
इए राजषिं अम्बरीषे जक पी छया ओर परीक्षित्‌ ! 
| मर्यच्ट॒इुरुभरेष्ठ॒ द्विजागमनमेव शः ।४१।। वे केवल दुवांसाजीके अनेकी वाट देखने तो ॥ ४१॥ 
१ दुवासाजी आवद्यक कर्मोसे निवृत्त होकर यस॒नातटसे 
कोट आये । जब राजाने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन 
किया तब उन्होने अुमानसे ही समञ्च ण्या किं 
राजाने पारण कर च्या है ॥ ४२ ॥ उस्र समय ८ 
दुवासाजी बहत भूले थे । इन्धि यह जानकर किं ` ` 
राजाने पारण कर च्या है वे क्रोधसे थर-यरं कपत 
















/ दाता यञनाङ्घकाद्‌ कृतवाबर्यक आगतः । 


ा्ञाभिनन्दितसतख ॐ धे चेष्टितं धिया ॥४२। 


#ै + 
॥ 1 ज । { । #। 


मन्युना प्रचलद्गात्रो भङ्करीडयिकाननः । 


4 लगे । मौके चद जानेसे उनका सह विकट हो गया। ` 
५ ई = | उन्होने हाथ जोडकर खड़े अम्बरीषसे डटकर कहा ॥४२॥ : 
इतश्च सुतरां कृताञ्ञसिमभापत ।४३॥ अहो । देखो तो सही, यह किंतना करर है ! यह घनके ` 

~ | मदमे मतवाव्र हो रहा है। भगवानकी भक्ति तोइसे 


अहम अख चृश्धुसख श्रियोन्मत्तस्य परयत | छतक नहीं गयी ओर यह अपनेको बड़ा समं मानता 


है । आज इने धर्मका उत्छङ्खन करके बड़ा अन्याय 
क्या है॥ ४४॥ देखो, मै इसका अतिथि होकर आया 


" "वी = +न क 


© @‰ [| ६ 
पमव्यतक्रम विष्णोरभक्तस्येशंमानिनः ॥४९॥ 


+ (6 न ~ 7.10 ^ 
+; 9 349. 4 # "018. 
नि 4 1 1, [ क ४. > उ 

44944 







द । शसने अतिथिसत्कार केके व्यि सुस निमन्रण ` ` 
यो मामतिथिसायातमातिथ्येन निमन्त्प च। भीदिया है वितु फिर भी सुङ्ञे खिखये निना ही खा ५ 
| क्या है । अच्छा देख, तुस्चे अमी इसका फल चखाता ` अ 
अदत्ता इक्तवांसस् सचस्ते दये फलम्‌ ।॥४५ | ह ॥ ४५.॥ यो तेकते वे क्रोधसे जठ ठे | , 
क . | उन्हाने अपनी एक जटा उखाड़ ओर उससे अम्बरीष. ` 








को भार डालनेके व्यि एक कृत्या उत्पन्न की । चह 
प्क्यकाल्की आगके समान दहक रदी थी ॥ ६ ॥ 
वृह आगके समान जरती इई, हाथमे तच्वार र्‌ 4 
जा अम्बरीषपर इट पड़ी । उस॒ समय उसके पै य य 
पमकसे पृथ्वी कौप री थी । प्रतु राजा 1 अम्बरीष देख ` 


एवं ह्ुबाण उन्छृत्य यं रोषविदीपिितः। 





तयं सनिरभमे तसमै रत्यां कालानलोपमाम्‌ ।४६॥ 






तामापतन्तीं ज्वरतीमसिहसतं पदा शुभ्‌ । 
वेपयन्तीं सथुद्ीप्य न चचाल पदान्नृपः ॥४७।॥ | भी नही हट, जय केभ्य ह दे ॥ ४५ 
| ` | परमामाने अपने ५ तव राके चये 













` -- ---- पुरर ग्व पि भ 
व ~ + द 3 
ज | ग की २४ ध +, 


# । " कवि 0 क च = 
ॐ ~ 4 ' य्‌ 
4 ~ 
९ श न्द भद त ¢ 


ध > (न > च 

~ 4 श्रीख्ध उवाच 
कनन" न न, 

क १३ £ ९ ४ च प 


५ श्रीमद्भागवत [अन ¢ 











। 


। ददाह छतं रँ चक्रं हद्धादिमिव पावकः ॥४८॥ | यति इर सोपको मस कर देती है, वैस ही चकन 
र्वासीजीकी इत्याको जल्मकर राखका ठेर कर 


 तदभिद्रवददक्ष्य खप्रयासं च निष्फलम्‌ । दिया ॥ ४८ ॥ जब दुबांसाजीने देखा किं मेरी बनायी 
 दुबांसा दुदवे भीता दिष्षु प्राणपरीप्सया ॥४९॥ | इई कृत्या तो जल रही है ओर चक्र मेरी भोर आ रहा 
त्म॒न्वधाचदू भगवद्रथाज्ख तब वे भयभीत हो त स 
दौवागनिरुदधूतशिखो = छोड़कर एकाएक भाग निक ॥ ७९ ॥ ऊन्व- 
थाहिम्‌ ५९ सोँपके पीक्ते वैसे 

५ $ ध हम्‌ । / ऊँची च्पयोवाला दावानल सोँपके पीछे दौडता दै, वैसे 
तथादुकक्त निरीक्षमाणा ही मगवान्‌का चक्र उनवे पीछे-पीछे दौडने गा । जब 
गुहां विविठुः प्रससार मेरोः ॥५०॥ | दर्वासाजीने देखा कि चक्र तो मेर पीछे कग गया दै, तव 

~ दिवं ५० ॥ दुवांसाजी दिशाः आकारा, पृथ्वी 

द = लि अतल.वितर आदिः नीचेके ढोक;, समुद्र, गेकपाक ओर 
यतो यतो धावति तत्र तत्र उनके द्वारा सुरक्षित लेक एवं खर्गतकमे गये; परंतु 


सुदशेनं दुष्प्रसह ददश ॥|५१॥ | जह-जह वे गये, वही -वहीं उन्होने स॒द्य तेजवाले 
सुदर्शन चक्रको अपने पीछे लगा देखा ॥ ५१ ॥ जब 











अरन्भनाथः स॒ यदा इतचित्‌ उन्हे कहं भी कोई रक्षक न मिला, तब तो वे ओर 
संत्रस्तचित्तोऽरणमेषमाणः . । भी डर गये | अपने व्यि त्राण दरंढते इए वे देवशिरोमणि 


ये ओर बोले ब्रह्माजी ! आप 
दें विरिशवं ६ ब्रह्माजीके पास गये अ 
दे रि सादु विधात खयम्भू है | भगवान्‌के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा 


ज्ाद्यात्मयोनेऽजिततेजसो माम्‌ ॥५२।। | कीजिये ॥ ५२ ॥ 







नह्मोवाच ब्रह्माजीने कहा-'जब मेरी दो पराधंकी आयु 
स्थानं मदीय सहविश्वमेतत्‌ , | समाप्त होगी ओर कालखरूप भगवान्‌ अपनी यह सषटि- 
त्रोडावक्षाने दविपराधंसं टीला समेटने त्गे ओर इस जगतो जलाना चार्हैगे 


भ्रभज्खमत्रण हि संदिधक्षोः उस समय उनके भरभङ्गमात्रसे यह सारा संसार ओर मेरा 
| कालात्मनो यख तिरोभविष्यति ॥५२॥ | यह ल्क भी ठीन हो जायगा ॥ ५३ ॥ मै, शंकरजी 
दक्ष-्गु आदि प्रजापति, भूतेश्वर, देवेश्वर आदि स॒ 
जिनके बनाये नियमे नधे ह तथा जिनकी आज्ञा 
रिरोधायं करके हमरोग संसारका हित करते है, (उनके 
प्रत्याख्यातो विरिश्वेन ५ 
ताः सविन विषणुचकरोपतापितः । तब मगवानूके चक्रसे सन्तप्त होकर वे कौटासवासी 
* शरण यातः शव कलासवासिनम्‌ |॥५५॥ | मगान्‌ शंकरकी शरणमे गये ॥ ५५ ॥ 


भरीमहादेवजीने कहा-'दुरवासाजी | जिन अनन्त 
«| परमेशवरमे ब्रसा-जैसे जीव ओर उने उपाधिभूत कोरः 
। _ । इस तरहण्डवे समान दी अनेकों ब्रह्माण्ड समयपर पैदा होते 


ल ~ 


अहं भवो दक्षमृगुप्रधानाः 
स्वे वय यन्नियमं. प्रपन्ना 









अ० ४ | 


भको नय जनक त ठ 





गतम्‌ स्कन्ध < 











भवन्ति काठ न भवन्ति दीद्शाः ` 
सहस्रशो यत्र॒ वयं अमामः ॥५६॥ 
अहं सनल्कमारश्च नारदो भगवानजः । 
कपिलोऽपान्तरतमो देवलो धर्म आसुरि; ॥५७] 
मरीचिप्रषुलाश्न्ये सिद्धेशाः पारदर्शनाः । 
विदाम न बयं सवं यन्मायां माययाऽऽताः \\५८॥ 
तस्य षिश्वेशवरस्येदं शसं दुर्विषहं हि नः। 
तमेव शरणं याहि हरिस्ते शं विभाखति ॥५९॥ 
ततो निरशो दुबांसाः पदं भगवतो ययौ | 
बेडुण्टाख्यं यदध्यास्ते श्रीनिवासः भिया सह ।६०। 
संदद्यमानो ऽजितशस्वद्धिना 
तत्पादमूले पतितः सवेपथुः | 
आहाच्युतानन्त सदीष्षिति प्रभो 
कृतागसं माव हि विश्वभावन ॥६१॥ 
अजानता ते परमानुभावं 
छतं सयां भवतः प्रियाणाम्‌ । 
तस्ापवितिं बिधात्‌- 
युच्येत यन्नाम्न्युदिते नरकोऽपि ॥६२॥ 


श्रीभगवानुवाच 


विधेहि 


अहं भक्तपराधीनो द्यखतन्त्र॒ इव दि । 
साधुभिग्र्हदयो भक्तेभक्तलनम्रियः ॥६३॥ 
नाहमात्मानम।शसे मद्क्तेः साघुभिषिना । 
भियं चात्यन्तिकीं जम्‌ येषां गतिरहं परा ॥६४॥ 
ओ दारामारपुत्रापतान्‌ प्राणान्‌ वित्तमिमं परम्‌ । 


दहित्वा मां शरणं याताः कथं तास्त्यक्तुतसदहे ६५ 





| ओर समय आनिपर किर नका पता भी नदीं चल्ता, जिनमे 


हमारेजैसे हजारों चक्र काटते रहते है--उन प्रथुके 
मुम्बन्धमे हम कुछ मी करनेवी सामथ्यं नहं रखते ॥५६॥ 


मै, सनक्कुमार, नारद, भगवान्‌ ब्रह्मा; कपिक्देव; 


अपान्तरतम, देवक, धमं, आघ्ुरि तथा मरीचि आदि 

दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्रर-- ये हम सभी भगवानकी मायाको 

नहीं जान सकते; क्योकि हम उसी मायाके धेर 

हे ॥ ५७-५८ ॥ यह चक्र उन विदवेश्वरका श्ञ है । 

यह हमलोगोके ण्मय असह्य है । तुम उन्दीकी रारणमं 

जाओ । वे भगवान्‌ ही तुम्हारा मङ्ग करगे ॥ ५९ ॥ 

वहसि भी निराश होकर दुर्वासा भगवानूके परमधाम 

ववुण्ठमे गये । लक्ष्मीपति भगवान्‌ क्दमीके साथ वही 

निवास करते ह ॥ ६० ॥ दुवांसाजी मगवानके 

चक्रव आगसे जर रहै थे | वे कोपिते इए भगवानूके 

चरणोमं गिर पड़े । उन्दने कहा--‰ अच्युत | हे 

अनन्त | आप संतोके एकमात्र वाञ्छनीय दहै | प्रमो ! 

विश्वके जीवनदाता ! मे अपराधी द्र । आप मेरी रक्षा 

कीजिये ॥ ६१ ॥ आपका परम प्रभाव न जाननेके 

कारण ही मैने आपके प्यारे भक्तका अपराध किया है| 

प्रभो | आप मुञ्चे उससे बचादये । अपके तो नामका 

ही उच्चारण करनेसे नारकी जीव भी मुक्त हो जाता 

दै ॥ ६२॥ ५ 
शरीभगवानने कहा-दुवापाजी | भै सवैधा मक्तो- 

के अधीन हँ | मुञ्जमे तनिक भी खतन््रता न्वी है । 

मेरे सीचे-सादे सर भक्तानि मेरे हृदयको अपने हायमे ` 

कर्‌ रक्ला है । भक्तजन सुञ्चसे प्यार करते हँ ओर म ` 3 

उनसे ॥ ६२ ॥ ब्रह्मन्‌ | अपने मरक्तोका एकमात्र आश्रय ` 

मृ ही ह । इसलिये अपने साधुस्वभाव मक्तोको छोडकर मै 

न तो अपने-ापको चाहता द्रं ओर न अपनी अद्वाङ्गिनी ` 

विनारारहित च्छ्मीको ॥ ६४ ॥ जो सक्त बी, पुत्र, 

गृह, गुरुजनः, प्राण, धनः, इदलेक ओर परलेक-- 

सबको छोडकर केवल मेरी शरणमे आ गये है, 








क = ~. 


छोडनेका संकल्प मी मै कंसे कर सक्ता हरं १॥६५॥ 
नेसे सती खी अपने पातित्रतसे ष तरयस सदाचारी पतिको व 





न कि । ध 
= प १ ~ अ भ {~ 9" 
+ ड इदयको "य 4 १, 
-- ~ अ ५६ ॐ 8 ४ 4 "ते ५ कत ज ५ क 
॥ अपन हृ ष्‌ ॥ 2 > क 
भ, ‰ ४ 8 च ५ ॥ ) (= वि ~ 
कः । ८ न 
८ < र] पि =+ -~ = "$ ४ 
- = इङः # न्क = 
छव (° ॐ ४ च ४ = च व, = 4 = "५ # श्व 
- 4 । ~) { ॐ ~. -* 
कैः ६ । 


" क कै ` क ` पवक ` | ^ „+ क रविरिति क निन 
च. ` क शा चक क "नकन कः -- च्व ~> कद ॥, +त क २ भ 


४, | 


च्व महाभागं ततः शान्िर्भिष्यति ॥७१।। 


। १ + कक ९३१ 
19 र 13 
| *६ ~ 
ह ४ {क 
#3" ४. 








श्रीमद्भागवत 





+ 


[ अ ५ 











बशीद्वन्ति भां भक्त्या सत्यः सत्यति यथा ६६ | बन्धन से बोध रखनेवाले समदा साधु भक्तिके दारा 


मत्सेवय! प्रतीतं च सालोक्यादिचतुष्टयम्‌ । 
नेच्छन्ति सेवया पूरणाः इतोऽन्यत्‌ कालबिदुतम्‌ ९७ 


सधवो हदयं मह्यं साधूनां हदयं त्वहम्‌ । 


` मदन्यत्‌ ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ६८ 


उपाय थयिष्यामि तव रिग्र शृणुष्व तत्‌ । 


अयं हयातमाभिचारसते यतस्तं यातु पै भवान्‌ । 





मश्च अपने वरामं कर ठेते हैँ ॥ ६६ ॥ मेरे अनन्यत्रेमी 
भक्त सेवासे ही अपनेको पयिूर्ण-- कृतकृत्य मानते हैँ । 
मेरी सेवाके फटलरूप जब उन्हे साकोक्य-साख्प्य आदि 
सुक्तियां प्राप्त होती हैँ, तब वे उन्हं भी स्वीकार करना नहं 


| चाहते; प्रिर समयवे फेसे नष्ट हयो जनेधाली वस्तुओंकी तो 


बात ही क्या है ॥ ६७ ॥ दुर्वापताजी ! मँ आपसे ओर स्या 
कद्र, मेरे प्रेमी मक्त तो मेरे हृदय है ओर उन प्रेभी मक्तोका 
हृदय स्वयं मेँ ह्र | वे मेरे अतिरिक्त ओर कुछ नदी 
जानते तथा मे उनके अतिरिक्तं ओर कुछ भी नह 
जानता ॥ ६८ ॥ दुर्वाप्ताजी ! सुनिये, म आपको एक 
उपाय बताता द | जिक्षका अनिष्ट करनेसे आपको इस 


साधुषु प्रहितं तेज; प्रहतः कुरुतेऽरिवम्‌ ॥६९॥ विपत्तिमे पड्ना पड़ा है, आप उसीके पाक्त जाइये । 


तपं र्या विप्राणांति श्रेयस्कर उमे | 


` ते एव दुविनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥७०) 
जहा्तद्‌ गच्छ द्र ते नाभागतनयं चम्‌ । 


| निरपराध साघुओके अनिष्टकी चेष्ठासे अनिष्ट करनेवाके 


का हयी अमङ्गल होता है ॥ ६९ ॥ इसमे सन्देह नहीं 
किं त्राह्मणोके व्यि तपस्या भौर विवा परम कल्याणके 
साधन हँ । परतु यदि ब्राह्मण उदण्ड ओर अन्याथी हो 
जायः तो वे ही दोनों उलटा फल देने खगते है ॥ ७०॥ 
दुवासाजी | आपका कल्याण हो ¡ आप नाभागनन्दन 


| परम भाग्यञ्याटी राजा अम्बरीषके प्रास जाइये ओर उनसे 


क्षमा मागिये | तब आपको रान्ति मितेगी | | ७१ ॥ 


`> ~९#&= 
इति श्रीमदवागते ब्हयपुराण पारमहंस्यां संहितायां नवमस्वन्पे 
ऽम्बरीषचरिते चतुर्थोऽध्यायः ॥ ५ ॥ 
~ ~. 4--र-__-~. 
अथ पञ्चमोऽध्यायः 
इवासाजीकी दुःखनिच्रत्ति 


श्रीक उवाच 


| | एवं भगवताऽऽदिष्ट हुवासाश्चकतापित | 
। अन्वरीपयुपय ततादौ सितोऽग्रही्‌ ॥ 
„ प्स्व साचमनं वीक्ष्च पादस्वंशंरिरक्ित | 






तद्ययन्‌ '१॥। २. स्पश्यन लछजि° 


भीशकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ | जब मगवानूने 
स्त॒ भकार आज्ञा दी, तब सुदर्शनचक्रकी ज्वालसे 
जठते इए दुवांसा लौटकर राजा अम्बरीषके पास अये 
ओर उन्होने अयन्त दुखी होकर राजाके वैर पकड़ 
च्थि ॥ १ ॥ दुर्वासाजीकी यह चेटा देखकर - ओर 
उनके चरण पकड्नेसे लित होकर राजा अम्बरीष 
गवानूके चकरवी स्तुति करने त्मो । उस समय उनका 
ल्य दयाव अव्यन्त पीडित हो रहा या ॥२॥ 


त, श व ९ 
४ [बि । ६. ध 
तै ५ चद श भ 
क ह 4. क । # 2 [4 1. ^~) १" द -*=* ' -र 
वी ९: क । + + म द 
"= ३ च 4 क, १ ? ~ 
५ = धु तः क क ८८ त 
+ त ज ह 9 ` ^ द- क कक 
॥ र १ 9 - ~~ भ त ज (4 ॐ* | + += {+ क च ॥ि 
र, 3. >~" ४ भ 1 "> र. धः क ५ ध = | 9 
र त्क र ॐ कः ^ 
ज च ^ नवो" + । 1 





¶ि 





अश ष्‌ ] 


अम्बरीष उवाच 
त्वम्निभेगवान्‌ घू्यस्त्रं सोमो ज्योतिपां पतिः 
त्मापस्त् क्षितिर्व्योम वायुमत्रन्द्रियाणि च ॥३॥ 
सुदश्षन नमस्तुभ्यं॑सरघाराच्युतप्रिय । 


अम्बरीषने कहा-न प्रभो ! सदन आप अभ्निस्वखूप 


ह । आप ही परम समथं सूर्यं है । समस्त नक्षत्रमण्डल- 
के अधिपति चन्द्रमा भी आपवे स्वरूप है | जलः, पृध्वी, 


आकारा, वायु, पञ्चतन्मात्रा ओर सम्पूण इन्दियके रूपमे 
मी आप ही हे ॥ २ ॥ मगवानके प्यारे, हजार दाँतत्रारे 


चक्रादेव | मेँ आपको नमस्कार करता द्र । समस्त अज्- 


सवाल्ञघातिन्‌ पिभ्रा खस्ि भूया इडस्पते ॥ ४ ॥ राको नष्ट कर देनेवाठे एवं परथ्वीके रक्षक | आप इन 


त्व धमस्त्वतं सरथं सवं यज्ञोऽखिरयज्ञश्‌ । 
` त्व ोकपारः सवौत्मा स्वं तेजः पौरुषं प्रम्‌ ।। ५ ॥ 


नमः सनाभासिरधर्मसतवे 
दधरम॑ीरासुरधूमकैतते | 

्ररोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे 
मनोजवायाद्शुतकमेणे गणे ॥ ६ ॥ 


त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहृतं 
तमः प्रकाशश्च धतो महात्मनाम्‌ । 
दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पते 
त्वद्रूपमेतत्‌ सदक्षत्‌ परावरम्‌ ॥ ७॥ 
यदा विसृष्स्त्वमनञ्जनेन वे 
= बरं॑प्रविष्टोऽजित देत्यदानवम्‌ । 
बाहृदरोबंडघिशिरोधराणि 
 वक्णन्नजक्तंः प्रधने विराजसे ॥ < ॥ 
सष त्वं जगत्त्राण खलप्रहाणये 
निरूपितः सवसो गदाभृता । 
. चिप्र चासल्ुरदेबहेतवे 
पिधेहि भद्रं तदुपरहो हिनः॥९॥ 
` यद्यसि दत्तमिष्टं बा खधरमो षा खलुष्ठितः । 


ब्रा्मणकी रक्षा कीजिये ॥ ४ ॥ आप ही धमं है, मधुर 
एवं सव्य वाणी हैँ; आप ह्वी समक्त यज्ञोके अधिपति 
ओर खयं यज्ञ भी है । आप समस्त लोकोके रक्षक पं 
सवगेकखरूपम भी हैँ । आप परमपुरुष परमात्माके शेष 
तेज है ॥५॥ सुनाम | आप समस्त धर्मोकी मर्यादाके 
रक्षक हैँ । अधममका आचरण करनेवाठे असुरोको भस्म 


| करनेके ल्य आप साक्षात्‌ अग्नि है । भप ही तीनो 


लोकों के रश्चक एवं विशुद्ध तेजोमय हैँ । आपकी गति 
मनके वेगके समान है ओर पके कमं भदूमुत है| 


मै आपको नमस्कार करता द्व, आपकी स्तुति करता 


हर ॥ ६ ॥ वेदवाणीके अधीश्वर ! आपके धर्ममय तेजसे 
अन्धकारका नाश होता है ओर सूयं आदि महापुरुषकि 
प्रकाराकी रक्षा होती है । आपकी महिमाका पार पाना 
अत्यन्त कठिन है । ऊचे-नीचे ओर छोटे-बडेके भेद-भावसे 
युक्त यह समस्त कायंकारणामक संसार आपका दी 
खर्प है ॥ ७ ॥ सुदशंन चक्र । आपपर कोर ष्रिंजय 
नहीं प्राप्त कर सकता । जिस समय निरंजन भगवान्‌ 
आपको चखाते हँ ओर आप देव्य एवं दान्वोकी सेने 
्रवेरा करते ह उस समय युद्धभूमिमं उनकी युजा, ` 
उद्र, जंघा, चरण ओर गरदन आदि निरन्तर काते _ 
इए आप अत्यन्त शोभायमान होते हैँ ॥ ८ ॥ विशषके ` ` 
रक्षक ! आप रणभूमिमें सबका प्रह्यर सहः ठेते है, 
आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता । गदाधारी 


क 





# 


| मगवानने दुष्टोके नारके व्व ही आपको नियुक्त क्या 





है । आप छपा करके हमारे कुख्के भाग्योदये च्य न 1 


५ 
ज जे 






गः ~ ~ 
च ष्णो 
र क 
0 2- 
ह ० १ 






२: 


>> = य) = स: # व 
+? तः "र. १ = 
~ ५ ०४: 3 


२ ; भीमद्धागवत [ अ० ५ 
{नो तिमद वत्त विज्वरः ॥१०। 1 त स नागोे दो पना किया हो, यदि हमारे वंत छोग ब्राह्मणोको ही अपना 
कुलं नो विभ्रदेवं चेद्‌ द्विजा भवतु त पीव स 


१ जाय ॥ १० ॥ मगवान्‌ समस्त गुणोके एकमत आश्रय 
यदि नो भगवान्‌ प्रीत एकः स्ेरुणाभ्रयः । & | यदिः मैने समस्त प्राणि्योके आत्माके रूपमे 
उन्हे देखा हो जओौर वे सुङ्षपर प्रसन्न हों तो दुवांसाजी- 

सर्वभूतात्मभावेन द्विजो भवतु विज्वरः ॥११॥ | के हदयकी सारी जकन मिट जाय ॥ ११ ॥ 
श्रीक उवाच | आटयुकदेवजीी कहते दै--जब राजा अम्बरीषने 
र्वासाजीको सब ओरसे जखानेवाले भगवानके सदशन 


इति संस्ततो ज्ञो विष्णुचक्र सदश्नम्‌ । चक्री इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्राथनासे चक्र ` 


अशचाम्यत्‌ सर्वतो विप्र प्रदहद्‌ राजयाच्जया १२ | शान्त हो गया ॥ १२ ॥ जब दुवांसा चक्रकी आगसे 
सक्त हो गये ओर उनका चित्त स्वस्थ हो गया; तब वे 
स शक्तोऽल्ञाभितापेन वासा ¦ खल्िमांसतत्‌ः । राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आ्ीवांद देते इए 
प्रशशंस तवींशं युञ्ञानः परमाशिषः ॥१३॥ | उनकी प्ररासा करने को ॥ १३ ॥ 

दवस उवाच दुबौसाजीने कहा- धन्य है | आज ने भगवानके 
ॐ प्रेमी भर्तोका महत्व देखा । राजन्‌ ! मेने आपका अपराध 
अहो अनन्तदासानां महं इष्टम मे । किया, फिर भी आप मेरे व्यि मङ्खल-कामना ही कर रहे 
„ति है ॥ १४ ॥ निन्होने भक्तवत्सलं भगवान्‌ श्रीहरिके 

9 मङ्गलानि च 
तमस द्‌ रजन्‌ म्ञसानि समीहसे ।\१७। चरणकमलको दृद प्रेमभावसे पकड चछा है-उन 


` दुष्करः को चु साधूनां दुस्त्यजो बा महात्मनाम्‌ । | साधुपुर्परके च्ि कौन-सा कार्य कठिन है १ निनका 
~) ~ _ ~, हृदय उदार है, वे महात्मा मत्य; किंस वस्तुका परित्याग 
यः संगृहीतो भगवान्‌ सात्वतामृषभो हरि; ॥१५॥ | नहा कर सक्ते १ ॥ १५ ॥ जिनके मङ्गख्मय नामोके 


यन्नामधरुतिमात्रेण पुमान्‌ भवति निर्म: । | श्रणमातरसे जीव निरमक हो जाता है-उन्हीं तीर्थपाद 
भगवानके चरणकमछके जो दास है, उनके व्ये कौन- 
तख तीथपद्‌ः ई बा दासानामवशिष्यते ॥१६॥ | सा कर्तव्य देष रह जाता है १ ॥ १६ ॥ महाराज 
४ गृहीतोऽदहं ॑ अम्बरीष | आपका इदय करुणामावसे परर्णं हे । 
" राजमलुगृहीतोऽहंः त्वयातिकरणात्मना शप । 
४ ४) क भापने मेरे ऊपर महान्‌ अनुग्रह किया । अद्णो, आपने 
^ भद्ध पृष्ठतः छृत्वा राणा यन्मेऽभिरक्षिताः ॥१७॥ | मेर अपराधको सुकर भरे प्ा्ोकी रक्ष की है ॥१७॥ 
^ राजा तम्ताहारः परत्यागमनकाड्कषया । परीक्षित्‌ | जनसे दुवांसाजी भागे ये, तवसे अबतक 
छ | राजा अम्बरीषने भोजन नहीं किया था । वे उनके छीटने- 





` -- 
५ अद 


=. 
^~ 


चरणावुत प्ता समभोजयत्‌ १८ |^ बाट ९ एद थे । भव उनदन द्साजीके चरण 
स | पकड़ य्य ओर उन्हे प्रसन्न करके विधिदूरवक भोजन 
० २1 कराया ॥ १८ ॥ राजा अम्बरीष बड़े आद्रसे अतिथिवे 


१, 
9 
१ ग्र 

( क) 
ए 
न्ट" कै 
न> 
च = 


५ + 
| 

५ 
क, 
~ 
6 







9: पि ४ 4 ऋक मोजन करके तृप्त हो गये । ` अब उन्होनि आद्रसे 
एपात्मा चतत्‌ ब्रह शृज्य तामिति सादरम्‌ ॥५९॥ कहा “गाजन्‌ | अन्‌ आप भी मोजन कीजिये ॥१९॥ 


श रण्क्क र "श 1 च 10 १ 
1 त न ~, [ ~^ 
र ५ 
ध च) 18. प * = ५ कन) भ्‌ 
4४ ६ {. ~ + 
॥ वि ५ ऋक ^ ~ 4 
ष 9 चे, @ छ ^ = वू ज १ क ज न ( * 
4 9 च ~ "वष ॐ, न 
५१ ४, + = = "बद र 2- 
~ ऋ च ~^ ट = च 
च" क त 


व सो ऽ[शल्वाऽऽद्‌ | = | 
भ ऽदत्मानोतमातिथ्य सावकामिकमू | | वेय सव प्रकार मोजन-सामभ्री ठे आये । दु्वासाजी ` 








= नवम्‌ स्कन्ध 





प्रीत्‌ [ऽस्म्यनुगृहीतोऽखि तच भागवतख वं | अम्बरीष ! अप भगवान्कते परम प्रेमी भक्त = आपके - ए 
९ नि, स्पर्सा मनक भगवानकी ओर प्रबृत्त 
दशनस्पशंनासापरातिथ्येनालमं मेधसा ॥२० क $ ओर क ४: 
कमाबदा तमेतत्‌ ते मायन्ति खःचियो शुः । | डा हं ॥ २० ॥ खगकी देङ्गनार्‌ वस्व अपके 
‡ इस उञ्ञ्वर चखिरिका गान करणी । यहं प्रध्वी भी आपकी 
कोतिं पसपुण्यां च दीर्त॑यिष्यति भूरियम्‌ ॥२१॥ | परम पुण्यमयी कीरतिका संकीर्तन करती रहेगी, | २१॥ 
| श्री्ुक उवाच „ श्रीशुकदेवजी कहते है दुर्वासाजीने बहत ही 
. एवं संगीर्य राजानं दरबा्ाः परितोषितः । , सन्त होकर राजा अम्बरीषके गुरणोकी प्रसंसा की जौर 


ययौ विहायसाऽऽ कमेत | उसके बाद उनसे अनुमति ठेकर आकादामार्गसे उप 
1 मन्न्य बह्मरकरमहतुकम्‌ ॥२२॥ ्हमलोककी यात्रा की, जो केवल निष्काम करमते ही प्रात 


सचत्सरात्यगात्‌ तावद्‌ यावता नागतो तः) | होता है ॥ २२ ॥ परीक्षित्‌ ! जव सुदर्शन ` चक्रसे 
छनिसतदशेनाश्चङ्छो रःजाऽग््ठो वभूव ह \।२२॥ | मयमीत होकर दर्वासाजी मे ये, त्से ठेकर्‌ उनवे 
इ शद छौटनेतक एका वर्ष्रा समय बीत गया । इतने दिनोतकं 
गते च दुवा सोऽम्बरीषो राजा अम्बरीष उनके दशनकी अआकाङ्खासे केवलं जल 
दविजोपयोगीतिपविव्रमाहरत्‌ । | पीकर ही रहे ॥ २३ ॥ जव दरवासाजी चे गये, तव 
ऋेर्विमोधं व्यसनं च इद्ध्वा उनवेः भोजनसे बचे इए अत्यन्त पत्रित्र अनल्का उन्होनि 
व भोजन किंया । अपने कारण दुवांसाजीका दुःखमें पडना 
मेने सबीयंच रपरालुभावम्‌ ॥२४॥ | जर पिर अपनी ही प्रा्थनासे उनका छरटना--इन दोर्ना 
एवविधनेकथुणः स रा बा्तोको उन्दोनि अगनेद्ारा होनेपर भी भगवान 
(~ णि द ही महिमा समश्चा ॥ २४ ॥ राजा अम्बरीषे रेसे-रेसे 
< क | अनेकां गुण ये । अपने समस्त कमेकि द्वारा वे पल्य 
क्रियाकलाप; सथुबाह भक्ति परमा्मा श्रीभगवरानमे मक्तिभावकी अभिद्रद्धि करते रहते ` 
यथाऽऽविख्ज्च्यास्‌ विश्याश्च्ार | २५) थे । उस्‌ भक्तिके प्रभाषसे उन्होने ब्रह्मलोकतक्केः समस्त 
भो्गोको नरक्वे समान समञ्चा ॥ २५॥ तदनन्तर राजा _ ` 
अथा्बरोपर्तनयेष ` नाय अम्बरीषने अपने ही समान भक्त पुत्रोपर राज्यका भार ` 
समानशीलेषु विद्युज्य धीरः | छोड़ दिया ओर खय वे वनमे चे गये । वँ वे बडी ` 


न॑ विवेशात्मनि वासुदेवे | षीरताके साथ आ्मखरूप मगतरानूम अपना मन ्गाकर्‌ 
= गुणोके प्रवाहख्प संसारसे युक्त हो गये ड 
मनो दधद्‌ ध्वतगुणप्रवाहः ।।२६॥ । ५" स 0१ 


. परीध्षत्‌ । महाराज अम्बरीषका यड प्रम पवित्र आख्यान 
स्थेतत्‌ पूण्यमारयानमम्बरीषसख भूपतेः । | है । जो इका सङ्कतन लौर सूरण करता है, वद्‌ ` 


संकीतयन्नुभ्यायन्‌ भक्तो भगवतां भवेत्‌ ।।२७। । भगवान्‌का भक्त हो जाता है ॥ २७ 











श्रीमद्भागवते [ अ० & 


न ~~~ ~ न” (~ 2 नानया 
अथ षष्ठोऽध्यायः 
इश्वाङ्के वंशाका वणेन, मान्धाता ओर सौभरि ऋषिकी कथा 

| श्री्कदेवजी कहते है -परीक्षित्‌ | अम्बरीपके 
| तीन पुत्र थे--विखूप, केतुमान्‌ ओर शम्भु । विरूपसे 
विरूपः केतुमाञ्छम्धरम्बरीषसुताच्लयः । पषदश्च ओर उसका पुत्र रथीतर हआ ॥ १ ॥ रथीतर 
„ | संतानहीन था । वंशपरम्पराकी रक्षाके च्ि उसने 
विरूपात्‌ एषदश्चोऽमूत्‌ तत्पत्रस्ठ रथीत्रः ॥। ९ ॥। | अङ्गिरा ऋषिसे पाथना की, उन्होने उतकी पत्ीसे बरहमतेज- 
+ से सम्प कई पुत्र उत्पन्न किये ॥ २ ॥ यपि ये सब 
रथीतरखाप्रजख भार्याया तन्तवेऽथितः । रथीतरी भार्यास्े उत्पन इए थे, इसय्ि इनका गोत्र 
९ । वही होना चाहिये था जो रथीतरका था, फिर भी वे 
अङ्गिरा जनयप्मात 9 5. न आङ्धिरस द्वी कव्ये । ये ह्वी रथीतर वंश्ियोके प्रवरं 
( कुलम सवश्रेष्ठ पुरुष › कह्ये; क्योकि ये श्षत्रोपेत 
| बराह्मण ये--क्षत्रिय ओर ब्राह्मण दोनों गो्रोसे इनका 

रथीतराणां श्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः ॥। २ ॥। | सम्बन्ध था ॥ ३ ॥ 





न्न +: 


ऋः न्क ऋ = 


श्री्चुक उवाच ` 


एत तरे प्रता वै पुनस्तव ङ्गिराः स्खृता; । 


्षुबतस्तु मनोज्ञ इश्वाडघ्रीणतः सुतः । परीक्षित्‌ ! एक बार मनुजीके उीकनेपर्‌ उनकी 
नासिकासे इद्वाकु नमसा पुत्र उन्न इ । इ्वाठुके 


तस्य पुवसतव्ये्ठा विङषिनिमिदण्डका; \। ४ ॥। | सौ पुत्र थे । उनमे सबसे वदे तीन ये--विुि, निमि 

| ओर दण्डक ॥ ¢ ॥ परीक्षित्‌ ! उनसे छोटे पचीस पुत्र 

। तेषां परस्तादभवनायोवतं सृण चृप। आयावरतके प्रवेभागके ओर पचीस॒ पश्चिमभागके तथा 

८. | उपर्युक्त तीन मध्यभागके अधिपति इए । देष सैताढीप्त ` 
पञ्चविंशतिः प्च त्रयो मध्ये परेऽन्यतः ॥ ५। दक्षिण आदि अन्य प्रान्ते अधिपति इए ॥ ५ ॥ एक 

. नार राजा इश्वावुने अष्टका-शाद्धके समय अपने बड 

स॒ एकदाक।भाद्धे इष्वः सुतमादिशत्‌ । पुत्रको आज्ञा दी--°किकक्षे | रीघ्र ही जाकर श्राद्धके 


| योग्य पवित्र पड्ु्जका मांस ओः ॥ ६ ॥ वीर 
: ९, 
भांसमानीयतां मेष्य विधे गच्छ मार्बिरम्‌ ॥ ६ ॥ | विधिने "बहत अच्छः कहकर वनकी यात्रा वी । वहं 


(८ उसने श्राद्धके योग्य बहत-से पड्ओंका रिकार किया । 
तथेति ्च बनं गत्वा षरगान्‌ हतवा क्रिंयाहणान्‌ः। | बह थक तो गया ही था. भूख भी खग आयी थी; इस्ये 
क यह बात भूढ गया कि श्राद्वके ्थि मारे हए पञ्युको 
न खयं न खाना चाहिये ।. उसने एक खगो खा 
४3. च च्य ॥७॥ विकुक्षिने बचा इभा मास॒ गकर 
ˆ निवेदयामास पितरे तेन च तद्गुहः। | शपने पिताकषो दिया । इवाङुने अब भपने गुरसे 
ध ~ य उसे प्रोक्षण करनेके न्ि कडवा, तब रगुरुजीने 
पर्मणाचा ६ दए "र द्ककमू ।॥ ८ ॥ | बताया कि यह मांसं तो दूषित एवं श्राद्धके भयोप्य 












अ० ६ |] 











को अपने पुत्रकी करतूतका पता चर गया । उन्हनि 
दैशालिःसारयामास सुतं त्यक्तमिधि रषा ।। ९॥ | शाकीय विधिका उल्ज्न कलेवाले घुत्रको क्रोधवशा 
धि वा अपने देशसे निकाक दिया ॥ ९ ॥ तदनन्तर राजा 
स तु विप्रेण संवादं जापकेन समाचरन्‌ । इ्वावुने अपने गुरुदेव वसिष्ठसे ज्ञानविषयक च्चा की । 
फिर योगके द्वारा शरीरक! परित्याग करके उन्न परम 
वद्‌ प्राप्त किया ॥ १० ॥ पिताका देहान्त ह्यो जनेपर 
पितर्ुपरतेऽस्पेत्य विकचः 1 ककुक्षि अपनी राजधानीमें डीट जाया ओर इस पृथ्वीका 
त्य पङशषः पृथिवीमिमाम्‌ । शासन करने ख्गा । उसने बड़े-बड़े यज्ञोसे भग्रानकी 
शासदीजे हरि यतेः शशाद इति विशतः ।॥११।। | आराधना की नौर संसारम शशादके नामसे प्रसिद् 
इआ ॥ ११ ॥ विङ्गुक्षिके पुत्रका नाम था पुरञ्जय । 
परजयस्तद्य सत इन्द्रवाह इतीरितः! उसीको कोई “इन््रवाह' ओर कोई “कुत्स्य कहते है | 
जिन कमकि कारण उस्केये नाभ प्डेये, उन्दें 

कडुरख् इति चष्युक्तः शृणु नामानि कषैभिः\१२ , घनो ॥ १२ ॥ 


ज्ञात्वा पुत्रस सत्‌ कम्‌ गुरुणाभिषितं चुप; । ‰ , दै ॥ ८ ॥ परीक्षित्‌ । गुरुजीके कनेपर राजा इषाः ` र: 


त्यक्त्वा कलेवरं योशी स तेनावाप यत्‌ परम्‌\\१०॥ 










छृतान्त आशीत्‌ सपे देवानां सह दानवैः । सत्ययुगके अन्तम देवताओंका दानवेकि साथ धोर्‌ 
¦ संप्राम इभा था । उसमे सन-के-तव देवता दैव्योसे इर 
पाष्णिग्राहो इतो वीरो देवेदेत्यपराजितेः ॥१३॥ | गये । तव उन्दने वीर पुरज्नयको सदायताके व्यि जपन 
मित्र बनाया ॥ १३ ॥ पुरञ्जयने कद्वा कि “यदि देवराज 
पचनाद्‌ देवदेवस्य विष्णोर्वंशवात्मनः प्रभो । इर मेरे वाहन वर्ने, तो भै युद्ध कर सकता हं । 
क पहले तो इन्द्रने अलीकार कर दिया, परंतु देवताओकि 
वाहनत्वे इृतस्तस्य बभूवेन्द्रो महाश्षः ॥१४। | आराष्यदव सवंशक्तिमान्‌ विश्वासा मगवानूकी बात मानकर 
` ह पीडे वे एक बडे मारी बेर बन गये ॥ १४ ॥ सर्वान्तर्यामी 
स संनद्धा धलुदिव्यमादाय षिशिखाज्छितान्‌ | मगान्‌ विष्णुने अपनी शक्तिसे पुरञ्ञयको भर दिया | ` 
र उन्दने कवच पहनकर दिव्य धनुष ` ओर तीसरे बाण 


). स्तूयमानः संमारुदय युयुः कदि सितः ॥१५॥ | परहण किये । इ्के राद रपर चदकर वे उसके क्ठुद्‌ 





) डील ) के पास बढ गये | जब इस प्रकार त युद्धवे दके | ॐ र 
तेजस्राऽऽप्यायितो विष्णोः पुरषस परात्मन्‌; ¦ ( ₹ वंयुद्धके 


ल्य तत्पर इए, तब देवता उनकी स्तुति करने चो | ` 

देवताओंको साथ लेकर उन्होने पश्चिमवी ओरसे दै्योका ५ ५ 

नगर धेर च्या ॥ १५-१६॥ वीर पुरञ्ञयक्ता दैयोके ` 
त प्रधनं त्रं रोमहर्षणम्‌ साथ अत्यन्त रोमाच्चक्षारी शोर सप्राम हआ । युद्धे 

वैस चूत मथनं ततं लोम । क भव ज क 

यमाय भर्रैरनयद्‌ दैत्यान्‌ येऽभिययु॑धे ॥१७॥ ऊ यमराजके हवाले कर दिया ॥ १७॥ 

स धधकती ह थी]जो 


= १ द चि । 
त " बी त न्ता पिव  ॥ 
भच |) व 
4 2 ९। ( पाताभिग्रुख नव युध्‌ ॥ 9 & =¦ दब द ४ पू क्र 1 भी "क उसके ५१ 1 सामने आताः भिरे | ¶ (त ; | 

४। (त ॐ" १५ र 4 ५ = कनि 8 ९ । 8 ९ ` §. ७4 # । २५७,.१.-. ५ तो च ४ - . ॥ (६. ‡-- {१ म त 3 ~~ सिन +~ ५६. ‡ ५५९ त ५ ४ 
षि ~ व ~ न १ श (५२.०६ 0 गष ग्रः क क 3 + 7 49, = 3 "ज = ॥ ज, ~) = न - ष्व ५4 ० 4 4 । ५4 ८। क २, क ^ = = । 
4 ४ भ नि रः र रयययोरौ = ~ न कि नारव ^ ७ % कक ८.५ ् श~ नजा = - ~ य्‌ - र -' ययय कवि = 
१ ४, 3 न स गन ५ नक श ह 

स ११ 






प्रतीच्यां दिधि दत्यानां न्धरुणत्‌ त्रिदशः पुरम्‌ ।१६। 






॥ । 
> ॐ कः # न 1 
न्न, च. 
^. - : 


२८ श्रीमद्भागवतं | अ० & 
~~ -~--~ 
| यमानाः वे रणभूमि छोड़कर अपने-अपने 
विद्यल्य दुद्ुबदैत्या हन्यमानाः खमालयम्‌ । १८) साहस जाता हा | वे रणभू 

क | घरोमे घुस गये ॥ १८ ॥ पुरञ्जयने उनका नगर, धन 
8 + _ | ओर एेश्चयं-- सव कुछ जीतकर इन्द्रको दे दिया । इसीसे 
जित्वा पुरं धनं स्व सश्रीकं वज्रपाणये । | उन राजभ पुर जीतनेके कारण ्पुरजञय,, इन्रको 
५ | वाहन बनानेके कारण “इन्द्रवाहः ओर बैख्के कलुदूपर 

्रत्ययच्छत्‌ स राजपिंरिति नामभिराहृतः ॥१९॥ | के कारण लुतः का जाता है ॥ १९ ॥ 








पुरञ्चयका पुत्र था अनेना | उसका पुत्र प्रथु इआ | 
पृथुके विश्वरन्धि, उसके चन्द्र ओर चन्द्रके युवनाश्च ॥२०॥ 
विशवःन्थि्तनदरो युवन;शव्च॒तपुतः ॥२० | यवना पुत्र इए शावसत, मिनन शावस्त पुरी वसायी । 
शाबस्तस्तत्स॒तो येन शाबस्ती निभमे' पुरी । शाबसतवे बृहदश्च ओर उसके कुवल्याश्च इए ॥ २१ ॥ 
ये बडे बली ये | इन्होने उतङ्क ऋषिको प्रसन करनेके 

बहदश्वस्त॒॒शाबस्िस्ततः इुवरयाश्वरूः ॥२९॥। जारं पुव साधं सेकः घु 
यः भ्रियाथ॑मुतङ्कसख धुन्धुनामासुरं बरी । नामक दैत्यका वध किया ॥ २२ ॥ इसीसे उनका नाम 


हआ धुन्धुमारः । धुन्धु दैत्यके सुखकी आगसे उनके 
सुतानामेविंशत्या सदसेरदनद्‌ दृत; ।।२२॥ | लब पुत्र ज गये । केव तीन दी कव रहे थे ॥ २३॥ 


धुन्धुमार इति ख्यातस्तत्सुतास्ते च जञ्वलः | परीक्षित्‌ | बचे इए पुत्रोके नाम थे--द्ढ।श्च, कपिलश्च 


ओर भद्रा । द्टाश्चसे हय ओर उससे निकुम्भका 
धुन्धोय॑खाभिना सष त्रय एवावशेषिताः ।॥२२॥ | जन इभा || २४॥ िकुम्भके बर्हणा, उसके कृचा, 


टाः कपिलश्च भद्राश्च इति भारत । कृरा शवे सेनजित्‌ ओर सेनजिते युवनाश्च नामकं पुत्र 

9 हआ । युवनाछ संतानहीन था, इसलिये वह बहत 
ध्दाश्पत्रो हया निङम्भस्ततसुतः स्पत: ॥२४) दुखी होकर अपनी सो बि्योके साथ वनमें चख 
बंहणाश्ो निङ्गम्भख शं श्वोऽथाख्य सेनित्‌। | गया । वहां ऋषियोने बडी कपा करके युवनाससे पुत्र- 
५ युवनाधा-भवत्‌ तख सोऽनपत्यो घनं गत्‌, ।(२५)) ए त साप सवकम 
< कराया॥ २५-२६॥ एक दिन राजा युवनाश्चको रात्रि- 
भयाशतेन निविण्ण ऋषयोऽस्य कृपालवः | | के समय बड़ी प्यास ठगी । बह यज्ञशावमे गया, वितु 
५ ,,__ | वहां देवा कि ऋषरिठोग तो सो रे हैँ । तब जटः 
1 इटं स वत॑याचकर््री ते पु्माहिताः । २६॥ | मनवा ल 7 ~ 
। (: " " राजा तद्‌ य्ञसश्नं प्रविशो निशि तपतः अभिमन्तिन जल द्वी पी च्या ॥ २७ ॥ परीक्षित्‌ | जब 
। ।  द्राशयानान्‌ रलान्‌ पपौ मन्रजे खय्‌। २७॥ | भर शग सोक उ नोर उन्न देखा कि 
4" कलशमे तो जल ही नहीं है, तब उन लोगेनि प्रू कि 
(4 ` उत्थितास्ते निशाम्याथ व्युदकं कर प्रभो । धह किपसका काम है १ पुत्र उत्पन्न करनेवात्म जक 
किसने पी च्य ¢ ॥ २८ ॥ अन्तमं जब उन्हें य 
माद्धम इ कि मगवानूकी प्रेरणासे राजा युवनाछने दी 
उस. जख्को पी लिया है) तो उन रोगन भगवान : 


पुरञ्ञयख पुत्रोऽमू रनेनासतत्सुतः पुः । 
























गि 
° 2 


+) 


5 | नवम्‌ स्कन्धं 


=* ` = अदद्‌ [1 1 कक 
चक वः च ज 





ईश्वराय न भथुरहो देवबलं बहन्‌ ॥२९॥ | चरणों नमस्कार किमा ओर कशा 

1 व मगवानूका बल ही वासवे वल है ॥ २९ ॥ इसके 

त्त कारु उपाहृतते वि निभिद् दक्षिणम्‌ ।  । वाद प्रका समय आनेपर युवनाखकी दादिनी कोख 

यु म ¶ पुत्र उत्पन्न इआ ॥ २० ॥ 
वनाव तनेय्चक्रवतीं जजान ० क 

ख जान॒ह।।२०॥ ठे रते देख ऋषियेनि कहा ह वाचक दूधके लि 

स धायि ङमारोऽयं स्तन्य रोरूयते भृशम्‌ वहत रो रदा है; अतः किस्का दूध पी्यगा १ तब 

°इन्द्रने कहा-पमेरा पीयेगा ( मा धाता ) बेटा | तुरो 

मा धाता वत्य सारोदीरितीन्द्रो देशिनीमदात्‌ ३१॥ | मत । यह कहकर इन्द्रे अपनी तर्जनी गुटी उसके 


ओर देवताअके प्रसाद- 
न ममार पिता तश्च विप्रदेवभ्रसादतः महम डाक दी ॥ २१॥ ब्राह्मण अ 

£ ५. से उस बालके पिता युवनाखकी भी मृत्यु नदीं इई । 

युवनाश्वोऽथ तत्रैव उषसा सिद्धिमन्वगात्‌ । ३२] | बह बही तपसया करके मुक्त हो गया ॥ ३२ ॥ परीक्षित्‌ । 

~ र इनद्रने उप॒ बाल्कका नाम रला च्दस्यु, क्याकिं रावण 

वद्स्युरितीन्द्रोऽङ् चिदे नाम्‌ त्खयव्‌) आदि दस्यु ( लुटेरे ) उससे उद्विन एवं भयभीत रहते 

तरसनि मे थे ॥ ३३ ॥ युवनाखके पुत्र मान्धाता ( त्रसदस्युं ) 

५: पा दण ^ चक्रवतीं राजा इए । मगवानके तेजसे तेजस्वी होकर 

यौधनःशोऽथ मान्धाता चक्रवर्थबनींप्रुः। | उन्दने अकेले ही सातो दीपवाटी पृथ्वीका शासन 

क्रिया ॥ ३४ ॥ वे ययपि आसमज्ञानी ये, उन्दे कम- 

सपरदवीपवतीयेकः शश्चासाच्युततेजक्षा ।॥२४\ | काण्डकी कोई विशेषः आवर्यकता नही थी -किर भी 

§ 9 दध्िणैः उन्होने बडी बड़ी दक्षिणावाठे यज्ञोसे उन य्ञखरूप 

गस भूर प्रसुकी आराधना की जो स्वयंप्रकारा, स॒वेदेवस्वखूपः 
सवेदेवमयं॑॑ देष सर्वान्मकमतीन्द्रियम्‌ ॥३५। स्मा एवं इन्द्ियातीत है ॥ ३५.॥ मगवानक्ै अतिरि 
ओर है ही क्या १ यज्ञकी सामग्री, मन्त्र, विधि-विधान, ` 
यज्ञ, यजमानः ऋतिज, धम, देश ओर कालय 
धर्मो देशश्च कालश पर्वमेऽद्‌ यदात्मकम्‌ ॥३६॥ ' सव-का-सब भगवानका दी खर्प तो दै ॥ ३६ ॥ 
परीक्षित्‌ ! जहंसे सूर्यका उदय होता है ओर जहा वे 


द्रव्यं मन्त्रो षिधियज्ञो यजमानस्तथविजः | 








, .. याबत्‌ एयं उदेति सप यावच प्रतितिष्ठहि। | भल ते है, बह सर-कासाामूमाग युवन न १ 
सवं तद्‌ योवनाशधस्य मान्धातुः शषेत्रुच्यते ॥३७॥ | मान्धातके दी अधिकारम्‌ था ॥ ३७ ॥ ` 
शु्लबिन्दोहृहितरि बिन्दुमत्यामधान्नृषः राना मान्धाताकी परली शाशबिन्दुकी पुत्री बिन्दुमती ` 






4 थी । उसके गभसे उनके तीन यन इए्-प्ठुस्स < 

रकृतममतरपं शचन्दं च योगिनम्‌] = | अम्बर (ये दूर जम्बव है) जर वो सचु्द । 

इनकी पचास बहन थीं । उन प्रचासोनि अक्स र 

ऋषिको पतिक रूपमे वरण कयां ॥ २८ 

= | बार यघुनाजमे इुत्रकी 

न ग्रसप्यमानः द्र॑तप;1 = | तपसी सोभरिजी एक बाः 
 अनान्तजले म्‌ क | १।० च 


^ । <= 
छ = क # 
द + ५ छ 










तेषां खारः पश्वाषत्‌ सौभरि बत्रि पतिम्‌ ॥३८॥ 












५१५..७ 
रदा है ॥ त थु 


ति #ीचराजस्य वीक्ष्य मेयुनधभिणः 


कदर तकायन रक 


+ 
"4८. 2 * ~ र ४. | २ भ) 9 भ मजीजनत्‌ म 
4 4 0. क > ॥ त नी | * ८ 
7 च न ` शि) 4 लला | ; प च्च. ५७- 
वैः = न ५ क > 
व = क -- गे ~ = य॒स्य (# * ~न 8 
ब + कद क्क ~> चद २.2 ऋ 3 ५ छ < १. ५ ८. | । # न २४ 
प प , । द + 
. ड वे च => हक्क ` त 3 
ऋ ४3, = ` ज १8. 4 न 


न्न 


न च 9, 
0; ५ -ग 


4 


व र ( 
= = 


4 य 3 न 


, =+. 18 ~ 43 स 





9 ककत कोणः न कनि क्क ०० किः ८७  -- 


क न मी {क #. ~ [त 





| २० 





+ 





शीमद्भागवेसं 


11 िादयययेियकियियोनियनयदेेोन ऋक = = 


लातस्ृहो सपं विरः कन्याभैकामयाचत । 


सोऽप्याह गृह्यतां ह्म्‌ कामं छन्या खंंदरे !, ४०।। 


स विचिन्त्याभ्रियं श्लीणां जण्टोऽययरंमतः ¦ 


वलीपलित एजत्क इत्यहं प्रत्युदाहृतः ।४१॥ 


साधयिष्ये तथाऽऽत्मानं सुरद्गीणासीप्सितम्‌ | 


ङ पुनमंनुजेन्द्राणामिति व्यवसितः प्रयः ।४२ 


शनिः म्रवेदितः शत्रा कन्यान्तःपुरमृद्धिमत्‌ 


ृतंथ॒ राजकन्याभिरेक्षः पञ्चाशता यरः ॥४३१। 


। तासां कणिरमूद्‌ भूयांसदथेऽपोदय सौहृदम्‌ । 
।  ममातुरूपो नायं घ इति तद्गतचेतसाम्‌ ॥।४४।। 
(~. स बहचसताभिरपारणीय- 








४४ 


च 7 =. ~ 
क" ^/ + ^4 4 # क ५३ च. 
1 3 = + ६-१५ १ 1, न ५ ^ 
1“ (11144 
१ ~ ४4 
:4 1 
॥** १ ॥ि.  # 
। + । ‡ 


4. 
ॐ >, 


५ 1 9 
9 






# ३ च ४ 
क 1.4. +: ५. ~+ "11५ 
रन १।५ । च! # न, १.६ क „ष 
# "च. द + = क | 09 
(वर. (4 11 $^ व 
५ ^ 


मै, 


4 १ ९), 
74. 4 5 19 , ।.. त 
^ 





कका > 1 क अ्कतिदिननयि वि 
क. 


01 
(भ 


४] धि 
। ह ` 
ि ४ 1.4 
(0 +न 


प च्व 9 
^ ४१५, 
0 .# 
क १ „न 
` 
कभ 


च ९.५९ ह, „9 
"लः ॥ की? 
नवक... ३. 
#ि त ॥ १ 


यद्ग 


५ ॥ 


ह ध ध 


3.५. १९ 
# =. १ 
‰ ति, 21: द 
०१९. भ 
= ४) 
1 ५ च (म 4 
~ + कदि ^ 
क ' 2.9; ++ च; 
>+ ५ ५ +" ५" += 4 
षड क. १। 
9०५." पि 1.७४. ह 
#^‰ छः * "कक 
#~ पि 5 4 १ "५, 
¢ ¶ ६५ 9 >. * ~^ 2) ५ 
^ 1 ॥: ~; ~+) 


र 


४64; 
{98 ॐ 


# 1 
¢ ६ ४ 


& 707 त॒ ष्व (- ९ 


तपःश्रियानध्य॑परिच्छदेषु 


नानोपवनामलाम्भः 


सरस्सु सोगन्धिक्काननेषु ।। ४५ 


महाहशय्यासनवल्ञभूषण- 
सानाच॒रेपाभ्यवारमाल्यदैः 









` सपृद्रीपवतीपतिः 


॥४६॥ 





0 


| अ° & 








चो क दादाक" @99 तती हके ` सः नका ऋ 


उसके इ घुखको देखकर ब्राह्मण सौभरिके मनमें भी 


विवह करनेकी इच्छ जग उरी ओर उन्हनि राजा 
मान्धाताके पास आकर्‌ उनकी पचाद् कन्यास एकः 
कन्या मांगी । राजनि कदहया--श्रह्मन्‌ ! कन्या खयंवरमे 
आपको चुन र, तो आप उसे ठे खीजियेः ॥ ४० ॥ 
सौभरि ऋषि राजा सान्धाताक्रा अभिप्राय समन्न गये | 
उन्होने सोचा कि “राजाने इसलिये मुञ्चे एेसा सुखा जवाब 


| दिया है कि अब मँ बढा हो गया द, छरीरे हुधििँ पड 


गयी है, बार पक गये है ओर सिर कोपने खगा है । 
अव कोई स्री पुस प्रेम नहीं कर सकती ॥ ४१॥ 
अच्छी बात है | पै अपनेको रेश्चा सुन्दर वनाञंगा कि 
राजकन्याए तो क्या, देवाङ्गनाएं भी मेरे व्यि छव्यित 
हो जायगी !' रेषा सोचकर समर्थं सोभरिजीने वैता 
ही किया ॥ ४२॥ 


फ़िर ष्या था, अन्तःपुरके रश्चक्ने सौभरि सुनिको 
कन्याओंके स॒जे-सजाये महख्म पर्चा दिया ¡ रिरि तो 
उन पचासों राजकन्याथोने एक सौभरिकतो ही अपना 
पति चुन च्ा|॥ ४३ ॥ उन कन्याओंका मन 
सोभरिजीमें इस प्रकार आसक्त हयो गया कि वे उने 
न्ि आपस्के प्रेमभावको तिस्रह्नणि देकर परस्पर कल्ह 
करने गीं ओर एकदूसरीसे कहने व्री कि ध्ये तुम्हारे 
योग्य नही; मेरे योग्य हैः ॥ ४५ ॥ ऋग्वेदी सौभसिनि 
उन सथीका पाणिग्रहण कर च्या | वे अपनी अपार 
तपस्याके प्रभावसे बह्मूल्य सामम्रियोसे सु्षञ्जित, अनेकों 
उपवनों ओर निमल जल्से परणं सरोवरोंसे युक्त एवं 
सौगन्धिक पु्पोके बगीचोसे धिरे महलोमे बहमूल्य शव्या, 
भानः वज्ञ, आभूषण, स्नान, अनुषेपन) घुखादु भोजन 
ओर पुष्पमालाओकर द्वारा अपनी पल्नियों फे साथ विहार 
करने लगे । बुन्दर खुन्दर बल्लाभूषण धारण किये ची- 
पुरुष सव॑दा उनकी सेवापे ल्ग रहते । कमी पक्षी 
चहकते रहते, तो कीं मौरे गंजार करते रहते ओर 
कह कहीं वन्दीजन उनकी विरदावटीका बखान करते 
रहते ॥ ४५-७६ ॥ सपद्मीपवती प्रथ्वीके खामी 
मान्धाता सौमरिजीकी .इसं गृहस्थीका सुख देखकर 








कोति पिरि 
अव ~ ---- 


९ नवम्‌ स्कन्ध 




















---------------------------------- ~, 
विखितः स्तम्भमजहात्‌ सवभोमशिषाचितश्‌]। ४७] | आश्वर्यचकरित हो गये । उनका यह गवं कि, मँ सावं 
मोम ॒सम्पत्तिका खामी ट जाता रहा ॥ ४७ ॥ इस 
< ल प्रकार सौमरिजी गृहस्थीके सुखम रम गये ओंर अपनी 
एव शहम्वमिरतो विषयान्‌ विविधैः सुतैः । | नीरेग इनदरो जनको विषोकाः सेवन कते दे । 
| फिर भी जैसे धीकी बुंदसि आग तृप्त नहीं होती, वैसे 
सेवमानो न चातुष्यदाज्यसतोक्ैरिवानः \४८। | ही उन सन्तोष नहीं इभा ॥ ४८॥ 
स॒ कदाचिदृपासीन आत्मावह्वमारन्‌ः । छग्वेदाचायं सोभरिजी एक दिन खस्थ चित्तसे 
६ बैठे इए ये । उस समय उन्होने देखा किं मस्स्यराजके 
४ ददश भह्ैच चार्थ भीनसद्गुस्थितम्‌ 11४९ क्षणभरके सङ्खपे मे किंस प्रकार अपनी तपस्या तथा 
अहो मं परयत मओ विनां अपना आपातक खो वेव ॥ 9९ ॥ वे सोचने कगे- 
अरे, मैते बडा तपखी था | मेने भठीमोति अपने 
तपखि शच्शितविरख ्र्तोकः अनुष्ठान भी किया था । मेरा यह अधःपतन तो 
~ ज देखो । मने दीधक्षासे अपने व्रहतेजको अक्षुण्ण रक्वा 
न्तजले ५¶दवरशसज्ञत्‌ था, परंतु जर्के भीतर विकार करती इई एक मदीये 
= संसगेसे मेरा वह्‌ ब्रह्मतेज नष्ट हो गया ॥ ५० ॥ अतः 
म्यां ब्रह व्विरं धतं यत्‌ ॥५०॥ जिसे मोक्षकी इच्छा है, उस पुरुषको चा्ठिये कि वह 
सङ्गं त्यजेत भिथुनवहिनां शषः भोगी प्राणियोका सङ्ग सवथा छोड दे ओर एक क्षणक 
त य्यि भी अपनी इद्िर्योको बहिर्मुख न होने दे। अके 
पत्मना च वजर्‌ दष्डरनदूवम्‌ । | ही रहे ओर एकान्तम अपने चित्तको सवंराक्तिमान्‌ 
म स गवानमे ही त्गा दे | यदि सङ्ग करनेकी आवइयकता ` 
एकरद रहसि चित्तमनन्त द ही हो, तो मगतरानूकते अनन्य प्रमी निष्ठावान्‌ महामार्ओका 
| धीत दूनरिषु साधु चेत्‌ रङग ५॥५१॥ | दी सग फर ॥५१॥ १ पर एकानतं जके ही = 
तपस्वामे संखून था । फिर जक्मे मच्टीका सङ्ग होनेसे ` 
+  एकसतपर्व्यहमथाम्भति मतखसङ्गात्‌ विवाह करके पचास हो गया बीर फिर संतानेकि ख्प- ` 
६. म॑ पच हजार । विष्योमं सव्यनुद्धि होनेसे मायावे ` ५ 


दस्त पथ्चसह्च (८; 
पञ्चाशदाग्रुत पश्वष्हु्स्गःः | गुोने मेरी बुद्धि हर टी । अब तो लेक ओर परलोक्के 
त्तं सम्बन्धमे मेरा मन इतनी लक्छाओंसे भर गया है कि ` = 
नान्तं वजाम्युभयङृत्यमनोरथानें कि 

मै किसी तरह उनका पर ही नहीं पता ॥ ५२ ॥ ` 
मायागुणेहतमतिरिषयेऽ्थभावः ।।५२॥ | इ प्रकार विचार करते इए वे कु दिनतक तो घस्रे ˆ ` 
ही रहे । फिर विरक्त होकर उन्होने संन्यासलेन्ि ` 

ओर व वनम चसे गय अपने ने भी उ ` पति को ५९ ही |. स्वे सच्‌ क, 











एवं बसन्‌ गृहे कठं विरक्तो न्यासमाखितः। 


| : बनं जमामाुययुस्तत्पत्न्यः परिदेवताः ॥५२ 
तुत्र त॒प्ठ तपस्तीशष्णमात्म ऽ | र्नम्‌ । ध | “- सौभरिजीने १ 


ससन 




















| ¢ 
मौपद्भागवतं | अ० ५ 





| ३२ 

| सहैव मिभिरातमान युयोज प्रमाटमनि ॥५७) | तथा आहवनीय आ।दि अन्नियोके साथ ह्वी अपने-अपको 

| | परमीमामे छीन कर दिथा ॥ ५४ ॥ परीक्षित्‌ । उनकी 

पलियोँने जब अपने पति सौमरि सुनिकी आव्यालिक 

ताः खपत्युरमहाराज निरीक्ष्याध्यार्मकीं मतिम्‌ । | गति देशी, तव जते जादा शान्त अग्निम लीन हो 
जाती है वैसे ही वे उनके प्रभावसे सती होकर 

अन्भीथुलतस्भावेण अग्नं शान्तमिवाचिषः ॥५५॥ । उर्मि लीन ह गथा, उ हीकी गतिको प्रात इः ॥५५ 

--~@०-- 
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमस्य संहितायां नवमस्कन्घे 
सोमर्याख्यने षष्ठोऽव्यायः ॥ ६ ॥ 





अथ सप्मोऽष्यायः 
राजा लिङ्क भौर दरिश्चन्द्रकी कथा 
श्रीदयकदेवजी कहते द--यरीक्षित्‌ । मे वणन कर 


श्रीञ्चुकं उवाच 
चुका द्व कि मान्धाताके पुत्रोमं सवसे श्रेष्ठ अम्बरीष थे । 


मान्धातुः पूत्रश्रबरो योऽम्बरीषः ्रकोतितः । उनके दादा युवनाश्चने उन पुत्ररूपमें खीकार कर 


ल्या | उनका पुत्र इआ यौवनाश्च ओर योवनाश्चका 
हारीत । मान्धाताके वंशम ये तीन अवान्तर गो्रोके 


पितामहेन प्रवृतो यवनाश्च तत्सुतः । 


/ हवस त्रोऽभूलमान्धाठशरवरा इमे । १॥ | मक इए ॥ १ ॥ नागेन अपनी वदिन नमदाका 


यु 8 ८ विवाह पुरुकुत्ससे कर दिया था । नागराज वासुकिः 
नमेदा भ्राठभिरद्॑ता पुरुङ्साय योर; । दी आज्ञासे नम॑दा अपने पतिको रसातलम ले 


: नीतो अजगेन गयी ॥ २ ॥ वहम मगवानकी राक्तिसे सम्पन होकर 
रसातलं नीतो शजगेन्दरभयुक्तया ॥ २॥ | ` 
९ ५ पुरुकुरसने वध करनेयोग्य गन्धर्वोको मार डाटा । इसपर 


ध ४:  गन्धबोनवधीत्‌ तत्र वध्यान्‌ वे विष्णुशक्तिधृक्‌ | | नागराजने प्रसन होकर पुस्वुत्सको वर दिया कि जो 
` इस प्रषङ्गका स्मरण करेगा, बह सर्पि निभय हो 


। 8  नागाह्टन्धवरः सपांदभयं सरतामिदम्‌ ॥ २ ॥ | जायगा ॥ २ ॥ राजा पुरुवुत्सका पुत्र त्रसदस्यु था | 


उसके पुत्र इए अनरण्य । अनरण्यके ह्य, उसे 
हि १ मस र्‌ अरण शौर अरुणके त्रिबन्धन इए ॥ % ॥ त्रिनन्धनवेः 
< र | 1 ्लत्सुतससादरुणोऽथ त्रिबन्धनः ॥| ४॥ | पुत्र सतयत इप | यही संत्त्रत ॒त्रिराङ्क्के नामसे 
ह विल्यात इए । यबपिं त्रिशङ्क अपने पिता ओर गुरुके 

त॒स्य सत्यवतः पूव्रक्विशङ्करिति विश्रुतः शापसे चाण्डा हो गये ये, परतु विश्वामित्रजीके प्रभावसे 


म 





४. वे सरारीर खगम चरे गये । देवताओनि उन्ं वहसे 


न्ब प 
# +न 
1 # 


^  प्धाण्डारतां शापाद्‌ गुरो; कीशिफतेजसा॥ ५॥ | ढक दिया जर वे नीचेको सिर किये इष्‌ गिर पडे; 


ही धिर कर दिया | वे अब भी आकारं ठ्टके इए 


४ =" ~ त 9 - 
शर गत, खगम पि दिवि दृश्यते परत विश्वामित्रजीने अपने तपोबर्से उन्हे आ 
ह तर॥&॥। । दीखते ई ॥ ५६ ॥ 


४ २.५4 ~ ने ५ र 
-- ध व 


तुतं तोऽ १।९५९॥ ५१ ९११॥० स्तम्भितो 











. त 
, अ० ७ | 


~^^^~^~^~^~^~^~--~~-~-~^~--~^~~^~~^~~7¬-~-~~-~~~-~~~-^~~~~~~~^~~~~~- ~~ ~~~ ~~ ^ ^^ ^ ^~^~-~-^~- ~~~ ~~~ ^~ ^~ ~~~ ^~ ^~ ~~~ ^~ ~ ^~ ^~ ^~ ^-^ ^= 





~~~ 


्ेशङ्यो दसथन्द्रो विश्वमित्रवसिष्ठयोः। _ 
यज्निमित्तमभूद्‌ युद्धं पिणोषेहुवाषिकम्‌ ॥ ७॥ 
सोऽनपत्यो शिषण्णास्मा नारदस्योपदेशतः । 
वरुणं शरणं यादः पुत्रो मे जायतां प्रमो ॥ ८ ॥। 
यदि वीरो महारा तेनेव त्वां यजे इति । 

॥ तथेति वरुणेन पत्रो जातस्तु रोहितः ॥ ९1 
जातः सुतो ह्यनेनाङ्ग मां यजस्वेति सोऽ्रवीत्‌ । 
यदा पश्चुनिर्दशः खादथ मेध्यो भवेदिति । १० 
निर्दशे च स आगत्य यजस्वेत्याह सोऽब्रवीत्‌ । 
दन्ताः पशोयंङधिरन्नथ मेध्यो भवेदिति ॥११॥ 
जाता दन्ता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽनबीत्‌ । 


यदा पतन्त्यश्य दन्ता अथ मेध्यो भवेदिवि ॥१२॥ 





` पशोनिपतिता दन्ता यजस्वेत्याह सोऽरवीत्‌। 
, + यद्‌ पोः पुनदंन्ता जायन्तेऽथ पञ; शचि १२ 

 पुनजीता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽब्रवीत्‌ । 

+ (~ = ९ 

सान्नािको यदा राजन्‌ राजन्योऽथ पञ्चः शचि १४। 

| 
इति पूत्राल्रागेण स्नेदयन्वितचेतसषा | 
~ ^ 
क: ~ त | व {< ५ > 


५ क : र 4 ह ** त | 

= " $ ॥ ९ ट 
शाणाचैष चस्य 
 प्राणप्रष्सु णररण्य प्रर 
“| । ऋ 2 ह >) जक 
व “भो व 0 नः १.९ [९ 
॥ अभ > 
श र । भार ५ ५५: + क ९ | 
न ^ 4. = र च ६; १. । । । ~. ५. जथ नः + 


न 
> 1 


नवम्‌ स्कन्ध 


~~~ ~^ ~ 


= 
५ ९ च ह - 
ह 





त्रिशङ्कवे पुत्र थे हरिशन्द्र | उनके च्ि व्िामित्र 
ओर वसिष्ठ एक दूसरेको शाप देकर पक्षी हो गये ओर ` ध. ; 
बहत वर्मोतक लते ए ॥ ७ ॥ इरिधन्द्के कोई _ 
संतान न थी । इससे वे बहत उदास रहा कते ये। ` ` 
नारदके उपदेशसे वे वरुण दवताकी शरणमे गये ओर 
उनसे प्राथना की किं श्रमो ! सन्ये पुत्र प्राप्त ह्यो ॥८॥ 
महाराज | यदि मेरे वीर पुत्र होगा तो मै उसीसे भापका 
यजन करेगा ॥ वरुणने कहा--टीक है | तव 
वरुणकी कृपासे हरिश्न्द्रके रोहित नामका पुत्र इआ ।९। 
पुत्र होते हयी वरुणने आकर कहा-“हरिशचन््र ! तुम्हं 
पुत्र प्राप्त हो गया । अब इसके द्वारा मेरा यज्ञ करो । 
हरिशन्रने कहा-जब आपका यह यज्गपञ्च ( रोहित) 
दस दिनसे अधिकका हो जायगा, तब यङ्क योग्य 
होगा ॥ १० ॥ दस दिन बीतनेपर वरुणने आकर फिर 
कहा--अब मेरा यज्ञ करो ।' हरिचन्दने कडा-- 
(जब आपवे यज्ञपञ्ुके पुमे दत निकल आर्यगे, तब ` 
वह यज्ञके योय होगा" ॥ ११ ॥ दोँत उग॒ आनेपर | 
वरुणने कहा-- अब इसके दत निक आये, मेरा यज्ञ॒ ` 
करो । हरिधन्द्रने कहा-- “जब इसके दूघके दातगिर 
जारयगे, तन यह यज्ञके योग्य होगा ॥ १२ ॥ दूषवे ¦ 
दत गिर जानेपर वरुणने कहा- “अब इस यङ्गपडके ` 
दत गिर गये, मेरा यज्ञ करो ! हरिशचन्दने कहा-- ` 
'जब इक दुबारा दत आ जारयगे, तब यह पञ य्ञके ` 
योग्य हो जायगा ॥ १२ ॥ दोँतकि किर उग अनेपर १ | 4 





त 
9 ् ५ 10. 
। 2 । ~ न 2. ११ च = ॐ ४ 
कम कन क ~~ वि क वो योयो कै-क दः = भ्यौ ~ = अक ९. ६६ ~क" क ॐ =. = 5 क~) < 
















==: ~ <. ह ` 


है, जब वह क्वच धारण -करने च्गेः ॥ १४ ॥. 
परीक्षित्‌ | इस प्रकार राजा हरिन ध कै प्रेमसे ही 


("= 1 व # अ~ 
च+ ऋ यह व र =) = 
"क नि + ४ ` चक ,य्‌ 
हवाल क्रक समय = आ = ~ क द $ डं ऊ १ 
५ काण 9 ध 
टाकते रष इसका र । 
भ इ 9 ` स . 4 यह ८ १ च # 
भ" फन" = + ऋ भि, य द ध जा 4 
"8: ट + नकैः व 6 4 - का #< ॥ 
१: ष्क भ ~ भै ब ध ४“ > ~ 
उनके हृदयको 3 ९ # ६ ॥ 
- म (> ~= 
ष ; 
4 












1 + "ज रस्‌ 8 ह 8 
व 


< जीं ५६५ ५. ष बलिदान ` रना च हत्‌ ड) त ब 


द्‌ ठ 2 11 ्रपि त रत्रा व्यं हाथमं घुल्तु ` केकः 


धः नक जके ग्व्श > [ , ~ इ~०. += ऋ 9१ ५ = चक 


३४ 


पितरं बरुणगरस्तं॑भरुत्वा जातमहीदर । 
रोहितो ग्राममेयाय तमिन्द्रः प्रत्यषेधत ॥१५७॥ 
भूमेः पयटनं पुण्यं दी्थश्षतरनिषेबणेः । 
तेहितायादिशच्छक्रः सोऽप्यरण्येऽबेसत्‌ समाम्‌१८ 
एवं द्वितीये दतीये चतुथे पश्चमे तथा । 


। अभ्येत्याभ्येत्य खपिरो प्रो भूत्वाऽऽह इत्रद।९९। 





| षष्ठं सबस्सरं तत्र चरित्वा रोहितः पुरीम्‌ \ 

(4 | उप्रजनजीगतादक्रीणान्मध्यमं सुतम्‌ ॥२०\। 
शुनशञेपं पश्चं॑पित्रे प्रदाय समनन्दत । 

पुरुषमेधेन हरिशन्द्रो महायशाः ॥२१५ 
्ोदरोऽयजद्‌ देवान्‌ बरुणादीन्‌ महत्कथः;। 

वि्ामित्रोऽभवत्‌ तसन्‌ होता चाध्वयरात्मवान्‌२२ 
जमदभिरमूद्‌ नह्य बसिष्तोऽयायसामगः । 

` तस्ते तष्टो ददाविन्द्रः शातकौम्भमयं रथम्‌ ॥२२॥ 
 शनःरेपसख माहात््युपरिात्‌ प्रचक्ष्यते । 


(य 0 
( निक मीं 7 मभि 2 
त 


17 ककि + ह+ "य 2 
भं 32 3 = 4 # 9 ५ । पि. ४ ५. न, षु ^ ॥ 
&1\ 5 ,. 41 वि 11114 ~ 
०7. 2 क “ "न 17, ^ +न ^ १ ९१००. चु + = १५ ब ~ 
4 ~. 04. "9, 1 9३ }./ १३ 
धि ति ५१ „1 |; थ कै ५ न च. ॥ क्ष = + 


द “ ब -- = किन ~ = 3 
। "~ #4 . ५१? १ 
+. 4 ¢ कन, + ठ १६५ । र 1३ 
१ 
[ति ॥ न +, क, अ 
। “ # ॥ प. ककं 
त दद. १२१ # + 
४ 4) १ त ~ 
४ १ (1.3 
~ 1 ४ -4 
[न 


4 ॥ ॥ 
क» ' > "न 5 



















नि 


ध  सत्यसारां शतिं षरा सभायंख च भूपतेः ॥२४) 
. वरिवामित्रो भृशं श्रीतो ददावविहतां गतिम्‌ । 
पृथिव्यां तामद्धिस्तेजस्ापोऽनिङेन तत्‌ ।२५) 


# ष 


भयः 
मन्‌ 
न 


। चे बां धारस्त् भूतादौ तं महात्मनि । 


श्रीमद्भागवतं 






भी परियाग कर दिया भौर समत बन्धनेसि युक्त होकर 


+ 


| अ० ७ 





न ~ 
ज चः चो ` ऋ कः क चः न्क जि चि को कोका जि स ननन ~ 


वनते चला गया ॥ १६ ॥ कुछ दिनके वाद्‌ उसे माम 
हओं किं वरुणदेवताने रु्ट॒होकर मेरे पिताजीपरं 
आक्रमण किया है- जिसे कारण वे महोदर रोगसे 
पीडित हो रहे है, तब रोहित अपने नगरकी ओर चल 
पड़ा । परतु इन्द्रने आकर उसे रोक दिया ॥ १७॥ 
उन्होने कहा---“बेटा रोहित ! यज्ञपञ्ु बनकर मरनेकी 
अपेक्षा तो पवित्र तीर्थं ओर क्षेत्रोका सेवन करते इए 
पृथ्वीम विचरना ही अच्छा है ।› इन्द्रफी बात मानकर 
वह्‌ एकः वर्षतक ओर वनमे ही रहा ॥ १८ ॥ इषी 
प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे ओर पोच वषं भी रोहितने 
अपने पिताक पास जानेका विचार किया; परंतु बूढ़े 
्राह्मणका वेष धारणकर इर बार्‌ इन्र आते शौर उसे 
रोक देते ॥१९॥ इस प्रकार छः वर्धतक रोहित वनपे 
ही रहा । सातवै वर्षं जव वह अपने नगरको व्ैटने 
लगा, तब उसने अजीगतंसे उनके मञ्लले पुत्र नः 
शेपको मोक ॐ छा ओर उसे य्ञपञ्ु बनानेके व्ये 
अपने परिताको सौपकर्‌ उनके चरणोमें नमस्कार किया । 
तब परम यराखी एवं श्रेष्ठ चसिवारे राजा हरिश्वन्दरमे 
महोदर रोगसे छरृटकर पुरूषमेध यक्दवारा वरुण आहि 
देवताओंका यजन किया । उस यज्ञमे विश्वासित्रजी होता 
हए । परम संयभी जमदग्निने अध्वथुका काम किया | 
वसिष्ठजी ब्रह्मा बने ओर अयास्य सुनि सामगान करने- 
वाठे उद्गाता बने । उस समय इन्द्रे प्रसन हकर 
हर्शचन््रको एक सोनेका रथ दिया था ]॥ २०-२२॥ 

परीक्षित्‌ | आगे चल्कर मँ श॒नःरोपका माहास्य 
वर्णन करगा । इरिशन्द्रको अपनी पल्नीके साथ सत्यमे 
टदृतापूवक लित देखकर विश्चामित्रजी बहत प्रस 
हए । उन्होनि उन्हे उस्‌ ज्ञानका उपदेश किया, जिसका 
कभी नाश नह होता । उसके अनुप्ार राजा हरिन्द्रन 
अपने सनको प्वीमे, प्रथ्वीको जल्मे, जलको तेजम, 
तेजको वायुम ओर वायुको आकाशम स्थिर करके, 
आकाराको अहङ्कारे छीन कर दिया । फिर अहङ्कारको 
महत्तत्वमे लीन करके उसमे ज्ञान-कलाका ध्यान किया 
ओर उससे अज्ञानको स्म कर दिया ॥२४-२६॥ 
इसवे बाद निर्वाण-घुखकी अनुभूतिसे उस ज्ञान-कल्यका 











अ० ८ | 
अनिरदश्यापरतक्येण तसौ विष्वस्तबन्धनः ॥२७॥ | वे अपने उस खरूपमे" खित हो गये, जो न तो किरी इ 
~ | प्रकार बतलाया जा सकता है लोर न उसके सम्बन्धमे 
किसी प्रकारा अनुमान ही किया जा स्का दै ॥२७ 
इति श्रीमद्भागवते म्ापुरण पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे हरिशन््रो- 
पाल्यानं नाम सप्तमोऽव्यायः ॥ ७ 1 
न्ध 
अथाष्टपोऽष्यायः 
सगर-चरिज 
शर्क उवाच धरीरयक्देवजी कहते हं-रोदितका पुत्र था हरित । 
| म्य हुआ । उसीने चम्पापुरी बक्षायी थी । 
हरिषो रोहितसुतश्वम्पंस्तसाद्‌ विनिषिता 1 चम्पसे सुदेव ओर उसका पुत्र विजय इजा ॥१॥ 
= ऋः व्रिजयका मरुक, भरुकका बक ओर दृकक्रा पुत्र इआ ` 
चम्पापुरी सुदेषोऽतो वियो सख चात्मजः ।। १ ॥ | बाहुकः । र्रुभने बाइकसे राव्य दीन ष्वा, त बह 
7 पत्नीके साथ वनमे चला गया॥ २ाव्नमं 
३ वकसलस्यापि बाहः अपर्न 
1 धकप जनेपर बुढापेके कारण जब बाहुक्की गृष्यु ह गयी, _ ` 
गरि मापि की पत्नी भी उसके साय सती होनेको उचत ` 
सोऽरिभिहेतभू शजा सभार्यो वनमाविशत्‌ ॥ २॥ | ०५ ॐ 4 
ह्‌ ६ | इई । परंतु महद्षिं ओवेको यह म्म था कि इसे गमं ` 
द्धं तं पश्वतां प्रां भिष्यलु सरिष्यती । है । इथि उन्दने उसे सती दोनेसे रोक दिया ॥३॥ 
| । जब उसकी सी्तोको यह बात माम इई, तो उन्हनि = 
॥ ओभेण जनताऽऽस्मान प्रजाधन्त निवासि ॥ ३॥ उसे भोजनके साथ गर ८ विष) दे दिया, परत १ ५ 
"~ 2 गर्मपर उस विषका कोई प्रभाव नदीं पडा; बल्कि उस ` 
।  आह्ञायास्ये शपलीभिगरो दत्तोऽन्धसा सहं । 


ॐ 


^ ण मरण्डाज्लमश्ुधरान्‌ कां धिन्धक्तकेशार्धभुण्डितान्‌, £ | रबा दी" 


विषको घ्य इए दी एक बाल्कका जन्म इआ, जो ` 


गरके साय पैदा होनेके कारण (सगरः कलया । सगर" 
सह तेनैव संजातः सगराख्यो महायशाः । ४॥! | बडे यराली राजा इए ॥  ॥ ः 


सग्रथक्रवत्यासीत्‌ सागरो यत्सुतं; कतः 









कर्‌ समुद्‌ बना दिया भा । सगटने अपने गुल र म जो ॥ 


सारजङ्वान्‌ ययनाञ्छकान्‌ देहयववरान्‌ ।। ५॥ | आज्ञा मानकर तालजङ्ग, यवन, चक हदय आर नर 









नावधीद्‌ गुरुवाक्येन चक्रे विकृतवेषिणः त 

ुछको सु बा्मेषाया बना ठि बना दिया तो कुखछ्को 
| आधा सुडवा दिया ॥५-६॥ कुः इ वेको सगरे केवल 

नत दने: न - दी, पहननेकी नदी 1 ओर 


र 2 2 ~ 
र ५२ 


र नवक 1 ॥3-, ॐ „~ 
` ~ 4 
क {~ 9 ५ र 4 ध्‌ 
क च ` ॐ +भ त - 
"न 
४ । ठ 





~ न = ~ 
= न~ > कस््ज्न्टय्‌ 


य स य 


४ 





सोऽश्वमेधैरयजत सवरवेदसुरात्मकम्‌ ।॥ ७। 
ओर्वोपदिष्टयोगेन हरिमात्मानमीश्वरम्‌ । 
तसयोत्व॒ष्टं पञ्च यज्ञे जहाराश्वं पुरन्दरः ॥ ८ ॥ 


सुमत्यास्तनया इक्ताः पितुरादेशकारिणः । 


न व्व कीक 


| अ० ८ 





कोद्य भि जोन नक च्यक, 















ठको केव गोटी पहननेको ही कडा, ओदनेको 
नह । इसके बाद राजा सगरने ओव छषिके उपदेशा- 
लुसार अश्वमेध यक्ञके द्वारा सम्पूणं वेद एवं देवतामयः 
आत्मघ्प, सरवदाक्तिमान्‌ भगवानकी आराधना की | 
उक यज्ञमे जो घोड़ा छोड़ा गया था, उसे इन्द्रने चुरा 
न्या ॥ ७-८ ॥ उस समय महारानी सुमतिके गमेसे 


` | उत्पन सगरके पुत्रोने अपने पिताके आज्ञानुक्तार धोडके 


| घ्ि सारी प्रथ्वी छन डाली । जब उन्हें कहीं घोडा 


हयमन्वेषमाणास्ते समन्तानन्यखनव्‌ महीम्‌ ॥ ९ ॥ 
प्रागुदीच्यां दिशि हय दद्युः कपिलान्तिके । 
एष वाजिहरशथोर आस्ते भीकितलोचनः 1१०] 
हन्यतां हन्यतां पाप इति षष्टिसहक्षिणः । 
उदायुधा अभिययुरुन्मिमेष तदा शनिः ॥११॥ 
खशरीराभिना तावन्महेनदरहतचेतसः । 
महद्व्यतिक्रमहता भससादभवन्‌ क्षणात्‌ ॥१२॥ 
न॒ साधुवादो अनिकोपभजिता 
ृधनद्रत्रा इति स्वधामनि । 
कथं तमो रोषमयं विभाव्यते 


जगत्पवित्रात्मनि खे रजो शवः ॥१२॥ 


यस्येरिता सांसयममी चेह नौ. 
भथा भरते इर्य 








व, # 
4 „ क "न । कने 5 
= 6 ्ै ५ ॥॥ ~ $ ककि 
= ग ॥ । शि ॐ ॥: न्दु {प ४० 
च 8४.) भवाणव 
कृ च > ॥ । # 
क भ - ४ 9 | 
न = ~ ५ +| 
१ ~ "+ व : => म्त्युपथ 
५ = 29 19 1 व्‌ जक म %^ 
~ । मः कः - कः त ४ ५ ध ~ २ 9, 
+ = "~ श ग ि # | 
- क~ + क्क्‌ ७ $) "द |" 8८ 
॥ प्र ५, न ह 
>. । = १ ४ ५, 
५ # -% नि ह; १ ~ क ज > 
र न । 
त भ षु + 
५ 






| क ७ प स 
१ ~ 4 
मि ५4 र ॥ ४ ~>. ~ ~ 
< + च कपः ड ॥ ५2 ६१ ह भद =| 
^ ९८२ ~ = ११.१४ 8 र 1. ८ 3; 
+ > क क ॐ = `` म 2, ॥ 9 -#? च - ~+ रक ~ ड ` 9) 
। ॥ ++ > क (^ क ०. 1 क ०५ ५ 
= ~~ 7 कथ श ० 
1 ॥ न त क ॐ ४ ये 


न मित्य, तब उन्होने बड़े धमंडसरे सब ओरसे पृथ्वीको 
खोद डाव ॥ ९ ॥ खोदते-खोदते उन्हं पूवं जर 
उत्तरके कोनेपर कपिर सुनिके पास अपना घोड़ा 
दिखायी दिया । धोडेको देखकर वे साठ हजार राजकुमार 
राख उठाकर यह कहते इए उनकी ओर दौड पड़े किं 
"यही हमारे घोडेको चुरानेवात्म चोर है । देखो तो 
सही, इसने इस समय कैसे ओंखं मूँद रक्खी हँ । यह 
पापी है | इसको मार डाढो, मार डालो ! उसी समय 
कपिल सुनिने अपनी पल्कं खोरी ॥ १०-११ ॥ 
इन्द्रने राजकुमार की बुद्धि हर ली थी, इसीसे उन्होने 
क्पिल्सुनि-जेसे महापुरुषका तिरस्कार क्या । 
इस॒ तिरस्कारे फर्खरूपम उनके दारीरमे दही 
आग जक उदी, जिससे क्षणभरमं दही वे सब-वे- 
सुत्र॒ जल्कर खाक हो गये ॥ १२ ॥ परीप्षित्‌ । 
सगरके ठंडके कपिकमुनिके क्रोधे जर गये, पेसा कहना 
उचित नहीं है | वे तो शुद्ध सत्वगुणके परम आश्रय 
है | उनका शरीर तो जगतुको पवित्र करता रहता है । 
उनमें भव्य; क्रोधखूप तमोगुणकी सम्भावना वसे की 
जा सकती है । मल, कहीं पृरथ्वीकी धक्का मी 
आकारासे ्म्बन्ध होता है £ ॥ १३ ॥ यह संसार-सागर . 
एक मूत्युमय पथ है । इसके पार जाना अत्यन्त कठिन 
है । परतु कपिच्मुनिने इस जगतमे सांस्यसास्की एकं 


सी दृढ नाव बना दी है, जिससे सुक्तिकी इछा रखने- 


बालां कोई भी व्यक्ति उस समुद्रके पार जा सकता है । 
व केवल परम ज्ञानी ही नदी, खयं परमात्मा है । उनमें 
मखा, यह शत है ओर यह मित्र- इस प्रकारकी मेद- 


परत्मूतस कथं एषद्तिः ॥९७॥ | बि वस रती ह १ ॥ १५। 
केषं एथङ्मतिः ॥१४॥ | बुद्धि कैसे दो सवती है १ ॥ १४॥ ` 
१ क = >; ० ~ । न | हः 


इ ॥॥ 
१ ०५ भ ण क > 
(1 (६ ॐ ~^ कैः (शि | 
न 
ष ज ह». ~, त 
~ व . 





` इतोऽपरे तस्य मन शरीरधौ 





याऽसमज्स इत्युक्तः स सि रलः 

र 
तख प््रोऽद्ुमान्‌ नाम पितामहहिते रतः ॥१५५॥ 
असमञ्जस आत्मानं दश॑यभसमज्ञसम्‌ | 
जादिखरः पुरा सङ्घ योगी योगाद्‌ विचारितः।१६। 
आचरन्‌ महितं रोके ज्ञारीनां कर्म विप्रियम्‌ । 
सरस्नां क्रौडतो बालान्‌ प्राखदद्जयड्नम्‌।॥।१७॥ 
एवच्तः परित्यक्तः पित्रा स्नेहमपोह्य वै । 


७, र, 


योगेख्येण बाङस्तान्‌ दर्शयित्वा ततो ययौ ।१८॥ 
अयोध्यावासिनः सवे बारकान्‌ पुनरागताच्‌ । 
दृष्ट्रा बिक्षिसिरे राजन्‌ राजा च॑प्यन्वतप्यत्‌ ।।१९॥। 
अंशुमांशोदितो राज्ञा त्रङ्गान्वेषणे थयौ । 
पितृव्यखातानुपथं भान्ति ददे हयम्‌ ॥२०॥ 


तत्रासीनं निं वीय कपिलाख्यमधोक्षजम्‌। 


, असत्‌ समाहितमनाः प्ाज्ञरिः प्रणतो महान्‌।९१॥ 


अच्युमानुवाच 
न प्ह्यति त्वां प्रमात्मनोऽजनो 
न बुध्यतेऽद्यापि समाधियुक्तिभिः। 





स॒गरकी दूसरी पन्लीका नाम था कैरिनी । उसुकं 


गर्भसे उन्हं असमन्ञ् नामका पुत्र इआ था । असमन्नस- 


के पुत्रका नाम था अंद्चमान्‌ । वह अपने दादा सगरी 
आज्ञाओंके पाजन तथा उन्हींकी सेवामें चणा रहता ॥ १५॥ 





असमञ्नस पहटखे जन्ममें योगी ये | सङ्के कारण वे. 


योगसे षिचचित हो गये थे, परंतु अब भी उन्दं अपने 
पवंजन्मका स्मरण बना हआ था | इसब्यि वे एेसे काम 
किया करते थे, जिनसे माई-बन्धु उरे प्रिय न समञ्चं | 
वे कभी-कभी तो अत्यन्त निन्दित कमं कर तैठते ओर 
अपनेको पागल-सा दिखते--यहँतक किं खेव्ते इए 
बच्चोको सरयूमं डाल देते | इस प्रकार उन्डनि ोगोक्षो 
उद्व कर दिया था ॥ १६-१७ ॥ अन्तमं उनकी 
ेसी करतूत देखकर पिताने पुत्रसनेहको तिलाञ्लि दे 
दी ओर उन व्याग दिया । तदनन्तर असमञ्चस्‌- 
ने अपने योगबल्से उन सब बालकोंको जीवित कर 
दिया ओर अपने पिताको दिखाकर वे वनमें चले 
गये || १८ ॥ अयोध्याके नागरिकोने जब देखा किं 
हमारे बाख्क तो फिर गट आये, तब उन्दः असीम 
आश्चयं इभा ओर राजां सगरको भी बड़ा पश्चात्ताप 
हआ ॥ १९ ॥ इसके बाद राजा सगरी आज्ञासे 
अं्युमान्‌ धोडेको दूदनेके च्वि निकरे । उन्दनि अपने 
चाचा्के हारा खोदे इए समुदके किनारेकिनारे 
चलकर उनके शरीरके भस्मके पास ही घोडेकोः 
देखा ॥ २० ॥ वहं भगवानूके अवतार कपिर सुनिं 
बेठे इए थे । उनको देखकर उदारृदय अंञ्युमान्‌ने 


उनके चरणोमे प्रणाम किया ओर हाय नोडकर एकाम्र 


मनसे उनकी स्तुति की ॥ २१॥ 


[२ 


से भी परे ह । इसीष्थयि वे आपको प्रक्ष नदी देख क ( 


क 2 


पते । देखनेकी बात तो अकम रदी- पे समाधि करते. ` 


करते एवं युक्ति च्डातेख्डते हार गये, वितु आज- ` 
तक आपको समञ्च भी न्वी पाये । हमलेग तो उनके ` 
+ | मनः शरीर ओर बुद्धिस होनेवारी सृष्टिक दारा बने . 


चिणो 5 ते" कीः 7२ भत ज १० ` ददवा ककतति 





२८ < श्रीमद्भागवत | अ० ८ 








दे क धारके शरीरधारी सच्गुण, रजोगुण 

भाजक्िगुणप्रधाना सकते है ॥ २२ ॥ सपार । 
थे ^ ल या तगाण-प्रधान दै । वे जाप्रत्‌ ओर खप्न अवस्था 
गुणान्‌ विपश्यन्त्युत वा तम ¦ केवल गुणमय परार्थो, विषर्योको ओर सुुप्ि-अवस्थाम केव 
| सोहितबेतसस्त । न देखते है । इसका कारण यह है किं 

यन्मायया भो्ितचेतसस्ते अज्ञान-हवी-अज्ञान प 
ः र वे आपकी मायासे मोहित हो रहे है । वे बहिशुख शोनेके 
विदुः सखसंस्थं न बहिःप्रकाशाः ॥२२॥ | कारण बाहरकी वस्तुओंकोः तो देखते है, पर अपने ही 
हृदयमें सित भापको नहीं देख पते ॥२३॥ अप 


तं॑त्वामहं ज्ञानघनं सभाव एकरस, ज्ञानघन है । सनन्दन आदि सुनि, जो अस्म- 
दमोह के अनुभवसे मायके गुणोके द्वारा होनेषाठे 
परध्वस्तमायागणभेदमोहेः स 
+ सेदभावको ओर उसके कारण अनज्ञानको नष्ट कर 
सनन्दनवैनिभिविभाव्यं चुके है, आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते है । मायाके 


गुणेमिं दही भूख हआ म मूढ किप प्रकार अपका 
चिन्तन कर १ ॥ २४॥ माया, उ्षके गुण ओर 
गुणेकि कारण होनेवारे कम एवं कमोकि संस्कारसे 
सदस बना इआ टिङ्ग शरीर आपर्मे है ही नहीं । न तो आपका 
| मनामसूपं ` युक्तम्‌ । नाम है ओरनतो ख्य । आपे न कायं है ओरन तो 
<. गीददिहं कारण ! भाप सनातन आत्मा दहै । ज्ञानका उपदेरा 
ञानोपदेशाय दीपदेह करनेके च्ि ही आपने यह शारीर धारण कर रका 
नमामहे त्वां पुरुं पुराणम्‌ ॥ २५) है | हम आपको नमस्कार करते हैँ ॥ २५॥ प्रभो । यहं 

ले संसार आपकी मायाक्षी करामात है | इसको सत्य 
त्वन्मायारचिते रोके षस्तुशुद्धया गृहादिषु । समश्नकर काम, लोभ, ईष्या ओर मोहे लोगोंका चित्त, 


क नाति शारीर तथा धर आदिमे भटकने लगता है । चग इतके 
न्त्‌ १ {२६ & ह ् 
भ्रमन्ति ह 8) २॥ समला यिय आला 


अद्य नः सर्वभूतात्मन्‌ कामकर्मन्द्ियारयः। प्रमो | आज भापके, दशनसे मेरे मोद फी बह द फोंपी 
~ 8 कट गयी जो कापना, कमं ओर इन्दर्योको जीवन-दान्‌ 
हप दटर्छिन्ो भग्वस्तत दश्चनात्‌।.२७) | देती है ॥ २७ ॥ 


कथं हि मूढः . परिभावयामि ॥२४) 


्रक्ान्तमायागणकमेलिङ्ग- 








श्रीक उवाच श्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ | जन अं्ुमान्‌- 

| ने भगवान्‌ कपिखमुनिके प्रभावका इस प्रकार गानं 
किया, तब उन्होने मन-द्यी-मन अंञ्युमान्‌पर बड़ा अनुप्रह 
चेदमयुगद्य धिया चप।॥२८॥ | कया ओर क्डा--॥ २८॥ 


र ६ ५. र १ ¶ १ न + "44 भ ४. ११५ # 0 । + } ; ५ ए काश 1 0 9 १४ ती | द्वि ^ + २१२ ॥.# 
" " १ = --१६५ / 7 ¢ 5 ' त 6१,८ १- ^ > १ 
ई ०.१.१९ # # ~ + ^ ~ ~ च > 
क; >‰१५१३;० ` त * ह त! 
11 | 13 ४. १ उभ च १5. ई ॥ । 
चै  #- ध, " 
.%‰ १६ 


क्रीभगवानने कहा--श्वेया | यह घोड़ा तुम्हारे 
पितामहका य्गपद्च ` दै । इसे तुम ॐ जाओ । तम्हारे 


॥ । ॥ 
५ "ग 
॥। (भीते 
कको, न = 
[क 2 त 7 
# 9 - = ~~ ~ "कको € 













अॐ० ९ | मवम स्रं 














तं॒परिकरम्य शिरसा प्रसा हयमानयत्‌ । ओर कोई उपाय नदी है" ॥ २९ ॥ अंपानने बडी ` 
ˆ | नम्रतासे उन्हे प्रसन्न करके उनकी परक्रम की ओर 
सगरस्तेन पशना क्रतुेषं समापयत्‌ [३० | वे षोडेको ऊ आये । सगरने उस य्ञपञ्के द्वारा ` क 
यज्ञकी रोष क्रिया समाप्त को॥३०॥ तव राजा 
राज्यमंशमति न्यस्य निःस्पृहो शुक्तषन्धनः | सगदने अंदयमानूको राज्थका भार सीप दिया ओर वे खय॑ 
- विष्ोसे निःस्पृह एवं बन्धनमुक्त हो गये । उन्होने महिं ` 
्नोपदिष्टमागण रेमे गतिमुत्तमाम्‌।।२१॥ । ओरवके बतत्ये इए मार्गसे परमपदकी प्रापि की ॥ २१॥ 
अछ+ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्वन्वे 





र सगरोपाख्यानेऽमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ 
"भन 
अथ नवमोऽध्यायः 

भगीरथ-खरित्र ओर गङ्ञावतरण 
श्रीद्युक उवाच भीययुकदेवजी कहते है-परीक्षित्‌ | अंडमानने ` 
मं ल 6 गङ्गा जीको गनेकी कामनासे बहुत वर्षोतक घोर तपस्या ` 
१ नयनकास्यया । की | परंतु उन सफलता नहीं मिली, समय अने 
\ 5 उनकी मृत्यु हो गयी ॥ १ ॥ अं्युमानके पुत्र दिकीपने _ 
कर अहान्तं नाश्चक्रात्‌ ततः ४ वसी ही ~ हे कः ध | 
हान्त नाशक्रोत्‌ तत; केन ससित १॥ र वै दी त्या कौ । पव ची जत च 
= त च समयप्र्‌ उनकी भी मृद्यु हो गयी । दिरीपके पुत्र थे 
दिलप्त्मुतददचक्तः ऋालनेमिान्‌। भगीरथ । उन्हानि बहुत बड़ी तपस्य की ॥ २ ॥ उनकी 
 भगीरथलस्य पुत्रस्ते स सुमहत्‌ तपः ॥ २॥ | तप्यसे प्रन होकर भगवती गङ्गने उने दशेन दिया 4 


र ओर कहा कि तुं वर देनेके व्यि आयीदहै। 
दर्शयामास तं दैवी असा वरदासि ते। | उनके देषा कहनेपर राजा भगीरथने बड़ी नभ्रतासे 
3 अपना अभिप्राय प्रकट किया किं अप मव्यगेकमे 
` + इत्युक्तः खमभिप्रायं श्चसावनतो चपः ॥ ३ \' | चब्ि, ॥ ३ ॥ + 
, कोऽपि धारयिता वेशं पतन्त्या मे महीतले | [ गङ्गाजीने कहा-- ] “जि समय पै खसे प 
: 4 तपर गिर, उस समय मेरे वेगको कोई धारण कले. ` 
व वाग होना चाहिये। भगीरय । पसा न 1 + 
अन्यथा भूतलं भित्वा चप यास्ये रसातलम्‌॥। ४ \ दना ववि मण 


इसके अतिरिक्त इस कारणसे भी भँ प्रथीपर्‌ 
र्व चाहनन्‌ खव यास्ये नरा मख्याम्जन्त्यधमू । जागी कि ढोग मुम जप पाप घोयेगे। प्रि । उ 
श; स | पापको करां धोऊगी । मगीरथ । ईप विषये 

६ ८ 5  मजामितदष इत्र राजतत र्वि ४ यताम्‌ ॥ ५ ॥ | खयं विचार कर को ( २ [1 


"26 ट; (० 
~ न = ^ च त भगीर 4 छ 
-@ क» ६ च व ^ क ` ५ - 
न म # 8 ~ ` ९ 
उवाच व क ऋः हं 4 ५ ६ ७4 
॥ "भ चको. भ ~ चन ् + नद ¢ 
दमे (व. 92 "क 1 + ०, 
(क १५४, ५ - ४ 
क च ह च "क १ > 
जक त हि क = नै 
ह गः 
# | ३ 1 ॥ 



















र १ ॥ ॥ त 4 
ध: ० | सर | | 9 & ८1 17|| (६६९ । 


च ~ 
। र प 
| 


| ० . * श्रीमद्भागवत | अ० ९ 
\ „न~ ज~ 


| (स | लोकोंको पवित्र करनेवाठे परोपकारी 
हरन्त्यधं तेऽङ्गरज्गात्‌ तेष्वास्ते हषमिद्धरिः ॥ ६ ॥ | 8 चूं नलनिष् ओर कोकोको पवित्र करनेवा 
| ¢ सज्नन है- वे अपने अङ्गस्परासे तुम्डारे पार्पोको नष्ट 


 , धारयिष्यति ते वेगं रुद्रस्त्वात्मा शरीरिणास्‌ । कर देशे; 'क्योकि उनके हृदये अवरूप भवाघुरको 








` 7 | मारनेवाछे मगवान्‌ सवेदा निवास करते है ॥ ६ ॥ 
| यसिन्नोतमिदं प्रोतं विखं शाटीव तन्तुषु ॥ ७ ॥ | समस्त प्राणि्योके आत्मा देव तुम्हारा वेग धारण 
। कर छेगे; क्योंकि जैसे साड़ी सतोमं ओतप्रोत है 


| इत्युक्त्वा स स्पा देवं तपसातोषयच्छिवम्‌ । . ‹ वैसे दी यद सारा विश्च मगवान्‌ रुढरमे ही ओतप्रोत 

| हैः ॥ ७ | परीक्षित्‌. । गङ्गाजीसे इस प्रकार कहकर 

कालेनाल्पीयसा राज॑स्स्येशंः समतुष्यत ॥ ८ ॥ | राजा मनीरथने तपस्याके दवारा गतान्‌ शंकरको प्रन 

किया | थोडे दही दिनम महादेवजी उनपर प्रसन हो 

~ © = ६ { = हितैषी 

तथेति राज्ञाभिहितं सवरोकहित १ शिव १ । | गये ॥ ८॥ भगवान्‌ शंकर तो समप विश्वके हितैषी 

ह र है, राजाकी बात उन्होने "तथास्तु, कहकर खीकार कर 

द्धाराबहितो गज्गां पादपूतजलां हरेः ॥ ९॥ ढी | फिर दिवजीने सावधान होकर गङ्गाजीको अपने 

गसं राजिनिन्य सिरपर धारण किया । क्यों न हो; मगवानूक्ते चरणोका 

भगीरथः स ॒राजषिनिन्ये शुवनपावनीम्‌ । सम्पद होनेके कारण गङ्गाजीका जक परम पवित्र जो 

है ॥९॥ इसके बाद राजषिं भगीरथ त्रिभुवनपावनी गङ्गा 

त्र खपितणां देहा भस्मीभूता; स शेरते ॥१०॥ | जीको वयँ ॐ गये, जहो उनके पितरोकेः रीर राव 

| | देर बने पड़े थे ॥१०॥ वे वायुके समान वेगसे चकने- 

रथेन वायुवेगेन प्रयान्तमनुधावती । वाठ रथपर सवार होकर आगे-आगे चल रहे ये ओर 

| निर्ध उनके पीठे-पीडे मार्गमे पडनेवाठे देरोको पवित्र करती 

देशान्‌ पुनन्ती नासिशचत्‌ सगरारंमजान्‌ ११। | इई गङ्गानी दौड रही थी । इस प्रकार गङ्ग-सागर-सङ्गम- 

त पर पहुंचकर उन्होने सगरके जले इ९ पुत्रको अपने 

यजरस्रमात्रेण हमदण्डहता अपि । जलमें इना दिया ॥ ११ ॥ यद्यपि सगरके पुत्र ब्राह्मण- 

केः तिरस्कारे कारण मस्म हो गये थे, इस्तव्ये उनके 

उद्धारका कोई उपाय न था---फिर भी केव्रर शारीरक 

भूाज्गङ्गन लत राखके साथ गङ्गाजल्का स्पदां हो जानेसे ही वे खमे 
त्‌ ‡ { क ज 

भी मजः । | चले गये ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ । जब गङ्गाजल्से शरीरकी 


 द्धिपनः अद्या राखका स्परा हो जनेसे सगरके पुत्रको खगंकी प्राप्ति 
, + दी बे सेननते धत्त; ॥१२॥ हो गयी, तब जो लोग श्रद्धाके साथ नियम केकर 


ध = श्रीगङ्गाजीका सेवन करते है, उनके सम्बन्धमें तो कहना 
। न हेत्‌ परमाय खधुन्या यदिहोदितम्‌ | ही कया है ॥ १३ ॥ दैन गङ्गाजीकी महिमा सन्ध 
छ त ताया ८ मे जो कुछ कडा है, उमे आाश्व्यकी कोई बात नही ` 
` अनन्तचरणाम्भोजः भवच्छिदः ।॥ १७] | है; क्योकि गङ्गाजी मगवानूके उन चरणकमले 

| 2 निकली ह, जिनका श्रद्धाके साथ चिन्तन करके बडु- 
बड़ सुनि निल हो जते ह ओर तीनों गुणोके कठिन 


` सगरात्मजा दिवं जग्धः. केबलं देहभसभिः ॥१२॥ 






¢ क ह २ „= 

कृ ४ 
। = >< ् ५१६८ 
ज 2. कु 4 ४ १ = ८४ 
ति पि न भ † >. = र व 
{ ए र ~ = क रे 9 4 हः म न ॐ ् (^^ द - 
+£ 9" क~ > क 


क 
११. "37 


१. इ . यसिच्छरदधया ट ५ 

7 क्क ~ ९ [क + 4 क ८ वि ॥ 

~ ह ~ १ च. ५ गक ति 
# > -- र अ न ४ [ ए९॥:१ . ध 
ॐ षक क + ¶ 4२ (€ @ # | (1 #" २ "तञ + 
{+ 02 क १. 4 ¶ + 1 (१,९.१0 च म 9. ८ 
१ => 9 + ~ न (स (न $; कक, । ` ५ + ~ जट ् 
४ (अ ~ = रि 0 म सक ~; 4 -4 ह 
४. क. क न = न्क 4 * ति (१ + १४ ,#- चने न त 
1 ~ व 
५ "क नद ` > "ट = ~ ^ + "व्च च 
^ + र 2, क न्क्व 8 4 
न ॥ि ह, 
त 








। र & ॐ स „ „` ` `-`-`----------------------------------------- स: य < 
नगुण्य दुस्स्यज हित्वा यो यातास्तदात्मतामू्‌।।१९५]। | बन्धनक्रो काटकर तुत्त मगल बन_ जाति है| 
पि गङ्गाजी संसारका बन्धन काट दे इसमे कौन बडी 
वात ह ॥ १४-१५॥ र 


> 


शतो भभीरथाजक्ञे तस्य नाभो ऽपरोऽभवत्‌ । 


सिनधुीप्ततस्तसाद्‌ुतायु्ततोऽभवत्‌ ॥१६॥ 


ऋतुपर्णो नरषखो योऽश्ववियामयान्नसात्‌ । 


दत्त्वाक्षहृदयं चस्मे सवंकामस्तु तत्सुतः ।१७।॥ 


ततः सुदारस्तत्पुत्रो मदयन्वीपतिर्नप। 


9 + 


आहुरमित्रसहं यं वे कर्मापाङ्घिुत कचित्‌ । 


वसिष्ठशापाद्‌ रक्षोऽभूदनपत्यः खकर्भणा ॥९८॥ 
राजोवाच 
कं निमित्तो गुरोः शापः सीदासख महात्मनः । 
एतद्‌ वेदितुमिच्छामः कथ्यतां न रहो यदि ॥१९॥ 


श्रीञचुक उवाच 


सौदासो मृगयां फिश्चिचरन्‌ रक्षो जघान ह । 
५ मोच भ्रातरं सोऽथ गतः प्रतिचिकीषया ।॥२०॥ 
, स चिन्त्यन्नधं राज्ञः दरूपधरो गृहे । ` 
। य भोक्ठकामाय पला निनय नरामिषम्‌॥२१॥ 


परिविक्ष्यमाणं भगवान्‌ विलोक्याभ्यमञ्ञस्ा । 


च 


राजानमश्यपत्‌ कद्ध रक्षा 





हेवं भविष्यसि ।॥२२॥ | जाः हस कामसे तु रक्षस हो जायगाः 


क न्नः ५ क > 


भगीरथका पुत्र था श्रुत; श्र॒तका नाभ । यह नाभ 
पर्ाक्त नाभसे भिन है । नामका पुत्र था सिन्धुद्वीप 
ओर सिन्धुद्रीपका अयुताय । अयुतायुके पुत्रका नाम 
धा ऋतुपण । वह नल्का मित्र था । उसने नख्को 
पासा फकनेकी विदाका रहस्य बतलाया था ओर बदलते 
उससे शखविद्या सीखी थी । ऋतुपर्णका पुत्र सर्वकाम 
इआ ॥ १६-१७ ॥ परीक्षित्‌ । सवकामके पुत्रका 
नाम था दात्त । सुदासके पुत्रका नाम था सौदास 
ओर सौदासकी पतनीका नाम था मदयन्ती । सौदा्षको 
ही कोकोई मित्रसह कते है ओर कही.कही उसे 
कट्माप्रपाद्‌ भी कहा गया है । वह वसिष्ठके रापसे 
रक्षतहो गया था ओर फिर अपने केकि कारण 
संतानहीन इ ॥ १८॥ 


` राज्ञा परीक्षितने पूछा-भगवन्‌ | हम य जानना 
चाहते हं कि महात्मा सौदासको ग वसिष्ठनीने शाप 
कों दिया १ यदि कोई गोपनीय बात न हो तो कृपया 
बतलाह्ये ॥ १९ ॥ 


 श्ीटयुकदेवजीने कहा- पु रीक्षित्‌ | एक बार राजा _ 
सोदास शिकार सेने गये इए ये । वहं उन्दने ` 
किती राक्षसको मार डाल ओर उसके माईैको छोड़ ` 
दिया । उसने रानाके इस कामको अन्याय समञ्च ˆ 
जीर उनसे माकी मृब्युका बदा लेनेके च्यि बह. < 
रसोहयेका ख्य धारण करके उनके धर गया । जब `` 
एकं दिन भोजन करनेके व्यि गुर्‌ वसिष्ठजी राजाके ` 
य आये? तब उसने मनुष्यका मास रोँषकर उन्दै 4 
परस दिया ॥ २०-२१ ॥ जब सर्वसमर्थं वसिष्ठनीने ` 
देखा कि परोसी जानेवाडी वस्तु तो नित यु 

त्र उन्हनि क्रोधित होकर . राजाको राप ४५ कि 


॥ २: 


उन्हं यह बात माद्धम इं कि यह काम तो रा सका 7 
क्ष नह नह्य = न्ड १६ युः जापको _ = ` 


+ (7 १३ 


1 


श्म २६. - ४ = @, के ॥ 
८) #ः 1 (4 1 ~ र 
















ऋ च द 
शद्धः: = = च नि चकः 4 








ॐ --+ 
("° „+ @ च्छे 


बार मदयन्त्यापो रुशतीः पादयोजंह । 


दिशः खमवनीं सवं पर्यज्जीवमयं नृपः ॥२४॥ 


राधं भावमापन्नः पादे कट्माषतां गतः। 


ति 


व्यवायकाले दलो वनौकोदम्पती द्विजो ॥२५॥ 
धातो जगृहे विप्रं तत्पत्न्याहाकृताथवत्‌ । 
न भवान्‌ राक्षसः साक्षादिष्ष्वाकूणां महारथः॥ २६ 
मदयन्त्याः पतिवीर नाधमं कतुंमहंसिं । 
देहि मेऽपत्यकामाया अङृताथं पतिं द्विजम्‌ ।।२७॥ 
देहोऽयं मानुषो राजन्‌ पुरषखासिराथंद्‌ः। 
तसादस्य वधो वीर सर्वाथवध उच्यते ॥२८॥ 
एष हिं ब्राह्मणो विद्वंस्तपःशीरगुणाच्ितः। 

4 आरिराधयिषुर महापुरुपसंकषितम्‌ । 


‡.  सवभूतात्मभावेन भूतेष्वन्तर्ितं॑गुणैः ।२९॥ 















0 


७२ 6 श्रीमद्भाभवत | अ० ९ 
न ------------- [~` 





सोऽप्यपोऽञ्चलिनाऽऽदाय गुरं शप्तुं स्यतः २३ || बारह्न वर्षके लये कर दिया ।"उस सम्य राजा सौदास 


भी अपनी अञ्जन्िमिं जक लेकर गुरु वसिष्ठको राप 
देनेके व्यि उच्यत इए ॥ २२ ॥ परंतु उनकी पली 
मदयन्तीने उन्हे रेसा करनेसे रोक दिया । इसपर 
सौदा्तने विचार किया कि "दिशाः आकाश नौर 
प्वी--सब-के-सब तो जीवमय दही हैँ | तव य 
तीक्ष्ण ज कहाँ छोड {' अन्तमे उन्द्योनि उस जटको 
भपने पैरोपर डाछ दिप्रा । [ इसीसे उनका नाम "मित्रसहः 
इ ] ॥ २४ ॥ उस जच्से उनके पैर काके पड़ गयं 
थे, इसल्यि उनका नाम (कल्माषपादः भी इआ । अव 
वे राक्षस हो चुके थे | एक दिन राक्षस बने इए राजा 
कल्माषपादने एक वनवासी ब्राह्मण-दम्पतिको संहवासके 
समय देख च्या ॥ २५ ॥ कत्माषपादको भूख तो 
छ्गी ही थी, उसने ब्राह्मणको पकड़ चछया | व्राह्मण 
पत्नीकी कामना अभी पणं नहीं हई थी । उसने कडा-- 
(राजन्‌ | आप राक्षस नदीं ह । आप महारानी मदयन्ती. 
के पति ओर इष्वाकुत्रंराके वीर महारथी हँ । आपको 
ठेसा अधर्म नदीं करना चाहिये । मुञ्चे संतानकी कामना 
है ओर इ ब्राह्मणकी भी कामना अभी परणं नीं दई 
है | इसय्यि आप पृञ्चे मेरा यह ब्राह्मण पति दे 
दीजिये ॥ २६-२७ ॥ राजन्‌ । यह मनुष्यशरीरं जीवको 
धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष-चासें पुरुषार्थो की प्राति करने- 
वात है । इवि वीर ¡ इस शरीरको नष्ट कर देना सभी 
पुरुषार्थोकी हत्या कदी जाती है ॥ २८ ॥ फिर य्ह 
ब्राह्मण तो विद्वान्‌ है । तपस्या, शील ओर बडे-बडे गुणोंसे 
सम्प है | यह उन पुरुषोत्तम परत्रहमकी समस्त प्राणियोके 
आत्मके खूपमे आराधना करना चाहता है, जो समस्त 
पदार्थो विमान रहते इए भी उनके पथक्‌ थक्‌ गुरणा 
से छि इए & ॥ २९ ॥ राजन्‌ | आप शक्तिराटी है । 
आप धर्मका मर्म॑ भठीमंति जानते हैँ । जैसे पिताके 
हार्थो पुत्री मृष्यु उचित नदी, वैसे ही आप-जेसे श्र 
राज्िके हाथों मेरे शष्ठ ब्रहार्षिं पतिका वध किसी श्रकार 
उचित नहीं है ॥ २० ॥ आपका साधु-तमाजमें बडा 
सम्मान है | भख अप मेरे परोपकारी, निरपराधः 





छ "स र ध क 
। षट #। ४ ऋ => ॥ ^ ए =. 4 ह] र न जै 
४ र | । + 0 क. > ~ न ५ - (क ~ । 
छ 8 मोच) + ' अमु ण्कोष 
^} चन्न ` १ ह ३ ॥- ^ क्र, 
॥ 3" न्मग्यत्‌ सन्मतो भवाच्‌ ॥२१॥ | श्रोत्रिय एवं बह्मवादी पतिका वध कैसे दीक समञ्च रहे 
$~ प -. -† 2" = 
भः | 0 भ 
स व 
9 (4 #-, 
[` ज ^ (. 












~~~ ~~~ ~ च> चः की चः कक 
१ "क व्क क ्क्कन्क्कन्कन्क्कन्कन्कृन्कष्क्क्क्क्याणष्कष्कष्क वक वकि व्क 


यद्यय क्रियते भक्तहिं मां खाद पूर्वतः । है ।येतो नौके समान निरीह है ॥२३१॥ फिर मी 
€ । यदि आप इन्दं खा ही डाटना चाहते हँ तो पह सुद्चे खा 
म्‌ जीविष्ये विना येन श्ण च मृतकं यथा ।२३२ डाघ्ि | क्योकि अपने पतिके बिना | मुदंके समान दहो 
| नाऊंगी ओर एक क्षण भी जीवित न रह सकरूगी' ।३२। 
एवं करुणभाषिण्या पिलषन्त्या अनाथवत्‌। नराह्मणपत्नी वड़ी ही करणाघ्रूणं वाणीमें इस प्रकार कहकर 
| | अनाथकी मति रोने त्री । परंतु सौदासने शपसे ` 
ठ्साघ्ः पशुभिवाखादत्‌ सोदासः शापमोहितः ३३ | मोहित होनेके कारण उसकी परा्थनापर कुछ भी ध्यान 
न दिया ौर बह उस्‌ ब्राह्मणको वैसे ही खा गया, जेसे 
ब्राह्मणी वीक्ष्य दिधिषुं पर्वादे । बाध किष पञ्चको खा जाय ॥ ३३ ॥ जव व्राह्मणीने 
क शात भनिप भक्षितम्‌ । देखा कि राक्षसने मेरे ग्भाधानके सिये उदयत परतिको खा 
च्या तव उसे बडा शोक इआ । पतीं ब्राह्मणीने क्रोध 
करके राजाकी छप दे दिया ] ३४ ॥ रे पापी ! मे 
अभी कामसे पीडित हो रशी थी । एेसी अवस्था्मे तुले 
यसान्दे भक्षितः पाप कामायाः पदिस्स्यया । मेरे पतिको खा डात्रा है | इत्थि मूख | जब तु खीसे 
षहवास करना चष्टेगा, तमी तेरी मृत्यु हो जायगी, यहं 
तवापि मृत्युराधानादक्रतप्रज्ञ दररितः । २५] | बात मेँ तुस्चे सुशाये देती दहर ॥ ३५ ॥ इ प्रकार 
मित्रसहको साप देकर ब्राह्मणी अपने पतिकी अस्थियो- 
एव॑ मित्रसहं शप्त्वा पतिोपरायणा । = | को पकती इई चितामे डालकर खयं मी सती ह गवी 
ओर उसने बही गति प्राप्त की, जो उस्तके पतिदेवको 
मिडी थी । क्यो न हो, वह अपने पतिको छोडकर ओर 
किसी लोकम जाना मी तो नीं चाहती थी ॥ ३६॥ 





शो चन्त्यात्मान्वीं शसश्षपत्‌ पिदि सती ॥३४। | 


तदस्थीनि स्षमिद्धेऽभ्रौ राख मंतर्गतिं गता।२६॥ 










बारह वर्ष बीतनेपर राजा सौदास शापसे खुक्त हो 

गये | जत वे सुहवासके लिये अपनी पत्नीके पास्‌ गये,. 
तत्र उसने इन्द रोक दिया । क्योकि उसे उस ब्राह्मणीके 
रापका पता था ॥ ३७ ॥ इसके बाद उन्होने ज्ी-सुख 
का बिल्कुल परियाग ही कर दिया । इस्‌ प्रकार अपने 
कमवे फलस्ररूप्‌ वे संतानद्वीन हो गये । तब वसिष्ठजी- ` 
ने उनके कहनेसे सदयन्तीको गमोधान कराया ॥ ३८ ॥ । 
मदयन्ती सात वतक गम धारण किये रही, परंतु बचा . 
पैदा नहीं इ । तब वसिष्ठजीने पत्थरसे उसके ध: पेपर 
आघात किया । इससे जो बालक इ, बह अः 

 जपेऽश्मनोदरं तस्याः सोऽश्मकस्तेन कथ्यते ।* २९ की चोटसे पेदा होनेके कारण अदमकः कलाया ॥३९। ` 
= | भस्मकसे मूलकका जन्म हआ । जब पर्यरामजी पृष्ी- ` 
।  अमसानूकजे,हीभः परितः । |= विन र 
- म | र्गत । २. विलाप्य । ३. परजाः । धर 5 ५ श अ १ 


विक्ापो दादकाब्द।न्ते मैथुनाय सयुद्यतः। 
विज्ञाय बाह्मणील्चापं महिष्या स निवासिः।॥२७ 
| # © 3 
तत उध्वं छ तत्याज ह्ञीसुख कम॑णाप्रजाः 1 


वतिष्सतदलुज्ञागो मदयन्त्यां प्रजामधात्‌ ॥ २८॥ 







स्रा पै सप्र समा गभमनिभ्रन्न व्यजायत । 
















ः 








। भी आ । उसे मूलक इसलिये कहते हँ कि वह पथ्वी- 

ततो दशरथस्तखात्‌ पुत्र रेड विडस्ततः । | य क्षत्रियहीन डो जानेपर उस वंशाका मूल ( प्रवर्तक ) | 
| वना | ४० ॥ मूल्कके पुत्र हर दरारथ, दङरथके 

५1 राजा विश्क्षही यख खट्‌वाङ्गथकरबत्यभूत्‌ ' ४१। | ठेडविड ओर रेडव्ंडके राजा विश्वसह । षिश्वसके पुत्र 

& ही चक्रवती सम्राट्‌ खट्वाङ्ग इए ॥ ४१॥ युद्धे नदे 

| यो देवैशथैतो दैस्यानवधीद युधि दुजंयः । कोई जीत नदह सकता था । उन्होनि देवताओंकी प्राथना- 
| से दै्योका वध करिया था । जव उन्हे देवताओंसे य 

यहूतंमायुज्ञात्वेत्य खपुरं संदधे मनः ॥४२॥ | माम इआ किं अव मेरी आयु केवट दोही घडी 

बकी है, तब वे अपनी राजधानी लौट आये ओर 

नमे न्रह्मडलाद्‌ रणा, ङरदेवान वात्मा; । अपने मनक उन्दने भगवान्‌ ल्गा दिया ॥ ५२ ॥ 

वे मनही-भन सोचने ल्गे क्षि मेरे कुर्वे इष्ट देषता हैँ 

नभियोच मही राज्यं न दाशश्चातिबह्ठभाः ॥४३॥ ब्राहमण ! उनसे वदः मेरा प्रम अपने प्रार्णाप्र भी नही 

५ | है । पत्नी, पुज, ल्मी, राज्य ओरं प्रथ्वी भी सुञ्चे उतने 


न बाल्येऽपि महि्म्मधर्मे रमते कचित्‌ । | प्यारे नहीं छते ॥ ४३ ॥ भेरा मन वचपनमे भी कमी 
( अघमकी ओर नष्टं गया | मेने पवि त्रकीतिं भगवान्‌के 


४ 3 | । श्रीमद्भागवत | (= 
| । श | 
! ----------------~-----~=--====-------- 
४. | । न ५ ८ .4 
(4 नारीकवच इत्यक्तो निः्त्रे शूलकोऽभवत्‌ ॥४०॥ , रख ल्या था । इसि उका एक नाम नारकवचः ॥ 


न न््वनदौः 9 = 9 1 
न नुन वाक क नता - 
ञे ` ध्व + ई | ^ +# ॥ क 





॥  नाप्डययुत्तमशछकादन्यत्‌ ङविभ्वन्‌ वस्त्वहम्‌ । ८५।। | अरिस्कि ओर कोट भी वस्तु कश्च नहीं देखी ॥४५॥ 
स तीनों लोकके स्वामी देदताओनि मुदे मह्मागा व्र देने 



















| म देवे; कामवरो दत्तो मह्यं त्रिथुनेश्वरः । । को कहा । परंतु मैने उन भोगी खाक्तता निल्युख 
| ~. । नहीं की | क्योकि समस्त प्राणियेके जीवनदाता श्रीहरिकी 


| ४ ५ | न वृणे तमहं कामं भूतभावनभावनः । ४५॥ | मवनापे हं) मँ मगन हो रहा था ॥ ४५] जिन 
स देवता्भोयी इन्द्रिया ओर मन व्िषर्योमें भटक रहे है, 


| ४: ४ ये विश्िपरेन्द्रियधियो देवास्ते खहदि स्थितम्‌ पएगुणप्रधान होनेपर भी अपने हृदयमं विराजसः न, = 
~ सदा-सवंदा प्रियतपके रूपमे रहनेवा>े अपने आत्मस्भरूय | 
# न विन्दन्ति परियं शश्वदात्मानं किष्ठतापरे ॥४६॥ | भगवानूको रहीं जानते । फिर भक जो रजोगुणी ओरं | 
६ तमोयुणी है, वे तो जान ही केषे सक्ते है ॥४६॥ इस- ^“. 
अथेश्चमायारचितेषु सङ्खं छे भन इन वरिषयोमिं तँ नहं रमता । ये तो मायाके खेल 
५ ह | आकाशमें चट्‌ प्रतत हयोनेषाठे गन्धवनगरोंसे बद- 
 , गुणपु गन्धर्वपुरोपमेषु | | कर इनकी सत्ता नही है । ये तो अन्ञानवद चित्तपर । 
चद्‌ गये थे । संपारके सच्चे स्वयिता मगान्‌ की साषना- 
मं टीन होकर म विषर्योको छोड रषा ई ओर वैवल 
उन्हीकी रारण ठे रहा ह्र ॥ ४७ ॥ परीक्षित्‌ । भगवान्‌ 
ने राजा खटवाङ्खकी बद्धिको प्लेस दही अपनी ओर 
भक्षित कर रक्ला था । इसीसे वे अन्तसमयमे ड! 
दसा निश्चय कर सके | अअ उन्होने शरीर आदि 


| 


अ० १० | 


>~ 0 9 


। 
`नव चच 
कमक नोक च जच) कको अ ऊ ७ उन ऊक कका काण्णयय। का ज 





नवत्‌ स्कन्ध 






हितान्यभावमज्ञानं ततः खं भावमाभितः 8७८ ¦ जनाघयदामेम जो अक्गानमूख्क आलात था, उका 1 


(+ 


यत्‌ तद्‌ हम पर क्ष्ममशल्यं शन्वकरिपितम्‌ ! 


-----=०>90@9ॐ०न=्----- > ~ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्ये ह. 


मुयवंशानुवरणेने' नवमोऽध्यायः | ९ ॥ 
6 


। ---- 


अथ द्शषोऽध्यायः † क 
भगवान्‌ श्रीरामकी ीलकाओंँका वर्णन ` 


श्रीञ्चुक उवाच 
खट्बाङ्द्‌ दोषबाहु रघुस्तसात्‌ पृथु्वाः 
अजस्तता महराजस्तसाद्‌ दशरथाऽभयत्‌ ॥ १ ॥ 
तखापि भगवानेष छःक्षाद्‌ ब्रह्ममयो हरिः । 
अंशंरोन चतुधाात्‌ पुत्रं प्राथितः सुरैः । 


रामख्क्ष्पणभरतश्च्प्ना इति संज्ञया}; २॥) 
तखखानुखश्ति. राजन्नुषिभिस्तखदिंभिः । 


रुहं हि वणितं भूरि खया सीतापतेषहुः।॥ ३॥ 
गुव स्यक्तराज्यो व्यचरदनुवनं 
पड्मपद्भ्यां प्रियायाः 
^ पाणिस्पलौक्षमाम्यां सजितपथरुनो. 
मो 


वैरप्यच्छरप॑णख्याः; प्रियविरहरषा- 


हरीन्द्राबुजाभ्याम्‌ । 


ऽऽरोपितभ्रषिजम्भ- 





| बह समसे भी सूम, शल्यके समान ही है । प॒ 
| बह शल्य नही, परम स्य है । भक्तजन उरी वस्तुको 
भगवान्‌ वापुदेवेति य॑ गृणन्ति हि साता ।;४९॥ । 'मावरान्‌ वासुदेष इस नामसे वर्णन करते है ॥ ४९॥ ^ 


| धारण करके राजा दारथके पुत्र इए । उनके नाम ¦ 


| । य ; [ट] + 
„  व्र्तान्धिबदधसेतुः खलदवदहनः व = त १ । = व ० 


























पर्याग कर दिया गौर अपने बास्तक्रिक आत्मल्स्पमे ^ 
सित हो गये ॥ ४८ ॥ वह खरूप सक्षात्‌ पलहमद । 


कद» + 
| ५ ब 4 
न १ 


श्रीश्युकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! खटवाङ्खके 
पुत्र दीधबाह ओर दीर्धंबाहुके परम यशस्वी पुत्र रघु 
इए । रधुके अन ओर अजके पुत्र महाराज दर्थ 
इए ॥ १॥ दे्रताओंकी प्रार्थनासे साक्षात्‌ परत्रह 
परमात्मा भगवान्‌ श्रीहरि ही अपने अंशांङसे चार ख्प 


ये- राम, लकषम, मरत जौर शलुष्न ॥ २ ॥ परीक्षित्‌ _ 
सीतापति मगतरान्‌ श्ररामक्रा चचिं तो तच्वदसीं ऋषियो- ` ` 
ने बहत कुछ वर्णन क्षिया है ओर तुभने अनेक बार | 
उसे सुना भी है ॥२॥ ~ ज ध 
मगत्रान्‌ श्रीरामने अपने पिता राजा दशरथके सत्य- ` 
की रक्षकि व्यि रानपाट छोड दिया ओर बे वन्‌-वनमें 
फिरते रहे । उनके चरणकमलं इतने सुकुमार ये कि ` 
परम सुकुमारी श्रीजानकी जीके करकमलोका छरा भी 2 1 । 
उनसे सहन नदीं होता था । वे ही चण जब वनमे ` 
चरते-चलते धक जाते, तत्र हनूमान्‌ ओर रक्षण उन्हे ` 


| दबा-द्नाकर्‌ उनकी थक्राबट मिटाते। सपणलाको नाक 
| कान काटक्रर विरूप कर देनेके कारण उन्हें ऽ ५ १. 












प्रियतमां श्रीजानकीजीक्ा वियोग भी सहना पड़ 
्रियोगके कारण क्रोधवडा उनम महि तन गया, 
देखकर सधुद्रतक भयश्रीत. हो गया । इसवे 





जै 













१ ४ [ति ॥ अद ९५ 


` सपान दग्ध कर दिया । वे को्ल- ` 


४६ श्रीमद्भागवत [ अ० १० 
विशामित्राध्वरे येन मारीचाद्या निशाचराः । मगवान्‌ श्रीरामने विश्वामित्रे ज्म उक्ष्मणके सामने 
. ही मरीच आदि राक्षसोको मार डला । वे सुतर बड़े-बड़े 


पर्यतो लक्ष्मणस्यैव हता नैक्तुङ्गवाः ॥ ५ ॥ | रक्षसोकी गिनतीमे थे ॥ “^ ॥ परीक्षित्‌ । जनकपुरमे 
| सीताजीका खयवर हो रहा था । संसारके चुने इए 













यो लोकवीरपितौ भलुरेशयुग्र वीरो समामे भगवान्‌ शोंकःका वह भयंकर धनुष रस्खा 
| हआ था | वह इतना मारी था क्रि तीन सौ वीर बड़ी ः 
सीतास्वयंवरगृहे त्रिशतोपनीवस्‌ । = | कठिनारसे उसे खथवरसमामे ख॒ सके थे । मगवान्‌ | 
ू श्रीरामने उक्त धनुषो बात.की-वातमें उठाकर उ्तपर 
„  . आदाय बालगजलील दवेश्चयष्टिं डोरी चदा दी ओर खीचकरर वीचोवी वसे उसके दो | 
| ठकड़े कर दिये- टीक वेषे ही, जैसे हाधीका बचा १६ 
सजीकतं नृप पिकृष्य बभज्ञ मध्ये । ६॥ खेकते-खेकते ईख तोड़ डरे ॥ ६ ॥ मगव्रान्‌ने जिन्हें | 
अपने वक्षःस्थल्पर स्थान देकर सम्मानित किया हैः 
्रीलकष्मीजी ही सीताके नामसे जनकपुरमं अवतीणं इई | 
जितवालुूपरुणक्ीरवय). जगमा थी | वे गुण, शीट, अवस्था, रारीरकी गठन ओर । 
सीताभिधां भिष्रखभिलन्धमानाय्‌ । सैन्दर्यमे स्वैथा मगान्‌ त श्रीरामके अनुरूप थी । | 
भगवान्‌ने धनुष तोडकर उन्हे प्राप्त कर लिया । अयोध्या- | 
भगे वजन्‌ भूगुपतेर््यनयत्‌ प्ररं को ौटते समय मार्गमे उन परञ्यरामजीसे भेट इडः 
जिन्होनि इक बार पृथ्वीको राजवंशके बीजसे भी रहित 
। दषं महीमकृत यद्धिरगजीजाम्‌ ।॥ ७ ॥ कर दिया या । मग्रानूने उनके बढ हर गश्को नट क 
~ | दिया ॥ ७ ॥ इसके वाद पिताके वचनको सद्य 
५ सिदत कनेक ल्य उन्होने वनवास खीकार करिया । यदपि 
- 4 | धित | महाराज दश्षरथने अपनी पत्नीके अधीन होकर ही उसे | 
र र वि चिला ग्रे सभा्ः | | वैसा बचन दिया भा, फिर मी बे सतयके बनपनमे ष॒ “नज 
~ गये थे | इये मगवान्‌ने अपने पिताकी आज्ञा शिरोधायं 
~ ल निवि की । उन्होने प्राणोके समान प्यारे राज्य, व्कमी, प्रेमी, | 
। = ^ ५ ती गि ओर महे छेक अपनी पलीके साच 
॑ ् त्यक्त्वा ययो वनमघ्रमिव षुक्तसङ्कः ॥८॥ वनकी यात्रा कौ ६ क्याकि उन्हे क्रिसीके प्रति कोई ॥ 


हि आसक्ति न थी ॥ ८ ॥ वनमें पुव कर॒ भगवान्‌ने 


क" 


` . रधःखसुव्यदत॒ सूपमशुद्धबुदध ` | राक्षपराज रावणकी बहिन सप॑णखाको विप कर 

£ दिया । क्योकि उसशी बुद्धि बहुत दही कुषित; 
सस्या; खशतरिश्िरद्षणघुख्यभन्धून्‌ । | कामबासनाके कारण भञद्ध थी । उसके पक्षपाती खर, 
५ दूषणः त्रिशिरा आदि प्रधानप्रभान माहृ्ोको-- जो 
" जपे  चतदशपदक्षमपारणीय | सष्यापे चौदह हजार थे-हाथमे महान्‌ धनुष लेकर 
स त मगान्‌ श्रीयपने न्ट कर डाग; ओरं अनेकं प्रकारकी 

कोदण्डपाणिरटमान उवास कृच्छ्रम्‌ म्‌ 1९) ॥९॥ | कठिनाध्येसि परषूणं वनम वे इधर-उधर त्रिचरते 


‡ 
4 "व. (च ह 





“ल 
ध: 













„ 
च -*+ ~~ 































हए निवास करते रदे ॥ ९ ॥ परीक्षित्‌ । जब राबणने 
८ सीताजीके, ङ्प, गुण, सन्द आदिकी बात सुनी तो | ¢ ॑ 

सृष्टं पिलोक्य नृपते दञ्चकन्धरेण \ उसका हृदय काम-वासनासे आतुर हो गया । उसने ` 18 
= 3 जदूमुत हरिनके वेषे मारीचकरो उन शे पणं ुटीके पा 
जघेऽद्युतेणतपुषाऽऽभ्रमतोऽपदष्ट भेजा । वह धीरे-धीरे मगश्रान्‌ ॐ वहसे दूर खे गया । अन्त- 
म मगवान्‌ने अपने बाणसे उसे बात-की.त्रातमे वैसे ही 


मारीचमाड्य विश्षिखेन यथा कयुग्रः ।१०। | मार डाला, जैसे दक्षप्रजापतिको वीरभद्रे पारा था॥१०॥ 

& जब मगवान्‌ श्रीराम जंगम दूर निक गये, तव 
रक्षोऽधमेन बृकबद्‌ विपिनेऽसमक् ( जदमणकी अनुपस्थिति ) नीच राक्षस रावणने 
देह ठ | मेडियिके समान विदेहनन्दिनी सुकुमारी श्रीसीताजीको 
जदुहितयेपयापितायाम्‌ । हर चा | तदनन्तर वे अपनी प्राणप्रिया सीताजीसे 
निचुडकर अपने माई खमणके साथ वन-बनमं दीनकी 
मोंति धुमने लगे । ओर इस प्रकार उन्होने यह शिक्षा 
दी कि जो नियमं `आसक्ति रखते है, उनकी यदी गति 
स्ीषङ्किनां गतिमिति प्रथपश्चचार ॥ ११ होती है ॥ ११ ॥ इसके बाद भगवानने उस जटायु 
सनं का दाह-संस्कार किया, जिसके सारे कमवन्धनं 


वनाम प मगवत्सेवाखूप केमसे पडे ही भस्म हो चुके थे । फिर 
। ६ = मगवानने कबन्धका संहार किया ओर इसके अनन्त 7 

सरूयं विधाय कपिभिदयितागतिंतः। सुग्रीव आदि वानरोसे मित्रता करके वालिका वध क्या, | 

० = | तदनन्तर वानरके द्वारा अपनी प्राणत्रियाका पता 
 बुदृध्वाथं वालिनि हते प्रेन्द्र सेन्य- ` | त्ाव्राया । ब्रहम। ओर शंकर जिनके चरणोंकी वन्दना ` 
| कते है, वे भगवान्‌ श्रीराम मनुष्यकी-सी री करते ` 

्ैलामगात्‌ स मलुजोऽज्भवाचिताडध्रिः। १२) | हए ब॑दरोकी सेनके साय समुदतरपर पेचे ॥ १२॥ _ ` 

। ( बहम उपवा ओौर प्रायनासे जब समुद्पर कोह प्रमा _ 
न पड़ा तब ) मगवानने क्रोधकी लीव करते इए ` 
अपनी उप्र एवं टेदी नजर समुद्रपर डागी 1 उसी समय _ 
समुद्रके बड़े-बड़े मगर ओर कच्छ खल्बला उठे । डर ` 
जानेके कारण समुद्रकी सारी गजेना शान्त हो गयी। ~ 
तब समुद्र शरीरघारी बनकर ओर अपने सिरर बतः ` 


त काः 


सी भटे ऊेकर मगवान्‌के चरणकमर्गेकी शरणमे भाया 9 
ओर इस प्रकार कहने र्गा ॥ १३ ॥ “अनन्त 1 हम 


सीताकथाश्रवणदी पितहच्छयेन 


भ्रात्रा ने कृपणवत्‌ प्रियया वियुक्तः 


हि > ¡त 
न्व 











यद्रोषषिभ्रमविवत्तकटाश्षुपात- 
क = २ ीषोषः 
# ~ संभान्तनक्रमकरो भय ६ । 


सिन्धुः शिरखहणं परिग्रह सूपी 






पादारबिन्दय्ुपगम्य बभाष एतत्‌ ॥१२॥ 






त्वां सु भूमन्‌ १५ ~ 
# /' सखा € प्री 1 मः ‡ ह जगत्‌ प ॥ । मसत र 
क ` ] ९ (च , (2 = । द न 8 भ * न 4 (ग्र वतेनेमिं २४ 
* ` वि =< = च < 9 र: # [1 २ क ४ 1 
कि नि ह कण ॥ १. भ भ ह # गुणं 1 
हनेवाले हदे \  (------ ~~~ (७ 
र्‌ ॐ | | ¢ अपि | | स्‌ 4 < ° (त ९ < ॥ 
9 व = ६ , ची, 
# र ५ (क 1 अः ५ ध 0.१ ५ 1 भ ५ * श. क १ 
४। चा ^ 0 4 त 8) #ै ओ 1 = 
= क ह) (ना ~ ४, 4 र 
+ के । क "3 ) 


कै ॐ चै. र = ४ 4 = व क नष ण ब क" = = नत ~ ~“ ~या 
गीनिका ` 


0 





। ^, जानाना कयो दो जोक ककः [ति 11 11) षी वि 1 ति त 1 91 1 त = १ सा 


- ----------------------------------- 
यत्सस्चतः सुरगणा रजसः भजेका है | इसल्यि जब आप सखगुणको खीकार कर 
ठेते क्षे तब देवताओंकी, रजोगुणको खीकार कर छेते 
| स है तब प्रजापरतिर्योकी ओर तपरोगुणको खीक।र कर ठेते 
4: = ने १ वाच्‌ गुणश \। १४५) ह = 
# मन्यो भूतपतयः स भ चु | हैं तब आपके क्रोधसे रुद्रगणकी उत्पत्ति होती ह ॥१४॥ 
| | वीरशिशैमणे ! आप अपनी इच्छाकरे अनुसार मुञ्चे पार 








कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं कर जाये ओर त्रिकोकीको रुानेवि वि्राके इत : 


| रावणको मारकर अपनी पन्नीको फिरसे ्र प्त कीजिये; परतु 
आपसे मेरी एक प्राथना है | आप यह सुञ्षपर एक 
पुल बध दीजिये । इससे आपके यराका विस्तार होगा 
। ओर आगे चकर जब बड़े-बड़े नरपति दिमिजय 
| करते इए यदहं आयेंगे, तब वे आपके याका गान 

गायन्ति दिग्विजयिनो युपेत्य भूपाः १५ करगे ॥ १५ ॥ 
$ बद्भ्नोदधो रघुपतिविविधाष्रङ्टेः । मगवान्‌ श्रीरामजीने अनेकानेक पबतोके शिरसे 
।; सतं ह | सुमुदरपर पुल बधा । ज्र बडे-वडे बंदर अपने हाथोसे 
सेतुं कषीन्द्रकरकम्पितमूरुहाङ्गः । | पर्वत उठा-उठाकर त्मते थे, तब उनके दृक्ष ओर बड़ी-बड़ी 
सुश्रीवनीलहलुमसमघुखेरनीके- । चद्वानँ थर-थर कोपने छ्गती थीं । इसके वाद्‌ विभीषण 
की सबाहसे मगवानने सुप्रीत, नीर) हनूमान्‌ आदि 
संक विभीषणश्शाऽऽविशदग्रदग्धाम्‌। १६। प्रमुख वीरो ओर वानरीसेनाके साय ल्मे प्रवेश 
सा बानरेन्द्रबररद्रविहारकाषठ- किया । बह तो श्रीहनूसानजीके द्वारा पहटे ही जत्मयी 


श्ीदारगोपुरखदोवलभीविर्ड्ग । जा चु थी ॥ १६ ॥ उस समय वानरराजकी सेनाने 
= र लङ्काके सैर करने ओर खेलनेके स्थान, अनक गोदाम, 


| ्ैक्यरावणपरवाप्लुहि वीर पलतम्‌ । 





ब्रीहि सेतमिह ते यशसो वितत्य 


त ~ 4 0 कन 
| 


87); 





। ध निभज्यमानधिषणध्वजहेमङ्गम्भ- | खेजाने, दरखाजे, फाटक, समामग्न, छञ्जे ओर पक्षियो- 
ई शृङ्गाटका गजङलेहंदिनीव धुणां ।॥१७॥ के रहनेके स्थानतकको धेर॒लिथा । उन्ाने वही 
हि (6. वेदी, ध्वजा, सोनेके कल्श ओर चौरे तोड-फोड़ 
` रक्षःपतिस्तदबलोक्य निद्ुमभङ्म्भः | डले । उस समय र्का देसी माद्धम पड़ री थी, जैसे 


4. हो ॥ १७ ॥ यह देखकर राक्षप्तराज रावणने निकुम्भ, 
| ्रहस्तमतिकायविकम्पनादीन्‌ इमम) पूमाकष दुर्मुख, घुरान्तक, नरान्तकः प्रहस्त, 
(6: गिनी तिक।य, विकम्पन आदि अपने सब अनुचरो, पुत्र 
सर्वा़गान्‌ सम भकर्णम्‌।१८। > `" ° ॥ 
दुगान्‌ समहिनोदथ डः ।९८। । मेघनाद ओर अन्तमं माई कुम्भकणंको भी युद्ध कश्नेके 


तां यतुधानप्रतनामसिश्रूलचाप- व्यि भेजा ॥ १८ ॥ राक्षपोकी वह विशा सेना 
तच्वार, त्रिदयूल, धनष, प्रास, ऋष्टि, शक्ति, बाण, भाले, 


धूम्राधदु्ैसुरान्तनरन्तकादीन्‌ । | डके हायियोने किसी नदीको मथ डाला 












मादन, नीठ, अङ्गद, जाम्बवान्‌ ओर पनस आदि वीरोको 


११९१९९ ५ | | धी | भगवान्‌ श्रीरामने सुप्रीव, च्दमण, हनूमान्‌, गन्ध- 
नन्त न दिभिरन्ितोऽगात्‌॥॥१९॥ अपने साय लेकर राकषोकी सेनाका सामना किया ॥१९॥ 





= ~ श्रीमद्ागवतं | अ० १० 


्ासष्िशक्तिरतोमरल्गदगाम्‌ खड्ग भादि शक्ल-अक्षसे सुरक्षित शोर अत्यन्त दुर्गम | 
















































9 ५ | तः ५ 3 
3 नवम्‌ स्कन्ध = 
तेऽनीफपा रघुपतेरभिपत्य स्च रघुवंशिरोमणि भगवान्‌ श्रीरमके अङ्गद आदि 


^ | सव सेनापति रक्षसोकी चतु्गिणी सेना-ङाथी, 
न्द्रं वहथभिभपत्तिरथाश्वयोचैः । रथ, घुडक्तवार ओर पैदेके साथ दनद्युदधकी रीत्सि ^ 
भिड़ गये जीर राक्षसोको ब्रक्ष, पवतशिखर, गदा ओर 
9: बाणोसे मारने ठे | उनका मारा जाना तो खाभाविंक 
जष्लुडधमगिरिगदेषुभिरङ्गदाचाः दी था; क्योकि बे उसी रावणके अनुचर थे, जिसका 
मङ्ग श्रीसीताजीको स्प करनेके कारण पले हवी नष्ट 
सीताभिमर्शहतमङ्गररावणेशषाच्‌ ॥॥२०]। | दो चुका या ॥ २० ॥ 
जब राक्ष्रराज रावणने देखा किं मेरी सेनाका तो 
नार इभ जा रहा है, तब वह क्रोधमे मरकर पुष्पक 
वरिमानपर आख्ढ हो मगवान्‌ श्रीरामके सामने आण । 
उस समय इन्द्रा सारथि मातलि वड़ा ही तेजखी दिव्य 
रथ लेकर आया ओर उसपर भग्वान्‌ श्रीरामजी व्रिराज- 
मान हए | रावण अपने तीखे बाणेसि उनपर प्रहार 
करने ख्गा ॥ २१॥ भगवान्‌ श्रीरामजीने रावणस 
कह्ा--“नीच राक्षस | तुम कुत्तेदी तरह हमारी _ 
अनुपखितिमे हमारी प्राणप्रिया पलनीको हर खये । तुमने _ ^ 
दुष्टताकी हद कर दी । त॒म्डसेनैसा निन तया 
निन्दनीय ओर कौन होगा । जसे काठक्षो कोई यानी 
सकता- कर्तापनके अमिमानीको बह फठ दि विना _ ` 


१ 


रशुःपतिः खग्रख्नष्टिमवेक्ष्य शुष 
आर्च यानकमथाभिससार रामम्‌ । 
खःखन्दरे चुमंति मातलिनोपनीते 
विभ्राजमानमहनन्नि रितः रैः २१) 
रामस्तमाह पुरूषादपुरीष यन्नः 
कान्तासमश्षससतापहूता शत्‌ ते । 


स्यक्तत्रपख फरुमद्य जुगुष्ठिहख 








£ गह नद्टीं सकता, वैसे ही आज मे तुम्हं तुम्हारी करनीका 
यच्छामि फार इव कतुरलक्घयवीयः।।२२। | फल चखाता दः ॥२२॥ इप्‌ प्रकार राबणको फटकारते 
स हए भगवान्‌ श्रीरामने अपने धनुषपर चदाया इआ बाण _ 
एव 1 क्षषपन्‌ चव साधत्ुत्स्तज उसपर छोडा । उस बाणने वज्रे समान उसके इदय- ` 
| = „ क्तो विदीर्ण कर दिया । वह अपने दसो युखसि खून ` 
4 ण तद्धृदर्यं बिभेद । = 
# शा र उगक्ता आ विमानसे गिर पड़ा-दीक वैषे ही, जैसे ` 


ुण्यात्माछोग भोग समाप होनेपर खर्गसे गिर पडते हैँ 


¦ = | सोंऽसुम्‌ चमन्‌ दश्चयखेन्यंपतद्‌ विमाना- ६ 
दाहेति जल्पति जने सुकृतीव रिक्त; ।२२। | चिल्यने क ॥ २२ ॥ | 






तदनन्तर हजारे राक्षपिथां मन्दोदरी 8 
इरं ज्डवासे निकल पड़ी ओर रणमूमिमे शायी ॥ २४॥ ` 


अ | 
ततो निष्कम्य लङ्काया यातुधान्यः सलः । 
पर > नु - + 4 क 2.2 द । 
उन्होने देखा क्रि उनके खजन-सम्बन्धी ल्छ्मणजीके _ 
५. ` वे अपने 


अन्दोदर्य समं तसिन्‌ प्ररुद्य उपाद्रवन्‌ ।॥२४। 






ष । 
1 क च्‌ र 


हा हताः ख वयं नाथ लोकरावण राण । 





वर॑ यायाच्छरणं लङ्का तद्विदीना परादिता ॥२६॥ 
तवं वेद महाभाग भवान्‌ कामवशं गतः । 
तेजोऽलुभावं सीताया येन नीतो दशामिमाम्‌ ।।२७॥ 
कृतेषा विधवा लङ्का बयं च इलनन्दन । 


देहः तोऽन गृधाणामात्मा नरकहेतवे २८ 
श्रीञ्चुक उवाच 


खानां विभीषणे कोलेद्रालमोदितः। 

।  पिविमेधविधानेन दुक्तं साम्परायिकम्‌ ।।२९॥। 
ततो ददश भगवानशोकवनिकाभमे । 

` क्षामां खविरव्याधि धिंशपामूलमायिताम्‌।३०॥ 

। राप प्रियतमां भाया दीनां बीषयान्वकम्पत । 

॥२९१॥ 














॥ ह १ ? (च ५ 1 (५ १४.7१4 चवै ५ 
ब्र ॥ ~ न्वै «~ ## + ^ ९ र भ । 
र व अ+ ५ ५ तो + ० "९ ब +~ क ५८१४ 
= प |, । क छ ५ ॥ ° ०४ १,; क 
4150 40 । 


 “ आत्मषदशनाहादवरिकतन्धखपङ्कजाम्‌ 


आनोप्यारुषहे यानं भावभ्यां हयुम्यतः 
 विभीषणाथ भगवान्‌ द्वा रक्षागणेशताम्‌॥२२॥ 
धुश्च कस्यान्तं यथो चीणवतः पुरीम्‌ । 





ङसुमेरकपालापितेः पथि ।३२॥ । ये ॥ २२.२२ ॥ 


0 


५० श्रीमद्भागवत [ अ० १० 
हाय-हाय | खामी | आज हम सव बेमोत मारी गयीं । 


एक दिन वहन था, जब आपके भयसे समस्त रोकोमं 
त्राहि-जाहि मच जाती थी । आज बहन दिन आ पचा 
किं आपके न रनेसे हमारे शत्र लङ्काकी ददशा कर 
रे हैँ ओर यह प्रन उठ रद्वा है किं अवर लङ्का किसके 
अधीन रष्ेगी ॥ २६ ॥ भाप सब प्रकारसे सम्पनन ये; 
किसी भी बातकी कमी न थी | परंतु आप कामके 
वश हयो गये ओर यह नहीं सोचा किं सीताजी कितनी 
तेजखिनी है ओर उनका कितना प्रभाव है । आपकी 
यदी भूर आपकी इस दुदंशाका कारण बन गयी ॥२७७॥ 
कमी आपके कामोसे हम सव्र ओर समस्त ॒राक्षस्तवश 
आनन्दित होता था ओर भज हम सत्र तथा यह सारी 
लङ्का नगरी विधवा हौ गयी । आपका वह शरीर, जिस- 
के चि आपने सब कुछ कर डा, आज गी्धोका 
आहार बन रहा है ओर अपने आत्माको आपने नरकका 
अधिकारी बना डा । यह सव्र आपकी दी नासमञ्ञी 
ओर कामुकताका फल है ॥ २८ ॥ 


श्रीदयक्देवजी कहते ह-परीक्षित्‌ ! कोसकाधीश 
भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजीकी भज्ञासे विंभीषणने अपने 
खजन-सम्बन्धियोका पितृयज्ञकी विधिसे शाख्के अनुसार 
अन्त्ये्टिकम किया ॥ २९ ॥ इसके बाद भगवान्‌ श्री 
रामने अशोकवाटिकाके आश्रममे अरोक ॒वृ्षके नीये 


बैदी इई श्रीसीताजीको देखा । वे उन्हीके विरहकी 


व्याधिसे पीडित एवं अत्यन्त दुबल हो रही थीं ॥ ३०॥ 


| अपनी प्राणप्रिया अधाद्धिनी श्रीसीताजीको अव्यन्त दीन 


अवस्थे देखकर श्रीरामका हृदय प्रेम ओर कृपासे भर 
आया । इधर भगवानका दशन पाकर सीताजीका हदय 
प्रेम ओर आनन्दसे परिपणं ह्यो गया, उनका भुखकमलं 
खिल उठा ॥ ३१ ॥ *भगवानने विभीषणको रक्षसाका 
स्वामि, लङ्कापुरीका राज्य ओर एक कल्पकी आयु 
दी ओर इतके बाद पहठे सीताजीको विमानपर बैगकर 
अपने दोनो भाई लक्ष्मण तथा सुग्रीव एवं सेवक 
हनुमान्‌जीके साथ खय भी विमानपर सवार इए । इस 
प्रकार चौदह वर्षका त्रत पररा हयो जानेपर उन्होने 
अपने नगरवी यात्रा की । उस समय माग॑मे ब्रह्मा आदिः 
लोकपाच्णण उनप्र बडे प्रमसे पुर््पोकी वर्षा कर रद 








पि म क = क 
© ९० ] ~; ) 
स नवम्‌ स्कन्ध 


ऋ | 
वी 0 0) 9, 9, ने (0 द्‌ २ "वी 


उपगोयमानयस्ति 











ऋ 
्कगक्कााननयकयक्य क === = 


कन जानकि कय भभ दे 








श्त्तयादिभि्दा। । 

“ | कीखार्ओोका गान कर रदे थे जौर उधर जब भगवान 
गोमूत्रयावकं श्रुत्वा भ्रातरं व्रकराम्धरम्‌ ।॥३४॥ | यहं माम इआ क मरतजी केत्रल गोमून्नमं पकाया 
| हआ जौका दख्िया खाते है, वल्कर पहनते हे ` ओर 
डाम त्रिछाकर सोते हैँ एवं उन्होने जटाए्‌ बढा 
रक्खी है, तब वे बहुत दुखी इए । उनकी दशका 
स्मरण कर परम करुणाडीक भगवानका हदय भर आया। 
जव मरतको माद्धम इआ कि मेरे बडे माई मगान्‌ 
्रीरामजी आ रहे &, तव वे पुखासी, मन्त्री ओर 
पुरोहितोको साथ लेकर एवं भगवान्‌की पादुकाए सिर 
रखकर उनकी अगवानीके च्य चङे ¡ जब मरतजी 
अपने रहनेके स्थान नन्दिम्रामसे चे, तब गोग उनके 
साथ-साथ मङ्गल्गान करते, बाजे बजाते चल्ने खे । 
वेदवादी ब्राह्मण बार-बार वेदमन्त्रोंका उच्नारण करने गे 
जौर उ्तकी ध्वनि चारों ओर गूजने ठगी । सुनहरी 
कामदार पताकां फराने लगीं । सोनेसे मदे इए तथा 
रग-त्रिगी ध्वजा्ओंसे सजे इए रथ, सुनहरे साजसे 
सजाये इए सुन्दर घोडे तथा सोनेके क्वच पहने इए 
सेनिक उनके साथ-साथ चट्ने खगे । सेठसाह्कारः 


महाकारुणिकोऽतप्यज्ञटिरं खण्डिलेशयम्‌। 










भरतः प्राप्रमाकण्यं पोरामात्यपुरोहितैः ॥३५५॥ ˆ 
पादुके शिरसि न्य रामं प्रस्यु्यतोऽग्रजम्‌। 

[ # [4 र्दे, 
नन्दिग्रामात्‌ खदिबिराद्‌ गीतवादित्रनिःखनः ३६] 
ब्रह्मघोषेण च यहः पैटद्धिजेहावादिभिः। 
रथः ॥२७] 


खर्णकक्षपताश्ाभिर्दैमेथित्रष्यले 


सदश्वै सक्मसन्नारैभेटैः पुरटवमेभिः। 







भ्रेणीभिवौरषख्याभिभरत्यशैव पदादुभेः ॥३८॥ 





पारमेष्ठथान्युपादाय पण्यान्युच्चावचानि च। 


पादयोर्न्यपतत्‌ परेम्णा प्रिनहदयेक्षणः ।३९॥ 






पाटे न्यस पुरत; प्राञ्जरिर्बाष्परोचनः। 
| थी ! मगवान्‌ने अपने दोनों ह्वाथासे पकडकर्‌ 






तमाश्िष्य चिरं दोम्या खापयन्‌ नेत्रजैजरेः।। ४० 


विप्रभ्यो | ६ ४ © 
` रामो रक्ष्मणसीताम्यां विप्रभ्यो येऽ हंसत्तमाः। 










तेभ्यः खयं नमथक्रे प्रजाभिश्च नमस्कृतः ॥४१॥ 


"2.7 मिः 


न्त सवर्गा पति वय भिरगतम्‌। = | रा सण भरा अपने ल भा 
----------- (=. २ प्ि°। ह * | ४. ऽहत्तमाः क ड 4 | । अ षः । 
५६ ५ 2 ७ । 


^ न > „ल ईः चन छ 73 "अ+. त 
क ~ न भै नुक ~ (= ~~ 
= द "र सः व } ` = चे व 4 = "व वि. ~ १५ 
न व | ~~ च ऋ = = # क पिं 9 ~ = ~ 4 तै च ह भ ४ ध ~ ४ 
१; 0 7 = = ~ क 2 = त र । 4 के (नि (` ; चि ~ क = = क = 0, 
न कि ५ त कः » ॐ ~+ 1} कके ्ा क ॥ (क 
< 2 च ८ व भक | चर द र च १५1 वः » ¢ क रि „ न, कि "५ ॥ बन । - -््‌- ५ 4 निभि. भ 
॥# ४-ध्‌ 0 + = + ` केक १ चङ्क न्‌ ५. = [१-4 - = ऋ» हि -ज ९ पि ४ = 9 न = * ् ए. २ ४ < अ › 
` ^ र ~, ऊ + च ध क्ष { (4 (न्क) >: | च #=" क ` कद ` ज @-4 `क चै भ | ॥ हि 
क 9 क 87: ) कष १ " क क कः - ~~ ~ < (क ल अ १ शव = ज {^ £ 


रं $ ५ ८ 


न शः 




















इधर तो ब्रह्मा आदि बड़े आनन्दसे भगवानूकी = \ 


। (१.2 ९.1 
ह "ह्‌ 1 १ ५ \ 9 + +. ए व 
7 = > जोत क न ए 4 न 
¢. 3234 कक भ + ॐ शव क ॥ ‡ > ५ 
ध ध \.-9; "> ~ > 9 9 >> 


रेष्ठ वाराङ्गना, पैदल चञ्नेवाठे सेवक ओर महा- 

राजाओंके योग्य छोटी-बड़ी समी वस्तुए्‌ उनके साथ चलं 

रही यी । मगवानूको देखते ही प्रमके उद्रेकसे भरतजी | 
का हृदय गद्गद हो गया, नेत्रोमे ओस्‌ छ्क्क आये, वै ` 
भगवान चररणोपर गिर पडे ॥३४--३९॥ उन्न ` 
रके सामने उनकी पादुकां रख दीं जोर हाय जोडकर ` 
खडे हो गये । नत्नेसि ओंसूकी धारा बहती जा दी 


ओ नु 
# 4 ४ { >^ ¶ 


। ५, ४ = ॥ # 
४१ । ^ 
04 ५१२ । 
च # # र 1.9. # > # 
1.11 
। 


देकः मरतजीको हृदयसे च्गाये रक्ला । मगवाचके ` 
नेत्रजक्से मरतजीका स्नान हो गया.॥ ४० ॥ इसके ` 
बाद सीताजी जोर च्क्मणजीके साय मगवान्‌ श्रीरामजीने 
| ब्रह्मण ओर पूजनीय गुरुजरनोको नमस्कार किया तया ` 
सारी प्रजाने बडे प्रमसे पिर छकाकर स ॥ ० भगवा ४ व 

त किया ॥ 9  । नेसल न 


लगी समस्त श्रना अपने खामी भगवानको बहत 


य म ~ ~ = 


न 
को तः कह ९ 


ह क ^ # ६ 


[न 
= ॐत ' ५ 
क, ऋ ~ 


। 1 
॥ि । ति ५ । 
४ । । 
। त ४9 ` ककः ~ भज कम न क क । "4 अभर) - च 
4; ८ > ६ ६ 3 1 2 वन 1 1 - ११२ 








उत्तराः कोसछा माल्यैः किरन्तो नचतुखेदा ४२), 
पादुके भरतोऽगह्ना्चामरजव्यजनोत्तमे । 
विभीषणः ससुग्रीवः उवेतच्छत्रं मरुतुतः ॥।४२। 


` धलनिषङ्धञ्छघुघः सीता तीथकमण्डटम्‌ । 





अबिभ्रदङ्गदः खड्गं हैमं चरमक्ष॑राण्‌ रप ।४४। 
ुष्पक्षखोऽन्वितः सीभिः स्तूयमान बन्दिभिः । 


विरेजे भमनान्‌ राजन्‌ ग्रैशन्द्र इवोदितः ॥४५॥ 
 भ्ाठभिनन्दितः सोऽपि सोत्सवां प्रामिशत्‌ म्‌ 
प्रविश्य राजभवनं गुरुपलीः खमातरय्‌ ।४६।। 


गुरून्‌ वयस्यावरजान्‌ पजितः प्रत्यपूजयत्‌ । 
वैदेही रक्ष्मणश्चैव यथावत्‌ सशुपेयतुः ।४७। 


त्रान्‌ शखमातरस्तास्तु प्राणांस्तन्व इवोस्थिताः। 


"अ ^ । ~ 4 ५, #, | # च व क ' 3 र > 31 
त 4 ॥ ६ ~ #* १ न न एत) , (>, च ^ ४ 
5 ," ज + 9; ' ॥ ५ #+१.८.१ 
॥ ॥* ह । 9 | । 


"न १ ~ च क र काः + "^ १, ` न क + ~ न 
| › नि न्नी # 1 # ¢ = $ #. य 
१ "कुथ ` त ++ के च त न ० ह 9 
{९4 ¢ ¢ थ! {9 ~ + २१ बर # | र क, ^, ति + 
| तः. 9 ज्‌ 137 ९८} ^ ग्न तकि) क. 7, नि ५ + क १ । 
॥ स क्षर) 1 ७५) अ नि = अ । (9 1 + 4 ~ ४ 9 > = (पन 9 ^ अ 
०५. 7. २.8 † 1 १. # | ॥ ८ । त य र 
१ 7 ् ॥ । # + ^.  ! # | 
। 1 श न हि [1 ५ 
ॐ, ॥ । # ४1 त व 


श्च श्न् ह ) 
, म 



















8. ‰ ॥।  आरोप्याङ्धऽभिषि्न्त्यो वाप्यौपेप्रंजहुः शुवः।४८। 


जा निंच्य विधिवत्‌ लश; समं गुरुः 


6 श्रीमद्भागवत 





[ अ० १० 


भ जवणाण ज 











० व््याणग्दण्दाष्कन्कष्कन्द्योष्या त-ना 2 नय ज 
दि पे 





क 9 





कं 


दिनके बाद आये -देख अपने दुपट्‌टे हिखा-हिखकर 
पुष्पोधी वर्षा करती इई आनन्दसे नाचने ठगी ॥४२॥ 
मरतजीने मगवान्की पादुकां ली, विभीषणने श्रष्ठ 
चंवर, सुभ्रीवने पंखा ओर श्रीहनूमानूजीने सवेत छत्र 
ग्रहण किया ॥ ४३ ॥ परीक्षित्‌ ! शत्रष्नजीने धनुष 
ओर तरकस, सीताजीने वीथेकि जटसे भरा कमण्डलु, 
अङ्गदने सोनेका खडग जर जाम्बवानूने दाल ले 
टी ॥ ४४ ॥ इन सगोके साथ भगवान्‌ पुष्पक विमान- 
प्र विराजमान हो गये, चार तरफ यथास्थान सिया वे 
गयीं, बन्दीजन स्तुति करने छ्गे । उस समय पुष्पक 
विमानपर भगवान्‌ श्रीरामकी सी शोभा इई, मानो 
प्रहोके साथ चन्द्रमा उदय हो रहे हों ॥ ४५ ॥ 

इस प्रकार मगवानने भादयोका अभिनन्दन सखीकार 
करके उनके साथ अयोध्यापुरीमे प्रवेदा किया | उस 
समय वह पुरी आनन्दोत्सवसे परिपूणं हो रही थौ । राज- 
महन्मे प्रवेश करके उन्होने भपनी माता कौसस्या, अन्य 
माताओं, गुरुजन, बराबरके पित्र ओर छोयोका यथायोग्य 
सम्मान किया तथा उनके द्वारा किया इ सम्मान खीकार 
किया | श्रीसीताजी ओर कक्ष्मणजीने भी मगवानके साथ-साय 
सबके ग्रति यथायोग्य व्यवहार किया ॥ ४६-४७ ॥ उस 
समय ससे भरतकशरीरमें प्राणोका संचार हो जाय, वैसे 
ही माता अपने पुत्रके आगमनसे हर्षित हो उटीं । 
उन्होने उनको अपनी गोदमे बैठ ल्फ ओर अपने 
आओंघुभोसे उनका अभिषेक किया । उस समय उनका 
सारा शोक मिट गया ॥ ४८ ॥ इसके बाद वसिष्ठजीने 
दूसरे गुरुजनोके साथ विधिष्रवेक भगवानूकी जटा 
उतरवायी ओर ब्रहस्पतिने . जैसे इन्दरका अभिषेक क्या 
था, वैसे ही चारों समुदरके ज आदि से उनका अभिषेक 
किया ॥ ४९ ॥ इस प्रकार सिरसे स्नान करके भगवान्‌ 
शरीरामने सुन्दर वज्ञ, पुष्पमालं ओर अलङ्कार धारण 
किये । समी भाहयों ओर श्रीजानकीजीने भी सुन्दरः 
सुन्दर वज्ञ ओर अलङ्कार धारण किये । उनके साथ 
भगवान्‌ श्रीरामजी अत्यन्त शोभायमान इर ॥ +° ॥ 


| मरतजीने उनके चरणोम गिरकर उन्हे प्रसन्न किया 
| | ओर उनके आग्रह करनेपर भगवान्‌ श्रीरामने राजसिहासन 
| ४, चतुमि; सागराम्बुभिः। | 























^ नवम्‌ स्वन्ध 
भ्रजा, सभमानरता वणोश्रमशुणान्विताः | खीक्ार किया | इसके त्राद्‌ व्र अपने-अपने धाति ल < | | 


१ 


जुगोप षितृयद्‌ रामो मेनिरे पितरं च तम्‌ ।॥५१॥ | समान पाठन करने व्मो । उनकी प्रजा भी 
। पिता ही मानती थी ॥ ५१॥ परीक्षित जवर समस्त 
 प्राणियोँको सुख देनेवाछे परम धर्मज्ञ भगवान्‌ श्रीराभ राजा _ 


रतायां बत॑मानायां कालः कृतसमोऽभवत्‌ । 
रामे राजनि धर्म्ञे रयंभूतसुखावहे । ५२} 
वनानि नघो भिरथो वपोणि दीपसिन्धवः। 
सर्व कामदुघा आखन्‌ प्रजानां भरतषभ \५३॥ 
नाधिन्याधिजराग्लानिदुःखक्लोकभयङ्कमाः । 
मृत्युश्वनिच्छरां नास्ीद्‌ रमे रजन्यधोशुजे।।५४॥ 
एक्पलीव्रतथरे रजपिंचश्तिः शचिः। 
खधमं गृहमेधीयं शिक्षयन्‌ खयभाचरत्‌ ।५५॥ 


प्रम्णानुष्त्या शीङेन प्रभरयाषनता शती । 


श क 111 
“~ ऋ अथैकादशोऽध्यायः 
क ` भगवान्‌ श्रीरामकी शेष टीलाओंका वणन 


व श्रीशुक उवाच 
 भगवानारमनाऽऽत्मानं रम्‌ ` उत्तमकर्पक्षेः | 


१ ~~ [ष 
=" 


हेतरऽददाद्‌ दिशं प्राचीं बहणे दक्षिणं थः 


 सवेदेवर्मयं देवमीज आचायवास्‌ मखैः।॥ १॥ ॥ | (१ 


तथा वर्णाश्रमके आचास्को निमानेवाटी प्रजाका पिताक्रे 


हए तथ थातो त्रेतायुग, परंतु माद्धम होता था मानो 


-सत्ययुग ही है ॥ ५२ ॥ परीक्षित्‌ ! उक्ष समय वनः 


नदी, पर्वत, वर्ष, दीप ओर समुद्र ~ सवके-सत्र प्रजाके 
व्ि कामघेनुके समान समस्त कामनार्ोको पूणं करने- 
वा वन रहे थे ॥ ५२ ॥ इन्दरियातीत भगवान्‌ श्रीरामके 


राज्य करते समय क्रिीको मान्तिक चिन्ता या शारीरिक ` 


रोग नहीं होते थे । बुदापा, दुषल्ता; दुःखः; सोक 
भय ओर थकावट नाममात्रके च्य मो नहीं ये| यह 
तक कि जो मरना नहीं चाहते थे, उनकी मृष्यु भी 
नहीं होती थी ॥ ५४ ॥ मगवान्‌ श्रीरामने एकप्त्नीका 
वरत धारण कर रका था, उनके चरसि अत्यन्त पतत्र 
एवं राजर्षियोके-से ये । वे गृहस्थोचित खघर्मकी शिक्षा 
देनेके व्यि खयं उस घम॑का आचरण करते ये ॥ “|| 


सतीरिरोमणि सीताजी अपने पतिके हदयक्रा मावर जानती _ ` 
| रहती । वे प्रमसे, सेवासे, रीग्से, अव्यन्त विनयसे तया | 
अपनी बुद्धि ओर कजा गदि गुणेसि अपने पति भगवान्‌ ` 
धिया हिया च भवन्न भतं ; सीताहरन्मनः | ५६} | श्रीरामजीका चित्त चुराती रहती थी ॥ ~६ ॥ ॐ 
( =-= 
इति श्रीपद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्े 
रीमचसिति दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ 


= ग क 


» $" % 1 क. ~ 


~. 


दु क ~: र ---- 
{ | लाः ह्व: = 
पि ९०।।र ॥८। 9.6 ॥ १. र] १ र । ४ = ( र 


ह ध वः 


च्छो 4 4 
* = ॥ + रं त  ## +~ + र 
1 १. ~ " भ (२ 
+ १ ग + # > ` रच न्व ¢ 
१ च> >“ ^ २ 
३५ ॐ ध नि । 
[३ क क” + 
र । च. = क ष्क १ ॥॥ 
> भे + 
। 


कैत > । चै व र क 
£ 
1 च, 4 


अपना ˆ 





























च क । 3 र. 
। # ५ ~ ~ ~ ध क ~ 
पि + क च जो | ज ` ८ # ~ 
व 9 8 # क्क १ = नै + 
न = नक, ॥ १९ 
भै ष | ~ #॥ 3 ५ चक क ' च ~~ क, 
क्षित्‌ "व, ॥ (+ 24 कि 2 
४ , चट । भ (= 
सनक ~ "9 १ ¬>" = > ~ 
द 017 १ 
9 ४4] 4.4 ३ ऋः + प य 
$. क, † > 
7); श 
॥ य न, क न ; व +, = ज 
॥ न , दन. 


स | 


आचायाय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा । | उनके बीचमे जितनी भूमि बच रही थी, वह उनि 
आद्ा्यको दे दी । उनका यह निश्चय था किं सम्पूणं 


भूमण्डल्का एकमात्र अधिकारी निःस्पृह ब्राह्मण ही 
है ॥ २॥ इस प्रकार सारे भूमण्डल्का दान करके 
उन्होने अपने शरीरके वन्न ओर अलङ्कार ही अपने पाप 
रक्खे । इसी प्रकार महारानी सीताजीके पाक्ष भी केवल 
माङ्गच्कि वचन ओर आमूषण ही बच रहै ॥ ४ ॥ जव 
आचायं आदि ब्राहर्णोने देखा कि मगवान्‌ श्रीराम तो ब्राहमणो 
को ही अपना इष्टदेव मानते है, उनके इदयमे ब्राह्मणोके प्रति 
अनन्त स्नेह है, त्र उनका हृदय प्रेमसे द्वित हो 
गया | उन्होने प्रस्तन होकर सारी प्रथ्वी मगवान्‌को ैटा 
दी ओर कहा ॥ ५॥ प्रभो | आप स्न ठोकंकि 
एकमात्र खामी हँ । आप तो हमारे हदयके भीतर रहकर 
अपनी ज्योतिसे अज्ञानान्धकारका नादा कर रहे है | 
एसी सितिमे मला, भापने हमे क्या नहीं दे ख्खा 
है ॥ ६ ॥ आपका ज्ञान अनन्त है | पवित्र कीर्तिवाे 
| पुरुषोमें आप सवश्रेष्ठ हैँ | उन महाताओंको, जो किषी- 
को किसी ग्रकारकी पीडा नहीं पर्हुचाते, आपने अपने 
चरणकमठ दे रक्ले हँ । रेषा होनेपर भी आप ्राह्र्णो- 
को अपना इष्टदेष मानते हैँ । भगवन्‌ ! आपके इस 
रामरूपको हम नमस्कार करते हे ॥ ७ ॥ 
परीक्षित्‌ | एक नार अपनी प्रजाकी सिति जाननेके 
व्यि मगवान्‌ श्रीरामजी रातके समय छिपकर बिना 
किसीको बतटाये धुम रहे ये } उस समय उन्होनि 
किसकी यह्व बात घुनी । वह अपनी पत्नीसे कह र्षा 
था ॥ ८ ॥ 'अरी | तू दुष्ट ओर कुल है । तु पराये 
घरमे र आयी है । खी-लेभी राम मछे दी सीताको रख 
ठ, परतु मे तुसचे पिर नौं रल सकता' ॥ ९ ॥ सचमुच 
सब रोगोको प्रपनन रखना टेदी खीर है; क्योकि 
मू्खोकी तो कमी नक्षीं है । जत्र भगवान्‌ श्रीरामने 
बहृतोके सहसे रेसी बात सुनी, तो वे ोकापवादसे कुछ 
भयभीत-से हो गये | उन्होने श्रीपीताजीका परित्याग कर 


मन्यमान इदं छृत्स्नं जाह्मणोऽ्दति निःस्पृहः २ ॥। 














इत्ययं तदलङ्ारवासोभ्यामवरेषितः। 


तथा रात्यपि वषेदेही सोमङ्ल्यावरोषिता ॥ ४॥ 





। त 
॥, 
9 
॥ 
 । 
+ 
॥ 
४ 
| 
क १. 
१अ 
}६ । ब; 
[ॐ! 
४ । 
न 
दा 
४२. 


तेतु जंहमण्यदेवसख वात्सट्यं वीक्ष्य संस्तुतम्‌ । 
प्रीताः छ्िनधियस्तस्मै प्रत्यर्प्येदं बभाषिरे॥ ५॥' 


` अप्रत्तं नस्त्वया फं लु भगवन्‌ शुवनेश्वर । 


चि 


^ + 444 


छ 


। 

। 

। 

| 

१ 

| ख हैदयं ~> हंसि ॥ ९ 

| । ^  यन्नोऽन्तहेदयं विर्य तमो हंसि खरोचिषा ॥ ६ ॥ 

। नमो बहण्यदेवाय रामायाङ्कष्ठमेधसे। 


/ उत्तमश्छोकधुयाय न्यसतदण्डापिंताड्घये ॥ ७॥ 






।  कदाविटोकनिहासगढो रात्यामरकषितः। 










4 ४ ^ चरन्‌ वचोऽभृणोद्‌ रामो भारयाधुदिश्य कखचित्‌८ 


1 । 
ह ध  : गाह बिभमि त्वां दष्टामक्षतीं परवेदमगाम्‌ | 


भ 
"स 





~ 
0 = ¢ 3 


बभूयात्‌ सीतां रामो नाहं भजे पुमः॥९॥ 









1 
+न्‌ 
१. ८ न 





= कव 











= ४ ~ | सीताजी उस्‌ क्षमय गर्भवती थी । समय आनेपर उन्डनि 
अ तिका 1 9 एक साय दी दो पुत्र उन्न कयि । उनके नाम हए-कुश 











दिया ओर वे वाल्मीकि सुनिवे आश्रममे रहने चीं ॥१०॥ 


+ 





र 
नि कि भो ॐ क व 1 





श! प कोक. क + क  , + 


[व । न 


| 
| 
1 
] 


॥ 1 क ५4 ह रं [५ ~. # 
र - 4 (च, = ३ २ 
कौ ~ ऋ; =+ + 
+ ॥ कः 
¶, क @* 


अ० ११ |] नवम स्कत्ध 





------र~-----------------------------~------------- 














छ किक 





` इशो रच इति ख्यातो तयोधकरे करिया युनि५।११॥ खव | वात्पीकिं सुनिने उनके त संस्वार 4 4 
अद्रि ^ इए-अङ्गद जोरच््रिकेतु। 
दथित्रकेत॒श्च लक्ष्मणसात्मलौ किये ।११ वमणजीके दो पुत्र हए-अर्ग आर चिनरक्ठ। _ 
| ठ | सान" परीक्षित्‌ | इसी प्रकार भरत जीके भी दो हयी पुत्र थे- तक्ष 
तक्ष; पुष्कर इत्यास्तां भरतख महीपते १२ 
सुबाहुः श्रुतसेनश्च शच्च बभूवतुः 1 


भौर पुष्कल | १२ ॥ तथा इलरुध्नके भी दो पुत्र हए 
सुबाह ओर श्रतसेन । भरतजीने दिषि जयम करोड 
गन्धान्‌ कोटिशो जघ्ने भरतो विजये दिशाम्‌।१३ 
तदीयं धनमानीय सवं राज्ञे न्यवेदयत्‌ । 




















गन्धर्वोका संहार किया ॥ १३ ॥ उन्दौनि उनका सब 
रन जाकर अपने बडे माई भगवान्‌ श्रीरामकी सेवामे 
निवेदन किया । शतुष्नजीने मधुवनमें मधुके पुत्र चवण 
नामक राक्षसको मारकर वहाँ मथुरा नामकी पुरी 
बसायी || १४॥ मगवान्‌ श्रीरामके द्वारा निवांसित सीताजीने 
अपने पुत्रोको बाटमी किजीके हार्थोमि सप दिया भौर 
मगवान्‌ श्रीरामके चरणके का ध्यान करती इडं वे 
पृथ्वीदेवीके लोकम चरी गयी ॥ १५॥ यह समाचार 
सुनकर मगवान्‌ श्रीरामने अपने शोकवेशको बुद्धिके द्वारा 
रोकना चाहा, परंतु परम समर्थ होनेपर भी वे उसे रोक 
न सके; क्योकि उन्हं जानकीजीके पवित्र गुण बार-बार 
स्मरण हो आया करते ये ॥ १६ ॥ परीक्षित्‌ । यह ज्ञी 
ओर पुरुषका सम्बन्ध सब करीं इसी प्रकार दुःखकां 
कारण है । यह बात बडे-बडे समथ गोगेकरि विषयमे मी ` 
रूसी ही है, रिर गृहासक्त विषथी पुरुके सम्बन्धर्मे तो _ 
कहना ही क्या है ॥ १७ ॥ क 


शचुघश्च मधोः पत्रं लवणं नाम रक्षसम्‌ 
हत्वा मधुवने चक्रं मथुरां नाम वे पुरीम्‌॥१४ 
` भनौ निशिप्य तनयौ सीता त्रा विवाहिता । 
ध्यायन्ती रमचश्णो भिरं प्रविवेश्च ह ॥ १५ 
तच्छ्रुत्वा भगवान्‌ रामो रुन्धन्नपि धिया शचः। 
सरंस्तस्या गुणांसतांस्ता्नाशक्रोद्रोद्घु मीश्वरः १६ 


ह व * 
र 4.1 [क ३ त ॥ 9 
क । #* % के = 4 ४.६ 9 , चनि 
त 9, #॥ | ++" 4 क ॥ 
4 ती -1> १ १2 "१५. ं 
त २ ५, मि ॥, 
च १ च + ग च, ४ >> ८, 


(५) 
- ` 


लरीपुप्रसङ्ग एतादक्संष््न त्रासमाबहः। 
अपीश्वरणां कियत ग्राम्यस्य गृहचेतसः ॥१७]) 


तत॒ उ्वं॒॑ब्रह्मचयं धारयनजुहोत्‌ प्रथुः। इसके बाद भगवान्‌ श्रीरामने ब्रह्मचर्य धारण करके 





५ व ्िरोत्रमलण्डितम्‌ | तेर हजार वर्षतक अखण्डख्पसे अग्निहोत्र क्या॥१८॥ ` श 
त्रयोदशन्दसाह्मभिष्ेत्रमखण्डितम्‌ १८ | तदनन्तर अपना स्मरण करेवा मन्लके इदमे अपने ` ५ 
णकमर उक्वनके 
विन्यख विद्धं दण्डककण्टकैः । चरणकमर्जोको स्थापित करके जो दण क 
प + सपादप रम आत्मञ्योतिरगात्‌ तत्‌ ६ ॥(१९॥) घाममे चङे गये ॥ १९ ॥ ` 








(न्क 
४ 


(+ 
# ३ ३ १ ॥ ¬ + ॐ 
#* 9 त 4५) ४ (१ + 





परीक्षित्‌ 1 मगवानके समान ग्रतापशाटी ओर ‡ 4 ई 
नहीं है, पिर उनसे बढ़कर तो हो ही कँसे सकता है । 
उन्होने देवताओंकी प्राथनासे ही यह लीला-विग्रह षारण ` 
किया या। पेषी सितिमे रघुवंशरिरोमणि मगवान्‌ श्रीराम्‌- 
के स्थि यह कोई बडे गौखकी बात नहीं है किं उन्हनि 


नेदं यो रघुपतेः सुरथाच्जयाऽऽत्त- 








र 
५ 
ने 
[9 








(क 
म, र 


ष, ॐ । 





हीलातनोरधिकलाभ्यविथुक्ताम्नः । व 





८. 


५ = 
४ ४ [वि 








रक्षोवधो जलधिबन्धनमक्ञप्गः 


कृपय ~  & 
॥ > ॥ 


१ 


= ग [र 
+ छ + 4 क कवच (~ „ < 9 ५ श 4 7 ४५८ ^ 
२. 9 8६} {~  ॥ 8. - प्‌ | ०५१ ॥ क ^~ न्वः 
= ॥ | च, ज ष भ . म > 
€ (*(१५ नव 9 | ५ च ० 8 -१9 १०९ १.११ "ख ५ > "१ 
= ` ~. > ^, > श 
४ ~ ॥ +. | ग्ल #॥ ४. 





= क "+ न अ 
१ अ ११०१... 





6 


५६ श्रीमद्धागधत [ अ० ११ 


इ छन्ना ० च कण सा च कनक वनाम --कवककन्काा उछ नाको जाग ककनह कन्यका चा चक्रगा छक 








अचि > च के > = 














` भगवान्‌ श्रीरामका निम यश॒ समस्त पार्पाको 


यखामलं सृपसदस्पु यशोऽधुनापि ॐ # पाव 
नष्ट च्कर देनेवाल ह | वह इतना फक गया है किं 





गायन्स्यषघम्रषयो दिभिमेन्द्रषड्‌ । दिगगर्जोका स्याम दारीर भी उसकी उञ्ञ्यकता- 
से चमक उठता है। आज भी वड़-बडे षि-महरषिं 
त॑ नाकषार्षयुपालकिरीरजु्- राजाओंकी समामे उसका गान करते रहते है । खर्गके 
देता ओर प्रश्वीके नरपति अपने कमनीय किरीर्टोसे 
पादाम्बुजं रघुपतिं शरण ग्रपद्य 1२९१) ॥ उनके चरणकमलकं सेवा करते रहते है | म उन्ह्‌ | 


रधुवराशिरोमणि मगवान्‌ श्रीरामचन्द्रकी रारण ग्रहण करता 
ह|| २१॥ जिन्होनि भगवान्‌ श्रीरामका दर्शन ओर्‌ 


स यैः स्ण््टोऽभिदो वा संविषटोऽखुगतेऽपि गा | | 2 ~ 
स्परां किया, उनका सहवास अथवा असुगमन किंया-- 





| त योभिनः वे सव-के-पव तथा कोसठदेशके निवासी भी उसी लोक- 4 
|: कोसलास्ते यथुः खानं यत्र गच्छन्ति योभिनः।२२। न त च 
॥ ह स है | २२ ॥ जो पुरुष अपने कानोँसे भगवान्‌ श्रीरामका । 
॥ पुरुषां रामचरितं भवणरपधारयच्‌ | चरित्र सुनता है--उसे सरना, कोमलता आदि गुणोकी 

॥ ~ उछ स मरति शती है । परीक्षित्‌ | गेवल इतना ही नही, वह 

।  आलशखपरो राजन्‌ कमबन्धेविुच्यते ।।२३॥ | समस्त कर्मबन्धनेसि सुक्त हो जाता है ॥ २३॥ 

¦ राजोवाच राज। परीष्टितने एा- भगवान्‌ श्रीराम खयं अपने 


॥ कर्थं त भगवान्‌ रामो तन्‌ वा खयमात्मनः भाह्योके साथ किप प्रकारका व्यव्ह्मार क्रते ये १ तथा 
- ॥ भरत आदि भाई, प्रजाजन ओर अयोध्यावासी मगवान्‌ 








| तसिन्‌ चा तेऽन्यवतंन्त प्रजाः पोरा ईश्वरे ।।१४॥। | श्रीरामके प्रति कैसा वर्तव करते ये १॥२४॥ । 
॥ क | 
|` र्कं उवाच ध्रीद्युकदैवजी कहते हं--त्रिभुबनपति महाराज | 
| िदवते #रामने राजसिहासषन खीकार करनेके बाद्‌ अपने भाद्यो- | 
| दिशद्‌ दिजिजये भ्रा 2 
| १९११ रजतप ्िडवनेधरः । को दिष्विजयकी आज्ञा दी ओर खयं अपने निजजनोको | 
| आत्मानं दर्शयन्‌ खानां परीमै्षत सानुगः ॥२५॥ | दशन देते ९ अपने अदुचरोके साथ ३ पुरीकी देखरेख ५ 
(९. ध र करने खगे ॥ २५॥ उस समय अयोध्यापुरीके मागं | 
ङ 4 आसिक्तमागा गन्धदः करिणां मदशीकरैः । षुगन्वित जल ओर ह्ाथिधके सदकणोसे सिच रहते । 
& एसा जान पडता, मानो यह नगरी अपने खामी भगवान्‌ | 
खामिनं प्रपठमारोक्य मत्तां वा सुतरामिव ॥२६॥ | श्रीरामको देखकर अलयन्त मतवारी हो री है ॥ २६ ॥ । 
ङ उसके महक, फाटक सपामवन, विहार ओर देवाख्य | 


# = ्सादगपुरतभाचत्यदेवगृहादिषु ५ आदिमे सुषणके कलशा रक्खे इए ये ओर स्थान-स्थानपर 

 : विन्यस्तहे पताकाएं पहरा रदी थी ॥२७॥ वह डठ्लसमेत सुपारी 
केलेके खंभे ओर घुन्दर वल्ञोके पष्ठसे सजायी इई थी । 
दर्पण, वस ओर पुष्पमाखओंसे तथा माङ्गव्कि चित्र- 
कासियं ओर बंदनवारसे सारीनगरी जगमगा रही थी।२८। 
नगसखासी अपने ह्वाथोमें तर-तरहवी भेट ठेकर भगवान्‌ २ 
कै पास आते ओर उनसे प्राथना करते कि "देव | पहले . 






































१ "ज 2 | दः 
। ¢ | 9 ^ -अ^ = ८... 
| । 2. 
३ अ० ११ नवम्‌ स्कन्ध ५७ ~ 


आशिषो युयुजुदंव पाहीमां प्राक त्वयोदु शृता्‌| २९ भापने ही वराहरूप धृथ्वीका उद्धार किया था, अत्र जाप 
८ | ही इसका पाटन कीजिये ॥ २९ ॥ परीक्षित्‌ । उस 

वीक चिरागतं < 
उत, रजा च्य पतिं चिरागतं समय जव प्रजाको माद्म होता क्रि बहत दिनेकि बाद 
दिद्षयोत्व्टगहाः च्ियो नराः । भगवान्‌ श्रीराम जी इधर पधारे है, तत्र स भी ल -पुरुष 
गृहाः कति | उनके दशनकी व््सापे षर दरार छाडकर दौड़ पडते । 
आरुह्य हम्यौण्यरविन्दशोचंन- वे ऊची-ऊंची अगसिंपर चद जाते ओर अतृप्त नेतरि 


कमव्नयन भगवान्‌कां देखते हर उनपर पुर्णोकी वषं 
मदप्तनेत्राः इसुमेरवाकिरन्‌ ॥३०॥ | करते | < ॥ 


अथ प्रविष्टः खगृहं जुष्टं सेः पूर्वराजभिः | ईस प्रकार प्रजाका निरीक्षण करके भगवान्‌ क्रि 
| < अपने महर््ममे जा जाते | उनके वे महल धूर्ववतीं रजारओ- 
अनन्ताखिलकोशाद्यमनष्येर्परिच्छदभ्‌ ॥२९॥ | के दवारा सेवित थे | उनमे इतने बड़-बडे सव प्रकारके 


दम्बर ॐ थे, जो कभी समाप्त नही होते ये । वे बड़ी-बड़ी 
बिदुबोदुम्बरदार्वेद्यंसतम्भपङ्क्तिभिः । वा 
न र ९ ~ बहमू्य बहुत-सी सामग्रिथोसे सुसजित थे ॥ ३१ ॥ 
स्थलमारकतेः खच्छेभातस्फरिकभित्तिभिः | ३२॥ | महक द्वार तथा देहवियो मूंगेकी बनी हई थी | उनमें 
र र जो खमे ये, वे वैदूर्थमणिके ये। मरकतमणिकै बडे 
चित्रसभ्भिः पडा भिवांसोमणिगणां युक्तैः । एन्दर-घुन्दर फ यथे, तथा स्फटिकमणिकी दीवार 
चमकती रहती थीं ॥ ३२ ॥ रग-बिरगी मां, पताका 
मणिर्योकी चमक, युद्ध चेतनके समान उञ्ञ्वग मोती 
धूपदीपे ¦ सुरभिभिर्मण्डितं ुष्पमण्डमे; । एुन्दरसुन्दर भोग-सामग्री, सुगन्धित धूप-दीप तथा ध्र 
के गहर्नोसे वे महक लू सुजाये हए थे 1 आभूष्णोको 
सपु भ्भि सुरखश्ाश् जभ्टं भूषणमूषणः ॥३४॥ भी भूषित करनेवाले देधताअकि समान सी-पुरुष उसकी 


सेवामें ठो रइते ये ॥ ३३-३४॥ परीश्चित्‌ ¡ भगवान्‌ 
तसिन्‌ स भगवान्‌ रामः लिग्धया प्रिययेष्टया । | शीरामजी आत्माराम जितेन्द्रिय पुरुषोके दिरोमणि ये । 


उसी महम वे अपनी प्राणप्रिया प्रेममयी पतन श्रीसीता- 
स्वारामर्धरयणामषभः 
४ रेमे खारामधीराणामृषभः सीतया किल ॥२५ जीके साय विहार करते ये | ३५ ॥ समी ली-पुरुष 


ईजे च यथाकारं कामान्‌ धममपीडयन्‌ । = | जिनके चरगकमयेका व्यन करते रहते है, वेषौ 
क | भगवान्‌ श्रीराम बहत वरषोतक् धर्मैकी मर्ाराका पान . 
 , चषप्गान्‌ बहून्‌ नणाममिष्याताङ्धिपषवः ॥२६॥ | करते इए सम्यानुसार मोगोंका उपभोग करते रे ॥२६ २६ (अ 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्वल्घे श्रीरामोपाख्याने 
| एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ क 


॥: ८ ५.80 ड्‌ = भै 4९. ध + ^~ 4 39 = ~न 


क्तासलिदु्ासेः कान्तकामोपपत्तिभिः ॥२३॥ 


षः ॥ 46  । 
कः 0 












१. त्वय।[ऽऽबृताम्‌ । २.. चनं न व्प्त०।.३. तथा कतमात° | ४. मण्डडेः | ५. बुसुजे ध ३ स॒ 
। ध ` ` : कामानन्यानर्ष डयच्‌ । &. प्राचीन प्रतिम्‌ (भीर भीरामोपख्यानेः इतना अंश नहींहे। _ ` "9 
व - । < ~ +. „> द 

: शा शल त्र 4 €~ 


ध ५ ¶ 
दुर ~ 8 ५, = 
५ क) 
१ ~ 





क क. = 0 ¬ श => न न्मनि ४ 
नि ~= भः च ५५} र ~= १ द # चै = छ र 4 |: च +. 
ह > ^ "2, त अ (१4 9 क +» ए च न र ^ नी ) प्य व 3 अद "क, 9 न्द | 
क 9 च 2 । मनं न = + ऋ - = त । # न ॐ "न पे  ; ~ भ 9 च पिच ; अनन न क व » दः 
1 ७ विक ११. (1४ न च +भ) ब ३4; ६ (ज 1 न ५ ब ~ की >.+ प धन्द्र 
४५ १के-#,५ भ = ॥ नति ॐ ॐ 2 ॥ ~= ५ ¢ (न~ ॥ 1 ॥ † 3 
4 क "१६ । ~ 23 व 
पिः षि 4 








~ ------------- ~ ए ए आ 7 > व व „2 चकः ऋतो कः चि च तो चन आत्तः क सक ऋ च = = जक 





| (ॐ ~ ` .  भीमद्भागवत {<+ ५: 





[ऋ 
क्क ° च 
ज जनो क ज च --> 
॥ ह „+ + मिरी 


" अथ दादशोऽ्यायः - 
इवाकुवंदाके देष राजाभैका वणेन 
भीदयुकदेवजी कदते है-परीक्षित्‌ | कुशका पुत्र 
धृल्तत्छ्तो नभः हआ अतिथि, उभ्रका निषध, निंषघका नभ, नभका 
यिस्तखाभिषधस्तव्छंतां नभः | & < 
शस ६ व पुण्डरीक ओर पुण्डरीकका क्षेमधन्वा | १॥ क्षेपधन्वाका 
पुण्डरीकोऽथ तत्पुत्रः क्षेमधन्वाभवत्ततः ॥ १ ॥ | देवानीक, देवानीकका अनीह, अनीका पारियात्र । 
देवानीकस्ततोऽनीहः पारियात्रोऽथ तत्सुतः । °| पारियात्रका बलस्य ओर बलस्क्का पुत्र इआ वन्ननाम । 
ततो मरुखलस्तसाद्‌ वृज्रनाभोऽकेसंभवः ॥ २॥ | यह सू्यंका अंरा था ॥ २ ॥ वन्ननाभसे खगण, खगण 
खगगलत्सुतलसाद्‌ विंशति्ाभवत्‌ सुतः । से विधृति ओर विधृतिसे हिरण्यनाभकी उ्पत्ति हई 
९ व वह जंमिनिका रिष्य ओर योगाचायं था ॥३॥ 
ततो हिरण्यनाभोऽभूद्‌ योधाचायस्तु जंमिनेः ॥। कोसलदेशवासी याज्ञवल्क्य ऋषिने उसकी रिष्यता खीकार 
शिष्यः कोपस्य आध्यात्मं याज्ञवर्क्ोऽष्यगाद्‌ यतः | करके उससे अध्यातमयोगकी शिक्षा प्रहण की थी । 
योगं ोदयबप्यभन्थभें वृह योग हृद्यकी गांठ काट देनेवाच तथा परम सिद्धि 
५ मह्द्यश ह यग्रा्य मदकषर ॥ ४ ॥ | देनेवाद है ॥ ४ ॥ दिरण्यनामका पुष्य; पुष्यका 
पुष्या दिरण्यनाभेख धुषसन्धिस्ततोऽभवत्‌ । धुत्रसन्धि; धुवसन्धिका सुदशनः; सुदरनका अभिवर्ण, 
6 अग्निवणका शीघधर जीर रीघ्रका पुत्र इआ मरु ॥ = ॥ 
सुदश्चनोऽथाभ्रिवणं: शीघ्रस्तस्य मरुः सुतः ॥ ५॥ 
र € ^" * मस्ने योगसाधनास्चे सिद्धि प्राप्त कर ॐ ओर बह इस 
। योऽसावास्ते यागतिद्धः कलापग्राममाभितः। | समय भी कलाप नामकं भ्राम रहता है । कण्ुगके 
+ करेरन्ते परथव॑शं नष्टं भावयिता पुनः ॥ ६ ॥ | न्तम प्वशके नष्ट हं! जानेपर बढ उसे भरसे 
तात्र प्रसुभरुतस्तसख सन्धिसतस्याप्यमषणः । 
 , महसां ्तत्पुतस्तस्माद्‌ विश्व्ाह्लोऽन्वजायत । ७ ॥। 
५ स 
ततः प्रसेनजित्‌ तस्मात्‌ तक्षको भविता पुनः । 


चलयेगा ॥ ६ ॥ मरुसे प्रुश्रत, उससे सन्धि ओर 
1 ततो द्वरो यस्तु पित्रा ते समरे हतः ॥ ८॥ 


श्रीशुक उवाच 









नी ॥ 





भिमन्युने युद्धं र उालथा॥ ८॥ | 
परीक्षित्‌ | इ्वाङरवंशाके इतने नरपति हो चके । _ | 
अब अनिवाकके विषयमे सुनो । ब्रहद्रल्का पुत्र होगा | 
बहद्रण ॥ ९ ॥ बरह्द्रणका उरक्रिय, उसका वत्स॒शद्धः ८ 
वत्सबृद्धका प्रतिन्योम, प्रतिभ्योमका मानु ओर मानुका 
पुत्र होगा सेनापतिं दिवाक ॥ १९ ॥ दिवाकका वीर । 
सहदेव, सहदेवका बृहदश्च, बहदश्चका भानुमान्‌, 

भरतीकः वः सुप्रतीकोऽथ तत्सुतः ॥११॥ । मालमानंका प्रतीकाश्च शौर श्रतीकाश्का पुत्र होगा च 
छ ॥ हेन न 1. & विटिश्चामवत्ततः । २. दनम्‌ । ४. तस्मात्‌ प्रश्तपुच्रस्व खन्धि० । ५. प्राचीन प्रतिमे (ततः ˆ` ` 
1 हीह: ९०० सानपर्‌ वतमान मरति माया हमा ध्मविताः "मिजित्‌, य्‌ बारहवा स्छोक दिया दै 1 












सन्धिसे अमषेणका जन्म हआ । अमषणका महखान्‌ 
ओर महखान्‌का विश्वाह ॥ ७ ॥ वि्साहक। 
प्रसेनजित्‌, प्रसेनजित्‌का तक्षक ओर तक्षकका पुत्र ` | 
बृहद्र इआ । परीक्षित्‌ ! इी ब्रहद्ररुको तुम्हारे पिता । 
^ एते द्वामूपाला अतीता; भृष्बनागतान्‌ । 
५ र ` बहद्वरख्य भषिता पूत्रो नाम बृहद्रणः ॥ ९॥ 
उरक्रियस्ततस्तसख कचत्सवृद्धो भविष्यति । 
्रतिव्योमसततो भाल्दिवाो वाहिनीपतिः ॥१०॥ 


"= द 















अ०° १३ | 
भविता मरुदेवोऽथ सुनक्षत्रोऽथ पुष्करः । | सुप्रतीक ॥ ११ ॥ सुप्रतीका मरुदेव, मरुदछका ` 
। ८ "न 
तद्यान्तरिकषस्ततपुत्रः सुतपास्तदमित्रजित्‌ ॥ १२ | छनश्षतर,सुनकषत्रका पुष्करः पुष्करा अन्तरिश्च, अन्तरिक्ष 
दद्ाजस्तु तस्यापि वर्ितसात्‌ कृत्यः का सुतपा ओर उसका पुत्र होगा अमित्रजित्‌ ॥ १२ ॥ 
रणञ्जयस्तस्य सतः सख्यो भषिता ततः अमित्रजितसे बरहद्राज; हद्राजसे बर्हि, बर्हिसे कृतञ्चय, 
र तः सज्ञया भ^ता ततः ॥५९॥ | कृतन्यसे रणञ्ञय थौर उसते सक्षय छोगा।|१२॥ सन्नयका 
तस्माच्छाक्योऽथ जुद्धादो छर्खंखस्तत्यतः स्मृतः । | राक्य, उसका शुद्धोदं ओर युद्धोरका लङ्खल, खङ्गच्का 
तत्‌ः प्रसेनजित्‌ तस्मात द्रो भविता तत\॥ ९४॥} ( प्रसेनजित्‌ ओर प्रसेनजित्का पत्र क्षुद्रक होगा ॥ १४॥ 
स्मे भविता द्दात सुरथस्तनयस्ततः | ुद्रकसे रणकः, रणकसे सुरथ ॐौर घुरथसे इस वंशकर 
सिनो जापर मि न्त एते बाईलन्वयाः । १५५ अन्तिम राजा सुमित्रका जन्म होगा । यें सब ब द्लको 
इ्वाङ्णामयं वंशः सभित्रानतो अविष्यि वराधर होगे ॥ १५॥ इ्वाङ्ुकरा यह वंशा सुपित्रतकं 


थरस्त अप्य राजानं संस्थां प्राप्ति वे कलौ\; १६॥ | यह वंश समाप्त हो जायगा ॥ १६ ॥ 
-*7ॐ?.ह ^+ 


इति श्रीमद्भागवते महपुरःणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे इष्वाकुवंशवर्णनं 
नाम दादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ 
























॥* 1 „1३ 
॥ 

2. + + 
न्व ३ ५ 1 


३ .. 4 4 गि. 3 १ ४. 


"ब +“ 5 9, न 






अथ अथोदशोऽ्यायः क 

राजा निमिके वंशका वणन | 

श्रीच्ुर उवाच भीशयुकदेवजी कहते है-परीदित्‌ ! इवाढुकरे पुत्र ` 
थे निमि । उन्होने यज्ञ आरम्म करके महिं वसिष्ठको 






निभिरिकष्वाकतनयो दसिष्ठवृतलिभम्‌ । ऋल्विजके रूपमे वरण किया । वसिष्टनीने कहा किं 
"राजन्‌ ! इन्द्र॒ अपने यज्ञके व्यि सञ्च पठे हयी वरण ` 
कर चुत्रे ह ॥ १॥ उनका यज्ञ ध्रा करके यै तुम्हारे ` 
पास॒ आऊ्गा तवतक तुम मेरी प्रतीक्षा करना ।' यह ` 
बात सुनकर राजा निमि चुप हो रहे ओर वसिष्ठजी - = 
इनका यज्ञ कराने चङे गये | २ ॥ विचाखान्‌ निमिने 
यह सोचकर कि जीवन तो क्षणभङ्ग है, विलम्ब करना 
उचित न समश्चा ओर यज्ञ प्रारम्भ क्र दिया । जबतक 

गुर्‌ वसिष्ठजी न लौटे, तबतककरे उन्होने दूस पर | ् 
ऋलिर्जोको वरण कर च्या ॥ २ ॥ गुरु वसिष्ठजी 3 
जब इनद्रका यज्ञ सम्पन्न करके लठ, तो उन्ोनि १ व 
` | वि उनके शिष्य निमिने तो उनकी बात न मानकर यज्ञ ` ` 
= || भ्रारम्म कर दिया है । उत॒ समय उन्होनि 






आरभ्य सत्रं सोऽप्याह शक्रेण प्राग्बरतेऽखि भोः९। 





तं निषरत्यागमिष्यामि तावन्मां ग्रतिपाल्य । 






तृष्णीमासीद्‌ अहतिः शोऽषीन्द्रयाकरोन्मडम्‌ ।२। 






निषिथलमिदं विद्वान्‌ सत्रभारभतात्सवान्‌ । 









ऋलिभ्भिरपरैस्तावन्नाभमद्‌ यावता गुः \ २॥ 











त्िष्यन्यतिक्रमं वीक्ष्य नित्यं शुरूरागतः 


दे स 






ओर ४ 0 च 

ड । । दे बडा धद 
न 1  विचाररीक्ता ओर्‌ पाण्डित्यका बड़ा 
ॐ पण्डितमानिनः ॥ ४ ॥ | वमंड है, इसब्ि उसका शरीरात हो जाय, ॥ ४॥ 
` न्क ह. ६. 3 द ~ न 
क क) नोल = |~ = ॥ ॥ ५.५ १. > क ¢ 

= सास्साध्याञ्थ । ३. लाः स ८* । ४. तयानुकथन्‌ श्ररसामचरिते | _ 

0 ~ 

(नः 

द. ग कः 

> द अ > 


६० भरीमद्भागवत ~ | अ० १२ 














नही°प्रतिकूल या । इसलिये उन्होने भी शाप दिया कि 
तवापि पतताद देहो लोभाद्‌ धमंमजानतः 1 ५॥ | “आपने लोमग्रश्च अपने धर्मका आदर नहीं किया, इसव्ये 
€ आपका शरीर भी भिर जायः ॥ ५॥ य कहकर 
। १8 इत्युतससजं स्वं देहं निभिरष्यात्मशेविदः अत्मविदयामे निपुण निमिने अपने शररका त्याग कर्‌ 
| । दिया । परीक्षित्‌] इधर हमारे बद्ध प्रपितामह वश्िष्ठ जीने भी 
मित्राबरुणयोर्जज्ञे उर्वश्यां प्रपितामहः ॥ ६।. | अपना शरीर त्याग कर मित्रावरुणके दवारा उर्वशी गर्भसे 
जन्म ग्रहण करिया ॥ & ॥ राजा निमिके यज्ञम अये 
इए श्रेष्ठ मुनियोने राजाके शरीरको सुगन्धित वस्तुओ 
रख दिया ¡ जब सुत्रयागकी समाति हई ओर देवतालोग 
रमाप्ते सत्रथागेऽथ देबानृचु ¦ समाबताच्‌ ॥ ७ | आये, तब उन सोर्गोने उनसे प्राथना की | ७ ॥ 
(महानुभावो | भपलोग समर्थं है | यदि आप प्रसन है 
= रज्ञो जीवतु देहोऽयं प्रसन्नाः प्रभवो यदि । तो राजा निमिका यह ॒रारीर पुनः जीभ्रित हो उठे ।' 
९ देवताओंने कदवा--"्ेसा दी हो ।› उस समय निमिने 
रः तथेत्युक्ते निमिः प्राह मा भृन्पे देहबन्धनम्‌ ॥ ८ ॥ कह्ा--“मुद्ये देहका वन्धन नहीं चा हिये ॥ ८ ॥ विचार- 
रीर मुनिजन अपनी बुद्धिको पृणख्पसे श्रीमगवानूमे ही 
यख योगं न वाञ्छन्ति वियोगभयश्षातरः । ४ व 4 ष क ॐ 
५ । एक-न-एक दिन यह शारीर अव्य ही छटेगा-- इस 
क मयसे भीत ॒होनेके कारण वे इस शरीरका कर्म संयोग 
भजन्ति चर नयो हरिमेधसः ॥ ९ ॥ ही नीं चाहते; वे तो सुक्त ही होना चाहते है ॥ ९॥ 


अतः में अव दुःखः शोक ओर भयके मूल कारण इस्‌ 


| [4 त 

६8 निभिः प्रतिददो श्ञापं गुरर्वऽधर्मव्तिने। निमिकी इष्टम गुरु वसिष्ठका यह शाप धर्मे अनुकल 
[ 

1 

| 


गन्धवस्तुषु तदददं निधाय अनिषतमाः 


५ देहं नावरुरुत्सेऽहं दुःखशोकभयावहम्‌ । | शरीरको "रण काना नही चाइता । जसे जव्मे मछली 
ह | के च्िस्त्रही मृद्युके अपररह वेसेदीइसशरीरके ~ 


समना यता सत्युमत्स्ानाघदके यथा ॥१०॥ | ्थि मी सत्र कहीं मृद्यु-दी-मृष्यु है" ॥ १० ॥ 











८  देवाजचुः दैवतानि कदा-मुनियो ! राजा निमि बिना 
=^ ॑ रादीरवे ही प्राणिर्योके नेत्रोमे अपनी इच्छाके अनुसार 
बिदेह उष्यतां कामं शुर ~ 
लोचनेषु शरीरिणाम्‌ । । निवास करे । वे वहौँ रहकर सूष्मश्चरीरसे भगवानका 


च  उन्मेषणनिमेषाभ्यां रुधितोऽभ्यातसंखितः। ११॥ | चिन्तन करते रं । पल्क उठने ओर गिरनेसे उनके ॥ 
~ अस्ित्वका पता चलता रहेगा ॥ ११ ॥ इसके बाद 
| |  अराजकभय॒दणां मन्यमाना मह्यः महवि्योनि यह सोचकर किं (ाजाके न रनेपर लेोगेमे ` 
3 देहं ममन्थुः स्म निये कुमारः समजायत ॥१२॥ | अराजकता फक जायगी' निमिके रारीरका मन्थन किया | । 

४ | उस मन्थनसे एक कुमार उत्पन इ ॥ १२ ॥ जन्म । 
। = ` जन्मना जनकः सोऽभूद्‌ भूद्‌ घदेदस्तु षिदेदजः लेनेवे कारण उसका नाम हआ जनक । षिदेहसे उन्न 


याश्रयात्‌ - क ^ १ 
१. तदेदं।२ य रयात्‌ 

श क) ५ (ल ` अ । क) = 
+ ग "क" ः 4 
2 " ^ १ त "द निय ~, 4 = - ग न 

क) १५ यु 5 ॐ ६: ध ५१) =+ ध कु 
1 4 ¬ ए. 
म ~+ =, १ ३ दै व क्यु 1 ~ । र ॥ 







न ~ द 4 -थ = + ५ 
। (> क्न ० ^ क ~ 4 ककन (~ भ द =, नि £ न्र्‌ = + [१ 
१ [^ क ० क 1 ~ ४. ज +^ 
त-न 1 ~ भ व, = वव भ लि क >. भ- उ ` "च, + 





























{~ ^ 
4 


इ» ४» ३ १ > ८1 - (षि 
कि ~ ~~ २. 
५५ ग्न ~+ = क 5 ~ 
अ° न 0 
नचम्‌ स्कन्ध ६१ ` 
च. 58 न ॥ 3 ‡ 
= "" 
` = -~~~------_-_-_-_-_-_-_--] -~-~-~--~-~-~-~-~-~-~--~-~-~----~-~-~-~-~-~- त = "© ~ न 
भ वि 
कः [न ~ ९ 
(4 ङ्कः 
९9 ~ ‰ 
¢ करि ४ 
ं .- किन 


भिथिलो मथनाजातो मिथिला येन निमिता ।॥१३॥ | नके कारण वरदेडः ओर मन्थनसे उत्यन होनेके 
, कारण उसी बाक्ककरा नाम भमिथिकः हज । उसीने ` ५ | 
मिधिलापुरी बसायी ॥ १३ ॥ । 


तसाहदावुश्तख पुप्रोऽभूम्नन्दिवर्धनः परीक्षित्‌ | जनकक्रा उदवु; उसका नन्दिवर्धनः 
तत; सुकेतुस्तखापि देवरातो भरीपते ॥१४।। | नन्दिवधेनका सुकेतु, उसका देवरातः देवरातका ब्द, 
ताद्‌ बरहद्रथस्तस्य महावीर्यः सुश्सिता । महातीयः ( उद्टति, इतिक धृक 

षे ट & घृ्टवतुका हयश्च अर उपक्र मर नापक्र पुत्र 
अ दोष क १ '॥ ५ हुआ ॥ १४-१५ ॥ मरुसे प्रतीपक, प्र्तपसे कृतिरथ, 
मरोः प्रतोपकस्तसाज्ञातः ई तिरथो यतः | | कृतिरथसे देवमीढ, देवमीढसे विश्रुत भौर विश्वुतसे 
दषमीटस्दस्य सुती धिश्रतोऽथ महाधृतिः ॥१६॥ | महाधृतिका जनम हआ ॥ १६ ॥ महाधृतिका कृतिरात, 
छृतिरातस्ततस्तस्मान्महारोमाथ तत्सुतः कृतिरातका महारोमा, मदहारोमाका खण॑रोमा ओौर खणं 
खणरोमा सुतस्तखं हखरोमा व्यजायत ।(१७॥ | रोमाका पुत्र हआ हघ्ठरोमा ॥ १७ ॥ इरी इतवसेमाके 
ततः सर्वजो जज्ञ यज्ञां क्षतो सहम्‌ । पुत्र महाराज सीरध्वज थे । वे नब यज्ञकर व्यिं धरती 


१ जोत रहे थे; तत्र उनके सीर ( हट ) के अप्रमाग 
सीता सीराग्रत जाता तस्मात्‌ सीरध्वज; स्मृतः।।१८॥ ( फान ) से सीताजीकी उस | त उ 


प ण ¢ ट ् 

य पुत्रस्तता धमध्नजा चृपः। (सीरध्वज पड़ा ॥१८॥ सीरध्वनके कुराध्वजः कुराध्वज- 
४ (४ ¢ 

धमेष्वजख दौ पुत्रौ कृतध्वजमितध्वजौ ॥१९॥ | के धर्मध्वज ओर धर्मव्नके दो पुत्र इए--कृतव्वज 


छेतध्वजात्‌ केशषिष्वजः खाण्डिक्यस्तु मितध्वजात्‌ | भौर मितव्वज ॥ १९ ॥ कृतध्वजके केशिध्वज ओर 
ध्वजयत्‌ न्नाटष्रिद्याषिचारदः | मितध्वजके खाण्डकंध इए । केशिध्वज आमत्रिघामे बड़ा 
20 नता । रजिन्रात च्ासारद्‌ः ॥२९॥ | प्रवीण था ॥ २० ॥ खाण्डिक्य या कर्मकण्डका मर्ह । 


खाण्डिक्यः कमेतचखन्ञो भीतः केशिभ्वजाद्‌ दरतः । | वह केश्िष्वजसे भयभीत होकर माग गया । केदिध्वजका 
भादुमांस्तस्च पुत्रोऽभूच्छत्युभ्नस्तु तत्सुतः ॥२१॥ | पुत्र मानुमान्‌ ओर नानुमानक्ता रातद्ुम्न था ॥२९॥ 
शुचिस्तत्तनयसतस्मात्‌ सनदवाजस्ततोऽभवत्‌ । | शतदय्नसे चि, चसे सनद्रानः सनदराजसे उष्वकेतु, ` 
उष्व॑केतुः सनद।जादजोऽथ पुरुजिष्सुतः ॥२२॥ ऊष्रतुसे अन, भसे नित्‌, परित श 9 


अरिण्नेमिसे श्रतायु, शतायुसे सुपाक, घुपाखैक्से ` 
अरिष्टनेमित्तसयार्पि शतायुलत्सुपाश्वकः। | चित्ररथ ओर वित्रथसे मिथिापति श्षेमधिका जनम ` 4 | 


तसात्‌ समरथस्तस्य सुतः सत्यरथस्ततः । स्॒यरथसे उपगुरु ओर उपगुरुसे उपयुप नामक पुत्र ` 
आशीदुषुरुलसादुपगुप्ोऽग्निसंभवः ॥२४] | इआ । यह अग्निका अंरा या ॥ २४ ॥ उपगुत्का _ ` 


बलनन्तोऽथ तसपत्रो युयुधो यत्‌ सुभाषणः। वखनन्त, वसनन्तका युयुध, युयुधका घुमाषण, सुमाषण- 
ं स का श्रुत, श्रुतका जय, जयका विजय ओर्‌ व्रिजयका ऋत . 
भुतस्तो जयस्तसाद्‌ विजयोऽसाहतः सुतः ।२५॥ | नमक एत्र इभा || २५॥ ऋतक जनक, छनकका = 


 शनकसततपुतो अक्ञ चीत न्यो तिस्तः । | वीत्य, वीतहव्य धृति, तिका बहुश्च, बहला । 
ब हुलाशो धतेस्य कृतिरस्य महावशी ॥२९॥ । का कति ओर कृतिका पुत्र हआ महावशी ॥२६॥ 













१. रीषो । २. प्रतिरथस्त ० । ३. -कृत० 1 ४. विश्चनाथो म मव तिः । ५. विखतश्तर्‌ तस्मा० । ६, तस्मात्‌ । 
शरष्वजसततो राजन्‌ यज्ञ । ८. स्याभूत्‌ । ९. ुखस्वग्नि° । १०. वीतिहव्यो १. । 


" न". 

च 

। ह 3. तिन 
“ र ट 





क 

» "खदु । 4 
^ ८८ 1 
9 [१ १ र 





५५. <: ड £ ५ क [ध - नत =+ 4 ^ भ = 
< प न लः 
। = 9 ध 


"५ छा ॐ "च र ~ 1. व 
स + "2 । 
५4 । चन „ "= 9 [1 7 
# 1 ६६१ न्द +. भ 
च क ऊ र „8 > त 











भ ह ५ ४९ । 
ष 7 क द + = ॥ कि 
ह ¬) ग ^^.” भ नै ह 
। ` ईः ` १३५ ॥ = ॥ 
( धन 4१. 
,' ` ६२ भ्रीमद्धा बचत अ० द्ध 
च| | त प हि । 
#; "च "^ ^ । € 
"त [| 
॥. ५ += क च न ज = क -क० == +" छ. "षे ईड & 
(य ने, = पक ॥ागवावयगयगवयााप्यायकष्कणकनकयकयकवावकायायादग क 
णीती रिणी मी क 91 ५ 0 त "2 > की ` कके न दः 





4 - एते षे मेथिला राजनातमनि्याविश्ारदाः । परीक्षित्‌ ! ये मिधिच्के वंशम उत्पन्न सभी नरपति 
क | ८तैविल्छ कहलाते हैँ । ये सब-के-सब आत्मन्नानसे सम्प 
एवं गृहस्थाश्रमे रहते इए भी घुखबदुःख आदि दरनद्ोसे 
| मुक्त ये । क्यों न हो, याज्ञवल्क्य आदि बड़े-बड़े योगेधर- 

योगेश्वरप्रसादेन दन्द गृहेष्वपि ॥२७॥। । की इनपर महान्‌ कपा जो थी ॥ २७॥ 

----*~<25~~ ---- 
इतिं श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्य, संहेतायां नवमस्कन्धे निपिव्॑ानुवर्णनं 
नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ 








ह अथ चतुदशोऽध्यायः 
| चन्द्रवंशाका वणन 

आी्क्देवजी कते है परीक्षित्‌ | अव सैं तुम्हे 
चन््माके पावन वंशका वणेन सुनाता ह । इस वेमे 
पुरूरवा आदि वड़े बडे पत्रत्रक्रोतिं राजाओंका कीर्तन 
किया जाता है ॥ १ ॥ सशर सिखाले विराट्‌ पुरुष 
नारायणके नाभि-सरोवरके कमरुसे ब्रह्माजीश्च उत्पत्ति 
इई । त्रह्माजीके पुत्र हए अत्रि | वे अपने गुभोके कारण 
ब्रह्माजीके समान ही थे ॥ २॥ उन्हीं अत्रिके नेत्रसे 
अध्रतमय चन्दभाका जन्म हआ । त्रह्माजीने चन्द्रमाको 
बराह्मण, ओषधि ओर नक्षत्रोंका अधिपति बना दिया ॥३॥ 
उन्होने तीनों लोकोपर विजय प्राप्त की ओौर राजसूय 
यज्ञ किया । इसे उन का धमंड बहु गया ओर्‌ उन्होने 
बल्पूवंक ब्रहस्पतिकी पत्नी ताराको हर च्या ॥ ४॥ 
देवगुरु ब्स्पतिने अपनी पल्नीको लटा देनेके ल्य 
उनसे बार-बार याचना की, परंतु वे इतने मतवाठे हो 


यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीष्ष्णो मदात्‌ । गये थे फि उन्होने किसी प्रकार उनकी पत्नी नदी 
लोटाया । पेसी परिशितिमें उसके ल्थि देवता ओर 


(५ ५ न जज्ञे सदानवबिगरः ॥ ५॥) | दानवे घोर संप्राम छिड गया ॥ ५ ॥ ड्ुक्राचायं जीने 
चो क्रो बृहस्यतदषाद्रदीत्‌ सासुरोडपम्‌ । बहस्पतिजीके द्ेषसे अघुरोके साथ ॒चन्दरमाका पक्ष ठे 


श्रीक उवाच 
अथातः शरूयतां राजन्‌ वंशः सोमख पावनः । 
यसिन्नेलादयो भूषाः कीत्यनते पुण्यकीतेयः ॥ १ । 
(  सदहरिरषः पुंसो नाभिहदसरोष्दात्‌। 
 _ जातखासीत्सतो धाह्रतरिः पिदसमो गुणैः ॥ २॥ 






जु # 8 ` "$ क का क्क्व "को" किक "क न; १; 


| 1 क, क अच {नन + ~+ ४ ष्क ४ 

कि (8; ५५ २. 4 "^ - 

~ ॥. छ ` ऋ च {न~ ~¬ = ५ 

र र 

#: नि ध हि * क ॐ च 1 

# 21 + ¢ + | ‡ 
१ ण, ५ + ~ ह) $ 8 
क भि ् + 
न 







। अ तख रग्म्योऽभवत्‌ पुत्रः सोमोऽग्रतमयः क्षिक! 






विप्रोष्युडगणानां अहमणा करिपितः पतिः ॥ ३॥ 
^  सोऽयजद्‌ राजघ्येन विजित्य भुवनत्रयम्‌ । 
ध ४; " यं बदस्पतेदंपात्‌ तारा नामाहरद्‌ बलात्‌ ।। ४॥ 









छ ` च्या ओर महादेवजीने स्नेवरा समस्त भूतगणोके 
य्‌. इते यं ससुतं स्नेहात्‌ सवंभूतगणाहृतः ॥ ६ ॥ | साय अपने विधागुह अब्गिराजीके पुत्र बृहस्पतिका पक्ष 
स | | च्या ॥ & ॥ देवराज इन्द्रने भी समस्त देवताओके 





गुरुमन्यात्‌ त्‌ । . | साय अपने गुरु च्स्पतिजीका ही पक्ष ल्या । हस | 
न ( रकार ताराके मिपित्तसे देवता ओर अघुरोका संहार 











` हाः ज 


¢ 


५० १४ | 


निवेदितोऽथाङ्गिरसा सोभं निभत्स्य विश्वङ्‌ । 


न 
`~ 


॑ 
। 
| 
1 
। 








दनन्तर अङ्धि ऋषिने ब्रह्माजीके पास जकर यह 
युद्ध बद करनंकी प्राथना की । इसपर ब्रह्माजीने चन्द्रमा- 


तारा खभ्त्रे अरय छदन्तवीमवत्‌ पतिः ॥ ८ ॥ | को बहुत डटा-फटकारा ओर त।राको उसके प्रति 


त्यज त्यजाञु दु्रजञे मर्ेत्रादाहितं पर 
नाहं तवां भससात्‌ याँ चिं सान्ताभिकःसति।।९॥। 


तत्याज व्रीडिता तारा इमारं कनकप्रभम्‌ । 


सपहामाङ्गिरसथक्रे इमारे सोम ठव च ॥१ 


ममायं न तवेत्युचेस्तसिन्‌ विवदमानयोः । 


पपरच्छु्छ॑पयो देवा यैषोचे व्रीडिता तु सा ॥११॥ 
मारां मातरं प्रा पितोऽरीकलज्या | 
किं न वोचस्यसद्वृत्ते आत्मावद्यं बदा मे ॥१२॥ 
बह्मा ती रह आहूय समप्राक्षीच सान्त्रयन्‌ । 
सोमस्येत्याह शनकेः सोमस्तं तापदग्रहीत्‌ ॥१३॥ 


तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां चप । 


बुद्धया अम्भीरया येन पूत्रेणापोडशण्‌ दम्‌ ॥१४॥ 


ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां य उदाहतः । 


तस्य॒ स्पगुणौदायंशीरद्रविणविक्रमान्‌ ॥१५॥ 


बृहस्पतिजीके हाले कर दिया । जब बृहस्पतिजीको 
य माद्धम हआ कि तारा तो गभवतीं है, तब उन्होने 
कहा-॥ ८ ॥ दुष्टे | मेरे क्षेत्रमे यह तो किसी दूसरेक्रा 
गम है । इसे त्‌. अभी त्याग दे, तुरंत त्याग दे। डर मत, 


भे तुन्चे जल्रगा नी, क्यश्गि एक तो तुली है ओर 


दूसरे मुञ्चे भी संतानक्षी कामना है । देव्री होनेके कारण 
तु निर्दोष भी है हीः || ९ | अपने पतिक्ती बात सुनकर 


०॥ | तारा अयन्त कित इई । उपने सोनेॐ समान चमकता 


इभा एक वाल्क अपने ग्भसे अक्ग कर दिया । उप्त 
बाख्कवो देखकर चरहस्पति ओर चन्द्रमा दोना द्वी मोहित 
हो गये भौर चाहने त किं यड हमे मिल जाय ॥१०॥ 
भव वे एक दूपरेसे इस प्रकार जोर-जोरसे ्षगड़ा कने 
को कि "यह तुम्हारा नही, मेरा है ॥ छषियां ओर 


| देवतान तारासे पूछा कति “यह किंसक्ता डका है ¢ 
| परतु ताराने कलाव कोई उत्तर न दिया ॥ ११ ॥ 


नाककने अपनी माताकी शटी र्जा ऋरोपित होकर 
कहा--ुष्ठे ! तू बतलाती क्यों नी १ तु. अपन 
कुम मुञ्चे शीप्र-से-शीव्र बता दे ॥ १२॥ उसी 
समय ब्रह्माजीने ताराको एकान्तम बुखकर बहुत कुछ 
समज्ञा-बुञ्ञाकर प्ख । तत्र ताराने धीरेसे कडा क्षि ^चन्दमा- 
का | इसघ्यि चनद्रमाने उस॒ बाङकक्रो ठे च्या ॥१३॥ 
परीक्षित्‌ । ब्रसाजीने उस बाञ्कका नाम रक्खा (बुधः 

क्यो्गि उसी बुद्धि बडी गम्भीर धी । रे पुत्र प्राप्त 
करके चन्द्रमाको बहत आनन्द इ ॥ १४॥ ` ` 


परीक्षित्‌ । बुधके द्वारा इत्यके गभ॑से पुखूखाका 
जन्म हआ । इसका वणन मेँ पहे ही कर चु त ह| 
एक दिन इन््री समामे देवि नारद गी पुरखके ख्य, 


` | यणः उदारता, शौल-खभावः धन सम्पत्ति ओर पराक्रमा 


रतवोव॑शीन्दरभवने गीयमानान्‌ सुरर्षिणा । 


` तदन्तिकषुपेयाय देवी सरशरादिता ॥१६॥ 





१. किश्वरदं । २. तारां समाहूय । 


| गान कर दे ये । उन घुनकर उ्वयोके हदये काप ` 


मावका उदय हो आया शीर उसे पीडित होकर बह 
देवाञ्गना पुखूरवके पासं चटी आधी ॥ १५१६॥ 





ऋ ऋक ` ` ऋक चे ` क 


५४. । ४ त 4 नव्य र । ॥ 
"~, य्व 9 (+> 


` नक 
प ष “ष्यः {मै कक 
1 ~ "~ध न चन "कद, 
व त ५ 

र ष # 


~ >. ^. . वि 9 
14 ^ 0. 9५ टः 






| 


| 

॥ ¦ 

ह 9 - . + श्रीमद्भागवत [ अ० १४ | 
"~~~ ॥ 
मित्रावरुणयोः श्वापादापन्ना नरलोकताम्‌ । | यपि उवशीको मित्राबशणके रापसे दी भृदयुलोकमे 
= | जाना सङा धा, फिर भी पुर्परशिरोमणि पुषूरवा मतिमान्‌ | 
भेटं कनदपमिव रूपिणम्‌ कामदेवके समान सुन्दर है-यह सुनकर सुर-घुन्दरी | 


अ मे. = 


धृतिं विष्टभ्य ललना उपतस्थे तदन्तिके ॥१७॥ | उर्वशीने धैर्य धारण किया ओर बह उनके पास ॒च्ठी ` 
आयी ॥ १७ ॥ देवाद्गना वेरो शो देखकर राजा 





किक किक 





सं तां विलाक्य चपतिहेषणोत्फषटलप्वनः । पुरूरवाके नेत्र इ्ष॑से खिल उठे । उनके शरीरम रोमाञ्च | 

उवाच षष्णया वाचा देवीं हृष्टतनूरुहः ॥१८॥ | हयो भया । उन्न बड़ी मीटी वाणीसे कदा-॥ १८॥ ्‌ 

राजोवाच रजा पुरूरवने कहा--षुन्दरी । तुम्हारा स्वागत | 

लागतं ते बरारेहे आखतां काम धिम्‌ । | दै । वेढे, मै त्दारी कथा सेवा करं १ ठम मेरे साष 

विहार करो ओर हम दोनोँका यह विहार अनन्तकाल- र 

संरमख मया संक रतिनं शाश्वतीः समाः ।।१९।। | तक चता रई ॥ १९ ॥ स 

उव्युवाच उवंरीने कहा--“राजन्‌ | जाप सौन्दर्यके मूर्तिमान्‌ | 

& स्वरूप है । भला, रेसी कौन कामिनी है, जिक्षकी दृष्टि | 

| कस्यास्त्वयि न सज्जेत मनो दृष्टश्च सुन्दर । ओर मन आपे आघ्क्त न हो जाय १ क्योकि आपके 

॥ समीप आकर मेरा मन रमणक्री इच्छसे अपना धैय खो | 

यदङ्गान्तरमासाद्य च्यवते इ रिरंसया ॥२०॥ | बैडा है ॥ २० ॥ राजन्‌ ! जो पु रूप-गुण आदिवे 

४ | कारण प्रशंसनीय होता है, वदी िर्योको अभीष्ट होता 
^ एतावुरणकौ राजन्‌ न्थासौ रक्षख मानद । हे । अतः तै आपके पाय अस्य विहार करी । 
परंतु मेरे प्रमी महाराज ! मेरी एक शतं है । मे अ।पको 
।  संरसेभवतौ सा लाध्यः जीणा बर; स्ृतः॥|२१॥ | परोदरके रूपमे भेके दो बनव तपती द्वं | आप इनक 
| | रक्षा करना ॥ २१ ॥ वीरशिरोमणे ! मँ केवल धी 
॥ ~ ।खाननेषसवान्यत् मैय खाजगी ओर तैथुनके अतिरिक्त ओर किसी भी समय 

| [न्यत्र पुनत आपको वक्षद्वीन न देख सकूगी ।› परम मनस्वी पुरूएवाने 3 

। ५ +, _ >. 'टीक दै"-रेप्ता कहकर उसकी शातं स्वीकार कर 
॥ ८ शिवां तत्‌ तथेति प्रतिपेदे महामनाः ।।२२॥ | छी | २२॥ गौर मिर उसी शा दमया 
१ सौन्दर्य अद्धत है । तुम्हारा भाव अलोकिंक है | यह 













¦ अह सपमहा भागो नरलोकविमोहनम्‌ । तो सारी मयुष्यघष्टिको मोहित क(नेवाख है ओर 
॥ देवि ! कपा करके तुभ खयं यहं आयी हो । फिर कौन 
अ 8 को न सेवेत मनुजो देवीं तवां खयमागताम्‌ ॥२३॥ | रेधा मनुष्य है, जो तुम्हारा सेवन न करेगा १।२३॥ 
४ तास पुरुषश्रेष्ठो रमयन्त्या यथार्हतः । परीक्षित्‌ | तत्र उर्वशी कामान्ञोक्त पद्धतिसे पुरुषः 
¢ द ध श्रेष्ठ पुरूखाके साथ विहार करने दी । वे भी देवताभ- 
# ल (८ की विहारघ्यढी चैत्ररथ, नन्दनवन आदि उपवनोमे 3 
काम॑ वेत्ररथादिषु ॥२४। उसुक्रे साथ खच्छन्द विहार करने त्मो ॥ २४ ॥ देवी 
ए उरव॑शीके दारीरसे कमब्केसरकी-सी सुगन्ध निक 
^ रममाणत्तया देव्या. पद्मङ्गञ्ञर्कगन्धया । | करती थी । उपक्ते साय राजा पुरूखाने बत वर्पोतक 
‡ छा० । २. ता शड्वच्छलाष्यः । ४. तथा वेति । 


--- 

१. खा सुरति चं क र 

> ^. न कव्व १ >. ` ( 

पि न = र" = । 

च 1 1. >~ क 

-‰ श न । 
+ 








अ० १४] 








तन्धुखामोदगुषितो य॒स॒देऽहगणान्‌ बहन्‌ ॥ २५॥ 
अपश्यन्लुवशीमिन्रो गन्धान्‌ समचोदयत्‌ । 
उवंशीरहितं मदमाखानं नातिदोभते ।।२६॥ 
ते उपेत्य महारात्रे तमसि प्रत्युपसिते । 
उवेदया उरणौ जहुन्य्तो राजनि जायया ॥२७] 
निशम्याक्रन्दितं देवी पूत्रयोनींयमानयोः। 
हतास्म्यहं छनाधेन नपुंसा वीरमानिना ॥२८॥ 
यद्िश्रम्भाददं नष्टा हृतापत्या! च दस्युभिः । 

यः शेते निशि संत्रस्तो यथा नारी दिवा पुमान्‌॥२९॥ 
इति वाक्सायकेविंदधः प्रतोसरेखि कुञ्जरः । 
निशि निरखिशमादाय विवल्ञोऽभ्यद्रवद्‌ रुषा ॥३०॥ 
ते विसृज्योरणो तत्र व्यद्योतन्त स षिंदयुतः ¦ 
आदाय मेषावायान्तं नसमेशषत सा पतिम्‌ ।३१॥ 
एेलोऽपि श्चयने जायामपर्यन्‌ षिमना इव । 
तचित्तो विहर; शलोयस्‌ बभ्रामोन्मत्तवन्महीम्‌।।२२॥ 
स तां वीक्ष्य रभते सरखत्यां च तत्सखीः । 
पश्च प्रहष्टवदनाः प्राह पृक्तं पुरूरवा; ।॥३३॥ 


अहा जये तिष्ठ तिष्ठ घारे न स्यक्तुमहेषि । 


| काकः = ककः > इ ऋष = ऋण = क 


९. विक्षताः ¡ २. विद्कवः | 
भा० स खं० २. ९- 


गम्‌ स्कन्ध 


क~~ 


आनन्द-विहार किया । वे उक्र पुखकी घुरभिसे अपनी 
सुध-बुध खो बैठते ये ॥२५॥ इधर जत्र इन्द्रने उवशीको 
नहीं देखा, तव उन्हनि गन्धर्वको उदे नैके चये 
भेजा ओ! कद्ा-८उर्वशीके तिना सुच यह स्वगं फीका 
जान पडता है || २६ ॥ वे गन्धव आधी राते समय 
घोर अन्धकारमें हँ गये ओर उवशीके दोनों मेडको 
जिन्ह उसने राजक्रे पाक्त धरोर रक्ला था, चुराकर 
चलते बने | २७ | उकंशीने जत्र गन्धतरेकि द्वारा ठे जये 
जाते इए अपने पुत्रके समान प्यारे मेडको “बे वे सुनी; 
तब वह कड उदी कि “अरे, इस कायरको अपना स्वामी 
बनाकर मे तो मारी गधी । यह नपुंसक अपनेको बड़ा 
वीर मानता है, यह मेरे मेडंको भीन वचा 
सका ॥ २८ ॥ इघीपर विश्वाप्त करनेके कारण दटटेरे 
मेरे बर्चाको टकर च्य जा रहे हैँ । मै तो मर गयी । 
देखो तो सदी, यह दिनमें तो मदं बनता है ओर राते 
लिर्ोकी तएह डरकर सोया रहता है" ॥२९॥ परीक्षित्‌ 1 
जपे कोई हायीको अकुदासे बेध उठे, वैसे दी उवंरीने 
अपने वचन-बाणेसे राजाको बीघ दिया । राजा पुखूरवाको 
बड़ा क्रोध आया भौर हाथमे तख्वार लेकर वज्ञहीन 
अवस्थामें ही वे उस ओर दौड़ पडे ॥ ३० ॥ गन्धर्षोन 
उनके ञ्जपठते ही मेडोंको तो वहीं छोड़ दिया ओर खयं 
बिजठीकी तर चमकने खगे | ज्र राजा पुरूखा 
मेडको उेकर लट, तब उवेश्ीने उस्‌ प्रकाशमे न्दं 
वञ्ञहीन अतस्यामे देख च्या । ( बस, बह उसी समय 
उन्हे छोडकर चटी गयी ) ॥ २१ ॥ 


परीक्षित्‌ | राजा पुरूरवाने जब अपने शायनागारमे 
अपनी प्रियतमा उवेशीको नहीं देखा, तो वे अनमने हो 
गये | उनका चित्त उवैशीमं ही बसा इआ था । वे उसके 
च्य शोकसे विहृ हो गये जौर उन्मत्तकी भांति परथ्वीमे 
इधर-उधर भटकने लगे ॥ ३२ ॥ एक दिन कुरुते 


सरखती नदीके तटपर उन्हनि उवेशी भौर उक्ती पाँच ` 

प्रसननुखी सखि्योको देखा भौर बडी मीटी बाणी ` 

` | कहा--॥ २२] "प्रिये | तनिक्र ठहर जाओ । एक बार 
मेरी बात मान लो । निष्ठे ! भ्र आज तो सुन्ने सुखी 








3 &8& । 3 ४; ० के श्रीमद्भागवत | अ० १४ 


(ज-वा यया ऋ ॥ि पिपिष वक 








जक 








रै `क 9 


रा तमाप्यनिर्त्य वचांसि कृणवावरै ॥३४॥ | क्वि तिना मत नाज । क्षगमर ठहर; आओ इमः 
दोनो कुछ बातें तो कर ठं ॥ ३४ ॥ देवि | अब इसु 
सुदेहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हतस्त्वया । शरीरपर तुम्हारा कृपा-प्रपार नहीं रहा, इससे तुमने इषे 
दूर्‌ फक दिया है | अतः मेरा यह सुन्दर शरीर अभी 
ढेर इजा जाता है जर तुम्हारे देते-देखते इसे भेडिये 

ओर गीध खा जर्येगे ॥ ३५ ॥ 

उर्व्युवाच | उवैदीने कहा--राजन्‌ । तुम पुरूष हो । इस 
६ प्रकार मत मयो । देखो, सच्च ये मेडिये तुम्हे खान 
मामृथाः पुरुषोऽसि त्व मा स त्वादुचका इमे । जाय | ्ि्याकी किंसीके साथ मित्रता नदीं हआ करती | 
(५ ६ 9 ~ न्रिर्योका ट्य ओर मेडियोँक। हृदय विल्कुख एक-जेसा 

कापि सख्यं न वै सीणां वृकाणां हदयं यथा;॥॥२६॥ | होता है ॥ ३६ ॥ वियँ निर्दय होती हे । बूरा तो 
उनमें खाभाविक ही रहती है । तनिकसी बातमे चिद्‌ 
जाती हैँ भोर अपने सुखके य्यि बड़े-बड़े साहसके 
काम कर बेठती है, थोडेसे खार्थके च्ि विश्रास् 
दिव्छकर्‌ अपने पति ओर माईतकको मार डारती 
विधायालीकविभम्भग्ेु त्यक्तसौहृदाः । | ६ ॥ २७॥ इनके हृदयम सौश्दं तो है दी नही । 
मोले-माञे छोगोको शूठ मूढका विश्वास दित्मकर फं ठेती 
नवं नवमभीप्सन्त्यः पुंरयः स्तरैरडृत्तयः ॥२८] | है बोर नये-नये पुरुषकी चाटसे कु्टा जर खच्छन्द चारिणी 





खादन्त्येनं बका गृधास्त्व्परसादस्य नास्पदम्‌।२५५ 





मणीव 3 2 कः 


जियो करुणाः कूरा दुष; प्रियसाहसाः । 


्न्त्यलपाथेऽपि विश्रब्धं पतिं आतरमप्युत ॥२३७७ 


के ~न न ए ~ 0 
[१ । ~ र 
१ 1 त त त का 1 => क्क ~ 9 = थ ~ कक 


0 ए 1 त त ए 


। बन जाती हँ ॥ २८ ॥ तो फिर तुम धीरज धरो। तुम राज- 
। | संवत्सरान्ते हि भवानेकरात्रं मयेश्वर । राजेशवर्‌ €ो । घवराओ मत । प्रति एक वर्धके बाद एक रात 
= ट तुम मेरे साथ रोगे । तब तुम्हारे ओर भी संताने 
। ^  बत्खतपपत्यानि च ते भषिष्यन्त्यपराणि भोः॥३९॥ होगी | २९ | 
षः ¦ | (9 9 = इसन्य 
| अन्तवत्नी्ुपालक्ष्य देषीं स प्रययो परम्‌ । राजा पुरूरवाने देखा किं उवंश्ी गर्भवती है, हस्य 
2. ` वे अपनी राजधानीमें व्यै आये । एक वर्धके बाद्‌ किर 


 युनसत्र गतोऽब्दान्ते उव॑शीं धीरमातरम्‌ ।॥४०॥ | व गये । तबतक उर्वशी एक वीर पुत्रकी माता हो 
छ ~ | चुकी थी ॥ ४० ॥ उवेरीके मिल्नेसे पुखूगवाको बड़ा 
।  उपरभ्य छदा युक्तः स्वाप तया निशाम्‌ । | सुख मि ओर वे एक रात उषीके साथ रहे । प्रातः 
॥ काठ जबवे व्रिदा ह्योने करो, तब विष्के दुःखसे बे 
अत्यन्त दीन दो गये । उसीने उनसे कहा-॥४१॥ 
गन्धवा दुपधावेमांस्तभ्यं दाखन्ति मामिति । (तुम इन गन्धर्वोकी स्तुति करो, ये चाहे तो तदं सुद 
ध दे सकते है । तब राजा पुरूखाने गन्धर्वी स्तुति 

की । परीक्षित्‌ । राजा पुरूखाकी स्तुतिषे प्रसन होकर र 

तर ससत्तस्तुशा अभ्निखारं दुष | गन्धर्वान उन्हे एक अभ्निष्याठी ( अगननिस्थापन करनेका - 
|| पात्र) दी । राजाने समञ्च यही उर्वरी है, इपन्य 

उक्षको हृश्यसे गाकर वे एकर वनसे क | र कातरे ए मदर वनम धू वनमे घूमते 


| अभरन प्राह कृषणं विरहातुरम्‌ ॥४१॥ 









+ 4 => + 3.0 बशः ४.५७ 5 क. 7 - 
1. {+ 1 = ।> 94114 ५9 ५५ स # क, ९१ 
क ४1 वि हि 
न ग (व 
५7 1 ९६ 





1 
| 
| 


| 
। 











प 
 %! ॐ तिक 3 ५०२१ ५ 
क ` 9२ 





व्व जकाराः =कनयान कः = काक = = = चक == = 


साली न्यख वने गला गृहानाध्यायतो निधचि। 






र % # 9 ९ € 
तरताया सप्रषृत्तायां मन्ति चय्यधर्त॑त ॥४३॥ 


गवम्‌ स्कन्य 





, रहे ॥ ४२ ॥ जवर उन्दं होश इ आ, तव वे सथार्खीको 


कक सियो । 


वनमें छोड़कर अपने महम गेट आये एवं रातके समय 
उवशीका ध्यान करते रहे । इ प्रकार जब त्रेताश्ुगका 









2 { व: प्रास्म हआ, तत्र उनके हृदयम तीनां वेद प्रकटः = 
साटीखानं गतोऽश्वत्थं शमीगभ बिलक्ष्यं सः। इए ॥ ४३ ॥ पिर वे उस स्थानपर गये, जहाँ उन्दनि | 
= वीरो वह अग्निस्थाली छोडी थी । अब उस स्थानपर रामीव्रक्षके 
ण न गर्भे ९ 
तेन ढे अरणी कृत्वा उर्ववीलोककाम्यया ॥४४।। गर्भे एक पीपलका दृक्ष उग॒ आया था, उसे देखकर 
यमीं = उन्डने उषसे दो अरणिर्यां ८ मन्थनकाष्ठ ) बनायी । 
उवंशीं मन्त्रतो ष्यायन्नधरारणिष्त्तराम्‌। | २ न 
१,५६ फिर उन्हाने उवशीटखोककी कामनासे नीचेकी अरणिको 
आत्मानञुभयोमेष्ये यत्‌ तत्‌ प्रजननं प्रः ।।४५॥ | उशी, ऊपसकी अरणिको पुरवा ओर बीचके काष्ठको 
पत्ररूपसे चिन्तन करते हए अग्नि प्रज्वलित करनेवाे 
तस निमन्थनाज्ञातो जाते दा मिभावेसु १ | मन्त्रोसे मन्यन किया ॥ ४५-४५ | उनके मन्थनसे 
(जातवेदा नामका अग्नि श्रकट इआ । रजा पुख्गानें 
रय्या स विद्या राज्ञा पुत्रत्वे कटिपितखित्‌ ।॥४६॥। | अग्निदेवताको त्रयीवरियाके दारा आहधनीय, गाहपत्य ओर 
स दक्षिणाम्नि-ईइन तीनों भागोमें विमक्त करके पुत्रख्पसे 
तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम्‌ । सीकार्‌ कर ल्या ॥ ४६ ॥ फिर उर्वेशीटोककी इच्छासे 
0 पुरूखाने उन तीनों अग्नियोद्वारा सवेदेव्रूप इन्दियातीत 
°चसालाकमान्वच्छन्‌ सवदवमय हरिम्‌ ॥४७॥ | यज्ञपति मगवान्‌ श्रीह ्कि यजन किया ॥ ४७ ॥ 
एक एव पुरा वेदः प्रणवः सववा १ | परीक्षित्‌ । त्रेतके पूरं सत्ययुगमें एकमात्र प्रणव 
( ॐकार ) ही वेद था । सार वेद-शा उसीके अन्तर्भूत 
= म थे । देवता ये एकमात्र नारायण; ओर कोश्नथा। ` 
देवो नारायणो नान्य एकोऽगिर्बणं एव च ॥४८॥ । ` ` व. 3 
र | अग्नि मी तीन नही, केव्रक एक था ओर वणं भी केव ` 
वस एवासीत्‌ त्रयी त्र एक “हंसः ही था ॥ ४८ ॥ परीक्षित्‌ | त्रेतके प्रारम्म्मे _ ` 
रूस्वस एवात वर्थ। तताघुखे सृप । पुरूरवासे ही वेदत्रयी ओर अग्नित्रयीका आविर्माव इजा। ` ध 
रजा पुरूखाने अग्निको संतानख्पसे खीकार करके ` 
अभरिना प्रजया राजा लोकं गान्धवेमेयिवान्‌ ॥४९॥ | गन्धवैलोककी प्राति की ॥ ४९ ॥ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे रेरोपाख्याने अ 
चतुदशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ "3 
अथ पञ्चदशोऽध्यायः | ५ धः ५. 
ऋचीकः जमदच्नि ओर परडयुरामजीका चरित्र 


श्रीक उवाच 


 . एेलख वोर्वशीगभीत्‌ पृडासन्नातमजा सष । 


स > 


= | ए 


७9 
+ 4 क 








न्द क चः 1 
५* द्‌ + न्मे 


देवेशं । २. प्राचीन प्रतिम्‌ इसके पदे (सोम; 


1 = + ष त क 
त क्‌+ निरे ह ) = क 
क, =. 
- प्री = (३ क्षि च ् 1 द 9 
श्रीश्युकदेवजं ~. । त = क 
स+ + ९ । 8 (£ „+ कम 
< "म १ १. + $= त्‌ षौ च @ ४) 9,” = 
सु = 
ति ॐ ^ अत 1 
द ॐ ¢ 
~ ॥। 


अ ^ 
* कः 








| | ५८ भ्रतायोसुभान्‌ पुत्रः सत्याय बतज्ञयः 
/ समख सुत एष जयसख तनयं 
भीमस्तु विजयस्याथ काञ्चनो दात्र कस्ततः । 


तख जह्वः सुतो गङ्ग गण्डषी त्य योऽपिबत्‌। 

जदोसतु परु्तत्पुत्रो बलाकश्चात्मजोऽजकः । २॥ 
त्तः कुशः $शखापि इशंम्बु्नयो वसुः। 
कुश॒नाभथ चत्वारो गाधिरासीत्‌ इशाम्बुजः॥। ४ ॥ 
तस्य सत्यवतीं कन्यागूचीकोऽयाचत द्विजः 


र विसद्शं मत्वा गाधिभागवमत्रवीत्‌ ॥ ५॥ 
एकतः श्याम््णानां हयानां चन्दरवचसाम्‌ । 
सहस्रं दीयतां शर्क कन्थायाः डुशिका वयम्‌।। ६ ॥। 
` इत्युक्तस्तन्मतं ज्ञात्वा गतः स वरुणान्तिकम्‌ । 
| । | ३ आनीय द्वा तानश्वानुपयेमे वराननाम्‌ । ७।। 


४ स्छषिः प्राथितः पटन्या श्वभ्रवा चापत्यकाम्यया । 















। ` भगयिलोभवेर्न्थरं सातु गतो शनिः ॥ ८ ॥ 


„ तावत्‌ सत्यवती मात्रा सव॑चरं याचिता सती । 





"स शष्ठ 8 
^ अष्ट मला तयायच्छन्मात्रे मातुरदत्‌ खयम्‌ ॥ ९॥ 


= ह ठ 
† >, (1 # व । 
च र क [वि विज्ञाय ॥ ~ ० छ 
12 4: व ` । युनि 
| | | व . : तदू म्‌ १ प्रा एमक्ार १ ५ 
र धि गि ॥ [1 
५) + „ ऋ श 
=.» ४ न ७.४. भद ^ त र # , । , | 
[म । १ क ^ ऋऋ ¢ ^ ५. ५ 
~ (1 = = ~ 
4 +न्‌ -4 (दन 
“~ त त 
क १ ` |, 
3 # 1 







^ ५५ + ।। ^ 
हि द , ~ पि | कति ठे > 
ओ, ¶ 
< न्१ +; 
- । > ~ $ # ~“ 


"व्क = र 
{= ~-*# द ५ र, १. ४ 
भ, > 4 ' =" ऋ >~ क; ध 
£ ग षु ~ १ ` ५५७ 
न ` ध 4 र ~) ५ ५ ॥ 4 = ~ र 
 - 4 ५३ क ष ` [* त 
८ द  @ | न्न 7 १. ॥। त्था ° (| [९ 
ति ~क जै नि ६ 
2 : < र ॥) ‡ पि ४ 
= मः -4 
८: [ (ल 


भीमद्भामवतं ` 








| अ० १५ 


7 








रय; विजय ओर जय ॥ १ ॥ श्रुतयुक्ता पुत्र था वसुमान्‌, 


ऽभितः ॥ २ ॥ | सत्या्चका श्रुतञ्जयः रयका एक ओर जयका अमित ॥ २॥ 


विजयका भीम, मीमका काञ्चन, काञ्चनका होत्र ओर 
होत्रका पुत्र था जहुं | ये जह वही थे, जो गङ्गाजीको 
अपनी अज्ञलि लेकर पी गये थे। जहका पुत्र था 
प्रः, पूरका ब्यक ओर वबलकका अजक ॥ ३ ॥ 
अजकका कुशा था | कुराके चार पुत्र थे--कुदाम्बु, 
तनय; वञ्च ओर कुरानाम । इन्मेसे कुराम्बुके पुत्र 
गाधि इए ॥ ४ ॥ 

परीक्षित्‌ | गाधिकी कन्याका नाम था सत्यवती | 
चीक्‌ ऋषिने गाधिसे उनकी कन्या मगी | गाधिने 
यह समञ्नकर्‌ कि ये कन्याके योग्य वर नहीं है, ऋचीकसे 
कहा-॥ ५ ॥ मुनिवर | इमखोग कुरिक वंशके है 
हमारी कन्या मिलनी कठिन है । इप्तञ्यि आप एक 
हजार पेसे घोडे खाकर मुञ्चे शुल्करूपमें दीजिये, जिनका 
सारा शरीरतो स्वेत हो, परंतु एक-एक कान श्याम 
वणका होः ॥ ६ ॥ जब गाधिने यह्‌ बात कटी, तन 
ऋचीक सुनि उनका आदय समञ्च गये जर वरुणके 
पास जाकर वेसे ही धोड़े ठे आये तथा उन देकर 
सुन्दरी सत्यवतीसे विवाह कर च्या ॥ ७ ॥ एक बार 
महिं ऋचीकसे उनकी पतनी ओर सास दोननि दी 
पुत्रप्रा्तिके च्य प्राथना वी | महिं ऋचीकने उनकी 
प्रार्थना खीकार करके दोनोके व्यि अलग-अलग मन्त्रेसि 
चर्‌ पकाया भौर स्नान करनेके स्ि चङे गये ॥ ८ ॥ 
सत्यवतीकी माने यह समश्चकर किं ऋषिने अपनी पत्नीके 
च्य श्रेष्ठ चर पकाया होगा, उससे वह चरु माग च्या | 
इसपर सत्यवतीने अपना चर्‌ तो माको दे दिया ओर ` 
माक्रा चर्‌ वह खयं खा गयी ॥ ९ ॥ जब ऋचीक 
मुनिको इस बातका पता चखा, तब उन्होने अपनी पली 
सत्यव्रतीसे कहा कि (तुमने बड़ा अनं कर ड्म । 
अब तुम्हारा पुत्र तो लोगोको दण्ड देनेवाल घोरं ग्रकृति- 
का होगा ओर तुम्हारा भाई होगा एवा श्र ब्रहमवेत्ताः॥ १०॥ 
सत्यवतीने ऋचीक मुनिको प्रसन कथा ओर प्रार्थना 
कीं कि खामी । एेसा नद्यं होना चाहिये | तब उन्हनि 
कह्ा--“अच्छी बात हे । पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र 














































भ क त स्कन्ध ६ 
8 सा चामूत्‌ सुमहपृण्या काशिकी लोकपावनी । वैसा ( घोर भ्कृतिका ) होण ॥ समयपर सघ्र्तीके ` ८ 
¢ गभसे जमदग्निका जन्म इआ ॥ ११ ॥ सत्यवती सभ्त॒ 
रेणोः सुता रेणुकां वै जमदग्निरुवाह याम्‌ ॥१२॥  गेकोको पवित्र करनेवाली परम पुण्य्रयी कौडिकौः नदी हः 
| ध । बन गयी ।रु्षिकी कल्या थी रेणुका । जमदश्निने उसका 
तस्यां वे भागंवच्छषेः सुता चसुमदादयः | पाणिग्रहण किया ॥ १२ ॥ रेणुकाके गर्भसे जमदग्नि ` 
` | ऋषिके वघुमान्‌ जादि कई पुत्र हए । उनमें ससेखेटे _ 
यवीयाञ्लज्ञ॒ एतेषां राम इत्यभिर्िश्रतः ॥१३॥ | परञ्चरामजी ये । उनका यञ्च सरे संबार प्रसिद्ध ` 
है ॥ १३ ॥ कहते हैँ किं हैदयवंरा करा अन्त करनेके 
यमाहूर्वासुदेवां्चं रेहयानां ङरान्तकंय्‌ । व्यि खयं भणवानने हौ परञ्रामके रूपमे अंशावतार 
ड हण किया था । उन्होने इस प्श्वीको इकीक्त बार्‌ 
सप्तो यमां चक्रेनिःत्रिां महीम्‌ १४॥ | शयान कर दिवा ॥ ४ ॥ यचि धति उनका = 
१५६ थोडा-सा ही अपराध क्या धारि मीवेडोगबडे 
(9 मनी दुष्टः ब्राहमणोके अभक्त, रजोगुणी ओर विरेष करके ` | 
दृष्ट शत्र भुवो भस्मन्रह्मण्यमनीनशत्‌ | तमोगुणी होरे थे | यदी कारण था कि वे पृरथ्वीके " 
र & मार्‌ हयो गये थे ओर इसीके फक्खरूप मगवान्‌ पर्यराम- ` 
रजस्तमावरतमहन्‌ फल्गुन्यपि कृतेऽहसि ॥१५॥ | ने उनका नारा करके पृरष्वीका भार उतार दिया ॥१५॥ 
| राजोवाच राजा परीक्षिवने पूछा-मगवन्‌ ! अवद्य ही उस्‌ | 
| समयके क्षत्रिय विषयजोटुप हो गये थे; परंतु उन्दनि ` 
| कि तदहो भगवतो राजन्येरजितात्मभिः। परड्यरामजीका पेसा कौन-सा अपराध कर दिया, जिसके ` 
कारण उन्दने बार-बार क्षत्रियेके वेशका संहार 
| कृतं येन ङं नष्टं कषत्रियाणामभीक्ष्णशः ॥१६॥ | किया १॥ १६॥ अ 
श्रु उवाच भीड्कवेवजी कने रुगे-परीक्षित्‌ । उन दिनं 
रिं हेदयवंशका अधिपति था अजुन । वह एक श्रेष्ठ कषत्रिय 
हेहयानामधिपतिरजुनः शषत्रियषभः। या । उसने अनेको प्रकारकी सेवा श्रा कके भगवान्‌ ` 
नारायणके अंरावतार दत्तत्रेयजीको ग्रसन क्र च्य 
दत्तं नारायणस्थांशमाराध्य परिकमभिः ॥१७॥ | ओर उनसे एक हजार सज तया कोई भी अर युद्ध ` न 
| म पराजित न कर्‌ सके यह वरदान प्राप्त कर थ्या _ 
ॐ || ¢^0 २: 
| बाहून्‌ दशतं लेमे दुधषतवमरातिषु । | साय ही, इन्द्योका अवाथ बढ, अतुल स॒ष्पति, ` 
| तेजल्षिता, वीरता, कीतिं ओर शारीरक बल भी उसने ल 
अव्याहतेन्धियौजःश्ीतेजोवीयंथशोबलम्‌ ॥१८॥ | 


् १. स॒पाहरत्‌ | २. बादरायण 


१ ^, 


| हि प + 4 
र "+" {9 दे = (त - ;- च5-११- कवी 
द च ~ # = ४ १ {> - क क 1 नन 
| 1 म्‌ र क 
=. (कन्‌ - क 
{~ ३ ॥ # > 


अव+, ~. 
+ ॐ "+ 





ल्लीरतनेराव्रतः करोडन्‌ रेवाम्भसि-मदोत्कटः । 


प्ेजयन्तीं सरजं बिभ्रद्‌ रुरोधसरितं युजेः ।॥२०॥ 


विषितं खदिषिरं प्रतिस्रोतःसरिजरेः । 
नाश्रष्यत्‌ तस तद्‌ बीय वीरमानी दश्चाननः।२१। 
गृहीतो लीलया स्लीणां समक्ष छृतकिख्षिषः। 


| माहिष्मत्यां संनिरुद्धो य॒क्तो येन कपियंथा ॥२२॥ 
सष एकदा त॒ सृगयां विचरन्‌ विपिने वने । 
यद्च्छयाऽऽश्रमपदं जमदग्नेरुपाविशत्‌ ॥२२॥। 


तस्मे स नरदेवाय युनिरहंणमाहरत्‌ । 
















ध  ससेन्यामात्यवाहाय हविष्मत्या तपोधनः ॥२४। 
सरं वीरसतत्र तद्‌ द्रा आत्मैयािशायनम्‌ । 

| ॐ स । तननाद्रिताग्निहोत्यां साभिलाषः सहयः ॥२५॥ 
| |  हविानर्द्राच्‌ = हरमचोदयत्‌ । ` 

ते च माहिष्मतीं निन्धुः सवरपं क्रन्दतीं बलात्‌ ।२६। 
अथ राजनि निर्याते राम आश्रम आगतः । 


=: अ - 
प 


लात्‌ तख दौरात्म्यं चुक्रोधादिखिाहतः।;२७॥ 


(८ क ~ 
५, हि ओ (ह 





एकः बार गलेमे वैजयन्ती माला पहने सहखबाह अञ्जन 
बहुत.सी खुन्दर लियोके साथ नम॑दा नदीमे जल.विहार 
कर्‌ रहा था । उस समय मदोन्मत्त सहस्रवाहने अपनी 
बसि नदीका प्रवाह रोक दिया ॥२०॥ दरामुख 
रावणका शिविर भी वहीं की पाक्षं ही था | नदीकी 
धारा उच्टी बहने लगी; जिससे उसका शिविर इबने 
गा । रावण अपनेको बहत बड़ा वीर तो मानता दही 
था, इसव्थि सहस्राजंनका यह पराक्रम उससे स्न 
नहं इआ ॥ २१ ॥ जब रावण सहस्रबाह अजुनके पास 
जाकर बुरा-भखा कहने लगा, तब उसने स्ियकि सामने 
ही स्ञेर-सेरमें रावणको पकड च्या ओर अपनी राज- 
धानी माहिष्मती ठे जाकर बंदरके समान कद कर 
स्या । पीछे पुर्सत्यजीके कहनेसे सहस्रबाहने रावणको 
छोड दिया ॥ २२॥ 


एक दिन सहस्बाइ अञ्न शिकार खेलनेके थ्य 
बडे घोर जंगम निकल गया था | दैववा वह्‌ जमदग्नि 
मुनिके आश्रमपर जा पहुंचा ॥ २३ ॥ परम तपनी 
जमदि मुनिके आश्रमम कामधेनु र्ती थी । उसके 
प्रतापसे उन्होने सेना, मन्त्री ओर बाहनोके साथ 
हैहयाधिपतिका खूब खागत-सत्कार किया ॥ २४ ॥ 
वीर हैहयाधिपतिने देखा कि जमदग्नि सुनिका रेशचर्य 
तो मुञ्चसे भी बदा-चढा है । इसय्यि उसने उनवेो 
खागत-सत्कारको कुछ भी आदर न देकर कामधेनुको दी 
ठे लेना चाहा ॥२५॥ - उसने अमिमानवदा 
जमदग्नि मुनिसे मांगा भी नही, अपने सेवकोको आज्ञा 
दी किं कामघेनुको छीन ऊ चलो । उसकी आज्ञासे 
उसके सेवक बच्डेके साथ प्नाँ नँ" कराती इई. काम- 
धेनुको ब्पूवेक माविष्मतीपुरी ॐ गये ॥ २६ ॥ ज 
वे सब चले गये, तब परद्युरामजी आश्रमपर आये भौर 
उसकी दुष्टताका इृत्तान्त सुनकर चोट खाये हए सपकी 
तरह क्रोधसे तिलमिला उठे ॥ २७ ॥ वे अपना भयक्र 
फरसा; तरकर, ढाल एवं धुष केकर बड़े वेगसे उसके 
पीछे दोडे-जेसे को किंसीसे न दधनेवाला सिंह 


--------  हायीपर दरट पड़े ॥ २८ ॥ 
~ । ^ = १५ इत०। २. तय |४. पं वोरमादाय च ्गादरमका्ङम्‌। ५. दुमो । 





2 = ६८२ ; 1 १ २ ~ 


(क । च "9 ">= ०, = 
{. 


न ~ 
र 29 य ४१142. 
+: 1 (५४ क के 








ज 


न 
क कान = 


तमाप = ५ क थमो क र ू हि 
मापतन्त | भृगुवयमाजसा सहस्रा अजुन अमी अपने नगरम प्रवेश कर ही ` 
धनुर बाणपर्धायुधम्‌ । रहा था किं उसने देखा परद्यरामजी महाराज बडे वेगसे ` 
एणेयचमांम्बरमर्डधामभि- उसीकी ओर श्ञपटे आ रहे हैँ । उनकी वड तरिगक्षण 
तं जटाभिर्द्े पुरी विशन्‌ ॥२९॥ जञोकी थी । वे हाथमे धलुपबाण ओर परसा चयि हृषः 
लिलासपी थे, शारीरपर काव्य मृगच्मं॑धारण किये हए थे ओर 
चोद्यद्ध पात्ताभ्‌ उनके जटाए्‌ सूर्यकी किरणोके समान चमक रही 
गंदासिब्राणष्टितध्निशक्तिभिः । या || २९ ॥ उन देखते ही उसने गदा, खडग, बाण, 
अक्षौहिणीः सवि कृष्टि, रातध्नी ओर शक्ति आदि आयुर्धोसि खसलित 
~ एव हाथी, घोडे, रथ तथा पदातियोंसे युक्त अत्यन्त 

८ | प एको भगवानघ्रदयत्‌ ॥२०॥ , भयंकर सत्रह अक्षौहिणी सेना मेजी | भगवान्‌ परञ्यरामने 
यतो यतोऽसौ प्रहरत्परश्वधो बात.की-बात्मे अकेले ही उस सारी सेनाको नष्ट कर 
मनोऽनिलै्ाः परवकदन; द्या ॥ ३० ॥ भगवान्‌ परयरामजीकी गति मन॒ ओर 

वायुके समान थी । बसु, वे शघ्रुकी सेना काध्ते ही जा 

रहे थे । जहँजर्दौँ बे अपने फरसेका प्रहार करते 
निपेतुरूव्यां हतदसतवाहना \ | ।२ १ ॥ वहा-वहांँ सारथि ओर वाहनोके सपय बड़े-बड़े वीराकी 

ह वते सिव बहि, जे, कथे कट-कःटकर्‌ परथ्वीपर गिरते जाते 
४ थ ॥ २१ ॥ हंहयाधिपति अजनने देखा कि मेरी सेना 

णाजिरे रामङुडारायकैः । संनिकः उनवे धनुष, ध्वजा ओर ढा मगान्‌ 
पिवृक्णचर्मध्वजचापपिग्र ओर 1 कट-कटक्र खूनसे ख्य 
पथ रणमूमिमं गिर गये हं, तब उसे बड़ा क्रोध आया 

निपातितं दैहय आपतद्‌ रमा ३२ । ओर बह सयं भिदे किमि जा. भका ॥ ३ २॥ 
अथार्जुनः पश्चरातेषु॒बाहृभि- उसने एक साय ही अपनी हजार सुजाओसि पोच सौ 
धनुरषोपर नाण चदाये ओर परद्यरामजीपर छोड । पर 

घु बाणाच्‌ युगप सन्द्‌ | ९ | 
6 प्‌ युगपत्‌ स सन्दे । परद्करामजी तो समस्त शङ्धारियके शिरोमणि बरे । ` 
रामाय रामोऽख्रभृतां समग्रणी- जननि अपने एक धनुषपर छोडे इए बाणेसे ही एक ` 
लान्येकधन्वेषुभिरीच्छिनत्‌ समम्‌॥|३३॥ | जय सबक काट डाग ॥ २९ ॥ अव दैहयाधिपति | 
अपने हा्थोसे पहयाडं ओर पेड उखाङकर बडे वेगसे 
पुनः खहस्तरचलान्‌ मृधेऽङ्धरिषा- युद्धभूमिमे परञ्रामजीकी ओर क्षपा । परंतु परदमनी- ` ` 







ततस्ततर्छिन्न घुजोरुकन्धरा 


१ ^ ॥ १.५ ग, 4 \ 
१ ॐ १ भ] # ॥ { # 
य : प ¢ # क ि 3 
# ^ 5.1 ^ ५ 
1,“ १५१. अ 1 0 9.71 र का 


= 16, 
क 







^. 
(1 


ध १ , द) 

96 + 0. , ६१ १ 

रः न 00461 
५ ः # 


+ ५4 


# +^. कि + 
~ कि, 8. ४ "9 
५.1 £+ 4 ते ) ५ ८0 १ "ध “ १. 9 
+ 1 छु ।॥ न: ‡, | + + 1 


1 ५ च 3 










$> 





 सुर्किप्य वेगादभिधावतो युधि । ने अपनी तीवी धाखाठे फरसेसे बडी पर्तकि साय ` 
` शजान्‌ इटारेण कठोरनेमिना उसकी संपिकि समान सुजाओंको काट डल ॥ ३४॥ ` 


५ 


जब उसकी बेहि कट गयी, तव उन्होने पहाड्वी. ` 











चिच्छेद राम्‌, प्रसभ त्वहेणि ॥ 1२५) | = पोटीकी 4. तरह | ५ चा ' ह सिर क त , = १ द 
` कृत्तबाहोः शिरस्त गिरेः शृङ्गमिवाहरत्‌ । 4 ` क न कर्‌ ` 








0 | 
न ~ „~` आमद्धागवत ^~ 





| व 6 | प्रक्षित्‌ ! विपक्षी वीरोके नारकं परद्युरामजीने 
। अ्नहातुपानत्व शा ५९ । बछ्डेवेः साथ कामधेनु ल्यटा खी । बह बहत ही दुखी 
| | सयुपेत्याश्रसं पित्र परिष्धिष्ट समपंयत्‌ ॥१९॥ | हो रही थी । उरन््ोने उसे अपने लाकर 
3, = पिताजीको सप दिया ॥३६॥ ओर मादिष्म 
खक्षभं त्त्करूतं राम, पित्रे रातस्य एव च । सहस्ननाहने तथा उन्होने जो कुख किया था, सब अपने 
र्णथामास तच्छत्वा जमदग्निरभाषत ।।२७॥ | पिताजी तया मयोक्तो कड नाया । सन इ नकर 
| जमदग्नि सुनिने कहा-॥२७॥ (हाय; हाय, परञ्चराम । 
राम राम महाबाहो भवान्‌ पापमकारषीत्‌ । तुमने बड़ा पाप किया । राम, राम | तुम क्डे वीर हो; 


~ ॑ परंतु सर्वदेवमय नरदेवका तुमने व्यथं दही वघ 
दे वृथा ।२<} 
अवधीन्नरदेवं यत्‌ सवेदेबमयं इ ॥२ किया ॥ ३२८ ॥ बेटा 1 हमलोग ब्राह्मण हँ । क्षमाके 


बयं हि बाह्मणास्तातं श्वमयार्दणतां गता; । | प्रमावसे दी हम संसारम पूजनीय इए है । ओर तो 
व क्या, सबके दादा ब्रह्माजी मी क्षमाके बकसे ही ब्रहमपद्‌- 
यया लोकगुरुदवः पारमेष्ठयमगात्‌ पदम्‌ ॥२९॥। | = भत इर ह ॥ २९ ॥ शर्म शोगा धमाके 


पया रोचते रक््मी्बहमी सौरी यथा प्रभा। दारा ही सूधकी प्रमाके समान चमक उती है । सब 
शक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीहरि भी क्षमावानोंपर दी शीघ्र 
्षमिणामाद्च भगवांस्तुष्यते हरिरीश्वरः ॥४०॥ | प्रसन होते है ॥ ० ॥ वेदा | सार्वभौम राजाका वध 
= पिक्तख ब्राह्मणकी हत्यासे भी बदकर है । जाओ, भगवान्‌का 
शुर 4 { 
1 रि रोद ध) स्मरण करते इए तीर्थोका सेवन करके अपने पापोको 
तीर्थसंसेवया चांहो जहयङ्घाच्युतचेतनः ॥४१॥ | धो डारेः ॥ ४१ ॥ 
इतिं श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे 
पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ 





क कनके क क कर १ 4 
= च च ॐ च भक 


|| 
५ 
५१. 
| ! 
9 
४११३. 
13. 


व (कस्म 
-~ क = = ब 4 1 +# ४५ 


५१६ 
ठ प 
[1 
= 8. 
















॥ 7 भ्व 3 ॑ कण 
न द 9६. १.६१ र ' ् ^ ॥ 
४ > { 9 ५» १" {ति च > ५ 9" >^ ("4 ४. न 4 भ । ” व 
‰ +,“ +: ,## ) "> क 1 
॥। ++ ॐ "~ # न = ,{* च म ह 
2 2, „ # न 


१.77 भ (90 1 
१ ५ + च क [9 ऋ १ 
न +^ १1 


ग जाति १.५... ध । । 
4०" + 3: "+. + + ^> "न 1.4, † 
^ +, 19 (9 ५ अ र (4, 04 =, 169 च 
व 1 >, 11४5. 0 4-11-4 १ | 
श्वे , 
| 





व २.५ 

५4९7६ य । 

=+ ई 
क 


न न 0 
"० क > ५=कु. ऋद्धः क *ै # ऋक + नि 


ऋषैः ५ 22 [" 
4 “अ 4 > 
~ += । + 
[नी 14 ४१९८. 0 ११०६ 
<. ^ - +$ १ 
# 
4 =; 1 
7. 
त भ ॥१।६ + 


अथ षोडशोऽध्यायः 


 पर्यरामज्ीके दारा क्षन्नियसंहार ओर विश्वामिअजीके वंराकी कथा 
श्रीक उवाच श्रीद्यकदेवजी कहते है-परीक्षित्‌ ! अपने पिताकी 
यह शिक्षा भगवान्‌ परञ्चरामने “जो आज्ञाः ककर 
1 खीकार की । इसके बाद वे एक वर्षतक ॒तीथयात्रा 
संवत्सरं तीथयात्रां चरितवाऽऽश्रममाव्रजत्‌ ॥ १ | करके अपने भाश्रमपर लौट आये ॥ १ ॥ एक दिनकी 
1 बात है, परद्यरामजीकी माता रेणुका गङ्गातटपर गयी इई 
याता गङ्गायां पदममारिनम्‌ । थी । वहो उन्दोनि देखा कि गन्धर्बराज चित्ररथ कमर 
= रोभिरपद्य वी माव पहने अप्सराओके साथ विहार कर रदा 
५, ९ है ॥ २॥ वे जल खनके च्वि नदीतर गयी थीः ` 
त | । परंतु बँ जल्करीडा करते इए गन्धवैको देखने लगी - 


। क. 
१ ` । "> [~ * + 
4 + । 9 "कै ` 1 4४ ५ १ 8 @ "न~ ५ {= # नि ठ ९ 
५००८; ; - क # ६4 क, ना ते 7 ब. य {१ ६ 
नै ८ ् ॥ ५, ११.१५ "1. चव .7 ५, २ ॥ ध । 
व 15४. ..-1,. 3 १.1 ("+> ^. 
१ कः ॐ; +न ॥ त 
1.4३, . ^ ५३. है + क्न ध 





= + १ य -----~ न॑ = = प = 
न ^ ऋ = # ्ः कर्क र - 

(4 ट पए (- श नृ नुत चकै £ कन १ ~~~ अधिक द 

ध {~ ९५ र च्व 1 ड च्च्य 
। ५ मनति ९ (1 
= १८/५९ जुनवधेः यह अधिक पाठ ह ।२ 
35 ~ । ~: 
= त प 
-; च "= भ ४ ५ ४ 3 + ; 

गीः + प 
| न ज. रः 


कः 
0 १ 


गवर | ४ 
किते पे क 
"+ 43: | +++ 


न्म 





‡-; ॐ १५ 


~= 4 ` # ~> न क्वो यमक ^ ` ~ 
दिः ५-१.६ भै५ = । । 4. ९ 
4 ॥ त 
कै) चै ॥ त + ७ 
३ ॥ ५ ५ 4 


£ 


होमवेलां न ससार वििचित्ररथस्प् ॥ ३॥ 


€ 


कालात्ययं तं विलोक्य युनेः क्रापविशङ्कता । 
आगत्य कलशं तयौ पुरोधाय कृताञ्ललिः ॥ ४ ॥ 
व्यभिचारं शुनिज्ञात्ा परन्याः प्रङपिरोऽत्रवीत्‌ । 
घ्नेतेनां पुत्रकाः पापामिसयु्ता्ते न चक्रिरे ।॥ ५ ॥ 
रामः सश्चोदितःपिता भ्रातृन्‌ सात्रा सहावधीत्‌ । 
प्रभावज्ञो नेः सम्यक्‌ समाधेस्पषंथ सः । ६1 
य्रेणच्छन्दयामास् प्रीतः सत्यवतीसुतः । 

वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं बघे ॥ ७॥ 
उत्तस्थुस्ते शलिन निद्रापाय इवाञ्जसा । 


पितुविदांस्तपोवीयं रामशक्रे सुहृदधम्‌ ॥ ८॥ 
ये ऽज॑नख सुता राजन्‌ सरर्न्तः खपितुषधम्‌। 


रामवीयंपराभूता ठेभिरे शमं न कचित्‌ ॥ ९॥ 
एकदाऽऽश्रमतो रामे सभ्रातरि वनं मते । 
वैरं सिसाधयिषयो रन्धच्छिदरा उपागमन्‌ ॥१०॥ 


दृष्टागन्यगार आसीनमावेशितधियं निम्‌ । 


क 
+ द 
~~ कं 


(= (> - “ [4 = क 





् 









= 
(=. १. । 


क्ताः पुत्रकाः पापा हन्यत ५; 


 नवमस्कन्ध =.. . 


 भगवत्यु्मश्छोके जष्युस्ते पापनिशयाः ॥११॥ अच 





ओर पतिदेवके वनका समय हो गया है इस बातको 
भूल गर्यी | उनका मन कुछ-कुछ चित्ररथकी ओर चिच 
मीगयाथा॥ ३ ॥ हवनका समय बीत गया, यह 
जानकर वे महर्षि जमदन्निके शापसे भयभीत हयो गयीं 
ओर तुरत वहसे आश्वमपर चली आयीं | वहं जक्का 

कलश ॒महर्षिके सामने रखकर हाथ जोड़ खडी हो ` 
गयीं | ४ | जमदगिनि मुनिन अपनी पन्नीका मानधिक 
व्यमिचार जान व्या ओर क्रोध करके क्ा--भेरे 

पुत्रो ! इ्त पापिनीको मार डालो ।' परंतु उनके किसी 





| भी पुत्रने उनकी वह आज्ञा खीकार नदीं की ॥ ५॥ 


इसके बाद पिताकी आज्ञासे परञ्यरामजीने माताके साय 
स्र माद्यको भी मार डात् । इसका कारण यथा-वे 

















अपने पिताजीके योग ओर तपस्याका प्रमा मटीभतिं 
जानते थे ॥ & ॥ परञ्यरामजीके इस कामसे सत्यवती- 
नन्दन सहषिं जमदग्नि बहुत प्रसन्न इए ओर उन्होनि 
कहा-- बेटा | तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो 
परश्युरामजीने कहा--“पिताजी !। मेरी माता ओर सुब 
भाई जीवित हो जाये तथा उन्हें इस बातकी याद न 
रके कि मने उन्हं मारा था ॥ ७ ॥ परञ्युरामजीके इस 
प्रकार कहते ही जैसे कों सोकर उदे, सब-के-सब 
अनायास ही सकुराक उठ बैठे । पर्यरामजीने अपने 
पिताजीक्षा तपोबरङ जानकर दही तो अपने सुददोका 
वध किया था॥ ८॥ 

परीक्षित्‌ | सहस्बाइ अजनके जो ठ्डके परञ्चरामजी- ` 
से हारकर भाग गये ये, उन्दं अपने पिताके वधकी याद ` ` 
निरन्तर बनी रहती धी । कही एक क्षणके व्यि भी ॐ 
उन्हं चेन नही भिल्ता था ॥९]॥ एक दिनकी बात है, ` 
परड्रामजी अपने माइयके साथ आश्रमसे बाहर वनकी ` 
ओर गये हए यथे । यह अवसर पाकर वैर साधनेके _ ` 
व्यि सहसबराहे र्डके वरहा आ प्हैचे ॥ १० ॥ उस 
समय महिं जमदग्नि अगििशालमं कैठे इए ये 








७४. 





याच्यमानाः इषणया राममात्रादिदारूणाः । 
ग्रसद्य शिर उत्करत्य निन्युस्ते शृत्रबन्धयः ॥९२॥ 
रेणुका दुःखशोकातां निध्नन्त्यात्मानभारमना । 


र) 


राम रामेहि वातेति षिचक्रोशोचकेः सती । १३: 





तदुपश्रुत्य द्रस्थो हा रामेत्यातंवत्स्वेनम्‌ । 
स्ररथाऽऽश्रप्मासाद्य दद्शे पितरं हतम्‌ ॥ १४} 
| तद्‌ दुःखरोषामषातिंशोकवेगविमोहितः । 


हा तात साधो धर्मिष्ठ स्यक्तवास्माच्‌ खसो भवास्‌॥ 










विलप्यैवं पितुदेहं निधाय भावृषु खयम्‌ । 


॥ अगृह्य परं रामः क्षत्रान्ताय मनो दधे ॥१६॥। 
| . गत्रा माहिष्मतीं रामो ्रहध्नविहतभियम्‌ । 
4 तषी स शीर राजन्‌ मध्ये चक्र महागिरिम्‌ १७॥ 
॑ | | ध तद्रक्तेन नदीं धोरामन्रहमण्यभयावहाम्‌ । 


ौमद्धगनत 





५, 


अन १६ 





नो 


र्खा था ॥ ११॥ परञ्युसमकी माता रेणुकः बडी 
दीनताप्चे उनसे प्राथना कर रही थी; परतुं उन स्वने 
उनकी एक न सुनी । बे उल्ूतरैक महिं जमद्ग्निक्‌ 
सिर काट्कर ॐ गये । परीक्षित्‌ । वास्तवमें वे नीच 
क्षत्रिय अत्यन्त करूर थे ॥ १२॥ सती रेणुका 
दुःख ओर रोकसे आतुर हो गयीं । वे अपने ह्यं 
अपनी छती ओर भिर पीट-पीटकर जोर-जोरसे रोने 
ल्गीं-- पपरज्युराम ! बेटा परञ्चुराम ! शीघ्र आओ | १३॥ 
परञ्युरामजीने बहुत दूरसे माताका द्वा राम ! यह्‌ 
क्र्ण-कन्दन सुन ल्या । वे बड़ी शीघ्रतासे आश्रमपर्‌ 
आये ओर वयँ आकर देला कि पिताजी मार डाटे गये 
हैँ | १४ ॥ परीक्षित्‌ ! उस्र समय परश्चरामजीको वडा 
दुःख हआ । साथ दी क्रीध;, असहिष्णुता, मानसिक 
पीडा ओर शोके वेगसे वे अव्यन्त मोहित दष्टो गये । 
लाय, पिताजी । आप तो बड़ महात्मा थे । पिताजी , 
आप तो धर्मके सचे पुजारी थे। अप हमलोगोंको छोडकर 
खग चरे गये, ॥ १५॥ इस प्रकार विल्ापक्षर उन्होने 
पिताक्षा शरीर तो भाद्यांको सोप दिया ओर खयं ह्ाथमं 
फरसा उशकर क्षत्रिर्योका संहार कर डाट्नेका निश्चय 
किया ॥ १६ ॥ 

परीक्षित्‌ । परञ्यराभजीने माहिष्मती नगरीमे जाकर 
स्‌हसबाहन अञुनकरे पुत्रके सिरोसे नगरे आीचो-बीचं 
एक बड़ा भारी पव॑त खडा कर्‌ दिया | उस नगरकी 
ङोभा तो उन ब्रह्मघाती नीच क्षत्रियकि कारण हीं नष्ट 


६ “ "हतं रखा पित्वधं शत्रेऽमङ्गरकारिभि ॥१८॥ | दयो चकी थी ॥ १७ ॥ उनके रक्तप एक बड़ी भयंकर 


सदी बह निकी, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियोका हृदय 
भयसे कांप उठता था । भगवान्‌ने देखा कि वतमान 


(> तप्के चक्रे शोणितोदान्‌ हदान्‌ नृप ॥१९॥ | त्रिय अत्याचार हो गये है । इसण्थि राजन्‌ ! उन्होने 








(>? 
"ध ४ 
^ श ग ह कायेन = 
क ' ११ ४ 
[त [> # क, 
` पठ, कायन सन्धाय शिर आदाय बहिषि | 
क| 4 ^ ~ं ह त 
> 4 ई 
ष्ण क 
४५ क कै ह 
चम ५1 १५ 
~ 


५ - क = ७ ॥ 
क 9 रय ॥ 
५ हः ॥ “५ ॥॥ भक ८ 1 
क र = = *- + 
व 
॥ < (९ (म 
+> छि 4. च ~ 
1 ~ "+ दिं दे 
५ > ~ 4 ४ 
4 1 ॥ 
॥ ` #* (^ ¢ 4 
` "के. 2, १, ३५ १9 द 
॥। € 4 > ब्रू 
3 => ^ ; त. 
च+ ध 
अ € > ॥। =. "~ ६ {१० र 
५ 2 ष । त ४ ६ 
८.४ ४ ५ न र = 
क, [र 
| {~ १ ~ 
८ 3 || 
क । री च © 
ई | च । व न 
५ ग  उद्गत्र 
१ 


 देवमात्मानमयजन्मसैः ।२०॥ ठेसे-पेसे पाँच तालाब बना दिये, 


अपने पिताके वधक्षो निमित्त बनाकर इ्ीस वार प्रथवी 
को क्षत्रियदीन कर दिया ओर कुरुक्षत्रके समन्तपञ्चकं 
रक्तवे जवसे भरे 
हए अ ॥ १८-१९ ॥ परञ्यरामजीने अपने पिताजीका _ 
धिर चकर उनके धडसे जोड़ दिया ओर यज्ञोदारा 


९ दिशम्‌ *॥९ ॥२९॥ सर्वदेवमय आत्मखख्प भगवान्‌क्ता यजन किया ॥२०॥ 






< + 
क क| वषाः । २. प्त: --+--- र 
ह 9 ११.०4 १ न्‌ र्‌ ७ 
१०९५. क शै म 
= नद्य ७ च 
४ + 
ॐ ति च ॥ 
+ ९1 
क "| ह ५ 
अ: ठ 


तत्‌ ५ | 
भ # च  # 
॥ 





व ५ ~. 
"¬ 4 #1 ध 

न~ - ग क, 

1 

क द ५ 


"~>. य 





यज्ञम उन्होने पूवं दिशा होताको, दक्षिण दिर 






+ न कः [१ ¢ 4 
„ + न ४; ज्‌ ,* न 


क ~ ह, 
च्च 





श्च 
< ~+ 
= प 





५ । 
श 5 न ह 


ए 


स 


रै । # 
४ नकि । (6 क क , १ = 1 
70 = 6 = ॥ ति > # प हि ` र व ` ६२९५ [ वि (२ 
क्क , > ` = › चू + 
9 कथः 42 ह~ है क ज-- 4.१, १ 
>~ 











आजीगतं सुतानाह ज्येष्ठ एष प्रदरप्यताप्‌ ॥३०॥ 


यो घे हरिशिन्द्रमखे विक्रीतः. पुरूषः पञ्चः 






`~ व्य्य्य्व्य-------------------------------------------- व "+ "न्दी १, ई 
ऋ" कनः # क 


्रहमाको, पश्चिम दिशा अवथुंको ओर उत्तर दिद साम- 
गान करनेवाठे उद्गाताको दे दी ॥ २१ ॥ इी प्रकार ` 9 
ततश्चावभृथस्नान विधूतारोषकिरिबिष | अगनिकोण आदि विदि्ाए्‌ ऋविरजोको दी, क्दयपजीको 
मव्यभूमि दी, उपदर्टको आर्यावतं दिया तथा दूसरे 
सरसत्यां बहनां रेजे उ्यभ्र इवांशुमान्‌ ।॥२२॥ | सदस्योको अन्यान्य दिशा प्रा कर दीं ॥ २२॥ ` 
इसके बाद यक्ञान्त-स्नान करके वे समस्त पापरसि सक्त 
हो गये ओर ब्रह्मनदी सरख्तीके तटपर मेधरदित स्के 
समान शोमायमान हए ॥ २३ ॥ महषिं जमदननिको 
स्मृतिरूप संकल्पमय शरीरकी प्राप्ति ह्यो गधी । परद्यरापजी- 
से सम्मानित होकर वे सपर्भियोके मण्डले सातवें ऋषिं 
हो गये ॥ २४ ॥ परीक्षित्‌ ! कपल्कोचन जमदननि- 
नन्दन भगवान्‌ परञ्यराम अगामी मन्वन्तरमे सप्तषिंथके 
मण्डलम रहकर वेदोका विस्तार करेगे ॥ २५॥ वे 
आज भी किंसीको किसी प्रकारका दण्ड न देते इए 
ान्त चित्तसे मदेन प्वतपर निवास करते है । बहो 
सिद्धः गन्धव ओर चारण उनके चस््रिका मधुर खरसे | 
गान करते रहते है ॥ २६ ॥ सर्वैराक्तिमान्‌ विशाला ` 
भावान्‌ श्रीहरिने इस प्रकार ्रगुवरि्योमं अवतार ग्रहण ` 
करएवे पृथ्वीके भारभूत राजाओंका बहुत बार वध 
क्या ॥ २७] 





¢ यः ५.९ 
आयातंुपद्ष्रे सदस्येभ्यस्ततः परम्‌ ॥२२॥ 





सदेहं जमदभिस्त॒ रन्ध्वा संज्ञानलक्षणम्‌ । 







"षीम ण्डे सोऽभूत्‌ सप्तमो शमपूजितः ॥२५॥ 


जामद्रभ्योऽपि भगान्‌ रामः कमललोचनः । 





आशामिन्यन्तरे राजन्‌ वतयिष्यति दै बृहत्‌ २५ 







आस्तेऽ्ापि महेन्द्राद्रो न्यस्तदण्डः प्रलान्तधीः 






उपगीयषनचरितिः सिद्धगन्धर्षचारणैः ॥२६॥ 







एं शगु विश्वात्या भगवान्‌ हरिरीश्वरः । 






4 -५६,५४ 
0 8 






अवतीय परं भारं ुबोऽहन्‌ बहुक्ो दपान्‌ ।२७॥ 






महाराज गाधिके पुत्र इए ग्रज्लिति अन्निके समान ` ` 
परम तेजखी विशामित्रनी । इन्होनि अपने तपोवच्से ` 
षत्रियत्वका त्याग करके ब्रह्मते प्राप्त कर च्या॥२८॥ 
परीक्षित्‌ | विश्वामित्रजीके सौ पुत्र ये] उनमें बिचले ` 
पुत्रका नाम था मधुच्छन्दा । इसव्ि सभी पुत्र ५ 
(मधुच्छन्दाः के ही नापसे विख्यात इर ॥ २९ ॥ ` 
विश्वामित्रजीने शगुवंशी अजीगतेको पुत्र अपने २ नने 
नःदोपको, जिसका एक नाम देवरात भी थाः पुत्र्यं 
खीकार कर स्या ओर अपने पुतरसे नोर क. कहा किं (तुमरे 


गाधेरभून्महातेजाः समिद्ध इव पावकः । 
तपता श्ात्रतय॒ज्य- थो केम बहवर्च॑सम्‌ ॥२८। 
विश्वामित्रश्य चेवासन्‌ पुत्रा एकशतं सप । 










मध्यमस्तु भधुच्छन्दा मधुच्छन्दस एव ते ॥२९॥ 






पत्रं कृत्वा शुनःशेपं देवरातं च भगवम्‌ । ` 












बही प्रसिद्ध 
|  भरगुवरी खनःरोप था, जो हरिशन््रके यज्ञमे यज्ञपडकरे ` र | 
। < े | 

| रूपमे मोल लेकर था (व्वामत्र जीने 





ति चक = चेक 


1 = == 
1॥जनष स्त कत उस्‌ 


ञ्यिथा दः देवता वताअके यज्ञम यह 


4 न अ 9 (० ~ 
न कि =-=, 
[क ~ ृ- की 
























{ १ 
1 1 प पि भ 
। ५५ क. #^ = >+ 1.1 ~ + - = ^ कः ह "! 
4 ¬) 4 क 7 मिदि क ६). ८ ७ + 
# #ज इक च 4 ज ह * कं # १ श # १4 क ~= ५: 
| न |» त 4: ॥ | व्क ््ं ~शु नः ५९, कर -९ ~; षे नभुण+ (० 4 न्‌) कै प 
ति ~ *। (1 ५ +न कै < ह~ ११ नकी ५ । ह १ 6 0 स (५ छ > 1 क ७34 =. 4 
११९ (-॥ [ श * ४" ` 4 ~ स" 


1 


<-<9 ~> 9. \ ५.४१ ~ (4 ~ शि तब ‡ ५) 


^ १ 


एष भः इरिका वीरो देवरातस्तमन्वित । 


|, > १ क्रं नअ ), 
4 भकतः ~~ - 
ड ण च 
"^ "++ 
} ॥ क 
४. क । र व | 
|; 1. 
। % 


एतं कोरिक्गोतं त विशा 


1 
~. "न, ६.१ ^ 
° धः „ त्र ^ ~ # "~ = 
=> द ' { । र 
क~: भ $ द्वि = 9 ५९ प 
- = = भ्र ब्रान्त न.) २ # रम्‌ य पन्न 
२) ग) {3 नि ४ षु 
~ = 
9: 


७६ ू श्रीमद्भागवत | अ° १७ 














द्यनःदोप देवताओंद्वारा विखवामित्रजीको दिया गया था; 
अतः ‹ध्छैः रातः” इस ्॒युत्पत्तिके अनुसार गाधिवंभं 
| यह तपखी देवरातके नामसे विख्यात इआ ॥२१-२२॥ 
| विश्वामित्रजीके पुत्रमिं जो बडे ये, उन्दं ॒नःदोपको बड़ा 
माई माननेकी बात अच्छी न र्गी । इसपर विश्वामित्रजी- 
अशपत्‌ तान्निः कद्ध म्टेच्छा भवत दुजनाः॥ ३२ | ने क्रोधित होकर उन्हं शापदे दिया कि ष्दु्टो ! तुम 
| सब म्लेच्छ हो जाओः ॥३३॥ इस प्रकार जवर उन्‌चास 
| माहं म्लेच्छ हो गये, तब श्िश्रामित्रजीके वरिचले पुत्र 
| मधघुच्छन्दाने अपनेसे छोटे पचासों मायके साथ कहा-- 
यन्नो भवान्‌ संजानीते तस्मिंलिष्ठामहे बयम्‌ ॥३४॥। | "पिताजी ! आप इमकोगोको जो आज्ञा करते है, हम 
उसका पान करनेके ल्ि तैयार है| ३२४ ॥ य 
| कहकर मधुच्छन्दाने मन्त्रदरष्टा ्नःदोपको बड़ा भाई 
खीकार कर व्या ओर कषा कि हम सव्र तुम्हारे 
| अनुयायी- छोटे भाई हँ |; तव विश्वामित्रनीने अपने 
इन॒ आज्ञाकारी पुत्रोसे कडा--^तुमलोगोने मेरी बात 
मानकर मेरे सम्भानकी रक्षा की है, इसन तुमलगो 
जसे सुपुत्र प्राप्त करके मै धन्य इआ । में तुम्हे आशीर्वाद 
देता ह्र कि तुम्हं भी सुपुत्र प्राप्त होगे ॥ ३५ ॥ मेरे 
प्यारे पुत्रो ! यह देवरात श्युनः दोप भी तुम्हारे ही गोत्रका 
है । तुमलोग इसकी आश्ञामे रहना । परीक्षित्‌ । 
विश्वामित्रजीके अष्टकः हारीत, जय ओर क्रतुमान्‌ आदि 
ओर भी पुत्र ये ॥ ३६ ॥ इ प्रकार विश्ामित्रजीकी 
सतानसे कोरिकगोत्रमे कई मेद्‌ हो गये ओर देवरात- 
को बड़ा माई माननेके कारण उसका प्रवर ही दूसरा 
दो गया ॥ २७ ॥ 


देवरात इतिं ख्यातः श्चनःशेपः स भागंवः॥२२॥ 


ये मधुच्छन्दसो ज्येष्ठाः ङ्क्ल मेनिरे न तत्‌ । 
स॒ होवाच मधुच्छन्दाः साधं पश्चाश्चता ततः! 


उयेषटं मन्त्रदशं चक्रस्त्वामन्वश्चो षयं स हि । 
वि्ामित्रंः सुतानाह वीरवन्तो भविष्यथ । 


ये मामं मेऽचुगृहन्तो भीरंवन्तमकतं माम्‌ ॥२५॥ 


चा्टकहारीतजयक्रत॒मदादयः ॥२३६॥। 


¦ पृथग्िधम्‌। 


`" "ददित 


चि श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्य 


षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ 


= अथ सप्दशोऽष्यायः 
८ | ।  क्षत्रहद्ध, रजि आदि राजाँके वंशा वर्णन 
न ग्रीकं 4 श्री्युकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ ! राजेन 
# | मे आयु छी भवन्‌ सु व 1 | पुषटखाका एक पुत्र था अयु । उसके पाँच व्डके हए-- 
४ 9 म यः क ॥ १ ॥ । नदष; क्षत्रबरद्ध, रजि, राक्तिडाटी रम्भ ओर अनेना । अब 


(५९९।५।.[चवाच्‌ } < 


॥ ५ । 
ह 1" ^ ऋ ~ 
क ~ 





व क त क च्कन्क ऋकर क ` क क क = (क च कक क 


केषा = 
# ९ ^ ॥ ३ 
न्क 


= आत्मानसपयामप्त प्रहादाचरिशङ्ितः। 


१ | १ यजा तोत्त ति 




























त नवम्‌ स्कन्ध | ` अक 
ग क 
अनेना इति राजेन्दर शृणु त्र बृधोऽन्वयम्‌ । ्षतरवृद्धका वंशा सुनो । क्षत्वरदधके पुत्र ये ख॒ोत्र । सुदत्र 
शत्रचदधसुतस्यासन्‌ सुदोत्रखात्मजाखयः ।/*२॥ के तीन पुत्र इए-- काद्य, कुरा ओर गृत्समद । गृत्समदका 
काश्यः शो सृत्समद्‌ इति गृरसमदादभूत्‌ । र व | इसी, ्नकवे पुत्र य ४ 
रमक शानक यख बहद्चप्रबरा मुनिः ॥ ३॥ ४ प | र दः ^ च 9. 

का राट, राष्ट दीघतमा ओर दीधतमाके धन्वन्तरि | यही 
क्य कोशिस्तःपुत्ो रारो दी्ेतमः पिता । आयु्वेदके प्रवर्तक हैँ ॥ ४॥ ये यज्ञमागके मोक्ता ओर भगवान्‌ 
धन्वन्तरदि्धतम आयुर्वदप्रव्तकः ।। ४ ॥ | 
यज्ञथग्‌ वासुदेषांशः स्मृतमात्रातिनाशनः । | रोग दूर्‌ हो जाते हे | धन्वन्तरिका पुत्र इआ केतुमान्‌ 
तत्पुत्रः केतुमानसख यद्धे भीमरथस्ततः ।। ५ ओर केतुमानका भीपरथ ॥ ५ ॥ भीमरथका दिवोदास 


दिवोदासो दमांस्सा ओर दिवोदासका दुमान्‌- जिसका एक नाम प्रतर्दन 
सात्‌ ब्रतदन इति स्मरतः (मी वी व 


स एव शञ्जुजिद्‌ वरस ऋतभ्वज इतीरितः कुवल्याखके नामसे भी प्रसिद्ध है । द्ुमानूके ही पुत्र 
तथा उुभर्याउेति प्रोक्तोऽलकोदयस्ततः । ६॥ | अक्र आदि इ९ ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ | अर्कतो सिवा 
षषटिवषेसदस्राणि षषटिवर्ष्तानि च ओर किसी राजाने छाछठ हजार ८ ६६००० ) वषेतक 
नारकोदपरो रजन्‌ मेदिनीं बज युबा ॥ ७॥ | यवा रक पृथ्वीका राज्य नहीं मोगा ॥७]॥ अक्कका 


पुत्र इआ सन्तति, सन्ततिका सुनीथः सुनीथकरा सुकेतन, 
अ सुग 
लक्‌ सन्ततिस्तसात्‌ सुथोऽथ केतन सुकेतनका धमकेतु ओर धमेकेतुका सव्यञतु ॥ ८] 


मके 

धम्कतुः सुतस्तसात्‌ सत्यकेतुरजायत ॥ ८ ॥ सत्यकेतुसे धृष्टकेतु, धृध्वेतुसे राजा षुकुमार, स॒कुमारसे 

धृष्टकेतुः सुतस्तसात्‌ सुङुमारः क्षितीश्वरः । वीतिहोत्रः वीतिहोतसे मगे जर मगसे राजा मागंमूमिका 

बीतिहोत्रख भर्गोऽतो भागेमूमिरभून्तृपः ॥ ९॥ | जन्म इब ॥ ९ ॥ | 

इतीमे काशयो भूपाः क्त्रबद्धान्वयायिनः। ये सब-के-सब श्त्वृदधके वंरामे कारिसे उत्प 

3 < रिय नरपति इए | रम्भके पुत्रका नाम था रभस, उसे 

रम्भस्य रभसः पुत्र गम्भीरा ; ॥ | = रः 
र त्रो गम्भाराक्रिवस्वतः ॥९० गम्भीर ओर गम्भीरसे अक्रियका जन्म इआ ॥ १० ॥ ` 

तख क्षत्र रह्म जज्ञे शृणु वंशमनेनसः | अग्रियकी पत्नीसे ब्रा्णर्वंशा च । अन अनेनाक्षा वशा ` 

दस्त: त्रि ० सुनो । अनेनाका पत्र था शद्ध, द्वक चि, शचिका 

द्रस्ततः शुचिस्तसात्‌ त्रिक धमसारथिः। ११॥ रिद्‌ ओर तिहा भरसार ॥ ११॥ भवैः ` 


ततः शान्तरयो जज्ञे ृतदृत्यः स आत्मवान्‌ । सारथिके पुत्र े शान्तरय  रान्तरय आलज्ञानी होनेके ` ` 
ण कृतकृत्य थे, उन्हें स॒न्तानकी अवरह्पकता न 
रजेः पश्चशतान्यामन्‌ पुत्राणाममितोजघाम्‌ ॥१२॥ | थी । परीत । युते पुनर रजिके अवयन्त तेजली ष 


देषैरभ्यथिंतो द्यान्‌ हेन्द्रायाददाद दिवम्‌ । पाच सौ पुत्र थे ॥ १२ ॥ देवतार्भकी प्राथनासे रङि 


इन्द्रस्तस्मै पुनर्दा गृहीत्वा चरणं रजेः ॥१३॥ | वे शपने परहाद शादि शट स: जति ख | वमी: त च्व 
धव जन व र मय 

















द 


| 4५ ह 9 £ 04 ४. 
9, 9 न ५ 
९ 9 न्क चन्न 
५ ठ | | ०० ७७ । १ 
<+ „ तश 1 ~ न) 
न अवक" १ ० 4 
{~ ५ ॐ * "क षं 
+ + ५६५. 9 1 + कु 


क । 
न~ 


ग, ~~ 
+ "9 य र? = 
























[क 






पिमे नहुषस्याषनिन्द्रिाणीव देहिनः ॥ १॥ 
` राज्यं नेच्छद्‌ यति पित्रा दत्त तत्परिणामित्‌ | नहं किया; कंथोकि वह राज्य पानेका परिणिम जानता 


„ ‰ ~ --ॐ क 3 


। 


७८ ४ श्रीमद्भागवत [ अड १८ 
== ----------------- --~--~------------------- ~~~ -----------~--~-~ 
तिविष्टषं महेन्द्राय यन्तभागाच्‌ मादुः । मोगनेपर भी रजिके पुत्रान खगं नहं व्यैटाया । वे खयं 


| ञः ही य्ञोका भाग भी प्रहण करने लगे । तव्‌ गुर्‌ बरह्‌- 
गुरुणा हूयमानेऽग्नौ बलभित्‌ तनयान्‌ रमेः १५॥ स्पतिजीने इन्द्रकी प्राथनासे अभिचार विधिसे हवन 


धार मरि = किया । इसे वे धमंके मा^से भ्रष्ट हो गये | तव इन्द्र 
ठ्‌ अशितान्‌ सागांन कुथिद्धशेषितः । ते अनायास शी उन सव रिक नोक मर दाणा। 


कुशात्‌ रतिः शात्रब्द्धा्‌ सञ्जयस्तरुतो जयः॥|१६॥। | उनसे कोई भी न वचा । कष्रद्धके पौत्र कुरासे परति 
| प्रतिसे सज्ञय ओद सञ्जयसे जयका जन्म हुआ ।१३-१६। 
ततः छतः छतयापि जज्ञे हर्थने सयः जयसे कृतः छृतसे राजा हयवन, हर्यवनसे सहदेव 
सहदेवस द्वीन ओर हीनसे जयसेन नामक पुत्र 
सहदेवस्ततो हीनो जयसेनस्तु तत्सुतः \१७। | इआ ॥ १७ ॥ जयसेनश्ना सङ्कति, सङ्कतिका पुत्र था 
महारथी वीररिरोमणि जय | क्षतरवृद्धफी वंशपरम्परामे 
इतने दी नरपति इए । अव नहषवंदाश्ा वर्णन 

शषत्रबद्धान्वया भूषाः शृणु वंशं च नाहुषात्‌ ॥१८। | सुनो ॥ १८ ॥ 

"नक 00ण०्््् 
इति श्रीमद्रागवते महापुराणं पारमहस्यां संहितायां नवमस्कन्धे चन्द्र 
वंराुवणंने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ 











सद्छृतिसस्य चं जयः कषत्रधमा महारथः 


अथाशदशेऽध्यायः 
ययाति-डरिच 
्ीहुक उवाच भदयुकदेवजी कते है- परीक्षित्‌ ! जैसे शरीर- 


धारियोके छः इन्द्रिया होती है वैसे ही नहषके छः 


(8 : यतियंयातिः संयातिरायंतिगिंयतिः तिः पुत्र थे । उनके नाम॒ ये--यति, ययाति, संयाति, 


आयति; वियति ओर कृषि ॥ १ ॥ नष अपने बड़े 
पुत्र यतिको राज्य देना चाहते थे । परंतु उतने खीकार 


था । राज्य एक रेसी वस्तु है कि जो उसके दाव-पेच 
त विष्टः पुष आत्मानं नावहु्यते || २॥ | ओर प्रबन्ध आदिमे भीतर प्रवेश कर जाता है, बह 
{अ अपने आत्मखख्यको नहीं समञ्च सकता | २ !॥ जब 
भशिते ानादिन्दराप्या धर्षणाद्‌ दिसैः। | हन्दपतनी शचीते सहवाश्ष करनेवी चेटा करके कारण 
न नटषको ब्राह्मणोने च्पदसे गिरा दिया ओर अजगर बना 


"१४ 


= 
१ 










न शकृ ~ ॥+ [ब्‌ छः न र 
३६. [९8 + 1 ॥ (1 # पु शण्कदः 
र, | ऋ | { च 9 । ध क्ल, (म, 

४१९ = नस््न 

नक ¦ = छ च च, 
रि ॥ च. 

> क 

च छ) \ 


"त" जग्रत्व वे ययातिरभवन्तरपः ॥ ३ ॥ | दिधा; तब राजके पदपर ययाति बैठे ॥ ३ ॥ ययातिने 
तान ~ अपने चार छोटे मादो को चार दिशाओमिं नियुक्त कर 
` ^~ 2 लातृन्‌ श्राता यवीयसः दिया ओर खयं छक्राचायैकी पुत्री देवयानी जौर र 
= | रज दृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको पत्नीके रूपमे खीकार 





ज्र] 








१, 


= ऋ न च चा जह 


म न्ट ~ = - == 
् (॥ 


 राजन्यधिमरथोः फट्‌ विशाहः प्रतिलोष्‌ 


राजोवाच 
व्यः; शषुत्रवन्धु नाहुषः 1 ^ 
। ५ ॥ 
श्रा्ुक्र उवाच 

एका दानदेन्द्रख शमिष्ठा नास कन्यका | 
सखीसहस्रसंयुक्ता शुरुपुत्या च भामिनी ।। & 
देवयान्था पुरोचाने पष्ितदुमसङ्से । 
भ्यचरत्‌ करगीतारिनेरिनीपुरिनेऽदला ॥ ७॥ 
५! अङ यद्‌ 


ध कन्याः कपङसोचन्‌ा; | 


तीरे न्यस्य दु्लानि विजहः ्िश्ववीक्विथः। ८ । 


५4 


वीक्ष्य बजन्तं शिरिं सह देष्या इवधितम्‌ । 


सदसोच्तीयं वासांसि पयधुत्रीडिताः च्चियः ॥ ९॥ 
स।पजालवलता दाक्ला सुर्पुन्याः समन्ययत्‌ | 

सखीयं मत्वा प्रकुपिता देवयानीदसबवीत्‌ ॥१०।। 
अहो निरीश्ष्यतासखा दाखाः भ॑ हयंसाश््रतय्‌ | 
असद्धायं पधूतदती शुनीव हविरध्वरे ॥११॥ 
यैरिदं तपसा सृष्टं युखं पसः परख ये । 
धार्यते यैरिह ज्योतिः शिबः पन्थाश्च दरित॥१२॥ 


यान्‌ बन्दन्स्युपरदिष्डन्ते लोकनाथाः सरेरा 


। भवानपि विस्वात्मा पावनः श्रीनिकेतनः ॥१२॥ सात आश्रय परम पावन £ 
४ ९. धुरंजिताः । २, च साम्प्रतम्‌ । ` 





भै 
भ कक 





राजः परीक्ितने पृ्ा-मगवन्‌ ! भगवान्‌ शुक्रा 

जी तो ब्रह्मण थे ओर्‌ ययाति क्षत्रिय | द्धिर व्राह्मण 

न्या आर्‌ क्षत्रिय-वरका प्रतिखीम ८ उल्टा ) वित्राह 
| कंसे इआ १ ॥ ५ ॥ 


भ्रीदयुककेवजीने कदा-राजन्‌ ! दादवराजः वृष- 
पवाक पक बड़ी मानिनी कन्या थी । उद्का नाम थ] 
रमा । वह एक दन अपनी गुरुतुत्री दयानी ओर 
हञ।रा स्वयके साथ अपनी राजधानीके शरे उयानमें 
रहर रह थः । उप॒ उचानमें सुन्दर-सुन्दर पष्पोसे छदे 
इर अनेकों बश्च थे । उपमं एक वड़ा ही घुन्द्र सरेवर 
था । सरोबरमें कमल खिले हए थे ओर उनपर बड ही 
मधुर्‌ खरसे भोर गुंजार कर रहे थे] उसकी ष्वनिसे सरोवरः 
कातट गूज रहा था ॥ &-७ ॥ जढाशयके पास्‌ 
पंचनेपर उन सुन्दरी कन्या्ओंने अपने-अपने वच्च तो 
षारप्र रख दिये ओर उश्च तावम प्रवेश करके च 
एकदूसरेपर जर उली व-उलीचकर व्रीडा कने ठगी | ८॥ 
उसी समय उधरसे पर्वती जीके साय वरैडपर चदे इए 
भगवान्‌ राक्र आ निके | उनको देखकर सव-वी- 
सब कन्याए सकुचा गयीं ओर उन्दने श्चःपर सरोवरे 
निकल्कर अपने-अपने वख पहन व्यि ॥ ९ ॥ शीघ्रता 
के कारण शार्मिष्ठनि भन जानम देवयानीकरे वखको अपना 
सपज्ञकर पहन ल्या । इसपर देवयानी करोधके मारे 
भाग-बनरूला हो गयी । उसने कहा-॥ १० | “अरे 
देखो तो सही, इस दासीने कितना अनुचित काम कर 
डाला | राम-राभ, जैसे कुतिया यज्ञका हविष्य उडा छे 
जाय, वैसे ही इसने मेरे व पहन व्थि हैँ ॥ ११॥ | 
जिन ब्राह्मणोने अपने तपोवर्ये इस संसारकी सृष्टि वी 
दै, जो परम पुरूष परमात्मक सुखरूप है, जो अपने ` 
इृदयमं निरन्तर ज्योतिर्मय परमात्माको धारणं किये रहते 
इ गोर जिन्दाने सम्पूणं प्राणि्यके कल्याणक लि 
वेदिक मागैका निदेश क्षिया है, बड़े गोकपाठ तथा ` 
देवराज इन्दर्रमा आदि मी जिनके चर्णोकी बन्दना = 
भोर सेवा करते है--ओौर तो क्या, ल्ह्मीजीके एक ` 
मत्र आश्रय प्रम पावन विश्वात्मा सगवान्‌ भी जिनकी 




























~~~ ~~, 





























८० श्रीमद्भागवत | अ० १८ 


= कर कोक क्े। = न ~ ---------------~-------------- ~~ ~ 





चयं तत्रापि भृगवः शिष्योऽस्या नः पितासुरः | वन्दना ओर स्त॒ति करते है उन्दी ब्राहमणोमें हम 
सबसे, श्रेष्ठ श्गुवंशी हैँ । ओर इसका पिता प्रथम तो 
असद्धायं धरतवती शद्धो वेदमिवासती ॥१४॥ | घुर है, फिर हमारा रिष्य है । इसपर मी इस दुषटाने 
जेसे द्ुद्द वेद पढ़ ले, उसी तरह हमारे कपडँको 
एवं शयन्तीं शर्मिष्ठा गुरुपुत्री मभषत । पहन ल्या हैः | १२-१४॥ जब देवयानी इप्‌ प्रकार 
गाी ` देने लगी, तब शर्मिष्ठा करोधसे तिल्मिक उदी | 
„ वेक चोट खायी हई नागिनके समान छवी सौस लेने ख्गी। 
आत्महृत्तमनविज्ञाय कत्थसे बह भिश्चुकि। . उस्ने अपने दौतोसे होठ दवाकर कडा- ॥ १५॥ 
न भिखारिन | तु इतना बहक रही है ! तुञ्चे कु अपनी 
रन प्रतीक्षसेऽसाकं गृहान्‌ ब्जा यथा॥१६॥ बातका भी पता है; जैसे कौए ओर कुत्ते हमारे दस्वाजे- 
| पर रोटीके दुकड़ोके व्यि प्रतीक्षा करते है, वैसे दी 
क्या तुम मी हभारे षरोकी ओर न्वी ताकती रहती । १६। 
शामिष्ठाने इस प्रकार कड़ी-कड़ी वात कहकर गु- 
पुत्री देवयानीका तिरस्कार किया जौर क्रोधवशा उसके 
व्च छीनकर उसे कुमे ठक दिया | १७ | 
‹ रामिष्ठाके चले जानेके वाद्‌ संयोगवरा शिकार खेकते 
प्राप्नो यद्च्छया इषे जलाथीं तां ददशं ह ॥१८॥ | इए राजा ययाति उधर भा निकले । उन्हें जल्की 
ह = | भावद्यकता थी; इसल्ि कुर्म पड़ी हई देवयानीको 
खा खरं बस्तस्य राजा विवाप्तसे । स 1 
गृहीत्वा पाणिना पाणिय्जहार दयापरः ॥१९॥ | थी । इसब्ि उन्होने अपना दुद उसे दे दिया ओर 
क द्या करके अपने हाथसे उसका हाथ पकड़कर उसे 
बीरमाहोरनसी प्रेमनिभेरया गिश । नाहर निकाल ल्या ॥ १९ ॥ देवयानीने प्रेममरी वाणी- 
१ से वीर ययातिसे कहा--वीरशिशेपणे राजन्‌ ! भज 
| व शापने मेरा हाथ पकड़ा है । अव्र जवर आपने मेरा हाथ 
॥ हग्ाहोऽपरो मा भूद्‌ गृहीतायास्त्वया हि मे | | पकड लिया, तवर कोई दूसरा इते न पकडे । वीर्र् 


रुषा उवसन्व्युरङ्गीव धिता दश्टदच्छदा ॥१५॥ 


एवं विधैः सुपरपैः धिप्त्वाऽऽचायसुतां सतीम्‌ । 


शमिष्डा प्राक्षिपत्‌ कूपे बास आदाय मन्युना ॥ १७] 


तस्यां गतायां खगं ययातिशमयां चरन्‌ | 


॥  राज॑स््या गृहीतो मे पाणिः पररय ॥२०॥ 





` < कुएमे गिर जनिपर सयुश्रे तो भपका अचानक दर्शन 
"एष श्यङृतो वीर सम्बन्धो नौ न पौर्षः हआ हैः यह मगव्रान्‌का ही किया इ सम्बन्ध समश्चना 


व चाहिये । इसमे हमशेर्गोकी या ओर किक्षी मनुष्य- 
य्‌ दि दद्‌ ह 4 
। यदिदं इरया भवतो दशनं मम्‌ ॥२९॥ | की कोहं चेश नदी हे ॥ २. 1 
दः कः २ / म ब्राह्मणो म भूषिता हस्तग्राहो महाभुज । मने बरहस्पतिके पुत्र कचको शाप दे दिया था, स्स्पर्‌ 
~ = उसने भी सक्च शाप दे. दिया । इसी कारण नाह्मण 
२ नहस्पत्यसय शापाद्‌ यमदप रा ॥२२॥ | मेरा पाणिग्रहण नद्य कर सकता# | २२ ॥ 
= चास्श्चादा° | 
= “^ ९९. तजकरा पुत्र कच शक्राचायजीमे मृतसञ्जीवनी विशध्रा पठता था | अध्ययन समाप्त करके ज्र वह्‌ अपने घर 


छ मा ~ 9 भरण करना चाहा । परंतु गुरुपुत्री हनेके कारण कचने उसका प्रस्ताव स्वीकार नही 
किया । इसपर देवः नानि उक्षे शाप दे दिया किं 


 माक्षण द्द पल्मीस्पमे तराकार न 





प. ^ ह. तः (व र 9) भिः < : कः । 
व ४ "9१ -- 
+ = $ 1 ४ च 3. १ ३१-- 


+, १. 
(3 4. द्ध नि 
~, 






शव 
च ५ ४, 





[ क 1 
"= रर. ~ न ~ 
; ६८ 1 न १। शः न्व र न ४५ 
~ 
जनी + + ^ | ४; 


न # [ च 
॥ 1 5 न. चु } ्॑ 
~ = 


11" न क 3 

~ ~ कय 

# " ऋ ( ¶द्र १ नि # 
क + क -}. * 





वुम्दारी पदी इड विरा निष्फ हो जाय ।› कचने भी उसे याप दिया 











अ० १८ ] 





ययातिरनभिप्रेतं देवोपहतमो्मनः । 


मनस्तु तद्गतं बुद्ध्वा प्रतिजग्राह तद्वचः ।२२॥ 
गते राजनि सा बीरे तत्र स रुदती पितुः | 


न्यवेदयत्‌ ततः वश्क्तं शमिष्ठया कृतम्‌ २४ 
| दुमना भगवान्‌ काव्यः पौरोहित्यं विगहयन्‌। 
सतुबन्‌ इत्ति च कापोतीं दु्ित्रा स ययौ पुरात्‌ ॥२५॥ 
ृषपवां तमाज्ञाय प्रत्यनीकविवश्ितम्‌ । 


गुरं प्रसादयन्‌ मू पादयोः पतितः पथि ।२६॥ 


गवम्‌ स्कन्ध १ 
सस | 


7 मीम मीम दि किः त ह 


। 


ययातिको शाचप्रतिकूल होनेके कारण यह सम्बन्ध अभीष्ट 
तोन था; पतु उरन्योने देखा क्ते प्रारग्धने खयं ही सुतर 
यह उपहार दिया है ओर मेरा मन भी इसकी ओर शिच 
रहय है । इसलिये ययातिने उसकी बात मान ढी ॥ २३॥ 


वीर राजा ययाति जब चे गये, तत्र द्खयानी 
रोती-पीटती अपने पिता चुक्राच।यके पास पह॑ची ओर 
रामिष्ठाने जो कुछ किया था, वह सव उन्दं कः 
एुनाया ॥ २४ ॥ शमिष्टाके व्यवद्वारसे भगवान्‌ क्रा- 
चायंजीका भी मन उचट गया । वे पुरोहिताश्ी निन्दा 
करने गे । उन्हनि सोचा कि इसकी अपेक्षा तो खेत 
या बाजारमेसे कत्रूतरकी तरह कुछ बीनकर खा ठेना 
अच्छा है | अतः अपनी कन्या देवयानीको साथ लेकर 
वे नगरसे निक पड़े ॥ २५ ॥ जव वृषरप्वाको यह 
माद्म इआः तो उनके मनम यह शङ्का हई करं गरुजी 
करीं रानुर्ओकी जीत न करा द, अथवा सुञ्चे खाप न 
दे द्‌ | अतएव वे उनको प्रसनन कनेके थ्य पीछे-षीछे 
गये ओर रास्तेमे उनके चरर्णोपर सरके बल गिरं 


| गये ॥ २६ ॥ मगवान्‌ शुक्राचार्थजीका क्रोध तो 


श्षणाधेमन्युर्भगवान्‌ शिष्यं व्याचष्ट भार्गवः । 


कामोऽस्याः क्रियतां राजन्‌ नेना त्यक्तुमिहोतसहे२७ 
तथेत्थवयिते प्राह देवयानी मनोगतम्‌ । 


पित्रा दत्ता यतो यास्ये सानुगा यातु मामु ॥२८॥ 
खानां तत्‌ सङ्कटं वीक्ष्य तदर्थसख च गौरम्‌ । 


देवयानीं पयंचरत्‌ स्ीसदसेण दासवत्‌ ॥२९॥। 


नाहुषाय सुतां द्वा सह शमिष्ठयोशना । 


१. मानसः । २. मनश्च । ३. गता | 


आधे ही क्षणक्रा था । उन्न वृषपवांसे कडा- - 
“राजन्‌ । मे अपनी पुत्री देवयानीको नहीं छोड़ सकता । 
इसलिये इसकी जो इच्छा हो, तुम परी कर दो । पिर सुच 
लौट चलनेमें कोई आपत्ति न होगी" ॥ २७ ॥ जब 
वृषपवाने दीक हैः कहकर्‌ उनकी आज्ञा खीकार कर 
ठी, तब देषयानीने अपने मनकी बात कदी | उसने 
कहा “पिताजी सङ्गे जिस क्िसीको दे दः जौर मै 
जह कहीं जाऊ, राष्ठ अपनी सहेव्यिके साय सेरी 
सेवाके च्य वहीं चठ ॥ २८ ॥ 


मिष्ठाने अपने पखिरारेका सङ्कट ओर उनके 
कायका गौर देखकर देवयानीकी बात खीकार कर खी । 


वह अपनी एक हजार सहेव्यिके साथ दासीके समान `` 
उसकी सेवा करने ल्मी ॥ २९ ॥ च॒क्राचार्यजीने द- ` 
यानीका विवाह राजा ययातिके साय कर्‌ द्वा जर 
शमिष्ठाको दासीके ख्पमे देकर उनसे वह दिया ` 
तमाह राजञ्छमिष्ठामाधास्तरपे न कहिचित्‌। ३०॥ "रजन्‌! इसको अपनी सेजपर कभी न अने देना |३०॥ ` ` 


च्क्ः 
„ ~ 
= द = = # क 












<२ ॐ श्रीमद्भागवत | अ० १८ 











जो च भा क ० जः = कचि ऋ अः चि 


€ संम्रजां [क द नी पुत्रवती हो 
| जञ्छरमिष्ठा संग्रजां कचित्‌। परीक्षित्‌ | कुछ ही दिनों नाद देवय 
" ५ गयी ।*उसको पुत्रवती देखकर एक दिन शा्मिष्ठाने भी 


तमेव वरे रहसि सख्या पतित सती ॥३१। अपने ऋतुकावम देवयानीके परति ययातिसे एकान्तम 
वासकी याचना की ॥ ३१॥ शमिष्ठाकी पुत्रके 
राजप्पाथितोऽपत्ये धमं चावेक्ष्य धवत्‌ । 2 प्रार्थना धर्मसंगत है-- यह देखकर धमेज्ञ॒राजा 
सरन्छकवचः 7 ॥३२॥ | ययातिने छक्राचा्य॑की बात याद्‌ रहनेपर भी यदी निश्चय 
स्कतवः करे (९ किया किं समयपर प्रारन्धके अनुसार जो होना होगा, 
यदुः च तवसं चेव देवयानी व्यजायत । | हो जायगा ॥ २२ ॥ देवयानीके दो पुत्र इए- यहु 
ओर तुवघु तथा दृषपवांकी पुत्री रा्मिषठाके तीन पुत्र 
इए दद्यु, भनु ओर पूरु ॥ ३३ ॥ जब मानिनी ६ 
देवयानीको यह माम हआ कि रार्मिष्ठाको भी मेरे पति 
के द्वारा ही गभं रहा था, तब वह रोधसे बेुध होकर 
अपने पिताके घर चढी गयी ॥ ३४ ॥ कामी ययातिने 
मीटी-मीटी बाते, भुनय-विनय ओर चरण दबाने 
आदिकं द्वारा देवयानीको मनानेकी चेष्टा की, उसके 
पीछे-पीछे वहांतक गये भी; परतु मना न स्के ॥ २५॥ 
क्राचायजीने भी क्रोधे मरकर ययातिसे कहा- “तू 
अत्यन्त ज्ञीटम्पट, मन्दबुद्धि ओर इ्ूठादहै | जा, तेर 
शीरमे वह बुदढापा आ जाय, जो मयुप्योको कुप कर 
देता हैः ॥ ३६ ॥ 


ययातिने कहा--श्रह्मन्‌ | आपकी पत्री साय | 
विषय-भोग करते-करते अमी मेरी तृपि नहीं हई है । 4 
इस शापसे तो आपकी पत्रीका भी अनिष्ट ही है | 
इसपर शयुक्राचायजीने कडा-"भ्छा जाओ; जो प्रसनता- 
से तुम्हे भपनी जवानी दे दे, उससे अपना बाप 
बद छो" ॥ ३७ ॥ छुक्राचार्यजीने जब रेसी व्यवस्था | 
दे दी, तब अपनी राजधानी आकर ययातिने अपने | | 
बड़ पुत्र यदुसे कहा -- “बेटा | तुम अपनी जवानी स॒द्य | 
| 





द्यं चालं च पूरुं च शमिष्ठा वारषपवेणी ॥३३॥ 









गर्भसम्भवमासु्या भतंविज्ञाय मानिनी । 
देवयानी पितुर्गेहं ययौ कोधविमूच्छिता ॥२४॥ 
 श्रियामयुगतः कामी वचोभिरुपमन्त्रन्‌ | 


4 न प्रमादयितं शेके पादसंबाहनादिभिः॥२५॥। 







( शुक्रस्तमाह पितः सखीकामावृतप्रूष । 










| लां जर वितां मन िस्पणौ णाम्‌ २६ 
1 ययातिर्वाच 






|. | - अतपतोऽस्म्यय कामाना बरह्मन दुहितरिस ते । 






र 


 , व्यत्यथतां यथाक्रामं वयक्ता योऽभिधाख्यति ।२७ 


4: 1 नो 
॥१ 
















इति ऊञ्धन्यवखानः पूर्रं ज्येष्ठमवोचत । 






प 






| ह तात्‌ प्रतीच्छेमां जरा देहि निजं वयः ॥२८॥ 







दे दो ओर अपने नानाका दिया हा यह बुदापा तुम 
सकार कर लो; क्योकि मेरे प्यारे पुत्र | नै अभी 
विषयोसि तृप्त नहीं इजा द्रं । इसथ्यि तुम्हारी आयु 
रेकर मकु वर्भोतक ओर आनन्द भोगूंगाः ॥३८-२९॥ 


= व 9 ) त | यदुने कहा--“पिताजी | बिना समयके ही प्राप्त 
5 ए ्‌ | हा जापका बुढापा लेकर तो मे जीना भी नही 

















शै ^ | 
नं , "की न+ वि तः ॥ 
- ~" ~ अ 
ण ह ष ध | ॥ १ क श (र ~ न त 
ति 6११... + न 
"ॐ 4 ^ ~ ऋ 4 छ 1 न रक, + < 4: च ^ हि ७ 
~ 


| स 


~ क 
1 (कथ \.- कैः 














1 
' ८ ह णि क "4. छ 
श्‌ ४ + 
ह कः % "+ १४ ~ भ. र र - न १ 
+= "न" श + द कः ॥ न्क + ॥ © क = ^ नी ४ 
६ = बम ज + ।# क) १ =` * == क (* ४ ^ ध 1 
टि * ब ^ न ^ कै ॥ 
"1. + न र प कह्वः 3 ~~ 1 
~ + ॐ 
भु  › 












क न्क = कक , ओ 9 त ५ ॥। ब्र ढे न न 2 ~+ 
धि हि ^ क्क वि च ४. 4 ठ ^ 4 ४4 श नक र क ि बि + > च 8 # १ 
^ नथ अ । = 9 । सि. इ 
> "1 ह ~ » ऋ $ अन थ 
भ क (> = 
~ “~ | 4 द > # 
° 7 कन ध भ्‌ च #ै = 4 


| त रन न्ध ह, - करव 


+ ६. व > 
^ >, ४ + ॥, (क “युर । म 
ए 1 { = ^ + च न्व च * ~ ऋ (व ~ 4 #1 1 
ध को कि ^ क न्क मी च ई ~= कु न्त 4 * नः 0 १ © द क (6, च 1 “~ ^. क ज, ; २ क" 9 । 
॥ ~ = १ क > = # ~ + कि क ` । ् क `, 3.) 
| ० ९८ ए = 0 म ब. 1. 
। ८ „ नवि ह । नि =  । 4 
, + + " ` ~ नक, च) क 
- क ऋ 4 ( क 9; १. क च 
= ४१५७,१ च # अच्छ + 

~ य्ववव्प्य्पय्य "~ ~~~ 


' : अविदित सुखं ्राम्॑ वषयं वैति पूरुपः ॥४०। | चाहता; क्योक्ति कोई भी मनुष्य जवतक वरिषयखुका ^ 
8 ~ अनुभव नहीं कर ठेता, तव्रतक उसे उससे वैरम्य नरह 

एव मुदित ¦ पितरा दुद्यश्चानुथ भारत्‌ । होता" ॥ ४० ॥ परीश्चित्‌ | इसी प्रकार तवघुः ४ 

४ | ओर नुने भी पिताकी आज्ञा अघ्लीकार कर दी | सच 

चरूयुरध्म , 1.0, । पूछे तो उन पुत्रोको धर्मका तच माद्धम नहीं था | 
्वाचस्बुरमजञ नित्य नित्यबुद्धयः ॥४१। वे इस अनित्य शरीरको दी नित्य मने वेठे थे॥ ४१॥ . ~ 
*अव ययातिने अवस्थामे सवसे छोटे वितु णमि बडे 
अपने पुत्र पूरको बुल्कर पृछा जौर कटहा-- “वेदा । | #: 
अपने बडे भाद्योके समान तुमे तो मेरी बात 

॥ न त्वसग्रजयद्‌ वर्स मां प्रत्याख्यातुमहेसि ॥४२। | न्वी टाग्नी चाहिये, ॥ ४२ ॥ 











अपृच्छत्‌ तनयं पूरु वयसोनं गुणाधिकपू । 








पृष्ने कहा-- पिताजी | पिताकी कृपासे मनुष्यको `` 
परम पद्की प्राति हो सकती है । वास्तवमें पुत्रका शरीर ` ~ 
पिताका ही दिया हआ है । एसी अवस्थामे पेष कौन 
है, जो इस संसारमे पिताके उपकारका वदत चुका 
सके {॥ ४३ ॥ उत्तम पुत्र तो बह है, जो पिताकरे मन । । 
की वात बिना कहे ही कर दे । कहनेपर श्द्धाके साथ च 
आज्ञापाख्न करनेवाठे पुत्रको मध्यम कहते हँ । जो 
आज्ञा प्राप्त होनेपर भी अश्रद्धासे उसका पाचन करे 
वह अधम पुत्र है । ओर जो किसी प्रकार भ पिताकी 


ूरुर्वाच 
को नु लोके मनुष्येन्द्र पितुशत्मटृतः पुमान्‌ । 
प्रतिकतु क्षमो यख प्रसादाद्‌ विन्दते परम्‌ ॥४३॥ 


उत्तमश्चिन्तितं छात्‌ प्रोक्तकारी तु सभ्यमः। 






ई ~ प 0) ११. 2 > {4 0.4> 







॥ ५३ । ह 4 छ * 
{८ 4. 1: ५ 240) 


> 1 





अधमोऽश्रद्धया इयादकर्तोचरितं पितुः ॥४४॥ 








इति प्रमुदितः परुः प्रत्यगृह्णाज्जरां पितुः । 
परीक्षित्‌ | इस प्रकार कहकर पूरन बड़े अनन्दसे अपने ` = 
पिताका बुदापा खीकार कर व्यि । राजा ययाति मी 
उसकी जवानी ठेकर पूर्ववत्‌ विषर्योका सेवन करने _ 
चे ॥ ४५ ॥ वे सतं द्रीपके एक्च्छत्र सम्राट्‌ थे । 
पिताके समन मलीर्माति प्रजाका पारुन करते थे । 
उनकी इन्द्रियम एरी शक्ति थी ओर वे ९५ र यथा- 
पराप्त िषर्योका यथेच्छ उपमोग करते थे ॥ ४६ ॥ देव- 
( यानी उनकी प्रियतमा पत्नी थी । वह अपने प्रियतम 
प्रेयसः परमां प्रीतिषवाह प्रेयसी रदः।॥४७॥ ययातिको अपने मन, वाणी, दारी रीर म उ ौर र वर | 

न. | दिन-दिन ओर भी प्रपन्न : 
ङ कुभिर्मूरिषिभैः । | इख देन ना ययाति 
| वेदमयं ` हरिम्‌ ।\४८॥ ८1 | से दं बड़ी-बड़ी दक्षिणा यजन किया ॥ ४८ ॥ 





सोऽपि तदयक्षा कामान्‌ यथावज्जुयुषे सृप ॥४५॥ 









सप्दरीपपतिः सम्यक्‌ पिवत्‌ पारयन्‌ प्रनाः। 








यथोपजोषं विषयाञ्जुजुषेऽब्याहतेन्द्रियः ।॥४६॥ 





देवयान्यप्यनुदिनं मनोवाग्देहवस्तुभिः । 





क ~) 


क 
= + ~ न्मन 


| | |... ८४ ीमद्धागवत  अ०° १९ 


# "ग र 
् थ = क 
1 








(| _ असिभिदं विरचितं व्योम्नीव जरद्‌।वलिः । | जैसे आकाशम दलके-द बादल दीखते ह ओर कभी 
(9 | नही भी, दीखते, वैसे ही परमात्माके खरूपमं यह जगत्‌ 
खप्न, माया ओर मनोराञ्यके समान कल्पित है । यह 
कमी शनेक नाम ओर रूपोके रूपमे प्रतीत होता है, 
ओर कभी नहीं भी ॥ ४९ ॥ वे परमात्मा सबके हदय- 
तमेव हदि बिन्यख वासुदेवं गुहाशयम्‌ । मे विराजमान हैँ । उनका खूप सूष्षमसे भी सूक्ष्म है | 
सवंशक्तिमान्‌ स्व्यापी मगवान्‌ श्रीनारायणको 
अपने हृदयम स्थापित करके राजा ययातिने निष्काम 
मावसे उनका यजन किया ॥ ५० ॥ इस प्रकार एकः 
इ = 3 हजार वषतक उन्होने अपनी उच्छृष्घल इन्दियोके साथ 
एवं वपसह्ञाणि मनष्ठमनःसुलमू। | मनको जोडकर उसके प्रिय विधर्ोकतो मोगा । परत 
इतनेपर भी चक्रवर्तीं स॒म्राट्‌ ययातिकी भोगोसे तृपति न 

विदधानोऽपि नातप्यत्‌ सावंभीमः कदिन्द्रियेः ५१ । हो सकी ॥ ५१ ॥ 


"भ "व्व्न्दरक 
इति श्रीमद्धागवते मह्वापुराणे प।रमहं्यां संहितायां नवमस्कन्ये- 
ऽषादसोऽष्यायः ॥ १८ ॥ 
नधन 
म वि शो | 
अथेकोनविशोऽध्यायः 
यय।तिका गृहत्याग 
श्रीक उवाच ीश्यकदेवजी कते है- परीक्षित्‌ | राजा ययाति 
इस प्रकार ख्ीके वशम होकर विषयोका उपभोग करते 
¦ = : | र्दे । एकं दिनि जब अपने अधःपतनपर दृष्टि गयी 
#  इद््ाभ्रियय निविष्णो गाथामेतामगायत १ ॥| | तन उन्दं बङा वैराग्य हा ओर उन्ोने जपनी प्रियः 
हि ~ पत्ती देवयानीसे इस गाथाका गान कतिया ॥ १ ॥ 'मयु- 
` . ` ~" 5 
। श्रृणु भागव्यमूं गथां मह्विधाचश्तिं थवि। नन्दिनी | तुम यह गाथा सुनो । प्रथ्वीमें मेरे ही समान 











नानेव भाति नाभाति खञममायापनोरथः ॥४९॥ 


॥ 
नु - - जो नतक क क कत ७ क द स्‌. ~न ध 
> र > ~ त~ अर + 
र हशः # द्र ^ 





प 


रौ 
को किक चैर ` कडि = 


नारायणमणीयां चं निराश्ीरयजत्‌ प्रथम्‌ । ५०॥ 


ते ११ ) 
नक 


> क 7 णका 5 पा क प 
, 'क्रर्य ~ 


न 
थ्‌, ^^ हि ५ (५ न त ५३॥ = 
^ । 


अ क. 
1... 
+ त ७ ^ ७ 


त क ^ क क (क 
णः 
कक - > 9५.927 = -ईै` # 


= ~ 4. ~ 5 णः 


"= ष १ क क कके 
"न कः 3 
नि त र) 
~ = 9 =-@ ` ~ ति क 
द "५ > यि 


= , क न = 
बरं ष इ~ तः 
न 


$ 
> [1 4 ४. ह 
1 + = 4, धः < क्‌ कनकेन चने + = 4 अ+) कचन क स 
४ कः "> ' पवन 2. = = 3 4) ^ च 3 3 + ठ ४) ष त ` र क # ॥ 
^" {+ ~ "(~ 91. > † 
५१.१४ (+ १५४. । \ ॥ । 
# # 










भ्व १, ` न ऋ ष्य, दे, ` 
= --8 + भ~ = नजन 


।  सहत्थमाचरन्‌ कामा्‌ स्ेणोऽपएहवमात्मनः । 


व वरिभयीका यह सत्य इतिहास है । रसे ही प्रामवासी 
धीर यख्ालशोचन्ति वते ग्रामनिवासिनः || २॥ | विषयी पुरुमोके सम्बन्धे ` बनवाती जितेन््ि पुरुष 
भ {4३ ॑ दुःखके साथ विचार किया करते है कि इनका कल्याण 
ने कवि विचिन्वन्‌ प्रिथमात्मनः। | केसे होगा १ ॥ २ ॥ एकः था बकरा | वह वनमें अङ्गे 
४ ही अपनेको प्रिय क्गनेवाली वस्तु दरंहता इआ धूम 
= रहा था । उसने देखा कि अपने कर्मवशा एक बकरी ¶ 
या उद्धरणं ; कामी विचिन्तयन्‌ द गर पड़ है ॥ २॥ वह बकरा बड़ा कामी या | 9 
व  " ।। वन्तुय्‌न्‌ वह सोचने ठा कि इत बकरीको किप प्रकार कूर्पसे 
हि रवं वेण रोती निकाला 1 उसने अपने सीगसे कूएके पासकी 
= “(< (भपणप्रण राधसा ॥ ४ ॥ । धरती खोद डाटी ओर रास्ता तैयार कर च्य ॥ ४॥ 
















॥ व 
[ 
कत 


व 


6 १ 
४१ । 4 १ 





> ध हि 0 
न य „ ^ व क ५४. 
= 8 व 







प्र ॥ (+) न चान ग~ चावि क ~ अ तिः न "तः र 
| ^“ ॥ १० >।-चभ्‌ ९१ इसुपे ॐ [ग “2 [य्‌ नेष छ  ानिन-* , ` 
4 कछ +` ०. §  । 4 9 अ ( [1 श | 6 1 |: “ 
र हं 9 





अ° १९ | 





नवस्‌ स्कन्धं `“ 


"व 





सात्तीयं इपात्‌ सुश्रोणी तमेव चकमे श्षिल । 
तया दृतं समुद्र्य बह्योऽजाः कान्तकामिनीः ।५। 
पीवानं इमं रेष्ठ मीद्ां सं याभकोदि द्‌] 
स॒एकोऽजड्षस्तासां बह्वीनां रतिवर्धनः । 
रेमे कामग्रहग्रस्त आमानं नावयुष्यत ॥ ६॥ 
ष्ठतमया 


तमेव रममाणमजान्यया | 


बिरोक्य इूपसं विभा नामृष्यद्‌ बलकर्म तत्‌ ॥ ७॥ 
तं दुह सदरपं॒कामिनं क्षणसीहृदभ्‌ । 
इन्द्रियारामञ्त्वुज्य खामिनं दुःखिता ययौ ॥ ८॥ 
सोऽपि चाजुगतः सरेण; पणस प्रसादितुम्‌। 
ुवेन्निडविडाकारं नाशक्तोत्‌ पथि संधितुम्‌॥ ९॥ 
तस्यास्तत्र द्विजः कश्चिदजाखाम्यच्छिनद्‌ रषा । 
लम्बन्तं इषणं भूयः सम्दधेऽ्थाय योगवित्‌ ।॥१०॥ 
सम्बद्धवृषणः सोऽपि ह्यजया कूपलब्धया । 
कालं बहुतिथं भद्रे कामेनाचारिं तुष्यति ॥११॥ 
तथाहं कषण, सुश्च भवत्याः परमयन्त्रितः । 
आत्मानं नाभिजानामि माहितस्तब मायया ॥१२॥ 


यत्‌ पृथिव्यां व्री हियबं हिरण्यं पशवः सियः। 


च दुद्न्ति मनःप्रीतिं पुः कामहतस्य त्‌ । मनश पुसः कामहतख ते ॥१२॥ 


तम्हारे प्रेमपाशमें ब॑धक्षर मै भी भव्यन्त दीन हो गया । 
| तुम्हारी मायासे मोहित होकर भै अपने-आपको भी 


१. घोरं | २. र्तमजया | ३. कामसवि° | ४, उुदन्‌ विडव्ड० |: ` ` ~ ब छः >. 





जव बह सुन्दरी बकरी वुरसे निकी, तो उसने उस + 
बकरेसे ही त्रम करना चाहा । बह दाद्री-मूखमण्डित 
बकरा इट-पुष्ट, जवान, वकरिरयोको छख देनेवाल; 
विहारफुराक ओर बहत प्यारा था | जब दूसरी बकरा 
ने देखा कि कुमे गिरी इई बकरीने उसे अपना प्रेमपात्र 
चुन च्या है, तवर उन्हनि भी उसीको अपना पतिं बना 
किया | वे तो पहडेसे दी. पतिकी तव्मशमे थी । उस | 
बकरेके सिरपर कामरूप पिशाच सवार था । बह अकेन 
ही बहृत-सी बकयियेकि साथ विहार करने खगा ओौर 
भपनी सब सुध-बुध खो वेव ॥ ५६ ॥ जव उसकी 
कुरमेसे निकाढी इई प्रियतमा बकरीने देखा कि मेरा 
पति तो अपनी दूसरी प्रियतमा बकरीसे विहार कर रहा 
दै, तो उसे बकरेकी यह करतूत सहन न इई ॥ ७॥ 
उसने देवा किं यह तो बडा कामीं है, इक प्रेमका 
कोई भरोसा नदीं है ओर य मित्रके रूपमे शतुका काम (8 
कर रहा है | अतः वह बकरी उस ईद्धियगेटुप बकरे. | 
को छोड़कर बड़ दुःखसे अग्ने पाठनेवालेके पास ची _ ` ` 
गयी ॥ ८ ॥ बह दीन कामी बकरा उसे मननिकेष्यि 
भमै" करता हआ उसके पीडे-पीछे चला | परंतु उसे _ ` ` 
मागमे मना न सका ॥ ९ ॥ उत्त बकरीका स्वाभी एकं & 
ब्राह्मण था । उसने क्रोधे भाकर बकरेके खटकंते इए 41 
अण्डकोषको काट दिया । परंतु फिर उस वकरीका ही 
भल[ करनेके च्य फिरसे उसे जोड भी दिया । उसे 
इस प्रकारके बहुत-से उपाय माद्धम थे ॥ १० ॥ प्रिये | 
इस प्रकार अण्डकोष जुड़ जानेपर वह बकरा फिर कु 
से निकली हई बकरीके साथ बहत ॒दिनोतक विषय- 
मोग॒करता रा; परंतु आजतक उसे संतोष न. 
हआ ॥ ११॥ सन्दर ! मेरी भीदयदीदशादहै। 


न 11 0) ती 1, « @ ~» 4 
व 92 त जवी ५११, = श न 









भूल गया हर ॥ १२. ॥ 


प्रिये । पथ्वीमे जितने भी धान्य (चावल जो आदि) १. 











<& . क  शीमद्धामवत ॥ अ० १९ 


रि यययो कक = जन "क ऊन च्छक २० सनता पककच्छन द्छकन्रया न कच्छः हिकष्ड 8 दनव 8 ९ शष छर ७ = = = "७ ह द अआ छ्वाण्या एकानन) अ जाक "का च ठ 9 ठो > = चरि © "द क 5४७ | ~ मया ० क न 
[रि न षि 











न जातु कामः कामानाघुपभोगेन शाम्यति । के प्रहारसे जज॑र हो रा है ॥ १३ ॥ विष्के मोगने- 
| से भोगवासना कभी शान्त नही हो सकती । बत्कि जैसे 
धीकी शाहृति डालनेपर भाग ओर मड़क उती है 

हविषा छष्णवत्मव भूय एवाभिवधंते ॥१४॥ काग ववो ता) 
नः पुतन जब मनुष्य किंसी भी प्राणी ओर किसी भी वस्तुके साय 

यदा न इरुते भावं ११. रागद्वेषा भाव नहीं रखता, तब बह समदं हो जाता 
व सः । है तथा उसके स्यि सभी दिशा सुखमयी बन जाती 
५९९, साः समया दिशः ॥१५। ह ॥ १५॥ विषर्योकी तृष्णा हयी दुःखोका उद्गमस्थान 
है । मन्दशुद्धि गोग बड़ी कठिनाईसे उसका त्याग कर 
सकते हँ | शागीर बढा हो जाता है, पर त॒ष्णा नित्य 
नवीन ही होती जाती ह | अतः जो अपना कल्याण 
चाहता है, उसे शीप्र-से-सीघ्र इस तृष्णा ( भोग-बासना ) 
का त्याग कर देना चाये ॥ १६ ॥ ओर तो क्या- 
अपनी मा-बहविन ओर कन्यके साथ भी अकेले एक आसन- 
पर सरकर्‌ नही बेठना चाहिये । इन्द्यँ इतनी बल्वान्‌ है 
| किं वे बडे-बडे विद्वार्नोको भी विचलति कर देती 
| स क तिवत द ॥ १७ ॥ वरिपर्योका वारवार सेवन करते-करते मेर 
# णं वहतं मे मरिषयान्‌ सेवतोऽसदरत्‌ । एक हजार वष प्रर हो गये, फिर मी क्षण-्रतिक्षण उन 
त भोरगोकी खल्सा बढती ही जा रही है ॥ १८ ॥ 
^ तथापि चा्षबन दष्णा तेषूपजायते ॥१८॥ | इसब्धि म अव मोगोकी वासना-तष्णाका पाग करके 
५ भपना अन्तःकरण परमात्माके प्रति समपिंत कर -दूंगा 
|  तसादेतामह त्यक्वा ब्रह्मण्याधाय मनसम्‌ | ओर शीत-उण्ण, खुख-दुःख आदिक मासे ऊपर उठकर 
ध. अहकारसे सुक्त हो हरिनोके साथ वनमें विचरूगा । १९ । 
| | निद॑न्दो निरहकारथस्ष्याभि मगः सह ॥१९॥ लोकप्ररलेक दोनेवि ही भोग असत्‌ हे एषा समन्नकर 
| न तो उनका चिन्तन करना चाहिये ओर न भोग ही | 
समञ्लना चाये कि उनके चिन्तनसे ह्वी जन्ममृल्युरूप 

तम्‌ ड्ज नानुध्यायेन्न सित्‌ | ससारकी प्रापि होती है ओर उनके मोगसे तो 3 
नार ह्वी ह्यो जता है | वास्तवे इने रष्ठस्यको जान- 
व सुति क कर्‌ इनसे श्रा रहनेवाखा ही आसक्ञानी हैः ॥ २० ॥ 


। इयु्तवा नाहुषो जायां तदीयं पूरवे बयः परीक्षित्‌ । ययातिने अपनी पलीसे इ प्रकार क- 
दत्वा कर्‌ पूरको जवानी उसे गश दी ओर उससे अपना 
बुदरापा 2 च्या । यह इसस्ि किं अब उनके चित्तमे 
िष्याकी वासना नही. रह गवी थी ॥ २१॥ इसके 


या दुस्त्यजा दुर्मतिभिजींय॑तो या न. जीय॑ते । 


| । „तां दष्णां दुःखनिवहां शमंकामो दुतं त्यजेत्‌ ॥१६॥ 





॥ ॥ मात्रा खला दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्‌। 









५ ^  बरवानिन्दरियग्रामो विद्वांसमपि कषति ।॥१७।१ 










~ 5 त =, 

१ 7 ऋ 4 4 
१. 
११ ¢. च = 

(ॐ 7, १ ३ ' ¢. 
, ^ + षक 
कै # ॥ 


+<“ 


++ = 
9 १ 2, ॥१८१५..४ 
$ 1 क, 


1» 


4 


4 %६ 
+} 9 


सस्ति चात्मनाशं च तत्र विद्वान्‌ स आतमदक्‌ |२०। 


~ 
। *\ कै द 









अती सं च उदी मलुमीश्व्‌ ॥२२॥ 











बाद उन्दने दक्षिणधवे दिने द्यु, दक्षिणमे यदु, 
पश्चिमे तुषु ओर उत्तरे जलुक्तो राज्य. दे दिया॥२२॥ ` . 


अ० २० | 


भूमण्डरुख सवेय पूरुपरहतमं विशाम्‌ । 
अभिषिच्याग्रनांस्तस्य वे खाप्य वनं ययो ॥२३॥ 
आसेवितं वर्षपगान्‌ डव विषयेषु सः 


` क्षणेन भुवे नीदं जातपक्ष इव द्विजः ॥२४। 


स॒ तत्र॒ निर्भक्तसमसतसङ्ग 
आत्माञुभूत्या विधुतत्रिशिङ्गः । 
परेऽमले त्रणि वासुदेवे 


लेमे गतिं भागवतीं प्रतीत; ॥२५ 
धत्वा गाथां देवयानी मेने प्रस्तोभमात्मनः । 


स्रीपुंसोः स्नेहवेङ्कव्यात्‌ परिहासमिवेरितम्‌ ॥२६॥ 
सा सनिवापं सुहृदां प्रपायामिव गच्छताम्‌ । 
विज्ञयेश्वरतन्त्राणां मायाविरचितं प्रभोः ॥२७] 
सवत्र सङ्गयुत्युज्य खमौपम्येन भार्गवी । 
कृष्णे मनः समावेदय व्यधुनोषिङ्गमात्मनः ॥२८। 


नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे । 


गतम्‌ स्कन्ध 


त ~ 


सारे मूमण्डलक्री सस्त सम्पत्तिपेकि येग यतम पात्र पको 
अपने राज्यपर अभिषक्त करके तथा बडे मादर्योको उसके 

पीन बनाकर्‌ वे वनमें चङे गये ॥ २३ ॥ यदपि राजां 
ययातिने बहत वर्पोतक इन्दि्योसि विषर्योका सुख मोगा 
या- परंतु जैसे पाख निकल अनेपर पक्षी अपना 
धोसल छोड़ देता है, वैसे दी उन्डोनि एक क्षणमें ही 


सब्र कुछ छोड दिया ॥ २४ ॥ वनम जाकर राजा 


ययातिने समस्त आस॒क्तियेसि चुटी पा टी । आत- 
साक्षात्कारके द्वारा उनक्गा त्रिपुणमय लिङ्गशरीर नष्ट हो 
गया । उन्होने माया-मकसे रहित पर्रह्म परमात्मा 
वाघुदेवमे मिलकर वह भागवती गति प्राप्त की, जो बड़े 
वड्‌ भगवरान्‌के प्रेमी संतोंको प्राप्त होती है ॥ २५॥ 


जब द्रयानीने वह गाथा सुनी, तो उसने समञ्ना 
कि ये मुञ्चे निदृत्तिमाग $ च्वि ्रोत्साहित कर खे &। 
क्योकि जी-पुरुषमे परस्पर प्रेमके कारण विरह होनेपर 
्रिककता होती है, यह सोचकर ही उन्होने यह बात 
हेसी-हंसीमें कही है ॥ २६॥ खजन-सम्बन्धिर्योका- 
जो ईश्वरे अधीन है-एक स्थानपर इक्टा हो जाना 


वा ही है, जैसा प्याऊपर पथिकोका । यह्न सब 


मगतरानकी मायाका खेर ओर खप्नके सरीखा ही है । 
एसा समञ्चकर देवयानीने सब पदार्थोकी आसक्ति त्याग 
दी ओर अपने मनको भगवान्‌ श्रीकृष्णे तन्मय कसे 
बन्धनके देतु लिङ्गदारीरका पस्त्याग कर दिया- वह 
मगवानूको प्राप्त हो गयी ॥ २७-२८॥ उसने भगवान्‌- 
को नमस्कार करके कडा--^स॒मस्त जगत्‌के रचयिता, 
सबान्तयामी, सवके आश्रयखख्प सवशक्तिमान्‌ मगवान्‌ 
वाञ्जुदेवको नमस्कार है । जो परम शान्त ओर अनन्त 


सवभूताधिव्रासाय चान्ताय बृहते नमः ॥२९॥ | तच है, उसे भँ नमस्कार करती द" ॥ २९ ॥ 





इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे 
एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ 
कैन 


विंशोऽध्यायः 


पूरके वंशा, राजा दुष्यन्त ओर भरतके चरिजका वणेन 


श्रीक उवाच 
प्वध्यामि यत्र जातोऽभि भारत । 


शरीश्यकदेवजी कहते है - परीक्षित्‌ ! अ्र सै राजा 





पूरके वंशका वणन करूगा । इसी वंरामें तुम्हारा जन्म 


९. वेदितम्‌ । २. बिभेः । ३; प्राचीन प्रतिम ‹ययातेः इतना अभिक पाठ हे । ४. बादरायणिरुबाच | 


^ क च श ~ च 
ट जे ् +कः न्क 
"= 0 ~ [५२ शः 2 ->+ - च न 
† ह १ = (> ~> > ^ ॥ च" ऋऋ > ` 
च ५.4; =; [अने १ ~ भदः -{ १ - ५४ (- क 9 = ९, व्‌ =: सि ४ क 4 क 
* | ‡ प > - > 4 छ - ॥ क > > ९ ++ त्प ९ ४ ४ ५३ १ 
६६. + ष 9. (मिनन) अ, १९ "र म [त 7 कु त द ति. + 
1 त भ ध + १ { १ व +. > ऋ ॥ 9 
५ - < ~ 9) ध ~ > न १3 9 ‡ 
१ =, ~ न्द 4 नवि १ ~ क 
"क * ह । [ि 


` ¢ । 
चै १६ 4 ~: ५३ क | 6 #ै । 
॥ #ै क: १. १ ५ 16 २.४ (1 (9 ९ १५1 १२ 44८ 


। 2 ५ न॑ ५: 9) #१ 
+ । व र १ ननि 














] # # ॥} 
4 4, 4 


५, $ 4 
न, (४ +®, =" अ ~ 
# 4 0. १६: #" ` | ॥ + 3 







द 
ॐ क + रः 


त 





____ 





हआ दहै । इसी वंशके वंशधर बहुत-से राजप्रि ओर 
ब्रहम भी इए हैँ ॥ १.॥ प्रुका पुत्र इआ जनमेजय । 
जनमेजय प्रचिन्वान्‌, प्रचिन्वानका प्रवीरःग्रवीरका नमस्यु 
ओर नमस्युका पुत्र इआ चारुपद ॥ २॥ चारुपदसे खुदयुः 
सुदुसे बह्नगव, बह्गवसे संयाति, संयातिसे अदंयाति ओर 
अहंयातिसे रौद्राश्च इआ ॥ ३ ॥ परीक्षित्‌. ! जंसे 
विश्वात्मा प्रधान प्राणसे दस इन्दयाँ होती है, वैसे ही 
घृताची अप्राके गर्मसे रद्राश्चके दस पुत्र इए- ऋतेयुः 
ुक्षेयु, स्थण्डिलेयु, कृतेयु, जजेयु, सन्ततेयु, घमेयुः 
सव्येयु, त्रतेयु ओर ससे छोटा बनेयु ॥ ४-५ ॥ 
परीक्षित्‌ | उनमेसे ऋतेथुका पुत्र रन्तिमार हआ ओर 
रन्तिमारके तीन पुत्र इए-- सुमति, धुर ओर अप्रतिरथ । 
अप्रतिरथके पुत्रका नाम था कण्व ॥ ६ ॥ कण्वका 
पुत्र मेधातिथि इआ । इसी मेधातिथिसे प्रस्कण्व आदि 
ब्राह्मण उत्पन इए । सुमतिका पुत्र रेभ्य हआ, इधी रेभ्यका 

पुत्र दुष्यन्त था ॥ ७ ॥ 
एक बार दुष्यन्त वनम अपने कु सेनिकोके साथ 
शिकार खेकनेके व्यि गये हएथे | उधर ही वे कण्व 
मुनिके आश्रमपर जा पचे । उष॒ आश्रमपर देवमायाके 
समान मनोहर एक खी बेदी हई थी । उप्षकी ल््मीके 
समान अङ्गकान्तिसे वक आश्रम जगमगा रहा था | 
उस खुन्दरीको देखते ही दुष्यन्त .मोहित हो गये ओर 
उससे बातचीत करने लगे ॥ ८-९ ॥ उसको देखनेसे 
उनको बड़ा आनन्द मिला | उनके मनम कामवासना 
जग्रत्‌ हो गयी । थकावट दूर करनेके बाद उन्न बडी 
मधुर वाणीसे सुपकरते इए उससे पूखा--॥ १० ॥ 
(कमल्दल्के समान सुन्दर नेत्रोवाटी देवि | तुम कौन 
हो ओर किसकी पुत्री हो १ मेरे इदयको अपनी भर 
आकर्षित करनेवाली सुन्दरी! तुम इस निजेन वनम 
रहकर क्या करना चाहती हो १ ॥ ११॥ उन्दी । 
नै स्यष्ट समक्ष रहा ह किं तुम किसी क्षत्रियकी कन्या 
ए हो, क्योकि पूस्वरिर्योका चित्त कमी अधमंकी ओर 

1 थम रमते कवित्‌ ॥१२॥ | नद श्वकताः ॥ १२॥ 
"£ % र < क 9 शाकुन्तलाने का-आपका कहना सव्य दै ! पँ 
^ । विश्वामित्रीवी पुत्री दर । मेनका अप्सराने सुसञे भनमे 


यत्र राञर्ष॑ो चर्या बहमवंश्याथ्च जज्ञिरे ॥ १॥ 
जनमेजयो ह्यभूत्‌ पूरोः प्रचिन्ां्त्सु तस्ततः । 
प्रवीरोऽथ नमस्य तसाव्वारुपदोऽभवत्‌ ॥ २ ॥ 
तस्य ॒सुदयुरभूत्‌ पुत्रस्ससाद्‌ बहुगवस्ततः । 
संयातिस्तसखाहंयाती रौद्राश्च्तत्युतः स्मृतः ॥ २॥ 
ऋतेयुस्तख ङकषेयुः खण्डिकेधुः कतेधुकः । 
लेयः सन्ततेयुश्च धर्मसत्यव्रतेयवः ॥ ४ ॥ 
दधतेऽप्सरसः पत्रा वनेयुश्चावमः स्यतः । 
घताव्यामिन्द्रियाणीव युख्यख्य जग रात्मनः ॥ ५।' 
तेयो रन्तिभारोऽभूत्‌ त्रयस्तश्यात्मजा सृप । 
सुमतिर्ध॑वोऽप्रतिरथः कण्बोऽग्रतिरथात्मजः ॥ & ॥। 
॥ / , तखमेधातिथिस्तसात्‌ ्रस्कण्वाचया द्विजातयः । 
4 पुत्रोऽभूत्‌ सुमतेरेभ्यो दुष्यन्तस्ततसुतो मतः ॥ ७॥ 
/ ` दुष्यन्तो सरगयां यातः कण्वाश्रमपदं गतः । 





















॥  तत्रा्ीनां खप्रभया मण्डयन्तीं रमामिव ॥ ८ ॥ 
/ विलोक्य सो यहे देवमायामिव स्यम्‌ । 








॥ बभाषे तां वरारोहां भटः कतिपयः ॥ ९॥ 





॥ ~ 
 ! ~ 
{श द ११६ 9 --4 
। तदशंनप्रय॒दितः संनिदृत्परिभ्रम 
[~ = = 
४ ॥ .4 ॥ ३ ¶ ४ र # = 
| ष < 












। पप्रच्छ छ कामसन्तप्तः प्रहसञश्णया भिरा ॥१०॥ 


क 


॥ कालं कमलपत्राधि कस्यापि हृदयङ्गमे । 










> पर ननः चि! इ~ 
त य षितं सत्न भवत्या निजने वने ॥११॥ 








व्यक्ते राजन्यतनयां वेदुम्यहं त्वां सुमध्यमे । 











8 मद्धागवत अ | 





अ० २०] 





वेदेतद्‌ भगवान्‌ कणो वीर फं करवोम ते १२१ 


खहा ह्यरविन्दाक्ष गह्यताग्रहणं च नः । 


सज्यतां सन्ति नीवारा उष्यतां यदि रोच 


दुष्यन्त उवाच 


४॥। 


उपपन्नमिदं सुभ्र॒ जातायाः इुश्िकान्धये । 





खयं ह रणते राज्ञा कन्यकाः सदशं परस्‌ ॥१५॥ 
॥ ओभितयुक्तं यथाधयपुषयेमे शङन्वलास्‌ । 


गान्धबेविधिना २।जा दे्फाङचि 


षित्‌} १६।। 
अमोधवीथ राजेषिबषहिष्यां वीर्यमादपे | 


# | 


ोशृते खपुरं यातः काङेनाद्त सा सुतस्‌ ॥ १७; 
कण्वः ङुमारख यने चक्रे सथुचिताः क्रियाः । 
बद्‌ध्वा सृगेन्द्रसतरसा ऋीडति ख स वाङश्ः ॥१८॥ 
६ दुरत्ययदिक्रल्तमादाय प्रमदोत्तमा | 
हरेरंशांशसम्भूतं भतुरन्तिकिमाममत्‌ ॥१९॥ 
यदा न जगृहे राजा भायापुत्रावनिन्दितौ 
शृण्वतां सवभूतानां खे वागाहाशरीरिणी ॥२०॥ 
माता अल्ला पितुः पुत्रो येन जातः सष ए सः । 


भ्रख पुत्रं दुष्यन्तं मावमस्थाः श्डन्तसम्‌ ॥२१॥ 





ए ` 
| छोड़ दिया या । इस वातके साक्षी है मेरा पाटन-पोषणं 


य क क ----- ---------- 
छ " ' गि 








करनेवाठे महप्रिं कण्व । वीररिरोमणे । मै आपकी क्या 
सेवा करं १ ॥ १२॥ कमलनयन । आपः यह व्यिं 
ओर दम जो कुछ भपका खागत-स॒त्कार करं, उसे 
खीकार काजिये । आश्रममें कुछ नीवार ८ तिनीसा भात ) 

& ¦ आपको इच्छा हो तो भोजन कीजिये ओर जचे ` 
तो यहं व्हरियि ॥ १४ ॥ 


दुष्यन्तने कहा-श्ुन्दरी ! तुम कुिकवराने 
उत्पनन इइं हो, ` इसल्े इस प्रकारका आतिध्य-सत्कार 
तुम्हारे योग्य ही है; क्योकि गजकन्यारं स्वयं द्वी अपने 


योग्य पतिको वरण कर ल्या करती है | १५ ॥ 


राङुन्त्रकी स्वीकृति मिल जानेपर देर, कार ओर 
रञ्च आज्ञाको जाननेवाठे राजा दुष्यन्तने गान्धर 
बिधिसे धर्माुप्ार उक्के साथ विवाह कर ल्य) 1 १६॥ 
राजप दुष्यन्त वाय अमोष था | रात्रिम वह रहकर 
दुष्यन्ते रकुन्तत्यका सवात किया ओर दूसरे दिन 
सबेरे वे अपनी राजघानीमे चटे गवे । समय अनेपर्‌ 
राङुन्तत्यको एक पुत्र उत्पन्न इअ ॥ १७ ॥ महं 
कण्वने वनमे ही राजक्ुभारके जातकर्म आदि संस्कार 
विषिषूक सुम्पन किये | वह बालक वचपननें ही इतना 
बख्वान्‌ या श्रि वड़-वडे धिको बन्धूक ध छता 
ओर उनसे खेखा करता ॥ १८ ॥ 


चह ॒बाठक्र भगवानक्ता अंशांशावतार था । उसका 
बल-विक्रम अपरिमित. था । उसे पने साथ ठेकर ` 
एमणीरत्न शाङुन्तला पने पतिकरे पाप गयी । । १९ ॥ 
जब राजा दुप्यन्तने अरनी निद पनी नौर पुत्रको ` 
स्वीकार नहीं क्रिय! तव जिक्ञा वक्ता नह दीख रहा 
था ओर जिसे सव्र लोगोने सुना, रेकी आकाशवाणी 
इई ॥ २०॥ पुत्र उत्यनन कलमे माता तो केवल 
धोकनीके समान है । वास्तवे पुत्र पिताका ही ड, ` = 
ककि पिता ही पुत्रके स्थम उन्न होता है, इल्ि 
दुष्यन्त । तुम शङरुन्तखका तिरस्कार न करो, अपने 
पुत्रका भरणपोषण करो ॥ २१॥ राजन्‌ । वंशकी 
बृद्धि कएनेवाल पत्र अपने पिताको नरके उनार लेता 










| 
¢: | त्वं चाख धाता गभस्य सत्यमाह शङन्तला ॥२९॥ 
। 


पितथंपरते सोऽपि चक्रवतीं महायशाः । 
महिमा गीयते तख हरेरंशथुबो डवि ।॥२३॥ 
चक्रं दश्चिणहस्तेऽख ¶अकोशोऽख पादयोः । 


ईजे महाभिषेकेण सोऽभिषिक्तोऽधि राड्‌ विशः २४। 


पश्चपश्चायत्ता मेष्यैगं्गायामनु वाजिभिः 
भीमतेयं पुरोधाय यष्नायामनु प्रथः ॥२५। 


अष्टसप्रतिमेध्याश्चान्‌ बबन्ध प्रददद्‌ वसु । 


क क क जत कको ज - कि 
५ ॥ 
* 


॥ । भरतख हि दोष्यन्तेरभिः साचीगुणे चितः । 


सहस्रं बदरो यसिन्‌ तरह्मणा ग। विभेजिरे ॥२६॥। 









 ।  अयविशच्छतं श्वन्‌ बुध्वा विखापयन्‌ नृपान्‌ । 
| ं  ।  दोष्यन्तिरस्थगान्मायां देवानां गुरुपाययो । २७ 


पगानछदतः इष्णन्‌ हिप्येन पीतान्‌ । 
। 


1 § | “ र अदात्‌ कमणि मष्णारे नियुतानि चतुदश ॥२८]। 


ह 
५ 












(न क 1 = सं 
किरातहूणान्‌ 
2; ङ क. 
~ 


ः पा ‰ 
एधाच्‌ पाः ¶ 


[ अ० २० 











हे । शाछुन्तल्यका कहना विल्छुछ टीक है । इस गभंको 
धारण कशनेवाठे तम्हीं होः ॥ २२ ॥ 


परीक्षित्‌ ! पिता दुष्यन्तकी मृष्यु हयो जानेके बाद 
वह परमयरास्वी बाकर चक्रवती स॒घ्राट्‌ इआ । उसका 
जन्म भगवान्‌ अंसे इआ था । आज भी पृथ्वीपर 
उक्षकी महिमाका गान किया जाता है ॥ २३ ॥ उसके 
दाहिने हाथमे चक्रका चिह था ओर पैरोमें कमल्कोषका | 
महाभिषेककी विधिसे राजाधिराजके पदपर उसका अभिषेक 
हआ । मरत बडा राक्तिराटी रजा था॥२४॥ 
भरतने ममताके पुत्र दीध॑तमा मुनिको पुरोहित बनाकर 
गङ्ातटपर गङ्गासागरसे केकर गङ्गोत्रीपयन्त पचपन पवित्र 
अश्वमेध यज्ञ किये ओर इसी प्रकर यसुनातटपर्‌ भी 
प्रयागसे केकर यमुनोत्रीतक उन्होने अटहत्तर अद्वमेध 
यज्ञ किये । इन सभी यज्ञो उन्होने अपार धनराशिका 
दान किया था । दुष्यन्तक्रुमार भप्तका यज्ञाय अग्नि- 
स्थापन बड़ ही उत्तम गुणवाले स्थानम किया गया था | 
उस स्थानम भरतने इतनी गए दान दी थींकिं एक 
हजार ब्राह्मणोमे प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक बद्र 
( १३०८७ ) गौरं मिली थीं ॥ २५२६ ॥ इस 
प्रकर राजा मरतने उन यज्ञम एक सौ तेतीस 
( ५५-[-७८ ) घोडे बोधकर ८ १३३ यज्ञ॒ करके ) 
समस्त नरपतिर्योको असीम आश्वयमे डल दिया | इन 
यज्ञोके द्रारा इत लोके तो राजा भरतको परम यश 
मव्य ही, अन्तमे उन्होने मायापर भी विजय प्राप्त की 
ओर देवताओके परमगुर भगवान्‌ श्रीहरिको प्राप्त कर 
न्या ॥ २७ ॥ यज्ञमे एक कमं होता है “मष्णारः 
दकम भरतने सुवर्ण॑से विभूषितः खेत दंतिवाके तथा 
काठ रगके चौदह ख हाथी दान क्वि॥२८॥ 
रतने जो महान्‌ कम किया, वह न तो पहटे रोई 
रजा कर सका था ओर न तो अगे ही कोईकर 
सकेगा । क्या कमी कोई हासे खगेको द्रं स्ता 
है १॥ २९ ॥ भरतने दिग्विजयके समय किरातः द्रण 
यवन, अन्ध्र, कङ्क, खड, शक ओर म्टेच्छ आदि 


म विलाच्‌ | समस्त ब्राहमणद्रोही राजाओंको मार डद ॥ २० ॥ 


त 
त ॥ 
"०. च 








| च 
| 
6 
१ 





जित्वा पुरासुरा देवान्‌ ये रसौकांसि भेजिरे । 
देधज्ियो रसां नीताः प्राणिभिः पुन एहर्त्‌ ॥३१॥ 
स्वेकामान्‌ दुदुहतुः प्रजानां तख रोदसी । 


समाज्ञिणवतदशतीदिशचु चक्रमवर्तयत्‌ ।।३२॥ 


स सम्राड्‌ रोकपालाख्यमधयमधिराट्‌ भियम्‌ । 
च चास्खरितं प्राणान्‌ मरषेत्युपरराम हे ।॥२२॥ 


२ 2, वैद ¢ 
तस्यासन्‌ चप वद्भ्यः परन्यलिः सुसम्मताः । 


जध्टुस्त्यागभयात्‌ पुत्रान्‌ नाजुरूपा इतीरिते ॥२४॥ 


ठस्येवं धितथे वंशे तदथं यजतः सुतम्‌ । 


मरुत्स्तोमेन मरुतो भरद्राजगुपाददुः ॥३५॥ 


अन्तरटन्यां भावृपल्यां मथुनाय बहस्पतिः । 


रुतो वारिति गभं शप्त्वा बी॑मवासुजत्‌ ।॥३६॥ 


तं त्यक्तुकामां ममतां भवत्यागविशङ्किताम्‌ । 


श 





प्रहे युणमें वच्वान्‌ असुरोने देवतापि विनय ब्राप् म | 
कर्‌ ली थी ओर वे रसातलम रहने रगे थे, उस समय वे 


बहत-सी देवाङ्गनाओंको रसातलम के गये थे । राजा 
भरतने करसे उन्हं छुडा दिया ॥ ३१ ॥ उनके राञ्य- _ । 
म पृथ्वी जीर आकार प्रजाकी सारी अव्र्यताए्‌ पण 
कर देते थे । भरतने सत्ताईस हजार वतक समस्त 
दिदार्ओका एकच्छत्र शसन विधा ॥ ३२ ॥ अन्तमं 
सार्वभौम सप्राट भरतने यदी निश्चय किया किं लोक- 
पार्योको भी चकित कर देनेवाला रेख, सावभौम 
सम्पत्ति, अखण्ड शासन ओर यह जीवन भी तिष्या ही 


द । यह्‌ निश्चय करव वे संसारसे उदाप्षीन हो गये ] ३३॥ | ॥। 4 

















परीक्षित्‌ । विदभराजकी तीन कन्याएं सघ्राट्‌ 
भरतकी पलिया थी । वे उनका वडा आदर भी करते ये | 
प्रतु जन भरतने उनसे कह दिया कि तम्हारे पुत्र मेरे 
अनुरूप नहीं है, तब वे उर गयीं कि कीं सम्राट ह्मे 
त्याग न॒दं । इसव्ि उन्दने अपने वर्च्वको सार ` | | 
डाला ॥ ३४ ॥ इस प्रकार सम्राट्‌ भरतका वंश वितथ ` 
अथात्‌ विच्छिन्न होने ठ्णा | तन उन्होने संतानके 
य्ि “मरुत्स्तोम' नामका यज्ञ॒ किया । इससे मरद्रणेनि 
प्रसन्न होकर भरतको भरद्वाज नामका पुत्र दिया ॥३१५। 
मरद्राजकी उव्पत्तिका प्रसङ्गं यह ह कि एक बार 
बृहस्यतिजीने- अपने भाई उतथ्यकी गभव्रती पत्नीसे 
मेथुन करना चाहा । उस समय गभमे जो वु | 
( दीधतमा ) था, उतने मना क्या । कितु बहस्पतिः श 
जीने उसकी बातपर ध्यान न दिथा ओर उसे (तू अधा ` 
हो जाः यह शाप देकर बल्पूषक्‌ गमाधान कर्‌ 
दिया ॥ ३६ ॥ उतथ्यकी पत्नी ममता इसु बातसे : 
गयी कि कहीं मेरे पति मेरा त्याग न कर दे | 
उसने ब्रहस्पतिजीके द्वारा होनेवाठे 
देना. चाहा । उस समय देवता 
नामका निवचन करते इए यह 
























॥.' 


[क 
ं # 
४. 
क 
४ 


त, 


ष्क ५ + = चव : 





‡ =-= - < 










त › इत का ह स भ्रण-पोषण कर ( भर ) । 
` - नु नद 


छ र ( ५ ४५ । ९-८ॐ | च पते 
र ४4 चु ह ५ 

तानं कद्ा--चहस्पते . यह मर पतिक 
{भ + पे ॐ ५ है + ५. + -*~ ५ ५ ५५. 


द वक्यं कवकाया 


व +" 





ञं न्दू ५.4 | कः ५ / » -- र क. 
2 ४ श्रीमद्भागवत [ अ० २१ 


ठ 
| 
>» ` > 
¢ ॥ 
1. १ हि~: 
~ +. 


| . ` यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरदाजस्ततस््य 





काय काक कचो कक जका 








कत फलार जनवति 
= अनो, = 


म्‌ ॥३८॥ | नही, हम दोनोका ही पुत्र है; इपतल्ये तम्दीं इसका 

भरण-पोषण क्रो । इस प्रकार आपसमे विवाद करते 
` | हुए माता-गिता दोर ही इघको छोडकर चले ` गये | 
4 . द्व्य इस क्डेका माम 'मरद्राजः इञ }} ३८ ॥ 
| देवताओके द्वारा नामका रेक्षा निवंचन होनेपर मी 
 चोधसाना सुरंरेवं सत्वा वितथमात्मजम्‌ । ममताने यही समज्ञा किं मेरा यह पुत्र वितथ अर्थात्‌ 











[पी भीीिरौ 





4 अन्यायसे पैदा इं है । अतः उसने उस बच्येको 
¢ छोड दिश । अव मरुद्रणोनि उसका पालन किया 
धः ओर जव राजा भरतक्रा च्च नष्ट होने लगा, तव उसे 

॥ लाकर उनको द दिया । यही वितथ ( मशद्राज ) 

“1 व्यद्युजन्‌ मरुताऽिन्रन्‌ दत्तोऽयं वितथेऽन्वये! २९।। | भरत्का दत्तक पुत्र इभा ॥ ३९ ॥ 

^ ->->¢<« <€ 

( इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहस्यां संहितायां नत्रमस्क 

~: व्िंरोऽष्यायः ॥ २० ॥ 

क; द | £ ह | 

द अथेकर्विशेऽध्यायः 

द । ` 3 तंरा यथय, शाखा सहिसदेशवी सथा 

| ` ^ श्रीक उवाच . धीशयुकदेदजी कये € --परीक्षित्‌ | बितय अथवा 















भरद्राजका शूत्र था यन्यु | मन्युके पाच पुत्रे इए्-- 
वित्तथयख सुवो मन्युबहरशषत्रो अर्यस्ततः; । वृहतक्षन; जय, महावीयं, गर ओर गर्गं | नरक पुत्र 


| था सृति ॥ १ ॥ संजतिकि दो पुत्र इर--गृरु ओं 
र (1 :-2 1611 श सङ्क्रतिस्तु देष ¶। | 
1 महावीर्यो नरो गगः सङ्ढतिस्तु नरात्मजः ॥ ९॥ रन्तिदेध । परीक्षित्‌ ! रन्तिदेनका निर्मरु यश्च सस 


लोक ओर्‌ परलोके सव जगड नाया जतः है ॥ २ ॥ 
| ध 1 श | क <: | रन्तिदेव आकारके पमान निना उशीगक ही देवव 
9२ तदेव हि यश्च इहाप्रुत्र च गीते ।! २ ॥ ¦ प्राप्त वस्वुका उपभोग करते ओर दिनोदिन उनकी 
` वियद = प्रजी षटती जाती । जो कुछ पिल जाता उते मी दे 
गित ददतो रब्धं रन्धं बु््तः। = | अन्ते नोर लयं मे रते । 8 संगहपरिगद, ममते 


रहित तथा बड़े धैयशाटी ये ओर अपने कुटुम्बे 
धीरसख स्कटम्बख शीदतः ॥ २ 
सीदतः ॥ ३॥। साथ इःख भोग रहेये॥ ३॥ एक बार तो लगातार 


शिदिदशन्धपिषतः चिल | अडताटीसन दिनि एसे बीत गये किं उन्हे पानीतक 

पीनेको न मिल । उनचासत्रै दिन प्रातःकाल ही उन्हे ` 
तोयं प्रातशपस्थितम्‌ | ४ ॥ | कुछ धी, खीर, हख्रा ओर जल मिला ॥ £ ॥ उनका 
दपर ४ ५, जातवेपथोः] | पिर बढ़े शङ्कटमे था । भूख घौर प्यासके मारेवे 
4 अ 
= ° ० भ्तिामस्य चागमत्‌॥५। करना चाहा, त्या ही एक ब्राह्मण अतिथिके रूपमे आ 


व 
| * (€ | ¢प्रर्‌ {-1 द पि. ५ अधिक 
ॐ । ॥ च्‌} १1. [(* ( । 


ए अधिक है| २, सुतान्‌ वश्ये बृह° । 


रन्तिदेवश्च सडकृतेः पाण्डुनन्दन । 


न कष्णे 
~ 

न्न न 

[1 9 


=> , ~~ ५ 













++ 
४ +< 0 "भप जद + ~ >> = द, = + 
ति == ॥ द (१ 
7 - ध: ढः ` प 
4 


-- न = > - -- “` 











अ० र १ र | ४१. ॥ ५ छै =, | > चक ध, रः र र | 
भ -------- ५ 











------~-~-~-- न्व प्छ व्ट वा = कन्यकया पो ०2 अच्छ ॐ ८9० "किया. ख चछ चा क्या चि भज जन कनक आकट्‌ @ जा, ॐ. ह ००, "0 7781 17111 
1 1 क 


च प" ` ऋ पि च 7 च. ण जण भी = अः जी चाज आः ` क क 


कः = = ------- | 
तस्म सज्यभजत्‌ सोऽन्नमाद्त्य भ्रद्यानिदः। | गया ॥ ५ ॥ रन्तिदेव सवभ श्रीभगवान्‌कै ही दशन 





क्रते ये । अतएव उन्दमे वड श्रद्रासे आदूक 
हरि सरवन शं 1 क उसी अन्नपेसे ब्रह्मणी भोजन कराया । ब्राह्मणदवतां 
स सपश्यस्‌ ख शुरत्वः प्रयया {इचः 11 8 |! | मोजन करदे च गय ॥ ६ ॥ 


-= [सि क 2 1 10 1 श) ~ ्ः 
त नक ऋ = 





| अथान्यो भो्यमाणस्य तिभकरस्य पे । | परीक्षित्‌ | अ अनको रन्तिदेने आपर्मे 


दोट ध्या ओर भोजन करना चाद्य । उसी सम्य एक 
(नभक्तं व्यभजत्‌ रस्म वृषलाय हरिं खर्‌ \। ७1! दूरा श्-अतिथि आ गया | रन्तिदेषने मगवानूका 


















| याते दद्र तन्याऽग ट्‌ तै ४ श भरष्ट ९ } स्मरण करते इए उस व इप्‌ अन्नमंसे मी 7 ।॥ । 
१ राद्के रूपमं आये अतिपिको खिला दिया ॥ ७ ॥ । 
॥ रजच्‌ भे दीयतायतन्तं सगणाय वुशुश्चते !! ८ ।} । जब चष खा-पीकर चला गया; तव कुर्तोको व्यि इष । 
स आ्याव््टं थद एक ओर्‌ अतिथि आया । उसने कहा--राजन्‌ ! भै ` _ 
` -"-त्मतराशच्ट यद्‌ बहुमानपुरस्छदस्‌ । ओर मेरे ये कुत्ते बहुत भूखे & ¦ हमे कुछ खानेको | 
तञ्च ठम्खा स = छर [जये न्तदेवये ४ 
च द्वा नगरे म्यः शप्तये विशः }। ९। स॑ । ८ ॥ रन्तिदेवने अत्यन्त अआदरमा्रसे, जो । 
ङ बच रहा था; सव-कौ-स्व उसे दे दिया ओर 1 
पानीयमाभररच्छेषं तचैकपरितपणय्‌ | भगवन्मय हकर उन्होने कुत्ते ओर कु्तेके खामीके 
| रपम अयि इए स्गवान्खयो मसस्वरर विया॥९॥ 
पसखतः पुरक उऽस्यगद्‌का द्चन्चुभख से ।। १०} | अव केवल जल ही बच रह था ओर वह भीं केवट । 
1 एक मनुष्यके पीनेभरा णा | वे उसे आपसे बौव्कर ` 
तख तां कर्णां वाचं निशम्य बिपुरुध्रमाध ॥ 
9. | पीना ही चाहते थे कि एक चाण्डार ओर आ पर्वा । __ । 
कृपया भृशसंतक्ष॒ शद माहा वचः {\११।। | उक्त कश सत्यन्त नीव द । स्च जल गि 
ध | दा जिय! ॥ १० ॥ चण्डाली वह कर्णाप्रणं वाणी, ` ^ 
ष म समयेऽटं शतिमीचचस्‌ { परा | जिसके उच्वारणमे मी वह अत्यन्त क्टपारह्ाथा, 
गट ० सुनकर रन्तिदवि दयसे अव्यन्त सतप हो उठे ओरये ` 
"द क्तामरुननव्‌ च| | अमृतमय वचन कहने लगे ॥ ११५ न्न मन्वान 
आति प्पदयेऽखिरदेहभाजा- | आलं सिद्धयोसे युक्तं परम गति नह्य चाहता । ओर 4 
। तोक्या, म मोक्षी मी कामना नहली करता] तै 
| मन्तःखता थेन भवन्त्यदुःखाः; ॥१२।। | चाहता ह तो केवल यही कि यै सम्पूणं प्राणियेके ` (| 
इदमे सित हो जाऊँ ओर उनका सरा दुःख ही ` र 5 
। ुत्तट्भमो भात्रपरि्रमश सहन करू जिससे ओर किंपी थी ग्राणीको दुव 
5 नहो ॥ १२॥ यह दीन प्राणी जछ पी करके जीना 
~ दैन्यं कमः शोकविषादमोहाः । । चाहता था । जल दे देने इरे जीवनी सि 
1 = गयी रिथिल्ता, ` 





जिनीविषोजीयलसा्पणाल्मे . ॥१३॥ सव जाते खे । पै सखी हो गया ॥ १३ ॥ . ` 


थ, # ऊ भये. न~ न गर्वः 


५ ९ 4 (क) , [त ष 
< ~ -§ न ~~. = 4 
ॐ > ५ ^ ४ "द २ 
हि > क २ ॐ, "अद्‌, ^ ॥#: 
न न क 
क ~+ 









` ` ९. माये | ३. तस्येति कड० । 





५ न 6 + 

„२ न्क) 3. ॥ नन 43 £ > क्क ह, ४ 
च र (कक न ५: 0 ॥ न, 2 

भ ~ नः 

> ~ 2 ५ ~ 

॥ 1४ 
क (९ 
।॥ वि 








= हि 7 षी अ यणो चिणि चोः = चका क भा यो चिणि = चत" ग = चि 


इति प्रभाष्य पानीयं भ्रियमाणः पिपाप्तया । इस ्रकार कहकर रन्तिदेवने वह वचा हआ जल भी उस्‌ 
चाण्डाच्ो दे दिया । यपि जके विना वे खयं 
पुल्कसायाददाद्धीरो भिसगंकशष्णो सपः ॥१४॥ | मर रहे थे, फिर भी खमावसे ही उनका हृदय इतना 
करुणापूणं था किं वे अपनेको रोक न सके | उनके 


तस्य त्रिथुवनाधीशाः एरुदाः फलमिच्छताम्‌ । धेयक्री भी कोई सीमा है १॥ १४॥ परीक्षित्‌ । 
ये अतिथि वास्तवमं मगवान्‌की रची इई मायाके ही 


आत्मानं दर्शयाश्व्घ्पाया विष्णुविनिर्भिताः ॥१५॥ | विभिन रूप थे । परीक्षा परी हो जानेपर जपने भक्तोकी 
अभिलाषा परणं करनेवाले त्रिभुवनशखामी ब्रह्मा, विष्णु 

सवै तेभ्यो नभर्छस्य निःसङ्गो विगरसपहः | ओर महेश-- तीनों उनके सामने प्रकट हो गये ॥१५॥ 
रन्तिदेवने उनके चरणोमें नमस्कार किया । उन्हें कुछ ~ 


वासुदेवे भगवति भक्तया चक्रे मनः परम्‌ ॥१६॥ | चना तो था नही । मगवानूकी कृपासे वे आसक्ति ओर 
६ स्यहासे भी रहित हो गये तथा परम प्रेममय भक्तिपात्रसे 











क्र क क क क , ^# +य च न 
हि ४१" श = * रि 
[1 र ५" न ४ + क 
¢ ~ + % 
गक्ष तो 7 कि "तन 0 कको ~ १ = कित ८ क 
त ॥ ५ ॥) 1 वन # 





















|  रारम्बनं चतं र्वतोऽनन्यराधसः | अपने मन॒को भगवान्‌ बाघे तन्मय करर दिया | 
| कुछ भी मागा नही ॥ १६ ॥ परीक्षित्‌ ! उन्द भगवान्‌- 
) | य के प्षिवा ओर किसी मी वस्तुकी इच्छ तो थी नहीं 
^ माया गुणमयी राजन्‌ खप्नवत्‌ ` २ ५ 

१ मथ राजन्‌ खपनवत्‌ मरत्यरीयत ।॥१७॥ उन्होने अपने मनको प्रूणरूपसे भगवान्‌ कग दिया । 
3 | द रनतिदेवालुबतिनः । नष्ट हो गयी ॥ १७ ॥ रन्तिदेषेके अनुयाथी भी उनके 


५ अ ५ सङ्गके प्रभावसे योगी हो गथे ओर सब मगवानूके ही 


गगाच्छिनिसततो मागः त्राह्‌ जंहा यवर्पत । मन्युपुत्र गगंसे शिनि ओर शिनित्ते गारग्थका जन्म 
" दुरितक्षयो महावीययात्‌ त्य त्रय्यारुणिः कविः ।१ ९] | इञा । यद्यपि गाग्यं क्षत्रिय था, किर भी उसे ड 
ध पुष्करारुणिरित्यत्र ये ब्ाह्मणथतिं गता; | . | बरा्मणवंरा चला । महावीयका पुत्र या दुसतिक्षय ॑ 


 बहतत्रस पूोऽभूदधसी दध्नाम्‌ ॥२०॥ दुरितक्षयके त न पुत्र इए चच्यरुणि, कविं ओर 
व वीरो मी पुष्कराणि । ये तीना ब्राह्मण हो गये । बहत्षत्रका पुत्र 
` अ परुमीटथच हस्तिनः हा हस्ती, उसीने हस्तिनापुर बसाय 

 ।  अजमीटय व्याः स्युः प्रियते | 1 

क - स्यु धाद्यो द्विजा।।२१॥ | हस्तक तीन पुत्र थे--अजगीढ, द्विमीढ ओर परुभीढ । 

: 9 इहदिषृस्तस् पुत्रो बदद्भलुः अजमीढके पुत्रम प्रियमेध आदि ब्राह्मण इए ॥ २१ ॥ | 
॥  उश्तकयत्ततसतस्य पुत्रे आसीजयद्रथः ॥२२॥ | इन्दी अजमीढके एक पुत्रका नाम था ब्हदिषु । 
तत्सुता विशदस्तसख सेनजित्‌ समजायत | ह पुत्र इञ बद्ध, ब्हद्धलुका चहत्काय 
र चहत्कायका जयद्रथ हआ ॥ २२ ॥ जयद्रथका 

| { १ दटदयुः काश्यो वत्स तत्सुताः ॥र्‌ ३॥ | पुत्र इ विर ओर विशादका सेनजित्‌ । सेनजित्के ५ 
क ५ र वत्सु | २३ ॥ रुचिरादवका पुत्र पार था ओर पारका 

- ४ वो नीपल = उगत त्वभूत्‌ ॥२४॥ | ्रथुसेन । पारके दूसरे पुत्रका नाम नीप॒ था । उसके 

९» 213 “4 ५ ऽत ६ ब्रह्मण्यवरतत॑त | ४ चर्यो यस्य ° | ९ 

त ५ (~ - क 9 | ¦ 


४ 
च च ९ + क ~ 
$ 4 दभ अ क मि "न्ट ~ 4 
2 1 + 





\^“ 4 








त्ख सत्यधृतिः पुत्रो धजुवद्‌ विशारदः । के पुत्रका नाम था शरान्‌ 1 एक दिन उवैसीको ठे 








य --------------- तीम य 


चक व्क 7 नी णी जद न भि भः कि" चकि जि ऋ ऋः भिः ऋ कि चि ऋक 


° ॐत शुककन्यायां ब्रहदत्तमजीजनत्‌ | | सौ पुन ये ॥२४॥ इपी नीपने (खया)*# ककी कल्या ¢. र 
छवीसे विवाह किया था । उससे ब्रह्मदत्त नामक पुत्र 
स योगी गवि भार्यायां विष्वसेनमधात्‌ सुतम्‌॥| २५ | उन्न हणा । ्रदत्त वडा योगी था । उने चपनी 
पत्नी स्रखतीके गभ॑से विष्वक्सेन नामक पुत्र उत्पन्न 

जेगीपन्योपदेरेन योगतन्त्रं चकार इ | | किया ॥ २५॥ इी विष्वक्सेनने जैगीषव्यके उपदेरसे 
योगशाखकी रचना की । विष्वक्सेनका पुत्र धा उदक्‌- 
खन ओर उदकूस्बनका भल्त्यद्‌ । ये सब बरहदिषुकरे वंशज ५ 
३ "इए ॥ २६ ॥ + 
यवीनरो द्विमीढसख ृतिमांसस्मुतः सतः । दविमीढका पुत्र था यवीनर, यत्रीनरका कृतिमन्‌ । 
नाम्ना स्यत्रतिर्यसखय दटनेमिः ुपार्त्‌ | २७] | कृतिमानका सत्यधृति, सत्यध्रतका द्ढनेमि ओर्‌ दृढनेमि- ` | 
। 





उद््खनस्ततस्तसाद्‌ भल्सादो बार्हदीषवाः ॥२६॥ 


; का पुत्र सुपारवं इआ ॥ २७ ॥ सुपासे छुमति, 
प ५ १ । हः 
उपात्‌ सुमतित्तसख पुर; सन्तिमांसतः । सुमतिसे सननतिमान्‌ ओर सन्नतिमानूसे कृतिका जन्म 


छृतिहिरण्यनाभाद्‌ यो योगं प्राप्य जगौ स पट्‌ [२८] | इआ । उसने हिरण्यनाभसे योगव्रिवा प्रात की ची ओर 


संहिताः पराच्यसम्नां पै नीपो दयग्रायुधस्तत; । | शराच्यसाम' नामक ऋवाओंकी छः संहिता कहीथी। = 
वच ट सयः कृतिका पुत्र नीप था, नपका उग्रायुधः उग्रायुधका क्षेम्य, । 
& 9 (९ ९। थ्‌ सु रध पुञ्जय, | २९। । क्षम्यक्रा सुधीर ओर सुवीर का पुत्र था रिपुञ्जय २ ८-२९॥ क अ 3 


त॒तो बहुरथो नाम पुरमीढोऽप्रजोऽभवत्‌ । रिपुञ्ञयका पुत्र था बहुरथ । द्विमीढके भाई पुरुमीढको 


नरिन्यामजभीटस नीलः शान्तिः सुतस्ततः॥॥२०॥ | कोई संतान न इई । अजमीढकौ दूसरी पल्ीका नाम. । 


(९ ५ ९ : { 

श्तेः सुशान्तिस्तस्य पुरुजोऽक॑सततोऽभवत्‌ | | बा नलिनी | उसके गम॑से नीग्का जन्म इआ । नीख्का ` 
शान्ति, शान्तिका सुशान्ति, सुशान्तिका पुरुजः, पुरुजका 
भम्याश्वलनयस्तस्य पच सन्ुदूगलादयः ॥२१॥ | चक जौर व॑का पुत्र हआ मम्यां्च । मम्याश्चके पोच 


यवीनरो बृहंदिषु; काभ्पिसथः संजयः सुताः । घत ये--एुद्रक, यवीनर, बृहदिषु, काप्पिश्य ओर सञ्चय । ` 


९ = ४ मर्म्याशचने कहा--धये मेरे पुत्र पोच देका चासन 
भम्याश्चः प्राह पुत्रा णाय हि ॥३२॥ | = 
भ याध आह पुः मे पश्चानां रक्ष (२८ ॥२२॥ | = ज स ( प्च अमम्‌) ह ॥ इसन्ि ये चवन्राक = 
विषयाणामलमिमे इति पश्वारुष्क्ञिताः | नामसे प्रसिद् इए । इनमे सुरते नोद्य नामक नराह्ण- ` 
मुद्गला बह्म निशत गोत्रं मोदगव्यसंज्ञितम्‌॥। २३ | गोत्रकी प्रदृत्ति इई ॥ ३०-३३ ॥ ड 
मिथुनं भुदगलाद्‌ भाम्याद्‌ दिबोदाक्षः पुमानभूत्‌ । | मम्याशचके पुत्र सुदरल्से यमज ( जुवा ) संतान ` ` 
इं । उनमे पुत्रका नाम था दिवोदास ओर कल्याका ` 

ह्या छन्यका यस्था शतानन्दस्तु गौतमात्‌।२४॥| अहल्या । अहल्याका विवाहं महष गोतमसे इ । 
गोतमके पुत्र इए शतानन्द ॥ २४ ॥ शतानन्दका ७ र 

सत्यधृति था, वह धलुर्विवामे अत्यन्त निपुण था। सवयघृति- 







व 
149: 


0 9 ४ त 9, ~ ^ 
१५१ १ ॥ २५ [,५५ | 
` + 31 11 नी अर १.४ " न, 


च; १ ५ ४) (२ \ 1 
र १.१५. 1.9. 4 
(११ 0 1/3 ति, # १1 9, 4141 













च्‌ ९ त ॥) 
४४ १ {५५ ¢^} ॥ ‡ र ५ 6 ५^। 
+ द. "ह ^ ९1). षि; ०१ 
उ 9. क, # वै । +` + > + ? ~^ 
^ प # 
+ (3 # ~ -- 
न्क ४ १ 


~ पष्थलन 


। १0 # ५५ 
। वनि 
न ~= 
भ 


ऋ 
# 4. 1 














नः से शरद्रानका वीयं मूजके श्चाडप्र एक 
शरद्य यस्माद्वशीदशनात्‌ किल । २५॥ | म रक्षणवारे पुनर जर पुतीका ज्म इ इभा । महाराज 
= ` र कमी च । २ निलः सवः । १. दव ८ वे। 4 सच 


" 


भ 





"~ - - 
४ ॥ 
~ [त 
ज्र ^ नन 4 ५५ 
ग ( क 
1१ [च च [0 । ॥ 
कक "कि ` ॥ 


4 % =. ॥ यः ह. 1 
ब्यवहार ये| न ` 
`: वी 9 
(#* "ष > ~+" 
~ 





अनि, 
€~ 4 : 
` ई ण्व 
९ 
= = 3 चः 
पने इ, 


कैः चै 
+ (८, व भ ~ क क छद्‌, 
* ^+ क द ज १४ ` # = ४: । इ~ शू, ४ ~ 
र भ< 9 = ५.4 ए) ग कभ द्ध २ | + नकन ऋ त ु = क = 
(>~ ॐ | "थः ध ~~ ~ (14 14 
~ ~. 4. ~ वः क प 
क = र, ०५, ज र, क += "द ~ अष, >. [3 
कड =. [ि वं + ^, # 
= = = 
१ = 

















# आद्यकदेवनी असंग ये; पर बे बन जाते समय एक डाया-ध॒क चकर छोड़ गये थे । उस छाया कने ही यइस्योचित 


भ्रेष क = 


५५ 
ष ~ त 

ॐ > = नौ 
न्द्ध ~ +, 










६ 
4 


ब 
(> ६ =, च 1 > ह ` 
ल्कः र्‌ 4 च 
` ~ व श ~" 
नै 1 ) अ ज 
ब 1 


र +» ॥ 
"न ~> ~ 
॥ ४७ ङ. १ ॥ 
न्क द च 
१.१ ~ 9 -< 





=, 





4 ध ९३ ६ | ¢ ्रीमद्ाग्वते = । र | ॥ अ० २९ 


ऋ । 
ए) 
11, 1 




















`  शरस्तम्बेऽपतद्‌ रेरो ९ धुं उदेभृच्छभर्‌ । खन्तनुकी उपर दृष्टि पड़ गयी क्योकि वे उधर्‌ शिकार 
ध सेलनेके व्यि गये इए ये । उन्होने दयात्र् दोनोको 


। (9 तदू दष्टा दपयाश॒हाच्छन्तलसंगयां च्‌रस्‌ । उठ छिपा | उनमें जो पुत्र था; उसका नाम कृपाचायं 
क आ ओर जो कन्या थी, उसका नाम इ कृषी । यही 
| कपः ङमारः कन्था च दरोणपतन्यभवत्‌ कृषौ ॥ ३६१; ' कृधी द्रोणाचायकी पलनी इई ॥ २५३६ ॥ 
4१ -श्दान्व्व्छन्छनर6--- 
| ॥ इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे 

| एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ | 


[4 ऽ ध्यायः 
थ ददर स्मय 


पाल, कौरव ओर मगथदेच्छीय सयजाभंके वंदाका वर्णन 




















श्रीक उवाच | श्ीद्युक्देवजी कहते है- परीक्षित्‌ । दिवोदासका 
प पुत्र था मित्रयु | मित्रेयुके चार पुत्र इए--च्यवनः सुदाः 
विधु वदवद्स्िच्च्यननस्ततता चप । सहदेव ओर सोमक । सोमक्ठे सौ पुत्र थे, उनमें सबसे 


। । - ` सदाः सहदेयाऽथ सामक जन्त॒ञन्पद्त्‌ \ १॥ | नडा जन्तु आर स्वसे छोटा प्रषत था | प्रषतक्े पुत्र 
` द = # ओर पष 
तय पतरशतं तेपां यनीास्‌ पयतः सुतः । | हद % षद दपद। नामी पुत्री आर श 
9 = न आदि पुत्र हए ॥ १-२ ॥ धृष्टदयुल्नका पुत्र था धृष्टकेतु | 
दरषदो द्रोपदी तख शष्टम्नादयः सुज; । २ ॥। | सर्म्यािवे वंश्ये उत्पतन हए ये नरपति "पाञ्चाल, कहल्ये | 
^ शष्टद्ुस्ताद्‌ श्ट तुभाभ्याः पालक इषे | अजमीढश्षा दूसरा पुत्र था ऋक्च | उनके पुत्र इए 
< ॥ 4  योऽजमीदसुतो चन्य ऋक्षः संवरणस्ततः ॥ ३॥ 


संवरण ॥ ३ ॥ संवरणक्ा विवाह सूयकी कन्या तपती. 
से इआ । उन्ीके गभसे कुरृक्षतरवे खामी कुरुका जन्म 

तपत्यां दयकन्यायां दुरक्ेत्रपर्तिः इङः | 
` परी सुधलुजंहुनिषधाश्चः रोः सताः ॥ ४ ॥! 


हआ । कुरके चार पुत्र इए- परीक्षित्‌, सुधन्ा, जह 
ओर निषधाश्च |] 9 ॥ सुघन्वासे सुद्ोत्र, सुदोत्रसे च्यवन, 

॥  स॒दात्राऽभूत्‌ सुधलुषर्च्यवनोऽथ ततः कृती | 

(  चु्तखापरिविर दृहदरथग्चलास्ततः । ५॥ 





च्थवनसे कृती, कृतीसे उपर्चिरवसु ओर उपरिचरभ्षुसे 
बद्रथ आदि कईं पुत्र उत्पनन इए ॥८॥ उनमें बुहद्रथ, 
कुराम्ब, महस्य, प्रत्यग्र ओर चेदिप आदि चेदिदेशके राजा 
इए । बद्रथका पुत्र था कुशाग्र कुराप्रका ऋषभ, 
ऋषभका सत्यदित, सत्यहितका पुष्पवान्‌ ओर पुष्पवान्‌के 
जह नामक पुत्र हआ । ब्रहद्रथकी दूसरी पत्नीके गभ॑से 
एक शारीरके दो टुकड़े उन्न इए ॥६-७॥ उन्हं माता- 
ने बाहर पफकवा दिया । तत्र (जशः नामकी राक्षसीने 
(जियो, जियो, इस प्रकार ककर खेक-खे्मं उन दोनों 
ु जोड़ दिया । उसी जोड़े इए बाख्कका नाम 
| इआं जरासन्ध ॥ ८ ॥ जरासन्धका सहदेव, सहदेवा 


४ क सत्यहितोऽपत्यं धृष्पवांसत्युतो जहुः । 
“अन्यां चापि भायायां रके दे ृदद्रथात्‌ ।। ७॥ 

ते मत्रा बदिरु्छष्टे जरया चाभिसम्धिते । 

== नानत जगडन्त्या जर्‌रन्शऽभवत्‌ खतः॥।८॥ 

च सहदव्‌ाऽयूत्‌ सा पियच्टतश्रना श म्‌ ५ 


"चग प्र 





१ कीणं 








एक - नथः 

ई नकि) जन = जक + 
कं 
६.४ ^> 


 । त" व्क 
[नि 2 2 7 त क 
ध & 1 = किक 
५ 


2, 
4; 


ज्् 3 ~ जि = ऋ 9. ब~, 
चै र ४. - न 


+ कित => 
1.4 : 


ह ` अकव "ण ॥ भ 9 का पि क र 
~ ~ 
*' 1 ~ कै 
॥॥ । 
न्‌ 


ि क" -विढीनमीे 9 कदु 
र ॥ 3 


२ कैर " % 
क र, + 

= 

® च्व 


का जो जो क क 9 ७ 4.8 99 4 कक 
त य को कक जो हिः ज कि = 
[। क क ह । 
५ 
(1 


तन्मन प्रहितेषिगर्ेदाद्‌ विभ्रशितो भिरा ॥१६॥ 
वेदवादातिवादान्‌ बै तंदा देवो ववषं ह । इसब्वये वे राञ्यके अधिकारसे वञ्चित हो गये ओर तब 


"परिवेत्ता, जानन चाये ओर उसका वड्ा माई परिवितति, कहलाता हे । 


अ० २२ | नवम्‌ स्कन्ध 











परीक्षिदनपत्योऽभूत्‌ सुश्थां नाम जाहूवः ॥ ९॥ ! सोमापि ओर सोमापिका पुत्र इआ श्रतश्रवा | कुरुके 


० | व्येष्ठ पुत्र परीक्षितके कोई संतान न इई । जहका पुत्र 

ततो विद्रथस्तसात्‌ सावेभोंमस्ततोऽभवत्‌ । ¦ था रथ ॥ ९ ॥ घुरथका विदूर, विदूरथका सार्वमौम, 
। सावंभौमका जयसेन, जयसेनका राधिक ओर राधिकका 

जयसेनस्तत्तनयो राधिकोऽतोऽयुतो दयसूत्‌ ॥१०॥ । पुत्र इआ अयुत ॥ १० ॥ अयुतका क्रोधनः क्रोधनका 
| | देवातिधि, देषातिथिका ऋष्य, ऋष्यका दिलीप ओर दिढीप 

ततश्च ऋोधनस्तसाद्‌ देवातिथिरघुष्य च । `| क्‌ पुत्र प्रतीप इआ ॥ ११ ॥ प्रतीपके तीन पुत्र ये-- 
देवापि, चन्तु ओर बाह्वीक । देवापि अपना पैतृक 
राञ्य छोडकर वनम चखा गया ॥ १२ ॥ इसलिये उसके 
छोटे भाई शन्तनु राजा इए । पर्जन्ममे ्न्तनुका नाम 
| महाभिष था । इस जन्ममे मी वे अपने हाथोंसे जिसे 
सदरच्यं परित्यज्य दे ० देते थे, वह बृदढेसे जवान हो जाता था ॥ १३ ॥ उसे 
(पदशन्य परित्यज्य देवापिस्तु वनं गतः ॥१२॥ परम सान्ति मिठ जाती थी । इसी करामातके कारण 
अभवच्छन्तन्‌ राजा प्रा ङमहभिषसंज्ञित |: उनका नाम “डान्तन्नुः इआ । एक बार्‌ रान्तयुके राज्यम 
र बारह वषेतक इन्द्रे वर्षा नहीं की । इसपर ब्राह्मणेन 

यं यं कराभ्यां स्पृशति जीगं यौवनमेति सः ।।१२॥ | रन्तयुसे कडा कि तुमने जपने बड़ माई देवापिसे पडले 
ही विवाह, अग्निहोत्र ओर राजपदको खीकार कर च्या; 

शान्तिमाप्नोति चेवयां कमेणा तैन शन्तनुः । | अतः त॒म परिविा# हो; इसीसे तम्डारे राज्यमे वषा नही 
होती । अव यदि तुम अपने नगर ओर राकी उन्नति 


ष्यस्तसख दिलीपोऽभूत्‌ भतीपरतस् चात्मजः ।११। , 


देवापिः शन्तुसतख बाहीक इति चात्मजाः । 


खमा द्वादश्च तद्राज्ये न ववषं यदा विथः ॥१४॥ | चाहते हो, तो शीघरसे शीघ्र अपने वे माईको राज्य 


न लोटा दोः ॥ १४-१५ ॥ जन ब्राह्मणोनि शन्तनुसे इस 
न्तचुब्राह्मणरुक्तः परिवेत्तायमग्र्ुक्‌ । प्रकार कडा; तब उन्होने वनमें जाकर अपने बडे भार 
देवापिसे राज्य खीकार करनेका अनुरोध किया । परंतु 


राज्यं देह्यग्रनायाश्च पुररष्विषद्धये ।॥१५॥ | दन्तलुके मनी अरमरातने पहलेते ही उनके पास कु 


= द्वेनष्ट = + ~, एसे ब्राह्मण भेज दिये थे, जो वेदको दूषित क्रनेवादे 
एकत डिजज्यभ्ठ छन्दयामास सोऽब्रवीत्‌ । | वचनोसे देवापिको वेदमार्गे विचलित कर्‌ चुके ये। 


इसका फल यह्‌ इआ कि देवापि वेदोके अनुसार गृहस्था 
श्रम खीकार करनेकी जगह उनकी निन्दा करने च्छे । 


शन्तुके राज्यमे वषां ई । देवापि इस समय मी योग 


देवापियोगमाखाय ककापग्राममाभ्रितः ।।१७॥ | साधना कर दे टं ओर्‌ योगियोके प्रिद निवासस्यान 


क्पप्राममे रहते है ॥ १६-१७ ॥ जब कलियुगे 


सोमवंशे कलो नष्टे कृतादौ खापयिष्यति.। चनद्रवंशका नारा हो जायगा, तब सत्ययुगके प्रारम्भ वे 


फिर उसकी स्थापना करगे । शन्तुके छोटे माई बाहीक ` ` 


बाहीकात्‌ सोमदत्तोऽपूद्‌ भूरिभूरिश्रवासततः॥ १८ | का पुत्र हमा सोमदत्त । सोमदचकेः तीन पुत्र ४: 


१. क्च । २. समुत्सुज्य । ३. ततो । ॥ 
# दाराग्निहोत्रसयोगं ऊुरुते योऽग्रजे सिते । परिवेत्ता स विशेयः परिवित्तिस्तु पू्व॑जः ॥ म 
अथात्‌ जो पुरप्र अपने बड़े माके रहते हुए उससे पहङे ही विवाह ओर अभिहो्का संयोग करता है, उसे 


भा० स० खं २. १३- ु 2 

























। | ९८ व 2/7: ` रीमद्धानत , 
ध ॥ [न 

९ । नन्व के 

18 मवान्‌ | प--भर ूा शौर शल । सन्त दार गङ्गा 
॥ शरश शन्दनोरासीद्‌ गङ्भायां भीष्म आत्मवान्‌ । त षका मीक जनम हा ते समर 
( | र धर्मक सिरमौर, मगवानके परम प्रमी मक्त ओर परम ज्ञानी 
9; , सर्वधर्मविदां शरेष्ठो महाभागवतः कविः ॥१९॥ | मे} १८-१९ ॥ वे संसारके समस्त वीरोके अग्रगण्य 
| ५ 1 ९८ ~ ~ नेता ये । ओरोकी तो बात ही क्या, उन्होने अपने गुरः 
व वीर तोषितः । 

/ ुथाग्रणीयन रामोऽपि धि मगवान्‌ परञ्यरामको भी युद्धम सन्तुष्ट कर दिया था । 


॥ शन्तनोदिकन्यायां जज्ञे वित्रज्गदः सुतः ।२०॥ | रन्तलते द्राण दासराजक कन्यके गम॑से दो पुत्रइए- 


“ | चित्राङ्गद ओर विचित्रवीयं । चित्रङ्गदको चित्राङ्गद नामकः 
विचित्रवीर्यावरजो नाम्ना चित्राङ्गदा हतः । गन्धर्थने मार डा । इसी दाशराजकी कन्या सत्यवती 


परारास्जीके द्वारा मेरे पिता, मगषान्‌के कत्मवतार खयं 
मगवान्‌ श्रकृष्णद्ेपायन ग्यासजी अवनीणं इए ये | 
उन्होने वेदोकी रक्षा की । परीक्षित्‌ ! मैने उन्हीसे इस 
श्रीमद्रागवतपुराणका अध्ययन किया था। यह पुरण्‌ परम 
गोपनीय--अव्यन्त रहस्यमय है । इसीसे मेरे पिता मगान्‌ 
व्यासजीने अपने पक आदि शिष्योको इक्षका अव्ययन 
न्वी कराया; मुञ्चे ही इसके योग्य अधिकारी समङ्गा | 
एकं तो म उनका पुत्र था ओर दूसरे शान्ति आदि गुण 
भी सुञ्षमं विरेषरूपसे थे । शन्तनुके दूसरे पुत्र विचित्र 
वीयने कारिरजकी कन्या अम्बिका ओर अम्बालिकासे 
विवाह किया । उन दोनोको भीष्मजी खयंवरसे वलमपू्ैकः 
ॐ आये ये । विचित्रवीयं अपनी दोनों प्रलिरयोमिं इतना 
आक हो गया किं उसे राजयक्ष्मा रोग हो गया ओर 
उसकी मृ्यु हो गयी ॥ २०-२४॥ माता सल्यवतीके 
कहनेसे भगवान्‌ व्यासजीने अपने संतानहीन माध्वी 
जयोति धृतराष्ट्र ओर पाण्डु दो पुत्र उत्पन्न किये । उनकी 
| दासीसे तीसरे पत्र विदुरजी इर ॥ २५ ॥ 


कि : "5 कः 
~ न 


+ गकि 7, ~ 0 कन 


„व - ती ` 


(न न, मनक 0 1. का" 3, ` 9; 1 १ ¬. 
1 »4 क 3 ५ + 1. त ` जि, 


यस्यां पराशरात्‌ साक्षादवतीणों हरे; कला ॥२१॥। 


वेदगुप्रो निः कृष्णो यतोऽहमिदमध्यगाम्‌ । 


हिता खशिष्याच्‌ पेलादीन्‌ भभवान्‌ बादरायणः २२ 


ति 7 =) 
== + 


मयं पुत्राय शान्ताय परं गुद्यमिदं जगी । 


विवित्रवीर्योऽथोबाह काथिराजसुते बलात्‌ ॥२३॥ 
















` खयबरादुपानीते अम्बिकाम्बार्कि उमे । 


0 " ह | ४ + ह १.19 तै ॥\ ि 
4) ^ {1 # ज ॥ नि र 
गि, व नवि | धः त्र वि श्‌ ५" = न १९११. ५-८०-८५ अ१+ 2 2 अकी १ 
ति + क „4 टु ज्द-र क. । ॥ ॥ > + ३ ॥ ` 


 / तयोरासक्तहृदयो गृहीतो यक्ष्मणा सृतः ॥२४॥ 
शतऽ्जख वे भ्रातुमात्ोक्तो बादरायणः । 

+ शतार च पाण्डुं च भिदुरं चाप्यजीजनत्‌ ॥२५॥ 
“ गान्धायां धरतरा्स्य जज्ञे पुत्रशतं नृप । परीक्षित्‌ ! धृतराष्टरकी पत्नी थी गान्धारी । उसके 
गभस सा पुत्र इए, उनमें सव्रसे बड़ा था दुर्योधन । 
कन्पक्रा नाम था दुःशल ॥ २६ ॥ पण्डकी प्ली थी 
| इता । शापवरा पाण्डु ल्री-संहवास नही कर सकते थे । 


ईाच्व उनकी पत्नी कुन्तीके गर्भे धर्म, वायु ओर इन्द्र 


ध. के द्वारा क्रमशः 
जाता षमानिरन्द्रम्थो युधिष्ठिरयखास्यः ॥ २७ तीन ८ 
ह ५न उन हए । य तीनों के-तीनों महारथी ये॥ २७॥ 


च तत दुर्योधनो ज्येष्टो दुःशला चापि कन्यका ॥ २६॥ 








कितु दाशे ( कवये ) के द्वारा पाठ्ति ` 



























‰ 
५ तवम ₹हन्ध 


गडलः सहदेवश्च माद्रयां नाखत्यदल्लयोः । पाण्डुकी दूसरी पल्नीका नाम था माद्र 
सके गर्म॑से नकुल ओर ष. | 
द्रप पञ्च पञ्चम्यः पुत्रस्ते पिततेऽभवन्‌ ।[२८॥ | दोना अशध्िनोकुमारंकि दारा उ 3; . 


र सहदेवका जन्म हआ । परीक्षित्‌ ! इन पाच पाण्डवोके 
इषित प्रतिविन्ध्यः श्रुतसेनो इकादरत्‌ । दारा द्रौपदीके गर्मसे तुम्हारे पौव चाचाउतन इए ॥२८॥ 
“सना्छतकतिस्तु शतानीकस्तु नाङलिः ।।२९॥ | इनमे युधिषठिके पुत्रका नाम था परतिव्िच्य, मीमघेनका 
¦ पुत्र था श्रुतसेन, अन्ना श्रुतकीतिं, नकुख्का शतानीकं 

९ह्‌ दैवतो जअज्कृतकमां ~ 
ः । ध = प ॑ ओर सहदेवका श्रुतकमां । इनके सिवा युधिष्ठिरके पौखी 
इधिष्ठिरत्‌ त पोरब्यां देवकोऽथ षदरोतकवः ॥३२०॥ नामक पलनीसे देवक ओर भीमसेनके हिडिम्बासे घटोत्कच 4 
भीमसेनाद्धिडिम्बायां सारयां सबेगतस्तत्‌ः । | भर॒ काठीसे सर्वगत नामके पुत्र इए । सददेवके 
5६ म त वार्त पवेतकुमारी विजयासे घुहोत्र ओर नकु क्रेणुमतीसे | 
> एव हब विज (~ | € मकि ल 4 
2 द ह ॥५९। नरपित इआ । अजुनद्यारा नागकन्या उद्धपीके : | 
फरेणुमत्या नङ़लो निरमित्रं तथान; । | इरावान्‌ शौर मगिश्रलरेशकी कन्यासे बथुवानका जन्म 


इराचन्तषुट्प्यां वें सुतां बभ्रवाहनभ्‌ । हआ । बशुत्ाहन अपने नानाका ही पुत्र माना गया । 
॑ 


= ----~ 


कथोकिं पह हयी यह्‌ बात तै हो चुकी थी ॥ २९२२ ॥ 
“गदः सपि त्यत्र; ुतरिकासुस ।२२॥ अयुनकी सुभद्रा नामकी पनीसे तम्हारे पिता अभिमन्यु- 
उव तातः सुभद्रायामभिमन्पुरजायत । का जन्म हआ । वीर्‌ अमिमन्युने समी जतिरधिर्यको जीत 
च्या था । अमिमन्युके द्वारा उत्तराके गर्भसे तम्हारा ` ` 
सवोतिरथजिद्‌ बीर उत्तरायां ततो भवान्‌ ॥३३॥। | जन इना ३ ॥ पि क 
परिशीणेषु रषु दरौगेर्बह्यान्लतेजक्ा 1 नारा हो चुका था । अश्चत्यामाके ब्रहमाखसे तुम भी जल 
ही चुके थे, परंतु मगवान्‌ श्रृष्णने अपने प्रमावसे ` 
खं च कृष्णाजुभवेन स जीरो मोचितोऽन्तकात्‌। २४ तमं उस ययुस जीता जागता वचा व्वा ॥ ३४॥ ` = 


` एवेमे तनयास्तात जनमेजयपूर्वकाः । परीक्षित्‌ | व पु तो सामने ही बैठे इए 

= 4 दै--इनके नाम है--जनमेजयः श्रुतसेन, भीमसेन ओर 

शृतसेनो भीमसेन उग्रसेनश्च नीयवान्‌ ॥२५॥ | उप्रसेन । मे सवेत के पराकमी है । २ 

जनमेजयस्तं विदित्वा तक्ष्कालिधनं शवम्‌ । तक्षकके काटनेसे तुम्हारी मृत्यु हो जायगी, तब इसु ` ~ 

वातको जानकर जनमेजय बहत क्रोधित होगा ओर यह `` ` 

सप-यज्ञकी आगमं सर्पोका इतन करेगा ॥ ३६ ॥ यह्‌ ` ह 

कावषेय तुरको पुरोहित बनाकर अखतेष यज्ञ करेगा ` र 4 

ओर सब ओरसे सारी पृष्वीपर विजय प्रात करके यजञेके ` ^ 
दारा भगवानूकी आराधना करेगा || ३७ || जनमेजयः & 
पुत्र होगा शतानीक । वह्‌ याज्ञवस्क्य ऋषिस ह नो वेद ष. ध 


` कौ ` त \ ८ सयो +: 





सर्पान्‌ वे सर्पयाभाग्ो स दोष्यति सषान्वितः ॥३९ 










ऊावषेयं पुरोधाय तुरं ठुरममेधयाट्‌ 1 . 







समन्तात्‌ पृथिवींसबां जित्वा यक्ष्यति चाष्वरैः ।२७ 
। ` तस्य पुत्रः शतानीको या्षचवलक्यात्‌ त्रयीं पठन्‌ । 










क क 
ह [ उन 





२ । भमद्धागवत [ अ० २२ 


असीभङ्ष्णसलसापि नेमिचक्रस्तु तत्सुतः २९ | सहसानीकूका स सा 
असीमङकष्णका पुत्र होगा नेमिचक्र ॥ २९ ॥ जद 
गजाहये हृते न्या कौशाम्ब्यां साघु बत्यति । हस्तिनापुर गङ्गाजीमे बह जायगा, तब बह कौशाम्बी पुरीमे 
उक्तसतशित्ररथस्तसात्‌ कंविरथः सुतः ॥४०। । | घुखपूवेक निवास करेगा । नेमिचक्रका पुत्र होगा चित्ररथ, 
तसाच इषटिमांलख सुपेणोऽ्थमहीपतिः । = | विनरथका करिरयः कमिरथका दमान्‌ दान 
€ राजा दुषेण, सुषेणका एुनीथ, सुनीथका चचक्ष, चचक्षुकः 
सुनीथस्तस्य भविता चँवश्ठुयत्‌ सखीनरःः ।॥४९॥ | ुखीनर, घुलीनच्का परि, परिवका सुनय, जनयक 
परिषुवः सतस्तसान्मेधाबी सुनयात्मजः । । मेधावी, मेधावीका चपज्ञय, चृपञ्ञयका दूवं ओर दतरेका पुत् 
रपञ्जयसततो दू्सिमिस्तसाजनिप्यति ॥४२॥ | तिमि होगा ॥ ४०४२ ॥ तमिस इय, चयस 
त सुदास, सुदाससे शतानीक; शतानीकसे दुर्मनः दुदं मन 
तिमे शदद्रथस्तसाच्छतानीकः सुदासजः । से वद्ीनर, वदहीनरसे दण्डपाणि; दण्डपाणिसे निमि ओरं ~ 
शतानीकाद्‌ ुर्दमनस्तसापतय व्हीनरः ॥४३॥ | निमिसे राजा क्षेमकका जन्म होगा । इस प्रकार रमनं 
दण्डयाणिनि ० | वुम्हं ब्राह्मण ओर क्षत्रिय दोनोके उत्पत्तिस्थान सोमवंशका 
मिसतस्य क्षेमको भविता चपः । वर्णन सुनाया । बड़े-बड़े देवता ओर ऋषि इस वंशाकां 
ब्हमकषत्रस्य वै “ग्रोक्तो वंशो देवपिंसत्कृतः ॥४४॥ | सत्कार करते हँ ॥ ४३-४४ ॥ यह वंशा कल्ुगमे 
£ अः = राजा क्षेमकके साथ ही समाप्त हो जायगा | अव मेः 
मव आग्रजानं संखा ्रा्डति े करी । भविष्यमें होनेवाठे मगधदेशके राजार्ओका वणेन सुनाता 
अथ मागधराजानो भवितारो बदामि ते ॥४५॥ | ह ॥ ४५ ॥ 
भविता सहदेवस्य माजासि्चटूतभवाः | जरास॒न्धके पुत्र सहदेवसे माजारि, माजारिसे श्रुतश्रवा, 
ततोऽयुतायुलस्यापि निरमित्रोऽथ तत्सुतः ॥४६॥ ्रुतश्रवासे अयुतायु ओर अयुतायुसे निरमित्र नामकं पुत्र 
बत चः हेगा ॥ ४६ ॥ निरमित्रके घुनक्षत्र; सुनक्षत्रके च्रृहत्सेन, 
सनसत्र ° उनसर द ¡ऽथ कमंजित्‌ । बरहत्सेनके कर्मजित्‌, कर्मजित्‌के सृञ्जय, सृतञ्यवे 
। ततः सृतञ्जयाद्‌ विप्रः शुचिस्तस्य भविष्यति ॥४७॥ | विप्र ओर विप्रके पुत्रका नाम होगा चि ॥ ४७॥ 4 
` ` अ त चिसे क्षेम, क्षेमसे सुत्त, सुत्रतसे धर्मघूत्न, ध्मसूत्रसे 
ध कषमोऽथ सुबरतस्तसाद्‌ प्तः शं भस्ततः। शम, शमसे शुमत्सेन, दुमत्सेनसे छुमति ओर सुमतिसे 
`  छमत्सेनोऽथ सुमतिः सुबलो जनिता ततः ॥४८॥ | खुबक्का जन्म होगा ॥४८॥ घुवव्का घुनीय, घुनीधका 
^ सीरः सत्यनिदथ गिशवमिद्‌ यद रिपुञ्जयः । स्जित्‌, सयजितका विशरजित्‌ जोर विखजित्का पुत्र 
ह द धः रिपुञ्जय होगा । ये सब बरहद्रथवंराके राजा होगे । इनक 
` हदि भूपारा भव्याः साहृसतवत्सरभ्‌ ॥४९॥ | शासनकालं एक हजार वर्षके मीतर ही होगा ॥ ४९ ॥ 





क क्क ` ति , क शा नि न ज्वी + | # 1 
~ कष ०8०. 9 ~<.4 #> 1 जै क = चे 


(114 -- 


प 7 कि क. ०५ 
^ # 


। काक 969 5 


न कोक = 












६. व्ल ` + 
न 
कक 4. कै ` 


र 39-भ्@ॐ- 
इति श्रीमद्वागवते मद्ापरणे पारमहंस्यां संहितायां 
नवमस्कन्धे  द्ाविंशोऽष्यायः ॥ २२ ॥ ~ 
--`-सअन््श्च्् । 
त्रेच०। ४. हस्ती निमिस्त ० । ५. नि० । ६. योनिवंशो । ७. शमः 






अ० २३] 


गवम्‌ स्कन्ध 








अथ त्रयोविरोऽष्यायः 


अचु, द्यः त॒वखु ओर यदुके वंदाका वर्णन 


श्री्चुक उवाच 
अनोः सभानरथश्चुः परो्श्च त्रयः सुताः | 
षभानरात्‌ कालनरः सृंञ्जयस्तत्सुतस्ततः ॥ १॥ 
जनमेजयस्तख पुत्रो .महारीरो महामनाः । 
उक्षीनरस्ितिक्ुश्च महामनस आत्मजो ॥ २॥ 
शिंबिवंनः शमिरदशषश्वत्वारोशीनरार्मजाः । 
इषादभेः सुवीर भद्रः ैकेय ओत्मजाः ॥ ३॥ 
शिबेश्चत्वार एवासंस्तितिक्षोथ रस्शद्रथः । 
ततो हेमोऽथ सुतपा बिः सुतपसोऽभवत्‌ ॥ ४॥ 
अङ्कवङ्गकरिङ्गाद्याः सुह्यपुण्ान्धसंक्ञिताः 1 
ज्षिरे दीधेतमसो बलेः श्रे मदीधितः ॥ ५॥। 
चक्रुःखनाज्ना विष्याच्‌ षडिमान्‌ प्राच्यक्रांचते। 
खनपानोऽङ्खतो जज्ञे तखाद्‌ दि बिरथस्ततः ॥ ६ ॥ 
सुतो धर्मरथो यस्य जज्ञे चित्ररथोऽप्रजाः । 
रोमपाद इति ख्यातस्तस्मे दशरथः सखा ॥ ७॥ 
शान्तां खकन्यां प्रायच्छदष्यभृङ्कउवाह ताम्‌ । 
देवेऽवर्षति यं रामा आनिन्युहरिणीसुतम्‌ ॥ ८ ॥ 
ना्यसङ्गीतवादितरविभ्रमािङ्गनादणेः । 
च तु राज्ञोऽनपत्यस्य निरूप्येष्टिं मरुत्वतः ॥ ९ ॥ 
प्रजामदाद्‌ दश्वरथो येन लेभेऽप्रजाः प्रजाः । 
चतुरङ्ञो रोमपादात्‌ पृथुलाक्षस्तु तत्सुतः ॥१०॥ 
बृहद्रथो बृहत्कमा बृहद्भानुश्च तत्सुताः । 
` आद्याद्‌ बृहन्मनास्तसाज्ञयद्रथ उदाहृतः ॥९ ‹॥ 
विजयस्तस्य सम्भूत्यां ततो धृतिरजायत । 


गजक 


ध्रीययुकदेवजी कते है-परीक्षित्‌ ! ययातिनन्दनं 
अनुके तीन पुत्र इए--समानर, चक्षु ओर परोक्ष । 
समानरका काठनर;, कागनरका सञ्जय, सञ्जयका 
जनमेजय, जनमेजयका मारी, महारीख्का पुत्र इआ 


| महामना । महामनके दो पुत्र इए-उरीनर एव 


तितिश्चु ॥ १-२ ॥ उरीनरके चार पुत्र थे-रिविं, वन 
शमी जीर दश्च | शिविके चार पुत्र इए- वृषादभ, 
सुवीर, मद्र ओर कौकेय । उरीनरके माई तितिक्षुके 
रुदाद्रथ, रुदाद्रथके हेम, हेमवे सुतपा ओर सुतपाके 
बलि नामक पुत्र इआ ॥ ३-४ ॥ राजा बलिकी पत्नीके 
गर्भसे दीषेतमा मुनिने छः पुत्र उत्पन विये-अङ्ग, 
वङ्ग, कलि, सुहा; पुण्ड्‌ ओर अन्ध ।।५॥ इन छोगोने 
अपने-अपने नामसे प्रव दिदामें छः देश साये । अङ्गका 
पुत्र हआ खनपान; खनपानका दिविरथः, दिविरथका 
धर्मरथ शौर ॒धर्मरथका चित्ररथ । यह चित्ररथ हयी 
रोमपादके नामसे प्रसिद्र था | इसके मित्र॒ थे 
अयोध्याधिपति महाराज दशरथ । रोमपादको कोई 
संतान न थी । इसय्यि दशरने उन्दं अपनी शान्ता 
नामकी कल्या गोद दे दी । शान्ताका विवाह ऋष्यश्चङ्ग 
सुनिसे इआ । ऋष्यश्च ॑विभाण्डक ऋषिके दारा 
हरिणीके गभ॑से उत्पन्न इए थे । एक बार राजा रोमपादके 
राज्यम बहत. दिनोतक वषा नह हई । तत्र गणिका 
भपने चत्य, संगीत, वाघ, हाव-भाव, आटिङ्गन ओर 
विविध उपहास मोदित करके ऋष्यश्चङ्गको वह्यं ले 
आयीं । उनके आते ही वषां हो गयी । उन्देनि ही 
इन्द्र॒ देवताका यज्ञ॒ कराया, तब संतानद्ीन राजां 


रोमपादको मी पुत्र इजा ओर पुत्रहीन दशरथने मी ॥ 
उन्हके ्रयत्नसे चार पुत्र प्राप्त किये । रोमपादका पुत्र॒ 
हज चतुरङ्ग ओर चतुरङ्गका प्रथुगक्च ॥ ६-१०॥ 
पृथुके बृहद्रथ, बृहत्कमां ओर च॒हद्वाल- तीन पुत्र ` 


इए । ब॒हप्रथका पुत्र इ बहन्मना ओर बहन्मनाक। 


जयद्रय 1 ११ ॥ जयद्रथके पलीका नाम या । सम्भूति ।# 
ज १. तत्युतः सृञ्जयस्ततः। २ सिनः श्चमिदं्षः । ३. आत्मवान्‌ । अ 


* ५ ५६। | 
४ व ~ 
त त ॥ ् न त य्‌ छः ‡ र = ` " प + १ ट 
१ 0 1 ~ भ अ ०० 9४ 03 
र = ८.“ १५९ "कृ । ~+ > 3 + + 4 2 9 ^ 


> ~ 0 
८ = ¬ कन 


=) पक. -॥ = + 3 १०.८४ वि छ (य 




















अ १ दः 


॥ । 
( ० 1 1 क 1 
न ^ ~ ५४3 


व ~ $ 
+> 





५ ¢ अनयान्क कुक ना च 0 नाः स भक कि ज = ज वा काजक व क 


/ 


ततो धृतवतस्तख सत्कमाधिरथस्ततः ॥ १२।' 
योऽसौ गङ्खातटे ऋीडन्‌ मञ्जुषान्तगतं रिम । 
इन्त्यापविद्धं कानीनमनपत्योऽकरोत्‌ सतस्‌ ॥१२॥ 
दृषरेल ¦ इतस्तख कणंसख जगतीपतेः । 
द्यो तनयो बभ्रुः सेठस्तस्यारमजस्ततः ॥ ९४ 


१ 
क | आरन्धस्तख गन्धारस्तख धमस्ततो एतः । 
 # । 


| कः 1 >^ हि ने -कपिष्ण [3 ~ व >. + 
न्ता - कअ ्भ्वन्क > क 2. (भन 
स. रै ग्नम + 4 = 4 
# तः क», कनद तकम्‌ 2 [था 2 (पको 9 कि 
1 " क „क्न च 4 = ~~ १ 
है + 1 पि 


\ = ~न कि व्यु. - 
नि ` ---\ ` 





२, ह; + 
क ह 


वि; "4 ~ 
किमक मः. 
~ कनकः । 
५५. 


धरत दुर्भनास्तसात्‌ प्रचेताः प्रचेतसं शतम्‌ ॥१५॥ 





 स्लेच्छाधिपतयोऽभूवन्वदीचीं दिशमाश्रिताः। 
तसो खतो वहवर्वहभर्गोऽथ भासुमान्‌ ॥१६॥ 
 त्रिभादस्ततपुतोऽस्यापि करन्धम उदारभीः । 
| ध  मरुतस्ततुतोऽपुत्रः पुत्र पोरषमन्वभूत्‌ ।॥१७।। 
॥ द्यन्त ¦ स पुनर्भेजे खं वंशं राज्यकाणकः । 


| ययतिज्येपत्रख यदोर्वंशं नरषभ ॥१८॥ 
1 
< 




















` णयामि महापुण्यं सवेपापहरं मृणामू । 
 यदोवंशं नरः श्रुता सवप; प्रषुच्यते ॥१९॥ 
।  यत्रा्तीणो भगवान्‌ परमात्मा नराकृतिः । 
यदोः सहसनजित्कोशा नो रिपुरिति श्रुताः ॥२०॥ 
चत्वारः दलवस्त॒त्र शतजित्‌ प्रथमात्मजः । 
महाहयो वेणुद्यो देहयश्ेति तत्युताः ॥२१॥ 
। र्भ्मस्त " हैहयसुतो नेत्रः इन्तेः पिता ततः । ` 
स नतमहिष्मान्‌ भद्रसेनकः ॥२२॥ 

भ कृतवीयंघ्चः 

| १ कृतीजा धनकात्मज।: ॥२३॥ 


1२४ 


। ५ | र 
^ 4>> कि ४७, 
<= 27 3 ४ 


= ककन ` ऋ क > कोर क - = कका = कि | १. 


१०२ श्रीमद्भागवत 


व न्व 


| अ० २३ 





उसके ग्भसे विजयका जन्म इभ । विजयक्षा धृति, 
धृतिका धरतत्रत, धृतत्रतका सत्कमौ ओर सत्कमौका पुत्र 
था अधिरथ ॥ १२॥ अधिरयको कोई संतान न थी । 
किसी दिन वह गङ्घातटपर क्रीडा कर रहा थाकिंदेखा 
एक पिटारीने नन्ह-सा दिद्यु बहा चला जा रहा हं । 
वह बाल्कं कर्णं था, जिसे कुन्तीने कन्यावश्थामें उस्पन 
हयोनेके कारण उस प्रकार बहा दिया था | अधिरथने 
उक्ीको अपना पुत्र बना ल्या ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ । 
राजा कर्णके पुत्रका नाम थां वृषसेन । ययातिके पुत्र 
दह्यसे बभरुक्रा जन्म इआ । वशुका सेतु, सेतुका 
आरब्ध, आरग्धका गान्धार, गान्धारका धमं, घमेका धृत, 
धृतका दु्म॑ना ओर दुमनाका पुत्र प्रचेता इआ । 
प्रचेताके सौ पुत्र इए, ये उत्तर दिशाम्‌ म्लेच्छांके राजा 
हए । ययातिकर पुत्र तुर्वषुका वहि, वहिंका भगे, भगंका 
भानुमान्‌, भावुमानका त्रिभानु, त्रिमानुका उदरबुद्धि 
करन्धम ओर कृरन्धमका पुत्र इआ मरुत । मरुत 
संतनद्वीन था । इसल्यि उसने पृर्वंरी दुष्यन्तकरो 
अपना पुत्र बनाकर रक्वा था ॥ १४-१७ ॥ परतु 
दुष्यन्त राञ्यक्री कामनासे अपने ही वंशम खट गये । 
परीक्षित्‌ | अब मै राजा ययातिके बडे पुत्र यदुके वंडाका 
वर्णन करता ह ॥ १८ ॥ 
परीक्षित्‌ । महाराज यदुका वंश परम पवित्र ओर 
मनुष्यके समस्त पार्पोको नष्ट करनेवाला है । जो 
मनुष्य इसका श्वंण करेगा, वह समस्त पापोसे मुक्त हो 
जायगा ॥ १९॥ इस वंशम खय भगवान्‌ परन्रह् 
श्र.कृष्णने मवुष्यके-से रूपमे भवतार दिया था । यदुके 
चार पुत्र ये-सदम्नजित्‌, नोटा, नल ओर रिपु । 
इसरजितसे रतजित्‌का जन्म हआ । शातजिद्‌के तीन 
पुत्र थे-मद्वाहय, वेणुदय ओर हेय ॥ २०-२१ ॥ 


हैहयका धमे, धमका नेत्र, नेत्रका कुन्ति, कुन्तिका 


सोहज्ञि, सोहक्जिका मष्टिष्मान्‌ ओर मदहिष्मानका पुत्र 
मद्रसेन इभा ॥ २२ ॥ भद्रसेनके दो पुत्र ये--दुमेद 
लौर धनक | धनक्के चार पुत्र इए-कृतवीय, तानन? 
कृतवरमा ओर कृतौजा ॥ २३ ॥ कृतवीयैका पुत्र अन 


| था । वद सातो द्वीपश्ा एकछ्न सम्राट्‌ था । उसने 
० | ४. संश्च | ५. ऊन्तेखतः पिता । &. इदमो । 


चः = 
"^~ ऋ ~ +~ ~ ह त > 
हन ४ नं चर ज क ^ अक कन्ठ | 4. ५१.५४ 
~ जै ~ नि~ - ९, ॐ १ 4 द य च 
र > 


च ष्कः ष क म ग रू 
> किक न्ग ग्न कन्त = = नि चे ॥ प ` ` क काक ` चा ` रच्छ ऋ स "ककि 7 क त 
= क्कः ति = द 

. 









अत्यागमहागुणः ॥२४॥ ] भगवान्‌के अंशावतार श्रीदत्तत्रेयजीसे योगवरि्ा ओर 
अणमा-ज्धिमा आदि बड़ी-बड़ी सिद्ध्या प्रात की ` 

नूः ~ तवी €~ [त काट भी 

१ चत ऋातवीयख गतिं यान्ति पाथिवाः । | ॥ २४॥ श सेद नहा क संता को भी 

- सनाद यज्ञः दानः तपस्या, योग, चाज्ञान; पराक्रम -+ 
ओर त्रिजय आदि गुणेमिं कार्तवीर्य अजुनकरी बरात्ररी ` 4 
ना कर सक्रेगा ॥ २५ ॥ सदस्रवाह अर्जुन पचाषी | 
हजार्‌ वधतकर खदा इन्दि्योसे अक्षय विषर्योका भोगं | 
पश्वारीरिशदस्नाणि यव्या तबलः समाः करता रहा । इस बीचमें न तो उसके शरीरका ब ही | 1 | 

१ 4 क्षण इजा शौर न तो कमी उसने यदी सरण किवां 4 

४ | ह रं कि मेरे धनका नाश हयो जायगा । उसके धनके नाशकौ ‡ 
. अनषटवित्तसरणो बुयुे ऽक्ष्यषडवसु ॥२६।) | तो वात ही क्या है, उसका रेस प्रमाव या किं उसके ~ 
स्मरणसे दूसरोका खोया हआ धन मी मिल जाता था॥ २६॥ 

तस्य पूत्रसहसेषुं पञ्चैवोर्वरिता मृधे । उसके हजारों पुत्रमेसे केवल पाच ही जीवित रहे । 

रार सब पर्यरामजीकी क्रोधानिमें मस्म हो गये । बचे 

शूरसेनो <= पुत्रके नाम ये--जयध्वज, श्युरसेन, वृषभ, म 

जयध्वजः शूरसेनो इषभो मधुरूभितः ।|२७॥ | दए प ! 


ओर ऊर्जित ॥ २७ ॥ 
भचभ्वजात्‌ तालजङ्गस्तस्य पुत्रशतं त्वभूत्‌ । 


त्रं यत्‌ तानङ्गाख्यमोर्षःतेजोपसंहतम्‌ ॥२८॥ 
तेवं जयेष्ठो वीतिहोत्रो ष्णि; पुत्रो मधोः स्मृतः । 
तस्य प्रशं त्वासीद्‌ शष्णि्ेष्ठंयतः लम्‌ ॥२९॥ 
माधवा इष्णयो राज्‌ यादवाश्रेति ं्गिताः। 
यदुषृत्रस्य च करोष्टोः पुत्रो बजिनवां स्ततः ॥२०॥ 
शाहिस्ततो रुदो तस्य चित्ररथस्ततः । 
शमबिन्दुमहायोगी महाभोजो महानभूत्‌ ।॥२१॥ 
चतुदंशमहारत्नथक्रवरस्यपरानितः | 
तख परत्नीषदस्राणां दच्चानां समहयश्चाः ।॥३२॥ 
इ ` दञ्चलक्षसहस्लाणि पत्राणां ताखजीजनत्‌ । 
तेषां त॒ पट्परधानानां पृुश्वस्च अत्मजः ॥३३॥ 


दि छः पुत्र प्रपान थे | प्धुश्रवाके 
‡ याधर्भ।घ 40 0 
मा नामाशना तख हयमेधशतख याट्‌ । नका नाम या भर्म | धभैका पुन उशना इजा | उस 
| | १. 3 व क ४ 9 गः श्रुत. ठ ~= । ` ~ "~ व अ: च ---- । 


न? ट्त; राक्र पराः: णिः छन्न 3 गोर मार 





दततत्रयादरररंशात्‌ 















यज्ञदानतपोयोगंशरुतवीर्यजयादिभिः ॥२५॥ 





जयव्वजके पुत्रका नाम या तागजङ्ख | ताठ्जङ्खके ` = 
सा पुत्र इए । वे ्तागजङ्ख' नामक क्षत्रिय कहब्ये। 
महषि ओवेकी शाक्तिसे राजा सगरने उनका संहार कर ~ 
डाय ॥ २८ ॥ उन सौ पतरम सत्से बडा या बीतिहोतर। ` थ 
वीतिहोत्रका पुत्र मधु हआ । मघुके सौ पुत्र ये । उनमें ५ न 
ससे बडा था इष्ण ॥ २९ ॥ परीक्षित्‌ | इन्हीं मधु, 
वृष्णि ओर यदुके कारण यह वंश माधव, वर्ष्य ओर 
यादवके नामसे प्रसिद्ध इआ । यदुनन्दन क्रष्टुके पुत्रका ` 4 
नाम॒ या इजिनवान्‌ ॥२०॥ बृजिनवानूका पुत्र हि, ` ` च 
शाहिका रुरोकु, रुरोकुका चित्ररथ ओर चित्ररथवें पुत्र- ` 
का नाम था राराविन्दु । व परम योगी, मह महान्‌ र ५ 
भोगेशचयसम्पन ओर अव्यन्त पराक्रपी था ॥ ३ १ 
चौदह रत्नो शका खामी, चक्रवती ओर युद्धम अजेय था ` 
परम यशी शराविनदुके दस्‌ हजार पलि थौ । से 
एक-एकके ` खल्ल संतान यी । इस प्रकार ` 


म 
हृ ! 



































8१२ द ¢ 
ग ~ 


१०४ भीमद्भामवत ० 


६ ३४] | सौ अश्वसेध यज्ञ किं 1 य अ | उतनाक पन इभा इक | । उरानाका पुत्र इभ रुचक । 
त्तो रुक्ख प्ासातमनाः पु रुचके पोच पुत्र ए, उनके नाम सुनो ॥ २२२४ ॥ 
पुरुजिदुक्मरक्सेषुथुज्यामधक्ञेता (3 पुरुजित्‌, रुक्म, रुके पृथु बौर ज्यामघ । ज्यामघकी पलनी 

र भार्या व्यापतिर्भयात्‌५ | का नाम था च्चैन्या | ज्यामघके बहत दिनोंतक कोई संतान 
इण सया चा रा इई। परतु उसने अपनी पत्नीके मयसे दूसरा विवाह नही 
| ए शात्रुके घरसे भोज्या नामकी 

-दच्छनरमनोद्‌ भोज्यां कन्थामहारषीत्‌ । | किया । एक वार बह अपने चद्‌ 
7 र ५ कन्या हर छाया । जब्र दौन्याने पतिक रथपर उस्‌ 
रथस्थां तां निरीक्ष्याह शेभ्या; पतिसमषिता ॥२६॥। | कल्याको देखा, तब वह विदृकर पने पतिसे बोली- 
; रथमारोपितेति पै (कपटी ! मेरे वैठनेकी जगहपर आज किसे बैठकर 
देयं हक मत्खान पेतेति वें । न द तो म 
ने सस्तकराकर अपने पति 

महिते खयन्ती पतिमगरवीत्‌ ।।२७॥ | एत्धू दै ।' शन 

स्तुभा तवेत्यभिहिते खय त्‌ त नेद बोर 
अहं बन्ध्यासपत्नी च स्नुषा मे युज्यते कथम्‌ । कोई सौत मी नदीं है । फिर यह मेरी पुत्रवधू कसे हयो 
सकती है ¢ उ्यामघने कहा-'रानी ! तुमको जो पुत्र 
जनयिष्यसि यं राज्ञि तस्मेययुपयुज्यते ।२८॥ | होगा, उसकी यह पत्नी बनेगी, ॥ ३८ ॥ राजा ज्यामधके 
इस वचनका विर्वेदेव ओर पितरोने अनुमोदन किया । 
अन्वमोदन्त तद्विवेदेवाः पित्र एव च । किर क्या था, समयपर शेन्याको गभं रहा ओर उसने 


बड़ा ही सुन्दर बाख्क उत्पन्न किया । उसका नाम 





+न क चक ॐत च क क । _ जकः चे (सि ` + न क 2 ~ 2 „ता ककार 1 ॥} सवी (६ । व्क _ ॐ + = । 
न 4 ० नः >; जः > ऋ" 9१ ध ~ न = = ` शी 9१ ००9- 9 4 
१ "= + क ् ५9 ४ ह 4 " कक व + 4: क: "~ क [ 
^ ˆ 1, | च 2  ;- 74 कन्न १1 = ०२ २ न 9 7 श्न प 3 # +: ध 
"त "न= "र ' ६ १ ए । 











ए 
१५ | ह श्छ ` >; 
भ ४ > ५ + > +: + 004 ~ 
न्क ह 


॥ शम्य गमात्‌ काले मारं सुवे शभम्‌ । इआ विदर्भं । उसीने शन्याकी साध्वी पुत्रवधू मोज्यासे 
। स विदमं इति प्रोक्त उपयेमे स्तुषां सतीप्‌॥३९॥ | विवाह किया ॥ २९ ॥ 
| थ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्षे 4 


यदुवंशानुबणने त्रयोरविंरोऽष्यायः ॥ २२३ ॥ 





क - क 4 > ^ व 4 न 
~ | # 4; 4 च ॥ । "न =^ १ + #१ 4 १ @ = ‰ 
त + ++ ~ ~ (+ 8 # भै 4 =. + {4 1७4. 
चकः च त ५ क र चवक 
3. 1 ध ८५ 
॥ + ५ ^, ^+ न्क १ ` "श - हि 
न ५७ १ ` ` वि १९१५८ 1. 4 1 , % १.३. ४ द्रः ~+ 
१ 0 { $ # ह + १४ । "५ 
+) 41 4 >, ॐ 
प न # कृषे 
न. 


ह: अथ चतुविंशोऽध्यायः 
४ विद्भके वं शका बणंन 
श्रीक उवाच भीटयकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ | राजा विदम- 


स्‌ 4 (4 


तलां विदर्भोऽजनयत्‌ पुत्रौ नाना ङशक्रथौ । | की मो्या नामक पलीसे तीन पुत्र इए कुशः कय नैर ` 
क तृतीयं रोमपाद च विदभेढुलनन्दनम्‌ ॥ १॥ रोमपाद । रोमपाद विदभवशामे ब्रहूत ही श्रेष्ठ पुर्व 
तयति हए ॥ १ ॥ रोमपादका पुत्र बभु; बभुका ति, तिः 
2 का उशिक ओर उशिकका चेदि । राजन्‌ । इस ॒चेदिके. 
व्यादवा चप ॥२॥ | वशे ही दमघोष एवं चिद्यपाक भादि इर ॥२॥ 
ष्य कन्तिः पत्रोऽमूद्‌ धटस्तस्याथ निरवतिः। | कयका पुत्र हआ दुन्ति, कुन्तिका धृर्टि, धिका नदति 
ततो दाहो नाम्नाभूत्‌ तख व्योमः सुतस्ततः ॥२॥ । निदतिका दया ओर दाका व्याम ॥ २ ॥ 


र 8 "प र 
॥ ॥ 










1 # 4 ८ ॥ #। 
५३ + न~ ८, 
कै +" \८ ~ < 
.। द व 
व + { ग भः 
क दनक 
४. ॥. 
छ 1 
"+. ^ 
` राप्पद्छुता वभ्रषभ्रा 
३ ५, ~ च 
५ 3 
"^, + ८ 
"द 4 न 
॥ 
६।५ ४ # < ॥ नै न 
च 
# (° 


--=--=----- 


१. ' नम्या | १, युज्यत्‌ | ट यम्रू। १ दन्त | 0 नुकथने 1 









। ह [| 
8 च -9 
ष. 1 
= वि › = +, , 





अ० २४] 


` जीमूतो विकृतिसतसख यस्य भीमरथः सुतः 


तत। नवरथः पुत्रो जातो दशरथस्ततः | ॥ 
करम्भिः शनेः पूत्रो देवरातस्तदात्मजः 
देवक्षतरसततत्तसख मधु; ङरुवश्ौदुः ॥ ५ ॥ 
ुरुदोत्रस्त्वनोः पुत्रस्तस्यायुः सात्वतस्ततः । 
भजमानो भजिदिव्यो वृष्णिदेवात्रधोऽन्धकः।। ६ ॥ 
सात्तख सुताः सप्त महाभोजथ मासि | 
भजमानख निम्लोचिः किङ्कणो धृष्टिरेव च ॥ ७।। 
प्कलयामात्मजाः पत्न्यामन्यस्यां च त्रयः सुताः | 
शताजिच्च सहस्चाजिदयुताजिदिति प्रभो ॥ ८। 
बभुदवाब्धसुतस्तयोः शोको पठन्त्यमू । 
यथव भृणुमो दूरात्‌ सस्पश्यामस्तथान्तिकात्‌ ।॥ ९ ॥ 
बभ्रुः श्रष्ठा मनुष्याणां देवेदृवाबृधः समः | 
पुरुषाः पथ्चषष्टिशच षट्‌ सहस्राणि चाष्ट च ॥१०॥ 
येऽम्रतत्वमनुप्रप्ना बभ्रदेवघ्रधादपि । 
महाभोजोऽपिं धमाँमा भोजौ आसंस्तदन्वये ।।११॥ 
इृष्णेः सुमित्रः पुत्रोऽभूद्‌ युधाजिच परंतप । 
शिनिसतस्यानमित्रश्च निम्नोऽभूदनमित्रतः ॥१२॥ 
सत्राजितः प्रसेनश्च निम्नखाप्यासतुः सतौ । 
अनप्नित्रसुतो योऽन्यः शिनिस्तखाथ सत्यकः ।१३) 
युयुधानः सात्यकिं जयस्तख ङणिसततः । 
युगन्धरोऽनमित्रस्य दृष्णिः पुत्रोऽपरस्ततः ॥१४॥ 
धफल्छधित्ररथथ गान्दिन्यां च श्वफल्कतः । 
अक्रूरप्रयुखा आसन्‌ पुत्रा दादश शिशवुताः ॥१५॥ 
आषङ्ः सारमेयश्च मृदुरो मृदुविद्‌ गिरिः। 
धमवृ सुकमां च्‌ ्ेत्रोपेक्षोऽरिमिदंनः ॥ १६॥ 
गन्धमादश्च प्रतिबाइुथ द्वादश । 


नवम्‌ स्कन्ध 






आति क + हि ति नि ह जक =. #। 






व्योपका जीमूत, जीमूतका व्छिति, विकृतिका भीमरथ, ` | 


भीमरथका नत्ररथ ओर नवरथक्रा दरार्थ इआ ॥ ४ ॥ 
द्रारथसे शनि, शङुनिसे करम्भि, करम्भिसे देवरात 
देवररातपे देवश्षत्र, देवक्षत्रसे मधु, मधुसे कुरुवदा ओर 
कुरूवरासे अनु इए ॥ ५॥ अनुसे पुरुदत्र, पुरुडोत्रसे 
आयु ओर आयुसे साततका जन्म हुआ । परीक्षित्‌ ! 
सात्रतके सात पुत्र हए--भ जमान, भजि, दिभ्य; वृष्णि; 
देवावृध, अन्धक ओर मद्ाभोज । भजमानकी दो पतिया 
थीं | एकसे तीन पुत्र इए- निम्डोचि, कङ्कण ओर 
धृष्ट । दूसरी पत्नी मी तीन पुत्र इए--रताजित्‌, सह- 
साजित्‌ ओर अयुताजित्‌ || ६-८ ॥ देवाद्रधके पुत्रका 
नाम धा बभु | देवावृध ओर बभ्रुके सम्बन्धे यह बात 
कदली जाती है-- हमने दूरसे जसा सुन र्खा था, 
अब वेसा ही निकटसे देखते भी है॥९॥ वभ 
मनुष्योमे श्रष्ठ है ओर देवाब्रप देवताओके समान दहै 
इसका कारण यह है क्रि बभ्रु ओर देवावृधसे उपदेश 
लेकर चोदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पदको प्राप्त कर 
चुके हे ।' साततके पुत्रोमे महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा 
था | उसीके वराम भोजवंशी यादव इए ॥ १०-११ ॥ 


























4 त 1 1. 
[१ ~क क ५007) क 2 न कक ठ 


न क ५.93 न छ ड १५ ४६५ छः एकि 


परीक्षित्‌ । वृण्णिके दो पुत्र इए-घुमि्र ओर ` 
युधाजित्‌ । युपध्राजित्के रिनि ओर अनमित्र-ये दो 4 
पुत्र थे । अनमित्रसे निम्नका जन्म इअ ॥ १२॥ ड 
सत्राजित्‌ ओर प्रसेन नामे प्रसिद् यदु्ंसी निम्नक्े ही 
पुत्र थे | अनमित्रका एक ओर पुत्र था, जिसका नाम. ` 
या शिनि । रिनिसे ही सत्यकका जन्म इ ॥ १३॥ ` ` 
इसी सत्यकके पुत्र युयुधान ये, जो सायके नामसे 
प्रसिद्ध इए । सात्यकरिका जय, जयका कुणि जर कुणि 
का पुत्र युगन्धर हआ । अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम 
वृष्णि था | बृष्णिवे दो पुत्र इए- श्वफल्क ओर चित्ररथ ~ 
श्रफल्क री पत्रीका नाम था गान्दिनी । उनमें स्सेश्रे्ठ 
भकरूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उन्न हृए-आसङ्ग, सास्य, ` 


| १ त । | # 5 | 
१ क 






॥ + 


दैववालुपदेवथ तथा 





चित्ररथात्मजाः । 


कुकुरो भजमानशथ शविः कम्बरबहिषः । 
कपोतरोमा तस्यानुः सखा थख चं तम्बुरुः 
तखाहकथाइशी च कन्या चेबाहुकात्मजा । 


देववानुपदेवश्च सुदेवो देववर्धनः । 
तेषां खषारः सप्तासन्‌ ४तदेवादयो रुप ॥२२॥ 
शान्तिदेवोपदेवा च श्रीदेवा देवरक्िता,। 
सहदेवा देवकी च वसुदेव उवाह ताः ॥२३॥। 
कंसः सनामा न्यग्रोधः कङ्कः शङ्कुः सहृरतथा । " 
राषट्पारोऽथ चष्ट तष्टिमानोर्र॑सेनयः ॥२४॥ 
कंसा कंसवती कङ्ञा श्रम्‌ राषटपारिक्षा । 
उग्रसेनदुहितरो वबसुदेवालुजच्धियः ॥२५॥ 
शरो विद्रथादासीद्‌ भजमानः सुतस्ततः । 
शिनि्तसात्‌ स्वयम्भोज हदीकस्तत्सुतो मतः।२६। 
देवबाहुः शतधलुः श्वेति तत्सुताः 
8  देवमीटख शर मारिषा नाम पल्यभूत्‌ ॥२७॥ 
तां स जनयामापत दश्च पुत्रानकल्मषान्‌ । 
¢ वसुदेवं देवभागं देवश्रवसमानकम्‌ ।।२८॥ 
 धञ्जयं स्यामकं कड शमीक पत्सकं वृकम्‌ । 
















१०६ जीमद्भामबतं 





---------------------------- = 






पथुविदृरथाद्याश्च बहवो दबृष्णिनन्दनाः ॥१८ । 


छुङ्रस्य सुतो बंहिषिंलोमा तनयस्ततः ॥१९॥ 
अन्धको दुन्दुभिस्तसादरियोतः पनवेसुः ॥२०॥ 


देवक्रथोग्रसेनश्च चत्वारो देवकात्पजाः ॥२१॥। 





| अ० २४ 








पुत्र थे देववान्‌ नौर उपदेव । शफल्कके भाई चित्ररथके 
थु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र इए-जो दृष्णिवंरिरयोमे शरेष्ठ 
माने जाते हैँ ॥ १४--१ ८॥ सात्वतके पुत्र अन्धकके चार पुत्र 
इए-कुकुर, मजमानः, चि ओर कम्बठबर्हं | उनमें 
कुकुरका पुत्र वहि, विका विक्रमा, विढोमाका कपोत- 
रोमा ओर कपोतरोमाका अनु इभा । तुम्बुरु गन्धर्वे 
साथ अुकी बड़ी मित्रता थी। अनुका पुत्र अन्धकः, 
अन्धकका दुन्दुभिः दुन्दुभिका अरिबोत, अरिवोतका पुन- 
वषु ओर पुनरवुके आहुक नामका एक पुत्र तथा आहकी 
नामकी एक कन्या इहै | आहइक्के दो पुत्र इए-- 
देवक ओर उग्रसेन । देवकके चार पुत्र इए । १९२१ 
देववान्‌; उपदेव, खुदेव ओर देववर्धन । इनकी सात 
बहिनं भी थी-- धृतदेव्य, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, 
देवरक्षिता, सहदे ओर देवकी । वसुदेवजीने 
इन सबके साथ विवाह किया था ॥ २२-२३॥ 
उग्रसेनके नौ ठड्करे थे -- कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कङ्क, 
राङ्क, सुद, राषटरपाल, सृष्टि ओर तुष्टिमान्‌ ॥ २४ ॥ 
उप्रसेनके पोच कन्याएं भी थी-कसा, कंसधरती, कङ्का, 


शूरभू ओर राषटपाटिका । इनका विवाह देवभाग आदि 


वषुदेवजीके छोटे माह्योसे हआ था ॥ २५॥ 


चित्ररथके पुत्र विदूरथसे शूर,शूरसे भजमान, भजमान- 
से शिनि, शिनिसे खयम्भोज ओर खयम्भोजसे हदीक 
हए ।२६। हृदीकसे तीन पुत्र इए-देवव्राह, शतधन्वा भौर 
कृतवमां | देवमीढके पुत्र सूरी पत्ीका नाम था मासि 
॥ २७ ॥ उन्होने उसके गभ॑से दस निष्पाप पुत्र. उत्पन्न 
किये- वपुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सज्ञय; 
श्यामक, कङ्क, शमीक, वत्सक ओर वक । ये सत्रके- 
सब बड़ पुष्यात्मा थे । वसुदेवजीके जन्मके समय 
देवताओंके नगारे ओर नौबत खयं ही बजने चो थे । 
अतः; वे आनकदुन्दुभि भी कडूलाये । वे ही भगान्‌ 
वृष्णके पिता इए । वघुदेव आदिकी पच बहन भी 
थाया ( ङुन्ती ), श्रुतदेवा, शवतकीरति, श्रुतश्रवा 
ओर राजाधिदेवी | वसुदेवके पिता श्चरसेनके एक मित्र 


र - ० रा मधन 2 -डनभोज । ततिोले कोहं संतन न शी | 


नि ज 





 „ -+ ++ क 


4 


कि क को र * केन यि क क न 








 शिद्पारः सुलखा; कथितस्तस्य सम्भवः । 


= द 





# "7, , नक्त च्छा न कक 1 ~ त (--गवककषा \ ध ५ # ए 
$ ध ४४५। 4 व = ऋ ॐ. 


[ न अ ~ 
न १ ~ + अ~ ` 
= (च 


९.२४ तवम स्कन्धे 








अयाय कोक = ५ न ज्द # 
"जन ० > # 
आः > 


न्ते ससध: पिता सूरो दपुर प्थामदात्‌ ।|३१॥ | हसल्यि शतेने उन एवा नामकी अपनी ससे बडी = 
6 , | कन्या गोद दे दी ॥ २८३१ ॥ पृथाने दुवांसा ऋषि- 
साऽऽप दुससो विदां देवहूतीं प्रतोषितात्‌ । ` | को पर्न करके उनसे देवता्ोको बुखनेकी निवा 
सीख ढी । एक दिन उस विद्याके प्रभावकी परीक्षा लेने 
के ल्य परथाने परम पवित्र भगवान्‌ सुयंका आवाहन 
किया ॥ ३२ ॥ उसी समय भगवान्‌ सूय बह्म आ 
पचे | उन्दं देखकर कुन्तीका इदय विस्मयसे भर गया । 
उसने कहा--*भगवन्‌ | सुद्चे क्षमा कीजिये । मैने तो 
परीक्षा करनेके लि हयी इस विधाका प्रयोग किया धा । 
अब आप पधार सकते हैः ॥ ३३ ॥ सू्यदेवने कहा- 
८देवि | मेरा दशंन निष्फठ नहीं हो सकता, इसि हे 
घुन्दरी 1 अब मँ तुञ्चसे एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता ह | 
हौ, अव्य ह्वी तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका 
उपाय मै कर दूंगा ॥ ३४ ॥ यह कहकर भगवान्‌ सुय 
ने गमं स्थापित कर दिया ओर इसके बाद वे खगं 
चले गये । उसी समय उससे एक बडा सुन्दर एवं 
तेजसी शिशु उत्पन्न इआ । वह देखनेमें दूसरे पूर्यके 
समान जान पडता था ॥ ३५ ॥ प्रथा रोकनिन्दासे 
डर गयी । इसस्थिि उसने बड़े दुःखसे उस बा्कको 
नदीके जल्मे छोड दिया । परीक्षित्‌ | उसी प्रथाका 
विवाह तुम्हारे परदाा पाण्डुसे इआ था, जो वास्तवमे 
बड़े सच्चे वीर थे ॥ ३६ ॥ ¦ = | 
परीक्षित्‌ परयाकी छोटी बहिन शरुतदेवाका विवाह ` 
क्ष देराके अधिपति बृद्धशमासे इआ था । उसके ` 
गर्भसे दन्तवक्तरका जन्म इआा । यह बही दन्तवक्त्र है, _ 
जो पूवैजन्ममे सनकादि ऋषियोकि शापसे हिरण्याक्ष इ 
था ॥ ३७ ॥ केकय देराके राजा धृष्ठकेत॒ने श्रुतकीतिंसे 
विवाह किया था । उससे सन्तदन आदि पाच कवैक्य 
ाजङुमार इर ॥ ३८ ॥ राजाधिदेवीका विवाह जय~ 
सेनसे इजा था । उसके दो पुत्र इए- विन्द ओर ` 
भयुविन्द । वे दोनों ही अवन्तीके राजा इए । चेदिरा (इ 











पित कनक 





॥ णि 







तस्या बीयंपरीक्षार्थमाजुदहाव रविं शुचिम्‌ ॥३२॥ 






चद ०, 9 ० 9 कि, क, 
तद्वां पागतं देवं वीक्ष्य विसितमानसा । 





प्रत्ययाथं प्रयुक्ता मे यहि देव श्षमख से ॥२३॥ 





4 ५५ 

। १ 29 

4 * ) 4 ११४ १ - + ५१ ४ ४ भी ) 
9. १४ -1 1९.11 1¶# र १ १. ३५ 
# 1 # ‰) पा» ^" कव 11 4 ९ ## १) 8 6 (क ौ 
त ‡-. च+ ९. ६ 1 ^ % 1 "1 4. । ५ ~" १ "त 
„ भ # । =^ ०१ 1. त ष | 1.1.11 न ५ + च 0 ङ > 
0४८ म 0 4 क < 0 4 3 क ५५। १ ॥ - 


= 9 ठ © 3 देषि (५ 
अमोघं दशेन देवि आधित्से तयि चारभजम्‌ । 






योनियंथा न दुष्येत कर्ताहं ते सुमध्यमे ।३४॥ 






इति तस्यां स आधाय मभ षयो दिवं गतः । 






सद्यः मारः संजज्ञे हितीय इव भास्करः ॥३५॥ 





तं सात्यजन्नदीतोये इच््टोशसख बिभ्यती । 






प्रपितामहस्तावाह पाण्डव सत्यविकमः ॥३६॥ 





शवुतदेवां त॒ कारूषो बृदधशमौ समग्रहीत्‌ । 






यस्याममृद्‌ दन्तवक्त्र ऋषिशपो दितेः सुत५।३४॥ 
कैकेयो . धृष्टकेतु भुतकीपिमबिन्दत । 







सन्पर्दनादयस्तस्य पश्चासन्‌ केकयाः सुताः ।(३८॥ 
राजाधिदेन्यामावन्त्यौ जयसेनोऽजनिष्ट ह । 


पुत्र या शिद्धपाठ, जिसका वणेन मेँ पहले ८ 1 सुप्तम्‌ 


















५ इतदान्द्‌ द०। ६ जयत्षना | 


च [- 
५५ + 0 कन 
+ ` 1 [र द 

432 -- ज्र -- 


अ 
16 ) ५ | ५ 





{ {६ । श्रीमद्भागवत [अ० २४ 


जा ोनयाकणकयकयकक ज 
च्व 





। ग ~ ---------------- 
| १ कंसवत्यां देवभवसः सुवीर शुमासतथा । = | चल ॥ ४०॥ दवश्रवाकी पी कंसवती घुवीर 
ओर इमान्‌ नामके दो पुत्र इए । आनककी पत्नी 


॥ 

ध, 

2 कङ्कायामानकाजातः सत्यजित्‌ पुरुजित्‌ तथा॥॥४९॥ | कङ्काके गर्भसे भी दो पुत्र इए-- सत्यजित्‌ भौर 
॥ 














९< पुरुजित्‌ ॥ ४१ ॥ सञ्चयने अपन पत्नी रा्ट्पालिकाके 
मषणा कृन्‌ | भसे = |च , ९ 
खयो रष्पारयां च श्षदुमषणादिकाव्‌ गभसे वृष भीर दुमधघण आदि कड पुत्र उन्न किये | 


| हरिकेशो शूरभूम्यां च श्यामकः ॥४२॥ | इसी प्रकार श्यामकने शरमूमि ८ शूरभू ) नामकी पलनीसे 


॥ | इरिकेरा ओर हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन किये ।४२। 
॥ /  . मिभ्रकेस्यामप्सरसि ृकादीन्‌ वत्सकस्तथा । | मिश्रकेसी अप्तराके गर्भसे बत्सकके भी वृक अ।दि करई 
1 | पुत्र इए । वृकने दु्ाक्षीकरे गमसे तक्ष, पुष्कर ओर 



















दुवाक्ष्यां आदधे ॥४३॥ < 

तश्षपुष्करशलादीन्‌ दु डक आदधे ।४३ राक आदि कईं पुत्र उत्पन्न किये ॥ ४३ ॥ शमीककी 
सुमित्राज॑नपालादीज्छमीकात्त खुदामिनी । पत्नी षुदामिनीने मी सुमित्र ओर अ्जुनपाल आदि कई 
बाल्क उत्पन्न किये | कङ्ककी पत्नी कर्णिकाके गर्भसे दो 


णिकाथां वे चऋतधामजयावपि ॥४४॥, 
कड्य काणक्राया वै ऋतध पुत्र इए-ऋतधाम ओर जय ॥ ४४ ॥ 


पौरवी रोणी भद्रा मदिरा रोचना इला । आनकटुन्दुमि वघुदेवजीकी पौरी, रिणी, मद्रा, 
/  देवकीपरखा आसन्‌ पल्य आनकदुन्दुभेः ॥४५॥ | मदिरा, रोचनाः शत ओर देवकी आदि बहुत-ी 
बलं गदं सारणं च दुर्मदं विषुलं शरव्‌ । पलनर्यो थीं ॥ ४५॥ रोहिर्णके गर्भसे वघुदेवजीके बलटरम, 


षिष्यं गद, सारण, दुमद, विपुर, धुत्र॒ ओर कृत आदि पुत्र 
वसुदेवस्तु ¢ ताद) द पाद्त्‌ ५५९ हुए थे ॥ ४६ ॥ पौर्ीके गर्भे उनके बा पुत्र इ7-- 
सुभद्रां मद्रवाहथ्च दुमंदा भद्र ण च। = 


मूत, सुभद्र भद्रवाह, दुमद ओर मद्र भादि ॥ ४७॥ 
पर्यानयत भूताया द्वादशाभवन्‌ ।॥४७॥ | नद, उपननद, कृतक चूर आदि मदिर ग्से यथन 
नन्दापनन्दकृतकशराद्या मदिरात्मजाः हए थे । कोसल्याने एक ह वंरा-उज।गर पुत्र उत्पन्न 
करोषल्या केशिनं त्वेकमघ्रत इखचन्दनय्‌ ॥४८॥। | किंथा था । उसका नाम था केरी ॥ ४८ ॥ उसने 
रचनायामतां जाता हस्तहेमाङ्गदादयः) रोचनासे हस्त ओर हेमाङ्गद आदि तथा इसे उरुवस्क 
॥ इलायायुखुवर्कादीन्‌ यदुशुख्यानजीजनत्‌ ॥४९॥ | जादि प्रान यदुवंशी पुत्रको जन्म दिया ॥ ४९ ॥ 
¢ + ~ विपृष्ठं धृतदेवायामेक आनकदुन्दुभेः । परीक्षित्‌ ! वघुदेवजीके धृतदेषाके गभसे विपृष्ठ नामका 

शान्तिदेवात्मजा राजज््रमप्रतिशवुतादयः ॥५०]। | एक ह पुत्र हभ ओर शान्तिदेवासे श्रम जर भरति- 
` राजानः कस्पवर्षाया उपदेवासुता दद । श्रुत आदि कईं पुत्र हए ॥ ५० ॥ उपदेवाके पुत्र 
ब्॑ससुदंशाब्ाः श्रीदेवायास्तु षट सुताः ।॥५१।। | कलपवष आदि दस राजा इए ओर श्रोदेवाके वसु, हसः 
¢ देवरधितया रब्धा नव चात्र गदादयः । षुवशा आदि छः पुत्र हए ॥ ५१ ॥ देवरक्षिताके गभसे 
् सुतानष्टावादपे सहदेवया ॥५२।। | गद भादि नौ पुत्र इए तथा जसे खयं धर्मने आठ वदुओं 
साक्षाद्‌ धों वद्ूनिव । ५ क्ियाथा वैसे ह्वी वघुदेवजीने सहदेवाके 
नीजनत्‌ गरभसे पुरुविश्चत आदि आठ पुत्र उत्यनन किये । परम उदार 
पत्रानजीजन 11: गमे = 
५५ बसुदेवजीने देवकीके गमसे भी अठ पुत्र उन्न क्वि, ` 
` धा सातके नाम है-कीरतमान्‌, सुभेण, मदरतेन, ऋजु, 


देवक्यामष्ट 





| नवम स्कन्ध । 4 
अष्टमस्तु तयोरासीत्‌ खयमेव हरिः किल । उन दोनोके अवे पुत्र खयं श्रीभगवान्‌ ही ये। 
ह परीक्षित्‌ ! तुम्हारी परम सोमाग्यवती दादी स॒मद्वा भी 

यदा यदेह धरमख श्वयो वृद्धिश्च पाप्मनः । जब-जव संघारमे धर्मका हास ओर पापकी बृद्धि 
होती है, तब-तब स्व॑शक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीहरि अ . तार 
प्रहरण करते हैँ |५६॥ परीक्षित्‌ । भगवान्‌ स॒ब्रके दश ओर 
वास्तवमे असङ्ग आत्मा ही हैँ | सव्ये उनकी आतखरूपिणी 
योगमायाके अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्मका ओर कोई 
भी कारण नहीं है ॥ ५७ ॥ उनकी मायाका विलास 
दी जीवके जन्म, जीवन ओर मृप्युका कारण है| 
यन्मायाचेष्टितं पंस; खित्युतपस्यप्ययाय हि । ओर उनका अनुग्रह ही मायाको अलग करके आत्म- 
रूपको प्राप्त करानेवाख है ॥ ५८ ॥ जब अघुरोनि 

अनुगरहस्तन्नशतेरात्मसाभाय चेष्यते ।॥५८]] | राजारथोका वेष धारण कर्‌ ल्वा जर कई अक्षौहिणी 
सेना इकट्वी करके वे सारी परश्वीको रौदने कगे, तब 

अक्षीहिणीनां पतिभिरसरचपलाज्छये १ | | पृथ्वीका भार उतारनेके ल्य भगवान्‌ मधुसूदन वडराम- 


| जीके साथ अवतीणं इए । उन्होनि रेसी-रेसी लीलां 
म अक्रस्यमाणाया अभाराय दकृताद्यमः ॥५९॥ | की, जिनके सम्बन्धे बड़े-बड़े देवता मनसे अनुमान 


मी नष्टीं कर सक्ते--शरीरसे करनेकी बात तो अङ्ग 

कमण्यपस्मियाणि मनप्तापि सुरेश्वर १ | | रही ॥ ५९-६० ॥ प्रथीका भार तो उतरा ही, साथ 
ही कट्धिुगमे पदा होनेवाङे भरक्तोपर अयुग्र र करनेके 
लये मगवानने एेसे परम पवित्र यराका विस्तार क्षिया; 
। जिसका गान ओर श्रवण करनेसे दवी उनके दुःख, शोक 
| ओर अज्ञान सब-के-सब नष्ट हो जार्थेगे ॥ ६१ ॥ 
अनुग्रहाय भक्तानां सुपुण्यं व्यतनोद्‌ यशः ।।६१॥ । उनका यरा क्या हैः चोगोको पवित्र करेवा श्रेष्ठ 
। तीर्थं है । संतोके कानेकि च्थिि तो वह साक्षात्‌ अमृत 

सिन्‌ सत्कणपीयुषे यज्षस्तीथंबरे सञ्त्‌। ही है । एक बार भी यदि कानकी अञ्लल्ंसे उसका 
| आचमन कर्‌ च्या जाता है, तो केकी वासनाए 

भ्रत्राञ्जलिरुपस्पश्य धूयते कमवासनाम्‌ ॥&२॥ निमूढ ह्यो जाती हँ ॥ ६२ ॥ परीक्षित्‌ 1 मोज, इष्णि, 
अन्धकः, मधु, शूरसेन, दाहं, कुरु, सृञ्जय ओर 

भोजब्ष्ण्यन्धक प्धुशरसेनदशाह केः । | पाण्डुवंशी बीर निरन्तर मगवानूकती रीगरओंदी आद्र 





पदा तु भगवनीर आत्मानं सृजते हरिः ॥५६॥ 
न यख जन्मनो हेतुः कर्मणो वा महीपते । 


आत्ममायां मिनेश्ख परस्य द्रष्टुरात्मनः ॥५७।। 


सहसंकषगशक्रे भगवान्‌ मधुब्दनः ॥६०॥ । 


कलो जनिष्यमाणानां दुःखशोकतमोनुदम्‌ । 


(नः वक सराहना के रते ॥६३॥ उनका स्म शीर" 

शवाषनीयेहितः शश्वत्‌ इरुवुजजपपाण्डमिः ॥९१२। | सवङगु्दर था । उन्मि उस मन किते तया | 
ोदारेवाक्थवि भपनीपरेममरी सुसकानः, मधुर चितवन, रसद बचन 
तोदारेबाक्येविक्रपरीलया. । थ 

| शोर पराक्रमप्रणं रीयके द्वारा सारे मनुष्यलोकः 
चलकर ` रमयामास भूर्यो सवाङ्करम्यया ॥६४॥ को आनन्दम सराब्रोर कर दिया या॥६४॥ ` 


क क 
“ +~ 2 -8 ॐ 


# (र # $ । त | र प 
चि न ॥ 9, १ ` ~ + नि जकः -~ 
८ 14... ~~ ~. - 9 
ज = किक क 


= 


च 


१ 


५०.३५ ~~ कन्व - "१४ भ~ „ ^~ 
त 1 0. ~ ष्‌ न्क 


१ व 
ह व अ 
क च # (1 क्क ॐ 
५१ । क (न ` ~ 
- 4 + 
= र "व व+ 
द = (1 क क म = ~ -- 
+ न क, मि * 9 4 “५ न ऋ 
+ ॥ ८4 ^+ [-“ एत ५ (9) 4 ^ ~र $ 





ध ॑ 
यल्याननं मकरङुण्डल चारुकणं- 
भ्राजत्कपोलसभगं सविलासहासम्‌ । 


नित्योत्सवं न तवपुद॑शिभिः पिबन्त्यो 














1 पृथ्व्याः सवे गुरुभरं क्षपयन्‌ डरूणा- 
` सन्तःसपुत्थकलिना युधि भूपचम्वः । 


+ क 
1 ॥ ~ 
॥ प 
{ ष (4 
~ "व नक्‌ १ ह 
र च १ ॥ि 
: न 4 र -<& "= श्य ६ 
चे ॥: कि ि 
५ तै # अवी (4 - -- ५ जयघुद्विषोष्य 
: स क विधुय 
५ "^ द्षया त ॥ # 1 
॥] ~ त >; #॥) + + त च, [) ५, 
१ ह ~ 4 ति: कवि अ-की- च> प -4. ह ५ 
४ ॥ 
,“ "~ 4 ' "यै क ह. 
न्द + कनो 9 ५ 
1 == ॥ [> @ + नि 
भ ॥ आन नन अ+ 
ि ( क ` व ॥ = छ 
१ धन ऋ +» = | ॥ ; र 
4 „ चक 


श्रीमद्भागवतं 








॥ | नार्यो नराश य॒दिताः त | 
। जातो गतः पिगृहाद्‌ व्जमेधितारथो 

। हत्वा रिपून्‌ स॒तश्तानि कृतास्दारः । 

। उत्पा तेषु पुरुषः करतुभिः समीजे 


आत्मानमात्मनिगमं प्रथयञ्जनेषु ॥६६॥ 


( ५ स ` क ~ $ | 
 प्राच्याद्रवायच परं समगात्‌ खधाम ।६७। 





| अ> २७ 





भगवानके सुषखकमल्को रोभातो निरादी दही थी] 
मकराकृत, कुण्डजेसे उनके कान बडे कमनीय माद्धम 
पडते थे | उनकी आमासे कपोोका सौन्दर्य ओर भी विख 
उठता था । जब वे विशसे साथ हस देते, तो उनके 
सुखपर निरन्तर रहनेवाठे आनन्दमे मानो बाद्-सी आ 
जाती । सभी नर-नारी अपने नेत्रेके प्यालोसे उनके 
मुखकी माधघुरीका निरन्तर पान करते रहते, परंतु तप्त 
नहीं होते । वे उसका रस ले-लेकर आनन्दित तो 
होते ही, परंतु प्क गिरनेसे उनके गिरानेवाटे निमिपर 
खीक्ञते भी ॥ ६५ ॥ ठीलापुरुषोत्तम भगवान्‌ अवतीर्ण 
इए मथुरामे वशुदेवजीके घर, परंतु बहोँ रहे नही; 
वहसि गोकुले नन्दबाबके घर चले गये | वह्नौ अपना 
प्रयोजन---जो गा, गोपी ओर गौओंको घुखी करना 
था--प्रूरा करके मथुरा छोट आये । व्रजमें, मथुरामे 
तथा दवारकाम रहकर अनेकों शरुरओंका संहार किया । 
बहुत-सी च्ियोसे परिवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्न 
कयि । साथ हयी छोगोँमे अपने खख्पक्ा साक्षात्कार 
करानेवाटी अपनी वाणीष्व्प श्रुतिर्योकी मर्यादा स्थापित 


करनेवे च्य अनेक यज्ञोके दारा खयं अपना ही यजन 


किया ॥ ६६ ॥ कोर ओर पाण्डरवोके बीच उत्पन्न 
इए आपसके कल्हसे उन्होने प्र्वीका बहृत-सा भार 
हल्का कर दिया तथा युद्धम अपनी दषे ही राजा्ओं- 
की बहत-सी अक्षौहिणियोंको ध्वंस करके संसारमें 
अञुनकी जीतका डका पिटवा दिया । पिरि उद्धवको 
आत्मतच्वका उपदेश किया ओर इसके बाद वे अपने 
परम धामको सिधार गये ॥ ६७ ॥ 





क ति शरषद्धागते पक्धुरणे वैयासिक्याम्दरसाहव्यां पारमहंस्यां संहितायां 
(~ ` नाम चतुर्विशोऽष्यायः ॥ २४॥ 





् 
४ 
ङ 


< 
= 
= 
ट 
(त | 
६ 
(द 
श 


४ 


८ 


प 


स्कन्ध 


दरम 


क ष 


दः 





= 


॥ ४। क्कि = {- 
५6: (र “= 

+ स 46४ चथ 
स 
| < ~न 
41 # 4 
१५. ६; ५ 


र ४ च इम भ १ 


क 1 3 





५५ .-र 








हृदि ॥ 





रमतां 


यद्लोदया 


क 


लारितोऽङ 
गोपालो र 


पारितो गभ ला 
रो बालो 


देवक्या षा 
यशोदयायुतो ब 


गे 


"चा च 


ना 9 


" # ष्क काति श 


| 
| 
| 
॥ 
1 


मि रि 








भ श 


कष्ट 





इ - 
० 


न क 


, 
१ भद्ध 
॥ 
।, 


` "` "नक 
प ५ चरै ३.४ षट द न 
.* ^ १ * १२ 
कै ॥ } र [३ 
४ @ + ^ 
[| । # 
-- 1 # {4 
9 -ढ 
 ; 
५ [) ^< = छ 
॥ थे |] 
[ 


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 


बतमहापुराणम्‌ 


स ~ ` ४ 

स्कन्ध . < 
| "टन 
अथ प्रथमोऽच्यायः | क 

भगवायके दारः पृथ्वीको आश्वासन, वसुदेव देवकीका विवाह ओर कसके डरा 
देवकीके छः पुत्राकी हत्या - 





` दशम 


राजोवाच 


कथितो वंश्दिस्तारो भवता सोमघ्रययोः । 


रज्ञां चोभयवंश्यानां चरितं पएरमाद्ुतस्‌ ।। १॥। 


यदोश्च धर्मशीलस्य नितरां शनिषत्तम । 


तत्ररिनावतीर्णसख विष्णोवींयाणि क्स नः ॥ २।. 


अवतीय यदोवंशे भगवान्‌ भूतभावनः । 


कृतवान्‌ यानि विश्वात्मा तानि नो वद विस्तरात्‌ ॥३॥। 


निटृत्तर्परुपगीयमानाद्‌ 


त 


उत्तमश्वोकगुणाचुवादात्‌ 


| भौपधाच््रो्मनोऽभिरामात्‌ | 


| के परम पवित्र चत्र भी मे खुनाश्ये ॥ १-२ ॥ मगान्‌ ` 4 4 


र ¬ 2 कि) ^=} अ, । 
२.१५. द * ध त कत -* त 
4 व | 
प र 
१ द्द 


















र त %‰ न 
=+ 4.11..4- 0." ग्व =, 
1 | कै) # ^ ॥ 
५ 4 क = न) नक 9 


राजा परीक्षितने पूा-मगवन्‌ ! आपने चन्द्रवंश 
ओर सूर्यवंशके विस्तार तथा दोनों वंशेके राजा्ओंका 
अत्यन्त अदूमुत चस्ति वर्णन किया । मगवानके परम प्रेमी 
मुनिवर ! आपने खमावसे ही ध्मप्रमी यदुवंकां भी 
विद वर्णन किया | अब कृपा करके उसी वंशमे अपने 
अंश श्रीबख्रामजीके साथ अवतीर्णं इए भगवान्‌ श्रीकृष्ण्‌- 


0 १ 1 ४. - 1 पी ॥ , - 
4.4 


शरीहृम्ण समस्त प्राणि्योके जीवनदाता एवं सोता है । 
उन्दनि यदुवंशे अवतार ठेकर जो-जो लीगए्‌ की, उनका ` 
विस्तारसे हमखेर्गोको श्रवण कराये ॥ ३ ॥ जिनकी 
तृष्णाकी प्यास सबैदाके व्यि बु चुकी है, वे जीवन्सुक्तं 
महापुरुष जिसका पणं प्रेमसे अतप्त रहकर गान क्या 
करते है, मुमुष्चुजनेकि च्ि जो मवरोगका रामबाण 
ओषष है तथा विषयी छोगेकि व्यि भी उनके कान जर "त २ 
मनको परम आहा देनेवागा है, भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्के _ ` 
ठेसे सुन्दर, सुखदः, रसीके, गुणालुवादसे पञयघाती 
आरमघाती मनुष्यके अतिरिक्त ओर पूसा कौन है जो 
विमुख हो जाय, उसे प्रीति न करे १॥ 9 ॥ ( ष्ण ग ८ 4 








दि अतिरयियसि मरे दादा पाण्डर्वाका युद्ध 


॥ कुरृक्षेत्रमे ५ 
ह ५7 "= ।॥ 
५ त दर ~; ऋ 5.१४ इतिनः रिः न क रेनेवल ` 
= , । हो न 1 ओर ९५ त ^ ओको क भी जीत 9 2 क खद के 
"्नूषव ` द प 

= . 9 रश््धाया अङ्‌ वता 411 अत ¢ 

0 = विरज्येत ४ \ # श 6 # 9 क. (~~. 3 कजे 0 > +. 

च एुषाच्‌ द्ध ४ ३ ¢> {  @ ह ॥ि गे ् " ऋ. ह [1 ए क क ४" 

स ४. क, = १ क ॐ £ ॥ +~ १ ष पितामहं भ) 
| + + ) क = क १ च 
ङ # 
क) = ५ # 


1 { ^~ ॥ १ 
` | ह। रद्वा या, उस्‌ समय करत स्म्‌ उन स्यि अपार्‌ ` 
`< ` & ( क 4.~ ०२५ १ न, - सेना = शु 


है 
~ _ भध १ 


समुद्रके ध ४ - ॥ 
¢ ५ १ । ४ ५: द (१९ - र्‌ ५३ -6 (स । 





[ अ० १ 


भय उस्पन्न कर रहै थे । परंतु मेरे खनाम-धन्य पितामहं 
भगवान्‌ श्रीकष्णके चरण-कमलोकी नौकाका आश्रय लेकर 
कृत्वातरन्‌ बत्सपदं स यत्वा ।। ५॥ | उस समु्रको अनायास ही पार कर गये--रीक वैसे ही 
नण्यज्विषठमिद जैसे कोई मार्गमे चलता इभा खमावसे दी ब्डेके खुर- 
द्ोष्यज्विष्ठशमिदं ष का गडा पार कर जाय | ५ ॥ महाराज | मेरा यह 
सन्तानबीजं इरुपाण्डवानाम्‌ । शरीर जो आपके सामने है तथा जो कौरख ओर 

. | पाण्डव दोनों ही वं्योका एकमात्र सहारा था-- अश्वत्थामा 

गोप इषं गत॒ आत्तचक्रो के ब्रह्माखसे जल वचुका था । उस समय मेरी माता जव 
मगवान्‌की शरणमे गयी, तब उनने हाथमे चक्र ठक 
मेरी माताके गर्भम प्रवेशा किया ओर मेरी रक्षा की ॥६॥ 
बीयाणि तसखाखिलदेहभाजा- ( केवल मेरी ह्वी बात नदीं, ) वे समस्त शारीरधारियोके 
मनत ५ भीतर आ्मारूपसे रहकर अगृतत्वका दान कर रहे हं 

र परुषकालरूपेः । | ओर बाहर काढरूपसे रहकर मृल्युका #। मनुष्यके रूपमे 

प्रतीत होना, यह तो उनकी एक लटा ह । अपि 
उन्हयंकी रेश्र्थं ओर माघुयंसे परिपूणं टीलाआका वणन 


तुश्च मे यः चरण गतायाः ॥ & ॥ 


प्रयच्छतो सत्युुतामृतं च 


ट मायामनुष्यस्य बदख विद्वन्‌ ॥ ७॥ | कीजिये ॥ ७ ॥ 

रोहिण्यास्तनयः प्रोक्तो रामः सङ्षणस्त्वया । मगवन्‌ ! आपने अभी बताया या कि बर्रामजी 
रोहिणीके पुत्र ये । इसके बाद देवकीके पुत्रों भी आपने 
~. ¶ ५ दूसरा शर विये वि 
देवक्या गभेसम्बन्धः इतो देहान्तरं विना ॥ ८ ॥ उनकी गणना क | सरा शर पारण कि विना दो 
[6 |. माताओंका पुत्र होना क्रंसे सम्भव हँ १॥ ८ ॥ अषुरा 
८. को सुक्ति देनेवाऊे ओर मरक्तोको प्रेम वितरण करनेवाले 
















क कसान्मुदधन्दो भगवान्‌ पितुगेहाद्‌ बजं गतः! मगवान्‌ श्री्ृष्ण अपने वात्सन्य-स्ेदसे भरे हए पिताका 
+ छ वाघंज्ञातिभिः सधं तवान्‌ सात्वतां पति;।। ९॥ | मकवत्सल प्रयने नन्द आदि गोप बन्धुम साय क 
= कँ निवासत किया १॥ ९ ॥ व्रह्मा ओर शंकरका 


व्रजे वसन्‌ भी शासन करनेवाले प्रन वरजम तथा सधुपुरीमं रहकर 
9 दय ५५ कौन-कौन-सी टीगरं की १ ओर महाराज ! उन्होने 


४. = ५.94 
कर ` ॥ि 

= "~` वो 
,# ॥ 


द भरात्रं चावधीत्‌ कंसं ॒मातुरद्वातदहणम्‌ ।१०॥ | डाय १ वह मामा होनेके कारण उनके दवारा मारे जाने 





=:  १खाकं। 
> प - देहधारि्ेके . 
` अन्तःकरणे अन्तयामीरूपसे शित भगवान्‌ उनके जीवनके कारण ह तथा बाहर कालसूपखे 
8 उनका नादय करते ह । अतः जो आत्मज्ञानीजन अन्तर्दिद्ारा उन अन्तयामीकी उपासना करते दैः वे मोच 


रजो विषयपरायण अज्ञानी ना. पुङ्ष बाह्मदषठिसे विषयचिन्तनमें ही लगे रहते हः वे जन्म-मरणरूप 


ज्‌ नः ५ गु 
> «< + च. ॥ 

ध |. स श दक ॐ ¶4 व > न ष "^= ६. 

धि १२ ५ र ‰ "० क चि - क न्व = # च को 

॥ का~ # ५. 3 न बक त्क +» 
द 2 ०५ क ~ न च = च 
र = (व ट ॥ भे न्ध ६८. -* * 
य ३ । # च इ ॐ ~ शैः ५ - 
= ह न 
' 4 षि ` कै ^ 3, कर 





घर छोडकर व्रजमे क्यो चङे गये १ यदुवंदारिरोमणि ` 


अपनी माके माई मामा कसको अपने हाथां क्या मार्‌ ` 


=. ~ । योग्य तो नही था ॥ १० ॥ मनुष्याकार सचिदानन्दमय ` 
ह मतुप मित्य कति वषाण इृष्णिभिः। विप्रह प्रकट करके द्रारकापुरीमे यदुवंशि्योके साथ उन्दने 





त + 






अध्याय १] 


योगयोग्याय नान्न सा णारा योना क 





दश्चम स्कन्धं 


नैक अ 
११५ 








यदुपुया सहावारशीत्‌ प्यः कत्यभधन्‌ प्रभो५\११॥ 


, # 


एतदन्यच्च सवं मे शुने छष्णविवेषटितम्‌ । 
वक्तुमहंसि सर्वज्ञ श्रदधानाय विस्वृतस्‌ ॥१२॥ 


नेषापिदुःखहा श्ुन्मां त्यक्तोदमपि बाधते । 


प॒ १ गमि त्त्‌ म्ना | 


तरूत उवाच 
एवं निशम्य भगुनल्दन साधुवादं ~ 
ग्द, (र 
वैयासकिः सख भगवानथ विष्णुरातम्‌ । 
्रत्यच्यं कृष्णचरितं कलिकरमपष्न 
व्याहतुंमारभेत भागवतप्रधानः ॥१४॥ 
श्रीक उवाच 


सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजषिसत्तम । 


वासुदेवकथायां ते यजाता नैष्ठिकी र॑तिः १५ 
 बासुदेवकथाप्रभ्र; पुरुषां्ीन्‌ पुनाति हि । 
वक्तारं पृच्छढ श्ोतुलत्पादसलिं यथा ॥१६। 


भूमिर्परृषव्याजदेत्यानीकशतायुतेः . । 


आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययो ।॥१७॥ 





(रौ 





य ानयनयय्यन्ययानययकयकनकन्याान्यनन्यान्कन्यडन्कन्न्यानयनननकन्क जी चक्क 


कितने वर्षोतक निवास किया १ ओर उन सवेशक्तिमान्‌ 
्रमुकी पलिया कितनी थीं १ ॥११॥ सुने। मेने श्रीकृष्ण 
की जितनी रीका धटी हैँ ओर जो नदी पूरी है, वे 
सब आप सञ्े विस्तारसे सुनाद्ये; क्योकि आप सबं 
कुछ जानते हँ ओर मँ बड़ी श्रद्धाके साथ उदं छुनना 
चाहता द्र ॥ १२ ॥ भगवन्‌ ! अन्नकी तो बात ही क्या, 
मैने जज्का भी परियाग कर दियादहै| फिर भी वह 
असह्य भूख-प्यास ८( जिसके कारण मेने सुनिके गलेमे 
मृत सपं डाय्नेका अन्याय किया था ) मुञ्चे तनिक भी 


| नहीं सता रदी है; क्योकि मै आपके सुखकमकसे 


इ्रती इई मगवान्‌की खुधामयी गीक-कथाका पान कर 


रदा द्रं ॥ १३॥ 


सतजी कहते ह शौनकी ¬} -ख्छानकेप्रमियेमिं 


अग्रगण्य एवं सु्वज्ञ श्रीद्युकदेवजी महाराजे परीक्षितक्रा 


एसा समीचीन प्ररन सुनकर (जो संतोंकी समामे भगवान्‌ 
की कीलके व्णंनका हेतु इभा करता है ) उनका 
अभिनन्दन किया ओर मगवान्‌ श्रीकृव्णकी उन गीगार्ज- 
का वर्णन प्रारम्भ किया, जो समस्त कलिमर्कको सदाके 
व्यि घो डाक्ती है ॥ १४ ॥ 


श्रीदयुकदेवजीने कहा-मगवान्‌के टीस -रसके रसिक 
राजर्षे । तुमने जो कुछ निश्चय किया है, वह बहत दवी 
सुन्दर ` ओर आदरणीय है; क्योकि सबके इदयाराध्य 
श्रीकृष्णकी रीग-कथा श्रवण करनेम तुम्हं सहज एषं 
घुदढ प्रि प्राप्त हो गयी है ॥ १५ ॥ मगवान्‌ श्ीङष्ण- 
की कथाके सम्बन्धे प्रन करनेसे ही वक्ता, भ्ररनकता 


ओर श्रोता तीनों ही पवित्र ह्यो जाते है जेसे गङ्गाजीका ` । 


जठ या भगवान्‌ शाग्प्रामका चरणामृत स॒भीको पवित्र 
कर देता है ॥ १६ ॥ 


परीक्षित्‌ । उस समय खो दैत्योके दल्नते घमंडी 


| राजा्ओका रूप धारण कर अपने मारी भारसे पृरष्वीको 4 
आक्रान्त कर रखा था । उससे त्राण पनेके च्ि बह ` 
| ब्र्माजीकी शरणमे गयी ॥ १७ ॥ पूथ्वीने उस समय्‌ 


गोका रूप धारण कर रक्वा था । उसके 6 नेत्रोसे १ सू ` 





("= क. 


(ऋआङ्् शा 3 च, `न च्ल 


> ) 
॥ ॥ # 





हि. 


~ ४ 
# {: । ^ ८ 








४१ =>4 ४१ । । व भ 9. ~ 
थु ^ ८4 0 अ ५ क, १: {* 


ह १ 


# चु) ऋ 2 । कः 
। न ( 
"1 3 4 ॥ + + क { “५७ ९१०० किन 
427 १. ठ नि ^ ; . ५*५-॥ + 
1 > च ॥ + ४ चै. + १ #%4 ~प र ~ 3 ५ १ 
१ र 9 - ५ । 
५1 +$ । । ॥ 4 
व) 4 ट # 
नि 9 नि 


` ए 4 
६०५७१. 1. 
~ 


॥ ॥ 
त त, र. 
नर 
व ५ * +] ह 
"ग्द 


१.१५ = (भ -> >+ + 
ह र १ र | 
(1 १.५ 
4 न 4 ञ्‌ ) 
# 










| ५८ 
` ध १. 
> ज 
५ # छ 

क). 


= 








= 

क्व £ 

ककरी ? ति 

१ द 1 ॥- = 
# 

च 
^ 


भ< 4 ; 
"द ञ्‌ „`  । 
> ~ 
3 
च _ 
8“... 
“2 ^ 
चि 
न 
५१ १ 
४1 की ॐ + 


(ति वि १ । 
# च ति य 1 # 3 


0" > 9, ` 








। ११६ ५43 ५ भरीमद्ाभवत | अ० २ 
| न्न =-= === 


उपसितासितक्षे तस्मै व्यसनं स्व॑मबोचत ॥१८॥ था ही, शरीर भी बहत कृश हो गया था | वह बडे 


ब्रह्मा तदुपधार्याथ सह देवैस्तया सह । 
जगाम सत्रिनयनस्तीरं क्ीरपयोनिधेः ।॥१९॥ 
तत्र॒ गत्वा जगन्नाथं देवदेवं वृषाकपिम्‌ । 


पुरुषं पुरुषद्क्तन उपतस्थे समाहितः ॥२०।। 
गिरं समाधी गगने समीरितां 


निशम्य मेधा्चिदालुधच ह | 


 . गां-णेशषी मे नृणतामराः पुन- 


विधीयतामाद्य तथेव मा चिरम्‌ ॥२१॥। 
परैव ` ुाबश्रतो धराज्वरो 
भवद्धिरशेयदुषुपजन्यताम्‌ । 
~स यावहुर्व्यां भरमीश्वरेधरः 


खकारक्तया श्वपयंशरेद्‌ थुबि ॥२२॥ 


` वसुदेवगृहे साक्षाद्‌ भगवान्‌ पुरुषः परः । 


ति 
7 
निहि , । 


जनिष्यते तस्याथ सम्भवन्तु सुरकषियः ॥२२॥ 


>+ क, 
+^ 
+ 
च क 

0 
न 
त 
न 
‡* ५ 
ह 
# 


चै + ॥ 
| ( म; (9 अग्रतो ५ भ. 
वा भिता देवो परियचिकीर्षया | 
~+ च्छ | ॥ | ५ ५ ॥ 
च ४ 4 प. 9 च~ १ न ॥ | ॐ ५ । । 
ध (* ५ £: ५ † £ ॐ 
9 ह ४ 
त षे 






(> ४ 0 ॐ? 
~ <: 1 
न ` +~ 
१ / -& ऋऋ 
"` ङग = देः 
् 
(- # > - | 9७५ ५। ॥ 
क्के "३ [4 
क नि 


ॐ ++ ३ ^ 
4.४ „२ ५ ॥ 
१ 2१ 


॥ 
| 
# 
न्द. + 
4. ९ 
-4 ^. 
> 


> 


भगवती थया सम्मोहितं जगत्‌ । 








क जका 
पम न्द 


करुणःखरसे रंभा रदी थी । नह्याजीके पास जाकर 
उसने उन्दं अपनी पूरी कट-कहानी घुनायी ॥ १८ ॥ 
ब्रहमाजीने बडी सहानुभूतिके साथ उसकी दुःखगाथा 
सुनी । उसे बाद बरे भगवान्‌ शंकर, खगके अन्यान्य 
प्रमुख देवता तथा गौके रूपमे आयी इई परथ्वीको अपने 
साथ लेकर क्षीरसागरे तटपर गये ॥ १९ ॥ भगवान्‌ 
देवताके भी आराष्यदेव हैँ । वे अपने भक्तोकी समस्त 
अमिलाषाँ पूर्णं करते ओर उनके समस्त क्लेशको नष्ट 
करदेते है| वे ही जगतूके एकमात्र खाभी ह । 
क्षीरप्तागरके तटपर पहंचकर ब्रह्मा आदि देवरताओंने 
"पुरुषसूक्त, के द्वारा उन्ही परम पुरुष सवान्तयामी प्रयुकी 
स्तुति की । स्तुति करते-करते ब्रह्माजी समाधिश्य हो 
गये | २० ॥ उन्होने समाधि-अवध्थामें आकाशवाणी 
घुनी । इसके बाद जगत्‌के निमाणकतां ब्रह्माजीने 
देवताओंसे कहा-'देवताओ । मैने भगवान्‌की वाणी 
सुनी है । तुमलोग भी उसे मेरेद्रारा अभी सुन खो ओर 
फिर वेषा ही करो । उसके पाठनं विलम्ब नही होना 
चाहिये ॥ २१ ॥ भगवान्‌को पृथ्वीके कटका पहलेसे 
ही पता है | वे ईशरोके मी ईश्वर है| अतः अपनी 
काल्दाक्तिके द्वारां पृथ्वीका भार हरण करते हए वे 
जबतक पृथ्वीपर लीला करं, तबतक तुमखोग भी अपने- 
अपने अदाके साथ यदुकुले जन्म लेक उनकी टीलामें 
सहयोग दो ॥ २२ ॥ वघुदेवजीके घर खयं पुरषोत्तम 
भगवान्‌ प्रकट होगे । उनकी ओर उनकी प्रियतमा 
(श्रीराधा) की सेवके चये देधाङ्गनाए जन्म प्रहण करं ।२३। 
खरयप्रकारा भगवान्‌ रेष भी, जो भगवानूक्ती कत्म होनेके 
कारण अनन्त हैँ ( अनन्तका अंशा भी अनन्त द्यी होता 
है ) ओर जिनके सहश्च सुख है, भगवानके प्रिय कारय 
करनेके लिये उनसे पठे ही उनके बड़े भाईके ख्पमे 
अवतार ग्रहण करेगे ॥ २४ ॥ मगवानकी वह रेश्वयं- 


शाणी योगमाया भी, जिसने सारे जगतूको मित कर ` 
| रक्खा है, उनकी आज्ञासे उनकी टीके कायं सम्पन्न ` 


| | करनेके वि अंशरूपसे अप्रतार प्रहण करेगी ॥ ९८५ | ॥ 


च र ४, 





+ + ऋ 








अ०१| दशम रन्ध त्र = ७ 4 9 
= वज --------------=~------~~- 
= श्रीचुकं उवाच श्रीश्यकदेवजी कहते ह-- परीक्षित्‌ ¡ प्रजापतियकि 


इत्यादिश्यामरगणान्‌ प्रजापतिपतिः ।. 
आश्वाख च महीं गीभि; खधाम परमं ययौ ॥२६। 
शूरसेनो यदुपतिर्भयुरामावघन्‌ पुरीम्‌ । 
माथुरा ज्रसेनांश् विषयान्‌ बुथज्ञे पुरा ॥२७। 
राजधानी ततः साभूत्‌ सवंयाद्वभूय॒जाम्‌ । 
मथुरा भगवान्‌ य॒च्र नित्यं संनिहितो हरि; ॥२८॥ 
तद्या तु कदिचिच्छौरिवंसुदेवः छृतोद्रहः | 
देवक्या घ्यंया साधं प्रयाणे रथमारुहत्‌ ।२९॥ 
उग्रसेनइुतः कंसः खसु; प्रियचिकीर्षया । 
रदमीन्‌ हयानां जग्राह रोक्मे रथक्षतेशैतः ।२३०॥ 
चतुःशतं पारिमं गजानां हेसमारिनाप्‌ | 
अश्वानामयुतं साधं रथानां च त्रिषटुशवतम्‌ ।॥२१॥ 
दे शते समलंकृते । 
दुहि देवकः. प्रादाद्‌ याने दुष्िरेवत्सलः ॥३२॥ 
शह्वतूयभृदज्गाथच नेदुदुन्दुभयः | 


दासीनां सुङ्मारैणां 


समम्‌ । 


पथि प्रग्रहिणं कंसमाभाष्याहाच्रीरा्‌ । 


अखास्त्वामष्टठमो गर्भो हन्ता यां वहसेऽबुध ॥३४॥ 


इत्युक्तः स खलः पापो भोजानां करपांसनः । 


भिनी हन्तुमार्धः खङ्गपाणिः कचेऽग्रहीत्‌ ॥२५।। 


तं जुगुष्डितकमौणं दृकंसं॑निरपत्रपम्‌ । 





१. वदेव उवाच 
-ाषनीयगुणः शरेभवान्‌ भोजयशस्छरः । 
< $ १ कंसो भगिन्या प्रिय०। २ जगृ | | 








प्रयाणप्रक्रमे तावद्‌ वरवध्वोः सुमङ्गलम्‌ ।॥२३॥ 






¬ . वदेव सहभाग उवाच प्रिसान्तयन्‌ ॥३९॥ 





खामी भगवान्‌ ब्रह्माजीने देवता्ओको इस्‌ प्रकार आश्ञा 
दी ओर प्रय्वीको समञ्चा-वुञ्ञाकर ढादस॒ वंधाण । इसके 
बाद्‌ः वे अपने परम धामको चङे गये ॥ २६ ॥ प्राचीन 
कालम यदुवंशी राजा ये शूरसेन । वे मथुरापुरीमे रडकर्‌ 
माधुरमण्डल ओौर शूरसेनमण्डठ्का राञ्यद्ासन करतेथे ~ 
॥ २७॥ उसी समयसे मथुए ही समस्त यदुवंशी नशपतिर्यो- _ 
की राजधानी हयो गयी थी । भगवान्‌ श्रीहरि सुवेदा वहां 
विराजमान रहते है ॥ २८ ॥ एक वार मथुरामे शरक 
पुत्र वघुदेवजी विवाह करके अपनी नधविवाहिता पत्नी 
देषकीके साथ घर जानेके ध्ये रथपर सवार इ९ ॥२९॥ 
उग्रसेनका ठ्डका था कंस । उसने अपनी चचेरी बहिन 
देवकीको प्रस करनेके स्यि उसके रथके धोड़े रास 
पकड टी । वह खयं ही रथ हँकने ठ्गा, यपि उसके 
साय सैकड़ं सोनेके बने इए रथ चठ रहे ये ॥ ३०॥ 
देवकीके पिता ये देवक । अपनी पुत्रीपर उनका बड़ा 
प्रम था | कल्याको विदा करते समय उन्होने उसे सोनेके 
हारसि अल्करृत चार सौ हाथी, पंद्रह हजार घोडे, अठ- _ ` 
रह सी रथ तथा सुन्दरसुन्दर वल्ञाभूषणोंसे विभूषित दो . 
सौ सुकुमारी दासियँ दहेजमे दी ॥ ३१-३२ ॥ विदाई ` 
के समय वरवधूके मङ्खव्वे ध्ि एक दी साथ राङ्खः 
तुरी, मृदङ् ओर दन्दुभिर्यो बजने व्गीं ॥ ३३ ॥ मागम 
जिसे समय घोडोकी रास पकड़कर कस रथ हाक रहा _ 
था, उस समध आकारवाणोने उसे सम्बोधन करये 
वहा--अरे मूख | जिसको तु रथमे गकरच्ि जारद्ञ 
है, उसवी भाव्वे ग्भकी संतान तञ्चे मार उल्गी' ॥२५॥ 
कंस बड़ा पापी धा । उसकी दुधताकी सीमा नही थी । 
वह मोजवंशका कङ्कः ही था । आकारावाणी सुनते ही 
सने तख्वार खींच डी ओर अपनी बहिनकी चोटी 4 = 
पकड़कर उसे मारनेके व्यि तेयार हो गया ॥ ३५॥ 
अयन्त क्रूर तो था ही, पाप-कमं करते-करते निखलं ` 
भी हो गया था। उसका यह काम देखकर महासा. | 
वूसुदेवजी उसको शान्त करते इए बोर--॥ ३६॥ 


की भ 
~ ५ 
ट । "~ त ५८ 
= ~ कुमार्‌ ॥ि भण, 
त 
कह कन्त ? क 
॥ 4 ग रज 3" ५५ अ „२ 
११ नैक ~ क (त ( क णे 
। =^ ५ # श 
४ > 
^ 
कुखुकीं की 














~ 


। च 0. क अ >> + =) 9 ध द, 
ट < ०, ५ द धश, =; ५० द ६२ त 5 ^... 2. १ क ~ 
भ = पुर्ण प । ॥ ४ 9३ । "१ नो र त 
कः + पु शन ~, ५.4 ४ + द ग्वा = - ऋ + & #@ + + 3 
~ त ७ च क उन # व न * .* ॥ > # ¢ 
न न ॐ ५ ४ न नि भ ४ ङ ~ न्‌ र॑ = ५३ > "च 3 [4 [च > - रे - + 4.1 
कः >€ भक 1 ब -4- 3 न र 
च थ ». च ५. ह कै = ॥ रि 4 म . थ ॥ 
> - 1 क १.५ "करौ 4 श. ^¬ ९ छ द. ‰# र. च मु क {क =+ न्द 1 16 ~, 
क क क ऋ, 6 0 ४ + तः = क क "नै + ९4 (4 
्ः ४.4. क 4 4 : = र द-प > च । । 
= £ ॥ ४ ५, च र श ४ दः ५. +^ + ष (न. चव (*६ ५ यथ । ५ 
च | ॥ ह) =: ` # ति = *१ 9. २4 त ४ # ^> न ~ च च्म, ३ > = 
= चौ" /, 9 +. 3० ` द च # ४.) "त चिः ट 4 # [ि [न गङ्ख 2; न -- 
= 1 ^ १9 ॐ "| 1 भक च~ == 4१ > ५०५4 ४५ + #* दर <~ ~र +~) 
न ५ "स न भद ¢ - - ~ २ क भ १ ह~ ३ त 
प र ए ५, ~ श टः ॥ १, रद १, ^ भ । 
.* "३ प ्॑ ५ आ ८4 { 4 (क + ६." 3 क =) | = दन $` # च ११ 
क ४ ५ + 4 १८ = र पे ६ क 
५१ ~ प न ि ५ क चैन च , & ध्‌ त (° 49 
मि व ४ न्द ~ "क - ह 1 ५ ने 
ह ~ न्क. च । > + र ५,४५ 7 
ज ~ 4 (3५१ ४ ह + 
५४ त = र न 
१ छ 








श ` ज ` शीमद्भागवत [ अ०-१ 


सः = तत क म ज यः र प ~ श जा = डो त कका उ त्‌, = म खा क छ ज = कण क 8 9 जकन अछि 


है | बड़े-बड़े ूरवीर आपके गुणोंकी सराहना करते हैँ । 
इधर यह एक तो स्री, दूसरे आपकी बहिन ओर तीसरे 
यह विवाहका च्युभ अवसर ! एेसी श्थितिमे आप इसे 
वसे मार सकते है १ ॥ ३७ ॥ वीरवर ! जो जन्म ऊेते 
है, उनके शरीरके साथ हयी मृ्यु भी उन ह्योती है | 
आजदह्ोया सौ वषके बाद-जो प्राणी है, उसकी 
रत्यु होगी हयी ॥ २३८ }! जव रारीरका अन्त हो जाता 
है, तन जीव अपने कर्मके अनुक्तार दूसरे शरीरो ग्रहण 
करके अपने पहले शरीरको छोड देता है । उसे विवद 
होकर एसा करना पड़ता है || ३९ ॥ जैसे चरते समय 
मनुष्य एक पैर जमाकर द्वी दूसरा पर उठाता है जर 
जसे जोक किसी अगले तिनकेको पकड़ ठेती है, तव 
पकड़े इए तिनकेको छोडती है-- वैसे जीव भी 
अपने कमेके अनुसार किसी दारीरको प्राप्त करनेके बाद 
दी इस शरीरको छोड़ता है | ० ॥ जंसे करई पुरुष 
जाम्रत्‌-अवस्थामें राजाके ेश्वर्यको देखकर ओर इन्द्रादिके 











स॒ कथं भगिनीं हन्यात्‌ श्िययद्राहपतेणि ॥२७॥ 
मरतयुजन्मवतां वीर देहेन सह जायते । 















अद्य वाब्दशतान्ते वा सत्युवे प्राणिनां ध्रुवः ॥२८॥ 
देहे पश्चत्वमापन्ने देही कमादगोऽवश्चः । 


देहान्तरमयुप्राप्य प्राक्तनं स्यजते वपुः ॥३९॥ 





ब्रजंसिष्ठन्‌ पदेकेन यथेबेकेन गच्छति । 
यथा तृणजद््केवं देदी कमंगतिं गतः ॥४०॥ 


| खप्ने यथा प्यति देहमीश् 


व 1० 1. 
= ~क गले - ~ - 
. 
न 


अवस्थामे ही मन-दी-मन उन बातोंका चिन्तन करते-करते 
तन्मय हो जाता है ओर उसे स्थूढ शरीरकी खुधि नदी 
रहती, वैसे ही जीव कर्मकृत कामना ओर कामनाकृत 
कमके वरा होकर दूसरे शरीर्को प्राप्त हो जाता है ओर 
अपने पहले शरीरको भू जाता है ॥ ४१ ॥ जीवका 
मन॒ अनेक विकारोका पुञ्ज है । देहान्तके समय बह 
अनेक जन्मोके संचित ओर प्रारज्ध कर्मोकी वासनाओंके 
अधीन होकर मायाके द्।रा रचे इए अनेक पाच्मोतिक 
शरीरोमेसे जिस किसी शारीरके चिन्तनमे तष्ीन क्षो जाता 
है ओर मान वैठता &ै कि यह भ द्र, उसे वही शरीर 
हण करके जन्म ठेना पड़ता है ॥ ४२ ॥ जैसे सूर्य 
चन्द्रमा आदि. चमकीढी व्तुएं जसे भरे इए घडमि 
` | या तेढ भादि तरढ पदा्ोमिं प्रतिबिम्बित होती है ओर 
1 : | इवाके किसे .उनके जल आदिक हिगने-डोढ्नेपर उनमें 
^" 4। | प्रतिनिन्बित वस्तु मी श्र जान पडती है ते ही 


स ~. 


एेशयेको सुनकर उसकी अभिलाषा करने लगता है ओर 
| मनोरथेनाभिनिविष्टेतनः उसका चिन्तन करते-करते उन्हीं बातोमें धुल-मिल्कर 
` | एक हो जाता है तथा स्वप्ने अपनेको राजा या इन्द्रके 
| चशुताम्यां मनसानुचिन्तयन्‌ ख्यमं अनुभव करने ख्गता है, साथ ही अपने ददिः 
॥ | | वस्थाके शरीरको भूढ जाता है । कभी-कभी तो जाम्रत्‌ः 






प्रपद्यते तत्‌ मिपि हयपस्मरतिः ॥४९॥ 






| यतो य॒तो धावति दैवचोदितं 


„ ‰ ऋ - 4 क्का ९ च । # ` 
१११९ = 
› ५ - २ 
9 + त ह ह + 
न ॥ 4 क छ 
\ 1 # 
। | ष † । ° ५ विकारात्मकमाप पञ्चसु | 
-> =+ ` 
2 नि + -9 
` -"ीः < । 
| क प 









न 









„ 4 ^ जन 
>> 





३ 
५ + ५०४१४ 
न ` ~< अ: पि स्क 
1१ १ ि ^“: ध ॥ 
4-#ॐ - १ # ^ १ 


४ - ॐ च ^. +~ 
~ <. {~ {7 ने # 
"क 4 
~ # रकी 










{2 3 ट -` अ 
४ दश्चम स्कन्ध ११९ 
। ` उ=-------------------------------------- 
एवं खमायारचितेप्वसो पुमान्‌ जीव अपने स्वरूपके शङ्कानां स्ये इए शरीरमं राग 
. | करके उन्हे अपना आप मान वैठता है ओर महवा 
गुणेषु रागाचुगतो विशदयति ४३} | उनके आने-जानेको अपना आना-जाना मानने गता 
॥ २ ॥ इस्ि जो अपना कल्याण चाहता दैः 
तसान्न कखचिड्‌ द्रोहमाचरेत्‌ स तथाविधः! | किसीसे द्रोह नहीं करना चादि क्योकि जीव कर्के 
अधीन हो गया है थौर जो किंसीसे भी द्रोह करेगा 
उसको शस जीवने शत्रुख ओर जीवनके बाद परलोकसे ं 
भयमीत होना ही पडेगा ॥ ४४ ॥ कंस ! यह आपकी ` 
छोरी बहिन अभी बी ओर बहुत दीन है । यह तो | 
आपकी कल्या समान दै । इसपर, अभी-अभी इसका 
विवाह इभा है, विवाहके मङ्गलचिह भी इसके दारीरपरसे 
हन्तु नाहि याणीञ्चिभां स्वं दीनवस्छरः॥ ५ नहीं उतारे है । एसी दामं अप-जेसे दीनवत्सर पुरुष- 
को इस बेचारीका वध करना उचित नदीं है ॥४५५]॥ 
६ | श्रदयकदेवजी कहते ह--परीकषित्‌ ! इ प्रकार 
3 वघुदेवजीने प्रशंसा आदि सामनीति ओर मय आदि मेद 
एवं स सापभिेदैवोष्य॑मानोऽपि दारुणः। | नीतिते कसको ब्त समञ्ञाया । परंतु बह क्रूर तो 
राक्षसोका अलुयायी हो रहा था; इसलिये उसने अपने 
घोर संकल्पको नदीं छोड़ा ॥ ४६॥ वसुदेवजीने कंस 
निबन्धं तख त्‌ जात्य विचिन्त्यानकदुन्दुभि | का विकट इट देखकर यह विचार क्या किं किसी 
6 प्रकार यह समय तो टाक हवी देना चाहिये । तब वे इस 
राच काट प्रतिव्योडभिदं तत्रान्वपद्यत ॥४७॥ | निश्चयपः पर्वे ॥ ४७ ॥ वुद्धिमान्‌ पुरुषको, जरहोतक 
यद्यसौ न निवर्तेत नाषराधोऽस्ि देहिनः ॥४८॥ | शिर प्रयल करनेवारेका कोई दोष नहीं रहता ॥ ४८ ॥ 
ं इसलिये इस मृत्युरूप कसको अपने पुत्र दे देनेकी प्रतिज्ञा 
प्रदाय सत्यवे पुत्रान्‌ मोचये कृपणामिमाम्‌ । | मै इस दीन देवकीको बचा द । यदि मेरे च्ड्के 
हृगि ओर तबतक यह कंस्‌ स्वयं नहीं मर जायगा, 
एत भ दि जायेरन्‌ शयुवौ न भ्रियत चेत्‌ ॥४९॥ | कय होगा १।। ४९॥ सम्भव है, उवाह हो । मेर 
विपर्ययो बा रि न खाद्‌ गतिधौतुदुरस्यया | लडका द्वी इसे मार डके ! क्योकि विधाताके विधानकां ज 


~+ | पार पाना बहुत कठिन है । मृत्यु सामने आकर मी टल 
उपस्थितो निवतंद नितः पनरापतेत्‌ ॥५०॥ | जती है बोर ठी इ मी छट आती है ॥ ५० ॥ 


अनर्म दारुविषोगयोगयोः | निस समय बनने बाग छाती ० कौन-सी 


शृष्टतोऽन्यम्‌ निमित्तमस्ति । 








आत्मनः शेमसन्विच्छन्‌ द्रोगधर्ये परतो भयम्‌ ।४४७।) 


एषा तवाुजा बाला षणा पुत्रिकोपमा । 


न न्यवर्तत कौरव्य पुरुषादाननुव्रतः ।॥४&।। 










११० ५ श्रीमद्भागवत [ अ० १ 


बद्व क + को तॐ `= ज च 7 चतः कन्या को गा भाज कण च्छ -किक््न्या 
[सीति 




















एवं हि जन्तोरपि इमिभान्यः र कोई कारण नहीं होता । वैसे ही किंस प्राणीका 
। कतौन-खा शरीर बना रहेगा ओर किंस हेतुसे कौन-सा 
शरीरसंयोगवियोगहेतुः ` ।\५१।। दारीर नष्ट हो जायगा--इस बातका पता खगा लेना 
बहुत द्वी कठिन हैः | ५५१ ॥ अपनी बुद्धिके अनुसार 
दसा निश्चय करके वसुदेवजीने बहुत सम्मानके साथ पापी 
पूजयामास्च द शौरिवहसानपुर {सरम्‌ ॥५२।! कंसकी वड प्ररंसा की ॥ ५२ ॥ परीक्षित्‌ ! कंस चडा 
रूर. ओर निकल था; अतः एेसा करते समय वसुदेवजी- 
प्रसन्नवदनाम्भोजो शंसं निरपत्रपम्‌ | के मनम बङी पीड़ा भी हो रही थी । किर भी उन्होने 
`| ऊपरसे अपने मुख-कमल्को प्रफुल्कित करके हँसते इए 
मनसा दूयमानेन बिहषननिदमनवीव्‌ ॥५३॥ | कहा- ॥ ५२॥ 
वसुदेव उभाव , वञ्छुदेवजीने कदा- सौम्य | आपको देवकीसे तो 
न दयस्ास्ते भयं सोम्य यद्‌ बागाहादीरिणी । कोई भय है नहीं, जेसा कि आकाशवाणीने कहा है | 
भय है पुत्रसे, सो इसके पुत्र म आपको छकर्‌ सप 
त्रान्‌ समपंयिष्येऽखा;यतस्ते भययुत्थितम्‌ ।५४॥ दगा ॥ । ८४ ॥ च 
श्रीक उवाच भ्रीद्युकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! कंस जानता 
| था कि वसुदेवजीके वचन च्ूटे नहीं होते ओर इन्होंने 
स्ंसुबधानिवदृते कसस्तदवाक्यसारवित्‌ जो कुछ कहा है, बह युक्तिसंगत भी है । इससे उसने 
9 & वसदेवोऽपितं अपनी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड दिया | 
४ श देवोऽपि तं श्रत; प्रस्य प्राविशद्‌ ग्रहम्‌ ॥५५॥। | इससे वदुदेवजी वहत प्रपन हए ओर उसकी प्रशा करके 
9 अपने घर्‌ चठे आये ॥ ५५ ॥ देवी बड़ी सती-ताध्वी 
| अथ काल उपात्तं देष ` सवेदेवता । थी । सारे देवता उसके शरीरमे निवास करते थे । समय 
( | अनेपर देवकीके गर्भसे प्रतिवषं एक-एक करके आठ 
प्राच्‌ प्रसुषुवे चाषो कृत्यां चनयुवत्षरम्‌ || ६ | पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न इड ॥ ५६ ॥ पहले पुत्रका 
नाम था कीर्तिमान्‌ । वषुदेवजीने उसे लाकर कंको 
| दे दिया । रेसा करते स्षमय उन्द कष्ट तो अवरस्य हा; 
पतु उससे भी वडा कष्ट उन इस बतका था कि 
कदी मेरे वचन ह्लूठे न हो जायं ॥ ५७ ॥ परीक्षित्‌ । 
सत्यसन्ध पुरुष बड़े-से-बड़ा कष्ट भी{सह रेते है, ज्ञानिर्यो 
को किसी बातकी अपेक्षा नही होती, नीच पुरुष बुरे से- 
बुरा काम भी कर सकते हैँ ओर जो जितेन्दिय है-- 
जिन्होने भगवान्‌को हृदयमे धारण कर रक्वा है, वे सब 
कुछ व्याग सकते है ॥ ५८ ॥ जब कंसने देखा कि 
न्यवसितिम्‌ भ्रू । | वसुदेवजीका अपने पुत्रके जीवन ओर मूब्युमे समान भाव 
क है एवं वे सत्यमे पूणे निष्ठावान्‌ भी है, तब वह बहत 
॥५९॥ | प्रसन इभा ओर उनसे हंसकर बो ॥ ५९॥ , 


सि स्म ए क पिक 








एवं विश्ृश्य तं पाएं यावदात्सनिदशेनम्‌ । 


" र \ 


। 
् 
&। 
| 
= 7 
४ त 
४, 
| 
| 
4 
॥ 
{ 
| 


~ 
४2. 
॥, 3 




















~ ~~ क क स 





अ० १ ] । दमम सकनभ चः शु | ~ 4 
ल ४ | र 

~ प्रतियातु मारोऽ्यं न हसादत्ति मे भयम्‌| | वसुदेवजी। भापस ननहे-से सुकुमार बाक्कको ॐ जाये । 
४. ठ व इससे मुञ्चे कोई भय नहीं है; क्योकि आकारवाणीने तो एसा 
माद्‌ युय योगभान्भृ्ुमे षिषितः क्षि ।॥९०॥ | वद्वा था किं देवकीके आरव गर्भसे उत्यन संतानके दवारा 

व मेरी ग्रप्यु होगी ॥ ६० ॥ वघुदेरजीने कहा--टीक दहै" 
० सुतमाद्‌।य ययावानकदुन्दुभिः । जीर उस बाख्कको लेकर वे लौट आये । परंतु उन्ं 
माद्धम था किं कंप वडा दुष्ट है ओर उसका मन उसके 

नाभ्यनन्दत तद्वादषमक्षतीऽविजितात्मनः ॥६१।॥ | दायमे नीं है । बह किसी क्षण बदर सकता है । 
इसलिये उन्होने उसकी वातपर विश्वास नहीं किया ॥६१॥ 


नन्दाद्या ये वरजे गोपा याश्चामीषां च योषितः | परीक्षित्‌ | इधर मगवान्‌ नारद कसके पास अवे 
जौर उससे बोञे कि “कंस्‌ | व्रनमें रहनेवारे नन्द 








बुष्ण॒यां गो हैव्‌ देव्‌ > य ञी 
¦ र्वाचा ववक्याचा यदुक्ञियः ।।९२॥ आदिं गोप, उनकी ज्जिय, वद्देव आदि इृष्णि 
समे वे देवताग्राया उभयोरपि भारत । यादव; देवकी आदि यदुवंशकी श्चि्याँ ओर नन्द, वद्देव 


जञातथो बस्धखटलो ॐ २ दोनोके सजातीय बन्धु-वान्धव ओर स्गे-सम्बन्धी- 
र ५ स मन्ध कसमस म्रा ९ | २ 
1 स्र-केसव देवता है; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर 


एतत्‌ कसाय भगवीान्छंसाभ्भेर्य नारदः | रे है, वे भी देवता ही है । उन्होने यह भी बताया 
मे व र | किं 'दैत्येकि कारण परीका भार भढ़ गया है, इसि 
भूमभारायमागाना दैत्यानां च मम्‌ ।६ ध ॥ | देवतार्ओंकी जरसे शब उनके वधकी तैयारी की जा 
रदी हैः ॥ ६२-६४ | जब दवि नारद इतना कहकर 
चरे गये, तब कसको यह निश्चय हो गया किं यदुवंशी 
¢ भूतं मिषु 2 देवता हँ ओर देषकीके गर्मसे विष्णुभगवान्‌ ही मुञ्च 

| देवक्या गभसभ्भूतं विषं च खवधं प्रति ॥६५॥ मारनेके ग्य पेदा होनेवाे हँ । इसल्यि उसने देवकी 
~` देवकीं वसुदें च निगृह्य नि डय ओर वसुदेवको हथकड़ी-बेडीसे जकडकर वौदमे डाक 
५ ॑ च निगडे । दिया ओर उन दोनोसे जो-जो पुत्र होते गये, उन 
कि कहीं विष्णु ही उस बाक्कके रूपमे न आ गया _ ` 
. मातरं पितरं भ्रातृन्‌ सर्वाश्च सुहृदस्तथा । | हो ॥ ६५.६६ ॥ परीक्षित्‌ । पृषवीमे यह बात प्रायः 
< देखी जाती है किं अपने प्रार्णोक्षा ही पोषण करनेवाले लोभी 

परन्ति सुषा दग्धा राजानः प्रायशो षि ॥६७। राजा अपने स्वाथंके च्थि माता-पिता, माई-बन्घु ओर 


 आत्मानमिह संजातं जानन्‌ प्राग विष्णुना हतम्‌ । 


ऋषेविति्मे इंसो यदय सत्रा सुरानिति । 


स ~ ग कन नि मि मि 
# क । } 







| है ॥ ६७ ॥ कंस जानता था कि भैं पडले काज्नेमि 
/ महासुरं कारनेमि यदुभिः स॒ व्यरुष्यत ॥६८॥ | गुर था जर्‌ विने सुश्च मार डाला या । इसे ~ 





= 
नजन {~> ~~~ +, ८... 


५ ५ त 






इ९॥।यन्घका° | भ 


५.१२ ४ ४ व [4 ठ श ॥#) 


+~ 9 अ < १६ क + १3 - 
५१ = । भ, 9 क ~ ४ ४, = ~न - ५. 
क त #- = = नीर क च म~ क “जे न्य % "५ "दै - = च ` + + “न + 2. , = ++ १ =  +4 ८ 
क % +, * ' 4 । 4 # ॐ च र = क्च 4 +~ 4 ४ + * > ॥ च 
न भ - +& ~ 0, ~ न ~ व 
1 प ६ प ^ प ~र मि > १ "~ न्न "न= अ ` ह ३ चत क 
` = ४५ =. च = र, ॐ ॥ १ का चद ८ = त > १.५ > ` च र > द > ॐ तै १ 9 ह) `" ि 
( क ॥ ४. " 4 7 न ~+ २ भन्न्मं-- ह व वद १ = ६. 8 ¶ ॥ क 
1 = क . च। खट # व नि द (क ~ प्न 4647, = - । ~ । ५. छ ५ १ ४ 7- ~न (कस्य - वके $ 4 त १ ५ ३ 5 
नय~ -- व १ प 0 १4 > क च व च ज *२१. ९ ५ ¦ ब $= ~ नरः 1 १५ > ४, क ॥ 
(4. च + क र = 3 क क "३. > त ५ (9 ^ “जच ॥ न~ र च ` च छ 
ॐ ^ १ ४ च टः १ न्व १ ^ र प [ ॐ ॥ 4 1 च्‌ = ॥) ऊ ५-* | कै [नप 
त कः ~ "मे क + क ~ द ` च ष्टं 
५ द) ५ च, 1 
ष 


च क, कर फ 



























व + ` ` भमङ्ागवत [अ०२ 









वंशे अधिनायक अपने पिता उग्रसेनको कंद कर च्या 
ल्लोर शूरसेनःदेशका राज्य वह खयं करने कगा ॥ ६९ ॥ 


4 खयं निगद बजे शरसेनान्‌ महाब; ॥।९५॥ 





इतिं श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायं दरामस्वीन्वे पूवां 
श्रीकृष्णावतारोपक्रमे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ 


अथ द्वितीयोऽध्यायः 


भगवान्‌का गर्भ-मवेदा ओर देवताओंदारा गभे-स्तुति 
श्रीक उवाच श्रीद्युकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ ! क्स एक तो 


्रलम्बवकचाणूरकणावर्तमह शनैः खयं बड़ा बली था ओर दूसरे, मगधनरेरा जरासन्धकी 
ए प शतम ज उसे बहत बड़ी सहायता प्राप्त थी । तीसरे, उसके साधी 


। ुिकारि र्द्धिविदपूतनाकेशिघेसुकं १ | १ ॥ | थे-प्रलम्बासुर, बकाछुर, चाणुर्‌, तृणावर्तं, अधघासुर, मुष्टिक; 
| 
भरिष्टास्रुर, दिविद, पूतना; केशी ओर धेनुक तथा 


(4 म अन्वैथासुरमू पाटर्बाणभौमादिभिर्युत म ६६ 

+ न्येधासुरमूपाेबाणभोमादिभिुतः । बाणासुर ओर मौमासुर आदि बहुत-से दैत्य राजा उसके 

# । | लेकर वह थदुवरिर्योको नष्ट 
यदूनां बली मागधसंश्रयः ॥ २॥ | सायक थे । इनकी साय 

 " = ल | करने खा ॥ १-२ ॥ वे खोग भयभीत होकर कुरु; 

^ १ पीडिता निवििद्यः इरुपश्वालकेकयान्‌ । पञ्चाल, केकाय, शाल्व, विदभं, निषध, विदेह ओर्‌ 

` स कोसक आदि देयम जा बसे ॥ २ ॥ कुछ खोग ऊपर- 


ात्वान्‌ विदर्भान्‌ निषधान्‌ विदेहान्‌ कोसलानपि। ३। | उपरसे उसके मनके अयुसार काम करते हए उसकी 
सेवा कगे रहे । जब कंसूने एक-एक करके देवकीके 
एके तमनुरुन्धाना ज्ञातयः पयुपासते । छ; बाल्क मार डाठे, तब देवकीके सातवे ग॑म भगवानूके 


" तष ्रोपरेचिना अदाखरूप श्रीरेषजी जिन्हे अनन्त भी कहते ईहै-- 
„ बहि दस्मा ॥ ५ ॥ | पर | आनन्दखरूपर शेषजीके गभे अनेके कारण 


/ स्मो वेष्णवं धाम यमनन्तं प्रचक्षत । देषकीको खामाविक ही हषं हआ । परंतु कस शायद 
ह इसे भी मार डके, इप मयसे उनका शोक भी बढ 
गया ॥ £-५ ॥ 








। सरभो शून देवतया हषशोकविवधनः ॥ ५ 
गवानपि विश्वात्मा विदित्वा कपतज भयम्‌ । विश्वात्मा मगवानने देला कि मुञ्चे ही अपना खामी 

व, ओर सर्वस्व माननेवाठे यदु शी कंसके द्वारा बहुत हयी 
सताये जा रहे दै । तब उन्दोनि अपनी योगमायाको यह 
आदे दिया-॥ ६ ॥ '्देविं | कल्याणी । तुम तनमे 
जायो ! बह प्रदे श्रा जौर गौओंसे उरोभित है । 

वँ नन्दबाबाके गोकु वशुदेवकी पत्नी रोहिणी निवास 


हायर => सः „~ 
चना । =. निद्रा 
र ५.६ + (>) (+. र ¶ 
७ ॥ 19  । र -, |) |, (-1 । ^ ३ तै  , 9 ॥ 
4 किया कः | 
` 1 या यमावत भरईकी आज्ञा माननी प 
~क छ ‰> ३ +~ नः 4 (1.9 एष द 
षं मगवानूने विचार किया कि (रामावः छोय भाई बना? इ ४ 
१ १६ ण ~ ॥ ॐ #१ ५ ०8 ५. 
४, ८ 4 ह~ ५० क श षः ` न्तर =>) भगवासी ् | ई 
न द नहीं १. + श्ी््णानतास | मर्ह २६ नकर = = न+ ॐ 
|: ( | व ' १२ „<. =+ र ॥ [ | ऋ 
| प ॥ # १ ५, ॥ 
४ | बडु । ८ (१ 2 
ए - ~. ॥। क ॥ । # ८ ॥ । 





व 
= 
23 


अ०२। 
अन्या कससंविग्ना विवरेषु वन्ति हि' ॥ ७॥ 


देवक्या जठरे गभे शेषाख्यं धाम मामकम्‌ । 
तत्‌ सनिभ्य रोहिण्या उद्रे संनिवेश्य ॥ ८॥ 


अथाहमंशभागेन देषक्याः पुत्रतां शुभे । 
्ाप्छामि तवं यशोदायां नन्दपलन्थां भविष्यसि] ९ । 
अचिष्यन्ति मनुष्यास्त्वां सर्वकोमवरेशरीम्‌ । 
धुपोपहारषरिभिः सर्वकामवरपरदाग्‌ ॥१०॥ 
नामधेयानि इनि यानानि च नरा धवि । 
दुगेति भद्रकालीति विजया रैष्णवीति च ॥११। 
इथ्रदा चण्डिका ढृष्णा माधवी कन्यकेति च । 

माया नारायणीश्चानी शारदेत्यम्बिकेति च ॥१२॥ 
गभसंकर्पणात्‌ तं वै प्राहः संस्पणं वि । 
रामेति रोकरमणाद्‌ बलं बरबदुचछ्रयात्‌ ।१३॥ 
सन्दिषटवं भगवता तथेत्योमिति तचः 
प्रतिगृह्य परिक्रम्य गां गता ततू|तथाकरोत्‌ ॥१४॥ 
गभ प्रणीते देवक्या रोहिणीं योगनिद्रया । 


अहो विसंसितो गभ इति पौरा विचुक्रुशुः ॥१५॥ 
भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्रः । 


आविवेशांशभागेन मन आनकटुन्दुमेः ॥१६॥ 


स॒ बिभ्रत्‌ पोरुषं धाम भ्राजमानो यथा रविः । 





करती है । उनकी ओर मी पलि कंससे डरर गुप्त ` 4 4 


स्थानमें रह रषी दै ॥ ७ ॥ इस समय मेरा वह अ ` 


जिसे दोष कहते है, देषकीके उदरमे गर्भरूपसे शित 
दै । उसे वहसि निक्राय्कर तुम रोहिणीके पेटमे र 
दो ॥ ८ ॥ कल्याणी | अव्र मै अपने समस्त ज्ञान, बल 
आदि अंशके साय देवकीका पुत्र वर्नूगा ओर तुम 
नन्दबबाकी पत्नी यञ्चोदाके गभ॑से जन्म लेना ॥ ९ ॥ 
तुम योर्गोको सुंहमेगि वरदान देनेमें ्षमथं होओनी । 
मनुष्य तुम्हे अपनी समस्त अमि्ाषाओंको पर्ण करने- 
वाी जानकर धूप-दीप, नैवेय एवं अन्य प्रकारकी 
सामग्रियोसे तम्हारी पूना करगे ॥ १० ॥ पर्वे लोग 
तुम्हारे व्ि बहते स्थान बनार्ेगे ओर दुर्गा, मदकाढी, 
विजया, दष्णवी, दुधुदा, चण्डिका, ष्णा, माधवी, 
कन्या, माया; नारायणी, ईरानी, शारदा नौर अम्बिका 
आदि बइत-से नामे पुकारंगे ॥ ११-१२ ॥ दवीके 
गममेसे खीचे जनेके कारण शेषजीको रग संसार 


| (संकषणः कदंगे, गोकरञ्ञन करनेके कारण "रामः कगे 


ओर बल्वार्नमे श्रेष्ठ होनेके कारण “वर भद्रः मी 
करगे ॥ १३ ॥ 


जब मगवान्‌ने इस प्रकार आदेश दिया, तत्र योगः 


मायाने “जो आज्ञा--पेसा कहकर उनकी बत हिरोधार्य 
की ओर उनकी ` पर्रिमा करके वे पृष्वीगेकरे चटी 


आया तथा मगवानने जेता कहा या, चैते द्वी. 
किया ॥ १४ ॥ जब योगमायाने देवकीका गर्म छे जाकर ` 
शिणीके उदरम रख दिया, तब पुखासी बडे दुःख्के । 
साय आपसमे कने कगे- काय ! बेचारी देवकीका ध ; 








यह गमं तो नष्ट दी हो गयाः ॥ १५ ॥ 
भगवान्‌ मक्ताको अभय [ञे 








प ~ # 
रः = 
करनेवाञे ह ् > => । 
„ क प । = ~ प) । 
(~ {8 2 
गृह द ९.५ न ~ च < 
: छ | १ 9 १; 
क ` -' ° "ऋश्द्धर ` ~> ५ 
4 ५ = 
वसुदेवजीके धीय 01 लव 
# । 
अपनी ५ 
क (4 (> स भ 





































„> ~ ५ 4 
१९९. श्रीमद्धागर्वतं [०९ 
> छः, त 1 गय = व्योतिरमयभशवो = 1 
. [ | ञ्योतिमय अंशको ५ 
& = गनमज्ञलमच्युतां सकता था ॥ १७ ॥ भगवानके उस्‌. 
३ व १ जो जगत्‌का परम मङ्गल करनेवाग है, वश्चुदेवजीके । 
3. समाहितं शरस्तेन . देवी । द्वारा भधान किये जानेपर देवी देवकीने प्रण किया | | 
3 जैसे पूर्वदिशा चन्द्रदेवको धारण करती है वैसेदी ` 
ॐ दधार भकमात्ससूत । 
ह 8 द सवाः द्ध ससे सम्पन देवी देवकीने विद्द्र मनसे सवात्मा । 
ई = काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं मनस्तः ।१८॥) | एवं आत्मखरूप भगवान्‌को धारण किया ॥ १८ ॥ | 
क (वास. मगवान्‌ सारे जगत्‌कै निवासस्थान ह । देवकी उनका 
` ध ग भा मी निवासस्थान बन गयी । परंतु घडे आदिके भीतर 
ध निवा्षमूता नितरां न॑ रेजे। बंद विये हए दीपकका ओर अपनी विद्या दूसरेको न 
् ध जनदेऽधिषिसे देनेवाले ज्ञानखल्की श्रेष्ठ वियाका प्रकाश जसे चारो ओर 
4 भोजन्द्रहेऽभिषिव रा नहीं पठता, वैसे द्यी कंसके कारागारे वंद देवकीकी | 


मी उतनी शोमा नही इई ॥ १९ ॥ देवकीके गमे 
भगवान्‌ विराजमान हो गये थे । उसके मुखपर पवित्र 
तां वीक्ष्य कसः प्रभयाजितान्तरां मुस्कान थी ओर उपके शरीरकी कान्तिसे बदीगृह 

विरोचयन्तीं भवनं श्॒चिसिताम्‌ । जगमगाने क्गा या | जग कने उसे देखा, तव ह = “ 
क. ् मन-दी-मन कहने व्गा--“अबकी बार मेरेप्राणेके 
1 अष मे प्राणहरो इरि ्राहक विष्णुने इसके गर्भमे अवश्य ही प्रवेडा कियादैः 


सरखती ज्ञानखले यथा सती ॥१९॥ 


^ 






रुवं भितो यन्न पुरेयमीद्शी ॥२०॥ | क्योकि इके पहले देवकी कभीरेषी न थी ॥ २०॥ ` 

किमद्य तसन्‌ करणीयमाशु मे अब इस विषयमे शीप्र-से-दीघ्र सुञ्चे क्या करना चाये! | 

4. देधक्धीको मारना तो दीक नष्टोगा; क्योकि वीर पुरुष सवाथ- ` 

[पक्ता विहन्ति क्कम्‌ । बय अपने पराक्रमको कलद्कित नही कते । एकतो ` 
 :  ल्ियाः . खसुगुरुमत्या वधोऽयं यह्‌ खी है, दूसरे बिन ओर तीसरे गर्भवती है । इसको 
&: ४ | मारेसे तो तत्का ही मेरी कीति, रक्ष्मी ओर आयु 
् ८ र यशः नियं हन्त्यलुकालमायुः ।।२१॥ नष्ट हो जायगी ॥ २१ ॥ वह मनुष्य तो जीवित रहने- 







` सष एष जीवन्‌ खु सम्परेतो पर्‌ भी मरा इजा ही ह, जो अत्यन्त करूरताका व्यवहार 
| र ह अ | र्दी ` देते 
~ बतत योऽत्यन्तनृशंधितेन । करता है । उसकी शुके वाद छग उसे गारी दते 
2 ¦ र देह मृते तं मनुजाः शपन्ति ह । इतना ही नही, वह देहामिमानियोके योग्य धोर 
^ 4 नरकमे भी अवद्य-अवर्य जाता है ॥ २२ ॥ यचि 
` तमोऽन्धं तनुमानिनो धुवस्‌॥२२॥ | कंस देवकीको मार सकता था, कितु खयं हयी वह. इस ` 
३ तम | लय भावात्‌ संनिवृत्त; खयं प्रयुः अत्यन्त क्ररताके विचारसे निदत्त हो गया । अन 
आस्ते म्रती्ष्॑तजन्म हरषे च बरातुबरन्धद्त्‌ ॥२३॥ | मगवान्‌के प्रति द़॒ वेरका भाव मनम १ छक ^ न्धछ्त्‌ ॥२३॥ | भगवान प्रति दढ वैरका भाव मनम्‌ गँठ्कर उनके 


र 












"व 


मङ्गलचिहको न 4, 
क = द 


५: दः 





५. ‡ उ्रोगसे क - +.“ 
८ ॥ 
् # देवकीके - 74 
1 आज [अ जि क छ दि ~“ 
$  ; = 39 ¢ 4 
१६ "८ वृहू कैः भ 9 त 
> 9 ° २ ® + स शु कः 
र „^ 3 (त य ग ५ “^~ १.१ ; 
9 ष 4 ॥। नि द्वः , ॐ = 
ऊ 9 चनः होन ४: 4 
वः ई: 9 इ, [ 
कोई ~ 
७ 


५९ २९/८५ [४ 29 ॐ के दद ; 
7. 
न 


अ० २ | 











आसीनः संविशंसिष्य्‌ भुञ्जानः पटन्‌ महीम्‌ । 


। + 


चिन्तयानो हषीकेशमप्रयत्‌ तन्पसं जभत्‌ ।॥२५॥ 
रह्मा भवश्र तुत्रैदय सुनिभिनौरदादिभिः | 

| भ $ ८ 0 अ 
सासुखरः वाश सीिद्ेपणमेडयस्‌ २९५ 


देवैः 


सत्यव्रतं शस्यपरं भि्त्यं 


सत्यश्च योनिं भिहितं च श्ये । 


सस्यख्य सरयश्रतसस्यनेत्र 


इत्यात्म स्वा रण प्रपक्षः ॥२६। 
दविफलश्िभूर- 


एक्ायनोऽसी 


पृश्चविधः पडता । 


तूरः 


सुपत्वगटविटपो नवाक्षो ` 


# 0 9 0 ^ 17) 


पै श च के हि 
. # क "म्न . + क प्के | 
१ ॥१ र + +, ४./ 
~ ८ ह 3 च | 
॥ कि 9 9 ५. 
्ः 4 - ४ "५5 १ क्न = | 
3 ५ ष ॥ ५ = 
^ द + { 
नरि. 4 \ छ, । 
& ॥ 3 ॥ च #< श“ 
क ~ † 
त ॥ ४, „ ० क ग ^ 4 न ए 
® > ध न जय ॥ ॥ 
6 = 
५ नि +~ ^क ^ 
नि ण्यक # 
| 











प्रतीक्षा करने गगा ॥ २२ ॥ वहः उल्ते-वैवते, ` ~ 
खाते-पीते, सोते-नागते जीर चर्तेकिरते- स्वेदा दी ` 
श्ीकृष्णके चिन्तने खगा रहता । जहा उस्की आख _ 
पडती, जौँ कुछ ,खड्का होता, वहाँ उसे श्रीकृष्ण 
दख जते । इस प्रकार उसे साग जगत्‌ ह्वी शीकृष्ण- 
मय दीखने चणा ॥ २४ ॥ 
परीक्षित्‌ | मगवान्‌ शंकर ओर ब्रह्माजी कंसके 
कैदखानेमे आये । उनके साय अपने अनुचरोके सष्ित 
मस्त देवता भौर नारदादि ऋषि भी थे। वे छोग 
सुभधुर वचनोसे सबकी अभिव्या परण करनेवाले 
्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति करने कगे ॥ २५ ॥ 
“प्रमो | आप सत्यसङ्कव्प ह । सत्य ह्वी आपकी प्राप्तिका 
रेष्ठ साधन है । सिके पूवे, प्रख्यके पश्चात्‌ जर ` 
संसारवी सितिके समय--इन अत्य अवस्थाअमिं भी 
आप स॒त्य है | परी, जठ, तेज, वायु ओर आकारा 
इन र्पाोच द्दयमान स्योके भाप ही कारण ह बौर ` 
उनम अन्तयाभीखूपसे विराजमान भी है । आप इस 
दररयमान जगतके परमाथंखल्प है । आप दी मधुर ` 
वाणी ओर समदर्शनके प्रव॑तक है । मगवन्‌ | अप तो 
बस, सत्यखरूप ही है । हम सब आपकी दारणं अये 
है ॥ २६ ॥ यह संसार क्या है, एक सनातन बक्ष | 
इस दृक्षका आश्रय है-- एक प्रकृति । इसके दो फठं ` 
है घुख घौर दुःख; तीन जडं ै- सत्वः रज ओर 
तम; चार स्सर्है- घर्म, अर्थं, काम ओर मोक्ष |` 
इसके जाननेके पोच प्रकार है श्र्नः तचा, नेत्र, ` 
रसना ओर नासिका । इसके छः खमाव है-पेदा होना, ` 
रहना, बढ़ना, बदग्ना; घटना ओर नष्ट हो जाना । ` 
इस इ्षकी छठ हँ सात धातुर्प-रसः रुधिर) मास, मेद 
अखि, मज्जा ओर शक्र । आठ शाखाए्‌ है-्पोच 
महामूतः मन सुद्धि ओर अद्वार । इसमे र इव अ दि = 
| नवों दवार खोड है पराण, अपानः व्यान, उद पमान? 


† 
| 
् 
३ 














के == 
च, 4 
> कक 


भि क ०4 { ० 





































१२६ क ` श्रीमद्भागवत [ अ० २ 





+ करोनि क क " ऊ कोर = ` 





"णिग 











खः चछ ऋः भणि य क च यः जक कः पि, जा चो जा पोर" चि च 


8 4 ॥ त्वमेक  एवाख शतः ग्रति है जीव ओर ईश्वर ॥ २४७ ॥ इस्‌ ससारख्प वृक्षकी 
उत्पत्िक्े आधार एकमात्र आप ही है | जपे ही 
स्त्वं संनिधानं त्वमयुगरहथच । इसका प्रग्य होता है ओर आपके दही अचुग्रहसे इसकी 
=] संते रक्षा भी क्ोती है | जिनका चित्त आपकी मायासे आवृत 
४, ध हो रहा है, इस क्व्यको समश्चनेकी शक्तिखो वे दहै 
पश्यन्ति नाना न शिपश्चितो ये ॥२८॥ | वे ही उत्पत्ति, सिति ओर प्रलय करनेवाले ब्रह्मादि 

| देवताओंको अनेक देखते हँ । तत्त्वज्ञानी पुष तो सबवे 
 बिभषिं रूपाण्यवबोध आत्मा , | ख्पमें केवर आपका ह्वी दशरन करते है ॥ २८ ॥ 
आप ज्ञानखरूप आत्मा है । चराचर जगते कल्याणक 
चि ही अनेकों रूप धारण करते ह । आपके वे खूप 
सत्लोपयन्नानि सुखावहानि | विहयुद्ध अप्राकृत समय होते हैँ ओर संत पुरु्षोको 


\ {र बहत सुख देते है । साथ ही दु्ोको उनकी दुष्टताका 
सतामभद्राणि . य॒हुः नाम्‌ ।॥२९॥ 1 अनक सी तीर 


तय्यम्बुलाक्षासिलसत्वधाम्नि है ॥ २९ ॥ कमच्के सुमान कोमल अनुग्रहमरे नेत्रोँवाठे 
तथेत प्रमो | ङछ बिरके लोग ही. आपके समस्त पदार्था ओर 
समाधिनाऽऽवेशितचेतसंकै प्राणियोके आश्रयखरूप रूपमे परणं एकाग्रतासे अपना 

$ चित्त खगा पाते है ओर आपके चरणकमलरूपी जह्ाज- 
ाद्पातेन ध इत का आश्रय लेकर इस संसारसागरको बछ्डेके घुरके 
र्वन्ति गोवत्सपदं भवाश्धिमर ॥३०॥ | गढेके समान अनायास ही पार कर जते हैँ । क्यो न 

हि सर हो, अबतकके सताने इसी जहाजसे संसारसागरको पार 
+ खयं स सुदुस्तरं ॒दयुमन्‌ जो किया है ॥ ३० परम प्रकाशखखूप परमात्मन्‌ । 
व ९, आपके भक्तजन सारे जगत्‌के निष्कपट प्रेमी, सच्ये 
भवाणव भीममदभसोहदाः । | हितेषी होते है । वे खयं तो इस भयङ्कर ओर कष्टसे 
पार करनेयोग्य . संसारसागरको पार कर दही जति है, 
विंतु ओरोके कल्याणके च्वि भी वे यह आपके चरण 
कमलोकी नोका स्थापित कर जाते है | वास्तवे 
सुदुर्षोपर आपकी महान्‌ कृपा है, उनके ग्ि आप 
अनुप्रह्रूप ही ह ॥ २१ ॥ कमढनयन | जो डोग 
भापके चरणकमर्लकी रारण नही ॐेते तथा आपके 
प्रति भक्तिमावसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी 
छद नदीं है, वे अपनेको श्यूठ-मूढ मुक्त मानते है । 
तोवेब्द्ध दी है| यदि बड़ी तपस्या जर 
सापनाका कष्ट उठाकर किसी भ्रकार ऊचे-से-ऊचे पदपर 
` | भी प्च जाय, तो मी बहस नीचे गिर जते हैँ ॥३२॥ 
| श तु भगवन्‌ | जो आपके अपने निज जन है, 


~ = * 9 
५ मः क ्र.# ॥ 
कः नै # 
श # ॥ नार च । । 
१ चि, +&; ह \ ^ र च 
~ "भि ३ 22 =, ॥ -+ + ४. च „च ् + 
न य न - "१ - ट क 
= # = (द - 9 क (न ~ ~ = ~ 4 7 +^ # + न न्क 
¶ ५ 4 "4 1 + ४ ब 
ज 1 ॥ ०, + वतो १ 


क्वेमाय लोकस्य चराचरख । 


[{५-4. „ 2 नि 
^. > 4 ह # च~ 
ष ७. 
19 ककन 


-$१८ . क 9 
त त त ज क = > + क 


त => ¶ ७ = च "ते 2 । ; 
- वे क 0 


२१९ य ज » [+ 
हि ॥ ४ 
= न्नै जन्त र = दक्कन्य दैे = प 
गअम. 
क 


¢ ॥३ | 1 + 
च+ ह # १ # # ५१ जर 
(क १ नि १. ० (= ५ 
[1 श 0 0 द 
१ ३. ब, नि क ज नि निक 
#१ ३ ११ 
ि ॐ ११ 
4 "159 १४ 
[4 
; 





ग ° ~ 


वि कियो 





अ० २] 








त्वथाभिगुक्षा विचरन्ति निर्भया मागसे गिरते नहीं । भ्रमो । वे बड़े-बडे वित्न स 
विनायद्छानीकपमूरधसु  प्रमो॥२३॥ त न म न 
शरीरिणां शेयउपायनं॑वपुः । कल्याण प्रदान करेवा विद्र सवभय, सचिदानन्द- 


मय परम दिव्य मङ्खल-विप्रह प्रकट करते ह । उस्‌ 


वेद्क्रियायोगतपःसमाधिभि- रूपके प्रकट होनेसे द्वी आपके भक्त वेदः कर्मकाण्ड, 

6 + अष्टाङ्गयोग, तपस्या ओर समाधिके दवारा आपकी जआराघना 

१ | थेन जन; समीहते ।२५॥ करते है । बिना किसी आश्रयके वे किसकी आराधना 

सत्तं न चेद्धातरिदं निजं भवेद्‌ करेगे १॥ ३४ ॥ प्रभो ! आप सबके विधाता है । यदि 
आपका यह विद्युद स्मय निज खूप न हो, तो 

विज्ञानमज्ञानभिदापमाजनम्‌ । अज्ञान ओर उसके द्वारा होनेवाऊे भेदभावको नष्ट करने- 

वाका अपरोक्ष ज्ञान दी किंसीको न हो । जगतम 

गुणप्रकाशेरनुभीयते भवान्‌ दीखनेवाङे तीनों गुण आपके हैँ ओर आपके हारा ही 


प्रकाशित होते है, यह सत्य है । परंतु इन रर्माकी 
प्रकाञ्चक बृत्तर्येसे आपके खरूयका वेवढ अनुमान ही 
होता है, वास्तविक खरूपका साक्षात्कार नहीं होता । 
( भापके खरूपका साक्षात्कार तो आपके इस॒॒विशद्ध 
सुत्वमय खख्यकी सेवा करनेपर आपकी कृपासे ही 
होता है ) ॥ ३५ ॥ मगवन्‌ ! मन ओर वेद-वाणीवे 
मनोवयोभ्यामलुमेयवरत्मनो वारा केव आपके खरूपका अनुमानमात्र होता हैः 
क्योकि आप उनके द्वारा द्य नही; उनके साक्षी हं । 
देव क्रियायां प्रतियन्त्यथापि हि ।३६॥ ¦ सन्य भापके गुणः जन्म ओर कमे आदिके दारा 
न आपके नाम ओरं रूपका निरूपण नही विया जा 
भृण्बन्‌ गृणन्‌ संखरयंश्च चिन्तयन्‌ सकता । फिर भी प्रमो ! आपके मक्तजन उपासना 
२ आदि त्रियायेगके रा आपका साक्षात्कार तो क्रते 

नामानि सपि ब ग द । ॥ ३६॥ जो पुर भे म्य ४,९.५ 

य॑स्त्वच्रणारषिन्दयो- का श्रवण, कीतन, स्मरण ओर ष्यान करता 

निता सा आपके चरणकमर्गोकी सेवामे ही अपना चित्त च्गाये 
राविष्टचेतां न॒ भवाय कल्पते 1३७] रहता है-- उसे फिर जन्ममृत्युरूप संसारे चक्रमे 

नहीं आना पडता ॥ ३७ ॥ पुपूणं दुःखंकि दहरनेवाले | 

दिष्टया हरेऽस्या भवतः पदो शबो ` मगवन्‌ ! आप सरवे दै । यह्‌ पृथ्वी तो आपका 

| ¦ चरणकमल दी है । आपके अवतारसे इसका मार दूर हो 

भारोऽपनीतस्तव जल्मने्ितुः। ¦ गया । न्य है | प्रमो । हमारे च्वि यह्‌ बड़े सोमाय ~ 

। ६. शुगकमजन्मभिनि° । २* वः । ३. युष्मचर० । ४ चितो । ह 


प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः । २३५ 
न॒ नामरूपे गुंणजन्मकर्मभि- 


निरूपितव्ये तव तख साधिणः । 














¢" 9 | ४. 
जोक क ज ॐ. क, क, क) न क 3 
क~ चदु ^ च चं 5६ ऋ 1 क # ~क == » क ॥ 
। ? ~ वै नि 
ति जै ह ॥ 
छ 





१२८ | ीमङ्कामवत | [अर 


दिष्टवाङ्कितां त्वत्पदकैः सुश्ोभनै- की बात है कि हमणेग भापके घुन्दर-सुन्दर चिहोसे 
६ युक्तं चूरणकमच्टोके द्वारा विभूषित परथ्वीको देखंगे ओर 
द्याम गां चां च तवालुकम्पिताभ्‌।२८॥ | खर्मोकको मी थापवी कपास कृतार्थं देदेग ॥ २८॥ 

न॒ तेऽभवस्येश भवख कारणं प्रमो | आप अजन्मा हैँ | यदि आपके जन्मके कारणक 
[त तवाम सम्बन्धमें हम कोई तकंना कर, तो यद्यी कह सकते हैँ 

विना ९ बत तकयामे । कि यह आपका एक रीत्म-विनोद है । रेसा कहनेका 

भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्यया कारण यह है कि आप तो द्वैतके लेदासे रहित सर्वा 

¦| छता यतस्स्दय्यभयाश्रयात्सनि ।२९॥  िषठानखरूप ह ओर इत जगलकी उपपि, सिति तया 
५ | परल्य अज्ञानके दारा आपमे रोपित हैँ ॥ ३९ ॥ 








ऋ 
च 


॥ मत्याश्वकच्छपसूर्िंहवशहहस- प्रमो | आपने जसे अनेकों वार मत्स्य, हयप्रीव, कच्छप, 
| राजन्यविप्रविबुधेषु कृताषतारः | सिह, वर, € ध क ओर 32 अवतार 
| लिव ाधन | धारण करके हमकगोंकी ओर तीनों ोकोकी रक्षा की 

त्वं पासि नक्ञि्वनं च यथाधुनेश | है- वैसे ही आप हस वार भी पृथ्वीका भार्‌ हरण 


भारं बो हरं यदृत्तम बन्दन ते ॥॥७०।। | कीजिये । यदुनन्दन ! हम आपके चरणोमें वन्दना 
| करते हैः | ४० ॥ [ देवकीजीको सम्बोधित करके ] 


| दिषटथम्े ते इकषिगतः परः पुमा- (माताजी | यह बड़े सौ माम्यकी बात है कि भापकी कोखमे 
च नरेन साक्षा भगवान्‌ भवाय नः | | हम सबका कल्याण करनेके लये खयं मगवान्‌ पुरुषोत्तम 
| मा भूद्‌ भयं भोजयतः | अपने ज्ञान, बर आदि अंशकि साथ पधार हैँ | अव 


ऋक 9), भा ज्ञ 
# 


| प कंसे तनिक भी मत डरिये । अब तो वह कुछ 
ही दिर्नोका मेहमान है । आपका पुत्र यदुवंशकी रक्षा 
करेगा" ॥ ४१ ॥ 

। श्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! ब्रह्मादि 

। देवताओने इस्‌ प्रकार भगवानूकी स्तुति की । उनका 
ख्य “यह हैः इस प्रकार निधितङ्पसे तो कहा नहीं 

एत्यभिषटय ध. भतुस्पमनिद्‌ . यथा । जा सकता; सब अपनी-अपनी मतिके अनुसार उसका 
निख्पण करते है । इसके बाद ब्रह्मा ओर शंकरजीको 

ब्रह्मेशानो पुरोधाय देवाः प्रतिययुदिवम्‌ ॥४२॥ | भगे करके देवगण खर्भमे चरे गये ॥ ४२ ॥ 

इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे 

 गमंगतविष्णोत्रहमादिकृतस्तुतिनाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ 


ग्ना यदूनां भविता तवात्मजः ॥४१॥ 








श्रीयुक उवाच 


=> -० = -- ~ । 
= # ग 0 भः # ॥ | नि ५ ष क.) . 
=+ ^ १ # + १४ । र ्‌ ४ 


; ॐ (2 - 
+ & १९५. = । 













अथ तृतीयोऽध्यायः 
भगवान्‌ आीकृष्णका पाकस्य 
॑ भीद्युकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! अब समस्त 


णापित, कालः परमशाभनः । | य॒म युणसि युक्त बहत खावना समय आया । रोहिणी. 


अक क 9 


क ष क. ५, 2, [2 कि 9 नीमि त व ` 11 1 9 0 1 २१ [क 9 8 1 पा १ चे, , = क 


^ [ 1 
ॐ च चः ऋ जे = चतो = जे कः + चः अ जः ज जनः + नि 


~ भी ` का 














च द्म स्कन्ध १२९९ ` 
नच्च चयन जजज~्ज === | 
य्चवाजनजन्मधं शान्तकषग्रहतारकम्‌ । १॥ | नक्षत्र या । भाकारके समी नकषतर ह भौर तरे शान्त-- « ` 
¦ म्य हो रहे ये+#॥१॥ दिशा खच्छ-प्रसनयी। निर्म 
दिशः प्रसेदुगंमनं निर्मलोडगणोद ५ 
५ स १ । भकारे तारे जगमगा रद ये। प्रथ्वरीके बडे-वडे नगर - छोटे 4 
= ~~ | 


# जैसे अन्तःकरण शुद्ध होनेपर उसमे भगवानका आविभांव होता डः श्रीकृष्णावतारके अवसरपर भी टीकर उसी 
प्रकारा समष्टिक़ी शुद्धिका वर्णन किया गया है ] इममे काल, दिद्याः प्रथ्वी; जक, अग्निः वाधः आकराः मन ओर 


आत्मा--इन नौ द्रव्योका अरूग-अल्ग नामोच्डेल करके साधक्रके स्यि एक अस्थन्त उपयोगी साधन-द्वतिकरी ओर संकेत 
क्रिया गया हे | 
क्मङछ-- 


मगवान्‌ कार्ते एे है । यासौ ओर सपपुरषोके दवारा ठेवा निशू्पण चुनकर काठ मानो करुद्ध हो गया था ओरं 
सद्रूप धारण करके सवनो निगल रहा था । आज जब्र उसे मादस हुआ करि खयं परिपूणंतम भगवान्‌ श्रीकृष्ण मेरे 
अंदर अवतीणं हो रे दैः तवर वह आनन्दे भर गया ओर समस सदूगुणोको धारणकर तथा सुदावना बनकर ग्रकट 
हो गया | 
दिशा- 


१. प्राचीन शाखमिं दिशाअओंको देवी माना गया है । उनके एक-एक खामी मी . हते दै जेसे प्राचीके इन्द्रः 
प्रतीचीके वरण आदि । कंसके राञ्य-काङम ये देवता पराधीन-कैदी हो गये ये । अवर भगवान्‌ श्रीकृष्णके अवतारे 
देवतार्ओकरी गणनाके अनुसार म्यारह-बारह दिनम दी उन्द छुटकारा मिरु जायगाः इसख्यि अपने पति्थोके सङ्गम 
सौमाग्यका अनुसंधान करक देविय प्रसन्न हो गथीं । जो देव एवं दिशचाके परिच्छेदसे रदित दै" वे दी प्र॒ मारत देशके , 
ब्रज-प्रदेशमे आ रे ई, यह अपूर्वं आनन्दोरखब भी दिकाओंकी प्रसन्नताका देत्‌ ह ! 9 

२. संस्कृत साहित्यमे दिश्याओंका एक नाम (आद्याः मी है । दिधाओंकी प्रसन्नताक्रा एक अर्थं यह भी हे किं अब 
सत्पुर्षोकी आशा-अभिलाा पूणं होगी । | 

३. विराट्‌ पुरुषके अवयव-संस्थानका वणेन करते समय दिशा्ओको उनका कान बताया गया है । श्रीक्ृष्णके 
अवतारके अवसरपर दिशा मानो यद सोचकर प्रसन्न हो गयीं कि प्रथु अयुर-असाघु ओके उपद्रवे दुखी प्राणियोकरी 
प्रार्थना सुननेके स्थि सतत सावधान दहै | 
परथ्वी-- | | 

१. पुरार्णोमं भगवान्‌ दो पलियोका-उल्छेख मिख्ता दै--एऊ श्रीदेवी ओर दूसरी मूदेषी । ये दोनो चलसम्प्ि 
ओर अचल-सम्पततकी खामिनी द । इनके पति ईै--भगवान्‌, जीव नहीं । जिस समय श्रीदेवीके निवासस्थानं वैङण्ठे 
उतरकर भगवान्‌ भूदेवीके निवासस्थान प्रथ्वीपर आने रगे, तब जेषे परदेशसे पतिके आगमनका समाचारः सुनकर पल्नी 
सज्-घजकर अगवानी करनेके स्थि निकठती हैः वेषे प्रथ्वीका मज्गर्मयी होना, मङ्गख्चिह्ञंको धारण करना खाभाविक 











^ र 
ह ६ । 
२. भगवानके श्रीचरण मेरे वक्षःखल्पर पदंगेः अपने सोभाग्यक्ा एेसा अनुसंधान करके परथ्वी आनन्दित 
हो गयी | | | 
३. वामन ब्रह्मचारी थे । परद्यरामजीने ब्राहमर्णोको दान दे दिया । श्रीरामचन्द्रने मेरी पुत्री जानकीषे विवाह कर ` 
~ लिया । इसल्ि उन अवतारोमे मै मगबानते जो खुल नदीं प्रात कर सकरी, वही शीङष्णसे प्राप्त करूंगी । यद लोचकर चक्र ` 
| ४, अपने पुत्र मङ्गलको गोदमे सकर पतिदेवका खागत करने चटी । क ~. 
अछ ( रिष) ठ गहने इमि ~ यु शः 
= १. नदियोनि विचार किया किं रामावतार सेठ॒-बन्धके बहाने हमारे पिता पवतोको हमारी ससुराङ समुद्रम ¦ 
„+  पर्ैचाकर इन्दोनि हमे मायकेका सुख दिया था । अब इनके श॒भागमनके अवसरपर हम॑मी प्रसन्न होकर इनका ` 
4 9 । . र 4 - चादि --- | ~ । १९ | न । क र 3 = म +“ २ ह 
 * ` खगत करना चाये । नि 


१३० । श्रीमद्भागवतं | अ०र 











. । नयः प्रसभसरिला हदा जलरुहभियः। | मय हो री थ ॥ २ ॥ नाक 
। गया था | रात्रिके समय भी सरोवररोमं कमल खिल रहे 

` थे | वनम बृक्षोकी पक्तियाँ रंग-विरगे पुष्पके गुच्छोसे 

द्विजालिङ्कलक्षनादस्तबका ` वनराजयः ॥ ३॥ छद गयी थी । कहीं पक्षी चहक रहे ये, तो क्यं भौरि 

गुनगुना रहे थे ॥ ३ ॥ उस समय परम पवित्र जौर 

{ङ वायुः स्प; पुण्यगन्धवहः शुषिः शीतकमन्द-सुगन्ध वायु अपने सयशसे सोगाको छखदान 

श करती इई बह रही थी । ब्राह्मणोके अथ्िहोत्रकी कमी न 

(1 बुञ्लनेवाटी अग्निरा, जो कके अव्याचारसे बुञ्च गयी थी, 
।  अभ्रयश्च द्विजातीनां शान्तास्तत्र समिन्धत ॥ ४। वे इस समय अपने-आप जक उटीं ॥  ॥ 

२. नदिया सव्र गङ्गाजीसे कहती थी--प्तुमने हमारे पिता पव॑त देखे है, अपने परिता भगवान्‌ विष्णुके दर्शन ` 

। ^  कराओ।' गङ्गाजीने खनी-अनुनी कर दी । अव वे इसच्यि प्रसन्न हो गयीं किं हम खयं देख ठगी | 

4. यद्यपि भगवान्‌ समुद्रम नित्य निवा करते ह फिर मी सुरार होनेके कारण वे उन्हें वर्ह देख नहीं पातीं । 

। अब उन्हे पूणं रूपसे देख सकेगी; इसि वे निर्मल हो गयीं । 

& ४. निमंड दयक भगवान्‌ मिलते है, इशस्ि वे निर्मर हो गयीं । 

६, नदिर्योको जो सोभाग्य क्रंसी मी अवतारं नही मिला, वह कृष्णावतारमे मिख । भरीङ्ृष्णकरी चतुथं पटरानी दै 
-भीकालिन्दीजी । अवतार ठेते ही यमुनाजीके तटपर जानाः ग्वाल्त्राङ एवं गोपियोके साथ जल-करीडा करना, उन्हे अपनी 
पटरानी बनाना--इन सवर बार्तोको सोचकर नदियां आनन्दसे भर गयी । 
हद्‌ १ 

काल्य द्मन करके कालिय-दहका ओोधनः ग्वाल्वाल ओर अक्ूरको ब्रहम-हृदमे दौ अपने खल्पके दर्शन 
= आदि सख -खम्बन्धी रीलाओंका अनुसंधान करके हदोने कमख्के बहाने अपने प्रफुदिलत दृदथको ही श्रीकृष्णके प्रति 
उअपित कर दिया । उन्न कहा कि रमो | भले ही हमे खोग जड समञ्च करे, आप हमे कमी खोकार करगे, इस भावी 
सोमाग्यके अनुसन्धाने हम सहुदय हो रहे हँ | | 








+ 


, ऋ; 


# 


च = 
क, 
४ कणं क # 3 


+^ 
न 


4, २१ मे { 
न 1 1 ध च ^ + ` रके 
श न 
+ 3 न * { र ^ ' + 
1 क 


न 


^ भे 3 क + # 9 
च २ + ४} 


>= च 





ह †* इस अतारमे श्रीक्रष्णने व्योमासुरः तृणावत, काल्यके दमनते आज्ञारः वायु ओर जल्की शुद्धि की ३ । 
दु-मक्षणसे ्ष्तीकी ओर अग्निपानसे अग्निकी | भगवान्‌ शीङ्ष्णने दो बार अग्निको अपने मदमे धारण क्रिया । इस 
+ ` भावी सुखका स अनुतधानं करके ही अग्निदेव शान्त होकर प्रज्वछ्ति होने रे । 
क २. दवताअकि चयि यज्ञ-माग आदि बंद हो जानेके कारण अग्निदेव भी भूखे ही ये | अब श्रीकरष्णावतारपे | 
अपने भोजन मिल्नेकी आसि अग्निदेव प्रसन्न होकर प्रज्वलित हो उठे । 


^ @ ` 2 
1 त 
क क, ~ 


# ^ २ 
कै ५५ ५१ 
















॥ ॥) 
८ र नि त १ 
न = ~ ह 
# ~) ॥। 
"ज ~~ 





ऋ ४. ई | ९. उदारदिरोमणि भगवान्‌, श्रकृष्णके जन्पके अवसरपर वायुने सुख लटाना प्रारम्भ शिया ; क्योकि समान 
¢ शान्ते ही मेती होती हे। ठे खाधीके सामने सेवक, गरन अपने गुण प्रकट करके उसे प्रत्न करती दैः वैते ही वायु 


7 ` न 


भवान सामने अपने गुणक करने तो । 


{ _ . 
२ ` > 1 
9 । 


0. ^ छलारविन्दपर जवे श्रमजित स्वेदबिन्दु आ जार्यगे, तब ओँ ही शीतरमन्द । 
क सोचकर श पहेते ही वायु सेवाका अभ्यास करने रगा । + 
„५“ द सनुष्यक्रा भर्ु-चरणारविन्दके देशैनकी छाक्सा हो तों उसे विश्वकी सेवा ही करनी चाहिये, मानो यहं 


, = ॐ 
+ ॥ि = 
+ = =. क % 4 


श 


व 
४. 
4 


॥। 












३ 


५.3 = 
7 हआ वायु सवरकरी सेवा करने खगा । 


१ 


५ ॥ 4. 
217 नि 
॥- 2. 3 , = 

^ य| { ६. | 
म ` ५ 

» ५ क + ‡ १ 3 

निन १ क ६ 
4. 
+ क ~ 


धुत हलमान्‌ने मगवानुङ़ी सेवा की, इस्ते ओ कृतार्थं ही ह; पर इस अवतार यु 


४ | 1 3 सकः द €~ 9 = : क व ~=; क जी त 
ध सेवा कर छेनी चाये । इस विचारसे वाट वायु छोगको यख परैनान ख 
अव कर लेनी चाहिये ] इस विचारे वायु लोगोको सुख परदैचाने लगा 
> 4 ह `, = थ 6 ६ 1. # ध । 1 । ता = ‰ त 4 ॥ र कः > 0 ॥ ` ५ | ॥ ॥ । || । 










‡ ५ 9 अन १४ न द 4 ^ सम्पूणं < विं # श्की श ४ ओरसे ई ॥ > ष ह त ठ व त +=  । 
४, ° वानं समयृण विश्वकी ओते भगवान खागत-समारोहमे प्रतिनिधित्व किया क 
ध. ४; न त चि + -4 ह, त 0५) भ - भ 1 १. 4 ११. ` कषे ४१ 9 (- ' रः प्रतिनि 809 1 -+ -‰4 = = 
~ ~ + ` "ज त 3 = न 4 4/9 9 | | ४ 
^ १ न्क" क ५, “ ~; 2 ~ 9 ४ क " "1. ^ क १ ॐ ह 9 च ति . - ५0 
4 9. ~) ^ -° १६. श > ॥ ४ कृ क ~ 4 क "थ 9» ^ 4:19 ६४ । त ८ 1 
"यक त ~ ~= 0१1 9 - = "~: ॥ ॥ "=" ५ 
~ ~ च 1 9 ५ ९.६ क ~= क ^ 1 0 24.7 १५. 4 = > # 
~ क #>;4. 1 त ४ 2 (न म 4 | + “4 क १ * त 
क त्रं (| ¶ † च, ति 












~ ४ 4 ^. 
ना = 1 ध (= प) च धद 1 न 
२. 





५ दुर्म स्कन्धं 
वव न= = 
मनाखसन्‌ प्रस्नाति साधूनामसुरदहाम्‌ । संत प्प पेते ही चाहतेये कि असुरकी बढती न होने ` ¦ 





क सन्नतासे भर गया । 
जायमानेऽजने ्न्दुभयो दि 0 = 
सन्‌ नेहुडन्दुभयो दिवि ॥५॥ | जिस समय मगवरान्‌के आविर्मावका अवसर आया, खगे 

जगुः किमरगन्ध्वास्तुष्ुवुः सिद्धचारणाः ¦ देवतार्जीकी दुन्दुभियां अपने-आप बज उठी ॥ ५॥ 
` | क्रिनर ओर गन्धवं मधुर खरम गने लगे तया सिद्ध 
विद्याधय्च ननहुरप्सरोभिः समं तदा ।॥ ६ ॥ | ओर चारण मगवानके मङ्गचमय गुरणोकी स्तुति कले 
रगे । विद्याधरया अप्सराओंके साय नाचने र्गी ॥६॥ ` 


0 ५ (+. 
_ अयु खसनया देवा; सुमनांसि अुदान्विताः । बड़े-बड़े देवता ओर ऋषि-सुनिं आनन्दसे भरकर पु्ोकी 
आकादा-- ॑ 


। ; "नि, (ज 
> ब्‌, # #, ~ #\ + 1 # १ 9, १ 
। # १ ४१ + क ५०५ # ( . 
1 ^ स च 1, 44 


९* आकाशकी एकता, आधारताः विशारता ओर समताकी उपमा तो सदसे ही भगवान्के साथ दी 
जात। रही, परंतु अव्र उसकी टी नीलिमा मी मगवान्‌के अङ्गे उपमा देनेसे चरितार्थं हो जायगी, इसय्यि आकराश्- 











ने मानो आनन्दोत्सव मनानेके च्मि नीरे चैदोवेम हीरोके समान तारोकी खरं ल्टक्रा ली है | । 
२. स्वामोके शभागमनके अवसरपर जैसे सेवकं स्वच्छ वेष-भूपा धारण करते ह ओर शान्त ह्यो जति हैः 

इ मकार आकाराके सव नक्षत्र रहः तारे शान्त एषं निर्मख हो गये । वक्रता; अतिचार ओर युद्ध छोड़कर श्रीङष्णङ्ञा = ` 
स्वागत करने रगे | ध 
नक्षत्र-- १ 
१ देके गर्भे जन्म ले रहा तो रोहिणी यतोषके च्थि कमकम रोदिणी नवतय जन्म तो छना, ` 

ह चाहिये । अथवा चन्र जन्म छे र्दा ६ ता चन्द्रमाकां सवसे प्यारी पत्नी रोदिणीम ही जन्म लेना उचित _ ` 
। यह सोचकर मगवानूने रोहिणी नक्षमे जन्म छिया | ॐ 
मन-- । 
९* योगी मनका निरोध करते. मुमु निर्विषय करते ह ओ. जिलायु वाष कले है । तेने तो मनका सत्याना ` 

हा कर देया । भगवान्‌के अवतारका समय जानकर उसने सोचा कि अत्र तो मे अपनी पल्नी--इन्द्रियो जर विषय ` : 
` --बारूवच्चे सवके साय ही मगवानूके साथ चेदंगा । निरोध ओर बाधते पिण्ड चटा । इससे मन प्रसन्न हो गया । । = 
२. निमल्करो ही भगवान्‌ मिलते दै, इसख्यि मन निर्मह हयो गया । 


३. वैसे शाब्द, स्पशं, रूप, रसः गन्धका परित्याग कर देनेपर भगवान्‌ मिरते ह । अव तो खयं भगवान्‌ ही बह ` 
खव बनकर आ रहे हँ । लीक्रिक आनन्द भी प्रसुमे मिलेगा । यह सोचकर मन प्रसन्न ह गयां | क 


४. बञुदेवक्े मनमें निवास करके ये दी मगवान्‌ प्रकट हो रदे है । वह इमारी ही जातिश्ा है, यह सोचकर ऋः 
मन ग्रसन्न हो गया । 


४, ८.# 


नो 


८. सुमन ( देवता ओर द्ध मन ) को सुख देनेके व्यि ही भगवानूका अवतार हो रहा है ! यह जानकर ` ` ६ 
सुमन प्रसन्न हो गये । व 


संतोम, खगम ओर उपवनमे सुमन ( युद्ध मनः, देवता ओर पुष्प ) आनन्दित हो गये । क्यों 
माधव ( विष्णु ओर बसन्त ) का आगमन जो हो रहा है । 











 भाद्रमास-- । 

मद्र अथात्‌ कल्याण देनेवाला ह । कम्पश्च खयं ष्णसे सम्ब ह । 
` . बीचोबीच सन्धि-ख्ल्पर पड़ती ह । रात्रि योगीजरनोको प्रिय ह । निरीथ यतियोका संर दत १ भय ५ १ 
 भरगोकी सन्धि है | उस समय श्रीक्रष्णके आविमावका अथं है -अज्ञानके घोर अन्ध कासे 1६ स व्य दिव्य र द - । क 





` ‹ अवतीर्णं ५ © अदटमीके चन्दर , =+ न ^: दयक 
इ ,  चन्रके वंशम जन्म ठेना हे तो निशाके मध्यभागमे अवतीणं होना उचित मी ३ । जष्टमीके चन्ोदयका = 
= “४: (भद ४ है ङ सुदेवजी वंदाके ख") (~ प 2 म -4# 
द । यदि तुदेबजी मेरा जातकमं नहीं कर सक्ते तो हमारे = शके ` आ 7दिपुरुष ` 
 करुकिरसि अगरुतका न ५ ( 


क 


> {= = = 0 






























१३२ [व १ 





` = तः जगर्जरलसामरम्‌ ॥| ७॥ । वर्षा करने को# । जसे मरे इए बादल समुदरके पास 
त 3. प जाकर धीरे-धीरे गजना करने कगे { ॥ ७ ॥ जन्म-रत्युके 
निस्षीथे तमञद्भते जायमाने जनादंने । | चक्रसे छुडानेवाले जना्धनके अवतारका समय था 
4 | निशीथ । चारों ओर अन्धकारका साम्राज्य था | उसी 
1 | देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सवंगुंहाश्षयः समय सवके हृदयम त्रिराजमान भगवान्‌ विष्णु देखष्परिगी 


¦ ° देवकीके गभसे प्रकट इए, जसे ध्रवदिशामे सोच 
॥ शीर ए १ | (4 ¢ | 
आबरिरासीद्‌ यथा भायां दिशीन्दुखि पुष्कर कोस पूणं चन्द्रमाका उदय हो गया हो॥८॥ 


तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं वघुदेवजीने देखा, उनके सामने एक अद्धुत बाक्क 
ध १ है | उसके नेत्र कमव्के समान कोमल ओर विरा हैँ । 
चतुखज श्मदाड्दायुधम्‌ । चार घुन्दर हा्थोमे शङ्ख, गदा, चक्र ओर कमल च्य 


ॐ । # म +. 


त्सरक्ष्म॑ गलक्चोभिकौस्तमं हए है । वक्षः स्थकपर श्रीवत्सका चिह--अत्यन्त सुन्दर 
शीत्सलक {गर्ोभिक्ु सुवणमयी रेखा है ¡ ग्म कौस्तुममणि ज्चिल्मि रही ` 

पीताम्बरं सान्द्रपयोदसोभगम्‌ ॥ ९॥ है । वर्षाकाटीन मेधके समान परम सुन्दर स्यामल शरीर- 

| सदिड्डर पर . मनोहर पीताम्बर फहरा रश्च है । बहुमूल्य वेदूयमणि- 

महहेन दयक “इण्डर- के किरीट ओर्‌ कुण्डलकी कान्तिसे सुन्दर-घुन्दर धुंषराे 

बाढ सूयकी किरणोकि समान चमक रहै हैँ | कमरमे 

सवषा -प्रिष्वकतसहडुन्तरम्‌ । चमचमाती करधनीकी ज्डियाँ ठ्टक रही हे बहम 

। उदामकाज्च्यद्खदक्षङ्णादिभि बानजूवंद ओर कलाश्योमें कङ्कण सोभायमान हयो रहे हे । 

= "स . इन सब आभूषणोसे सुरोमित बाल्कके अङ्ग-अङ्गसे 

/  षिरोचमानं वसुदेव रेत ॥१०॥ | अनोखी छया छिटकः रदी है ॥ ९-१०॥ जव वघुदेधजीने 
$ स विसयोत्फहटविलोचनो हरि देखा कि मेरे पुत्रके रूपमे तो खयं भगवान्‌ ही आये हैः 
1 तब पहंठे तो उन्हें असीम आश्चयं इआः; शिर आनन्दसे 
= मेम परमानन्द = 





१. रुणाथयः । २. दाद्युदायुधम्‌ । 


¦ ॐ ऋषिः यनि ओर देवता जब अपने सुमनकी वषा करनेके लि मथुराकी ओर दोड़ेः तब उनका आनन्द छ 
^ भी पी चूट गया ओर उनके पीछे दौढृने खगा । उन्होने अपने निरोष ओर बाधसम्बन्धी सारे विचार ` 
^ त्यागक्रर सनको श्रीकृष्णकी ओर जानेके खमि सुक्तं कर दिया, उनपर न्योावर कर दिया । 


"द (कः 
+ 1 € मेष समुदरके पास जाकर मन्द-मन्द गज॑ना करते हुए कदते--जलनिधे | यहं चम्हारे उपदेश ८ पाख 
आने ) का पठ हे कि हमारे पास जढ-दी-जर दो गया । अव देता कु उपदेश करो कि जेते वारे भीतर भगवान्‌ 
 . २. बादल दके पस जते ओर कहते क समुद्र | ठरे इदयमे मगवान्‌ रहते ईः हम भी उनका ~ 
# शशः मात्‌. करवा ष 1 दो । समुद्र उन्दं थोड़ा-सा जरु देकर कह देता-अपनी उत्ताल तरङ्खसि ठकेट देता-जाओः 
[धर र मवा वथ रेणे ॥ लं मभा चत च 
द्र नजम आ रदे है उनपर छाया करगे, अपनी दयां बरसाकर जीवन न्य छावर करेगे ओर उनकी 0 
सौमागयक्रा अुरंधान करके ५ बाद सदे पाऽ प्रे ओर मन्दमन्द्‌ गजना ` 


। ४ 
ह ज | "५ ~ 


ॐ ॐ ई 3 





-- 4 =-= \ | 









+ त 
~ 4४. > ५ ४ | 
= च ॥ ति + =, ' + ॥ । 
= न हि , "> ८* #, (4 + 
= + + | जै + रभकष ज „2. त 
4 \ ॥। च = ह ५ 
1 भ ++» न = छ ५ । + 
~> 9 2 च ॐ + 
# न. कै 


॥# + चद 





द्रम्‌ स्कन्ध १३द 


भकना य ~ ----- ---------------- 


दृष्णावतारोत्सवसभ््रमोऽस्पञन्‌ 


49 अथ" ऋः कान 2 उन ` 2 ककः क. द्र क 
ह 1. 








हो गया । शीकृम्णका जन्मोत्सव मनानेकी उतावरीमे 

उन्होने उसी समय ब्राह्मणकि य्य दश्च हजार गायका 
सङ्कल्प कर दिया ॥ ११ ॥ परीक्षित्‌ ! मवान्‌ श्रीकृष्ण 
अपनी अङ्गकान्तिसे सूतिक्रागृहको जगमग कर रहे थे | 
नब वघुदेवजीको यह निश्चय ह्यो गया किये तो परम 
पुरुष परमातमा ही हैँ, तन मगवानूक्ा ्रमाव जान ठेनेखे 
उनका सारा भथ जाता रष्वा | अपनी बुद्धि स्थिर कवे 
उन्होने मगवानक्ते चरणोमिं अपना सिर शुका दिया ओर 
प्र्‌ हाय जोड़कर वे उनकी स्तुति करने च्गे--॥१२॥ 























षदा हिजेम्योऽयुतमाप्ठतो गास्‌ ।११॥। 
अथेनमस्तौदवधार्य परुषं 

परं नताङ्गः कृतधीः ऊृताञ्चक्तिः । 
खरोचिषा भारत दतिकागृहं 


विरोचयन्तं गतभीः प्रभावित्‌ ॥१२ 
वसुदेव उवाच 


वसदेवजीने कहा-- त समञ्च गया कि आप प्रकृति- 
विदितोऽसि भवान्‌ साक्षाद्‌ पुरपः हृतः परः । ¦ 


से भतीत साक्षात्‌ पुरुषोत्तम हैँ । आपका ख्य हं केवर 

अनुभव ओर वकेवठ आनन्द । आप समस्त बुद्धियके 

एकमात्र साक्षी हैँ ॥ १३ ॥ आप दही सगके आदिं 

अपनी प्रकृतिसे इस त्रिंगणमय जगत्‌की सृष्टि करते हैँ | 

फिर उसमे प्रविष्ट न होनेपर भी आप प्रविष्टके समानं 

जान पडते है | १४ ॥ जैसे जबतक महत्त्व आदिः 

कारण-तत्् प्रथक्‌ थक्‌ रहते हँ, तवतक उनकी दाक्ति . ` 

मी प्रथक्‌ पयक्‌ होती है; जव वे ईद्धियादि सोकं , 

विकारोके साथ मिलते हैँ, तभी इस तब्रहमाण्डकी रचन 

करते ह ओर इवे उत्पत करके इसीमें अनुप्रविष्ट-से जान 

पडते दै; परंतु सच्ची बात तो यह है कि वे किसी भी 

पदाथमे प्ररे नहीं करते । रसा होनेका कारण यह दै 

कि उनसे बनी हई जो मी वस्तु है, उमे वे पहलेसे दी 

विद्यमान रहते है ॥ १५-१६ ॥ ठीक वेसे ही बुद्धिके 

दवारा केव गुणोके छक्षणोका ही अनुमान किया जातां 

है ओर इन्द्ियोके दारा केव गुणमय विषर्योका ही ग्रहण 

होता है । ययपि आप उनमें रहते है, फिर मी उन 

गुणोके म्रहणसे आपका ग्रहण नहीं होता । इसका ` 

कारण यह है कि आप सब कुछ है, सबके भन्तयोमी = 

ह ओर परमाथ सत्य, आतखश्य है । गुणोका आवरण ` ` 

भापको ठक नहीं सकता । इसष्ि आपमं न बाहर है 

न भीतर । किर आप किमे श्रवेशा करेगे १ ( इव्थि ` 
र्मख सतम आत्मवस्तुनः ॥१७॥ | पेय न कपर मी आप पवेश विय इते सान 

`: १, प्राचीन पतिम लुदेव उवाच यह पाठ नही दै।ष्च। । | 


केवलासुभवानन्दखरूपः सवंबुदधिदर्‌ ॥१३॥ 


स॒ एव खप्रृर्येदं स्मे त्रिगुणात्मकम्‌ । 


तदनु तं प्रविष्टः प्रविष्ट इछ भाव्यसे ॥१४। 
यथेभेऽविङृता भावास्तथा ते षिद्धतैः सह । 
नानाबीयाः पृथग्भूता विराजं जनयन्ति हि।१५॥ 
सनिपत्य शशरुत्पा्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । 
प्रागेव षिद्यभानलान्न तेषामिह सम्भवः ॥१६॥ 
~ त 
एं भवान्‌ बुद्धयनुमेयरश्षणं 


्ी्गुणेः सन्नपि तद्गुणाग्रहः । 








अना्ृततयाद्‌ बहिरनतरं॑न ते 





। - = 
(न ~ + + ५ - 4 4 क्क्व 9 व क ~ + ` > 
4. ८५५ कव अ. > = च, + = । 
3. भवुक र, श 











॑ श्रीमद्भागवत { अ०र 





य॒ आत्मनो दवयगगेषु समपि दीखते ह) || १७ ॥ जो अपने इन दशय गुरगको 

(तस्‌ न) अपनेसे प्रथक्‌ मानकर सत्य समञ्ञता है, वह अज्ञानी है | 

व्यवखते ऽदुषः । | क्याकिं विचार करनेपर ये देह-गेह आदि पदाथं बाबिगास- 
 भिनालबादं न च तन्मनीषितं 


| के सिवा भोर कुछ नहीं सिद्ध होते | विचारक द्वारा 
| जिस वस्तुका अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, बल्कि जो वाधित 
| सम्यग्‌ यतस्त्यक्त्पाददत्‌ पुमाय्‌॥।१८॥ हो जाती है, उसको सव्य माननेवाा पुरुष युद्धिमान्‌ 
*. . › त्वत्तोऽख जन्मसितिसंयमान्‌ बिभो कंसे हो सकता है १॥ १८ ॥ प्रमो | कहके हैः किं 
„= वात | आप खयं समस्त क्रियाओं, गुणों ओर विकरंसे रहित 
त ५ च्‌ हैँ | फिर मी इस जगत्की सृष्टि, सिति ओर प्रल्य 
त्वयीश्वरे बरह्मणि नो विरुष्यते जापसे ही होते हैँ । यह बात परम रे्र्थशाटी परह्य ‡ 
त्वदाभयत्वादुपचयंते गुणे; ॥ १ | | परमात्मा आपके च्य असंगत नहीं है । क्थोकि तीनों ४ 
ध त्रो गुणोके अ प है „, इसलि ये क ग्र 
सत्व ॒त्रिलोकृसितये खमायया सय नाप हो द ८ क ६ 
पि शकं ६ भादिका आपरमे- ही भरोप किया जाता है ॥ १९ ॥ 
. बिभविं शुक्लं सलु वणंमात्मनः । आप ही तीनों नोकोकी रक्षा करनेके च्थि अपनी मायासे 
।  सगोय रक्तं रजसोपदहितं ,| सत्वमय शङ्छवण ( पोषणकारी व्िप्णुूप ) धारण करते 
र कष्ण च वण तमसा जनात्यये ॥२०॥। 
4  तमसख लोकल विभो रिकिषु- 


है, उत्पत्तिके च्यि रजःग्रधान रक्तवर्णं ८ सूजनकारी 
गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर । 













ब्रहमारूप ) ओर प्र्थके समय तमोरुणप्रधान कृष्णवर्ण ¢ 
( संहारकारी ररूप ) खीकार करते है ॥ २० ॥ 1 
प्रभो | आप सवशक्तिमान्‌ ओर सक्के खामी है । इस | 
ससारकी रक्चाके व्यि ही आपने मेरे घर अवतार च्या । 
है । आजकट कोटि-कोटि अघर सेनापतिोनि राजाक्रा 
नाम घारण कर रक्खा हं ओर अपने अधीन बड़ी-बड़ी 
सेनां कर रक्खी है । आप उन सवका संहार करेगे॥२१॥ 
देवताओंके भी.भराष्यदेव प्रभो | यई कंस बड़ा दु्ट है । 
इसे जब माद्धुप हआ करि भापका अवतार हमारे धरं 
दोनेवाला है, तव उसने पके मयसे आपके बडे मायो 
को मार डव्य | अमी उसके दूत आपके अवतारका 
समाचार उसे घुनायेगे ओर वह अभी-अभी हाथमे शब 
लेकर दौड़ा भायेगा ॥ २२ ॥ 


भरी्यक्देवजी कते हँ परीक्षित्‌ ! इधर देवकीने 
| देखा कि मेरे पत्रमे तो पुरभोत्तम भगवानके समी लक्षण ` | 
महापुर्षलक्षणम्‌ । मौज है | पद्वले तो उन्हे कंससे कुछ भय सद्धम हाः = 


















जः 
र [+ 4 ) + = 
। % 





+ = 





नच ~ 









४ ४. < अ 
५. दशम स्कन्ध ~ ५ भ 
। देवक्युवाच भाता देवकीने कहा-प्रभो | वेदनि आपके जि 


|: .9 रूपं यत्‌ त॒त्‌ प्राहुरव्यक्तमादय ठ ख्यको अव्यक्त ओर सबका कारण बताया है, जो 
। 5 तिमिरं स ब्रहम, ज्योतिःखख्य, समस्त गर्णोपि रदित ओर विकारहीन 
| ज्ञ उपातितयरुणं निविकारम्‌ । है, जिसे विशेषणरहित-अनिवचनीयः, निष्रिय एव केवरं 


सत्तामात्र निर्विशेषं निरीहं विशुद्ध सत्ताके रूपमे कहा गयादहै-- व्ही बुद्धिं मादिके 


र क्च प्रकाशक विष्णु आप खय ¢ || जिन्त समय 
` इत्वं साक्षाद्‌ विष्णुरष्यात्मदीपः ॥२४।। ६॥ र 


स ब्रह्मा की पूरी आयु--दो पराध समाप्त हो जते हैः ` 

नष्ट सो$ दिपराधोवसाने काठराक्तिके प्रभावसे सारे खोक नष्ट ह्यो जाते दह, पच्च 
. अहासूतेष्वादिभूतं मतेषु 1 ध "व भोर स रकृति- 
4 वेगेन लीन हो जाता है--उप्‌ पुमय॑ एकमात्र आपही देष रह्‌ . 
व्यक्तऽच्यक्तं कारेरोन याते जाते हैँ । इसीसे भापका एक नाम श्दोषः भी दै ॥ २५॥ 
भकामैकः शिष्यते शेषसंज्ञः | २५ | प्रकृतिके एकमात्र सहायक प्रमो | निमेषसे लेकर वधं 

योऽयं कलस्तख तेऽव्यक्तबन्धो पयंन्त अनेक विभागमे विभक्त जो काठ है, जिसकी ि 

| ॐ चेष्टासे यह सम्पूणं त्रिश्च सचे हो रहा है ओर जिक्षकी कोड 

चेशाहुेश्ते येन विशम्‌ । सीमा न क क ॥ आप व 3 

पिमेषादिरवस्सरन्तो महीयां भौर परम कल्याणक आश्रय ह । मँ आपकी शरणचक्ती 

र |॥२६॥ प्रमो ! यह जीव मष्युप्रस्त हो रहा है । यद मृत्युर्य _ 

स्तं ववेज्ानं॑ क्षेमधाम प्रपद्ये ॥२६॥ | कराढ व्याक्से मयमीत होकर सम्पूरणं गोकगेकान्तरेमि + 


मटकता रा है; परंतु ससे कभी कहीं मी एसा स्थान न मिव 
सका, जहाँ यह निर्भय होकर रहे । आज बडे मान्यसे _ ` 
लोकान्‌ सवौज्निभेयं नाध्यगच्छत्‌ । इसे आपके चरणारविन्दोकी शरण मिक गयी । अतः अब _ ` 
यह खस्य होकर सुखकी नीद सो रहा  भौरोकी ` 
तो बात दयी क्या, खयं मृत्यु मी इससे मयमीत होकर ५ 
माण गयी है ॥ २७ ] प्रमो ! आप दहै भक्तमयडारी ` । = 
ओर हमरोग इस दुष्ट कंससे बहत ही मयभीत है । अतः _ ` 
शाप हमारी रक्षा कीजिये । भापक्रा यई चतुमुज दित्य- 


ख्प ध्यानकी वस्तु है । इसे केवर मांस-मनामय शरीरः ` 


+ = ब 8 


मर्थ शत्युव्यारभीतः पलायन्‌ 


त्वत्यादषन्जं प्राप्य यदचच्छयाद्य 

खसः शेते मृ्युरखादपेति ॥२७॥ 
स॒स्वं धोरादुग्रसेनात्मजान्- 

खाहि त्रस्तान्‌ भृत्यवित्राष्ठहासि । 
स्पं॑चेदं॑पोरषं॑भ्यानधिष्ण्य 

भा प्रत्यक्षं मंसद्शां ङृषीशः ॥२८] 












ॐ 


पर ही दष्ट रखनेवाठे देद्वाभिमानी पुर्षवि सामने प्रकट 


क „ | मत कीजिये ॥ २८ ॥ मधुसूदन ! इष पापी कसको 
जन्म ते भ्यसो पापो मा वि्यान्मधुघ्दन । ` ` | यह बात माढधम न दो कि जापका जन्म डर गर्ते इना ~ 
 स्िजे भवद्धेतोः कंसादहमधीरधीः ॥२९॥ | दै । भग १ द्र रहा है । आपके नमि मै कंसे बहुत 


4 विश्वाह क्कः पन्‌  ¶. आपका नर 7 यो क, 
€ ण 4 = र स्प ॥ ः 
॥ च ` ९। | च नः दु ° # “^ यह ध) 45 
-+& नि 1 ५ ७ ९ = 
२@ प व - ५ त द 0 ॐ 9 # 4 र $ 4 3 । 
। नि 4 9 + ~ ४ 4 र + + ५ ११०, + र क + 
# ग क ग ध ४; क (~ न्क र्कः ९ सक ध ङ वा क~ + ~ ४, १ च र ईः- ५ 
५ राङ्ख। 4, * ॐ क, 
क्‌ ॥ ध ् ९ ५ च्छव ब ध 
(५ नचत्री 1.ॐ 2. ष ९.१ 
क कल >.) ५ ग्द # अ॥* ५ ष द ^ ति क 
र = € क च, १. +> ~प # रा ग ् श 
ति ९५ स्तो ` न श पष [क ष क थ न (7 रः 
व 4 से न ज्‌ + 4 
च प ५ 3 ॥ 0, ` ति > चिप द्ध क 1; (; † द स 4 
चतुमुजख्प ४ द त 
#। 
--र. . 7) 




































रीर 
= ननर्द य्य्य्स्ज्य्य्यय--------------- च --ज------------------------------ छ ण भाया कु 





ॐ - त 

18 = ~क 
# 44) 

। 1 ॥ हि ११ 
(4; भ ५ 

4 # "ऋः हि ५ 

ह - १ द 

(4 २६ गतत अ 
४ 
*1 1 च | 
14: ष र 
" कै 


विश्च यदेतत्‌ खतनौ निशान्ते प्र्यके समय आप इस सम्पूणं विश्वको अपने शरीरमे कैसे 
यथावकाशं पुरषः परो भवान्‌ । ही खाभाविक रूपसे धारण करते है, जैसे कोई मनुष्य 

ति ४ २. यू अपनं शरीरम रहनेषाले छिद्ररूपम आकाशको । वही 
भतिं सोऽयं मम॒ मभगोऽभू- परम पुरुष परमात्मा आप मेरे गर्भवासी इए, यह आपकी 
दहो नृलीकख विडम्बनं हि तत्‌ ॥२१। भद्ध मनुष्य-कीला नही तो जोर क्या है १ ॥ २१ ॥ 


श्रीभगवानुवाच भीभगवानने कषा- देवि ! खायम्मुव॒मन्वन्तस 
जब तुम्हारा पहत्ग जन्म हआ था, उस समय तुम्हारा 
नाम था पृस्नि जीर ये वघुदेव तपा नामके प्रजापति 
तदायं॒सुतण॒ नाम प्रजापतिरकल्मषः ॥ ३२॥ | ये । त॒म दोनोके हदय बडे ही छद थे | ३२ | जव 
1 ९ दष द नह्माजीने तुम दोनांको संतान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दी; 
ॐ ५ १२यद्‌ह' ब्रज यदा ततः तब तुम खोगोने इन्दिर्योका दमन करके उक्ष तपस्या 
सञनियम्यन््रियग्रासं तेपाथे परदं तपः ॥३३॥ | की ॥ ३३ ॥ त१ दोनोनि वषा, वायु, घाम, सीत, उष्ण 
वष॑वातातपहिमघर्मकारगुणानलु | भादि कालके विभिन्न गुर्णोका सहन करिया शौर प्राणा- 
4 4 यामके द्वारा अपने मनके मल घो उठे | ३४ | तुम 
समानौ ेनिषतसनोमो ।३९॥ | दोनों कभा सूते पते खा ठेते जौर कमी हवा पोकरही 
 शीणयर्णानिलाहाराघुपशचान्तेन ` चेतसा | रह जाते । तुम्हारा चित्त बड़ा शान्त था | इष प्रकार 
तभलोगनि सुश्नसे अभीष्ट वस्तु प्राप्त करनेकी इच्छसे मेरी 
कामानभीप्सन्ती मदाराधनमीहतुः ।।३५॥ आराधना की ॥ ३५ ॥ मुञ्चे चित्त व्गाकर एेसा परम 
४ एद वां तप्यतोस्तीव्रं तपः परमटुष्करम्‌ । दुष्कर ओर घोर तय करते-करते देवताओं वारह हजार 
` वधे नीत गये ॥ २६ ॥ पुण्यमयी देवि | उस समय रप 
द ` दिव्यचर्खददक्ाणि द्रादशयुमदात्यनीः = 
४.9 द दसाणि द्ेयुमदात्मनोः ।॥३६॥ त॒म दोनोपर प्रसन्न इभा । क्योकि तुम दोनोनि तपस्या, 
 त्दा वां परितुष्टोऽहममुना बदुषानघे। श्रद्धा ओर प्रेममयी भक्तिसे अपने हृदयम नित्य-निरन्तर 
` ~+ मेरी भावना की थी । उससमय त॒म दोनोकी अभिरषा 
तपसा श्रद्धया नित्यं भक्त्या च्‌ हदि भारितः।। ३७ 
ह ५ हदि भावितः।२७॥ पूणं करनेके व्ये वर देनेवा््ेका राजा मै इसी रूपसे 
्रुरास बरद्राड युवयोः  कामदित्सा । तम्हारे सामने प्रकट इभा । जव भने कहा कि "तुम्हारी 
४. वि व्रियतां बर इत्युक्ते मादृशो बां इतः सुतः ॥ ३८) जो श््छा हो, सुङ्ञसे माग गो, तब तुम दोननि मेरेनैसा 


त्वमेव पू्ंसर्गेऽभूः एकिः खायम्थुवे सति । 


 -कमण क 












अशु ग्राम्यबरिषयावनपत्यौ च दस्पती | त॒म ोगोका कोई सम्बन्ध नहीं हआ था । तुम्हारे कोई 

# ऋ न बव्राथेऽपवग मे मोहितौ सम॒ भायया व 1 
। दोनोने सु्ञसे मोक्ष नह मँगा॥ २९ ॥ तुम्हे मेरे जैसा पुत्र 
युवां लभ्ध्वा घ्रं मत्सद इतम्‌ । होनेका वर प्राप्त हो गया भौर सैं वहसे चखा गया | अब 






| सफ़क्मनोरथ क्ोकर तुमलोग विषरयोका भोग करने 


अर्च्‌ भो 
(^ क्गे॥ ४०॥ यने देखा कि संसारम शील-स्वभाव, 


< -भ- रज त 





णी भी 019 कण क छते कोक च कोक वो, मी" क व्यनि न्िकिकिाभ् 


पुत्र मगा ॥ ३७-२३८ ॥ उस प॒पयतक विषय-मोगोसे 


। १ 
ठ ` 
। ` त 
४५ 1 9 ^ जक क च 


| उदारता तथा अन्य गुणोमिं मेरे जैसा दूसरा कोई न है 4 | 






















नि > 9 न भ. 
की क क 


॥ 14 







आ गयः उसकी दथकड़ीेड़ी खुर जाय इसमे क्या 





क 


अ० ३; 


मि 


जं ` कनकेन = शिन ण्यो = =: , आ" ग उरच्‌, 
॥परिपिीरर पी 9 9 1 शक = ऋः कि 





क कः चर जिः क्कि क 


अहं खतो वामभवं पृक्षिगर्भं इति श्रुतः 1\४ 
तयोव। पुनरेवाहमदिर्थामास कश्यपात्‌ । 
उपेन्द्र इति विख्यातो वाषनताच् वामनः ॥४२॥। 
ठतीयेऽसिन्‌ भवेऽहं वै दैमेद पषाथ वाघ । 
जता भूयस्तयारव सस्य ॒से व्याहतं सति 1४३) 


एतद्‌ वा दशित स्यं प्राग्जरधखरणाय मे ] 
नान्यथा सद्धं ज्ञान सत्यछिङ्न जार्ते ४५} 


युवां मा पुत्रभावेन बह्मभावेन चौस्त्‌ । 


श्रीक उवाच 
इस्यु्स्वाऽऽसीदरिस्दृष्णीं मभवानात्ममायया । 
पित्रोः सस्पर्यतो; सचो वभूव प्रातः शिखः ॥।४६॥ 
ततश्च शोरिभेमबसप्रयोदितः | 
सुतं समादाय स सतिकागृहात्‌ । 


यदा वहिग॑न्तुभिमेष तष्च॑सा 
सा योगमायाजनि जन्द्ायया ॥ ४] 
तया हुतप्रस्थयसपश्चिषु 


दाःस्थेषु पौरेष्वंपि सापितेष्वथ । 
दारस्त॒॒ सवौः पिषठिदा दुरस्यया 
बहत्कषाटाशवीलमृङ्खरेः 
कुष्णवाहे वसुदैव आगते ` 
खयं -व्य्वयन्त यथा तमो रवेः । 


४८५ 
ताः 


14 स्कन्‌ 


ॐ = तक कत ऋका ऋ क > चाण चछ कात कक आ आत जः ककः १ पो ` ऋ 59 छ कः ¬ आ म आ शा च+ आत जित = ` जिर नको + = ` भक तच क च क द्धो शः त्त ` = त 


| 


| 


| चिन्तथन्तो कतस्य हो यास्येथे सदशतिं परास्‌) 1२२} | तथा निरन्तर ब्रह्मभाव रखना । इ प्रकार वात्सल्य-स्नेह 


१. स्मृतः | २. वा पुनः । ३. घु च । ४. रीयय॑न्त । 


इसल्मि मै दही तुम दौर्नोका पुत्र इआ ओर्‌ 

समय में पृदधनिगभग्के न।मसे विख्यात इअ ॥ ४१ ॥ 
फिर दूसरे जन्ममे तुम इई अदिति ओर व॒पुदेतर इए 
करेयप } उस समथ भी में तुम्हारा पुत्र इआ । म॑रा नाम 
था 'उपेन््रः | शरीर छदा होनेके कारण लोग मुद्ध वामनः 
मी कहते थे ॥४२॥ सती देवकी । तुम्हारे इस 
तीसरे जन्ममे मी मँ उसी ख्यसे किर त॒ब्हारा पुत्र इजा ` _ 
हर# । मेरी वाणी सवदा सव्य होती ई ॥ ४३ ॥ मैने ` 
| ठम्हं अपना यह रूप इसव्यि दिखता दिवा है किं तुम्हे 
मेरे रूवं अत्रतारोका स्मरण हौ जाय ¦ यटि भ रसा नदीं 


| ठीक वैसे ही 































ए 


ऋ च ऋ कः च कके ^ । भन 


=+ 
॥ 
# 


करता, तो केव्रर मनुष्य-दारीरसे मेरे अवतारकी पहचान 
नहीं हो पाती ॥ ४४ ॥ तुम दोनो मेरे प्रति पुत्रम्राव ` 


ओर चिन्तनके द्वारा तुम्हे मेरे परम पदकी प्राति होमी॥४५॥ 
श्रीडयुकदेवजी कहते ह--मगवान्‌ इतना कंकर 

चुप ह्यो गये | अब्र उन्क्नौने अपनी योगमायासे पिता- 

माताके देखते-देखंते तुरत एक साधारण चिका ख्प ` 


धारण क्र लिथा | ५६ ॥ त्र वुदेवजीने भगवान्‌की 
्रेरणासे अपने पुव्रको लेकर सूतिकागृहसे बाहर निकब्ने- _ 
की इच्छा की । उसी समव नन्दपत्नी वजशोदाके गभ॑से ५ 
उस योगमायाका जन्म हभ, जो गवानी छक्ति देनेके व । 
कारण उनके समान ही जन्मरहित हं ॥ ०७ ॥ उसी ` 
योगमायाने द्राराछ ओर पुरवासियांकी समस्त इन्दिय- श 
बृत्तियाकी चेतना हर ट, वे सव केस अचेत होकर 
सो गये । वंदीगृहवे सभी दरवाजे बद्‌ ये । उनमें बड़- 
वदे किवाड, केहेकी जंजीर ओर ताके जडे इए थे । 
उनके बाहर जाना बडा ही कठिन था, प्रतु ग्सुदेवजी 
मगत्रान्‌ श्री्ृष्णको गोदमे लेकर उयो ही उनके निव; ध 
पचेः त्यो हौ वे सव द्रवाजे आपसे.जप खक ग्ये†। ` 






“ पूरा नहीं कर सकता; क्योकि वैसा कोई है ही नदीं । किसीको 


तिशुनी वस्त॒ देनी चाहिये । मेरे सद्श पदार्थके समान में दं । अत्व मे अपनेनने ५ | र व ` तीन बार इनक्ना का ९ छ 


= 


परा स° खं 


त 4 
४ - 9 = 4 चः 
४ ~ श्रवणमात्रे असंख्य जन्मा्ित प्रारज्धवन्धन ध्वस्त हो जति ह 
४५ ‡- भ ~ ५ ५ ष दन जे क ७ ६ व्क + 
४ - ~ नाम + * 1९ "~ "उ 
। ~ - "4 "ष ~ 1 
र र ४, ति 94 # रै (4 लर 1 क. २८९ य चथ ॐ पः ए 
^ £ ह ९ अ । > ० -3» - + --- + = किः ^ त क) 
क | १ ^~ र ( ९. ^ शक = र = थि 3 वो, “^ ह क (१ * ५“ च । 9 | 
= > ~~ दर ११. 7 । क # 
4 < ऋ ^. 4 44 स! कै मै ८ = ^ # ग न ११ १ ~ 
व 1 3 9 १ । 
“द 1, द क ल ह: १ > हि~ -> = प प 
क ` - व + 
५२ त ३ व 


च + कि 
4 
वि 
५ 


१ 1. 9 1 ४ 
4; ४८. 
` ५4 


[4 +: # % र: + 
ॐ* ५ ऋ ` न. त 


=“ ० 


१ ,॥ च + + ~~} - [1 1 र) = = का, 9 


भन 3 + 1 
४ न 


र 
= 
“लः 
० र + &>* 











3 
ध 


१६९ 


~ 


प्य नी यपू । 


१३८ गमद्भाृषः [अ० ३ 
| जाता है । उस समय बादर धीरे-धीरे गरजक.र जल्वी 
फुहारं छोड रहे थे । इसल्विये रेषजी अपने फनोंसे जलको 
क तीर रोकते इए भगवान्‌के पीड-पीके चठने ठगे*# ॥४८-४९।॥ 
मघोनि न्यस्‌ क ५ उन दिनों बार-बार वषां होती रहती थी, श्ससे युनाजी 
शम्भीरतोयोषजवोमिफेनिला बहत चद्‌ गयी थी-[। उनका प्रवाह गहरा ओर तेज 
भयानकावर्तशताङला नदी हो गया था | तर तरद्खीके कारण जश्पर फेन-ही-फेन 
रै | हो रहा था । सैकड़ों भयानक मर्वेर पड़ रहे ये । जैसे 

मा ददौ सिन्धुखि भिः पतेः ॥५०॥ सीतापति भगवान्‌ श्रीरामजीको समुदरने मार्गं दे दिया 
नन्दव्रजं शौरिरुपेत्य तत्र॒ तान्‌ था, वैसे ही युना जीने मगवानूको मागं दे दिया { ॥५०॥ 
गोपा्‌ ्रसुपरालुपलम्य निद्रया । वघुदेवजीने नन्दबाबाके गोकु जाकर देखा कि सव. 

संतं यश्लोदारायने निधाय त- 


के-स्र गोप नींदसे भचेत पड़े इए है । उन्होने अपने 
पुत्रको वश्लोदाजीकी शाय्यापर सुखा दिया ओर उनकी 

ससुताुपादाय पनगृहानगात्‌ ॥५१॥ | नवजात कन्या केकर वे वंदीगृहमे टीट भये ॥ ५१॥ 
१. शिष्यं । २. सुतां समादा० । 


ॐ बल्यामजीने विचार किया कि मे बड़ा माई वना तो क्याः सेवा ही मेरा मुख्य धमं है । इसस्थि बे अपने रोष- 
रूपसे श्रीक्ष्णके छ बनकर जलका निवारण करते हुए. चङे । उन्होने सोचा किं यदि मेरे रहते मेरे खामीको वासे कष्ट 
पचा तो मुञ्चे धिक्कार है । इसच्ि उन्होने अपना सिर आगे कर दिया । अथवा उन्दने यह सोचा कि ये विष्णुपदं 
(आकाड ) वासी मेष परोपकारके चि अधःपतित होना खीकार कर छेते हैः इसस्ि ब्रक्िके समान सिरसे वन्दनीय हं । 


¶ १. श्रीकृष्ण रिश्यको अपनी ओर भति देखकर यज्रनाजीने विचार क्िया--अहा | जिनके चरणोकी धूखि 
सत्पुरुषोके मानस-ष्यानका विषय हैः वे ही आज मेरे तटपर आ रहे ह । वे आनन्द ओर प्रेमसे भर गयी ओखोसे इतने 














ववषं पजन्य उपांश्गजितः 
रोषोऽन्वगाद्‌ वारि निवारयन्‌ फणे; ।४९।; 


अंस्‌ निकरे फि नाद्‌ आ गयी । 


२. मुञ्चे यमराजकरी बहिन समञ्चकर श्रीकृष्ण अपनी ओंखि न फेर छ; इसय्ि वे अपने विशाल जीवनका 
ग्रदयोन करने लगी | 
३. ये गोपालनके च्वि गोकरुख्मै जा रहे दै ये सदख-सहख हरिया गो. ही तो 


इनक्रा मी पाटन करे । 
४. एक काल्यिनाग तो मुक्षमे पहखेते ही ईः यह दुसरे रोषनाग आ रहे ह । अव्र मेरी क्या गति होगी --यह 


सोचकर यप्रनाजीं अपने थपेडसे उनका निवारण करनेके स्यि बद्‌ गयी । 
† ९. एकाएक यघनाजीके मनम विचार आया कि मेरे अगाध जल्क्रो देखकर कहीं श्रीकृष्ण यह न सोच छे 


है । ये उन्हीके समान 


श्चि मे इते चेदा केसे इसय्यि वे तुरत कदी कण्ठभर, कहौं नामिभर ओर कीं धुटनोंतक जख्वाटी हो गयीं । 


२. जपे दुखी मनुष्य दया पुरुषके सामने अपना मन॒ खोख्कर रख देता हैः वसे ही काल्यिनागसे चरस्त 


अपने हृदयक्रा दुःख निवेदन कर देनेके च्ि यप्ुनाजीने भी अपना दिर खोखर श्रीकरृष्णके सामने रख दिया । 


मेरी नीरसता देखकर श्रीज्ष्ण कीं जलक्रीडा करना ओर पथ्यानी बनाना अस्वीकार न कर देः इसय्यि 


ठ छोडकर बड़ी बिनयसे अपने ददयकी सङ्धोचपूणं रसरीति प्रकट करने खग । 
५. जव इन्देनि सुय॑वंदामे रामावतार अ्रहण किया, तब मागं न देनेपर चन्द्रमाके पिता समुद्रको बोध दिथा था । 









गरी दो मागमे बट ग्य । । 
८. सत्युख कहते ह किं हृदयम भगवान आ जानेपर अरोकिक सुख होता है । मानो उसीका उपभोग 


भीतर ङे चया । | 
जख कष्ण ण॒ मे मेरे बाहर श्रीकृष्ण ह ¡ किर मेरे हृदयम ही उनकी स्ति क्यौ न हो ! 


॥- 1 


"3, {> 
मन्द्‌ + >, 1 
४ र्ब ^ = $. [5 + 
0 ण 4 





_ हट ह ह जीर भै सी यी ह । यदि मँ इ माग न गी तो चु मी धद । इस उ 









न्क 





स्तेयं तव फरयार्ण स्यं मा हन्तुमहंसि ॥ ४॥ 
थ 


अ०े | दृशाम्‌ सन्ध ९२१९ 


योनि 














देवक्याः शयने न्यख वसुदेबोऽथ दारिकाम्‌ । | जलम पद्वचकर वघुदेधजीने उस कन्याको देवकीकी 
| शाग्यापर सुला दिया ओर अपने पेम वेद्या डाठ । 
प्रतिमुच्य पदोलोहमास्ते पूरवबदाडृतः ।।५२॥। | तथा पेकी तरं वे वीगृहम बद्‌ द गये ॥५२॥ । 
८. | उधर नन्दपत्नी यश्ोदाजीको इतना तो माद्धम इआकिं ` 
= । कोई संतान इई है, परंतु वे यह न जान सकी कि पुत्र 
यशोदा नन्दपत्नी च जातं परमबुध्यत । हेया पुत्री; क्योकि एक तो उन्हं बडा परिश्रम इआ 
| था ओर दूसरे योगमायाने उन्हं अचेत कर दिया 
न तरिलिङ्गं परिशान्ता निद्रयापगतस्मृतिः ॥५२॥ । था# ॥ ५२ ॥ 
-=्च््ड्श्नद- 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूवाधें 
कृष्णजन्मनि तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ 





अथ चतुर्थोऽध्यायः 
कसके हाथसे टकर योगमायाका आकाराभे जाकर भविष्यवाणी करना 
श्रीशुक उवाच | श्रीशक्देवजी कहते है-परीक्ठित्‌ । जब वसुदेवजी 


कोट आये, तब नगरके बाहरी ओर भीतरी सब दरवाजे 
बहिरन्त {पुरदार £ सवां ६ पूवेवदाघृता ; | | अपने-आप ही पहकेकी तरह बंद हो गये | इसके बाद 
नवजात शिश्चुके रोनेकी ध्वनि सुनकर हारपार्गकी नीद 
~ = टी ॥ १ ॥ वे तुरंत भोजराज कं्तके पास गयं ओर 
ततां बारष्वनि श्रुत्वा गुहपााः सश्ुस्थिताः ॥ १} कीक संतन दो च 
आकुता ओर घबराहटके साथ इी बातकी प्रतीक्षा 
| कर रहा था ॥ २ ॥ दारपागंकी बात घुनते ही वहं 
ञजटपट पकंगसे उठ खडा इआ ओर बड़ी रीघ्रतासे 
आचष्युभजराजाय यदुद्ि्नः परीक्षते ।॥ २॥। | ततिकागदकी गोर श्वा । श नारो 
| जन्म हआ है, यह सोचकर वह विह हो रहाथा ओर ` 
। यही कारण है कि उसे इस बातका मी ध्यान न रहा 
कि उसके बाढ 'बिखरे इए ह । रास्तेमं कड जगह वह्‌ 
घूतीगृहमगात्‌ तूण प्रस्खलच्‌ उुक्तमूधंजः \ २॥ | जंडलडाकर गिरते-गिरते बचा | २ ॥ बंदीगृहमे पडचने- 
| पर सती देवकीने बड़े दुःख ओर करुणाके साय ९ 
तमाह भ्रातरं देवी कृपणा करुणं सती ।  । माई कंसे कह्ा--भरे हितैषी माई ! यह कन्या तो 
। तुम्हारी पुत्रवधूके समान है । ब्रीजातिकी दै, तुष्ह 
स्ीकी हत्या कदापि नहीं करनी चाहिये ॥ ४॥ ` 
पुत्रम । २. कृष्णावतारे तृतीयो ° । ३. शीघ्रमु° । ८. णी। ` 
भगवान्‌ श्रीक्ष्णने इस परसङ्खगमं यह प्रकट क्रिया करि जो सुञ्े प्रेमपूवक अपने दयमे धारण करता है उसके ` 
बन्धन खठ जते दैः जेखसे छुटकारा भिर जाता हैः ब्रह बडे फाटक टूट जते ई पहरेदारोका पता नदी चलता, भव-नदीव ॥ ॥ १ 
सूख जाता है गोकुल ५4 इन्द्िय-समुदाय ) की वृत्यां डत हो जाती है सामा हाथमे आ जाती है] ् 


ते तु तृण॑सुपत्रञ्य देवक्या गभ॑जन्म तत्‌ । 


स तपात्‌ तूणयुत्थाय कालोऽयमिति विहर । 




























१४० श्रीमद्भागवत | अ० ४ 


= । 

मेथा ! ठ॒मने दैववश मेरे बडृत-पसे अगनिके समान तेजघ्वी । 
वाल्क मार डाले | अब केव यही एक ढ्न्या वची 
| 
















हयो हि्िता आतः शिवः पावकोपमाः । 

च <| च वनि र = मदीय = ५९ ^~ ०९७ 
त्वया दवनिषृष्ेन पुत्रिकैका प्रदीयताम्‌ । ५ | है, इसेतोमुतै दे दो॥ ५॥ अ्रश्य हीन वुश्ारी 
| छोटी बहिन द्र । मेरे बह्ृत-से बभ्चे मर गये है, इत्य 
म अत्यन्त दीन द्व । मेर प्यरे ओर तमर्थं भाई ! तुम 
सुज्ञ मन्द्भागिनीको यह अन्तिम संतान अवर 
५ 


# 


द | & || . 
भ्रद्धुकद्वज कह त है परीक्षित्‌ । कन्याको अपनी 


| 
गोदमं छिपाकर देवक्षी जीने ध्यनत दीनताके साथ सेते | 
रोते याना की । प्रतु कंस वडा दुष्टथा | उने \ 
देवकी नीको ज्जिडककर उनके ह।थसे वह्‌ कन्या छीन 
ली ॥ ७ ॥ अपनी उप्त नन्हीं-सी नवजात मानजीे 
पैर पकङ्कर कंसमे उसे बडे जोरसे एक्‌ चद्ननपर दे 
0 स = (५ अ, 
मारा ! लाथने उक्र हूयसे सोह।द॑को समू उखाड़ 
फकाषा॥ ८ ॥ परंतु श्रीङृष्णकी वह छोटी वहिन 


नन्पहं ते भरजा दीना इतयता प्रभो | 





दातमहसि मन्छाया अङ्गेमां चरमां प्रजाष्‌ \। ६ \! 


\. शर्क उकाच 

उषगुदयात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत्‌ । 

| । याचितस्तां विनिभरस्यं हतादाविष्छिै खलः॥७ 
| । तां गहीत्वा चरणयोजोतमात्रां खसु सुताय ¦ 

+  अपोथयच्छिलाधष्ठ खार्थोनमूरितिसौहृदः ॥ ८ ॥। 






स्तुति कर्‌ रहे थे | उस समय देवने कंससे य् 
कहा-|॥ ११॥ ^ मूखं ! मञ्चे मारनेसे तञ्च क्या 
मिङेगा १ तेरे प्रवजन्मका शत्र तुं नारके च्यि किसी 
स्यानपर पेदा हो चुका है | अव व्‌ व्यर्थं निदोषं ॥ 
ाखकोकी हत्या न किया करः ॥ १२ ॥ कंपे इस | 
प्रकार कहकर भगवती यौगभाया वते अन्तर्धान हो 
गयी ओर प्रधरीे अने स्थानोपे विभिन्न नामोत मसिद्ध 
हई ॥ १२ ॥ ५ 


 देवीकी यह बात सुनकर कंसको थीम आश्य 
हा । उसने उसी समय देवकी ओर वघुदेवको कैदसे 
छोड दिथा ओर बड़ी नप्रत।से उनसे कह त 1 दा - 1९9 


1 ४ , उगहतास्वलिभिः स्तूयभनेदमत्रदीत्‌ ॥११॥। 





^ सा तद्धस्तात्‌ सघयुरपत्यं सो देव्यम्बरं गता ¦ साधारण कन्या तो धरी नही, देवी थी; उसके हाथवे 

1 | ् ५ 

1 =, | छरटकर तुरत अकामं चटी गथी ओर अपने वडे.बडे 

| वना ष्णोः सायुधाष्टमहाञजा ॥ ९ ॥ भाठ हाथौमं आयुध च्यि इए दीख एडी ॥ ९ ॥ वह्‌ 
दिव्यस्तगम्बराठेपरत्नाभरणमभूषिता | दित्य माला, ब, चन्दन ओर मणिमय आमूषणोंसे 

` द. | विभूषित धी ¦ उपक हाथमे धनुष त्रिश्ूढ, बाण, ढा, 

॥ धलु+शलेषुचमासिशङ्ववक्रगदाधरा ॥१०॥ | तच्वार्‌, रङ्घ, चक्र ओर गदा--ये आठ अयुघ 

५. छ रा ५५ <> गीर | 
१ तिद्वचारणमन्परप्तरः पिन, थ ॥ १० | सिद्ध; चारण, गन्धव, अप्रा, किर ॐ ‹ 
। ^ अ वपयन्यश्रप्तरः कि जरारगेः | -नागगण बहुत-सी मटकी सामग्री समित करके उसकी 






/ किं मया हतय। बन्द्‌ जातः खदु तवान्तङरत्‌ । 
यत्र क वा पुवं हिसीः कृपणान्‌ दथा ।१२॥ 












च | 
च ~ 9 2 १४ 





* कछ, `ˆ "ऋष क ` # 9 क = = अ भ 


























अ० ४ | 
ध. दशम्‌ स्कन्ध 
{ यकन प प च ~ 


अहो भभिन्यहो भाम मया वां बत पाप्सना । । भेरी प्यारी वहन ओर वहनोरई्जी ! हाय-दायः मै बड़ा 
पापी द | राक्षप्त जैसे अधने ही वर्वोको मार्‌ डालता 

पुरुषाद इवापत्यं बहवो हिंसिताः सताः ॥ १५ | है, वैसे दी धरन तुम्हारे बहत-से कडवेः मार डरे । ई 
¦ बातका सुने वडा खेद है# ॥ १८ ॥ म इतना दुष्ट 
सं त्वह त्यक्त करुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहत्‌ खलः। ह करि करुभाका तो सुबते टेल भी नहीं ह । मेने अपने 
माई-बन्धु ओर हितैषिर्योतकका व्याग कर दिया । पता 

छोकस्‌ यं समिष्यासि ब्रह्महेव सतः श्र्स्‌।।१६।। । नहीं, अव्र मुञ्चे किप्च नरकमें जाना पड़ेगा । बास्त्रमं तो 

मै ब्रह्मघाती समान जीषित होनेपर भी मुदो दही 

देवमप्यतं क्ति न सस्या एष व्य्‌ । द्र | १६॥ केवर मनुष्य ही रूह नहीं बते, विधाता 

। भी द्चूठ बोखते हैँ । उसीपर विशा करके मेने अपनी 

यदवि्म्भादहं ष्पः ख्ुनिहतवा्छिश्यूत्‌ ॥१७।॥ वहिनके बच्चे मार डाले । जोह । भ कितना पापी 
द ॥ १७॥ त॒म दोनों महासा हो । अपने पुत्रोके 


मा शोचतं स्डाभागावारमजान्‌ संङ़तम्थजः | व्यि शोक मत करो । उन्रं तो अपने कमंका ही फल 
मिति है । समी प्राणी प्राख्धके अधीन ह । इसीसे वे 
स सदैदत्र दैवाधीनास्तदाऽऽते ।। २८।। ` सदा-सवदा एक साय नही रह सक्ते ॥ १८ ॥ जसे 


मिद्टीके बने इए पदार्थं वनते ओर बिगडते रहते हं 
धधि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपान्ति च । | परं दमं कोर अदच्चदल नह होती दी 
शरीरकं तो बनना-बिगडना होता ही रहता है; परत ` 
, आत्मापर इसका कोई प्रभाव नहीं पडता ॥ १९ ॥ जो 
लोग इस तत्को नहीं जानते, वे इस अनात्मा शरीरको 
| ही आत्मा मान वेऽते हें | यदही उल्टी बुद्धि अथवा 
| अज्ञान है । इषीके कारण जन्म ओर मृत्यु हेते ह । 
तोगियोनै क । ओर जबतक यह अज्ञान नदी मिटता, तव्रतक घुल- ` 
देहौ च संसयु्तिमे निवतेते ।॥२०॥ ¦ दुःखख्प संसारसे दछुटकारा नहीं मिक्ता ॥ २० ॥ 
६ । मेरी प्यारी बहिन ! यबि मैने तुम्हारे पुर्बोको मार डाला 
त्द्‌ भद्रे खतनयाच्‌ मया व्यापादितानपि । ¦ है, किर मी तुम उनके ल्थि शोक न क्रो । क्योकि ` 
समी प्राणियोको किरा होकर अपने कर्मोकरा फर मोगना 
माटुक्ञोच थतः सवं; खछतं विन्दतेऽबक्ः ॥२१।। , पडता है ॥ २१ ॥ अपने खरूपको न जाननेके कारण 
। जी जबतक यह मानता रइता दै कि भे मासेवाल ` 
यावदतोऽखि हन्ताशीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक्‌ । हया मारा जाता ई तव्रतक रारीरे जन्म ओर मृ्यु- ` 
का अभिप्रान करनेवालर बह अज्ञानी बाध्य ओर 


नायमार्मा तथतेषु विषयेति तथेव भुः ॥१९॥ 


यथातेदविदो मेदो आत्समिपयंयः | 


पीत) 4. (0 1 क 1 





र तावत्तदभिमान्यज्ञ वाध्यगाधकतामियात्‌ ॥२२।। , मात्रकं) प्राप्त होता हं | अथात्‌ व दूसरोको दु ध 
१. सुद्दो । २. सुकृतं । ३. युक । ट र व ठ ८ 
जिनके गर्म भगवानूने निवास श्रियाः जिदं भगवान दन हुए, उन देवी-वसुदेवके द्शनकरा ही यड 


( गया । परं जत बह १ उनके २ खा 
फरडे कि कंक हदयं विनपः विच उदासता आदि सहुणौका उदय हो गवा । परवु ष = 
न ये पद्गुण पे । दु मन्निके री चमे जाति ही वह फिर ज्यो-कात्यो हो गया । व 


= 
(६ छ | कन । जु 
¬२ ४ न नि अ ¬ क, ४. ब्‌ > 
५ > "+ दभः ॥ ग 1 > १ ¶ 1 । 4 ^ 
3 = >~ 4 ठ > न -° =. ५, = >+ क न्क ~ भै + + 4" < क ¬ 3 ~ ५ नि # त „क! ++ ए ~^ च ४. (6 # क" 
अ+. = गि 4 4 2 » > 94 ४ त "अनकक ९ (19५ ट्र: ट ऋ ~" "ण 
~ ग. 234 र धः इथ व ह "कथ न -१,. -ई& (न 
त + द ` "~ 47 
"न 


५ | “ 
पक ~ च 


9.4 ओ > नि" + क # च ` 
^ क नगा" = ~ + १ न र्‌ + ए + कज +~ = भन ९९ -क 2 र "~ =-=: +> त. +न 
कनन +~ - नि प # च दः 1.4 क = 4, ॥ । # क + ~ १५ [य 
39, ६ 3 4 „१ -+ १4+ज् । । । । = । 
भ क " "र "रकया त ऋ ~ (~ रै षो ^ न्प, 71 (9 अ 






१ 


ह * १ ( न 
¢ § °} 2 ॥ि = -4 ष्टु क कमं = ष * १. 4 ~ 
क =+ > ~ ^ [र ६, = ॥- च ह ह 0 00 ४ ६ + 
9 ५. 30 ४: ~ ) ॐ ~~; 3 + ~> । शद - => द. ६. ज {4 €: "न्न भु ४ क्व ~ 1. ग 
५१ च ् ध ष 
द + 


+1१॥. 
४4. १११ 
† ५ = 
१ त ड 
४१ 9 
"कक च (न 
+ ११३ ॥ 


ध श्रीमद्भाम षत | | अ० 


अ क छं सोऽ कच्छ ` छादे = कका उ : ककच्केक्क क क ` च्छक @ ऋ कं च क ऋ कर आनत ते जकः क + ह) | भकः = आचित बदन नकद १.22,» 
नाणका कि काः क प च क चिक त, छः काषछ = = चक 9 9 कक 9 क च्छक 9 केतक जका गोरे = र ` क्कः चः जणे = ऋः । | ग अः चन्त च 





~~~ सदो ०४०५७७० क -- ् 








। „ श्मघ्वं मम दोरास्म्यं साधवो दीनवत्सलाः । है ओर खयं दुःख भोगता है ॥ २२ ॥ मेरी य दुष्टता 
| तुम दोनों क्षमा करो; क्योंकि तुम नडे ही साधुखभाव ओर 


इत्युक्त्वाश्वुुखः पादो श्यालः खस्रोरथाग्रहत्‌॥|२३॥ | दीनोके रक्तक हो ।' ेसा कहकर कंसने पनी बहिन 


मोचयामास निगडाद रिश्रब्धः कन्यकागिरा । | दलकी ओर बुदेवजीके चरण पकड चये । उसकी 
ओं वसे ओप बह-ब्रहक सुंहतक आ रहे थे | २३ ॥ 


देवकीं वसुष्ैवं च दशयन्नात्मसोहदम्‌ ॥२७॥ | इसके बाद उसने योगमायाके वचनोंपर विश्वास करके 
देवकी ओर वसुडेवको कैदसे छोड टिया ओर बह तरह- 
नुः समलतपरख क्षन्ता रोषं च देवकी | | तरसे उनके प्रति अपना ्रेम प्रकट करने ठगा ॥ २४ ॥ 
जब देवकी जीने देखा क्रि माह कस्को पश्चाताप हो रहा 
व्यजद्‌ वसुदेवश्च प्रहस तय्रवाच ह्‌ ॥२५। है, तब उन्होने उसे क्षमा कर दिया । वे उसके पठे 
अपरार्धोको मूढ गयीं ओर वसुदेव नीने हैँ्कर कंसे 


क ९ 9 मनस्वी कंस | आप जो कहते हैँ, वह 
एवभेतन्महाभाग यथा वदसि देषिनाम्‌ । | कडा -॥ २५ ॥ मनसी कं = 
चद दह ४। टीकर वेक्ता ही है। जीव अज्ञानके कारण ही खरीर आदिः 


धनैः मान वैठते हैँ । इसीसे अपने-परायेका भेद 
अज्ञानप्रभवाहषी खपरेति भिदा यतः ।२६॥ हो जाता है ॥ २६॥ ओर यह भेदष्ष्टि हो जानेपर 


तो वे सोक, ह, भय, देष, लोभ, मोष्ठ ओर मदसे 
शोकदभयद्ेलोभमोहमद्‌न् लोभमोहमदान्विताः । | अन्वे हो जाते है । पिरि तो उन्हं इस बातका पता 


ए 9 ही नहं रहता कि सत्रके प्रेरक भगवान्‌ ही एक भावसे 
। मिथो तन्तं न परयन्ति भावैर्भावं पथग्डक्षः ।|२७॥ | दूसरे भावका, एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नाश करा 
६ | रहे हं" ॥ २७ ॥ 















- शी्चुक उवाच भीश्यकदेवजी कहते हं-परीक्षित्‌ ! जग वसुदेव 
कप एवं प्रसन्नाभ्यां विशचद्धं प्रतिभाषितः ओर्‌ देवकीने इस प्रकार प्रसन्न होकर निष्कपटभावसे 


| `सी कतके साथ बातचीत की, तब उनसे अनुमति लेकर 
#: ~ सनकवसुद्वाभ्यामनुज्ञातीऽबिश्चद गृहम्‌ ॥२८॥ वह अपने महल चरु गया | २८ ॥ वह रात्रि बीत 
॥ जानेपर कंसने अपने मन्तरियोको बुलाया ओर योगमायाने 
। क साज्यं व्यतीतायां कं आहूय मन्विणः। | जो कुछ कहा था, बहन सव उन्हे कड सुनाया ॥२९॥ 
कके मन्त्री पूणतय। नीतिनिपुण नही थे । दैत्य होनेके 
कारण स्वभावसे द्वी वे देवताभोके प्रति शत्रताका भाव 
रखते थे । अपने खामी क्तकी बात सुनकर ३ देवताओं 
पर ओर भी चिद गये ओर कंससे कहने त्गे- | २०॥ 
(भोजराज | यदिः पेसी बात है तो हम आजी बडे 
बड़े नगरोमे, छोटे छोटे गमि, अदीरोकी बस्ियमिं जोर ` 
दूरे स्थानम जितने वच्चे इए है, वे चे दस दिन 
अधिकरर हों या कमपके, सबको आज ही.मार डख्गे॥३१॥ 

| समरभीर्‌ दगण युद्धोयोग करके ही क्या करगे १ बे तो 
आपके धनुषकी टङ्कार खुनकर ही सदा-स्वदा दवराये 


~~ म भ ‡, = 
+ = ~न" ४ 
ऋ 


| ॥: आचष्ट तत्‌ सव यदुक्तं योगनिद्रया ॥२९॥ 
2 भतुगंदितं तमूदुरदेषसत्रवः 
न्‌ तरति छतामषां दैतेया नाविकोविदाः ॥३०।। 
१" पि भानेन्द्र॒पूरगराम्रजादिषु | 


४ ॥ (५ 


पाय व शिशत्‌ ३१ 


त र 1 च 
(4८ (1 ( 


£ (4 [21 गेष्म ननि > 
१ करण्यान्त दवाः समरभीखः 
॥ ।नधनुषस्तत्र ॥ ३२ 


1 & ४८ ७१६ "नयः न्व स 
६ ब्रच्धचण० <" धय्ा० | ३. ज 






~ न 












अ० ४ | द्म स्कन्ध 











अखतस्ते शरवातेहन्यमानाः समन्ततः । | रहते हैँ ॥ ३२ ॥ जिस समय स आप चौट- 


पुरचोट करने क्गते दँ, बाण-वधासे वायक हकर अपनं 
जिजीविषव २त्छुज्य परायनपरा ययुः ॥२२॥ | ब्रा्णोकी रक्षाके च्य समराङ्गण ओोडकर देवतालग 
पलयन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते है ॥ ३३६ ॥ 
कुः देधता तो अपने अच्ञ-दाज्र जभीनपर डाठ देते द 
धृक्तकच्छकिसखा; केचिद भीताः ख इति वादिनः ३४ | आर शाय जोडकर आपकर सामने अपनी दीनता प्रकट 
करने ल्गते ह । को-काई अपनी चोकं बाठ तथा 
कच्छ खोलकर आपकी शरणमे आकर कहते ह कि- 
ह्म मयभीत है, हमारी रक्षा कीजिये ॥ ३४ ॥ अपि 


उन शत्रुओं को नही मारते जो राज्ञ-अख भूल.गये हो, 
जिनका रथ टट गया हो, जो डर गये हो, जो लोग युद्ध 
छोडकर अन्यमनस्क हो गये हां, जिनका धनुष द्रूट गया 
हो या जिन्न युद्धसे अपना मुंह मोड़ छलिया हो- 
उन्हे मी आप नीं मारते ॥ ३८५ ॥ देवता तो बस्‌ 
वहीं वीर बनते है, जहाँ कोई ल्डाई-्गड़ा न हो | 
रणमूमिके बाहर वे बड़ी-बड़ी डीग कते हँ | उनसे 
। तथा एकान्तवासी विष्णु, दनवासी शकर, अस्पवरीय इन्द्र 
तथापि देः घापल्यानेोपेक्ा इति मन्बहे। ` ओर तपस्वी ब्रहमासे मी हमे क्या मय हो म 

| है ॥ २६ ॥ फिर भी देवतार्ओकी उपेक्षा नहीं करनी 


केचित्‌ प्राञ्जरयो दीन्‌ न्यस्तश्चा दिवौकसः । 


न तवं धिस्पृतश्चाद्ान्‌ षिरथान्‌ भयसंदृतान्‌ । 
हस्यन्यासक्तविश्चखाय्‌ भस्चापानयुध्यतः । ३९५] 
रवि लेमश्रेविडुधेरसंयुभविकत्थनैः । 
रहोजुषा पि हरिणा कञ्चना वा वनोकसा 1 


किभिन्दरेणद्पवीयण ब्रह्मभ{ वा तपसखता ।\२६॥। 


त रि च्‌ | चाहिये- पेसी हमारी राय है ¦ वयोकि हैँ तोवें 

ततसत्भृर नने निबुङ्ध्वासानलुत्रतान्‌ ॥३७॥ | "° ` `. ` 6 
ही । इसयिये उनकी जड़ उखाड़ फकनेके ल्य आप 

यथाऽऽसथुऽटे सष्येक्षिति चभिः इम-जेपे विश्वा्पात्र सेवको को नियुक्त कर दीजिये ॥२७॥ 


जव मनुष्यक्रे शरीरम रोग हो जाता है ओर उसकी 
चिकित्सा नहीं कवी जाती-उपेश्चा कर दी जाती है, 
.ततर सेग अपनी जड़ जमा ठेता है ओर फिर गह असाध्य 
यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा । हयो जाता हे । अथवा जसे इन्दियोकी उपेक्षा क( देनेपर 


सं शक्यते इटयपदथिकिस्ितम्‌ 


रिपुभहान्‌ बद्धबलो न चार्यते ॥३८॥ | 


मूं हि विष्णुर्देवानां यत्र भमः सनातनः । ठे, तो भर उसको हराना कठिन हो जाता ह ॥३८॥ 


उनका दमन असम्भव हो जाता है, वैसे ही यदि पडे ` 
दात्रकी उपेक्षा दर दी जाय ओर बह अपना पोब जमा ` 





नत 
ड ऋ 





देवतार्ओंकी जड है विष्णु ओर वह वहाँ रता है, जं ह 


तस्य च ब्रह गोविप्रा्तपो यज्ञाः सदक्षिणाः ॥२९॥ सनातनधमे है । सनातनधमकी जड़ है वेद, गौ 3 । 


| रहण, तपस्या ओर वे यज्ञ, जिनमे दक्षिणा १ जाती 





तसात्‌ सबीत्मना राजन्‌ ब्राह्मणान्‌ जह्मवादिन;। | 1 १ क व ल | 
। 9 "= 





त॒पखिनी यज्ञशोलान्‌ गा हुर्पो दविदुषा; ॥४०॥ इविष्य पदाथं देनेवाी गायका प्रणख्यसे नाञ्च कर ` 


१. भीता । २. वा । 








भ क्यं मनिन्य पि ज क स क शा = = 1 ` » क 9 गयि किनि हि न किनका कवित कोक भक + आ य म उ --- >+ क्र त । 
ग ॐ म त =» =» # ` शाति त त श श पश च 9 (= {9 = १ तिनि पि । न (2. [त पे 
प कयः 345 => 94 व 7 " + केष 


ं 3 ~ . ` „ "ष्का कक = @ क च उदकन र 0 

















विप्रा गावश्च वेदाश्च तरपः सस्यं दषः शसः ¦ | डल्गे || ४० ॥ ब्रह्मण, गौ, वेद, त स्या, सत्य, 

इन्दियदमन, ्नोनिग्रह, शरद्धा, दया, तिनिक्षा ओर यञ 

भद्धा द्या तितिक्षा च कृतवश्च हरेस्तन्‌ गिष्णुके शरीर दँ ॥ ४१॥ बह विष्णु ही सारे दतां 

स॒ हि सवेसुराष्यक्षा छसुरद्विंड गु्।शयः । का लामी तथा अघुरका प्रधान द्वेषी है | प्रतु बहू 

तलत सः तवी, चराः सनतर्भला व गुफामे छिपा रहता है । महादेव, ब्रह्मा ओर सारे 

वीणा वििसनय वताअ।को जङ्‌ वही है | उसको मार डाटनेक। उथाय 
अयं बं तद्वधोपायो यद्वीणां विहरन्‌ ।\४२॥ य्न है करि ऋषियोको मार डाला जायः ॥ ४२ | 

भ्रीश्ुकदेवजी कहते है--पृरी क्षित्‌ | एक तो कस- 

श्रीक उवाच त दुद्‌ खेय ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री से 

- भले थे, जो उससे मी बडकर्‌ दुष्ट ये । इत प्रकार 

एवं दुर्मन्तिभिः कसः सह सम्मन््य दुर्मतिः । उनसे सकहन करके काच्के फे फते हए अघुर कंसने 

इ यही ठीक समन्चा किं ब्राह्मणो कतो ही मार डा जाय ॥४३॥ 

बरहमर्िसां हितं मेने कारुपाशाब्रतोऽसुरः ॥४३॥ | उपने हिसप्रेमी राक्षसोको संतपुरुषोकी हिंसा करनेका 

॑ | क आदेशा दे दरिया । वे हृन्छानुसार्‌ रूप धारण कर सकते 

। संदिश्य साधुलोकसख कदने कदनप्रियान्‌ । थे । जब वे इधर-उधर चे गये, तव कंसने अपने 


( 7 महम प्रवेशय किया ॥ ४४ | उन असुरोकी प्रकृति 
8 ह 0 राला , (4 थी रजोगुणी । तमोगुणके कारण उनका चित्त उचित 








क =. चः ज ~ 
ऋ + = न नै ४ 
रै ४ धि = ९५ क न भ ह ि 
नि न नाकतननलनजरत वा" ०, ०५ ७४०५ 
* । + 
। 1 = ` {> 
[नै ४३ 





| 
` 
। 
| 
। 
र 
{- 
। 
॥ 












| ¢ त 3 रजःकतयलमसा भूढवेतसः भोर अनुचितके विवेकसे रदित हो गया था | उनके 
| । १ | सिरपर मौत नाच र्वी थी | यही कारण ह कि उन्होनि 
श्र | क ॥ । 
^ सतां द्दवषमाचेर्रारादागतमूत्यवः ।।४५।। | सतस देष किया ॥ ४५ ॥ परीक्षित्‌ ! जो लोग महान्‌ 
{ | सत याका अनादर करतं हैः उनसर ब कुक उनकी 
($ | ` आयुः भियं यो धम लोकानाशिष एव च । आयुः चर्मी, कीति; घर्म, लोकःपरलोक, प्रिषय-भोग 
^ आर सवके कल्याणके साधननोक्षो नष्ट कर देता 
 इन्ति श्रेयांसि सवाणि पुंसो महद विक्रमः ॥४६॥ | है ॥ ४६ ॥ 
ह+ ----=--6४9ननठ------ 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारसहस्यां संहितायां दशाप्छ 
पूवार्थे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ 


१. | = | र | स - र न. । 4 "अमात्यं 
& ` `  गोङ्कलम भगवान्‌का जन्ममदोत्सव 
श्रन्चुक उवाच भ्रीशकदेवजी कडते है प्रीक्षित्‌ ! नन्दबाव! > 


मनस्वी जोर उदार थे | पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका 
हृदय विलक्षण आनन्दसे मर गया । उन्होने स्नान किय। 
= ~ तातः शुषिररुकृतः॥ १॥ | ओर पवित होकर घन्दरु्दर बलामूषण धारण वे । 
2 0 षा 


उत्पन्ने जाताह्ादो सहासना; 


चि + क च ४4 ॥ (पि 
~ कि. ~. ` "क 
क 


क ~ ~~ 3 द्र 
१ निच (३ क "क कैः ९ १ # 





व 
2 क ~ 
४... 4 
2 कन 4 मः क 0 


<-> ~ ~ न + ^ 


1१. च 1 > 
=, ` न्क -4 
< > ५ । 

9 ~) र 















~-~-ॐ> ~~ > 


चित्रभ्वजपताकःछक्चेरपछवतोरणे; 


-पिचित्रधातुबहंस्षगवद्चक्षाश्चनमालिनः 





अ० ५] 


दशतम्‌ स्कन्ध 





या ययित्वा खस्त्यथनं जातकर्मात्मजसख वै ¦ 
ऊ(रयासास विधिवत्‌ पिवदेवार्यनं तथा ॥ २॥ 


धेनूला नियुते प्रादाद्‌ द्द्रिम्यः समरंरते । 
तेलादरत्‌ सप रत्ीषशात्ोम्भाम्बराबरताव्‌ ।। ३ ।। | इ९ तिके सात पाड दान कयि ॥ २ ॥ ( संस्कारेसे 


डेन सानसोचाभ्यां संस्छारेस्तपदेज्यया । 


शुष्यन्ति दानः सन्त॒षटया दव्याण्यात्माऽऽत्मदिद्यया 


ह 


सौ ङ्ल्यगिरो षिश्राः तसागधश्म्दिनः । 


भायकाञ्च जयुनेदुमे्यो दुन्दुभयो युः ॥ ५॥ 


जः सम्युषटष्सिक्तदाराजरणरहान्तरः । 


॥ ६ ॥ 


॥ ९ २ ^ 
शवो वृषा वत्सतरा दशरिवंलरूषिताः । 


 ॥ ७ | 


मशदवञ्ञभरणकञ्चुकोष्णीपमूषिताः । 
गोपाः समाययू राजन्‌ नानोपायनपाणयः ॥ ८ ॥ 
मोप्यश्चाकण्यं मुदिता यञ्लो शयाः सुतोद्भवम्‌ । 
आत्मानं भूषयांचकष्वखकरपाञ्जनादिभिः ॥ ९॥ 
नवङु्मकिञरकयुखपङ्जमूतयः | 


बरङिभिस्त्वसितं जग्धः पृथुश्रोण्य्रत्ुचा ४ १०॥ | लेकर जल्दी-जस्दी यञ्चोदाजीके पास चटी । 





१. धिना पित्र° । २* षाः सवत्साश्च हरि° । 


पिर वेद ब्राह््णोको बुच्वाकर खस्तिवाचन ओर अपने 
पुत्रका जातकर्म-संस्कार कलाया । साथ ही देवता ओर 
पितरोकी वरिधिपूर्वक पूना भी कखायी ॥ १-२॥ 
उन्हनि त्राहम्णोको वज्ञ ओर आभमूष्णोसे छुसजित दो ` 
खख गौरे दान कीं । सत्न ओर सुन ॐ वल्मसे ठके 


ही गमद्ुद्धि होती है-- यह प्रदरदित करनेके टये अनेक 

| दृष्टान्तो का उल्टेख करते ¬) समथसे (नूतन जक, अद्ध 

| भूमि आदि ), स्नानसे ( शरीर आदि ), प्रक्षाखनसे 
( वज्रादि ), संस्कारोसे (गमांदि ), तपस्यासे (इन्द्रियादि ); 
यज्गसे ८ ब्राह्मणादि ), दानसे (धन-धान्यादि ) ओर संतोषसे 
( मन आदि ) द्र्य जुद्ध क्षोते है । परंतु आत्माी द्धि तो 
आत्मज्ञानसे दी होती है ॥ ४ ॥ उस समय ब्रह्मणः; 
सूत॑, मागध ओर वंदीजंन मङ्गल्मय आदीतरीद देने तथा 
सतुति करने कगे । गायकः गाने कगे । भेरी ओर दुन्दुभिरया 
बार-बार बजने ल्गीं ॥ ५] व्रजमण्डच्वे सभी धरोके 
द्मरः, ओगन ओर भीतरी भाग ्आङ्बह्यार दिये गये; ` 
उनमें सुगन्धित जख्का छिडकाव विया गया; उन्हें चित्र- 
विचित्र ध्वजा-पताका, पुर्ष्पोकी माडाओं, रंग-विरगे वज्ञ 
ओर पठ्च्वोंके बदनवारोसे सजाया गया ॥ & ॥ गाय 
वे ओर बछडकि अङ्खोमे हव्दीतेख्का ठेप कर दिया 
गया ओर उन्हे गेरू आदि रंगीन धातुं, मोरपंख, 
परमेके हार, तरह-तरहके सुन्दरं वचर ओर सोनेकी 


जजीरंसे सजा दिया णया ॥७॥ परीक्षित्‌ ! सभी | 


ग्वार बहुमूल्य वल्ञ, गहने, गरे लोर पगड़योसे . 


सुसनित होकर शोर शपने होमे मटकी बहइतसी ५ 


सामप्रिय ठे-लेकर नन्दबाबके घर आये ॥ ८ ॥ . 


यदोदाजीके पुत्र इआ है, यह सुनकर गोपिोको हः 
मी बड़ा आनन्द हआ । उन्होने सुन्दर-घुन्दर वख. = त 


आभूषण ओर अञ्लन आदिसे अपना श्च्वार किया 1९॥ 
गोपियोके मुखकमर बडे द्वी सुन्दर जान पडते थे । ` 
उनप्र ल्गी इर कुंकम रेसी क्गती, मानो कमटकी 

हो । उनके नितम्ब बे-बडे ये । वे मेंटवी म म च 8 





पौराणिक | २. वंशकरा वणन करनेवाङे । ३. समयानुखार उक्तिथोसे स्वति = केव मा । जै कि का है क 


्रतावसदशोक्तय “कट्‌ व 


~ श [1 च: सि ज ४ छु 
+ ~ 4 ; (सताः पौराणिकाः परोक्ता मागधा वंशशसकराः । बन्दिनस्वमल्प्रशाः रस्तानसद्याक्तयः ॥° ५ 


13 
1 + 


अअ + त 


4 ४ 
4 कै. ^, #॥# 
५ पी = क अ 


सामग्री १. ह ५ ~ ॥ । 
। ५.१९ र „8 ^ 
~ 
{^ समय „४ च 
चच च 
नेक ६ । # ~ 














































गोप्यः सुमृष्टमणिङ्कण्डलनिष्ककण्ठ्य- 
धित्राम्बराः पथि शिखाच्युतमाल्यवषौः | 


नन्दालयं सवलया ब्रजतीविरेज- 


ता आशिषः प्रयुञ्ञानाधिरं पाहीति बालके | 


इरद्रिचूणंतेलाद्धिः धिशचन्त्यो जनय॒जगुः ॥१२॥ 





अवाद्यन्त विचित्राणि वादित्राणि महोस्सवे । 


ष्ण विच्वेश्वरेऽनन्ते न॑न्दसख व्रजमागते ॥१३॥। 


र न 4. -*११४। त 1 ध च वि > र 5 ४ 
~ कन क = 4 ५० ~ न्क # 9 * ५ { + ब~“ भ ~ "~ 4 5- ^ 9. +. 
द र तः क | ह ~- ~ + 8. ५४ किः नत कक ~~ - = क व + ४ १ 0 (4 ॥ † & 
नि न |; [| १ । + ५ ५ क - च - = त ५ । ` {4 ति च „५ ~~ 
४8, न ® + ^ न १ क == ति = ग न 9 त) ^ श, ~~ - ग 
न ॥ ॥ : ह क य 0, + = ¶, 
च णू ॥ ^ । क्र १ ॥ { ८ @ ४. न ब: पि 1 य । । क, ‡ न 
क; -4 ,४ ५ * क. + स -9 द्धे ~ | ६ ५ 
~+ # . 7 1 क हं + + [वे £ # 
= कु = न्दु + ~ करभक. दु ककः 
$ | ‡ ¦ >. १.१ न 9 भ्त चै भ ^ जी 
व > 3, 
तै ॐ; | 


गोपाः परस्परं हृष्टा दधिक्षीरशताम्बुभिः । 





आसिञ्चन्तो बिङिम्पन्तो नवनीत चिकषिपुः॥१४॥ 








कामेरदीनात्मा यथोचितमपूजयत्‌ । 


मै 


4 + ¶ [न = ह ॥) ५ 
' -= कलक 
0 ४ क 
` „. ऋ कक, ए 
8 ८4 क अनहं += १ + छ, 
॥, | ५ ५ 
1 > | । । 4 ३ 
ध ४ १ ऊ १ हि क ^ ॥ # त 1 
1 च 9 39 9 # सखप्त्रखादय ५ ह 
(+ & नपे न्नर ^ > ४ # 
१ ४६२ # ५ १.1 <? 
त क " (५ क म 
{ १: क 
र १ 


3 न ॥ 
नत क + ९ ह छ । , 
१५ भ्र [1 ५, त ५ 4 ४, ट [+ 
"१ ४ त 
+ ट ~< + १५ £ ‹ = षि नि 
श न्वा दि 1१ च च्‌ महाभागा = ति ‡ री पाभिनन्दिता 
§ + - । षः 
ठ ~ ॥ 0 
ह] र (1 नन्द्गा (२ 1 
४ 1 = ग 9 49 ०४ च १ | 
ॐ वि ह * । ` 
च ह 
षि „५ ि ५ 
| ~ ध 
क त 
५ क 
ह -् 






१७९ श्रीमद्भागवत 


॥ ९७ | सत्कार करती इई विचर 


[ ऋ व म्य = ~ 
=... १ 
के २ कथन र 


| अ० ५ 


उनके पयोधर हि रहे ये ॥ १० ॥ गोपिके कानि 
चमकती इई मणियोके कुण्डक ज्ञिलमिटा रहे थे । गल्मे 
सोनेके हार ( दैकल या हमे ) जगमगा रहे ये । क 
बड़ घुन्दर-ुन्द्र रग-बिरगे वज्ञ पहने हए थीं । मार्गे 
उनकी चोवियोमे गये इए प्रक वरसते जा रहे थे । 

हाथों जड़ाऊ कंगन अल्ग ही चमक रहे ये । उनके, 


व्यालोलङ्कण्डलपयोधरहारश्चोभाः ॥ १ १ |} | कानोके कुण्डल) पयोधर ओर ह्र्‌ हिल्ते जाते थे | इस 


प्रकार नन्दवाबाके घर जाते समय उनकी श्लोमा बड़ी 
शनूटी जन पडती थी ॥ ११ ॥ नन्दबाबाके धर जाकर 
वे नवजात रिक आशीर्वाद देती यह चिरजीवी हो, 
भगवन्‌ । इसकी रघ्ता करो । ओर लोगोपर हल्दी-तेव्सेः 
मितम हआ पानी छिडक देती तथा ऊँचे खरसे मङ्खल- 
गान करती थी ॥ १२॥ 


भगवान्‌ श्रीकृष्ण समस्त जगत्के एकमात्र खामी 
दे । उनके रेच्य, माधुर्य, वारसल्य-- समी अनन्त है । 
वे जव नन्दवावाके व्रजमें प्रकट इए, उस समय उनके 
जन्मका महान्‌ उत्सव मनाया गया । उसमे बडे-च्डे 
विचित्र ओर मङ्कलमय वाजे बजाय जाने गे | १ ३ ॥ 
आनन्द्से मतवाले होकर गोपगण एक दूसरेपर दही,. 
दूध, घी ओर पानी उड़ेलने खगे । एक दूसरेके मुहपर 
मक्खन मलने लगे ओर मक्खन फक -फेककर आनन्दोत्सव 
मनाने कगे ॥ १४ ॥ नन्दबावा खभावसे ही परम 
उदार ओर मनखी थे । उन्होने गोपोको बहुत-से वस्र, 
आभूषण ओर गोरं दीं । सूत-मागध-वंदीजनो चुत्य,. 
| आदि विचाओंसे अपना जीवन-निर्वाह्न करनेवाले 
तथा दूर युणीजनोको भी नन्दवावाने प्रसन्नतापूर्वक 
उनकी सुहरमोगी वस्तुएं देकर उनका यथोचित सत्कार 
किया | यह सब करनेमँ उनका उदेश्य यही था कि 
इन क्सि मगवान्‌ विष्णु प्रसन्न हों ओर मेरे इस नव. 
जात शिद्यका मङ्गल हो ॥ १५-१६ ॥ नन्दवााकें 
अभिनन्दन करनेपर परम सौमाग्यवती रोहिणीजी दित्यः 
व्ल, माल ओर गलके मोंति-भोँतिके गहनोसे पुसनित 
होकर गृहस्तामिनीकी माति आने-जानेवाली ्ियोका' 
री थी ॥ १७ ॥ परीक्षित्‌ ! 
उसी दिनसे नन्दबानाके व्रजमे सब " - 


न्न 7 र 


॥। + >» ॥ 
र ८ सर्व॑सम ६ द्विमान्‌ ¬> - 
1 ॥ च ष नि, ई ५ 

ध १८ १.५8. ॥ /] श -सस्ः 

* ९० ~ = करने लगीं ओ, 

५. 0. } (मः \ वि | । ४ चि द्ध अः 5 | ई > ॥ के । ष 

# १.१ प ` ॥. # = -9 > ~ क सेलिय = ४. 1 9 ने नि र ५ ॥ | च च. भगव १. „ § * [नू न क्ष्णु 
| = ~ - - ------- र्‌ =: = । 3? 1 क के = # इतः ११ * | क ~ $ 2 ~ ५ > श्री ~^ नि % 
~~~ --"- -- ~ न क ् 
.# को " = "ऋ $ ( न > ॥ म ल - ५ 
[ । अ. ( न4 


149 के ४ द्‌ >> + 
चिः ॐ 6 ति ~ ` | । ॥ ऋ & ६ ॥) 
- (श 0 ॥ ् 
ह. ५ ॐ 
® क 4 द । ¬> 


| > = ५. ए, | रजिन 
क च ४ 2 [क च; ॐ क ् + = [३ [कि 
। ख - 
1 न ~ 


> ‡ (१ 
च तरी ५ 
ट ट अध द. = ` „श 

< ~ १ १. (स । 

१ ५4 -थ ही + ५ 

6 षक | »> च 8 

वि, क, श < 59 क | क न + 

` व |. 

ड नि 





















अ | दशम स्कन्ध 











हरेनिवासात्मगुणे रमाक्रीडममून्नप ॥१८॥ | निवास तया अपने खामाविक गुणोके कारण वह व्छमी- 
० जीका त्रीडास्थक वन गया ॥ १८ ॥ + 
यावान्‌ गङ्लरक्षायां निरूप्य मथुरां गत्‌ । ` परीक्षित्‌ ! कुछ दिनेकि बाद नन्दबावने गोङुक्की 
रक्षाका मार तो दूसरे गोर्पोको सपर दिया ओर वे खयं 
| कंस्का वार्पिक कर चुकानेके चल्ये मथुरा चे 
वसुदेव उपशुत्य भातरं नन्दमागतम्‌ । गये ॥ १९ ॥ जव वघुदजीको य माद्म हआ कि 
हमारे भाई नन्दजी मथुरामे आये हैँ ओर राजा कसको 
ज्ञाता दत्तकरं राज्ञे ययौ तद्बमोचनसू ।२०।। | उसका कर भी दे चुके है तव वे जहाँ नन्दवावा ठहर 
हृए ये, बह गये ॥ २० ॥ वघुदेवजीको देखते ही 
तं दृष्ट सहशषोतथाय देहः प्राणमिवागतम्‌ । नन्दजी सहसा उठकर खड़े हो गये, मानो ग्रतक शरीरम 
प्राण आ गया हो । उनि बडे प्रेमसे अपने प्रियतम 
प्रोतः प्रियतमं दोम्या सन्न परमबिहङः ॥२१॥ | व्ुदेवजीको दोना हाथांसे पकड़कर हृदयसे खगा च्ा। 
नन्दवावा उस समय त्रेमसे विल हो रहे थे ॥ २१ ॥ 
पूजितः सुखमासीनः पृष्रनामयमीहतः । परीक्षित्‌ । नन्दबाबाने वपुदेवजीका बड़ा खागत-सत्कार 
किया । वे आदरपरवंक आरामसे बैठ गये । उस समय 
- ग्रप्रक्धो ¦ खतम जयोश्दिमाह्‌ विशाम्पते २२] उनका चित्त अपने पुत्रोमे ख्गृदह्ा या) ते नन्दवाबांसे । 
` | कुशल मङ्गल पूछकर कदने खगे ॥ २२ ॥ 
दिष्ट्या भ्रातः प्रवयस इदानीमप्रनख ते । [ बदेवजीने कष्टा] "भाई! तुम्हारी अवस्था दल ` 
चरी थी ओर अबतक तुम्हं कोर संतान नहीं इई थी । 
रजाशया निवृत्तख प्रज। यत्‌ समपद्यत ॥२३॥ | यद्यौतक कि अव तुम्हे संतानकी कोई आशा मी न ` 
। थी । यह्‌ बडे सोमाग्यकी बात है किं अब तुम्हं संतान ` 
दिष्टया संसारचक्रेऽक्षिन्‌ बतंमानः पुनर्भवः । | परा हो गयी ॥ २३ ॥ यह भी बडे आनन्दका व्रिषय ` 
है" कि भाज हमलोगोका मिलना हो गया । अपने ` 
उपलन्धो भवानद्य दुर्भ प्रियद््नम्‌ ।।२४॥ | ्रमियोका मिना मी बङा दुर्म है । इस संसारक | 
| ही एेसा है । इसे तो एक प्रकारका पुनर्जन्म ही ` 
समदना चष्िये ॥ २४ ॥ जसे नदीके प्रबल प्रवाहे 
बहते इए जडे ओर तिनके सदा एक साय नहली रह ` 
. सकते, वैसे ही सगे-सम्बन्धी शौर प्रेमियोकरा मी एक 
ओषेन व्युद्यमानानां वानां स्रोतसो यथा ॥२५॥ | स्यानपर रहना सम्भव नहीं है--ययपि वह 
1 च है । क्योकि सबके १ अलग-अच् 
¡ नितलं ९ मुव ॥ २५ ॥ आजकल तुम महावने अपने 

कचित्‌ पशव्यं निरुजं म्बुठणवीरुषम्‌ । माई-बन्धु ओर खजनोके साय रहते हो, उसमे जठ, 
जोर ऊता-पत्रादिः तो भरेषूरे है न १ वह बन पञयुथकि 
शृहदनं तदधुना यत्रास्ते खं सृतः ॥२९॥ व्यि अलुकरूढ ओर सब प्रकारके रोगेसे तो क्वा 


नन्दः क्तस्य वापिकयं करं दातुं रूढ ॥१९॥ 






















नैकत्र प्रियसंवासः सुहृदां चित्रकमणाम्‌ । 










र. ५५ 
५ कह क 





म 


१. मात्मनः । 


9, ५9 
क 09 दप ^ 


न्क .~* 
॥ि 4 ष 1) 
"ऋ ॐ १,९- १ १ ॥ 
॥ \ < रं प * क च: च ५ ^ ् ह र => 
च ॥ = > । * , ऊ अ 
3 ४,२४.८ + = 
8 +" + 1 १] 
॥ ` किन ज त जक भि + 





१... = = 


= 


\ 
। 


4) 
+ 


५ 
%, 





क र १२.२.०९ ऋ क चद श * ‰९ 
निक 





च # = ,५~ थे नि 
म नक तनक, क = नि 221 71 1 [ति द 


१ 


टः ॥ ॥ नौ ॑ 1 = ॥ ००० वि) [त = ~ +> १" >= वि 
ते +, ~ छद = ०५९ ' 
(१ । ‡ 


=` ७9 


~ ० ^ क => ।१ ९ (ति 2 ३) 
॥ 


+ ध #१ क; 
कर सणि को 7: 
द्ध. ऋ“ 9 
> 












न्द्र 


ध ॥ 
भ 99 ० क्न ~ । - 
त ४ ~ ज = क = वि ५ ~ 
# "क - १. # ७ 8 = ६ 
4१ । ४. 
०" + ˆ $ 
(> 


। > 


नूलं -्द्टनिष्ठोऽयमद्टपरमो जनः | 


करो बे वार्षिको दत्तो रज्ञे चटा वयं च व; | 
नेह स्थेयं बहुतिथं सन्तयुतपाताथ गोले ॥ ३१॥ 


५ ^+ <. के 
>. = {~ १५. ~ ~ 
॥ ~ दः ११. ८ 
` ## ^ ४,।८अ - +^ न, = 
कै * १ ' अ+ क 
कि न इति ९. 
ङ्गु); = नि 
+= + ॥ (क (8 
# 4 4 प कः + ५० ^ 
~ क ऋणे 8 ् 
# किक "र; १ क, (+ 
~ “नव 
^ भ य 
र ° 
5 ८५ । 
| <) (> = ९ 4 
इ~ रे अनाभिरनइचयक्तसतमयुज्ञाप्य 1, ¢ 


भीमद्धागवत 
भातमेम सुतः कचिन्मात्रा सह भवद्बजे । 1 1 - ------------ है १।२६॥ माई! मेरा च्डका अपनी मा ८ रोहिणी + 
क साय तुम्हारे ्रजमें रहता है | उसका लाठ्न-पाकनं 
त॒म ओर यशोदा करते हो, शसच्यि वह तो तुम्ीको 
अपने प्रिता-माता मानता होगा । बह अच्छी तरह है 
न { ॥ २७ ॥ मनुष्यके ्यि वे ही धर्म, अर्थं जोर कामः 
रासरविित द, जिनसे उसके खजनोको सुख मिले ¦ 
| केव अपनेको ही सुख मिलता है; कितु अपने 
खलजनोको दुःख मिच्ता है, वे धर्म, अर्थं ओर काम 
हितकारी नदीं हँ ॥ २८ ॥ 

नन्द्बावाने कदा-- माई वसुदेव | कंसने देवकीके 
गम॑से उत्पन्न तुम्हारे करई पुत्र मार डाछे । अन्तमं एकः 
सबसे छोटी कन्या वच रही थी, वह भी द्रम सिधार 
गयी ॥ २९ ॥ इसमे संदेह नही त्रि प्राणियोंकाः 
सुखदुःख भाग्यपर ही अवर्म्नित है | भाग्य ही ्राणी- 
का एकमात्र आश्रय है | जो जान केता है कि जीवनके 
एुल-दुःखका कारण भाग्य हयी है, वह उनके प्रष्ठ 
होनेपर मोहित नहीं होता ॥ ३० ॥ 

वसुदेवजीने कहा- भई | तुमने राजा कसको 
ठसका साखना कर चुका दिया । हम दोनों मिक मी 
चुके । अब तुद यहं अधिक दिन नहौ ठहरना 
चाहिथः. क्योकि आजकल गोदे बडे-बड़े उत्पात 
हो रहे है॥३१॥ ` 

भीशकदेवजी कहते है-परीकषित्‌ ! जत्र वसुदेव 
जीने इस प्रकार कहा, तब नन्द आदि गोपन उनसे 
अनुमति ले, वैसे जते इए छकडोपर सथार होकर 
गोकुच्वी यात्रा की ॥ ३२ ॥ 











तातं भवन्तं मन्वानो भवद्भ्याुपलारितः ॥२७॥ 
पुसक्षिवर्यो विहितः सुहृदो हलुभावितः । 


न तेषु क्लिस्यमानेषु त्रिवर्गोऽर्थाय कर्पते ॥२८॥ 


भन्द्‌ उवाच 
अहो ते देवकीपुत्राः कंसेन बहवो हताः | 
एकावशिष्टावरजा कन्या सापि दिवं गता ।॥२९॥ 


अदृष्टमात्मनस्तत्तं यो वेद न स अुद्यति ॥३०॥। 
वसुदेव उवाच 


श्रीक उवाच 


क्तत गोलम्‌ ॥३२॥ 


चय 
इति श्रीद्भागते महापुराणे पारमहंस्यां संहितया द्रामस्कन्धे वविं 
नन्द्वषुदेवसङ्गमो नाम पञ्चमोऽन्यायः ॥ ५ । 
~= ॐ. -5-°---> 
अथ षष्ठोऽध्याय 


पूतना-उद्धार 
| श्रीद्यकदेवजी कहते है-- परीक्षित्‌ ! नन्दबाबा जव 


# नौ र त 
॥ 4 # +" कीन की, = क $ केर, 2 क ? ५ 
५ १.२9 = अ न्द > द ६ 
= 4 = च 
¶ ति + { कन्व + श "द ~ 





ति नि 
+ ~ (6 


~~ 
= । ष ५ 2». ६10 । 
र «दः [ [+ ; ४८ # न. "कः अक, ०४ 
ने ४.4 ">~ ॐ स नक १ 4 =+ ^ 
ॐ + न्क (न # 
^ अ = = 


अ ~+: ् त 
५4 


| अ० & 


मथुरासे चे, त्र रास्तों विचार करने सो किः ` 





[ ष == 
। 





म क कः को क अक्को वनि 4 


4 >> ठ, ह 
ऋः ति > 
ङः + ६ वि~ १ 
"ॐ वे क ~ | "कु 








अ० & | 





ष्ट न्मम ब्य जयाम्‌ शरणसत्पातागमशङ्कतिः + ९॥ | चुदेवजीका कयन चचूठा नहीं हो सकता । इससे उनके ` | 
. | मनमे उात यी । तब उन्दने 
कंसेन प्रहिता घोरा पूतना वारपातिनी | - | म | 





















मन-ही-मन ^मगवान्‌ ही शरण है, वे ही रक्षा कर" ` 

रिशअवार ति परमा एसा निश्चय किया ॥ १ ॥ पूतना नामकी एक बड़ी ब्रू 3 
घन्ती स्यामवजादिषु ॥ २॥ रती यी ।. ठसका एक ही काम था_ गस | 

न यत्र भ्रवणादीनि रकषो्रानि खकर्मसु | | मारना । कंकी आङ्ञासे वह नगर, पराम ओर गहीरेकीं ` 
1 वत्ति बरबोको मारनेके व्यि धूमा करती यी ॥२॥ 

र्वन्ति सात्वतां भतु्यात॒षौन्यश्च तत्र हि | ३ | | जके लेग पने प्रतिदिनके कामेमिं राक्षतकि भयको ` ` 
दूर भगानेवाले मक्तवत्स॒क भगवानूके नाम, गुण जर । 

सा खेचर्यकदोपेत्यं प॒तना नन्दगोकुलम्‌ । रीलार्जोका श्रवणः, कीत॑न जौर स्मरण नही करते ` 


बही देसी राक्षिर्योका बल चक्ता है ॥ २ | वह 
योषित्वा माययाऽऽत्मानं प्रविशत्‌ कामचारिणी।।४। | 


| धूतना आकाश्मागंसे चर सकती यी शौर जपनी शच्छाके 
तां केदाबन्धव्यतिषक्तमर्लिकं ` ` 


| असार खूप भी बना लेती थी । एक दिन नन्दवावाके ` 
गोकु्के पास आकर उसने मायासे अपनेको एक सुन्दरी 
इदननितम्बरतनङचटरमण्यमाम्‌ 
सुवाससं कम्पितकर्णभूषण- 







॥ १ ५ 4 1 * 4 + } # 
9, ० 9 0 > 


#। ध | 1 
॥ 
6 त 
# न ~ ह 
। -, + च: 94 ॥ ~ = कण | #\ 
~ 3 9 ^ ॐ ; 9१ ^ ^ 
न = = ~ 3 
५ ^< ~ ~ मः जक पि क क व अ म पि कि ~ 
+< ज - क १ 


युती बना विया ओर गोकुक्के भीतर्‌ घुस गयी ॥ ४। 
उसने वड़ा खुन्दर रूप बनाया या | उसकी चोिवमि 
बेलेके शरक गुंथे इए ये । घुन्दर वञ्च पने इए थी । 
जबर उसके कणष्चक दिते ये, तव उनकी चमक्ते ` 
मुखकी ओर ख्टकी इई अव्व ओर भी ओोमायमान हो 
जाती थीं । उसके नितम्ब ओर कुच-कल्य ऊंचेञवे ` 
थे ओर कमर पतली थी ¦ ॥ ५ ॥ बह अपनी मधुर 
सुसकान ओर कटाक्षं चितवेनसे नजवािर्योका चित्त ह. 
जरा रही थी । उस रूपवती रमणीको डायमे कक । 
स्कर आते देख गोपियों एसी उययकषा करने क्गी, मनो | | 
खय लमीजी अपने पतिका दशन कलेके स्थि आ ` | | 
रदी है ॥ ६॥ 4 


तना बाठकोके ज्य हके समान थी । बह इधर. 4 


िषोलस्डुन्तलमण्डिताननाम्‌ ।॥! ५॥। 
वर्गुरितापाङ्गविसगेवीशिते- | 

मेनो हरन्तीं बनितां बजौकसाम्‌ । 
अमंसताम्भोजकरेण रूपिणीं 


गोप्यः भिय द्रष्टुमिवागतां पिष्‌ ।। ६ ॥ 
दालग्रहस्तत्र . विचिन्वती ` शिन्‌ 


यदच्छया नन्दगहेऽसदन्तक्म्‌ 


ऋणः क्ह्ि 


# 
< 
क 


उपर बालोको इती इई अनायास ही नन्दाबाके | 
घर घुस गयी । बहा उसने देखा कि बाच्क श्रीकृष्ण ` 








दुटके काठ हैँ । परंतु जैसे आग राखदी देरीमे रमे अपने- ` 
को माये हए होः वैसे ही उस समय उन्डोनि भवते । 
चरअचर सभी प्राणि्यके आसा है । इसव्ि उन्दनि ` 


ददश तद्पेऽपरिमिवादितं भति ॥ ७॥ 
विबुध्य तां बालकमारिकाग्रं त र 
चराचरातमाऽऽस्‌ निमीरितेषणः। | उसी क्षण जान स्या नि यह बरबोको मार डानेवाण 
द १ माकरादि० | २.. घानाश्व | २. दोत्पत्य | ~ ९ | ५ स स य 






7 क: 
9 » [3 # 4 भै 


१५० श्रीमद्भागवत [ अ० & 


~ ~= र न पि 


अनन्तमारोपयदङ्मन्तकं रतना म्र है ओर अपने नेत्र वंद कर ष्ि । # जैसे 
कोईं॒॑पुरुष भभवरा सोये इए सपको रस्सी समन्ञ- 

कर उठा लेः वैसे ही जपने काढलपर भगवान्‌ 

यथोरगं सुप्नमबुद्धिरज्यधीः ॥ ८ ॥ | शरकृष्णको पतनाने अपनी गोदमे उ य्था ॥ « ॥ 


। भ पूतना देखकर मगान्‌ क्णने जपने नेत्र वंद कर स्वि, दज जक कषक जत्सन्न्स वद कर खि; इसपर भक्त कवि्यो ओर टीकाकार्येने अनेको 
प्रकारक उव्येक्षाए की दैः जिनमें कुर ये दै - 


९. भीमव्वल्लमाचायने खव्रोधिनीमे कहा है--अविदया हो पूतना है । भगवान्‌ श्रीकष्णने सोचा कि मेरी 
इष्टके सामने अविधा टिक नहं सकती फिर लोला कैसे होगी, इसव्थि नेत्र वद्‌ कर स्थि । 


२. यह पूतना बारूघातिनी हे (पूतानपि नयतिः । यह पवित्र बालको मी ॐ जाती है एेसा जघन्य कृत्य 
करनेवालीक्रा सह नह्य देखना चाद्ये, इसव्यि ने वंद कर व्यि । 

२, इस जन्ममे तो इसने छु साधन फिया नहा है । सम्भव ह घुश्चसे मिल्नेके च्थि पूवजन्ममे कुछ किया हो | 
मानो पूतनाके पूष-पूवं जन्मोके साधन देखनेके स्थि ही शरी्ष्णने नेत वंद कर लि | | 

४" मगवानते अपने मनम विचार क्या कि मैने पापिनीकरा दूध कमी नहीं परया ३ । अव ज्ेते जोग ओंख 
वद्‌ करके चिरायतेकरा काढ़ा ¶ जते दै वैसे ही इका दूष भी पी जा । इसल्मि नेत्र वंद कर स्थि । 

९* भगवान्‌के उद्र निवा करनेवाङे असंख्य कोरि नक्चाण्डोके जीव यह जानकर घत्ररा गये कि श्यामसुन्दर 
पूतनाके स्तनमं र्गा हत्महर विष पीने जा रहे ई । अतः उन्हे समञ्चानेके लि दी भीकृष्णने नेत्र वंद किये | 

६“ आङ्ष्णरिष्यने विचार क्रिया कि मै गोकुर्मे यह सोचकर आया था करि माखन-मिशरी लागा । सो 


छठीके दिन ही विष पीनेका अवसर आ गया । इसच्यि आंख बंद करके मानो शङ्करजीका ध्यान जरिया किं अप. 
आकर अपना अभ्यस्त विषपान कीजिये, मै दूष पीऊंगा । ॥ 


७. श्रीङ्ष्णके नेनि विचार किया कि परम स्वतन्त्र ईश्वर इस दुष्टाको अच्छी-बुरी चाहे जो गति दे दँ परु 
इम दोनो इसे चनद्रमागं अथवा सूय॑मागं दोनेमिसे एक मी नहीं दग | इसल्ि उन्दने अपने द्वार वंद कर ल्ि। 
८. नेनि सोचा पूतन के नेत ह तो हमारी जाततिके, परु ये इस क्रूर राक्षसीकी गोभा बढा रदे ई । इसलिये 
अयने होनेपर सी ये दथनके योग्य नहीं है । इसच्ि उन्दने अनेको पक्र ढक ख्या] ` 
। ९" शरङृष्णकर नेत्रम सित घमोत्मा निमिने उस दुष्टनो देखना उचित न समलचकर ने बद्‌ कर स्यि । 
~ ` 22 शाङ्करे नेत्र राजहंस ह । उन्हे बकी पूतनाके दशन केकी कोई उत्कण्ठा नहीं थी । इसल्यि नेत्र 
। वदकरस्ि | | ; 
| ९९. श्रीङृष्णने विचार क्रिया कि हरसे तो इसने माताका-सा सूप धारण कर रक्ला है, रतु हृदयम 
|  अलन्त क्रूरता मरे हु ह । एसी खरीक ह न देखना ही उचित है । इसख्यि नेर. वंद कर व्ि । 
( _ ५२उन्दनि सोचाकि मुञने निडर देलकर कों यह एेा न समन जाय कि इसङ ऊपर मेरा प्रमाव नहीं चला 


































ओर फिर करी छीर न जाय । इसल्थि नेत्र वंद कर्‌ ल्यि । ` | 
५२" बरुललक्ने प्रारम्ममे पदले-पहर लरीसे ही मुठभेड़ हो गयीः इस विचारसे विरक्तिपूवंक नेन वंद 
0 2 -; | च ५ ड * श 


धक्‌ 
| ३ ति त ह स्वि 
०५ 4 > " ` 
~ + [` + 
कक" । च =. +4 
तै 


+ 
(५ 
~° 
१५ 


४ ध भीङष्णके णक मनम यह ब्रात आयो क्रि करणा-दष्टसे देखूगा तो इसे भारगा केसे ओर उग्र दष्टे देखूगा 
(त चहं अम भर हो जायगी । टीला सिदधके च्थि नेतर वेद कर ठेना ही उततम है । इसख्यि ने वंद कर खि । 


८ -" 
नरि ~ > = + 
त { 


 __ ५. यह धातक वेष धारण करके आयी है, मारना उचित नहीं है; परु यह ओर ग्ाल्ाछको मरगी । 


इष वेष देखे त्रिना ही मार डाछ्ना चाहिये । इसि नेतर बंद कर च्वि । 
९ ५ ( स ~ < - 


^ ९९" वजढ़ा अनिष्ट योगते नृत्त हो जाता ३ । उन्दने नेव वंद करके मानो योगद सम्पादित की । 
` 9{& ` कक ` श्रय न ४ करके "न्न आयीं थी = कि + | वजके ध ९1 4 
1 यय करत आय। थी कि मै नजके सारे दियो मार ा्दैगी, परु मक्तरदषापरायण 
वानी पासे त्रजका । ` शिच उसे दिलायी नहीं दिया । 











। अ * 0 
` ~ च्छ च ` 
(र 4 1१.५४; ` ~... 

+ "क क 


छै के 









4 + ~>. 
४ र । > क ` १ ज र ११४ ति 
^. . 94. # >- १ न र ~~ 
ष्‌ मि“ + च क 4 ८4 च 4 ४१ = 1 ह. (74 । ध ह 
1 ;. ~+ ` => "वु "~ 
त ~. "- "न 7 ~ भ 24 ^, ~. अ च 
॥ 4 ह + ५ त ॐ न भ.4 ॥ -- श ड = कः र्व च + # #॥ + + फ क 
, ५. त *# 4 ४५ ५ # क ` * 
नः हि.) व 1. 
१ +न क म 4) क्क च च ` वि = ह 1 *५ = 
ग क ५१ € व गद र २०५ # > ङ्ग क. | 
र + म „~ ति -# ए च र - व "भ्ण 28 न ५ १ 1 ४ १ = 
1:04 ~, 
कत + ४ =.» , कनीय ध. न्वा 4 चै = ऋ 
- व्‌ "द ५२ | $ ~ <>“ क. ~ क श्‌ १ 3 
ए क यन्‌ ~+ दुः 





^ +~: >>” । ' अ. - 2. + (. | ८4२ । 





[1 
+ । 
„ * न्क 1 र. 







' 1 
चमे 


प्रणामे सीधी नन्दाल्यमै आ पर्हचीः तव भगवानूने सोचा करं मेरे भक्तका बुरा करनेकी बात तो दुर रदी, जो मेरे मक्तका 


` इष्टि पड़नेपर माया रहेगी नहीं ओर इसका असली भयानक सूप प्रकट हा जायगा । उसे. सामने देखकर योदा नैया 


` नहीं चाहते, इसीसे उन्ेनि नेत्र चंद कर ्थि । 


यह उनकी बाकलीलका माधुयं ह । 


( रोषाभिषठातु देवता सद्र ) न भर्णका पान कि ओर श न 


कि "अ क क का या 


र क ह 


अ० ६ | दशम स्कन्ध १५१ 


तां तीक्ष्णचित्तामतिवामचेष्टितां मखमटी म्यानके भीतर छिपी हई तीखी धाखारी तच्चारे 


समान प्रूतनाका हदय तो वडा कुटिक या; वितु 
वीकष्यान्तरा कोशपरिच्छदासिबत्‌ ! उपरसे बह वहत मधुर शौर घुन्दर व्यवहार कररदी यी । 
वरख्ियं तत्प्रभया च धषिते देखनेमे वह एक मद्र महित्णके समान जान पड़ती थी। 


इसल्े रोहिणी जर यञ्ोदाजीने उसे घरके भीतर आयी 

निरीक्षमाणे जननी तिष्ठताम्‌ ॥ ९॥ देखकर भी उसकी सैन्द्यपरमासे इतपरतिभ-सी होकर 
द ` तनं वतीं = | 
पदमत तम्‌ = | 
प्राणः समं रोषसमन्वितोऽपिबत्‌ ॥१०॥ ७ | र न 1 


मा मश्च युञ्चारमिति प्रभाषिणी क्रोध प्राण पीने त्रा | )# | .१० ॥ अव तो पूतनाके 
प्राणोके आश्रयमूत सभी ममस्थान फटने को । बह 


निष्यीड्यमानाखिलजीवममणि । पुकारने ल्णी--अरे छोड़ दे, छोड दे, अब वस कर ! 


जुरा सोचता ड, उस दुष्टका मेँ मद नदी देता; बज-वाख्क सभी श्रीकृष्णके सखा है, परम मक्त ई पूतना उनको मारनेकाः 
सङ्कट्प करके आयी है, इसचख्यि उन्होनि नेच ब्रद कर लि । 


१८. पूतना अपनी भीषण आकृतिको छिपाकर राक्षसी मायात दिव्य रमणी-रूप बनाकर आयी है । भगवान्‌की 


डर जाये ओर पुरी अनिषटोशङ्कासे कदी उनके हठात्‌ प्राण निकल जाये, इस आशङ्कसे उन्होने नेच बंद कर चि । 
१९. पूतना हिंसापूणं हृदयसे आयी है परंतु भगवान्‌ उसकी साक ज्य उपयुक्त दण्ड न देकर उसका | 
प्राण-वधमात्र करके परम कल्याण करना चाहते ह । भगवान्‌ समस्त सद्रुणोके भण्डार ह । उनमे धृष्टता आदि दोषोंका 


ठेस भी नहीं ह; इसीष्यि पूतनाके कल्याणाय मी उपतका प्राण-वध करनेमे उदं ला आती है । इस छ्जासे ही 
उन्न नेत्र बंद कर स्यि दह । ` 


२०. मगवान्‌. जगत्पिता ईै--अयुरराक्षसादि भी उनकी संतान ही द । पर वे सर्वथा उच्छृङ्खल ओर उदण्ड 4 
हो गये ई, इसथ्यि उरन्दे दण्ड देना आवश्यक है । स्नेदमय माता-पिता जव अपने उच्छङ्खर यु्को दण्ड देते है, तब = 
उसके मनमे दुःख होता ३ । परंतु बे उते मय दिखलनेके च्यि उसे बाहर प्रकट नहीं करते । इसी प्रकार मगवान्‌ ख 
मी जब असुरौको मासते है तवर पिताके नाते उनक्रो भी दुःख होता. है; पर दूसरे अयुरौको मय दिखछनेके चि वे । 
=से प्रकट नही करते । मगवान्‌ अब पूतनाको मारनेवाठे दैः पर॒ उसकी मृत्युकालीन पीडाको अपनी आलो देखना 


जे शुर 


| अपरिचितको देखकर डर ` 
छोटे बालरकोका खभाव है कि वे अपनी माके सामने सू खेर्ते है, पर किषी अप 
जाते दै न र मुद्‌ ठेते ह । अपरिचित पूतनाको देखकर. इसीय्यि बारलीला-विहारी भगवानले नेन बंद कर चिं } 


# मगान्‌ रोषके सांय पूतनाके प्राणोके सहित सनपान करने ठ्मोः इसका यह अथं प्रतीत होता हे किं रोष 





५ ॑ क स हकणन्न र -3.^ = 
ध्य न - ~ क न व. दै किम) = 


१५२ श्रीमद्भागवत [अ० ६ , 








{4 विश्त्य नेत्रे चरणो शजो यहं बह वार-वार अपने हाथ ओर पैर पटक-पटककर रोने # 


प्रखिन्नगात्रा क्षिपती रुरोद इ ॥\११॥। ल्गी । उसके नेत्र उक्ट गये । उसका सारा शरीर 

८ पसरीनेसे क्थपथ हो गया ॥ ११ ॥ उसकी चिछ्ठाहटका 

तस्याः तिणभीररहसा वेग वडा भयङ्कर था । उसके प्रभावसे पहाङ्के साथ 
हाद्विमंही चौश्च चचाल सग्रहा पृथ्वी ओर म्रहोके साथ अन्तरिश्च डगमगा उटा । सारतो 

रसा दिशश्च प्रतिनेदिरं जनाः पाताल ओर दिश्ार्‌ भज उटीं । वह्ूत-से लोग वन्नपातकी 


आराङ्कासे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ ! इष 
पेठुः क्षितौ चजनिपातशङ्खया ॥१२॥ | ___ ^~ ० ताति = 
प्रकार निशाचरी पए्रतनाकरे स्तनोमं इतनी पीडा हहं कि । 


निशाचरीत्थं व्यथितस्तना व्यसु- बह अपनेको छिपा न सकी, राक्चसीखूपमे प्रकट हलो 
व्यादाय केशां रणो युज्ावपि [ह ^ गयी । उसके शरीरसे प्राणं निकर गये, संह फट गया, 


प्रसायं गोष्टे निजरूपमाध्थिता बाल विष्ठेर गये ओर हाध-पँव फल गये । जैसे इन्द्रके 
वन्रसे घायल होकर ब्रत्रासुर गिर पड़ाथा, वैसे ही वह 


वज्रहता चत्र इचापतन्नरप ॥१३॥ | बाहर गोष्टे आकर गिर पड़ी ॥ १३ ॥ 
पतमानोऽपि तदेहस्निगव्युत्यन्तरद्मान्‌ । ` राजेनद्र | प्रतनाके शरीरने गिरते-गिरते मी छः कोके 


चुणयामाख राजेन्द्र महदासीत्‌ तदद्‌ यतम्‌ ॥१४॥ मीतरके बृ्ोको कुःचल डाला । यह्‌ बडी ह अदूमुत घटना 
| हई ॥ १४ ॥ पूतनाका चरोर वडा भयानक था, उसका 


ईेषामात्रोग्रद्रास्यं गिरिकन्द्रनासिकम्‌ । भुड हल्के समान तीखी ओर भयङ्कर दार्टसे युक्त या । 
| उसके नथुने पड्ाड़की गुफाके समान गहरे ये ओर स्तनः 


गण्डदोलस्तनं रौद्रं प्रकीणारुणमूधजम्‌ ॥ १८५।। पहाइसे गिरी इई चद्चानोकी तरह बड़े-बड़े -थे । लाट - ` 


खाल बाल चारों ओर विष्ठरे इए ये ॥ १५ | अखि 

१रां पुलिनारोहभीषणम्‌ । - | अधे क्के समान गहरी, नितम्ब नदीके करारकी तरह 

भयङ्कर, मुजार्प, जं ओर पैर नदीके पुलक्रे समान तथा 

बद्वसेतय॒जोवंङधि शन्यतोयहदोदरम्‌ ॥१६॥। | पे सखे हए सरोवरकी मति जान पड़ता था ॥ १६॥ 

पूतनाके उस शरीरको देखकर सव-के सव्र ग्वाल ओर 

संतत्रसुः सतद्‌ वीक्ष्य गोपा गोप्यः कठेवरम्‌ । गोपी डर गये । उसकी भयङ्कर चिल्गाहट सुनकर उनके 

हृदय, कान शौर सिर तो पहले ही फट-से रई ये ॥१७॥ 

जव गोपियोने देखा कि बार्क श्रीकृष्ण उसकी छातीपर 

जारं च तस्या उरसि कऋीडन्तमङताभयम्‌ | ` | निर्भय होकर खेर रहे हँ # तब वे बड़ी घवरादट ओर 

२१. इर्निःखिन्नर | 
=  % पूतनाके वश्षःस्थर्पर क्रीडा करते दए मानो मन-दी-मन कह रदे य-- 

स्तनन्धयस्य स्तन एव जीविका दत्तस्त्वया स सखयमानने मम :। 

मया च पीतो श्रियते यदि त्वया किं वा ममागः खयमेव कथ्यताम्‌ ॥ 

| दुधषहा शिच हः सनपान ही मेरी जीविका हे । तमने खयं अपना स्तन मेरे हमें दे दिया ओर मैने पिया स) 

यदि ठम मर जाती हो तो खयं ठम्दीं बताओ इसमे मेरा क्या अपराघ है ।' | 


तजा बलिक कन्या थी रत्नमाला । यज्ञराखामे वामन भगवानूको देखकर उसके इदयमं पु्रनेदका भाव उदय हो 
न-दी-मन अभिलाषा करने गी किं यदि मुन्ने एेसा बालक हो ओर मै उवे स्तन पिल्ाऊं तो सुञञे बी प्रसनता 


, छ 1 
















` 
(वे न णङ्कभ्क्यनन्यक्ष्यय 
क्कः त रै क कै ॐ 


पूव तु तन्निःखनितभिनहत्कणेमस्तकाः ।॥१७॥। 


( 
श्त आ -> ^ "सतम गडोकिो शिक्षक ~ ककि कजनः 
क 1 





॥ 
। कण | त ~ ध 9, । , र र 


र न ४ 
१ १, न प ५ 
॥ कः ण # - । क. ऋक निकः # 
= क न्न ~ "च । = ५ 
च ~, = 1: ॥ + नं ज द्र # 





नि # 0 


अद 


नि 1 





-गोप्यस्तुणं समभ्येत्य जग्ृहूजाीतक्म्भरमाः ॥१८॥ 
 यश्चोदारोहिणीम्पां ताः समं बालघ्च संवतः । 
रक्षां षरिदधिरे सम्यग्गोपुच्छश्रमणादिभिः ॥१९॥ 


गोपूत्रेण सरापधित्वा पूुनर्गोरजकषोर्भकम्‌ । 


रक्षां चक्रुथ शकृता दादशाङ्खषु नामभिः ॥२०॥ 
गोप्यः संसपृ्टसङिला-अङ्गेषु करयोः प्रथ्‌ । 
न्यस्यात्मन्यथ बारुख बीजन्यासमङ्र्बत ।२९॥ 
व्पादजोऽङ्घि मणिमांस्तथ जान्वथोरू 
यज्ञोऽच्युतः कटितटं जठरं हयास्यः । 
हृत्‌ केशवस्त्वदुर ईश इनस्तु कण्ठं 
विष्णुशरुजं युखभुरुक्रम ईरः कम्‌ ॥२२॥ 
चक्रयग्रतः सदगदो हरिरस्तु पश्चात्‌ 
त्वत्पाश्चयोधैनुरसी मधुहाजनश्च । 
कोणेषु शद्ध उरुगाय उपर्युपेन्द्र 
सत्यः क्षितौ हरधरः पुरुषः समन्तात्‌ २३ 
इन्द्रियाणि हषी ः प्राणान्‌ नारायणोऽवतु । 
रवेतदीपपतिश्चित्तं मनो योगेश्वरोऽवतु ॥२४॥ 
पृ्चि्गभस्तु ते बुद्धिमात्मानं भगवान्‌ प्रः । 
क्रीडन्तं पातु गोविन्दः शयानं पातु मधवः ॥ २५ 
वजन्तमन्याद्‌ बेङ्कण्ड आसीनं स्वां भियः पतिः। 
घुञ्ञानं यज्ञथुङ्‌ पातु सवंग्रहभयङ्रः ॥२६॥ 
डाकिन्यो यातुधान्य्र कूष्माण्डा येऽभकग्रहाः । 


भूतप्रेतपिशाचाश्च यक्षरशोबिनायकाः ॥(२७॥। 
कोटरा रेवती ज्येष्ठा पूतना मातकादयः 


दशस स्कन्ध 


१५ 








उताव्रलीके साय अ्जटपट वहम पटच गयीं तथा श्रीकृष्णको 
उठा ल्या | १८ ॥ इसके वाद यद्ोदा ओर रोहिणी- 
के साय गोपिरयोनि गायकी प्रक धुमाने आदि उपायोसे 
वाटक श्रीकृष्णके अङ्गकी सवर प्रकारसे रक्वा की ॥१९॥ 
उन्हानि पहले वालक श्रीक्रष्णको गोमू्रघे स्नान कराया; 
फिर सव अङ्खोमे गोरज कगायी ओर फिर बारहो अगमं 
गोवर लगाकर भगवानूकरे केरा आदि नामोसे रक्षा 
कगे | २० ॥ इसके वाद्‌ गोपियोने आचमन करके “अजः 
आदि ग्यारह वीज-मन्त्रोसे अपने शारीरो अल्ग-अच् 
अङ्गन्यास एवं करन्यास किया ओर फिर वाक्कके अङ्गो 
मे बीजन्यास किया | २१॥ 

वे कहने लगीं --(अजन्मा भगवान्‌ तेरे वैरोकी रक्षा 
करर, मणिमान्‌ धघुटननोकी, यज्ञपुरुष जार्घोकी, अच्युत 
कमरकी, हयग्रीव पेटकी, केराव हदयकी, ईदा वक्षःस्थल- 
की, सूयं कण्टकी, विष्णु वँहोँकी, उरुक्रम सुखकी ओर 
ईश्वर सिरकी रक्ता करें ॥२२॥ चक्रधर भगवान्‌ रक्षके चयि 
तेरे आगे रहे, गदाधारी श्रीहरि पीछे क्रमाः धनुष ओर खङ्ग 
धारण करनेवाे भगवान्‌ मधुसूदन ओर अजन दोनों 
बगलमे, शाङ्कधारी उरुगाय चारो कोनरमे, उपेन्द्र ऊपर, इर- 
धर पृथ्वीपर ओर भगवान्‌ परमपुरुष तेरे सत्र ओर रश्षाके 
व्यि रई ॥ २३ ॥ इभीकेरा मगवान्‌ इन्द्िथोकी ओर 
नारायण प्राणोकी रक्ता करं । उतेतद्रीपके अधिपति चित्त- 
की ओर योगेश्वर मनकी रक्षा करं ॥ २४॥ पृरन्निगभं तेरी 
बुद्धिकी ओर परमात्मा भगवान्‌ तेरे अहंकारकी रक्षा करं । 
खेलते समय गोविन्द रक्षा करर, सोते समय माधव रक्षा 
करें ॥ २५५ ॥ चकते समय .भगवान्‌ वैकुण्ठ ओर वैटते 
समय भगवान्‌ श्रीपति तेरी रक्षा करं । भोजनके . समय 
समस्त प्र्होको भयभीत करनेवाठे यज्ञभोक्ता भगवान्‌ तेरी 
रक्षा करे. २६ ॥ डाकिनी, राक्षसी ओर कूष्माण्ड 
आदि बाख्म्रह; भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस ओः 
विनायकः कोटरा, खती, ज्येष्ठा, प्रतना, मातृका आदि 
दारीर, प्राण तथा इन्ियोंका नाश करनेषले उन्माद 


उन्मादा ये द्यपसारा देहप्राणन्द्रियद्वुहः ॥२८॥ | ८ पागल्पन ) एवं अपस्मार ८( मृगी ) आदि रोः 
१. सर्वशः । २. सा सुतम्‌ । ३. जच्वे । ४. ्भस्ततो । ५. केडावः । । 


: इइं ओर कृष्णके स्पते उसकी रसा पूणं हुईं । 
शीः. | 9 स० ख० २. २०- 


छ 1 ~. न न ~ - (२ । 
वि ॥ि 3 च ® 
त 2 क 


अ ` न 0 7 १ 


" . भो ~न ~ 


होगी । वामन भगवान्‌ने अपने मक्त लिक पुत्रीके इस मनोरथका मन-दी-मन अनुमोदन किया । वदी द्वापरमे पूतन 


१५४ श्रीमद्भागवत [ अ० & 


खषप्नदष्टा महोत्पाता बृद्धबालग्रहाथच भे । खप्नमे देखे हए महान्‌ उत्पात बरदधग्रह ओर बालग्रह 
क न आदि--ये सभी अनिष्ट भगवान्‌ विश्णुका नामोच्चारण 
सवे नश्यन्तु ते विष्णोनामग्रहणभीरवः ॥२९॥ | करनेसे मयभीत होकर नथ हो जरै” ॥ २७२९ ॥ 
श्र्युकरद्वज। कहत ह--परोन्तित्‌ ! इस प्रकार 
गोपियोने त्रमपाश्चमें ब॑धकर भगवान्‌ श्रीङृष्णकी रक्षा की । 
इति प्रणयबद्धाभिर्गोपीमिः कृतरक्षणम्‌ । माता योदाने अपने पुत्रको स्तन पिखाया ओर पिर 
पालनेपर सुलखा दिया ॥ ३० ॥ इसी समय नन्दवावा 

पाययित्वा स्तनं मात्‌। सन्यवेशयद्‌ात्मजम्‌ ॥॥२०।} | ओर उनके साथी गोप मथुरासे गोकुच्पें पर्टुचे । जव 
ध 7 सथराया अलं गवाः। उन्न प्ूतनाका भयंकर शरीर देखा, तव वे आश्चयच करित 
ष हो गये ॥ २१ | वे कहने कगे--भ्यह तो वड आश्वय- 

की बात हँ, अत्रय दही वसुदेवके रूपें किसी ऋषिने 
जन्म ग्रहण किया है । अथवा सम्भव है वघ्ुदेवजी प्रवर 
नूनं बतषिः संजातो योगेश्चो वा समास सः । जन्ममें कोई योगेश्वर रहे ह; क्योकि उन्होने जेसा कडा 
था, वेसा ही उत्पात यहाँ देखने आ रहा है" ॥ ३२ ॥ 

स एव दष्टो ्य॒त्पातो यदाहानकदुन्दुभिः ॥३२॥ | तव्रतक ब्रजवासिर्योने कुदाड़ीसे प्ूतनाकरे शरीरको टुडे 
टुकड़े कर डाला ओर गोसे दूर ठे जाकर टकडिर्यो 

| कटेवरं परशुभिश्छिखा तत्ते व्रजोकसंः । परर रखकर जला दिया ॥ ३३ ॥ जवर उसका शरीर 
| स जलने चणा, त्र उसमेसे एेसा धूओं निका, जिपपेसे 
, द्रे कषप्त्वावयवो न्यंदहन्‌ काष्टधिष्ठितस्‌ ॥३३॥ श सी यी नयं न हो, अगवान 





श्रीद्युक उवाच 


विलोक्य पूतनादेहं बभूवुरतिविकिताः ॥३१॥ 














3 (८  दद्यमानख देह धूमश्चायुरुपौरम ¦ । जो उसका दध्र पी लिया था--जिक्षसे उसके सारे पाप 
(1८1 तत्काल ही नट हो गये थे || ३४ ॥ पूतना एक राक्पो 
` 48 क _ ¢ + = [र उ (~ ~ 
५ ८ उत्थितः ङष्णनिथक्तसपद्याहतपाप्मनः ॥३४॥। थी; छोगोँकरे वचोंको मार डाटना ओर उनका खून पी 


४ जाना--यही उसका काम था | भगव्रान्‌को भौ उसने 
पूतना रोकबालध्नी राक्षसी रुधिराशना । मार डाटनेकी इच्छसे ही स्तन पिटाया था । फिर मी 
। १: ट | उसे वह परमगति मिली, जो सत्पुरुर्षोको मिकती ह|| ३५५ 
६१ जिघांसयापि हरये स्तनं दत््वाऽऽप सद्गतिम्‌॥।३५॥ रली स्थितिमे जो परखह्म परमात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्णो 

1 ध श्रद्वा ओर भक्तिसे माताकरे समान अनुरागप्रूबक अपनी 
प्रिय-से-व्रिय वस्तु ओर उनको प्रिय टगनेवाटी वस्तु 
यच्छन्‌ प्रियतम कि लु रक्तास्तन्मातरो यथा ॥३६॥| | समपित करते हैँ, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या 
ए, है || २६॥ भगवान्‌के चरणकमक सवके बन्दनोय मह्य 


पदभ्यां भक्तददिस्थाम्यां बन्ाम्यां लोकवन्दितैः । | शंकर आदि देवताओके द्वारा भी वन्दित हैँ । वे भक्तो- 
के हदयकी प्रजी है । उन्ही चरणोसे भगवान्‌ने प्रूतनाका 


कं पुनः श्रद्धया भक्त्या कृष्णाय परमात्मने । 


"क, 







४ 3५ > { १ निद | 


+ 
#इस प्रसङ्गको पद्कर भावुक भक्त मगवानसे कहता है--८भगवन्‌ | जान पड़ता हैः आपकी अपेक्षा भी आपके नाम 
क्ति अधिक हे; क्योकि आप त्रिखोकीकी रक्षा करते है ओर नाम आपकी रक्षा कर रदा ३ । 
"~. ~त । 








अङ्गं यस्याः समाक्रम्य भगवान पिबत्‌ स्तनम्‌ ।२७॥ | शरीर दवाकर उसका स्तन-पान किया था ॥ ३७ ॥ 


५ 


भो 





अ० ६ ] 





दशम स्कन्व 


१५९५ 








9 यातुधान्यपि सा खगंमयाप जननीगतिम्‌ । 
कृष्णथुक्तस्तनक्षीराः किम गावो जु मातरः ॥३८॥ 
परासि खस्ासपिवत्‌ पुस्नेदस्युतान्यलम्‌ । 
भगवान्‌ देवकीपुत्रः कबस्याद्याखल प्रदः ।।३९॥। 

तासाषविश्तं ष्ण इषेदीनां सुतेक्षणभ्‌ । 


न पुनः कल्पते राजन्‌ सं्रारोऽन्ञानक्षम्भवः ॥४०॥ 


कटधूमस्य सौरभ्यमवघ्राय वजोकसः 


क्रिभिदं इत शतेति वदन्तो व्रजमाययुः ।४१॥ 
ते तत्र वणितं गोपैः पूतनागमनादिकम्‌ । 
श्रुत्वा तन्निधनं खस्ति शिज्ञोश्वाक्षय्‌ सुतेसिताः।४२। 
नन्दः खपृत्रमादपय प्रत्यागतद्वुदारधीः | 
मूध्न्युपाघ्राय परमां मदं ठेभे इरूढह ।*४३॥ 
य एतत्‌ पूतनामोक्ष॒कृष्णखभशमद्शतय्‌ । 


श्रृणुयाच्छद्वया मर्त्या माचिन्दे रभते रतिम्‌ ॥४४॥ 


माना क्रि वह राक्षसी थी; परंतु उसे उत्तम-से-उत्तम 
गति--जो माताको मिनी चाहिये- प्राप्त इई । पिर 
जिनके स्तनका दृध भगवानूने बडे प्रेमसे प्रिया, उन 
गौओं ओर माताओंकी तो बात दी क्यादहै॥२८॥ 
परीक्षित्‌ ! देवकीनन्दन भगवान्‌ कैवस्य आदि सव ग्रकार- 
की सुक्ति ओर सव कुछ देनेवाठे हैँ | उन्होने त्रनकी 
गोपि्यों ओर गौओंका वह दृध, जो भगवान्‌क प्रति पुत्र- 
भाव होनेसे वात्सल्य-स्नेहकी अधिकताके कारण खयं ही 
सरता रहता था, भरपेट प्रान किया ॥ ३९ ॥ राजन्‌ । 
वे गौरं ओर गोपि, जो नित्य-निरन्तर भगवान्‌ श्रीकृष्ण- 
को अपने पुत्रके ही ख्पमे देती थीं, पिरि जन्म-मरद्यु- 
ख्प संसारके चक्रमे कमी नहीं पड़ सकतीं; क्योकि यह 
संसार तो अज्ञानके कारण ही है ॥ ४० ॥ 
नन्दवावाके साथ आनेवाठे व्रनवासिर्योकी नाकम 
ज चिताके धूरठकी सुगन्ध पर्हची, तव भ्यह क्या हें! 
कर्मे एेसी सुगन्ध आ रही ह ¢ इस्‌ प्रकार कहते इए 
वे व्रजमें पर्हैचे ॥ ४१ ॥ वहं गोपने उन्हें प्रूतनाके 
नेसे लेकर मरनेतकका सारा दृत्तान्त कह सुनाया । 
वे लोग प्ूतनाकी मृव्यु ओर श्रीकृष्णके कुराव्पूैक वच 
जानेकी वात सुनकर वड़े ही आश्चर्यचकित इए ॥४२॥ 
परीक्षित्‌ ! उदारशिरोमणि नन्दवावाने मृष्युके सुखसे चचें 
दए अपने ठको गोदमें उठा ल्या ओर वार-वार 
उसका सिर सूघकर मन-ही-मन बहत आनन्दित इए ॥४३॥ 
यह्‌ 'पूतना-मोक्षः भगवान्‌ श्रीकृष्णकी अदूुत वाक्-लीला 
है । जो मनुष्य श्रद्धापूरक इसका श्रवण करता है, उसे 
भगवान्‌ श्रीकृष्णके ग्रति त्रेम प्राप्त होता है ॥ ४४ ॥ 


र~ -- 


इति श्रीमद्भागवते भद्वापुराणे पारमहंस्यां संहितार्यां दशमस्कन्धे 


रवर्धे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ 


~व कयक- 





१. निशम्य श्रद्धया । २. पूतनामोक्षः । 


उस समय अपने विभिन सूपोसे उन्होने अपने साथी अनेको गोप ओर वर्त्तोकी मातार्थका सतनपान किया । इसी 


बहुवचनका प्रयोग किया गया है । 





१५६. श्रीमद्भागवत | अ० ७ 


अथ सप्तमोऽध्यायः 


शाकट-भञ्जन ओर तृणावर्त-उद्धार 
राजोवाच राजा परीक्षितने पूक्ा--गप्रमो ! सवेराक्तिमान्‌ भगवान्‌ 
हसी श्रीहरि अनेकां अवतार धारण करके वडत-सी छन्दर एवं 
भेन येनावतारेण भगवान्‌ 8 घुननेमे मधुर टीखाएं करते हैँ | वे भी मेरे इृदयको 


करोति कणैरम्याणि मनोज्ञानि च नः प्रभो ॥ १ | | बहत प्रिय छ्गती हैँ || १ ॥ उनके श्रवणमात्रसे भगवत्‌- 
सम्बन्धी कथासे अरुचि ओर विविध त्रिपर्योकी तृष्णा भागः 
जाती है । मनुष्यका अन्तःकरण शीव्र-से-रीघ्र युद्ध हो 
जाता है । भगवान्‌के चरणोमं भक्ति ओर उनके भक्तजनों 
से प्रेम भी प्रप्त ह्यो जाता है । यदि आप मुञ्चे उनके 
श्रवणका अधिकारी समन्ते हों, तो भगवान्‌की उन्हीं 
तदेव हारं बद मन्यसे चेत्‌ ॥ २॥ | मनोहर टीव्ओंका वणेन कीजिये ॥ २ ॥ भगवान्‌ 


अथान्यदपि कृष्णस्य तोकाचरितमद्‌ सिति । श्रीकरष्णने मचुष्य-लोकमं प्रकट होकर मनुष्य जातिके 
= २) खभावका अनुसरण करते "हर्‌ जो वार्टीलापए्‌ की हेः 


करा 
॥ ४ 
भै 
0 
॥. 9, ४ ; 
+ त्ये 2 वि ए च 
कै । 
=. ` 44 न्त = 1 । 
क क > 
कि ' +न कक ॐ = प्व प्क प भव्क् फक ७ 
=> चनः (9 त) = द ` ` न" भतः गि कुक केः -न्वक्रयरकविक" _ 
५ कह जदि ` क ( 
धि # 


= = क्कः = 


यच्छ्ण्वतोऽपत्यरतिविदष्णा 


सत्त्वं च शुद्धयत्यचिरेण पुंसः 
भक्तिर्हरौ तत्पुरुषे च सख्यं 


















| 1 ` मायं रोकमासाद्य तन्जातिमनुरुन्धतः ॥ २ ॥ | अकस्य दी वे अव्यन्त अदूमुत इसलिये आप अव उनकी 

ज्ज: दूसरी बाटलीरा्ओका भी वर्णेन कीजिये ॥ ३ ॥ 

ध , (४ ॥ < 

~. शरद्य उवाच । श्रीट्युकदेवजी कहते ह-परीक्षित्‌ ! एक वार 

४ ¦; /; । भगवान्‌ श्रीकृष्णके करवट वदल्नेका अभिषेकउस्सूव 
कदाचिदीत्थानिककोतुकावे मनाया जा रद्वा था । उसी दिन उनका जन्मनक्षत्र भी 


५४५ 


= १.२, 
 । ५ ज 
अ "क 


गाना वजाना हो रहा था । उन्हीं खियोकि बीचमे खडी 
` _ ` वादि्रगीतद्विजमन्त्रवाचके इई सती-साध्वी यओोदाजीने अपने पुप्रका अभिषेकं 
भकेयन किया । उस्‌ शमय ब्राह्मणछोग मन्त्र पद्कर आरसीवाद दे 
क छलोरभिषेचनं सती ॥ ४॥ रे थे ॥ 9 ॥ नन्दरानी यशोदाजीने त्राह्मणोका खू 

र पल्ली कृतमजनादिकं पूजन-सम्मान किया । उन्हं अनन, वल, माला, गाय 

आदि सु हर्मागी वस्तुएं दीं । जब यरोदाने उन ब्राह्मणों 
कृतखस्त्ययनं सुपूजित; । | द्वारा खस्तिवाचन कराकर खयं बाल्कके नहलाने 


4 7 (. [~ 
१, | ब्‌ ॥ ) 1 3 च + ऋ 
॥ ६ ५९५५ 


५: १.१६. / ¦ 
= ` + 4. क त ^> स ४। ~ ०५.9० > =क्र 
४ # क~ ह 
(य +}. 


र 
|! १ > » 
4 न 
५ ~ 8 


1 
॥ 


४ ह खा वर्णन मिल्ता है. 





"क स्निग्धाः प्रयति सेष्मयीति अुजयोयुमं घरृश्वाल्यन्नत्यव्यं सधुरं च कूजति परिष्वज्ञाय चाकाद्खुति । 
शमाकामवयादयु्य रति कन्दसयपि काप्यलो पीतलन्यतया स्वपित्यपि युनजाअन्युदं यच्छति ॥ 
ओ वो ` उटाकर : देखते ९ ह ओर मुसकराते ६ । दोनो सुजा बार-बार दिखाते दै । बहे मधुर सर 


= 








योगे समवेतयोषिताम्‌ । था । धरम बहूत-सी ल्ियोंकी भीड़ लगी इई थी |, 


` बस्ुकरो पाकर उससे खेलने खग जाति ह ओर न मिल्नेसे 


कि स्किन त च = क = ढ़ 
क्र कक क । ^ क = "ऊ क्क = 4 
| ३ 


|| ५२५ क क 9 = 
^ "= कि" ^" 


अ० ७ | 


क यययो 
क पिपरि रि पि पिरि 


अन्नाद्यवासः सखगभीषटटधेनुभिः 








संजातनिद्राक्षमशीशयच्छनेः ॥ ५॥ 
ओत्थानिकोत्सुक्यमना मनखिनी 
समागतान्‌ पूजयती व्रजोकसः । 
नैवाप्येणोद्‌ बै रुदितं सुतस सा 
रुदन्‌ स्तनाथी चरणावुदक्षिपत्‌ ।। & ॥। 
अधः शयानख शिशोरनोऽल्पक 
प्रवालमृद्व्प्रिहतं व्यवतेत । 
विष्वस्तनानारसडप्यभाजनं 
व्यत्यस्तचक्राकविभिनद्ूमरम्‌ ॥ ७॥ 
दृष्टा यश्लोदत्र्चुखीा वजल्िय 
ओत्थानिके कर्मणि याः समागताः। 


नन्दादयशादृथतदशंनाङखाः 


कथं खयं वै शकटं बिपयंगात्‌ ॥ ८ ॥ 


नमन्ति मतीन्‌ मोपान्‌ मोपीश्च बालकाः । 


ङ्दतानेन पादेन धिप्तमेतन्न संशयः ॥ ९॥ | 


न ते अदधिरे मोपा बारुभाषितपित्युत । 





आदिका काय सम्पन्न कर ल्या, तव वह्‌ देखकर कि 
मेरे लल्लके नेत्रम नीद आ रही है, अपने पुत्रको 
धीरेसे शय्यापर छटा दिया ॥ ५॥ योडी वेर्से 
स्यामसुन्दरकी ओं खुली, तो वे स्तन-पानके न्ि रने 
कगे । उस समय मनखिनी यरोदाजी उत्सवे आये 
हुए व्रजवासिर्योके खागत-सत्कारमें बहत ही तन्मय हयो 
रदी थीं । इसव्े उन्हे श्रीकृष्णकरा रोना सुनायी नहीं 
पड़ा । तत्र श्रीकृष्ण रोते-रोते अपने पवि उद्ागने रगे 
॥ & ॥ रिद श्रीकृष्ण एक छकडेके नीचे सोये इए 
ये । उनके पाव अभी गक्खारु कोपोके समान बडे 
दी कोमल ओर नन्हे-नन्हे ये | परतु वह नन्ा-सां 
पौव क्गते ही विशा छकड़ा उरुट गया# । उस 
छकडेपर दूध-दही आदि अनेक रसंसि भरी इई मटक्ियाँ 
ओर दूसरे बतन रक्खे इए थे । वे स॒व्र-केसव श्वट- 
फाट गये ओर छक्डेके पिये तथा धुरे अस्त-व्यस्त हो 
गये, उसका जूआ फट गया ॥ ७ ॥ करट नदट्नेके 
उत्सवमे जितनी भी लियं आयी इई थी, वे सव ओर 
यशोदा, रोहिणी, नन्दबावा ओर गोपगण इस विचित्र 
धटनाको देखकर न्याकुर हो गये । वे आपसे कडने खगे- 
अरे, यह क्या हो गया १ यह छकड़ा अपने-भाप कैसे 
उख्ट गया £ ॥ ८ ॥ वे इसका कोई कारण निश्चित 
न कर सके । वँ खेक्ते हए बार्कोने गोपो र 
गो पियोँसे कहा कि इस्‌ कृष्णने दही तो रोते-रोते अपने 
पौविकी ठोकरसे इसे उख्ट दिया है, इसमें कोई सदेह नदीं 
॥ ९ ॥ परतु गोपोने उसे "बालकोंकी नातः मानकः 
उतसपर विश्वास नहीं किया । टीक दी है, वे गोप उर 


अप्रमेयं बलं तस्य बालकसख न ते चिदुः ॥१०]) | बाक्कके अनन्त बक्को नहीं जानते ये ॥ १० ॥ 


श्द॒न्तं सुतमादाय यशोदा अहशङ्किता । 








लोम -्रषिके आश्नमकर बृक्षौको कुच डला । लोमश ऋषिने क्रोध करके शप दे दियाः - “अरे 






धर्‌ 2 {4 ७1३ 


देहरटित हो जा । उसी सभय सोपके केचुकके समान उसका शरीर गिरने खगा । बं 
क ऋर्णोपर गिर पड़ा ओर प्राथन्‌। की--“करृपाषिन्धो | सुद्घपर कपा कीजिये । {पके प्रभावका ज्ञान नहीं थ 
` अरा शरीर लोया दीजियि । लोमरजी प्रसज् हो गये । महात्मार्ओंका शाप भी वर शे जाता द । उन्दने काः 
क  श्वैवसत मन्वन्तर शरीङ्ृष्णके चरणः स्प्शसे तेरी सक्ति दो व्ह 1 ड 


गा । वहां अदर छ्कड्म आकर बठ गयां य 
्ृ्णके चरणस्परसे मुक्तं हे गया । 2 | 
ग ` ५ = ऋः = । ` क ~ न 


+भ 








| >, गदया किषर कीः > 







4 
। 
"ॐ 
न= (6 
+ 


 महपुरुषमादभ्यौ जगतामास कमसु ॥१९॥। 


र 
1 ४ 
[ कै 
कु 
ति + चः ० 
$ 
५ 


९4८ भरीमद्धागवत [ अ० ७ 


ररि गी 














आ जकः = चक जक 


कृतखस्त्थयनं विपः सक्तः स्तनमपाययत्‌ ॥११॥ | टेकर ब्राहम्णोसे बेदमन्त्रके द्वारा शान्तिपाठ कराया ओर 


६ ५ फिर वे उसे स्तन पिटने ल्गीं ॥ ११॥ वच्छान्‌ 
पूवत्‌ स्थापितं गोपबकिभिः सपर्च्छिदम्‌ । गोपने छकडेको फिर सीधा कर दिया । उस्तपर पहले- 
संया चनँ ~  _ | की तरह सारी सामप्री रख दी गयी । ब्राह्मणोने हवन 

विप्रा हत्वाचयांचदं्यक्षतङ्शाम्बुभिः ॥ १२॥ | करिया ओर दही, जक्षत, कु 'तथा जगे दवारा मवान्‌ 
ओर उस छकड़ेकी पूजा की ॥ १२ ॥ जो किंसीके 
गृणोमें दोष नहीं निकालते, च्ूठ नहीं वोल्ते, दम्भ, 
ईष्यां ओर दहिंसा नहीं करते तथा अभिमानसे रहित 
क --उन सत्यरीर ब्राह्मणोंका आरीर्वाद कभी विफल 
इति बालकमादाय सामग्यजुरुपाढ़ृतेः । नहीं होता ॥ १३ ॥ यह सोचकर नन्दवावाने वाञ्क- 
< 9 - को गोदमें उठा च्या ओर ब्राह्म्ोसि साम, ऋक ओर 
जले; पतित्रौषधिभिरभिषिच्य {द्वजात्तमः ॥१४॥ यज्वेदके मन्त्रोद्रारा सस्रत एवं पतत्र ओपधि्योसे युक्त 
जल्से अभिषेक कराया ॥ १४ ॥ उन्होने बड़ी 
एकाग्रतासे खस्त्ययनपाठ ओर हवन कराकर ब्राह्मणको 
अति उत्तम अन्नका भोजन कराया ॥ १५ ॥ उसके 
वाद्‌ नन्दवावाने अपने पुत्रकी उन्नति ओर अभिब्रद्धि- 
गवः सवेगुणोपेता वासःसग्रुक्ममालिनीः । की कामनासे ब्राह्णोको सवगुणसम्पन्न बदरत-सी गों 
ट दीं । वे गए वख, पुष्पमाका ओर सोनेके हारोसे सजी 

उद्यायाय शदात्तं चान्वयुज्ञत ॥९९॥ इई थीं । व्राह्मणोने उन्हें आशीर्वाद दिया ॥ १६ ॥ 


येऽख्यान॒तदम्मेभ्या्हिामानषिवजिताः । 


न तेषां सत्यशीलानामाशिषो विषखाः कृताः १३॥ 


चाचभरित्वा खस्त्यथनं नन्दगोपः समाहितः 


इत्वा चाभ्नि दविजातिभ्यः प्रादादनं म॑हागुणम्‌।। १५॥ 


यह बात स्पष्ट है किं जो वेदवेत्ता ओर सदाचारी 
ब्राह्मण होते हे, उनका आश्ीवांद कमी निष्क नहीं 
ता निष्फल भविष्यन्ति न कदाचिदपि स्फुटम्‌॥१७।| होता ॥ १७ ॥ 


विप्रा मन््रविदो युक्तास्तेयाः शरोक्तास्तथाऽऽरिषः । 


एकदाऽऽरोहमारूदं लालयन्ती सतं सती । एक दिनकी वात है, सती यञ्चोदाजी अपने प्यारे 
लछ्ाको गोदमें लेकर दुखार रही थीं । सहका श्रीरष्ण 


गरिमाणं शिषे न सेहे गिरिश्चटवत्‌ ॥१८॥ | चदनके समान मारी वन गये । वे उनका भार न सहं 
सकी ॥ १८ ॥ उन्होने भारसे पीड़ित होकर श्रीङ्ष्ण- 


भूमौ तिधाय तं गोपी विखिता भारीडिता । को प्ृध्वीपर बेडा दिया । इस्त नयी घटनासे वे अत्यन्त 
3 चकित हो रदी थीं । इसके बाद उन्होने भगवान्‌ 
पुरुषोत्तमका स्मरण किया ओर घरके काममें व 


गयीं ॥ १९ ॥ 
४. नि 
। दैत्यो व €. , * कंसभृ = प 
 दत्यानान्चा दणावतः कर्षथत्यः प्रणोदितः । तृणावतं नामका एक देत्य था । वह कंसका निजी 
य सेवक था । कंसकी प्रेरणासे ही बवंडरके रूपमे वद्‌ 






गोकुरमें भाया ओर बेठे हए वाल्क श्रीकृष्णको उडाकर 








४ ए # द इ; क 
नि कि कात का क व के 


| ऋक = = ` 


अ० ७ ] दश्चम स्कन्ध १५९ 








गोकुलं सर॑माब्ण्वन्‌ युष्णंशक्षुपि रेणुभिः । | आकारामें ठे ह ॥२०॥ ४८ तरजरजसे सारे गोकुक- 
16  . ग ढक दिय ठोर्गोकी देश्वनेकी शक्ति हर टी 
यन्‌ सुमहाघोरशब्देन प्रदिद्यो दिशः ।२९।| को ठक दिमा नौर न शति 
< ह | उप्ते अत्यन्त भयंकर शब्दसे दसा दिशाए कंप उरीं 
मुदेतमभवद्‌ गोष्ट रजसा तमसाऽऽ्रृतम्‌ । 


५ 1 | ॥ २१ ॥ सारा त्रन दो घड़ीतक रज ओर तमसे टका 
खत यरदद्‌। म्‌पश्यत्ता स्न्‌ न्यस्तवती यतः । २२1 | रहा | यशोदा जीने अपने पुत्रको जहां त्रे दिया था, 


नापश्यत्‌ कथनातमानं परं चापि षिमोहितः। | वर्ह जाकर देखा तो श्रीकृष्ण वरहा नहीं ये ॥ २२ ॥ 


गावर्रि र उप्त समय तृणावतंने वव्रंडरखपसे इतनी वाद उडा 
दणवरत॑निखृ्टमिः शक्रराभरुपट्वुतः ॥२२॥ | कवी थी कि समी ोग अत्यन्त उद्विन ओर वेष्युव हो 
इति खरपवनचक्रपां दवष ` गये थे | उन्हे अपना-पराया कुछ भी नदीं सञ्च रहा 

9 ध जो रव ध ओ घूककी वप्र ति 

सुतपदवीमबल विलक्ष्य माता । धा ॥ २२.॥ उस्‌ गि अंधी ओर । वृप्रात्र 


अपने पुत्रका पता न पाकर यश्लोदाको वडा डओोक 
अतिकरुणमनुखरन्त्यशो चद्‌ दरआ । बे अपने पुत्रकी याद करके वहत दही दीन हो 
यवि पतिता मृतवत्सका यथा मौः। २७} । गयी ओर्‌ वछडेके मर जानेपर्‌ गायक्री जो दशा दहो 

भ विः जाती है, वही ददशां उनकी हो गयी । वे प्रथ्वीपर गिरि 
९.९ पम स्य पतग पड़ी | २४ ॥ ववरंडरके शान्त ॒होनेपर जव धूच्की 
भृशमनुतप्रधियोऽश्रपणमख्यः । वराका वेण कम हो गया, तत्र यशोदाजीके रोनेका उब्द 


+ ऋ सुनकर दूसरी गोपियां वहाँ दौड़ आयीं । नन्दनन्दन 
रुरुदुर २१९२ नन्दछ्ु | रयामसुन्दर श्रीकृष्णको न देखक्रर उनके इदयमे भी 
~ | बडा संताप इअ, ओंँखोसे ओपी धारा वहने ठगी । 
| उपारतपां सुबपवेभे ॥२५।। | ~ 
पवन पारतपां घुवपेवेभे २५] वर 
तण (चतं; श्ान्तश्यो बात्यारूपधरो हरन्‌ । इधर तृणावतं ववं डररूपसे जव भगवान्‌ श्रीकृष्णको 


आकारापें उखा ठे गया, तव उनके भारी बोञ्चको न 

ग न = सम्हाल सकनेके कारण उसका वेग शन्त हो गया । 
कर्णं नभोभतो गन्तु नाशचक्रोद्‌ भूरिभारभृत्‌ ॥२६॥। वा गधि 
भी मारी होनेके कारण श्रीकृष्णको नीरगिकिी चदान 
खमञ्चने चणा । उन्न उसका गला रसा पकड़ा कि 
वह उप्त अद्धत शिद्युको अपनेसे अकण नहीं कर स॒का 
गले गृहीत उत्खध्टु नाशक्रोदद्‌यताभंकय्‌ ॥२७॥ | ॥ २७ ॥ भगवानूने इतने जोरसे उसका गगा पकङ्‌ 
| रक्खा थाकि वह असुरं नि्चेष्ट हो गया ] उसकी 

गरग्रहणनिषशे दत्यो तिगंतलोचनः। अखि वाहर | निकठ आयीं । बवोकती वद 
हो गयी । प्राण-पखे उड गये ओर वाल्क 

अव्यक्तरावो न्यपतत्‌ सहबालो व्यसुत्रंजे 11२८1 | श्रीकृष्णके साथ वह व्रजमें गिर पड़ा# ॥ २८ ॥ 

(+ १. द्र वि ` 
# पाण्डुदेशमे सश्खाक्ष नामके एक राजा ये । वे नरमदा-तटपर अपनी रानिरयोके साथ विहार कर र्दे ये । 
उधरसे दुर्वासा ऋषि निकले, परंतु उन्होने प्रणाम नहीं क्रिया । छषिने शाप दयात्‌ रक्षस हो जा) जब वह 
उनके चरणोपर गिरकर गिड़गिड़ाया, तव दुबसाजीने कह दिया-^मगवान्‌ श्री््णके श्रीविग्रहका स्पशे होते ही त्‌ 
मक्त हो जायगा ।› वही राजा तृणावर्त होकर आया था ओर श्रीकृष्णा संस्पशे प्राप्त करके मुक्त हो गया । 


तमस्मानं मन्यमान आत्मनां गुरुमत्तया । 











१६० श्रीमद्भागवत [ अ० ७ 





तमन्तरि्षात्‌ पतितं शिखायां वहाँ जो चयो इक होकर रो रही यथी 
वि्ीर्णस्वनयवं करालम्‌ । उन्होने देखा किं वह विकराल दैव्य आकाशास 
- र ६ एक चञ्वानपर गिर॒ पड़ा ओर उसका एक-एक 
1 ण॒ विद्धं अद्ग चकनाचूर हो गया--टीक वैसे ही, जैसे भगान्‌ 
्ञियो रुदत्यो ददशः समेताः ॥२९।। | रांकृरके बाणोंसे आहत हय त्रिपुराघुर गिरकर चूर-चूर 
हो गया धा ॥ २९. ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसके वक्षः- 
स्थल्पर लटक रहै थे | यह देखकर गोप्या विस्मित 
कृष्णं च तस्योरसि छम्बरमानम्‌ । हो गयीं । उन्होने ज्ञटपट वद्य जाकर श्रीक्ृष्णको गोदमें 
ठे च्या ओर कर उन्हे माताको दे दिया | वालक 


भ्रादाय मात्रे प्रतिहत्य षिसिताः 





|| तं खस्तिमन्तं पुरुषादनीतं ४ 

| ॑ १ मृत्युके मुखसे सङुराक छोट आया । यपि उसे राक्षस 
| 1 । विंहायक्षा स॒त्युयुखात्‌ प्रथुक्तम्‌ । आकारामें उठा ठे गया था, फिर भी वह वच गया | 
#00 गोप्यश्च गोपाः किल नन्द्युख्या इस प्रकार वाल्क श्रीकृष्णको फिर पाकर यश्चोदा आदि 


> गोपियों तथा नन्द आदि गोर्पोको अव्यन्त आनन्द हज 
खछनञ्ज्वा पुन ४ प्रापुरतीव मादम्‌ || र © | ॥ ॥ ३२० ॥ वे कहने लगे--(अहो | यह तो वड़े आश्व य- 




















अहो बतात्यद्थ्ुतमेष रक्षसा की बात है| देखो तो सदी, यह कितनी अदधत 
घटना घट गयी | यह वाक्क राक्षपसके द्वारा प्रव्युके . 
बालो निवृत्ति गमितोऽभ्यगात्‌ पुनः । मुखमें डाल दिया गया था, परंतु फिर जीता-जागता 


आ गया ओर उस हिंसक दुष्टको उसके पापी खा 
| गये | सच है, साधुपुरुष अपनी समतासे ही सम्पूणं 
साधुः समत्वेन भयाद्‌ विञुच्यते ॥३१॥ | म्योसे बच जाता है ॥ ३१ ॥ हमने देसा कौन-सा 


कि नस्तपश्वीणंमधोक्षजाचंनं तप्‌, भगवानूकी पूजा, प्याऊपौसला, कूर्भा-वावली, वाग- 
बगीचे आदि पूर्त, यज्ञ, दान अथवा जीरवोकी भलाई 


हिकः खपापेन विहिंसितः खलः 


~< ष मू = 
ददतत तपाहृदमू । की थी; जिसके फल्से हमारा यह बालक मरकर भी 
 यतषम्परेतः पुनरेव बालको अपने खजर्नोको सुखी करनेके व्ि फिर लोट भाया १ 


त स २२॥ | भस्य ही यह बडे सौभाग्यकी बात हैः | २२ ॥ जव 
दिष्टया खन्ध ्रणयन्तुपसिितः॥३२॥ | नन्दवावाने देखा कि महावने बहत-ती अदूयुत बयार 
श दष्टाद््ुतानि बहुशो नन्दगोपो बृहदने । घटित हयो रही है, तव आशर्यचकित होकर उन्होने 
` बसुदेववचो भूयो मानयामास विस्मितः ॥२३॥ वसुदेवजीकी बातका बार-बार समथन किया ॥ ३३ ॥ 


ङ्मारोप्य भामिनी । एकः दिनकी बात है, यञ्ञोदाजी अपने प्यारे रिद्य- 
रः शकदाभेकरमादाय ख = 


^ ,. थीं । वे वात्सत्य-स्नेसे इस प्रकार सराबोर हो रही थीं 
हि त सन स्नेदपरिप्डता ॥३४॥ कि उनके स्तनाँसे अपने-आप ह्वी दूध ्षरताजा रहा 
सः था ॥ ३४ ॥ जब वे प्रायः दूध पी चुके ओर माता 
यञ्लोदा उनके रुचिर सुसकानसे युक्त सुखको चूम रही थीं 


) 





# कः 


अ० ८ | दश्चम कन्ध १६१ 


[द व त 








क क णी ~ यि 


ञ॒खं खरयती राजञ्जुर भतो दच्छे इदम्‌ ॥३५५॥ | उसी समय्‌ श्रीकरष्णको जंमाई्‌ आ गयी ओर्‌ माताने 
ख॑रेदसी व्योविरलीक्षमादयाः | उनके मुखमें यह्‌ देवा # ॥ २५ ॥ उसमे आकारा 
दनवहिवनाच्चयी | अन्तरिक्ष, उ्योतिमण्डल, दिशा, सूय, चन्द्रमा, अग्नि; 
एयन्दुवह्विधसन्ुरधीब । वायु, समुद्र, द्वीप, पर्वत, नदिर्यो, वन ओर समस्त 

दोषान्‌ नगांस्तदुददितुवनानि | चरचर प्राणी स्थित हैँ ॥ ३६ ॥ परीक्षित्‌ ! अपने 


ूतानि यानि शिरजज्गमानि ।\३६॥ | उनके दं इस भकार सदसा खाया जगत्‌ डक 
र्य विथ शनी मृग्ावकनयनी यशोदाजीका शरीर कप उठा । उन्हनि 
सा वीक्ष्य विग्धं सदक्चा राजन्‌ संजातवेषधथुः ¦ अपनी वदी-वडी खे बंद कर ठीं  । वे अत्यन्त 
सम्मीटथ सगस्चावाक्षी नेत्रे आसीत्‌ खविसखिता।२७॥ | आशचर्मचकित हो गयीं ॥ २७ ॥ 
नि~~ 
ति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्ामस्कन्धे परार्ध 
तृणावतंमोक्षो नाम सषमोऽष्यायः ॥ ७ ॥ 





- "कच्छ 
अथाष्टपोऽष्यायः 
| नामक्रण-संस्कार ओर बाखटीखा 
श्रीदयुक उवाच श्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ । यदुवंियोके 
~ = -पुरोहित ये श्रीगर्गाचायजी । वे बडे तपखी ये | 
गैः पुरोहितो रःजद्‌ यदूनां सुमहातपाः । = |> ¬` 


वद्ुदेवजीकी प्रेरणासे वे एक दिन नन्दबाबाके गोकुले 

व्रजं जगाष न्द देभुदेवप्रदोदित | १ | अये | १ ॥ उन्हं देखकर नन्दबाबाको वडी प्रप्तनता 

- हई । वे हाथ जोड़कर उठ खड़े इए । उनके चरेम 

त इद्र परमप्रीतः प्रस्युस्थि छताञ्जकिः। पणाम किया । इसके बाद भये खयं मगवान्‌ ही हँ- 

0 ^< इस भावसे उनकी प्रूना की ॥ २ ॥ ज्र ग्गाचायेजी 

आनचाधोक्षजधिया अ्रणिपातपुरस्सरम्‌ ॥ २॥ नारणे चठ भये नोर विवि 

घषवि्ट कृतातिथ्यं गिर दनृतया निम्‌ । सत्कार हो गया, तव नन्दबावाने वड दी घुर वाणीसे 

उनका अभिनन्दन किया ओर कहा--“मणवन्‌ ! आप 

 नन्द्यितवा्पीद्‌ बहन्‌ पूणस्य करबाम्‌ किमू ।। ३॥ । तो खयं प्णैकाम है, पि मै आपकी क्या सेवा 
१.राकटत्ृणावतंवधः । २. वादरायणिख्वाच । ३. अभ्यर्व्याथो° । 

ॐ स्नेदमयी जननी ओर स्नेहके सदा भूखे भगवान्‌ ! उन दूध पीनेघे वरि दी नहीं होती थी । माके मनम शङ्का 

हृद -कदीं अधिक पीनेसे अपच न हो जाय | प्रेम सव॑दा अनिष्टकी आराङ्का उत्पन्न करता है । श्रीकृष्णे अपने मुखम 


विश्वरूप दिखाकर कदा--“अरी मेया ! तेरा दूध मै अकेठे दी नहीं पीता दँ । मेरे स॒लमे बैठकर सम्पूरणं विश्च ही इसका 
पान कर रहा है | तू घवरावे मतः-- 





ज 


स्तन्य कियत्‌ पिवति भूयङ्म्मकेति वरतिंष्यमाणवचना जननी विभाव्य । 
विद्व ॒विभागि पयसोऽस्य न केवलोऽहमस्माददरि हरिणा किमु विश्वमास्ये ॥ 
{ बात्सस्यमयी योदा माता अपने खालके मुखम विश्च देखकर डर गर्थी, परंतु वात्सव्य-प्रेमरस-भावित हदय 


` होनेखे उन्द विश्वास नहीं हुआ । उन्न यह विचार किया किं यह विश्वका बखेड़ा सखे सदमे कसि मया १ हो-न-हो यह मेरी 
इन निगोड़ौ आंखकी ही गङ़वड़ी है । मानो इसीसे उन्दने पने नेत्र बद कर स्थि । 





 : श्रीमद्भागवत [ अ० < 
कर १ ॥ २॥ आप-जेसे महात्माओंका हमारेजैसे 
गृहस्थकि धर आ जाना ही हमारे परम कस्याणका 
कारण है | हम तो घर्योमे इतने उलन्च रहे हैँ ओर इन 
प्रपन्नोमें हमारा चित्त इतना दीन हो रहा है कि हम आपके 
आश्रमतक जा भी नहीं सकते । हमारे कत्याणके सिवा 
आपके जागमनका ओर कोई हेतु नहीं दहै॥ ४॥ 
प्रमो ! जो बात साधारणतः इन्द्र्थोकी प्ंचके बाहर है 
अथवा भूत ओर भविष्यके गर्भम निहित दहै, व्ह भी 
ञ्योतिष-साखके दारा प्रव्यक्च जान टी जाती है } आपने 
उसी ज्यौतिप-चाच्की रचना की | ५॥ आप 
ब्रह्मवेत्ताओमिं श्रे हैँ । इव्ि मेरे इन दोनों बाक्कोके - 
नामकरणादि संस्कार आप दही कर दीजिये; क्योकि 
ब्राह्मण जन्मसे ही मनुष्यमाव्रका गुरु दैः | ६ ॥ 
गगचायेजीने कदा--नन्दजी ! मँ सव जगह यदु- 
वंरिर्योके आचार्यके ख्यमे प्रसिद्ध द्व । यदि मैं तम्हारे 
पुत्रके संस्कार क्गा, तो रोग सम्चेगे कि यह तो 
देवकीका पुत्र है ॥ ७ ॥ क्की बुद्धि बुरी ड, व 
पापदह्ी सोचा करती है। वघुद्वजीके साथ तुम्ारी 
वंड़ी धनिष्ठ भित्रता है । जवसे देवकीकी कन्यासे उसने 
यह्‌ बात घुनी है कि उसको मारनवाटला आर कह। पदा 
हो गया है, तवरे वह यदी सोचा करता ह करि दवकीरकै 
आस्व गभसे कल्याका जन्म नहीं होना चाहिषे । यदि 
मै तुम्हारे पुत्रका संस्कार कर दृं ओर वह ईस वाख्कको 
वसुदेवजीका लडका समञ्चकर मार्‌ डे, तो हमसे बड़ा 
अन्याय ह्यो जायगा ॥ ८-र ॥ 

















म 


महद्विचलनं भुणा गृहिणां दीनतेतसाम्‌ । 










निःश्रेयसाय भगवन्‌ कर्पते नान्यथा कचित्‌ । ४ 
ज्योतिषाषयनं साक्षाद्‌ यचज्तानभती न्द्रिथम्‌। 


प्रणीतं भवता येन पुमान्‌ वेद पराब्रस््‌ ।\ ५}! 


# केः $ ऋ, १ © ©," 
तं हि बरह्मविदां भ्रष्ठ सस्कारन्‌ खत महे।से । 





बाङथोरनयोचेणां उन्मना ब्राहमणो गुरुः ॥ & ॥ 





गर्गा उवाच 







सवायः ख्यातथ युषि सर्वतः । 






सुतं मया सस्छृधं ते मन्यते देवकोसुत्‌ ॥ ७ ॥ 






कंसः पापतिः सख्यं त चानकदुन्दुभेः । 







देवक्या अष्टमो गर्भो न शी मवितमहति ॥ < ॥ 







इति सं चिन्ठयज्छत्वा देवक्या दारिकावचः । 






अपि हन्ताऽऽगताशङ्कसदिं तभोऽनयो भवेत्‌॥ ९ ॥ 






नस्दवाबाने क्टा-आचायजी ! आप्र चुपचाप इस 
एकान्त गोश्ाकामें केवल कस्तिवाचन करके इस बारुक- 
का द्विजातिसमुचित नामकरण-संस्कारमात्र कर दीजिये | 
ओरौकी कौन कदे, मेरे सगे-सम्बन्धी इस बातको 
न जानने पायं ॥ १०॥ 

श्रीद्यकदेव जी कहते ह-गर्गाचार्यजी तो संस्कार 
करना चाहते ह्वी थे । जब नन्दबाबाने उनसे इस प्रकार 
प्रार्थना की, तब उन्होने एकान्तम छिपकृर युप्षहटपसे 


गन्द उवाच 







॥ अलधितोऽखिय्‌ रदसि मामकैरपि मोजे । 






करु द्विजातिसंस्कारं खस्तिवाचन पुक्‌ ॥१०॥ 
्‌ श्रीक उवाच 








॥ + = 
= ॥ ् 
4 235 क 








यद्‌नामपथग्भावात्‌ संकवंणशन्त्युत \\१२।। 


आसन्‌ बणाह्लयो छस्य गृष्टतोऽदुयुं तन्‌ 
राको रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्मतां गदः ॥१३। 


प्रायं वयुदधेवसख कविजातस्तवारभजः 


वासुदेव इति भ्रीसानभिन्घाः सम्प्रदक्षुते १४) 


बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुदश्च ते 


गुणकृसौदुप णि तार्ण देद्‌ सो जनाः ॥ १५५) 


एष च्‌; भ्रेषं आधाखयद्‌ गोपगोड्रनन्दनः 


९९ 


अनेन स्व॑दुगांणि युयमञ्ञ्तरिप्यथ १६! 
पुरानेन व्रजपते भत्र दस्युपीडिताः । 


अराजङ्ग रक्ष्यमाणा जिग्युदस्युन्‌ सदेधिताः ॥ १७ 


य एतसिन्‌ महाभाग प्रीति डुवेन्ति मानवाः । 








५ न  नारयोऽभिभवन्त्येतान्‌ धिष्णुक्चानिवासुराः ॥१८॥ 


न 





} .) ~ 


१६३ ` 





ऋक ऋ किन त 


गगीचार्यजीने कटा-- भ्य रोहिणीका पुत्र है । 


इसन्वयि इसका नाम होगा रौहिणेय । यह अपने सगे- 
सम्बन्धी ओर मिरत्रोको अपने गुर्णोसि अत्यन्त आनन्दित 
करेगा । इसय्ि इसका दूसरा नाप होगा शामः । इसके 

वल्वी कोई सीमा नहीं है, अतः इसका नाम (वल! 
भी है ] यह याद्वं ओर तुमलोगोमे कोई मेदमाव 
नहीं रक्खेगा ओर ठो्गोमें ट पड़नेपर मेक कराेगा; 
इस्व्यि इक्तका एक नाम (संक्षणः' भी है ॥ १२ 

ओर यह जो सँवर-सँवल्ा है, यह प्रत्येक युगमें शरीर 
ग्रहण करता है । पिछठे युगि इसने क्रमदाः येत, 
रक्त ओर पीत--ये तीन विभिन्न रग खीकार्‌ कियिथे। 

अवकी यह्‌ कृष्णवणे दुआ द | इसच्यि इसका नाम 

“कृष्णः होगा ॥ १३ ॥ नन्दजी ! यह तुम्हारा पुत्र 
पहञे कभी वसुदेवजीके घर भी पैदा इआ था, इसव्ये 
इस रहस्यकतो जाननेवाठे लेग इसे श्रीमान्‌ वासुदेवः भी 
कहते है १४॥ तुम्हारे पुत्रके ओर भी बहत. नान ¦ 
है तथा रूप मी अनेक हैँ । इतके जितने गुण हँ ओर 
जितने कै, उन सवके अनुसार अत्-अल्ग॒नाम पड 
जाते ह । मै तो उन नामोंको जानता द, परंतु संसार- 
के साधारण जोग नदीं जानते ॥ १५ यह तुमल्छेगोका 
परम कल्याण करेगा । समस्त गोप ओर गौओंको यह 
बहुत ही आनन्दित करेगा । इसकी सदायताचे तुमल्मेग 
वडी-बडी विपततिर्योकतोऽवडी घुगमतासे पार कर्‌ खोगे। १६। 
तरनराज } पठे युगकी बात है । एक बार पृथ्वीम कोई 
राजा नहीं रह गया था | डउकु्ओने चारो ओर छ्ट- 
खसो मचा रश्खछी थी । तव तुम्हारे इकी पुत्रने सजन 
पुरर्पोकी रक्षा की जौर इससे बलं पाकर उन लोगने 
टुटेरोपर विजय प्रात की 1 १७ ॥ जो मनुष्य तुम्हारे 
इस सोवरञे-सलोने शिद्यसे प्रेम करते हँ, वे जडे भाग्य- ` 
वान्‌ है । जसे विष्णुभगवान्‌के करकमलकी छतछायामे 
रहनेवाटे देवताओंको असुर न्ह जीत सकते, वैसे ही ` 
इससे प्रे करनेवा्छोको भीतर या बाहर किसी भी ्रकार्‌- | 








। ससन 
॥ ^" न्ट 


ऽयं ते नारायणसमो गुणः । 












त जक के चको १ ` ऋककनकीत 


भकः क, ह श ॐ 
क) 6 = कि करण ॥ "र, कंच ,# 4- # > 3 क < # ~ ॥ 
च चै तति = के ुिीतीरणक्यकृ कनः १ कै 29} [+ +~  । न्क (न १) 
= कको च्न्क 1 ह ¢ क 


,  यदयङ्गनादश्चनीयङुमारलीला- 


१६४ श्रीमद्भागवत [ अ० < 


कः भनक कोक कक चन्त ेः ` ॐ तः १ ऋ ~ = कः ३३ ऋ ऋ ककि कर ॐ 
(क 


नारायणके समान है । तुम वड सावधानी ओर तत्परताचे 
इसकी रक्षा करोः ॥ १९ ॥ इस प्रकार नन्दबाबाको 
भली्भाति समञ्ाकर, आदे देकर गर्गाचार्भनी अपने 
आश्रमको चोट गये | उनकी बात सुनकर नन्द्बावाको 
वड़ा ही आनन्द हआ । उन्होने ठेसा समज्ञा कि मेरी 
सव॒ आशा-खलसाए्‌ं पूरी हो गयी, मै अद कृत्तय 
्रे॥२०॥ । 

परीक्षित्‌ ! कुछ ही दिनोें राम ओर श्याम घुटनों 
ओर हा्थोके वक वैया चट-चल्कर गोकु खेलने 
ल्गे ॥ २१॥ दोनों भाई अपने नन्दे-नन्हे पौरबोको 
गोकुन््की कीचडमे धसीटते इए चलते । उस स्मय 
उनके पाव ओर कमरके ध्र सुनद्चुन बजने च्छते ¦ 
वह राब्द्‌ वड़ा भटा माद्धरम पड़ता ¦ बे दोनों स्वयं वह्‌ 





भरिया कीत्यालुभावेन गोपायख समाहितः ॥१९ | 








इत्यात्मानं समादिश्य मग च खगरहं गते । 


नन्दः प्रयुदितो मेते आत्मानं पूर्णमाशिषाम्‌ ।२०॥ 
काटेन वजत॑ल्पेन गोङ्करे रामकेरश्च | 


जाचुभ्थां सह पाणिभ्यां रिङ्माणौ विजहतुः ॥२१।। 


ताचङ्धियुग्ममनुकृष्य सरीचयुषन्तौ 


घोषप्रघोषरुचिरं वजकरद॑मेषु । ध्वनि सुनकर चिल उठते । कभी-कमी बे रास्ते चच्ते | 
किसी अज्ञात व्यक्तिके पीछे दहो छेते | पिर जवर देखते 
तन्नाददृ्टमनसावयुद्त्य लो कि यह तो कोई दूसरा है, तवर श्चकःसे एह जाते ओर 


डरकर्‌ अपनी माताओं-- रोहिणी जी ओर यशोदा जीके पान्न 
लौट आते | २२ ॥ मातार्पँ यद्र सब देख-देखकर स्नेहसे 
भर जातीं | उनके स्तने दूधकी धारा वहने च्गणती 
थी | जव उनके दोनों नन्दे-नन्हे-से शिद्यु अपने हारीरमे 
कीचड़क। अङ्गराग लगाकर लोटते, तवर उनकी छन्दरता 
ओरमभी ब्द जाती थी | माताएं उन्हें अते दही दोनों 
हार्थोसे गोदमें केकर हृदयसे ट्गा ठकेतीं ओर स्तन- 
पान कराने ख्गतीं | जवर षे दूध पीने गते ओर वीच- 
बीचमें मुसकरा-पुसकराकर अपनी माताओंकी ओर देखने 
क्गते, तव वे उनकी मन्द-मन्द मु्ठकान; छोटी-छोरी 
दँतुव्ँ ओर भोला-माला सुह देखकर आनन्दे सपुदमे 
दूवने-उतराने च्गती ॥ २३ ॥ जरे राम ओर स्याम 
दोनों कुछ ओर वड़े हए, तत्र व्रजमें घरके बाहर ेसीः 


युग्धग्रभीतवदुपेयतुरन्ति मत्रोः ।२२॥ 


तन्मात्रो निजसुतौ घृणया स्तुबन्त्यौ 
यङ्काङ्गरागरचिरायुपगं द दोम्याम्‌ । 


दत्ता स्तनं प्रपितोः स शुखं निरीक्ष्य 


मुग्धसितार्पदश्चनं ययतुः प्रमोदम्‌॥२२॥ 


4 बाह 
"च ॥ ६ ठेसी बाकुली करने लगे, जिन गोपि्याँ देखती ही 
न्तव तदबलाः प्शीतपच्छैः। रह जातीं । जव वे किसी वैठे हए बछ्डेकी प्र पकड़ 


पि. नि । 
नक 2 ~ ५ 
- ५ र ऊर वि > च 
४): न 1 ज क 
५ ५ ॥ कनै 


व लेते ओर बडे डरकर इधर-उधर भागते, तत्र वे दोना 
वत उभावलुकृष्यमाणौ ओर भी जोरसे परं पकड़ छेते . ओर वछ्डे उन 
` ` ८ घसीटते इए दौडने र्गते । गोपियां अपने धरका काम- 


कि 
थ उज्ितगृहा जहपुसन्त्यः॥२४॥॥ धंधा छोडकर यदी सव देखती रहती ओर सते-ैसते 








1 ग] | 
\ [ ए ॥ च अ ३ व 
[हि च 
५ "= 4 वं क च+ #। ५ १ ॥ 
>. ऋ क, ४ 4 क, - < ऋ + * 
> # # [> ~. - क 
# व =. य ॐ 1 
9 क व २ र 
प ्रः- 
त ए 


र ग्क्ा पि 








० ८ | दद्व च्छन्ध १६५ 
भृङ्न्यिद्यक्षिजलद्विजकण्ट केभ्य छोःपोट होकर परम आनन्दम मग्न हो जातीं ॥२५॥ 


कन्हैया ओर वल्दाऊ दोर्नो ही वडे चच्चक ओर बडे 
यिखडी थे । बरे कहीं हरिनि, गाय आदि सीगवाले 
कौडापरःवतिचली खसुतौ निषेद्धुम्‌) | पञ्यभेकि पा दौड जते तो कदी धधकती इई आगसे 
खेष्नेके व्यि कूद पडते । कमी दते काटनेवाठे 
कुत्तकि पास पर्हुच जते, तो कभी ओंँख वचाकर तल- 
गृहाणि कर्त॑मपि यत्र न तजञनन्यौ वार उठा छेते । कभी कूं या गङ्के पास जल्पं गिरते- 
गिरते बचते, कमी मोर आदि पक्षियोके निकट चे 
जाते ओर कमी कर्यिकी ओर बढ़ जाते ये | मातार्पँ 
स , | उन्ं बहुत बरजतीं, परंतु उनकी एक न चक्ती । 
शेकात आवदुररं मनक्षोऽनवस्थाम्‌ । २५ दती स्थतिमे बे बका कमा 
पार्त । उनका चित्त वर्चोको भयकी वस्तुओंसे वचानेकी 

छ - विन्तासे अत्यन्त चञ्चठ रहता था ॥ २५ ॥ 
काङेनाल्येन राजव रामः कृष्णथ गोड । राजं | कुछ ही दिनोमिं योदा ओर रोदिणीक 
लड़के खाक धुटर्नोका सहारा व्यि विना अनायाप्ष ही 


अघ्टजालुभिः पद्धिषिचक्रमतुरञ्ञघ्ा ।२६॥ | खंडे होकर गोकुल्मे चल्ने-फिरने लगे# ॥ २६ ॥ 


णे 
~ "णी ण चा 
मि भ 


१. रोत्रजे | 
‰ जव श्यामयुन्द्र घुट्नोका सहारा च्य विना चने को, तव वे अपने धरम अनेको प्रकरारकी कौतठकमयी 
लीला करने ल्गे-- 
य॒ल्ये चोरयतः खयं निजग्े हैयङ्गवीनं मणिस्तम्मे खध्रतिविम्बमीश्ितवतस्तेनैव साद भिया । 
भ्रातमा बद्‌ मातरं मम समो मागस्तवापीदितो यु्श्वेत्याल्पतो हरेः कठ्वचो मातां रहः श्रुयते ॥ 
एक दिन सायरेसलोने व्रजराजकुमार श्रीकन्दैयालाल्जी अपने सूने घरमे स्वयं ही माखन चुरा रहे थे । उनकी 
दष्ट मणिके खम्भेम पड़े हपट अपने प्रतिविभ्ब्पर पड्की | अव्र तो वे डर गये | अपने पतिविम्बसे बो “अरे चैया ! 
मेरी मेवासे कियो मत । तेरा भाग भी मेरे बरावर ही मुन्ने स्वीकार हे; ऊ, खा । खा 2, मैया [° यशोदा माता अपने 
लटखकी तोतटखी बोटी सन रदी थीं | 
उन्दं वड़ा आश्वयं हुः वे घरमे मीतर घुस आर्यी । माताको देखते ही श्रीकृष्णने अपने प्रतिविभ्को दिखाकर 
वात बद्ठं दी-- 
मातः क एर नवनीतमिदं त्वदीयं लोभेन चोरयितुमच्य गहं विष्टः 
मद्रार्णं न मनुते मयि रोषरभाजि रोष्रं तनोति नहि मे नवनीवटोभः॥ 
मेया ! मेया [| यह कोन हे १ लोभवश तुम्हारा माखन चुरानेके ष्थि आज घरमे घुस आया हे । चै मना 
करता दरतो मानता नदीं है ओरमेंक्रोध करता द्र तो यह मी क्रोध कप्ताहै। मैया ! ठुम कुक ओर मत सोचना । 
मेरे मनम मालनका तनिक मी खोभ नींद» 
अपने दुर्मदे शिक प्रतिभा देखकर मेया वाल्छल्य-स्नेहके आनन्दे ममन हो गयीं । 
५ >< >< >< >< >< 
एक दिन श्यामसुन्दर माताक्रे बाहर जानेपर घरमे दौ माब्नन-चोरी कर रदे ये । इतनेमे ही देववर योदाजी 
लोट आया ओर अपने खड़े खच्को न देखकर पुकारने लगी | . | 
रणा ! क्वासि करोषि कं {पितरिति शरुत्वैव मातुर्वचः साशङ्क विरतो विश्रम्य तामन्रवीत्‌ ! 
मातः क्कणपद्मरगमदहसा पाणिमातप्यते तेनायं नवनीतमाण्डविवेरे विन्यस्य निवोपितः ॥ 
(कन्दैया | कनदैया अरे ओ मेरे वाप ! कह दैः स्या कर रहा हे --माताकी यह वात सुनते ही माखनचोर ` 
¬ > माखन-चरीसे अल थोड़ी देर चुप रहकर यशोदाजीते बोले श्मेया, री नैया ॥ ४ 
भीष्ण डर गये ओर माखन-चोरीसे अलग हो गये । फिर द {> 


9 रज -कद ~ ¢ + ॥॥ + 9 4 ङ क 4 १ 
३ "क~ 
कै ५५५ 4 [५ प 


न ॥ 8 
क क च + ३ भ्य 3 
` "^... । 3 म षि. = रः 4 
=+ _„ , न न = < $ क व "न 





+ ज 
नि इ 


९६६ ¦ श्रीमद्भागवत [ अ० ८ 


म > 9 7) 
^ =-= ~ कान्य ाजकानननननयन्ान्छन्यान्न्का्छन्कनकन्यान्नकाननन्क्छ कक कनकक्क 

















ततस्तु भगवान्‌ कृष्णो वयस्मैतरजवारद्ैः । ये त्रजवासिरयोकै कन्हैया खयं गतान्‌ है, परम सुन्दर 
ओर परम मधुर ¡ अब वे ओर बखराम अपनी ही उग्रके 
ग्वाख्नार्मेको अपने पाय ठेकर खेलनेक्े च्वि व्रजे 
निकर पड़ते ओर्‌ त्रजङी भाग्यवती गोपिर्योको निहा 
करते इए तरह-तरहकं खे खेरते । २७ ॥ उनके 


ष्णस्य गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कोमारचापडब्‌ । व थी वाती 
गोपिर्योको तो वे बड़ी ही सुन्दर ओर मधुर ख्तीं | 

एक दिन स॒व-की-सड इकट्ी होकर नन्दवावाके घर 

शृण्वत्याः किङ तन्मातुरिति होचुः खमागताः।२८। | आयीं ओर यञ्चोदा माताको सुना-सुनाकर कन्हैयाके 


~ ~ ~~~ 
यह जो तमने मेरे कङ्कणे पद्यराग जड़ा दिया दैः इसकी ठ्परसे मेरा हाथ जल रहा था इसी सने इसे माष्ठनके 
मटकेमे डार्करलुञ्ाया था | 
, माता यह मधुर-मधुर कन्दैयाकी तोतटी बोटी सुनकर मुग्ध हो गयीं ओर (आओ बेटा }* एेखा ककर लाटको 
गोदमे उठा ल्या ओर प्यारसे चूमने र्गी । 
>< >< >< >< >< >< 
्षुण्णाभ्यां करकुडमलेन विगठदवाष्पाम्बु दग्भ्यां खदन्‌ हुं हं हूमिति रसुद्धकण्ठकुहरादस्पष्टवाग्विभ्रमः | 
मात्नासौ नवनीतचौयंकरुव॒के प्राग्भर्ितः स्वाञ्चटेनामूज्यास्य सुखं तवैतद खिलं वत्सेति कण्ठे छतः ॥ 
एकर दिन मातने माखनचोरी करनेपर श्यासयुन्दरको धमक्राया, ङया-फटकारा । बस; दोनों नेत्रे ओं यु्ओंकी 
दाडी खग गयी । कर-कमल्ते अखे मल्ने खे । ऊ-ऊ-ऊ करके रोने खगे । गला रुध गया । रभभदसे बोला न्दी जाता 
था । बस, माता यशोदाका धेयं दरट गया । अपने ओचख्ते अपने लाला कन्हैयाका भूद पौखा ओर वड़े प्यारसे गले 
छ्गाकर बोर्ी-लाला | यष सब तुम्हारा ही हैः यह चोरी नदीं है, 


एक दिनकी बात है-पूणचन्द्रकी चोदनीसे मणिमय आगन धुर गया था । योदा भेयाके साथ गोपिर्योकीं 

गोष्ठी जङ्‌ रदी थी । वर्दी खेरूते-खेल्ते छष्णचन्द्रकी दृष्टि चन्द्रमापर पड़ी । उर्होनि पीछेसे आकर यशोदा मैयाका 
चूघट उतार छया । ओर अपने कोमर करसे उनकी चोरी खोलकर खीचने रगो ओर बार-बार पीड यपथपाने 
लगे । भैं दगा, यैं दगा तोतली वोटीसे इतना ही कते । जव मेयाकी सम्म बात नदीं आयी, तद्र उसने सनेदाद्र 
11  इष्टिसे पास वेढी ग्वालिर्नोी ओर देखा । अव्र वे विनयते; प्यारे ुषलाकर शीङ्ृष्णको अपने पास ठे आयीं ओर 
(1  बखी-खल्न | ठम क्या चाहते हो; दूध [2 श्रीकृष्ण-ध्ना? | (क्या बदिया ददी ¢ (नाः । (क्या खुर्वन १ नना | 
1 ` (म्द (नाः । (ताजा माखन १ (नाः ग्वालि्नानि कहा-ध्वेया | रूटो मतः रोओ मत । जो मोगिगे सो देंगी 
0 ` ्ीङष्णने धीरे कदा-ध्धरकी वस्त॒ नदीं चाद्ये? ओर अंगुखी उठाक्रर चन्द्रमाकी ओर संकेत कर दिया । गोपयां 
नरोटी-“अओ मेरे वाप ! यह कोई माखनका खदा थोड़े दह्ीदै ? हाय | हाय | हम यह केसे दंगी ? यह तो प्यारा-प्यारा 
, दंस आकादकरे सरोवरे तेर रहा दै ।› श्रीकृष्णने कहा-भ्मै भमी तो खेखनेके ल्य इस हंको ही्माग रदा दू, शीघ्रता 


करो | पार जानेके पूवेदीप्न्नेलादो। 


4 अब ओं भी मच गये । धरतीपर पवि पीट-पीयकर ओर हार्थो गला पक्रड़-पकड़कर दो-दो” कंहने खगे 
आर भी अधिक रोने खगे | दृखरी गोपिर्योनि कहा--ध्रेटा | रामराम । इन्होने ठमको बहला दिया हं । यह 
जहस नहीं है, य॒तो आकाशम दी रहनेवाला चन्द्रमा है ।› श्रीकृष्ण हठ कर वेठे-“सुञ्चे तो यदी दोः मेरे मनमे 


राजंस न 

इसके ला से तेख की बड़ी खल्व है | अभी दोः, अमी दो | जव बहुत रोने रोः तब यशोदा माताने गोदम उठा 
या अर प्यार करके बोटीं--भेरे प्राण ?| न॒ यह राजहंस दै ओर न तो चन्द्रमा । है यह माखन हीः परंतु तमको 

वृह काठा-काला विष ख्गा दुआ है । इससे बदिया होनेपर मी हसे कोद नदीं खाता 

7 | इ्घ्मे चिप्र कैसे खग गया । बात बदु गयी | मेयाने गोदम लेकर मधुरमधघुर 


न ४ नः गने ५ 
7) § 8 द न 

। ॥-41 | र41-न -र्नपत९ ६ € 

"क ~. "~ +~ >= # ३ 

ॐ 


सहराम वजघ्चणां चिक्रोडे जनयस्‌ दम्‌ ॥२७। 


























४2 ~ च ‡ 


व = # 3 1 र 


+ "क: 
„4 > क 


५ रये 





च क 


४, 


६। + 1 द्य स्र क + "= 
० < 1 शम स्कन्ध १६७ ¢ 


५ # = ऋ च ज ¬= रो 8 5 आ 5 ५ ऋ च ॐ तक = क क ` तः तक वः तो कक क क नकन त ` गमी यकि क 7 21 7 1 77. 171, 1 1 ऋत केकि - ऋः = ऋ == 
1 1) | आ लि भि आ य भि भा ॐ कक जा क कक के चः अमो ७» 9. भक 9 1 7 क = म 


त्सान्‌ भुश्वन्‌ कचिदक्षपरये कोय्षजातहाकषः करतूत कहने लगीं ॥ २८ ॥ “अरी यञ्चोदा ! यह तेरा 
कान्हा वड़ा नटखट हा गया है । गाय दुद्नेका समय 
न होनेपर भी यह वछ्डंको खोठ देता है ओर हम 
डांटती है, तो ठठा-ठटाकर र्देस्ने च्मता है | यह 
खादर्थथ दधि पयः कसिपतेः स्तेमयोगेः । | चोरीके वडे-बडे उपाय करके हमारे मीटे-मीठे ददी-दूध 
चुरा-चुराकर खा जाता ह । केवर अपने ही खाता तो भी 
= एक वात थी, यह तो सारा दही-दूध वानरोको र्ट 
देता है ओर जववेभी पेट भर जानेपरं नहीं खा 
मान्‌ भक्षयन्‌ विभजति स चेन्नात्ति भाण्डं भिनत्ति | पते, तव॒ यह हमारे मार्योको दी फोड़ डाठ्ता है । 
यदि घरमे कोई वस्तु इसे नहीं मिलती तो यह धर्‌ ओर 
घरवार्केपर वहत खीञ्चता है ओर हमारे वर्भ्वोको रुगकर 
भाग जाता है ॥ २९ ॥ जब हम दही-दूधको छीकोपर 
द्रव्यालाभे स गृहपते याल्युपक्रोय तोकवान्‌ ।२९] | रख देती द ओर इसके छोटे-छोटे दाय व्यं तक नही 
पट्च पाते, तत्र यह बड-बडे उपाय र चता हं । कहीं 
दो-वार षीढांको एकके ऊपर एक रख देता है । कहीं 
ऊखल्पर चढ़ जाता है तो की ऊखल्पर्‌ पीड़ा रख देता है, 
हस्त्य रचयति विधि पीटकोद्रराे- ( कभी-कभी ठो अपने किंी साथोके कंघेपर ही चद 
जाता है | ) जव इतनेपर्‌ मी काम नहीं चञ्ता, तव 
यह नीचेसे ही उन बतननोमें छेद कर देता है । इसे इस्‌ 
वातकी पक्ती पहचान रहती है कि किक्च छीक्तेपर किंस 
न्द्रं छन्तनिहित्दयुनः क्िक्यभाण्डषु तद्वित्‌ । । बतनमे क्या रक्ा है । ओर रेसे ठंगसे छेद करना 
शो द-'लखां प्क क्षीरसागरे] 1 - =- -~- = 
श्रीकरष्ण-^्सेया | वह्‌ केला दहै | 
यगोदा-धरेटा | यह्‌ जो तुम दूध देख रदे हो, इसीका एक समुद्र हं 
श्रङृप्ण-धमय्रा | करंतनी गायने दूष दिया होगा, जवर समुद्र बना होगा । 
यश्रोदा-(कन्हैवा ! वह गायका दध नही है |, 
श्राकरष्ण-पअर मया | वम मुञ्चे बहला रही है, मला चिना गायके द्ध केसे ? 
यशोदा-वत्छ | जिषने गारयोमिं दूध बनाया हैः वह गायके विना मी दूघ बना सकत हे ।' 
श्रीकृत्ण-“्मेया ¡ वह कोन है १ 


यश्चादा-ध्वह्‌ भगवान्‌ &; परतु अग ( उनके पस कोई जा नहीं सकता । अथवा “गः कार रदित ) ह |, 
श्रीकरष्ण-५अच्छा दीक दहे, आगे कहो 
यञचोदा-'एक वार देवता ओर दर्यो उ्ड़ई हई । अघुरोको मोदित कसनेके ल्ि भगवान्‌ने क्षीरसागरको 
मथा । मन्द्राचलकर रई बनी । वाुकरि नागक्री रस्सी । एकं ओर देवता खम दूसरी ओर दानव । - ॥ 
श्रकरष्ण-“जेसे गोपियौ ददी मथती ई; क्यो सैषा £ इ - 
9 य॒ञोदा-षदा बेय | उसीषे कालकूट न।मका विष पैदा हुआ ।' „3 ॐ 
्रीष्ण-“मेया ! विष तो सर्पिमं होता हैः दघम कैसे निकला = न छ 
वश्षोदा-्रेट। | जवर शंकर भगवानूने वही विष पौ ख्यः तव्‌ उककी जो फश्य धरतीपर गिर पद्ध, उन्द 
पीकर संपि विप्रधर हो गये । खो बेट ! भगवानृक्ती दी एेसी कोई खीला दैः जिससे दुधमेसे विष निका | _ ४ 








प्क 4 त ( 





॥ 


> "0 
म 
का. ,# 

क 


१, 


(5 ध: 


ह 







्रीक्ष्ण-*अच्छा मेया | यह तो ठीक है ।› ` | 3 
यस्योदा-श्रेय ! ( चन्द्रमाकी ओर दिखाकर ) यह मक्लन भी उसीसे निकला है । इ्स्यि थोड़ा-सा विष इसमे 
मी खग गया । देखो देखो, इसीको लोग कल्क कहते ई । सो मेरे भाण । ठम शरसा ही । ८ स 


कथा सुनते-खुनते द्यामसुन्दरकी अखोमे नीद आ गयी ओर 


मेयने "क. च (=. 
च बन - अ ॥ 
= क. + ( # छ ॥  । र 
8 "न. श 1 
४ < र | = ऋ „न ष त च # = 4 ॥। 
कै + ५५ । ५६ ` कै" दिः . 9 ज र = > जक ~ $ क 3 ५4 ५ १ 
: =^ ¬ 2 म "4 "अ 1» । 
4); पी ग ९ ४५ ध ५ ~ ई सं ५ 3 ~ 9 3 यैः - न च? (९ ॐ ठ न {३ 4 1 
््‌ भ ् < ~ # ; - (५ न ४ ब ~ १३-- ~ ^:५४ ५ भे ८ ४ 2 
न. ४. - 1 + ५ > + द न - † 
1 ॥ १ ¢ # ष्टः न न, # ~ 3 १. ष # 9 र + 
ए, ९* > " ऋ [ॐ ^ १ + ह ~~ = 
ङ्ख ब १ 8 १. क क * 























९६८ श्रीमद्भागवत [अ० ८ 

ननन 
भ्वान्ताभारे घरतमणिगणं खाङ्गमथप्रदीयं जानता है कि किसीको पतातकः न चे | जव हम 
ह अपनी वस्तुओंको बहुत अँघेरेमे छिपा देती ह, तब 
| # नन्द्रानी । तुमने जो इसे बहृत-से मणिमय आभूषण 
पहना रज्खे है, उनके प्रकाशसे अपने-आप ही सव दुख 

देख लेता है । इसके शरीरे भी ेसी व्योति हं कि 
जिससे इसे सव कुछ दीख जाता है | यह इतना 
चालक है कि क्व कौन कहाँ रहता है, इसका पता 
रखता है ओर जव हम सव धरके काम-घन्धोमे उरश्ची 
रहती है, तव यह अपना काम बना केता है ॥ ३२० ॥ 
एवं धष्टयान्युश्चति इहते मेदनादीनि वाह्तो एसा करके मी टिकी वाते करता है-- उच्टे इमे 

ही चोर बनाता ओर अपने घरका माक्कि बन जाता 

है । इतना ही नही, यह हमारे च्पि-पुते खच्छ धरोमे 

{. | मूत्र आदि भी कर देता है | तनिक देखो तो उसकी 
क प ओर बहा तो चोरीके अनेकों उपाय करके काम बनाता 
स्तेयोपाय्विरचितछृतिः सुप्रतीको यथाऽऽस्ते । दै ओर यहो माद्धम ह्यो रहय है, मानो पत्थरकी मूरतिं 

खड़ी हो ! वाह रे मोरे-माठे घ्ाधु ! इप्त प्रकार 

गोपि्या कहती जातीं ओर श्रीकरष्णुके भीत-चकित नेत्रसे 

युक्त सुखकमल्को देखती जातीं । उनकी यह दद्या 

इत्थं च्रोभिः सभयनयनभ्रीश्ुखारो ङ्िनीभि- देकर नन्दरानी यशोदाजी उनके मनका भाव ताङ्‌ 
। लेती ओर उनके हृदयमे स्नेह भौर आनन्दकी बाद आ 
जाती । वे इप्त प्रकार हंसने च्गतीं कि अपने ङ्के 

कन्हैयाको इस बातका उलखाहना भी न दे पाती, डटने- 

व्याख्याता ग्रहसितथुखी नं दयपारन्धुश्रच्छप्‌ ३१) | की बाततक नहीं सोच पातीं*# ॥ ३१॥ 





हि १ 
1 
क 
ॐ न्क व ॥ 
.4 नि 
चक 
ऋ + [व व शि र 
„ " 
त 


काटे गोप्यो यहिं शृटरस्येषु खव्यग्रचित्ताः ३० 


- # 
५३ च 
१ 
क. ॥ 
॥ ४५ [ + 
+ ^ ॥ 
| , ^ ॥॥ 
" क द १ 
५ 
१ 


क] ॥ < न = 
॥ ना प 
चे ॥ ~ , ` कन 
11 
२ च 
छि [वि ~. 6 
ॐ ॐ च 
(= म 
[. 


भे 











> मगवानकती टीलापर विचार कःते समय य वात स्मरण रखनी चादिये कि भगवानूका टीटाधाम, 
(भगवान्‌ लीलापात्र, भगवान्‌का लीलाशरीरं ओर उनकी टीला प्राकृत नहीं होती । भगवानूमं देह-देदीका भेद्‌ 
नहीं है । महामारतर्मे आया है-- 

| न भूतसंधश्चस्थानो देवस्य परमात्मनः । यो वेति भोतिकं देहं छृष्णश्य परसत्सनः ॥ 

(1 सख सर्व॑साद्‌ वदिष्काथैः भौतस्सातविधानतः। सुखं तस्यावोक्यापि सचेखः स्नादमाचरेत्‌ ॥ 

। श्वरमात्माका शरीर भूतससुदायसे बना इआ नहीं होता । जो मलुष्य श्रीङृष्ण परमात्माके शरीरको भौतिक 
, जानता-मानता है, उसका समस्त श्रौत-स्मातं कमेसि बहिष्कार कर देना चादिथे अथात्‌ उसका किंसी मी साज्लीय 
कर्मने अधिकार नहीं है । यतक कि उसका मुँह देखनेपर मी सचैक ८ वसित ) स्नान करना चाये ।' 

। श्राद्धागवतमे दी ्रहमाजीने भगवान्‌ श्रकृष्णदी स्तुति करते इए कडा है-- 
अस्यापि देव॒ वपुषो मदनुशरदस्य स्वेच्छामयस्य न लु॒भूतमयस्य कोऽपि ॥ 


#॥ 
4 नि 


भञजपर कृपा कटनेके ्ि ही यह स्वेच्छामय सचिदानन्दखरूप प्रकट किया है, यह पाश्चमोतिकं 


1 





४. 
+, 







न्रे 










“आपनं 


(ष न ~ 


211 © २1 +< 
1 | व ह. 
न ~4 
क 
1 # + 


षि । ई 
कै 
= वि 
# 
1 
५ 











1; र ॥ि 
(| न्वै चै हा 


` ~ ^ च्छ ` 
अ० € | देश्चम्‌ स्कन्धं १९४. 


(९ 








एकदा क्रीडमानास्ते रामाद्या गोपदारकाः 1 | एक दिन बलराम आदिं ग्ाच्तरा शरीकरष्णके साय 





इसमे यह स्प ह कि भगवान्‌का सभी कुछ अप्राकृत होता है । इसी प्रकार यह माखनचोरीकी खीला 
भी भप्राकृत- दिव्य ही है 
यदि भगवान्‌के नित्य परभ धामे अभिन्नरूपस्रे नित्य निवाक्त करनेवाली निव्यभिद्धा गोप्रििकी दष्टिसे न 
देखकर वेव स्‌।धनसिद्धा गोपिर्योकी दृष्टिसे देखा जाय तो मी उनकी तपस्या इतनी कटोर थी, उनको कट्सा 
इतनी अनन्य शी, उनका प्रेम इतना व्यापक था भौर उनकी ख्णन इतनी सची थी कि भक्तवाञ्छाकदतर्‌ 
प्रेमरसमय भगव्रान्‌ उनके इच्छानुसार उन्दं सुख पूर्हुचनेके व्यि माखनचोरीकी लील। करफे उनकी इच्छित प्रजा 
प्रहरण करे, चीरहरण करके उनका रहा-सहा ग्यवधानका परदा उठा दं ओर राक्ष्कीला करके उनको दिव्य सुख 
पहं चाय तो कोई बडी वात नही है | 
मगवान्‌की नित्यसिद्धा चिदानन्दमयी गोपियोंके अतिर्कि वहृत-सी रेसी गोपि्यां ओर र्थी, जो अपनी 
न्‌ साधनक फएलखख्य भगवानूकी सुक्तजन-वाज्छित सेवा करनेके य्य गापि्योके ख्पमे बवतीणं इई थीं | 
उनमेसे ङु पूवनन्मकी देवकन्या थीं, कुछ श्रुतियाँं थी, कुछ तपरश्ली ऋवे थे ओर कु अन्यथ भक्तजन । , 
इनकी कथ।रं विभिन्न पुराणम मिक्ती है । श्रुतिरूपा गोप्या, जो भनेति नति'के द्वारा निरन्तर परमात्माका 
वणेन करते रहनेधर भी उन्हं साश्नादेखूयसे प्राप्त नहीं कर सकतीं, गोपियोके साथ भगवानके दिव्य रसमय 
व्िहारकी वात जानकर गे पियोको उपाप्तनना करती हैँ ओर अन्तम खयं गोपीरखूपमे परिणत होकर भगवान्‌ 
श्रक्ृष्णको साक्षात्‌ अपने प्रियतमशखूपसे प्राप्त करती दँ । इनमें सुस्य श्रुतिर्योके नाम र्ै--उद्रीता, सुगीता, 
कल्गीता, कलकण्ठिका ओर प्रिपरश्ची आदि । 
भगवान्‌ श्रीरामावतारमें उन्हे देखए पुग्ध होनेवाले--अपने-आप क्षो उनके खरूप-सौन्द यपर न्यौछावर 
कर देनेवाले क्षिद्ध छषरिगणः, जिनकी प्राथनासे प्रपन्न होकर भगवान्‌ने उन्दं गोपी होकर प्रप्त करनेका बर दिया था, 
रनम गोपी्पसे अव्रतीणं इए ये । इसके अतित्कि मिथिकक्ती गोपी, कोसक्की गोपी, अयोव्याकी गोपी -- 
पुटिन्दगोधी, रमवैकुण्ठ, उेतद्रीप आदिको गोपि ओर जाग्न्धी गोपी आदि गोपियोके अनेन यूथ थे 
जिनको वड़ी तपस्या करके भगवानूसे वरदान पाकर गोपीरूपमे अवतीणे होनेका सोमाग्य प्राप्त इआं था । 
पद्मपुराणके पाताल्खण्डमें बहुत-से एेसे ऋषिर्योका वणन है, जिन्होनि बड़ी कठिन तपस्या आदि करके अनेकों 
कल्पोके बाई गोपीष्वरूपको प्राक्त किया था । उनमेसे कुखके नाम निम्नटिवित द-- 
१. एक उग्रतपा नामके ऋषि ये । वे अग्निहोत्री ओर बडे दृदत्रती थे। उनकी तपस्या अद्सुत थी। 
उन्होने पच्चददचाक्षरमन्त्रका जाप भौर रासोन्मत्त नवकिसोर श्यामघुन्दर श्रीकरष्का ध्यान किया था । सो कर्यो 
के बाद वे सुनन्दनामक गोपक कन्था “घुनन्दाः इए । 
२. एक संत्यतपा नामके मुनिं थे । वे सूखे प्तप रहकर द शाश्तरमन्त्रका जाप ओर श्रीराघा नीके दोनों 
हाथ पकड़कर नाचते इए श्रीक्ृष्णका ध्यान करते थे । दत कल्पके बाद वे सुभद्रनापक गोपकी ला # 
भद्राः इए । "र 


ष (न 


३. हरिधामा नामके एक ऋषिं ये । वे निराहार रहकर "कटी कामनीजसे युक्त विंशाश्षरी मनका 














॥* 
` करते थे ओर माधवीमण्डप कोभक-कोमल पत्तौकी शाय्यापर लेटे इए युगल सरकारका व्यान करते थे । तीन ` 
। कल्पक पश्चात्‌ वे सारङ्ग-नाभक गोपके घर ^ङ्गवेणीः नामसे षवतीर्णं इए | = ० 


` ~ जाबालि नामके एक नर्ज्ञानी ऋषि थे, उन्होने एक बार विशाल | वनम प्रिचरते रते एक जगह 
बत बड़ी बावठी देखी । उस बावीके पश्चिम तटपर वड्के नीचे एक तेजखिनी युवती खी कठोर तपस्या कर्‌ री थी 
ई १ स । 












न ॥ 
4 कद + => 


ड ६ 2.2 > 2 
पः ~ 9 < पनः = "र ज त्क ‡ दै १ न 4 १ 
{अः भा० स ख० २. २२- ` ~ > 


क ~ 9 १ ११ छ च #॥ 6 
न्क न "ॐ. 


९ द. & 


1 
न्द, 





~ ~~  ~-~ - 





वह बड़ी खुन्दर थी । चन्द्रमाकी ञुश्र किरणोके समान उसकी चोँदनी चारों ओर छक रही थी | उसका 
नायो हाथ अपनी कमरपर था ओर दाहिने हाथसे वह ज्ञानमुद्रा धारण किये इए थी | जावाव्कि बड़ी नम्रताके 
साथ प्रछनेपर उस तापक्षीने बतलाया-- 
ब्रह्मवियाहमठला योगनिन्द्रेयो च स॒म्यते। साहं दरिपिद्‌ास्भोजक।(म्यया सखचिरं तपः ॥ 
ब्रह्मानन्देन पुण तेनानन्देन ठप्तधीः । चरास्स्िम्‌ वने घोरे घ्यायन्ती पुरूषोखमम्‌॥ 
तथापि ्न्यमात्मानं भन्ये ऊष्णरयि लिना ॥ 

“मे वह व्र्त्रिधा द्वै, जिसे बड़े-बड़े योगी सदा दूदा करते 8 । पँ श्रीक्ृष्णके चरणकमोंकी प्राप्तिके च्वि 
इस धोर वनम उन पुह्षोत्तमका ध्यान करती इई दीर्धकाट्से तपस्या कर रही द्र मेँ व्रह्मानन्दसे परपरणं ई 
अर मेरी बुद्धि भी उसी आनन्दसे परितप्त है । परंतु श्रीक्ृष्णका प्रेम सुञ्चे अभी प्राप्त नदीं इ, इसन्यि मे 
अपनेको इन्य देखती द्रं ॥ त्रमज्ञानी जावालिनि उक्तके चरणोंपर गिरकर दीक्षा ढी ओर रिरि व्रजवीथि्ोे 
विहरनेवाे भगवानक्ता ध्यान करते इए वे एक पैरसे खड़े होकर वड़ी कलेर तपस्या करते रहै । नौ कस्पोके 
नाद्‌ प्रचण्डन।मक गोपके घर्‌ वे ¶चित्रगन्ध।"के खूप प्रकट इर । 

१. कु ध्यजनामकं ब्रहमर्षिके पुत्र ञयचिश्रवा ओर सुवणं देषतचज्ञ ये । उरन्ोने रीर्पाप्तन करके द्री 
ह्त-मन्त्रका जाप कतं इर्‌ ओर सुन्दर कन्दपं-तुस्य गोङकुखवासी दक्त वकी उग्रके भगवान्‌ श्रीङष्णका 
व्यान करते हए षोर तपस्या की । कल्पके वाद्‌ वे त्रजमेँ सुधीरनाशक गोपके घर्‌ उत्पन्न हए । 

इसी प्रकार ओर भी वहत-सी गोपियोंके पूर्वजन्मकी कथां प्राप्त होती है विंस्तारभयसे उन सवका 
उल्ठेख यह नहीं किया गया । भगवान्‌के व्ये इतनी तपस्या करे इतनी ख्गनके साथ कल्पोंतक सधना 
करके जिन त्यागी भगवत्रेमिरयोने गोपियोंका तन-मन प्राप्त किया था, उनकी अभिलाषा परणं करनेके च्वि, 
उन्हें आनन्द दान देनेके ल्यि यदि भगवान्‌ उनको मनचाही लीला करते हैँ तो इसपर आश्चय ओर अनाचारकी 
कौन-सी वात ई ? रासटील्यके प्रसङ्गमे खयं मगघ्रानने श्रीगोपियोसे कहा है- 

न॒ पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां खखघुरृत्यं विबुधायुषापि वः! 

या माभजन्‌ दुजेरगेदण्ङ्खखाः सन्नदच्य तद्‌ वः यरतियातु ख्युना ॥ 
( १० | ३२। ) 
| तुमत लोक ओर परोकके सारे बन्धनोंको काटकर युञ्चसे निष्कपट प्रेन किया है; यदि रैं 
तुम्मेसे प्रत्येके व्यि अच्ग-अकमा भनन्त काक्तक जीवन धारण करके तुम्हारे प्रेमा बद] चुकाना 
चरर तो भी नष्टीं चुका सकता । मेँ तम्दारा ऋणी द्र ओर ऋणी दयी र्गा । त॒म सुश्च जपने साधुखभावसे 
(1 ऋणरद्ित मानकर नौर भी ऋणी बना दो | यष्टी उत्तम है ।' सवलोकमहेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण खयं जिन 
(1 [^ महाभागा गोपियकि ऋशी रहना चाहते ई, उनकी इच्छा, इच्छा होनेसे प्रवं ही भगवान्‌ पूर्णं कर दे-- यह तो 

/ खामाविक दीह । 

भटा विचास्यि तो सद्दी श्रीङृष्णगतप्राणा, श्रीकृष्णरसमावितमति गोपियोके मनकी क्या सिति थी। 
^ गोपिर्योका तन, मन, धन-समी कुछ प्राणप्रियतम श्रीकृष्णका था । वे संतारे जीती थी श्री्ष्णके व्यि, घरमे 
ददतीं थीं श्रीष्णके व्यि भर धरके सारे काम करती थी श्रीकृष्णे व्यि | उनकी निर्म जर योगीन्द दुम पवित 
बुद्धिम शरीम्णके सिता अपना ङुछ या ही नहीं । श्रीकृष्णके व्यि द्वी; श्रीकृष्णको सुख पद्धंचानेके व्यि ही 
आ ध, णकी निज सामप्रीदे ह्वी श्रीकरष्णको पूजकर-श्रीकृष्णको खी देखकर वे खी होती यीं । प्रातःकार निद्रा 
-टनेके समयसे लेकर रातको सोनेतक वे जो कुछ भी करती थी, सब श्रीकृष्णकी भ्रीतिके व्यि ही करती थीं | 
लतकः कि उनी । दा ही होती थी । खप्न जर घुुति दोर्नोभं ही वे श्रीङृष्णकी मघुर ओर 
















= ++ ॥। 
=. 
+> भ 
(+, 4» ~ 


१७० । । श्रीमद्भागवतं [ अ० < 





अ० ८ | दशम स्कन्ध १७१ 











[त 1 7) 


ङान्त लीग देखतीं ओर अनुभव करती थीं | रातको दही जमाते स्मय श्यामघुन्दरकी माधुरी छतिंका ध्यान करती 
हई प्रेममयी प्रत्येक गोपी यह अभिलाषा करती थी क्ति मेरा ददी सुन्दर जमे, श्रीकृष्णके च्ि उदे विरोक म 
वद्िया-सा ओर बहृत-सा माखन निकारं ओर उसे उतने ही ऊंचे छीकेपर रकं, जितनेप्र श्रीकृष्णके हाय 
आसानीसे प्च सके । फिर मेरे प्राणधन श्रीकृष्ण अपने सखार्ओको साथ ठेकर हसते ओर क्रीडा करते इए 
घरमे पदापंण करे, माखन ट्टे ओर अपने सखाओं ओर वंदर्योको दुगं, आनन्दम मत्त होकर भैरे ओंगनमे 
नाच ओर मै किसी कोनेमे छिपरकर्‌ इस टीलाको अपनी खि से देखकर जीवनको सफर करू ओर फिर अच[नक 
ही पकड़कर इदयसे चणा द्धं । सर्दाप्तजीने गाया है-- 
मेया री सोद साखन भवे । जो मेवा पकवान कहति तु, मोहि नदीं रुचि आवे ॥ 
वरज-जुवती इक पादै उादी, सुनत स्यास की बात 1 मन-मन कहति कबहु शपनं घर, दे खौ माखन खात ॥ 
बेड जाइ सथनिर्योके ढिग, सै त्र रहौ छपानी । सूरदास प्रु अंतरजासी, ग्वाछिनि-मन की जानी ॥ 
एक दिन इपामसुन्दर कह रहे थे, 'रैया ! सञ्च माखन माता है; तू. मेवा-पक्वानके च्थि कहती है. परंतु 
मुञ्चे तो बे सुचते ही नहीं ।› वहीं पीछे एक गोपी खडी इयामसुन्दरकी बात सुन रही थी । उसने मन-दी-मनं 
कामना की-- भ्म कव इन्दे अपने घर माखन खाते देखूगी; ये मथानीके पाम जाकर्‌ वैठेगे, तव मेँ चिप रहण ¢ 
प्रमु तो अन्तर्यापी है, गोपीके मनकी जान गये ओर उसके घर पर्हैचे तथा उक्षकरे घरका मान खाकर उसे सुख 
दिया-- गये ध्याम तिर्हि ग्बाह्िनि कै घर | 
उसे इतना आनन्द हआ किं बह एटी न समायी । सद्दासजी गते दै - 
पूरी फिरति ग्वाक्ति मनने री । एूकति सखी परस्पर बातें पायो परयौ क्ट कहं तें री !? 
पुरुकित रोम रोस, गद्गद सुख वानी कदत न आवे 1 णेसो कहा आहि सो सखि री, हम कं क्यो न सुनावे ॥ 
तन न्यारा, जिय एक हमार, हम तुम एके प । सूरदास कटै म्बाछ्ि सखिनि सौं देख्यो रूप अनूप ॥ 
वह सुशीसे छककर भ्रली-ष्टडी फिरने द्गी । आनन्द उसके हृदयमे समा नदीं रहा था । सदेटिपोनि 
पूरा--“अरी, तुचे कहीं कुछ पड़ा धन मिल गया क्या ¢ वह तो यह सुनकर ओर भी प्रेमविद्वल हो गयी । उसका 
तोम-रोम खिल उठा, वह गद्गद ह्यो गयी, गहसे बेटी नदी निकली । सखिर्योनि कडा--*सखि! एेसी क्या बात है, 
हरमे सुनाती क्यो नहीं १ हमारे तो शरीर ही दो हैँ, हमारा जी तो एक दी है --हम-तुम दोनों एक दी खूप हें । भला; 
हमसे छिपानेकी कौन-सी वात है १ तच उस्तके महसे इतना ह्वी निकला--“मने आज अनूप रूप देखा है |° बसु 
फिर वाणी रुक गयी ओर प्रेमे ओप वहने लगे | सभी गोपिययोकी यही दरा थी । 
ज घर-घर प्रगटी यह बात । दधि माखन चोरी करि छे हरि, म्बारु सखा संग खत ॥ 
ब्रज-बनिता यह सुनि मन हरषित, सदन हमार आवै । माखन खात अचानक पावै, सुज भरि उरि छुपावे ॥ 
मनहीं मन अभिलाष करति सब हृदय धरति यह ध्य्रान । सूरदास प्रयु कौ घर मँ ङे, देहौ माखन खान ॥ 
ची व्रज वर-घरनि यह बात । नंदु-सुत, संग सखा छन्द चोरि माखन खात ॥ 
कोड कति, मेरे भवन भीतर, भवर्हिं पठे धाइ । कोड कहति मोहिं देखि र, उतर्िं गए पराइ ॥ 
कोड कठति फिर भोति इरि कौ, देखो अपने धाम । हेरि माखन देडँ आछो, खाइ जितनौ स्याम ॥ 
कोड कहति, में देखि पाऊं भरि धरौ कवार । कोड कहति मै बोधि राखो, को सरे निरवार ॥ 
सूर भ्रु के मिख्न कारन, करति विविध विचार । जोरि कए बिधिक्ौं मनावति पुरुष नंदङ्मार ॥ 


#. 


रातं गोपिर्याँ जाग-जागकर प्रातःकार होनेकी बाट देखतीं । उनका मन श्रीक्ृष्णमें ्ग। रता । प्रातःकाल 
जल्दी-जब्दी दद्व मथकर, माखन ॒निकाल्कर छीकेपर रखती, कहीं प्राणधन आकर कैट न जाय, इसब्यि सब 


काम छोड़कर वे सरसे पहर यही काम करती ओर द्यामसुन्दर्ी प्रतीक्षामे व्याकु होती इर ष 
सोचतीं-- हा ! आज प्राणग्नियतम क्यों रहीं आये १ इतनी देर क्यों हो गयी १ क्या आज इस दासीका धर पति न 










































१७२ श्रीमद्भागवत ` [ अ० € 
| । एः कृष्णो सुदं भक्षितवानिति मात्र न्यवेदयन्‌ ॥२२॥ | खेर रहे थे । उन ठोगेनि मा यञ्ञोदाके पराप्त आकर 
द्भ कहा-- “मा | कन्हैयाने मिद्व खायी है # ॥ ३२ ॥ 
न करेगे १ क्या आज मेरे सर्पण किये हए इस तुच्छ मालनक्ता भोग व्गाकर खयं सुखी होकर सुञचे सुख न 
देगे १ कह्णीं योदा मेयाने तो उन्हें नहीं रोक च्या १ उनके घर तो नौ टख गौ हैँ । माखनकी क्या कभी है | 
मेरे धर तो बे कृपा करके ही आते है !› टन्श्यीं विचारोमि अपि बहाती इई गोपी क्षण-क्षणमें दौडकए द्रवाजेपर्‌ 
जाती, खाज छोडकर रास्तेकी ओर देखती, सखिययोसे प्रूछ्ती । एक-एक निमेष उसके च्वि युगके समान हो 
जाता | रेसी माग्यवती गो पिर्योकी मनःकामना भगवान्‌ उनके घर पथारकर प्रणं करते । 
सरदासजीने गाया है-- 
थम करी हरि माखन-चोरी । ग्वाछिनि मन इच्छा करि पूरन, आपु जे वज खोरी ॥ 
मनम यहे विचार करत हरि, व्रज घर-घर सव जाः । गोकुरु जनम छियौ सुख-छारन, सव्र माखन खाँ ॥ 
बारुरूप जसुमति मोहि जाने, गो पिनि मिखि सुख भोग । सूरदास प्रथु कहत प्रेससों ये मेरे चज खोग॥ 
अपने निजजन त्रनवातियों को सुखी करनेके च्वि ददी तो भगवान्‌ गोकरुर्में पधारे ये । माखन तो नन्दवावाके 
"घरपर कम न था । कखला गौरं थी । वे चाहे जितना खाते-टटाते । परंतु वे तो केवल नन्द्वावाके ही नदी, 
समी व्रजवासि्योके अपने थे, समीको सुख देना चाहते थे । गोपिर्योकी खट्सा प्रर करनेके च्िि ही वरे उनके 
घर जाते ओर चुरा-चुराकर माखन खाते । यह वास्तत्मे चोरी नही, यह तो गोपिोकी प्रूजा-पद्रतिका मगवानूके 
दवारा खीकार था । भक्तव्रसठ भगवान्‌ मक्तकी पूना खीकार कंसेन करं ! 
भगघानकी इस दिन्यीका--माखनचोरीका रहस्य न जाननेके कारण ही कुछ लोग इसे आद््चके 
विपरीत बतखते है । उन्हें प ॐ समश्नना चहिये चोरी क्या वस्तु है, वह किसकी होती है ओर कौन करता 
है | चोरी उसे कहते हैँ जञ किसी दूसरेकी कोई चीज, उसकी इच्छाके विन, उसके अनजानपें ओर अभे भी 
वह जान न पये- पेषी इच्छा रखक्रर छ टी जाती है | भगवान्‌ श्रीकृष्ण गोपियोके धरसे माखन छेते थे उनकी 
` इच्छासे, गोपियोके अनजानमे नद्वी - उनकी जानें, उनके देखते-देप्वते ओर आगे जनानेकी कोई बात ही 
नहीं --उनके सामने ही दौडते हए निकल जाते थे । दूसरी बात मदखकी यह है कि संघार्मे या संप्तारके 
1 ` वाहररेसी कौन-सी वस्तु है, जो श्रीभगवानवी नहीं है ओर वे उसकी चोरी करते हैँ । गोपिर्योका तो सवख 
(| (  शीमगवानूका था ही, सारा जगत्‌ हयी उनका है । वे मटा किसकी चोरी कर सकते है १ हौ, चोर तो बास्तवमे 
वे जोग है, जो भगत्रानकी वस्तुको अपनी मानकर ममता-आसक्तिमे फसे रहते हैँ ओर दण्डके पात्र बनते हैँ | 
'  उपर्यक्त सभी दष्टियोसे यही भद्ध होता है कि माखनचोरी चोरी न थी, भगवानूकती दिष्य टीब्य थी | असले 
^  गोपियोनि प्रेम # अधिकतासे दी मगवान्‌का प्रेमका नाम "चोरः रख दिया था, क्योकि वे उनके चित्तोर तो थे ह | 
जो लोभ भगवान्‌ श्रीकृष्णक्रो भगत्रान्‌ नही मानते, यथपि उन्हं श्रीमद्वागवतमें वर्णित मगवानूकी रीलापर 
विचार करनेक। कोई अधिकार नहीं है, परंतु उनकी दष्टे भी इस प्रसङ्गमे कोई भापत्तिजनक बात नकष है । 
क्योकि श्रीकृष्ण उस मय च्गभग दो-तीन वषंके वन्ये थे जीर गोपिर्थो भत्यधिक स्नेहके कारण उनके एेसे-रेसे 
मधर वेड देखना चाहनी थी । आ।श्चा है, इससे शंकरा करनेवाको कुछ संतोष होगा । --हयमानप्रसाद पोदार 
 #सद्-मधणके देव-- 
(भगवान्‌ श्रीकृष्णे विचार करिया करि सुमे छद सत्वगुण दी रहता है ओर अणि बरहुत-से रजोगुणी कमं करने 
हँ । उसके च्यि थोड़ा-सा ^रज' तप्रहकरलछ | 
२-संस्छत-सादित्यमं पृथ्वीका एक नापर शमाः भी है । श्रीकृष्णने देखा किं ग्वाख्वाङ खुलकर मेरे साथ खेलते 


कम्‌ पमान भी कर्‌ बैठते दै । उनके साथ क्षमां धारण करके ही क्रीडा करनी चादियेः जिससे कोद विध्न 








् 
् 0 
‡ 





25. # 1 -4 । 


ब पड | | 




















र ~क नैक # _ जे 
अ० ८] द्काम स्छन्धे 
सौ गृहीतया करे कृष्गश्रुपारभ्य हितैषिणी । हितेपरिणी यञ्चोदाने श्रीकृष्णका हाथ पकड़ टिया# । उस 


समय श्रीकृष्णकी अखं उरके मारे नाच खी थीं { । 
योदा मैयाने टकर कहा-।।३३॥ शक्यो २ नटखट 
च तू वहत दीव दहो गया है । तूने अकेचेमें छिपरकर श्री 
1 कलान्यदमद्‌न्तास्मन्‌ भवान्‌ भक्षितवान्‌ रहः । क्यों खायी १ देल तो तेरे दक्के तेरे सला क्या कह रहे 
। वदन्ति तावका हेत ङुमारस्तेऽग्रनोऽप्ययम्‌ ।३४॥ | र । तेरं वड, भैया वल्दाऊ भी तो उनकी जोरसे 
ू गाही दे रहे है" ॥ ३४ ॥ 
| श्रीकृष्ण उवाच भगवान्‌ ्रीकृष्णने कदः- माँ ! मैने मिद्धो नही 
खायी । ये सव ठ वक रहै । यदि तुम इन्दीकी 
वात सच मानती ह्यो तो मेरा सह तुम्दारे सामने ही है, 
त॒म अपनी असे देख लः ॥ ३५ ॥ यशोदाजीने 
श व हा-- अच्छी व।त | यदिरेसादहैतो सुह खोढ ।>. 
| याद सत्यगिरं समश पम मे खम्‌ ॥\२५॥ माताके रेसा कहनेपर भगवान्‌ नान ब 
। येवं तदं व्यदेदीत्युक्तः स भगवान्‌ हरिः । खोक दिया । परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्णका देश्य 
यादत्ताव्याहतैशयेः क्रीडामसुजबारुकः ।\३६॥] | अनन्त है, वे केवल लीके लये ही मनुष्यकरे वाल्क 
| १. गृहीत्वाथ करे पु्रमुपा० | 
| ३- संस्कतभापार्म प्रथ्वीको धसाः मी कहते ३ । श्रीकृष्णने सोचा ख रसतोकेदही चुक्रा द, अव रसा-रसका 
आस्वादन ऋ | + | 
४- इस अवतारमे प्रथ्वीका दित करना है । इसस्ि उसक्रा कुक अंश॒ अपने मुख्य ( मुखमे खित ) द्विज . > 
( दतो ) को पहले दान कर डेना चाद्ये । 
५- ब्राह्मण शद्ध सास्विक कर्मम ल्ग रहे रैः अव्र उन्दं असुर्योका संहार करनेके व्यि कु राजस कमं भी करने 


यन्लोदा भयसस्प्रान्दपेशषणाश्चममावद \*२२। 





नाहं भकषितदानम्य रव भिथ्थाभिक्चंतिनः । 





,१,। 


२ नचादिये । यही सूचित करनेके स्थि मानो उन्होने अपने खर्म स्थित द्विजोको ( दा्तोको ) रजघे युक्त किया । 3 
६ प्रहे विष भक्षण किया था; सिद्धी खाक्रर उसकी दवा की । = 
७- पृडे गोपियोका मक्खन खाथा थाः उलाहना देनेपर मिद्धी खा लीः जिससे मुह साफ हो जाय । 9 नः 


८-- भगवान्‌ श्रीकृष्णके उदर रहनेवाङे कोटि-कोरि व्रह्माण्डाके जीव व्रज-रज-गोपि्योके चरर्णोकी रज--ग्रा्त 
कृरनेके व्ि व्याक्रुङ हो र्दे थे ¡ उनकी अभिलखषा पूण करनेके ल्यि भगवान्‌ने भिद्धी खायी । 










९--मगव्रान्‌ स्वयं दी अपने मक्तौकी चरण-रज मुखके द्वारा अग्ने दृदयर्मे धारण करते दै । = 
१०--छोटे बाख्कर ्वभावसे दी भ्द्टीखाखिया कसते दै | | ॥ ५ 
| % यशोदाजी जानती थीं किं इस दाथने मिट्टी खानेमे सहायता की है । चोरका सहायक भी चोर ही है। इसल्यि ` 
¦ उन्दनि दाथ दी पकड़ा । किक ५६५ 
† मगवान के नेत्रमे सूयं ओर चन्द्रमाक्ा निवाक् है । वे कर्मके साक्षी ई 1 उन्दने सोचा कि पता नहीं श्रीङ्ष्ण ` 
अ सिद्धी खाना खीकरार करगे क्रि सुक्र जायगे । अवर हमारा कतव्य कधा | इसी भावक करते नेत्र 


चकरानेखो। 
त {१-मा | भिद्धी खनिके सम्बन्धमे ये सुञ्च अक्ैलेकरा दी नामके रहे दै । मैने 
५ + मलम सम्पूण वि । 


== 
य देख खे ; र्‌ 









क 
ॐ 
[र 


न 3: 
णन वचार किया 1 उसदिनमे मुखम्‌ ' विद्व इः देखकर माताने अपने पने 


अ {3 ट: ¦ 
; ११ द कर.च्थिये | आज म 


नु < # द ् र 
मै अपना सुह खोद्धशाः तव यद अपने नेत्र वंद्‌ कर ङी वचार सुख खोड द्दिया | 


भ" 


९७४ आओीमद्धागवत | अ० € 


नने इए है ॥ ३६ ॥ यञ्चोदाजीने देखा किं उनके महम 
चर-अचर सम््रणे जगत्‌ व्रियमान है | आकाश ८ बह 
सत्य जिसमें किंसीकी गति नही ), दिशार्पँ, पहाड़, 
दीप ओर समुद्रौके सहित सारी प्रथ्यी, बहनेवाटी वायु, 
वेदयुत,अग्नि, चन्द्रमा ओर तारो के साथ सम्पूर्ण ज्योतिरगण्डल, 
जट, . तेज, पवन; वियत्‌ ८ प्रागिर्योके चलने-फिरनेका 
भाकादा ); वैकारिकि अहङ्कारके कार्यं देवता, मन-इन्दरिय, 
प्चतन्मात्राएं ओर तीनों गुण श्रीकृष्णके मुखम दीख 
पड़े ॥ २७-३८ ॥ परीक्षित्‌ | जीव, काल, खभाव, 
कमं, उनकी वासना ओर शरीर आदिके द्वारा विभिन्न 
रूपमे दीखनेवाव्य यह सारा विचित्र संसार, कमपूरणं ब्रन 
ओर अपने-आपको भी यञ्चोदाजीने श्रीकृष्णके नन्हे-से 
खुले इए मुखम देखा । वे वड़ी शाङ्कामें पड़ गयीं || २९॥ 
वे सोचने व्गीं कि ध्यह कोई खमन है या भगवान्‌की 
माया १ की मेरी बुद्धिम ही तो कोई भ्रम नहीं हो गया 
है १? सम्भव दहै मेरे इस वाच्कमें ही कोई जन्मजात 
योगसिद्धि होः ॥ ४० | ।जो चित्त, मन, कर्म ओर 
दवारा दीक-टीक तथा ुगमतासे अनुमानके विषय 
नहीं होते, यह सारा विख जिनके आश्रित है, जो इसके 
परक ह ओर जिनकी सत्तासे ही सकी प्रतीति होती 
है, जिनका खरूप सर्वथा अचिन्त्य है---उन प्रभुको मे 
प्रणाम करती हँ ॥ ४१॥ यहमेव ओर ये मेरे पति 
तथा यह मेरा च्डका है, साय द्वी मेँ त्रजराजकी समस्त 
सम्पत्तर्योकी खामिनी धमपनी हँ ये गोपि्यो, गोप 
ओर गोधन मेरे भधीन है--जिनकी मायासे मुञ्चे इस 
प्रकारकी कुमति घेरे हर्‌ है, वे भगवान्‌ ही मेरे एकंमात्र 











` सात्र द्दहो शिं जगत्‌ स्थास्सु च खं दिश्चः । 
साद्विद्वीपान्धिभूगोलं सवाय्वभीन्दुतारकम्‌ । २७ 
ज्योतिश्वक्रं जलं तेजो नभश्वान्‌ वियदेव च । 
वेकारिकाणीन्दरियाणि मनो मात्रा युणास्नयः ॥३८॥ 
एतद्‌ विचित्रं सह॒ जीवकाल- 
खभावकूमारयशिङ्गभेदम्‌ । 
घलोस्तनो रीक्ष्य विदारितास्ये 
व्रजं सहात्मानमवाप शङ्म्‌ ॥३९ 
कि खप्न एतहुत देवमाया 
किंवा मदीयो बत बुद्धिमोहः। 
अथो अथुष्यैव समार्भकख 
यः कथनोतत्तिकं आत्मयोगः ॥४०॥। 
अथो यथावन्न षितकंभोचरं 
चेतोमनःकमंवचोभिर्गषा । 
यदाश्रय येन यतः प्रतीयते 
सुदुर्विभाव्यं प्रणतासि तत्पदम्‌ ॥४१॥। 
| 18 अहं ममासौ पतिरेष मे सतो 
| | 1 वरजेधरस्थाखिलवित्तपा सती । 




























(| .| 4 १ ४. सगोषनाब मे आश्रय हैमे उन्डीकी दारणमें टः ॥ ४२ ॥ जब इस 
1. यन्माययेत्थं तिः स मे गतिः ॥४२। | प्रकार यशोदा माता श्रृष्णका त्व समञ्च गथ, तत 





सर्वशक्तिमान्‌ सर्वव्यापक प्रमुने अपनी पुत्रस्नेहमथी 
्रष्णवी योगमायाका उनके हृयमें सं वार कर दिया ॥४३॥ 
यश्चोदाजीको तुरत वह घटना भूढ गथी । उन्होने अपने 
दुरे गख्को गोदे उठा ल्या । जसे पमे उनके 
हृदयनें प्रेमका प्प उमइता रता था, चसे ही फिर 
उमडने व्मणा ॥ ४४ ॥ सारे वेद, उपनिषद्‌, सख्यः 
योग॒ ओर भक्तजन जिनके माहात्म्यका गीत गति-गाति 
अवति नहीं - उन्ही भगवानको यशोदाजी अपना पुत्र 


~ = न १५ = # म च 
(व म्यं हा = 2 ¢ ` ९ भगत , ¶ ~य 
उुपगोयमानमाह म्यं हर सामन्यत ट्म, धू | ८१५।। | मानत्‌ थीं ॥ ९५ ॥ 
वे (नि, "दै ४ क + व र. ॐ कै र ६ । ^. ४ य > + । प ॥ # 1 
व् अ, क. ~ ज ~+ ६ 


इत्थं विदिततत्वायां गोपिक्गायां स ईश्वरः । 


कि 
> 
क 


वैष्णवीं व्यतनोन्मायां पूत्रस्नेदम्यीं विथः ॥४३॥ 
 सचोनष्टस्छतिर्गोपी साऽऽरोप्यारो््मातमनजम्‌ । 








1 


१ 


४ 






षि ४ ( 4 व र ॥ 
ररद्वस्नेहकलिरहदयऽऽसीद्‌, यथा परा ॥४४॥ 
~: ५: । 
न -न1 {~ सांख्ययोग - त्वत 
सया चोपनिपद्ध सांख्ययोग) सात्वतः । 
> - ¬, गि), 












अं० € | 


दश्चम स्वान्ध 


विक = च्यु क 


१७५ 








राजोवाच 
नन्दः किंमकरोद्‌ बह्मन्‌ श्रेय एवं महोदयम्‌ । 
यशोदा च महाभागा षपो यस्याः स्तनं हरिः ॥४६॥ 
पितरौ नान्रदिन्देतां दृष्णोद्‌राभकेहितम्‌ । 
गायन्त्यद्यापि कवयो यष्टोकृश्चमरापहम्‌ ॥४५७।॥ 


शरदुक उवाच 

द्रोणो वध्लां प्रवरो धरया सह भायंया । 
करिष्यमाण आदेश्चान्‌ ब्रह्मणस्तपुवाच ह 11४८ 
जातथोरो पहषदषे युं विेशवरे हरौ । 
भक्तिः खात्‌ परम सोके ययाञ्चो दुगंतिं तरेत्‌ \४९॥। 
अरित्वत्युक्तः स भगवान्‌ वजे द्रोणो महायज्ञाः । 
जज्ञे नन्द इति ख्यातो यशोदा सा धराभवत्‌॥(५०॥ 
ततो भक्तिभगवति पुत्रीभूते जनाद॑ने । 
द॒म्पत्योनिंतरामासीद्‌ गोपगोपीषु भारत ॥५१। 
कृष्णो ब्रह्मण आदेशं सत्यं कतु वजे विथः । 


सहरामो वसंक्रे तेषां प्रीतिं खलीलया ॥५२॥ 


~< 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्कन्ये पूर्वीर 
विश्वरूपदरानेऽष्टमोऽष्यायः ॥ ८ ॥ 


- "वकण अ. ॐ 


राजा परीश्चित्‌ने ए--भगवन्‌ ! नन्दवावाने रेक्षा 
कौन-सा वहत वड़ा मङ्गठमय साधन किया था १ ओर 
परममाग्यवती यदोदाजीने भी रेसी कौन-सी तपस्या की 
थी, जिसके कारण खयं भगवानूने अपने श्रीमुखसे 
उनका स्तन-पान किया ॥ ४६ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णकी 
वे वाल-लीलारं, जो वे अपने रेधय ओर महत्ता आदिको 
छखिपाकर ग्वाच््ार्खमे करते है, इतनी पवित्र हँ कि 
उनका श्रवण-कीतन करनेवाठे लोगोके मी प्षारे पाप- 
ताप शान्त हयो जाते है । त्रिकाब्दीं ज्ञानी पुरुष आज मी 
उन शा गान करते रहते हैँ । वे ही टीखपएं उनके जन्मदाता 
माता-पिता देवकी -वदुदेवजीको तो देखनेतकको न पिलीं 
ओर नन्द-यशोदा उनका अपार सुख ट रहे हैँ ! इसका 
क्या कारण है १॥ ४७ ॥ 
भीट्युकदेव जीने कदा परीक्षित्‌ ! नन्दवावा पूरव 

जन्ममें एक श्रेष्ठ वघ्ु थे । उनका नाम था द्रण ओर 
उनकी पत्नीका नाम या धरा ! उन्दने ब्रह्माजीके आदेशो 
का पान करनेकी इच्छसे उनसे कहा-॥ ४८ ॥ 
८भावन्‌ | जब हम प्रथ्ीप्र्‌ जन्म छे, तव जगदीश्वर 
भगवान्‌ श्रकृष्णमें हारी अनन्य प्रेममयी मक्ति हो-- 
जिस भक्तिके द्वारा संसारम लोग अनायाक्त ही दुगतिरयोको 
पार्‌ कर जते हैः ॥ ४९, ॥ ब्र्माजीने कटा--“्े्ता ही 
होगा । वे ही परम यख भगवन्मथ द्रोण त्रजमें पैदा 
इए ओर उनका नाम इआ नन्द्‌ । ओर वे ही धरा इस्‌ 
जन्ममे यशोदाके नामसे उनकी पत्नी इई ॥ ५० ॥ 
परीक्षित्‌ | अव इस जन्ममें जन्म-मृल्युके चक्रसे छुडाने- 
वाले भगवान्‌ उनके पुत्र इए ओर समस्त गोप-गोपियोकी 
अपेक्षा इन पति-पत्नी नन्द ओर ययोदाजीका उनके प्रतिं 
अत्यन्त प्रेम इआ ॥ ५१ ॥ ब्रह्माजीकी बात सत्य 
करनेके व्यि भगवान्‌ श्रीकृष्ण बररामजीके साथ त्रजमे 
रहकर समस्त ब्रजवाधियोको अपनी बाल-कीलासे.आनन्दित्‌ 
करने लगे ॥ ८२ ॥ 


र 
२ 


ज 


॥ 


१७६ 9 श्रीमद्भागवत | अ० ९ 


न= ज्ज 7 








अथं नवमोऽध्यायः 


्रीरष्णका ऊखङसे वोधा जनः 























श्रीं ॐ उतत भरीश्युकदेवजी कहते द-प धिक्षित्‌ | एक्‌ समय- 

९ | वा है रोद ज ल्छ्ना त॑ 
एकदा गृहदासीषु योदा नन्दमेहिनी । २ य नन्द्रानी {जीने र दाति्यको ध 
< ह व हद पमि ल्गा दया अर खय ( अपने ढाटाः 
कसान्तरनियुक्तास निम॑भन्थ्‌ खयं दधि ॥। १॥ | मक्खन लिने किये ) ददी मने छी # ॥| १ ॥ 
यानि यानीह गीतानि तद्वाख्चस्तिानि च | मैने तमसे अवतक्र मगवानूकी जिन-जिन वाट-टीाथँका 
दधिनिभन्थने कारे खरन्ती तान्यायत ॥ २॥ | वण॑न किया हैः दभिमन्थनके समय वे उन सवका 
क्षौमं वासः पृथुकटितटे स्मरण & करती ड 1 र जाती थीं ५ । २॥ 
वे अपने स्थूल कटिमाग वँधकर रेशमी ब्हँगा 
बिभ्रती घत्रनदधं ॥ स , 
५ ` व पहने इए थीं । उनके स्तर्नोमिंसे पु्र-स्नेहकी अधिकतासे 
2. भुनस्नहस्युतङच दूध चूताजारहाथा ओरवे कौपिभीरहेये | नेती 
जातकस्य , च सुभ्रूः | खीचते रहनेसे वेहिं डु थक गयी थीं | हार्थोके कंगन 
रज्ज्वाकषश्रसशुजचलत्‌- ओर कानोके कण्टक दिक रहे थे । सुंहपर प्तीनेकी 
कङ्कण इण्डङे च॑ दं श्चक्क रदी थीं । चोटीमें गुथे द्रए माठतीके न्दर 
वक्त्रं कबरविगृख- पुष्प गिरते जा रहे थे । खुन्दर मौहोवाटी यशोदा इस 

निसं 
- न्माङ्ती मन्थ | ३ ॥ | प्रकार दश्ची मधरदीथी {॥३॥ 








१. बादरायणिरुवाच | | 
# इस प्रसङ्गमे “एकर समयः का तत्पयं है कार्तिक माघ । पुरार्णोमे इसे '्दामोदरमासः कहते है । इन्द्रयागके 
` अवसरपर दासिका दूरे कामोमं र्ग जाना खामाविक है । "नियुक्तासु इश्च पदसे ध्वनित होता दै किय #दा माताने 
॥ जान-वृल्चकर दाति्याकरो दूसरे कामम ख्णा दिया । ध्यशोद्‌ा- नाम उल्छेख करनेका अभिप्राय यह्‌ टै क्रि अपने विश्द्ध 

॥  वात्सव्यप्रेमके व्यवहारसे पडेशय॑शाटी भगवानूको मी प्रेमाधीनता, मक्तवद्यताकरे कारण अपने मक्तेकि दाथ वध जनेका 
॥  . (यदा यही देती दै । गोपराज नन्दकं वात्सस्य-परेभके आकर्षणसे सचिदानन्द्-परमानन्दस्वलूय श्रीभगवान्‌ नन्दनन्दनरूपे 
^ ` जगतमे अवतीणं होकर जगत्‌के खोगोको.आनन्द प्रदान करते द । जगतो इस अप्राकृत पस्मानन्द्का रसास्वादन कराने 
139: ^ नन्दवावा ही कारण ह । उन नन्दकी शदिणी होनेते इन्दं नन्दगेहिनी" कहा गया है । साथ ही (नन्दगेहिनी, ओर “खयं? 
¢ येदो पद्‌ इस बातके सूचक द कि दधि-मन्थनक्र्म उनके योग्य नदींहै । फिर भी पु्र-सेहकी अधिश्रतासे यह सोचकर 
कि मेरे लखको मेरे हाथका माखन ही मातादहैः वे खयं ही दधि मथरदीदै। 
¦ इस इरोकमे भक्तके खरूपका निरूपण है । शरीरसे दधिमन्थनरूप सेवाकर्म हो रहा टैः हृदये सरणकी धारा 
र ं ५८ ्रवादित हो रदी है, वाणीरमे बाक्चरि्का संगीत । भक्तके तनः मनः वचन--खव अपने प्यरारेी सेवा संखन दै । 
स्नेह अभूतं पदार्थं है; वह सेवाके रूपमे ही व्यक्त होता दे । स्नेदके ही विलसविशेष दैत्य ओर संगीत । योदा मैया- 
वनम इस समय राग ओर भोग दोनों ही प्रकट ई । 

1 कमस रमी र्गा डोरीसे ककर वेधा हआ है अर्थात्‌ जीवनमे आलस्य; धमाद, असावधानी नहीं है । सेवा- 
मम पूरी तरता हं । रमी उदगा इतीलियि पहने ई कि किसी प्रकारकी अपवित्रता रह गयी तो मेरे कन्दैयाको कु हो 
नधा = 

ताके छदयका रप-सनेह-- दूष सनके यह आ खगा हैः चुचुआ रदा ई बाहर कोक रहा दे । व्यामघुन्द्र भावे, 
की इष्टि पले सुदचपर पड़े ओर वे पठे माखन न खाकर मुच दी पार्वे--यी उसकी लारशा डे 
स्तनके कापनेका वि भी कीं मुन्ने नीं पिया तो | 


१४. 1 क) 
। ति ४ 
(क १३ 
< अर 


ट | ह 
= 4 
॥ दः मन 





॥ ~+ 





। “क, 


४ त "श ज्क २ | १.४ 
+ १२, >) 49. |+ नि ॥॥ ४ 


(> अ 











तै ॐ ` ४ ५२५ के ॐ ` 
अ० ९.  दश्चेम स्कन्ध १७७ 
तां स्तन्थकाड आक्षा मध्नन्तीं जननीं हरिः | उसी समय भगवान्‌ श्रीकृष्ण स्तन पीनके चिं दही ५ 


मथती इई अपनी माताके पाक्त अये । उन्होने अपनी माताके 


गृहीत्वा दधिमन्धानं न्यषेधत्‌ प्रीतिमावहन्‌ ।। ४ ॥ | हृदये प्रन जोर आनन्दको ओर भी वदति इए ददीकौ 


तद्ुतारढपपाययत्‌ रः मधानी पकड़ ठी तथा उन मेमनेसे रोक दिया | ४. ४ ॥ 
श्रीकृष्ण माता यश्चोदाकी गोदमं चद्‌ गयं | वात्सल्य 
स्मेहस्वुतं षखितमीक्षती खम्‌ । अधिकतासे उनके स्तनोसे दृध तो खयं न्नर ही रहा घा । 


वे उन्हं पिकने व्गीं ओर मन्द-मन्द्‌ मुक्तकानसे युक्त उनका 
मुख देखने व्गीं । इतनेमं ही दूसरी ओर अगीटीपर्‌ 
बु्छि्यमाने पयसि त्वधिभिते ।। ५ | सखे इए दमे उकान आया । उसे देखकर यञ्चोदाजी 
उन्दे अवृक्त ही छोडकर जल्दीे दूध उतानेके च्वि 


अत्प््त्छल्य अदन सा यया- 


संजातकोपः स्फुरितारुणाधुरं ची गयीं  ॥ ५ ॥ इससे श्रीकष्णको ङुछ क्रोध आ 
| गया | उनके खक्-खठ होऽ फड्कने खगे । उन्हे दतिंसे 
हंदश्य दद्धिदंपि मन्थभाजनय्‌ दवाकर श्रीङ्ृष्णने पास्त दी पडे इए रोदेसे ददहीका 

१, सृतम्‌ | २. स जा० | ३. धरः। 


ण ओर कुण्डल ना च-नाचकर मेवाको बधाई दे रहे द । यशोदा मेयाके हार्थेके कङ्कण इसलिये ञ्चकरार ध्वनि 
कर रे दै फिवे आज उन हाथमे रहकर धन्यदहो रेदैकरिजो हाथ भगवानूकी सेवामे खे द । ओर कुण्डल योदा 
मेयाकरे सुखे ीव्ध-7न सुनकर परमानन्दते दिकते हुए कानोकी सफर्ताकी सूचना दे रदे हं । हाथ वदी धन्य ई, जो 
भगवानकी सेवा करं ओर करान वे धन्य है जिनमे भगवान्‌के टील-गुण-गानक्री खधाधासा प्रवेश करती रदे । दपर स्वेद 
ओर माटतीके पुष्पके नीचे गिरनेका ध्यान माताको नदीं है । वह श्ङ्गार ओर शरीर भूक चुकी द । अथवा मालतीके पुष्य 
सयं दी चोदि टकर चर्णोमे गिर रदे द किं एसी वात्सल्यमयी माके चर्णोमिं दी रहना सोभाग्य है, हम सिरपर रहनेके 
अधिक्रारी नर्द | 
ॐ हदयमे लीराकी खखस्परतिः हदाथते दधिमन्धन ओर मुखसे खीखागान-- इस प्रकार मनः तनः वचन तीनोका 
श्रीकृष्णक्रे साथ एकतान संयोग ॒ददोते ही श्रीकृष्ण जगकर ^मा-मा? पुकारने खो । अत्रतक्र भगवान्‌ श्रीकृष्ण सोये हुए-ते 
भे | माक्ती स्नेह-साधनाने उद जगा दिया । वे निरंणते सगुण हए? अचकर्ते च हुए निष्कामस्े सक्राम इए; 
स्ने्टके भूखे-प्यासे माके पास आये । क्या दी सुन्दर नाम दै--^स्तन्यकामः | मन्थन करते समय अये; वेटी-डाखीके 
पास नहीं | 
सर्वत्र भगवान्‌ साघनकी प्रेरणा देते दैः अपनी ओर आङ्रष्ट करते ई; परत मथानी पकड़कर मेयाको रोक 
ख्य । भमा | अव तेरी साधना पूरणं हो गयी । पिष्ट-पेषण करनेते क्या खाम १ अव्र मै तेरी साधनाकरा इससे अधिक मार 
नदीं सह सक्ता ।' मा प्रेमसे द्र गयी- निहार हो गयी- मेरा खला मुञ्चे इतना चाहता हें । | 
{ मैया मना करती रही- ^नेक-सा माखन तो निकाठ छने दे ।' “ऊँ ऊँ, मै तो दुघ पीङगा.--दोनों हाथेसि ` 
मेयाकी कमर पकड़कर एक पाव घुटनेपर रक्खा ओर गो दमे चद्‌ गये । स्तनक्रा दूष बरस पड़ा । मेया दूध पिखने क्गीः 
लखा मुखकराने रोः, अखे मुसकानपर जम गयीं । ईक्षती" पद्का यह अभिप्राय ह कि जवर लाखा मह उठाकर देखेगा 
ओर मेरी अंखिं उसपर ख्गी मिटंगी तव बड़ा सुख होगा । न 
॥ ` सामने पद्मगन्धा गायका दुध गरम हो रहा या । उसने सोचा--^स्नेदमयी मा ययोदाका दुध कभी कम न होगा श + 
स्यामयुन्द्रकी प्यास कमी बुञ्ेगी नीं । उनम परस्पर होड ख्गी ३ । मँ बेचारा युग-युगका, जन्म-जन्मका ्यामसुन्द्रके 
होर्टोका स्प करनेके ल्थि व्याकुल तप-तपकर मर रहा द्र । अब इस जीवनसे क्या छाम जो श्रीकृष्णके काम न अवे । ` 
4 इससे अच्छा है उनकी ओंखोके सामने आगम कूद पड़ना ।' माके नेत्र पर्हच गये । दयाद्र॑ माको भीङृष्णका भी \ ध्यान नं ध 
रदा; उन्द एक ओर डाल्कर दौड़ पड़ी । भक्त भगवानूको एक ओर रखकर भी दुखि्ोकी रक्षा करते ई । ` | 
अतृप्त हीरह गये | क्या भक्तोके हृदय-रससे, स्नेहसे, उन्दै कभी तसि हो सकती । ५. | क ग ए 
` . दान अवत] न <> 3 ५ 
ं > र र 4 


+, 






















१७८ श्रीमद्भागवत | अ० ९ 








7 प नि नि 77 








भिचा स्षाश्वुदेपदश्मना रहो मटका फोड़-फाड डाव; बनावरटी ओप अखे भर - 
जघास हेयङ्गवमन्तरं गतः | ६ ॥ | व्ि ओर दूसरे धरम जाकर अकम बाती माखन 
उत्तायं गोपी सुशं पयः एनः ४६. 
-+ 9 यशोदाजी ओट हए दूधको उतारकर | फिर मथनेके 
प्रविस्य सदस्य च दध्यमत्रकप्‌। घरमे चटी आयां । वयँ देखती हैँ तो दद्ीका मटका 
भरं विलोक्य खसुतसख कमं त- ( कोरा ) टुकडे-टुकड़े हो गया है । वे समञ्च गयीं 


1 कि यह सव मेरे खाकी ही करतूत है | साथदही 
अह त चा रयत =; =+ स, 
हास तं चापि च तत्र पश्यती ॥ ७॥ | ठ- वहा न देखकर यञ्चोदा माता हने च्गी | ७ ॥ 


उद्वरूडघेरूपरि व्यवखितं इधर-उधर दंढनेपर पता चा कि श्रीकृष्णं एक उच्टे 


मरकाय कामं ददतं क्षिचि स्तय । इए ऊखञ्पर खड़े हैँ ओर छीकेप्रका माखन ले-खेकर . 
इङ्गय बदराको खृ्र ढ्या रहे हँ । उन्दं यह भीडर है कि 
धं चोयेविशङकितेकषणं कीं मेरी चोरी खुर न जाय, इसव्यि चौकन्ने होकर 
निरीक्ष्य पथात्‌ इखतमागमच्छनैः ॥ ८ ॥ | चारो ओर ताकते जाते ह । यह देखकर योदारानी 
पीछेसे धीरे-धीरे उनके पास जा पर्ची + ॥ ८ ॥ जव 





तामात्तय्टं प्रसमीक्ष्य सत्वर श्ीकृष्णने देखा कि मेी मा हाथमे छदी व्ि सेरी ही 
स्ततीऽवरुद्यापससार भीतवत्‌ । ओर आ रही है, तव श्चटसे ओखटीपरसे कूद पड़ ओर 



























# श्रीकृष्णके होठ फडके । क्रोध होर्ठोकरा स्प पाकर कृतार्थ हो गया । लाल-खल होट उतरेत-द्वेत दूधकरी ्दुदियोचे 
द्वा दिये गयेः मानो सत्वगुण रजोगुणपर यासन कर रहा हो; ब्राह्मण क्ष्चियक्रो रिक्षा दे रदा दो । वद्‌ क्रोध उतरा 
दधिमन्थनके मटकेपर । उसमे एक असुर आ बेटा था । दम्भने कदा-कामः क्रोध ओर अतृप्तिके बाद मेरी वारर है । 
वृह असु. वनक्रर अ्खोमे छल्क आया । श्रीकृष्ण अपने भक्तज्नोके प्रति अपनी ममताकी धारा उडेख्नेके च्ि 
क्या-क्या भाव नहीं अपनते ये कामः क्रोधः छोभ ओर दम्भ मी आज ब्रह्म-संस्प्य प्राप्त करके धन्य हो गये| 
श्रीकृष्ण घरमे धुस्कर वासी माखन गयकने गे मानो मको दिखा र्देदहोँकिं मे कितना भूखार्रं। 


प्रेमी मक्तौके “पुरुषां भगवान्‌ न्दी दै भगवानकी सेवा है । ये भगवान्‌की सेवाके ल्यि मगवान्‌का भी त्याग 
कर सकते ह । मेयाके अपने हार्थो दुहा हा यह्‌ पद्मगन्धा गायका दूध श्रीकृष्णके ल्थि ही गरम हो रहा था । थोड़ी 
देरके बाद ही उनकरो पिना था । दुध उफन जायगा तो मेरे दला भूखे र्दगे--रोयंगेः इसील्यि माताने उन्द नीचे 
` उतारकर दुधको सभाय । | 
न य्लोदा ` माता दूधके पास पर्ची । पेमक्रा अद्भुत दद्य ! पुत्रको गोदसे उतारकर उसके पेयके ग्रति इतनी 
प्रीति च्या १ अपनी छातीका दुघ तो अपना हैः वह कहीं जाता नहीं है । परंतु यह सदलं छटी हुई गार्येके दूसे 
पालित पद्मगन्धा गायका दुध फिर कर्हा मिञ्ेगा १ बरन्दावनका दूध अप्राकृतः चिन्मयः प्रेमजगत्‌क्रा दुष--माको आते देखकर 
शमे दब गया । “अदो | आगमे कूदनेका सङ्कर्प करके मैने माके स्नेदानन्दमे कितना बड़ा विध्न डाला १ ओर मा 
अपना आनन्दं छोडकर मेरी रक्चाके स्थि दोडी आ रही दै । सन्ने धिक्छार है ।› दूघका उफनना वद्‌ हो गया ओर वह 
तत्का अपने स्थानपर बठ गया | 
“मा । उम अपनी गोदमे नहीं बेठाओगी तो मँ करिसी खल्की गोदमे जा बेदंगा?- यदी सोचकर मानो 
या उच्टे ऊखच्के ऊपर जा वेठे | उदार पुरुष भे ही खलकी संगतिमं जा बेठ, परत उनका यील- 1 
बदलता नदीं है । ऊखल्पर बैठकर भी वे बन्दर्तोको माखन रबोयनि छो । सम्भव है रामावतारके प्रतिजो 
जतारा भाव उदय इथ था? उसके कारण अथवा अभी-अभी क्रोध आ गया थाः उखका प्रायञ्चित्त करनेके स्यि | ५ 
 आकृष्णके नेत्र ईः 1 १ ध्यान करने योग्य । वैसे तो उनके रुढितः कक्तिः छित्तिः वलित, चकित ` 
कारके ध्येय नेत्र है परं ये प्रमी जनेकि द्यम गहरी चोट करते ह । 


2 कः 





ग्ज ट्र 
~ गन्् ६५ ५ # व 
कक क ट ४ 
कमः) ७4 क 
#, ४. १ - रि 
ॐ 


र. - न 





` = ऋ ह 
> ॥ #-~ * = त 


॥ 


॥१,। १9 । - 





अ० ९ | दुश्चम स्कन्धं १७९ 
गोप्यन्वधावन्न यमाप योगिनां डरे एकी मति भागे । परीक्षित्‌ । वडवे योगी 
तपस्यके द्वारा अपने मनको अस्यन्तं सुस्म ओर द्ध 
बनाकर भी जिनमे प्रवे नहीं करा पाते, पानेवी दात 
तो दूर्‌ रदी, उन्हीं भगवान्‌८क्ते पीछे-पीछे उन्हें पकड्नेके 
य्यि यशोदाजी दौडी +| ९ ॥ जव इस प्रकार माता 
यशोदा श्रीक्रष्णके पीछे दौडने गी, तब कुछ ही देरमे 
वडे-बड़े एवं हिख्ते इए नितम्बोके कारण उनकी चार 
ससित धीमी पड़ गयी । वेगसे दौडनेके कारण चोटीकी गौठ 
जवेन बिसंशितङ्घेन्धन- टीढी पड़ गयी । व॑ ्यो-ज्योँ अगे वदतीं, पीछे-पीछे 
चोटीमे गुथे इए = गिरते जाते । इस प्रकार सुन्दरी 

पराखृ्छत्‌ ।५०।। | यञ्चोदा ज्यो-व्यों करके उन प्रकड़ सकीं{ ॥ १० ॥ 
श्रीकृष्णका हाथ पकड़कर वे उन्हे उराने-धमकारे व्गीं | 

कृतागसं सं प्रुदन्तमक्षिणी उस समय श्रीकृष्ण श्चौकी वडी विलक्षण हो रही थी । 
| अपराध तो किया ह्वी था, इसव्ि रुई रोकनेपर भी 

न रुकती थी । हाथोसे अंखिं मर रहे थे, इसव्यि संड- 
प्र काजल्की स्याही फेर गयी थी । पिटनेके भयसे 
ओंँखं ऊपरकी ओर उठ गयी थीं, उनसे व्याङ्टता 
सृचित होती थी [॥ ११॥ जब यरोदाजीने देखा 
कि लछछा बहत डर गया है, तब उनके इद यपे वात्सल्य 
स्नेह उमड़ आया } उन्होने छड़ी फक दी । इक्षके वाद 








शमं ॒प्रवेष्टं तपसेरितिं मनः ॥ ९॥ 
अन्वश्चमाना जननी वचृहचल- 


च्छरोणीभराक्रान्तगतिः सुमध्यमा । 


च्युतप्रघूलादुगतिः 


क्यन्तमज्ञन्मपिणी सखपाणिना । 
उद्वीक्षमाणं भयविह्वलेष्णं 
हस्ते गृरीत्वा भिषयन्त्यवाशुरत्‌ ।११।। 


स्यक्त्वा यष्टि सुतं भीतं षिज्ञायाभ॑कबत्सला । 
तो यह्‌ कहीं भाग जायगा ) । परीक्षित्‌ ! सच पूरो तो योदा 


इयेष किर तं बद्धुं दा्नातद्वीयंोविदा ॥१२। मेयाको अपने वाल्कके रेशचर्यका पता न था § ॥१२॥ 


मीत होकर भागते हुए भगवान्‌ दं । अपूव ज्चाकी ह ! एे्वय फरो तो मानो मेयाकछुूबात्सस्य प्रेमपर्‌ न्योदावर 





कृरके व्रजके बाहर दी फक दिवा है । कोई अपुर अख्न-शस्र ठेकर आता तो सुदशन चक्रका सरण करते । मेयाश्टी 
छड़ीका निवारण करनेके च्यि कोई भी अख्र-शल्न नदीं | भगवानकी यह भयभीत मूतिं कितनी मधुर दै | घन्य है 
इस भयको | 


| माता यशोदाके दरीर ओर श्रंगार दोनों दी विरोधी हो गये- तम प्यारे कन्दैयाको क्यों खदेड्‌ रही हो | 
परंतु मेयाने पकड़कर दी छोड़ा । 


‡ विश्वके इतिहासे, भगवान्‌के सम्पूणं जीवनमे पटी बार स्वयं विदवेश्वर भगवान्‌ माके सामने अपराधी बनकर 
खड़े हुए दै । मानो अपराधी भी म ही हू--इस सत्यका प्रत्यश्च क्या दिया । बाय दाथ दोनौ अंखिं रगङ्-रगड्शर 
मानो उनसे कदद्ना चाहते इ किं ये किसी कमके कत्त नहीं ह । ऊपर इसच््यि देख रहे दै किं जव माता ही 
वीयनैके ल्यि तैयार है, तव्र मेरी सहायता ओर कौन कर सकता है १ नेन भये विहर रो रहे ईँ, ये भके ही कड दै कि 
नने नहीं किया; हम केसे कदं । फिर तो लीग ही बद हो जायगी | 


माने ऊजय--अरे, अशान्तप्रकृते ! बानरवन्धो | मन्थनीस्फोरक !। अब वुस्ने मक्खन कसि मिञेगा १ आज ` 


सोचा कि इसको एक वार रस्सीसे बोध देना चाहिये (नदीं ` 


म तञ्चे एेसा वाधूगी, एसा वोधूगी किनतो तू ग्वाल्वरारौके साथ खेल ही सकेगा ओर न माखन-चोरी आदि ऊधम. 


ही मचा सकेगा । 


| ६ (अरी मया। मोहि मत मार ।' माताने कदहा--^्यदि वज्ञे पिटनेका इतना र था तो मटका क्यौ फोड़ा १ 
 श्रीङ्ष्ण-- ‹अरी मेया ! म अब एेसा-कमी नदीं करूगा । तू. अपने हाथसे छड़ी डाक देः | । 


4 








| १८० भीमद्धागवते [ अ०९ 
। ( ॐ 0 © ते 
/ न चन्तनं बहियेश्य न पूवं नापि चापरम्‌ । जिसमे न वा है न भीतर, न आदि है 
ओर न अन्त; जो जगत्‌के पहले भी ये, वादमें भी 
ध. ९ ९ = = वा ~~~: 


पू्ापरं हिधान्तजंयतो सो जगच्च यः || ९३ | रंगे; इस जगतके भीतर तो हैँ ही, बाहरी र्मम भी 
हे; ओर तो स्या, जगते यमे मी खयं वदी हैँ; # 
यही नह, जो समस्त इन्द्रियो से परे ओर अव्यक्त है 
उन्डां भगवान्‌को मनुष्यका-सा ख्य धारण केरनेक 
कारण पुत्र समञ्चकर यरोदारानी रस्सीसे ऊख ठीक 
वेसे ह्वी वध देती है, जसे कोई साधारण-ता बाख्क 


| 
ठ 6 | | दो ॥ १२-१० ॥ जव माता यद्योदा अपने 
तड्‌ दम्‌ चचकमालसख खानक छतगस्ः । | ऊधमी ओर नटखट ज्ड्वेको रस्टीसे वँधने 


| ठगी, तव व्ह दो अंगु छोटी पड़ गयी | तव 
दयङ्गलोनसभूत्तेन संदधेऽन्यच्च गोपिका ।१५। | उन्दोनि दूसरी रसती लाकर उसमे जोडी† ॥ १५ ॥ 


श्रीङष्णका मोटापन देखकर जैयाकरा हृदय भर जाया, वारछव्य सेहे सयनम ज्वार जा गना [ इ उन जनी ~ 
लखा अत्यन्त उर गया हे । करी छोड़नेपर यह भागक्रर वनसे चख गया तो कटा-कहा गटक्रता फर्गाः चखा-प्यासा र्हमा। 
इसय्थियि योधी देरतक वोधकर रख दर । दूध-माखन तेयार होनेपर मना दूगी । यदी सोच-विचारकर माताने वोँधनेका निश्चय 
किया । बाधनेम वात्सस्य ही हेतु था । 


(२16 भगवानके एेदवयका अज्ञान दो प्रकारका होता है, एक तो साधारण प्राक्त जीरवोको ओर दूरा भगवान्के निल्य- 
॥ (१; सिद्धः प्रेमी परिकरको । यशोदा मेया आदि भगवान्‌की स्वरूपभूता चिन्मयी टीलाके अप्राकृत नित्य-सिद्ध परिदर ई ¡ भगवान्‌ 
| । प्रति वात्सल्यभावः शिद्य-प्रेमकी गादृताके कारण ददी उनक्रा एेदवयं-्ञान अभिभूत दो जाता है; अन्यथा उनसे अज्ञानकी 
सम्भावना ही नहीं दे । इनकी सिति तरीयावस्था अथवा समाधिका भी अतिक्रमण करके सहज प्रेमे रहती द । वर पराङ्घत 
अज्ञानः मोहः रजोगुण ओर तमोगुणकी तो बात दी क्या, प्राकृत सत्वकी भी गति न्दी ह । इसय्ि इनका अज्ञान भी 
भगवान्की टीलाकी सिद्धिके ल््यि उनकी टीलराश्चक्तिका ही एक चमत्कारविरोष दै । 


तभीतक दयम जडता रदती दै, जवतक चेतनका स्फुरण नहीं होता । श्रीकृष्णके हाथमे आ जानेपर यसोदा 
माताने वासकी छी फक दी- यह सर्वथा खाभाविक है । 


मेरी चिका प्रयत्न छोडकर छोटी-मोटी वस्तुपर इष्टि डालना केवल अर्थ-हानिका दी देतु न्यं ३, सञ्ञे भी 
अष्विसि ओश्चङ कर देता है । परल सव कुछ छोड़कर मेरे पीछे दौड़ना मेरी प्रासिका देव है । क्या मैपाके चसितते इ 
।  बातक्री रिक्षा नदीं मिटती १ 
॥ | ` उदे योगिरयोकी भी बद्धि नीं पकड़ सकती; परंतु जो सव्र ओरसे मँ मोड़कर मेरी ओर दौड़ता दै, भँ उसी 
म॒म आ जाता हू । यदी सोचकर भगवान्‌ यरोदाके हाथों पकड़े गये | 
` # इत उलोक्रमं श्रीकृष्णक्री ब्रह्मरूपता वतायी गयी हे । उपनिषदोमे जेते बहक वर्णन है --“अपूर्वम्‌ अनपरम्‌ अनन्तरम्‌ 
अत्राह्मम्‌? इत्यादि । वही वात यहा श्रीङृष्णके सम्बन्धे है । वह्‌ सर्वाधिष्ठानः स्व॑साक्षी, सर्वातीत, सर्वान्तर्यामी सखवौपादान 
एवं स्व॑र्प व्रह्म ही योदा माताके प्रेमके वश वेधने जा रहा है। बन्धनरूप होनेके कारण उखमे किसी प्रक।रकी 
 असङ्गति या अनौचित्य मी नीं ह । 
[` गहकिर कभी ऊघल्पर जाकर न वेटे इसके व्यि ऊखलपे बधना हयी उचित दै । क्योकरि खल्का अधिक 
सङ्ग होनेषः ह. उक्ते मनम उद्वेग हो जाता दै | 
यह ऊखल भी चोर ही दै" क्योकि इसने कन्दैयाके चोरी करने सहायता की है । दोरनोको बन्धनयोग्य देखकर ही 
्ोदा माताने दोनोको बोधनेका उद्योग किया । 
| यशोदा माता च्यो.जयो अपने स्नेहः ममता आदि गुणो ( सद्गुणो या रस्सिया ) से शरीष्णका पे मरन 
र्यो अपनी निव्यमुक्तता, खतन््रता आदि सदृगुणोसे भगवान्‌ अपने खरूपको प्रकट करने कगे । 





तं सत्वाऽऽत्मजमव्यक्त सत्य॑लिङ्कमधोश्षजम्‌ । 


च्युत क => 


गोपिकोद्खले दासा बबन्ध भ्राकतं यथा ॥ १४] 


अदि र क 
















, ^) + सि चकन ~ 


४“ चष 
क्र ॥॥ 
के ध > = „३ 
= 4 १ ् ड + 
भ ् । चै ५ 
भत ज कक = ~ ॐ 
ह ~~ क नमकक ~ ==> ` कनन ~ 
= ह 





[ये क +> ह. के 
१ ० 
न माजन कोजककरी दि - न क 
® ~^ रः क ज काक = ऋक ७०० @ क क + न र च ह ॐ 9 ऋ 


न 





व 


ज क कः ए 7 7 





। । । ` " " "नति ~ । 
। ~+ 0 । ॥ 4 ह । । 
| 4 ` ` क = 


& + 5१ दशम स्कन्ध १८१ 

















1 यद्‌!ऽऽसीतच्तदपि न्धूनं तेनल्यदपि प्रदघे । जव बह भी छोटी हो गयी, तव उक्ते साष्र 
ओर ओडी# । इस प्रकार वे ्ज्यो-्यों रस्सी 
तदपि दयङ्टं ल्पुनं यदाद्‌त्त बन्धनम्‌ |\१६॥ लतं भौर जोडइती गयीं, स्यो त्यो जुडनेपर भी वे सतर 
दो-दो अगुट रओछोटी पडती गयीं! १६ ॥ यञ्लोदा- 
ति कतो 5 रानीने घरकी सारी रस्सिथां जोड ड्टखीं, फिर भी वै 
एव समगेददासादि यशोदा दंदधत्यपि | भगवान्‌ श्रीङ्ृष्णक्रो न वध सकीं | उनकी असफटतापर 
देखनेवाडी गोपि्यो मुसकराने लगीं ओर वे खयं भी 
खथन्ती बिखिताभवत्‌।। १७।। | सुककराती इई आर्थचकिित हो ग्यी† ॥ १७ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने देखा किं मेरी माका शरीर पक्षीनेसे 
खमातुः खिन्नमान्राया किलस्त्षशखजः । ख्थपथ हो गया है, चोटीमें गुथी इई माकरं गिर गयी 


गोपीनां दुखयन्ती 


‰ १. संस्कत-खाहित्यमे (गुणः शब्दके अनेक अर्थ ईदै-- सद्गुणः सत्व आदि गुण ओर रस्सी । सत्व, रज 
आदि रुण मी अखिल ब्रह्चाण्डनायक चिलोकीनाथ भगवान्‌का स्रा नदीं कर सकते | फिर यद छोटा-सा गुण ( दो 
वित्तेकी रस्सी ) उन्द कैसे बोधि सकता ह । यही कारण दे कि योदा माताकी रस्सी पूरी नदीं पड़ती थी । 

२. संसारके विष्व इन्दियोको ही र्बोधनेमै समथं है -विषिण्वन्ति इति विषयाः | ये दयम स्थित 

तयामी ओर साक्षीको नदीं बोध सक्ते | तव॒ गो-वन्धक् ( इन्द्रियो वा गार्योको वाधनेवाढी ) रस्सी गो-पति ( इन्द्र्यो 
या या्योके स्वामी ) को केसे वाध सकती 


वेदान्तके सिद्धान्तानुसार अध्यस्त ही वन्धन होता है, अधिष्ठानम नदीं । मगवान्‌ श्रीक्रष्णका उद्र अनन्त- 

कोटि व्रह्माण्डाका अधिष्ठान है । उस्म भला बन्धन केसे हो सकता दै १ 

४. भगवान्‌ जिखको अपनी कपाप्रसादपूर्णं दृष्टिते देख ठेते ई, वही सर्व॑दाक्रे स्यि बन्धनसे मूक्त हो जाता ३। 
यशोदा माता अपने हाथ जो रस्सी उटठार्ती; उसीपर श्रीङ्रष्णकी दृष्टि पड़ जाती । वह स्वयं मुक्त हो जातीः, फिर 
उसे गौँट केसे क्गती १ 

५. को साधक यदि अपने गुर्णोके द्वारा भगवान्‌को रिञ्ञाना चाहे तो नदीं रिञ्या सकता । सानो यदी सूचित 
करनेकते स्यि कोई भी गुण ८ रस्सी ) भगवान्‌के उद्रको पूणं कसने्मे समथं नहीं हआ । 

| रस्सी दो अगल दी कम कथो हई ? इसपर कदते दं 


ध १. मगवान्‌ने सोचा क्रि मेँ शुदधद्दय भमक्तजनाको ददन देता हूः तत्र॒ मेरे साथ एकमा सत्वगुणसे 
ही सम्बन्धकी स्फति होती दैः रज ओर तमसे नहीं । इसल्यि उन्होनि रस्सीको दो अगुरु कम करे अपना भाव 
प्रकट करिया | 


२. उर्न्ौने विचार क्रिया कि जौँ नाम ओर रूप दोते ई वदी बन्धन भी होता है । मुञ्च परमात्मामे बन्धनकी 
कल्पना केसे ? जवर कि ये दोनों दी नहीं । दो अंगुल्की कमीका यही रहस्य हे । | 


३. दो ब्रक्षोौका उद्धार करना हे | यदी क्रिया सूचित करनेके च्वि रस्वी दो अंगु कम पड़ गयी । 


४, मगवत्करपति द्वैतानुरागी भी मुक्त हो जाता है ओर असङ्ग भी प्रेमे रवध जाता है। यदी दोना भाव सूचित 
करनेके चयि रस्सी दो अगुरु कम हो गयी । 


क. 


५, यद्नोदा माताने छोटी-बड़ी अनेका रस्या अर्ग-अक्ग ओर एक साथ मी भगवान्की कमस्मै खगार्यीः 
परंतु वे पूरी न पड़ी, क्योकि भगवानमे छोटे-वड़ेका कोई भेद नदीं है । रस्सियोने कदा-भगवान्‌के समान अनन्तता? 
अनादिता ओर वियुता हमरोगेमिं न्दी है । इसय््यि इनको रवोधनेकी वात वंद करो । अथवा जैसे नदिया ` प 

समा जाती £ तैसे दी सारे गुण ८ सारी रस्षि्यौ ) अनन्तगुण भगवान लीन हो गयः अपना नामरूप खो वेठे | 
दो माब सूचित कनेक खि रसस दो अगुरकी न्यूनता हुई । वि ` 
च वे मन-ही-मन सोचती--इसक कमर युदीमखणै दैः किरि भी सेक हाय रवी रस्सीसे यह नहीं वैध 
करमर तिमा भी मोटी नहं होती, रस्पी एक अंगुल मी छोरी नी होती, पिर भी बह धता नदीं । केखा आश्य 
; ही कमी होती । त] ढेः न तीनकीः न न्चारकी, न भ ‡ रोकिक चमक्ारदे। 
र र स) प्क । 


| 
४ ५६ द 4 न 9 क 
ज त) ९ ^ ह क 
क च 3 ि | * < कं > 
~ 4 > चै 1 ` च धि ध 
। दः , फ र 4 -- = क 
॥ क # >= ॥ &-- ! क. # & चं 
ह ॥ १ "क कः (> 
॥ 
च. 


४ रः ऋ 
क च ` क) = "न 8 4 # १ ह [न 


















ग. 


1. ++ +> र 
" + 
` ॥ न 1. 
४ 4४ 


| 51, न्च कन / ~ ` -क "= "न = ग या 
्ः "4 । र ॥ ॥ 


































भे काः = क ० अका 











सय ही अपनी माके बन्धनमें बंध गये# ॥ १८ ॥ 
परीक्षित्‌ | भगवान्‌ श्रीकृष्ण परम खतन्त्र हैँ । ब्रह्मा, 
इन्र आदिके साथ यह सम्पूणं जगत्‌ उनके वशमें है । 
फिर भी इस प्रकार वधकर उन्होने संसारको यह वात 
खवेनापि इष्णेन यस्येदं सेश्वरं वशे ॥१९॥। । दिखला दी कि भँ अपने प्रेमी भक्तोके वरामे द| ॥ १९॥ 


एव संदशिंता यङ्क हरिणा भृत्यवरयता । 





असङ्गता क्यो भकट क ¡ जो सुने बद्ध समन्ता ह, उसके ल्ि बद्ध दोना ही उचित है । इसव्थि वेर्वैध गये । 

२. मै अएने भक्तके छोटे-से गुणको भी पृण कर देता हू यह सोचकर भगवानने यद्ोदा माताके गुण 
( रस्सी ) को अपने बोधने योग्य वना ख्या । 

३. यद्यपि सुद्चमे अनन्त अचिन्त्य कल्याण-गुण निवास करते हैः तथापि तव्रतक वे अधूरे दी रहते ई जवतक 
मेरे भक्त अपने रर्णोकी मुहर उनपर नदीं र्गा देते । यदी सोचकर यशोदा मेयाके गुणों ८ वात्स्यः स्नेह आदि ओर 
रज्जु ) अपनेको पूणोदर-दामोदर बना ख्या | 

४. भगवान्‌ आओीकृष्ण इतने कोमलद्धदय ह किं अपने भक्तके प्रेमको पुष्ट करनेवाला परिभ्रम मी सहन नहीं 
करते दै | वे अपने भक्तको परिभ्रमसे मक्त करनेके खयि खयं ही बन्धन स्वीकार कर ठेते ह| 


५. भगवानने अपने मध्यभागे बन्धन स्वीकार करके यह सूचित किया कि मुञ्चमै तत्वदृष्टिसे बन्धन है दी 

नही जो वस्तु आगे-पीछे, ऊपर-नीचे नदीं होती; केवर वीचर्मे भासती दैः वह श्चूटी होती दै । इसी प्रकार यदं 
बन्धन भी इटा है | 

&. भगवान्‌ किंसीकी शक्तिः साधन या सामभ्रीसे नहीं वधते । यशोदाजीके हाथो श्यामयुन्दरको न वधते 
देखकर पास-पङ़ोसकी ग्वाल्निं इकट्टी हो गयीं ओर कहने ठगी - यरोदाजी ! लाटकी कमर तो मुद्धीमरकी ही है ओर 
` छोरी-सी किङ्किणी इसमे खन-दन कर रही है ¡ अब यह इतनी रस्सर्योसि नहीं धता तो जान पड़ता है करि विधाताने इसके 
ठलायमे बन्धन छिखा ही नदीं है । इसल्यि अव ठम यदह उच्रोग छोड़ दो । 

यद्ोदा मेयाने कदा-- चाहे सन्ध्या हो जाय ओर गोवभरकी रस्सी क्यो न इक्ट्री करनी पड़े, परमै तो इसे 
बोधकर दी छोडंगी । यरोदाजीका यह हठ देखकर भगवान्‌ने अपना हठ छोड़ दिया; क्योकि जां भगवान्‌ ओर भक्तके 
हट विरोध होता है, वहां भक्तका ही हठ पूरा होता हे । भगवान्‌ धते दँ तत्रः जव भक्तकरी थकान देखकर कृपापरवद्य 
हो जते द । भक्तके रम ओर मगवान्‌की कृपाकी कमी ही दो अगुककी कमी है |. अथवा जव भक्त अदंकार करता है 
कि मै भगवान्को बोध दगा, तव वह उनसे एक अंगार दूर पड़ जाता है ओर भक्तकी नकर करनेवाडे भगवान्‌ भी एक 
` अंगु दूर दो जाते है । जवर यशोदा माता थक गयी, उनका शरीर पखीनेसे ख्थपथ हो गया; तव॒ भमगवानकी सर्व- 
। 5. करवतिनी परम माखती भगवती कपा-शक्तिने मगवानके दयको माखनके समान द्रवित कर दिया ओर स्वयं 
प्रकट होकर उने भगवान्‌की सत्य-संकस्पितता ओर वियुताको अन्तर्हित कर दिया । इसीसे भगवान्‌ वेध गये | 
र १ यद्यपि भगवान्‌ स्वयं परमेश्वर है, तथापि प्रेम-परवश होकर वेध जाना परम चमत्कारकारी होनेके कारण 
भगवानूका भूषण ही दः दप्रण नी । 
आत्माराम होनेपर भी भूख रुगनाः पू्णकाम होनेपर भी अतृप्त रहना, ञचद्ध सत््वसखसूप हदोनेपर भी क्रोध करना? 
स्वाराज्य-ल्क्ष्मीते युक्त होनेपर भी चोरी करना, महाकार यम आदिको भय देनेवाडे होनेपर भी डरना ओर भागना? मनसे 
री तीव्र गतिवाठे होनेपर भी माताके हार्थो पकड़ा जाना, आनन्दमय होनेपर भी दुखी होना, रोनाः. सवग्यापक होनेपर भी 
ध जाना--यह सव भगवानकी स्वाभाविक मक्तवदयता है | जो रोग भगवानको नदीं जानते ई, उनके च्यि तो इसका 
करु उपयोग न्दी दैः परंतु जो श्रीकृष्णको ५८ नके रूपमे पहचानते ई, उनके स्यि यह अत्यन्त चमत्कारकी वस्तु है 


# 
"वि 
१, 


छर यह्‌ दखकः जानकर =. द्ध्द्य १.१५। हो जाता  भक्तिप्रेमसे सराबोर हो 
र + ह - 


पने भत्त्के हाथा र्खसख्म वधैदह्ण्दै। 4 = 








"` चना ५ 


ॐ ॥ त 4 
क: ~ प्र "भन 
 ? । कः डे ~ की 


१८२ `  ओमद्धागवत [ अ० ९ 


दषा परिश्रम कृष्णः कृपयाऽऽसीत्‌ खबन्धने । १८] | है ओर वे बहत थक भी गयी है; तव कृपा करके वे 


# १. भगवान्‌ श्री्ष्णने सोचा कि जव ` माके दयसे द्रैत-मावना दूर नहीं हो रदी है तव मँ व्यर्थं अपनी 


हो जाता है । अहो ! विखवेश्वर प्रमु 


ज ¬ = = णा 9 क 
हि ` पि ज्रां ` 


|+ ऋ 0 ~ 


" "क्कि जनके 


कटि. ^ = 
1 


^ 

प ॥ 

५ 

+ 

। 

|; 
#१ 
। ४1 








^ णनी ~ प्रिर. |. च 
कु चककि क क कै * 4 १ । १ "द. - । 


अं० ९ | ` दश्चमं स्कन्ध १८३ । 
=-= -==-----=--_------------------------------ 


नेमं पिरिश्वो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया | 





मी कि षीम कि षयीिषति 


ग्वाठिनी यश्ोदाने समुक्तिदाता सुकुन्दसे जो उछ 
अनिवं चनीय कृपाप्रसाद प्राप्त क्या, वह प्रसाद 
परसादं लेभिरे गोपी यत्त्‌ राप बिठकतिदात्‌ ।२०॥ ब्रह्मा पुत्र होनेपर भी, इकर आत्मा होनेपर भी ओर 
वक्षःस्थन्पर विराजमान ठक््मी अध्िनी शेनेपर 

भी न पा स्के, न पा सके ॥ २० ॥ यह 
नायं सुखापो भगवान्‌ देहिनां गोपिकासुतः । गोपिकानन्दन भगवान्‌ अनन्यत्रमी भक्तकि य्य 
जितने ` सुक्म ई, उतने देहाभिमानी कमकाण्डी 
एवं तपखिर्योको तथा अपने खरूपभूत ज्ञानिर्योकि 


ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तेमतामिह ॥२१॥ | `. | 
न ध व्यि भी नदीं ह ॥२१॥ 


कृष्णस्तु गृहकत्येषु व्यग्रायां मातरि प्रथः । इसके बाद नन्दशनी य्चोदाजी तो धरके काम-धधोमं 

उलञ्च गयीं ओर ऊखल्मे वेधे इए मगवान्‌ इयामसुन्दरने 
अद्राकषदूर्जनौ पूर्वं गुद्यकौ धनदात्मजौ ।२२॥ | ` † दाना अहन धाक यि व 
यक्षराज कुवेरके पुत्र थे{ ॥२२॥ इनके नापर 
ये नककरूबर ओर मणिग्रीव । इनके पाप्त धन, सौन्दय 
ओर रेश्चयकी प्रणता थी । इनका धमंड देखकर दही 
देवं नारदजीने इन्दे शापदेदिया था ओर ये वृक्ष 
नलच्ूबरभणिभ्ीदामिति ख्यातो भ्रियान्वितो ॥२३॥ | हो गये थे६ ॥ २३ ॥ 


पुरा नारदञ्चापेन वृषतां प्रापितो मदात्‌ । 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दडामस्कन्धे पूवां 
-गोपीप्रसादो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ 
॑ --*~@<- 


१. बाल्क्रीडायामुद्रखख्वन्धो नाम 
# इस इलोकरमे तीनो नकारोका अन्वय “केभिरेः क्रियाके साथ करना चादि । न पा सके; न पा खकः न पा सके। । 


ञानी पुरुष भी भक्ति करं तो उन्दै इन सगुण भगवान्‌की प्रापि हो सकती ३, परंतु बड़ी कठिनाईैसे । 
सखलवैये-भगवान्‌ सगुण ह । व निगुण परेमीको केसे मिटेगे १ 


{ ख्य तरैधकर भी बन्धनम पड़े हुए यर्षोकी सुक्तिकी चिन्ता करना, स्पुरुषके सवथा योग्य है । | 

जवर यद्योदा माताकी दष्ट श्रीकृष्णसे हटकर दूसरेपर पड़ती है तब वे भी किसी दूसरेको देखने र्गते ई ओर णेसा ` 

ऊधम मचाते है कि सवकी दृष्टि उनकी ओर खीच आये । देखिये, पूतना, शक्रयाश्चुर, तृणावतं आदिका प्रसङ्ग 
६ ये अपने भक्त उुनिरके प्र द,  इखल्यि इनका अन नाम दै । ये देवं नारके द्वारा डष्ूत 

जा चुके ई, इकषल्यि मगवानले उनकी ओर देखा । ` ` "कीः + ५ 
७ ९ टे हो जाती हः उर्षपर्‌ ६८, ५ ब्र (नर न मगव जञ (९ 4 ५ 3 





4 






द 3 न्व+ ~“ भि~ व 





























राजोवाच 


कथ्यतां भगवन्नेतत्तयोः श्षापसख कारणम्‌ ¦ 
यत्तद्‌ विगर्हितं कमं तेनं वा देवरवेस्तमः ॥ १॥ 
श्रीञ्युक उवाच 
रुद्रसयालचरो भूत्वा सुप्तौ धनदास्मज । 
कैरासोपवने रम्ये सन्दाकिन्यां मदोत्करौ ॥ २॥ 
वारुणीं मदिरां पीत्वा मदाधूर्णितलोचनो । 
द्िश्चेरतः पुष्पिते बने ॥ ३। 
अन्तः प्रविश्य गङ्खायामम्भोजवनराजिनि । 
चिक्रीडतुर्युवतिभिगंजाबिव 


।  यच्च्छया च देवर्षिभगवांस्तत्र कौरव । 


करेणुभिः ॥ ४ 


अपर्यनारदो देवो शीबाणौ समबुध्यत ॥ ५॥ 


^ त दृष्टा वीडिता देव्यो विवल्नाः शापशङ्किताः 


त 
= 
क 
॥ 


~ बासौसि पयंधुः शीध्रं विवञ्लौ नैव गुद्यकौ ॥ ६ ॥ 


र 


> 
+ + 


ठ तौ दृषा मदिरामत्तौ श्रीमदान्धौ सुशत्मजौ । 


श्रीमद्भागवत 
अथ दशमोऽध्यायः 


यमखङ्धंनका उद्धारः 





॥ अ० १० 


न्क कक कव बव कके 1 
जाणत कः @ च" च नीः जाक = ऋ ऋ को [व 1, पि 1, त त 


राजा परीक्षिते परुछा-- भगवन्‌ ! आप कृपया 
यह वताय किं नलकरूबर जीर मणिप्रीवको चाप क्यो 
मिन्ध १ उन्होने एेसा कौन-सा निन्दित कम किया था, 
जिप्के कारण परम खान्त देवर्षिं नारद्जीषो भी क्रोध 
आगया१॥ १॥ 
भरीद्युकदेवजीने कदा-- परीक्षित्‌ ! नलकूवरः ओर 
मणिग्रीव--ये दोनों एक तो धनाध्यक्ष कुबेरे खड्के 
डके थे ओर दूसरे इनकी गिनती हयो गयी ₹इद्रभगवानूके 
अनुचरोमं । इससे उनका धमंड बद्‌ गया ¦ एक दिन 
वे दोनों मन्दाकिंनीके तटपर कैलासे रमणीय उपवनमें 
वारुणी मदिरा पीकर मदोन्मत्त हो गये थे | नदोके कारण 
नकी अखं घम रही थीं । वह्ृत-सी लि उनके क्षाथ 
गा-बजा रही थीं ओर वरे पुष्पोसे कदे इए वनमें उनके साथ 
विहार कर रहे थे ॥ २-३ ॥ उस समय गङ्गाजीमें पत 
पात कमल खिले दृए थे | वे यकि साध जच्के भीतर 
घुष गये ओर जसे हाथि्योका जोड़ा हयिनियोके साथ 
जलक्रीडा कर रहा हो; वैसे ही वे उन युव्रतियोके साय 
तरह-तरहकी क्रीडा करने व्गे ॥ ४ | परीक्षित्‌ ! संपोग- 
वरा उधरसे परम समथ देवर्षिं नारदजी आ निकले | 
होने उन यक्ष-युवकोको देा ओर समञ्च च्या कि 
ये इस समय मतवाठे ह्यो रहे है ॥ ~+ ॥ देधर्षिं नारदको 
देखकर वखद्ीन अम्र।ए छ्जा गयीं । शापके रसे 
उन्हंने तो अपने-अपने कपडे अ्टपट पहन च्वि, परंतु 
इन यक्षने कपडे नहीं पहने ॥ ६ ॥ जत व्वर्षिं नारद- 
जीने देखा कि ये देवाता्के पुत्र होकर श्रीमदसे अपे 
ओर मदिरापान करके उन्मत्त हयो रहे है . त उन्होने 
उनपर अनुग्रह करनेके व्यि शाप देते इए यह 


ध थाय शापं दास्यननिदं जगौ || ७॥ । कटा--*॥ ७ ॥ 













नारदने अपनी लानदष्टिसे थह जान ख्या क्रि ईइनपर मगवानक्ता अनुग्रह्‌ ` 
` उनके साथ छेद़-खाड़ की । 








अ० १० |] दश्चम स्कन्ध १८५ 





नारद उक्राच नारदजीने कहा- जो ठोग॒ अपने प्रिय त्रिषर्योका 
सेत्रन करते ह, उनकी बुद्धिको सवरसे बढ़कर नष्ट करनेवागा 
है श्रीमद-धन-पम्पत्तिका नडा | दसा आदि रजोगुणी 
-न ह्यन्यो जुषतो जोष्यान्‌ बुद्धिभरशचो रजोगुणः। क्म ओर कुटीनता दिका अभिमान भी उससे बढ़कर 
बुद्ध-भ्रराक नहीं दै; क्योकि श्रीमदके साथ-साथ तो 
; | खी, जूजा ओर मदिरा भी रहती है ॥ ८ ॥ रेश्चयंमद्‌ जीर 
-श्मदाद्ाभिजत्यादियत्र ल्ली चूतमासवः ॥ ८ ॥  श्रीमदसे अन्धे होकर अपनी इन्द्रि्योकि वामे रनेवाले 
| क्रूर पुरुष अपने नाश्वान्‌ शरीरको तो अजर-अमर मान 
| वत्ते है ओर अपने ही-जसे शरीखाठे पड्ुर्जोकी इत्या 
| करते ह ॥ ९ ॥ जिस शरीरको (भूदेव '» "नरदेव" "देवः 
| आदि नामेसि पुकारते है--उसकी अन्तमे क्या गति 
| होगी १.उसमे कीड़े पड़ जायगे, पक्षी खाकर उसे विष्ठा 
| वना. देंगे या वह जलकर राखका ढेर बन जायगा । उसी 
| शारीरके य्य प्राणिर्योसे द्रोह करनेमे मनुष्य भपना कौन- 
वि = विरश्षसतं सा खार्थ समञ्ञता है ! एेसा करनेसे तो उसे नरककी 
ेवितमप्मन्ते छमिविद्भसप जितम्‌ । | दी परातिहोगी ॥ १० ॥ बताओ तो सदी, यद शरीर 
| किसकी सम्पत्ति दै ९ अन्न देकर पाञ्नेवालेकी है या 
भूतधुक ततत खाथं फं वेद निरयो यतः ॥१०॥ | गर्माधान करनेषाले पिताकी १ यह शीर उसे नौ महीने 
पेटमे रखनेवाढी माताका है अथवा माताको भी पेदा 
करनेवाठे नानाका १ जो ब्वान्‌ पुरुष बल्पूवेक इससे 
देहः किमन्नदातुः खं निपेक्तमोतुरेव च । काम करा ठेता दै, उसका हं अथवा दाम देकर खरीद्‌ 
ठेनेवाछेका १ चिताकी जिस धधकती भागमें यह जठ 
जायगा, उसका है अथवा जो कुत्त-स्यार इसको चोथ-चीथ- 
मातुः पितुबां बलिनः क्रतुरनेः श्च॒नोऽपि बा॥॥११॥ | कर खा जानकी आचा गाये बैठे ई, उनका १॥ ११॥ 
| यह हारीर एक साधारण-सी वस्तु है । प्रकृतिसे पेदा 
होता है ओर उक्षीमे समा जाता है । रेसी स्थितिमे मूख 
पडुओके मिवा नौर रसा कौन बुद्धिमान्‌ ह जो इसको 
अपना आत्मा मानकर दूसरोको कष्ट प्चायेगा, उनके 
प्राण लेग जो दुष्ट श्रीमदसे अन्वे हो रहे है, 
| को व्िदनात्मस्षात्‌ कुत्वा हन्ति जन्तूजृतेऽसत ६।।१ २॥ उनकी ५ ५ डालनेके ल्य न स॒त्रसे 
बड़। अंजन है; क्योकि दरिद्रं यह देख सकता हे किं 
असतः श्रीमदान्धस्य दारिद्रयं परमञ्नम्‌ । दूसरे प्राणी भी मेरे दी-जेसे है ॥ १३ ॥ जिसके ध | 
एक बार कटा गड जाता हे, वह नहीं चाहता किं 
 आत्मोपम्येन भूतानि दष्िः परमीक्षते ॥॥१३॥ | वसी मी प्राणोको कय गडनेकी पीडा घहनी पडे ` 
` यथा कण्टकविद्धाङ्खो जन्तोरनेच्छति तां व्यथाम्‌ करयाकिः उख पीड़ा ओर उक्षके द्वारा हेनेवाके विकारसि 


--- ॥ । च ® (०2, क 9 
इन्यन्ते प्रवो यत्र निदयरजितात्पभिः 


मन्यमानेरिमं देहमजराम्रत्यु नश्वरम्‌ ॥ ९॥ 


खव साधारणं देहमन्यक्तप्रभवाप्ययम्‌ । 





न 





४ 


१८३ श्रीमद्भागवत ्‌ [ अ० १० 








जीवसाम्यं गतो लिङ्केनं तथाविद्रकण्टकः ॥१४ । | व समञ्जताहै कि दूसरेको भीकेसी दी पीड़ा होती 








दर्दर निरहलम्भो शक्तः सर्वमदैरिह । पीड़ाका अनुमान नही कर सकता ॥ १४ ॥ दरिद्रे 


कच्छ यदच्छयाऽऽप्ना ति त॑द्धि तसय परं तपः ।१५५॥ है, वह उसके व्यि एक बहत बडी तपस्या भी है १५५ ॥ 
जिसे प्रतिदिन मोजनके व्यि अन्न जुटाना पड़ता दे, भूख 
से जिसका शारीर दुबग-पतव्य हो गथा है, उप्त ददिकी 


नित्यं क्षुरक्षामदेहख द रिद्रसखयान्नकाह्िणः । 
इन्रया मी अधिक व्रिषय नही भोगना चाहतीं, सूख 


इन्द्रियाण्यनुञ्चभ्यन्ति दिंसापि विनिवतंते ॥ १६), 





[ड को प्तताता नह्यी--उनकी हिंसा नद्वीं करता ॥ १६ ॥ 
। } = क यद्यपि साधु पुरूष समदीं होते हैँ फिर भी उनका 

| व युज्यन्ते साधवः समदधिनः । समागम दरिद्रिके च्य ही सुल्म है; क्योकि उसके भोग 
लार्सा-तृष्णा भी मिट जाती है ओर शीघ्र ही उदका 
अन्तःकरण इद्ध हो जाता दै*#॥ १७॥ जिन महात्मार्थ- 
यै चित्तम सरके व्यि समता है, जो केव भगवानके 


सद्धिः क्षिणोति तं तष तत आराद्‌ षि्द्यति॥। १७ 
















समचित्तानां शकन्द चरणे पिणाम्‌ । 
| रहते है, उन्हे दुगुणोकि खजाने अथवा दराचारसि्यकी 
उये्यैः किं धनस्तम्भैरसद्धिरसदाभयैः ।॥१८।। | ` < ४ ुराचाियोकी 


{= 2 [व क्या शत्रश्यकता है | वे तो उनकी उपेक्षाके ही परात्र 
9९ मत्तयोमासवया वारुण्या श्ीमदान्धयोः । दे{ ॥ १८ ॥ ये दोनों यक्ष बारणी मदिराका पानं 


इन्द्रिय।के अधीन रहनेवाठे इन खी-म्पट यक्षोका अज्ञान 


 तमोमदं हरिष्यामि स्वेणयोरजितात्थनोः। १९॥। 


यदिमौ रोक्पाटख पुत्रो भूत्वा तमः प्ट्तौं । | सटी, कितना अनथं है कि ये गोकपाठ कुबेरके पुत्र 
होनेपर भी मदोन्मत्त होकर अचेत हो रक हैँ ओर इनको 





न विवाससमात्मानं विजानीतः रदुभदौ ॥२०॥ 
१. इनिष्या० । | 

>  # घनी पुखषर्भ तीन दोष होते द-घनः धनक्रा अभिमान ओर धनकी तृष्णा । दस्र पुरुषमे पदञे दो नहीं होते. 
र ~ वल तीसरा ही दोष रहता हे । इसल्यि; सत्पुरुषेकि सङ्गसे घनी तृष्णा मिट जानेपर,धनिर्योकी अपेश्चा उसका शप्र 





 - $ भ अ = 4 
= -{ ५न खयं एक दोषै । सातवे स्वन्धमे कदा हैः फि जितनेमे पेट भर जाय, उससे अधिकको अपना माननेवाला 
| सि कि को पात्र दै--स स्तेनो दण्डमर्हति ।› भगवान्‌ मी कते दै--जिखपर मै अनुग्रह करता द्रः उस्ना धन छीन 
की उपश्चा करते द । । 


ऋ + 
ऋ नो ~ 
> वि = = + 





न ललन ~ 


है परंतु जिसे कभी कोटा गडा ही नदी, वह उसकी 


धमंड जीर ेकंड़ी नहीं होदी; वह सव तरहके मर्दोसिः 
बचा रहता है । बल्कि देववद्च उसे जो क्ट उटाना पडता 


जाती ह ओर फिर वह अपने भोगेकि व्यि दूसरे प्राणियो- 


तो पहन्से दी टे इए हैँ । अत्र स्तोके सङ्गसे उसकी 


चर्णारविन्दोका मकरन्द रस पीनेके च्वि सदा उत्घुक 


जीविका चलनेबाले ओौर धनके मदसे मतवाठे दुर्ोकीः 


करक मतवाङे ओर श्रीमदसे अधे हो रहे है । अपनी 


। जनित मद ओँ चूर-चूर कर दूंगा ॥ १९ ॥ देखो तो 


इसत बातका भी पता नहीं है कि हम विल्कुक नंग-घङ्गः 


| ` ¢ _ ५ 


4 । , 1. ^. 








अ० १० द्‌ श्म स्कन्ध १८७ 
------------------------------=----- == च्च 
अतोऽदंतः स्थावरतां खातां नैवं यथा पुनः । । ह ॥ २० ॥ इसग्यि ये दोनों अन इक्षयोनिर्मे जानेके 


| पोग्य है । ेसा होनेसे इन भिर इ् प्रकारक्रा अभिमान 
स्खृतिः खान्मलसादेन तत्रापि मदनुग्रहात्‌ ॥२१॥ | न होगा । इकषयोनिमे जानेपर भी नेरी पासे चन्द 


वासुदेवस्य सांनिध्यं रुभ्ध्वा दिव्यशररच्छते। भगवान स्ति बनी रदेगी भीर मरेवुप्बसे देवता 
के सौ वधं बीतनेपर इन्दे भगव्रान्‌ श्रीह्रष्णका 

घृत्तं खरकां भूयो कन्धभक्ती भविष्यतः ।(२२।! | सनिष्य प्रात होगा; ओर फिर मगवान्‌के चरणोमिं परम 
प्रेम प्राप्त करके ये अपने लोकम चले आयेगे ॥२१-२२॥ 

श्रीक उवाच धीद्युकदेवजी कहते ह--देवरभिं नारद इष्त प्रकार 

कहकर भगवान्‌ नरनारायणके आश्रमपर चले गये#! नढ- 
कूवर थर मणिग्रीव-ये दोर्नो एक द्वी साथ अर्जुन वृक्ष 


~ 


खवयुक्त्या स देवपिंभेतो नारायणाश्रमय्‌ । 


नङक्ूनरमनिग्रीबावाक्चतुयंमलाजनो || २३।। | होकर यमलायन नामसे प्रसिद्ध इए ॥ २३ ॥ भगवान्‌ 
गन < शरीङ्ष्णने अपने परम व्रेमी भक्त देवर्षिं नारदजीकी बात 
ऋषेभोगवतयुख्यस्य सस्यं कतु वचो हरिः | सत्य करनेके ण्य धीरे-धीरे ऊखल धीयते इए उस 


> € ओर प्रस्थान किया, जिधर यमगाञ्च॑न इश्च ये ॥ २४॥ 

जगाम शनकै्त्र यत्रास्तां यसरूजुंनो ॥२४॥ र १ 
भम्‌ ह # भगवान्‌ने सोचा किं द्देवषिं नारद मेरे अत्यन्त प्यारे है 
देवर्धिमं प्रियतमो यदिमो धनदात्यजौ । ओर ये दोनों भी मेरे मक्त कुवेरके ठ्डके टैँ । इसव्यि 
महात्मा नारदने जो कुछ कडा है, उसे मै टीक उसी 
। श्पमे पूरा कङ्गा" † ॥२५॥ यह्‌ विचार करके भगवान्‌ 
इत्यन्परेणारुनयोः दछष्णस्तु यमयोर्ययौ । | शीहष्ण दोनों इृोके बीचमे घुस गये प । वे तो दप्तरी 
१ ओर निकर गये, परंतु ऊख टेढ़ा होकर ` अटक 
आत्मनिदेशचमत्रेण तियग्गतद्चलखलप्‌ ।॥२६॥ । गया ॥ २६ ॥ दामोदर भगवान्‌ श्रकृम्णकी कमस रस्सी 
= न की इई थी । उन्होने अपने पीछे छढकते इए ऊखलं 
बालेन निष्कष॑यतान्धगुद्धूवरं तद्‌ को अयो ही तनिक जोरसे खींचा, यो दी पेङकी सारी 


तत्तथा साधयिष्यामि यद्‌ गीतं तन्महारसमा । २५५) 


दामोदरेण तरसोर्कङिताङ्धिवन्धो । ` जडे उखङ गी ६ । समस्त बनविक्रमके केन्र 
र मगवान्‌का तनिक -सा जोर र्गते ही पेडोके तने, शाखार्‌+ 
निष्पेततुः परमविक्रभितातिवेष- छोटी-छोटी डाय ओर एक-एक पत्ते कौप उठे ओर वे 


स्कन्धप्रवारविटपो दृतचण्डश्चब्दौ ।॥२७।॥ दोनों बडे जोरसे तड़तड़ति इए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥२७॥ 

१. स्यात्तत्प्रसा° । २. स प्यवधुक्त्वा देव° । ३. ता उदूखल । ४. बलिनो । 

ऋ १. शाप-वरदानसे तपस्या क्षीण होती ह । नलव्रूबर-मणिग्रीवको शाप देनेके पश्चात्‌ नरनारायण आश्रमकी याजना 
करनेका यह अभिप्राय ह किं फिरसे तपःसञ्चय कर लिया जाय । 

२. मेनि यक्षौपर जो अनुग्रह किया है, वह ग्रिना तपस्यके पूणं नक्ष हो सकता है, इतय्ि । 

३. अपने आराध्यदेव एवं रुखूदेव नारायणके सम्पुख अपना कृत्य निवेदन करनेके घ्यि । 

{[ भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी कृपादष्टिसे उन्डं मुक्त कर खकृते थे । परतु बक्षोके पास जानेका कारण यह ह किं देवषिं 
नारदने कटा था कि तुमह वायुदेवका सान्निष्य प्राप्त होगा । 

† बक्षोके बीचमे जानेका आशय यह हे करं भगवान्‌ जिषके अन्तदेशमे प्रवेश करते ई, उसके जीवनम क्डेशका ठे 
भी नहीं रहता । भीतर प्रवेश क्रिये विना दोनौका एक सःथ उद्धार भी केसे होता १ 

§ जो भगवानके गुण ( भक्त-वात्सस्य आदि सद्गुण या रस्पी ) से बंध। हुआ है, वह ति्यकगति ( पञ्च-पक्षी या 
टेढ़ी चाल्वाखा ) द क्यो न हो-दूसरोका उद्धार कर सकता हे | 


अपने अनुयायीके द्वारा किया हुआ काम जितना यदास्कर होता है, उतना अपने हाथसे नदीं । मानो, यही सोचकर ` 
सपने पीठे-पीछे चलनेवाडे ऊखलके द्वारा उनका उद्धार करवाया । षः, 


ॐ र. क ॥ १: 
४, ¢ तव १ = ऋ - चन, ॥ं 
- = क ॥ # ॥ 9 


$ {क रि 

€ ह गकि ~+ । षं +++ # 
~ त = छ 
त हि ॐ ^ 


ग ~ \ = 





येच ०64 -* कह १००१ ० 














तैस्तैरतव्यातिशयेवीयदेहिष्वसंगतेः 


- 
पा 


१८८ 


भ्रीभद्ध(भवत 


[ अ० १० 


=== व 





तत्र रिया परमया ककभः स्फुरन्तौ 

सिद्धाइपेत्य कुजयारि जातवेदाः । 
कृष्ण प्रणम्य शिरसाखिलरोकनाथं 

बद्भाञ्ञली विरजसाविदमूचतः स ॥२८। 


कृष्ण कृष्ण महायोगिस्त्वमाद्यः पुरुषः परः । 


व्यक्ताव्यक्तमिदं विच्वं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥२९॥ 


त्वमेकः सवभूतानां देहाखातमेन्दरियेश्वरः 
त्वमेव कालो भगवान्‌ विष्णुरन्यय ईश्वरः ॥२३०॥ 
त्वं महान्‌ प्रकृतिः बह्मा रजःसखतमोमयी । 


त्वमेव ुरुपोऽध्यकषः स््षेत्रविकारवित्‌ ।३१॥ 


` गृ्यमाणेस्त्वमग्राह्यो विकारः प्राङ्रतेर्गणेः । 


को नविहाह ति विज्ञातं पराढ सिद्ध गुणसतः ॥३२॥ 


तस्मे तुभ्यं भगवते वासुदेदाय वेधसे । 


आत्मदयोत॑गुणेच्छनमदिम्ने बरह्मणे नमः ॥३३॥ 


यद्यावतारा ज्ञायन्ते रारीरेष्वश्चरीरिणः। 


।॥२४॥ 


स भवान्‌ सवलोक भवाय विभवाय च । 


४: 


` व, 1 क, ॥ ८. क 


उन दोनों वृक्षोमेसे अननिके पस्तमान तेजखी दो सिद्ध 
पुस्प निकले । उनके चमचमाते इए सौन्दर्थसे दिशां 
दमक उटीं । उन्होने सम्पूणं ल्ोकोके खामी भगवान्‌ 
श्रीकृष्णके पास आकर उनके चरणेमिं सिर रखकर प्रणाम 
किया ओर हाय जोड़कर द्ध हदयसे वे उनवी इषः 
प्रकार स्तुति करने खगे--॥ २८ ॥ 


उन्दनि क हा-- सचिदानन्दधघनखरूप | स्वको अपनीः 
ओर आकषिंत करनेवाले परम योगेश्वर श्रीकृष्ण | आप 
्रकृतिसे अतीत खयं पुरषोत्तम हैँ । वेदज्ञ ब्राह्मण यह्‌ बात 
जानते हँ कि यह व्यक्त ओर अन्यक्त सम्पूर्णं जगत्‌ आपका 
ही खूप हं ॥२९॥ आप हयी समस्त प्राणियोके श्चरीर, प्राण, 
अन्तःकरण ओर इन्द्रियोके खामी हैँ | तयाआपदही 
सवश्क्तिमाम्‌ कार, सवव्यापक एवं अविनाशी ईश्वर 
दे ॥ ३० ॥ आप दी महत्त्व ओर वह प्रकृति है, जो 
अव्यन्त सक्षम एवं सत्वगुण, रजोगुण ओर तमोगुणख्पां 
है । आप ही समस्त स्थूट ओौर सूक्ष्म श्रीरोके कर्म, 
भाव, धमं ओर सत्ताको जाननेवाठे सवके साक्षी परमासा 
हँ ॥ २१ ॥ वृत्तियोँसे प्रहण किये जानेवाठे प्रकृतिके 
गुणों ओर विकारोके दारा आप पकडमें नहीं आ सकते | 
स्थूक ओर सुहम शरीरके आवरणसे टका इभा रेप्ता कौन- 
सा पर्ष है, जो आपको जान सके ! क्योकि आप तो 
उन शरीरके पहठे भी एकरस विद्यमान ये | ३२॥ 
समस्त प्रपश्चके विधाता भगवान्‌ वासुदेवको हम नमस्कार 
करते हैँ | प्रभो ! आपके द्वारा प्रकारित होनेवाे गु्णोँसे 
ही आपने अपनी महिमा छिपा रक्खी है । पर्रह्मखख्पः 
श्रीकृष्ण | इम आपको नमस्कार करते ई ॥ २३ ॥ 
आप प्राक्त शरीरसे रहित हैँ । फिर भी जब आप एसे 
पराक्रम प्रकट करते है, जो साधारण इरीरधारियोके 
व्यि शक्य नहीं हैँ ओर जिनसे बढ़कर तो क्या जिनके. 
समान भी कोई नहीं कर सकता, तव उनके द्वारा उनं 
हारम आपके अवतार्तोका पता चर जाता ह ॥३४॥ 


= ग्रभो | आप ह्वी समस्त गोककि अभ्युदय ओर निःश्र | 
 अवती गोऽशभागेन साम्प्रतं पतिराचिषाभ्‌ ॥२५५॥ | यसक्गे च्थि इस क्षमय अपनी सम्रणं शक्तियोंसे भवतीणं 





अ० १० | दशम स्कन्ध १८९ 











नमः परमकल्याण नमः परममङ्गल । | इए दँ । आप समस्त अमिढाषार्भोको पूर्ण करनेवाले 


| हे ॥ ३५ ॥ परम कल्याण ( साध्य ) खर्प | आप्ते 
वासुदेवाय शान्ताय यदूनां पतये नमः ॥३६॥ | नमस्कार है | परम मङ्गर ( साधन ) ख्य } शाको 





नमस्कार है । परम शान्त, सवके हदये वि्यार करनेवाठे 
| यदुवंशश्चिरोमणि श्रीकृष्णको नमस्कार हे ॥ २६ ॥ 
अनन्त | इम भापके.दासाचुदास ई | भाप यह खीकार 
कीजिये । देवर्षिं भगवान्‌ नारदके परम अनुग्रह्से ही हम 
अपराधिर्योको आपका दर्यन प्राप्त हृथा है ॥ ३७ ॥ 
' प्रमो ! हमारी वाणी भापके मङ्घक्मय गुर्णोकरा वर्णन 
करती रहे | हमारे कान आपकी रप्तमयी कथामें टगे रहं । 
हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोन॑ः। हाय आपकी सेवामे जौर मन आपके चरण-कमर्ञे- 


अनुजानीहि नौ भूम॑स्तवानुचरर्किकरो । 


दश्चनं नौ भगवत ऋषेरासीदनुग्रहात्‌ ।३७॥ 


~= 


वाणी गुणाञुकथने श्रवणो कथायां 


की स्प्ृतिरमे रम जायं । यह सम्पूर्णं जगत्‌ आपका 
निवास-स्यान है । हमारा मस्तक सबके सामने ज्यका 


५ रे । संत आपके प्रत्यक्ष शरीर ह । हमारी ओं 
दृष्टि; सतां दशनेऽस्तु भवत्तनूना्‌ ।३८॥ | उनके दर्शन करती रद ॥ ३८ ॥ 


स्मरत्यां शिरस्तव निबाक्तजगसप्रणासे 


श्रीन्ुक उवाच श्री्युकदेवजी कदते दह सौन्दर्य-माधुर्यनिधि 


वत त गोङुलेश्वर श्रीकृष्णने नय्कूबर बौर मणिग्रीवके इस 
स्व प्रकार स्तुति करनेपर रस्सीसे ऊखय्मे नघे-धे ही हंसे 
दाम्ना चोद्खरे बद्धः प्रहसनाह गुद्यको ॥३९॥ | इ९+# उनसे कडा--॥ ३९ ॥ 


श्रीभगवानुवाच प्रीभगवानने कदा--तुमरोग श्रीमदसे अन्धे हो रहे 
ये | मे पहव्से दही यह बात जानताथा कि परम 
कारुणिक देवर्षिं नारदने शाप देकर तुम्हारा रेर्य नष्ट 
द न - कर्‌ दिया तथा इस प्रकार तुम्डारे ऊपर कृपा की ॥४०॥ 
यच्ट्रीमदान्धयोबाभमिविंभ्रंयोऽयुग्रहः कृतः ॥४७०॥ निनी बि. समदिनी 8 नोर 
प्रति समर्पित है, उन साघु पुशषकि दडानसे बन्धन होना 
रीक वेसे ही सम्भव नहीं है, जेषे सूर्योदय होनेपर 
॥ हिः ९ मनुष्यके नेत्रोके सामने अन्धकारका होना ॥ ४१॥ 
दशंनाननो भवेद्‌ बन्धः पुंसोऽस्णोः सवितुयेथा।।४१॥ एवमि नण्दबर नीर मि 
प होकर अपने-अपने घर जाओ । तुमरोगोंको संसारचक्रसे 
ग्‌ प्रमा नलङ्ब्‌र्‌ कादनम्‌ । 
तद्‌ गच्छतं मटर कूबर सादनम्‌ छुडानेवारे अनन्य मक्तिमावकी, जो तुम्दं अभीष्ट है, 
सश्चातो मयि भावो बाभीप्सितः पर्मोभवः 1४२ | प्रपि हो गयी ह ॥ ५२ ॥ 
-कज्ञाता सय भागा नाम्‌ | 


गीतं मम पुरेवेतदपिणा करुणात्मना । 


साधूनां समचित्तानां सुतरां मत्कृतात्मनाम्‌ । 


१. नमस्ते विश्वमङ्गल । २. ने भगवन्ममास्तु | ३. भुत । 


+ सर्वदा अ मुक्त र्ता र ओर बद्ध जीव मेरी स्तुति करते ई । आज मेँ बद्ध दँ ओर भुक्तं जीव भेरी स्वति कर 
रहे दै । यह बिपरीत दशा देखकर भगवानको इसी आ गयी । # व 





१९० ¦ श्रीमद्भागवत [ अ० ११ 








भ्री्ुक उवाच भीद्यक्देवजी कदत है जब मगवान्‌ने इस प्रकार .- 
कटा; तव उन दोनोने उनकी परिक्रमा की ओर बार-बार 
श््थुक्तो ती परिक्रम्य प्रणम्य च पुनः पुनः । प्रणाम किया | इसके बाद ऊखव्ममे बधे इर सवश्रकी 


आज्ञा प्राप्त करके उन गो्गोनि उत्तर दिञ्ाकी यात्रा 
बद्धोदलरमामन्त्य जग्मतुदिंशय॒त्तराम्‌ ॥४२॥ । की #॥ ४३ ॥ 








इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे 
रविं नारदशापो नाम दडभोऽव्यायः ॥ १० ॥ 
= ^ 49 -- - वि 7 


अथेकादशोऽष्याय 


गोङ्कुकसे ज्न्दावन जाना तथा शत्सा्ुर 
ओर बकषाुरका उद्धर 





श्रीक उवाच श्रीटयकदेवजी कते हैँ --परीक्षित्‌ । बृक्षोके गिरनेसे 

जो मयकर चन्द्‌ हआ था, उसे नन्दवाबा आदि नोपनि 

गोपा नन्दादयः श्रुत्वा दमयोः पततो रवम्‌ । भी छुना । उनके मने यह शका इई कि कदी बिजढी 

1 । तो नहीं गिरी | सत्रकेसत्र भयमोत होकर बृक्षोके पास 


तत्राजग्धुः इरेशरष्ठ॒निषातभयशङ्किताः ॥ १ | आ गये ॥ १ ॥ वघ पटवनेपर उन लोगेनि देखा कि 

दोनों अजुनके इश्च गिरे इर्‌ है । ययपि वृक्ष गिरनेका 

कारण स्पष्ट था- क्म उनके सामने दी रस्पीमें बधा 

हअ बाक्क ऊखल खींच दद्या था, परश्तु वे समञ्च न 

सके | “ह किंसका काम है, रेप्ी भाश्चयंजनक दुर्घटना 

कसे षट गथी ?- यह सोचकर वे कातर दहो गये, 

उनकी बुद्धि श्रमित ष्णो गयी ॥ २-२ ॥ वहां कु वाल्क [` 
खेर रहे ये । उन्दने क्ा--“अरे, इक्षी कन्हैयाका तो 
काम है । यह दोनों वृक्षेकि बोचर्मेसे होकर निकर 
र्या था । ऊख तिस्डा ह्यो जानेपर दू्तरी जरसे इतने 
उसे खीचा ओर बक्ष गिर पड । हमने तो इनमेसे 
निक्त इए दो पुरुष भी देखे है" ॥ 9 ॥ परत गोपोनि 
~ बार्कोकी बात नहीं मानी । वे कडने ठगे-- 
न ते तदुक्तं जगृुनं धेटेतेति तस्य तत्‌ । नना सा बच्चा इतने बड़ बक्षोको उखाड़ डाले, यह कमी 


९. तं। २- यमखज॑नमज्ञनं नाम । ३. बाद्रायणिख्वाच । ४. तिरभीनयुद्ध° । ५. घटेदिति । 
` #यक्षेनि विचार किया किंजव्रतक्र यह सगुण (रस्त ) मेर्वेषे हुए ई, तमोतक इमे इनके दर्यन हो रहे दै । निरु गको 
तो मनवे सोचा भी नदीं जा सक्रत। । इसीते भगवान्‌फे वेधे रहते ही वे चञे गये । | 
~ स्वस्त्यस्तु उदङ स्वद्‌ श्रीकृष्णगुणदाटी एव भूयाः 
दो, ठम सद्‌ा श्रीकृष्णके गुगेखे बधे ही रदो 1?-णेखा ऊलल्को अशीवाद देकर यश्च 


















भूम्यां निपतितौ तत्र ददशयरयमलाजंन । 
बभ्रष्स्तक्विज्ञाय लक्ष्यं पतनकारणम्‌ ॥ २॥ 
उद्धू विकर्षन्तं दाम्ना बद्धं च बालकम्‌ । 
कस्येदं इत अश्य्ुट्पात इति कातराः ॥ ३ ॥ 
| { बाला उचुरनेनेति तियगगतमट्खलम्‌ । 


मध्यगेन पुरुषावप्यचक्षप्रहि ॥ ४ ॥ 





=, 


अ० ९१] 





~~न _______~___~__~_~_~~~~-~~-~~-~~-~बब----~-~-~-~-~-------------------- ~~ 





उल्ल विकर्षन्तं दाम्ना बद्धं खमातमजम्‌ । 

विलोक्य नन्दः प्रहसददनो विुमोच ह ॥ & 1 

गोपीभिःस्तोभितोऽनृत्यद्‌ भगवान्‌ बात कचित्‌ । 

उ द्रायति कचिन्युग्धतद्रश्ो दाख्यन्त्रवत्‌ ॥ ७ ॥ 

बिभि कविदाज्ञप्नः पीटकोन्मानपादुकम्‌ । 

बाहृक्षेपं च छङुरुते खानां च प्रीतिमावहन्‌ 1 < ॥ 
श य॑स्तद्विदां लोक आत्मनो भरत्यवस्यताप्र ¦ 


व्रजस्योचाह वे हषं भगवान्‌ बार्चेशितेः \। ९ ॥ 


क्रीणीहि भोः एलानीतिश्चुत्वा सत्वरमच्युः । 


फ़राथीं धान्यमादाय ययो सवेफलप्रदः ॥१०॥ 
फ लविक्रयिणी तस्य च्युतधान्यं करद्वयम्‌ । 


फरेरपूरयद्‌ रत्नैः फलभाण्डमपूरि च ॥११॥ 


सरितीरणतं दृष्णं भग्नाजनमथाद्वयत्‌ । 
रामं च रोहिणी देवी कीडन्तं बारकैमृशम्‌ ॥१२। 


नोपेयातां यद!ऽऽहूतौ ऋीडासुदधेन पुत्रको । 


द्द्यम्‌ स्कन्ध । १९९१ 


बालस्योत्पाटनं तरोः केचित्‌ संदिग्धचेतसः ।। ५५ ॥ | सम्भव नक्ष दै । किंसी-किसीके चित्तम श्रीृष्णकी 


पहठेकी लीगर्ओका स्मरण करके संदेह भी हो आया ॥५॥ 
नन्दवात्राने देखा, उनका प्राणेसि प्यारा बचा रस्पीसे वधा 
हआ ऊखल घसीटता जा रहा है । वे हसने ज्गे अौर 
जल्दीसे जाकर उन्होने रस्सीकी गंठ खो दी# ॥६॥ 

सशक्तिमान्‌ भगवान्‌ कभी-कभी गोपियेकि फुष्तगने- 
से साधारण वारुकोके समान नाचने ठगते | कभी मोठे. 
भाठे अनजान बाटककी तरह गाने च्गते | वे उनके 
हाथकी कठपुतढी--उनके सवया अधीन हो गये ॥७॥ 
कभी उनकी आज्ञासे पीदा ले भते, तो कभी दुसेरी 
आदि तोटनेके बटखरे उठ ते | कमी खड़ा ठे अति, ` 
तो कभी अपने प्रेमी भर्तोको आनन्दित करनेके य्य 
पहत्वार्नोकी माति तार टोंक्ने कगे ॥ ८ ॥ इत प्रकार 
सवेशक्तिमान्‌ भगव्रान्‌ पनी बाज-रीखसि ब्रनवापिर्यो- 
को नन्दित करते ओर संसारमें जो ेग उनके रहस्यको 
जाननेवाले हैँ, उनको यह दिखग्ते कि अपने सेवककि 
वामे हर ॥ ९ ॥ 


एक दिन कोई फर वेचनेवागी कर पुकार उठी- 
फ, खो फर ! यह ॒घ्ुनते दही समस्त कर्म जर 
उपासना्भोके फठ देनेवाठे मगवान्‌ अच्युत फठ खरीदनेके 
व्ये अपनी छोटी-सी अञ्जुलीमे अनाज ठेकर दौड 
पड़े | १० ॥ उनकी अञ्जुरीमेसे अनाज तो रास्ते ही 
त्रिखर गया, पर कर वेचनेषाटीने उनके दोनों हयाय फटे 
भर दिये । इधर भगवान्‌ने भी उसको फर रखनेवाो 
टोकरी र््नोसे मर दी ॥ ११॥ 

तदनन्तर एक दिन यमगज्जन ब्क्षको तोड्नेवाे 
श्रीकृष्ण ओर बढराम बाठकोके क्षाथ लेलते-खेव्ते यमुना- 
तटपर चञे गये ओर लेमे दी रम गये, तब रो्िणीदेवीने 
उन्हे पुकारा.“ कृष्ण ! ओ बराम | जल्दी आओ ॥ १२॥ 
परंतु रोदिणीके पुकारनेपर भी वे जये नदी; कयोक्रि 
उनका मन खेव्मे ठग गया था | जव ब्ुखनेपर भी बे 


५ नन्दबावा इसख्यि से कि कन्हैया कौ यह सोचकर डर न जाय कि ञव्र माने बधि दिया, तब पिता स्य क ज यद सचकर डर न जाय ककि जवर मनि वषि दिया, तव पिता कदी आकर आकर 


पीरनेन ख्गं। 


मातानि बोधा ओर पितनि छोड़ा ! भगवान्‌ शरीकृष्णकी रु खसे यह बात सिद्ध हुई कि उनके स्वरूपम बन्धन ओ न 
क्तकी कस्पना करनेवाठे दूसरे दी दै । वे स्वये न बद्ध ई, न मुक्त ह । 





[2 


१९२ श्रीमद्भागवत [ अ० ११ 





च 


यशोदां प्रेषयामास रोहिणीपुत्रवत्सलाम्‌ ॥१३॥ | दोनों वाज्क नद्वी अये, तत्र रोहिणोजोने वत्प्तल्पस्नेहमयी 
यरोदाजीको भेजा ॥ १३ ॥ श्रीकृष्ण ओर बलराम 

ऋ्रीडन्तं सा सुतं बारेरतिबेरं सहाग्रजम्‌ । ग्वाय्त्राककोके साथ बहत देसे सेढ रहे ये, यञ्चोद।जीने 
ट । जाकर उन्दं पुकारा । उप्तसमय पुत्रके प्रति बास्पव्यल्नेह- 
यशोदाजोहवीत्‌ कृष्णं पुत्रस्नेहस्युतस्तनी ॥१४॥ | के कारण उनके स्तनोमेसे दूष चुचुआरहा था ॥ १४॥ 
वे जोर-जोरसे पुकारने व्गी--“मेरे प्यारे कन्शेया। | ओ 
कृष्ण | कमक्नयन स्य मसुन्दर ! वेड ! आओ, अपनी 


- | का दूष ल्ट | खेलते खे क्ते थत्र ये हा वेग ! 
अं विहारैः क्चरकषन्तः क्रीडा शरान्तोऽसि पुत्रक । १५ | मा इ ५ व । खेगते-लेक्ते थक गये हयो वेग ! 
अव्र वक्ष क्रो । देखो तो सही, तुम भूखसे दुबे हो 


हे रामाशच्छ ताताशु सादुजः इरनन्दन । १६ दो ॥ १५॥ मेर्यरे वेय राम! तुमत सपे च्छो 

आनन्द देनेवाठे हयो | अपने कछरोटे भाईको केकर जब्दीसे 

प्रातरेव ऊताहारस्तद्‌ भान्‌ भोक्तुमहंति ॥ १६॥ | आ जाओ तो ! देखो, माई ! आज तुमने बहत सवेर 
कठेऊकिंथा था | अत्र तो तुम्हें कुछ खाना चद्धिये ॥ १ 

त्वां दाश हं भोक्ष्यमाणा बजाधिपः । वेग बलराम | त्रनरज माजन करनेक्े च्वि वेऽ गपे है; 

प्रतु अमीतकर तुम्हारी बाट देख रहे हैँ । अ।भो, अव 

शट्यावयोः प्रियं धेहि खगान्‌ यात नारकाः ॥ १७ । | हमे आनन्दित करो । नारको | अत्रतुम छोग भी अपने 


: लतसं अपने धर जाओ ॥ १७ ॥ वेय | देखो तो पदी, 
धूलिधू्तरिताङ्गरूः युत मञ्जनमाचह | तुम्हारा एक-एक अङ्घ धूरसे वर्थपष =| रहा ह 1 
जन्मर्धम् भवतो विप्रभ्यो देहि गाः शविः ॥१८॥ आभो, जल्दीसे स्नान कर खो | आज तुम्हारा जन्म- 

नक्षत्र है | पवित्र होकर ब्राह्मर्णोको गोदान करो ॥१८॥ 
पय पय बयस्यास्ते मातमृष्टान्‌ खलंद्ृतान्‌ । देखो-देखो ! तुम्हार साथियोंको उनकी माता्नि नइ- 

घुखाकर, मींज-पोछकर कंसे घुन्दर-घुन्दर गहने पहना 
स्वं च स्नातः कृताहारो विहरख खलंद्रतः ॥१९॥ | दिये हैँ । अवर तुम मी नहा-धोकर, खा-पीकर, पदन- 
ओढकर तब खेयनाः ॥ १९॥ परीक्षित्‌ ! माता यशोदाका 
सम्पूणं मन-प्राण प्रेम-बन्धनसे बेधा हआ था । वे चराचर 
जगते शिरोमणि मगवानूको अपना पुत्र समञ्तीं ओर 


कष्ण छृष्णारविन्दाश्च तात एहि स्तनं पिन । 








न कक "~ 
च १ 1 > न 
@०` & 3 - 
2 + रक जत १, = 
ष्कः कि नकर 












^ हत्थं यशोदा वमशेषशेखरं ` 


१३ मत्वा सुतं स्नेहनिबद्धधीचष । इप्त प्रकार कहकर एक हाथसे वर्राम तथा दूसरे ह्ायसे 
। = श्रीकृष्णको पकड़कर अपने षर ठे भायीं । इसके वाद 
4 + < > 
| = हस्ते गहीत्वा सहराममच्युत उन्होने पुत्र को मङ्कलके व्यि जो कु करना था, वह 


$ डे प्रेमसे किया ॥ २० ॥ 
नीत्वा खवाटं कृतवत्यथोदयम्‌ ।।२०॥ 


"= 
> १3 चे र ॐ 
^ ` १ 
किनय न > भ 
= + `) ह 


` 


पव्द्धा महोत्पातानयुभूय जब नन्दबाबा आदि बडे-बहे गो पनि देखा किं महावन- 


न 






४ - 
न्दादयः समाग ` वजकायंममन्त्रयन्‌ होकर अब तजवातिर्ोको क्था करना चिे,-इ 


ज. 
च [य 
र ॥ 





च्च्य -चचव==चचच्व्व्व्व्व्व्व्य्य्य्व्वव्व्व्व्व्व्ववव=--------- चच 


म तो बड़े-बड़े उत्पात ्ोने कगे हैः तत्र वे रोग इकडे ` 


क 


अकवा = नि सः 








अ० ११] 


दश्चम स्कन्धं 


न ०0 गि जा > क कः क, 
+ मदर जड 


१९३ 





तत्रोपनन्दनामाऽऽह गोपो न्ञानवयोऽधिकः! । 


देश्षकाराथंतखज्ञः प्रियकृद्‌ रामदृष्णयोः ॥२२॥ 
उत्थातव्यमितोऽखाभिरगोङ्रुख हितेषिभिः। 
आयान्त्यत्र महोत्पाता बालानां नाशषदेतवः ॥२३॥ 
युक्तः रथश्चिद्‌ राक्षस्या बारघ्न्या बालको यसौ । 
हरेरनुग्रहान्नूनमनथोपरि नापतत्‌ ॥२४।॥ 
चक्रवातेन नीतोऽयं देस्येन विपदं वियत्‌ । 
श्चिङायां पितस्तत्र परित्रातः सुरेधरेः ॥ २५५] 
यन्न भ्रिथेत दमयोरन्तरं प्राप्य बारुकः । 
अश्ावन्यतमो वापि तदप्यच्युतरक्षणम्‌ ।२६॥। 


यावदोत्पातिकोऽरिषि जं नाभिभवेदितः। 


तावद्‌ बालादुपादाय यास्याभोऽन्यत्र साच॒गाः।।२७॥ 


वनं बृन्दावनं नाम पर्ञव्यं नवक्षाननम्‌ । 


गोपगोपीगवां सेव्यं पण्याद्रितणवीरुधम्‌ ॥२८॥ 


तत्तत्रायेव याखामः कटान्‌ युक मा चिरम्‌ । 


।  गोधनान्यग्रतो यान्तु भवतां यदि रोचते ॥२९॥ 





विंषयपर विचार करने गे ॥ २१ ॥ उन्मेस एक गोपका 
नाम या उपनन्द । वै अवस्य्मे तो बडेये ष्टी; ज्ञानमें 
भी बडे थे । उन्हें इस बातका पता था कि किंस समय 
किप्ठ स्थनपर किस वस्तुसे केसा व्यवहार करना चाहिये । 
साथ दही वे यह भी चाहते थे कि राम ओर श्याम सुखी 


रहं, उनपर कोई विपत्ति न अवे । उरनदोनि कहा--॥२२॥ 
८भादयो ! अब य्ह एसे बड-बवडे उत्पात होने लगे हैँ, 
जो ब्वोके व्यि तो बहत ही अनिष्टकारी हैँ । इत्य 
यदि हमजोग गोकु ओर गोकुल्वाक्षियोंका भटा चाहते 
है, तो हमें यद्यँसे अपना डरा-डंडा उठाकर कूच कर्‌ 
देना चाहिये ॥ २३ ॥ देखो, यह सामने बेट इभ 
नन्द्रायका खाडखा सबसे पहले तो वर्चोकि च्य काढ- 
खरूपिणी हव्यारी पूतनके चगुरसे किसी प्रकार छटा । 
इसके बाद भगवान्‌की दूसरी कपा यह हई किं इक्षके 
ऊपर उतना वडा छकड़ा गिरते-गिरते वचा ॥ २० ॥ 
बवरेडररूपधारी देत्यने तो इसे आकाडामे ठे जाकर वडी 
भारी विपत्ति ८ मृत्युके मुख ) में दह्ीडारु दिया था, 
परंतु वहसे जब वह चद्यनपर गिरा, तब भी हमारे 
कुल्के देवेश्वरोने ही इस बाख्ककी रक्षा की ॥ २५॥ 
यमगाय्यैन बक्षोकि गिरनेके समय उनके बीचमें आकर 
भी यदह या ओर कोई बाक्क न मरा । इप्तसे भी यही 
समञ्ना चाद्रिये कि भगवानने हमारी रक्षा की ॥२६॥ 
इसव्िये जब्रतक कोई बहत बडा अनिष्टकारी अर्ष हमं 
ओर हमारे ब्रजको नष्ट न कर दे, तबतक ही हमरोग 
अपने बर्चोको ठेकर अनुचरके साथ यसे अन्यत्र 
चठे चँ ॥ २७ ॥ “वृन्दावन नामका एक वन है । 
उसमे छोटे-छोटे जर भी बहत -से नये-नये इरे-भरे वन 
है | वर्ह बडा दही पवित्र पवेत, घास ओर हरी-भरी 
ठता-वनस्पतिर्यो ह । हमारे पड्ुके व्ये तो वह बहत 
ही हितकारी है । गोप, गोपी ओर गायके च्य बह 
केव सुविधाका ही नदीं, सेवन करनेयोग्य स्थान 
है ॥ २८ ॥ सो यदि तुम सब ठोगोंको यह बात ज चती 
हो तो आज दी हमगोग बहक च्यि कूच कर दे । देर 
न कर, गाड़ी-छकड़े जोत ओर पहल गायको, जो हमारी 
एकमात्र सम्पत्ति है, वहाँ मेज देः ॥ २९ ॥ = 
उपनन्दकी बात सुनकर सभी गोपने एक खरसे 
कहा--“बहूत ठीक, बहत दीक ।' इस्‌ विषयमे किसीका 





| ॥ ९९४ भमदि [ अं० ११ 
, गजान्‌ खान्‌ खान्‌ समायुज्य यय रूढपष््छिदाः। | | भी मतमेद न था। सव्र ठोगोने अपनी छुंड-की-श्ंड 
गाये इकट्री कीं ओर छकडोपर घरकी सवर सामम्री गदकर 
बरन्दावनकी यात्रा की ॥ ३० ॥ परीक्षित्‌ | ष्वाठोने वृर्दो, 
बरचो, लियो ओर सत्र सामप्रियोकवौ छकडोपर चद! दिया 
ओर खं उमके पीछे-पीढे धनुष-बाण ठेकर बड़ी छव 
धानीसे च॑ग्ने ठ्गे ॥ ३१ ॥ ऊन्हीने मौ यौर्‌ वको 
तो सबसे आगे कर व्या श्नौर उनके पीठे-पीछे सगं 
शीर तुरही जोर-जोरसे जाते हए चले । उनके साथ- 
ह्य-साथ पुरेहितलोग भी चक र्हैय} ३२ ॥ गोपि 
अपने-अपने वक्षःस्यट्पर नयी केप्तर लगाकर, छन्दर- 
सुन्दर वचर पहनकर, गवे सोनेके हार धारण किये हए 
र्थोपर सवार थीं ओर ब्रह अनन्दसे भगवान्‌ श्रीकरष्णकी 
ठीटाओँके गीत गाती जाती थीं | ६३ !}! यकशलौदारानी 
ओर रोदिणीजी भी वैसे ही प्षज-घजकर्‌ अपने-अपने 
ध्यार पुत्रं श्रीकृष्ण तथा बंढरौमके साथ एक छकदैपं 
खोभायमान हो रही थीं । वे अपने दोनो बाटक्ौकी तीतटी 
बोटी सुन-सुनकर भी अघाती न यीं, ओर-ओर सुननां 
चाहती थीं ॥ ३४ ॥ दृन्दावन वड़ा ही सुन्दर वन हे | 
चष्टे कोर भी ऋतु हो, वों सुख-दी.-षुख है । उरे 
प्रवेदरा करके ग्वालोने अपने छकड्ःको अद्ध चन्द्रःकार 
मण्डर बोधकर खडा कैर दिया भोर अपने गोधनकेरदने 
योग्य स्थान बना च्या ॥ ३५ ॥ परीक्षित्‌ । बृन्दावन 
हरा-भरा बन, अव्यन्त मनोहर गोधन पदैत ओर युना 
नदीके सुन्दर-सुन्दर पुलिनोंको देखकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
ओर बलराभजीके हदयमें उत्तम श्रीतिका उदय हुषा २६॥ 

राम ओर श्याम दोनों ही अपनी तेतटी बोली जओौर 
अत्यन्त मधुर बारोचित ठीकाओंसे गोकुख्की ही तरह 
बरन्दावनमे भी त्रनवाधिर्योको आनन्द देते रहे । थोडे ही 
दिननोमें समगर आनेपर वे बछडे चराने ग्गे ॥ ३७ ॥ 
दूसरे बालाक साथ खेलनेके च्य बहत-सी सामग्री 
लेकर वे षरसे निक्रर पडते ओर गोष्ठ ( गायोके शहनेके 
र स्थान ) के पाप ही अपने बछडको चराते ॥ ३८ ॥ 
ह व ~ श्याम नौर राम कटी नोरी बजा रहे हं, तो कहीं गुखेट 
कचिद्‌ बादथती वेणु क्षेपणैः क्षिपतः कचित्‌ । या देर्ववोक्से वेले या गोषा फक रहे है| किसी 
` द. 8 स समय भपने पैरोके धुबरूपर तान छेड रदे दै, तो क 

चेत्‌ पादैःकिद्कि छत्रिममोप ५५ ३९|| बनावटी गाय शौर बैक बनकर जेर रदे दै ॥ ३९ ॥ 











बद्धान्‌ बालाच्‌ क्यो राजन्‌ सर्वोपकरणानि च। 
अनस्खारोप्य गोपाला थत्ता आत्तशयरासनाः ॥२१॥ 
गोधनानि परस्त्य शृङ्गाण्यापू्यं सर्वतः । 


तूय॑षोषेण महता युः सहपुरोहिताः ॥३२॥ 





गोप्यो रुढरथा नूलङ्चङङमकान्तयः | 
कृष्णलीला जगुः प्रीता निष्ककण्ध्यः सुबाससः।३३। 


तथा यशओेदारोदहिण्यवेकं शकटमासिते । 


















रेजत॒ ; कृष्णरामार््यां तत्कथाश्रवणोत्सुके ॥२४॥ 
बृन्दावनं सम्प्रविश्य सवंकालसुखावहम्‌ । 
तत्र॒ चक्घधजावासं शकरैरर्धवन्द्रवत्‌ ।२३५५॥ 
बृन्दावनं गोवधंनं यथुनापुलिनानि च । 
वीक््यासीदुत्तमा श्रीती राममाधवयोन्ैप ॥२३६॥ 
। एवं बजौक्रसां श्रीतिं यच्छन्तौ बाल्वेटितैः । 
॥ ` करवाक्ये; खक्राखेन वरसपालो बभूवतुः ॥२३७॥ 


अविदूरे वजथवः कह गोपालदारकः | 





+ ॐ भ 






ॐ † 2 0 : ॥, ॥ न्द (पं रो 


# „> +>, 9 1 






क्कः 


अ० ११ | 








` ऋ ` अ 


दलम्‌ स्कन्ध 





वृष।यमाणो नदन्तो युयुधाते परस्परम्‌ । 


अनुकृत्य सुतेजन्तूऽ्चेरतः प्राङ्रतौ यथा ॥४०॥ 


कृदडाचिद्‌ थग्रनातीरे बस्सांश्वारयतोः खकः | 


वयस्यैः कप्णवलथोरजिषांयुर्दैतश आगमत्‌ ।४९॥ 


वत्सरूपिणं वीक्ष्य ॒वर्क्यूथगतं हरः 
दललेयन्‌ बल्देाय शनै इवासषदत्‌ ॥४२॥ 


गृहीत्वापरपादाभ्यां सहराङ्गूटक्षच्युतः । 


(४ 


नार्या क 


= 


पित्थाग्र प्राहिणोद्‌ गतजी वितम्‌। 

स कपित्थे मेहाहायः पात्यशनेः पपात ह ।।४२) 
तं वीक्ष्य धसिता बाखाः शश्चसुः साधु साध्विति । 
देवाश्च परिसन्तष्टा बभूवुः पुष्पर्पिणः ॥४५॥ 
तो वर्छपालको भूखा स॑लोकेकपालकौ । 
सप्रातराशो मोवत्सांश्वारयन्तौ षिचेरतुः ॥४५। 
स्वं स्वं षस्सङरं स्वे पाययिष्यन्त एकदा । 
गर्वा जलाशयामभ्याश्चं पाययित्वा पपुजंलम्‌ ॥४६॥। 


ते तत्र॒ दद्शबोला महासखमवसितम्‌ । 


एकः ओर देखि 


पञ्च-पक्षिर्योकी ब्य निकार रहे हँ । परीक्षित्‌ ! इस 


प्रकार सवेशाक्तिमान्‌ भगवान्‌ साघारण बाच्ककि समान ` 


लेते रते ॥ ४० ॥ 


एक दिनकी बात है, श्याम ओर वराम अपने प्रेमी 
खा ग्वालब्रालोके साथ यसुनातटपर बछ्डे चरा रहे थे । 
उक्ती समय उन्दँमारनेकी नीयतपते एक देय आया ॥४१॥ 
भगव्रान्‌ने देखा किं वह बनावटी बछ्डेका ख्प धारणकर 
बछठ्डोके दंडमे मिढ गया है । वे ओंँखोके इदारेसे 
बलरापजीको दिखाते इए धीरे-धीरे उसके पाक्त प्च 
गये । उक्त समध रेसा जान पड़ता था, मानो वे दैत्यको 
तो पहचानते न्वी ओर उस हट्टे-कट्‌2े सुन्द्र वछडेपर 
मुग्ध ह्यो गये हैँ ॥ ४२ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने प्के 
साथ उसके दोनों पिछले पर पकड़कर आकाशे धुमाया 
ओर मर जानेपर कैथके बर्षपर पटक दिया । उसका क्वा- 
तगड़ा देत्यरारीर बहत-से कैथके व्रक्षोंको गिराकर खयं 
भी गिर पड़ा ॥ ४३ ॥ यह देखकर गाच्वालके आश्चये- 
की सीमा न रही | वे 'वाह-वाहः करके प्यारे कन्हैयाकी 
प्रशा करने खगे । देवता भी बडे आनन्दसे षर्गोकी 
वर्षा करने लगे ॥ ४४ ॥ 


परीक्षित्‌ ! जो सारे छोककि एकमात्र रक्षक दै, 


वे ह्वी इयाम ओर बलराम अव वत्सपाक ( बकछ्डके 


चरवाहे ) बने इए दै । वे तड्के ही उठकर कलेवेकी 


सामग्री ठे केते ओर बरईडोको चराते इए एक वनसे 
दूप्तरे बनमे धमा करते ॥ ४५ ॥ एक दिनकी बात है, 


सब ग्वानाठ अपने छुंड-केछ्युड बछडको पानी पिंखने 


के स्यि जयाश्यके तटपर ठे गये । उन्होने पहले ` 





भरे तो सड बन-वनकर दँकडते इए आपं ` 
मे ठ्ड़रहे हतो दप्तरी ओर मोर, कोयक, बंदर भादि 


। 


बछरडोको जर पिराया ओर फिर खयं मी पिया ॥४६॥ = 


ग्वाटबारोने देखा कि वह एक बहत बडा जीव बेडा 
है । वह रसा माद्धम पड़ता था, मानो इन्द्रके वज्ञरे 


त्रसुर्वजनिभिन्नं गिरेः शृङ्गमिव च्युतम्‌ ॥४७॥ | कटकर कोई पदाडका टुकड़ा गिरा इआ है ॥ ४७ ॥ 


= व क नामका 
सवै बको नाम महानसुरो बकरूपथक्‌ । र अघर 


२ 
व्व भ. 
, नेः 
~ कै, 1 4 





१५ 
१ ( 


क च् 


१९६ भीमद्धागवत ं = 
ॐ २ 


















ॐ 
९३ आगत्य सहसाङृष्णं तीक्ष्णतुण्डोऽग्र्षद्‌ बली ।॥७८॥ | वहं आया था । उप्तकी चोंच बड़ी तीखी थी ओर वड 
| | र नं खयं बड़ा वलवान्‌ था । उसने ज्जपटकर श्रीकृष्णको 
।  @ ष्णं महाबकग्रसतं द्रा रामाद्थोऽभकाः । निगु चल्िया ॥ ४८ ॥ जव बलराम भादि बाल्कने 
५6 बभूवुरिन्दरियाणीव तरिना प्राणं विचेतसः ।४९॥ | देखा कि वह बड़ा भारी वणु श्ृष्णको निगल गया' 
{ 8 तब उनकी वदी गति हहं जो प्राण निकल जानेपर्‌ 
| तं ताडमूरुं भ्रदहन्तमग्निवद्‌ इन्दियोकी होती है | बे अचेत हो ग्ये ॥ ४९॥ 
| | ॥ 6 परीक्षित्‌ ! श्रीङृष्ण रोक्पितामह्‌ ब्रहमके भी पिता हैं | 
[| 8 गोपां पितरं जगद्गुरोः । वे टीलासे ह्ी गोपाल-बाटक बने ह्र्‌ हैँ | जवर बे बगुलेके 
19 = ताके नीचे पर्हचे, तत्र बे आगके समान उसश्ना 
| | चच्छदं सचोऽतिरुपाक्षतं बक- 1 1 
/-{; 6 जलाने लगे | अतः उस दैव्यने श्रीकृष्णकरे इारीरपर 
। स्तुण्डेन हन्तुं पूनरभ्यपद्यत ॥।५५०॥ | बिना किसी प्रकारका धाव किय ही ज्ञटपट उन्दै उगक 
दिया ओर फिर बड़े क्रोधसे अपनी कठोर चोचसे उनपर 
तमापतन्तं स निगृह्य तण्डयो- चोट करनेके च्ि दूटं पड़ा ॥ ५० ॥ कंप्तका सखा 
र 3 "1 बकासुर अभी भक्तवत्सक भगवान्‌ श्रीकृष्णपर्‌ पट ही र्या 
स्था बकं कंसक्तखं सतां प॑तिः । त 
था किं उन्होने अपने दोना हा्थसे उक्तके दोनों ठोर पकड़ 
| ६ 6 पश्यत्सु बाड्धेषु ददार लीलया क्ये ओर ग्वाकारोके देखते-देखते खेल -दी-खेव्े उसे 
| । ॥ स वेसे ही चीर डाग, जेषे कोई बीरण ( गँडर, जिक्षकी 
¢ ¢ छदावहो वीरणवद्‌ दिवोकसाम्‌ ॥५१॥ | जडका ख होता है ) को चीर डले । इससे देवताओं- 
78 को वड़ा आनन्द हआ ॥ ५१ ॥ सभी देवता भगवान्‌ 
{| चफा लोकव।सिनः 
। | | | | ५८ रि छर श्रीकृष्णपर नन्दनवनके बेड, चमेटी आदिक एक 
। ¡ & समाकिरव्‌ नन्दनमरिलिकादिभिः । बरपाने ज्गे तश्रा नगारे, शङ्खं आदि बजाकर एवं 
3३. 1 स्तोत्रोके द्वारा उनको प्रसन्न करने रगे । यह सतर देख- 
( . समीडिरे चानकशङ्धसस्तवे- कर सन-के-सन ग्वा-बार आश्चयचकित हो गये ॥५२॥ 


तद्‌ वीक्ष्य गोपालसुता पिसिसिरे। (५२।] | जब बकराम आदि बाककोनि देखा किं श्रीकृष्ण बुलेके 

` | मसे निकरुकर हमारे पास आ गये है, तब उन्हें 
युक्तं भकास्यादुपलम्य बालका दसा भानन्द इथ, मानो प्रा्णोके संचारसे इन्दिया सचेत 
ओर आनन्दित हो गयी हयो । सवने भगवानकतो अबा 
म अल्ग गे खगाया | इक्षके बाद अपने-अपने बडे 
,  स्थानागतं तं परिरम्य निषठैताः ककर स त्रजमे आये ओर व्यँ उन्होने धरके 
कोर्गसे सारी षटना कह सुनायी ॥ ५३ ॥ 


४. 4» “^ तल नि 
् प ~क ~ + ^, 
१ ७ "का / # 4 ौ 


रामादयः प्राणमितरन्द्रियो गणः | 


प्रणीय वत्सान्‌ बजमेत्य तज्जगुः ॥५२॥ 


~ ला तद्‌ विसित गोपा गोप्यशापिप्रियादताः । |  परीधिव्‌ । बकार वधक भटना नकर सवके 
^ ता च पब गोपी-गोप भाश्चयंचकिंत हो गये | उन्हें एषा 


`. ` | जान पड़ा, जैसे कन्हैया साक्षात्‌ मव्युके सुख्से ही 


च 1 








= ~ 
1. दीन ॥ 
॥ "4 
कष क = ऋ कन ब 
= ४) क "न 
"द < 
= > > ¶-र नि + 
मै $. ° 


क ‡ म नि ‡ 














न्क क्ल 
अ० १२ | 


च~ ~ 


[ग 1 त [गि [न 1 1 1 





अहो बताख्य बारुश् बहो मृत्यवोऽभवन्‌ । 


अप्यासीद्‌ विग्रियं वेषां छृतं पूवं यतो भयम्‌ ॥५५॥ 


अथाप्यभिभवन्त्येनं नेव ते घोरदशंनाः । 
जिषांषयेरमाप्ताय नर्यन्स्व्रौ पतङ्गवत्‌ ॥५६॥ 
अहये बह्मविदां वाचो नाशवत्याः सन्ति किंचित्‌ । 


मर्गो यद्‌!इ अभवालन्वभावि तथेव तत्‌ ॥५७॥ 


इति नन्द(दयो गोपाः कृष्णरामकथां इदा । 

0 कः (५ 
डवेन्ता रममाणाश्च नाविन्दन्‌ भववेदनाम्‌ ॥५८} 
एवं विहारे; शमर; कौमारं जहतुर्बजे । 


 निरायनेः सेतुषः 


दशम्‌ <कृन्ध 


| । भच" भः चोः ` जकः क चयि क्तः = ¬ = ककि = ह चोर 


याग्दभिरद्युस्यादेक्षन्त तषितेश्षणाः ॥५४॥ | 


सप्टवनादिभिः -॥५९॥! | तरजमें अपनी बाल्यावस्था व्यतीत की ॥ ५९. ॥ 


ऋ क 







कटे हो| वे बड़ी उत्घुकता, प्रेम जीर आदस्ते 
श्रीकरष्णको निह्ारने टगे | उनके नेत्रोकी प्यास बदतीद्ी 
जाती थी, किंषी प्रकार उन्दं तपि न द्योती थी ॥५४॥ 
वे आपप्तमे कने क्गे-- हाय | हाय ॥| यह कितने 
आश्चयकी वात है| इस बाख्कक्रो कई बार मृ्युके 
रुहम जाना पड़ा । परतु जिन्हे इसका अनिष्ट करना 
चाहा, उन््ीका अनिष्ट हआ । क्योकि उन्होने पहटेसे 
दूसरोका अनिष्ट किया था ॥ ५५ ॥ यह सब होनेपर 
शी वे मयंकर अष्ुर इसका कुछ भी नदीं विगाड पते | 
अते हैँ इसे मार डाग्नेकी नीयतसे, कितु आगपर 
गिरकर पतिर्मोकी तरह उच्टे खयं खाद्वा हो जाते 
हैं ॥ ५६ ॥ पच दहै, ब्रह्मवेत्ता महात्माअकि वचन 
कभी चूठे न्वी होते । देखो न, महात्मा गर्गाचायने 
जितनी बातें कदी थीं, सव-की-सत्र सों आने ठीक 
उतर रदी &'॥ ५७ ॥ नन्दवात्रा आदि गोपगण इी 
प्रकार बडे आनन्दसे अपने इयाम ओर रामकी वातं 
किया करते । वे उनम इतने तन्मय रहते कि उन 
संसारके दुःख-संकर्टाका कुछ पता ही न चलता 1*८॥ 
इ प्रकार श्याम ओर बल्शम ्ाख्बाकेके साथ कभी 
ओंँखमिचौनी खेकते, तो कभी पु बधते । कमी 
बदरो की मति उछर्ते-कूदते, तो कभी ओर कोई विचित्र 
सेक करते । इस प्रकारके बागेचित खेगंसे उन दोन 


3 


#, 


१ 


क „1 
# 9 ¶ 
{4 # 0 न 


- ~ "नकि 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूवां | 
वत्सबकवधो नामेकादसोऽव्यायः ॥ ११. ॥ 


णी (क 
अथ ढमदशोऽ्यायः 


धास्ुरक्ा उद्धार 


 . श्रीद्चुक उवाच 


` .. कचिद्‌ वनाशय मनो दधद्‌ वजात्‌ 


नद 


~ 
‰ 1 


प प्रातः समुत्थाय वयस्यवर्सपान्‌ । 
दङ्करवेण चारणा 
वनिगतो बरसपरःसरो 


ङः 


हरिः ॥ १॥ 



















| नन्दनन्दन श्यामसुन्दर वनमे ही कठेवा करनेके विचारसे 
बडे तद्के, उठ गये ओर सीगकी मघुर मनोहर ्वनिसे 
अपने साथी ग्ाव्नागेको त जनाते इए उन्ह 


 जगाया ` अं डक्ते भागे करके वे तरजमण्डदछ 
५ ५ | ॥१॥ नो १ 


१९८ श्रीमद्भागवत + [ अ० १२ 











नि = ववववववव--------------- 
ण $ 

तेनेव ॒ साकं एथुकाः सहस्चशः | निकर पड़े ॥ १ ॥ श्रीकृष्णके साथ ही उनके प्रेमी 

सहस्री ग्ाक्वाठ सुन्दर छीके, वेत, सींग ओर बँष्ुरी 

खिग्धाः सुरिग्वेत्रविषाणवेणवः । लेकर तथा अपने सहसरं बछ्डोंको आगे करके बडी 


प्रघ्ननतासे अपने-अपने घरोसे चज पडे ॥ २ ॥ उन्होने 
श्रीकृष्णके अगणित ब्छड़में अपने-अपने वड मिग 
वत्सान्‌ पुरस्कृत्य विनिर्थयुर्घदा ।॥ २ ॥ | दिये जीर स्थान-स्यानपर वबाखोचित खेर खेरते इए 

| विचरने ल्गे॥ २३ ॥ यद्यपि सव्रके-सव गार्बाल 


खान्‌ खान्‌ सहस्रोपरिसंख्ययाचिविताच्‌ 








कृष्णवत्सेरसंख्यातेयुंथीकृत्य सवेत्सक्ान्‌ । | कांच, धुंघची, मणि ओर सुवण के गहने पहन इए ये, 
/ | वि विजन रत्र | फिर भी उन्हनि बृन्दावनके नड्धीले-इर फरयोसि, नयी- 
1 6 च्यन्ताऽभल लाभिविजह्त तत्र॒ ह | २॥। | नयी कोपलसे, गुच्छोंसे, रंग-दिरे श्र ओर मोरपं से 
| 8 | तथा गेह आदि रंगीन धातु्ओंसे अपनेको सजा 
फुरश्रवारस्तवकरुमनःपिच्छधातभिः । । चर ॥ ४ ॥ कोई किंसीका छीका चुरा ठेता, तो कोई 


गङ्धामणिखर्णभषि र किप्तीकी वेत या घुरी । जत्र उन वस्तुओके खवामीको 
क चजानपल्लवनरू तता अप्यमूषयन्‌ ।॥ ४ ॥ | पता चछ्ता, ततर उन लेनेवाव्य किसी दूप्तरेके पास दूर 


६ पक देता, दसरा तीसरेके ओर तीपरा ओर भी दर चोथेके 
यष्णन्तोऽन्यो ल्य शिकं घा री - | 4 =, व १ 
य॒ यन्यशिक्यादीन्‌जञातानाराच चिष्षषुः । | पाल । कि व हसते इए उन्ड लोटा देते ॥ "५ ॥ यदि इ्याम- 


ओर दौड़ पडते ओर उन्हें छ छुक्र आनन्दमगन हयो 
जाते ॥ ६ ॥ कोई बोरी बजारहा है, तो कोईप्तीग ही 
पकः रहा है । कोई-कोई भौँरोके साथ गुनगुना रहे है, 
तो बहत-से कोयलोके खरमं खर मिलाकर "कु्रू-वुद्र 
कर रे हैँ ॥ ७ ॥ एक ओर कुछ ग्वाखनाक आकारे 
उडते हए पक्षिर्योकी छयाके साथ दौड़ ठ्गा रहे है,तो 
दूसरी ओर कु हंसतोकी चाल्की नकर करते इए 
उनके पाथ खुन्दर गतिसे च रहे हैँ । कोई बगुलेके पास 
उसीके समान ओं मूदकर बेठ रहे हँ तो कोई मोर्योको 
नाचते देख उन्दीकी तरह नाच रहे ह ॥ ८ ॥ कोई 
कोई नंदर्योकी प्र पकड़कर खींच रहे हैः तो दूसरे 
उनके साय इक्त पेडसे उस पेडपर चद रहे है । कोई- 
कोई ऽनके घ्ाय सुद बना रदे ई, तो दूसरे उनके साथ 
एक डाठ्से दूसरी डाच्पर छर्लोग मार रहे है ॥ ९ ॥ 
4. ` | बहत-से श्वायबा तो नदीके कछार छपका खेर रहे 
त; सरिस््वसम्द्ुर्तीः। | दै जर उमे छदक्ते इए भढकोके साथ खयं भी 


1 
ण्ड 
क 


४ । | ¢ ९ सुन्दर श्रीङृष्ण॒ वनकौ शोभा देखनेके व्यि कुक आगे 
¢ तत्रत्या 1 सर ‡ ( ५९/ व 4 

। ^ च ग. दतन्तय पुनददुः ॥ 4 ॥ बढ जते, तो "पहले मेँ दुगा, पहले में द्ुङंगाः--इस 

१३: र ् द प्रकार आपस्मं होड लाकर सश्र-के-सत्र उनकी 

७३. यदि द्रं गतः छृष्णो वनशोभेश्षणाय तप्‌ । क 





अहं पवंमहं पूर्वमिति संस्पश्य रेमिरे ॥ ६॥ 






केचिद्‌ वेणून्‌ वादयन्ता ध्मान्वः शृङ्गाणि केचन । 


केचिद्‌ शृ्ैः भरगायन्तः श्ूजन्तः फो किरः परे॥॥७॥ 









| विच्छायाभिः प्रधावन्तो गच्छन्तः साधु हसदैः। 






-& क 


' बकौरपविरन्तश्च त्यन्त कलापिभिः ॥ ८ ॥ 


। 
† 
। 
॥ 






विकर्षन्तः कीशभालानारोहन्त् तैरमान्‌। 


हि ~ 8 
॥ १ =4 , न 
कदल शा $~ 






> < ह व्यः १ ष 4 छि ) ४. 
^ ५ ---- (९४ तें वनः ~~. 4 धन्त 
। श्च .^ 0.4 
च्च (न 6 ० > ॥, = १९ स्क । # 
`" 
जग + - व त । 
नी + च, (५ ^ क 26 ि क 









क 





| + # क र &-: 

अ० १२1 दक्ेमं स्कन्ध | १९९. 
विहसन्तःप्रतिच्छायाः शचपन्तश प्रतिखनान्‌ ॥१०॥ | एदक रहे द । को$ पानी अपनी पराई देखकर 
उसकी हसी कर रहे है, तो दृसरे अपने ₹खाब्दकी प्रति- 
ध्वनिको ही बुरा कहू रहे ह ॥ १० ॥ भगवान्‌ 
दास्यं गतानां परदेवते न्‌ । श्रीकृष्ण ज्ञानी संतेके टििगरे यं ब्रह्मानन्दके मूर्तिमान्‌ 
अनुभव ह | दास्यभावसे युक्त भक्तोके च्वि वे उनके 
आराध्यदेष, परम देश्चयंशाटी परमेश्वर ई ओर माया- 
साकं विजहः कृतपुण्यपज्ञाः ॥१९॥। | मोदित वि यान्धौके च्वि वे केव एक मनुष्य-बाट्क 

क = हैँ । उन्दीं मगवानके साथ वे महान्‌ पुण्यात्मा गालवा 
यतपादपांसुवहुजन्मङ्ृच्छरतो तरह-तरदके खेर खेल रहे हँ ॥ ११ ॥ बदह्रत जन्मोतक 
श्रम ओर कष्ट उठाकर जिन्होने अपनी इन्द्रियां 
ओरं अन्तःकरणको वमे कर्‌ दिया है, उन योगियकि 
ख एव यदृ दग्िषयः खयं शितः व्यि भी भगवान्‌ श्रीङष्णके चरणकमर्नोकी रज अप्राप्य 
क्त वर्ण्वते दिष्टमतो व्रजौकसाम्‌ ॥१२॥ | दै । वदी भगवान्‌ खयं जिन त्रनवासी खवायवारयोकी 
ओंखोकि सामने रहकर सदा खेर खेरते है. उनके 








इत्थं सतां ब्रह्मसुखाचुभूत्या 


मायाभितानां नरदारकेण 


धतात्मभिर्यानिभिरप्यलभ्यः । 


तमाः सोभाग्यकी महिमा इससे अधिक क्या कदी जाय ॥१२॥ । 
स्तेषां सुखक्रोडनदीश्षणाक्षष्‌ः । परीक्षित्‌ | इसी समप अधाघुर नामका महान्‌ देव्य _ ` 
॥ आ धमका । उस्तपे श्रीकृष्ण शौर ग्ाद्वार्बोकी सुखमयी 
नित्यं यदृन्तनिजजीवितेप्ुभिः क्रीडा देखी न गयी । उक्तके हदयमें जंलन होने कमी । 
८; 
पीतामतरप्यमरैः प्रतीक्ष्यते ॥१२॥ | वह इतना मयकर था कि अरृतपान करकै अमर इर्‌ = 
९ देवता भी उससे अपने जीवनकी रक्षा करनेके व्व 
रव्रभशाच्‌ छष्गहलातनाडर, चिन्तित रहा करते ये ओर इक्त बातकी बाट देखते रहते 
कंरालशिष्टः त थे कि किक्षी प्रकारसे इसकी मृष्युका अवसर आं 
= ५ ६ स १ जाय \॥ १३ ॥ अघाघुर प्रतना ओर वकासुरका कोटा | 
| अयं तु मे सोद्रनाश्चकृत्तयो- भ तथा क्का भेजा इ था } वह्‌ श्रीकृष्ण; श्रीदामा __ 
| 6 > -9 3 = दि ताच्रालको देखकर मन-दही-मन सोचने च्गा कि ` 
| | दयामंमेनं सबल हनिष्ये ॥१४॥ | "~ ष ‡ ० 
४ ध्यही मेरे प्तगे भाई ओर बहिनको मारनेवाया है । इसव्ि _ ` 















एते यदा मत्सुहृदोस्िरापः 
कृतास्तदा नष्टसमा वजोकसः। 
पराणे शते वष्म॑सु का जु चिन्ता 
प्रजासवः प्राणभृतो हि ये ते।॥१५॥) 
इति व्यवस्याजगरं बृहद्‌ वपुः 
| स योजनायाममहाद्विपीवरम्‌ । 
=  श्रत्वाद्वुतं व्यात्तगुहानन तदा 
पेत ग्रसनाश्चया खर । 


4 ^ ~ र ॐ (८ च त ही 
¢ < 


आज मै इन ग्वाकवारेके साय इसे मा डाैगा ॥ १४॥ ` 
जन रे सब मरकर मेरे उन दोनों भाई-बहिनेकि मत ` 
तपणकी तिलाञ्ञलि बन जायेंगे, तत्र व्रजवासी अपने 
आप मरे-जेसे हो जायगे । संतान ही प्राणियके प्राण 
है| जद प्राण ही न रहंगे, तज शरीर कैसे रष्ेगा १ 
इसकी मरव्युसे त्रनवाक्षी अपने-आप मर जायगेः ॥ १५ ॥ 
रेका निश्चय करके देह दुष्ट देष्य अजगरका रूप धारण 
कर मागमे ठऊेड गया । उक्षका वह अजगर-शरीर एक 
योजन वे बड़ प्तक समान विरा एवं मोदा था । 
वह बहत ही भद्धत था । उसकी नीयत ष बाख्कोको 


निगक नानेकी थी, इ हि उषे फाके समान अपना 


अः 
ध 




























2 आीभद्भाभबत  अ० ११ 








धराधरोष्ठो जलदोत्तरो्ठो बहत बड़ा ड फाड़ रक्ला था । १६॥ उसका नीचे. 
नि का होट प्रथ्वीसे भर ऊपरका होठ बादसे टग रहा 
द्योननान्तो गिरिमृङ्गदः । था | उक्षके जबड़े कन्दराशेके स्मान थे ओर दादे 
ध्वान्तान्तरास्यो वितताष्वजिहः पवेतके शिखरी जान पड़ती थीं । महक भीतर घोर 
अन्धकार था । जीभ एक चोडी खाल डक-पी दीखती 
परुषानिरशाप्तदवेश्षणोष्णः १७) । थी । पसि ओंधीके समान थी ओर अखि दावानच्के 

समान दहक रही थीं ॥ १७ ॥ 
दृष्टा तं तादशं सवे मत्वा बृन्दावनश्चियम्‌ अभघाघुरका रेसा खूप देखकर बाटकोने समञ्चा कि 
- यह भी शरन्दावनकी कोई शोभा है ! वे कतुक्वरा खेक- 
व्यात्ताजगरतुण्डेन ह्य्क्षन्ते स लीलया ।१८}। | ही-खेवमे उपेक्षा करने गे किः यह मानौ अजगरका एुग 
र इथा मह है ॥१८॥ कोई कष्ता-“मित्रो ! भ, बतव्मओ 
तो यह जो हमारे सामने कोई जीव-सा वेढा है, यह 
हमें निगठनेके व्ि सॐ इए किसी अजगरके रमह-जेसा 
नहीं है १।१९॥ दृसरेने कहा-- “सचमुच सूयी किरणे 
पड्नेसे ये जो बाद सल-खाठहो गये हँ, वे एेसे 
भादधम होते हैँ मानो टीक-टीक इष्टका ऊपरी होठ ही 
हो नौर उन्हीं बादर्मोकी परछाईसे यह जो नीचेकी 
भूमि कुछ गन-र दीख रही है, वदी इका नीयेका 
होठ जान पडता है ॥२०॥ तीरे ग्राज्वःन्ने कडा- 
ष्या, पचतो | देखो तो सही, क्या ये दायीं भौर 
बायीं ओरकी गिरि-कन्दराएं अजगरके जबडोकी होड 
नहीं करतीं १ भौर ये ऊंची-ऊंची शिखर-पंक्तिथाँ तो 
साफ-साफ इसकी दादे माम पडती है" ॥ २१ ॥ चोथेने 
कहा- “भरे भाई ! यद्व॒ ठ्बी-चौडी सडक तो ठीक 
अजणरकी जीभ-सरीखी माद्धम पडती है ओर इन गिरि 
श्रङ्खोके बीचका अन्धकार तो उसके हके भीतरी भाग- 
को भी मात करता है ॥ २२ ॥ किसी दृप्तरे ाक्वाने 
कह्ा--"देखो, देखो ¦ रसा जान पडता है कि कहीं 
इधर जग्मे आग र्गी है । इसीसे यह गरम ओर तीखी 
इवा आं रदी है । परंतु भजगरकी सोसके साथ इसका 
क्या ह्वी मेर वैठ गया है । ओर उसी आगसे जले इए 
प्राणिर्योकी दुर्गन्ध रेकी जान पड़ती है, मानो भजगरके 
पेट मरे हए जीवेकि मसकी ही दुर्गन्ध होः ॥ २३॥ 
तन उन्मेस एकने कदा--“यदि हमटोग इसके समे 
घुसं जार्यै, तो क्या यह दमं निग जायगा १ जजी | 
| चह क्या निगञेण । कदी पसा करनेकी विगाहं की तो 





त 
१-०५-५ अ +र ण्वि न @^ चन" भिं 


> क ~ बरसी ० क ~र प 
कि वि १ 
9, 1, क = (दिक ण निमि कक" जो ३ 


अहो मित्राणि गदत सच्वक््टं पुरः सितम्‌ । 
ननव्यात्तव्यालतुण्डायते न वा ॥ १९ 

सत्यमकैकरारक्तयुत्तराह युवद . धनम्‌ । 

अधराहुवद्‌ ोषलतमरि्ापारणभ्‌ ॥ २०॥। 


 / प्रतिस्यधेते सुकिभ्यां सव्यासब्ये नगोदरे । 












तङ्गभृङ्गारयोऽप्ये तास्तददष्राभिथ पश्यत ॥२१॥ 


(>. ६. ॥ 9 = काक, = म्‌ जनरव ०० 
॥ + कृ १ [क | (> 1 
१४२४ । # ओ, 
४ ६, ४ 
+ + + त ॥ > > 
~ न ~ ~ क ग - ॥ * कन्नो = वन्यो पये 
-- । ` न 4 = 
+ +. 11 1 को +) | - ^ - ~ 
६ १।  # ५ ५4 | ॥ 1१ 1 
॥तााााावााारताााणतयाणाणतययाय  िि 


 आस्दतायाममार्गोऽयं रसनां प्रतिगज॑ति । 


एषामन्तगंतं ध्वान्तमेतदप्यन्तराननम्‌ ।।२२॥ 
9 
क $ 

 दावोष्णखरवातोऽयं श्वासवद्‌ भाति परयत । 


= 


4. प 
3 शु 1 


इग्धसत्त्वदुगन्धोऽप्यन्तरामिषगन्धवत्‌ ॥२३ 


४, 


४. 
= [क 3 
> क त 
न = 
> 





॥। 
५1, 
=-= 
नि + ॐ 
++ ।। 
4 
१५ ¢ 
॥ । 
४, च 
तः 9 
* * , 
पि ४ { 
(9. म 
वि 
अन , वि 
| | मि 
, जै ॥ 





॥ 1 , 
^~ 
4 
७ ॥ चै शै 1 
"ऋ | हः 
# 
०” = भ ॥ ~ 
र ५ किम चह य 
* चै 


[॥ ध 
क ऋ 






| ० १२। द्वम्‌ स्कन्ध २० ५ 













न वि त क 


< क्षणादनेनेति बकायुंशन्युखं एक क्षणे यह भी वकारे समान नष्ट हो जायगा | ` । 
हमारा यह कन्हैया इसको छडेगा थोडे द्वी ।' इस्‌ प्रकार 
कृते हृए वे प्राटनाठ चक्रको मारनेवाठे ्रीकृष्णका ` 
सुन्दर मु देखते ओौर ताटी पीट-पीटकर हंते इए 
भधासुरके रहम घुस गे ।॥ २४१॥ उन अनजान 


प = क ऋ = ऋ = ऋ = 








वीक्ष्योद्धसन्तः करताउनेयंयुः ॥२५४॥। 


द्त्थं प्रिथोऽतथ्यभतज्ज्ञभापितं 


~ बर्चोकी आपसमे की ई भ्रमरप्रूण वातं सुनकर 

श्रत्व वि न्त्य 
| धुत्वा विचिन्त्येत्यस्पा भपायते । मगान्‌ ननि चान 
¦ रक्षो विदित्वाखिलभृतहरिछितः सचा सपं मी च्ूखा प्रतीत होता दै ।' परीक्षित्‌ । 


भगवान्‌ रश्रकृष्ण॒ जान गये किं यद राक्षप्त है । मला; 

| खानां निरोद्धुं भगवान्‌ मनो दघे ॥२५॥। | उनसे क्या छिपा र्ता ¶ वे तो समस्त प्राणि के इये 
| ही नित्रास्त करते हैँ | अव उन्होने यड्‌ निश्चय क्रियः कि 
तावत्‌ म्रविष्टास्त्वसुरोदरान्तरं जपने छा ्राल-बार्छोको उसके समे जानेसे वचा 

ठं | २५ ॥ भगवान्‌ इ प्रार सोच ही रहे थेकिसब- 
के-सब ग्वाच्वाठ बछड़के साथ उस अलुक पेटमं चले 
{1 = गये | पतु अत्रासुरने अभी उन्हें निगमा नदीं | इसका 
कारण यह था क्रि अघासुर अपने भाई बकाघुर ओर 

हतश्व ान्तसरणेन रषा ।॥२६॥ बहिन पूतनाके वरध्रकी याद करके इ वातौ वाट्‌ देख 

रहा था कि उनको मारनेवाठे श्रीकृष्ण सुमे आ जाय; 


प्रं न गीर्णाः शिशवः सवत्साः 


तान्‌ वीक्ष्य ङृष्णः सक्छाभेयग्रदो तव स्रो एक साथ ही निग जाऊ ॥ २६ ॥ भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण सबको अभय देनेव्राटे हैँ । जब उन्दनि देखा 
- ह्यनन्यनाथान्‌ सवकरादवच्युतान्‌ । करि ये वेवारे वाखा जिनका एकमात्र रक्षक मेँ ही 


द मेरे हासे निकल गये ओर जेते कोई तिनका उड़कर 
भग्र गिर पड, वैसे द्वी अपने-आप मृ्युख्ख अघाघुरकी 
जटठराग्निके ग्राप्त बन्‌ गये, तत्र देवकी इष्ठ विचित्र डीलापर 
मगभ्रानको बड़ा विस्मय इ ओर उनका हृदय दयासे 
दरवित हो गया ॥ २७ ॥ वे सोचने ठगे किं “अब्र सुद्च 
क्या करना चाहिये १ रेक्ता कौन-सा उपाय है, जिष्षसे 


, दीनांश्च सत्योजंठराग्निषासान्‌ 
गादितो दिष्टकृतेन षिसितः ॥२७।॥ 


करत्यं फिमत्राय खञख जीवनं 










॥ {< त) ५/६ 

न वा अमीषां च सतां विर्हि्नम्‌ ! इ दुक मृष मी हो जाय जोर इन संत-खमाव मोल । 
९ | मारे बाल्ोकी हत्या मी नदो १ ये दोनों काम कैसे 

द्यं कथं सादिति स चिचिन्त्य त- . हो सकते है! परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण भूतः मविष्यु 





वर्तभान- सबको प्रसयक्ष देते २इते है । उनके व्यि 

उन्गात्वाविशतुण्डमङेषटग्धरिः ॥२८॥। | यह उपाय जानना कोई कठिन न था । बे अपना कतव्य ` 

| निश्चय करके खयं उसके मुम घुस गये ॥ २८ ॥ उष 

 ॥ तदा घनच्छदा देवा भयाद्वाेति चकरुः । समय बादर्ोमे छिपे इए देवता मयवश हाय-हायः पुकार्‌ 

क उठे ओर अघाघुएके हितेभी कस श हषे 
 जहषुय च कंसा्या; कोणपास्त्वघवान्धवाः ॥२९॥ | प्र्ट क ॥ २९ ॥ क 


५ ~+ के "^ 


क व 








= अ 
च = = 


9 ' = १4 


२०२ शीमङ्काशवतं [ अ १९ 








तच्छ्रत्वा भगवान्‌ छष्णस्त्वव्ययः सार्भवत्सकम्‌ | | = भवाघ्ुर बड ` शौर पवाव्नायके दित भगवान्‌ 


चूणीचिकी्षोरातमानं गे श्रीङृष्णको अपनी डाढोसे चग्रकर चूर्‌-चूर कर डाठ्ना 
चूणीचिकीरषोरात्मानं तरसा बदृषे गले ॥२०॥ चाहता था । परतु उसी पमय धविनाश्ी श्रीकृष्णने 


ततोऽतिकायख निरुद्रमार्भिणो देवता्ओंकी हाय-हाय घुनकर उसके गटेमे अपने 
खरीरको बडी फुर्तीसि वदा ल्या | २० ॥ इसके बाद्‌ 
| त भगवान्‌ने अपने हरीरको इतना द्डा क्रिया क्ति 
ूर्णोऽन्तरङ्गं पवनो निरुद्धो उप्तका गा द्वी रंध गथा | अखि उच्ट गयीं | वह 
मूधैम्‌ विनिष्पाद्य विनिभंतो बहिः ॥३१॥ | व्याङुल होकर बहुत ही छटपटाने लगा । सस रकशर 
<; धः ह: सारे शरीरम भर गयी ओर शन्तमं उक्तक्े प्राण व्रहम्ध्र 
तेनेव सवय बहिगतेषु फोड़्कर निकर गये ॥ ३१ ॥ उसी माच प्राणेकि 

प्राणेषु वत्सान्‌ सुहृदः परेतान्‌ । पाय उसकी सारी इन्द्रा भी इारीरसे बाहर हो गयी । 


दृष्टया खयोत्थाप्य तदन्वितः पुन- ` उसी समथ भगवान्‌ सुकुन्दने अपनी भगृतमी टृष्टिसे 
क | मरे हए बछृडों ओर ग्ाल्रार्छोक्नो जिच दिया ओरं उन 
वक्त्रान्ुन्दो भगवान्‌ विनिययो ।।२२॥ सवक्रो साथ टकर वे अधघाघुरके क्ये वार निक 


पीनाहिभोगोस्थितमद्धुतं मह 
ज्ज्योतिः खधाम्ना ज्वल्यद्‌ दिनो दश्च । 


ददरीणदष्टेभमतस्त्वितस्ततः । 





आये ॥ ३२ ॥ उस अजगरके स्थूल हारीरसे एक अच्यन्त 
अद्धत ओर महान्‌ अयति निकली । उस समय उप्त ज्योति- 
के प्रकाश्यसे दक्षा दिदं प्रञ्वलित हो उटीं । वह थोडी 














=> (©| (५ 7 निगमं * 
>१ तम्‌ देरतक तो आकारा खित होकर भगवान्‌ के निकल्नेकी 
१.९ विवेश तसिन्‌ मिषतां दिषो कसाम्‌ ॥२२॥। प्रतीक्षा करती रही । जब बै बाहर निकट श्ाये, तव वह्‌ सब 


देवताओंके देखते-देखते उन्हयीमे समा गयी |} ३३ ॥ उस 
समय देषताओंने 5 बरक्ाकर, अष्ठरा्जने नाचकर, 
गन्धर्वोनि गाकर, विधाधरोने बाजे बजाकर, त्राह्मणोनि 
स्तुति-पाठ्कर ओर पार्षदोने जय-नयक्रारके नारे खगाकर 
बडे आनन्दसे भगवान्‌ श्रीकृष्णका अमिनन्दन किय। | 


ततोऽतिहृ्टाः खकृतोऽशतार्हणं 
पुष्पः खुरा अप्सरसश्च नतनैः । 


न, 


गीतेः खगा वाद्यधराश्च वाद्यकैः 


स्तवे विप्रा जयनिःखनेगणाः |॥३४॥ । क्योकि भगवान्‌ श्रीकृष्णने अघष्ुरको मारकर उन 
तदद्धतस्तात्रसुवाद्यगीतिका- स्तुतिर्या, सुश्दर बार्जो, मङ्खकमय गीतां, जय-जय कार ओर 
जयादिनेकोत्सवमङ्गलखनान्‌ | आनन्दोत्सर्वोकी मङ्गलध्वनि त्रह्मलोकके पास पंच गयी । 


जन ब्रह्माजीने वह ध्वनि सुनी, ततर वे बहत ष्टी शीघ्र 
अपने वाक्नपर चढ़कर वज आये ओर भगवान्‌ श्रीकृष्णङ्गी 
यह्व॒ महिमा देखकर आश्चर्ययकित हो गये ॥ ३५५ ॥ 
परीक्षित्‌ | जव बृन्दावने अजगरक। वह चाप सूख गया 
तब वह ब्रजवा।प्िर्थोके घ्यि बहत दिनो्तक खेग्नेकी 
एक अद्भत गुफा-सी बना रक्ा ॥ ३६ ॥ यइ जो भगवान्‌ने 
अपने श्राव्बालको मृ्युके घ॒खसे बचाया या नौर 
अघाघ्ुरको मोक्षदान किया या, बह रदा मगवानूने 


१ `. शरुत्वा खधाम्नोऽन्त्यज आगतोऽचिराद्‌ 

+ दृटा महीरस्य जगाम प्रिसयम्‌ ।।२५ 
~ त ४ चरभं दाण्कं इन्दावनेऽद्वतम्‌ | 
तिथं वभूवाक्रीडगह्वरम्‌ ।३६॥ 


सबका बहत बड़ा काभ क्रियांथा॥ २३४ ॥ उन अद्भत 
2 
जं॒कमं हरेरात्माहिमोक्षणम्‌ । ` 


~< 





अ० १९ | 


नैतद्‌ विचित्रं मनुजार्भमायिनः 


परावराणां परप्य वेधसः 


अधोऽपि यत्स्पश्चनधौतपातश्षः 


परापारल्म्यं खप्ततां सुदुलंभम्‌ ॥३८॥ 


दू 


यदङ्प्रतिमान्तराहिता 


मनोपग्री भागवतीं ददो गतिम्‌ । 
स॒ एर निर्यात्मसुखादमूत्यभि- 


वयुदस्तमायोऽन्तगंतो हि क्रि पुनः ॥(३९॥ 
चूत उवाच 
इत्थं द्विजा अदवदेबदत्तः 
धुत्वा खरातुञ्चरितिं विचित्रम्‌ । 


पप्रच्छ भूयोऽपि तदेव पुण्यं 
वैयासक्षिं यन्निगृ्ीपचेताः ॥४०॥ 
राजोवाच 
नहम्‌ कालान्तरशृतं तत्कालीनं कथं भेत्‌ । 


यत्‌ कोमारे हरिषरतं जगुः पौगण्डकेऽभकाः ॥४१॥ 


दश्चम्‌ स्कन्धं 


मृत्यो; पौगण्डके बाला दृष्टो चुर्विंसिता वरजे ॥३७॥। | अपनी कुमार-खव्रस्यामें अर्थात्‌ रप्र वर्धे दी की थी ^ 












ग्राच्त्रा्ेने उसे उसी समय देखा भी था, परतु पौगण्ड- 
भवस्या अर्थात्‌ छटे वर्षमे अच्यन्त आश्चयंचकरित होकर 
वरजम उसक्रा वणन किया ॥३७]॥। अघाघुर मूतिमान्‌ अघ 
(पाप ) ही था | भगवान्‌के स्पराभात्रसे उसके सारे पाप 
घु गये भौर उसे उस सारूप्य-सुक्तिकी प्राप्तिं इई, 
जो पापिर्योको कभी मि नहीं सकती । परतु यह कोर 
आश्वयी बात नहीं हं | क्योकि मनुष्य-बाव्कक्षी-सी टीट 


| रचनेवालेये वे दी परमपुरुष परमात्मा हैँ, जो भ्यक्त-अध्यक्त 


ओर कायै-कारणदूप समश्छ जगतके एकमात्र विधाता 
दै ॥ ३८ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णके किसी एक अङ्गकी 
भावनिर्ित प्रतिमा यदि ष्यगके द्रारया एक वार भी इदयमें 
चेढा खी जाय, तो वह सालोक्य, सामीप्य आदि गतिका 
दान करती हँ, जो भगवान्‌के बड़े-बड़े मर्तोको मिढ्ती 
दै । भगवान्‌ आत्मानन्दके निध्य साक्षात्कारखद्प है । 
माया उनके पासतक नहीं फटक पाती । वे ही खयं 
अघाघ्ुरके शारीरम प्रवेश कर गये । क्या अब भी उस्तकी 
द्गतिके विषयमे कोई सन्देह है ॥ ३९ ॥ 

स्यतजी कते है--रोनव्शदि ऋषियो । यदुवंश- 
िरोमणि भगवान्‌ श्रीङृष्णने ही राजा परीक्षित्को 
जीवन-दान दिया था । उन्दने जब अपने रक्षक एवं 
जीवनसवैखका यह्‌ विचित्र चरित्र पुना, तब उन्होनि 
फिर श्रीड्धकदेवजी मह्ाराजसे उन्दीकी पवित्र खीलाके 
सम्बन्धमें प्रश्न किया । इसका कारण यह थाक 
भगवान्‌की अग्रतमयी लीने परीक्षित्के चित्तको अपने 


वरामं कर रक्खा था ॥ ४० ॥ | 

राजा परीक्षिते पा भगवन्‌ । आपने कडा था 
कि ग्वाख्रारेने मगवान्‌की की इई पोच वर्षकी लीग 
वरजम छठे वमे जाकर कष्टी । अब इस विषयमे आप 









दूसरे 


महायोगी गुरुदेव ! सुस्े ख आश्च्यपूणं रहस्यको जाननेके ` 
स्यि बड़ा कौत डो रहा है । आप कृपा करके 
बतायं । अवद्य ही इसमे भगवान्‌ श्रीकृष्णकी विचित्र 
घटनार्जोको र 1 नेवाडी मायाका कुछन-ङुछ काप 























।' > जः 
अं + 
3 9 वि ह 
1 ध ४ न्‌ 
~> भन 
२० 
र ी 
॥। [१ 
#. \ 
) + ति ५ 
1 
# 








क चक 


चश धन्यतमा रोके गुरोऽपि क्षत्रबन्धवः । 


सूत उवास 
इत्थ स पष्टः छतु बाद्राष्णि- 
स्ततसारितानन्तहताखिदेन्द्रियः 
छच्छ्रात्‌ पुनरुन्धवहि्टशिः शनैः 


श्रीद्युके उवाच 


4 साधु पृष्टं महाभाग खया भागवतोत्तम । 
शृण्वनपि कथां उुहुः ॥ १॥ 
सतामयं सारभृतां निसर्गो 
यदथंवाणीश्चुतिचेतसमपि 





` नन्यवदच्युतख यत्‌ 
` लिया दिटानाभिव साघु गर्ता॥२॥ 
न ~ = श 


१ "ऋ. 


श्युणाष्व बहता रजन 


वदामि ते। 


भीमद्ध(गनत 
| 1 न = 


यत्‌ पिबाभो य॒हुसवत्तः पुण्यं कृन्णकथामृतम्‌ ॥४३॥। 






ग नद ~ 


| अ० १३ 








॥ ४२ ॥ गुस्देव ! यदपि क्षत्रियोचित धर्म ॒त्राह्मण- 
सेवासे विमुख होनेवे कारण मै अपराधी नाममात्रका 
त्रिय द्व, तथापि हमारा अहोमाग्यदहै कि हम आपके 
सुखारविन्दसे निरन्तर क्षरते हए परम पवित्र मधुमय 
श्रीकृष्णलीकामरतका बार-बार पान दर रदे दैँ॥ ४२॥ 

स्ूतजी कते ह भगवान्‌ परम व्रेमी भक्तोमे 
ष्ठ रौनकजी | जत्र राजा परीक्षित्‌ने इस प्रकार प्रन 
किया, तव श्रीञ्चुकदेव जीको भगवान्‌की वह टीला स्मरण 
ह्यो आयी । ओर उनकी समस्त इन्द्रिया तथा अन्तः- 
वरण विवा होकर भगवान्‌की निव्यटीटामें खिच गये। 
कुछ पमयवे गद धीरेधीरे श्रम ओर कष्टते उन्हें 
बाह्यज्ञान इआ । तन वे परीक्षितसे भगवान्‌की टीका 


प्रत्याह तं भागवतोत्तमोत्तम ॥४४।) । वणन करने गे ॥ ४४॥ 
ककर र ~~~ 
इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्वे पूतरधे 
दादरोऽध्यायः ॥ १२ ॥ 
~<=.“ 
अथ अयीदशोऽ्याथः 


ब्रह्माजीका मोह ओर उसका नाश 


। श्रीद्युक्देवजी कते ~ परीक्षित्‌ ! तुम ॒वडे 
| माग्यवान्‌ हो । मगवान्‌के व्रेमी मक्तोमें वरम्ारा स्थान 
श्रष्ठ है | तभी तो तुमने इतना सुन्दर श्रदन किया है | 
योतो तुम्हं बार-बार मगत्रानूक्ती लोल-कथार्‌ घुननेको 
मिल्ती है फिर भी तुम उनके सम्बन्धे श्रस्न क्के 
उन्दं भौर भी सतलत--ओर भी नूतन वना देते 
हो | १ ॥ रक्षिकर संतोंकी बाणी, कान ओर हदय 
भगवान्‌की टके गान, श्रवण ओौर चिन्तनके व्रि ही 
होते है- उनका यह खभाव ही होता है कि वे क्षण- 
प्रतिक्षण मगवान्‌की टीलार्ओको अपूव रसमयी ओर 
नित्य-नूतन ` अनुभव करते रहै--टीक वसे ही, जैसे 
कम्पट पुरुषोकषो लिर्योकी चचाम नया-नया रस॒ जान 
पड़ता है ॥ २ ॥ परीक्षित्‌ ! ठम एकाप्र चित्तसे श्रवण 


 । करो | यचपि भगवान्‌की यह टी अव्यन्त रहस्यमथी 
= म तम्दं खुनाता द्वै । क्योकि दयद्ध जाचाय-  ॥ 
# ष्यको गुप्त रस्य भी बतदादिया | 


ऋ क 
न्न ~ ~ 


:1} हई ` "चवि पिक्का; 


` ` ~" "व्री । 
1135 


92 1 व >: 9. * 















अ० १३ | दृशम्‌ स्कन्धे 
तथाघवदनःन्सत्यो रित्वा वत्घठपाल रान्‌ । | करते दँ ॥ २॥ वहते तुमसे कदी चुकाद् | 
क्रि भगवान्‌ श्रीकरष्णने अपने सारथी व्राच्त्रा्गेको मर्यु- 


सरिस्पुखिनिमानीय भगवानिदमन्रवीत्‌ ॥ ४ ॥ | स्प अधाघुरके सहते वचा च्या । इक्क वाद्‌ वे उं 
यमुनाके पुलिनपर्‌ ठे आये ओ उनपे क हनं रे-॥४॥ 














अहोऽतिरभ्थं पुकिनं वयखःः मर प्यारे मित्रो } यमुना जीका यह पुटिन अच्यन्त रमणीय 

= दै | देखो तो सदी, यद्धकी वाद्‌ क्रिठनी कोमख ओर 
खकेलिहम्पन्परदलाच्छ्चाटुकभ्‌ । खच्छ हं ! हम लोगे व्यि लेच्नेकी तो यदह क्षी 

सामप्री वधमान है ¦ देष्डो, एक ओर्‌ रंग-विरंमे कमयं 

सफुशत्सरोगत्थहतालिपतरिक- | दिले इए है ओर उनकी सुगन्धे ग्िचकर भरे गुंजार 


कर रहे ह; तो दृक्षी ओर सुन्दर-ुन्दर पक्षी बडा दी 
मधुर कल्य कर रे है, निस्की ग्रतिध्यनिसे सुमित 
बरक्ष इ स्थानी शोभा वडा रहे है| ५॥ अब 
| हमलोर्गोको यह भोजन कर लेना चाहिये; क्योकि 
दिन बहुत चह आशया है ओर्‌ इमलोग भूखसे 
पीडित हो रहे है| बडे पानी पीकर समीप दीषीरेः 
धीरे हरी-री घस चरते रद ॥ ६ ॥ । 


धव निप्रतिध्वानलसद्दरुमाङ्करुभ्‌ ॥ ५॥। 


अत्र॒ भोक्तव्यससःभिर्दिवा रूढं द्वुधादिताः 












वत्त! सपीपेऽपः पीत्वा चरभ्तु शनकेस्त गध ॥।६॥ 


ग्राठब्राखोने एक लते कहा--ष्टोक हँ, टोक्त है! 
उन्डाने बछडोको पानी पियकर हरी.हरी घाम छोड 
दिया ओर अपने-भपने छीके खोक-लोककर भगवान्‌के 
साथ बडे आनन्दे भोजन करने रगे ॥ 9 ॥ सत्रके 
जीचमे भगवान्‌ श्रीकृष्ण वेठ गये । उनके चार ओर 
वालनारने बहूत-सी मण्डयकार पंक्त्यां बना खीर 
एक-से-एक सटकर वे गये । सवके मुंह श्रीक्ष्णकी ` 
ओर ये जर सबकी अखं आनन्दसे विढ्रदीयीं। 
वन-भो जनके समय श्रीढृष्णके साथ ञठे इए राका 
दूसे शोभायमान हो रहे थे, मानो. कमली कणिकके 
चारो ओर उष्ठकी छोरी-बडी पुडिया घुशोभित डो त 
रदी ह ॥ ८ 1 कोई पुष्प तो कोई पत्ते ओर को 
कोर पल्ज्व, अंकुर, फ, छीके, छार एवं ह 
पात्र बनाकर भोजन कने गे ॥ ९ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
भौर श्राख्ा सभी परस्पर जपनी-जपनी मिन्न-मिन्न 


£ ~ 


3 मि ष 
रुचिका प्रदरन करते । कोई किसीको हसा देता, तो ` 


को$ खयं ही हेसतेरद्ते चोटः 
॥ .१)। वे जं भोजनं करने खग ॥ १० 1 (उ शः | 


ध = क, 
0 क क 


तथेति पाययित्वभिा वरछानाशभ्यं च्चादङे | 


युक्तरा चिक्थानि बु जः सम भगवद ञंदा ॥ ७ ॥ 


1} 4 4 - + 


ग< न्ट 

कृष्णस्य ष्यक युर्राजिमण्डङे 
इस्यानन; एुख्लटशो वजाभकाः । 

सहेपषिडा बिपिने षिरेजु 


ख्डदः यथाभ्मोरुहकणिकाया ॥ € ॥ 














केचित्‌ पुष्यते; केचित्‌ परलवेरुरेः फलेः । 





जिगिमिस्त्वमििर्दपद्धिश्वबुशुजुः कृतभाजनाः। ९ ॥ 










च मिथो दशेयन्तः खखमभोज्यरुचि पथक्‌ । 


= | य 
ॐ र 


 इसन्तो हासयन्तश्ाम्यवज्हुः शदेषरा; ॥१० 





^ १ 
(4 ऋ ` 








बिभ्रद्‌ वेणुं जठरपटयोः शङ्कवेत्रे च कक्षे 


वामे पाणो मघणकवलं तत्फलान्यङ्गरीषु । 


तिष्ठन्‌ मध्ये खपरिखुहदो हासयन्‌ नमंभिः स्वैः 


खगे लोके मिषति बुथ॒जे यज्ञथ्ग्‌ बारुकेलिः॥ ११ 





भारतेवं वत्सपेषु य॒जञ्जानेष्वच्युतात्मघु | 

















तवने द्रं विविंशस्वरणलोभिताः ॥१२॥ 
तान्‌ दृष्टा भय्षत्रस्तान्‌चे कृष्णोऽस्य भीभयम्‌ । 
मित्राण्याश्चान्मा विरमतेकानेष्ये वतसकानहम्‌॥।१३॥ 


इत्युक्तवा द्विदरीडज्ञगहरेष्वात्मवरसकान्‌ । 


ॐ 8 ॥.। + 
[- ~क ॐ ४ 3 प 
र |, ॥ । 6 +. + 1 
क „4 १ वि १ ष | ध # ॥ हि ॥ 
ष्‌ । + छक ब + 


विचिन्वन्‌ भगवान्‌ कृष्णः सपाणिकरवलो ययो।' १४॥। 
अम्भोजन्मजनिस्तदन्तरगतो मायाभंकस्येशितु- 
द्रष्टुं मञ्जु महितमन्थदपि तद्वसक्रानितो वरसपान्‌ । 
हः ` नीत्वान्यत्र ्रूढहान्तरदधात्‌ खेऽवसितो यः पुरा 
ह ` दष्टाषारमोक्षणं प्रभवतः प्राप्तः पर विखयमर्‌॥ १५ 


कृष्णो निचिकाय समन्ततः ॥१६॥ 


० (> 


= 
४ [ज 1 ४ 
कि 
# 


भोमद्भागयघतं 


॥ ० नैन ) 
र ~ 
ककव > ५ => ¬ क 


[ अ० १३ 


नणय 
[वि 1 त त 





श्रीकृष्णकी छटा सव्रसे निरार थी । ) उन्होने मुरदीको 
तो कमरकी फटे अगेशी ओर खोंसच्या था । सीग भौर 
बेत बगन्में दबा व्यि ये । वाये हाथमे वड़ा द्वी मधुर 
घतमिश्रित दद्टी-भातका प्रा था नौर अंगुष्म 
अदरक, नीवु आरके अचारमुरव्वे दवा र्खेधै| 
गवाठत्रार उनको चारों ओरसे घेरकर बैटे हए थे ओर वे 
खयं सत्क नीचे बेठक्रर अपनी विनोदभरी बातेसे 
अपने प्ताथी ग्ाल्वाेको हंप्ताते जा सहेये। जो 
पतमस्त यज्ञोके एकमात्र मोक्ता हैँ, वे ही भगान्‌ त्राठ- 
बालके पाथ वेठकर इस प्रकार वबाढ-ढीखा करते 
हए भोजन कर रहे थे भौर खगेके देवता आश्व्यचक्रित 
होकर यह भद्धुत टीला देख रहै ये॥ ११॥ 


भरतवंशशिरोमणे ¦! इस प्रकार भोजन क.रते-करते 
ग्वाढनाक भगवान्‌ की इस रस्तमथी ठीलामे तन्मय द्यौ गये | 
उक्ती मय उनके बड़ हरी-दरी घातकी ङ!ख्चसे घौर 
जंगल्मे बड़ी दूर्‌ निक गये ॥ १२ ॥ जव गाब्वा्ले- 
का ध्यान उस ओर गया, तब तो वे भयभीत हो गये। 
उस घतमय अपने भक्तोके भयको भगा देनेवाटे भगवान्‌ 
श्रकृष्णने कदा--“मेरे प्यारे मित्रो | तुमलोग॒ भोजन 
करना बंद मत क्ये । में अनी वछँको व्यि आता 
द्रः ॥ १३ ॥ ग्वाच्वाोसे इस प्रकार कडकर मगान्‌ 
श्रीकृष्ण हाथमे दद्ी-भातका कोर्‌ व्यि ह पहा, गफा्जं, 
कुञ्ञो एवं अन्धान्य भयंकर स्थानोमें अपने तथ। साधि्योकि 
नछडको ददने चल दिये ॥ १४ ॥ परीक्षित्‌ | ब्रह्माजी 
पद्लेसे ही आकाशे उपश्ित थे | प्रभुके प्रभावसे 
अघासुरका मोक्ष देखकर्‌ उन्हें बड़ा आश्चर्य हआ । 
उन्होने सोचा कि गीकासे मनुष्य-बारक वने इए भगवान्‌ 
श्ीकृष्णकी कोई ओर मनोहर महिभामयी ठीखा देखनी 
चाहिये । ेसा सोचकर उन्होने पदर ठो बछ्डोको 
ओर भगवान्‌ श्रीङृष्णके चठ जानेपर ग्वाञ्चागोको भी 
अन्यत्र छे जाकर रख दिया ओर खयं अन्तधान हो गये, 
अन्ततः वे जड कमव्की ह्वी तो संतान ह ॥ १५॥ 


भगवान्‌ श्रीकृष्ण बछ्डे न मिजनेपर यमुनाजीके 
पुलिनपर लौट भये, परंतु यहा क्या देखते हैँ कि 


पवाय्नाठ मी नदीं ह । तब उन्दने बनमे धूम-घूभकर 


7 11 (17760 खा] 1 | 


नि 





च्छ 


० १३1 दश्चम स्कन्धं ~ = 





[हि न ~ निषि गि 0 क 2 क) 


क्ाप्यदषटरान्तविंपिने वत्सान्‌ पालश्च विश्ववित्‌ । | चारो ओर उन्दं दूदा ॥ १६ ॥ परंतु जब ग्वाखाढ 

ओर बडे उन्हे की न मिले, तब वे तुरत जान गये 

सव विधित कृष्णः सदसाकजगाम ह ।। १७ | कि य सत्र ब्रह्माकी करतूत है । वे तो सारे विश्वके 

[व | एकमात्र ज्ञाता है ॥१७॥ अत्र भगवान्‌ श्रीकृष्णे 

ततः कृष्णा मद्‌ कतु तन्मात्रृणा च कखच | | व्रां ओर ग्ाव्वार्छंकी मातार्ओको तथा ब्रह्माजीको 

| भी आनन्दित करनेके ध्ि अपने-भापको दी वछड़ं ओर 
उभयायितमत्मानं चक्रे विश्वकृदीश्वरः ॥१८।। | ग्ारवार्को--दोनोके खूपमें बना चिया# । क्योकि वे हयी 
तो सम्पण व्रिशचके कता सवैरक्तिमान्‌ ईशर ई ॥ १८ ॥ 

यिद बत्स्प्रवत्क्षकारपक्वपुय्वत्‌ करारघ्यादिकं । परीक्षित्‌ ! वे बाट्क ओर बडे संख्यामें जितने ये, 
| जितने छोटे-छोटे उनके शरीर ये, उनके हाय पैर जैसे- 
यबदू बष्टिविप्णदैणुदलश्िग्‌ याचह्‌ विभूवाम्बरम्‌) | जैसे ये, उनके पात जितनी शौर जैषी उडियौ, सीग, 


बोरी, पत्ते भौर छीके ये, जेसे जर जितने वचरामूषण 





यावच्छीलशगुणाभिधाङृतिवयो यावद्‌ विहारादिश्ं | ये, उनके शील, खमाव, राण, नाम, रूप ओर अस्था 

जषी थीं, जिस प्रकार वे खाते-पीते ओर चग्वे ये, ठीक वैसे 

सवं विष्णुप्यं भिरोऽङ्गवदजः सथ॑खरूपो वभो \\१९।॥| ही ओर उतने ह ख्पोमि स्वखरूप मगवान्‌ शरीकष्ण प्रकट 

हो गये । उस मय यह सम्पूणं जगत्‌ विष्णुख्प हैः- 

सखथपाटमाऽऽस्भगोवर्सान्‌ प्रतिवाथोटमशर्सपेः । | यह वेदवाणी मानो मूतिमती होकर प्रकट हो गयी ॥१९॥ 

पवात्मा मगवान्‌ खयं हौ बछडे बन गये ओर खयं ही ष्वा- 

तरासपविहारश्च सीर बार | अपने आलमदरूप बछडोको अपने आत्मष्ठखूप ्वाक- 

कीडमारमनिहारंथ स्वात्म भानि ८५ नारके द्र|रा घेरकर अपने ही साथ अनेकों प्रकारके खेढ 

तेते इए उन्दने त्रजमें रवेश्च किया ॥ २० ॥ परीक्षित्‌। 

जिस ्राख्वाक्के जो बडे थे, उन्हं उसी ग्वाख्वाख्के 

रूपसे अरुग-अ्ग ठे जाकर उसकी बाखलख्मे घुसा दिया 

तत्तदात्माभवद्‌ राजंस्तत्तत्स प्रविष्टवान्‌ ॥२१॥ | ओर तिभिनन वाक्कोके रूपमे उनके भिन्न-मिन्न घरोम 
चले गये ॥ २१॥ 

तर्म्‌ातर वेणुखस्वरोत्थिता ग्वाव्बार््ेकी मातारं बोष्ुरीकी तान घुनते ही जल्दी- 

= 6 से दौड़ आ्थीं | वार्वा बने हए परत्रह्म श्रीकृष्णको 

उत्थाप्य दोर्भिः परिरभ्य निभरम्‌ । अपने बच्चे तमश्षकर हा्थसि उगकर उन्होने जोरसे 

स्नेस्नुतस्तन्यपयःसुधासवं हृदयसे क्गा छिया । वे अपने यन ग 

, अधिकताके कारण सुधास भमी मघुर्‌ ओर आवसे भी 

मत्वा प्र ब्रहम सुतानपाययन्‌ ।।२२॥ | मादव चुचवाता इभा न. 

तते नृपोन्मर्दनमञ्जलेपना- परीक्षित्‌ । इषएी प्रकार प्रतिदिन संध्यासतमय 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण उन ॒श्वायबा्जोके रूपमे वनसे गोट 

| रङ्ाररक्षातिलकाञ्चनादिभिः अति शीर अपनी बाज्घुकषम गीगओंसे मातार्भोको 

= 1 + मगचान्‌ सर्वमर्थं ह 1 वे बरहमाजीके चुरये हु ग्वाला ओर बुङोको ला सकते ओर बरछङौको खा सकतेथेः किंतु इसे जह्माजीकामोद ` 

~ वुरन्‌ होत। भर वे भगवान्‌की उस दिव्य मायाका रे श्वय न देख सकते, जिसने उनके विश्वक्रती हदोनेके अभिमानको नष्ट ` 

र | ड किया | इसीख्यि भगवान्‌ उन्हीं ग्बालबरार ओर बछड़ोको न लाकर खयं दी वेसे ही एवं उतने ही ग्वाखार ओ बडे बन गये | 


तत्तद्ररसान्‌ प्रथङ्‌ नीत्व! तत्तदगोष्ठे निवेश्य सः। 



















न २०८ भीमद्धागवते [ अ० १३ 
संलाकितः खाचरितैः प्रहर्षयन्‌ भानन्दित करते | बे माता उन्हे उबटन कगाती,नह यतौ, 


चन्दनकां केप करतीं दौर अच्छे-अच्छे वज्ञ तथा 
खायं गतो यामयमेन्‌ साधद! ।\२३॥ | गहनोसे सजातीं । दोनों पह्यके वीमे डीठसे बचानेके 
व्यि कालका डिटौना खगः दतीं तथा भोजन कराती 


गावस्ततो गष्टटपेस्य सत्वरं जीर तरह-तरहसे बड़े सड्-प्यारसे उनका. व्यलन-पाठन 
करतीं | २३ ॥ ग्वायिनोंके पवमान गौरं भी जब जंगें 

हुङ्ारघोषेः परिषटतसङ्खता्‌ । मसे चकर जल्दी-जल्दी लौटतीं ओर उनकी हकार 

| नकर उनके प्यारे नछडे दौडक्र उनके पास शा जति, 

खकान्‌ स्वकान्‌ वरसतरानपाययन्‌ तत्र वे बार-बार उन्हं अपनी जीभसते चाटतीं ओर अपना 


दृध पिरतीं । उस स्मय स्नेहकी अधिकताके कारण 
सुहरिहन्त्यः सवदोधसं पयः !\२४॥ | उनके धनोसे खय ही दूधकी धारा बहने गती || २४॥ 
इन॒गार्थों ओर षालिनांका मातृभाव पहलेजक्ता ही 
एेखयज्ञानरहित ओर विद्यद्ध था ! हँ, अपने अष्तडी 
पुश्रोकी अपेक्षा इस समय उनका स्नेह अश्य अधिकं 
था । इसी प्रकार भगवान्‌ भी उभके पठे पुत्रोके समान 
ही पुत्रमाव दिखला रहे थे, परंतु भगवान्‌ उन बाटकोँ- 
= के-जेसामोहका माव नही या कि में इनका पुत्र द ॥२५॥ 
वजोकसां स्वतोकेषु स्गहस्ल्यान्द् सन्वह | श्षपने-अपने बाटकोके ग्रति त्रजवाधिरयो कती स्नेह-ठता दिन- 
प्रतिदिन एक वबतक धीरे-धीरे बहृती ही गयी | यह्यैतक 
शनेनिःसीम वषे यथा कृष्णे तवपूव॑वत्‌ ।(२६।। । कि पहले श्ीकरण्णमें उनका जा असीम ओर पूवं प्रेम 
| ¦ | था, वेस। ही अपने इन्‌ बाकककि प्रति धी हो गया ॥२६॥ 
इत्थमात्माऽऽस्मनाऽऽत्मानं बत्सरालमिषेण सः । | इस प्रकार सवासा श्रीहृष्ण वच्डे ओर्‌ प्वायनायेकि 
| बहाने गोपा बनकर अपने वाटकषपसे वत्सखूपका 
पाठन करवै इए एक वर्षतक वन ओर गोष्ठमे क्रीडा 
करते रहे ॥ २७ ॥ 





गोगोपीनां माततासिन्‌ सां स्नेदद्धिष्छं घिना | 


पुरोवदाश्चपि हरेस्तोकता मायया धिना ।(२५॥ 


















पाठयन्‌ वत्सो वषं चिक्रीड वनगोष्टयोः ।॥२७॥ 


8 एकदा चारयन्‌ वत्सान्‌ सरभो वनमाविशत्‌ | अव एके वत परा होनेमे पोच-छः रातं शेष थी, 
~ तब एक दिन भगवान्‌ श्रीकृष्ण वलराम जीके साथ बड. 
पञश्चषासु त्रियामासु दायनापूरणीष्वजः ॥२८॥ | कौ चरते इए वनभ गये ॥ २८ ॥ उक्त समय गौर्‌ 


ध विदूराचरतो गोवधेनकरी चोटीपर धास चर रही थी । वसे 
` ततो वि गावो वर्सालुप्रजम्‌ । उन्होने त्रनके पास दही धा चरते इए बहत दूर 


अपने बखछ्डोको देखा ॥ २९ ॥ बछङडको देखते 
ही गोर्ओंका बात्सस्य-स्नेह उमड़ आया । वे अपने. 
आपकी सुध-बुध खो -बेदीं ओर ग्वालोके रोकनेकी कुछ 
भी परवा न कर जिघ्ठ म्गसेवेन जा सक्तेये, उप्त | 
स गोव्रजोऽत्य या पदु्गमागं | | मागंसे इंकार करती हई बडे वेगसे दोड पड़ी । उप॒ 


नाद्िक्षिरसि चरन्त्या दद्शचस्दरण्‌ ॥२९॥ 


$ ~ 


क = ~~ अक 


` इषटराथ तरस्नेदवशोऽस्छतात्मा 


# 1 





ने + >" 3 र 
क ¢ + 


न 
रि क 
= - 
- च्व ^ 
क~ 









अ १२ | दश्चम्‌ स्कन्धं 
- हिषात्‌ कडट्ग्रीव उदाखपुच्छो- समय उनके यनि दृध वहता जाता था जौर उनकी ` 


गरदन सिंकुडकर डीश्से पिक गयी थी | वे प्छ तया << 3 
ऽमाद्ङकतंससुपया जवेन ॥३०॥ ९, क इतने नेगसे दोड़ रदी थी कि माम होता 
या, मानो उनके दोद्वीपेर्‌र्ह॥ ३० ॥ जिन गकि 
जोर भी बछ्डे हो चुके ये, वे भी गोवर्धनके नीचे अपने 
पठे बछडकि पाप दौड़ आयीं ओर उदे सेदवदा 
अपने आप वहतां इहु दू पिलाने च्गीं | उस्र समय 
वे अपने बचयोका एक-एक अङ्ग पेसे चादसे चाट रही थीं, 
मानो उन अपने पेट रख ठगी | ३१ ॥ गोपने उन्दं 
गोकसतद्रोदनायास मीभ्यलञ्जोरमन्युना । रोकनेका बहुत कुछ प्रयत्न किया, परंतु उनका क्षारा 
प्रयत व्यथ रहा । उने अपनी विफटतापर कुछ च्ना 
ओर गार्योपर बडा क्रोध आया | जन वे बहत कष्ट उढा- 
क्र उष कठिन मागेद्धे उघ्ठ स्थानपर पद्धंचे, तन उन्हनि 
बछडके साथ अपने बाटलकोको भी देडा ॥ ३२॥ 
कः | अपने बर्चोको देखते दी उनका हृदय प्रेम-रसे सरावोर ` 
उ{ताङरयथा अवमन्थदाऽसक्छर्‌ । हो गया | बा््कोके प्रति अनुराण्की दाद आ गयी; 
उनका क्रोधन जाने करा इवा हो गया | उन्हनि 
| अपने-अपने वःलक्तक्तो गोदमं उठाकर हदयसे ढगा स्या 
ओर उनका मस्तक सूँधकर अयन्त आनन्दित हए ॥३३॥ ` 
बूढे गोर्पाको अपने बाञकोके आलिङ्गनसे परम जानन्द 
प्राप्त इभा । वे निहाठ हो गये । पि बडे कष्टसे उन्हें 
स ध: छोडकर धीरे-षीरे वसे गये । जानेके बाद्‌ भी बान्कोके ` 
ततः श्वयो णोपास्तकाश्लेषसुनिदताः जोर उनके आलिङ्गनके स्मरणसे उनके नेत्रसि व्रेमके ` 


रच्छरच्छनैरपगताशतद्‌ुस्प्रस्दश्रवः . ॥३७॥ | स्‌ बहते रदे ॥ ३४ ॥ 


सम्य गादोऽधो बर्साच्‌ वर्कषवत्योऽप्यपाययन्‌ । 


भिरन्त्य इव चाङ्नि छिहन्त्यः खोधसं पयः।२१॥ 


दुगोष्यद्च्ट्रतऽभ्येत्य गोबर्सेद श्चुः सुतान्‌।।३२॥। 


तदीश्षम्‌ सख दररष्डवाक्ञेय! 


8. 2) १ + वि । छः 


{~ =< ¢ 
दभः परिरम्य भूधनि 


# । 3 #॥ ५4८ । कक कक 5 ` 


1 
ॐ 


प्रणेल्पुः परमां इदं वै ।३३॥ 


~ 


। 














वजख रामः प्रमद्धेवी्षथोत्कण्ठ्यमुक्षणम्‌ । बकरामजीने देखा कि व्रजवाप्री गोप, गौ जोर ` 
| १व।लि्नोकी उन संतार्ोपर भी, जिन्होनि अपनी माका 
ुकतस्तनेष्वपत्यष्बप्यहेतुविद्‌ चिन्तयत्‌ ॥३५॥ | द्ध पीना छोड दिया &› क्षण्रतिक्षण परम सम्पत्ति अ 
उस्तके अनुरूप उत्कण्ठा वदती ह्वी जा रदी है । तद 


विचारमं पड़ गये; क्योकि उन शरण 
किमेतदद्धुतभिव बासुदेवेऽखिलात्मनि । य ह 







अजस ॒सा्मनस्ोकेषवपूवं॑प्रेम वरथते ३६] | खा 8 इन बाजक शोर बड्पर मी बढता जा दा 
है ॥२६॥ यह कोन-सी म। त है { कोस जायी ह ! 


यह्‌ किसी देवताकी दै, मनुष्य 






3 






4८, 0.4 र" 
"व ~ # ९ ॐ 
क वै म = क 


> < 
केयंवा छत आयाता © || 4०१९ २.98 | 


११ कै 
= 
त 


भर. ० ज्र 2.--२.७. 





` न. --- यय भ वामकः = 8", अ कनका म ऋ 








इति सञ्चिन्त्य दाशार्हो वरसान्‌ सवयसानपि । 
सवोनाचष्ट बेङण्ठं चक्षुषा वयुनेन सः ॥३<। 


नेते सुरेशा ऋषयो न चैते 


त्वमेव भाश्च भिदाश्रयेऽपि। 





सवं पृथक्त्वं निगमात्‌ कथं बदे- 


त्यक्तेन इतं प्रभुणा बलोऽवेत्‌ ।२९॥ 
॥ [रात्ममानेन ुव्यनेहसरा । 


पुराबरदन्दं कीडन्तं द्द सकलं हरिम्‌ ।॥४०॥ 















यावन्तो भो बाला सवत्साः सवं एब हि । 
मायाशये शयाना मे नाधापि पुनरुत्थिताः ॥४१॥ 
{ ध इत एतेऽत्र ॒इत्रत्या मन्मायामोहितेतरे । 
तावन्त एव तत्राम्दं क्रीडन्तो विष्णुना समम्‌ ।४२॥ 
| एवमेतेषु मेदेषु चिरं ध्यात्वा स आत्मभूः । 


सत्या; के कतरे नेति ज्ञातु नेष्टे कथञ्चन ॥४३॥ 


श्रीमद्भागवत 








प्रायोमायास्तु मे भतं्नान्या मेऽपि बिमोष्िनी॥ ३७ 


। अ० १३ 
प्रसुकी हयी माया है । भौर क्षिसीङी सायमें देवी सामरथ 
न्दी, जो सुञ्चे भी मोहित कूर ठे" | २७ | बठर्‌ःमजीने 
एेसा विचार करके ज्ञानदश्िदधे देखा, तो उन्हे र्ता सादट्म 
हआ कि इन क्तव बछडं भौर ग्वालगालोद् सूपे केव 
श्ीकृष्ण-ही-श्रीकृष्ण्‌ हँ | ३८ !। तव उन्न श्रीकृष्णसे 
कडा---“भगवन्‌ | ये ग्वार्वा> ओर्‌ बडे न देवता 
ओरनतो कोई ऋषि दही इन भिन-मिनन ख्पोक्षा 
आश्रय लेनेपर भी जप अकेले हयी इन रूपमे प्रकाशित 
हो रहे हैँ | कृपया स्पष्ट करके योडमे ही यह बता 
दीजिये कि आप इष प्रङ्गार्‌ वख्डे, वादक, सींग, रस्ी 
आदिके रूपमे अख्ग-अख्ग क्यो प्रकाशित हौ रहे है ¢ 
तन भगवानूने ब्रहमकी सारी करत्रूत नायी नौर 
बल्रामजीने सन बातं जान} ३९} 





परीश्षिच्‌ | तबतक ब्रह्माजी त्रयो त्रजमें जट 
भये | उनके काल्मानसे अबतक कैव एकं त्रुटि 
( जितनी देरमे तीखी पुईसे कमक्की पडी चिदे ) 


समय व्यतीत इअ था | उन्दने देखा क्ति भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण वाय्वा ओर बछड़के पाय एक खाच्से पय्नी 
भांति द्यी क्रीडा कर रहै है}! ९०|| वे होच्ने चमे 


“गोकुर्च्मे जितने मी म्ाट्वाङडं ओर ब प द 
तो मेरी मायामयी शाय्यापर सो रहे दै उन 
मेने अपनी मायासे अचे कर्‌ दिया था; वे तवते 
वतक सचेत नहीं हए ॥ ४१६ तव येरी माय 

मोहित गाख्वार ओर बछडोके अतिर्कति ये उतने ही 
दूसरे बाठ्क तथा बड़े कसे आ गये, जो एकत प्ाच्से 
मगवानूके साय खेल रहे हँ १ ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी दोनों 
स्थार्नोपर दोनोको देखा ओर बहत देरतक ध्यान करकौ 
अपनी ज्ञानटृष्टिसे उनका रहस्य खोध्नां चाहा; परंतु 
इन दोनमिं कौन-से पहठेके ष्ा्बार हैँ ओर कौन-से 
पीके बना घ्यि गये रहै, इनमेसे कौन सच्चे है ओर कौन 
बनावटी- यह बातवे किसी प्रकारन पमञ् सके ॥ ४२॥ 
मगवान्‌ श्रीकृष्णकी मायामे तो समी सुग्ध हो रहे है, 
परंतु कोई भी मायामोह भगवान्‌का स्पर नीं कर 
सकता । ब्रह्माजी उन्दी भगवान्‌ श्रीकृष्णको अपनी मायासे 
मोहित करने चके ये । कितव॒ उनको मोहित करना तो 


4, : ० 
[कोक | [३ (1 
# 
>| 3 


4 


ऽपि खयमेव विमोहितः ॥४४॥ । दूर रा, वे जन्मा नपर भी भपनी दी मायासे जपन 






कै ५ 
त क नि क + ह # (` 
ज न्क धि क 
‰ - च, > न 
क + कन्न र क कि च त 
ई ध 9 ्ः । च ्ि । > 9 





जक कक कका क कि जका > 6 1 


` कै क च ऋ क कके कः क कः 


कि ^ 





१ | 





अ० १३ | 


[क य क ऋक = क ऋ 
जः ऋक [क 1 रि 


द्ञ्चभ्‌ श्छन्य 














तभ्यां तमावन्नेहारं खद्योता्विशाहनि । 


हतीतरमायपयं॑जिहन्त्यादमनि युञ्धतः ॥४५॥ 


ताषत्‌ सवे वत्छणलाः पर्यतोऽजख तत्क्षणात्‌ 
उथुददयत्त घनर्यधमाः पीदक्मोशेयवासक्ः ।४६॥ 
चतशजाः शह्न्यक्रग्द्‌एराजीवपाणयः; । 


दिरीडिनः इण्डदिनो हारिणो वनभालिमः । ४७ 


` श्रीवर्खाङ्ददोर्ट्नकस्बुकङ्णपाणयः 


[9 मिन 
४ 


दटदभौताः कटिद््राज्ुरीयकेः ॥४८! 
हू पूगास्त॒लसीनवदासभिः । 
कोरः रवेगघ्रेषु भूरिपुण्यवद पितः ।॥४९॥ 
चन्द्रिक धिश्वदस्मेरः सारुणााङ्गवी शितेः । 
ख्ना्थानाभिव रजःस्वास्या सष्टपारकाः ।*५०॥ 
आत्सदिस्तस्बपयन्देमृतिमद्धिश्वरशचरेः, । 
नृत्पगीतायनेकर्हैः पृथक्‌ परथगुपासिताः ॥५१॥। 
अभिपा्ैमहिसभिसलाद्याभिरविभूतिभिः । 


चतुर्धिशषतिभिस्त्वेः परीता महदादिभिः ।५२॥ 


कारुखभावक्षस्कारषछछमकमेगुणादिभिः । 


स 

@ ००४९ श्ल (९४५ (` १ ध ९५ त ९ ` ॥४ {| 

ए. ॥ ९ “~ ++ ९.५ ६.५ = केर ~र = -च क्र - ६ = ५ त 
७ द 2 प 


+. १ २ ्ः 





आप मोहित शो गये ॥ ४४ ॥ जिस प्रकार रात्केषोर 
अन्धकारे कुदरेके अन्धकारका ओर दिनके प्रकादमे 
जुगनुके प्रकाराका पता नदरी चक्ता, वेसे ठी जब श्षुदर 
पुरुष महापुरषोपर अपनी मायाक्ता प्रयोग करते है, तब 
वह॒ उनका तो कुछ बिगाड़ नहं सकती, अपना ही 
प्रभाव खो वेठती है ॥ ४५ ॥ 


ब्रह्माजी विचार कर्‌ ही रहै ये किं उनके देखते. 
देखते उसी क्षण सभी वाय्वा ओर वछ्डे श्रीकृष्णे 
रूपमें दिखायी पड़ने ठग । सब-के स॒व सजल जख्वरके 
पमान इयाप्रवणे, पीताम्बरधारी, शङ्ख, चक्र, गदा ओर 
पग्मसे युक्त--चतुभुज । सबके सिरपर मुकुट, कानेमि 
कुण्डक ओर कण्ठोमे मनोहर हार तथा वनमागार्प शोभाय- 
मान हो रदी थीं ॥ ४६-४७ ॥ उनके वक्षःस्थलपर 
एुवणकी घुनहटी रे्वा-- श्रीवत्सः, बाहुर्जम बाजूवंद, 
कलग्रदरयो मं शङ्खाकार रत्नों से जडे कंगन, चर्णोमि नूपुर 
शर कड़े, कमरमें करधनी तथा अंगु अंगूवियां 
जगमगा रदी थी ॥ ४८ ॥ वे नखसे शिखतक समस्त 
अङ्खोमिं कोम ओर नूतन तु रक्षीकी मागर, जो उरं 
बड़े भाग्यरारी मक्तनि पहनायी थी, धारण कयि इए 
ये ॥ ४९ ॥ उनकी मुस्कान र्चोदनीके क्षमान उञ्ज्वख 
थी ओर रतनारे नेत्रोकी कटाक्षपर्णं चितवन बड़ी ही 
मघुर थी । रेसा जान पङ्ता था मानो वे इन दोनोके 
दवारा स्वगुण ओर रजोगुणको खीकार करके मक्तजनेकि ` 
हदयमें शुद्र खटा जमाकर उनको पूणं कर रहे 
हँ ॥ ५० ॥ ब्रहमाजीने यह मी देखा कि उन्दीके-जेसे ` 
दूसरे ब्रहमासे लेकर तृणतक स॒भी चराचर जीव मूर्तिमान्‌ ` 
होकर नाचते-गाते अनेक प्रकारकी पूजासामभ्रीसे अट्ग- 
अलग भगवानूके उन क्तव खूपोंकी उपाप्तना कर रे 
दै ॥ ५९१ ॥ न्ह अल्गण-अव्ग अणिमा-मदहिमा आदि ` 
सिदिर्या, माया-विधा आदि विभूतिषों ओर महत्त आदि ` 
चौ बीता तत्व चारों ओरसे घेरे हए हैँ ॥ ५२४ 
क्षोभ उत्पनन करनेवाग काल, उसके परिणामका कारण 
स्लभाव;, बासनाओंको जगनेवाखा संस्कार, 
कमं, रिषय ओर फल सभी मूर्तिमान्‌ हे 
प्रत्येक खूपकी उपासना कर रहे है । 








ए, 


| भगवानूके ४5 
नुक सत्ता 






। ओर महतताके । त न सभ।क। पत्ता आर्‌ महत्त 


अ 














२१२ शीमद्धागवत [ ० १३ 
। ‡ र म = 
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्र करंसमुतयः अपना अस्तित्व खोवेटी थी! ५३} ब्रह्माजीने यद 
मी देखा कि वे सी भूत, भिष्यत्‌ जौर वर्तमान काच्के 
दारा सीगिह् न त्रेकाखदाधित सत्य हैँ । ३े सव- -- 


1 सणृष्टभूरिम। हष्त्म्या अपि ह्यपि ददल्‌ ।1*६॥। कै-सन खयप्रकार ओर्‌ केर अनन्त आभन्दश्चद्प है | 
उनमें जडता अथवा चेननतःका सेदभाव नहीं ४ | प 

सव्-के-सव एकस है | यद्टौतश दि उपनिषद 

तत्वनज्ञानिर्योकी दृष्टि भी उनकी नन्त महिका स्परो 

| नहीं कर सकती}! ५४ \ ट प्रार्‌ तन्याजानं एक 
साथदही देखा कि ३ -सव-के-पब उन परब्रह्म परमासा 


4 ५ 


एवं द्द्‌ टदकाजः परत्रहात्सनोऽखिखान्‌ । 


श्रीक्ष्णके ही खशू्प है, जिनके प्रःङसे यह दारा (~ 
यख भाला सयभिद्‌ विभाति शचशचरम्‌ ॥ ५९५ | चरा वर जगत्‌ प्रदाच्धित हौ रहः है ! “५५ + | 
ततीऽतिङ्कतुकोद्शत्य स्तिभितेश्दशेन्द्रिथः । यह अत्यन्त अाश्चर्गदय इदय देवकर त्लाजी तो 
त रह भय | उनव्मी ग्यारह इन्द्रिया ( खि दर्मन्द्रिय, 


+ ण पाच्च ज्ञानद्िय ओर एकर मन) क्षुभ्य एदं स्तब्ध रई 
। ` - तद्त्नादूद्‌जस्तूष्छ पूटन्यन्तीव पुत्रिका | ^ &।। ग्य | वै भगत्रान्‌के सैजसे निस्वजं हो ् भीन हं 
ॐ गश्रे | उस समय वे रेसे स्तब्ध होकर खडे रह गये, 





1; | , मानौ व्रनके अधिष्ठातर-देबत्ताके पास एङ ५तठी खडी 
३३. इतीरेशेऽतक निजमहिमनि स्वप्रमितिके हो | ५६ ॥ परीक्षिद्‌ ! मगक्रन्‌क! खद्ूप तकसे परे 
५1. है । उसकी सदिमा असाधारण दै } वह खय॑प्रका्चः 












चे, 
च 


आनन्दखरूप ओर माशासे अतीत है} देदान्त भी 
साक्षातरूपसे उसका द णन करम अमं है, इयय्िये 
उससे भिनका निषेध करके आनन्द ख्य व्रह्मा किकी ~~ 
+ | ॥ | द्द किमिदमिति बा श्यति कषति | मकार ङक सेत करता हे । यग हाजी समल 
` विवा्कि अधिपति है, तथापि सगबानूके प्विव्यद्वरूप- 
को वे तनिक मोन समञ्च सके यह क्या है! य्ह : 
तक्र क्कि वे भगवान्‌के उन मदिमामय खूपको देखनेमे । 
भौ अक्षार्थ द्यो गये | नकी ओंखे सद गयीं ¡ भावान्‌ 
श्रीकृष्णे व्रह्माके इष॒ मोह ओर असमथतःस आनिकर 


ततोऽर्गाकप्रतिलन्धाश्चः छः परेतवदस्थितः ) विना किसी प्रयाक्षके तुरत अपनी मायाका परदा हटा 


परत्राजातोऽदन्निरखनथुखत्र्मकविती । 





` चछादाजो ज्ञात्वा पदि परमोऽजाजवनिकम्‌ ५७ 





भ दिया ॥ ५७ ॥ इससे ब्र्माजीको बादयज्ञान छग | चे 
< मानो मरकर फिर जी उठे । सचेत ्षोकर अनशने ज्यो- 4 
दर #िव्य वै दृ्टीरत्वष्टेदं सहात्वश ॥५८॥ | यो करके बड़े कखे जपने नेत्र खोरे । तव ठ उने 

3. अपना दारीर ओर यह जगत्‌ दिखायी पड़ा ॥ =८ ॥ 


| किर श्रह्माजी जब चासो भर देखने लगे; तव पहले ` 
म्‌। । दिश र उसके बाद ठत यु इदावन = 


~ क ~ 
< ॥ 
क + 





(1 








"ना भि न्न 


ऋ ~क 


क 











अ० १६३] दृशम्‌ स्छन्धं २१३ 
---- 9 (~ 

तुन्द्‌न्‌ जना न यद्ुलादय सुन्रद्रयद्‌ ।५९॥। | दिखायी पड़ा । इन्दाव्रन सवके व्यि एक-सा प्यारा है | 

५ जिधर देखिये, उधर ही जीवको जीवन देनेवाटे फलं 
यत्र मनुगृदुवराः शदहासच्‌ व्म्रगदयः। 


| ओर एसे ्दे दए, दरे-हरे पर्तये दडइच्हाते इए 
प्चराणीयःनितादष्द्धवशदतर्वधिश्थ ¦ ६०; | दश्षेकी पतिं छोभा पारदी ह॥ ८९॥ मगवान्‌ 
| श्रीड्ष्णकी टीखामृपि होनेके कारण इन्दावन-घामम क्रोध, 
। तृष्णा आद्रि दोष प्रतरेदा बह्वी कर सकते रौर बह 
| खमात्रसे ही परस्पर दुस्यज वेश रखनेत्राले मनुष्य ओर 


{2 श्त श्य 1411. १ ८ (3 ~ „=, 
। (नमननाक पञ्यु-पक्षी मी प्रेमी पित्रकि मान हिर-मिकर एकः साय 
वताय सखीनिव परा परितो तिचिन्व- रहते है ॥ ६० ॥ ब्रह्मजीचे बृन्दावनका दशान करनेके 


वाद देखा कि अद्वितीय परन्रह्म गोपव॑राके वाटकका-सा 

[व्व कर रहा है । एक होनेपर भी उसके सखा रहै, 
अनन्त होनेपर भी वह इधर-उधर घुम रदा है ओर उस- 
द्र ज्ञान अगाध ्योचेपर यी वह अपने वाट्वार ओर वड 
को द्रढ रहा है । व्रह्माजीने देखा कि जसे भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण पे अपने हाथ ददही-भातका कोर व्यि उन्हें 
रद रहे ये, वेसे द्री अन भी अकेठे ही उनकी खोजमें 
लगे है}! ६१ मगवान्‌को देखदे दी ब्रह्माजी अपने 

इन हंसपरसे कूद पड़े ओर कषोनेके समान चमकते 
इए अपने दारीरसे एृथ्वीपर दण्डकी मति गिर पड़ । 
उन्होने अपने चारो सुकुटोके अग्रमागसे भगवान्‌कते चरण्‌- 
कमर्छोका स्पर्ञं करके नमस्कार किया ओर आनन्दके 
जघुओकी घारासे उन्हें नहम दिया ॥ ६२ ॥ वै 
मगवान्‌ श्रीकृष्णकी पहले देखी इई महिमाका बार-बार 
ह्मरण क्दते, उनके चरणोपर गिरते ओर उठ-उठकर 
फिर.पिर गिर पडते । इधी प्रकार बहत देरतक वे भगवान्‌के 
चरणोमिं डी पड़ रहे \\६३॥ फिर धीरे-धीरे उठे ओर अपने 
नेत्रोके आंसू पछि ! प्रेम ओर सुक्तिके एकमात्र उद्गम 
मगव्रान्‌को देखकर उनका सिर इक गया, वे कीपिने 


~ ~~: ~~~ (~ 3 ५ 
~~ {इ [न =  ] ड ऋ न्क 1 र्न 
ध । < ९५६ ३१८ (९४५) ८६१०५५६4 


अनृक्क गृ %ृअखरकत्‌ श 
नस्ल! उुदश्रजरुरकताभिषेकम्‌ ।६२॥ 
इत्थाःयःरभय्‌ दूष्यस्य बिर्ख पादयोः पतन्‌। 


कैच 


शस्ते हितं प्रष्टं स्त्वा स्परत्वा पुनःपुनः।६२। 


= कर च छक क >  । 
द्पदीशष्य भियस्रद्न्धरः। 


त्‌ा ५ ११दग्त्‌र 
दताञ्जलिः प्रभष्नाय्‌ समाद्ितः 


{7 
८ १ 
न 
(=| 
> 
०५ 
1 
ह. 
[श्री 
(१५1 
८५, 
३ 
[1 
7 # 
3" 
1 
~ =-= न वणन अ गद ाकयकय को कय जके 


गद्गद वाणीसे वे भगवान्‌ की स्तुति करने लगे ॥६४॥ 


सेष्युगद्द्यरुतेटया ६४} 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां सहिताशं दमस्दन्धे 
ूर्वधे त्रयोदओोऽव्यायः ॥ १२ ॥ 


॥॥ 


न न्क द क 
नि 4 र 
न = क, 
> „+ धि १७ 4 ¶ | च |. 4 ९ | += 
 “: > 
व ७ "~ 
(= ५ ०. 
च क" अ ॥ | 
जि + ~ ~>, ॥ ४ ४ = तः = [= श ज के. । क 








४ प) , 1 + 


टे | अञ्जलि बोधकर बड़ नम्रता ओर एसाग्रताके साथ 





















| श्रोमद्धाशवत [ अ० १४ 


अथ्‌ चतुदंशेऽध्यायः 
नह्माजीके दवारा भगवान्‌्टी स्नुति 
बह्मोवाय आी्रह्याजीने स्दुति क्ीी--प्रभो | एकमात्र आप 
ही स्त॒तिं करने योध्यं हैँ । म आपके चरणो नमस्कार 
नोमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिद्स्नराय करता हँ | आपका यह शरीर वर्घाीकालीन सेधके समान 
श्यामल है, इसपर स्थिर बिजलीके समान श्विकमिल-क्िल- 
मिल करता हज पीताम्बर रोम पाता है, अपकरे गलते 
गुज्ञावरतंसपरिषिच्छरसन्णुखाय । दुष चीकी मास्‌; कानों मकराक्रति ङण्डड तथा स्िरपर्‌ 
मोरपंखोका मुकुट है, इन एवक्फी कान्तिद आपके मुखपर 
बन्यसजे कवरुवेत्रदिषाणवेणु- अनोखी छटा स री है ! वक्षःस्यल्पर व्टकती हई ^ 
वनभाग ओर नन्ही-सी हयेलीपर ददही-धातका कौर, 
््मशिये म्रदुषदे पश्पाङ्गजाय ॥ १॥ बगलमे वेत ओर लीग तथा कमश्की षएेटर्मे आपकी 
पहचान वबतानेगरी सुरी शोभा पारडी है} आपके 
कमल-से सुकोमर परम सुकुमार्‌ चरण ओर यह गोपां 
वाकका सुमधुर वेष । ( यै ओर कुक नहीं जानता; 
बस, मेँ तो इन्हीं चर्णोपर निछाव्र ई ) | १ ] खयं- 
प्रकाश परमात्मन्‌ | आपका यह ॒शओीविग्रह् भक्तजर्नोकी 
गासा-अभिलषा पूणे करनेवाला दै } यह पदी 
चिन्मयी इच्छाका मूतिमान्‌ खर्प सद्र आपका साक्षात्‌ 
कृपा-प्रसाद है । मुञ्चे अनुगृहीत करमेके चयि डी आपने 
इसे प्रकट किया है | कौन कहता है कि यह्‌ प्तभू्तोकी 
रचना है १ प्रमो | यह तो अप्राकृत छ्द्ध स्मय है | न 
मे या जौर कोई समाधि लगाकर भी आपके इस सचिदा- 
नन्द्‌-विग्रहकी यदिमा नहीं जान सकता । दिर आसा- 
नन्दानुभवल्वरूप सान्नात्‌ आपकी घी पदिमासो तो कोई 
एकग्रमनसे भी केसे जान सकता है १६२ ॥ प्रमो | 
जो खोग ज्ञानके व्ये प्रयत्नं न करके पने स्थानमे हयी 
सित रहकर केवल सत्सङ्ग करते है ओर आपिक्ते प्रेमी 
संत पुरूकि द्वारा गयी हदं आपकी रील्ा-कूथाङम जो 
उन टोगोके पाप रष्येसे अपने-आप सुननेको भिक्ती है, 
सरीर, वाणी ओर मनसे विनयावनत ह कर्‌ सेवन करते 
शुततिगतां तहुवानोभि द_ यतक किं उसे द्वी अपना जीवनं बना ठते हैः ॥ + 
| उसके विना जी ही नदी सकते-- प्रभो | यपि आपपर | 
^ 
; 








॥ 


अस्यापि देव वषो मदलुग्रहख 


स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि । 
नेञे सहि त्ववसितुं मनक्षाऽऽन्तरेण 


साक्षात्तवैव रि्ठतात्मघखासुमूतेः ॥ २ ॥ 
















च, 


= ८ स. कोई कभी विजय नह प्रात कर्‌ कता, फिर 
| य प्राय अरत जवाऽन्यामसित चटकया 8 |॥ भी वे रि विजय श्राष्च क्‌ ठेते ठै अष उनके ग्रेमके 






$ ~ । 
` च [न + ` ^ ("क दू 
क ज - ॥ न्न" ह शत 
६ # ५; =) र न) " ` "चिः ५, 
“ ग ५ [ 4 12 १1 >^, 11 ह ॐ दः क -- ~+ 
क्री _ -* 6 मी क 1 ति 
;4 01 ध्व श १ =>. - 
| ५ १ ८ = = ‹ ् ट -९ द प # ~ 
क, क ` ङ ' + ् = 4 प ५ ~क = ॥ ५ छ ॥ वि 9. = ५ 
+ 9 ह ~ , 











क [र ॥6-4 





भ ् ४ { म त १ ॥ 
क, 21 | © ग न 





र ४ क ~क पिः च 


अ० १४ 








श्रेथःदतिं भक्िञ्दखय ते बिभो 
किलश्यन्ति ये फेवरबांधङग्धये | 
तेषामसौ श्लेशचङ एष शिष्यते 


नान्यद्‌ यथा स्थूरुतुपावधातिनाभ्‌ ॥ ४॥ 


पुरेह भूमन्‌ बहयोऽदि योगिन 


स्त्वदरपितेह निजकमंङन्धया । 
बिदुष्य अर्त्येव कथोपनीतया 


परपेदिरेऽ्ञोऽच्छु् ते गतिं पराम्‌ ॥ ५॥ 
दथः अुमच्‌ सहिमागुणख ते 
विबोद्‌धुशदस्यमलान्तरात्मभिः । 
अविक्रियात्‌ खाद्धभवादरूपती 

दयनन्यवोध्यात्मतया न चान्यथा ।। & ॥ 
गुणात्मनस्देऽपि गुणान्‌ विमातुं 

हितध्दीणंख क ईशिरेऽख । 
कालेन येवां षिभिताः सुकस्े- 


भूपां्षवः खे मिहिका चुभासः ॥ ७॥ 


सुसमीक्षमाणो 






दशष स्कन्धं 


-च=-====~-------------------- =-= === === == =-----------------------------------------~----- 
नन कि == 


| बड़ी उत्घुकतासे आपकी कपाका ही मी गति अनुमव 





। वि द्र ॥। नः || 


= ~~ ऋ 


॥ म ह, न, १ 3 
भ्वी न ० न 7 


त 
-- ज 
% 


९९० 





जः 


५2 
ऊ 





४. 


~ 


जधीन हो जते दै ॥ ३॥ भगवन्‌ | अपकी भक्ति 
सव प्रकारके कल्ाणका मूढक्लोत--उद्गम है | जो ` 


जोग उसे छोडकर वेवल ज्ञानक प्रापिके च्वि श्रम उठते 
जीर दुःख मोगते है, उनको वकत, क्छेदा-दी कलेदा हाय 
क्ता हैः, ओर छ नही जसे योधी मूषी 
सूटनेवाेको केवल श्रम ही मिलता दै, चाव नहीं ॥ ४॥ 


है जच्युत | हे अनन्त } इस दोक पठे भी वहुत- 
से योगी हो गये ई । जव उन्हे योगादिके दासं आपकी 
प्राप्ति न इई, तब उन्होने अपने लौकिक जौर वैदिक 
समस्त कमं आपके चर्णोमिं समपिंत कर दिये । उन 
समपिंत कमेसि तथा आपकी लीग-कथासे उने आपकी 
भक्ति प्राप्त इई । उप्त भक्तिसे दही आपके खख्पका ज्ञान 
प्राप्त करके उन्होने बड़ी घुगमतासे आपके पटमपदकी 
प्राप्ति कर्‌ खी ॥ ५ ॥ हे अनन्त ! अपके सयुण-नियुंण 
दोनों खख्र्पोक्षा ज्ञान कठिन होनेपर भी निर्यण ब्लखूप- 
की महिमा इन्द्रर्थोका प्रवयाहार करके ञद्धान्तःकरणसे 
जानीजा सकती 2} ( जाननेकी प्रक्रिया यद्ध है 
कि ) विरोष आकारके परियागपूर्ैकत आत्माकार अन्तः- 
करणका साक्षात्कार किया जाय ] यह आतसमाकारता 
घट-पटादि ङ्पके समान ज्ञेय नहीं है, प्र्युत आव्रण- 
का भद्धमत्र है | यह्‌ साक्षात्कार यह ज्य है, 
“भे ब्रह्मको जानता ह" इष प्रकार नदी, वितु खय॑प्रकारा- 
खूपसे हयी होता है ।॥ & ॥ परंतु सगवन्‌ ! जिन समर्थं 


परमाणु, अकाशके हिमकण ( जोसकीं बद ) तथा 
उपसर्गे चमकनेव।ले नक्षत्र एवं तारोतक्सो गिन डाग 


है-- उनमें भी भका, रेसा कोन होष्कताहै, जो ` 


आपके सगुण खरूपके अनन्त गुणोँको गिन सः 
प्रमो { आप केवर संसारके कल्याणक घ्य ही अवतीणं 


इ हैँ । सो भगवन्‌ } आपकी मदहिभाका ज्ञान तो डा 
दी कठिन दहै ॥ ७ ॥ सव्य जो पुरुष क्षण-श्षणपर 








+ 


"न... द 
प्रारन्धक्र ई 
क ^= ॥ 
क ग >. 
1 क 0 ॥. 
व ॥ 
ज += ह, + ~ कवं 
"कर १ कनि 


 अ्र्ि ईह गता 8 | उस - नि 
५. ् 


4 


पुङषोने अनेक जन्मोतक परिश्रम करके पृथ्वीका एक-एक £ 









| 


4 


। 


७ 

9. 
ड 
च 2 


च 
4 
4 

क 
~+ 
न 








ह निवी ४ = ¬ क कके जतिः = 
= 
|) 


जीवेत यो एुक्तिपदे स दायभाक्‌ ॥ < ॥ 


परयेश्च मेऽनायंमनन्त आधे 


परात्मनि त्वस्यपि माथिमाधथिनि । 


9 0०- चः (क + 
नि 


च ऋ "कहि कि = ॐ = 












{| मायां भिरैत्येशितुमात्मयेभं 
| | | दहं कियानेच्छमिवाविरुनो ॥ ९ ॥ 
|| अतः श्वमखाच्युत मे रजोशवो 
। द्यजानतस्त्वत्प्रथशोञ्चमानिनः । 
अजावरेपान्धतमोऽन्धचक्चुष 
एषोऽलुकम्प्यो म्िःनाथवानिति ॥१०॥ 
| क्वाहं तमोमहदहंखचराग्निवाभू- 
| | संवेष्टिताण्डधटसप्चवितसिशछायः । 
१ ववेश्ग्िधाविणणिताण्डपराणुचयौ- 


बाताष्वरोमविवरस्य च ते महित्वभ्‌॥ ११॥ 
उकेपणं गर्भगतस्य पादयोः 

किं करयते मातुरधोक्षजागसे । 
करिम्तिनालिन्यपदेशूषित 


(` तासि इक्षेः कियदप्यनन्तः ॥१२॥ 


4 = 
नक >. "द 
॥ ॥ 


३, 
। । २९६ श्रीभद्धागनरतं [ अ> १४ 

। ॥ -------- > ----------------------------- 

| र नु ) न परण 0 भन न, # द) 

(| हृदाग्बपुभिविंदधनमस्ते एव जौ व्रनद्रण दृदयः गदृगद्‌ वाणी आर पुलकित 


खरीरसे अपनेको ऊपे चरणे समप्रिंत करता ता 
दै इस प्रकार जीवन व्यतीत करनेदाट। ९1 ठीक 
वैसे ही आपके परम ९ जसे 


- (वव्छाररा &। ॐ ति] २१ 


1 
०, 
~= | 


अपने पिताकी सम्पत्तिका पुत्र ¡ } ८ !! 
प्रभो | मेरी कुटिव्ता तौ देखिये । अप अनन्त आदि- 
पुरुष परमात्मा हं ओर सेरे-जेसे वडे-डे मायावी भी 


आपकी मायके चक्रं इ ¦ फर्‌ भी मैने जापपर्‌ अपनी 
माया फेनकर अपना देश्यं देष्धनः चाहः ! प्रमो! तै 
आपके सामने द्रं ही क्था | क्या आगके दामने च्चिनगारी 
की भी कुठ गिनती है १ ९॥ मत्न | यँ रजौगरुणद्े 
उत्पन्न इ द्वं ¡ आपके चखकूपक्तो मै ठीक-टीक नहीं 
जानता । इसीशचे भरपनेको आपसे अलग संसारसा खामी 


गवःर्ल 
अगत्क्ल्त। 


माने वे थां । मँ अजन्म) त-स म।य।करत 
मोहके घने अन्धकारसे मे अधा दही रष्ा श ¦ क्षय्य 
आप यह समञ्चकर कि ध्य मेरे दी अधीन है-- भेरा 
श्रत्व है, इष्टपर कृपा करनी चाहिये, नेरा अपराध क्षमा 
कीजिये ॥ १०१! मेरे खामी | प्र त) महत, य! २) 


आका, वायु, अग्नि, जक ओर प्र्वीरूप अवर्णो 
विरा इआ यह ब्रह्माण्ड दी मेरा शरीर है ओौर आपके 
एक-एक रोमके चिद्रमं पसरसे अगणित ब्रह्माण्ड उसी 
मकार उडते-पडते रहते ई, जसे इ्धेद्धेी जाली 
अनेवागी सूयंकी किरणें रजन छोर-ॐटे परधःयु उडते 


(क) 


हुए दिखायी पडते है । कदां अपने परिमाणे सदे तीन 
हाथके सारीरवाखा अत्यन्त क्षुद्र भै आर्‌ कां आपकी 
अनन्त महिमा ॥१२॥ बर्तियो द्धः पकडे न आनेवाङे 
परमात्मन्‌ | जब बा मातक्रे पेटमे रहता है, त 
अज्ञानवद अपने हाय-पैर पीटत। है; प्रतु क्था मातां 
उस्ने अपराध समञ्चती है या उस डिवि बहू कोई भपराध 
होता दै १ है ओर (नक्ष है'--इन श्ोसे कदी जाने- 
वाढी कोई भी वस्तु सी है क्या जो भापकी कोखके 
भीतर न हो {॥ १२॥ 


तिय कहती हैँ किं जिन्त समय तीनों गेक 


प्रख्यकाटीन जग्मे लीन ये, उस्र समय उस्र जग्मे श्ित 
श्रीनारायणके नाभिकमटठसे ब्रह्माका जन्म इना । उनका 





ध. 


+ 
$< 


1 
| ५ # 
* शिच ज 
1 ० 
ॐ 1 
॥ पि क ^ 
॥ ७ कै 
8 5 हा भ के # 


॥ [क = 
ॐ 


=, 


1 


4 
॥ न्व न 
। ६ 
४. "न = ~> 
2 >. 


अ० १४ | 


द्ञ्म्‌ स्कन्ध 








ममी 








विनिगंतोऽजस्त्विति वाङ न वै मृषा 
ईं त्वीश्वर त्वन्न विनिगंतोऽसि ॥१३॥ 

नारायणस्त्वं न॒हि शवेदेदिना- 
मात्माखधीश्नाखिरलोकसाक्षी । 


नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना- 
तच्चापि सत्यं न तवेव माया ।॥१४॥। 


तच्चेञ्जरस्थं तव॒ सजजगद्वपुः 
किं मे 


दि वा सुष्टं हदि मे तदेव 


न दष्टं भगवंस्तदेव । 


विं नो सपद्येव पुनव्यंदरि ॥१५५]। 
अत्रेव मायाधमनावतारे 
द्यस्य ॒प्रपश्चस्य बहिः स्फुटख । 
छर्स्नस्य चान्तजंठरे जनन्या 


मायात्वमेव प्रकटीदरतं ते ।।१६॥ 
् + 4 ङ 

यस्य इक्षाविदं सवं सारम भाति यथा तथा । 

तत्वथ्यपीह तत्‌ सवं किमिदं मायया विना ॥१७॥ 


अदेव त्वदतेऽखख किं मम नते 


मायातमादशित- 
मेकोऽ्ि प्रथमं ततो बजसुहृद्‌ 

वत्साः समस्ता अपि। 
तावन्तोऽसि चतुथेजास्तद खिले; 

` साकं मयोपासिता- 
जगन्त्यमूस्तदमितं 


ब्रह्मादय 
भाग स० ख 


¢ दे 
७ 


(क 9 
। ४ श. सि "गन 
५ > च 
पि ह ४ ॐ 
ह = = चक , दये 
1 न " # 
^ ॥ 
॥8- 





यह कहना किसी प्रकार असत्य नदीं हो सकता । तब 
आप ह्वी बतखद्ये, प्रभो ! क्या नै आपका पुत्र नहीं 
दर १ ॥१३॥ प्रभो ! आप्र समस्त जीषेकि आत्मा हैँ । 
सध्ये आप नारायण (नार-जीव ओर अयन-आश्रय ) 
है । आप समस्त जगत्‌के ओर जीवोकि अधीश्वर है; इव्यय 
आप नारायण (नार--जीव नौर अयन-ग्रवतंक) हैँ | आप 
समस्त ोकोकि पाक्षी ह, इसयियि भी नारायण (नार-जीव 
ओर अयन-जाननेवाला ) दँ । नरसे उत्पन ह्ोनेवाठे जल- 


| मे निवास करनेके कारण जिन्हे नारायण (नाट-जल ओर 


अयन-निवाप्षस्थान ) कहा जातादै, वे भी आपके एक 
अंश ही है । वह अंशारूपसे दीखना भी सव्य नीं दैः 
आपकी माया ही है ॥ १४ ॥ भगवन्‌ } यदिः आपका वह 
विराट्‌ खरूप सचमुच उस समय जन्मे ही या तो मने 
उसी समय उसे क्यो नहीं देखा, जव किं म कमलनाच्के 
मागेस्ञे उसे सौ व्षतक जके दढता रहा { फिर मने जव 
तपस्या की, तव उसी मय मेरे हृदयमें उदका ददान 
कैसे हो गया १ ओर फिर कुछ दी क्षणम वह पुनः क्यों 
नहीं दीखा, अन्तान क्यो हो गया १ ॥१५॥ मावाका 
ना करनेवाले प्रभो | दूरकी बात कौन करे--अभी 
इसी अवतारमें आपने इस बाहर दीखनेवाठे जगतुको 
अपने पेटमें ही दिखा दिया, जिसे देखकर माता योदा 
चकित हो गयी थीं । इससे यदी तो सिद्ध होता है किं यह 
सम्पूणं विर केवर आपकी माया-ही-माया है ॥ १६॥ 
जव आपके सहित यह सम्पूणे विश्च जैसा बाहर दीखता 
है, वैसा दी भापके उदरमें भी दीखला, तब क्या यह सब 
आपकी मायाके बिना दही आपमे प्रतीत इआ १ अवद्य 
ही आपकी ठीव्य है ॥ १७ ॥ उप्त दिनकी बात जाने 
दीजिये, आजकी ही लीजिये! क्या आज आपने मेरे 
सामने अपने अतिरिक्त सम्पूणं विश्वको अपनी मायाका 
खेढ नहीं दिखगया है १ पहले आपः अकेले ये । फिर 
सम्पूणं ्ाक्नाल, नछ्डे ओर छडी-छीके भी आप दी 
हो गये 1 उसके बाद ने देखा कि आपके वे सब खूप ¦ 

चतुर्यन हैँ ओर मेरेसदहित सब-के-सब तख उनकी सेवा 
कर रहे है । आपने अग्ग-अल्ण उतने ही ब्रहमाण्डोका ` 
रूप मी धारण कर ल्या था, परतु अ भप केवल 


शिष्यते ॥१८॥ | अपरिमित अद्वितीष ब्र्मरूपसे ही शेष शेष रह गये दै ॥१८ ८ 
क र, 3 अः = +` 








२९८ भीमद्भागवत [ अ० १४ 





= आ क ज कक पं 


अजानतां त्वत्पदगीमनात्म- जो गोग भअज्ञानवश् आपके खरूपको नहीं जानते, 

न्यारमाऽऽत्मना भासि वितत्य मायाम्‌ । उन्ीको आप प्रकृतिमें स्थित जीवके रूपसे प्रतीत होते 

ना हैं शौर उनपर अपनी मायाका परदा डालकर सष्टिके 

= १६ जगत्‌ नधान समय मेरे (ब्रह्मा) रूपसे, पाटनके समय अपने (तरष्णु) 

इव॒ त्वमेषोऽन्त इव॒ तरिनेत्रः।।१९॥ | रूपसे ओर संहारके समय रुद्रके रूपमे प्रतीत होते है | 

सरेष्ठषिष्वीश तथैव नृष्वपि | ॥१९॥ प्रभो | अप सार जगत्‌के द्वामी ओर विधाता 

तिय पिते है | अजन्मा होनेपर भी आप देवता, ऋषि, मनुष्य, पञ्च 

दत्त जनय । पक्षी ओर जलचर आदि योनियोमे अवतार ग्रहण करतै 

॥ © है {यि ~~ = =, 

| जन्मासतां दुभदनिग्रहाय -इस््थि किं इन खूपोके द्वारा दुष्ट पुरपोका घमंड तोड्‌ 
आ ८५ = रुषोप वृर त्र न्‌ ॥ 

प्रभो विधातः दयुग्रहाय च ॥२०॥ | द भौर सतपा भुम करं ॥ २०॥ मगभन्‌ 1 आप 

अनन्त परमातमा ओर योगेश्वर हँ । जिन्त समय आप 


क वेत्ति शम्‌ भगवच्‌ परात्मन्‌ अपनी योगमायाका विस्तार करके टीटखा करने च्गते हैँ, 











1 ; योगेश्वरोतीभेवतक्जिलोक्याम्‌ | | उस समय त्रिगेकीमें देस कौन है, जो यद जान क्के 
। क्र व्‌। क्थंदा कतिवा कदेति किं आपकी टीला कहँ, किंसव्थिये, कव भौर कितनी 


होती है ॥ २१ ॥ इपय्यि यह सम्पूणं जगत्‌ स्वप्नके 
समान अस्य, अज्ञानरूप ओर दु :ख-पर-दु:ख देनेवाटा 
है । आप परमानन्द, परम ज्ञानरूप एवं अनन्त ह । 
यह मायासे उत्पन्न एवं विलीन होनेपर्‌ भी आपे आपकी 
खप्नभिमस्तधिषणं परुदुःखदुःखम्‌। सत्तासे सव्ये समान प्रतीत होता है ॥ २२ ॥ प्रभो ! 
आप ही एकमात्र सव्य हैँ | क्योंकि आप स्वके भासा 
जो हैँ । आप पुराणपुरुष होनेके कारण समस्त जन्मादि 
विकासे रहित हैँ । आप स््रयप्रकाड है; इृष्ठव् देशा, 
काठ ओर वस्तु--जो परप्रकारा है किसी प्रकार 
आपको सीमित नहीं कर सकते । आप उनके भी आदि 
सत्य; खयज्योतिरनन्त आद्यः प्रकाशक है । आप अविनाशी होनेके कारण नित्य है 
आपका आनन्द अखण्डित है । आपमें न तो किती 
प्रकारका मल है ओर न अमाव । जाप पूण, एक हैँ । 


| ऽतः धिरो नेके कारण आप अमृतघ्वरूप 
 पूर्णोऽदयो युक्त उपाभितोऽख्तः ॥२३॥ | समस्त उपाविषि सुक दे श 















विस्तारयन्‌ क्रीडसि योगमाया ॥२१॥। 


जगदशेषमसत्खश्पं 





त्वय्येव निस्यसुखबोधतनावनन्ते 


मायात उद्यदपि यत्‌ सदिवाबभाति।२२॥ 





। एकस्त्वमात्मा पुरुषः पुराणः 


४ ~+ नित्यो = [इ [ ९ निर । 
निस्योऽक्षरोऽजस्रसुखो निरञ्जनः 
य & > ६ > । 
क <> १०९) 
१ >^ 


~ ज 
+ क्क ५ 
न ~> 
५ तन क~ - 









न 
* ~ ध म | 
गवेकलन्धो । ६१ < (सा „९ । 


हि. ~ = हैं ॥ २३ ॥ आपका यह रसा स्वरूप समस्त जीरवोका 
4 ५ त्वा सकलात्मनामपि ही अपना स्वरूप है । जो युरुखूप सूयसे तच्ज्ञानरूप 
 खात्मानमात्मात्मतया विचक्षते । | दिव्य दृटि प्रात करके उससे आपको अपने स्वरूप 


ह्मे साक्षात्कार कर छेते है, वे इस छे संसार सागर- 
को मानो पार्‌ कर जाते दै । ८ संसारसागरके इटा 






००९ र .#4 
॥ 4४ = च ~ ` कल. , र - >, क~ १ (.- वकं के # न ८ १ >~) -दबाकी 
= ~~ # ~ ‹ ` ~ म प, # = क 3 / 2 प~ + ९ -3 ए श होने | कारण इससे पार्‌ जाना । भी अविचार 
४ | &€ ७ (५। भ] ५ 
4 द, ॥ £ |  &। [ च } (. | [ि । ४५ ॥ ॥., । [न | इ £) ॥ ष्ट ४ = न 934, 2*-.7 भ ठ 4 
8 छ छ १ 9 | & 1 9 च 9 ~, + & (6.4 । ८ + ी श ७ ४, [3 नै ज ‡ > कै ~ र र द ९ ॥ # ष ॐ 
न ६६६3 ८4 ट ध £ त त ४ 2. " अः २५१ = # अ ~ - ~ "कः ह - ५ नः "जी ह ९१६ 0? ट ट ट 





ह: 
|. ~ नद्ध # क~ छक् "> ॐ "कत = ~ 3 
न [8 । ॥, 
न्द # 4 = दः 7" 71 ~ 
ज 9 ९ ~ "^ न, म, ि ¢ शश 4 ऽ नि ~ > द "ज ध 
1 की, ~ = १ + - न द 
"भ~ ~ त 
+ न 4 २५९ & = "ऋक क ~ (४ 
न ~> र > १४ ९ 
~ # 1 न 





अ= १४1 








आ्मानमेषारमतयाविजानवां 
तेनेव जातं निखिलं प्रपञ्चितम्‌ । 


ज्ञानेन भूयोऽपि च तत्‌ प्रीयते 


रञ्ज्वामहेर्भोगभवाभवो यथा ॥२९५ 


अद्ञानसज्ञो भवबन्धमोक्षौ 


द्वौ नाम लान्यौ सत ऋतज्ञभावात्‌ । 


अजस्रचित्यात्मनि कवे परे 


विचायंमाणे तरणाविवाहनी ॥२६॥ 

त्वामारमानं एर सस्वा परमात्मानमेव च | 

आतमा दुनवंदहिश्वग्य अदोऽज्ञजनताज्ञता ॥(२७। 
अन्तभवेऽनन्त भवन्तमेव 


द्यतस्यजन्तो म्रगयन्ति सन्तः 


असन्तमप्यन्त्यहिमन्तरेण 
सन्तं गुणं तं किञ्च॒ यन्ति सन्तः ।२५॥ 
अथापि वे देव॒ पदाम्बुजद्य- 
प्रषादलेश्चाजगृदीत एव ॒दहि। 
जानाति ठतखं भगवन्‌ महिम्नो 
न चान्य एकोऽपि चिरं बिचिन्वन्‌।।२९॥ 
तदस्तु मे नाथ स भूरिभागो 
भवेऽत्र वान्यत्र तु वा तिरशाम्‌ । 
येनाहमेकोऽपि भवज्जनानां 







दश्चमर स्कन्ध 


जियो 


टषटिसे ही है ) ॥ २४ ॥ जो पुष परमात्माको आतमाके 


| जाती है ॥ २५॥ संसार्‌-पम्बन्धी बन्धन ओर उससे 














रूपमे नहीं जानते, उ उस अज्ञानके कारण ही इष 
नामरूपात्मक निखिढ प्रपश्चकी उत्पत्तिका भ्रम हो जाता 
हे । किंतु ज्ञान होते ही इक्तका आत्यन्तिक ब्रय्य हो 
जाता है । जसे रस्सीमें श्रमके कारण ही सौपकी प्रतीति 
होती ह ओर भमके निवृत्त होते ही उवी निवृत्ति हयो 





मोक्ष--ये दोनो द्यी नाम भज्ञानसे कल्पित है | वास्तव- 
मे ये अज्ञानके ही दो नाम हैँ | ये सत्य ौर ज्ञानखख्य 
परमात्मासे भिन्न अस्ति नहीं रखते । जसे पूर्य दिन 
ओर रातका मेद नहीं है, वैसे ही विचार करनेपर 
अखण्ड चित्खरूप केवर युद्ध आत्मतच्छरमे न बन्धन देँ 
ओरनतो मोक्ष ॥ २६ ॥ भगवन्‌] कितने आश्वर्यकी 
बातदहै किआप हैँ अपने आत्मा, पर जेग आपको 
पराया मानते हैँ । ओर दारीर आदि हैँ पराये, कितुउनको ` 
शास्मा मान वेव्ते है भौर इसके वाद आपको कहीं 
अन्ग ददने ल्गते हँ । मव; अज्ञानी जीर्वोका यह 
कितना बड़ा अज्ञान है ॥ २७ ॥ हे भनन्त ! आपतो ` 
सवके ्न्तःकरणमे ही विराजमान है | इसव्ि संतनेग 
आपके अतिच्क्रि जो कुछ प्रतीत हो रहा है, उका 
परित्याग करते इए अपने भीतर ही आपको ददते ई । 
क्योकि यपि रस्सीमे सप नहीं ह फिर भी उस्‌ प्रतीयमान 
सोपको मिथ्या निश्चय किये विना भका, कोई सत्पुरुष 
सच्ची रस्सीको कंसे जान सकता है १ ॥ २८ ॥ 

अपने भक्तजनकि इदयमे खयं स्फुरित होनेवाठे 
भगवन्‌ | आपके ज्ञानका खर्प ओर महिमा रेसी दी 
है, उससे अज्ञानकल्पित जगत्क्रा नारा हो जाता है । ` 
फिर भी जो पुरुष अपे युगर चरणकमर्गेका तनिक- ` 
सा भी कृपा-प्रसाद प्राप्त कर ठेता दहै, उससे अनुगृहीत 
हो जाता है--बही आपकी सचिदानन्दमयी महिमाकां | 
तत्व जान पकता है । दूसरा कोई भी ज्ञान-वैराग्यादि ` 
साधनरूप अपने प्रयल्नसे बहत कार्तक कितना मी 
अनुसन्धान करता रदे, वह आपक्ती मदहिमाका यथां ज्ञान ` 
नहीं प्रात कर सकता ॥२९॥ इसव्यि मगवन्‌ । सुञ्चे इस ` 
जन्ममे, दूसरे जन्ममे अयवा किसी पञ्च-पक्षी आदिकेजन्ममे 
मी रसा सोभाग्य प्राप्त हो कि मै आपके दासोमेसे कोई 
एक दाप हो जाऊं ओर किर भाप पके चरणकमर्गेकी ` 


ष्कक क क ० क ११ ९ धौ कनि 













































+ ९९९. श्रीमद्भागवत [ अ० १४ 
अहोऽतिधन्या व्रजगोरमण्यः सेवा करू ॥ ३० ॥ मेरे खामी | जगत्‌के बड़े-बड़े यज्ञ 

ख्टिके श्रारम्भसे लेकर अवतक आपको पृणंतः तृप्त न 

| कर सके । परत्ु आपने वत्रजकी गार्यो ओर ण्ालिनकि 

स्तन्यामृतं॒पीतमतीव ते भदा । बछड़े एवं बालक बनकर उनके स्तनोंका अमृत-सा दूध 

| बड़े उम॑गसे पिया दह । वास्तवमें उन्दीका जीवन सफल 

यातां विभो वर्सतरात्मजार्मना | हैः वे ही अव्यन्त धन्य है ॥ २१ ॥ अहो, नन्द आदि 


व्रजवासी गोपोंके धन्य भाग्य है | वास्तवे उनका अहो 

४ ॐ | भाग्य दै । क्योकि परमानन्दखरूप सनातन परिधूणं ब्रहम 
यत्ृप्तयेऽद्यापि न चालमध्वरा: ।३१॥ | आप उनके अपने सगे-सम्बन्धी ओर सुद्‌ है ॥ ३२॥ 
| हे अच्युत | इन व्रजवासि्योके सौमाग्यकी महिमा तो 

भ्ण ॒रही-मन आदि ग्यारह इन्दिर्योके भधिष्ठातू- 
देवताके खूपमें रहनेवाठे महादेव आदि हमगोग बडे ही 
| माग्यवान्‌ है क्योकि इन त्रजवापिर्योकी मन आदि 
ग्यारह इन्द्रियांको प्याठे बनाकर हम आपके चरणकमर्गे- 
का अग्रतसेभी मीठा, मदिरासे भी मादक मधुर मकरन्द्‌- 
रस-पान करते इहते हैँ । जब उष्ठका एक-एक इन्द्रिये 
पान करके हम घन्य-घन्य हयो रहे हैँ, तव समस्त इन्द्रियो 
से उसका सेवन करनेवाठे ब्रजवापिर्योकी तो बात ही 





अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दभोपव्रजौकसाम्‌ । 


यन्मित्रं परमानन्दं पूण जहम सनातनम्‌ ॥३२॥ 





एषां तु भाग्यमहिमाच्युत ताबदास्ता- 


मेकादशेव हि वयं ब्रत भूरिभागाः । क्या है ॥ ३३ ॥ प्रमो ! इस व्रजभूमिके किसी बनें 
ओर विरोष करके गोकुल्में किक्षी भी योनिम जन्म हो 
एतद्धरषीकचपदौरसङृत्‌ पिबामः जाय, यदी हमारे व्यि बड़े सोभाग्यकी बात होगी | 


क्योकि यँ जन्म हो जानेपर आपके किंी-न-किंसी प्रेमी- 
के चरर्णोकी धूठि अपने ऊपर पड़ ही जायगी | प्रमो !भपके 
प्रेमी ्रजवािर्योका सम्पूणं जीवन आपका ही जीवन है | 
आप ही उनके जीवनके एकमात्र सवख हैँ | इप्तव्मिि उनके 
चरणोंकी धूरि मिलना भापके दी चर्णोकी धूि 

4 ५ ४ मिल्ना है ओर भापके चरणो की धूलिको तो श्रतिर्यो भी 
1. । यद्‌ गोडेऽपि कतमाद्प्रिरजोऽभिषेकम्‌ | अनादि काल्से अबतक द्द दही रही द॥ ३४॥ 
८ ` | देवता्ओंके भी आराध्यदेव प्रभो | इन तजवाि्ोको 

` यज्जीवितं तु निखिल भगवान्‌ यन्द इनकी सेवाके बदकेमे आप क्या फक देगे १ सम्पूणं 


फक फर्खरूप | आपसे बकर ओर कोई फर तो 
। ह ही नही, यह सोचकर मेश चित्त मोहित दो रहा है| 
न तिह ॥; ` | आप उन्हे अपना खरूम मी देकर उऋण नहीं हो 


, श्वादयोऽङध्युदजमभ्वमरतासवं ते।२३॥ 









८3 


` तद्‌ मूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां 


म) 


स्त्वद्यापि यत्यद्रजशश्रुतिमृग्यमेव ॥२४॥ 








~ ह 


ग त, + अ 54 ग 
ह्‌ § ४ है | क्य > = पन = सल रूपक 
{~ ( 4 - § 1 (न्त ॥ + = ॥ 5 प, ड ~ ५ 
५. 0 ~ ~ ह 
+ न # भद ऋ चे ष्कः 
क्न्य ॥ न 





# , ९ ५ । 
. -" चक 


~= = 








..॥ 


^ - 
न ७१ ~, > ध: ~ 
धज क 4; = 
४ १ नि > > = क 
ॐ न 
"2 ॥ क 
¶ः छि ए 

"त 

[अ १ 


"“ - व) 


अ० १४] 


द्ञ्चम्‌ स्कर । 








सद्वेषादिव पूतनापि सङरा स्वामेव देवापिता 
यद्ध।माथसुहूस्मियात्मतनय प्राणाशयास्त्वस्छृते ३५। 
तावद्‌ रागादयः स्तेनास्तावत्‌ कारागृहं गृहम्‌ । 
तावन्मोहोऽङ्धिनिगडो यावत्‌ ष्ण न ते जनाः ३६ 
प्रपञ्चं निष्प्रपश्चोऽपि विडम्बयति भूते ' 


प्रपन्नजनतानन्द्‌ न्दाहं प्रथितं प्रभो ॥३७॥ | 


अपने सम्बन्धिर्यो--अघाघुर, बकासुर आदिके साय प्राप्त 
कर छिया, जिसका केवट वेश दी साध्वी खीका था, पर 
जो दयसे महान्‌ क्रूर यी । पिर, जिन्हनि अपने धर, 
धन; खजन, प्रिय, शारीर; पुत्र, प्राण ओर मन-- सव 
कुक आपके ही चर्णोमें समर्पित कर दिया है, जिनका 
सव कुछ आपके ही च्य दहै, उन व्रनवाघिर्योको भी 
वही फ देकर आप कैसे उऋछण हो सक्ते है ॥२५॥ 


सचिदानन्दखरूप इयामघुन्दर ! तभीतक रागद्वेष आदि 


दोष चोरोके पतमान सवेष्व अपहरण करते रईते है, 
तभीतक धर ओर उसके सम्बन्धी केदकी तरह सम्बन्ध- 
वे वन्धर्नोमे बोध रखते हैँ ओर तभीतक मेह पेरकी 
वेड्थोंकी तरह जकडे रखता है--जबतक जीव आप- 
का नहीं हो जाता ॥ ३६ ॥ प्रमो ¦ आप विश्वके 


| वखेडेसे सवथा रहित रै, पिर भी अपने खरणागत भक्त- 


जानन्त एव जानन्तु फ बहक्त्या नसे प्रभो । 


मनसो वपुषो वाचो वभवं तव गोचरः ॥२८॥ 


अनुजानीहि मां कृष्ण सवं वं वेत्सि स्वक । 


त्वमेव जगतां नाथो जगदेतत्तवापिंतम्‌ ॥३९॥ 


श्रीकृष्ण बष्णिङलपुष्करजोषदायिन्‌ 


्मानिजेरद्विजपश्चदधिद्द्विश्ारिन्‌ । 


उद्वमंशावरहर शितिराधृषषधु- 


गाकसपमाकंम्हन्‌ भगवन्‌ नमस्ते ॥४०॥ 
श्रीद्युक उवाच 


इत्यभिष्टूय भूमानं त्रिः परकरिम्य पादथोः । 


४ षक 
# 





जर्नोको अनन्त आनन्द वितरण करनेके य्यि पृथ्वीमे 
अवतार लेकर विश्वके समान ही लीखविलका विस्तार 
करते है ॥ २७ ॥ मेरे दामी ! बदत कहनेकी आवरय- 
कता नही--जो ठेग॒ आपकी महिमा जानते है, वे 
जानते रहं; मेरे मन; गणी ओर शरीर तो आपकी 
महिमा जाननेमें सवेया अत्तमथं है ॥ २८ ॥ सचिदानन्द- 
खरूप श्रीकृष्ण | आप सवके काक्षी ई । इसथ्यि आप 
सब कुछ जानवे हैँ । आप प्षमस्त जगतके खाभी हे । 
यह स॒म्पूणे प्रपञ्च आपं द्वी सित है । भापसे मे नीर 
क्या करं १ अब आप सुष्चे खीकार कीजिये । सुने अपने 


| छोकर्मे जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ ३९ ॥ सबके मन-प्राण- 
| को अपनी रू-माघुरीसे भाकर्धित करनेवाले इामघुन्द्र। 


आप यदुवंशरूप कमख्को विकपित करनेवाले सयं है । 
प्रभो ! पृथ्वी, देवता, ब्राह्मण भौर पञ्चरूप समुद्रवी 
अमिदृद्धि करनेवाले चन्द्रमा, भी आप ही है । आप 
पाखण्डियेकि धर्मरूप रात्रिका घोर अन्धकार नष्ट करनेके 
य्यि सूयं ओर चन्द्रमा दोनोके ही समान दै । परश्वीपर 
रहनेवाठे राक्षसेकि नष्ट करनेवाले आप॒ चन्द्रमा, सूये 
आदि समस्त देवताभके भी परम पूजनीय हैँ । भगवन्‌ | 
मे अपने जीवनभर, महाकल्पपर्यन्त आपको नमस्कार ही 
करता रट्र॥४०॥ 


ीश्युकदेवजी कहते हँ परीक्षित्‌ ! संसारके रच- 
यिता ब्रह्माजीने इस प्रकार भगवान्‌ श्रीङ्ष्णकी स्तुति 


कै | क द 
-4 ८. 9 र, कि ` # ह. 
ॐ ` 


"~ 


+ प $ । 





२२२ | भीमद्कागवतं | अ० १४ 
नत्वाभीष्टं जगद्धाता खध्राम प्रत्यपद्यत ॥४१॥ | की । इसके बाद उन्होने तीन वार पर्किमा करके उनके 
चरणोमें प्रणाम किया ओर फिर अपने गन्तव्य स्थान 


ततोऽचु्ञाप्य भगवान्‌ खुद ्रगवखितान्‌ । सव्यल्ोकमें चले गये ॥ ४१ ॥ ब्रह्माजीने वडा शौर 
ग्वाल्वार्गको पहले ह्वी यथास्थान पहुंचा दिया था| 


बतसान्‌ पुलिनिमानिन्ये यथापूर्सखं खकम्‌ ।४२॥ | भगवान्‌ श्रीङष्णने ब्रह्माजीको विदा कर दिया ओर वड. 
को लेकर यमुनाजीके पुलिनपर आये, जर वे भपने 

| सखा श्वाखबार्गोको पहटे छोड़ गये थे ॥ ४२॥ परीक्षित्‌ ! 

एकसिन्नपि यादेऽञ्दे प्राणे्ं चान्तशऽऽस्मन्‌ः । | अपने जीवनसर्वख--प्राणवल्ल्म श्रीकृष्णके वियोगमे 
यद्यपि एक वध वीत गया धा, तथापि उन ग्वाच्वःलको 

< वह समय आधे क्चणके समान जान पड | क्यो नहो, 

कृष्णमायाहता राजस्‌ श्षणाध मेनिरेऽमका॥३॥ | वे भगवान्‌की विश्वविमोहिनी योगमायासे मोहित जो हो 
गये थे ॥ ४३ ॥ जगत्‌के सभी जीव उक्ती मायासे मोहित 

कवि फन विखरन्तीह माखमोहितचेतसः । होकर शास्र ओर आचार्यक बार-बार समज्ञानेपर भी 
| अपने आत्माको निरन्तर भूठे इए है । वास्तवमें उश 


यन्मोहितं जगत्‌ सव॑ मभीष्ष्णं पिस्प्रतारमकम्‌ 11४४ । मायाकी रेसी दी शक्ति दै । भवा, उसे मोहित होक 
जीव यहं क्या-क्या नहीं मूढ जति है १॥ ४४॥ 























वद्‌. १. ४" ६ (1.4 4 । ॥ च न न~ ^ १४ 
प ^ १ ^, चैः ९ ४ 6. क) १९ "~ ¶ क्‌ ° 4 
† + 0) क 1 कः १ < 1 
॥) [क चः ५ नत 4 
४. ह = 4 #ज; ति 


















ऊचुश्च सुद ष्णं खागतं तेऽतिरंहसा । परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्णको देखते ही श्राल्बाेनि 
बड़ी उतावलीसे कहा-- "भाई ! तुम भठे आये । छागत 

= लको है, खागत ! भमी तो हमने तुम्हारे विना एक कौर भी 
१ ( ऽप्यभोजि कवल एतः साधु सज्यताम्‌ ॥।४५।। | नहीं खाया है । आ, हषर आओ; आनन्दसे भोजन 
ॐ & करोः ॥ ४५ ॥ तब हँसते इए भगवानूने गवाल्वा्ोके 
ततो हसन्‌ हषीकेशोऽभ्यवहत्य सहाभकैः । साथ भोजन किया ओर उन्हें अधाघुरके शरीरका चा 
दिखाते इए वनसे व्रजमे लेट आये ॥ ४६॥ 
श्रीकृष्णके सिरपर मोरपखका मनोहर सुकुट ओर धुंषराठे ` 
बाम सुन्दर-सुन्दर मर्ह-महं मरहकते इए पुष्प गुथ रहे 
थे | नयी-नयी रंगीन धातुओंसे श्याम शरीरपर चित्रकारी 
| बहप्रघलनवधातुविचित्रिताङ्गः | की इई थी । वे चकते सतमय रास्तेमे उच्च खरसे कभी 
बुरी, कभी पत्ते ओर कभी सीग बजाकर वायोत्समे 
मग्न हो रहे है । पीछे-पीछे ्बाराढ उनकी रोकपावन 
कीर्तिका गान करते जा रहे ह । कभी वे नाम ले-ककर 
अपने बछडोको पुकारतै, तो कमी उनके साय गङ्‌ 
छाने र्गते । मार्गके दोनों ओर गोपियँ खड़ी है; जब 
क ~ ध = क व एणन्नलुगमीतपवितरकी वे कभी तिरछे नेत्रोसे उनकी नजरमें नजर मिव्य॒देते 
£ = दु: ` है, तब गोपि आनन्द-सुग्ध हो जाती है| ईक्ष 

¢ पादशुत्सवदश्चः प्रं ववेश गो ॥४७।॥ । प्रकार मगवान्‌. श्रीकृष्णने गोष्ठमे प्रवे किया ॥४५७॥ 


= + क 
ऋ ~= 6 22 । 
<, व = "क द 712 ~~ 
भ { ५ कैन = ने 0 # 
न ४ म , = + न्क | 


अ 4 "लि 
क =) " च व, ४ 2 1१ 
५ व = 4 # 3 ॥ 
† द 2 ' 41 । 
* \ £. `क १,५९.२. ४ 
न. + "क~ 


` दशेयंअमौजगरं न्यवतंत॒बनाद्‌ व्रजम्‌ ॥४६॥। 



























^ अ ह 












अ० १४ | द्श्चम स्कन्ध २२दे 








अद्यानेन महाच्यालो यश्लोदानन्दश्चलुना । | परीक्षित्‌ | उसी दिन बाखकोनि रजे जाकर कडा किं 

। आज यज्ञोदा मैयकि ठड्ठे नन्दनन्दनने वनम एक 

इतोऽविता वयं चाशादिति बाला व्रजे जगुः ।॥४८॥ | बड़ा मारी जनगर मार डाया ह नौर उसे हमनेगोकी 
रक्षा की है" ॥ ४८ ॥ 

राजा परीक्षितने कदा--त्रह्यन्‌ ! त्रजव्रासिेकि 

य्यि श्रीकृष्ण अपने पुत्र नही ये, दृस्रेके पुत्र ये) 

ब्रह्मन्‌ परोद्धवे कृष्णे हयान्‌ प्रेमा कथं भवेत्‌ । फिर उनका श्रीकृष्णके प्रति इतना व्रेम कैसे इअ १ 

| ेसा प्रेम तो उनका अपने वाककोपर्‌ भी पहले कभ नही 

योऽभूतपूवस्तोकेषु खोद्धवेष्वपि कथ्यताम्‌ ॥४९॥ | इभा था ! भाप कृपा कसे वतलादये, इसका क्या 
| कारण है १॥ ४९. ॥ 


राजोवाच 


श्रीशुक उवाच  शआीद्युकदेवजी कते दै राजन्‌ ! संसारके सभी 
= 4 प्राणी भपने आत्मासे ही वसे बढ़कर प्रेम करते हं । 
सथपामपि भूतानां नुप खास्मव वर्लभः ) पुत्रस, धनंसे या ओर कि्षीसे जो प्रेम होता है--वहं 


तो इसव्ये कि वे वस्तुएं अपने आत्माको प्रिय खगती 
हैँ ॥'५०॥ राजेन्द्र ! यदी कारण है किं समी प्राणिर्योका 
तद्‌ राजेन्द्र यभ। स्मेह; खखक्षामनि देहिनाम्‌ | भपने आत्मके ग्रति जंखा प्रेष होता है, वक्षा अपने 
| कडलानेवाले पुत्र घन ओर गृह आदिम्‌ नदी होता॥५१॥ 

न दथा ममतारम्बिपुत्रवित्तगृहादिषु ॥५१॥ | तरपश्रेषठ ! जो ठोग देहको ही आत्मा मानते है, वे मी 
| अपने शरीरसे जितना प्रेम करते हैँ, उतना प्रेम शरीरके 
सम्बन्धी पुत्र-मित्र भादिसे न्वी करते ॥ ५५२ ॥ जब 
विचारके द्वारा यह माद्कम हो जाता है किं “यह्‌ शरीर 

यथा देहः प्रियतमस्तथा न द्यु ये चतम्‌ ॥५२॥ न गद गाय 
देहोऽपि ममताभाद्‌ वेत्त्यसौ नात्मवत्‌ प्रियः। आस्माके समान प्रेम नहीं रहता । यदी कारण है किं 
ट इस देके जीणं-श्ीणं हो जानेपर भी जीनेकी आक्षा 

यजीयंत्यपि देदेऽसिम्‌ जीषितान्ना बरीयसी।।५३॥ | प्रक रूपसे बनी रहती है ॥ ५३ ॥ इससे यह बात 
सिद्ध होती है कि सभी प्राणी भपने आस्मासे ही सबसे 
बदुकर्‌ प्रेम करते हैँ ओर उक्षीके य्थियि इस्‌ सारे चराचश 
जगतस भी प्रेम करते हँ ॥ ५५४ ॥ इन श्रीकृष्णको ही 
तुम सब आस्मा्ओंका आत्मा घमञ्चो ¦ संसारके कल्याणके 


हतरेऽपत्यवित्ताद्यास्तद्रर्लभतयेव हि ॥\५०॥) 


देहार्मवादिनां पंसामपि राजन्यसत्तम । 


तसात्‌ प्रियतमः खात्मा सवेषामपि देहिनाम्‌। 


तदर्थमेव सकलं जगदेतचराचरम्‌ ॥।५४॥ 


ड व्िि द्वी योगमायाका आश्रय लेकर वे यहा देहधारीके ` 
कुष्ण नमखिलास्मनाम्‌ ट ५ 
। मेनमेहि समात्मा स । समान जान पडते है ॥५५॥ जो रोग भगवान्‌ श्रीकृष्णे | 


जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ।५५॥ | वास्तविक खरूपको जानते 2, उनवेः च्यितो इस 


वस्तुतो जानतामत्र ष्णं खास्तु चसषणु च । 





किञ्चन कोई इ = = - ॐ ही न नहं ~ - न 8 
स्त्विह किञ्चन ।\५६॥ | ओर कोर प्राकृत-अप्राकृत वस्तु है ही नदी ॥ ५६॥ 
॥ नै क. + ^ +~ # १५. १६. 
ु क । + ~: कैः ५. ऋ क च वाः # १ म र 3 ह. पि; ड १ += 
व - ५ ठ" कत (वि~ प» तै न 9 । >. ५ - 
7 द *ॐ 8 ९ २14 ४ । क २ क च (4 # धे क । ४ ठ - + भन = , अः) शट: ॥ ह क क कक | 
ॐ 4 ` क $ नफ ज ०4 + । 


जगत्मे जो कुछ भी चराचर पदायं ई, अथवा इससे 
परे परमात्मा, ब्रह्म, नारायण आदि जो मगवत्रूप ह, ` 
समी श्रीकृष्णखखूम ही दह 1 श्रीकृष्णके अतिरिक्त 


+ 
ह 
न 
्. 


= + 







ए) ॥ 


२२४ श्रीमद्भागवत [ अ० १५ 


7 ती ीपणषीषमौीणिीणनीणणी मणीषी 











च ~ ~ = पै 


४ | स्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति यितः । सभी वस्तुर्ओंका अन्तिम रूप अपने कारणम सित होता है । 
। 
। 
। 





. उस कारणके भी परम कारण हैँ मगवान्‌ श्रीकृष्ण | तब मला 
वसयापि भगान्‌ ष्णः किमतवृवस्तुरूप्यताम्‌ 9. बताओ, किस वस्तुको श्रीकृष्णसे त बतनायं ॥५७॥ 
समाध्रिता ये पदपरलवप्लव जिन्न पुण्यकीतिं मुकुन्द मुरारीके पदपल्ख्वकी नौकाका 
महत्पदं पुण्ययशोुरारेः । आश्रय च्या दहै, जो कि सुप्पुरुषोंका सर्वख है, 
धिर्वसपं ६ | उनके व्ये यह भव-सागर वछ्डेके एुरके गढेके समान 
सपा; पर पप है । उन्हे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है ओर उनके च्यि 
पदं पद्‌ यदू विषदां न तेषाम्‌ ॥५८।। | विपत्तियोंका निवाप्तस्ान--यह संप्तार नहीं रहता ॥५८॥ 

॑ एतत्ते सबेभारषातं यत्‌ पृष्टोऽदमिह त्वया । त्‌ चमन सुक स नि मा 
| [¦ पाचरवे वषेकी टीला ग्वाव्त्रालछेने छठे वधमें कंसे कही, 
||! यत्‌ कौमारे हरिषतं पोगण्ड परिकीर्तितम्‌ ।५९॥ | उसका सारा रहस्य यने तुमे बदला दिया ॥ ५९ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णकी खाल्वार्खोके साथ वनक्रीडा, अधासुर- 
को मारना, हरी-हरी घा्तसे युक्त भूमिपर वैटकर भोजन 
करना, अप्राकृतरूपधारी बड़ों र षाल्वार्गोका प्रकट 
होना ओर ब्रह्माजीके द्वारा की इई रस महान्‌ स्तुतिको जो 















एतत्‌ सुहद्धिथशितं घरारे- 


~ ~ ~ -- 


रघादनं  शादरज्ेमनं च । 


९ „ ॐ © ॥ ५ (५ 

| ज्यक्त तरद्‌ रूपमजोवेभिष्टवं मनुष्य सुनता ओर कहता दहै--उस-उद्चको धम, 
# £ भयं, काम ओर मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ६० ॥ 
, ॥ ^ शृण्वन्‌ गृणन्नेति नरोऽखिलाथान्‌ ॥&०॥ | परीक्षित्‌ ! इस प्रकार श्रीकृष्ण ओर वल्रामने कुमार्‌ 


अवस्थाके अनुरूप ओंखमिचोनी, सेतुबन्धन;, बंदर्रोकी 
| भोति उदछलना-कूदना भादि अनेकों टीला करके अपनी 


निखाय; सेतबन्धेमकटोरप्लवनादिभिः ॥६१॥ कुमार-अवस्था त्रजमें हयी व्याग दी ॥ ६१ ॥ 
इति श्रीमद्ागवते महपुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे 


ब्रहमस्तुतिनांम चतुद शोऽव्यायः ॥ १४ ॥ 


कोमारे 


एवं विहारः कोमारेः कौमारं जहतुर्॑ने । 





` अथ पञ्चदशोऽध्यायः 
धेखकाञ्ुरका उद्धार ओर ग्वाटवाोंको कालियनागके विषसे वचना 







सिर 





{~ श्रीक उवाच =` श्रीश्कदेवजी कहते है परीक्षित्‌ | भव॒ बग्राम 
4 ४ ततश्च पौगण्डवयः श्रितौ ने कौर श्रीकृष्णने पौगण्ड-अवस्थामे अर्थात्‌ छट वेमे प्रवेश्च 
बभूषतुस्ती पश्चुपारष्षम्मतो । किया था। अब उन्हें गौरं चरानेकी खीकृति मिक गयी। 

ध श न्तौ सखिभिः सम पद्‌- | वे अपने सखा खालनाकके पाथ गौरं चराते इए बन्दा- 
क न॒ पुण्यमतीव चक्रतुः | १॥ | बने जाति शौर अपने चरणोसे इृन्दावनको भव्यन्त 


(नि च ध 
॥७९९।५१। ` & न +. क 
= "+ क = 9 कन [न " 9, न 
= "स । = ( क ~ 


ङ त + # | ¢ त 
1 9 च += > = न 4 { न्व ३ 
“9 नी 
य्‌ „ + ¬) 1 वा - 9 
= एत. + 4 ५ ॥ ं क 
॥ क: त १ 


त. 
0 ध (* = कव 





















क ॐ त का जक ॐ जो कः । क ककन क ~ = 
भोः न 


तन्भाध्वो वैणुषधुदीरयस्‌ चतो पावन करते ॥ १ ॥ य दन गौ्करि व्यि हर-हर 
घासे युक्त एवं रग-दिरगे पुष्पाक; खन हे इह्य शा | 
आगे-श.ने गो,उनके (पीट कँदयुरी वजात हुई इमम 
सुन्टर तदनन्छर दट्याम ओर दि श्रीक्रष्ण के यस्का मान 














विह्ापः छुपाकर धनर \ २॥ | द रम इ९ ्वालगल-इत प्रकर वि्ाः क्रक व्यि उन्डनि , 
उस उने प्रनेद्च किया! २}; उस बनं वद्ध तो नरे 


तनन षाबा'ल्म्‌इज§ वी मधुर युजार कर रहै थे, कहीं अ्ुड-के-घयंड इरन 
ठौकडी भर रहे ये ओर क्वं घुन्द्र-घुन्दर पश्च चहक 

सहन्धन अर ख्यपयः सरता । षे थे } ब्डेड्धी सुन्दर-षुन्दर सरोवर थे. जिनका जक 

1 ~ पहाप्पानके द्दयके समान सच्छ ओर निमेड था | उनम 


| लि हए रूसकके सौरभे सुवासित हकर खीतट-न्द- 
सगन्ध वरय उस दनकी शेवा सुर गही भी} इतना मनोद्र्‌ क 


¢ ४ छे, करे | 
[नक्ष्य र्ठ भगदा सनी दवे ॥२॥ | 
+ ` । धा वह वन्‌ क्कि उद्धै देखकर मगवान्‌ने मन-इी-मन उसमें 
स॒ तत्रे तत्रार्णपर्छसान्रया विक्र करनेका संकव्प किया ॥ २ ॥ पर्पोतचतम भगव्रान्‌ने 
त तेरह डवे न्न भ्र [4 ॐ 
ए [ङ्भ | पाद ४ | 1 कि त्‌ वड लश प्ट ओर फूट 4\ रसे त्तर पनी 


| डा्िर्यां ओर नृतन कोँपर्छकी गल्िपासे उनके चरणेका । 


4. स्पशं कर रहे है, तव उन्होने बडे भानन्दसे कुछ मुकराते 
सयग्निवाह्वा्यजमःदिपूषः ॥ ४ ॥ | इए-से अपने बड़े भाई बल्यामजीसे कडा ॥ ४ ॥ । 

र संय नुवाच भगवान्‌ श्रीदष्णने कहा- देवकिसेम्णे ! ्योतो 

धु ८ २. नडे-बड़े देवता आपके चरणकम्लोकी पूजा करते है; > 
अहिः अ दददरापुराचत परंतु देखिये तो, ये इश्च मी अपनी डाब्िष्वि छन्दर | 
: ~ ९ पुष्प ओर प्टोंक्ती सामप्री टेक आश्व चरणकमर्गेमिं च 

पादाम्डुज ते इुमनःफृराईमच्‌ । दुक पठे है, नमस्कार कर रहे रहै | क्योंन हो, इन्दोनि 3 
नमन्त्युपादाय ह्िखभरार्थ्न- ६: सौमाग्यकरे ल्य तथा अपना देन एवं श्रवण करने- र 












६ वारोके अन्ञानक्रा नारा करनेके व्यि ही तो इदान 
स्तभाऽपुर्य तजुजन्सं शत्छतदर || ५॥। | धामे इष्ष-योनि प्रण की है । इनका जीवन धन्य 


८तेऽलिनस्तव यरऽखिरलतीथं दै ॥ ५ ॥ आदिपुरुष ! यपि आप हस इन्दावनमे 
ह अपने रेखयख्यको क्िगकर बाल्कोकौ-सी लील कर्‌ 
यन्द आदटिषुरषालुपद्‌ भजन्ते ) है पि मी गाप अ नव व 


देत्रको प्रहचानकर यह भी प्रायः भके खपे पके 
मुत्रन-पाबन्‌ यक निरन्तर गान करते ह $ 
भजनम लगे रहते हैँ ¦ वे एक क्षणः चि 
नहीं छोडना चाहते } ६ ॥ ¦ 
 व्यन्त्यधी किखिम ईव्यषठदाहरिष्यः _ | ही स्तुतिं करने योग्य है 
| आया देख ये मोर्‌ अःपके शनोँसे आनन 
6 71 न्तिम्‌ प इञ तै प्रियमीश्वणेन्‌ ॥ क न्‌ ई।९।* यं मरुगन्‌यनां गौरिक 


म्रायो वशी इनिगणा भद यष्ुख्या 


गूं वनेऽपि न जह्यनेवास्मदेष।। & ॥। 





2 ~ 4 > 
काकिका 






























२२६ "ड ीमद्धागवतं [ अ० १५ 





----:~---~------------------------------------------------------------------ ---- ~ न => । @ = ॐ वो कः क जो क 


दुष कोकिलगणा गृहसमाश्दाय्‌ परमभरी तिश्छी चितव्नरे आपके प्रति प्रेम प्रकट कर 
रषी है, भापको श्रटन्न कर शी हैँ } ये कोय अपनी 

मधुर बुद्-कुद्र ध्वनिश्च आपका कितना सुन्दर खागत 

धन्या बनोकस हयान्‌ हि सतां निस्मेः }!७9\} | कर रही है । ये वनवासी होने भी धन्ध है । कर्कि 
सप्पुरुषोंका खभाव्र ह्वी रेखा हनोता है कि वे धर आये 

अतियधिक्ो अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु भेट कर देते है ॥७॥ 

ध्येयस्य धरणी तृणवीरुधस्त्यत्‌- भाज यहाकी सूमि अपनी हरी-हरी वासके साथर भापके 
वरणोकरा स्परे प्राप्त करके घन्य हो रही है | यद्दकि वृक्ष 

कतारं ओर ज्ञायां जापक्री अँगुिरयोक्ा स्पदां फकर ्रपना 

एद्स्पशः दुभर्ताः करजाभिम्र्टाः | 


क त कणन जयेन भ) त फजल तटी = +> 


अदहोभाग्य मान दशी दहै | आपकी दय!भरी चितवनसे 
4 नदी, पवत, पञ्च, पक्षी---द्व कृताथ हो रहे हैँ ओर 
व्रनदी गोपि आपके वश्चःस्थल्का स्पद्य प्राप्त करके, 


नचोऽद्रयः खभष्रभाः सदयाघरोदै- आ 
| जिद्के ल्य खय रक्ष्मी भी लखपत रही हे, घन्थ 


गष्थोऽन्तरेण युजयोरपि यसस्पृहा श्री; };८}} | घन्यहय रदी है ॥ ८ ॥ 
श्रीक उवाच भीदयुकदेवजी कदे है--परी! त्‌ ¦ इप्‌ प्रकार 
परभ सुन्दर बृन्दावनको देखकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण बहत 
, कि. (~ ही भानन्दित इए । वे अपने सखा ग्वाव्वाखोके साथ 
। (॥ | प गोवधनकी तराम, यमुनातटपर गौ ओं चराते हुए अनेकों 
` ॥ \ ॥ रेष सथ्वारयन्न्रः सशद्रिभश्षु साय; ;¦ ९} प्रकरारकी सीराए्‌ करने ट्गे {( ९ ॥ एकत ओर श्बाञ्नाढं 
क |, मगधान्‌ श्रीरष्णयै चसित्क्की सध्ुर तान केडे रते है, 
तो दृष्ठरी ओर बश्राषजीके पाथ वनमाला प्रह्ने इए 
श्रीकृष्ण मतवा भीरोकी छुरीडी युनरुना्टमे अपना 
उपधीयमान दस्ति; सग्बी सङ्कपंगान्वितः ।!१०}¦ | खर मिलाकर मधुर संगीत अ्रपने लगते है | १० ॥ 
| | । कभी-कभी श्रीक्रण्ण कूजते हर र\जहं्ोके साध खयं भी 
क्वचिच करदंसानामलु भति कूजितम्‌ । | कूजने कमते है ओर कथी नाचते इर्‌ मरके स।¶ खयं 
| भी दुघुकटुषुकं नाचने च्णते है ओर रेस। नाचते है क्ति 


एवं बन्दावंनं श्रीमत्‌ दृष्णः प्रीतमनाः पञ्नप्‌। 





क्वचिद्‌ गति गायत्सु मद।न्धालिष्वनु वरतैः) 


समान गम्भी वाणीसे दूर गये इए पञ्चको उनका 
| नाम ॐे-ञकर धड़ प्रेमप्ते पुकारते है । उनके कण्ठकी 
मधुर ध्वनिं सुनकर गायों ओर श्नाकदा्खोका चित्त भी 
ऋ पने वशम नहीं रकता ॥ 8 = व 
` चकोर | र भरदूढ ओर मोर आदि पक्ि्योकी- 
. ५ क ' "भ , | 1 कभी बाघ; सिंह नादिकी गजनासे 
सत्वानां व्याघर्सि्योः ॥१२॥ | डरे इए जो्रके समान कय भी सय मीतकर-ती लीडा 


 क्वचिदाह्य  ्रीस्या योगो गमनोज्ञया ॥१२।! 


न. 
६. ॥ 


ज क 











+ अभिनरत्यति नृत्यन्तं बहिणं हासयन्‌ कविर्‌।११॥ मयूरो उपश्षासात्पद बना देते हैँ || ११ ॥ कमी मेधके ॑ 





























अ दमं स्कन्ध 
< = 9 ~ व © ~" -~----------~----------------- ~~~ ~-- ~ 
कचित्‌ कडापरिभन्तं मोपोतसङ्खोपबदंणमू । | करते ॥ १३ ॥ जत्र वल्रामजी खेच्त-खेरते शकक 


किती ग्राल्वास्की गोदकै तद्धियैपर धिर रखकर ठेट जाति 
तत्र ्रङ्ष्ण उनके पर्‌ दबानं उगवे, पंख श्रः टगतें 
ओ इस प्रकार अपने बड़ भाईकी धक्तावट दूर करते ॥१४॥ 
जनग्बाल बाढ नाचन-गान्‌ ठगतें अथवा वार ठक्रि-लक्ष- 

गृहीतद्तौ गोषाछय्‌ इशन्तौ प्रज्श्ुः } १५१} | कर एक द्रेसे कुर? ठड़ने ठते, तव इयात ओर राम 
कचित्‌ प्टवतस्पेषु भियुद्धभमकरिवः | दाना माई हाम्‌ शान्‌ गन्ना 
| हरस्कर वःद-कहि' करत्‌|| १५।| कम-कभा य्‌ श्रद्रष्ण 

दृष््मुलाश्रयः जेते योपोत्हज्ञोपदमः 1} १६।। | भी व्वाधकि साय बुद्ती व्डते-ख्डत थक जाते तथा 
। किकी घुन्दर बरश्नकेनीचे कोमल पल््वोकती सेञधर निकी 

पादसंवाहनं चक्रः केचित्तख सहारन; । | म्राग्बाज्की गोदे धिर रलक्र ठेट जाते ॥ १६ ॥ 
| परीक्षित्‌ ! उस समय कोई-कोई पुण्यक मूतिमान्‌ ख्य 

अपरे इतराप्यानो व्यजनं; सस्वीजयन्‌ {६५} | गवाख्वाक महात्मा श्राकृब्णके चरण्‌ "दवान च्गत चौर 
 दूक्षरे निषाप बाख्क उन्हे बड़े-बड़े पत्ता या अंगोलियसि 
| पखा जलनं क्गत ॥ १७ ॥ िक्ती-किसीके इदयमे व्रेभकी 
शायन्दि ख अहरा स्वेइद्धिमधियः शनः {1१८} | षार उमड़ आती तेः वक धीरे-धीरे उदारश्चिरेमणि 
| परममनली श्रीकृष्णकी ठकीगन्नोके अनुख्प उनके मनक 
भ्रिय खानेवाटी मनोहर गीत गनं ट्गत। ॥ १८ ॥ 
भगवानूने इक प्रकार अपनी योगम।यासे अपने रञ्वमय 
खल्पको छिपा रक्खवा था | वे रक्ती टीलारं करते, 
| जो टीकर्टक गोपवाच्कोकी-सी हा माद्धम पड़ती । 
रेमे रमाखालितपादषल्लवो खयं भगवती कभी जिनके चएणकमेकी सेवानें संच्न 
रहती हैः वे ही भगवान्‌ हून त्रामीण बाख्कोंे साय 

ग्राम्ये; स्म॑ अ्राभ्यवदीश्चकचैष्टितः {\१९। ¦ बडे प्रेभसे म्रामीण खेर खला करते थे । परीक्षित्‌ । 

एसा होनपर भा कमी-कमी उनकी रेशयम्ी लीनां _ । 

भी भ्रक्ट ह्यो जाया करतीं ॥ १९ ॥ ६ 


खयं धिश्रप्रथस्थायं गादसंवा््नादिधिः ॥१५४॥ 


नृत्यतो भायतः कापि वरगती युध्वसोभिथः : 


क्क 


= अक [ि 


ककि ऋ कक 
> 
(् 
कः त 
@* = 


अन्ये तदञङूपाणि मनोज्ञानि सहारमनः | 


ल निगूढात्ममद्िः स्भायया 


गोपारभजत्वं चरितं विडम्बयन्‌ । 


श्रीद्‌!मा नाम गोपालो रासकेश्वयोः सखा | 









बकरामजी ओर शरृ्णके ्लाओमे एक प्रधान गोप- ` 
बाञ्क ये श्रादामा । एक दिन उन्न तथा घुब्छ ओर ` 
सुबरस्तकटष्णाचा गोपाः भरम्णेदमन्रव्‌ ॥|२०॥) स्तोकक्ृष्ण ( ओट कृष्ण ) आदि ग्राख्वालेनिं सथाम 
राभसे बडे प्रमके साथ क्डा--॥२०॥ भोगो १। ध (कः 
घुल पड वानेवाले बग्रामजी | आपके बा वन कोर 
थाइ ही नहीं है | मारे मनमोहन शरीडृषण | देको ` 
न्ट कर्‌ डाग्नातो ठम्शारा खभाव दी है । यसे योडीद्ी 


ॐ ५ क 
| ब ~ मे पृ केन्पातताड्वे 













"= 





(कक 


३९८ सद्‌ भाशषत ¡ > १४५ 


पि भजक 









चक 
> शजज -्क 


ॐ. 


[निक ^ क = ` 
अद्‌ = - 


व्क र ॐ क = कन किक कः त. = = @ त ; = 
श == 
= ज = 9 क = क ऋक 


[कि , 
वि 


एरानि तेत्र भूरीभि पतन्ति पठितानि चं चः मरे पड़े है ॥ २१} वदँ बहत-से ताड्के फल एक 


=+ 
। न व्क ~ -एर्भ 
‡ वक्कर्‌ गन्त रहैत हं आद्‌ वहत पर्क गिरे हृएभी 


(= 


[र ॥ = ९ 

| 2 । परत वहा वल्कः नामकः एक्‌ दष्ट दय रइता हं । 

सोऽतियीयऽ खुरः गभ ड द्ष्ण == ! । उस्नं उन सलपर रक खगा रक € \॥२२॥ दल्राम- 
& भ खरशू्पध्ङः - क, ~ भ 

६ 4 लर १ ओर भश श्रीढष्ण ! बह दैव्य गयेके ङ्प रहता 


ह 6 _ (© है । वह खयं वडा व्रक्पान्‌ है दही, उक्तम साथ ओर 
आतपठ्ल्थवलरन्येन्ञातिभिवदहुभिशेतः ॥२३। , ` ~ कि" 
स उरीकं समान बवान दंष्य उषी ख्रें 

२ 


- + ८ 1 न # ङ ङ्घ, > 
५1 4 ज अ ० > २.5 
+ 4.५ 


# भ 
* 

॥1 र छ ॥ 
अ, पै 
५ " > कि {2 + 

८५५ । ॥ 

॥ शः ॥॥ 
॥ि 
# 


क य. 
धि, ¢ ह) # ४ च |. 
# >= क 4 न > च 
हैर च्व कृतकः => च जद त्क 9 7 । क" 
7 


2 
1 


खन्ति छिलववरुद्धानि षेशः ट्‌ रात्छ 


+] १ ~ 
। ~ ४ ॥ + [ऋ ४ अ - ~~ रर ` , 9 ॥ 
„ +1# „~ = म ~ आ ~ तः 





2 क. ^ 
कि 1 क 
= 
= कः 
~~ 


= 


नदः - 


{¦ | + 

| £ ~ = न्‌ + 3 च 
} --- ह} २३ } यर शञधात सया । उस 2२९ 

। 1 ताद्‌ छरनराहारद्‌ भीतेदभिरमिवहन्‌ । = | रक्ते द ॥ ९३ ॥ भेर दधाती भया ! उस्‌ दने 

| | अधवकर्ः न जानं तन मनुष्य खा डा हं ¦ यही कारण 
{1 न, (७ | 2 रि - न > --,> नन भ्य (न~ "+ (न, 

अव न सेव्यते पश्चगणंः पक्शद्कदिभजितय्‌ ।।३४। | क मार मनुय उतकी. सनन न 
ड ओर पञ्य-पक्षी भी उद जगच्पं नदतीं जते} २४॥ 


विद्यन्तेऽसुक्तपूडाणि पखानि ससभमीणि च| उष्के फक हं तो वड पुगःघत, प्रतु हमने कभी नही 
4 र ६ = र १ २ अर उन्दी पन्द-मन्द्‌ धगन्ध 
३1 एष वं सुरभिगन्धो विषुचीनोऽवगरद्यते ।॥ ९५ | पच रही है | तानग-हा व्यान देन उका रस्त मिलने 
। 8 कता है ॥ २५॥ श्रीर्या ! उनी सुगन्धदे हारा 
प्रयच्छ तानि नः कृष्ण शन्धराभितदेदसाड्‌ | मन मोहित हो ग्या है ओर उह 


८21 
१2। 
£! 
ए 
१) 
१ 
ह 
१५} 
न 
^ 
भ} 
~ --+ 


1 & 9 
¢ 
» 
# 
॥ 
॥। 


= ० (ननः 
1 1 द चट 


रहा ह । तुम हमे वे फक अवयं दिल | दा 
दादा | हमे उन पफलोकी वदी उत्कट अभिल्षा है| 
¢ < आपको सचे तो वहां अर्यं चन्ि ।॥ २६ ॥ 
एवं सुददखः श्ुत्वा सहत्श्यचिक्पयः | अपने ह्खा वाय्वा 
रहय जम्मतमेदिषेदी तालवनं प्रभू ।।२७}} | शरकृष्म जर बल्रापजी दो 
बलः श्रदिच्य बाहुभ्यां बालान्‌ सभ्पर्दिस्पयन्‌ । | कनक चिथ उन साच ताव्च न छि चल १६ २५ 
यक्त यनम पटचकर्‌ बररःमजीने अपनी बं हर उन त।डवें 
फलानि पाठयामास सतङ्गज इवोजक्षा 1 २८॥। | पेदोको पकड़ चिवि; धौः मतवा हःथीके कच्चे, समान 
(८ ~ , उन्हें बडे जोरसे हिचकर ब्इृत-से प नीचे गिरा 
फलात्‌ परता. र्द निशम्बादररासभः । । दिये ॥ २८ ॥ ज गघेके शूषे रहनेवाल दव्यन फलके 


अभ्यधावत शिहठितलं छनं पशरिद्धभ्पयन्‌ ॥२९॥ | गिरनेका शब्द सुन; तन दहं एवतक पाथं सारी प्ध्वी- 
| को कपाता इभा उनकी ओर दौड़ः ॥ २९ ॥ वहं वड़ा 


बलवान्‌ था । उसने बड़ वेगं बख्रःमजकं सामने अ।कए 
पने ?िख्ले वैरसत उनकी छातीमें द्ुस्ती मारी आर 
इतके बाद वह दुष्ट बड़े जोरसे रकता इअ। शसि हट 
गया ॥ ३० ॥ राजन्‌ ! वह गधा करोधमे मरकर कषर्‌ 
रकता इ द्री बार ब्रमजीके पास पचा भौर 
बड़े क्रोधस अपने पिले 


वाञ्छसि महती राभ मभ्यं अहि रेचते २६}; 


[क 1 ~= 2 => 


+. = ^` क 
ह 
मा 






| ७ र समेत्य तरसा ृ्त्यदढास्या पटस्य बट वली | 


निहत्योरति का्चब्दं ञ्चन्‌ पर्यसरद्‌ संरः ॥२०॥ 









` निह 














धि , द 
# + ‡++# द्धि 2 7 १६ > (लै 


चक 





ब्र ` ` ` ^ = कु व = जं ४ = 
अ० १५ | 














दशम स्कन्ध २२९ 
ततं शरीः प्रष्द्‌श्रापरथिसक्रपामिनः। मैरोकी दुस्त चयी \, १६ ॥ बट्रामजीने अपने एक 
चिन्ेप तणरःलग्रे अाषणत्यक्तजीधिसद ॥ ३२; दी द्वाथसे उक दोना वैर पकड़ व्यि द्‌ उसे जाकादा- 

ष ५५५ ४1 वणत्यछञ 1/1 ¡ २३२ । म घ्पाकर पच्छ ताड्यः पडप्र मरं ) धुमाते दमय 
तेनाहता यहाताह्मं वेप्ानो बहच्छराः | | ही उक्तं गचघज प्राणपलल् उड़ गय च || ३२ ॥ उसके 
| गिनेकी चोचे बह मदान्‌ ताइकः ब्ृश्च--जित्तक्ना 

प्ाश्वर्थ्‌ सस्पयच्‌ भग्नः स {51१ चापरवूरं ४ प ६ 


ऊपरी भाग बहत विशाल श--दचयं तो ठड़तडाकर 
बरख रीरयोत्छुषटखर्देदहतद्दाः । | गिर ही पड़ा, सटे इए दपर इने भौ उसने तोड्‌ 
। डाला } उक्षन तीत्तरको, ताक्तरेनं चौयको- इद प्रकार 
एक-दुसरेको गियाते इए बहृत.ख ताय्नरश्च गिर पडे ॥२३॥ 
नदि भग्यति नन्दे अगसश्रे ¦ | बज्शामजीके च्थितो यह एक खेड था । प्रतु उनके 
दाश फक हृए गघेके शरीरद्चे चट खः-दाकर वहं सन- 

आतग्रारमिदं उद्िसतन्तुष्यङ्क यथा पटः ।\५। के-सब ताङ्‌ हिल गये । रे्ा जान पड़ा, नानो वको 
 कज्ञावःतनं ज्चकञ्ञार दिथा हो ॥ ३४ {† भगवन्‌ बराम्‌ 
खयं जगदीश्वर हैँ । उनः यह सारा इर ठीक वसे 
। ही ओतप्रोत है, जेसे स्तोमं वच्च | तव भका; उनके 
व्यि यह कौन आश्चयकी बात है} ३५ १ उद्घ प्षमय 
तासानापदतः कृष्णो रामश चष डीलया ।  चेद॒काघुरवे माब £ अपने मारके मारे जानेसे क्रोधके 
। मारे आगववरूा हो गये । सब-के-सव गवे बच्यामजी 

गृहः तप दव्र्णास्‌ भ्र({हणात्तमराजस ।॥२३७॥ ओर श्रीकृष्णपर बडे केगसे हट पड़ ॥ ३६ ॥ राजन्‌ ! 
उनमेसे जो-जो पापस् आया, उक्षी-उसीको वटरामजी ओर 

फलप्रकरकद्ीणं देत्थ देदेगंवाद्वुभि १ । । श्रकरष्णने खेर-खश्मे ही पिले पर पकड़कर ताव्छवरक्षो 
। पर दे मारा ॥२३७॥ उस्‌ पसषमय वह भूमि ताडके फल्शेसे 

रराज भूः सवाखग्रघ्रवि नभस्तलम्‌ ।\३८॥ । पट गयी चौर टटे इए बश्च तथा दैत्योकि भाणहीन 
रारीरोसे भर गयी । जसे बादर्गेसे आकाश्च ठक गय। 
हो, उस भूपिज्ी वेक्षी ही शभादहोनेख्णी॥ ३८! 
बठरामजी ओर श्रीज्कष्णकी यह भङ्खर्मयी खा देखकंः 
देवतागण उनपर छ बरक्षाने लगे ओर बाजे बजा 
| बजाकर स्तुति करने ल्मे ॥३९ जिस दिन चेनुकाष् 
मरा, उसी दिनसे रोग निडर होकर उक्ष बनके तारुफः 


। खाने लगे तथा पड्यु भी खच्छन्दताके साथ घास चर्‌ 
ल्ग ॥ 9 , = 
6, । इक्तके वाद कमल्दक्लोचन भगत्रान्‌ बरीकृष्ण द ग च 
कृष्णः कमरुपत्ा्षः पुण्यभ्रवणकेतेनः। | भाई बक्रामजोके साथ वरजनं जये । उच मय उन 
| ' साथी ग्ाल्व!ल उनके पीऊे-पीछे चते इर्‌ उन 6 
करते जतिये | क्योन हो, भग ४५६ ले रला 
वण-कीतन ही संबसे बहकर पवित जा 


वालशथङ्.भ्पयरं वव उहवबादै्वा इञ \;६४॥ 


ततः द्रष्णं ख रामं उ ज्ञातयो धेदुक्खये ¦ 


=} {२ ऽय्यद्रय्‌ सव सरन्धां हतबान्धवाः \\२६॥। 


¢ @ 


तयासत्‌ यदद्‌ कसं निश्लाम्य दिदुधादयः। 
धषु; एष्पय्ाण यद्कवादयानि तुष्टुबुः {३९ 
अथ दाख ङछन्यादर्‌ सञ्ुष्या गदसाव्वसाः | 


तृणं च पृशयेहवेर्देतघेलुककानने ॥४०६; 






 स्तूयभानोऽदगैगेषिः सश्रजो व्रजमाव्रनत्‌ ।४९॥ 





[५ ^ र | * 
र द क 4 च ऋ, 
~: 9 ~. ¶ ५१ "वि का, ° ४ 

"> भी: 
५4 ् = = 
- [रे [त य 
~क - + दक्भ्ः ककमा 
त ५ र । 
* 


क क 









१. तारः पतमानो । 


२३० श्री षद्धागवतं { अ० १५ 


` पजा त प ज भ = ति भ ` श त ग त भ ` जि श त जा जा ज = = अ वि 2 १ ॥ [ 0 क 1 ए क र: ० मी द १ 
1 1 9 मि ` ति जः" तो ` अको ज = 5 च 2 = क को चा ज क = = भ ` नोना कोजः ऋ» च -अो, = ® तककः तकः चा तक चत, 3 जक 8 ठ = = किक 








तं गोरजश्छुरितद्ुन्वलः बद्धषह- | उस समय श्रीक्रष्णकी धुघरारी अलकपर गौत घुरेसे 
| उड्-उङ्कर धूलि पड़ी दहे थी, सिरपर मोरपखका शकु 

यन्यप्रषधलरुचिरेशषणत्वारुहासय्‌ 1 । था गीर वलम छुन्दर-सुन्दर जंगली पुष गुथ इए २। 

र | उनके नेत्रम मधुर चितवन ओर सुखपर मनोहर धरस्तकान 
वेणु कवणन्तःडुभेरलुधौतकीतिं ची | वे मधुर्‌-मधुर्‌ मुरी बजा रहे थे ओर साथी ग्रल्व्राठ 


उनकी ट्टित कीतिका गानि कररहेये | वंशीकी ध्वनि 
। घ्ुनकर बहरत-सी गोपियो एकः वाथ दही व्रजसे बाहर 
निकल आयीं | उनकी खं न जारे कवे श्रीकृष्ण, 


गोप्यो दिद शितद्शोऽस्यगमन्‌ समेताः ४२ 





न्द 
न्द भदै 
पीत्वा इडन्दवसारपमकिभू दशनके वल्य त्स रही भं | ४२ }} गोपिर्थोने अपने 
| जहर्विरदजं अजयो वितोऽहच नेत्ररूप श्रपर्गेे भगवान्‌के मुखार विन्दका भकरन्द्‌-रमु 
। ११ । पान करके दिनभरके विरहकी जलन रन्त की | ओर 
| भगवान्‌ने भी उनकी [जभर्‌ हंसी तशा विनये युक्त 
। | [न क । १ भ 
| तत्सतछतिं खमधिभम्य विवेश भोषटं परेमभरी तिर्छी चितवनक। सत्कार स्कार करके व्रज 
















प्रवेश किया ॥ ४२॥ उधर यश्चादासेया ओौर रोहिणी. 

जीका हृद्य वास्सव्यस्न ह उमड़ रद्वा था । उन्होने श्याम 

तयोयंश्चोदारोहिण्यो पुत्रोः पूत्रवस्खके।! -| ओर रामके षर प्रवते ही उनकी इच्छाके अनुसार तथ। 

समयके अनुख्प पहलटेसे ही से च-संजोकर रक्खी हृदं 

यथाकामं यथाकालं व्यधत्त परमाशिषः \\४४।। | वस्तुरं उन्दं खिली -पिलाय ओर्‌ पदनायीं ॥ ४४॥ 

स माताओंने तेक-उवटन नदि लगाकर स्नानं कराया | 

गताच्वानश्रम तत्र मजनोन्मदनादिभिः । इससे उनकी दिनभर बूमने-फिरनेश्री मागत थकान दृर 

र 1 हो गथी । फिर उन्न घुन्दर वख पहनाकर दिऽ४ पुष्पोकी 

„ नीवीं वसित्वा रचिरां दिव्यस्रगन्धमण्डितौ \\४५)! या ०1 

४ = दोन भाहइययोने माताओंका पगेधा इण स्वादिष्ट अन्न भोजन 

जनन्थुहतं प्रार्य खाद्टन्रपसाकितौ : 1 

` यश्ोदा ओर रोहिणीने उन्हं न्दर श्धापर्‌ घुदखाया | 
॥ संविष्य वरशय्यायां सुखं सुषुपतुद्रजे ।॥४६॥ | स्याम ओर राम बड़े धारामसे सो गये } ४६ ॥ 


सत्रीडश्नसबिनयं यद॑पाङ्गमाक्षय्‌ । ४३ 


त ~ | | 9 
एव स भगवान्‌ दभ्णा चन्दाचनचरः क्वचित्‌ । | भगवान्‌ श्रीकृष्ण सप् प्रकार चृन्दावनमें अनेकां 
: | लीला करते । एक दिन अपने सखा पालवालोके घाय 


ययौ रामम्रते राजन्‌ कालिन्दी सखिभिद॑तः ।४७।। | वे यपुनातटपर गये । राजन्‌ । उस दिन वकरामजी 
उनके साय नहीं थे ॥४७॥ उस समय जेऽ-आषादके 


श प्याप्तसे उनका कणठ पूख रहा था । ईसल्िे उन्होने 
दु जर १७ सस्वस्ट्षाती विषदूषित्‌ ।४८।। यमुनाजीका विषेखा जक पी ल्या ॥ ४८ ॥ परीक्षित्‌ | 
` = अक नहे 
वेषाम्भस्तदुयस्पश्य देवोपहतचेतक्षः । होनहारके वश्च उन्हें शस बातका ध्यान ही नहीं रहा 
व 3... था । उस विषेले जल्के पीते दी सव गौं जीर ग्ाठ 
तव्यंसवः स 8: संलिलन्ते §इहदह ॥४९॥ | बाठ म्राणदीन होकर यक्ुनाजीके तटपर गिर पड़े ॥४९॥ 


र स्व ~ - च - च -- ~ व यःयकार्यान्य्यातसपकज रर 


अथ गाव गोपाश्च निदाघावपपीडिताः 1 घामसे गौ ओर ग्वाल्नाक अत्यन्त पीडित हो रहे ये | 





= + 4 











अ० १६ ] | 
वीक्ष्य तार्‌ वे तथा धृतान्‌ ष्णा योगेश्वरेशरः उन्ं रेसी अवस्थामे देखकर योगेश्वरके भी ईद मगवान्‌ 
श्रीकृष्णने अपनी अग्रत नरसानेवाटी दष्टिसे उन्दँ जीवित 


ई्षयासृलवपिण्यां खनाथान्‌ समजीवयत्‌ ॥५५०॥। | कर द्विया । उनके खामी ओर स्वल तो एकमात्र 
श्रीकृष्ण ही ये | ५० }} परीक्षित्‌ । चेतना आनेपर वे 

ते सश्प्रतीतस्मृतयः सगुत्थाय जलान्विकात्‌ । सव यमुना जीके तटपर उट खडे दए ओर आश्चयं वकित 
होकर एक-दृ्रेकी ओर देखने च्गे }} ५१ } राजन्‌ । 

आसन्‌ सुिखिताः इच वीक्षमाणाः परस्परम्‌॥५१)) | अन्ते उन्न यदी निशय किया कि हमकोग विषैला 

| जल पी टेनेके कारण मर चुके थे, परत हमारे श्रीकरष्णने 

| अपनी अनुग्रहभरी इष्िसे देखकर हमं पसे जिटा 

पीत्वा दिषं परेत एनकुत्थानमात्मनः ।\५२}! | दिया है ! ५२ ॥ 


अन्दरसंखत ठद्‌ राजन्‌ गविन्दारुग्रहेकषिदम्‌ । 





इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायं दशमस्कन्धे 
व्र वेनुकवधो नाम पञ्चदशोऽव्यायः ॥ १५५ !! 


"न ~~ 


अथ षोडरोऽध्यायः 
काियपर कृपा 
श्ीशयक उवाच श्रीदुकैवजी कते है--परीश्चित्‌! मगवान्‌ श्रीङ्ृष्ण- 
ने देखा कि महाविषधरर्‌ काडिय नागन युनाजीका जलं 
विषा कर दिया है, तव यमुनाजीको खुद्ध करनेके 
वरिचारसे उन्होनि वषये उस सपको निकार दिया ॥ १॥ 


दिखोक्य उषितं द्रष्णं इष्ण' कुष्ष्िना विश्रुः | 
तस्या चिश्ुदधसन्वच्छये सप तश्ुदवासयत्‌ ॥ १। 


राजोवाच राज! परीष्ितने पुका- ब्रह्मन्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्णने 

न यपुनाजीके अगाध जलें किस प्रकार उक्च सपंका दमन 
्थृभरन्तजंछेऽगघे स्याद्‌ अश््रानहि 

<~व्चं न्यदृह्ठादू भग्तरान्‌हुमर | किया १ किर कान्य नाग ते जस्र जीव नहीं था, ` 


द्वे वहुशुग्‌यासं थाऽऽषीद्‌धित्र कथ्यतामर्‌)} २॥ | रेसी दामे वह अनेक युगोतक जक्में क्यों ओर कंसे 

८5 रहा १ सो वह्लइये ॥२॥ ब्रह्मखखूप महात्मन्‌ ! भगवान्‌ 

हान्‌ भगचत्स्य भूल्न, सच्छन्दन्‌त्िन्‌? । अनन्त दै । ये अपनी रीढा प्रकट करके खच्छन्द्‌ ` 
व विहार करते हैँ । गोपालख्पसे उन्होने जो उदार खील ` 
गोपालोदारचरितं दस्प्येताग्रतं जषच्‌ | ३॥ | की है, वह तो थमृतलरूप ह । भला; 

| सेवनसे कौन तृप्त हो सकताहै१।॥३॥ 
४ शु उवाच मेज क -पद्‌ । गा 
कालि नागका एकः कुण्ड : 7 । उस्तका जलं विषकी 
गर्मीसे खौर्ता रहता था । यहयोतर किं उक ऊपर 
ल जाय  करतेये॥४॥ 


--- => ----~ ~~ - ~ 
क ण न नल 










कारलिन्यां काल्यिखःसीदुपरदः किद्‌ विषाग्निना । 


२२२ ञ्रीमद्भागवत [ अ०.१६ 


न ष्ये पोतकः दोः कोः ज > = = जा पि भिमो 3 य 
प (क जक "मी क भो चक = कनः => क = (म 











[1 


क (र अ 


विप्रता धिषोदोधिभारुतेनाभिसर्तिताः उसरे विषैले जल्की उत्ताल तरङ्घोका स्यद्ं करके तया 
भ्रियन्ते तीःगः यस प्राणि श्थिरिजङमाः || ५ }} | उस्वी केोरी-खोटी तव्रद केकर जव वाशु वाहर आती 
ध विध्य तेन ओर तये घास पात, बक्षः दयप आदिका स्पदचं 
करती; तव वे उसी समय भर्‌ जाते थे |} ५} परीक्षित्‌ 

भगवान्‌का अवतार तो दष्टोका दमन र्रनेके च्वि होता 
ही ह । जव उन्होने देखा कि उष सपक विर्का वेग 
नड़ा प्रचण्ड ( भयंकर ) है ओर्‌ वक् भयानक विष द्री 
उसका महान्‌ बल है तथा उसके कारण रेरे विहारका 
स्थान यपुनाजी भी दूषिते हो गयी है, ततर मनवान्‌ 
3 < श्रीकृष्ण अपनी कमरका फटा ककर एक बहत ऊँचे 
मास्फोव्य दर्शना न्यपतद्‌ निषोदे।। ६। | कदम्बकः वरक्षपर चढ़ गये अर बहते ताढ रोककर उस 
रपंहद १ एरुषसारनिणतवेग- विषे जलय कूद पडे}! ६ !} यसुनाजीक्ा जल सपे 
विषकै कारण पहल्से ही खौल रषा शा | उक्षकी तरे 
लाल-पीटी ओर व्यन्त भयंकर उट रदी शीं | पुस्गोत्तम 
भगवान्‌ श्रीकृष्णके कूद पडनेखे उष्ठका जीर मी 
= ~ उछल्ने कणा } उष समय तो सालियदहदा जल इधर. 
पयपलुत। रिपकपायविभीषणोमि- उधर उछलकर चार पौ हाथतक पैठ गया ] अचिन्त्य- 


| १; । & अनन्त बढ्शारी भगवान्‌ श्रीक्ष्णके लि इमे कोई 
1 १ धलुश्तधनर 7 

चय्‌ च "रतभनन्तचरुद्य ‰ तत्‌ ॥। ७ ॥ आश्र्यकी नात नहीं है | ७॥ प्रिय परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 

| श्रीकृष्ण काच्ियदद्मं कृदकर अतु बरसाटी सतत्राके 


दृष्टां नदी च खलक्षंयमनवलरः 


छष्ण्‌ः खदस्बमधिरुद्य ततोऽतितुङ्‌- 





संश्लोभितोरगिशेच्छरत्िताम्बुराशिः। 
















० क # 
, = = 
क 
अ ॐ. 
१) 
“| १ कृ दमक ०० 


तख हदै धिहर्तो शुजदण्डधृणं- । गजराजके समान जल उछाटने टगे } इ प्रकार जक 
क्रीड करनेपर उनकी भुजाओंकी ट्रे जलम बहे 
व॒घृएमङ्ख दरथारणयिक्रसस्य | `  जारका ₹> होने ट्गा । अखिसे ही स॒ननेकाटे कालिथ्‌- 


नागने दह आव्राज छनी ओर देखा किक >रे निग 
स्थानका तिरस्मार कर रष्वा है । स्ये यह यहनं न हआ 
वह चिडकर भगवान्‌ श्रीक्रष्णरे खामने अ! गया ! ८ ॥ 

ने देखा कि सामने एक सौँगला-घलोना कल्क है | 
वर्पाकाली येके षान अत्यन्त छकुपर अरीर है, उधमे 
९ ठगद्छर आंख हरन नाम डी नही ठेतीं ¦ उसके वक्षः- 
ह तं ््षयीयसुहमारघनत्रदातं | स्थक्पर एक घुनी रेखा-- श्रीक्सका चिह ॐ ओर 
द ४ | वह पीठे रगका वच्च धारण किये है } व्डे भुर एवं 
भरीवर-सपीठचनं सितङन्दराखम्‌ } मनोर सुखपर सन्द भन्द्‌ मुस्कान अत्यन्त चोभायमान 
` हो रही दै । चरण इतने सुकुमार्‌ शौर सन्दर ड, मानो 
- व कमठकी गदी हो । इतना कभक रूप होनैपर भी जव 

५ ४ काटि नागने देखा कि बाठ्क तनिक भीन डरकर इस 
` ` ~ विषैरे जल्में मौजसे लेररहा है, तत्र उसका क्रोध ओर 
ठ्पा जया चछाद्‌॥ ९} | मी बढ़ गया । उसने श्रीृष्णकरो मसान डसकर्‌ 


क 
व त २ 
न तै 


^ ग््कि + ¶-- कै = 
1 4 ^ कै च व #॥ ४१ 
# ५ (4 १ < 
> "ष ् & ^ 
न न |; "क ~ ५ ् 
- = म £< ऋ 
५* » ई ट वः क ति क्रि ^ # 
द्र क ~क चः प (नः # 4 १९ 
नि ` + क 
न च १ कि 4. ८ 
= मह्वि = ;१ -ॐ- भ्न » च 9? कक ~ च 8 
॥.. = ध ~ ,4 
प्त "4 ॥ $ 4 
+ ॐ श $ >. 
#॥ 1 १ ॥ 
चं कः "ध > 4 


आश्रुत्य तद्‌ खडदनाभिभय निरीक्ष्य 


खष्ुःभवा समस्रत्तदर्ष्यमणः }; < ॥ 


~ कर 
९ 





५: 


अ= १६ ] 


दशम्‌ स्कन्धं 





[षि 


त॑ नागभोगपरिवीतभदषटशेषठ- 
भालोक्य तस्परियषखाः पश्चुपा भृशातीः । 
कष्णे ऽधित! 


रुहद थ करत्रकामा 


{निपेहदः }} ? ०) 


चक 


ट{्ष्न णे धश्च { 
१९ ४ सः] ट्‌ ५4 


गादो चप्‌ वस्तयः ऋन्दथानाः सुदु ःखिडाः \ 


~ 


ण्‌ <स श्ठद्धणः बतत 


~ 
^< {~ 


द्य 


(क 


अध्‌ व्रजते सहुत्पासाद्धिवधा इतिद्‌ार्णाः ¦ 


उत्येतुटेपि दिव्यास्मन्यारलभेयकं दिनः ॥ १२}; 


तानारक्ष्ण भधोद्धिग्नः गोदा चन्दपुरोगषाः 


विचा रदेण भाः छरष्णं ज्ञाता चारयितुं मद१्‌।।१३॥। 


५ तिमि 
ख 


दंनिमिततेनिधनं अस्वा शाष्चपतदहिदः, 


तल्राणास्तन्मनस््स्ते दुःखसोकभयःतुराः 11 ‡&; 
अ{बारशद्धवनिताः स्ब॑ऽङ्ग पलयुद््तयः 
निज॑गुमेङ्घलाड दीनाः छष्णदज्ञनजरसाः १५ 
तांस्तथा कातरान्‌ वीक्ष्य भगवास्‌ माधवो बलः। 


| प्रहस क्िञ्चिन्नोवाच प्रभलश्नोऽखुजख सः | १६॥ 







= 
नि 


तेऽन्वेष ॥ ८ 


भ 9 


ही ब्ाच्छल्यपूर्णं था । बे मने देसी वात अति ही ञ्त््त 


| वाक्ती अपने प्यारे श्रीकृष्णो 








अपने शरीरके बन्धनसे उन्दे जकड़ ल्या ॥९} भगवान्‌ ` 
श्रीकृष्ण नागपाक्षे धकर निश्चेष्ट हो गये । यह्‌ देखकर्‌ 

उनके प्यारे सखा ग्वाटवाट वद्भुत ही पीडित इए ओर 

उदी एमय दुःख, पश्चत्तप ओर भयक्षे मूच्छित होकर 
प्रथ्यीपर गिर प्रडे | वर्योकि उन्दने अपने छरीर, घु 
घन-पुम्पत्ति, ची, पुत्र, भोग ओर्‌ कामन ९-- सव कु 
भगवान्‌ श्रीङृष्णक्तमे ही क्षमर्पित कर रक्वाथा}॥ १०॥ 

गाद, बैट, विया ओर वचडे वड़े दुःखंस डकरने खगे | 
श्रकृप्णकी ओर ही उनकी टक्टकी बध दश्ीथी।वे 
डरकरर्‌ इस प्रकार खड हो गये, मानो सौ रहे ह्य । उस्‌ 


समय उनका च्गीर हिक्ता-डोल्ता तक न था} ११॥ 


इर्‌ व्रजे प्रथ्वी, आकार ओर शरीरो बडे भयंकर 


| भयदः तीनों ग्रकःरके उत्पात उठ खंडे इए, ज इस 


नःतकी सूचना देरहैये क्रि बहत ही शी्र कोड अद्म 
घटन! घटनेत्राठी ड ॥ १२ ॥ नन्दवाबा आदि गोपनि 
पडले तो उन अश्चकुनोको देख। ओर्‌ पीछे यह जाना किं 


| आज श्रीकृष्ण विना बठरामके ही गाय चराने चले गये । 


वे मयस व्याकर द्वो गये ॥ १३ ॥ वे भगवानल्छा प्रसत 
नहीं जानते ये । इसीय्ि उन अश्चङुनोको देखकर 


। क्का क, 


' उनके मनम यह वात आयी किं आज तो श्रीङ्ृष्णकं 


मृ्यु ही हो गयी होगी | वे उसी क्षण दुख, शोकशोर्‌ 
मये आतुर हो गये | क्यो नर्यो श्रीकृष्ण हीउनके 
प्राण, मन ओर स्वस्व जो ये॥ १४ ॥ श्रिय परीक्षित्‌ ! 

रनक बाटकः, वृद्ध॒ ओ चियोका स्वभाव गार्यो-जेसा 


दीन हो गये दयौर अपने प्यारे कन्हैयाश्नो देखनेकी उत्कट 


 लकतासे घरद्वार छोडकर निकल पड़े 1 १५५ ॥ नल्राम- ्; 








जी स्वयं भगवानूके सरूप ओर सवराक्तिमान्‌ है । 
उन्होनि जव त्रजवातिर्योको इतना "कातर नैर इतना ` 
आतुर देखा, तव उन्हे हंसी आ गयी । परंतु वे 
योले नी, चुप ही रहे; भयोक्ति वे अपने छ माई 


४ 
श्रकृष्णकः प्रभाव भीमं ॥१ ॥ त्रन- 





नन ~ 3 ~ 


# चं र, 4 जु 
(2 ० भगत 
छ ५ 
गमे उन्हे » 
०. न ६.4 
# श १ ०, -११३) 
~ | ॥ 
[त द ¬ ॐ । 
~ 1 म 


स व शा य ` पााााकातककककत तककक क 


+ 6 ` +कः ५ ^, ५५ 



























। "19.41 5 
५ 


क्‌ = 


1 
) 


[क + 


२२३४ 








` ऋ त ह 
। । भेगवररधणेजग्धः पदन्या यथुनातटम्‌ ॥१७ ` 
ए , 
॥ ते तत्र तत्रान्जयगाङश्ाशनि- 
| ॥ ध्वजोपपन्नानि पदानि चिस्पतेः। 
|| ॥ मां गदामन्यपदान्तरान्तरे 
(शि निरीक्षमाणा ययुरङ्ग सत्वराः ॥१८॥ 
(8 -17 - 
+ श __ 6 ङ 
| 1 = अन्तहंदे अजगभोगपरीदमारात्‌ 
1 { ` छृष्णं निरीहशुपलभ्य जलाशयान्ते । 
ऋ गोपां मूढधिषणान्‌ परितः पश्च 
{| संक्न्दतः एरमकरमरमापुरार्ताः \\१९॥ 


गोप्योऽनुरक्तमनश्षो भगरत्यनन्ते 
तरकषीहदसितविलोकगिरः सरन्त्यः। 
ग्रस्तेऽदहिना प्रियतमे भृश्दुःखत्ाः 
शूल्यं प्रियज्यतिहृतं दध्न्धिलोकम्‌॥।२०॥ 
ताः कृष्णमातरमपत्यमनुप्रविशं 
तुरथन्यशाः समनुशृद्य श्चचः सवन्त्यः) 
ड | जात वरनभ्रियकथाः कथयन्त्य आसन्‌ 
4 कृष्णाननेऽपिं वशो ृतकप्रतीकाः ॥२१॥ 


गतो नन्दादीन्‌ वीक्ष्य तं हदम्‌ । 


कष्णप्रणान्‌ ४ 
<~ 


त्यपेधत्‌ ख भगवान्‌ राधः कृष्णाजुभाव्रवित्‌ ॥२२॥ 


= क~ ए 


१, प्रत 1 | | | + | प (८ ध 2 ॐ 19 


भीभद्भागवते 








[ अ० १६ 


^ 
जः जः जरः भ क = = = क 


मिकते जाते धे । जो कमक, अङ्कश आदिसे युक्त होनेके 
कारण उन्दं पहचान होती जाती थी | इस प्रकार वे 
यमुना-तटकी ओर जाने लगे ॥ १७ ॥ 

परीक्षित्‌ ! मागमे गौओं अर दृक्तरँके चरणचिहोके 
बीच-वीचमें भगवानेक चरणचिह्व भी दीख जाते थे । 


उनमें कम, जो, अङ्का, वज्ज ओर्‌ ध्वजाके चिह बद्रुत 
ही स्पष्टथे | उन्हें देखते द्रए वे वहत रीघ्रतापे 


चे ¦ १८ ! उन्होने दृस्सेदह्ी देखा कि काल्यदहमे 
कलिय नागके इरीरसे वेषे हए श्रीकृष्ण चेटदहीन हो 
रहे हँ । कुण्डके किनारेपर ग्राल्बाठ अचेत इए पड़ हैँ 
ओर गौण, रेट, वछडे आरि बडे आतश्रदे कश रहे 
हे | यह सव देखकर वे सव्र गोप॒ अत्यन्त व्यक्रुल ओर 
अन्तमं मूच्छित हो गये | १९ ॥ गोपिर्योका मन अनन्त 
गुणगणनिल्य भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्रेमके रगमें रगा इ 
था | वे तो निन्य-निरन्तर मगवानके सौहार्द, उनकी 
मघुर मुपकान, व्रेपभरी चितवन तथा मीडी वाणीका ही 
स्मरण करती रहती थीं । जव उन्होने देखा कि हमारे 
प्रियतम स्यामसुन्दरको काले प्षौपने जकड रक्खा है, तव 
तो उनके हृदयम बड़ा दी दुःख ओर बडी ही जलन इडं । 
अपे प्राणवल्लभ जीवनसवस्वके बिना उन्ं तीनों ठोक 
सूने दीखने ल्गे॥ २० ॥ माता यदरोदा तो अपने 
लाड लच्के पीछे काल्यिदहमें कूदने ही जा रही यी; 
परतु गोपियोनि उन्हं पकड़ ्धिा | उनके हृशयमे भी 
वेसी ही पीडा थी | उनकी भखोंसे भी ओँघुओंकी डी 
लगी इई यी । छ्टवकी अं श्रीकृष्णके समुखक्मच्पर 
टमी थीं | जिनके शरीरमें चेतना थी, वे त्रनमोहन 
श्रकृष्णकी पूतना-वध शभादिकी प्यारी-प्यःरी रेश्चयकी 
लीला कह-कदकर यशोदाजीको . धीरज बधाने व्गीं । 
वित अथिकांश्च तो मुर्देकी तरह पड़ ही गधी यी ॥२९॥ 
परीक्षित्‌ | नन्दबाना आदिके जीवन-प्राण तो श्रीढृष्ण 
ही ये | वे श्रीकृष्णके व्ि काथ्यिदहमे घुसने गे । 


यह देखकर श्रीकृष्णका प्रभाव जाननेवाटे भगवान्‌ बलराम 


जीने किन्दींको समञ्चा-बुश्चाकर, किन्दीको बल्ूर्वक ओर 
विन्हीको उनके हृदरयोमे प्रेरणा करके रोक दिया ॥२२॥ 
प ~ | 


अ० १६ | दश्चम्‌ स्कन्धं २३५ 








चज ल भण भाः जण => =) = भय 


इत्थं खगोङ्कलमनन्यगतिं निरीक्ष्य | 





परीक्षित्‌ ! यह सषौपके शरीरसे वंध जाना तो 
श्रीकृष्णकौ मुरष्यो-जैसी एक टीम थी । जव उन्होनि 
देखा कि व्रजके प्षमी लीग चरी ओर वच्चेकि साथ मेरे 
लये इप्त प्रकार अत्यन्त दुखी ह। रहे हं ओर सचमुच 
शृक्ञाय मर्त्यपदवीमनुद्तमानः मेरे सिवा इनका कोई दूसरा सद्वाश मी नहीं है, तव वे 
एक समुद्रततक सपके बन्धनमें रहकर बार निकल 

त्वा मुहूतडद तिषठदुरङ्गबन्ध।त्‌ २३) | आये ॥ २३ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णे उस समय अपना 
तस्परथ्यमानवदएुषा ठषथितात्मभोग- | शरीर ष्मक खे मोटा कर व्या । इससे सौपका 
र शरीर टूटने र्णा । वह अपना नागपाश्च छोडकर अरग 

खड़ा हो गया ओर क्रोधसे आगवनरूढा हो अपने फण 
ऊचा करके फुफकारे मारे व्गा । घात मिलते ही 
षनज्क्रुषनरन्प्रविषास्बरीष  श्रीकृष्णपर्‌ चोट करनेके व्ये वह उनकी ओर टकटकी 
। टगाकर देखने ल्गा । उप्त समय उसके नथुनोसे गषिकी 

स्तन्धे्णोय्युकप्रखो इरिमीक्षमाणः।\२४। | फार निकर रदी थीं । उसकी अखं खिर थीं ओर्‌ 
इतनी लाठ-खर हो रदो थी, मानो मद्भोपर तपाया इआ 
| खपड़ा हा । उक्के पुंहसे आगकी वपे निकल रही 
थीं॥२४॥ उस सनय काय्यिनाग अपनी दुहरी 
जीभ ल्पख्पाकर अपने होटेकि दोनो किनासँको चाट 
रहा था ओर अपनो करार आंखोसे तिषकां ज्वाला उग- 
ठता जा रदा था । अपने वाहन गर्डकं समान भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण उसके साथ रूकते इए पेतरा बदर्ने चे 
ओर वह्‌ संप भी उनपर चोट करनेक। दव देखता 
इआ पतया बदल्ने खगा ॥ २५ ॥ इस भ्रकार पेंतरा 
बद्लते-बदल्ते उसका बल क्षीण ह। गथा । तब भगवान्‌ 
श्र कृष्ने उस ॐ बड़े-बड़े सिरोको तनिक दबा दिया ओर 
< उछच्कर उनपर्‌ सवार होग ये । काटिथनागके मस्तक 
तन्मूरधरत्ननिकरस्पशातिताम्र- पर॒ वहत-सी गल-ल मणिर्यो यीं ! उनके स्पंशसे 
घुने > भगवान्‌के सुकुमार तटुर्ओकी लालिमा ओर भी बद 
पादाम्बुजऽलिलकलादिगुरुनेनते ॥२६॥ गयी । चत्य-गान आदि समस्त कल्के आदिभ्रवतक 


सब्लीकुम।रमतिदुः खिचमार्महेतोः) 





स्त्यक्त्वानमय्य क्रुध ठः खफणान्‌ अ्ुजङ्कः । 


१ 


~ 
8 


त जिद्धया दिक्षिखयः परिठकिलिद्‌ानं 


द घुक्तिभौ द्यतिकरालविपाग्निरष्टिम्‌ । 


~ 


क्रीर्नपुं परिष्ष्सार यथा खगेन्द्र 
बभ्राप्‌ दोऽप्यवश्रं प्रसमीघ्ुमाणः ॥ २५) 


एवं परिभ्रभहतोजक्तयुन्नतां 8- 


र ऋक 1 रके 
जाय क 


मानस्य त्पृथुक्षिरःखधिषटट आदः | 


तं नर्तभुचतमवेक्ष्य तदा तदीय- मगवान्‌ श्रीकृष्ण उसके सिरोपर कपण द्व्य कने 
ˆ | चमे ॥ २६ ॥ भगवान्‌के प्यारे मक्त गन्धवं, पिद्ध 
गन्धर्वसिद्धसुरवारणदेववभ्वः । देवता, चारण ओर देवाङ्गनाअनि जब देखा किं भगवान्‌ 








चव्य करना चाहते हैँ, तब वे बड़ ग्रेमसे मरदङ्ग, ढोढ, ` 
परीत्या मृदङ्कपणवानकवाद्यगीत- नगारे आदि बाजे बजाते इए, घुन्दर-सुन्दर गोत गाते 


इए, पुष्पांकी वषां करते इए ओर अपनेको निखछावर | 
करते इए भेट के-लेकर उती समय मवानके पास आ 





# आ 
= 


पष्पोपहारुतिभिः सदक्षोपसेदुः ॥२७॥ 


क्न 





कि = +> श का व [= , "मा" "का ^ का ` कतक "= त "तयाव 


२३६ ओमद्ागवत | ° १६ 


ऋ ऋक = च 
जति त त भाः भो भ क भ 9 जय दिक ककण "आक 0 त 2 1 क 1 1 7 
नि कि 2 7 1 न कि क 3 > 2 ए 7 2 व > आ त 2 त 7 7 "किमी नी नी मणो 


यद्‌ यच्छिरो न नयतेऽङ्ग शतकशीष्ण- पूर्वे ॥२७] परीक्षिद्‌ ! काल्यिनागके एकः सौ एक सिर 
+ व । थे। वह्‌ अपने निष्ठ दरो न्वी छकाता था, उस्षीको श्रचण्ड 
स्ततन्संधद्‌ खरदण्डवराःऽङभ्रदात्‌;ः । | दण्डधादरी भगवान्‌ पने पैकी चोटसे कुचल उरते | इससे 


काल्ियनागक्ती जीवनक्षक्तिक्षीण हो चली, वह सह ओर 
नथुनःसे खून उगख्ने खषा | अन्त ने वक्र काटते-काटते वहं 
स्तो दमस परथ. धाद् नागः 1रद | वेहोख हो गया | २८}; तनिक भी दैत द्ोतातो वह्‌ अपनी 
२ तः = | ओंखिंसे दिष उभट्ने ख्गता यर क्रोधके मारे जोर-जोरसे 
खाक्लिभियरलद्मतः शिरस्सु | फुफकारे मारने खगा | इस प्रकार व अपने हिरेमेसे जस 
यद्‌ अत्‌ सशरन्नति निःशवसतो रषोच्चंः ! | सरको ऊपर उठाता, उसीको नाचते दूए मगवान्‌ श्रीकृष्ण 
- ङ अपने चरणोकी दोकरसे ञ्ुकाकर रद डाक्तै | उस समय 
क 4 पुराण-पुरुषीचम भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरर्गोपर्‌ जो खुनकी 
ष्यः प्रपूज्ित वेह पुमान्‌ पुराणः ॥२९॥! | वे पडती शी, उनसे देना मादन ह्येता, मानो रक 
तचितरता्डवदिरूणफणातपत्नो पुष्पोसे उनकी पूजा कीजारीदहो!\र ९ ॥ परीक्षित्‌ । 
= भग्वान्के इस्त अद्भुत ताण्डव-यृत्यसे कादियके फएणरूप 
रक्तं युश वस्‌ प नवनगह्ः । छते छिन-भिन हो गये ¦ उका रएक्तए्क अङ्ग चूर- 
स्यत्वा चराचरगुरं पुरषं पुरां चूर हो गय ओर सहसे खृकी उच्टी होने गी } अ 
| उशते छारे जगतके छादिश्िश्चक पुराणयुर्प्र भगवान्‌ 
नारायण समरणं नक्ता जयामि ।॥६०॥ | नारायणकी स्परति ह । व मन-इः-मन भगवान्‌ 
रारणमें मया ॥२५॥} भगवान्‌ श्रोकृष्णके उदम सम्पण 
विश्च है | हसब्यि उनके भारी बोश्चस्े ऋाद्ियनागके 
पाष्मि्रहारपरिर्ग्णदणातपतरेर्‌ : ारीरकी एक-एक गांठ ढीली पड़ गयी । उनकी एडो 
की चोटसे उसके छत्रके स्षमान फण छिन्न -भिन्न हौ गये | 
| टृष्टाहिमाद्यषुपसेदुरषष्य पल्य अपने पतिकी यह दशा देष्टकर उडी पलि सगकवानू- 
की शरणवें आयीं } ते अल्यन्त आतुर हो रही थीं) 
अतं छथद्हनदषण द्द धन्धा; {६4१६ | भयकरः मारे उनके वल भूषण अस्त-व्यस्त हयौ गहे थे ओर्‌ 
-- केङाकी चोटिथं मी बिखर रदी थौ ॥ ३१ ॥ उ सपय 
उने साध्वी नागपश्नियोके चित्तमे वडी पबडा््ट थी । 
। अपने बःसकरोको आये करके वे परध्मीपर्‌ व्येट गयीं ओर 
हथ जोड़कर उन्हं धमःत प्राणि्योके एकमात्र खामी 
करताञ्चलिपयः शङ्ख भतु- । भगवान्‌ श्रीकृष्णक्ो प्रणाम क्या } भगवान्‌ श्रीकृष्णकों 
| शर्णागत-दत्सछ जानकर अपने अपराधी पतिक छ्ुडाने 
छरणद शरण शपन्तचाः ।३२। ; की इच्छसे उरहहोने उनकी रारण ग्रहण की ॥ ३२ ॥ 
| ^  नागपल्य जनु नागपल्लियाने कदा--प्रमो | भापका यह अवतार 
न्याय्ो हि 2 ण्डः कुतक्िद्विषेऽसि ही दुौको दण्ड देनेके व्यि इ है ! ईइसच्यि इस 
तप्रात्रदारः  खलनिग्रह्मय ।  अपगधीक्ो दण्ड देना सर्वथा उचित है । आपकी दृ्टिमे 
यकषिमिरमरक०- “०३ छक्र ८“ मनसा जगामः क पूरे दो दोक नही ह । 


कषीमायुषो भ्रमत उदर्वभदाखतोऽद्ङ्‌ 





करष्ण॑स्य॒ गमेजगतोऽविभरवसन्नं 
0 


























ग । 
4 ० ॥ भ 8 + 84 १ 
५ । ४ 4 
| | | 8 = ५९ ५ 















# यै 





ण मीक क 2) 





क क के 


रिपोः इतानासपि तल्यदष्टे- 


अदुग्रक्षऽयं भवः छतो हि नो 


के क १- 
कऋाभाऽ[¶ तड्डुश्रह एव इम्मतः (1२४८१) 


~ ~. {तदेन 
(णर्‌तधानन हः भरनर्द्‌म | 


त । च 
भग्यं सा सवमङ्खिकस्एया 


= २६:-तव्यति 0 
धतो भदस्तुष्य्ति स्वजो : ५५ 
= आ + ने नः ~ 
५५ व ख = दवं द्मह्‌ 
~ (14 
तव रयु (धकर 
+ ` 


ऊः 04 
२६०८७ अ_ई=न्‌ऽऽचरचषा 


विहाय आयाद्‌ चिरं धृतव्रता \\३६॥ 


वाञ्छन्ति यतरपराद्रजः प्रपन्नाः ६\३७॥ 
तदेष नाथाय दुराण्सत्थै- 
सतप्रोलनिः कोच्वषेऽप्यदीश्चः । 


हंक्षःरचक्रे अरसवः शरीरिणी 








। शत्र ओर पुरका बोई मेदभाव्र नदीं है| = आप 3 ड 
| जो किसको दण्ड देते है, वह उसवे, पार्पोका प्राथश्चित्त 


अ० \8& दशम्‌ इ्कर्ध्‌ 
0. 
धृस्सै दषं फरुमवाद्ुखन्‌ 11२ 1} । करानि ओर उसका परम कल्याण करनेके य्यि ही ॥३३॥ 
| 


| राञ्य या प्ृथ्वीक्ी बादसाही नद्वीं चाहते । न वे रसातल~ 


युदिच्छहः खाद्‌ विमदः समः \२ ॥ 









जपन शः = कः अक 


आपने इमन्ेगोपर यह बडा ही अनुग्रह किया | यह 
तो आपकरः छृषा-ग्रसाद द्वी दै; क्योक्रि आप जो दुर्ेको 
दण्ड देते हँ, उससे उनके सारे पाप नच््हो जतेदै। 
इस सपके अपद्धी होनेमे तो कोई सदेह ही नकशीहै। 
यदि यह अपरधी न ह्येता, तो ञ्चे सपवी योनि ही 
पयां भिल्ती १ इस्तट्ये हम सच्चे हृदयसे आपक्रे इस 
नर्तो भी आपका अनुग्रह ही एमञ्चती है ॥ ३४ ॥ 
अवद्य ही पूवेजन्भमे इसने खयं मानरहित होकर ओर 
सरसा सम्मान करते हए कोई बहत वडी तपस्या की 

अथवा सव जीवोपर दया करते इ९ इसने को$ 
नहत बड़ धम किय! ह | तमी तो आप इसके ऊपर 
<न्तुड इष्‌ है; क्योकि सव-जीवघ्ठद्प आपकी प्रसननताका 
यही उपाय है ॥३५५]} सगदन्‌ ! हम नद्य समश्च पातीं ` 
क्रि यह्‌ इसकी किस साधनाका फर है, जो यह आपके 
चरणकमव्येदी धूर्का सपरा पनेका अधिकारी इआ है। 
आपके चरर्णोकी रज इतनी दुकंम है किं उसके च्वि 
आपकी अद्धोङ्खिनी ख्दमीजीको भी बहुत दिनोंतक समस्त 
भोर्गोका त्याग करके नियर्मोका पायन करते इए 
तपस्या करनी पड़ी थी ॥ ३६ ॥ भ्रमो ! जो आपके 
चरणाकी धूठिकी शरण ठे ठेव है, वे भक्त जन खगंका 


५ १. व ६ ॐ 
(4 न्कल क ` कश्य = ११ 


का ही राज्य चाहते ओर न तोब्रह्माका पद दीठेना. 
चाहते हैँ । उन्हे अणिमादि योग-सिद्धियोकी भी चाह 
नहीं होती 1 यर्हातक क्रि वे जन्म-मृत्युसे छुडनेवाठे 
दवस्य-पोक्षकी भी इच्छा नहीं करते ॥३७॥ खामी ! ` ` 
यह नागराज तमेोगुशी योनिम उत्यन इभा है ओर 
अयन्त क्रोधी है । पिर मी इसे आपकी वह परभ पवित्र 
चरणरज प्रात इई, जो दूसरोके व्यि सवंया दुम है ` 
तथ्‌ जिक्तको प्राप्त करनेकी इच्छामात्रसे नि पंसार । 
पड़े इए जीवको ससारके वैमनसुम्पत्तकी तो बात दी 






































२३८ श्रीमद्भागवत [ अ० १६ 





कै ऋ क 7 कालः काक कः [१ जो 7 क द तः ` ॐ ज जाः कनक चकन ऋ कत को ` शकः कः त ` ककन कः ऋ ज 


भ ऋक चकर ऋः र 
ऋ कक जकः जि ॐ जः कीः त हः ऋः तो = वे क किक = ` तको @ किः = = ऋ च ` = रक्तकः क => गक ऋ ऋक 1 क 








चाः त काण ¬> चो कः 














[व 


मूतवाक्ाय मतय पराय परमास्थने \३९। | करणेमिं विराजमान ह्योनेपर भी अनन्त है । आप समस्त 
प्राणियों ओर पदाथेक्रिं आश्रय तथा छव पदा्ेकिं ख्पमे 

| श्चिमान दहै । आप प्रकृतिसे परे खयं परमासा 

ज्ञानचिज्ञाननिधये रवण जन्तयक्तये । | हे {६ २९ | अप स्व प्रक्तारके ज्ञान ओर अनुभवोके 

| खजाने हैँ । आपकी महिमा ओर शक्ति अनन्त है | 

आक खख्य भप्रकरृत--दिव्य चिन्मय है, प्राक्रतिक 

गुर्णो एवं विकारांका आप कभी स्पश दही नहीं करते | 

अगुभायाविकाराय नमस्तैऽग्रारेताय च ¦ ४०॥ | आप दी बह हे, हम आपको नमस्कार कर रही है ॥४०॥ 

। आप प्रतिमे क्षोभ उत्पन्न करनेवारे काल है, काठशाक्तिके 

आश्रय हँ ओर काय्के क्षण-कुल्प आदि समस्त अवयवि 

कालाय कालनाभाय कारादयवसाक्षिणे । = | घी द । आप विश्वरूप होते इए भी उससे अच 

रहकर उसके द्रा हं । आप उसके बन।नेवाठे निमित्त- 

कारण तो हैँ ही, उसके श्यमें बननेवाये उपादानकारण 

मी्है।॥ ५१} प्रमो! पञ्चभूत, उनकी तन्मात्रा, 

विश्वाय तदुदरे तत्कत्रे विश्वेतवे ॥७१॥ | इन्द्र्यो, प्राण, मन, बुद्धि ओर इन सवका खजाना 

चित्त-ये सन आप दही ह | तीनों गुण ओर उनके 

कार्यो होनेश्राठे अभिमानके द्वारा जपने अपने साक्षात्कार- 

कोषिपा रक्खा है! ४२ ॥ अप देश; काल ओर 

वस्तुभंक्ती सीमासे बाहर--अनन्त दें ¦ पुक््षसे भी 

स्म ओर काय-कारणोके समस्त, विकररोमिं भी एकरस, 

विकाररहित ओर सवज्ञ है ¦ द्र है कि नहीं हैँ, सवेज्ञ 

परभानेन गूढलार्माचुभूतये २ | हैँ क्रि अस्पन्ञ इत्यादि अनेक मतमेदके अनुकार भप 

उन-उन मतवादिर्योको उन्ही -उन्हीं ख्पमिं दन देते 

है । समस्त शब्दके अर्थके ख्पमे तो आपर्हैही; 

राब्दोवेः पमं भी हैँ तथा उन दोर्नोका सम्बन्ध जोडने- 

वाली शक्तिभी आप दही है । हम आपको नमस्कार 

ॐ करती है ॥ ४२ ॥ भ्रयक्न, अनुमान भादि जितने भी 

य = तः च रमाण दै, उनको प्रमाणित करनेवाले मूढ भाप हयी है । 

4  नानात्रादाुरोधाय वाच्यवाचकञचक्तये ॥४२॥ | समस्त शाद आपसे द्वी निकमे है ओर आपका ज्ञान 

[= खतः सिद्ध है । आप ही मनको व्ानेकी विधिके ख्पमे 

; भ्रमाणमूलाय कथये शाञ्ञयोनये । धौर उसको सब कीस हटा ठेनेकी आज्ञके रूपमे 

, ्रृत्तिमार्ग नर निद्ृत्तिमागं ह । इन ॒दोनोके मूल वेद्‌ 

 अदत्ताय निवत्ताय निशमाय नमो नमः ॥४४॥ | भी खयं आप ही है । हम आपको बार-बार नमस्कार 

1 ३ करती है ॥ ४४ ॥ आप ॒छद्रसस्मय वघुदेवके पुत्र 
कृष्णाय ¡4 रामाय वचसदेषश्ुवाय च । वाघुदेव, सङ्कषण एवं प्रद्युम्न ओर अनिरुद्ध मीरहै। इसत 

` | भ्रकार चतुग्यूहके रूपमे आप मक्त तथा यादर्वोकं खामी 

' नमः ॥४५५॥ क ॥ श्रीकृष्ण । हम आपवो नमस्कार करती दे ॥ ४५५ | 





भूतमत्रेन्द्रियभ्राण मनोबुद्धयाश्यात्मने । 


। (  नमोऽनन्ताय ब्ष्माय कूटस्थाय विपथिते। 


यानिरुद्धाय सात्वतां पत 


४4 र 4 ~ ५ 4 । ॥ ४ ^ +~) ॥- [ 
>+ ४ 9 ^ ॐ ५ 3१ 5 


कै न प 4 
# ५९. र # ५ ~ १* नि 3 


५ 







[@. = = 
4 
। व 

क `, 
0 








# म न ह 
२, करः ४. 


. 


अ° १६ | “ दन्तम्‌ स्कन्धं २३९ 


कानः ता भः => भः क जज जा न क ऋ = 
= न ७9. ज क रजि 9 आ कः = चको क ऋक भागा 








| ज 0 नः ण @ भ = क > शना = कि = भ ~> == ~ म चण न्क 


नमो गुणप्रदीपाश्च गुणार्शच्डादनाय ख} । आप अन्तःकरण शौर उसकी वृचियोके प्रकारक &, 


ओर उन्हीके द्वारा अपने-भापको ढक रखते ई । उन 

गुणव्रच्छुपलक््याय गुणद्रषच सत्रंतिदे |} ‰&।} अन्तःकरण ओर व्रत्तियोके द्रारा दी आपके ख्यका क्छ 
कु सकेत मी मिक्ता है ¦ आप उन गुण्‌ ओर्‌ उनकी 

वरत्तियोके यक्षी तथ, खयर ई । इम अपरकों 

यव्याढरतविहारय म्॑य्याङ्कतसिद्के । नमस्कार करती है ॥ ४६॥ आप मूटघ्रकृतितं नित्य 
। विहार करते रहते है । सस्त स्थूल ओर सुषम जगल्की 
तिद्वि अपरे इी हती है ¦ दषीकेञ्च ! आप मननशील 
आत्माराम हँ ¦ मौन ही आपका भाव दै ¦ आपको हम्गरा 
नमस्कार दै }; ४७ ॥ आप स्थूछ, सुक्ष्म समस्त गति्यकिं 
ज{ननेवाठे तथा सत्रक्रे साक्षी हैँ! आप नामख्पात्मक् 
परावरगतिक्ञाय सवौध्यक्षाय ते नमः। विष नि र भ 
रोचक सारण विश्वस्य मी हं } आप विश्वके अध्यास 

तथा अपवादके साक्षी हैँ एवं भअज्ञानकं द्वारा उसकी 

॑ सत्यत्श्नान्दि र खरूपं [नके दारा उसकी आत्यन्तिक 


हृपीक्श्च नमस्तेऽस्ध अनये मोनक्षीलिने \}४७!; 


अचिश्वाय ख विश्वा र तचे ५ ८\। निवर्तिरे भी काश्ण दहं । आपको हमारा नमस्कार 
2 ॥ 9८ ॥ 
त्वं ह्य जन्मस्पितिसं यमान्‌ प्रभो । प्रमो | यपि कर्तापन न होनेके कारण आप कोई 


| भी कम नहीं करते, निश्िय ई--तथापि अनादिं 
काठशक्तिको खीकार करके ्रकृतिके गुणक द्रा आप 
3 नहत नतः | ३७ विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति ओर ग्रल्यकी टीका करते 
समान्‌ पय. छतः । &; कथोक्ि आपकी लीलाएं अमोघ हैँ । आप सत्य 
समौक्वथामोधविहार ईहसे ॥४९॥ । संकल्प हैँ । इष्व्ये जीरके संस्काररूपसे छिपे इए 
 सखमार्वोको अपनी दष्टिसे जाग्रत्‌ कर देते द ॥ ४९ ॥ 
त्रिलोक्गीमे तीन प्रकारकी योनियं है संगुणद्रधान 
दान्त, र गोगुणध्रघ्रान अशान्त ओर तसोगुणप्रघान मूढ । 
वे सन-की-दव आपकी लीखमूर्तियौ है । किर भी इस्‌ 
शान्ताः प्रियास्ते द्यधुनावितुं सरां समय आपको स्वगुणश्रधान शान्तजन ही विशेष प्रिय 
ई; वर्योकि आपका यह अवतार जोर ये लीलं साघुजनो- 


गुणेरनीहोऽञतकालशक्तिधृक्‌ । 


तस्यैव ठेऽसूस्तनवद्धिलोक्यां 


शान्ता अ्ञान्ता उत मूढयोनयः। 


अपराधः सकृद्‌ त्रौ सीदव्यः खप्रजाढृतः। 


2 ॐ भगवन्‌ } कृपा कीजिये, अब यह सपे मरनेहीवाख है । 





ख्णतुञ्च ते धमेपरीप्सयेहतः ॥५०।। | की रक्षा तथा धर्मकी रक्षा एव विस्ताखे व्यि ही 
हैँ ॥ ५० ॥ चछन्तात्मन्‌ ! खाभीको एक बार अपनी 
प्रजाका अपराध सह लेना चाहिये । यह मूढ है, भपको 
त छन्तुमहसि शान्शस्सम्‌ भटस्य लामज्ञानतः॥५६॥ पह चानता नही है, इसव्यि इसे क्षमां कर दीजिये ॥५१॥ 


हः 


अनुगृह्णीष्व भगवन्‌ प्राणांस्त्यजति पनम: शाघु पुरू सदासे दी १ अवरपर दया कःते अयि 





| 


भ 
१ 































भीसद्धागवेतं 


` क कः क ऋः 











(र मीरे 


ज्ीणां नः साधुलोच्यानां पतिः भाणः प्रदीयताम्‌ । है | अतः आप हमे हमारे ्ाणखरूय पतिदेवको 
दीजिये ॥ ५२ # हम आपकी दाधी&) द्मे शाप 
अज्ञा दीजिये, अपकी क्था खेवा करें १ क्योकि जो 
श्रद्धाके साथ आपकी आडार्थोख्ः पाञ्न--आपद्धी चेवा 
कर्ता है, वह सव प्रसारके म्ोदे छकारः एा जाता 


विधेहि ते किङ्कीणामदुष्डेयं ठयाज्ञया । 


न ‹ ५ 
यच्छरद्भयालुति्ठन्‌ वं च्यते खवेतोभयःत्‌४।\५३१) | है ॥ ५३॥ 
५ भीखयकदेवजी कये &ै--परीक्षित्‌ ¡ भगवान 
| चरर्णोकी ठोकरोँसे काटियनगङे एण छ्िनल-भिन्न हो 
[र भिर | 
इत्थं स नागपतीभिभगवाच्‌ समभिष्टतः ¦ गाग व या ज न 
दप्ठ॒ प्रकार भगवान््क्ये स्तत की, तदं उन्होने दया 


मच्छितं भ्ष्िरषं विससजाडधिइने,,४६५४) करके उस छोड दिय; ॥५४}! धीरे-धीरे काहिय नःगकी 
्तिलन्ेन्दिय्राणः काकि: शनैर । इन्द्रां ओर प्राणो डक चेतन! = गथ ¦ वह्‌ 
स. बड़ी कठिनतासे शस. टे 

कृच्छाद्‌ सथुच्छ्रषर्‌ दीनः कृष्णं प्राह कृताञ्जलिः | 
प्रकार बोग--॥ ५५५ {¦ नाध | हम जनः 
मोगुणी ओर बहुत दिनेदि शाद भी लटः 
न्ड क्रोधी जीव है | जीरवोके लिये अपन! खमःव छेड 
देना बहुत कठिन है । इसी कारण संदाके कग नाना 


प्रकारके दुराग्रहोमे फस जाते है { 


वयं खलाः सहोत्पत्या तामक्ा दी्धमस्यवः ! 


खभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसदुश्रहः \*५६॥' 


1५५६१} चद्विधाता ! 
आपने ही गुणोंक भदसे इस जगतमे नाना प्रसारके 
खभाव, वीय, वक, योनि, बीज, .चिद् धौर आकृ्िययोका 
निर्माण किया है ॥५७]। मगठन्‌ ! आपकी ही सृष्टे हम 


#॥ ~. 
` त्वया चुष्टमिदं चिदं धातु्गुणविसलंनय्‌ । 


| ध ' नानाखभावगीर्योजोयोनिबीजाश्चयाकृति ५५७) 


सपं भी हँ । हम जन्मसेद्वी व्डेक्रोधी होते रै} इम 
इस्त मायाके चक्रमे खयं माहिन हो रके है} फिर 


अपने प्रधने इष दुस्य घायाका त्याग कँडे करे ॥५८॥ 
भाप सवेज्ञ ओर पर्ण जगदे खामी दै । आप द्यी 
हमारे खभाप्र लौर इस मायाके कारण है ¡ अन भप 
अपनी इच्छसे-- जेसा ठीक समक्षं कृपा कीजिये या 
दण्ड दीन्यि ॥ ५९ ॥ 


श्रीद्यकदेवजी कहते है--कान्यि नागकी बात 
बुनकर टीत्म-मचुष्य मगान्‌ श्रीकृष्णने कदया--^सप | 
| थव तुचे य नक्टी रहना चाहिये । तू. अपने जाति 


| . | माई पुत्र जौर' लियो 






४ , च" "न 





¢ < १. ५ ४ 9 १ 4 8 = 9 
22 [ऋ ------------------ ग 
, बादरबाणङ्वाच | ~ : 





साय शीव्र ही यहसि समुद्भे 


7 


{>> ~+ 


१ 





अ० १७ ] द्श्चम स्कन्ध २४१ 








स्वज्ञत्यपत्यदराद्य गोच॒भिश्ुजधतां दी । ६०॥ | चला जा । अब गौर ओर मनुष्य यमुना-जव्का उपभोग 
य एतत्‌ संसरेन्मत्यस्तुम्यं मदनुश्चाक्षनम्‌ | करं ॥ ६० ॥ जो मचुष्य दोनों समय तुञ्जको दी दई 

स मेरी इस आज्ञाका स्मरण तथा कीतंन करे, उसे संपिसि 
कीतंयन्नुभयोः सन्भ्योनं युष्मदभयमाप्लुयात्‌॥।६१॥ | कमी भय नदो ॥ ६१ ॥ मैने इस काल्यिददमे क्रीडा 
योऽभ्मिन्‌ स्नात्वाभदाक्रोडे देषां पेजञठेः । | कं & । इत्थि जो रुष इसमे स्नान करके जल्से 
देवता ओर पितयोका तपंण करेगा एवं उपत्रास् करके 
मेरा स्मरण करता इभा मेरी प्रजा करेगा- वह सब 
दीपं रमणक्रं॑ हित्वा हदमेतञुपाभितः । पर्स सुक्त हो जायगा ॥ ६२ ॥ मँ जानता द्वै कितु 


| गरुडके भयसे रमणक द्वीप छोडकर इस दमे आ वसा 
यद्धयात्‌ सख सुपणैस्त्वा मूधाः मत्पादकाच्छितम्‌ ६२ | था । अव ठेरा शरीर मेरे चरणचिहखोसे अद्भित हो गया 





उणेष्य मां सरन्नचंत्‌ सवपापः प्रघुच्यते ॥६२॥ 


{तत है । इससे जा, अब गरुड तुञ्चे खारयेगे नदी ॥ ६३ ॥ 
। भीद्यकदेवजी कते है--भगवान्‌ श्रीकृष्णकी एक- 
एक्तो भगवता दूष मनाव = { एक लीरा अद्भत हैँ | उनकी रेक्षी आज्ञा पाकर 


काठ्िय नाग ओर उसकी पलियोने आनन्दसे भरकर 

तं पूजयामास अदा नागपरन्यश् सादर ।(&४।। | बड़े भादरसे उनकी पूजा की ॥ ६ ॥ उन्होने दिव्य 
दिव्यास्बरखश्चणिभिः परार्ष्येरपि भूषणैः । प्ल, पुष्पमाव्म, मणि, बह्मूल्य आभू, दन्य गन्धः 
चन्दन ओर अति उत्तम कमर्व्की मासे जगव्कते 
खामी गरुडष्वज . भगवान्‌ श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें 
पूजयित्वा जगन्नाथं प्रसाद्य गरुडध्वजम्‌ । प्रसन्न किया । इसके दाद्‌ बड प्रेम ओ भानन्द्‌र 
ध उनकी परिक्रमा की, वन्दना की ओर उनसे अनुमति 
ततः परीतोऽभ्यनु्ञातः परिकरम्थामिवनय ११५ ९ ली । तब अपनी पलिया, पुत्रो ओर बन्धु-बान्धवो ङ 
सकलत्रसुहूत्पुत्रो दरीपमन्धेजंगाम ह्‌ | साथ रमणक द्वीपकी, जो समुद्रम सर्पोके रहनेश्ञा एक 
| स्थान दहै, यात्रा की । लीग-मनुष्य भगवान्‌ श्रीङृष्णकी 
तद्व साखरृतजला यपरना निविषरभवत्‌ । कृपासे यमुनाजीका जन केवर विषद्वीन दी नडी, बल्कि 
अनुग्रहाद्‌ भगवतः क्रीडामानुषरूपिणः ॥६७॥। | उसी समय अमृतके समान मधुर हो गया ॥६.५-६७॥ 


दिब्यगन्धाङङेफेध महइत्योत्पकमालय।( ।\६५५॥ 





| इति श्रामदूभागत्रते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्कल्वे 
| पूर्वां काच्यमोक्षणं नाम षोडयोऽव्यायः ॥ १६ ॥ 
।. ~अ = 
अथ सष्ठदशोऽध्यायः 
काछिय ॐ कालियददमे भनेको शया तथा भगवानरक्ा जवासियोको द्‌वान रसे बचाना 
राजोवाच राज परीन्लितने पू्ा--मगवन्‌ ! काब्यनागने 
नातं व्वा तलना नत त्तित । नागोके निवास्थान ` रमणक द्रीपको क्यों ॐछोडाथा १ 


ओर उस अकेलेने ही गरुडजीका कौन-सा परध ` 
कृतं छि वा सुपणंल तेनेकेनासमञ्जरमर्‌ ॥ १॥ । किया था १॥ १॥ दुः 


> क) 








त्रीुकं उवाच 
उपहार्येः सपंजने्मासि मासीह यो बलिः । 
वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राङ्‌ निरूपितः) २॥ 
स्वंस्वं भामं प्रयच्छन्ति नागाः पर्वणि पर्वणि 
| गोपीथायात्मनः से सुपणाय महात्मे ॥ ३ ॥ 
| विषनीयंमदानिष्टः काद्रवेयस्त॒॒ कालियः । 
ऋद्थंृत्य गरुडं स्वयं तं बुश रिष्‌ ॥ ४॥ 
तच्छत्वा कुपितो राजन्‌ भगवान्‌ भगवस्रियः । 


विजिषांसुमेदावेगः कालियं सषपाद्रवत्‌ ॥ ५॥ 


तमापतन्तं तरसा विषायुधः 





प्रत्यभ्ययादुच्करितनेकमस्तकः । 


दद्धि; सुपणं व्यदश्चद्‌ ददायुधः 













करालजिहच्छरुधितोग्ररोचनः ॥ ६ ॥ 


| {| 
५ तं ताक्यधुत्रः स निरख मन्युमान्‌ 


मधुष्दनाक्तनः ` 
हिरण्यरोचिषा 


कद्रूसुतथुग्रविक्रमः 


ग्रचण्डवेगो 
सन्येन 


जघान 


पक्षेण 
॥ ७॥ 


सुपणंपश्चाभिहतः कालियोऽतीव विह्वलः 


च 


२ ~~~] बब 
१ बाद्रायणिरवाच। 





>, ~=, 
कः 

 भदकवी पन्‌ 

१ विः ४) ०। 

| च श कः 

"3 प 1 


दिया च दि = अन्य. 
। ; 
१. क + 
- (१ प 
र (स 
क 
च भ क ज श 
क न र # क 
+₹- 








7स्याको 
" अ > 
|) क ~ ५ ड £ (> > 4 = 


[क 
१, < "क + पच 
ध -~ कन - - ~क. ~ जङ्ग 
। + # ~ न्क ^ 
#॥ 












0 

रै, 
कने 2. ~ 
ॐ 9 हौ क 

{५ 





„च 
[2 
चन ` 

नी 


भीमद्भागवत 








४ कि त ~ 


# कै 
(४ । न > ८ 
4 [ने ज ञः ॥ 


क; + 
ॐ 


नौ 
~: 


| अ० १७ 








भ्रीद्यकदैवजीने कदा--परीक्षिद्‌ ! पूर्वकान्मे 
गरुडजीको उपहारखरूप प्राप्त होनेवाे सपनि यह्‌ नियमं 
कर ल्याथाकि प्रत्येक मासमे निर्दिष्ट बृक्षके नीये 
गर्डको एक सपकी मेँटदी जाय॥२॥ इ 
नियमके अनुसार प्रत्येक अमावास्याको सारे सपं अपनी 
रक्षके घ्यि महात्मा गर्डजीको अपना-अपना भाग 
देते रहते थे ॥ ३} उन स्यमि कटरका पुत्र 
काल्य नाग अपने विष शौर बख्ये घमंडसे मतवारा 
हो रहा था । उसने गरुडका तिरस्कार कारकै खयं 
तो बि देना दूर रहा-दृस्रे सोप जो गरुडको बलि 
देते, उस्ने भीखाच्ता।| | परीक्षित्‌ | यह 
घुनकर भगवानूकते प्यारे पाषेद शक्तिशाटी गर्डको बड़ा 
क्रोध आया | इस्यि उन्होने कालिय नागको मार 
डालने विचारसे बडे वेगसे उक्ठपर भक्रवण किया 
।॥ = ॥ विषधर कालिय नागने जब देखा कि ग्ड 
बड़े वेगसे मुञ्चपर आक्रमण करने ओ रट है, तव वहं 
पने एक सौ एक फण पफौगकर उसने य्यि उनपर्‌ 


टट पड़ा । उसके पास शास्र थे केवल रदोत, इस्ि 


उसने दतोसे गर्डको उस च्या | उस समय वह 
अपनी भयावनी जीभ च्पल्पा दहा था, उसकी ससि 
ठी चलरही थी ओर अखि बड़ी डरावनी जान 
पड़ती थीं ॥ £ ॥ ताक्षयेनन्दन गरुडजी विष्णुभगवान्‌के 
वाहन हैँ ओर उनका वेग तथा पराक्रम मी अतुटनीय 
है | काल्य नागकषी यह डिगाई देखकर उनका क्रोध 
ओर भी बद्‌ गया तथा उन्होने उसे अपने शरीरसे 
ञ्ञटककर फक दिया एवं अपने घुने बार्ये पंखसे' 
कालिय नागपर बडे जोरसे प्रहार किया ॥ ७ | उनके 
पंखकी चोरसे काल्य नाग धाय दहो गया | वहः 
घव्रड़ाकर बहोसि भगा ओर यसुनाजीके इस कुण्डं 
चला आया । यमरुनाजीका यह्व॒ कुण्ड गरुडके लिय 
अगम्य था | साथ ही वह इतना गहरा था किं उपमं 


4 4 इदं विवेश काटिन्धास्तदगम्य दुरासदम्‌ ॥ ८ ॥ | दूसरे रोग मी नही जा सक्ते थे ॥ ८॥ इसी 


3: त 
इत प्रकारदै- गरुडलीकी माता विनता ओर सर्पौकी माता कद्र परस्पर वेर्‌ था । माताका चर सरणक्र 
गरुडजी जो ख भिरा उसीको ला नते । इते व्याक होकर सब सभं॑तरदमाीकी शरणमे 

रत्येक सर्पपरिवार वारी-वारीते गख्डजीको एक सर्पंकी बड दिया कर । 


गये । तव्र ब्रह्माजीने यद 


न प = च 

न न 

एन" गसं +, 
व 





क | 









अ० १७ दशम्‌ स्कन्ध २४३ 








तत्रेकद्‌ा जकचरं गश्डो भक्ष्षपीष्सितप्र्‌ । | स्थानपर एक दिन श्चुधात्रर गङ्डने तपखी सौभरिके 
मना करनेपर भी अपने अभीष्ट म्य मत्स्यको बल्पूवक 
पकड़कर खा लिया ॥ ९ ॥ अपने मुखिया मत्स्यराजके 
मारे जानेके कारण मचछ्िर्योको बड़ा कष्ट इआ । वै 
अत्यन्त दीन ओर व्याकुर हो गयीं | उनकी यह दशा 
कृपया सौभरिः प्राह तत्रत्यक्षेममाचरन्‌ ।।१०॥ | देखकर महिं सीमरिको बडी द्या भावी । उन्न 
उस कुण्डमे रहनेवाठे सव॒ जीवांकी मगईके च्यि 
अघर प्रविश्य गरुडो यदि मल्स्यान्‌ स खादति । गरुडको यह शाप दे दिया ॥ १० ॥ दि गरुडि 
कभी इस कुण्डम घुसकर मछचिर्योक्ो खयेगे,तो उसी क्षण 
क प्राणसि हाय धो वेठेगे । मेँ वह्‌ स्य-सत्य कहता द 
वपा ॥ ११॥ परीक्षित्‌ | महषिं सोभरिके इस श्चापकी 
ल 1 | बात काचि यनागके सिवा भौर कोई सपि नहीं जानता 
धा । इसय्यि बह गर्डके भयसे वहाँ रहने खा या 
भोर अव भगवान्‌ शीकृष्णने उसे निभय करके वयसे 
रमणक द्वीपमें मेज दिया ॥ १२ ॥ 


निवारितः सोभरिणा प्रसह्य श्षुधितोऽहरत्‌ ॥ ९ ॥ । 


पो 


सीनान्‌ सुदुःखितान्‌ दृष्ट्रा दोनान्‌ मीनपतो इंसे। 








अवार्सीद्‌ श्रुडाईइ भीतः ृष्णेन च विवासितः; १२। 


परीक्षित्‌ । इधर मगवान्‌ श्रीकृष्ण दिव्य माला; 
| गन्ध, वल, महमूल्य मणि शीर घुवगंमथ आभूषर्णो 
अहासणिगणाक्रीणं जाम्बूनदपरिषडितम्‌ ॥१२।। | विभूषित हो उस कुण्डसे बाहर निकले ॥ १२ ॥ 
ह & | उनको देखकर सब-के-सब व्रजवासी इस प्रकार उठ 
उपलभ्योत्थिताः व कन्धप्राणा इवाप्तवः । | खड इए, जैवे प्रा्णोको पाकर इन्दरयौ सचेत हो जाती 
| भृतारमानो ोपाः प्रीत्याभिरेभिरे ।१४॥ | & । समी गोर्पोका दय भानन्दसे मर गथा । वे बड 
ग्रमोदनिभतारमाना गोषाः प्री ।।९४॥ नं र अतायि नि 
यश्रोदा रोहिणी नन्दो भोप्यो गोपाश्च कौरव । । लगे ॥ १४ ॥ परीक्षित्‌ ! यश्चोदारानी, रोदिणीजी, 
नन्दवावा, गोपी ओर गोप- सभी श्रीकृष्णको पाकर 
सचेत हो गये । उनका मनोरथ सफ हो गया 
थाच्युवमारिङ्घ ॥ १५ ॥ बरामजी तो मगवान्‌का प्रभाव जानते ही 
रामाच्युतमारिङ्कय जहाास्यानुभाववित्‌ । = 
नंगा भावो वषा वतका ठेभिरे परमां यदम्‌ ॥१६॥॥ पवेत, दृक्ष, गाय, बैर, बछ्डे सब-के-सब आनन्दमग्न 
हो गये ॥ १६ ॥ गोपोके कुच्गुरु ब्राह्मणोनि अपनी 

नन्दं दिप्रा उमागस्य गुरवः सकलत्राः । पल्निर्योके साथ नन्दबाबाके पास्त आकर कहा-- ` 
| “नन्दजी ! तुम्हारे बार्कको काञ्यि नागने पकड़ ` 

ऊचुस्ते कालियग्स्तो दिष्टया युक्तस्तवातमजः॥॥१७॥ | किण या, सो द्ुटकर आ गया । यह बडे खोमाग्यकी 
| ॐ - वात दै ॥१७॥ श्रीकृष्णके शब्युके सुखसे गैट अनेके ` 


ष्णं हदाद्‌ विनिष्छःन्तं दिव्यस्तम्न्धवाससम्‌ । 





ष्णं समेत्य रब्धेहा आषेच्लन्धमनोरथाः ॥१९५॥ 


चै 
। # 1 2 1 2 


च. > 





श 

एवः - ३ ऋ ६ 

१. इते । २. गावो दृषा रवत्लाश्च । न 

3; > -- 4 >: प ् न न्क प 4 ॥ » ¢ ७ 3 { न्क 4 = > 3# ॥ त ४ . अ भं ति ~` ध 
श्र भविक ९ 4 ~ 0 ¶ कत कन्न क ट # 7 1 ** र 4 बै | ४". = च रब 4 9 र ४३ त ह ष १ च गो न) 

द, ~ < (4 = ५ कि गि यम ङ ऋ ~ + र 4 3; 2 ४ व धद 


द ~ व... 


+ 
न... 
7 र कः ५ 4 





च र # ~ भ =+ ^ नु भ 


क [6 
= श = च+ करके र ह | $ क भीजानकीजीको 9 
~ भ द ध क ४ भव ० ऊण ५ २ ते थ, 
+" ^ उदच्का - 0 ~ त 
+ # = ह 2 क ह र ~ १01 सत्कार्‌ = क न » के करना कतव्य 
~ -* ॥ त ह ~ व्क 
-4 स ४ 1 ॥ ~ ५ 6 * ^, च ~ क ¢ 9 कै रिज टः ~ = 
र के ० १ 1 = 4.4 
। थ. >.“ , ग. [व 
। त "क ~~. श ए (न = 


२४४ 


श्रीमद्भागवत 


| अ० १७ 








नन्दः प्रीतमना राजन्‌ गाः सुबणं तदादिशत्‌।९८॥ 
यशोदापि महाभागा नष्टन्धप्रजा सती । 
परिष्वज्याङ्मारप्य शमोचाश्चुकलां यहुः ।१९॥ 
तां रात्रिं तत्र राजेन्द्र ्ुत्तडस्ां श्रमकरिताः। 
ऊषुवजौकसो गावः कालिन्या उद्रः ॥२०।। 
"तदा श्चुचिवनोदधरो दावाग्निः सरव॑तो वजम्‌ । 
सुप्तं निशीथ आव्ुत्य प्रदग्धुयुपचक्रमे ।२१॥। 
तत उत्थाय सम्भ्रान्ता दद्यमाना जोकः । 


कृष्णं ययुस्ते शरणं मायामनुजमीश्वरम्‌ ॥२२। 
कृष्ण कृष्ण महाभाग हे रामामितविक्रम । 

एष घोरतमो चद्िस्तावकान्‌ ग्रसते हि नः ॥२२॥ 
सुदुस्तरान्नः खान्‌ पाहि कालाग्नेः सुहृदः प्रभो । 
न छकनुमस्त्वच्चरणं सत्यक्तुमकुतोभयम्‌ ।२४।) 


इत्थं खजनवेबरव्यं निरीक्ष्य जगदीश्वरः । 


तमग्निमपिबत्तीवमनन्तोऽनन्तशक्तिधक्‌ ॥२५॥ 


¢ 





ब्राह्मणोकी बात चुनकर नन्दबावाको बडी प्रसन्नता इई। 
उन्होने बहत-्ता सोना ओर गोपं ब्राहम्णोको दान दीं 
॥ १८ ॥ परमक्षोभाग्यवती देधी यस्चोदाने भी काव्यैः 


गालघे बचे हए अपने लाल्को गोदमे ठेकर हृदयसे 


चिप का च्या | उनकी ओंखोँसे आनन्दके भँघुकी 
बूद्‌ बाबर टपकी पडी थीं {¦ १९॥ 

राजेन्द्र ! व्रजवासी गौर गौं टव वहत द्वी थक गये 
ये । ऊपरपरे भूख-प्यास भी च्म रही धा } इरय्यि उस्‌ 
रात वे व्रजे नही गये, वहीं यमुनाजीके तय्पर्‌ 
सो रहे ॥ २० ॥ ग्मकि दिन ये, उधरका वन सूख 
गया खा | आधी रातके समय उक्मं आग ल्ग गयी | 
उस आगने सोये हए व्रजवातिर्योको चाते ओरसे घे 
लिया ओर वह उन्हं जलने ल्मी ॥ २१॥ आगक्री 
आंच टगनेषर व्रजवाक्षी घनड़ाकर उठ खडे हए भौर 
ठीरा-मदुष्य भगवान्‌ श्रीकृष्णकी इारणमे गये ॥ २२ ॥ 
उन्होने कहा-- प्यारे श्रीकृष्ण ! इ्यामघुन्दर्‌ 
मह।भाग्यत्रान्‌ बलराम | तुम दोर्नोका वल-विक्रम अनन्त 
है । देखो, देखो भयंकर आग तुम्हारे कगे 
सम्बन्धी हम खजनाोंको जलाना ही चाहती है ॥२३॥ 
तुममे सब सामथ्यं है । हम तुम्हारे बुद्‌ है, इसव्ि 
इस प्रय्यकी अपार आगसे हमे बचाओ । प्रभो | हम 
मृत्युसे नहीं उरते, परंतु तुम्हारे भकुतोभय चरणकमटः 
छोडनेमे इम नपतमथ हैँ ॥ २४ ॥ मगवान्‌ अनन्त दै; 
वे अनन्त रशाक्तिर्योको धारण करते हैँ, उन जगदीश्वर 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने जब देखा किं मेरे खजन इस प्रकार 
व्याक्रुक हो रहे है, तब वे उस्र भयंकर भआगको पी 
गये #* ॥ २५ ॥ 


न्यक्त ~ ~ ककि 


इति श्रीमद्भागवते मङ्षापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वा 
दाश्राननिमोचनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ 


णी 1 नि 


न: 
१. इतदावा० । २. तरो | ३. बाक्क्रीडायां दावाग्निमोक्चणं । 


अग्नि-पान 





` # ९ सवश्न दाह दूर करने च्थि हौ अवतीं हुमा रं । इचि यह दा दूर करना मी मेरा कतव्य द । 


= 
। "न 
+ 


. (श 
र = -१ ^ # 


सुरक्चित रखकर अग्निने मेरा उपकार किया था । अब उसको अपने ममे ख्ापितः 


न्नव 


व 








अ० १८ | दद्म च्कन्प २५५९ 
=-= 
अथाशदरोऽध्यायः 
प्रलम्बासुर-उद्धार 

श्रीद्युक उवाच । भ्रीद्युकदेवजी कते ईद- परीक्षित्‌ ¦ अव आनन्दित 
अथ कृष्ण्‌; परितो ज्ञातिभिर्धदितामभिः । सखजन सम्बन्धियाँसे धिरे इए एवं उनके म॒खसे अपनी 


| कीर्तिका गान घ्नते हए श्रीकृष्णने गोद्ुलमण्डित गोषठमे 
अनचूमीयमान) न्यषिज्चद्‌ बजं गा्कलमण्डितम्‌॥। २ ॥ | प्रवेश किया | १॥ इस प्रकार अपनी योगमायासे 
 म्व्रालकरा-सा वेष बनाकर राम ओर श्याम-त्रजमें क्रीडा 
| कर रहे थे । उन दिनों भ्रीषम ऋतु थी । यह जरीर- 
धायियोंको बइत त्रिय नदीं है| २ ॥ प्रतु बन्दावनके 
सखाभाविक गुणोंसे वहो वसन्तको ही छटा छिटक रही 
स ४ न्धावनशु ध ८ -¬ लित ६ । | थी । इसका कारण था, बृन्दावनमें परम मुर्‌ भगवान्‌ 
५ 4 । श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण ओर बल्रामजी निवास जो करते 


<त ट थे ॥३॥ गुरकी तीखी लकार इ्रनोकि मधुर 
यत्रास्ते भगवान्‌ साश्द्‌ रामेण उह केश्वः ॥\ ३॥ , £ 
स ` इर-ञ्जरमें सिपि गयी थी | उन र्नोसे सदा-सवैदा 


व्रजे विक्रीडतोरेव गोपालच्छब्रमायया | 


ग्रीष्मा नामतुरभव न्नातिप्रियाञ्छरीरिणाम्‌ ॥ २॥ 


यत्र॒ निर्रनिर्हादनिघृत्तखनश्चिषटिकम्‌ । बह्रत ठ्डी जल्की फुहियां उड़ा करती थीं, जिनसे 
वहके वृक्षोकी हरियारी देखते ही बनती थी ॥ % ॥ 

खश्वत्तच्छीकरजींषद्ुममण्डलमण्डितम्‌ ॥। ४॥ | जिधर देखिये, हरी-द दूबसे पृथ्वी इरी-हरी हो रदी 
न दै । नदी; सरोवर एव क्षर्नोकी लहरोका स्पश करके 
सरित्सरःप्रसवणोभिवायुना जो वायु चट्ती थी, उसमे लखार-पीठे-नीठे, तुरतके 
कह्वारकञ्ोरपरुरेणुहारिणा । सिरे इए, देरके खिले इषए-- कार, उलन आदि 

अनेकों प्रकारके कमर्गोका पराग मिला इआ होता या । 

न विद्यते यत्र वनौकसां दवो इस सीतल, मन्द ओर छुगन्ध वायुके कारण वनवा्र्यो- 


॥ को गमींका किसी प्रकारका क्ट नहीं सहना पडता 
निदाघवह्वयकभवोऽतिच्चादङे ॥ ५॥ | या । न दाधानिका ताप च्गता था ओर न तो सूर्यका 


~ ~ घाम ही ॥ ५ ॥ नदियोमें अगाध जक भरा इया} 
अगाधतोयहदिनीतटो्िभि बड़ी-बड़ी लहर उनके तर्टोको चूम जाया करती थी । 
९ > वे उनके पुल्िनिंसे टकरातीं ओर उन्दं खच्छ बना 
वटपुरीष्या; पलिनंः समन्ततः । 
= ५ जातीं । उनके कारण आस-पासकी भूमि गीली बनी रहती 
न यत्र चण्डांशुकरा विषोखणा ओर सूर्यकी अघ्यन्त उम्र तथा तीखी किरणे मी वहोवी 





पृथ्वी ओर हरी-मरी घासको नहं घुखा सकती 


क 


भुबो रं श्ादङितं च गृहते ॥ £ ॥ | यी । चारों ओर हरियाटी छा री थी ॥ ६ ॥ 3 

३. कार्यका कारणम रय होता हे । भगवानके मुखसे अग्नि प्रकट हआ- सलाद्‌ अग्निरजायत । इससे भरावानने च 

उवे मुखम ही स्थापित किया । | 

| ४ परुखके दवारा अग्नि शान्त करके यह भाव प्रकट किया कि भव-दावाग्निको शान्त करनेमे भगवानके युख-स्थानीय 
ना्षण ही समर्थं है । 


























वनं सुमितं भ्रीमन्नद चित्रगद्धिजम्‌ । 


गायन्मयुरभमर कूजत्कोकिरसारसम्‌ ॥ ७॥ 


जी डिष्यमाणस्तत्‌ छृष्णो भगवान्‌ बलसंयुतः । 
वेणु विरणयन्‌ गोपे गोधनैः संदृतोऽविश्त्‌ ॥ ८ ॥ 


परवालबहेसत्रकस्तग्धातुङ्ृतमूषणाः | 


रामङृष्णादयो गोपा 


ननुतुयुंयुधुजंगुः ॥ ९ ॥ 


छरष्णद्य चृत्यतः केचिजगुः केचिदबादयन्‌ | 


वेणुपाणितलेः भ्ङ्ैः प्रश्चशसुरथापरे ॥१०॥ 


~ 


कन्नो देवा गोपालरूपिणः। 
( ईडिरे छृष्णरामौ च नटा इव नटं तप ॥११॥ 


` अ्राप्णेरंहनैः शषपेरस्फोटनविकर्णैः । 


द्धन काकपक्षरौ कचिद्‌ ।१२॥ 


+~. ~ 
[न ड + ~~ 
~न ~ग ४ ढे ध: ॥ 
2 क 
न्वे, ४, 
(> 


कचिन्धतयलपु चान्येषु गायकौ वादको खयम्‌ । 


८.१ 


+ १ 

दः =». 
© ल १ भ ध ् 
नन नन्‌ न = म ~ ष्क ज 
~ | | क ॥ ९० | 2 ९ कु | ९५ < 
4 प आर) 


क ` । 


वादिनौ ॥ १३॥ 


ज =" # 94 
= 
ह | > "~, अ 


1 ~त 


श्रीमद्ध{गवत 

= 

| उस वनमे बक्षोकी पोत-की-्पौत छसे वद री वी | ` 
जह देखिये, वहसे घुन्दरता री पड़ती थी । कहं रग- 
निरगे पक्षी चहक रहे हैँ, तो कद्यं तरह-तरहके हरिनि 





[ अ० १८ 


चोकड़ी भर रहे हैँ । कहीं मोर कूक दे है, तो कदी 
मरे गुजार कर रहै दँ । कीं कोयटे कुहक रही है, 


तो कदी सारस अलग द्वी यपना गलप छोड इए है 


॥ ७ ॥ एसा इन्दर वन देखकर इयापदुन्दर श्रीकृष्ण 
ओर गौरघुन्दर वटरामजीने उसमे विहार करनेकी इच्छा 
की । आगे-आगे गौरं चली, पीले-पीछे ष्वाख्वार रौर 
नीचे अपने बहे भाईके साथ र्बषुरी बजाते इए 
श्रीकृष्म | ॥ ८ ॥ 

राम, श्याम ओर ्राल्वाखने नव प्रवो, मोरपं खके 
गुच्छ, इुन्दर-छुन्दर पुष्पके हारों ओर गे आदि 
रगीन धातुओंसे भपनेको मोति-मतिसे सजा च्या | 
फिर्‌ कोई आनन्दे मगन होकर नाचने ल्गा, तो को$ 
त ठेककर कु्ती य्डने लगा भौर किसी-ङिसीने 
राग अरूपना जरू कर दिया ॥९॥ जिक्त समय श्रीक्ष्ण 
नाचने च्गते, उत्त समय कुक श्बाख्वाठ गानं लगते 
ओर कुछ वाँष्ठुधी तथा सींग बजाने ल्गते । कुछ हथेरीसे 
ही ताक देते, तो कुर '्वाह-व्राहः करने च्गते ॥१०॥ 
परीक्षित्‌ | उस्र समय नट जेसे अपने नायककी प्ररं 
करते हैँ, वेषे ही देवताकोग ग्राखामेकः रूप धारण 
करके वहो भावे ओर गोपजातिमें जन्म रछेकर छिपे इए 
बलएाम ओर श्रीङृष्णकी स्तुति करने लगते ॥ ११॥ 
घंषराटी अख्कोंवाे इयाम धीर बलराम कमी एक- 
दूसरेका हाथ पकड़कर, कुम्हवारके चाककी तरह चक्र 
काटते--घुमरी-परेता लेक्ते । कमी एकदूसरेसे भषिक 
फद जानेकी इच्छासे कूदते--कूंडी डाकते, कभी 
कहीं होड लगाकर देडे फकते, तो कभी तार तक- 
लेककर रस्साकसी करते--एक द दूसरे दकके 
विपरीत रस्सी पकड़कर खीचता ओर कभी कहीं एक- 
दूसरेसे कुरती ठ्डते-ख्डाते । इस प्रकाए तरह-तरहके 
खेल खेकते ॥ १२ ॥ कही-कद्वीं जब दूसरे ग्वाल्नाट 
नाचने गते तो श्रीकृष्ण ओर बलरामजी गते या 
नेरी, सींग आदि बजाते | ओर महाराज ! कभी-कभी वे 
°वाह-वाकणकह कर उनकी प्रराषा भी करने लगते ॥ १३ ॥ 








` के = = = ह. । 


^ 4. “ अ 





२८७ ई | 





| क्विद्‌ बिल्वैः कवित्‌ दवम्भेः क चामलकयुष्टिभिः | | कभी एक-दूपरेपर बेट, जायफक या ्बौवलेके फठ हायते 
। लेकर्‌ फोकतै | कभी एक-दूसरेकी ओंख बंद करके छिप 


अस्पृतयनेतरबन्धाचेः क्चिन्मृगखमेहया ।॥१४॥ 
क 8 र, (6 ®> णद, १ 

कवि दटदुरावविविधेरूपहासशः । 

कृद्‌ चिरस्णन्दोलिकया कहि चिर्चरपवेष्टया ॥१५। 

वं त लोकसिद्धाभिः तऋीडाभिश्चेरदुवने । 


नद्य दद्र णिङ्कञ्जेषु कानयेदु छरस्सु च ॥१६॥) 


यश्चुरयतो गोपेस्तद्रये शमङ्कष्णयोः | 
गोपरूपी प्रङभ्बोऽमादश््रस्तज्िरीषया ।1 १७] 


तं दिद्वानपि दाच्ाहो भगवान्‌ सवंदशेनः । 
अन्वमोदत दरसख्यं चधं तस्य विचिन्तयन्‌ ॥१८॥। 
तत्रोपा हूय भौपालान्‌ ष्णः प्राह विदहारवित्‌। 
हे गोपा विहरिष्यामो इन्दरीभूय यथायथ्‌॥ १९) 
तन्न चक्रः परिषद मोपा रामजनादंनौ । 
छृष्णसंषटड्निः केचिदासन्‌ रामस चापरे ॥२०॥ 
आचेरुषिंविधाः कऋीडा बाह्यवाहकरक्षणाः । 


य॒त्रारोहन्ति जेतारो बहन्ति च पराजिताः ॥२९॥ 








वहन्तो बोह्यमानाश्च चारयन्तश्च गोधनम्‌ । 


|  भण्डीरकं नाम टं जगुः कृष्णपुरोगमाः ॥\२२॥ 


= = ®, । च (4 गजंमानाश्च 1 
क्न न 





जाते भौर वह पीछेसे इंढता-इस प्रकार ओंँखमिचोनी 
लेकते । कभी एक दूम्तरेको छनेके च्य बहत दर-दूरतक 
दोडतेरहते ओर कभी पद्यु -पक्षिर्योकी चेशर्जोका अनुकरण 
करते ॥ १४ ॥ करीं मेढकोंकी तरह फुदक-फुद ककर 
चरते, तो कभी मुह बना-बनाकर एक दृप्तरेकी हसी उडाते। ` 
कीं रस्िर्योसे वृक्षोपर च्ूढा डारुकर ञ्ूब्ते, तो कभीदो 
बाठ्कोको खड़ा कराकर उनकी ्वोहकि वट्पर्‌ ह्वी क्टकने 
यगते | कभी किसी राजाकी नकठ करने ख्गतें ॥ १५५] 
दस प्रकार राम ओर द्याम बृन्दावनकी नदी, पत, 
घाटी, कुञ्ञ, वन ओर प्रोष्य वे सभी खेर खेर्ते, 
जो साधारण नन्वे संसारं खे करते & ॥ १६ ॥ 





एक दिन जब बलराम ओर कृष्ण ाठ्बाेके 
साथ उक्त वने गौरं चरा रहे थे, तब ग्राज्के वेषमे 
ग्रकुम्ब नामका एर अ्ुर आया | उक्तकीइ्छा यी 
कि मेँ श्रीज्ृष्ण ओर बरख्यामको हर ठे जाऊं ॥ १७ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण सवेज्ञ हैँ । वे उसे देखते ही पहचान 
गये । फिर भी उन्होने उसका मित्रताका प्रस्ताव खीकार 
कर ल्ियां | वे मन-क्षी-मन यह सोच र््येकि किस 
युक्तिसे इका वध करना चाश्िये ॥ १८ ॥ षाख्वाकोमें 
सबसे बडे खिलाड़ी, खेकके आचाय श्रीकृष्ण ही थे) 
उन्होने सव ग्राख्बाखंको बुणकर कष्ा-- “मेरे प्यारे 
मित्रो ! आज हमखोग भपनेको उचित रीतिसे दो दमे 
बाँट ठै ओह फिर आनन्दसे ॥ १९ ॥ उस 
खेव्मे ग्वाज्वाखने वर्म ओ श्रीक्ष्णको नायक ` 
बनाया । कुछ श्रीकृष्णके पायी बन गये ओर कुछ । 
नररामके ॥२०॥ फिर उन कोगोने तरह-तरहसे रेस । 
बहृत-से खे खेले, जिनमे एक दके जोग दषे दच्के 
छोर्गोको अपनी पीठपर चदढाकर एक निर्दिष्ट स्थानपर्‌ 
ठे जाते थे | जीतनेवाखा दढ चदता या भौर शरनेवाला 
दढ ढोता था॥२१॥ इष प्रकार एक दूसरेकी ` 
#ठपर चदते-चढाते श्रीकृष्ण आदि श्वा्वाक गौरं च 
चराते इए भाण्डीर नामक वटके पाप्त प्च गये॥२२॥ 








राम्तङ्कडिनो यहि श्रीदामबरषभादयः। 


क्रोडायां जयिनस्तांसतानूहुः कृष्णादयो नुप ॥२३॥ 
उवाई ष्णा भगवान्‌ श्रीदामानं पराजितः । 
` बृषभं भद्रसेनस् प्रखम्नो रोहिणीसुतम्‌ ॥२४। 
अविषह्यं मन्यमानः ढृष्णं द्‌ानवयपृङ्कवः । 


बहन्‌ द्रुततरं प्राभाद्बरोदणतः परम्‌ ॥२५ 


तसुद्श्न्‌ धरणिधरेन्द्रगोरवं 
महाप्ुरो विगतरयो निज बपुः। 










स॒ आसितः पुरटपरिच्छदो बभौ 
तडिदथमानुडपतिवाडिव,म्बुद्‌ः ।।२६।) 
निरीक्ष्य तद्धपुरलमम्बरे चरत्‌ 
प्रदीप भ्रङृटितयोग्रद्कम्‌ । 
ज्वलच्डिख करङकिरीटङण्डल- 
क सिषाद्धुतं हलधर ईषदत्र्षत्‌ । २४॥ 


` १२. 
कनि = > 









न 
`  अथागतस्पतिरभया रिपुं बलां 

" श्रः | 

 विहायसाथंमिव हरन्तमात्मनः। 
ध 

 सरुपाहनच्छिरसि द्टेन अुष्टिना 







सुराधिषी गिरिमिव बजरंहसा ॥२८॥ 


पः 
हि „> 


सं आहतः खपदि वि्ीर्णमस्तको 


न 


= 





[+ 
9 
ग्नि 
~+ ह 


ड ६.4: 


अुखाद्वमन्‌ रुधिरमपस्परतोऽसुरः 


निः #‰८ 






ब्र = 


खाद्वमन्‌ सधिरमवध्य्रताघुरः। क. - 


२७८ श्रीमद्भागवत [ अ० १८ 





परीक्षित्‌ | एक बार बलरामजीके द च्वाॐे श्रीदामा, 
वृषभ आदि गालब।ेने खस्मे बाजी माश्डी | तब 
श्रीकृष्ण आदि उन्हं अपनी पटपर चदाकर ठोनं रो 
॥ २३ ॥ हारे इ श्रीकृष्णे श्रीदामाको अपनी पीठपर 
चदाया, भद्रसेनने दृषभको ओर प्र्म्बने बट्रामजीको 
॥ २४ ॥ दानवपुङ्गव प्रलम्बने देखा कि श्रीकृष्ण तो 
बड़े बञत्रान्‌ हँ; इन्दं मै नहीं हरा सकरुगा | भतः वह 
उन्दः के पक्षम हो गया ओर बल्रामजीको केकर फुर्तीसे 
भाग चखा भौर पीठ्परस्े उतारनेके ल्यि जो स्थान 
नियत या, उसषे आगे निक गया ॥२५॥ वल्राभजी 
बड़ भारी पवतके पतमान बो््राके थे | उनको ठेकर 
प्रयम्बाष्ुर दूरतकन जा स्का, उसकी चारु रुक 
गयी | तव उस्ने अपन खाभाविक देप्यखूप धारण कर्‌ 
लिया । उसके क्‌।ले शरीरपर होनके गहने चमक र 
थे रर गौ.सुन्दर बख्रामजीको धारण करनेके कारण 
उक््की एेसी शोभाहो रही थी, मानो बिजटीसे युक्त 
काला वाद चन्द्रमाको धारण क्यिद्ृरष्षो॥ २६॥ 
उप्तकी अंखिं आगकी तरक धघक रही यीं ओर ददं 
भौहोतक पर्टची हई बड़ी भावनी यीं | उक्षकरे खज 
क; बार इस तरह विखर रटे थे, मानो भागकी चपट 
उठ रही € । उक्तषके हाथ भोर पर्विंमे कड़े, ष्षिरपर 
मुङ्खट ओर कार्नोमि कुण्डल ये | उनकी कान्तिसे वह 
बड़ा अद्भुत ल्ग ग्हाथा। उक्त भयानक देत्यको बड़ 
वेगक्े आकाश्चमे जाते देख पहले तो बग्रामजी कुछ 
घबड़ा-से गये ॥ २७ ॥ परंतु दूसरे ही क्षणमें अपने 
खशूपकी यद भाते ही उनका भय जाता रहा। 
बलरामजीने देखा कि जेसे चोर किंसीका घन चुराकर 
ठे जाय, वैसे ही यह शत्रु शुद्चे चुराकर आकाश्च-मागसे 
व्यि जा रहा है। उस समय जैसे हन्द्रने पकरतोपर 
वन्न चाया या, वैसे हवी उन्दनि क्रोध करके उक्षके 
सिरपर एक धूता कक्कर जमाया ॥ २८ ॥ धूपा 
णना था कि उघ्का सिर चूर-चूरदह्ो गया। वह 


मुहसे खून उगय्ने दगा, चेतना जाती रदी ओर नडा 
द त्रनादः- (२ अाचीन भिमं “स आहतः“. “'इत्यादि पूवार्धका पठ यो हे -- स एव देत्योऽथ विशीण शीर्षो 


क ड ५ ् 

++ ~ ^ 14 
४.२ प त. ॥ | ८ 9 य ^ ए 

न्क क > ॐ भः # च न १.१ इ 
तिः ~ ॥ । “ = छ 


+ 9, 
४. 0 









अ० १९) दश्चम्‌ स्कन्ध २४९ 





=-= 
महारवं व्यस्ुश्पतत्‌ समीश्यन्‌ भग्र॑कर्‌ शब्द करता हआ इन््रके द्वारा बञ्से मारे दए 


पवेतके समान वह उक्षी समय प्राणद्ीन होकर पर्ीपर्‌ 
भिर्यिथा सघत आयुधाहतः 1! २९) | गिर पड़ा ॥ २९ ॥ 
| 


ककन 


बल्तमजी परम वलश्चाटी थे |] जव्र॒व्राय्बानि 
| देखा कि उन्होने प्रलम्बासुरको मार डाटा) तव॒ उनके 
आश्चयकी सीमा न रही | वे वार-वार षवाह-वाहः करने 
| ल्गे ॥ ३० ॥ गाल्ताटोका चित्त प्रेमसे वहिक हो 
| । गया । वे उनके च्ि हयुभ कापनार्थोकी ववां करने 
आाशिषोऽभिगगन्वक्तं प्रशं सुस्तददंणस्‌ । | वो ओर मानो मरम्र गोट आये दघ, इस भावव 
| आ!लिद्गन करके प्रदासा करने टगे | वस्तुतः वल्रामज 
परऽबिहल्देतसः ।1२९॥ इसके योग्य ही थे ॥३१॥ प्रटम्वाष्कुर मतिमान्‌ 
| पाप था | उक्तक्ती मृध्युसे देवनाअको वङ् सुख तिडः! | 
पापे प्रङञ्वे निहते देवाः परसनिद्रेताः । | वे वल्रामजीपर क बरसाने लगे ओर (डत अच्छा 
। किया, वहत अच्छा किया" इस प्रकार कहकर उनज्ञ 
अभ्यवपन्‌ बलं सालैः शशं घुः साधुमाभ्विि।३२॥) । प्रशंसा करने लगे ॥ ३२ ॥ 
न 
इति श्रामद्वागवते महापुरणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्वे पूर 
प्रलम्बव्रधो नामाश्टादरेऽध्यायः ॥ १८ ॥ 


अथेकोनविशोऽध्यायः 


गों ओर गोपोको दाकानटसे वचना 


दृष्टा प्रलम्बं विहतं बलेन वलक्षालिना 


गोपाः सुतिसि आरासन्‌ साधु साध्विति वादिनः२० 


पेत्यागृदभिचालिङ्क्य 





श्रीशुकं उदाच । -श्रीद्येकदेवजी कते द परीक्षित्‌ ! उस सभ्य 
जब ग्वाट्वार चेल-करूदमे च्ण॒ गये, तत्न उनकी गौरं 
क्रीडाक्षक्तषु गोपेषु तद्रावो दृरचाशिगीः । वेरोक-टोक चरती इई बहुत दूर निकल गथीं ओर इरी- 








इरी घासके लछोभसे एक्‌ गहन वनमे घुस गयीं ॥ १ ॥ 
स्वैरं वरन्त्यो विविश्ुस्णलोमेन गह्वर ।। ९ 1! | उनकी बकर्यौ, गाये ओर भैसे एकः दनसे दूसरे वनमें 
होती इई आगे ढ्‌ गयीं तथा गर्मोकेि तापसे व्याकु 
हो गयीं । वे वेघुध-सी होकर अन्तम उकराती 
सुज्ञाटी ( सरकडोके वन ) मे घुस गयीं ॥ २. # ~ 
जब श्रीकृष्ण, बलराम आदि ्वाच्नालनि देखा कि ` 
 तेऽपर्यन्तः पञ्चन्‌ मोपा; कृष्णरामादयस्तदा। | हमारे पञ्चर्भोका तो कही पता.त्काना ही हे, १८३ 
॥ तव उन्हं अपने खेन-कूदपर बङा पडतावा आ ओर 
जाताचुतापा न बिदुविं चिन्वन्तो गवां गतिम्‌ ॥ ३\ | वे बहत कुक खोज-बीन करनेपर भी अपनी गौ्ओका 
= ९१. सन्नस गेडायामष्टा० | णिरूवाच । =) ४. तापिः | ५ सतः] 4 


1० सन (1 -~ 


अजा भावो महिष्यश्च निर्विंशन्स्थो वनाद्‌ वनम्‌। 











इषीकाटवीं निवि विचः कन्दन्त्यो दावं ताः\।२॥ 

































` २५० 
वणे स्तत्सुरंदच्छिन्नैगोष्पदैरङ्किैर्गवाम्‌ । 


माधमन्वगमन्‌ सवे नश्टाजीग्या विचेतसः ।॥ ४ ॥ 


क 


+ + " „ ऋन्क छ ॥ 
४ रकरः प त, 
णकारः 


॥ 1 
> क 


य॒ज्ञाटव्यां अष्टमाम क्रन्दमानं स्वगोधनम्‌ । 


कषभ््राप्य तृषिताः ान्तास्ततस्ते संन्यवर्तयन्‌! ५॥ 
ता आहूता भगवता मेघगम्भीरया गिरा । 
स्वनाम्नां निनदः श्चुता प्रतिनेदुः प्रहिताः । ६॥। 


ततः समन्ताद्‌ वनधूमकेतु- 


यंदच्छयामृत्‌ क्षयङद्‌ वनौकसाम्‌ । 
समीरितः सारथिनोखबणोर्युवौ- 

विरेलिहानः सिरजङ्गमान्‌ महान्‌ ॥१७॥ 
परितो 


गोपा मावः 


तमापतन्तं दवाग्नि 
प्रसमीक्ष्य भीताः । 
ऊचुश कृष्णं सबलं प्रपन्ना 

यथा हरिं म्रत्युभयार्दिता जनाः ॥८ ॥ 
छृष्ण छृष्ण महावीर हे रामौमितविक्रम । 


/ दावाग्निना दद्ममानान्‌ प्रपन्नां ्ातुमर्हथः ॥ ९ ॥। 


।# द न क~ - + नं + = ^ 
त 1 ९ ८६ 
। च १८ | डे 0 ~ (^ क धः -ॐ य नि~ द # 
व रय + 6 ” (> (~ 0 ° {~ छि 9 @ 
कन्य £ ~ 4 क ^ (प ई क त्वन्ना | ६ नि थृस्त्वह | । । 
1 4.४ क य { > ४ 0 - ४०. क += ॐ १५५ -- हे १4 १ = 
#॥। ह . ९ ची ए थ च ^ + „~ 
छ ^ |` 4 [ज कैत न 
~ ह) १ 2 + ४ @ ; 
1 1.1 ५ त 1 ८ क 


क 3 


~ 
त + र. 
| ॐ धन = 


श्रीमद्भागवत 
=== 





गवाम्‌ । २. षाः सगावः । ३. मामोधवि० । 
>~ ॥# . ओ भ २ मः 8 + 


| अ० १९ 


पतानव्मगास्के॥ ३ ॥ गँ ही तो त्रनवासियोकी 
जीविकाका साधन थीं । उनके न मिलनेसे वे अचेत-से 
हो रहे ये । अववे गौ्ओंे खुर नौर दोतसे करी 
इई घास तथा प्रथ्वीपर्‌ बने इए खुरोके चिहोसे उनका 
पता च्गाते इए अगे बदे ॥ £ ॥ अन्तमं उन्होने 
देखा किं उनकी गौ सुन्ाटवीमें रास्ता मूख्कर डकरा 
रही हँ । उन्हें पाकर वे छौटानेकी चेष्टा करने ठो | 
उस समय वे एकदम थक गये ये बौर छन्दं प्याक्त भी 
नडे जोरसे लगी हृं थी । इससे वे व्याङ्कुक हो रहै 
ये ॥ ५ ॥ उनकी यह दशा देखकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
अपनी मेघके समान गम्भीर वाणीसे नाम ले.टेकर 
गोओंको पुकारने ल्मे | गौ अपने नामकी वनि 
सुनकर बहत हर्षित हहं । वे भी उत्तरमे हकारे ओर 
रभाने ल्गीं ॥ ६ ॥ 
परीक्षित्‌ ! इस्त प्रकार भगवान्‌ उन गार्योको पुकार 
ही रके थे किं उस वनमें सत्र ओर अकस्मात्‌ दावाग्नि 
च्ग गयी; जो वनवासी जीरवका काल ही हाती है। 
साथ दही बड़े जोश्की धी भी चलकर उस अग्निके 
नद॒नेमे सहायता देने लगी । इक्तसे स्तव ओर पटी इई 
वह प्रचण्ड अग्नि अपनी मयंकर लपर्टोसे पषमस्त चश चर 
जीवको भस्मसात्‌ करने य्गी ॥ ७ ॥ जव वाये 
ओर गौभोने देखा किं दावानक चारो ओरसे हमारी ही 
ओर बढता आ रहा है, तव वे धल्यन्त भयभीत हो 
गये । ओर मू्युके भयसे डरे इए जीव जिस प्रकार 
भगवान्‌की शरणमे भते है, वैसेद्ीवे श्रीकृष्ण शौर 
ब्रामजीके शरणापन्न होकर उन्हं पुकार्ते हए 
बोठे--॥ ८ ॥ महावीर श्रीकृष्ण । प्यारे श्रीकृष्ण | 
परम बल्डारी ब्रम | हम तुम्हारे शणणागत हैँ | 
देखो, ईस समय हम दावानकुसे जख्ना ही चाहते हैँ | 
तुम दोनों हमे इससे बचाओ ॥ ९ ॥ श्रीकृष्ण । 
जिनवे तुम्हीं भाद््बन्धु ओर सन कुहो, उन्हें तो 
किसी प्रकारका कष्ट नही होना चाये । सन धमेकिं 
ज्ञाता श्यामघुन्दर ! तम्दं हमारे एकमात्र रक्षक एवं 
खामी हो; हमें केवल तुम्ारा दी भरोघ्ा है ॥ १०॥ 












# 


अ० १९ | दश्चम स्कन्ध २५५९१ 


(त प त 








श्रीशुक उवाच ध्रीद्यकदेवजी कते है--अपने सखा ग्ाखाककि 
ये दीनतासे मरेवचन सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा-- 
(डरो मत, तुम अपनी भंखिं बद कर छो” ॥ ११॥ मगवानकी 
निमीलयत मा भैष्ट रोचनानीत्यभाषत ॥११॥ | भक्षा खनकर्‌ उन ग्वाववायने कड “बहत अच्छा' ओर 
तथेति सीलिताक्षेषु भगवानम्नि्ुखखणम्‌ । | पनी भा की । त व 
उस भयंकर आगको अपने महसे पी ध्या # ओर इस्‌ 
पीत्वा मुखेन तान्‌ छच्ट्राद्‌ योगाधीश्चो व्यमोचयत्‌ १२ प्रकार उन्दं उस घोर संकटे छुडा दिया ॥१२॥ इतके 
बाद जब ग्ाच्वार्खछ>े अपनी-अपनी खं खोलकर देखा, 
| तन भपनेको माण्डीर वटके पास पाया | इस प्रकार अपने 
| आपको ओर गौर्ओंको दावानरसे वचा देख वे वाठ्बाढ 
बहत ही विस्मित हृए ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णकी इस योग- 
< < सिद्धि तथ! योगमायके प्रम!{वक्रो एवं दावानरसे अपनी 
छष्णख योगवीय तद्‌ योगमायाजुभावितम्‌ । रक्षाको देखकर उन्होने यद्वी समञ्षा किं श्रीकृष्ण कोई 

दवाग्नेरार्मनः कषेमं वीक्ष्य ते मेनिरेऽमरम्‌ ॥१४॥ | देवता है ॥ १४ ॥ = 
1-1-11 51 परीक्षित्‌ ¦ सायङ्काल होनेपर ब्यामजीके साय 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने गोर खोटायी भौर वंशी बजाते 
हए उनके, पीछ-पीछे त्रजकी यत्रा की । उस समय 
ग्वाय्वाल उनकी स्तृति करते आ रहेथे ॥ १५॥ 
इर त्रनमें गोपियोंको श्रीकृष्णके बिना एक-एक क्षण सो- 
गोपीनां परमानन्द आस्रीद्‌ गोषिन्ददशंने | सो युगके समान हो रहा था । जव भगवाद्‌ श्रीकृव्ण 
कीटे तन उनका दरशन करके वे पदभानन्दमे मग्न हो 

क्षणं युगज्ञतमिव याक्षं येन ॒विनाभवव्‌ \\१६॥ | गयीं ॥ १६ ॥ 


वचो निश्ञम्य दूषणं बन्धूनां भगवान्‌ हरिः 


ततश तेऽक्षीण्पुन्मीरय पुनर्भाण्डीरमापिताः | 


निष्चास्य बिखिदा आसन्नामान भाश्च मोयिता४१३ 


वेणुं विरणयन्‌ गोष्ठममाद्‌ मोपेरभिष्टुतः ॥१५॥ 





इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूरवार्धे 
दाव्राग्निपानं नामेकोनविंसोऽच्यायः ॥ १९. ॥ 





= ~ ` ~ => = ज 


१. बाख्क्रीडायां दावानठ्विमोश्चषणमेको ° | 


# १. भगवान्‌ श्रीकृष्ण भक्तौके द्वारा अर्पित प्रेम-भक्ति-खुधा-रसका पान करते ई । अग्निके मनमे उसीका खाद छेनेकी 
लाक्सा हो आयी । इसल्ि उसने सयं ही मुखम प्रवेश किया । 

२. विषाग्निः मज्ञाग्नि ओर दाव।ग्नि-तीरनोका पान करके भगवान्‌ने अपनी चितापनाशकी शक्ति व्यक्त की । 

३. पहङे रातिम अग्निपान जिया याः दूष्री भार दिनम । भगवान्‌ अपने भक्तजर्नोका ताप हरनेके ण्यि सदा * ` 
तत्पर रहते है । 


४. पहली बार सब्रके सामने ओर दुखरी बार सबकी आंखें येद कराके शीकृष्णने अग्निपान किया । इसका अभिष्षय 
यह हे किं भगवान्‌ परोश्च ओर अपरोक्च दोनो ही प्रकारसे वे भक्तजर्नोका हित करते ई । 


। जणा 





"> क * । 
~ "अद 4 > 
3 2, 
> हू = ध 























२५५२ भीमद्भागवत [ अ० २० 








अथ डिंशोऽध्यायः 
चष ओर शारद्‌ऋछतुका वणेन 
श्रीदयुक उवाच । शीड्ुकदेवजी कहते हँ ~ परीक्षित्‌ | ग्वाक्वालोने घर 
पर्ुचकर अपनी मा, बहिन आदि ज्ि्योसि श्रीकृष्ण ओर्‌ 
बटरामने जो कुछ अद्भुत कमं किये थ--दावानलसे 
उनको वचाना, प्ररुभ्बको मारना इत्यादि-- सबका वणेन 
क्रिया | १ ॥ बड़े-बड़े वृदे गोप ओर गोपिर्यो मी राम 
गोपल्द्धाश गोप्य तदुपाकभ्यं {वरि्मिदाः । ओर इयामकी अलौकिक लां सुनकर विस्मित हो गयीं | 
वे सव पसा मानने ल्मे कि श्रीकृष्णं ओर वस्रामके 
वेषमें कोई बहत बड़ देवता ही त्रजमें पारे हैः ॥ २॥ 


तयो्तदद्धतं कमं दव.्नेरभोक्षभास्मनः । 


गोपाः स्रीञ्थः समाचख्युः प्रलस्वसधेमेव च| १) 


मेनिरे देवप्रवशे कृष्णरामौ व्रजं गतौ ।\ २॥। 


ततः प्रावतंत प्रात्र सवंसखक्षग्ुद्भवा | इसके बाद वषा तुका ज्ुभागमन हआ । इस ऋतुमं 
‡ | सभी प्रकारके प्राणियोंकी वदती हौ जाती है । उष समय 

य ओर चन्द्रभापर वार-वार्‌ प्रकादामय मण्डल बैठने 
 विद्योहमानपरिधिविस्फुर्जितनभस्तला ।।३॥ | बादल, वायु, चमक, कङ्क आदिसे आका ्ु्भ- 
| सा दीखने ल्गा॥३॥ आकां नीले ओर धने 
सान्द्रनीलाम्बदर्व्योम सिद्यस्तनथितनुभिः । बादठ धिर आते, विजदी कधन लगती, वार-वार गड- 
ध गड़ाहट छुनायी पडती; मू प, चन्द्रमा ओर तारे दके 
रहते । इससे आकादाकी देसी शोभां होती, जसे ब्रह्म 
खूप होनेपर भी रणोसे टक जानेपर जीवकी होती 
> | है |  ॥ सूयने राजाकी तरह प्र्वीरूप श्रजासे आठ 
अशी मासान्‌ निपीतं यद्‌ मूम्याश्चोद्मयं वसु । महीनेतकः जल्का कर प्रहण क्रिया शा) अन समय अने- 


[ खगोभि्मोक्ति्ारमे पर्जन्थ ‡ कार आगते +¦ ५॥ | पर वे अपने किरण-कसे फिर उसे वँटने ल्गे ॥ ५॥ 
2 ~ ` | जैसे दथा पुरुष जब्र देखते देँ कि प्रजा बहत पीडित 
| 8 तडित्वन्त बहामेधाशण्डश्रसनवेपिताः। हो रही है, तव वे दयापरवश होकर अपने जीवन-प्राण 
` < | तक निछावर कर देते है वैसे ही विजटीकी चमकसे 
` | | शोभायमान घनधोर बादल तेज हवाकी वरेरणासे प्राणियों 
श्री शनं जीवनं ख रमुचः करुणा इव ॥ ६ । के कल्याणे, लिये .अपने जीतनश्वरूप जलको वरसाने 
~ ल्म ॥ ६ ॥ जेठ-भक्रादकी गमीसे पृथ्वी सख गयी थी । 


शच्छन्नं ब्रह्मेव सगुणं बभा !\ ४॥ 





८: 1 .| अन व्षकि जसे सिंचक्रर वह किर हरी-मरी हो. 
२ श 4 देवमीटढा आसीद्‌ वृषींयसी ही । गयी ससे सकामभावसे तपस्या करते क्षमय पहले 


तो शरीर दुबेक हयो जाता है, परतु जव उसका फलः 


ज 
काम्यतपक्स्तचुः सम्प्राप्य तत्फरमर्‌ ॥ ७ ॥ | मिक्ता है, तन दृ्ट-पुट हो जाता है ॥ ७ ॥ वषोके 
` "क सायंकालमे बादल्मसे घना अँधेरा छा जानेपरं ग्रह भीर 


१ + <+ ऋ + १३ „प 


9: रि (^ ~ न > ग्रः तोका । ा प्रकाशा तो नहीं दिखायी पडता; परत 


ऋनि @ 9 






( भस्त | 
101दए॥ 1 





१, भ्या उद 





अ० २० | 





द्श्म्‌ इकन्ध 


षयषणीयिणीतमीणगममररषणीीिकीपयषकीषषीम पी भीरि = क क क क 0 1 त 7 1 क मी 





यथा पापेन पाखण्डा न हि वेदाः कले युगे ॥ ८ ॥ 
0 से 
श्रुत्वा पजंन्यनिनदं मण्डूका व्यधुजन्‌ भिरः। 
तूष्णीं शयन्‌(ःपराम्‌ यद्वद्‌ त्र षणा नियमात्यये॥ ९ ॥ 
आषन्युतपभवाहिन्यः क्षुद्रनधोऽयुंनुभ्तीः । 
पुंसो यथाखतन्त्रसख्य देहद्रविणक्षम्पदः ॥१०॥ 
हरिता हरिभिः इष्येरिन्द्रभोपेषच रोहिता । 
उच्छिरीन्ध्रष्ठतच्छाया चृणां भीरिव भूरमूत्‌॥१९॥ 


क्षत्राणि संखक्षम्पद्धिः कषेकाणां शरदं ददुः 1 
धनिना्रुपतापं च देवाधीनमजानताम्‌ ।॥१२ 


जलखरोकसः वं नववारिनिषेवया । 


अबिभ्रद्‌ रुधिरं रूपं यथा हरिनिषेवया ।१२॥ 
सरिद्धिः षङ्तः सिन्धुश्चुश्चुमे शवक्षनोमिमान्‌। 
अपक्वयोगिनधित्तं कामाक्तं गुणयुष्‌ यथा ॥ १४॥ 


गिरयो वर्पधाराभि्हन्धमाना न विव्यथुः 


अभिमूग्रमाना व्यसनेयंथाधोश्चजचेत तः ॥१५॥ 


| वे घास्रसे ठक गये र उनको पहचानना कठिनिहो ` 
गया--जेसे जब द्विजाति वेदोका अम्य नहीं करते ` 


, मागो बभूवु; सन्दिग्धास्वृणेश्छना हयसंस्छृताः । 


[र 








१. ऽम्बुपूरिताः । २. सस्यबृद्धानि । 





जुगनू चमकने कते ै-जेसे कयियुगमें पापकी प्रनर्ता 
हो जानेसे पाखण्ड मर्तोका प्रचार हो जाता है ओर वैदिक 
सम्प्रदाय दुम हो जते है॥ ८॥ जो मेढक पटे 
सुपचाप सो रहे थे, अब वे बादर्गोकी गरज सुनकर 
टर-टरं करने ग्गे-- जैसे नित्य-नियमयने निवृत्त होने पर 
गुरुके आदेशानुस्ार ब्रह्मचारी डोग वेदपाठ करने गतै 
ह ॥९॥ कछोटी-छोटी नदिया, जो जेट-भाषादर्े विस्कुड 
सूखनेको आ गयी यीं, वे अव॒ उमड्-घुमङ़कर अपने 
घेरेसे बाहर बह्ने क्गी-- जसे अजितेन्द्रिय पुङ्षके 
दारीर ओर धन-सम्पत्तिर्योका कुमागमें उपयोन ह्योने खाता 
है ॥ १०॥ प्रथ्वीपर कर्ी-कहीं हरी-हरी धासकी 
हरियानी थी, तो कहीं-कहीं वीरबहूटि्योकी लालिमा ओर्‌ 
करीं -कहीं बरपाती छन्तों ८ सफेद कुक्ुरघुत्तो ) के कारण 
वह सफेद मादरम देती थी । इस प्रकार उक्तकी एसी 
शोभा हो रही थी, मानो किसी राजाकी रग-विरगी सेना 
हो ॥ ११ ॥ सव खेत अनाजसे भरेूरे ग्हय्ह। रहे 
ये । उन्दे देखकर किसान तो मारे आनन्दके प्के न 
समाते ये, परंतु सन कुछ प्रारभ्धके अवीन है-यह वात 
न जाननेवाठे धनियां चित्तम बडी जलन हो रही थी 
कि अव हम न्दं अपने पंजेमे कसे रख सकेगे ॥१२॥ 
नये वरसाती जल्के सेरन्चे सभी जख्चर ओ थल चर 
प्राणि्योकी सुन्दरता च गयी थी, जसे भगवानक्ती खेवा 
करनेसे बाहर ओर भीतरके दनो ही ख्य खड हो 
जते है ॥ १२ ॥ वर्षाऋतु हाक ज्लोकसि समुद्र 
एक्‌ तो र्यो ही उत्तार तरङ्ख॑से युक्त हो रहा धा; अव 
नदियोके सयोगस्ने वह ओर भी क्षुज्ध हो उटला-टीक 
वैसे ही, जसे वासनायुक्त योगीका चित्त विषर्योका 
सम्प होने५र कामनाअकि उभारसे भर जाता है॥१५॥ 
मूपलाघर वर्षाकी चोट खाते रहनेपर भी पवेतोको को 
व्यथा नहीं होती थी- जैसे दुःखोकी भरमार शोनेपर 
भी उन पुर््षोको किसी प्रकारकी व्यथा नद्यं होती, 
जिन्होने अपना चित्त भगवानूक्तो ही समपिंत कर रक्खा 
दै ॥.१५ ॥ जो मागे कभी सफ नहीं कयि जातये, ` 








~~ ~--=------~----- क ऋ कः = ककः 








२५५४ ीमद्धाभशवतं [ अ० २० 











नाभ्यस्यमानाः श्तयो द्विजः कालहता इव ।१६॥ | तव काल्क्रमसे वे उन्द मूढ जते हैँ ॥ १६ ॥ यदपि 
वादक वड़े छोकोपकारी हैँ, फिर भी विज््याँ उनम 
लोकबन्धुषु मेधेषु विदयुतथरसोहदाः । स्थिर नहीं रहती--टीक वैसे ही, जसे चपल अनुराग- 
| वाली कामिनी लियो यणी पुरुपरके पास मी स्थिर भावसे 
स्थेय न चक्क: कामिन्यः पुरुषेषु गुणिष्विच ।।१७।। | नहीं रहीं ॥ १७ ॥ भाकाश्च मे्धोके ˆ गजन-तजनसे 
भर रहा धा ¦ उसमे निगुण ( विना डोदीके ) इन्द्रधनुष- 
धनुवियति मादेन्द्रं निशंणं च गुंणिन्यभात्‌ । | की प्री सोमा इई, जैकी ससखरज भादि. गुणेकि 
 क्षोभसे होनेवाटे विश्वके वखेडमे निगणः ब्रह्मकी ॥१८॥ 
व्यक्ते गुणव्यतिकरेऽगुणवान्‌ पुरूषो यथा १८}! | यचपि चन्द्रमाकी उञ्ल चाँद नसे वादर्कोकः पता चरता 
| था, फिर भी उन वादरख्रने ही चन्द्रमाको ढककर शोभा- 
न्‌ रराजोड्परछन $ खज्योत्खाराजितैधेने १ | | हीन मी वना दिया था--टीक वेषे ही, जेसे पुरुषके 
| | | आभाषस्ते भासित होने अहंकार दी उक्षे कक्‌ 
अदहंमत्या भाक्ञितया खभासा पुरुषो यथा ।१९॥ प्रकाशित नहीं होने देता ॥ १९॥ वादके दयभागमन- 
| से मोरोका रोम-रोम खिल रहा था, वे पनी हक भौर 
* मेधागमोत्सवा हृष्टाः प्रत्यनन्दच्छिखण्डिनः। चरव्यके द्वारा आनन्दोत्सव मना रहे थे--टीक वैसे ही, 
| जैसे गृहस्थीके जंजाल्मे फंसे हए छेग, जो अधिकतर . 
गृहेषु तप्ता निर्विण्णा यथाच्युतजनागमे ॥२०॥। | तीनों तापसे जकते ओर घवड़ति रहते है, भगवान्‌के 
भक्तोके शभ;गमनसे आनन्दम हो जाते ह ॥२०॥ 
पीत्वापः पादपाः पद्धिरासन्नानात्ममूतंय ; । | जो दृक्ष जेऽ-भाषादृमें पूख गये थे, वे अव अपनी जङ्पति 
| | जक पीकर पत्त, प्र तथा डा्योसे खूब ॒सज-षज 
प्राक श्षामास्तपक्षा आन्ता यथा कामानुसेवया।।२१॥ | गये-- जसे सक्षाधभावसे तपस्या करनेवाठे पठे तो 
दुब ह जाते है, परंतु कामना पूरी होनेपर मोटे-तगडे 
सरस्खश्ान्तराधस्सु न्युषुरङ्गापि सारखाः । हो जते हँ ॥ २१॥ परीक्षित्‌ ! तार्वोके तट कोट. 
| कीचड़ ओर जल्के बहावके कारण प्रायः अशान्त ही 
गृहेष्वश्ान्तद्रत्येषु ग्राम्या इव दुराशयाः ॥२२॥ | रहते ये, परतु सारस एक क्षणके व्यि भी उन्हं नहीं छोडते 
। ये-- जैसे अद्द्ध हदयवाले विषयी पुरुष काम-धं्ोकी 
जलेौपै्निरभिद्यन्त सेतवो वर्षतीश्वरे। ` ` | चरसे कभी छुटकारा नहीं पाते, किर भी षरोमे दी पे 
रहते हैँ ॥ २२ ॥ वषो क य क 

| धार वर्षा होती है, इससे नदि्योके बाघ ओर खेती 
 पाखण्डिनामसदरादवेद मागोः कलौ यथा ॥२३॥ | मेदे टरूट-्ट जाती है-- जैसे कट्धुगमे पाखण्डिपोकि 
तरह-तरहके मिथ्या मतवादोसे वैदिक मागकी मयोदा 


बायुभिव  दीटी पड़ जाती है ॥ २३ ॥ वायुकी प्रेष्णासे घने बादक 
व्यञयुश्वन्‌ न्ना भूतेम्योऽथागृत घनाः। अगि विं भदत जस्की षण कले -ते र 


 : अ ध जैसे ब्राह्मणोंकी प्ररणासे धनीलोग समय-समयपर दानके 
क ( यः काठ का हिजेरिताः | २५] । द्वारा म्रजाकी अभिलाबा९्‌ पूण करत है ॥ २४॥ 
. 4 ~ 

























अर २० 1 


एवं वनं तद्‌ विष्टं पक्रखजूरजम्बुमत्‌ । 


द्श्नम्‌ स्कन्ध 


रेष 


॥ का 1, 
का = ~ 


वर्षा ऋतम बृन्दावन इसी प्रकार दोभायमान ओर 
पके इए खजूर तथा जामुनेसि भर रहा था । उसी वनम 


च =, (१ अ % 
गोगोपारे्र॑तो न्तु खबलः प्राविशयद्धरि ; ॥ २५) | विहार करनेके ल्वियि श्याम ओर वल्रामने णावां ओर 


धेनवो मन्दगामिन्य ऊधोभारेण भूयक्ता । 


ययुर्भगवताऽऽदरता द्रुतं श्रीत्या स्तुतस्ठ॑नी; | २६॥ 
वनोकमः अश्चुदिता बनशाजीमंधुच्युतः | 
जरधारा गिरेनादानासन्ना दद्श्चे गुद्धः ॥ ७} 
यां चाभिवषहि | 


क्र{खद्‌ यनस्पदिक्र)डं 


निविंरयं भमवाच्‌ रमे कन्दअरफलदरनः ३।२९॥) 
दध्यादनं टमानीतं ¦ शङाय।! सलिङान्तिक । 


५ क क 


सम्भोजनीयेवुयजे मोेः 
ञाद्ररोपरि संविश्य यदतो मीलितेक्ष्णान्‌ । 
त॒प्राच्‌ इषान्‌ वरसतराय्‌ गाथ स्वोधोभरश्रमाः।।३०॥ 
्रबट्‌भ्ियं च तां वीक्ष्य सवंमूतघंदावहम्‌ । 
भगवान्‌ पूजयाश्चकर शात्मशकत्युप् हितास्‌ ॥३१॥ 
णवं निवसतोस्तसिन्‌ रामकेशवयोरने । 


` श्रत्‌ समभवद्‌ ठयभ्रा खच्छाम्न्बपरुषानिरा॥३२। 


शरदा नीरजोत्पत्यः नीराणि प्रकृति श्रथुः । 


सङ्पंणान्वितः ।\२९। 


। गौओके साथ प्रवेद किया ॥ २५ ॥ गौर अपने यनोकि 
। मापी भारके कारण वहूत ही धीरे-धीरे चल ददी थीं | 


व भगवान्‌ श्रीकृष्ण उनका नाम टेकर पुकारते, तवर 
वे प्रेमपरवश्च होकर जल्दी-जस्दी दौडने ख्गतीं । उस 


। समय उनके थर्नोसे दृधकी धारा गिरती जाती थी ॥२६॥ 


भगवानने देखा किं वनवाक्षी भीर ओर भीटनिर्या आनन्दरमग्न 
हैँ । बरक्षोकी पंक्तियाँ मधुधारा ॐ डक रही हैँ । पवतोस 


` अर-ञ्जर करते हए रने अरर रहे ई । उनकी आवाज 


वड़ी सुरीटी जान पडती है ओर साथ द्वी वषां होनेपर 
किपनेके च्वि. बहुत-सी गुफार्पं भी हैँ ॥ २७ ॥ जव 
वधा होने लगती, तव श्रीकृष्ण कमी किसी वृक्षक गोदमें 
पा खोड जा छिपते । कभी-कभी किसी गुफामे ही 
जा वेठते ओर कभी कन्द-मूल-फ खाकर ग्वाल्वारेकि 
साय खेकते रहते ॥ २८ ॥ कमी जच्के पास ही किसी 
चट्ानपर बैठ जाते ओर वब्रामजी तथा ग्बाल-वाोके 
साथ मिच्कर धरसे गया इ ददी-भात दाल-शाक 


 आदिके साथ खाते ॥ २९ ॥ वषा ऋतुमें बैल, वछ्डे 


ओर थर्नोके भारी भारसे थकी इर गोरं थोडी दी देरमे 
मरपेट घास चर ठेतीं ओर हरी-हरी धासपर बैठकर दी 
ओंख मूंदकर जुगारी करती रहतीं 1 वषां ऋतुकीं 
घुन्दरता अपार थी । वेह सभी ्राणि्योँको सुख पडंचा 
रही थी । इसमें सन्देह नकी कि वह ऋतु, गाय; बे, 
वछडे--सव-के-सब भगवान्‌की ीराके द्री विलास थे । 
फिर भी उन्हे देखकर भगवान्‌ बहत प्रसन्न होते ओर 
वार-बार उनकी प्ररासा करते ॥ २०-३१॥ 


इस प्रकार श्याम ओर वराम बडे आनन्दसे त्रनमे 
निवास कर रहे थे । इषी समय वषा बीतनेपर शरद्‌ 
ऋतु आ गयी । अव आकाशम बादर नहं रहे, 
निम हो गया । वायु बड़ी धीमी गतिसे चरने क्गी॥३२॥ 


शरद्‌ ऋतुमे कमरा की उत्पत्तिसे जगाश्चयोके जयने अपनी 


सहज खच्छता प्राप्त कर टी-रठीक वेसे ही, जेसे 


अष्टानामिव चेतांसि पुनर्थोगनिषेवया ।।३३॥ | योगभ्रष्ट पुरुषका चित्त पिरसे योगका सेवन करनेसे 





[1 





१. स्तनाः । २. विशन्‌ 1 ३. दनमुपानीत । ४. स्वोघ्रो भर ° । ५. सुखाव ° । 








+ 4 
५ ॥ क. 


ए व 1 
॥ ५ क्ण्ि *# $ - 
= ॥ }) ° 
४ ् ॥ = 
६ त) +ड -+ 





२५६ श्रीमद्भागवत [ अ० २० 








 व्योम्नोऽन्दं भूतश्ानस्यं थवः पङ्कमपां मलम्‌। | निर्ग हो जाता है ॥ ३२ ॥ दरद्‌ ऋतुने आकाशके 
बादल, वर्षा-काल्के वदे इए जीव, पृथ्वीकी कीचड़ 


शरजहाराभ्रमिणां ङ्ष्णे भक्तियंथाञ्ुभम्‌ ॥३४॥ ओर जलके मटमेटेपनको नष्ट कर दिया- जसे मगान्‌ 
की भक्ति ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानग्रस्थ ओर संन्यापियेकि 


घर्यस्लं जलदा हित्वा बिरेजः भव्य ¦ सव प्रकारके कष्टों ओर अछछमोका अटप्ट नाद्य कर्‌ 
देती ह ॥३४॥ बादल अपने सद जलका दान करके 
उञ्ञवल कान्तिसे सुद्ोमित होने ल्गे-- टीक वेसे ही, 
जेसे लोक-परलोक, डी-एुत्र ओर धन-्म्पत्तिसम्बन्धी 
चिन्ता ओर कामनाओंका परित्याग कर देनेपर संसारके 
वन्धनसे टे इए परम शान्त संन्यासी च्ोभायमान होते 
है ॥ ३५ ॥ अव पयंतोँरे कही-क ही वरन रणे ये अर कर्ही- 
कहीं वे अपने कल्याणकारी जलको नद्वीं भी वहति मे-जैते ^ 
ज्ञानी पुरुष समयपर अपने अमृतमय ज्ञानका दान किती 
अधिकारीको कर देते हैँ ओर्‌ किसी-किसीको नहीं भी 
नैवाविदन्‌ क्षीयभाणं जलं भाधजङेचराः ¦ करते ॥३६॥ छोटे-खोटे गङ्खोमे भरे ए जलके जठचर यह 
नहीं जानते कि इ गड्टेका जठ दिन-प्र.दिन सूखता जा 
यथाऽऽयुरन्बह क्षय्यं नरा मूढाः इडुभ्बिनः ।।३७॥ | रहा है जसे इद्भवके भरण पोषणम भूल ह म यह नही 
जानते कि हमारी आयुक्षण-क्षण क्षीण हो रही है ॥३७॥ 
थोडे जलम रहनेवाटे प्रणियोँको इारत्काटीन सुथेकी 
प्रर किरणीसे बडी पीडा हने टसगी-- जैसे अपनी 
इन्द्रियो के वमे रहनेवाटे कपण एवं दरद कुटुम्बीको 
यथा ददिः कृपणः इडञ्न्यविजितेन्द्रियः ॥।३८॥ | तरदह-तरहके ताप सताते ही रहते ह ॥ ३८ ॥ पृथ्वी 
| | धीरे-धीरे अपन कीचड़ छोडन य्गी भौर षास-पात धीरे 
छनैः दानेजंहुः पङ्क स्थलान्यामं य वीरुधः । धीरे अपनी कचाई छोडने ्गे--टीक वैसे ही, जते 
विवेक्ठम्पन्न साधक धीरे-धीरे शरीर आदि अनास 
यथाह ममतां धीराः शरीरादिष्वनास्मसु ॥३९॥ | पदा्ेमिसे "यह मै द ओर यह मेरा हैः यह अहंता 


जीर ममता छोड देते हे ॥ २९ ॥ दार्द्‌ ऋते समुद्रका 
निश्लाम्बुरभूत्तष्णीं सथुद्रः श्वरदागमे । जल स्थि९, गम्भीर ओर शान्त हो गया--जसे मनवे 


निःसंक्प हो जनेपर आत्माराम पुरुष कम॑काण्डकां 

मेला छोडकर शान्त हो जाता है ॥ ४० ॥ किसान. | 
ेर्तोकी मेड मजबूत करके जलका बहना रोकने ल्गे- _ 
जैसे योगीजन भपनी इन्दिर्योको विषर्योकी भीरं जानेसे 
रोककर, प्रव्याहर करके उनके द्वारा क्षीण होते इए ` ॐ 





# 1112. 


यथात्यक्तंषपणाः शान्ता अनयो क्त किटिवंषाः।\३५॥ 


# चः 
ए * # द 
कककोनकोेः " कानोनकिता योगेन, ककन 


[ 
तः नक्षत कः जोन इ्वकण्हः # ~+ { + ¢) ^ ॥॥ "ॐ ॥ ^+ # +> (ति  *# शि = न्क = "नकत 


भिरयो शखच्तोयं क्वचिन्न अुयुचुः शिवम्‌ । 


यथा ज्ञानाप्रतं काडे ज्ञानिनो ददतेन वा \ ३६}; 


=> प णपि भः + 
म क ^ 099 = "द = 0 = @ कक 













गाधवारिचरास्तापमविन्दञ्छरदकजम्‌ । 


क । 


[५ 


` आत्मन्युपरते सम्यङ्छनिव्युपरतागमः ॥४०॥। 


चन 






~ 










क्क ह । भ १५ 3 < (, 
४. 


द्ञ्चम्‌ स्कन्ध 





लरदकोलजःस्ताएएन्‌ भुतानशड्योऽहरत्‌ । 


देहाभिमानजं बोधो न्दो तरजयोपितःग्‌ \\४२॥ 


खक्षोभत छरद्धिसंरुतार्‌ । 


सन्वयुक्तं थथा चित्तं छन्दबहार्थदशनस्‌ \\४३॥ 





ऋ, 
शखष्डमं म्नि रशजोड्गणेः क्षी ¦ 


५ > 
1 


| 
9६ {इइ सुषि 11:11 


रखप्यं दखप्कीतोव्मं श््ूलवयमारुदम्‌ । | 
ननास्तापं जइर्गोप्य न छव्णहतचेत्चः ॥४५५।। 
गदो एगाःखमा चयैः एष्िण्य; स्रद्‌ाभयन्‌। 

अन्दीयमानाः खबरे; फररीषक्रिया इव ।४६॥ 
उदहृष्यन्‌ पारिजानि घरर्थात्थाने इद्‌ चिना। 

रज्ञा तु निभवा लोका शंथा दस्यून्‌ विना सेप ।४७॥ 
पुरश्ामेष्बाज्रवभैरेन्दरियेध महोत्सवः । 


वभौ भूः पक्रसयाव्या कलाभ्यां निरं हरे;\\ ७८ 


क्ञानकी रक्षा करते हैँ ॥ ४१ ॥ शरद्‌ ऋतु दिनके 
समय बड़ी कड़ी धूप होती, गोर्गोको बहत कष्ट होता; 
परंतु चन्द्रमा रात्निके समय ठोर्गोका सारा सन्ताप वसे 
ही हर ठेते जसे देहाभिमानसे होनेवाठे दुःखकरो ज्ञान 
ओर भगवद्विरहसे दोनेषाठे गोपि्योके दुःखको श्रीक़्ण 
नष्ट करदेतेहें || ४२ ॥ जसे वे्दोके अंको स्पष्ट 
रूपसे जाननेवात्म सत्त्वगुणी चित्त अत्यन्त चोभायमान 
होता है, वेते ही शरद्‌ ऋतुमे रातके समयमेघेसिरहित 
निम आकाश्च तार्रोकी ज्योतिसे जगमगाने द्गा 1 ४३॥ 
परीक्षित्‌ ! जैसे प्रथ्ीतल्में यदुवंशिर्योके वीच यदुपति 


। भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सोभा होती है, वैसे दी आकाशम 


तारके वीच पणे चन्द्रमा सुशोभित होने खगा ॥४५॥ 
कसे दे इए वृक्ष ओर लतार्थमें होकर व्डी दही 
सुन्दर वायु वहती; बह न॒ अधिक टंडी होती ओर 

अधिक गरम । उस वायुके स्पशंसे सव छोर्गोकी जलन 
तो मिट जाती, परंतु गो पिर्योकी जलन ओर भी वढ़ जाती; 
क्योकि उनका चित्त उनके हाथमे नह्य था, श्रीकृष्णने 
उसे चुरा च्या था ॥ ४५ ॥ शरद्‌ ऋतम गौर, हरिनियां 
चिडि्या ओर नार्यो ऋतुमती-सन्तानोस्पत्तिकी कामनास 
युक्त हो गयीं तथा सड, हरिन, पक्षी ओर पुरुष उनका 
अनुसरण करने ्गे- टीक वैसे ही, जैसे समथं पुरुषके 
दवारा की इई क्रियार्ओका अनुसरण उनके फल करते 
दे ॥ ४६ ॥ परीक्षित्‌ । जैसे राजके श्ुमागमनसे डाकू- 


चोरके प्षिवा ओर सवर ठोग निर्भय हो जति है, वेसे ` 
ही सूर्योदयके करण कुमुदिनी (कुई या कोड) के 


अतिरिक्त ओर सभी प्रकारके कमर खिल गये ॥४७॥ 


उध्व समय बड़े-बड़े राहरो ओर गमिं नवानप्राशन ओर ` 
हन्द्रसम्बन्धी उस्सव होने जगे | खतम अनाज पक 
गये ओर प्रथ्वी भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा बट्रामजीकी ` 


उपद्थितिसे अत्यन्त सु्ोभित होने ल्गी ॥ ५८ ॥ 
साधना करके सिद्ध इए पुरुष जैसे समय आनेप्र अपने 


देव आदि शरीरोको प्राप होते है, वैसेदी वस्य, संन्थासी, 





॥ 


{ 
1 


व. \/ 






















् 
॥ 







राजा ओर स्तक--जो वर्षाके कारण एक स्यानपर 
रुके इए थे-- वहसे चलकर अपने-अपने भभीष्ट काम- 
वषृरुद्धा यथा सिद्धाः स्वपिण्डान्‌ कार आगते।}४९। काजमे ल्ग गयं ॥ ९ ॥ 3 


ईति श्रीमद्धागषते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां `दशमस्कन्वेःूर्ाधे ्राबरट- 


 बणिघुनिनरृपस्नाता निर्भम्यार्थान प्रपेदिरे ! 





् क 
क ॥ 
| 
॥। “न ९ 
किः ४ + [ 
< कनै ष + ^ 








~ शरद्णेनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ न. 
ष । # ---+ ० ॐअ -- न र ॐ 
4: १. आखन्‌ । ॑ अ 0 कः 
भन 6 ५ म: 
॥ नक 22 > 
~ = 4 ट. स, भात स० खं ० > 2 ३२ 6 =° 





२५८ 


ज च चो आ शा आ = भाक अ, ० ©= == आ, ७8 








भीमदभागवत 


7 किमि 
णि या 


| ° २१ 





भ गीर 


¢ | अथेकविंशोऽध्यायः 
१0. वेणुगीत 
१ । श्री्ुक उवाच ओीद्यकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ ! शरद्‌ ऋतुके 
३. कारण वह वन बड़ा सुन्दर हयो रहा था | जल निमेड 
{ ॥ इत्थं रारत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना । | था ओर जगद्योमे खिखे दए कमलँकी सुगन्धसे सनक्षर 
४7 | | वायु मन्द्‌-मन्द्‌ चर रही थी । भनदान्‌ श्रीकृष्णने गभं 
8 ॥ , < ओर वार्वालके साथ उद वनम प्रदेय किया ॥ १॥ 
| | न्यविश्चद्‌ वाङ्न चति सगोगोपारकोऽच्युत्‌ ६ १॥ सुन्दर-सुन्दर पुष्पोँपे परिपणे हूरी-हरी बृक्ष-पक्तियोमें 
४ । मतत्राठे मरे स्थान-स्थानपर युनगुना रहे ये ओर तरह- 
¢ | = ~ तरहके पक्षी इ्ंड-के-द्ंड अलग-धख्ग कलरव कर्‌ रहे 
9, ४. | । इुमितयनराजिञचम् थे, जिससे उश्च वनके सरोवर, नदिर्यां भौर पवत-- 
ए | सव-के-प॒व गूजते रहतेथे । सधुपति श्रीकृष्णने वठराम- 
४ ॥ द्विजङरघुष्टसरःससरिन्मदीधम्‌ । जी ओर वाख्वालोके साय उसके मीतर धुस्कर गौ्भो- 
१ | को चराते इए अपनी वंसुरीपद वडी मधुर तान 


मधुपतिरवगाह्य चारयन्‌ धाः 















सहपश्चपारबलश्चुङजन वेणु ॥ २॥ 


तद्‌ वजल्ञिय आश्रुत्य बेणुगीतं स्मरोदयस्‌ । 
काथित्‌ परोक्षं ष्णस्य स्वसखीम्योऽन्ववर्णयन्‌॥। ३) 
तद्बणंयितुमारन्धाः स्मरन्तः ष्णचेटितम्‌ । 


नाशकन्‌ सरवेगेन विधिप्तमनसो चप ।॥ ४॥ 


बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः ` कणिकारं 


॥ बिभ्रद्‌ वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्‌ । 


^. 
क नः १ च क "8, * 
। क भ 





क 1.4 ऋतिक 
¶ ॥ च वं क सर च्‌" पि ४ ्‌ 
म ~ 
नद्ि ए ~ वि 
क - < & ` = 0 


गीर [धरङुधया ¢ १ ॐ 
"1 
> क क) ६ च ५ की ` त 
क = 4 
% क चैः न 4 += + म. = 
१ नि = ७ ४4 
4» ऋ १ ~ क ५ द क ष न 1 
र बन्दारण्यं 9. 79 2 कः 49 प्राविष्च 
; दभ्रा ग्‌ (4 | ९५ || 
६1 ध ॥ 6 द्र 4 “ । | 
ल, >) [3 ५ # = री र † तक्ति ५ ॥ 1 ( छै 
1 (क (क ~ विन ५ 9 क -  छ 4 5 - ~ र ५ ~= ९५ =, 
ह 
ज ॥ हक द + क "न न 3 ~~ । 
~ ह] [` क # 
चै 


ऋ 
तरच) 


द ब्‌ 
> धः ^" क 
0 "४ "क ग्द 
"नः 
ॐ 


छेड़ी ॥ २॥ श्रीक्रष्णकी वह वंश्चीष्वनि भगवानूके 
प्रति प्रेममावक्तो, उनके मिन सी भकांक्षाको जगानेवाटी 
थी | ८ उसे सुनकर गोपियोका हृदय प्रेमसे पर्णं हो 
गया ) वे एकान्तम अपनी सखियोसे उनके रूप, गुण 
शोर वंरीष्वनिके प्रभावका वणन करने ल्गीं|॥ ३॥ 
व्रजकी गोपियोने वंशीष्वनिका माधुयं आपसे वणेन 
करना चाह्। तो अव्रद्य; परतु वंश्ञीका सरण होते ही 
उने श्रीकृष्णकी मधुर चेष्टाओंकी, प्रेमप्रणे चितवन, 
मींहके इदारे भर मधुर सुसकान आदिद्मी याद हो 
आयी । उनकी भगवानूसे मिलनेकी आकांक्षा ओर भी 
बद्‌ गयी | उनका मन हाथसे निकर गया । वे मन-ही-मन 
दहं पट्च गयीं, जह श्रीकृष्ण थे । अव उनकी वाणी 
बोडे कैसे १ वे उसके वर्णनमें अप्तमथं हो गयीं ॥ 9 ॥ 
८ वे मन-ही-मन देखने लगीं कि ) श्रीकृष्णं ग्वस्बाखोके 
साय बृन्दावनमें प्रवेश कर रे हँ । उनके सिरपर मयूर्‌- 
पिच्छ है ओर कार्नोपर कनेरके पीठे-पीठे पुष्प; 


| शरीरप ुनहर। पीताम्बर ओर गलप पाच प्रकारके 


सुगन्धित पूर्पोकी बनी वेजयन्तीमात््र है | रगमश्चपर 
अभिनय करते इर श्रेष्ठ नटका-सा क्या ही सुन्दर वेष 
है | बोह्ुरीके चिदोको वे अपने भधरागरृतसे भर रहे 
ह | उनके पीठे-पीछ्ठे म्बाल्बाल उनकी लोकपावन 
कीर्तिका गान कर रे है । इस प्रकार वैकुण्ठसे भी श्रेष्ठ 
वह दृन्दावनधाम उनके चरणचिहोंसे ओर भी रमणीय 


जै 





न 


अ० २१ दश्चम स्कन्धं २५९ 


कका जो = । ऋ कर क मी > शा 1777 11 ॐ न्को = क = ज 
को ज गो पि क कक ऋ कः % = = हक [ण + व , त क का श क 7 ए 8) | 1 भि चको दि क, "नकः = भ 














नि १ 1 7 ॐ "` आ क भ किः @> @ =` कया कि 
न किति = किः त (भ मी मि नि 





इति वेणुखं राजन्‌ हवभूतमनोहरम्‌ । । वन गया दै ॥ ५ ॥ परीक्षित्‌ | यह वेंशचीध्वनि जड, 
चेतन-- समस्त भूर्तका मन चुरा र्ती है | गोपियेनि 


वि (3 । उसे सुना ओर सुनकर उसका वणेन कटने व्गीं | वर्णन 
श्रुत्वा व्रजब्खियः सवौ बणंयन्त्योऽभिरेभिरे।। ६ ॥ कतिकति वतप व 





गोप | धालिङ्गन करने च्णीं ॥ ६ ॥ 
(1 | गोपिर्यो आपसमै बातचीत करने टठगी- भरी 
| जरितं स्‌ । सखी | हमने तो ओंँखवार्छके जीवनकी ओर उनकी 
अक्षण्वतां ईकभद्‌ न एर विदाः 


| ओंखोकी वप्त; यदही-इतनी दही सफलता समङ्गी है, 

ओर तो हमें कुछ माम दी नहीं है । वह कौन-सा 

<; तवि | लाभ है १ वह यही है कि जव द्यामघुन्दर श्रीकृष्ण 

सर्ब पद्यत (तब्यृतचवस्प, । ओर गोरसुन्दर वशर्राम ग््राच्वाकेकिे साय गार्योको 

रोककर वनम लेजारदेहोंया टोटाकर व्रज्मे ला 

न रहे हो, उन्होने अपने अधरोपर मुरटी धर रक्खी हो 

वर्त्र॒व्रजेशघुठयारदुषेणु जट ओर प्रेममरी तिरछी चितवनसे हमारी भर्‌ देख रहे 

| हा, उस समय हम उनकी पुख-माघुरीका पान करती 

यैवा निषीसमलुर्तकटा्षभोशषू ।। ७ | रदे ॥ ७ ॥ अरौ सखी । जव वे भामकी नयी कोपे 

मोर्तोके पंख, देके गुच्छे, रंग-विरगे कमठ ओर 

कुपुदकी मालां धारण कर ठेते दै, श्रीडृष्णके सौवरे 

चूत्‌ प्रवयारषहस्तकोत्वलान्ञ कारीरपर पीताम्बर भौर वरुएमके गोरे श्रीप्पर नीव्यम्बर्‌ 

फटराने लगता दहै, तव उनका वेष वड़ा विचित्र 

बन जाता है | गाल्वागेकी गोठीमे वे दोनों 

बीचोवीच वेठ जाते दै भौर मधुर सद्गधीतकी तान 

छेड देते है! मेदी प्या सखी! उस समय रेसा 

मभ्य पिरेजतश्टं प्चपालगोषठयां जान पड़ता है मानो दो चतुर नट रंगमश्चपर भनिनय 

कर रहे हं म क्या बताऊं कि उक्त समय उनकी 

ङ य ते नप किंतनी शोभा होती है ॥ ८ ॥ अगी गोपियो 1 यह 

गे यथा नटभरो ऋ च गायमानो ।। ८ ॥ | नगु परमनातिका होनेपर मी प्वनन्ममे न जने दवा 

कौन-सा साधन-भजन कर चुका दै किं हम 

गे।पि्योकी अपनी सम्पत्ति--दामोदरके अधरोकी सुधा 
खयं ही इस्‌ प्रकार पिये जा र्ाहै कि इम गोगोके 
य्य योडा-सा मी रस शेष नहीं रहेगा । इस वेणुको ` 

अपने रससे सींचनेवागी इदिनियां आज कमलके मिस 

ङ्त खयं यद्बशचि्रसं हदिन्यो रोमाश्चित हो रदी ट ओर भपने वंश्चमे मगवस्मरेमी 
प | ` | इन्तारनोको देखकर शरेष्ठ पुरुषकि समान वृक्ष भी इसके ` 

साय भपना सम्बन्ध जोड़कर खों आनन्दाश्र॒ बहा 


मालालुप्रक्तपरिधानविचित्रवेषौ । 


गोप्यः हिमष्वरदय शरु ख वेणु- 


दौमोदरधरसुधामपि गोपिकानाम्‌ । 


इ्य्चोऽच धचलसोयथाऽऽयौ॥। ९॥ | ३ ६॥९॥ े 


१- नोरमम्‌ । 


#' 
9 ये ॥ ॥। ॥ 1 
~ ॥ +य च । ५ 
धि ॥। ऋः - "कनक ॥ ॥ न - 
^. ४ - ~ त % = 4 * 
४ 1 क, ४ णो च ह 



























(+ 








1 ५ 


^. 
+ 9 क 


कह 
@ ~ क्ल र| 
५9 १ १ 
+ "श न . 
४ (7 


कः 


२६० 


बरन्द्‌।वनः सखि धुषो वितनोति सीर्ति 


यह्देवकीसुतपदाम्बूनरुन्धलक्षिमिः । 
गोविन्दवेणुमञु मत्तमयूरनरस्य 


गे््याद्रिसन्वपरतान्यसमस्तसत्वस्‌ ॥१०॥ 
धन्याः ख सूढमतयोऽपि हरिण्य एता 
या नन्द्नन्दनञुपात्तविचित्रदेषम्‌ । 
आक्यं वेणुरमि तं सहकृष्णसाराः 
पूजां दधुर्विरवितां प्रणयावलोकरैः ।\११॥ 


कृष्णं निरीक्ष्य बनितोःसवरूपश्चीलं 


श्रुत्वा च ततक्वणितवेणुविं चित्रमीतस्‌ । 


॥ क १ ड 


ति क 8 च 


श्रीमद्नागंबतः 


कको भ कः = वो कक ` ऋक जनकजा आ = ऋक 0 कक = ऋ ऋ, कक कर क्क त चव चको ककन कको ऋ  @ = "कः = ॐ ऋक ऋक चः 
की णी भो ॐ 


नी व्य! ॥१२॥ | ष्द कमरसे खि्षककर जमीनपर 


{ अ० २९ 


भरो सखी | यहः बृन्दावन वेकुण्ठरोकतक पृश्वीकी 
कीतिका विस्तार कर रहा है । क्योकि यशोदानन्दन 
श्रकष्णके चरणकमनेके चिह्णोसे यद्व॒ चिहित हो खहा 
है | सखि | जव श्रीकृष्ण अपनी सुनिजनमोहिनी सुरशी 
वजाते है तव मोरे सतारे होकर उसकी ठताल्पर 
नाचने ठ्गते हँ । यड देखकर पवतकी चोटियोप 
विचरनेवाठे समी पद्ध-पक्षी चुपददाप---लान्त होकर 
खडे रह जते है ¦ अरी सखी | जव प्राणवस्छम 
श्रीकृष्ण विचित्र वेष धारणं करके वेँष्िरी बजाते है 
तव मूढ बुद्धिबादी ये हरिनि्याँ भी वं्ञीकी तान 
घुनकर अपने पति कृष्णार गरुगोके स्वार नन्दनन्दनके 
पाञ्च चली आती ह ओर अपनी प्रेभमरी बड़ी-बड़ी 
भंँखोसे उन्हं निरखने च्गती दै ! निर्खती क्या है, 
अपनी क्मर्के समान वड़ी-वड़ी अखि श्रीकृष्णके 
चरणोपर निछठावर्‌ कर देती ह ओर श्रीङ्ष्णङ्गी 
्ेप्रभरी चित्वनके दवारा किय} इअ अपना सत्कार 
सखीकार करती ह । दास्तवमे उनका! जीवन धन्य है | 
( ष्म बन्दावनकी गोपी ्नेपर्‌ भी ईष अकार उनपर्‌ 
भपनेको निकछावर नटीं कर्‌ पाती, हमारे घाटे कदने 
गते हैँ । कितनी विडम्बना है ¡ ) ॥१०-११॥ अरी 
खी । हरिनियोकी तो बतदी क्ष्या है खगकी 
देविय जब युधतिर्योको आनन्दित करनेवाठे सौन्दयं 
ओर शीव्ेः खजाने श्रीकृष्णको देखती द जर बोँ्ुरी- 
प्र उनके दारा गाया इभा मधुर षंगीत श्ुनती &, तव 
उनके चित्र-विचित्र भाप घ्ुनकर वे अपने विमानप्र्‌ 
दी घुध-बुध खो बेठती दै मूच्छित हो जाती कै 
यह्‌ कौसे माद्धम इभा सखी १ सुनो तो; जब उनके 
इृदयमें श्रीकृष्णसे भिग्नेकी तीव्र आकाह्घा जग जाती 
है तन वे भपना धीरज खौ बवती है, बहो टो 
जाती है, उरन्द इष बातका भी ता नहीं चता कि 
उनकी चोविययमिं गुंथे इए, न पृरथ्वीपर गिर रहे & । 
यत्र कि उन्दः भपनी साड़ीका भी पता नदीं रहता, 








> रु = कः =+ ॐ नः +> 


गिर जतीदहै॥१२॥ 





अ० २१ । दश्चम स्कन्ध 





---------------<--------------------- न जज 


मात्र डलनिगतवधगीत 
पीयृपषयुत्तभितक्ृणं पुटे; पित्रन्त्यः । 
लावाः स्नुतस्तनपय्‌+ कवलाः स्म तस्थु- 
गे!विन्द मात्मति दखाशरुशूखाः स्पृशन्त्यः) १३। 
प्रःयो बदपध्य विहगा नय बनेऽस्मिच्‌ 
करष्णेश्रितं तदुदितं कल्वेणुभीतय्‌ । 
आच्द्य ये दमषुज्ान्‌ रुचिरप्रवाङन्‌ 
भृष्ठल्स्य्रीलितदशछो विभतास्यवाचः ॥१५४॥ 
नस्तद्‌ तदुषथाये शुङधन्दमीत्‌- 


„__ मानतरधितमनोभवमम्ेगाः __ ^ _ - 





अरी सखी | तुम देविर्थकी बात क्या कड द्वीहय; 
इन गौरओको नदी देखतीं १ जव हमारे कृष्ण प्यारे 
अपने सुखसे बोँघुरीमे खर भरते ह भीर गौर्‌ उनका 
मधुर संगीत पुनती ई, तत्र ये अपने दोनो कानोके 
दोने सम्हाज्ल्तीर्दै-खडे कर्‌ ठेती हँ जीर मानो 
उनसे अमृतपी रदी, इस्त प्रकार उस पङ्गतका 
रस ऊने क्गती है| रेता क्यों होता है सखी १ अपने 
नेत्रोकि हारसे श्षयाभष्चुन्दरको इदयमे ले जाकर वे उन्हें 
वहीं विराजमान कर देती हँ ओर मन-दी-मन उनका 
आण्िद्िन करती दँ । देखती नह्य हो, उनके नेत्रसि 
आनन्दके ओं छल्कने र्गते है ओर उनके बख्डे, 
वचछ्डकी तो. दशा दही. निरा हो जाती है ! यदपि 
| थने अपने-आप दूध क्षरता रहता है, बे जव 
दूध पीते-पीते अचानक ही वंशीष्वनि सुनते है, तव 
धुम च्या हभ दूधका घूट न उगढ पाते है भर न 
निगक पाते है | उनके हदये भी होता है भगवानका 
संस्पशं ओर नेत्रोमे छककते होते दँ आनन्दके ओंस् । 
वे ्यो-केत्यों ठ्व्के रह जातेदहं॥ १३॥ अरी 
सखी ! गौरं ओर ब्छ्डे तो हमारी रकी वस्तु ह । 
उनकी बात तो जनेदहीदो। ब्ृन्दावन्के पर्षिर्थोको 
तुम नदी देखती हो १ उन्हं पक्षी कहना दही भूढ है । 
पतच पूरो तो उनमेसे अधिकारा बड़े-बड़े ऋषि-पुनिं 
हैँ । वे बृन्दावनके खुन्दर सुन्दर बृश्चोकी नयी ओर 
मनोहर कोपलबाढी डाच््योपर चुपचाप बैठ जाते हैँ 
ओर आँख बद नदीं करते, निर्चिमेष नयनोसे श्रीकृष्णकी 
रूप-माघधुरी तथा प्यारभरी चितवन देख-देखकर निद्या 
होते रहते दै तथा कानोसे अन्य सब प्रकारके शर््दोको 
छोडकर केवढ उन्हीकी मोहनी वाणी नौर वं्षीका 
त्रिमुवनमो्न सङ्गीत छुनते रते द । मेरी प्यारी सखी | 
उनका जीषन कितना घन्य है ! ॥ १४॥ 
अरी सखी ! देखता, गोओं नौर पक्षिर्योकी बात 
क्यो करती ह्यो १ वे तो चेतन है । इन जङ्‌ नदिर्थोको 


नही देखतीं १ इनमे जो भवर दीख रे है, उनसे ` 


इनके इदयमे स्यामसुन्दरसे मिल्नेकी तीतर आकाक्षाका 





० रि 








ह 1 । 


२६२ श्रीमद्भागवतं [ अं०२१ 


ऋ क कक क =-= व 
= ~~~ 


वकनच्कोनकाक को त चत = को = तक च 9 धि 1 7 च ५ ऋ क न = क (` 
"णि ॥ क श) ॥ ऋ (त "क 1 7 श 1 1 त 9 क जक न क व अ क 


आलिङ्गनसखगशितमभूमिश्जैथुरारे रक गया हे । इन्होने भी प्रेमखरूप श्रीकृष्णकी वंशी्वनिं 
| सुन ली है । देखो, देखो ! ये अपनी तरङ्खौके हारथोसे 


| उनके चरण पकड़कर कमर्के कएर्नका उपहार चदा 
हरि स , | रही हैँ ओर उनका आलिङ्गय कर दही हैँ; मानो उनके 
| गृह्णन्ति पाद्थुगल कमलोपहारः । १५}; | चरणोपट अपना हृदय ही निर कर्‌ दही है ॥१५॥ 
| | अरी पवी ! ये नदियां तो हमारी पध्वीकी;, हमारे 
| बरन्द्ावनकी वस्तुए ह; तनिक इन बाद्को भी देखो | 
| दष्टाऽऽतपे ब्रजपचून्‌ सह रामगोपैः जब वे देखते हैँ कि व्रजराजकुमार श्रीकृष्ण भर 
बठरामजी ग्वाट्वालोके साय धूपमें गौरं चरा रहे 

| ओर धाथ-साथ वाँदुरी भी वजात ा रहे हँ, तव उनके 

| र इृदयमे प्रेम उमड़ भाता है । वे उनके ऊपर मंड्राने 
| सज्चारयन्तमनु वेशुमुदोरयन्त्र्‌ । ट्गते हं ओर्‌ वे श्यामेन अपने स्वखा घनद्यामके 
| ऊपर भपने शरीरकं) दी छता बनाकर तान देते हैं| 
॑ इतना ही नदी, प्तखी | वे जव उनप्र्‌ नन्दी-नन्ही 
| म्रेमप्रश्द्ध उदितः इसमावलीभिः फुहियोकी वर्षां कएने द्गते हँ, तब रज्ञा जान पडता 
। | है कि वे उनके, उप्र छन्दर-घ्ुन्दर श्वेत दुभ चदा 
। 





तः " ति किकः =^ 


च द ` $ क ऋ १ "वु ॥ ५ "न + च 
म तिरि 


सख्यर्व्यधात्‌ स्ववपुषाम्बुद आतपत्रभ्‌॥। १६ ॥ | रदे & । नदी सखी, उनके वान वे तो अमना जीवन 
ही निखार कर दते हं ॥ १६ ॥ 
अरी भट | हभ ता उृन्दावनकी इन मंरनिर्योको 
ही धन्य ओर इतकृत्य मानती ह । रेस क्यों दी १ 
हस्य कि इनके इृदयमे बड़ा प्रेम ह । जब ये 
हमारे कृष्ण-प्यारेको देखती है, तव इनवे हृद यमे भी उनसे 
श्रीड्हमेन द यितास्तनभृण्डितेन ¦ मिल्नेकी तीतर भाकाक्षा जाग उन्ती है । इने हृदयमे भी 
॥ परेमकी व्याधि चग जाती ह । उप्त समय ये क्या उपाय करती 
है, य भी छन खो । हमारे प्रियतमकी प्रेयसी गोषियों 
८ अपने वक्षःखर्गोपर जो केसर च्णाती है, वह श्याम- 
तदश्चनसररुजस्वृणरूपितेन ुन्दरके चरणोमं ल्मी होती है ओर वे जव इन्दावनके 
घासु-पातपर चन्ते है, तन उन्मेभी चण जाती है। 
ये सोमाग्यवती भीलनिययां उन्दं उन तिनको परे छडाकर 
| जपने स्तनो ओर भुखोपर मन ठेती है जीर इस भ्रकार 
रिम्पन्त्य आननङ्कचेषु जहुस्तदाधिमर्‌ ॥ १७ | जपने हृदयवी प्रेम-पीङा शान्त करती है ॥ १७ ॥ 
| अरी गोपियो | यद गिरिराज गोवद्धंन तो भगवानूके 
 --3 ४ स ॑ भक्तोमें बहत ही श्रेष्ठ है । धन्य है इसके भाग्य | 
~ । (व देखती नद्वी हो, हमारे प्राणवछ्ठम शरीडष्ण शौर 
` इन्तायमद्विरबङ्ा हरिदासवर्यो नयनाभिराम नकरामके चरणकमर्गेका स्प प्राप्त कके 
~ ~~ ` | यद कितना भानन्दित रदता है । इसके भागयकी 
सराहना कौन करे { यद तो उन दोनोका-- षाव्नां 


पणाः पुन्य उरूगायपदान्जराग- 








# गः, = त त = = 
। 4 ~. ~ ल ४ 


। . द्‌ रामहृषणबरणस्प्भमोदः । 






क (न १ क 
नि +" 


कै 
7 १ 
111. 







~" क 
शक 








्र° २२ | दृश्चम्‌ स्कन्धं २६३३ 


9 जा जा काक 





ज ~ ज 


भः” मज = क चकः = = 
हि म 





| ` ~ आ 
भी भ ॥ ए 1" क का 


मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोयंत्‌ भौर गौर्भोका नड़ा वी पत्कार करता है । स्नान-पानके 
व्यि ्रर्नोका जढ देता है, गौभोके श्रिये सुन्दर हरी-हरी 

घाप प्रस्तुत करता है । विश्राम कनेके न्यि कन्दरा 

लल रहे ओर खानेके च्ि कन्द-मूक-फल देता है । बास्तव्मे यद 
पानीयक्यवसकनद्र$न्दमूरः ॥१८) धन्य है ¡ ॥ १८॥ अरी सखी ! इन सँगरगोरे किशोरते- 

कोतो गति ही निरी है। जव वे सिरपर्‌ नोवना 

गा गोपद्ैरल्वनं नयतोरूद्‌ार- ( दुहते सछषमय गायके पैर बवोँधनेकी रस्सी ) ग्पेटकर्‌ 
ओर कंर्धोपर्‌ फंदा ( भागनेवाटी गार्योक्षो पकढनेकी 

रस्सी ) रखकर गार्योको एक वनसे दूसरे वनम शँककर 

+ ठे जाते है, साथमे बाब्वाठ भी होते है ओर मधुर- 

वेणुखनं; करपदेस्तसुभत्छु सख्यः। | मधुर संगीत गातेह र बाँष्ुधीको तान छेडते हँ, उस समय 
मनुष्योंकी तो बात ही क्या, न्य दारीरधारि्योमे 
भी चज्नेवाले चेतन पञ्चु-पक्षी ओर जड नदी आदि 
तो स्थिर हो जते है तथा अचञ-वृक्षोको भी रोमाञ्च 
हो आता है । जादूभरी वंश्षीका ओर क्या चमत्कार 


निर्योगपाजषकृवरक्षणयोविचित्रस्‌ ।१९। | उनाञ ! ॥ ९९ ॥ 





अस्पन्दन्‌ गतिमतां पुलकस्तरूणां 


एक नही, अनेक टीला हँ } गोपिर्यो प्रतिदिन आपसे 
। उनका वर्णेन करतीं ओर तन्भय ह्यो जातीं । भगवान्‌की 

0 च क ० ९4 † 
चणंयन्त्यो मिथो गोप्यः क्रीडास्तन्भयतां युः | २० , टी उनके हृदयमें स्फुरित होने लगती ॥ २० ॥ 


इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्कन्वे पूर्वार्धे 


एवषिधा भशवतो या बन्दावनचारिणः। | परीक्षित्‌ ! बन्दावनविहारी श्रीकृष्णकी रेसी-रेसी 
| 
| 


वेणुगीतं नामेकविचोऽध्यायः ॥ २१ ॥ 


" "य-द 


अथ ाविशोऽध्यायः 
चीरहरण 
श्रीक उवाच धी कदेवजी कते दै- परीक्षित्‌ ! अव मन्त 
< ऋतु आयी । उसके पहले ही महीनेमे अर्थात्‌ मागं शीषे 


नन्दव।बाके त्रजकी कुपारियां कात्यायनी देवीकी प्रजा 

हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दवजङ्मारिश्याः । ध ६ 
7 र व्रत करने ल्गीं। वे केवल हविष्यान्न दी खाती 
चेरुह ष्यं अज्ञाना; कारायन्यवेन्रतम्‌ ।॥ १ ॥ | थी ॥ १ ॥ राजन्‌ ! वे कुमारी कन्याप॑पूवं दिश्ाका 


आष्टुस्याम्भसि कारिन्या जसन्ते चोदितेऽरुणे 1 | क्षितिज त्मक दोते-शोते यमुनाजन्मे स्नान कर छती 
कृस्ा प्रतिद्धषि देषीमानर्चुरष सकतीम्‌ 11 २॥) | भोर तटपर ही देवीकी बाठुकामथी मति बनाकर 
१. वृर्दावस्‌क्रीडायामेक° । * 


+ 3 तीः 4 
५" (८ ~ + गकााप 





॥ ॥ 
ए र, 
५.» क 
क 


¢> 2 | 
"नक दः + १२ 
रै र ~ श 





२8६४ 





गन्धेमार्येः सुरभिभिवकिभिरपुपदीपङैः । 


उच्ाचवेश्ोपहारेः प्रवारुफरतण्डुङैः \। ३॥ 


कात्यायनि सहामाये सहायोनिन्यधीश्वरि | 


नन्दगोपसुतं देवि पतिं मेङ्रु ते नमः, 





इति मन्त्र जयन्त्यस्ताः पूजां चक्र! कुमारिकाः) ४ ॥, 


एवं मासं व्रतं चेः कुमार्यः इष्णचेदघः | 
॥ वार © © 
| भद्रक समानचुभूयान्नन्दसुतः पतिः \। ५॥। 
| उषस्युत्थाय गोत्रैः स्वेरन्योन्याबद्धमाहवः । 


ती 


कृष्णघच्चेजंयु्यान्त्यः कालिन्धां लातुमन्वहम्‌॥।६।; 


कः 


कन ऋ = ज ॥ क का ^ 
= 9 कोनो = । त भ अकः आ क + = = = ~ 
नको ऋक" = च वि ~ 9 


नद्यां कदाचिदागत्य तीरे निशषिप्य पूर्ववत्‌ । 


ज कक + ऋ 





वाक्वांसि व्णं गाशन्त्यो बिलः सिरे यद्‌ा।\ ७॥ 
 भग्वांस्तदभिप्रेत्य कृष्णो योगेश्वरेश्वरः । 


वयस्येराघ्रबसत्र गतस्तत्कम॑िद्धये ॥ ८ ॥ 


तासां वारसस्वुपादाय नीपद्षारुद्य सत्वरः । 


हसद्धिः प्रहसन्‌ बारे; परिहासयुगच ह ॥ ९॥ 
अत्रागत्याबलाःकामं स्वं स्वं वासः प्रगृद्यताम्‌ । 


ज्यं माभि नो नमं यद्‌ यूयं वबकंिबा; १० 


१) 
॥ 


॥ 
[क - 
क्षी" 4 
"अ 
१ 
9. 
् - 
व्क १ 
॥ 1 
११ 


ज 
1 दद 
१ हि 

हि 
ह * वि 
| सि : 

चनं , 
। 





४4 


वि , 
१ क अ * 
4 ४, । - नै १ 
 # ~ † 3 केर 


भीमद्कागचत 





| अ० २२ 


[मणी 











पगन्धित चन्दन, छ्रके हार; ंति-ोतिके नेवेय; 
धूप-दीप, छोरी-बडी मटकी क्षामग्री, पल्य्व, फर धीर्‌ 
चावल आदिते उनकी पूजा करतीं ॥ २-३ ॥ साथ दी 
¢है कात्यायनी ! हे महामाये ! हे मह्ायोगिनी । हे ्ठबकी 
एकमात्र खाभरिनी ! आप नन्दनन्दन श्रीङ्ष्णको हमारा 
पति वना दीजिये ¦ देवि ¡ हम भापके चरणौमे नमस्कार 
करती है |: स सन्नरका जप करती इई दे कुमासियिं 
देवीकी आराधना करतीं | ४। इद प्रकार उन बुमा्ि- 
ने; जिनका मन श्रीकृष्णपर निछावर हो चुकता था) इ 
पकल्पके साथ एकत मष्रीनेतक् भद्रकारीरी भली्माति 
पूजा की कि नन्दनन्दन ध्यासघ्नुन्दर ही हमारे पति 
ह" | ५॥ वे प्रतिदिन उषाकाव्मे दही नाम ठे. 
लेकर एकः-दृष्षरी सखीकषो पुकार स्तं भौर परस्पर 
हाथमे हाय डालकर ऊंचे खर्ये यगवान्‌ श्रीकृष्णकी 
त्म तथा नामोँका गान करती इई युना जलमें स्नान 
करनेके व्यि जातीं | ६ ॥ 

एक दिन सब कुपारियेनि प्रतिदिन क भति यमुनाजी- 
के तटपर जाकर्‌ अपमे-अपने वञ्च तार दिये भर 
भगवान्‌ श्रीक्रष्णके गु्गोका गान दृरती हई वड़े आनन्द्‌- 
से जलक्रीडा करने लगीं | ७ ॥ परीक्षित्‌ | भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण सनकादि योगियों ओर शंकर आदि योगेद्रोके 
भी ईर है । उनसे गोपियांकी ्मिलाषा छिपी न रदी। 
वे छनका अभिभ्राय जानकर अपने सखा ग्वाठ्बालकिः साथ 
उन कुमार्िर्योकी साधनां सफल करनेके टिपर यमुना- 
तटपर गये ॥ ८ ॥ उन्न धकेठे ही उन गोपियोके 
सारे वज्ञ छठा ग्मि भौर बी फु्तीसे ने एक कदम्बके 
बरक्षपर चढ़ गये । साथी नाग्नाक ठठा-ठटाकर इंखने 
ठगो ओर खयं श्रीकृष्ण मी हं ते इए गोपियोसे हंसीकी 
वात कहने ल्मे ॥ ९ ॥ “अरी कुपारियो ! त॒म यहं 
भाकर इच्छा हो, तो अपने-अपने वख ठे जाभो। में 
तुमलगोसे सच्च कहता द्व । हंसी विच्वुर नहीं 
करता | तुमंकोग त्रत करते-करते दुबली हो गयी हो ॥१०॥ 


ये मेरे छखा'ग्बाक्नाक जानते हैँ कि भने कभी "को 
टी बात. नही. कदी है । छन्दप्यो । तम्दारी रच्छा 
हो तो अल्ग-अव्ण आकर भपने-अपने वज्ञ टे ठो 


| सन एक साय दही भोभो । युञ्चे इसमे `को भपित्ति 
सुमभ्यमाः ॥११॥ । नदी दैः ॥ ११॥ 


# श 
५4 न, 
नः न 
| य ॥) 
+ 
ऋ, ५ » रि" ङ ॐ ४ + 
र र, # = क श क = 
१.४ । ऋ र. च 
[1 | र = ८ 


व 





[1 


| अ०२२] दश्चम्‌ स्कन्ध २६५ 












तस्य तत्‌ क्ष्वेलितं दष्टा गोप्यः प्रेमपरिष्ठताः। भगवान्‌की यह हैसी-मसखरी देखकर गोपिर्योका 
< हदय प्रेमसे सराबोर्‌ हो गया । वे तनिक सकुचाकर एकं 

वी {डित्‌ ब्रह्य चान्योन्यं जाता न नियुः। ९२1 | दृसशीकी ओर देखने र मुसकराने च्गी । जन्ये 
वाहर नहीं निकटीं ॥ १२॥ जव सगवानने हंसी-हंसीे 
यह्‌ वात की, तवर उनके चिनोदसे कुमार््यका चित्त 
शौर भी उनकी ओर खच गया । वे ठंडे पानीमें कण्ठ- 
आकण्डसग्नाः शीताोदै वे१सानास्तमघ्वयन्‌ \) १३२} | तक वी इई थीं थौर उनकः रौर थर-यर कध रहा 
| या । उन होने श्रीकृष्णसे कह] १३॥ ध््यारे श्रीकृष्ण । 

मानयं श कृथास्त्वां तु नन्दगोपश्ुतं भ्रियस्‌ । त॒म देसी अनीति मत करो । हम जानती ह किं तुम 
नन्द्नाबाके खाड्टे रट हो | इमारे प्यारे दो | सारे 

जानीमोऽधव्रजश्वाष्य देहि वांसि देपिडाः\\ ९४ | वनभ्सी तुम्हारी सराहना करते रहते दै । देषो, हम नाड 
। के मारे ट्टुर र्दी है तुम हमें हमारे व्र दे दो ॥१५४॥ 

प्यारे दयामघुन्दर हम तुम्हारी दाी हैँ । तुम जो कुछ 
कहोगे, उसे हम करनेको तैयार हैँ । तुम तो धम्का 
ममे मटीर्भाति जान्ते हो । हमें कष्ट मत दो । हमारे 
वख हमे दे दो, नहीं तो हम जाकर नन्दबावासने कह 


एवं जुति गोविन्दे नसेणाऽऽधिप्रचेतसः । 


+ 


दणामयुः्दर ते द्यः करवाम तथोदिदम्‌ । 


(8 हि 

च; 

+ 2 
1 


= 


~= ~-~----- -~ -~- 1 


चासं ध्ज्ञं नो चैद्‌ राज्ञे वामहे \१९५॥ 


& देणो' ॥ १५ ॥! 
श्रीभगवानुदाच भगवान्‌ श्रीक्ष्णने कहा--कुमारियो ! ट्म्हारी 
५ =^ _ पव्छान पवि आर मप्र से भ्र दे जत्र तुम 
भधत्यो यदि ञे दाखो पयोत्तं दा दरियिथ । मु्ठकान पवित्रता ओर प्रेमे मर &ै । देखो, जव तु 


अपनेको मेरी दास्षी खीकार करी हो भौर मेरी आज्ञा- 

अद्गःगस्य खवासांसि प्रतीच्छन्तु शुयिखिदा)\६६॥ | का पान करना चाहती हो, तो यह आकर अपने- ` 
अपनेक्खलेखो | १६॥ पर्क्षित्‌ ! वे कुमारियों 
ठंडसे ट्ट रदी थ, कोप रदी थीं । मगवानकती रेसी 
वात सुनकर वे अपने दोनों हाथोसे गुप्त अङ्खोको छिपा 
कर्‌ यमुनाजीसे बाहर निकी । उस समय ठंड उन्हें 
& बहुत ही षता रदी थी ॥१७]॥। उनके इस शुद्ध भावसे 

भगवानाहता वीक्ष्य ॒श्ुदधभावप्रसादितः । भवान्‌ नात न 
स्कन्धे निधाय वांसि ग्रीतः प्रोवाच सखितम्‌। १८। | देखकर उन्दोनि गे'पिर्योके व्र अपने कंचेपर रख व्यि 
ओर बड़ी प्रसनतासे मुसकरवे इए बोठे-॥ १८ ॥ 


ततौ जलाल्षखात्‌ सवां दारिकः शीतचेपिषः | 


पाणिभ्यां योनिमाच्छाच प्रोचेङः रीतकशिताः।१७) 


युयं विवद्धा यदषो धृतव्रता ८अरी पियो ! तुमने जो त्रत च्या था, उसे अच्छी 

७ तरह निभाया है- इसमे संदेह नही । परंतु इस्‌ 

व्यगहतेतत्तदु देवहेरनम्‌ । अवस्थामे वच्लहीन होकर तुमने जग्मे स्नान किया दै, 

८ | इससे तो जल्के अधिष्ठातृदेवता वरुणका तथा यमुनाजी- 
 बद्भ्वाज्ञरिं मू््यपुत्त्येऽहस ४ का अपराध इजा है । अतः अब इस दोषकी शान्तिके 
चये तुम अपने हाथ जोडकर धिरसे खगा ओर उन्हे 


तवा नमोऽधो वसनं प्रगृह्यताम्‌ ॥।१९। | छककर प्रणाम करो, तदनन्तर अपने-अपने वज्ञ ठे 











॥8 २९३ श्रीमद्धाशबव [ अ०२२ 
। । = -------------------------------------------------------------- 
| | हत्यच्युतेनाभिहिक्ा व्रजाबला जाभोः ॥ १९ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णकी बात सुनकर इनं 
| बरजकुमारियानि रेसा ही मक्षा कि वास्तवे वहीन 
8 | मत्वा विधल्ञाष्वनं व्रदच्युतिड्‌ । होकर स्नान करनेसषे हमारे तरतमे तरटि आ गयी | शत्‌; 
। 9 ति फरण उसकी निर्वि्न पृतिढेः लिये उन्होने छपस्तं कसेडि सक्षी 
| ततत्‌" त क्रम्‌ मणां श्रीकुष्णको नमस्कार किया } सथोकिं उन्हे नमस्कार 
ह | करनेसे ही साप बुग्ों ओर अपराधो माजन हो 
| शाक्षात्छत नेष्ुरवयस्म्‌ यवः ५ ६ 
|| धवलम्‌ यतः ॥९०॥ | जाता है २०१ जन यक्ोदानन्दन गवार श्रीकरष्णने 
ह | वि ख व-की-सव कमारो सेरी आङ्गके 
{| तास्तथावनता दष्ट भगवान्‌ देषशचीसुतः। = | रा क सर व-सव म भत आक अदु 
¢ | णाम कर रही है, तलं वे चदरुत हीं प्रद्न्नं हुए ¦ उनके 
| वासांसि ताभ्यः प्रायच्छत्‌ रूणस्तेन सीषित॥२१।) | हयम रणा उपड आरी ०९ उट उक डद 
॥ दिये॥२१॥ रिय परीक्षित्‌ ! श्रीदष्णने कुमास्यिंसि 
॥ | द्दं॑प्रलन्धाह्णपया च हापिता हछभरी वातं कीं, उनका च्जा-संदच चछया, हंसी 
¢: । द्री ओर उह कठपुतचिग्णेमे मान स चाया, यृहौँतक 
8. । ५ ्रीडन कि ( 
॥- | प्रस्तोभिता। दच कारिताः, कि उनके वद्धतक्‌ हर ल्य ¦ प्रं भी वे उनसे रुष्ट 
णि > नही इई; उनकी इन चे्ाओंखो टो यदीं माना, वक्ति 
चन्न चतब्रह्तान्यधाप्यडु अपने प्रिथतभके सङ्गे वे ओर भी प्रद्नन इई ॥२२॥ 


परीष्ठित्‌ ! गोपियोने क्पने-अपने घ पहन व्ये | परतु 
श्रीकृष्णने उनके चिचक शस प्र अपने वदाम कर 


शा 


परिधाय खवाशांसि प्रष्ठसङ्गमखन्जिताः | एका था कि च वहसि एक पग॒भी न चरस 
अपने दियतमवे द्वमगपकै लने छलजकरं वे उन्हीकी 


गृहीतचित्ता नो चेठस्तसिमि छज्जञायितेक्षणाः।। ३३॥ | ओर चजीटी चितप्नये िहःर्दी र ॥ २३ ॥ 


ता नाम्यद्यन्‌ प्रियशङ्कनिध्॑ताः !\ २२} 


















तासां विज्ञाय भगवान्‌ खषादस्पशंङास्थया । भगवान्‌ श्रीकृष्णने देखा किः उन कुपाल्ततिने उनके 
। | चरणकमटेकि स्प्रकी कापनासे ही त्रत धारण क्रिया 
धतव्रतानां संकल्पमराह दभोदरोऽब्रखाः ।२४॥ | है ओर उनके जीवनक यी एकाणत्न संकल्प है । तव 
गोपियोक्ने प्रेगके अधीन होकर उखल्तकमें बृ जानेवाले 
भगक्ानूने उनसे कहा---}} २४ } "सेरी परम प्रेयपी 
कुमाशियो ! में वशा यह कर्प लता इं कि तुम 
मेरी पूजा करना चाहती हये । मै तुम्हारी इस अमिव्यषा- 
क। अनुभोदन करता ट, वम्हारा यष संकर सस्य होगा| 
तुम मेरी पूजा कर ॒सकोगी ॥ २५ ॥ जिन्होने अपना 
2. तधि 6 4 मन ओर श्राण सन्ने मपित क्र रक्खा है, उनकी 
.." ^ कटपते | कामनाएं उन्दे सांसारिक भोगोंकी ओर र जानेमे समं 
| त नदी होती, टीक वैसे ही, जसे शुने या उवाले हए बीज = 
| ९ ध तै।॥२६।। | फिर अंसके ख्पमे उगनेके योगर नहीं रह जाते॥२६॥ 


नक्र" ++ + ^ 


व 










-- 2 , ~> 


~ 3 


१३ ह~" ~ 


ब 


` जाननेका सोष्‌ग्य वहत धड़े कर्मके होता हं । जिस प्रकार भगवान्‌ चिन्मय ह, उसी प्रकार उनकी टीव मी 


था | वे यदी जपती रहती थीं कि एकमात्र नन्दनन्दन द्वी हमारे प्राभोके सामी ष | श्री 


अ० २२|| दशमं स्कन्धं = ` श्व 


१) 
कारक ऊक ~ ह: > ४ 


ॐ = कनकः क 







































जक = कक = 


| 9 छ ऋषि ~ अथेमा = ग्नि 
यातादरा तलं शिद्धा सयेमा रख्यथ शकाः । दसिषे कुमारियो ! अव तुम अपने-भप्रने घर गट जाओ। ` 
तुम्हारी साधना सिद्ध हौ गयी है । तुम आनेवादटी शरद्‌ 
ऋतुकी रात्रिधामे मेरे साथ विहार करेगी । सतियो । 
इस! उदृदेरधसे तो तुमटोशनि यद व्रत भौर काल्यायनी 
यदुदिर्थ व्रतमिदं चैररायोचनं तीः ॥२७॥। | देधीकी प्रजा की थी । # ॥ २७ ॥ 





% चीर हरणकै प्रस्गको ठेकर कई तर्ही शङ्कां दी जाती हैँ, अतएव इख सम्बन्धे कुछ विचार 
करना आवद्धक हे | बाह्लतव्रपं बात यह है कि सच्चिद्रानन्दवन भतवान्‌क्ती दिव्य मधुर रदनयी टीलार्ओंका रदस्य 


चिन्मयी ही होती है | सच्चिदानन्द रसखमय-घान्रज्यके जि परमोनत स्तरमं यह लीखा हआ करती है, उसकी 
रेकी विलक्षणता है कि कदं वार्‌ तो ज्ञान-गिज्ञान्वरूप विद्ध चेतन परप ब्रह्मम भी उस्तका प्राकव्य न्यं होता 
ओर दीवि त्रह्य-साक्षातव्कारको प्राह महात्मा जोग भी इस टीका-रसक्रा समाह्लादन नहीं कर पाते | भगवानूक्ी 
इस परपोञ्ञ्धं दिव्य-रस-लं सक्त यश्राथ पकार तो मगवान्‌क्ी खरूपभूता दिनी राक्ति निष्यनिद्घुज्जेश्चरी 
श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीयधाजी ओर्‌ तद ङ्गभूता प्रेममयी गोपियके ही इदम होता है ओर वे दी निर्रण होकर 
सगवान्‌की इक परम अन्दरङ्ग रसमयी लीलका प्माल्ञादन करती है । 1 

यो तो भग्ठानक्ते जन्म-क्॑की समी ठीनादं दिष्य होती है, परंतु त्रजकी टीला, त्रनमे निकङ्ञ्ञटीला ॥ 
ओर निङ्ुञ्नपं भी रद्वःखी गौपियोके साथ होनेवाटी मधुर लीला तो दिव्यातिदिव्य ओर सवगुद्यतम दै । 
यह टीला सवंसःवरणके सम्घुख प्रकट नहीं है, अन्तरङ्गं ठीला ह ओर इसमे प्रवेरका अधिकार केवल श्रीगोषी- 
जनोको दी हं । अस्तु, | 

दशम्‌ स्वन्धकरे इकीक्षवरे अध्यायमे रेस्ा वणेन आया है कि भगवान्‌की रूपमाघुरी, वंदीष्वनि ओर 
रममयी ठ लरप देख सुनकर गोपियों सु हो गयी । वाईस अव्यायमें उसी प्रेमकी प्रणता प्राप्त करनेके व्यि वे 
साधनपरं खा गयी है } इसी अघ्यायमें मगवान्‌ने आकर उनकी साधना पूणे की है ¦ यही चीर-हरणका प्रसंग है। 

गोपि क्या चाहती थी) यह बात उनकी साधनासे स्ट है | वे चादती थी--श्रीडृष्णके प्रतिप्रणं ^ 
आत्मसमर्पण, श्रीकरष्णक्रे साथ इष्त प्रकार बुल-मिक जाना किं उनका रोम-रोम, मन-प्राण, सम्पूणं आत्ना ` ` 
केवल श्रीकृष्णमय हो जाय | शश्त्-काल्में उन्होने श्रीङृष्णकी वंशीष्वेनिङी चचां अपसम की थी, हेशन्तके पहले 
ही महीने अर्थात्‌ मगवानूके विभूतिखखूप मार्गीर्षमे उनकी साधन। प्रारम्भं ह्यो गयी । विल्व उनके व्यि 
थस्य था । जड़क्तं दिनमं वे प्रातःकाल दही यघुना-स्नानक्षे व्यि जाती, उन्दं शारीरकी परवा नदीं धो , बहइत-सी 
कुमारी ग्ाल्निं एक साथ ही जातीं, उनमें ईष्या-देष नहीं थी । वे ऊंचे खरसे श्रीकरष्णका नाम्रकीतन करती इई ¦ च 
जाती, उन्हं गोव ओर जातिवरार्लोका भय नहीं था ] वे घरमे मी हविष्यान्नका ही भोजन करतीं, वे श्रीकृष्णके ` 
लिये इतनी व्याङ्क हौ गथी थीं किं उन्वं माता-पितातकका संकोच नहीं था । वे विधिप्ूवंक दीक बाटकाभयी 
मूरति बनाकर पूजा ओर मन््र-जप करती धी । अपने इस कार्यको सर्वया उचित ओर प्रशस्त मानती थीं । 
वाक्यमें-- उन्होने अपना बु, पखिर, ध्म, संकोच ओर व्यक्तित्व भगवान्‌के चरणेमिं सवे समर्पण क्‌ कर्‌ स द्या 


@ 
भ 
~ 





खामी ये ही । परंतु ठीकाकी दृषटिसे उनके सम्ैणमे थोड़ी कमी थी । वे निरावरण्पसे श्री श्रीकृष्णके घ मने नह 
ा रद्यी थी, उनमें थोड़ी क्ि्चक थी; उनकी यदी श्ञिञ्चक दूर्‌ करनेके चयि --उनकी साधना, उनका समपेण 


पूण ६ वरण सङ्ग कर्‌ देनेकी आवश्यकता थी, उनका हं ५ आं वरणं हर छेना जर्रो 


ग्ध ् +--*4 ~ जः, ज 
चै ¢ ह र ७ ॥ +) ह. १ = क. {04 कः, ऋ कै क ,£ ८६ = ० 8 # + 
क, + 

न 1 >= $ 2 ४ ह वक 


^" =) 


५ + ~ > {ः 
च नि , 




























२६८ | श्रीमद्भागधतं | अ० २२ 


[पिरि ॥ 
भो दाय ज. 9 = चक आ कि ` "चते = कक = दो ज उकः "२ क्क ` कः जकः आकः 1 1 1.11 


१ 3. ¡ए ° 17 1 भि = ति शि ज भि जः त ज को त जो 9 भजा क जा क == च जः + ऋआ कोच की शणो त क, कका [व ^) १ 1 











था ओर यही काम भगवान्‌ श्रीकृष्णने किथा । इसीके ्यि वे योगेश्वरेके ईशर मगान्‌ अपने पित्र घास्वालेक 
साथ यपुनातटपर पधारे थे । 
साधक अपनी शक्तिसे, अपने बर शौर सकल्पसे केवल अपने निश्वयसे पूर्णं सम्पण नही कर सक्ता । 
सम्पण भी एक क्रिया है ओर उसका करनेषाख अर्पित ही रइ जाता है । देप धितिमें अन्तरात्माका प्र 
समपण तव्र होता हे, जन श्गवान्‌ खयं आकर वह संक्प खीकार्‌ करते हैँ लोर संकल्प करनेवाटेको भी खीकार 
करते हे । यहीं जाकर सम्पण प्रण होता है । साधक्रका कतभ्य है- पूणं स्पणक्गी तैवारी। उसे प्रण तो 
भगवान्‌ ही करते हें । 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण यो ते ठीखापुरुषोत्तय &; फिर भी जब अपनी टीट प्रङट क्रते हैँ तव मर्यादाका 
उल्टद्कन नहीं करते, स्थापना ही करते हँ । परिधिका अतिक्रपण करके कोई साधनके मार्ग अग्रसर नहीं हयो 
सकता । परतु हृदयकी निष्कपटता, सचाईं ओर स्वा प्रेम विधिके अतिक्रमगको भी शिथिल कर देता है । 
गोपि्यो श्रीकृष्णको प्राप्त करनके च्य जो साधना कर रदी थी, उसमें एक इटि थी । वे चास्र-सर्यादा ओर 
परम्परागत सनातन मयादाका उद्लच्खन करके नग्न स्नान करती थीं | यथपि उनकी यह्‌ क्रिया अज्ञानपूवकं ही थी 
तथ।पि भगवानके द्वारा इसका माजन होना आवद्यक था ¦ मगवाननें गोपिर्यासे इसका प्रायधित्त भी कराया | 
। जो खोग भगवान्‌के प्रेमके नामपर विधिका उस्टङ्खन करते है, उन्हें यह प्रपङ्घं ध्यानसे पना चाहिये ओर भगवान्‌ 
। राखत्िधिका कितना अ।दर करते हँ, यह देखन। चाहिये । 
वेधी भक्तिका पयवक्षान रागालिका भक्तिमें है ओर रागान्िका भक्ति पूण सम ृणकते ख्यमं परिणत हो 
जाती है । गोपियोने वेधी भक्तिका अनुष्ठान किया, उनका हृदथ तो रागासिका भक्लिसे सरा इं था ही; अव 
पूणं समपेण्‌ होना चाहिये । चीरहरणके द।रा वी काय सम्पन्न होता है 
गोपिर्योने जिनके ल्य लेक-परलेक, खाथ-परमार्थ, जाति-कुक, पुर जन-परिजन ओर गुखजनोकी पखा 
नहं की, जिनकी श्राप्िके च्वि ही उनका यह महान्‌ अनुष्ठान है, जिनके चरणोमे उन्होने अपना स्वल 
निछात्रर कर रखा है, जिनसे निरावरण मिलनकी ही एकमात्र अभिकाषा है, उन्डीं निरावरण रक्तमण मगवान्‌ 
श्रीकृष्णके सामने वे निरात्ररण माव्से न जा सकं--्या यह उनकी साधनाकी अपूर्ण॑ता नहीं है ? है, अत्रश्य 
है ओर यह समश्रकर ही गो पियो निरावरणरूपसे उनके तसाभने गयीं । 
श्रीङ्ृष्ण चराचर प्रकृतिके एकमात्र अधीश्वर हे; समस्त क्रियाअकि कर्ता, मोक्ता ओर साक्षी भी वही है। 
, देसा एक भीन्यक्त या अव्यक्त पदां नही है, जो बिना किसी परदेके उनके सामने न हो । वही सर्वव्यापक, 
अन्तर्यामी है | गोपियोके, गोपोके ओर निखिर विश्वके वही आत्मा हैँ । उन्दं खामी, गुर, पिता, माता, सला, 
पति आदिके ख्ये मानकर ॐोग उन्हीकी उपासना करते ह । गोपियोँ उन्ही भगवान्‌को जान-नृक्षकर कि यही 
=: भगवान्‌ दै यदी योगेशवरेर, क्षराक्षरातीत पुरुषोत्तम है पतिक रूपमे प्राप्त करना चाहती यीं । श्रीमद्भागवत 
` ` के ददाम स्कत्धका श्रदवाभावसे पाठ कर जानेपर यह॒ वात बहृत ही स्पष्ट हो जाती है किं गोपियों श्ीकृष्णके 
` वास्तविक खख्यको जानती थी, पहचानती थीं । वेणुगीत; गोपीगीत, युगच्णीत ओर श्रीक्ृष्णके अन्तर्धान हो 
जनेपर गोपियोके अन्वेषणमे यद बात कोई भी देख-घुन-समश्च सकता है । जो रोग मणवानूको भगवान्‌ मानते 
। £, उनसे सम्बन्ध रखते ई, खामी-खुद्‌ आदिके रूपमे चन्दे मानते ई, उनके हदयमें गोपियोके इस गेकोत्तर 
(क ४ ५ ह. सम्बन्ध ओर उसकी साधनाके प्रति शद्धा ही कंसे हो सकती है ! 
` गोपि्योकी इस दिव्य टीका जीवन उच्च श्रेणीके साधकके व्यि आदं जीवन है | श्रीकृष्ण जीवके 
प्राप्तव्य साक्षात्‌ परमात्मा ह । हमारी बुद्धिः इमारी दृष्टि देहतक ्ी सीमित हे । इसथ्यि इम श्रीकृष्ण 4 | २ 


ग्य 
के ए 
न सा [4 1 ४३ + १ > " ङ 
क , ९ + नक + कु > प 1 ~~ क च, २ श्ट 
+ न र ^ # ~ ~ द क - 9 ४1 च । । 
। ज ष ं ऋ ् "च 2 क $ ~ ह >) । हि । ष्व कन 
। पके 9 ` - ~ ~ 277 1 न्क = 
= भि ४ ॥ ^ =+, च (ै-+- " ^ -4 


र णी ॥ 


व -) ~ 2 1 1१ (+ + 3 ^ & 
4 7 +< च शः ४: 


र 
४५ 
> 
॥ 












का ^. "9 ~ 
“ ">. 5१ ४ 
+. चककि च 
„ ° पण 
1 


एका 








(थ) क 


ई तः (4 र #+ . 





अ० २२ | दन्तम्‌ स्कन्धं भ २६९ 


जः भः ` जिन 











ऋ भे कोः हि 





ओर गोपिपके प्रमको भी कैत्रक दहिक तथा कापनाकटुषित समञ्च वरैटते है । उस अपार्धितर ओर अप्राक्रत ठील- 
को इस प्रक्रतिके राञ्यमें घक्षीट खाना हमारी स्थुल बा्तनार्भोका हानिकर प्ररिणाम ह । जीव्रका मन भोगाभिमुख 
वा्तनाओंसे ओर तमेगुणी प्र्ृ्तियोँसे अभिभूत रदता है । वह विषरयोे ही इधर-से-उधर भटकता रहता है ओर 
अनेकों प्रकारॐ रोग-रोकसे आक्रान्त रहता है । जवर कधी पुण्यकर्मोकि फ उदय होनेपर्‌ मगवान्‌की अचिन्ध्य 
अहैतुकी कृपासे विचारका उदय होता है, तन जीवर दुःखञ्वाखासे त्राण पनेके श्यि ओर अपने प्राणोंको शान्ति- 
मय धामे पर्टचानेकते व्यि उत्सुक ह उव्ता हँ | बह मणवान्‌के कीलखाधा्पोंकी यात्रा करता है, सद्ग प्रप्त 
करता है ओर उसके हृदथकी छटपदी उश्च आकांश्षाो केकर, जो अन्तक सुक्त थी, जगकर बडे वेगसे परमात्ा- 
की ओर्‌ चर पडती है । चिरकार्से त्रिष्योका ही अभ्याक्ष होनेके कारण वीच-बीचरमे विषयोके स्कार उत्ते 
सताते हं ओर वार्‌-वार्‌ विक्षेपोका सामना करना पडता है । परतु भगवरानूकी प्राना, कीतन, स्मरण, चिन्तन- 
करते-करते चित्त सरस होने लगता है ओर धीरे-धीरे उसे भगव्रान्‌की सन्निधिका अनुभव भी होने खता दहै। 
योडा-सा रसका अनुभव कोते ही चित्त बडे बेगसे अन्तरदशामे प्रवेश कर जाता दै ओर भगवान्‌ मागेदर्घ॑कके ख्ये 
संसार-क्ागरसे पार टे जानेवाठी नावप केवटके रूपे अथवा योँ कद किं साक्षात्‌ चितस्लरूप गुरुदेके खपे 
प्रकट हो जते हैँ | दीक उषी क्षण अमाव, अपूणेता ओर सीमाका बन्धन न्ट हो जाता है, विद्र आनन्द--- 
विश्चद्ध ज्ञानकी अचुभूति इने क्गती दहं | 
गोपिर्या, जो अभी-अभी साधनसिद्ध होकर भगवानकी अन्तरङ्ग लीरमें म्रत्रिष्ट होनेवाटी है, चिरकाख्से 
श्रीकृष्णे प्रणमे अपने प्राण मिला देनेके व्यि उत्कण्ठ ह; सिदिकामके समीप पंच चुकी हैँ अथत्रा जो 
नित्यसिद्धा होनेर भी भगवान्‌ङी इच्छके अनुष्ठार उनक्ी दिव्य टीमें सहयोग प्रदान कर रही ई, उनके 
यके मस्त भावोंके एकान्त ज्ञाता श्रीकृष्ण वाश बजाकर उन्हं आक्रष्ट करते हैँ ओर जो कु उनके हरयमे 
वचे-युचे पुराने संस्कार है, मानो उन्हं धो डाल्नेके व्यि साधनामे च्गाते हैँ | उनकी कितनी दया है, बे अपने 
्रमिर्योसि कितना प्रेण करते हँ-- यक्ष सोचकर चित्त मुग्ध हो जाता है; गदूगद हो जाता है | 
श्रीकृष्ण गोपियकि कोके सपमे उनके समस्त संस्कारोके भावरण अपने हाथमे लेकर पास दी कदम्बक 
क्षपर चढ़कर वेऽ गये । गोपियाँ जलम थीं, वे जल्में स॒वन्यापक सवेदा मगवान्‌ श्रीकृष्णसे मानो अप्रनेको गुप्त 
सञ्च रही यीं--तर मानो इस तच्छको भू गयी यीं कि श्रीकृष्ण जलम ही नहीं है खयं जलघलख्प मी वहो ह । 
उनके पुरानं संस्कार श्रीकृष्णे सम्पुख जानेमे बाधक हो रषे थे; वे श्रीकृष्णके च्य सब कुछ भू गयी थीं; 
परंतु वतक अपनेको नहीं भूटी थीं । वे चाहती थीं केवल श्रीकृष्णको, परंतु उनके संस्कार बीचमें एक परदा 
रखना चाहते थे । प्रेम प्रेमी नौर त्रियतमके बीचमें एकं पुधका भी परदा नहीं रखना चाहता । प्रेपकी प्रक्रति 
है स॒वेथा व्यतेधानरहित, अबाध ओर अनन्त मिलन । ज्हतक अपना सर्वख- इसका विततार चाहे जितना 
हो- प्रेमी ज्वालमें मस्म नहीं कर दिया जाता, वहंतक् ब्रेम लर समर्पण दोनो दी अग्रणं रहते है । इसी 
अपूर्णताको दूर करते हए, छम मावे प्रसन हए' ( छ॒द्धमावप्रसादितः ) श्रीकृष्णने कहा क्रि सुञ्चसे अनन्य 


्रेम करनेबाटी गोपियो | एक बार, केवर एक बार अपने स्वखको ओर अपनेको भी भूलकर मेरे पास आओ ` 


तो सही । तुम्हारे हृदये जो अन्यक्त त्याग है, उसे एक क्षणके च्वि व्यक्त तो करो । क्या तुम मेरे च्यिं इतना 


भी नहीं कर सकती हौ ¢ गो पि्योने मानो कदा-- श्रीकृष्ण ! इम अपनेको कैसे भू १ हमारी जन्म-जन्भकी ` ` 
धारणाद मूलने दे, तब न । इम संसारके अगाध ।जक्मे आकण्ठमगन हँ । जादेका , कष्ट भी है । इम आना 





२७० | भ्रीमद्धाम्व॑त [ अ० २२ 


जार शक गौ । ऋत नं छ के ) नि 
नि ण री = 1 त 1 त = नथी 3 क त 1 1 1 





[ि = १ त रि त ररे 


साधकके यह दशा-भगवानको चाहना ओर साथ ही संसारको भी न छोड़ना, संस्कारोम दी उच्चे रहना -- 
मायाके परदेको बनाये रखना; बड़ी द्विविधाकी दशा ह । भगवान्‌ यदी सिखाते §ै कि संस्कारसूल्य होकर, 
निरावरण होकर, म।याका परदा हटाकर आओ; मेरे पास आभो । अरे, व॒म्हारा यह पोका परदा तो मेनेदी 
छीन ठिथा है; तुम अब ईस परदेके मोहं क्यो प्ड़ी हो ! यह पर्दा ही तो परमात्ना ओर जीवक बीच बड 
व्यवधान हँ; यद हट गया, कडा कल्याण हआ । अन तुम यरे प्च जओ।, तभी तभा चिरसंचित आकाक्षां 
पूरी हो सकेगी ।' परमात्मा श्रीङृष्णका यह आह्वान) आसाके आता परस व्रियतभके मिख्नका यह मनुर्‌ आमन््रण 
मगवत्कृपासे जिसके अन्तदंशमें प्रकट हो जाता हैँ, बह प्रेममं निमान होकर स्‌ ऊं छोडकर, छोडना मी 
भूकर प्रियतम श्रीङ्ष्ण> चरणों दोड़ आता ह । फिर न उसे अपने व्लाकी धि रहती है ओरन नेगोका 
ध्यान ! न बह जगत्को देखता है न अपने । यह मगवस्मेभक। रङ्कस्य है । विद्युद ओर अनन्य भगव्ेभमे दसा 











होता हीह 
¢| गोपि भाय, श्रीकृष्णके चरणके पाक्त मू्कभावन्ते खडी ह। गयीं । उनका सख लज्नाव्रनत था | यक्किञ्चित्‌ 
| संस्वारशेष श्रीङ्ष्णके परणं आभि मुख्यमे प्रतिबन्ध हा र्वा धा | श्रीकृष्ण 44 य| उ> सारस करदा 


(इतने बडे त्यागे यह सङ्कोच कल्ङ्क ह । त॒म तो सदा निष्वज््का हो; तुन्हं इसका यी त्न, व्यागके मावका 
भी त्याग-व्यागको स्प्रतिका भी व्याग करना होगा ¦ गाषयाक्री दि श्रीक्ग्ःकै पुखक्तपस्पर्‌ एड | दनां ह्यथ 
अपने-आप जुड गय ओर मयमण्डन्में विराजमान अपन भ्रयतम श्रीकरष्णन्चे ही उन्द(न प्रेमां मिश्ला मग | 
गोपियोके इसी सवख त्यागने, इसी १० समपणने, इद्त उतम आभात्मावस्मरतिने उन्दं भगवान्‌ ५ क्ष्णः व्रभस्े मर 
दिया । वे दिव्य रसके अलोकरिक अग्राज्त मघुकै अनन्त सुद्र इनन-उतरने व्गीं । 3 सतं ऊुॐ भूक भयी, 
भूकनेवालेको भी भूर गयी, उनकी इशे अन दयामुन्दर थे । नक्त, केवल देयामघुन्द्र यै । 
जवः त्रेमी भक्त आमविस्मृत हय जाता है, तव उसका दापित प्रियतम मगवानूपर्‌ होता है । जत्र 
मथांदा-रक्षाके व्यि गोपि्योको ता वज्ञक्री आवस्यकता नही थी । क्योकि उन्टं जिक्च वस्तुकी आवद््यकता थी, वह 
पिर चुकी थी । परंतु श्रीङृष्ण अपने प्रेभीको म्यादाच्युत नह होने देते । वे खयं वेत्र देते है ओर्‌ अपनी 
अभृतमथी वाणीके द्वारा उन्हें दिस््रतिसरे जगाकर पिर जगतमें लाते दहै | श्रीकृष्णे सहा ---'गोपिये ! तुम स्षती- 
साध्वी ह्य । तम्हारा त्रम भीर तुम्हारी. खाधना भुश्चसे कपी न्दी € । तुम्हारा सङ्कल सव्य होगा । तुम्डारा यहं 
सङ्कव्प--वम्हारी यह कामना वुम्हं उस पदपर श्त करती है, जो निश्ङ्कत्पता ओर निष्कामताका है| 
तुम्हारा उदेश्य प्रण; तम्हारा समपण पूण ओर्‌ अगे आनका शादय रात्रियीमं हमारा रमण पू. होगा | 
भगवान्‌ने साधना सकर होनेकी अवधि निधारित कर दी । इससे भी स्पष्ट है किं भगवान्‌ श्रीडष्णपे किसी भी 
कापत्रिकारकी कल्पन! नही थी । कामी पुरुषका चित्त वखदहीन चियांको देखकर एक क्षणके वल्य भी कब वक्षे 
रह सकता है । 
4. एक बात बड़ी विंखक्षण है । भगवान्‌के सम्पुख जनेके परे जो वचर समर्षणकी पर्णतामें बाधक हो 
(1, रदेये- विक्षेपका काम कर रहे थे- वही मगवानूकी कपा, प्रेम, सान्निष्य ओर वरदान प्रात होनेके पश्चात्‌ 
4 (सादः खर्प हो गये । इसका कारण क्या है १ इतका कारण है भगवान्‌का सम्बन्ध | भगवानूने अपने 
` दा से उन वन्ञाको उठाया था ओर फिर उन्हे अपने उत्तम अङ्ग कंघेपर रख च्या धा । नीचेके शरीरम पहनने 
“की सादया मगवानके कंधेपर चढकर--उनका संस्परं पाकर कितनी अप्राकृत  रसातमक हो गर्यी, कितनी 
नि म्ण य गयी, इसका भजमान कौन गा सकता है । असमे यड संसार तभीतक नाधक शौर 
तङ यइ भगनानूते सम्बद्ध भौर भगवानका श्रसाद नदी दो जाता । उनके द्वारा प्रात ह्ोनेपर 


# चर 
क 


ज कुक च क्न > 
जका ॐ क 7 न 















म्द च 0 (~) त म~क ` भश्यो० व चः ^ 


=, ~ ^ {2926 








न  नगनस्नान एक दोष है, ज किं पञ्लको बदानेवास है । शमं 
॥ शाकी आज्ञा है । श्रष्ण नहीं चाहते थे कि गोपयां 


ए । (दय ` च कः ^~ क~ ~ (श 
॥ पि ॐ ~+ ~ ३ 
५ ह ॐ कः १-८4 + ५ + 
1, ~ य 1 म „ "ब 
भ ॐ * ~ ॥ भ # क 


अ० २२] दशमस्कन्ध॒ $ ~~ २७१ 











तो यह बन्धन ही सुक्तिखरूप हो जाता है । उनके सम्पकमे जाकर माया द्र विधा वन जाती है । संसार 
ओर उक समस्त कमं अमृतप आनन्द्रक्षसे पश्प्रण ह्यो जाते हैँ ! तवर बन्धना भय नहीं रहता । कोई भीं 
आघ्ररण भगवान्‌ दर्शनसे बद्वित नद्यं रख सकता । नरक नरक नहीं रइता, भगवानूका दरेन होते रइनेके 
कारण वह परवु्छ वन जाता दै । इसी सितिपे पचक वडे-वडे साधक प्राकृत पुरषे समान आचरण करते _ ` 
दृए-ते दीखते हैँ । स्वान्‌ श्रीकृष्ठको अपनी होकर गोपियाँ पुनः वे द्वी वल्ल धारण करती ई अवत्राश्रीकृष्णवे 
दी वञ्च धारण कराते है, पर गोपि्योकी शिम वये वश्च नहीं द्वै; वस्ततः वेह भी नही--अव तो | 
ये दूरी दी क््तुहो गये हैँ} अवरतो ये भगवानूके पावन प्रघ्ताद है, पल-पल्पर भगवानक्रा स्मरण करानेश्राठे 
भगवानूङ्े परम घुन्दर्‌ °तीक हैँ } दोसे उन्होने खीकार मी किया} उनकी त्रेममयी स्थिति मर्यादाके ऊपर थी 
फिर मी उन्न भगवानकी इच्छासे मर्यादा दीकार कौ | इप्त दशसि विचार करनपर रेश्चा जान पडता है कि 
मगवान्क्ती यह चीरडय्ण जी भी अन्य टीलओंकी माति उच्चतम मर्यादा परिपएूण हं । 
सगवान्‌ श्रीटृष्णद्ी खीला्ंके सम्बन्धे वोवड वे 


म 


अदी + > 


९ ५ - 
न (कक). /, १ < ऋक च. 


वेदी प्राचीन आपंग्रन्थ प्रमाणं देँ, जिनमें उनकी 
टीखक्ता वणन हया है | उनसे एक मी रेखा ग्रन्थ नहीं है, जिस्म श्रीकृष्णकी मगवत्ताका वणन न हो । 
श्रीकृष्ण (ज्यं भगत्रान्‌? हैँ, यही वात सवत्र दिरती है । जो श्रीडृष्णको भगवान्‌ नदीं मानते, यह स्पष्ट हं क्रि वे 
उन प्रन्थोको भी नष्टं शनते } अौर जो उन म्र्धोको ही प्रमाण नदीं मानते, वे उनम वणित लीखा्भकि 
आधारपर श्रीरृष्ण-चस्ि को समीक्षा करनेका अविक्रार्‌ भी नहीं रखते । सगत्रानक्ती ीलार्थको मानगीय चस्िके 
समकश्न रखना शाच्ल-इषटिस्े एक महान्‌ पराध है ओर उसके अनुकरणका ते सवथा दी निषेध हं । 
मानवदुद्धि--ओ स्थृलताओंसे दी पलिष्ठित है केवल जडके सम्बन्धे ही सोच सकती .है, भगवानक्ती दिव्य 
चिन्धयी रीचके सम्वन्धतें कोई कल्पना ही न्वी कर्‌ सकती । बह बुद्धि खयं ही अपना उपहास करती है । 
जो समसत बुद्धये प्रेरकः ओर बुद्धियोसे अत्यन्त परे र्हनेवाठे परमात्माकी दिव्य टीव्छको अपनी कसौटीपर्‌ 
कसती है । 


दय ओर बुद्धिके सवथा विपरीत होनेपर भी यदि थोडी देरके चयि मान टे किं श्रीकृष्णं मगवान्‌ नहीं { 


॥ 1/4 # 1 ^, # १ > व । न. ^ १ "कष 










थे या उनकी यह ठीला नवरी थी, तो मी तकं ओर युक्तिके सामने देसी कोई बात नयं टिक पाती, जो 
श्रीकृष्यके चरमे ञ्छ्न हो ! श्रीयद्धागदतका पायायणं करनेवाठे जानते हैँ किं त्रजमें श्रीकृष्णे केवर ग्यारह 
वषकी अवष्यातक ही निव्राक्ठ क्रिया था । यदि रासलीलाका समय दस्षबौँ वष माने, तो नवे वषमे ही चीरहरण्‌- 
लील दई थी ¡ उक्त वातकी कल्पना मी नहीं हयो सकती क्रि आठ-नौ वषके वाल्कमे कामोत्तजना ह्ये सक्ती 
है । गवयी गवास मालिने, जह वर्तमान काठ्की नागरिक मनोडृत्ति नदीं पटच पायी है, एक आठ-नौ वषेके ` 
वाठकसे वेध सम्बन्ध करना चाहं शौर उक्तके व्यि साधना करर यह कदापि सम्मत नहीं दीखता ! उन. 
कुमारी ग पिके मन्वे कटुवित वृत्ति थी, यह वतमान कड्पित मनोदत्तिकी उड्ङ्कना है । आजर जसे गव 
छोटी-ोटी डकिरयो "र।भः-सा वर्‌ ओर (लक्मणः-सा देवर पनेकर व्यि देवी-देवतार्ओकी पूजा करती है, वसे ही 
उन कुमायििनि भी परम घुन्दरः परम मधुर श्रीकृष्णकरो पनेके व्यि देवी-पूजन ओर व्रत किये थे । इसमे दोषवं 
कोन-सी बात = 


भजकी वात निराली है । भोगभ्रभान देशो तो नग्नसुमप्रदाथ ओर नन्नस्नानके क्व मी बने इए. 






++ 


किके विर्‌ 





(ी 





+ 1 











षक = 
२७२ भीमद्भागव१ [ अ० २२ 
श्रीशुक उवाच श्रीद्यकरेवजी कष्टते है-परीक्षित्‌ । भगवानकी 
यह आज्ञा पाकर वे कुमारियां भगवान्‌ श्रीकृष्णक्ते चरण- 
इत्यादिश भगवता लब्धकामा; कुमारिकाः ¦ कमलका ध्यान करती हुई जानेकी इच्छा न होनेपर भी 


वड़े कष्टसे व्रजमें गयीं । अत्र उनकी सारी कामना पूरण 
४धायन्त्यस्तत्पदपम्भोज छृच्छ्रा्निरिविश्ुब्रजग्‌।२८ । हो चुकी थीं ॥ २८ ॥ 


नि -- 





1 


नहा--भारतीय ऋषिर्योक्ता वह सिद्धान्त; जो प्रत्येक वस्तुमें प्रथक्‌-प्थकर्‌ देवताओंका अस्तित्व मानता है इस 
नग्नस्नानको देवताओकि विपरीत बतल्ता है । श्रीकृष्ण जानते ये किं इससे वरुण देवताङ्ता अपमान होता है | 
गापरिथा अपनी अभीष्ट-सिद्धिके व्यि जो तपस्या कर रदी थी, उसमें उनका नग्नस्नान अनिष् फल देनेवाटा था 
ओर इस प्रथाके प्रभाते ही यदि इसका विरोध न कर दिया जाय तो रागे चख्वर्‌ इसका विश्ार हो सक्ता 
है; इसछिये श्रीङ्ष्णने अरोकिंक ठंगसे निषेध कर दिया । 

गर्वकी ग्ालि्नोंको इस प्रथाकी बुराई किप प्रकार समञ्ञायी जाय; इकके व्यि मी शरीद्रष्णने एक 
मोजिक उपाय सोचा । यदि वे गोपियोके पापस्त जाकर उन्हें देवतावादकी फिलक्षफी समञ्लादे, तो तरे सरटतासे 
नहीं समञ्च सकती थीं | उन्हें तो इस प्रथाके कारण होनेवाटी विपत्तिका प्रव्यक्न अन॒मव क्रा देना धा ओर 





विप्तिका अनुभव करानेके पश्चाच्‌ उन्होने देवताओंके अपमानकी बात भीव्ता दी तवा अञ्जलि वधर 
क्षमा-प्राथनाख्य प्रायश्चित्त भी कराया । महापुरूषोमे उनकी वास्यावस्थामें भी रेखी प्रतिभा देटी जाती है | 

श्रीकृष्ण आठ-नौ वंके ये, उने कामोत्तेजना नही हो सकती ओर नस्नस्नानङी इुप्रथाको नष्ट वरनेके 
य्य उन्होने चीरहरण क्लिया-- यह उत्तर सम्भव होनेपर भी मूर््मे अये हए षकाः थौ णः जन्दोसे 


= 


करई खोग॒ भड़क उठते हैँ | यह केवल शाब्दकी पकड़ है, जिसपर महास्माखोग ध्यान नह देते । श्रुतिरयोतिं ओर 
गीताम भी अनेकों बार “कामः, ^रमणः ओर “रति, आदि श्दोका प्रयोग हज है; परत बहौ उना अद्लील 
अर्थं नहीं होता । गीतामें तो ध्ध्माविरद्र कामः को परमास्ाका खर्प वत्या गयः है | महापुश्का 
आत्मरमणः, आत्ममिथुन ओर आत्मरति प्रसिद्ध ही है । र्षी धितिमें केवर कुछ शब्दको देखकर भड़कना 
| पुरषोका काम नह्य है | जो श्रीकृष्णको वेव मनुष्य समञ्लते दै, उन्दः रमण ओर रति चाब्दका 

अथ केवल क्रीडा अथवा चखिव्वाड़ समञ्लना चाहिये, जसा कि व्याकरणके अनुसार ठीक है--^रमु क्रीडायाम्‌ 
टृष्िमदसे श्रीकृष्णकी रीका मिन्न-मिन्न ख्पमें दीख पड़ती है । अध्यात्मवादी श्रीकृष्णको भआत्माकरे रूपमे 


^ देखते है ओर गोपिर्योको इत्तियकि रूपमे । इत्तियोका आवरण नष्ट हो जाना ही (चीरहरण-ीव्ः है ओर 
^  .उनका आम्मा्मे रम जाना ही !रासः है । इस दृष्टिसे भी समस्त ॒गीगओंकी संगति बैठ जाती है | मक्तोकी 


दृष्टस गोलोकाधिपति पूणंतम पुरषोत्तम मगवान्‌ श्रीकरम्णका यह सब नित्यलीका-विकस है ओर अनादिकार्से 













 सखा-सहचरियकि साथ ॒खीला-धाममे प्रकट होकर गीला करते हैँ गोर भक्तोके स्मरण-चिन्तन तथा आनन्द- 
4  सङ्गक्की सामप्री प्रकट करके पुनः अन्तर्धान हो जति हैँ । साधकोकि व्थि किप प्रकार कृपा करके भगवान्‌ 
^ अन्तमस्को ओर भनादिकाच्से संचित संस्कारपटको वियद्ध कर देते है, यह वात भी इस चीरहरण-रीखसे 


४ ८ कट होती है | भगवान्‌की रीवा रहस्यमयी है, उसका तस्व कैवढ मगवान्‌ ही जानते हँ भर उनकी कपासे 


श - ० ॥ ^ 


` उनकी ठीटातें ्रव्र्ट भाग्यवान्‌ मक्त कुछ-लुढ जानते ्ै । यदय तो शाल्ञो ओर संतोकी वाणीके जाधारपर ही 
कुक लिखनेकी धृष्टता की गयी "दै । | 





` -दमानग्रसाद्‌ पादार 
ड : - 
| 9 छ. = + 















` अनन्तकाटतक यह नित्य चक्ता रहता है | कभी-कभी मक्तोपर कपा करके वे अपने नित्य धाम ओर नित्य | 


ं ^ श & ् 


~ 
[रे 


इ~ 


1 1; [मि 


ध 
+ निक 


अ° २२ | 








अथ गोपैः परितो भगवान्‌ देवदीसुतः । 
बृन्दावनाद्‌ गतो द्र चारयन्‌ गाः सशग्रजः॥।२९॥ 
निदाघाकोतपे तिग्मे छायाभिः खाभिरात्मनः। 
आतपत्रायितान्‌ वीक्ष्य द्रमानाह जोकः ॥॥३०॥ 
हे स्तोककृष्ण हे अंशो श्रीदामन्‌ सुब्रराजन । 
विश्चारुर्षभ तेजखिन्‌ देवप्रय वरूथप ॥२१।॥ 
परपरतेतान्‌ महाभागान्‌ परार्थे कान्तजीवितान्‌। 
वातवर्षातपहिमान्‌ सहन्तो वारयन्ति नः ॥)३२॥ 
अहो एषां बरं जन्म सवेप्रण्युपजीषनम्‌ । 
सुजनस्येव येष वे विष्चुखा यान्ति नाथिनः ॥३३॥ 
पत्र पुष्पफलच्छायामूलवर एर्दारुभिः । 
गन्धनियांसभसास्थिंतोकमेः कामान्‌ वितन्वते॥ ३४। 
एतावजन्सक्षाफ्यं देष्टिनामिह देहिषु । 
प्रणैर्थे धिया वाचा श्रेयं एवाचरेत्‌ सदा ॥३५५। 
इति । 


प्रवारुस्तबकफरुपुष्पदलोत्करेः । 


` तरूणां नम्रश्चाखानां मभ्येन यथरुनां गतः ॥३६॥ 


- ` तत्र गाः पाययितवापः सुम्रष्टाः शोतलाः शिषाः 


काम चारयन्तः पश्यन्‌ चप । 


। २. सामभ्रयं । २. भेयआचरणं सद्‌ा | 


4. - 


0 


द्ञ्चम्‌ स्कन्य 


- ततो नृप खय गोपाः कामं स्वादु पपूजंलम्‌ ॥३७॥ । बद्‌ खयं भी जी भरकर खादु जलका पान्‌ किया॥३७॥ 






व ` क न्ट 
कनि) र षि 
ह "~ # थ 
५ 


२७३ 
# ~ ५ 9 गिक ॥ 





















ऋ ऋ [ ४ 
4 


प्रिय परीक्षित्‌ | एक दिन भगवान्‌ श्रीकृष्ण बढराम- ^ 
जी ओर व्राग्वाढोके साय गौ चरावे इए बृन्दावनसे 
बटत दूर्‌ निकल गये ॥२९॥ ग्री ऋतु थी । सूयेवी ` 
किरणे बहृत हयी प्रखर हो रही थीं । परंतु घनेन वृक्ष 
भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऊपर छन्तेका काम कर रहे ये। 
भगवान्‌ श्रीकृष्णे वृरकषोको छाया करते देख स्तोकङ्ष्ण, _ ` 
अञ्च, श्रीदामा, एुवक, अर्जन, विशा, ऋषम, तेजखी, ` 
देवप्रस्थ ओर वख्यपर आदि ग्ाक्बारछके सम्बोधन करके ` 
कहा -॥ ३०-३१ ॥ मेरे प्यारे मित्रो { देखो, ये वृक्ष 
कितने भाग्यवान्‌ है | इनका साग जीवन केवर द्रो 
की मलाई करनेके ल्िहीदहै। ये खयं तो वाके 
के, वर्षा, धूप ओर पाटा--सव कुछ सहते है, 
परतु हमरेोर्गोकी उनसे रक्षा कते ॥३२॥ 
मै कहता ह किं इन्हीका जीवन सवसे श्रेष्ठ है; क्योकि 
इनके द्वारा सब प्राणिर्योको सहारा मिल्ता है, उनका 
जीवन-निर्वाह होता है । जसे किसी सजन पुरुषवे घरसे 
कोई याचक खाटी हाथ नहीं ढौटता, वैसे ही इन वृ्से 
भी स॒भीको कुछ-न-कुछ मिक ही जाता है ॥ ३३ ॥ये 
अपने पत्त, एक, फल, छाया, जड, ऊक) खकडी, गन्ध, 
गोद, राख, कोयन, अङ्कूर ओर कोपकोंसे मी छोर्गोकी 
कामना पणं करते है ॥३४॥ मेरे प्यारे मित्रो संसारम 
प्राणी तो वद्र है; परतु उनके जीवनकी सफक्ता ५ £ 
इतनेमे ही है किं जहतक हो सके अपने घनसे, विवेकः 
विचारसे, वाणीसे ओर प्राणेसि भी रेसे हयी कमं कयि ` 
जाय, जिनघे दूस्रोकी माई हो" ॥ २५ ॥ परीक्नित्‌ | 
दोनो ओरके ब्रक्ष नयी-नयी कोपन, गुच्छो, फल-फू्ं 
ओर पर्तोसे ट्द रदे ये । उनकी डावियां प्ध्वीतक 
युवी इई थीं । इस प्रकर भ्ण करते इए भगवान्‌ श्रीकृष्ण _ 
उन्हीके बीचसे यसुना-तटपर निकल आये ॥ ३६ ॥ 
राजन्‌ । यमुन।जीका जठ बड़ा ह्वी मघुर, रीत र ः ओर 
खच्छ था । उन लोर्गोनि पदे गौओकि पिखाया ओर इसके ` 


हरे-> ते 
थे, उसी . 


। 


परीक्षित्‌ | जिस समय वे य 1 
उपवनमे बडी 


= क त 
ग 


~ 
नः य & 


+ क 
चरक 


, २७४ 


६, 


श्रीमदभागवत | अ० २३ 


छृष्णरामाबुपामस्थ श्ुधातां इदमष्ठुवन्‌ ।॥३८॥ 


जक ` # = न 


~ ~~ च बकर ह कु नकष भके 4 
= करक चक 1 
जोक क ^ कनके जा की > ज ` => - 
जि ` ¬ 7 कना कक ज 99 >> 9 ~ १" ` तः कि 


चे = अ 





समय कुछ मूले ग्वाखछेने भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बलराम- 
जीके पास आकर यह बात कही ॥ ३८ ॥ 





इति श्रीमद्भागवते सह।पुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वरधे 
गोपीवस्नापहारो नाम दार्विंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ 


} { 3 
|| अथ त्योविशोऽध्यायः 
{|| | यन्ञपस्नियोपर छपा 

| { गोषा ऊचुः ग्ाटवासाने कद्ए-- न यन!भिराम वशख्राम | तुम 


राम राम महावीयं ष्ण दुष्टनिवर्हण । 
एषा वे बाधते श्चन्नस्च्छान्ति कर्त॑मर्हथः ॥ १॥ 


श्रीद्युकं उवाच 


। इति विज्ञापितो गोपेर्भगवान्‌ देवकीसुतः । 
भक्ताया विप्रभायायाः प्रसीदज्निदमन्रदीत्‌ ॥ २॥ 
प्रयात देवयजनं जाह्मणा ब्रह्मवादिनः | 


नाम धाते स्वगंाप्यया ॥ ३॥ 


तत्र गत्वीदनं गोपा याचताश्नदिशर्जिताः | 











| ( कीतंयन्तो भगवत आर्यस्य मम चाभिधाभ्र्‌ ।! ६ ॥ 
| + ( . इत्यादिष्टा भगवता गखवायाचन्त ते तथा । 
| ताज्ञलिएटा वित्रान्‌ दण्डत्‌ पतिताय॒तिं ॥ ५, 
त हे भूमिदेवाः शृणव छइष्णसखयादेश्कारिभः 
„¬ आह्लानीतम्रवो गोषान्‌ नो रामचोदितान्‌॥ ६ ॥ 








वड़े पराक्रधी हो । हमारे चित्तचोर्‌ च्याम्ुन्दर्‌ ! तुमने 
वड़-बड़ दुका संहार या हं । उन्दी टुटके हमान 
यह्‌ भूख भी हष सता रदी है । अतः तुम दोनो इसे 
मी ब॒क्षनिका कोद उपाय करो ॥ १} 
श्ीदुकदेवजीने द.द1-- परीक्षित्‌ ! जव गवाटवार्खने 
देवकीनन्दन भगश्न्‌ श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रधना की 
तन उन्होने मथुराश्ी अपनी मक्त ब्राह्मणपतिर्योपर 
अनुग्रह करनेके लिये यह वात कदी --॥२॥ “मरे प्यारे 
मित्रो | यश्चंसे थोडी ही दूरपर वेदशादी ब्राह्मण खगेकी 
कामनासे आङ्धिरप्त नामक्रा गरज्ञ कर रदे दै | तुम उनकी 
यज्ञश्ालामे जाओ ॥ २}; स्बाल्वाठो ! मेरे सेजनेसे 
वदँ जाकर तुम लोग सेर बडे भाई मगवान्‌ श्रीवटराम्‌- 
जीका ओर मेरा नाम लेकर कुक थोड़ा-सा भात-- 
भोजनकी साप्रम्री मोग लाजः ॥# % ॥ जव मगवानूने 
देसी आज्ञा दी, तच ग्बालव।छ उन ब्राह्मर्णोकी यज्ञश्चामे 
गधे ओर उनसे मगवान्‌की आज्ञाके धनुसार ही अन्न 
मागा । पहले उन्द्नि प्रथ्वीपर गिरकर्‌ दण्डवत्‌-प्रणाम .. 
किया ओर किर ह्यथ जोड़कर कहा--॥ ५॥ प्रथ्वीको 
मूर्तिमान्‌ देवता ब्राह्मणो ! आपका कल्याण शो । भापसे 
निवेदन है कि हम त्रजके गाङ हं । भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
ओर बलरामवी आज्ञासे हम आपके पाक्च आये हे | आप 
हमारी बात घन ॥ ६ ॥ मगवान्‌ बलराम ओर श्रीकृष्ण 


6 < ओदनं ग्‌ चराते इए य्होसि थोडी ही दूरपर अये इर है | 
शमाच्युती बो दषतो वुशुधिती । उन्हें इस सम्य भूख लगी दै ओर वे चाहते है किं 
 “ इष्णक्रोडायां यसुनागमनं नाम द्वाविंशतितमो । २ न्तो न विदू भः 


६. ५ 
4 क 6 1 
३. [> दः # 
चवक ध्‌ % न्क ह 
नबि ॥ न + 
, 









# 












अं° २३) दम स्वव =" ^ 


ह 
~ द, 


तयो्टिंजा ओदनमधथिनोर्यदि आपलेग उन थोडा-सा भात दे दे | त्राणो | आ 
धमका मम जानते ह | यदि आपकी श्रद्वा दहो, तोउन 
शद्धा च बौ यच्छत धमंदित्तमाः । ७ ॥। | मोजनार्थियोके व्यि ङु मात दे दीजिये ॥७॥ सन्नो 
जिस यज्ञदीक्नामे पञ्चवट होती है, उसमे ओर सोत्रामणीं 
दीक्षायाः ष्यसंखायःः सौत्रामण्याशच सचतणः। | यज्ञम दीक्षित परक अन्न नहीं खाना चाहिये । इनके 
अतिरिक्त ओर किसी भी समय किसी भी यज्ञम दीक्षित 4 
अन्यत्र दीकषितखयापि नान्नमननन्‌ हि दुष्यति ॥ ८॥ 9रप्रका भा अन्न खनेम कोई दोप नही ह" ॥ ८॥ ` | 
परीक्षित्‌ ! इस प्रकार भगवानूके अन्न मोँगनेकी बात 
इति ते भगवयाच्जांभूष्वन्तोऽपि न श्शरुः । नकर मी उन त्राह्मणेनि उस्पर्‌ कोई व्यान नदीदिवया। = 
वे चाहते थे गादि तुच्छ कल ओर उनके व्यि वडे-वड़ 
| क्ममिं उल्क्ञे इए थे । सच पृषो तो वे ब्राह्मण ज्ञानकी 
दृष्टिसेि थे वाकुक ही, परंतु अपनेको वडा ज्ञानवृद्ध 
† | भ मानते य ॥९॥ परीक्षित्‌ । देश, काठ, अनेक प्रकाखी _ 
दसः कवलः पथम द्रव्य मन्त्रे वन्त्राल्तजाऽरनय्‌ः। | सामग्र्य, सिन्न-मिन्न कर्मनि विनियुक्त मन्त्र, अनुष्ठानकी ` 
पद्वति, ऋविज-्रक्षा आदि यज्ञ करनेवाले, अग्नि, 
देवता यजमान छतुरधर्मथ यन्मयः ।।१०॥ | देवता, यजमानः यज्ञ जौर धमे--इन सव ख्पोमि एक- 
मात्र मगवान्‌ ही प्रकट होरे हैँ॥१०॥ वेदी 
ठ रहम परमं .दाकाद्‌ समदन्तमधोकषजम्‌ । इन्दियातीत प्रह भगवान्‌ शक्ष्ण खय पाग्वा्कि दाग 
भात माँग रहे है । परंतु इन मूर्खोनि, जो अपनेको रीर ही 
माने बेटे है, भगवानूको भी एक साधारण मनुष्य ही 
माना ओर उनका सम्मान नदीं क्या ॥ ११॥ परीक्षित्‌। 
जव उन तब्राह्मणोने शो या ना- कुछ नहीं कहा, 
न ते यदोभिति प्रोचुनं सेति च परंतप । | तव म्वाल्बाछंकी आशा द्रूट गयी; वे लौट अये र 
यहांकी सब बात उन्होने श्रीकृष्ण तथा बलरामसे कह 
। मोपा निरशाः प्रत्येत्य तथोचुः कृप्णरामयोः|।१२॥ | दी ॥ १२ ॥ उनकी बात घुनकर्‌ सारे नगते खामी ` , 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण हसने लगे । उरन्हहोने ग्वालब्रागेको 
तदुषाकण्यंशगवान्‌ प्रहस्य जगदीश्वरः । सम्ञाया कि “संारमे अप्तफक्ता तो बार-बार होती दीह, ` 
॑ उससे निरारा नदीं होना चाहिये; बार-बार प्रथन करते ` 
ह~ ५५ ती रहनेसे सफकता पिल ही जाती है । फिर उनसे 
| ड. व्याजहार पुनर्भोपान्‌ दशेयल्लोक्रिकीं गतिमू्‌।।१३। कदा ॥ १२ ॥ र प्यारे खराच्नाले ! इ नार तु 
खग उनकी पलि्योके पास जाओ ओर उनसे कहो कि. 
राम ओर श्याम यहा आये है । तुम जितना चाहोगे 
उतना भोजन वे तुम्हे गो । वे सुञ्चसे बडा प्रेम करती 


# क क 
ख खो च आ" आक िो ज कः ० य छ च भा 3 ज 7 क + ® को यः 9 पो दो ` = = भक = = = ५ छि ५ जा क ० ` जोक ७ ० कः 





ऋ" 





द्राजा भुरिकसणो बालिश चृ सानिनः ॥ ९॥ 



















मनुष्यद््टया दुष््ज्ञा मर्यौर्मानो न मेनिरे ॥११॥ 








> 1; खरङ्ताः। । 


कन्य कै 
२७६ 





























नरा द्विजतीर्गोपाः प्रभ्रिता इद्मनुगन्‌ ॥१५ 





नमो वो विप्रपत्नीम्थो निबोधत वचांसि नः। 
इतोऽविद्रे चरता छृष्णनेहेषिता वयम्‌ ॥१६॥ 
गश्च।रयन्‌ स गोपाः सरामो द्रभागतः । 


बुभु्षितस्य तस्यान्नं स चुगस्य प्रदीयताम्‌ ॥१७॥ 


्ुत्वाच्युतम्पायातं निस्य त्दशंनोत्सकाः 


तत्कथाधिप्तमनसो बभूयुजांतसम्भ्रमाः ॥१८॥ 


चतुबिधं बहुगुणमन्नमादाय भाजनैः 


अभितस्ुः प्रियं घवा; सथ्रुदरभिव निम्नगाः ॥१९॥ 


निषिध्यमानाः पतिभिर््रातभिबन्धुभिः सुतैः। 


ॐ दीषश्ुतधताञ्चयाः ॥२०॥ 

| यथुनोपवनेऽश्नोकनवपहवभण्डिते 

` विचरन्तं इतं गोपैः साग्रजं दद्युः लियः ॥२१॥ 
५ # 


` इधामं हिरण्यपरिधिं वनमारयब्ह- 


धातुश्रवालनटवेषमचुव्रतांसे । 


स ॐ 
 विन्यस्तदस्तमितरेण धुनानमन्जं 
+ र. द 


 कर्णोत्पलालककपोशुलाम्जशसः 


श्रीमद्धावंत 


कमर मन्द्‌ 


[ अं० २३ 





गहनोँसे सज-धजकर्‌ बेटी हँ । उन्होने द्विजपलिर्योको 
प्रणाम करके बड़ी नप्रतासे यह बात कदी --॥ १५॥ आप 
विभ्रपल्नियोंको हम नमस्कार करते है | आप कृपा 
करके हमारी बात सनं । भगवान्‌ श्रीकृष्ण यक्षंसे थोडी 
ही दूरपर आये इए ईद ओर उन्होने ही हमें आपके पाप 
मेज। है ॥ १६ ॥ वे घाल्वाल ओर वल्रामजीके साथ 
गौए्‌ चराते हए इधर बहत दूर आ गये हैँ । इक्त समय 
ऊहं ओर उनके साथिर्योको भूख ट्गी है | आप उनके 
य्य कुछ भोजन दे दें" ॥१७॥ परीचित्‌ । वे ब्राह्मणिर्या 
बहत दिनोंसे भगवान्‌की मनोह टीला घुनती थीं | 
उनका मन उने खण चुका या|वे सदा-सवदा इस 
बातके लिये उत्सुक रहती किं किसी प्रका श्रीकृष्णके दशन 
हो जायं | श्रीकृष्णके आनेकी वात घुनते हयी वे उतावटी हो 
गयीं ॥१८॥ उन्होने बतनेरमे अत्यन्त खाट ओर हितकर 
मस्य, मोञ्य, लेह्य ओर चोष्य-चारों प्रकारकी भोजन- 
प्ामग्री ठे ढी तथा माई-बन्धु, पति-पुरके रोकते रहनेपर 
भी अपने त्रियतम भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास जानेके च्य 
घरसे निकल पड़ीं--टीक वैसे ही, जंसे नदियां समुद्र 
के ल्यि | क्योन हों; न जाने कितने दिर्नोसे पवित्र 
कीतिं मगवान्‌ श्रीकृष्णके गुण, रीका, सन्दे ओर 
माघुयं आदिका वणन सुन-इनकर उन्होने उनके 
चरर्णोपर अपना हृदय निद्ावर कर दिया या ॥१९-२०॥ 
ब्राह्मणपरिर्योने जाकर देखा कि यमुनाके तटपर नये-नये 
कोपरछोसे शोभायमान अश्ोक-वनमे म्वाखबालोसे धिरे 
इए बन्रामजीके साथ श्रीकृष्ण इधर-उधर धूम रे 
है ॥ २१ ॥ उनके सावे शरीरपर घुनहत्म पीताम्बर 
भनिग्मिग रहा है । गले बनमाला ब्टक र्दी है | 
मस्तकपर मोरपखका सुकुट है । अङ्ग-अङ्गमे रंगीन 
धातुओंसे चित्रकारी कर रक्खी है । नये-नये कोपरगोके 
गुच्छे शरीरे ल्णाकर नटको-सा वेष बना रक्खा है। एक हाय 
अपने सखा ग्वाठनारकरे कंघेपर र्खे इ९ है ओर दतर हाय- 
से कमव्का र नचा रहे द कानों कमग्वे कुण्डल 


ह, कपो्ोपर धुरा भके व्यक रही हैँ जीर मुख. 
कानवी रेखासे प्रषित हे रा ¦ 


ए. > -+# १ 


क ङ * ~ न 
स च, ह 








अ० २३ ] दश्षम स्कन्धं 











प्रायशश्रुतप्रियतमोदथकशृणपू्र- ¦ है ॥२२॥ परीक्षित्‌ | अबतक अपने त्रियतत दयाश्षुन्दर- 
के गुण ओर लीग भपने कानोसि घुन-खुनकर उन्होने 

अपने मनको उन्ीके त्रेमके र्मे रंग डाग था, उसीमे 

यंसिन्‌ निपरनभनप्स्तमथाशिरन्धेः | सरवर करदिया था | अ नेत्रे मार्गे उन्हं भीत 

ठे जाकर बहत देरतकर वे भन-द्वी-प्रन उनका आण्ङ्गिन 
करती रहीं ओर इस प्रकार उन्होने अपने इृदयकी जठन 
शान्त की-टीक वसे ही जैसे जाग्रत्‌ ओर खप्न अव्या्जकी 
वृत्तिं यह मे, यह मेरा इस भावस जय्ती रहती है, 
परतु सुषुक्ति अवधयामें उक्तके अभिमानी प्राज्ञको पाकर 
उसीमें ठीन हो जाती है ओर उनकी साी जढन पिट 
प्रज्ञं यथाभिमतयो विजहुनरेन्द्र ॥२३॥ जाती दै ॥ 8 ॥ ; ५ 

८ शा; = त्रिय परीक्षित्‌ | भगवान्‌ सबके हृदयकी ब।त जान्‌ 
तास्तथा त्यक्तसर्शाल्ाः प्राप्ता आत्मदिदृक्षया । तनवो वि मथा 
ये ब्राह्मणपलिर्यं अपन माङ्-बन्धु ओर पति-पुत्रकि रोकने- 
षिज्ञापाखिरूरग्द्र्ा प्राह प्रहसिताननः ॥२७॥ | पर भी सन सगे-प्म्बन्धिर्यो ओर पिषर्योकी आद्या छोडकर 
केवर मेरे दरानकी कछार्तासे ही मेरे पाक्त आयी है, तव 
उन्दने. उनसे कडा । उक्त समय उनके मुखारविन्दपर 
शा ताति हास्यक्गी तरंगे अटलेच्थिं कर रदी थीं ॥२४॥ भगवान्‌ने 
स्वागतं वो महाभगा आयतां कराम कष्‌ । कदा-"मदामववता दवि व 
बैठा । कशो, हम तुम्हारा क्था खागत करर १ तुमलोगहभारे 
3 दङानकी शच्डासे यक्ष आयी हो, यह ॒तुश्रेजेसे प्रे 
यन्नी दिदृक्षा प्राप्ठा उपपन्नमिदं हि वः ॥२५५॥ पं ष्वव वावी 
किं संसारम अपनी सच्ची भगईैको समज्ञनेवारु जितने 
भी बुद्धिमान्‌ पुष है, वे अपने प्रियतमके समान हयौ 
मुञचसे प्रेम करते ह ओर रेषा प्रेम करते हे, जिकमे 
| किसी प्रकारकी कामना नदय रहती -जिक्षमे किपी प्रक्रारका ` 
अदतुकय व्यवहितं भक्तिमात्मप्रिये यथा ।२६॥ | व्यवधान, संकोच, छिपाव, दुधा वा दत नक होता 
| ॥२६॥ प्राण, बुद्धि, मन, शीर, खजन, खी; पुत्र जोर 
धन आदि संसारकी समी वस्तुरं जिक्षके व्यि ओर जिक्त- 
प्राणवुद्धिमनःखासमदारपत्यधनादयः । की सन्निधिसे प्रिथ ल्ाती है-उघ्त सासे ग 2 
| मञ्च श्रष्णसे बदकर भर्‌ कोन प्यारा हो पकता है 

‡ > 

। यर्सम्प प्रिया आसंशतत; को न्वपरः प्रिय! ।२७] | ॥२७॥ इसब्यि तम्दारा आना उचित दी है | ५ र 

। | व्रेमका अभिनन्दन करता द्व । परंतु भवे तुमओेग मे मए 
तद्‌ यात देवयजनं पतथो बो द्विजातयः । दर्चन कर चुकीं । भब अपनी यज्ञशाकमे गैट जाओ | 
‹ तुम्हारे पति ब्राह्मण गृहस्य है । वे तुम्डारे साय 


` «<=. ~ 


` खसत्रं पारयप्यन्ति युप्मभिगैहमेधिनः ।।२८॥ ही अपना यज्ञ पूण कर सकेणे' ॥ २८ 
॥ ~ हः ऋ + स * इत्यादि । हरो कृके । प पहले ठे (शाभग गबा । चुव च्‌ धिक! ठ ह 


अर; प्रवैर्य सुचिरं पशिरिभ्यतापं 





© + © © 
नन्वद्धा मयि इव न्ति ङश्वराः स्वाथदशेनाः 1 


३ ` 
त ॥ ॥ 7 + १ क. 41. , ++. । 
¶ # {4 ह ५ ^ क कन = 6 र 6 व." ^ 4 क 1.) 9 











न 


# + 
4 4 ५, ॥ 1; 
.- व 4 ॥ 13, 






भीमद्धागवतं [ ० ६३ 















परत्य ऊचुः | ब्राह्मगपल्लियोने कहा-- धन्तर्यामी इयामस्ुन्दर । 
नं विक क = आपकी यह बात निष्टुरतान्ने पूणे है | आपको रेभी 
मवं बिभोऽहंति भवान्‌ गदितुं मुक्तं बात नहीं कनी चाद्ये । श्रतिणेँ कहती कतै कि जो 


| एक्‌ वार्‌ भगवान्‌कोङ्प्तदहो जाता है, उसे पिर 
संसारे नदीं टोटना पड़ता । आप अपनी यड्‌ वेदवाणी 

। सव्य कीजिये | हम पने स्षमस्त सगे-पएम्बन्धिथोकीं 
| आज्ञाका उल्लद्खन करव आपव चरणो इसय्यि.आथी 
केशेन दमहिर्गयसम्तबर्धून्‌ | २४} दहै कि आपके चरणोसे गिरी इई तुच्ीकी माला पते 

वेशम धारण व्रं ॥२९॥ छामी | अत्र॒ हमारे 

गृह्णन्ति नो न पत्यः पितरोसुतावा | पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-वन्धु ओः खजन-सम्बन्धी 
। हमें छीकार नहीं करगे, फिर दृसर्शकी तो ब्रात दही 

न श्रातबन्धुसुहृदः इत एव चन्ये क्या है ! वीपिरोमणे ! अब हम आपके चरणे आ 

| पडी है । हमें ओ किधीका सह।रा नहीं है | इषव्यि 
अव हें दृसतेकी रणे न जाना पडे) रेक्षी व्यत्रस्था 


सत्यं कुरुष्व निगमं तव पादमूलम्‌ । 


| || 8 प्राप्ता षयं तुरुसिदाम पद्‌ वश्यष्टं 





तस्पाद्‌ भवस्प्रपदयोः पतितास्मनां नो 


नान्या भवेद्‌ गततिररिन्दम तद्‌ विधेहि \३०॥ , कीनि ॥ २० ॥ | 
| अगबान्‌ श्ी्कप्णने का~ -देत्रिये। | तुमरे पति. 


। श्रीभगवानुक्राच | 3 = 
पुत्र, माता-पिता, भाई-बन्धु -- कोई भी तु»: तिरस्कार 


नहीं करेगे | उनकीतो वातत ही क्ण, छारा सं्षार 










† नी ष द्‌ 4 ५ = 
स पतया नाम्यदयेर््‌ पितृभा तादयः । | त॒म्हारा खम्मान करेगा । इसका कारण है | अव्रतुम 
` हि मेश हो गयी हो, सुश्चये युक्त दहो गथीद्धो। देष्टोन, 


लोकाश्च वो सथोपेता देवा अप्यदुभन्वंते !३१॥ ये देऽता मेरी बातक्रा धनुमादन करं रहे दहं! ३१॥ 
|  देवियो ! इत संल मेरा अङ्गपङ्ग दी मलु्योपे मे 


प्रीति यां अनुराणका कारण न्हीं हं] रव्य तुम 
जाओ, अपना मन सु्षमे व्गादो | तुम्हं वहन शीघ्र 
मेरी प्राप्ति ह्यो जागी ॥२३२॥ 

भी्युकदेवजी कहते है--परीष्टित्‌ | जव भगवानूने 
शक्त प्रकार कडा; ठव वे ब्राह्मणपत्नियां यज्ञश्चारामे 
लौट गयी । उन तब्राक्षणोने अपनी श्ियोमे तनिक मी 
दोषदृष्टि नहीं की । उनके साथ मिलकर अपना यज्ख 
पूरा किया ॥ ३३ ॥ उन जियोमेसे एकको आनेके 
समय ही उसके पतिने बव्मूर्वक रोक च्या था | 
इसपर उक्र त्रा्मणपत्नीने मगवानके वैसे दी रूपका 
ध्यानं किया, जैसा किं बहुत दिरनोसे घन रक्खा था । 
| जब उसका ध्यान जम गया, तन मन-ही-मन भगवान्‌का 





त म) मनो मयि युद्धाना अचिरान्भामवाप्खथ ॥३२॥ 
नि 
त उवाच 








निपलन्यस्ता यज्ञवाट पुनमंताः 









वः खारि ४ द्ीभिः सत्रमपारयन्‌ ॥३३॥ 


^+ 
[न 0 4 , 
न, ष 






क. ^ 
नि ॐ , ग नै १ 
4 श न क्‌ 


अ० २३) 


हृदोपणुद्य॒षिजही देहं कमाुबन्धनम्‌ ।३४॥ 





भण्रबानपि मो विन्दश्तेनेबान्येन गोपकान्‌ । 


चतुविधेनाश्थिस्वा खयं च बुयुजे प्रथः \\३५५॥ 


एषं सीलान एएवखोङपद्रीखयन्‌ । 


रेवै गोशपमीषीनां रपय रूपया कते; !२६॥ 


अथानुस्मरर्य विप्रःस्ते “न्दकषप्यन्‌ इतागसः। 


भ 


यद्‌ दिद्वेश्धरयोयोच्जापहन्य नुविडस्धयो; 1३७) 


ज्ञीमां जगवति डुष्णे भक्तिमरोकिकीम्‌। 


आस्वनं च तय्‌! दीनवटुतप्ता व्यमहंयन्‌ ॥३८॥। 
धिषजन्भ नस्धिव्र्‌ वियां पिष्‌ वतं धिग्‌ बहुङ्ञताभ्‌] 
। धिक्‌ ङ्लं धिक्‌ क्रियादाक्ष्य वि्रुखा ये स्वधोक्षजे ३९ 


सूनं भगवतो साया योभिनापपि मोहिनी । 


| यद्‌ वयं गुरवो वृणा खां शुद्ामे द्विजाः ॥४०;) 


हाभिधाम्‌ ।४१। | हन्दने ग्‌ 


दश्चम स्कन्ध > 



































॥ 
५ नम | 


लालिङ्गन करके उसने कमके द्वारा बने इए शनन 
कारको छोड़ दिया--८ द्ध्य दिव्य शरीरसे 
उसने भगवान्‌की सन्निधि प्राप्त करढी)॥ ३४॥ 
इधर ` मगवान्‌ श्रीकृष्णने ब्राह्मणि्योके व्ये इर्‌ उस 
चार प्रकारके अनते प्के ग्ागर्गोद्तो भोजन कराया 
ओर पिर उन्होने खयं भी भोजन क्रिया] ३५॥ 
परीक्षित्‌ । इस प्रकार रीरमिनुष् भगवान श्रीकरष्णने 
मनुष्पकी-घी टी की ओर्‌ अपने सौन्दर्य, माधुय, 
बाणी तथा क्मेसि गौरं, षालबारु ओर गोपियैकरि 
आनन्दित किया ओर खयं भी उनके अढोकिक 
प्रेमरक्का आखवादन क्रके आनन्दित दृए ॥ ३६ ॥ 


परीक्षित्‌ ! इधर जव ब्राहणोंको यष माम ह्न कैः 
कि श्रीकृष्ण तो खयं भगवान्‌ है, तव उन्हं बडा | 
पठताग इआ । वे सेचने ठे क्रि जगदीश्वर भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण ओर वल्गमकी आज्ञाका उल्यछ्घन क्क्के हमने 
वड़ा भारी अपराध किया है) ये तो मनुष्यकी-घी । 
ढीठा करते इए भी परयेश्वर ही & ॥ २७ ॥ जव 
उन्होने देखा किं हमारी पल्नर्योके हृदयपें तो सगवान्‌क्षा 
अटौकिक तरेम दै णोर हभठेग उससे विल्कुक रीते है, 
तव॒ वे पडता-पहताकर अपनी निन्दा करने रगे 
॥ ३८॥ वे कने स्गे-- “हाय | हम भमगत्रान्‌ 
श्रीकृष्णसे विनुख हें । वड ऊचे कुले हमारा जन्म 
दओ; गायत्री ग्रहण करके हम द्विजाति इर, वे दष्धयन 
करकं हमने बडे-ब्डे यज्ञ किये, परतु व्ह सव क्कि 
कामका १ धिक्तार है, पिक्तार है! हमारी विचा व्यथं 4 
गयी; हमारे त्रच बुरे तिद्ध इए ! हमारी इष बह्हताको 
धिक्षार है । ऊंचे वंशम जन्म ठेना; कमंकाण्डमे निपुण _ 
होना किसी काम न अप्या | इन्हं वार-वार धिक्रर है 
॥२९॥ निश्चय हयी, मगत्रानकी माया वडे-बडे योगिर्थोको 
भी मोहित कर ज्तीहै | तभी तो हभ करते 
मलु्योके गुरु ओर ब्राह्मण, परंतु अपने स्वे खयं ` 
कशोर परमाथंके विषयमे बिल्छुर भूरे इए है 
कितने आश्चयकी बति है) ध तो ३ 
ये ज्जियां हे, तथापि 
कितना अगध प्रेम है, अनुगग 
ते नहर बहत ड। पक्ष 







| २८० श्रीमद्भागवत | अ० रेह 








नासां द्विजातिसंस्कारो न निवासो गुरावपि । जो मृष्युके प्षाथ भी नीं कटती ॥ ४१ ॥ इनके न्‌ 
तो द्विजातिके योग्य यज्ञोपवीत दि संस्कार इए है 


भौर न तो हन्होने गुरङ्कस्मे ही निवास किया है। 
न हन्होनि तपस्या की है ओर न तो आत्मके प्म्बन्धमे 
ही कुक विवेक-विचार किया है । उनकी ब्रात तो दूर 
र्वी, इनमें न तो परी पक्रत्रता है जर न तो द्युमकमं 
ही ॥ २ ॥ फिर भी समस्त योगेश्वरोके ईश्वर पुण्य 
कीतिं भगवान्‌ श्रीक्रष्णके दरणोमें इनका द्द प्रेम है | 
ओर हमने अपने स्कार किये है गुरुकुले निवास 
किया है, तपस्या की है, जाध्मानुक्चधान किया है, 
पवित्रताका निर्वाह किया है तथा अच्छे-अच्छे कमं किये 
नलु ख.थविमूढानां प्रमत्तानां गरेका । दै, फिर भी भगधान्‌के चरणोमिं हमारा प्रेम नदीं दै 
6 ॥ ४३ ॥ सच्ची वात यह दहै कि हमनेग गृहश्यीके 
4 काम-धंधोमे सतवे हो गये घे, अपनी मकाई ओर 
क + ना 9 | बुराश्को विल्छुक भूढ गये ये । अहो, भगवानूकी 
; सारयामा्त गाषवाक्यंः सतां ग तिः॥४४॥ व १. 1 गवत्व अ 

सेजकर्‌ उनके वचनोँसे हमं चेतावनी दी, अपनी याद्‌ 
दिलायी ॥ ४४ ॥ भगवानु खयं पूणेकाम दहै ओर 
वौवस्यमेोक्षपर्यन्त जितनी भी कामना होती हैँ उनको 
परणं करनेवाले हैँ । यदि हमें सचेत नही करना होता तो 
इशितव्येः किमसाभिरीशस्यैतद वि डम्बनम्‌।।४५५। | उनका हम-सरीखे शुद्र॒ जीवसे प्रयोजन ही क्या 
1 हो एकता था १ अवद्य ही उरन्ोने इसी उदेश्य 
: मोगनेका बहाना बनाया । अन्यथा उन्हं मागनेकी भगा 
4 क्या भावद्यकत। थी १ ॥ ४५ ॥ खय लक्ष्मी अन्य 
। सव देवतार्भोको डोड़कर धर अपनी चश्चता, गवं 
(` आ्मदोषापवर्गेण तद्याच्जा जनमोहिनी ॥४६॥ | आदि दोषका परि्याग॒ कर केवल एक वार उनके 
"चैः चरणकमलका स्पद्यं पानके न्य सेवा. करती रहती 
ष २ है | वे ह्वी प्रभु किंसीसे मोजनकी याचना करं, यह 
६, देश्व; कालः ए्थग्दरभ्य मन्त्रतन्त्रलिजोऽग्नयः। | ठोगोको मोदित करन ल्यि नही तो ओर क्या है। 
॥ ४६ ॥ देहा, काल, प्रथक्‌ पथक्‌ सामग्रिथ› उन-उन 
कर्मोमिं प्रिनियुक्त मन्त्र, अनुष्ठानकी पद्धति, ऋलिज, 
ग्नि, देवता, यजमान, यज्ञ ओर "मे - सुब 3 
ही रवरूप है ॥ ४७ ॥ वे दी येगेश्वरोके भी इष 
भगवान्‌ द्िष्णु स्वय श्रीकरष्णके रूपमे यदटुवंशिथीपें अवतीणं < 


^ «= शनभ जनन्य म जन्तू 


न तपो नान्ममीमांसा न शोचं न क्रियाः शुभाः ।४२]। 
| अथापि दहयत्तमरलोके कृष्णे योगेश्वरेधरे । 


च ® 8 पि 
भक्तिद्टा न सास्माकं संस्कारादिमताभपि ॥४२॥ 





अन्यथा पूणंकामसख कैवरयाचाशिषरां पतेः । 


।। ५ 04 । 9 ॥ 
ष | 













हित्वान्यान्‌ भजते य॑ श्रीः पादस्पर्शाश्या सत्‌ 











1 


~ ज र ^ न 
१ "+ 4. क „व+ 

















नातो यदुष्वित्यभृण्म ह्यपि मूढा न विह ॥४८ ॥ | हए है, यह वात मने हन क्ती यी; परत इम _ ` 
£ इतने मूढ ह कि उन्दं पहचान न सके ॥ ४८ ॥ 
अहो वयं धन्यतमा येपां नस्ताकशीः ज्ञियः । यह्‌ सत्र होनेपर्‌ मी कम धन्यातिधन्य हैँ, हमारे अहो- 
म्यह | तभी तो हमे वैसी पलिर्यो प्राप्त इई है |. 
उनकी भक्तिसे हमारी बुद्धि श्री मगवान्‌ श्रीङ्गव्णके 
म्यं अविचल प्रमसे युक्त हो गयी है ॥ ४९॥ प्रमो! 
नमस्तुभ्यं भगवते ष्णायाङ्क० 2 ॥ 
© वपे छृष्णायाह्ण्ठमेधसे । ्ाप अचिन्ध्य ओर अनन्त रेश्वयेकि खामी हैँ । 
~ ् 7क्रष्ण्‌ ! है | अपि 
य॒न्मायामोहितधिषौ श्रमः कषेचत्म॑सु ।(५९०।) 1 1 ( प ग 
हमारी . बुद्धि मोहित होदी है ओर हम क्मेकि 
स व ग्‌ अयः परुषः स्वमायामोहितास्मनाम्‌ । प हम भापको  ् करते 
दै }} ५० ॥ वे आदि पुर्पोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्ण हमारे 


इस अपराधको क्षपा दरं; क्योकि हमारी बुद्धि उनकी 
अनिजञातालुभावानां शन्तमरदत्यदिकरमम्‌ ॥५१॥ | गायसि मोदित हो रही ह नोर ` तम न 


ह न जाननेवाले अज्ञानी है ॥ ५१ ॥ 

इति स्वाघसतुस्छत्य छष्णे ते कतहेरनाः । परीक्षित्‌ ! उन त्राह्मणोनि श्रीकृब्णका तिरस्कार 
किया था} अतः उन्हं अपने अपराधकी स्मृतिसे बड़ा 
पश्चात्ताप हआ ओर उनके हृदये श्रीकृष्ण-बलरामके 
दरशनकी बड़ी इच्छा मी इई; परंतु कंसके डरे मारे 

दिद्क्षवोऽप्णच्युदयोःकंसाद्‌ भीता न चाचरन्‌ ।५२। | वे उनका ददान करने न जा स्के ॥ ५२॥ 

स ० 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दश्चमस्कन्धे पूर्वे 
यज्ञ ल्युद्धरणं नाप त्रयोदियोऽध्यायः १२२ ॥ 


भक्त्या यारा सतिजाता अस्माकं निश्चला हरै) ४९॥ 





~<: 
अथ चतुविंशोऽध्यायः 
। इन्द्रयश्च-निबारण 
परीदं उवाच भीश्चकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ 1 भगवान्‌ ` 
< „ श्रीकरष्ण्‌ बलरामजीके साथ बन्द्पवनमे रहकर अनेक 9 
` मेशवानदि तत्रेव बरुदरैवेन संशुतः। कार्की सीद्‌ कर रे ये । उन्दने एक दिन देवा ` 


किं वरहोकि सन गोप इन्द्र-यज्ञ करनेकी तैयारी कर रहे . 
दे ॥ १ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण सबके भन्तयामी ओर 
&  तदभिज्ञोऽपि भगवान्‌ सर्वात्मा पर्वदशंनः। सज्ञ हैः। उनसे को$ बात छिपी नहं थी, वे सब जानते 
ह थे | फिरभी बिनयावनत होकर उन नि नन्दबाबा आदि 

भरयावनतोऽप्रच्छद्‌ बद्धान्‌ नन्दपुरोषमान्‌ ॥ २ ॥ | बडे-बरूदे गोपसि प्छा--॥ २ ॥“पिताजी ] आपरोगेकि 
`  श-प्राचीन प्रतिमे (महो वयं ˆ “घे लेकृए८- ` "निश्चला हरौ तक्करा पाठ नहीं है । २. सक्षपै । ३. पल्नुपदथनं 


नाम [वृक 1 छ. न ` अ" र ह, 2 = 
¶ जयाविश्चतितमो° | वाच | न 


अपरश्यन्निवसषन्‌ गापानिन्द्रयागङ्तोधसान्‌ ॥ १॥ 

















० स० खं० २. ३६-- 





(^ 


कथ्यतां मे पितः कोऽयं सस्ममो ब उपामतः। 
कि फल कस्य चोदेशः केन षा साध्यते सखः \। ३} 
एतद्‌ बूहि सहन्‌ कामो मद्यं शुशरषदे पितः । 
न हि गोप्यं हि साधूनां छृत्यं सर्वात्मनासिह । ४\। 
अस्त्यस्वपरद्टीनाप्रोदास्तविद्विएस्‌ । 
उदासीनोऽरििद्‌ दञ्ं आत्स्वत्‌ सुहृदुच्यते\ ५॥ 
ज्ञात्वा ज्ञारव्‌ः च कमणि जनोऽयमडुतिष्टति । 
विदुषः कम॑सिद्धिः स्यात्तथा नाषिदुषो भषेत्‌ ॥ ६ ।! 


तत्र तावत्‌ क्रियायोगो भवतां रि षिचार्ठिः । 


अथवा लोकिकसतन्मे एच्छतः खाधु भण्वताम्‌ ।!७ ॥ 


नन्द उवाच 
पर्जन्यो 
पजन्यो भगवानिन्द्रो बेषाशतस्य(त्ममूर्तयः | 


तेऽभिवर्षन्ति भूवन प्रीणनं जीवनं पयः ॥ ८ ॥ 


-4 त॒ तात वयमन्ये च वाचां पतिमीश्वरम्‌ ! 





 तच्छेषेणोपजीवन्ति 





= ज = = - - -------~ ~ पो ~ ऋ च 2 ह: हः 
कन्व (ऊ, ~ 4 त व ॥ > + ष क , ५ + ३ +. क । न 4 अं 4 1 > ~ "द 
ॐ १ | | (द च | । 1 =त्‌। | | > च (र > कः ~ । १ त ह # लः । = दरः क = म 4 - 
¦ र. (2, = 1 
च तं व्‌ च न भि“ कीः र > 4 पे 
क 8 त | म 0 कः र ॥ ५ क द्द ; + ॥. ए २. त "+ 4 
न 1 744 ~~ = = +~ प 
क ~ | = 
चः 


= द्रव्यैसपरेव्षा सिदरजन्ते क्रतुभिनेखः ॥ ९॥ 


तरिवगफरुहेदपे । 
` पुरूषकारणां पजंन्यः फरभावनः ॥१०॥ 
` विदजेद्‌ धम प।रम्पयांगतं नरः 


काः | र{ट.] १९ {६ 116 सवं नाप्नोदि शोभ१११ 


श्रीमद्भागवत 





(= +. 
> 


प्ामने यह कौन-सा बड़ा भारी काम, कौन-स्ा उत्सव भां 
प्च है ? इसका फल क्या है १ किस उदेश्यसे, कौन ेग, 
किन साधरननोकेद्रारा यह यज्ञ दिया करते है १ पिताजी | भाप 
मुञ्चे यह अवश्य बतच्महये !} ३ }} आप चेरे पिता ह भौर 
आपका पुत्र } ये बातें छुननैक च्यिं सुल कड़ी उत्कण्ठा 
भी है| पिताजी | जो संत परप वको अपनी आता 
मानते है, जिनकी द्मे अपने ओर पशयेका भेद नहीं 
है, जिनका न कोई भित्रदहै, न रात्र ओर न उदासीन 


उनके पस्च छिपनेकी तो. कोई वात ह्येदी ही नहीं | 
प्रतु यदि रेसी स्थिति न्‌ हो, तो रहस्यकी वात शत्रुकी 


माति उदासीनसे भी 
अपने सपान दी कह; ) हल्यं 
छिपायी न्वी जाती }॥ %-५ }} यह संक्तारी सनुष्य समक्षे 
बेसमञ्चे अनेकों ध्रकारफे दर्मोका अन्ठान करता है । 
उनमेसे छमश्च-नूङ्ककर्‌ पुरुपोके कमं जसे 
सफर होते हे, वैसे येक्चमच्चरे नहीं !} & ॥ अतः इस 
सभय आपलोग जो क्रियायोग करने जा रहै हँ, वह 
षुषटदोकि साथ विचासति--शलस्म्पत है अथत्रा लौकिक 
ही है-- यै यह सव जानना चाहतः ईह; आप क्रपा करके 
स्पष्टरूपंसे वतलाहये }} ७ | 


= > १६्ये । = 
न्म दहनी चाहिये | क्नित्रतो 
# क 
1 


गया हे 


~ न्न {~ ५ 
{141111५ 


आप्‌ 


नन्द्वावाने कष्टा-- वेटा } भगवान्‌ इन्द्र वर्षा करने 
बाट मेघके खाभी हं । ये मेध उन्दी अपने ल्य है| 
वे समस्त प्राणि्योको तप्र करनेवाखं एवं जीवनदान 
करनेवाखा जल वरस्ते दहै! ८ ॥ येरे प्यारे पुत्र) हम 
शीर दूसरे ठग मी उन्हीं मे्पति भगवान्‌ इन््रकी यज्ञके 
दारा प्रजा किया करते हँ । जिन सापग्नि्धसे य्न ह्येता 
है, वे भी उनके बरद्ाये इए शाक्तियाी जच्ते दही 
उत्पन्न होती ह !} ९ ॥ उनका यज्ञ देके बाद जो 
कुछ क्च रहता है, उसी अन्नसे हम सत्र मनुष्य अथं, 
धर्म कौर कामख्य त्रिव की सिद्धिके चल्ि अपना जीवन्‌- 


निर्षाह करते है । मनुष्ये खेती भादि प्रयलेकिफठ ` 


देनेवाले इनदर हीर) १० ॥ यह धमं हमारी कुल- 
परभ्परासे चदा आया ह । जो मुष्य काप, गोम, भय 


अयवां द्वेषश्च रेसे परम्परागत ध्मेको छोड देता है, ` 


8१६ क 
वि 


उसक् कभी मङ्गल नदी हता ॥ ११ ॥ 





[अ०२६ 


~~. 


र कनक र = ह 4 क क 
2 4 । कैक कर क ५8 2 य 
4 क ~ ऋ. ~+ र दु 
न्क १२ कवि क 
क ५ क्य 
त के नः + = 


~ व 4 ॥ =. 
~ >» ५ 


~" | 8 ह 
॥ न 1 [४ 
~ 53 1 र क ४ ~ 
ब 4 4 . वेक ~" - 
"द ३ ॥ ~ ह. 



























































+ कः+ क 9" | 
4 ऊ ध । । 


अं० २४ | दशम स्कन्ध - २८३ 4 


व 





® ` 
ति ~ 
हि क । |. 





श्रीक उदा शरी श्चकदेवजी कहते दै--परीध्वित्‌ ! हया, इकर 
वचो निक्चम्य नर्दश्च तथान्येषां वजौदसास्‌ । दिके भी शान करनेवाटे केडाव मगवान्‌ने नन्द्वाबा ^ 

। ओर दूसरे त्रजवाधिर्गेकी बात घुनकर इन्द्रको क्रोध "की 
इन्द्राय सन्युं जनथन्‌ पितरं प्राह केशवः ।॥१२॥ | दिलनेके व्ि अपने पिता नन्दावासे कडा ॥ १२ ॥ 


न भीभगवानले कष्टा- पिताजी ! प्राणी अपने कर्मके 
र अनुषार हयी पैदा होता ओर कसे ही मर जाता है | उसे 
कमणा जायते जन्तुः दर्मणैव विलीयते । उसके कमे भदुसार दी सुखदुःख, भय ओर्‌ मङ्टके 


निमि्तोकी प्राप्ति होती दह ॥ १३॥ यदि कमेक ही 
सव कुछ न मानकर उनसे भिन्न जीवक कमका फक 
देनेवाला ईश्वर माना मी जाय, तो वह्‌ क्म करनेवार्येकरो 
ही उनके कमके अनुप्तार फैल दै सक्रतादै | कमं न 
आस्त दद्‌; क।4त्‌ रररप्यल्यद्सणाच्‌ । करनेवार्छोपर उसकी प्रसुतां नदीं चर सकती ॥ १४ ॥ 
६ जब्र समी प्राणी अपने-भपने कर्मोका द्वी फर भोग रहे 
कतारं भजते &ऽपि न्यकतः प्रभं सः \\१५४}। | है, तव हमे इन्द्रकी क्या आवद्यकता है १ पिताजी । 

जव वे पूवसंस्कारके अनुकार प्राप्त होनेवाठे मनुष्योकि 
किमिन्द्रेणेह भूतानं खखकमालुदतिनाम्‌ ¦ कम-फख्को वद्र दही नहीं सकते-- तब उनसे 


प्रपो जन {|| १५] मनुष्य अपने खमा ( पूतर-सस्कारो ) 
के अधीन है । वह्‌ उघ्ीका अनुष््रण्‌ करता है । यहंतक 
भावतन्त्रो हि जनः सभाव किं देवता, अघुर, मनुष्य आदिको व्यि इए यह सारा ` 
स्अभावतन्त्रो हि जनः खभवेमडुबतेते ¦ जगत्‌ खमा डी अत हे ॥२९॥ बन 
स्वभावश्भिदं सव॒ सदैवाषुरमालुष्‌ ॥१६। के अनुसार उत्तम ओर अधम शरीरोको भ्रह्ण करता 
ओर छोडता रहता है } अपने ककि अनुसार हयी ध्यह॒ ` 
देहालुरवाधचाङन्तः यप्योरलूजति कमणा । शत दै, यह मित्र है, यह उदासीन है" रसा व्यवहार ` 
करता है। कर्होतक कदरः कमद्ी गरुद ओरक्मे 
शवुभित्र्ुदासौनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥१७॥ | ही शवर ॥१७॥ इसब्ि पिताजी ! मलुम्यको चाहिये 
सत ६ किं पृदसंस्कारोवे अनुसार अपने वणं तथा आश्रमके 
तखट्‌ सम्पूजयेत्‌ कम स्व भवस्य; स्वश्षमञ्त्‌। = | अनुक धरमोका पालन करता हआ क्का ही आदर 
र 3 करे । जिपके द्वारा मलुष्यकी जीविका सुगमतासे चख्ती ` 
अज्ञा येन्‌ बरव तदेवाख्य हि दच्च ।\१८॥ | है, वही उसका इष्देव होता है ॥ १८ ॥ जैसे अपने ` 
व्रिवाहित पतिको छोडकर जार पतिका सेवन करनेवार्ढ 
व्यभिचारिणी ज्ञी कभी चान्तिाम नद्यं करती, वैसे ही 
जो मनुष्य अपनी आजीविका चखानेवा एक देवताको 


सुखं दुःखं अयं क्षेमं छषेणेदाभिषयते ।१३॥ 


नी शेनारथ९ वभावत वृभास्‌ ॥१२५॥ 


॥ 1 
। क & 


आजीव्यैकतरं भावं यस्लन्यशुषजीववि । 





न तसाद चिन्त कषेमं जारं नायसती यथा ॥१९॥ | 


बतत नह्मणा विप्रौ राजन्यो रथमा शषः । 


(= =; --- 3 ~ = 
१. बाद्रायणिख्वाच 


ॐ 
^" ~~ २, ग 4 
^ क. 4 १ 
हि 7 ६> 





[व > ~ - पण्ड ‡ 
२८ ¢ श्रीमद्धामवतं [ अ २४. 
त ववव्वववयवचच्वववव=------------- ------ 








बरथस्तु वातया जीवेच्छद्रस्तु द्विजसेवथा ।\२०।} चत्तिसे ओर यद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय ओर वै्योकी सेवसे 
{ १ अपनी जी्रिकाका निर्वाह करं ॥ २० ॥ वैर्योकी 
छृषिवाणिज्यगोरक्ष। सीदं ठयञ्चच्यह । वाताद्त्ति चार्‌ प्रकारकी है- कृषि, वाणिञ्य, गोरा 


य ओर ग्याज लेना | हमटोग॒ उन चारोमेते एक केवछ 
वातां चतुबिधा तत्र वयं गो्योऽनिसम्‌ ।२१।, ६. 
| ९ इतयोऽनि्म्‌ ॥२१ | गोपन दी सदासे करते आये है ॥ २१॥ पिताजी] 
† 6 कि त सिरपसपरय्व | इस संसारक श्थिति; उत्पत्ति ओर अन्तके काण क्रमशः 
¢ सत्वं रजस्तम इति स्थितयुत्परयन्तदैतवः | | सगुण, रजोगुण ओर हमोगुण है । यह विविध प्रकार 
का सम्पूणं जगत्‌. ज्जी-पुरपके संयोगसे रजोगुणके द्वारा 
उत्पन्न होता ह ॥ २२॥ उसी रजोगुणकी प्रेणासे 


मेघगण प्षव कीं जल वरसि है | उसीसे अन्न भौ 
( रजक्षा चोदिता मेघा वकेनःयम्बूनि सवतः व 
॥. देता मेषा बधन्पयम्बूनि सवतः । अन्नसे ही सन जी्ोंकी जीविका चचती है । इमे मा 


इन्द्रका क्य ठेना-देा है का 
परजास्तेरेव सिद्धयन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति॥।२३।। | >“ ` तना रना 5 { बह भला कवा कर सकता 
हे १॥ २३॥ 

न नः पुरो जनपदा न ग्रामा न गृहा वयस्र । पिताजी ! न तो हमारे पास किषी देशका राज्य ` 
है ओरन तो बड़-व्डे नगर दही हमारे अधीन है। 
हमारे पाक्ठरगोवयाषर भी नहह । हम तो प्तदके 
तसाद गवां ब्ाह्मणानापद्रेारम्पतां मखः । वनवापी हँ, दन ओर पहाड़ दही हनारे घर ह।॥२१॥ 
स इसलिये हमलोग गोओ, ब्राह्मणों ओ गिरिराजका यजन 
इन्द्रयागशम्भारास्त ४५तां सखः | तं र येज ौँ 
[सम तात. मलः ॥९५॥ करनेकी तयारी करं । इन्द्र-यज्ञके व्यि जो सामग्रियां 
पच्यन्तां विविधाः पाकाः प्रषान्ताः पायसादयः} | शकटी की गयी है, उन्हीसे इष्ठ यज्ञका अनुष्ठान होने 
> 6 ~ दे ॥ २५ ॥ अनेकों प्रकारके पकवान-- खीर, हत्वा, 
| 8 ष्कृदटद्य) त । हि = ॐ _ ^ ९ ५ 
0१ दाह्य गताम्‌ ॥२९॥ पूजा, पूरी आरिसे टेकर भूगकी द्‌।लतकर वनाये जायं 
त्रनका सारा दूध एकत्र कर च्या जाय ॥ २६ ॥ वेद- 
वादी ब्राह्मणोके द्वारा भटीर्भोति हवन काया जाय तथा 
अन्नं बहुविधं तेभ्यो दें बो धेबुदक्षिणाः ॥२७॥। | उन्हे अनेको प्रकारके अन्न, गौर ओर दक्षिणा“ दी 
६ जार्यै ॥ २७ ॥ ओर भी, चाण्डा, पतित तथा कुततो 
अन्येभ्यश्चाश्चचाण्डाङ्पतितेम्यो यथाहतः | तकको यथायोग्य वस्तुएं देकर गायोको चारा दिया जाय 
क क | | ओर फिर गिरिराजको भोग खाया जाय ॥ २८॥ 
' यवसं च गवां दत्वा गिरये दीयतां बिः ॥२८॥ 5, 
कः पहनकर, गहनोँसे सज-प्तजा च्या जाय ओर चन्दन 
= ्‌ व्गाकर गौ, बाह्मण, अगि तथा गिरिरिज गोवधेनकी 
| श्रद्‌ प्रदक्षिण च रुत मोविप्रानरपवेतान्‌ ॥२९॥ | प्रदक्षिणा की जाय ॥ २९ ॥ पिताजी | मेरी तो देषी 

ए = प - ह्वी सम्भति है | यदिः भाप गोरगोको रुचे, तो दा ही ह 

एतन्मम मतं तात क्रियतां यदि रोचते। कीजिये । देखा यज्घ गौ, ब्राहमण ओर गिरिराजकोतो प्रि ` 


अयं गोना मंच दथितो मल ॥२०॥ शग ये मौ डत भ दै ॥ २०॥ 


= ~ वि 9 १६९ ४.) 
द ि । ह ह १ क 
क $ च | ' कि, [ कि क ऋऋ न्न = ॥ि त = = ४, < ^ नोयः १4 ॥ि 
नः ~ न न * 9 प छ क = 2 8 2 हि 
- ह ^ = क 1. क = 4 ५ बि - ४ ~, चै १ छे = 
र {९ “य ==> 





रजसोप्पद्यते विश्वसन्यान्यं बिनिधं जषह्‌ ।(२२॥ 


नित्यं बनोकसस्तात वनरेरनिवािनः ॥२४॥ 


9 + 4 
+ 
+ -व 
£ रै 
। } 
ऋ, 
8१ 
४; 
४ 
9; 
। # 1 
ध न 
` 









हुयन्तामग्नयः सम्यम्‌ ्ाहमणेत्रंहवादिभिः । 












> 
# -~ ^; 
(क 





न्व” र ४ 4 
„4 तै = = कि क 


4५4 ॥ 9.4 0 


इन्द्रसद्‌ाऽऽस्भनः पूजां ज्ञाय विहतां यष । 


अ २५ | 





द्रप रहन्ध 


२८५ 








श्रीद्ुक उवाच 
कारत्मना भगवता शक्रदपं जिघांसता । 
प्राक्त निन्नम्यं नन्द!चाः छाध्यगृह्तन्त तद्वचः ।॥२१।। 
तथा च उथृदधुः खवं यथाऽऽह मधुष्दनः । 
वःचथित्वा खस्त्यथनं दददरन्येण गिरिद्विजान्‌।२२। 


उपहृर्य बलीन्‌ सर्वानादता यवपरं भवाम्‌ । 


गोधनानि पुरस्डस्य गिरिं चक्रुः प्रदक्षिणपर ३३ 


अनांख्यनड्घ्युक्तानि ते चारुह्य खलङ्कताः । 
गोप्यश्च दृष्णदीयाणि गापन्त्यः स दविजार्िषः॥ ३४॥ 
कुऽ्रस्त्मन्यतेसं रूपं गोपरिभ्रम्भण गतः । 


क 


कोऽसीति घ्ुबन्‌ भूरि बकिमादद्‌ ब्रहदरपुः३५॥ 
तप्परे नभो व्र जजनैः खह चक्रे आत्मनाऽऽत्मने। 


अहा परयत शेरोऽसौ रू¶ नोऽनुग्रहं व्यध।त्‌।(२६॥ 
एषोऽचजानतो म्यान्‌ कामरूपी वनोकसः । 
हन्तिद्यस्मं नमस्यामः छ मणे आरमनो गवाम्‌ । ३७ 


हत्य द्रिगोद्िजमखं बच।सुदेवभ्रणोदिताः। 


यथा विधाय ते गोपाः सहकृष्णा व्रजं ययुः ॥३८]। ` 





भ्रीगयुकदेवजी कते ह--परीक्ित्‌ 1 काध्मा 
मगवान्की इच्छा थी किं इन्द्रका मण्ड चूर-चूर्‌ करदे | 
नन्दवावा आदि गोपने उनकी वात सुनकर बड़ी ्रप्तननता- 
से स्वीकार कर टी ॥ ३१ ॥ भगवान्‌ श्रीङृष्णने नित्त 
प्रकारका यज्ञ करनेको कह।[-या, वेसा ही यज्ञ उन्होने 
प्रारम्भ किया पह ब्राह्मणो स्वस्ित्राचन कराकर उक्षी 
सामग्री गिरिज ओर ब्राह्मणोको प्ादर भटे दीं, तथा 
गोर्जको हरी-हरी घाक् खिटायीं | इ6के वाद नन्दवावा 
आदि गो्पोने गौओंको भगे करके गिर्रिजकी प्ररष्टिणा 
की ॥ ३२-३३ ॥ ब्राहमर्णोका आशीर्वाद प्राप्त करके वे 
ओर गोपियाोँ भी्मोति श्चङ्गार करके ओर बैकंसि जती 
गाडिर्योपर सवार होकर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी कीराओंका 
गान करती इई गिरिराजकषी परिक्रमा करने टगीं॥२४॥ 
मगवान्‌ श्रीकृष्ण गोर्पोको त्रिश्वाप्त दिलनेके व्यिं गिरि 
राजक ऊपर एक दूसरा विशार शरीर धारण करके प्रकट 
हो गये, तथा भ्म गिरिराज दहै इस श्रकार कहै इए 
सारी सामग्री आरोगने कगे | ३५ ॥ मगत्रान्‌ श्रीकृष्णने 
अपने उस स्वरूपको दूसरे व्रनवािर्योक साथ स्यं भी 
प्रणाम किया ओर कहने ख्गे-- देखो, कैषा आश्वर्यं 
है | गिरिराजने साक्षात्‌ प्रकट होकर हभपर क्पाकी 
है ॥ २३६ ॥ ये चाहे जैसा खूप धारण कर सक्ते है । 
जो वनवासी जीव इनका निरादर करते हे, उन्दँये नष्ट 
कर डालते हैँ । भाओ, अपना जीर गौओंका कल्याण 
करनेकं लिये इन गिरिराजको हम नमस्कार करे ॥२७॥ 
इस प्रकार भगव्रान्‌ श्रीहृष्णकी प्रेरणासे नन्दबाब। आदिं 
बडे-बुदे गोपने गिर्िज, गो ओर ब्राहम्णोका विधिप्रकं 
पूजन किया तथा फिर श्रीकृष्णके साध सव व्रजमें नटः 
आये ॥ ३८ ॥ 


----9ानजन्डछथ्०-ए 0 ~ - । 
इति श्र द्रागतरते मह(पुराण पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्वे पूरे 
चतुविशोऽच्यायः ॥ २४ ॥ 





अथ पञ्चविरोऽध्यायः 


गोवधनधार्ण 


श्रीशुकं उवाच 


श्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ । जब =न्द्रको 


` पताच्गा किं मेरी प्रजा बंद कर दी गयी दहै, तब वे 4 


१, प्रचो० । २, इन्द्रमखमङ्गश्तु° । ३, बादरायणिख्वाच । 





न 
४ 4. 
१. 1) 1. का ` 





ज 
क 


ह. | 
ह ण % 
= वववव्वचवच्थ््---------------------- ~ 


` गोपेभ्यः छ्ष्णनायेभ्यो नन्दादिस्परुचुकोप स)\१ । | नन्दवावा आदि गोपोंप्‌ वहत ही क्रोधित इ९। पु 
उनके क्रोध कनेस्ते होता क्या, उन गोपक र्कं 
गणं सावत नाम सेषानां चान्तकारिभाम्‌ । तो स्यं मगणकान्‌ श्रीहृष्ण ये ! १ ॥ इन्द्रको अपने 
पदका वडा घमण्ड था, व॒ भम्क्षते थे किमह 
इन्द्रः प्रचोदयत्‌ कुदो वाक्यं चाहैशमन्युत ॥। २॥] | त्रिञकीका ईर द्व । उन्दने व्रोधसे हिटमिमकर 
प्रख्य करनेगले मेधोके सादतंक नामक गणको व्रन्‌ 
अक्षे श्रीमद्‌ शहास्स्यं गोपानां काननौककषापू | चार करनेकी भाज्ञा दी बौर कदा--} २ ५ "ओह, 
इन जंगी शार्मको इतना धमण्ड ¡ सचमुच यह धनका 


चि 


5 + ~ ~ - न 
कृष्णं सत्ययुाश्चित्य ये चक्र्देबहेलनमर्‌ । ३॥। | दी नशा है । मन्न देखे तो सदी, एक साधारण 



































भति श = जकः 


ध ; 2 मनुष्य कृष्णक वखपर उन्टोने पञ्च॒ देधराजका अपमान 
यथद्टः इममरः करतुभिनामन। नभ॑ः | कर डाला ३ ॥ जसे पृ्वीपरं वहत-से मन्दवुद्धि 


पुरुप भवस्तागरसे पार जानेक्ने सच्चे सधन व्रह्यविदाको 
तो छोड देते दँ ओट नाममात्रकी टूटी इई नावसे- 
कममध यज्ञोप्त इस घोर दंशर-सागरको पार करना 
चाहते ईँ! ॥ कृष्ण्‌ वकदादी नादान, भषिमानी 
ओर मूख होनेपर भमी अपनेको वह्ृत वडा ज्ञानी 
पमञ्चता है । वह स्वयं मृत्पुका प्रापि है । ङि भी 
उसीका सहारा टेकर इन अहीने मेरी अवदैट्न। की 
है॥ ५॥ एकतोये्योदही धनके चेमे चूर हं 
रहे थे; दक्षरे छृष्गने इनको दौर वदरावा दे दिया है| 
अव तुमगेग जाकर इनके इ धनको धमप ओर्‌ 


१. ता क हैकडीको धूल मिला दो तथः उनके पद्युर्थका संहार 
क. - 2 चरतत नागपरुद्यात जघ्‌ 1 कर डाो ॥६॥ मै गी तुग्ट।रे पीछे -पीछे दैरःवत ह[थीपर 


विद्याभान्वीक्िकीं हित्वा तितीर्षन्ति भवार्णवम्‌ ।।४॥ 
वाचालं बालिश सन्धमज्ञं पण्डितमानिनस्‌ । 
भ्ण सत्यषुपाभरिस्य गोपा से चह्ुरभ्रियम्‌ \ ५। 
एषां धियावरिप्रा छृष्णेनाप्ायितार्मनाष्‌। 


धुत श्रीमदस्तम्भं पञ्चून्‌ नयत संक्षश््‌ ॥ ६॥ 


> नवदकर्‌ नन्दको व्रजका नाश करनेवेः व्यि सहापराक्रमी 
$ मरु ग्द, ¢ हवी नः ् ५ 
खद्रणंसेहवीयेनन्दगोष्ठजि्षाक्षया ॥ ७॥ | मरुदरणेकि घाच अता ई ॥ ५ ॥ 
श्रीद्ुक उवाच श्री श्युकेवजी कहते है-- परीक्षित्‌ । न्द्रे इस 
प्रकार प्रल्यके मेघोको आज्ञा दी ओर उनके बन्धन 
त्थ $ † चक्तबर १ ०५ ९ 
ई + प्रा मेषा नि धनाः । खोल दिये | अव वे वडे वेगसे नन्दव।व।के व्रजप्र 


नन्दगोलमात्तारैः पीडयामासुरोजसा ॥ ८ ॥ | चद आय धीर मूता पानी बरसाकर सारे नको 
४ पीडित करने स्मे ॥८॥ चारों ओर बिजव्यां 


1 विद्ुद्धिः सनन्त; सनयित्तुभिः चमकने ठगी, वादक आपसे टकराकर्‌ कड्कने तो 

8 क्षीर प्रचण्ड भँधीकी प्रेरणासे वे बड़े-बड़े ओठे बरसाने 
कगे ॥ ९ ॥ इस प्रकार जव द-के-दन बादल बार्‌- 
बार आ-भआकर खंमेके स्मान मोटी-मोदी धारारए गिराने. | < = । 









~-- ष्ण ल दलशः 


त 
हि 


च ५ 
सं 


° ५५ । द्म स्दन्ध 2८७ 











ललौषेः प्लाव्यमाना शू्नौदश्यत नतोञ्तम्‌ ।॥१०॥ | को, तव व्रजभूमिका कोना-कोना पानीसे मर्‌ गया 


भर कहाँ नीचा है, कहँ ऊँवा- इसका पता चगना 
कठ्नि हो गया ॥ १० ॥ दस शकार मू्चघार षां 
तथा भ्ंज्ञावातके श्रपटेसे जव एक-शक पञ्च विटुरने 
भौर कोपने का, वाल ओद ग्ालिनं भी टंडकै मारे 
अत्यन्त व्याक्ुर हयो गयीं, तव दे सव-के-प्तच भगवान्‌ 
श्रीकरष्णकी शरणमे आये ॥ ११ ॥ मृञ्च््ार वासे 
स॒ताये जनके कारण स्ने अपने-अपने किर ओर 
वचच्चको निककर्‌ अपने दारीर्के नीचे छिपा लिया 
था ओर वे रोपिते-कापते मगवान्‌की चरणङारणप 
छरस्ण्‌ कृष्ण सदाश्ाभ्‌ सवन्नाथं गोङ्कस प्रभो ; पचे }! १२ ॥ ओर वोठे ~ भ्यारे श्रद्ष्ण ! तुम बड 
भाग्यवान्‌ हो | अव॒ तो कृष्ण | दैव तुम्हारे ही 
| भाग्ये हमादी रक्षा होगी | प्रभो ! इस सारे गोक्च्के 
एकमात्र खामी; एकमात्र रक्षक तुम्हीं हो । मक्तवत्छट । 
इन्द्रके क्रोधसे अव तुम्हीं हमारी रक्षा कर क्रते 
होः ॥ १३ ॥ मगवानने देखा कि वषां ओर ओ्छवी 
सारसे पीडित होकर सब वेदो दहो रहे हैँ । वे समञ्च 
गये कि यह सारी करतत इन्द्रकी है । उन्होने दी 
क्रोधवशा रेसा किया है } १४॥ वे मन-दी-मन 
कहने ल्गे-- हमने इन्द्रका यज्ञ मङ्ख कर दिया दहै, 
इसे वे त्रजका नारा करनेके ल्य विना ऋछतुके ही 
यह प्रचण्ड वायु ओर शोके साय घनघोर वधं कर 
रहे है ॥ १५ ॥ अच्छा, मै अपनी योगमायासे इका 
भठीभोंति जवाब दंगा । ये मूषंतावडा अपनेको लोकपाल 
मानते &, इनके रे खयं ओर धनका घमण्ड तथा अज्ञान 


अर्याद्ारा्िवातेन रष्व जातदेपएनाः । 
गोका गोप्यञ शीता भोरिन्दं इरणं ययुः । ११॥ 


[दसरा इडः) 


श्िरावषनिपातेन हन्यमानश्वेतनम्‌ 


[निरी 


निरीक््य गवयान्‌ येने इपिदेन्द्रशृदं दरिः ॥९४ 


॥ {1 ~+ 1 ~ 


- दर्द्ररि = सिधा 
‡ख्बुणृ वदद खखशयब्रू ॥ 


पि क, श्‌ 
"+~ # 3 1 


7 ८ ५१ = नः © + 
सख थार वहत भरन्द्रा दश्चःय चपि ।॥१२५॥) 


प, 


तत्र॒ प्रतिधिधि सश्यगात्ययोगेम्‌ साच्च) 


भोऽखद अनभङ्कः प्रह्वमायोपद्धस्पदै ।1 १७।। | कर दू । इसे अन्तमे उन्हें रान्ति ही मिलेगी ॥ १७॥ _ ` 

यह सारा त्रज मेरे अश्रितहै, मेरेदारा खीकृत है ओर 

तखह्षच्छर्णं गोष्ठं सन्मां सस्परिग्रहम्‌ ¦ एकमात्र मै ही इसका रक्षक दँ | अतः में अपनी योगमायसे 
इसकी रक्ता कर्गा । सर्तोकी रक्वा करना तोमेरात्रत ही ` 

० 9 ४ न 3 

| मोपाभर लारपयोवेन सोऽयं मे त्रत आहितः ॥\१८॥ । है । अव उसके पाटनका अवसर आ पचा है५।१८॥ _ 
< १. दनिष्ये | ऊ क 
५ = 
| # भगवान्‌ कंइते दै ~ 





रोकेक्चशनियां भोव्वाद्धरिष्ये शीमदं तमः १६ 


11, 
<21 
&< 


इवधुकाना सुरणासीशविखयः । 


मँ चूर्चूर कर दंगा ॥ १६ ॥ देवताखोग तो 
पखप्रधान होते हैँ । इनमें अपने रेश्वयै ओर पदका 
अभिमान न होना चाहिये । अतः यह उचित दही है 
कि इन स्खगुणसे च्युत दुष्ट देवताओंका मे मान-भङ्ग 


कदेव प्रपन्नाय वदास्मीति च याचते | अभयं षवैमूतेभ्यो ददाम्येतद्रतं सम्‌ ॥ 


_ जो देवल एक बार मेरी श्चरणमे ज आता ३ ओर्‌ भ्म ठम्हारा ह" इख प्रकार याचना करता है उते मे सम्पूणं 
प्राणि्ोसि अमय कर देता द--यह्‌ मेरा व्रत ह " 


9 = # ¢] -्ध 
ब 
५ द व्व अ 99 ^ क 
न ऋ ` = भ 
त > । च रं ह । 


` ॥ $> # 
4 409 ५, ^ “च 0 
१4. 4 
145, ८ 
















| २८८ 








इत्युक्तेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम्‌ । 


दध।र लोलया कृष्णरहन्राकपिव वारकः ॥१९॥ 


अथाह भगवान्‌ गोपान्‌ हेऽस्प्र तात बजौकसः। 


यथोपजोषं विशत भिरिभतं सगोधनाः ।२०। 


न त्राह इहं वः कार्थ सद्धस्ताद्रिनिपावने | 
वातवषंभयेनालं ततत्रणं विषितं हि वः ॥२१॥। 
तथा निविविश्वगंतं छस्णा्वासितमानसाः । 
यथाव्काञ्च सधनाः सवरजाः सोपजीविनः ॥२२। 
छत्तञ्यथां सुखापेशषां हित्वा तेवंडवासिभिः। 
वी्थमाणो दशावरं सप्ताहं नाचरुत्‌ पदात्‌! २३॥ 
` कष्णयोगालुभावं त निशा्येनद्रोऽविविसितः, 
। निःस्तम्भ ्रष्टशङ्ल्पः खान्‌ मेषान्‌ संन्यवारयत्‌२४ 
खं व्यश्रष्ुदितादित्यं बातवपषं च दारुणम्‌ । 
निशम्योपरत गोपान्‌ गोवर्धनधरेऽज्वीत्‌ ॥ २५॥ 
9 त्यजत त्रासं गोपाः सद्लीधनार्भश्चाः । 
॥ इषारत वातवपं व्युद्भरायाश्च निम्नगाः ॥२६॥ 


ततस्ते निगरयर्णेपाः खं खमादाय गोधनम्‌ । 


ओमद्धागनत 


---------=----~--------------~-----------------------____--~~~_~-~-~-~~~_~_~ 


[ ख 8 


इस प्रकार कहकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने जेसठ्क ` 

एक ही हायसे गिरिराज गोवद्धंनको उखाड टिया शर 
जैसे छोटे-छोटे वालक बरपताती छन्तेके पुष्पको उखाइक 
हाथमे रख ठेते है, वैदे ही उन्हौने उस पवतको 
धारण कर्‌ च्या | १९ १ इसके बाद भगवानूते 
गोपोसे कहा-- माताजी, पिताजी ओर त्रजवापिये। 
तुमलोग अपनी गौं ओर सव सामश्रियोक्रे साथ छ 
पवतके गेन आकर आरामे वैठ जा ॥ २०॥ 
देखो, तुमणेग रेस चड्ा न करना कि मरे हाप 
यह पवत गिर पड़ेगा ! तुमलेग तनिक मी मत डरे । 
हस ओंधी-पानीके रसे तुषं वचानेके ्यिही मेन 
यह युक्ति स्वी दहै | २१} जव भगवान्‌ श्रीकृष्णे 
इस प्रकार स्वको आश्चाद्टन दिया-- दाद धाया 
तव॒ सव-के-सव खाट अपने-अपने गोधन; छखकड, 
आश्रितो, पुरोहितं ओर भरव्योँो अपने-अपने साध 
लेकर सुभीतेके अनुसार गोवद्वनके गमं आ 
घुसे ॥ २२ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने सव त्रजत्रा्ियेकि देखते- 
देखते भूख-प्यासकी पीडा, आराम-विश्नामकी आवश्यकता 
आदि सव कुछ मुखाकर सात दिनतक लगातार उस 
पवतको उटाये रक्खा । वे एक डग भी वहसे इधर- 
उधर नहीं हए ॥ २३ ।} श्ीकरष्णकी योगमायाकां यह 
प्रभाव देखकर इन्द्रके आश्वयका टिकाना न रहा। 
अपना संकस्प पूग न होनेवे कारण उनकी सारी 
हेकडी बद हो गयी, वे भौँचक्के-से रह गये । इक्षकें 
बाद उन्होने मेधोको अपने-आप वर्षी करनेसे रोक 
दिया ॥ २४ ॥ जव गोवद्धनधारी भगवान्‌ श्रीकृष्णे 
देखा किं वह भयंकर र्भँधी ओर धनधोर वर्षां बद्‌ 
हो गथी, भाकाश्चसे बादल छट गये ओर पूयं दीखने 
गे, तव उन्होने गोपोंसे कह(-॥ २५ ॥ “मेरे प्यारे 
गोपो | अब तुमढोग निडर हो जाओ ओर अपनी 
ल्ञियों, गोधन तथा वन्चोके साध बाहर निकल आओ। 
देखो, अव ओंधी-पानी बंद हो गया तथा नदिर्योका 
पानी मी उतर गयाः ॥ २६ ॥ भगवानकी रषी अज्ञा . 
पाकर अपने-अपने गोधन, ख्यो, बबं भोर वूर्ढोको 











साथ ॐ तथा अपनी सामग्री छकड़ंपर रद कर धीर 
धीरे सव कोग बाहर निकल आये ॥ २७॥ सवक्तिमान्‌ र 





१ 


० २६] दक्षम्‌ स्कन्ध 









स, देखते 


भगवानपि तं श्रं खध्थाने पूर्वत्‌ प्रभुः । मगवान्‌ श्रीकृष्णने भी सब प्राणियोकि देखते-देख 


खेल-खेमे द्यी गिर्जकीो पूववत्‌ उसके स्थानपर रख ` 
पश्यतां सवभूतानां खापयामाष लीलया ॥२८॥ ० 


दिया ॥२८॥ ५. 

तं॒प्रेमवेगाननिभृता वजीकसो रजवाि्योका हदय प्रेमके आवेगसे मररहयाथा। 4 | 
पव॑तको रखते ही वे मगवान्‌ श्रीकृष्णके पाप्त॒ दौड । 

यथा सभीथुः दरिरस्भणादिभिः। आये । कोई उन्हे हृदयसे व्गाने ओर कोई चूमने चणा | ज 


सबने उनका सत्कार किया } वडी-वृही गोपियनि बड़े 
भानन्द अर स्नेहसे ददी, चाव, जठ आपसे उनको 

६१ एृताद्धियुयुजुः यदाक्लिषः ॥ २९) | मङ्गल तिलक किया ओर उन्मुक्त इृदथसे सयम आ्चीवाद 

दिये ॥ २९ ॥ यश्चोदारानी; रोदहिभीजी, नन्दवावा 

यशोद! रोहिणी सन्दे र्थ विनां दरः! ञौर बल्वानोमे श्रेष्ठ वकरामजीने स्नेहःतुर होकर 
पनर रिक अ ्रृम्णको हृद्यन्चे च्मा च्वि तथा गीवा 
छ गना लङ्गय युदुजगा्चव्‌ः स्नदकात्‌; ॥९०।। | दिये ॥३०॥ परीक्षित्‌ ! उस समय धाकारामे धित देता 
दिवि देवणणः साष्या; लिद्धमन्धतरे चारणाः । | साष्य, सिदध गन्धव ओर चारण आदि प्रसन्न हयक 
- भगवान्‌की स्तुति करते इए उनपर शर्की वषां करने 
त्ष्डवुेषुचुस्तशः पुष्पवपणि पाथिव ॥३१। | लगे | ३१ ॥ राजन्‌ ! खर्म देषताखोग ख्ख ओर 
नौबत बजाने रगे । तुम्बुरु आदि गन्धवराज मन्वान्‌की 
| मधुर टीका गान क्ले य्गे॥ ३२ ॥ इसके बाद 


गोप्यश्च सस्नेष्टसपूजगरर्‌ भद्‌ 


शह्दुन्दुभयो बेदुर्दिवि दैवश्रणोदिताः 


२ | ्‌ 
जयुभन्धवेपतयस्तुष्वुरुप्रयुखा नुप ॥३२॥] | भगवान्‌ श्रीङ्णने त्रजकी यत्ना के । उनके वगम १ 
१ बलरामजी चल रहै थे ओर उनके ब्रेमी षाख्वाक 
१ उनकी सेवा कर रहे थे । उनके साय दी प्रेममयी गोषियो ` 
राजन्‌ स ओष्ठं षवरोऽत्रनद्धरिः । मी अपने हृदयको आकर्षित करनेवाठे, उसमे प्रेम जगने- ` ५ 













तथाविधान्यसख कठानि गोपिका वाठे भगवान्‌की गोवद्वनधारण आदि टीलार्ओका गान 
गायन्त्य दयु्ुदिता हदिस्णशः ॥३३॥ | करती इई बडे आनन्दसे तनमे गोट आयीं ॥ ३३ ॥ 





इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे 
` पूरवार्पे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ 





अथ्‌ षडविंशोऽध्यायः क 
नन्दवावासे गोपो श्वी श्रीकृष्णके भभावके विषयमे बातचीत ~. ~ 


॥ च 


श्रीञयुकं उवाच शरीड्यकडेवजी कहते है -परीक्षित्‌ ! व्रजके गोपः 


भगवान्‌ श्रीकृष्णके रेसे अलौ क कर्म देखकर कम देखकर बड़ 
भानि काणि गोपाः दृष्णखवीक्ष्यते। = | जामे पड गये छद मगन न 


1 » षि द्‌ { ग्रो ॥ सपरभ्येत्य सुषिकिताः ||| १ || पता या कार जापते इस = आपसे र इष त 
॥ न्धे पञ्च° । ३. बाद्रायणिखवाच | ४. ~ अ द = 











-- 


+ ~ 








२९० 








नारकस्य यदेतानि कर्माण्यत्यद्धुतानि वै । 
कथमहेत्यसौ जन्म ग्रम्यष्वात्जुगुष्डितम्‌ ॥। २॥ 
यः सपहायनो बालः करेणैकेन लीलया । 


कथं बिभ्रद्‌ गिरशिरं पुष्करं गजराडिव ॥ ३॥ 
तोकेनामीलित्चेण पूतनाया महौजष्ः | 
पीतः सनः ह प्राणे; काडेनेच वयस्तनोः । ४ !! 


हिन्वतोऽधः शयानश्च मायस्य चरण्‌ बुद ई । 


श्रीमद्भागवत | अ० २६ 


ननन =-= ------------------------------------~ <= १ निकै 71 1 ए 11 1 त त त त ष 





| = श = भ 0 ज त आ १ ज त 0 व का न ० 


ल्गे ॥ १ ॥ शस बाज्कके ये कमं बडे अढीकिक है। 
दृष्ठका हमारे-जेसे गंवार प्रामीर्णोमिं जन्म टठेना तो इसके 
व्यि बडी निन्दाकी वात है| यह भला, कैसे उचित 
हो सकता है! २॥} जसे गजराज कोई कमल उखाड- 
कर उसे ऊपर उ्छा ऊ ओरघा्ण करे, वेसे ही इष 
नन्टे-से सात वधेके वालक्ने एक ही हासे गिरिज 
गोवद्धंनको उखाड लिा ओर खे-खेच्में सात दिर्नोतक 
उठाये रक्खा # ३} यह साधारण मुष्यकरे व्यि मयं 


वसे सम्भव है १ जव यई नन्हा-सा वद्धा था; उस समयं 
बड़ी मयंकर राक्षसी प्रतना आयी ओर इने ओँख कट 
कियि-किये ही उसका स्तनतोपियादह्वी, ग्राण भीषी 
जे काट शरीरसी आध्रको 
निगल जाता दहै! ¢} जिस समय यह केवल तीन 


महीनेका था ओर छक्डेके नीचे टोक्र रो रहा था, 





4 
= + श रो ~ [क 
डा ---ख)क ३ ह), 


अनोऽपतद्‌ विपर्थस्तं रुदतः प्रपद्‌ाहतद्र }} ५।} | उघ समय रोते-रोते इसने रेखः पवि उछमका कि उपकी 


एकहायन आसीनो हियमाणो चिहायष्षा | 


दैत्येन यस्वणावत॑महन्‌ कण्टगरहातुरग््‌ । £ ॥ 


कचिद्धेयज्गवस्तेन्ये मात्रा बद्ध उदूखल ¦ 


वने संचारयन्‌ वत्सान्‌ सरामो भारतः । 
हन्तुकामं बकं दोभ्या सखतोऽरिमपाटयत्‌ ।। ८॥ 
वत्सेषु॒वबत्सरूपेण प्रविशन्तं जिघांसया । 


इत्वा न्यपातयत्तन कपित्थानि च लीलया ॥ ९॥ 


हत्वा रासभदेतेयं तदन्धृश बलान्वितः । 


=< १. . ०. + 
2 2, ~> 9 न 
॥ 


ठोकरसे वह वडा भारी छकड़ा उद्टकर गिर दही 
पड़ा ॥ ५॥ उष्‌ ष्चमय तो यह एक ही वषक्ताथा, 
जव दैत्य बवंडरके रूपे इदे दैटे-वेठं आकाशमे उड़ा 
ठकेगयाथा | तुम घ्व जानदै हदीदहो कि इने उस 
तृणावतं दैत्यको गला धोटकर मार उखा} ६ ॥ उप॒ 
दिनकी वात तो सभी जानते ह कि माखनचोरी करने- 
पर यश्ोदारानीने इसे ऊखस्से वध दिया शा} यह 
घुटनोके बल ववौ खीचते-खी चते उन दोनों विरा भजन 


= | वृक्षोके वीचमेसे निकल गया ओर उन्द्रं उखाड़ ही 
गच्छन्नयुनयोमेध्ये बाहुभ्यां तावपातयत्‌ ॥\ ७॥। | 


डाखा ॥ ७ ॥ जव यह ग्वाल्वार ओर वल्रामजीके प्ता 
बछड़को चरानेके व्यि वनमें गया हआ था, उक्त समय 
इसकी मार डार्नेके स्थि एक दैत्य बगुलेके रूपमे 
आया ओर इने दोनों द्वाथोसे उसके दोनों ठोर पकड- 
क्र उसे तिनकेकी तरह चीर डा ॥ ८ ॥ जिप्त समय 
इसको मार डाग्नेकी इब्छासे एक देत्य॒वछड़ेके रूपमे 
बछडोके डमे घुस गया था, उक्त समय इसने उस 
दैयको खेर-दी-खेन्मे मार डाग ओर उसे केधके 
पेडोपर पटककर उन पेडोको भी गिरा दिया ॥ ९ ॥ 
हसने बकरामजीके साय मि्कर गधेके रूपमे रहनेवारे 
घेलुकाुर तथा उक्षके भाई-नन्धुओंक्रो मार डाखा भर 
पके इए फठेति पूणं ताब्वनको सवकं च्य उपयोगी 


चक्र तालवनं क्षेमं परिपक्रपलान्वितम्‌ ।॥१०॥। | शोर मङ्गकमय बना दिम ॥ १० ॥ इीने न्धी 


न ` श ना त िक्नौ्ा्ि ;|॥ 1 | 


[का 17 






प्रलम्बं घातयित्वोग्रं बलेन बलक्ालिना | 
अमोचयद्‌ वजन्‌ गोपंथारण्यवदह्धितः 1 ११।! 
आश्ीविपतमादीन्द्रं दमित्वा दिमदं हदात्‌ । 
प्रषद्योद्माह्य य्चुनां चकरेऽ€ निविषोदकाम्र्‌ ।॥१२॥ 
दस्त्यजश्चालुरगोऽखिन्‌ सवेषां नो वजौकसाम्‌ । 
न्द्‌ ते तनयेऽस्परसु तसाप्यौतपत्तिकः कथसू्‌।।१३॥ 
क सपरहायनो बा क्र महाद्विविधारणष्‌ । 

ततो नो जायते शङ्का वजनाभ्‌ तवातसंञे ॥१४। 


नन्द उवाच 
भूषता मे वचो गोपा व्येतु शङ च बोऽभके | 
एनं इमारखदिश्य भर्गो मे रहुवाच्‌ ह }\१५] 
२५ | 
वणाश्चयः किंरुस्यासन्‌ गृह्णतोऽुयुभं ततनः । 
शुक्लो रक्तस्तथा पीत दानीं दरष्णतां गतः ॥१६॥ 


म्रागय वसुदे क्ववचिजातस्तवारमञजः । 


वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञाः सम्प्रयक्षते ॥१७॥ 


बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य बै । 


गुणकमीदुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः ॥१<॥ 


एष वः श्रेय आधाखद्‌ गोपगोङरनन्दनः । 


अनेन सर्वदुर्गाणि युयमज्ञस्तरिष्यथ ॥१९॥ 


व्रजपते साधवो दस्युपीडिताः 


दशम्‌ स्कन्ध 


ज्व -च्य्व्व्य्य्व्य्प्प्य्य्ययय---------------------------चचच्प््व-------------- न = न्वकान्वकन्कवक्कान्यन््व्नदन्येग्विरगतौीवयाार 













बटरामजीके द्वारा क्रूर ब्रटम्बाुरको मखा उस तथा 
दावानग्से गौर्भो ओर्‌ षाच््रा्मेको उवार च्या ॥११॥ _ 
युनाजस्मे रहनेवाटा काच्यिनाग किंतना वैय या१ 
परंतु इसने उसका भी मान मदन कर ठसे बन्धूक 
दहसे निकाल दिया ओर यप्रुनाजीका जड सदकि च्िं 
विषरहिंत---अमरतमय बना दिया ॥ १२ ॥ नन्दजी। 
हम यह भी देखते हैँ कि तुम्हारे इस सवे वाय्कपर 
हम सभी त्रजवाक्षियोँका अनन्त प्रेम है ओर उसका भी 
दमपर खामाव्रिक दी स्नेह है । क्या आप वतम सकते 
हे कि इसका क्या कारण है ॥ १२ ॥ मढा, कडँ तो 
यह्‌ सात वधका नन्हा-सा वाल्क ओर कर्डँ इतने वड 
गिर्दिजको सात दिनोंतक उढठाये र्ना ! त्रनराज 1 
सीसे तो तुम्डारे पुत्रके सम्बन्धमें हमें बड़ी शङ्क हो 
रही है ।) १४ ॥ 

नन्द्‌बाबाने कहा- गोपो | तुमगेग प्रावधान देकर 
मेरी बात सुनो । मेरे वाल्कके विषयवे तुम्हारी शङ्का | 
दूर हो जाय; क्योकि महर्षिं गगने इस बाख्कको ` 
देखकर इपके व्रिषयमें रसा ही कहा या ॥ १५ ॥ तुम्हारा ` ` 
यह बाख्क प्रत्येक युगमें शारीर ग्रहण करता है । विभिन्न 
युगोमे इसने छेत, रक्त ओर पीत- ये भिन-भिन रग 
सीकर किये थे । इस बार यह कृष्णव्रण इआ ह ॥ १६॥ 
नन्दजी । यह तुम्हारा पुत्र पहले कहीं वसुदेषके धर 
भी पैदा इअ था, इष्टये इस रहस्यको जाननेवाले 
लोग सका नाम श्रीमान्‌ वाघुद्व दै-रेसा 
कहते हैँ ॥ १७ ॥ तुम्ह।रे पुत्रके गुण ओर कमेकिं 
अनुरूप ओर भी बहत-से नाम दह तथा बडतसे ख्य । _ 
मँ तो उन नामको जानता ह्र परंतु संपाके साधारण 
छेग नहीं जानते ॥१८॥ यद्न तुमरोगोँक्ञा परम कल्याण द 
करेगा, समस्त गोप ओर गोओंको यह बहत ध नन्दति 
करेगा । इसकी सहायतासे तुमगेग बड़ी-बड़ी विपत्तर्योको ` 
बड़ी सुगमतासे पार कर रोगे ॥ १९ ॥ त्रनराज 1 
ूर्वकाल्मे एक वार्‌ पृथ्वीम कोड १ नहीं र रह 


1 ११. १2). 1 


॥ ८: ५ -च्‌। ^ = #। १५ 





































॥ ॥ि 
ह २ ( दि) 
2 ६ 
| क + 
। ६, [3 च नी 
1 -3 १! इन, र्‌ 
4 रन क 
9 > क 
| 
1 


य एतस्मिन्‌ महाभागाः प्रीतिं वन्ति मानवाः | 


तस्मान्नन्द ङमारोऽय्‌ नारायणक्षमो युणैः । 
रिया कीत्यांसुभावेन तत्कर्मस न विस्मयः ।२२॥ 


इत्यद्धा मां समादिश्य गगें च खमगृं गते । 


इति नन्दवचः भरुर्वा गर्गगीतं त्रजोककः । 


दष्श्चुतायभावस्ते ष्णस्याभिततैजसः । 


देवे ववति यन्ञविुवरुषा 


(ड बज दमपर्पानिले; 


` सीदत्पलपश्चल्चि आत्मश्चरणं 





दष्रालुकम्प्युर्स्मयन्‌ । 


करेण शोरमब्ररो 


नि 
[ + 1 


[) = 


न्न = 


8 + रीरोच्छिरीन्ध्रं यथा 
बिभ्रद्‌ गोष्टमपान्महेन्द्रमदभित्‌ 


। ॐ # - + 


क: 





क ्रीयान्न इन्द्रो गवाम्‌ ॥२५॥ । 


(>~ २ । 
~ उ 





3 । ¬ { कके > 
">+. की 


श्री मह्{गवेत 


युदिता नन्दभानचः कृष्णं च गत विस्मया, ॥२४॥ 


| अ० २६ 








| की ॥ २० ॥ नन्दवावा ! जो तुम्हारे इस संर शिष्ये 


प्रभ करते ह, वे बड़े भाग्यवान्‌ हैँ । जैसे विण्णुमगवान्‌के 


नारयोऽभिभ येतान्‌ विष्णुपक्षानिगासुराः ।॥२९॥ | करकम्ेकी उन्र-जयामें रहनेवाञे देवताओको अघुर 


नहीं जीत सकते, वैसे दी इससे प्रेम करनेवा्गंको 
भीतरी या ब॑हरी- किकी भी प्रकारके रात्र नही जीत 
सक्ते ॥ २१ ॥ नन्दजी | चाहे जिष्ठ टष्िसे देवे 
गुणसे, रे खयं ओर सोन्दथसे, कीतिं ओर प्रमावसे 
तुम्हारा बाख्क खयं भगवान्‌ नारायणकरे ही समान है | 


| भतः इस वाच्कके अलौकिक कयोकं। देखकर आश्वय 
| | 8; | न करना चाहिये ॥ २२ ॥ गोपो ! मुञ्चे खयं गर्गाचायजी 
(मन्ये नारायणस्यांशं कृष्णसकलिष्टकारिणमू ।।२३।! | यह आदेश देकर अपने व्र चले गये । तवसे मेँ 


अकोकिक ओर परम सुखद कर्म करनेवाठे इस बाच्कको 
भगवान्‌ नारायणक्रा ही अंश मानता द्रं ॥ २३ ॥ जव 
वरजवासिर्योने नन्दनावाके सुखसे गग॑जीकी यह बात घुनी, 
तव उनका विस्मय जाता रहा; वयोँकि अवर वे अमित- 


तेजस्वी श्रीकृष्णके प्रभादको पूणल्पसे देख ओर सुन . 


चुके थे । भआनन्दमे भरकर उर्न्लयौने नन्दवावा ओर 
श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रयासा की॥ २४॥ 

जिस प्तमय अपना यज्ञ भङ्खं हो जानेके कारण इन्द्र 
करोधके मारे आग-बनरूढा हो गये थे ओर मूष्ठख्धार वपा 
करने कगे ये, उस सपय वज्रपात, ओ्णोकी वार ओर 
प्रचण्ड ओंधीसे ल्ली, पञ्च॒ तशा श्राटे अल्यन्त पीडित हो 
गये थे | अपनी शरणमे रहनेवारे त्रजत्राक्षियोकी यह्‌ 
दशा देखकर भगवान्‌का हृदय करूणासे भर भाया | 
प्रतु किर एक नयी टीम करनेके विचारसे वे तुरंत 
ही मुसकरानि को } जैसे कोई नन्हा-प्ता निव्रठ वाख्क 
चल-खेव्मे ही बरक्षाती छन्तेका पुष्प उखाड़ ठे, वेसे 
ही उन्होनि एक हाथसे दी गिरिराज गोवद्वनको उखाड- 
कर धारण कर च्या ओर सारे व्रजकी रक्षा की। 
इ्द्रका मद चूर करनेवाले वे ह्वी भगवान्‌ गोविन्द्‌ 


हमयर प्रन हो ॥ २५ ॥ 





(ति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दश्चमस्कन्धे पूव ॥ 





षडविकोऽव्यायः 1 २६॥ 





` कायि 3 


[ अ "त ` त 


[ त वि 









अथ सप्तविंशोऽध्यायः 





भीरृष्णका अभिषेक्र 
श्रीक उवाच | भीद्युकदेवजी कहते ह--परीक्षित्‌ | जव भगवान्‌ ` 
श्ीकृष्णने गिरिराज गोवद्वनको धारण करके मूस॒र्धार 
गोवधने धरते चैर आसाराद्‌ रक्षिते वरजे । वसि व्रजको वचा व्या, तव उनके पास गो्ेकसे 


कामधेनु ( बधाई देनेके व्यि) ओर खर्भसे देवराज ` 
इद्र ( अपने अपराधको क्षमा करानेके व्यि) अये ॥ १॥ 
मगवान्‌का तिरस्कार करनेके कारण इन्द्र बहत ही ग्ित 
थे | इसय्यि उन्होने एकान्त स्थानम मगवानूके पास ` 
जाकर अपने सुयके समान तेजघ्वी सुकुटसे उनके चरर्णो 

का स्पश किया ॥ २ ॥ परमतेजखखी भगवान्‌ श्रीकृष्णका 
प्रभात्र देख-षुनकर इन्द्रवा यह धमंड जाता रहा कि मै 

| ही तीनों रोकोका खामी द्रं | अव्र उर्होनि हाथ जोड़कर 
उनकी स्तुति की ॥ ३॥ 


गोलोकादाव्रजत्‌ कृष्णं सुरभिः शक्र एव च ॥ १॥ 


विविक्त उपसङ्गम्य व्रीडितः कृतहेङनः । 





पस्पशं पादथोरेनं किरीटेनाकवर्चसा ॥२॥ 





दृष्टश्चुताच्ुभावोऽस्य ृष्णस्यामिठतेजः । 


नषटत्रिरोक्केश्षमद इन्द्र आह छृताञ्जलिः 1 ३॥ 





इन्द्र उवाच | इन्दे कहः-मगवन्‌ | भायका खूप पमञ्ान्त, ` 

| ज्ञानमय, रजोगुण ठया तमोगुणसे रहित एवं विदद ` 

अप्राकृत स्मय है । यह॒गुणोक्े प्रवाह्य प्रतीत 
तपोमयं ्वस्तरजस्तमस्कम्‌ । होनेवाल्ा॒प्रपश्च केवल मायामय है; क्योकि आपका 

सरूप न जाननेके कारण ही आपमें इसकी प्रतीति होती ` 

है ॥ ४ ॥ जब आपका सम्बन्ध अज्ञान ओर उसके 

न॒ वियते तेऽग्रहणादुबन्ध! | ९ | | कारण प्रतीत होनेवाठे देहादिसे है ही नही, फिर उन 

देह आदिकी प्रा्िके कारण तथा उन्हीसे होनेवाठे गेभ- च 

कुतो खु तद्धेतव ईश तत्कृता क्रोध आदि दोष तो आपे हो ही कैसे सकते १ ` 

~ ; प्रमो | इन दोषोंका होना तो अज्ञानका रक्षण है । इस ` 

स = ण प्रकार य्यपि अज्ञान ओर उससे होनेवाठे जगतसे आप- ` 

तथापि दण्ड भग्वान्‌ भिभति का कोर सम्बन्ध नहीं है, फिर भी धमकी रक्षा ओर 

: दुर्टोका दमन करनेके ल्य आप अत्तार ग्रहण कर 

धम्‌ञ्च पुष्त्य खलनिग्रहय ॥ ५ ॥ | हैँ ओर निग्रह अनुग्रह भी करते रह॥ ५॥ प जगत्‌ 

परति गुरस्व अमतामधीशलो के पिता, गुर्‌ ओर खामी है । आप जगत्का नियन्त्रण 

(8 करनेके थ्य दण्ड धारण किये इए दुस्तर का है । आप्‌ 

दुरत्ययः काल उपत्तद्ण्डः । | भपने मक्तोकी चखाल्सा श्ण करनेके व्ि खच्छन्दतासे 


हिताय स्वेच्छातलुभिः समीहसे | दीस प्रकट करते ह नौर जो लोग हमारी तर 


| अपनेको ईश्वर मान बैठते है, उनका मान मर्दन करते 
मानं॒विधुन्वज्गदीशमानिनाम्‌ ॥। ६॥ | इए अनेकों प्रकारकी टीव करते है ॥ ६ ॥ भ्रमो 


विश्द्धसखं ठव धाम श्षान्तं 


मायामयोऽयं गुणक्षस्प्रबाहो 













(४ 

















ह 





ग्भ ` = 


८ कन । 
॥ ४ ऋ भ == 4 = = भन नीः ^ 
॥ ~ पज ८ य व . १६. ५ © ॥ २ माह । न - + 
र < भ ध = ध । 4 
ह न श्‌, = । 1. ॐ. 4; +~ ' = # + 





! „++ 








 - ^+ हॐ 
~~ ` = ~ 
0 0 तणा 





ये मदिधाज्ञा जगदीच्चमानिन- 
स्वां वीक्ष्य काङेऽभयमाश्च दन्मदम्‌ | 


क 


~~ 
+ किन्कः 
# 


हित्वाऽऽयंभाग प्रभजन्त्यपसया 

। } इहा खलानामपि तेऽखुश।सनय्‌ ॥ ७॥ 

स्व॑ भमेधयेमदप्ुतख 

कृतागशस्तेऽविहुषः प्रभावम्‌ । 

|| (| | न्तु प्रभोऽथाहंसि भूढचेतसो 

॑ सैवं॑पूुनरभून्मतिरीशच मेऽकती ॥ ८॥ 

तवावतारोऽयमधोक्षजेह 
स्वयम्भरणायुरुभ(रजन्पनाम्‌ । 
देव 

युष्मचरणायुतिनाम्‌ ॥ ९ ॥ 


चमूपतीनामभवाय 
भवाय 

| नमस्तुम्य भगवते पुरुषाय महात्मने । 

| बाणुदेवाय ष्णाय सास्वतां पतये नमः ॥१०॥ 

† 


खच्छन्दोपात्तदेहाय 
| (|| | | सवस्मै सवबीजाय स्ंभूतात्मने नमः ॥११॥ 













चिदयदधज्ञानमूतये । 


1. | | मयेदं भगवन्‌ गोष्ठनादश्ायासारवायुभिः 
5 चेष्टितं विहतै. यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना ॥ १२॥ 


क तो ^ + 
(कि 4 > चैः 


९ ९ छ श्रीमद्भागवत 


| अ० २७ 


न 111 111 7 1, श 1 
ऋ ऋ क 





| जो मेर-जेसे भज्ञ।नी ओर भपनेको जगत्‌का ईशर मानने. 


वा है, वै जब देखते हँ क्रि बड़े-बड़े भयके अवरोपः 
भी आप निर्भय रहते हैँ, तव वे अपना घमंड छोड देते 
द भोर गवरहित होकर संतपुरषोंके द्वारा सेषित भक्ति 
मगका जनाश्रय लेकर आपका भजन ठ्रते है | प्रमो | 
आपकी एक-एक चेषा दुष्टेकि ग्यि दण्डविधान है ॥ ७॥ 
प्रभो | मेने रेश्वयेके सदसे चूर होकर आपका अपराध 
किया है; क्योकि मेँ आपकी शक्ति ओर व्रभाधके सम्बन्ध 
म वित्कुरु अनजान था । परमेश्वर ! आप कृपा करके 
मुञ्च मूख अपराधीका यह्‌ अपराध क्षमा करे जर रेसी कृपा 
करं करि मुद्चै फिर कभी रेपे दुष्ट अज्ञानका शिकार 
न होना पड़े ॥ ८ ॥ खयंप्रकाश्च, इन्द्ियातीत परमासन्‌। 
आपका यह अवतार इसच्यि हआ है क्रि जो अघ 
सेनापति केवर अपना पेट पालनेमे ही ल्ग रहे है ओर पृथवीके 
च्यि वड़े भारी भारके कारण वन दहे हैँ उनका वध 
करके उन्हें मोक्ष दिया जाय ओर जो आपके चरणकि 
सेवक द--आज्ञाकारी भक्तजन है, उनका अभ्युदय 
हो--उनकी रक्षा हो ॥ ९ ॥ भगवन्‌ ! मै भापको 
नमस्कार करता द्वं । आप सर्वान्तर्यामी पुरुषोत्तम तथा 
सात्मा वादेव है । आप यदुवंशियोके एकमात्र खामी 
भक्तवत््तर एवं सवके चित्तको आकर्धित करनेवाठे है | 
मे आपको बार-बार नमस्कार करता हँ ।। १० ॥ आपने 
जीवोंके समान कमवरा होकर नही, खतन्रतासे अपने 
भरक्तोकी तथा अपनी इच्छाके अनुसार शरीर खीकार 
किया है । आपका यह इारीर भी विञुद्धज्ञानखरूप है, 
आप सब कुछ है, सबके कारण ह ओर सवके आत्मा 
है । मे भापको बाह्वार नमस्कार करता द्र ॥ ११॥ 
भगवन्‌ | मेरे भपिमानका' अन्त नहीं है ओर मेरा 
क्रोध भी बहत ही तीतर, मेरे वश्षके बाहर है | जब 
मैने देखा कि मेरा यज्ञ तो नष्ट कर दिया गथा, तन मैने 
मूसब्धार वषा ओर भंषीके द्वारा सारे व्रनमण्डच्को 
नष्ट कर देना चाहा ॥ १२ ॥ परंतु प्रभो | आपने 
मुञ्षपर बहत ही अनुग्रहं किया । मेरी चेष्टा व्यथं हने ` 


"2 मेरे घमंडकी जङ्‌ उखङड़ गयी । भाप मेरे खामी है, गुरं 
गुरुमातमान ` नं त्वामह शरणं गतः ॥१३॥ । द ओर मेरे.आत्मा है । म आपकी शरणमे द्रं ॥१३॥ 





"क + 


अ० २७ | | द्श्चम स्कन्ध 








-~-य्-य््ण्व्व्व्य्य्य्य-------------------- च य्य्य्च्च्च्य थ्य चच 


श्रीचुक्त उवाच | भ्रीड्ुकदेवजी कदते ह - परीक्षित्‌ । व जब देषराज 
| 
| 








'" -सीतित इन्द्रने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी इष प्रकार स्तुति की, तन 
एवं सङ्कीतिंतः ष्णो मघोना भगवान्‌ । | । 
॥ ब उन्न हसते इए मेधके समान गम्भीर वाणीसे इन्द्रको 
मेघगम्भीरया चाचा ॒ब्रहसम्निद्मवीत्‌ ॥१४॥। सम्बोधन करके कहा- ॥ १४ ॥ 


शरीभयवानुव।च | रीभगवान्‌ने कदा--इन््र ! तुम रेखयं ओर धन- 


| सम्पत्तिके मदसे पूरेपूरे मतवाटे हो रहे थे | इसव्ये 
तुमपर अनुग्रह करके ही भने व॒म्हारा यज्ञ भङ्गं किया है। 
यह इक्तविये कि अव तुम मुञ्चे नितव्य-निरन्तर स्मरण रख 
मदुस्पवथे नित्यं मत्स्यनद्रभिया भृशम्‌ ॥१५॥ | सको ॥ १५ ॥ जो देय शर्‌ धन-सम्परिके मदसे 
धंधा हो जाता है, वह यह नहीं देखता कि मै काटख्प 
मामैशर्य्रीमदान्भो दण्डपाणि न प्यति । = | पर हायन दण्ड लेक इसके सि्‌ सार है । ° 
जिसपर अनुग्रह करना चाहता दर उसे रे्यश्रष्ट कर 
देता हँ ॥ १६ ॥ इन्द ! तुम्हारा सङ्गर हो ! अव तुम ` 
अपनी राजधानी अमरावतीमे जाओ ओर मेरी आज्ञाका 
पान करो | अव कमी घमंड न करना । नित्य-निरन्तर 
गम्यतां शक्र भद्रं बः क्रियतां मेऽलुशारनमर । मेरी सन्निधिकाः मेरे संयोगका अनुमव करते रहना ओर 


अपने अधिकारे अनुसार उचित रीतिसे मर्यादाका पाठ्न 
स्थीयतां खाधिकारेषु युक्तवेः स्तम्भवर्जितेः ॥\१७।) | करना ॥ १७ ॥ | 


अया तेऽारि मधवन्‌ मखभङ्गोऽचुगृह्तता । 


तं ्रंश्षयापि सम्पड्धधयो यख वचेच्छाम्यसुग्रहम्‌ ॥\१६। | 


> परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ इस प्रकार आज्ञा देही रहे ये 
अथाह सुरभिः इष्णमभिवंन्य मनखिनी । किं मनखिनी कामघेसुने अपनी संतानोके साथ गोपवेष- 
। ॐ | | धारी परमेश्वर श्रीकृष्णकी बन्दना की ओर उनको सम्बोधित 

स्रसन्तानरुपामन्य गोपरूपिणमीश्वरम्‌ \) १८ | करके कहा) १८ ॥ 

सुरभिरुवाच ¦ कामधेद॒ने कदा सचिदानन्दखखखू्प श्रीकृष्ण ! आप ` 

॑ महायोगी-- योगेश्वर हैँ ) आप॒ खयं विश्च है, विश्चके 

ष्ण ष्ण महायोगिन्‌ विश्वात्मन्‌ विश्वसंभव | | परमकारण है, अच्युत है । समब विश्वके खाभी 
( , | आपको अपने रक्तकके ख्पमें प्राप्तकर हम सनाथ हो 
भवता लोकनाथेन सनाथाः वयमच्युत ॥१९॥ | गयीं । १९ ॥ आप जगतके खामी है, परत ` 
¦ ¦ हमारे तो परम पूजनीय आराध्यद्छ ही है । प्रमो! ` 
इनदर त्रिेकीके इन्द्र॒ इश्ना करे, परंतु हमारे इन्द 
| मोतिप्र श १-।।२०॥ | आपृ ही हैँ । .अतः आप ही गौ, ब्राहणः, देवता 
भवाय भव देवानां ये च साधवः 1|२०॥ 1 
` हृ्द्रं नस्त्वाभिषेक्ष्यामो ब्रह्मणा नोदिता वयम्‌| ~ . . दम गोप बरहाजीकी प्ररणासे शू १ 
"ऋ र | “` “ | कर अभिषेक करेगी । विशा्मन्‌ } -आपने पृथ्वीका भार्‌ 
णोऽपि विश्वात्मन्‌ भूमेभोरापरततये ॥२९।। | उतारनेके .टि वेया है! २१) 







त्वं नः परमकं दैवं लं न इन्द्रो जगतपते । ` 









|) 1 
६ | २९६ ५ ीमहभागवत | अ० २८ 








"व्यच चय्व्य्यजज---------्व्य्््व् व वव्व्प्प्य्य्व्यव्वव्----------------~------ -च्य्प्प््- 




















। ‡: प्री्ुक उवाच आद्कदेवजी कते है- परीक्षित्‌ | भगवान्‌ 
¢ । श्रकृष्णसे रसा कहकर कामघेनुने अपने दृधसे शीर 
। 2 एव छष्णसुपासन्त्य सुरभिः पयसाऽऽत्मनः। देवमाताओंकी प्रेरणासे देवराज इन्द्रने एेरावतकी सूंडके 
1 जठैराकारगङ्खाया रेरावतकरोद्धरतैः ॥२२॥ | दारा कये इए आकाशागङ्गाके जलसे देवधियकि साय 
` तमि तार नादि श्रदुनाय श्रीकृष्णका अभिषेक किया ओर उन्हं “गोविन्दः 
। 8 वनो । _ | नामते सम्बोधित किया | २२-२३ ॥ उस समय बह 
। अभ्यपिश्त दाशाह गाषन्द्‌ इति चाभ्यधात्‌।२२॥ | नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व, विचाधर, सिद्ध ओर चारण 
॥ तत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयो पहलेसे ही आ गये थे । वे समस्त संसारके पाप-ताप- 
{ गन्धर्वविद्याधरसिद्धवारणाः | को मिटा देनेवाे भगवान्‌के लोकसबापह यशक[ गान 
| 4 ६ करने रगे धीर अम्सर।ए भानन्दद्धे भरकर चप्य कने 
॥. जगुयंशो लोक्मलापहं हरेः ख्गीं॥ २४ ॥ सुख्य-मुख्य देता भगवान्‌की स्तुति 
#॥ ; खराङ्खनाः संनच॒त्ंदान्विताः || २४॥। | करके उनपर नन्दमवनके दिव्य पुरष्पोकी वां करने 
। ह कीः = मे + 

| | न त॒ तुष्ट्बुदवनिकायक्षेतवी | खग | तीनों लोको म प्रमानं न्द्की नाह जा गयी ओर गोअकि 
| व्यवाकिरंथाद्धतुष्डृषटिभिः । स्तनोसे आप-हदी-भप ् दूध गिराकिप्श्भी गीटी 
॥ । हो गयी ॥ २५ ॥ नदियोमें विविध ररसोकी वाद भा 
४; लकाः परं निपिमा््चो गयी । बरक्षोसे मधुधारा वहने लगी । विना जोते-वौये 
8 गावस्तदा गामनयन्‌ पयोद्ताम्‌ ॥२५॥ |“ । ^ ~^ ` = 
(8 | | तरितो पथ्वीमे अनेकों प्रकारकी ओषधिर्या, अन्न पदा हो गये 
+ ॥ नानारसोधा सरितो बृ्षा आसन्‌ मधुस्रवा । पवतोमें चपि इए मणि-माणिक्य यं ही बाहर निकटं 
; 4.3 अकृष्टपच्योषधयो भिरयाऽबिश्रदुन्मणीन्‌ ॥|२६॥ | भाये ॥ २६ ॥ परीक्षित्‌ ! सगवान्‌ श्रीकरष्णका भभिषेक 


| । ष्णोऽभिषिक्त दतानि संच्वानि कुरुनन्दन । होनेपर जो जीव खमावसे ही करूर है, वे भी वेरहीन हो 


न्तिराण्यभवसात कऋराण्यपि निसर्म॑तः ॥२७॥ गये, उनमें भी परस्पर मित्रता हो ` गी ॥ २७ ॥ दन 
इस प्रकार गौ भौर गोकरुलके खामी श्रीगोविन्दका अभिषेक 


इति गोगोलपतिं गोविन्द्मभिषिच्य सः किया ओर उनसे अनुमति प्राप्त होभेपर देवता, गन्धव 
च अनुज्ञातो ययौ शक्रो इतो देषादिभिदिंवम्‌ ॥२८॥ | आदिके साथ खगेकी यात्रा की ॥ २८ ॥ 
ह _ „दस 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे धवा 
इद्रस्त॒तिनांम सपतर्विंशोऽव्यायः ॥ २७ ॥ 





अथाष्टाविंशोऽध्यायः 
वरुणलोकसे नन्द्जीको छुड़ाकर राना 
शकं उवाच ्रीश्कदेवजी कते ह-- परीक्षित्‌ ! नन्दनानाने 
कार्तिक ्यक्ड एकाद श्चीका उपवास किया भौर मगवान्‌की 
पूजा की तथा उसी दिन रातमे द्वादश्ची च्ानेपरस्नान 
यां जलमाविशत्‌ १॥ | करनेके च्ि यघुना-जक्मे प्रवेश किया ॥ १ ॥ 


दितो। २. सर्वाणि । ३. छष्णामिेको नाम । ५. बादरायणिस्वाच्‌ । 


= 44 कि % 
7 ` = 
न्ययं = # निरा ९ त 
एकादहयां निराहारः समभ्यच्यं जनादनम्‌ । 
+ { ५ £ „$ > च 
= * = 
६५३ ज 











१] 4 च तै र 
"क कि ०, ५ ~“ | 
+ % च 
1 " + 41 क ३2 ॥ 
(ण 
"+ स 2 -ा"न ् 
4१ 1११ 1 1 1। न्वी व ~ ~ । 8 ॥ 
10111 । 






अ० २८ ] दक्षम्‌ स्कन्ध 





# चि पी ती चो 


तं गृहीत्वानयद्‌ शस्यो वरुणखासुरोऽन्तिकम्न्‌ ! | नन्दवावाको यह माद्धम नदीं या कि यह अघुररोकी वेग 
है, इ्तय्यि वे रातके समय ही यमुनाजव्में घुसगये। _ 
उस समय वरुणके सेवक एक अघुरने . उन्हें पकड य्या _ 
अविज्ञायासुरीं वेखां ग्रविषय्चदर चिक्लि || २ || | र वद्र अपने खामीके पास ठे गया ॥ २॥ नन्दबात्राके 4 
। खो जानेसे ब्रनके सारे गोप श्रीकृष्ण ! अव तुम्ीं अपने ` 
चु्श्॒सलतमयश्यन्तः कृष्ण रातति गोपा; | = | पिलकर व सकते हो; बकराभ! गव दुन्डारा ही भरोसा 
इस श्रकार कइत इए रोने-पीटने खगे । भगत्रान्‌ श्रीकृष्ण 
सवदाक्तिमान्‌ हैँ एवं सदसे ही अपने भरतोका भय मगाते 
भगर्गास्तदुपश्वुत्य पितरं बरुणाहृतस्‌ | आये हें } जव उन्न त्रजव्रासि्योका रोना-पीटना सुना 
। ओर्‌ यह जाना कि पिंताजीको वरूणका कोई सेवक ठे गया 
तेद्न्तिषं मदो राजन्‌ खानाग्रसयदो चिष्ठुः \! ३1) है, तव वे वरुणजीके पास मये २॥ जव लोकपाल वरुणने 
देखा कि समस्त जगते अन्तरिन्द्रिय ओर वहिरिन्द्रियेके 
्रव्वक भगवान्‌ श्रीकृष्ण खयं ही उनक्े या पारे है,तव॒ + 
उन्दोनि उनकी बहुत बडी पूजा की } भगवानङ्के द्चनसे 
उनका रोम-रेम आनन्दसे लिड उठ । इसके वाद उन्होने ` 





| 





पराप्तं वीक्ष्य हृषीके सोपाकः सपर्या ! 










हस्या पूजयिसवाऽऽह तदं रमहः \} ४ ॥ | भगवानसे निवेदन किया ॥ ४ ॥ † 
द्रुण उवाचं चरुणजीने कटा- प्रमो ! आज मेरा डरीर धारण 
अद्य जे विभ्रते देहोऽचैगोऽधिगतः अरे। करना सफ हआ । भाज मुञ्चे पम्धरण पुरुषाय भ्रात ह्यो 


गया, क्योकि आज सञ्च आपके चरणोकी स्वका 

त्वः ० वस भगवन्‌ | जिन्हं मी अपके 
त्वतपाद्भाजो भगवन्नवापुः पारमध्वनः म अवसर प्रात इभा दै । म्‌ + 
= न शनः ॥ 4 ॥ | चरणकमर्यकी सेवाका सुअव्सर मि, वे मवसागरसे 
नमस्तुभ्यं भगवते ब्रह्मणे परमारभने ) पार हो गये ॥ ५ ॥ आप भक्तकि भगवान्‌, वेदान्तियोकि ` 
ै ब्रह ओर योगियेकि परमास्मा है । आपके खख्पमे विभिन्न एः 
न यत्र भरुयते माया लोकसुष्टिविकरपना ।। ६ ॥ । योकखध्ोकी कल्पना करेवाी माया नही दै-दसाशति  । 
४ छः कहती है } मँ आपको नपरस्कार करता द्र ॥|&॥ प्रभो! मेरा 
अजानता भपकेन मदेनाक्षायंवेदिना | यह सेवक बड़ा मूद ओर अनजान है । वह अपने कतत्यको 
ू मी नहीं जानता । वदी आपके पिताजीको ठे आया 
है, आप कपा करके उसका अपराध क्षमा कीज्यि ॥७॥ 
गोविन्द्‌ । मै जानता द्भ कि आप अपने पिताके प्रति < 
४ = =. | बडा प्रेमभाव रखते है । ये आपके पिता है । इन्दं आप 
छ ममराप्यजुग्रह ` कृष्ण कतुमहेस्यशञेषशक्‌ ।  |े जाहये 1 परंतु भगवन्‌ 1 आप सरके ‹ तयामी) 
[> ` 2 सवके साक्षी है । इसव्थि विश्विोहन श्रीकृष्ण ! भाप 
गोबिन्द नीयतामेष पिता ते पिवृबत्सल ॥ ८ ॥ | मुञ्च दासपर मी कृपा कीजिये 11 


त । [का न  & 


आनीतोऽयं तव पिता तद्‌ भवान्‌ श्वन्तुमर्हति ॥ ७॥ 














श्रीच्चुक उवाच आीद्युक्देव च, जी (५ ते - पर +९।।९९६, ॥ भग्वान्‌ ध ६ श्री- 
ीश्वरेशवरः ¦ | कृष्ण ब्रह्मा आदि ईधरोके भी ईशर है 1 योकपार वरणने 






कनक 
-जज्वाक्"र-क-- ज्वाहणन्ेन र ह क श 


ट = द ष्य स्यः ~ ` न -------- ---- ~~~ 
न्दा० | २. यसा० | ३.वानविक्करः। = 


तति + 


न ॥ # , च~ = क्ण चमो + 
<^ > रण |© ज्ञ २. ८ ----. 











| | क २९८ श्रीमद्भागवत [ अ० २८ 
ॐ} ---- रि 
¢ ¦ ` आदायागात्‌ खपितरं बन्धूनां चाबहन्धुदम्‌ ॥ ९ ।। | इस प्रकार उनकी स्तुति कारके उने प्रसन्न किया । 
1 | इसे वाद भगवान्‌ अपने पिता नन्दजीको टेकर व्रजे 
{ | ऋ < चले आये ओर्‌ व्रजवासी साई-बन्धुओंको आनन्दित किया 
॥ नन्दस्त्वतीन्द्रयं दृष्टा रोकणरसहोदयम्‌ । ॥ ९ ॥ नन्दानने बरुणगेकने गवन 
¦ एय ९ सुख-सम्पत्तिको देखा तथा यह भी देखा किं 


वहि निवराक्षी उनके पुत्र श्रीकृष्णके चरणोमि कञ्च 


| छष्णे च खन्नति तेशं इातिञ्यो बिखिरोऽब्रवीर्‌ म ध 

| षृ कर रं दहं | उ डा विस्मय हआ | 

॥ उन्होने व्रजमें आकर अपने जाति-माध्योको सव वातं 
॑ ते सीतसुक्यधियो रजन्‌ सत्वा मोषास्तमीश्वरम्‌ } | क नाया ।! १० ॥ परित ! भगवान्‌के ्रमीगोप 
; यह्‌ सुनकर शसा समञ्चन टे ९१ ठो खयं 
॥ 


न 


भगवान्‌ हं | ठव उर्होनि मन-ही-मन वड़ी उत्छुकतासे 
अपिं नः खगति ए्पष्ठपाधासखदधीश्चरः \\१ १।। विचार किया कि क्या कभी जगदीश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
॑ हमरोगोछो भी अपना वह मायातीत खधाम, जहो 
९ति खानां = मगधान्‌ विहाया सिङदक शत तेव इनपेत्रेमी भ ६ स्‌ ६ हैः दिखसायंगे १९। 
| खरृदक्‌ सयू । | परीक्षित्‌ | मगवान्‌ श्रीकृष्ण खयं सर्वदर्य हि । मद, 

उनसे यह बात केसे छिपी रहदी १ > 


= 
1 


` = = जः `को 


६ 
५. 
< 2 
4 च 


| ~> नः ~ 
ग 


न 


व॒ अपने आत्मीय 
सङ्ख्पसिद्धये देशं दछृपयैददयिन्दयत्‌ \\१२।। | गोपोंडी यइ अमिलापा जान गये ओर उनका संकल्प 
सिद्ध करनेके व्यि छप।से मरकर इस प्रकार सोचने 

= ॐ ह ल्गे॥ १२॥ इक संसारे जीव अज्ञानवश्च शरीरमें 
जनो वं लोक शएकसिन्नतिदयाकामकरममिः । 1 क्रके भति सँतिकी कामना ओर उनकी 
पूतिक ्यिं नाना प्रकारके कमं करता है | फिर उनके 

उच्वावचासु गतिषु न वैद खां गतिं रमन्‌ ॥१३॥ | फ्लरूप दवता, मन्य, पञ्च, पक्षी आदि ऊँची-नीची 
योनि्यमिं भटकता फिरता दै, अपनी असरः गतिको-- 

इति सञ्जिन्त्य भगान्‌ महाकारुणिको हरिः। आत्मखरूपको नहीं पहचान पाता ॥१३॥ परमदयाु 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने इतत प्रकार सोचकर उन गोर्पोको 
माय।न्धकारसे अतीत अपना परमधाम दिखखया ॥ १४॥ 
भगवानने प्रहे उनको उस ब्रह्मका साक्षात्कार काया 
५ क जिसका खूप एत्य, ज्ञान, अनन्त, सन।तन ओर ज्योतिः- 
सत्य ज्ञानमनन्त यद्‌ ब्रहम ज्योतिः सनातनयू | स्वरूप है तथा समाधिनिष्ठ गुणातीत पुरूष ही जिसे 

| देख पाते ह ॥ १५॥ जिस जकारायमें अक्रूरको भगवानने 
यद्वि परयन्ति यनयो गुणापाये समाष्िताः ।\१५॥ | अपना खरूप दिखाया था, उसी त्रहखरूप ब्रह्मे 

| मगवान्‌ उन गोपोको ठे गये । वहाँ उन गेर्गोनि उसमं 
ते तु ब्रह्महदं नीता मग्नाः कृष्णेन चोद्ध्रताः | ` | इवकी लगाथी । वे व्रहदमे प्रवेश कर गये | तव 
। न + भगवान्‌ने उसमेसे उनो निकालकर अपने परमधामका 

दरशन कराया ॥ १६॥ उस्‌ दिव्य भगवत्खरूप ठोक्को ` 


द्‌ ्शु्षणो लोकं यत्राक्ररोऽभ्यग्‌।द्‌ परा ॥१६॥! | देखकर नन्द भादि गोप परमानन्दे मग्न हो गये | वं 
` = य खिरनिश्वथम्‌। २. तं ब्रहम | 


[त्क 
= कक 


ऋ. 
क , कि त ठ नि 
ति ॥ 7 स । 


शि + ऋ = 


दद्चयामाघ् लोकं स्वं गोपानां तमः परम्‌ ॥१४॥ 








॥ ५ ~ क, $ [> "व ह ् षं ई # | 
3 #, ~ र "कः 
१) + क "= =+ क "कक 
























अ० २९ | द्म स्कन्ध 


[51 क 1, 1 2 र त 2 व 








ऋक ॐ "क = 


नन्दादयस्छ उ श्रा परमान दनिरेचाः | उन्होने देखा कि सारे वेद मूतिपरान्‌ होकर भ 
श्रीकृष्णक्ती स्तुति कर दहे हैँ । यह देखकर वे सवके 
छष्णं च्‌ तत्रच्छन्दोभिः स्तय प्रानं सुधिखिताः } १७] । सन परम त्रिसित ह्रो गये } १७॥ ; 9 
- "4 &->-- = £ ॥ 


इति श्रीमद्धागवते मह्ययुधाणे पारमहंस्यां संहिताथां दशमस्कन्धे 
रवर्धिऽाविशोऽव्यासः ॥ २८ ॥ 


व्य व~ 
अथेकनतरिरेऽध्यायः 
 ससखीटखाका आरम्भ 
श्रु क उवाच आद्यकदेखजंः कते दै--परीक्षित्‌ | दरद्‌ ऋतु 
थी | उसके कारण वेच; चमेटी आदि सुगन्धित 
पुष्प खिट्कर मर्ह -महं महंक रहे थे । मगवानने चीर- 
हरणककरे समय गोपिरयोको जिन रात्रिर्याका स्षकेत किया 
था, वे सब-की-सब पुञ्जीभूत होकर एक दी रात्रिके 
रूपमे उल्लहिति हो रही थीं । भगवान्‌ने उन्हं देखा, 
देखकर दिव्य बनाया । गोपि्या तो चाही ह्वी थीं । 
अव मगवानूने मी अपनी अचिन्त्य महाद्यक्ति योगमायाके 
सहारे उन्हं निमित्त जनाकर रसमयी राक्षक्रीडा करनेका 
संकस्प क्षिया । अपना होनेपर मी उन्होने अपने प्रमिर्यो- 
तदोडशज्ः कंङ्भः करेयुखं कीरच्छा प्रण करनेके व्यि मन खीकार किया॥१॥ ` 
भगवानूके संकल्प करते इ! चन्दरद्वने प्राची द्दिके ` 
मुखमण्डर्पर्‌ अपने शीतर किरणख्पी ककमलंसे 
लिमकी रोखी-वौशर मर दी, जंसे बहत दिनके बाद 
अपनी प्राणाप्रया पत्नीके पास भाकर्‌ उसके प्रियतम पतिने ` 
उसे आनन्दित करनेके छिये रक्ता क्रिया ह्यो ! ₹§ प्रकार 
द चन्द्रदेवने उदय होकर न केवर पूर्वदिर।का, प्रत्युत ` 
स॒ चषणीनाश्चदगाच्छुचो मृजन्‌ संसारके समस्त चर-अचर प्राणिर्योका संताप-जो 
दिनमे शतत्काटीन भ्रखर सथरस्भियोके कारण बढ़ गय 7. 
५ या- दर्‌ कर दिया ॥२॥ उक्त दिन चन्द्रदेवका मण्डलं 
प्रियः प्रियाथा ह्व दीषंद््श॑नः |} २। | अखण्ड था | परूणिमाकी रात्रि थी | वे नूतन व ‡ ~~ घमा ८ 
‹ वाट. हो रहे ये, ङु संव संकोचमिष ष । । 
कुधुदन्वमरलण्डमण्डरं । युक्त जान पड़ते थे | उन्‌ =. ण्डल वद्मीजीवे 
ह सः = समान मद्धि होर यथया ा श दी ं 
` रमाननाभं  नबह्कङ्कमारुणभर = | सार गवा षा | बनके कोति- 
तूय मानयन्तः श्॒चिसित।ः । २, नन्दविमेकष प्रनचल्तः ३७। ८ स्मित। 


भगवारपि वा रीः ररदस्छुस्छमद्छिकाः | 


वीक्ष रन्तं सयश्वक्े योभसायादुसाभ्ितः \ १॥ 


माच्या विलिस्पर्नङ्णेन शन्तमेः 






















स्मता; । २, न्दविमोक्षणः छार ३. बाद्रायणि णरूवाच । ४ मयोऽच उतः 


१२९ 


च # 
> 
^ 











11 ट 
=^ श्रीमद्भागवत [अ०२९. 
वन च तत्कोमरुगोऽभिरङ्ितं कोनोमें उन्होने अपनी चोँदनीके द्वारा अमृतका सुषु 


उदे दिया था । भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने दिव्य उञ्ञ 
रसके उदीपनकी पूरी सामग्री अन्द ओर उप्त बनके 
देखकर अपनी वँ्धरीपर बजघुन्दध्िकि मनको हरण कले 
वाखी कागवीज “स्खीं की धद्पष्ट एवं मधुर तान चछडी॥३॥ 
भगवान्‌का वह वंशीषादन भगवान्‌क्ते ्रेमको, उनके 
मिकनकी खल राको अव्यन्त उकक्तानेवा-- वदृनेवाग 
निशम्य भीतं तदनङ्खवधंनं था ¦ यों तो श्यामघुन्दरने पहल्से ही गोपि्योके मनको 
अपने वकम क्र रक्खा थां | अव तो उनके मनकी 
सारी वस्तुए्‌--मय, संकोच, पैय, मर्यादा आदिकवी 
शृतियो मी-- छीन ठी । वंदीष्वनि सुगते ह्वी उनवी 
दिचित्र गति दहो गयी । जिन्ोने एक सः साधना की 


जगो कलं बामदशां मनोहरम्‌ }\ ३ 





व्रजन्ियः दछष्णगहीतमान इ! । 


| 
| 
| | आजग्धुरन्योन्यमरक्षितोचयमाः थी श्रीकृष्णो पतिख्पे प्राप्त करनेके व्यि, वे गोपयां 
| 8 भी एक -दूसरेकीो सूचनां न देकर -यद्षँतक कि एक 
| {| ६ दूसरेसे अपनी येशनक्तो छिप।कर जँ दे थे, वके व्ि 
| । | स यत्र कान्तो जवरोलङ्ण्डलाः ।। ४ ॥ | चठ पद| परीक्षित्‌ ¡ वे इतने वेगसे चटी थीं किं 
/[} 8 उनके कान्ते बुष्डक शेके खाद्देथे॥ ४॥ 

| दुहन्त्योऽभिययुः काथिद्‌ दोहं हित्वा ख युरसुकाः। वृंशौध्वनि सुनकर जो गोपियों दूध दुह ददीथी 


वे अप्यन्त उप्टुकतावश्च दघ दहना छोडकर चं 
पड़ । जो चू्देप दूध अय रही थी, वे उफनता इभा 
दृध छोडकर, भौर जो व्पसी पका रही षीं, वे पकी 
| इइं च्पसी बिना उतारे ही अ्यो-की-व्यां छोडकर चल 
1 015 सापरा अयुः ॥५॥ दीं ॥५॥ जो मोजन परसरही थीं वे परसना छोडक 
॥ जो छोटे-छोटे बर्चोको दृध पि ददी थीं वे दूध पिगना 
वैषयन्त्यस्त छोडकर, जो पतिथोकी सेवा-दयुश्रषा कर दही थीं, वे 
पविषयन्तयस्द्विता पाययन्त्यः किञ्‌ पयः। सेवा-दयश्रषा छोड़कर ओर जो खयं भोजन कर्‌ रही थी, 
वे भोजन करना छोडकर अपने कृष्णप्यारेके पाक चल 
पड़ ॥ ६ ॥ कोई-कोई गोपो अपने शरीरमें भद्गराग, 
चन्दन भौर उबटन ल्णा रदी थीं ओर कुछ ओंखोमें 
अंजन व्णा रही थीं। वे उन्हें छोड़कर तथा उल्टे- 
| लिभ्यन्त्यः्रखजन्त्योऽन्या अज्ञन्त्यः काथ लोचने । पटे वल धारणकर श्रीङृष्णके पास प॑वनेके च्ि 
चर पड ॥ ७ ॥ पिता भर॒ पतिरयोने, माई भर 
` ध्य ० ्नाभरणाः काथित्‌ ृष्णान्तिक ययुः ॥।७॥ | जाति-बन्धुओनि उन्हे रोका, उनकी मङ्गक्मयी प्रयाताः ` 
9 . न मनै विघ्न डा । परंतु वे इतनी मोदित हो 4 थी. 
कि रोकनेपर भीन रुकी, न रुक सकीं| रुक्त 











^,  छभषन्त्यःपतीन्‌ काचिद्र्नन्त्योऽपाखभोजनय्‌॥।६। 





























० २९ | दश्चम्‌ सङन्ध 
गोिन्दापहूताटमानो न न्यदतेन्त मोहिताः॥ ८] | कैसे ९ विश्वविमोदन श्रीक्रष्णने उनकै श्रांण, मन ओर्‌ 
| आत्मा-सन कुछक्रा अपहरण जो कर य्या था॥ ८॥ 
परीक्षित्‌ ! उस समय कुछ गोपि धरकि भीतर थी। 
उन्दँ वाहर निकल्नेका मागं ही न मिडा | तव उन्न 
अपने नेत्र मंद य्ि ओर वड़ी तन्मयतासे श्रीकृष्णके ` 
सोन्दय;, माधुय ओर टीगर्ओंका ध्यान करने व्गौं 
। 


अन्तगहमताः काधि भोप्योऽलन्धविनिर्गमाः । र 
॥ ९ ॥ परीक्षित्‌ ! अपने परम प्रियतम श्रीकृष्णके 
क्ष्णं तद्धावनाधक्ता दभ्युमींकितलोचनाः ॥ ९ ॥ | भसद्य विर्हकी तीतर वेदनासे उनके हृदयम इतनी 
न्यथा --इतनी जलन इई कि उनमें जो कुछ अद्म 
संस्कारोका लेरमात्र अवशेष था, वह भस्म हो गया। 
इसके वाद तुरत ही ध्यान खण गया । व्यानमे उनके 
सामने मगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रकट इए । उन्डनि मन-ही- 
मन वड़े त्रेमसे, बडे आ गसे उनका आलिङ्गन किया । 
उस समय उन्हँ इतना सुख, इतनी शान्ति मिटी कि 
ध्यान ष पच्युतारलेपनिवेन्या क्षीणभङ्गखाः ।१०॥) | उनके सव-के-सव पुण्यके संस्कार एक साथ ही क्षीण 
हो गये ॥ १० ॥ परीक्षित्‌ । यद्यपि उनक्रा उप्त घमय 
श्रीकृष्णके प्रति जारभाव मी था; तथापि कहीं सत्य 
वस्तु भी भावकी अपेक्षा रखती है १ उन्दने जिनका 
आणिङ्गन किया, चाहे किंसी भी भावसेक्रियाहो, वे 
खयं परमात्मा ही तो थे । इसव्ि उन्हने पाप ओर 
पुण्यहूप कर्मके परिणामसे बने इए गुणमय इरीरका _ 
परित्याग कर दिया । ८ भगव्रानकी लीखमें पषम्मिकिति _ 
दोनेके योग्य दिव्य अ्राकरृत शरीर प्राप्त कर च्या|) 
इस इारीरसे भोगे जानेवाले कमवन्धन तो ध्यानके समय 
ही डिन-मिन हो चुके थे॥ ११॥ 
राजा परीक्ितुने पृा-मगवन्‌ ! गोप्यो तो 
भगवान्‌ श्रीकृष्णको केवर अपना परम प्रियतम हयी मानती 
यीं । उनका उने ब्रह्मभाव नहीं था। इस प्रकार 
उनकी दृष्टि प्राकृत गणम दी आसक्त दीखती है 
ेसी सतिम उनके व्यि गुणोके प्रषाहख्प इस 
संसारकी निदृत्ति कंसे सम्भव इई १ ॥ १ 
कदेवजीने कद (परीक्षित्‌ ! मै तुमसे पडे 
दी कह चुका ह किं चेदिरान शिद्यपाढ भगवानूके 
व 
प्रति द्वेष-माष रखनेपर भी अपने प्राकृत रारीरको 


उक्त पुरस्तादेवत्ते चयः सिद यथा गतः । ~ = कृत शारीरसे उनका पाषंद्‌ हो गया । सी 


अ > क (क ^ मि 
र ध? 


5 स र 


;सहम्रष्ठविरहरीततापषु दाषमाः 


तमेव परयःत्मानं जारबुद्धयापि संगताः । 


प्ण 





जहुगुंणमयं देहं सद्यः भ्रक्षीणबन्धनाः ॥११॥ 
राजोवाव 










छष्णं विदुः परं कान्तं न ठु ब्रह्मतया सने । 









गुणप्रवादोवरमस्तासां गुणधियां कथम्‌ ॥१२॥ 
श्रीञचुकं उवाच 









~ 





स भ्रीमद्भाभवत | अछ सच क 


ना णायामा ते काय छो + चक = कत तात च+ ह 9 भ रकि छि. = 2. च "9 क क कः ॥ ष क + 
गगरी [मि मी भि 


दिषन्नमरि हवीकेशं करियुताधोक्षजग्रिथःः ।।१३।} | सतिम ज समन्त प्रकृति ओर उक गुणि अतीत 
| मवान्‌ शीङकष्णकी प्यारी है नौर उनसे अनन्य पर 
करती हैँ ३ गोपिधाँं उन्हें प्रप्त हो ज्य- शे 
कोन-सी आश्वर्थकी वात है }॥ १३॥ परीक्षित्‌। 
वास्तवमें भगवान्‌ प्रकृतिसम्बन्धी दृद्धि-विनाद्च, प्रमाण 


प्रमेय ओर युणगुणीभावपे रहित दहै। वे अचिन्त्य 


| अनन्त अप्राकृत परम कल्याणृखशूपं गुोके एकमात्र 

अन्ययस्ाप्रमेयख नियंणख गुणात्मनः ॥१४।} | शाश्रय है । उन्होने यह जो अपनेको तथा अरनी 
टीखाको प्रकट किया है, उदका प्रयोजन केवर शइृतना 
दी हं किं जीव उसके रहर अपना परम कल्याण 

दम्पादनं क्रे ॥ १४} इषएच्िये भगवानूसे कैव 
सम्बन्ध दहो जाना चाहिये | दह सम्बन्ध चाहे जेषा 
हो-- कामकः हो, क्रोधव्ताहो या मयका हये; लेहः 
नातेदारी या सोह्दका हो । चाहे चिस भावस भगवान्‌ 

निस्यं हरो षिदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते \\१५॥ | मे नित्य-निरन्तर अपनी वर्तयो जोड दी ज्य, वै 

| भगवान्‌ ही जुडती हं । इसव्विये दृत्तियां भःक्न्मय 
हो जाती दँ ओर उस जीवको सगवानकी ही प्राप्ति 

होती दै ॥ १५॥ परीक्षिव्‌ ! त॒म्हारे.जेसे पसम 

न चेवं विसयः कार्यो भवता भगवत्थजे । भागवत, भगवान्‌का रहस्य जाननेवाये धक्तवौ श्रीद्ष्णके 

सम्बन्धमं देसा द्वदेह्‌ न्दी करना चाद्ये ! योगेश्वरे 

। | | ्‌ भी ईश्वर अजन्धा भगवारकते व्थिि मी यह कोई आ{श्चय- 
। यगेधरेधरे दृध्णे यत एतद्‌ वि्ष्ते ॥१६।; | की वात है १ भरे ! उने संवादम 
इ्वारेे सरे अगवका परम कल्याणं ह्च सक्ता है 
| १६ ॥ उव भगवान्‌ श्रीकृष्णे देखा किं व्रजकी 
अनुपम वरिभूतिर्यो-- गोपिशाँ पैर विद्छुल पाक्च आ गयी 
है, तव उन्दने अपनी विनोदभरी वाकुचातुरीसे छन्दं 
मोहित करते द्वए कहा । क्यों न दी-भूत, भविष्य 
ओर वर्तमानकाख्कै जितने वक्ता है, उनमेवे ही तो 


; पेशचेत्िंमोहयन्‌ ॥१७॥ | सर््रष्ठ है ॥ १७ ॥ 











नृणां िःभेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो चप | 


कामं क्रोधं भयं स्नेहमेक्यं सौहृदभेव च ¦ 













ता याता भभ्वान्‌ वजयोषितः। 


# र 


श्रीभगवानुवाच व क ॥ 


श ~ ह ग भगवानुवाच ` = भगवान्‌ भीरृष्णने शदा-महाभाग्यवती गोपियो| 
- प्रियं 1 | वम्हारा खागत है । बतमाभो, तर्द प्रसन्न केके 
अ च्पि मै कौन-सा काम कं १ वरजम तो सब 









कता पड़ गवी १॥ १८॥ इन्दी 
गक्ला पड | ४ = = 
~= 8 # ज "किः 9 न्व ग ` 

न 


= ९ ् ह = १ 
[क = च कि = 
#। ५ क क 
^= (रि क नो >= क 
0 १ ~ 0 के 
क 


न 






















॥ि =` #॥॥ वकः बै ॥ ह = + क ९.५ व 0 ५ क + च 
, 6 क ह ८ ष क भ । 2. 
॥ [१ कः च क 
7 , "न कना । 












अ० २९ ] दशषम सन्ध र 
रजन्येषा घोररूपा षोरसच निषेषिता । गोपियो | रातका समय है, यह खयं ही बड़ा भयावना 


प्रतियात वरजं नेह स्थेयं सीभिः समभ्यसःः ।(१९॥ 
मातरः पित पञ चतरः पत्तयश वः 


बिचिन्धन्षि दयपरशन्ते सा दृदयं बन्धश्चःष्वश्चश्च २० 
दष्टं वनं इुखुमितं रकेञ्चफररज्ञिठस्‌ ! 


यष्रनानिऽउलीलेजचर्पछवक्ेभितम्‌ \\२१॥ 


‡ 


तद्‌ थात मः चरं शेष्टं शुश्रूषध्वं पतीन्‌ सतीः। 


कन्दन्ति दसस सारश्च तान्‌ पएाययत दुद्यत।।२२॥। 


अधवा मद भिस्नेहाह्‌ श्वस्य यस्थिदक्चयाः। 


॥ 


आमता हयुपएन्न चः प्रीयन्तै मयि जन्तवः ॥२३ 


भतुः छभूषणं सीणां परो धर्मो हमायशा । 
तद्वन्धूनां च कल्याण्ड! प्रजानां शानुपोषणम्‌ ।॥२४॥ 


` दुभ्ीलो णो बृद्धो जडो रोग्यधनोऽपि बा । ¦ 
पतिः स्वीभिनं हातव्यो रेकेष्सुभिरपातकी ॥२५॥ 
र स्यं य॒ 


५ 


` असभ्य मय  फएर्शु इष्टं भयावहम्‌ । 





= > ~ -9 = = 
९९ ४ ५। त्र <। 4९९८ ९१५९. ६ | र 


| लोकमें अपया होता है | यह ५ 
। 4  भ्रवयक्ष--व =, अ 
 । तच्छ, क्षणिक है ही) इसमे व ्क्ष--वतेमानमे 





( ता ठ 
 साल्तात्‌ परम भय- नरक भादिका हेतुहे ॥ 























होता है ओर इसमें वड़ेबडे भयावने जीव-जन्तु इधर- 
उधर धूमते रहते दँ । अतः तुम हव तुरंत व्रजे खट 
जाओ । रातके समय धोर्‌ जंगयपरे ज्ञियोको नदीं सुकना 
चाहिये ॥ १९ ॥ तुमे न देखकर तुम्हारे मो-वापः पति. 
पुत्र छीर भाङ्नन्धु द्द रहै होगे । उन भये न 
डारे | २० ॥ तुमलोगोनि रग-बिरगे पुरष्पोसे व्दे इए 
रस वनकी चोभाको देखा } पण॒ चन्दरमाकी कोमठ 
ररिपियोँसे यह रगा हआ है, मानो उन्दह्ोनि अपने 
हार्थो चित्रकारी की हो जीर यमुनाजीके जचब्का 
स्पशं करके वहनेवाले शीतक समीरकी मन्द्-मन्द 
गतिसे हिच्ते इर ये व्ृक्षोके पत्ते तो इस वनकी 
रोभाको ओर भी बढ़ा रहे हैँ ¦ परंतु अव तो तुमगेगो- 
ने यह सन कुछ देख च्या॥२१॥ घव देर मत 
करो, शीत्रसे-्चीघ्र त्रजमें लौट जा । तुमलेग 
कुलीन खी हो ओर खयं मी सती हो, जाभो अपने परतिर्यो- 
की ओर स॒तिर्योकी सेवा-ञुश्रूषा करो । देखो, तम्हारे 
घरक नन्दे-नन्हे वच्चे भोर गोओके वषड रो-रंभारदेहै, _ 
उन्है दूध पिओ, गोर्‌ दुष्टो ॥ २२ ॥ अथवा यदिमेरे _ ` 
रमसे परवद होकर तुमेग यहम आयी हो तो इसमे 
कोई अनुचित वात नहीं हई, यह तो तुम्हारे योग्य ही 
दै; क्योकि जगद्के पञ्य-पक्षीतक सुक्षसे प्रेम करते ह, _ 
मुञ्चे देखकर प्रसन्न होते ह ॥ २३ ॥ कल्याणी गोपियो! 
चिर्योका परम धम यही दहै कि वे पति जीर उस्के माई ` 
बन्धुर्ओकी निष्कपटमाव्डे सेवा क्रे ओर संतानका 
पाग्न-पोषण कर ॥ २४ ॥ जिन जिर्योको उत्तम लोक 
प्राप्त करनेकी अभिलषा हो, वे पातकीको छोडकर ओर 
किसी भी प्रकारके पतिका परत्याग न करं 1 भले १ 
वह बुरे खभाववावा, माग्यदीनः बुद्ध; मूख, रोगी निः न 
दी क्योनहो॥ २५॥ कुटीन लिर्योके च्य जार 
पुर्षकी सेवा से तरहसे निन्दनीय ही न 


~+ 















४ ५) =, 
नाते क्‌॥ग कोर) बह 
२६ ||| 


| मोक्ष आदिक 


३०४ भीमद्कागवत | अ० ६९ 








भवणाद्‌ दशनाद भ्यानान्मयि भावोऽलुङीतनात्‌। | गोपियो ! मेरी लीग शीर गु्णोके श्रवणसे,रूपके दशनसे 
उन सबके कीतन ओर ष्यानेसे मेरे प्रति जैसे अनन्य प्रेमकी 


प्रापि होती है, वेसे प्रेमदी प्राह्ि पास रहने रहीं होती | 

न तथ। सन्निकष॑ण प्रतियात ततो गान्‌ ॥(२७॥ | इसव्ि तुमगोग अभी अयने-यपने घरं छट जाभो ॥२७]॥ 
श्रीशुक उवाच आीद्यकदेवजी कहते है--परीक्ित्‌ ! भगवान्‌ श्री- 

कृष्णका यह्‌ अग्रिय भाषण पनडःर गो पिणं उदास्त, खिन्न 

¢. इति वरिप्रियमाकर्ण्यं गोप्यो गोविन्दभाषितमू | हो गयीं | उनकी आखः टूट नयी । बे चिन्ताके अथाह 
। | एवं अपार क्षमुद्रमे इवने-उतराने च्गीं |} २८ | उनके 


| ( बिम्बफल ( पके इए छंद ) ठे समान वलखङं 
निषण्णा भग्नसङ्करपािन्तामापुदुरत्ययाग्‌ २८ व 
ह 1 ष्‌ । ८ | अधर लोकक्े कारण चन्नेवारी ठी भौर गस धिरे 


(# ५ (9! 


मख गये । उन्ोने अपने रह नीचेकी ओर ट्टका 
व्यि, वे पैरके नश्चे धरती इुरेदने व्ण ¦ नेत्रासे 
दुःखके ओं. वह-वहकर काजय्ये पाथ वक्षुःस्थल्पर्‌ 
पर्टुचने भौर वँ ट्गी इई दे श्रको धोने टये | उनका 
हृदय दुःखघ्चे इतना भर गया क्रि दे कछ वो नस्क, 
चुपचाप खड़ी दह गयीं }} २९ ॥ गोपिवोने अपने प्यारे 
इयापचुन्दरके व्यि छारी कामनार्पैः शछारे भोग छोड 
दिये थे | श्रीकृष्णे उनका अनन्त अनुराग) परम प्रेम 
था | जब उन्हने धपने प्रियतम शओीकृष्णरखी यह्‌ 
निष्टुरतासे भरी बात सुनी, जो बड़ी ही अग्रिय-सी माम 
हो षी थी) तव उन्हे बड़ा दुःख हा । अंखं रोते- 
रोते गक हो गयीं, शंके भारे रघ गयीं! उन्दं 
धीरज धारण करके अपनी शओँखोके ओप पो ओर्‌ 
फिर ॒प्रणयकोपके कारण दे गद्गद्‌ बाणीसे कहने 
च्गीं॥ ३० ॥ 


गोपियोने कदा प्यारे श्रीकृष्ण | तुम घट-घट- 
व्यापी हो । हमारे हृदयकी बात जानते हो । तमहं 
इस प्रकार निष्टुरताभरे वचन नहीं कहने चाहिये । 
हम सब कुछ छोड़कर केष तुम्हारे चरणोम 
ही प्रेम करती ह । इसमें संदेह नष्टं कि तुम खतन््न 
जीर हटीटे हो । तमपर हमारा कोई वश्च नदी है। 


११ 9.0१ १११0, 








छरुत्वा घुखान्यव शुचः शधष्ठनेन शष्यद्‌ 





बिम्बाधराणि चरणेन युव रिखन्त्यः। 







` असेरपात्तमंषिभिः इचङृङकमानि 







` तस्थु्जन्त्य उरुदःखभराः ख तृष्णम्‌ ॥२९॥ 
 वरेष्टं प्रियेतरमिव प्रतिभाषमाणं 
छरणं तदरथंबिनिवर्ितसर्वकामाः । 


। नेत्र धिघ्न्य रुदितोपदते ख किंञचित्‌ 











. संरम्भमद्गद गिरोऽब्वुवताचुरक्ताः ॥३०॥ 
गोप्य ऊचुः 








मेवं निभोऽहंति भवान्‌ गदितुं सृशंसं 
४. # संत्यज्य सर्॑विषयांलव पादमूलम्‌ । 















दुरवग्रह मा त्यजासान्‌ फिर भी तुम अपनी भोरसे, जैसे आदिपुरुष भगवान्‌ ` 
क. * | नारायण कृपा करके पने सुपुक्षु भक्तोसि प्रम करते है, वैसे 
बो यथा. षो भजते य्॒षुन्‌ ॥३१॥ । दी दमे खीकार कर ठो । हमारा त्याग मत के ॥३१॥ 





न णे | 
= 


नवो कृच््न$ 3 =) चष न 2 ^= 
ब्राखनः । म (= क, 
न > 





अ० २९] दकम्‌ स्कन्ध 








यत्पतयपत्यसुहदामचुचरत्तिरङ््‌ प्यारे श्यामसुन्दर | तम॒ स्व॒ धर्मोका रहस्य 

‡ : < जानते हो । तुम्हारा यह कहना किं “अपने पति, पुत्र 

स्रीणां खधमे इति धमविद्‌। त्वयोक्तम्‌। ओर माई बन्धुओंकी सेवा करना दी निर्योका खधर्म 

| < अ दै'--अक्षरश्चः है | पर देके अनु्ार 
सतयेवमेतदपदेकषपे त्वयी है'--अक्षरशः ठीक है । परंतु इस उप 

पदेशषपदे 5 हमें तुम्हा ही सेरा करनी चाहिये; क्योकि तम्ही सब 

ष्ठो भवांस्तनुमृतां चिर बन्धुरार्मा ।३२॥ उपदेशकि पद ( चरम च्छ्य ) हो; साक्षात्‌ भगवान्‌ हो। 

तम्दीं समस्त शरीरधारियकि घुृद्‌ हो, आत्मा हो ओर 


न्ति हि स्यि रतिं हशालाः; ख आास्मन्‌ = | परम प्रियतम ही ॥३२॥ आसङञानमं निपुण महयुष 

तुमसे ही प्रेम करते दै; क्योकि तुम नित्य श्रिय एवं 

नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरतिद्ः किमू। अपने ही आत्मा हो | भनित्य एवं ॒दुःखद पति- 
पुत्रादिसे क्या प्रयोजन दै १ परमेश्वर ! इसव्ि हमपर 

तन्नः प्रसीद परमेश्वर सा स छिन्या प्रसन्न होओ । कृपा करो । कमलनयन ! चिरकाल्से 


र तुम्हारे प्रति पाठी-पोसी आरा-अभिलषाकी ज्हट्दाती 
आन्ञां भृतां त्वयि चिरादरपरिन्दमैत्र ।।३३। | कताका छेदन मत करो ॥ ३३ ॥ मनमोहन । अब- 


तकः हमारा चित्त धरके काम-धंधोमे लगता था } इसी 


चित्तं सुखेन भवतापहूतं गृहेषु हमारे हाय धी उनमें रमे इए थे । परंतु तुमने हमारे 

देखते.देखते मारा वह चित्त ट च्या । इसमें तुम्हं 

यन्निर्विश्त्युत करावपि गद्यर | कोई कठिनाई भी नहीं उठानी पडी, तुम तो छखघ्लरूप 

होन! परंतु अव तो हमारी गति-मति निरागी ही 

ख हो गयी है | हमारे ये पैर तुम्हारे चरणकमर्छोको 

पादो 2 छोडकर एक पग भी हटनेके य्ि तैयार नदीं दँ, नदीं 

यामः कथं चरनमथो करवाम † वा ।[३४।। | इट रदे ई । फिर म वनम कंसे जाय ¶ ओर यदि 

॥ वहा जाय भीतो करं क्या १॥ ३४ ॥ प्राणवल्क्म । 

सिश्वाङ्ग नस्त्वदधराग्रदपूरकेण हमारे प्यारे सखा । तुम्हारी मन्द-मन्द मधुर सुक्कान; 
} ॥ 


 प्रेममरी चितवन ओर मनोहर संगीतने हमारे हृदयमे 
। प्रम ओर मिग्नकी आग धधका दीदहै। उसे 
तम॒ अपने अधर्रोकी रसधारासे बुञ्ञ। दो । नहीं तो 
प्रियतम । हम सच कहती है, तुम्हारी विरह-व्यथाकी 
आगसे हम अपने-अपने शरीर जया देंगी ओर धष्यानके 
दवारा तुम्हारे चरणकमलेको प्राप्त करेगी ॥ ३५॥ 


प्यारे कमड्नयन ] तुम॒वनवाघियेकि प्यारे हो 
ओर वे भी तुमस्चे बहुत प्रेम करने दै । इससे प्रायः ` 
(तम उन्दीके पास रहते हो । यर्हातक कि तुम्हारे 
चरणकमर्जोकी सेवाका अवसर खयं क 7 भी 












हाक्षावलोककलभीतजहच्छयाग्निम््‌ । 
नो चेद्‌ वयं विरश्जागन्धुषयुक्तदेहा 


ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥२५॥ 








य्म्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया 









भीमद्भाणवत ० २३९ 




















अस्म्र्म ततप्भृति नान्यसमश्षमङ् प्राप्त इभा । जित दिन यह सौभाग्य हप मिरा नौर 
| तुभने हमं खीकार करके आनन्दित किया, उसी दिनसे 

हम ओर किसीके सामने एक क्षणके व्यि भी टहरनेमे 

स्थातु स्वयाभिरमिता बत पारयामः ॥३६॥ | भसमथ हो गयी ॒ै--पतिःपुत्रादिकोकी सेवा तो दूर 

रही ॥ ३६ ॥ हमारे खामी ! जिन लक्ष्मीजीका 

कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके व्यि ट्डे-बड़ देवता तपस्या 

(1 श्रीयत्पदाम्बुनरजशकमे तुरा करते रहते हैँ, वही र्मी जी तम्हारे दक्षःस्थव्मे विना 
ऋ किसीकी प्रतिद्रन्दिताके स्थानं श्राह कर ठेनेपर्‌ भी अपनी 
सीत तुरसीके साध तुम्दारे चरणोंकी रज पानेकी अभिव्यषा 
र लञ््डापि वक्षति पदं क्रिल भत्यजु्टम्‌ । किया करती हैँ । अनतकके सभी भक्तोने उस्‌ 
§ । चरणरजका सेवन किया है | उनहीके समान हम भी 
तम्हारी उसी चरणरजकी शरणमे आयी हैँ ॥ ३७ ॥ 
+ ययाः खवीक्षणछ्ृतैऽन्यसु परषास्त- भगवन्‌ | अवतक जिष्ठने भी तुम्दारे चर्णोकी शरण 
8. टी, उसके प्रे कष्ट तमने पिट दिये] अव तुम 
५. हमपर कृपा करो । हमे भी अपने प्रसादका भाजन 
; त वनाओ । हम तुम्हारी सेवा करनेकी आशा-अमिदाषासे 
घर्‌, गोव; कुदुम्ब--सव कुछ छोडकर तुम्हरे युग 
चर्णोकी रारणमें आयी है | प्रियतम ! वह तो तुम्हारी 
आराधनाके च्य अवकाश्च ही नहीं है । पुरूषभूषण । 
पुरुषोत्तम । तुम्हारी मधुर सुसकान ओर चार्‌ चितवनने 
हमारे हृदयमें प्रेमकी--मिटनकी आदक्षादी आग 


सतद्वद्‌ वयं च तवर पादरजः प्रपन्नः ॥३७।॥ 


तन्नः प्रसीद बरजिनादन तेऽद्चिभूरं 


म्राप्ना विद्युञ्य वसतीस्तदुषसनान्नाः । धधकादी है; हमारा रोम-रोम रस्से ऊक रहादहै। 
तुम हमें अपनी दासीके रूपमे खीकार कर छो | हमें 
त्वत्सुन्दरसितनिरीश्षणतीव्रकाम- अपनी सेवाका अवसर्‌ दो ॥ २८ ॥! प्रियतम ! तुम्हारा 


सुन्दर युखकमठ, जिसपर धुघरादी अलक श्चल्क रही 
है; तम्हारे ये कमनीय कपोल, जिनपर सुन्दर-सुन्दर 
कुण्डढ अपना अनन्त ॒सौन्दय व्खिर रहे है; तुम्हारे 
ये मधुर अधर, जिनकी सुधा घुधाको भी ठजनेवाटी 
है; तुम्डारी यह नयनमनोहारी चितवन, जो मन्द-मन्द 
मुक्तकानसे उल्छ्सित ह्यो रही दहै; तुम्हारी ये दोनों 
भुजां जो शरणगर्तोको अभयदान देनेमे अत्यन्त 
उदार हैँ भौर तुम्हारा यह वक्षःस्यग, जो ठक्ष्मीजीका- 
सोन्दर्यवी शकमात्र देवीका नि्य क्रीडास्यक है, देखकर 
हम सव तुम्दषरी दासी हो गथी दै ॥३९॥ 


त्तास्मनां पुरुषभरृषण देहि दाखम्‌ ॥३८॥ 
वीक्ष्यालकादृतयुलं तव इण्डलभ्री 
गण्डखलाधरसुधं हसितावरोकघब्र्‌ । 

द भयं च शुजदण्डयु ध विलोक्य 


=" 
वक्षः [त्रियकरमण च भवाम्‌ दाख; ॥२९॥ 


--- > न्य = 






=, * 
ककन च क्षि चं = क भय भ ५ । + 


४ 
कु ४ क दु + ज~ + कि सी कि र" = ॥ ^ 
ण उता ए क~. 
् क ` 9 " क # = कच +, ^ १1 ् ~ 





“2 + `. = = 
[अ० २९] दृक्ञष स््न्ध 








नानायोगा ----(----.-.ः . . . ी.1ु (मी रि करयककर 


रथामघुन्दर । तीनों कोके भी ओर रेसी कौन-सीं 
खी है; जो मधुर-मधुर प्रद ओ आगोह-अवरोह-कभसेः 
विभिघ प्रकारकी मृच्छनाओंसि युक्त तुम्हारी वंशीकी 
तान सुनकर तथा इस त्रिठोकघुन्दर मोहिनी मूर्तिको- 
जो अपनी एक वब्रूद सौन्दयसने ्रिढोकीको सौन्दर्थका 
दान करती है एवं जिसे देखकर गौ, पक्षी, व्रश्च अर 
हरिनि भी रोमाच्चित, पुलकित हय जाते ह अपने 
ेत्रोसे निहारकर आये-मर्यादासे विंचल्ति न हो जाय, 
कुल-कान ओर्‌ टोकठ्ज्जाको व्यागकर्‌ तुमे अनुरक्त 
नहो जय ४०|| हमसे यज्क बात चिपरी नहीं है 
कि जेसे भगवान्‌ नारायण देधतार्ओंकी रक्षा करते है, 
वेस ही तुम व्रनमण्डख्का भय भौर दुःख मिटानिके 
व्यि दही प्रकट इए दहो | ओर यह भीस्पषटदहीड कि 
दीन-दुदिर्याप तुम्हारा वडा प्रेम, बडी कृपा है। 
प्रियतम | हम मी बडी दुःडिनी हैँ । तुम्हारे मिल्नक्री 
आकांश्छाकी आगसे हमारा वक्षःस्थल जठ रहा है । 
तुम अपनी इन दाियोके वक्षःखक भौर सिरपर 
अपने कोम करकमठ रखकर इन्दं अपना गो; हमें 
जीवनदान दो ॥ ४१॥ 





५ क्म्‌ खूपङ्ग ते करुपद्‌पतमूच्छितेन 























सम्मौहिताऽऽयंचरितान चङेस्िलोक्याघर्‌ । 
त्रेरोवयसौभगिदं च निर्य ख्यं 
यद्रो दविलद्रयदणः पुङुकान्ययिश्र्‌।४०। 


व्धुक्तं भवाच्‌ व्रजभयाविंहरोऽभिजातो 


देवो यथ्‌ऽऽहि पुष; सुरसोकणेपा 
तनो निधेहि करपङ्जसातबन्धो 
तप्रस्तनेदु च श्षिरस्छ च किङ्कराय ॥४१॥ 


श्रीशुक उवाच 


इति बिव्लबितं तासं शुस्वा यीगेधरेश्वरः। 


= पः भो "चः वक 


भीद्युक्देव जी कहते परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण सनकादि योगियां ओर रचिवादि योगेरोके 
भी इर हैँ । जव उन्होने गोपिर्योकी भ्यथा ओर 
व्याकुखतासे भरी वाणी सुनी, तव उनका हदय दयासे 
मर्‌ गया ओर यदपिं वे आताराम दै -अपने-आपमे 
ही रमण करते रहते है, उन्हे अपने अतिरि ओर 
किषी भी बाह्य वस्तुकी अपेक्षा नही है, रिरि भी 
उन्होनि ह सकर उनके साथ क्रीडा प्रास्म की ॥४२॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने . अपनी माव.भङ्गी ओर चेष्टा 
गोपियोके अलुकूढ कर दीं; फिर भी वे अपने खख्पमे 
ज्यो -केत्यां एकरक्त खित ये, अच्युत थे । ` व वे. 
एुख्कर ईते, तब उनके उञ््वग-उञ्जवक दाति ` 
कुन्दकगीके समान जान पड़ते थे । उनकी प्रेभमरी 
चितवनसे ओर उनके दशनके आनन्दसे गोपिरयोका 
सुखकम प्रपुल्किति दो गथा । वे उन्दं चारों रसे 
 घेरकर खड़ी हयो गयी । उत सम १ ष्णकी रेस 
। शोभा इर, माः भ < नी पतनी तार्काजेसि षिरे इए 


भभ 
द नि {5 


प्रहस सदय गौपीरात्मारामोऽप्यदीरमत्‌ ॥४२॥ 


ताभिः समेताभिर्दःस्वेषितः 


पथिकषभोत्ुरलयलीभिरच्धुवः । 









उदरहासद्विजङन्ददी धिति 



















इवोडमिद्ंतः ॥४३।॥। 


अ 
क +> .- र 













श्रीमद्भागवतं [ अ० २९ 





उपगीयमान उदृगाषव्‌ वनिताशतयूथपः 
मालां निभ्रद्‌ वेजयन्तीं वयचरन्मण्डयन्‌ वनम्‌ ।४४। 
नद्याः पुलिनिमाविश्य मोपीभिर्हिमबाटकम्‌ । 
रेमे तत्तरलानन्दङ्धुदामोदवाश्रुना ।४५॥ 


बाहुग्रसारपरिरम्भकशलकोरु- 


नीवीक्तनारभननमनलाप्रपतेः । 


ह्वेस्यावलोकहसितेबंजसुन्दरीणा- 
युत्तस्भयन्‌ रतिपतिं रमयाश्चकार ॥४६॥ 
एवं भगवतः दष्णाद्लन्धमाना महात्मनः 


आत्मान मेनिरे स्त्रीणां मानिन्योऽभ्यधिकः ुवि ७७ 


ताकषां तत्‌ सौमगमदं वीक्ष्य मानं च कैश्वः। 








चन्द्रमा ही हों ॥ ४३ ॥ गोपियोकि शतशत युर्थोके 
स्वामी भगवान्‌ श्रीकृष्ण वैजयन्ती माला पहने बृन्दात्रन- 
को शोभायमान करते हृए विचरण करने ल्गे । कभी 
गोपिय अपने प्रियतम श्रीकृष्णके गुण ओर लीठार्भोका 
गान करतीं, तो कभी श्रीकृष्ण गोपियोके प्रेम ओर 
सोन्दयेके गीत गने स्गते॥ ४४॥ इसके बाद 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने गोपियोके साथ यसुनाजीके पावन 
पुचिनपर, जो कपूरके समान चमकीटी बाद्धसे जगमगा 
रहा था, पद्‌(पण किया । वह यपुनाजीकी तरक तरङ्गो- 
के स्पर्हसि चीत यौर कुपुदिनीकी हज घुगन्धसे 
छुवाक्तित वायुके द्वारा सेवित हो रहा था | उत 
आनन्दभ्रद पुटिनपर्‌ भगवान्‌ने गोपियोकि साथ क्रीडा 
करी ॥ ४८ ॥ हथ फेना, आलिङ्गन करना, गोपि्योकि 
हाथ दवाना, उनकी चोटी, जघ, नीवी ओर स्तन 
आदिका स्पश करना, धिनोद करना, नक्षत करना, 
व्रिनोदप्रणं॑चितवनसे देखना ओर युसकाना-- इन 
क्रियाथेके दाया गोपियकि दिग्य कामरसदो, परमोञ्ञ्वक 
परेमभावको उत्तेजित करते इए भगवान्‌ श्रीकृष्ण उन्हें 
त्रीड्वारा आनन्दित करने व्ये ॥४६॥ उद्ारशिपेमणि 
घर्वव्यापक भगवान्‌ श्रीकृष्णने जव इष्त प्रकार गोपिर्योका 
सम्मान किया, तन गोपियोके मनमे रेसा माव आया 
करि सं्षारकी समस्त लिर्योमे हम ही सवेश्रेठ है, हमारे 
समान ओर कोई नहीं है । वे कुछ मानवती हो गयीं 
| ७ ॥ जब भगवानने देखा किं हन्द तो अपने 
घुद्वागका कुछ गवै हो आया है ओर अब मान भी करने 
गी है, तन वे उनका गवं शान्त करनेके व्यि तथा 
उनका मान दूर्‌ कर प्रघननन करनेक च्य वह-उनकं 


ह: म्रशमाय प्रसादाय तत्रेबान्तरथीयत ।४८]। | बीचमें ही अन्तर्धान हो गये ॥ ४८ ॥ 


डक + - 
इतिं श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कनवे परार्धे भणवतो 
रासक्रीडावणनं नामैकोनन्रियोऽध्यायः ॥ २९ ॥ 





अथ तिशोऽध्यायः 
श्रीक्ृष्णके विरम गोपियांकषी दृश्चा 


भीद्युकदेवजी कदते है-- परीक्षित्‌ । भगवान्‌ 
सदसा अन्तर्धान दो गये । उन्हें न देखकर्‌ ब्रजयुवति्थो 


क यमिका यक क (कि दि 


= ऋ 





4 दशम स्कन्ध दद 





ति र चि = चि ति च 








अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य हव यूथपम्‌ ॥ १॥) | की वी ही दश्चा हो गयी, जसे यूथपति गजराजके 
बिना हयिनि्थोकी होती है । उनका हृदथ विरकी 

गत्याञुरागसितषिभ्रमे्िते- उपासे जलने ठा ॥ १॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णकीं 
मदोन्मत्त गजराजकी-सी चाठ, प्रेमभरी मुस्कान; 
व्रिगाक्तमरी चितवन, मनोरम त्रेमाखप; भिन्न-भिन्न 
र प्रकारकी टीगर्भो तथा श ्गासरसकी भाव-मङ्गियनि 
आक्डिसचित्ताः अ्रमदा रमापतेः उनके चित्तको चुरा च्यिाथा | वे प्रेमकी मतवाी 
गोपियोँ श्रीृष्यमय हो गीं ओर रिर श्रीङकष्णकी तिभिन्न 

स्तास्ता विवे जगृहुस्तदात्मिक्नः ॥ २॥ चेशाधोका अनक बसे न ॥ 1 


मनोरमालापविहारतिभ्रतैः । 


गतिसित्रक्षणभाषणादिषु श्रङृष्णकौ चाल-ढाक; हास-विव्यस्त ओर चितवन-बोयन 
आदिमे श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियोँ उनके समान हवी दन 

प्रियाः श्रियश्च प्रतिरूढभूतंय ; । गयी; उनके शरीरम भी वही गति-मति? वद्वी भाव-मङ्गी 

उतर आयी । वे अपनेको सवंथा भूख्कर श्रीकृष्णस्य 
असावह स्थिरयवरस्तदात्मिका हो गीं ओर उन्हीके ठीग-विखक्का अनुकरण करती 
न्यवेदिषः शष्मविह्रविभ्रमा४ इई “मे श्रीकृष्ण ही दह इस प्रकार कहने वख्गीं | 
न्पवेदिदुः कृष्णयिहारवभ्नमाः ॥ ॥३॥ वे सव र प्रिलकर ऊंचे खरसे उन्हीके 
गायन्त्य उच्पैरषुमेव संहता गुणोका गान करने व्गीं ओर्‌ मतवादी होकर्‌ एक 
वनसे दूसरे वनम, ६क आडीसे दूसरी ज्ञाड़ीमें ज-जाकर 

विचिकयुरुन्पत्तकषव्‌ द्‌ नाद्‌ वनभ | श्रीकृष्णको ददने क्गा | परीक्षित्‌ | भग्वान्‌ श्रीष्ण 

कहीं दूर थोडे दही गये थे । वे तो समस्त जड-चेतन 

पप्रच्छ धश्वशषभदन्तर बहि- पदार्थमिं तथा उनके बाहर भी भाकारके समान एकरस 


| सितदहीहै। वे वहीं ये, उन्क्ीमे ये, परतु उन्हं न 
भूतेषु सन्तं॑पुरुपं वनस्पतीन्‌  ४॥ देखकर गोपि्यां वनस्पतियोंसे- पेङ-पोधोसे उनका पता 
पूछने व्गीं ॥ ४ ॥ 


दो वः कचिदश्वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः ८ गोपियोनि पहठे बड़े-बड़े इक्षोसे जाकर पूछा--) 


हे पीपढ, प,कर ओर बरगद ! नन्दनन्दन इयामसुन्दर 
रलम हतवा > अपनी प्रेममरी सुप्तकान ओर चितवनसे हमारा मन 

षं ; ४ = 
ननदशुगतो हृत्वा प्मदासावलोक्नः ॥ ५॥ चुराकर चले गये है । क्या तुमञोगोने उन्हे देखा है १ 
( ॥ ५ ॥ कुरबक, अश्चोक, नागकेशर, पुन्नाग ओर 

ग ६ 

कच्चित्‌ इतकाथाकनागभुन्ाभचम्पकाः । चम्पा | बल्रामजीके छोटे भार, जिनकी यु्तकानपात्रसे ` 
बड़ी-बड़ी मानिनिर्योका मानमदन हो जाता है, इधर 
राभाचुजो मानिनीनौभितो दरषहरसितः ॥ & ॥ | आये ये क्या १ ।६॥ ( जब उन्दोनि जीनातिके पोषो 
कहा--) "बहिन तुर्सी । व॒म्ारा हृदय तो बडा 


कोमक है, तुम तो समी लेर्गोका कल्याण चाहती हयो | 


कचि्तलसि कर्याणि भोविन्दचरणग्रिये । मगवान्‌के चरणो तुम्हारा प्रेम तो. दै ही, वे म॑ 






~ -- - - - ~~~ न -ााक -------------------------------------- - 


~ 
क + 1 र = च~ ७ ॥ 3 


रः 
न च ऋ = 
क „च > ~ ३५८० - + = व = 


क | 
वै _ -२९०. श्रीपद्धागवत  अं० ३० 




























इह त्वालिङ्लेनिभ्र द्टस्तेऽति्रियोऽ्युतः ॥५।। , ठमसे बहत प्यार करते दै । तथी तो मौके मडराते 
| रहनेपर भी वे तुम्हारी मारा नहीं उतारते, सवदा 
मालत्यदश्चि वः कृचिन्मर्कलिके जाति युथिकै | पहने रहते हं । क्था तुमने अपने प्रम प्रिधतम सयाम- 
| घुन्दरको देखा है † ॥ ७ ॥ प्यारी साठ्ती ¡ मल्व्किं | 

प्रीतिं बो जनयन्‌ यातः करस्पशंन माधवः । < ॥ | जाती सौर जही ! तुभरेगोने कदाचित्‌ हमारे प्यारे 
< | माधवको देखा होगा । क्या वे अपने कोमल करोसे स्पशं 
चूतप्रियारपनसासनकोविदारः । करके तुम्हें आनन्दित करते हए इधरसे गये हं १ ॥८॥ 
(रसाठ, त्रिया, कस्हढ, पीतद्णकु, - दचन।र्‌, 

जम्न्धकंनिल्वबङुला्रकदम्बनीपाः | | जामुन, आक, वेक, सौखिरी, आम, कदम्ब ओर 


| नीम तथा अन्यान्य यसुनाके तटपर विराजमान सुखी 


| येऽन्ये पणथंभवका यश्वनोपङूलाः | तरवस ! तम्डारा जन्म-गीन केवल परोपकारके चयि 
\ है । श्रीकष्णके विना हमारा जीवन सूना हो रदा है । 
> शंसन्तु कृष्णरदवीं रहितात्मनां नः! ९ ॥। | हम वेहोश्च हो ददी दँ ¦ तुम हे उन्दं पानेका मागं 

{ बता दोः ९ ॥ 'सगक्राच्कौ प्रेय्ठी पृथ्वीदेवी । तुमने 


छं ते कृत क्षिति तपो बत केशकवाङ्धि- एसी कोन-घी तपस्या की हं किं श्रीृष्णके चरणकमर्य- 

का स्प श्राप्त करके तुम अनन्दसे भटदहीदह्य ओर 

तृण-ख्ता आदिके ख्पम्‌ अपना रौमाज्र प्रकट कर रही 

हषो १ वुम्क्यरा यह उर्छस-विन्द श्रीकृष्णक्ते चरणस्परे- 

अप्यङ्प्रिसम्भव उरक्रमनिक्रमाद्‌ चा के कारण हं अना वामनावतारमं विश्वङ्खं धारण 

¢ करके उन्होने तुदं जो नापा था; उसके कारण हं 

कहीं उनसे भी पहर वराहश्गवान्‌के अङ्ग-सद्कक कारण 

तो त॒म्दारी यह दशा नद्ध ह। रदी है \ ॥१० ॥'अरी 

सखी ! हरिनियो } हमारे इ्यामयुन्दरके अङ्ग क्गसे 

अप्येणपल्युपगतः प्रिययेह मात्रै सुषमा-सौन्दर्यवी धारा बहती दती है वे कहीं अपनी 

प्राणप्रियाके साय तुम्हरे नयनाक्तौ परमानन्दा दान 

सतन्वन्‌ दशां खि सुनि्वतिभच्युतो वः । | करते हए इधरसे दी जा नहीं गये & ! देखो देखो; 

यौ कुख्पति अ छृष्णकरो न्द क्का मालक मनोहर 

बड़ वश्ङ्मरञ्जितायाः गन्ध आ रही 8, ज। उनकी परभ रपीके अद्ध-सङ्गसे 

८ गे इए कुच-कुङ्कमसे अयुरज्ञित रहता हं ॥ ११ ॥ 

 कन्दखजः इरुपतेरिह दाति गन्धः ॥११॥ | (तसुवरा | उनकी माद्यकी ठ॒ब्सीमे रेसी छुगन्ध है कि 

उसकी गन्धके गोभी मतवाले भरे प्रत्यक क्षण उसपर 

बाहुं भ्ियांस॒ उपधाय गृदीतपग्मो मडराते रहते हैँ । उनकं एक हाथमे टीन्कमल होगा 

ओर दृप्ता हाथ अपनी प्रेयक्ीके कंवेपर र्खे हयगे । 

रामालुजस्तरसिकालिङलेमेदान्यः हमारे प्यारे १ इधरसे र अवद्य गये 

ॐ जान पड़ता ढे, ठम लग उन्हं प्रणाम करनेके 

अन्वीयमान इह वर्तव, प्रणामं द | दी छक हो । परत उन्होने. भपनी प्रेममरी 

॑ चितवनसे मी ठम्दारी बन्दनाका अभिनन्दन किया है 
२८ 


ष्ट 
£: 


सपरशोत्तवोत्पुरुकिताङ्गरुदेविंभसि । 


आहो चराहवपुषः परिर्भणेन ॥१०। 


कि बाभिनन्दति चरन्‌ परणयावरोकैः॥१२॥ 


+ 
[कः ~ मि 


क 


१ 


६» ऋ 


[8 
५3 यै 
५ १५ 
^ 

0 

"1 


[क । ए [+ न मी 


अ० ३० | 


` दद्चम्‌ स्कन्धे 


. 


३९१९ 









पृच्छ तेमा रता बाहूनप्याश्िष्टा बनस्यतेः । 


नन तत्छश्लस्प्ट ४8 ञ्यहो ॥ १३) 


छ 
हथुन्पत्तवचोअप्धः छृष्णान्वेवण्ादरः | 


"9 


लखा भगव्दस्तास्ता द्यङु्यक्षुस्तदा।च्यकाः 1 ९४८।। 


द्खाश्वित्‌ पूतनायन्त्याः इष्णायन्त्य दिवत्‌ स्तन्‌ । 


रठ्दरथः्य्‌! पद्हहञ्छकटाषतीम्‌ \। १५ 


देस्यायित्वा उहारान्यायेक कृष्णा भावनाम्‌ । 


रिङ्गिथामा् काप्यदघ्ी कषेन्ती घोपनिःखनेः।। १६ 
कुष्णरामाथिते ह तु शोषायन्स्यश्च कश्चन्‌ । 
व॑स्सायरीं हन्ति चान्या तरेका ठु बद्ाायरीम्‌\) ६७ 
आहूय दरा भ्रदरत्‌ छृष्णसतमलुवतंसीञ १ 

वेणं छणन्तीं कोडन्तीमन्यःःचष्न्ति घाध्विति ।१८। 
कस्यां चित्‌ खज न्यस्य चखन्त्याहापरा नच । 


करष्णोऽहं पर्थत दति रर्तिासिति तन्मनाः ।१९॥ 


मा मैट घातबषौम्यां तलखराभं विहितं षया । 





२. वखायितां ग्रदीत्वान्य। तञका ठु वकायिताम्‌ । 
- । - ५८ । प । दती न व, 
=+ अ - ४ 


स 


ह्युकध्व॑ केन रस्तैन यतन्त्युनिदधेऽस्बरम्‌ ।\२५}) | 





या नहीं १ | १२ ॥ “अरी सखी | इन कतार्भसे पूछ । 
ये अपने पति वर्षोको भुजापाशमे वँभ्रकर आणिङ्गन 
विये हए है, इससे क्या इभा १ इनके श्रीर्मे जो 
पुच्क है, रोमाच्च है, दह तो भगवरानूके नखोकि 
स्परासे ही है । अहो ! इनका वक्षा सौभाग्य 
हे ?॥ १३॥ 

परीक्षित्‌ | इस प्रकार मतव.खी गोपियां प्रगप करती 
हई भगवान्‌ श्रीकृष्णो दंढते-दरढते कतर हो रही यी | 
अव ओर भी गाढ़ आवेश्च हो जानिके कारण वे भगवन्मय 
होकर भगवान्‌की विभिन रीखार्ओका अनुकरण करने 
व्गीं | १४ ॥ एक पूतना बन गयी, तो दृस्ती श्रीकृष्ण 
ननकर उसका स्तन पीने लगी । कोई छकड़ा बन गयी; 
तो कि्षीने बाग्कृष्ण बनकर रोते इए उसे पैरकी लेकर 
मारकर उच्ट दिया ॥१५॥ कोई सखी बाटकृष्ण बनकर 
बैठ गयी; तो कोर तृणाधते दैत्यका ख्य धारण करके 
उसे हर ठे गयी । कोई गप पौव घसीट-घक्षीटकर 
घुट्नोके वख वकता चख्ने ज्गी भौर उस पमय उसके 
पायजेत्र रनञ्चुन-रुनञ्चन बोलने गे । १६। एक बनी कृष्ण्‌, 
तो दसी बनी वन्यम ओर्‌ बहूत-सी गोपिर्या श्राख-वार्के 
रूपमे हो गयीं । एक गोपी बन गयी वत्सर, तो 
दूसरी वनी वक्राञ्ुर । तव तो गोपि्योने अज्ग-अचल्ग श्रीकृष्ण 
वनका वत्ाष्ुर ओौर बकाष्ुर बनी इई गोपिर्योको मारनेकी 
ठीला की ॥ १७॥ जे श्रीकृष्ण वनम करते थे, वेसे ही 
एक गोपी बँष्ुपि वजा-बजाकर दूर गये इए पञ्चभको 
बुखानेक! खे खेलने ट्गी । तव दृस्ती गोपियां ववाह- 
वाह” करके उष्की प्रसा करने लगीं ॥ १८ ॥ एक 
गोपी शपनेको श्रीकृष्ण सुःक्चकर दूसरी सखीके गलेमे 
वंह डाख्कर चर्ती ओर्‌ गोपियोसे कहने कगती-- 
“मित्रो | मँ श्रीकृष्ण दँ । तुमणेग मेरी यह मनोहर चाक ` 
देखोः ॥ १९ ॥ कोई गोपी श्रीकृष्ण बनकर कदती-- ` 
“अरे त्रजवासिो । तम ओधी-पानीसे मत डे । । 
मैने उससे वचनेका उपाय निका च्या है. 
कहकर गोवधेन-घारणक्रा अनुकरण करती इइ वह 
उपर तन क्ती ॥ २० ॥ 











+न. चैः 
४ - १ + १ 
क न नय ~ - ष 


"क 
व~ 








आरुद्येका पद्‌ाऽऽक्रम्य श्िरसखाहापरां नृप । परीक्षित्‌ | एक गोपी बनी कालिय नाग, तो दूसरी श्रीकृष्ण 
बनकर उसके सिरपर पर रखकर चदी-चदी बोल्ने ल्गी- 





२३१२ श्रीमद्भागवत | ० ३० | 
| 
| 
| 
| 


दु्टाहे गच्छ जातोऽहं खलानां नु दण्डध्क्‌॥(२९। रे दु सोप | त्‌ यसे चला जा | मै दुर्टोका दमन 
4 = ॥ कनेक च्ि ह्वी उन्न हआ दरः ॥ २१ ॥ इतनेमें ही 
‡ तत्रकोवाच हे मोपा दावार पश्यतोलबणम्‌ । एक गोपी बोढी- (अरे गाये ! देखो, वनम बडी 


मयकर आग च्मी है | तुम लेग जल्दी-द-जल्दी अपनी 
आंखें मूद छो, मै अनायाक्न ही तुमलोगोकी रक्षा कर 
दगा ॥ २२ ॥ एक गोपी यश्चोदा वनी ओर दसी 
वनी श्रीकृष्ण । यश्चोदाने ष्लोकी मासे श्रीकरष्णको 


चक्षुष्य्छपिदश्वं घो विधास्ये क्षेममज्ञसा ॥२२॥ 


बद्धान्यया स्रजा छाचित्तन्वी तत्र उदूखल 


~ ल्मे ध ट्य >| श सुनः 
भीता सक्‌ पिधायास्यं मेज भीतिवरडम्बनंम्‌।२३। | उख बभ दिया । अव बह श्रीृषण बनी इं छन्द ॥ 
गोपी हा्थोसे संह दंपकर भयकी नकर करने ट्गी ॥२३॥ 
एव कृष्ण पच्छमाना बृन्दाकनलतास्तरून्‌ । परीक्षित्‌ | इत प्रकार टीना करते-करते मोपिर्यो 


च = बृन्दावनके दृक्ष ओर ढता आदिसे फिर मी श्रीकरष्णका 
व्यचक्चपर॒वनोदेशे पदानि परमात्मनः ।२४॥ | पता पूछने ठा । इसी समय उन्होने एक स्थानपर 


( न मगवान्‌के चरणचिह् देखे ॥ २४ ॥ वे अपक्ष कहने 
पदानि व्यक्तमेतानि नन्दश्रनोमंहात्मनः | धि भि उरोरदधिरोमणि ननद 


नन्दन र्यामघुन्दरके &; क्योकि इनमें ध्वजा, कमल, 
वन्न, अंकुरा ओर जो आदिके चिह्न स्पष्ट ही दीख रहे 


त्तेः पदेस्तत्पदवीमन्विच्छन्त्योऽग्रतोऽबराः। दै ॥२५॥ उन चरणचिहोंके दवारा तरजवस्टम भगवान्‌को 
दूढती इई गोप्या अगे बद, तव उन्हें श्रीकृष्णके 


वध्वाःपदेःसुपृक्तानि विलोक्याताः समहवन्‌॥।२३॥ | साथ किसी व्रजयुवतीक भी चरणचिह दीख पड़ । 
(24 उन्हें देखकर वे व्याकुर हो गयीं ओर पक्षम कहने 
कसा, पकाय चतान याताया नन्दद्रलुना । ल्गी--)} २६ ॥ “जैसे हथिनी अपने प्रियतम गजराजके 
साथ शयी हो, वेसे ही नन्दनन्दन श्यामघुन्दरके साय 
उनके कधेपर हाथ रखकर चग्नेवाटी किंस बड़- 
मागिनीके ये चरणचिह दै १ ॥ २७ ॥ अवद्य ही सव- 
 अनयाऽऽराधितो नूनं भगवान्‌ हरिरीश्वरः । शक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यह (आराधिकाः होगी । 
क इसील्िथे इसपर प्रसन्न होकर हमारे प्राणप्यारे स्याम- 
 यञ्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्‌ रहः | २८ | सुन्दरे हमे छोड दिया है ओर इसे पकान्तमे ठे गये 
"् है ॥|२ ८॥ प्यारी सखियो ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने चरण- 
धन्या अहो अमी आस्यो गोषिन्दाङ्घ्यज्जरेण ब | | कमलसे जित रजका स्प कर देते दै, वह धन्य हो जाती 
--- अक है, उसके अहोमाग्य है; क्योकि ब्रह्मा, शंकर ओर मी 
लान्‌ अदेश रमा देनी दपुर्मभ्न्यघुत्तये ॥२९॥ । शादि भी अपने भञ्युम नष्ट करनेके टये उस रजको अपने 


१. नाम्‌ । २. यान्न ब्रह्मादयो देवाः प्राप्ठुवन्ति च मूर्धतः । 


ल्यन्ते हि ष्वजाम्भोजवजाड्शयवादिभिः॥२,५॥। 


व, । 


अषन्यस्तप्रकोष्ठायाः करेणोः करिणा यथा ॥२७)। 









अ० ३० | द्श्चषम स्कन्ध 












[रि 





तस्या अमूनि नः शोभं ङरन्स्ु्वैः पदानि यत्‌। | किरपर धारण करते & ॥ २९॥ भरी सखी । चदि 
कुछ भी हो-- यह जो सखी हमारे सवख श्रीक्ष्णको _ 


यैकापटृस्य गोपीनां रहे युङक्तेऽच्युताधरम्‌ ॥३०॥ एकान्तम ठे जाकर अकेठे दही उनकी अधर.घुधाका ध 
रस पी रदी है, इष्ठ गोपीके उमरे दए चरणचिह तो ` 
ज हमारे हदये बडा ही क्षोम उपपन्न क्र रहे हैः ॥ ३०॥ 
ग 1 1 य्ह रस गोपीके पैर नहीं दिखलायी देते । माद्धम होता । 
हे, यह प्यारे इ्यामघुन्दग्ने देखा द्ौगा कि मेर प्रेयक्षीके 
चिद्यस्छजावाङध्रितखादन्निन्ये त्रेयसीं प्रि 1\३१। | सुकुपार चरणकमले घासकी नोक गडती होगी, इन्धि 
उन्डोने उसे अपने कवेप्र चा च्या होगा} ३१॥ 
हम्‌ स्य्‌धकसग्नानि पदानि वहतो वधूर्‌ | एखियो ! यरा देखो, प्यारे श्रीकृष्णके चरणचिह अधिक 
गहरे -- बाटमे धे ए हैँ । इससे सृचित ७ = ८६ 
ऽप्य पुरः 7 ल यर्हा ते किसी मारी वस्तुको उठ'कर चठे हँ, उसी 
4. बक्से उनके पैर जपीनमें धै गये दै ¦ हो-न-ङो यहाँ 
(= = उप कामीने अपनी प्रियतमाको अवदय कवेपर चदाया । 
अत्रावरा पत) "त युष्पहदोमहारसमना । होगा! ३२ ॥ देखो-देखो, यद्टौँ पमप्रेभी त्रनवल्छभने 3 
फू चुननेके च्यि अपनी प्रेयसीको नीचे उतार दिया 
अत्र प्रसूलावखयः भिमारथ त्रेया करु | है भीर य्ह परम प्रियतम श्रीकरष्णने अंपनी प्रेयसीके 
व्यि एल चुने हैँ | उचक-उचक्रकर श्ट च 
स क कारण यहाँ उनके पंञे तो धरतीमें गड ओर्‌ 
ह भपदाक्रशषमं एते पृश्यतासकरे पदे ॥३३) एड़ीका पता ४ हे ॥ २३ ॥ परम म श्रीकृष्णने 
कामी पुरुषके समान यहौँ भपनी प्रेयघीके केशसंतररेहं । _ 
केशप्रसाधनं ततरे कामिन्याः कामिना कृतम्‌ । देखो, अपने चुने इए श्र्मेको प्रेयसीकी चोटीमे गूयनेके _ 
व्यि वे ययँ वरय ही बेटे रहे गे, ३४ ॥ परीक्षित्‌ 
| तानि चूडयता व्ान्वायुपविष्टमिह धुम्‌ ॥३४॥ | मगवान्‌ श्रीकृष्ण लास्ाराम ह । वे जपने शापमेहीखतष्ट 
ओर पृण हैँ । जब वे अखण्ड हैँ, उने दूप्षरा कोई है दही ` र 
€ | नही, तव उने कामकी कलना कंसे हो सकतीहै १फिर_ 
रेमे तय! चार्मरत आत्मारामोऽप्यखण्डितः भी उन्होनि कामिर्योकी दीनता, खीपरवदाता ओरल्िणेकी _ 












इ दिखते इए वहो उष गोपीके खाय एकान्त- . ` 
कामिनां दर्शयन्‌ दैन्यं द्वीणां चैव दरात्मताथ्‌।३५।। | मे कडा कीयी--एकखेलराया॥ ३५॥ _ 
ट य्‌ द्न्य्‌ ज्ञीणां चच दुरात्मताश्‌।(३५५॥ व 
इत्येवं दशयन्त्य्ताश्चेशर्गोप्यो षिचेदसः बुघ खोकर एक दूसरेको भगवान्‌ श्रीकष्णके चः 


दिखती इई वन-बनमे मटक रही थीं | इधर भगवान्‌ 
यां गोपी मनयत्‌ कृष्णो बिहायान्याः ल्चियो वने।३६]॥| श्रढ़ष्ण द्री गोपियोको वनमे छोड़कर जिस भाग्यवती 


1 
१.३ 





"तकणटष्द स्न च. 





अ गोपीको एकान्तमे ठे गये ये, उतने समश्चा कि कषँ ही 
मेने तदाऽऽत्मानं बरिष्टं सवयोषिताम्‌। समस्त गेपियोमे श्रेष्ठ ह । स व लये तो हमरे प्यारे 
~ र श्रीकृष्ण दूसरी गोपिरयोको छोडकर) डकः ् जो उन्हं इतना 

याना मामसौ भरते प्रियः।{३७॥। । चाहती है, ) है सुस्ेद्ी 


तिमे ८अत्राव ˆ "" - महार › यह लोक] क] ४ 
> डर #॥ ५ न~ | 
~ ८ (4 4 । 4 श व 


| ७ ओमदूभागवत [ अ० ३० 
ततो गत्वा वनोदेशं इप्ता केशवमव्रवीत्‌ । | आदर दे रदे है ॥२६-३७॥ मगवान्‌ श्क्ष्ण ब्रहमानैर = 
रांकरके भी शासक हैँ । वह गोपी वने जाकर अपने 
परेम ओर सौभाग्यके मदसे मतवाढी ष्टो गयी जर उन्दी 
न पारयेऽहं चलितुं नथ मां यत्र ते मनः ॥३८॥ | शरक से कहने लग-- प्यारे ! सुश्चसे अव तो जर 
नहीं चला जाता मेरे कुमार पौवर यक गये हैँ । अव तुम 
जहा चटना चाहो, पुञ्चे अपने कंघेपर चहराकर ठे 
चो ॥ ३८ ॥ अपनी प्रियतमाकी यह बात सुनकर 
दयापसुन्दरने कदा-- “अच्छा प्यारी | तुम अब मेरे 
हः कधेपर चद लयो | ण्ह सुनकर वह गोपी यों ही उनके | 
ततच्ान्तदच ङष्णः स्रा वधूहन्वतप्यत्‌ ॥३९॥ | कथेपर चने चटी, स्यो ही श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये ^= 
ओर वह सौभाग्यवती गोपी रोने-प्ताने व्गी ॥ ३९ ॥ | 
'हानाथ। ह्या रमण | का प्रष्र| हा महाभुज! त॒म 


र करा हो | कहाँ हो | मेरे प्खा ! मँ तुम्हारी दीन-दीन 
हा नाथ रमण प्रेष्ठ कासि क्वा ् < 
॥ [11 सात महाव | दासी ह्रं। शीघ्र ही सुन्चे अपने सानिध्यका अनुभव 


दासास्ते कूपणाया बे षखे दशंय सन्निधिभ्रू ॥४०॥। कराओ-- मद्य दरान दोः | ४०॥ परीक्षित्‌ 
गोपिर्यां भगवान्‌के चरणचिहोके सहारे उनके जाने- 


अन्विच्छन्त्यो भपवतो मागं गोप्योऽविदूरतः | | का मा दती-इदती वहा जा पी । योडी 
दूरसे ही उन्होनि देखा किं उनकी सखी अपने प्रियतमको 
 ददशःप्िथविदरेषमोहितां दुःखितां सखीय्‌॥४१।। | भियोगसे दुखी होक अचेत हौ गयौ है ॥ ४१ ॥ जव 
उन्होने उसे जगाया, तव उसने भगव्रान्‌ र कृष्णसे उसे 
जो प्यार ओर सम्परान प्राप्त इभा या, बह उनको घुनाया | 
उसने यह भी कहा कि भ्रैने कुटिलताव्डा उनका <> 
| अपमान किया, इ्षीसे वे अन्तर्धान हो गये ।' उसकी 
अवमानं च दीरात्म्य।द्‌ विखयं परमं ययुः ॥४२॥ | बात सुनकर गोपियोके आश्चयकी सीमा न रदी ॥४२॥ 





एवप्ठुक्तः प्रियामाह स्कन्ध आरुद्यत।मिति । 





व क 





क 0 













ऋ ऋऋ 


तया कथितमाकरण्यं मानप्राप्ति च माधवात्‌ । 


कः ततोऽचिश्चन्‌ वनं र न्द्रव्योत्स्ना याप्रद्‌ विभान्यते। हस्तक बाद वनमे जहातक्र च्रदेवकी चांदनी चटक 
3 | रही थी, वहातक वे उन्हें दृंढती हई गथीं । परंतु जब 
उन्होनि देखा किं अगे घना अन्धकार है--षोर जग 
है- हम ददती जर्यगी तो श्रीकृष्ण ओर भी उसके 
य अदर घुस जार्यगे, तन वे उधरसे खोट आयीं ॥ ४२ ॥ 
तमः प्रविश्मालक््य ततो निवव्रतुः लियः ॥४३॥ | परीक्षित्‌ | गोपिरयोका मन श्रीकृष्णमय हो गया या । 
क: उनकी वाणीसे कृष्णच्चाके भतिरिक्त ओर कोई बात 
नही निकठती थी । उनके शरीश्से केवल श्रीकृष्णके व्व ओर 


नरस्कास्तदारापास्तदिचेशस्तदालिमिश्गाः ` | केवट श्रीङ्गण्णकी बेटा हयो रदी यीं । कर्होतक्‌ क्ट; उनका 








अ० ३१ 1 दश्षम स्कन्ध 













तद्गुणानेव गायन्स्यो नाल्भाग।रणि सखरूः॥४४॥ , रोम-रोम, उनकी आला श्रीक्ृष्णमय हो रही थी । वे केवढ च 
उनके गुर्णो ओरकालर्ओका द्यी गान कर र्दी यीं ओर उनमे 
इतनी तन्मयदहोरहीथीं किं उन्हं शपनं रशरीरकीभी 

पूनः पृरकिनिपागत्य कालिन्याः कृष्णभावना,.। ५ 1 व 1 
गोपियोंका रोम-रोप इस्त वातकी प्रतीक्षा ओर अक्खा | 

कर रा थ। करि जब्दी-से-जल्दी श्रीकृ आयं । श्री- | 

कृण्¶की हयी भावनमें इ बी इई गोपियाँ यघुनाजीके पावन 
पुठिनपर-हमणरेतीमे जोट आयीं ओर एक साय मिक- 
समवेता जगुः कृष्णं तद।गमनकाष्धिताः 1७५५) | कर श्रीक्ृण्णके गुर्गोका गान करने कग ॥ ४~ ॥ 
=-= 
इति श्रीमद्भागधते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशभस्कन्वे पर्भँ रासक्रीडायां 
कृष्गान्वेषणं नाम त्रिंखोऽव्यव्रः ॥ ३० ॥ 


चछ - 
अथेकत्रिशोऽध्यायः 
गोपिकागीत 
गोप्यं उचुः गोपिर्यौ िरदावेशाम गान लगी--पयरे ! तुम्हारे 
जन्मके कारण वैकुण्ठ आरि गोक्रसे भी त्रजकी महिमा 
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः बह गयी है । तभी तो सोन्दय ओर मृदुकताकी देवी 
श्रयत इन्दिरा शध हि। लक्मीजी अपना निघ्रासस्थान वेङुण्ड छोडकर यहो 


नित्थ.निरन्तर निवाप करने ठगी है, इसकी सेवा करने 


दयित दश्यतां दिष्चु तारका व्गी है | परंतु प्रियतम ! देखो तुम्हारी गोपयां जिन्होने 













सवयि प्रताष्ठवस्त्वां विचिन्वते ॥ १॥ | तुम्हारे चरणेमिं ही अपने प्राण समपिंत कर रखे हँ, ` प 
शरद्‌ दाश्चये साघुजातसत्‌ वन-वनमे मटककर तुम्हें दद रही हँ ॥ १॥ हरे 
स्रसिजोदरश्रीषुषा दशा । रमणं हदयके खामी । हम तुम्हारी विना मोक्की दासी 


हैँ । तुम रा्काीन जगश्चयमे सुन्दर-से-षुन्दर क्षरसिज- ` 
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका की कणिकाके सोन्दयको चुरानेवाले नेत्रेषि हमे घायक कर ` 
व्रद॒निष्नतो नेह फं वधः॥ २॥ | चुके ० हमारे मनोर ष करनेवलि प्राणेश्वर | . 

ठ क्या नेत्रोसे मारना वध नहीं है १ अलसे इत्या करना 

विषजलाप्ययाद्‌ व्यारराध्ाद्रद्‌ दी वध है १॥ २ ॥ पुरुषशिरोमणे । युनाजीके वितले 
वेमारुताद्‌ बेधयुतानलात्‌ । जवसे होनेवाटी सृष्यु, अजगरके रूपमे खानि 
इन्द्रकी वषा, आंधी, बिजटी,दावानखःबृषभाघुर ओरन्योमा- 





प &॥ ३। 


या न ~> ~ ~~ 


न खट गोपिकानन्दनो भवा- | ठमकेवर योदानन्दन ही नद्टी हो; समन्त श्ररीरधारियो- 
नखिलदेहिनामन्बशतसष्क्‌ के हृदयम रहनेवाले उनके साक्षी हो, अन्तर्यामी हो । 
विखभसार्भितो दिशधयुक्षये सख । ब्रह्माजीकी प्राथनासे विश्चकी रक्षा करनेके च््यि 
| सख उदेयिवान्‌ सात्वतां इठे ।; ४। तुम यदुवंशे अवतीर्णं इए हो ॥ % ॥ 
॥ विरचिताभयं इष्णिधुर्यं॑ते ् अपने १ च प्रण करनेवारोमे 
| ल ण्य यदुवं्तरिरोमणे ! जो लोग जन्म-मृत्युखूप 
| चरणनीुवा संसतेभयात्‌ । संप्तारके चक्रे उरकर तुम्हारे चरणोँकी शरण ग्रहण 
करसरोरुहं कान्त कामदं करते हे, उन्दं तुम्हारे कर्कमट अपनी छत्रखायारे 
| केकर अभय कर देते हैँ | हमरे प्रियतम | वकी 
शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्‌ ॥ ५॥ | बव्सा-अमिवाषार्भोको परणं करनेवाग वही दरकमल, “= 
जससे तुमने टक्मी जीक। हाथ परकड़ा है, हमारे रपः 
वरजंजनातिंहन्‌ कौर योषितां रख दो ॥ ५ ॥ त्रजव्रासियोके दुःख दूर करनेवाठे वीर 
शिरोमणि श्यागघुन्द९ ! त्री मन्द-मन्द्‌ सुद्तकानकी 
निजजनसयध्वसनसित | एक उञ्ज्वटं रेखा ह तुम्हारे व्रमीजगोके सारे मान- 
मदको चूर्‌-चूर कर देनेके व्यि पर्याप्त है | हारे प्यारे 
भज सखे भवत्किङ्करीः स नो सला | हमसे रूटो मतः प्रेम क्रो | हम तो तुम्हारी 
दासी है, तुम्हारे चरर्णोपर निछावश्‌ है | हम अटार्जः- 
जलसष्टननं चार दर्शय ॥ ६ को अपना वद परम सुन्दर सवासा सुदकमल 
दिखगओ ॥६॥ तुम्हारे चरणकमङ शरणागत प्राणियोके 
प्रणतदेहिनां पावद्र्चनं पारे पा्पोको नष्ट कर देते है । बे समस्त सौन्दर्य 
माधुथकी खान हैँ ओर खयं लस््मीजी उनकी सेवा कती 
दृणचरानुमं भ्ीनिकेतनम्‌ । रहती है ¦ तुम उन्हीं चरणोसि इपर कछ के पीछे-े 
चलते हो ओर्‌ हमरे व्यि उह रोपे फमोंतकपर "4 
लं रखनेमे भी दमने संकोच नहीं किया । हमारा ह्य | 
फणिकणापितं ते पद्बुनं तुम्हारी विरह-व्यथाक्री आगसे जल रहा है, तम्हारी 
| भिलनकी भाकाह्घ। हमं एता रही है । तम॒ अपने वे 
= छृणु वेषु नः कृन्धि हृच्छयम्‌ ॥ ७॥ | दी चरण हमारे वक्षःस्थलपर रखकर हमारे हृदयी 
= ष्वालाको शान्त कर्‌ दो ॥ ७ ॥ कमस्नयन ! तुम्हरी 
` मधुरया गिर॒ ब्युवाक्यया वाणी कितनी मधुर है | उक्तका एक-एक पद, एक-एक 
- 6 शन्द, एक-एक भक्ष मधुरातिमधुर है । बड़े-बड़े 
~ म बुधमनोज्ञया पुष्करेश्वण | विद्रान्‌ उसमे रम जावै हैँ | उसपर अपना सस्व 





२१६ ्रीमङ्णवतं [ अ० ३१ 


कि नि कि ` यिनि 













निछावर्‌ कर देते है । तुम्हरी उसी बाणीका रसास्वादन ९.६ 
विधिकरीरिमा बीर सयत करके तम्दाी आज्ञाकारी दासी गोपियाँ मोदित हो 
रदी है | दानवीर | अब तुम अपना दिव्य अगृतसे भी 


(रवम "१५९११ 6 _-____- > ४९ 
® भद । च्‌ (१ - १ब्रू गजना # 99 9 चाड दर्यः यह्‌ कठोक नहीं हि | । 


न | 8, = ॥ 
£^ ~ कत्‌) ७ क < १ 
भ 1 क । » = ॥ 
नि क ्, ~ 


क्म य छ कः नि 
४ ए 
= ॐ, 
् 












+ । षु ह ५। 4, ; 


^ # ++ =“ # क 
त च 
क 
=) 


| "क च = 
^ 
ॐ ^~ 


र, 
व छ = 





ग अ प 
निस र प ध £ चै 
क 














अ० ३१ | दक्षम्‌ स्कन्धं 
तब कथादरत तप्रजीवनं दो ॥ ८ ॥ प्रभो | तुम्हारो रीलाकथ। मी अग्रत 
। रिरहस्चे सताये इए टोगेकि च्य तो वह जीवन- 
कतरिभिरडितं करधषपहभ्‌ । स्वल दही दै । वदे-वद़े ज्ञानी महाताओं- भक्त 
करविंयाने उसका गान किया है, वह पारे पप-ताप तो 
भ्रप्रणसङ्गलं श्रीमदाततं मिटाती हयी है, छाथ द्वी च्णमात्र्रे परम मङ्गल ` 


परम कल्याणका दान मी करती ह । वह परम घुन्दर, 

यष एणन्ति ते सशदि जनाः \ ९ || | परम मघुर ओ बहत विस्तरत भी ह । जो तुम्हारी उस्‌ 
लीट-कथाका गान करते हँ, वास्तवमे भूटोक्मे वे ही 
खनसे बड़े दात। हैँ ॥ ९ ॥ प्यारे! एकत दिन वह था, जव 
तुम्हारी प्रमभरी हक्षी ओर दितवन तथा तुम्दारी तरह- 

| तरहकी क्रीड।ओंका ध्यान करके हम आनन्दे मग्न हो 


प्रहसितं क्रिय प्रेमवीक्षणं 


हरण च ते ऽ्यानमङ्ककम्‌ । जाया केरती थी | उनका ध्न भी परम मङ्खक्दयक 
। है, उक्तके बाद तुम मिले | तुभे एकान्ते हृदयस्पर्ी 
रहसि एविदः या हदिस्प्रश्षः विधियां की, त्रेमकी बातें कही | हमारे कपटी मित्र। 


१ | अब वे पसव बति याद्‌ भरकर हमारे मनक श्षुव्ध दिये 
हक नो मनः क्षोभयन्ति हि ।१०॥ देती है| १०॥ 
चरति यद्‌ वर तर्चाश्यन्‌ पशून्‌ । 


| हम।रे प्यारे स्वामी ! तुम्हारे चरण कमस्से मी 


नङिनुन्द्रं नाथ॒धे षदभ्‌ । कोमठ ओर सुन्दर हे । जवर तुम गं ओको चरानेके च्य 
१ व्रजसे निकठ्ते हो, तन यह सोचकर कि तुम्हारे बे युगठ 
1 ञदनम्कर) सीदतीति नः | चरण ककड, तिनके ओर कुश-कोटि गड़ जानेसे कष्ट 


ङितां सन; कल्पं मच्छति ॥११।॥ पते होगे, हमारा मन वेचेन दो जाता दहै । हमे बडा ` 

ध € दुःख दहयोता है ॥ ११॥ दिन दस्नेपर जब तुम बनञ्चे 

दिनपरिये ।सङन्तल- घर ठीटत हो, तो हम देखती हैँ कि तुम्हारे सुखकमढ- ` 
पर नीली-नीी अब्के ख्टक रदी ई ओर गोओके, खुरसे च 9 
उड़-उडकःर घनी धूल पड़ी इई हे । हमारे वीर प्रियतम । 
ः तुभ अपना बह सौन्दय हमे दिखा-दिखाकर हमारे इदयमें 
घनरजखलं ददंयन्‌ शह मिनी भाका्षा- त्रम उन्न करते हो ॥ १२॥ ` 

त्रियतम ! एकमात्र व्ही हमारे सारे दुःखोको मिटाने 

मनलि न; सरं वीर यच्छसि ॥१२॥ , वाले हो । त्हारे चरणकमल शरणागत भरञोकी समसत । 

। अभिलाषार्भोको प्रण करनेवाले हैँ । खयं व्क्ष्मीजी उनकी 
| सेवा करती हैँ ओर प्थ्वीके तो वे भूषण ही 
धरणिमण्डनं ध्येयमापदि । । आपत्तिके समय एकमात्र उन्दहीका ` न्तन करना उचित 
है, जिससे सारी आपत्तिरयो ५ १ साभा है । नुर्ज- 












वंनरुहपननं बिभ्रदावृतम्‌ । 


अ्रणतन्नाभदं पञ्जाचितं 


चरणपङ्कजं शन्तमं च ते 


| 4 4 
व~ श्रीमद्भागवत [ अ० ३१ 
























न सुरतवर्धनं शोकन।श्चनं दो ॥ १३ ॥ वीरशिरोमणे । त॒म्ह।रा अधराभरत मिखनके 
षुखको, आकाङ्काको बदानेवाया ह | वह॒ विरहजन्य 
3 खरतिवेणुना सुष्टु उुम्बितमू । समस्त शचोक-संतापको नष्ट कर देता है | यह गनेवाटी 
इतररागविसारणं चरणां वोष्ुरी भीमा ति उसे चूमती रहती £ । जिरन्होने एक 
१ वितर बीर नस्तेऽधराशृतम्‌ ॥१४५॥ | वार उसे पी ल्या, उन रेर्गोको फिर दस्त ओर दू्तरोकी 
= आपसक्तिर्योका स्मरण भी नहीं होता । हमारे वीर! 
अपना वदी अधरामृत हभ विदरणं करो, पिलाओ 
बुषियुंगायते त्व।मपत्यताम्‌। ॥ १४ ॥ प्यारे | दिनके समय जव तुम वनमें विहार 
- करनेके स्यि चले जाति हो, तब तुम्हें देखे विना हमारे 
इटिल्ङुन्लं श्रीखं च॒ ते व्यि एक-एक क्षण युगके समान हो जाता है ओर 


लड उदीक्षतां पकष्मञ्द्‌ दृशाम्‌ ।१५॥। | जम तम ॒संष्याके समय गोव्ते हो तथा धँबराठी 
अलकोसि युक्त तुम्हारा परम ञुन्दर मुखारविन्दं हम 


अटति यद्‌ भवनह्वि काननं 


ट 3 प पतिसुतान्वयश्नाठ॒बान्धवा- देखती है, उस समय पलक्रोका गिरना हभारे च्यि मार 
४ नरिविलङ्घ्य तेऽन्त्च्युतागत।; । हो जता है ओर रेरा जान पडता है कि हन नेत्रोकी 
- क ट पठकोकि बनानेवाला विध।ता मूं है ॥ १५ ॥ प्यारे 

गतिषिदसूवाद्रीतमो हिता 1 श्याम्ुन्दर ! हम अपने पति, पुत्र) भाई, = ९८। ओर 


कुक-परिवारका त्याग कर, उनकी इच्छा ओर आज्ञाओंका 
उल्क्षन करके तुम्ह।रे पास आयी हैँ । हम तुम्हरी 
4 | ह एक-एक च।ऊ जानती हे, संकेत समञ्नती है भौर 
रहति संविदं हृच्छयोदयं तुम्हारे मधुर गानकी गति समञ्चकर, उीसे मोहित 


किंत योषितः कस्त्यजेनिक्ि ॥१६॥ 


रः होकर यहो आयी हँ | कपटी | इस प्रकार रात्रिक 

्रहलितानन ्रमबीश्षणम्‌ । प्तमय आधी इई युवतिर्योको दम्हारे सिवा भौर वौन 

= = छोड़ सकत। है ॥१६॥ प्यारे । एकान्तम तुम मिग्नकी 
 इहदुरः भियो बीक््य धाम ते | आकाङ्घा; प्रेममवको जगनेवाखे बाते करत ये। 


ठिलिगी करके हमें छेडते थे । तुम प्रेमभरी चितव्रनसे 

य॒हुरतिस्पहा अद्यते मनः ॥१५७॥ हमारी ओर देखकर मुक्तकरा देते थे भीर हम देखती 
(2. यी तुम्हारा वह विरा वक्षःस्थल, जिसपर च्कमीजी 
` एसां व्यक्तिरङ्ग ते निष्य-निरन्तर निवाप क्ती है । तवसे अबतक निरन्तर 
< हमारी गपा बढती ही जा दी है ओर हमारा मन 

अधिकाधिक मुग्ध होता जा रहा है ॥ १७ ॥ प्यारे । 
तुम्हरी यह अभिन्यक्ति त्रज-वनवा्ियकि सम्पूण दुःख- 


क र 
4 न 


विमङ्गलम्‌ | 






व्यि है| हमाश हदय वम्ह।रे प्रति खरसासे भर रहा 


त्यज मनाक्‌ च नस्त्वरस्पृहात्मनां 
~ हे ॥ ध) थोड़ी-सी देक्षी ओषधि दो, जो तुम्हारे निजजनों 





न 





` ` = त 
र ८ ह ॐ ह १) १ 








__ _ खजनहद्नां  यश्निषूदनम्‌ ॥१८॥ |के इ रोगको सर्वया निगूढ कर दे ॥ १८॥ 


इ 
च 





> ~ 
> ज 


१. वार्‌ | २. स्ह । 


तापको नष्ट करनेवाली नीर विका पूर्णं मङ्ग करनेके 











अ० ३२] द्श्चम स्कन्धं २१९ 








~~ क प यक्यक्रयकण्यं 
ती भख करनय 


यत्ते सुनातचरणाम्बुशुं स्तनेषु तुम्हारे चरण कमरसे भी सुकुमार हैँ १ उन्दं हम अपने कठोर 
स्तर्नोपर भी डरते-डरते बट्रत धीरेसे रखती ई किं कहीं 
उन्हं चोटन ग॒ जाय । उन्दी चरर्णोसि तुम रात्रिके 
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि ककंशोषु । समय घोर जग्मे च्पि-चिपि भटक रहेहो | क्या 
ककड, पत्थर अ।दिकी चोट ल्गनेसे उनमें पीड़ा नहीं 
-| होती; हमे तो इसकी सम्भावनामात्रसे द्यी चक्र आ रहा 
तेनाटवीमटसि वद्‌ व्यथते न किंखित्‌ | है। हम अचेत होती जा रदी ह । श्रीकृष्ण | 
श्यामसुन्दर ! प्राणनाथ ! हमारा जीवन तुम्हारे व्यि 
है, हम तुम्हारे व्यि जी रही है इम तुम्हारी 
कूपादिभिम्रंमति धीभवदायुषां नः ॥१९॥ | है ॥ १९ ॥ 
= 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्कन्वे प्रव्धे रासक्रीडायां 
गोपीगीतं नामेकत्रिसोऽव्यायः ॥ ३१ ॥ 


- "~ग ट्ट 
अथ द्वात्रिरोऽध्यायः 
भगवानक। प्रकट होकर गोपियांको क्लान्त्वना देना 
श्रीद्यकं उवाच श्रीटएुकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! भगवानकी 


> 


प्यारी गोपियाँ विरहके आतेशमे इस प्रकार मति-भंतिसे 
गाने ओर प्रलाप कले ग्गौं | अपने कृष्ण-प्यारेके 
दशंनकी गर्सासे वे अपनेको रोक न सकी, करुणा- 
< ह जनक सुमधु खस्से षट-ष्टकर रोने चीं ॥ १ ॥ 
रुरुदुः युखर राजच्‌ कृष्णदश्चनलारकस्षाः ॥ ९ ॥ ठीक उसी मय उनके बीचोबीच भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
प्रकट हो गये; उनका मुखकमच मन्द-मन्द सुसकानसे 
खिला इ था, गलेमे वनमाला थी, पीताम्बर धारण 
किये हए थे । उनका यह खूप क्या था, सबके मनको 
मथ डाल्नेवाठे कामदेवके मनको भी मथनेवाख था 
॥ २॥ कोटि कटि कामोँसे भी खुन्दर परम मनोहर प्राण- 
वल्लभ श्यामसुन्दरको आया देख गोपियोके नेन्नप्रेम ओर 3 
व 
। 


इति गोप्यः प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्च चित्रधा । 


+= ` 


तासामाविरभूच्छोरिः खसयमानश्रखाम्बुजः 


पीताम्बरधरः सग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥ २॥ 


त विलोकयागत प्रष्ठ प्रीव्युत्फुर्लदशोऽबलाः । आनन्दसे खिन उठे । वे स्ब-की-सब एक दही साय 
इस प्रकार उठ खडी दई, मानो प्राणद्वीन शरीरम दिभ्य 


प्राणका संचार हो गया हो, शरीरके एक-एक अङ्खमे 

नव्रीन चेतना-- नूतन स्पत आ गयी हो॥३२॥ 
| एक गोपीने बहे प्रेम ओर आनन्दसे श्रीकृष्णके ` 
काचित्‌ कराम्बुजं शोरे्जगृहेऽञ्जरिना सुदा । ‰ | करकमल्को अपने दोनों हामि ठे च्या जर बह. 


१. ` १. रसक्तीडायामिकव्रि०,। २. बादरवणिरुबाच | `` ` रासक्रीडायामेकरत्रि०,। २. बाद्रायणिर्वाच । 


उत्तस्थुर्युगपत्‌ सबोसतन्वः प्राणमिवागतम्‌ ॥ ३॥ 






























३२० श्रीमद्भागवत [ भर ३२ 
€ ---------------=--~------ -------- 





काचिद्‌ दधार तद्वाहुमंसे चन्दनरूषितम्‌ | ४ ॥ | धीरे-धीरे उसे सहकाने च्णी । दृसरी मोपीने उनङे 

चन्दनचचिंत भुजदण्डको अपने कधेपर रख छिया 

काचिदञ्जलिनागहात्तन्वी ताम्बूलचर्वितम्‌ । ॥ 9 ॥ तीतरी छन्दरीने भगवान्‌का चनाया हआ पान 

धपने हा्थोमे ठे व्यि | चौथी गोपी, जिसके हदयमे 

भगगनकरे विरहसे बडी जयख्न हो रही थी, बैठ गयी 

एका तदङ्धिकमलं सनऽप्ा सनयोरथात्‌ ॥। ५ ॥। | नौर उनके चरणक्मव्को अपने वक्षःस्पर रख दया 
र ॥ ५ ॥ पोचवीं गोपी प्रणयकोपद्धे विह्वल होकर, भीहि 

चदढाकर, दतोंसे होठ दबाकर पने कटा्ष-वाणसि 

बीधती इहे उनकी ओर ताकने ल्गी! ६ ॥ छटी 
गोपी अपने निर्निपेष नयनो उनके मुखव्छमलक्‌ः 

| मकरन्द-रस पान करने व्गी | पएरतु जैसे संत पुरूष 
घ्नतीवेशषत्‌ कटाशेपेः संदषटदशनच्छदा ॥ ३ ॥! | मगवानके दर्णोके दशनसे कभी तृप्त नरी होते, ३ 

हीं वह उनकी मुख-माघुरीकां निरन्तर पान करवै 

अपरानिमिषद्दस्यां जुषाणा तन्धुलाम्बुजस्‌ ए १९ वत नही. होती धी ॥ ७ ॥ सातवी गोपी 

ै नेत्रोके मागसे भगवान्‌को अपे हदयमें ठे गयी ओर 

फ़िर उद्ने आंख वंद करीं} लन मन-ही-मन 

आपीतमपि नाठप्यत्‌ सन्तस्तच्चश्णं यथा । ७ ॥ मगगन्‌का भालिङ्गन करटेसे उका चीर पुखकित 

हो यया, रोम-रोम खिल 51 ओ१ वह सिद्ध योगियोंके 

समान परमानन्दमें मगन हो गयी | ८ # परीक्षित्‌ | 

जेसे मुसुक्षुजन परम ज्ञानी संत पुरुषको ग्राप्त करके 

संसारकी पीडसे सुक्त हो जते है, वैसे ही सभी 

पुखसाङ्गयपगुद्यास्ते योगीवानन्दसम्प्टुता ।॥ ८) | गो पियको भगवान्‌ श्रीकृष्णवे दशनसे परम आनन्द 

ओर परम उल्गप्त प्राप्त हभ । उनके विरहके कारण 

= है & ६ | गोपि्ोको जो दुःख इभा था, उससे वे मुक्त हो गयीं 

।  सरबा्ताः केशवालोकपरमोत्सवनिदंताः। ` लोर शान्तिक सममे इवने-उतराने स्गी॥| ९ ॥ 

क परीक्षित्‌ ! यों तो भगवान्‌ श्रीकृष्ण अच्युत ओर ९करस 

है, उनका सीन्दय ओर माधुयं निरतिशय है; फिर भी 

विरह-व्यथ।से सुक्त द्वद गोप्रियोके वीच उनकी शोभा 


ए क्षीर भी बढ़ गयी । दीक वैसे ही, जैसे परमेश्व अपने 
3 भिरविभूतश्नोकाभिर्भगवानच्युतो इतः । नित्य ज्ञान, बल आदि रशाक्तियोंसे सेवित होनेपर ओर 


व्यतेचताधिकं तात पुरपः अक्तिभिर्यथा ॥१०॥ | भी शोभाधमान होता ह ॥ १० ॥ 

~ इक्के बाद भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन नजघुन्दरिर्योको 
. | साय ठेकर यसुनाजीकेो पुरिनमें प्रवे किया । उस 
` | समय विले इए कुन्द ओर मन्द्‌।रकं पुकि रमि 


एका भ्रङ्टिमावध्य प्रेमस्तरम्भगिहसा । 


| ` १, । ॐ 
ह 


4 


न्यु + 2, 
1 14. 


॥ # # ) "व 
५ 1 ॥ि क ३ ३ ==. न ४ 
15 2 क ` ~ 1 कद ० क छ  %4 । + = 11, धद र = 
# रा ४ + ॐ 
कः , ° [६९ कै क 


| 1 + 


0 य क्यः 


[२ 
व 


त काचिन्नेतरररपरेण हदिकृत्य निमीरय च । 


अ हरविर तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जनाः ॥ ९॥ 
द 


[१ 5 = द छ  # | ~ 


५९१ 








= । 
क = 9 कन 
ऋ * ॐ = निकोद्िक्ि ये 8 क्श तक ह? शे छदि ८7 ३ +. 


० ३२ ] दृश्चम स्कन्ध ३२१ 

















विकलङृन्दभन्दारसुरभ्यनिलषट्पदम्‌ ।११॥ , ठेकर बड़ी ही शीतल ओर सुगन्धित मन्द-मन्द बा 
चट रद्टी थी भीर उसकी महंकते मतवाले होकर भीरि 

इपर-धर मंडरा रहे ये॥ ११॥ शरूर्णिमाके 
शरचन्दराग॒न्दोदष्वस्तदोषातः श्िवभ््‌ । चन्द्रमाकी रचोदनी अपनी निरागी ष्ठी छटा दिख री 
यी । उसके कारण रात्रिके अन्धकारका तो कहीं पता 
दी न या, सवत्र आनन्द-मङ्गव्का ही साम्राज्य छया 
था । वह पुलिन क्या या, यमुनाजीने खयं अपनी 
गरक हार्थो भगवान्‌की रीाके च्वि सुकोमल 
बाटुकाका रगमच्च बना रक्खा या ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌] 

| हः हिध भगवान्‌ श्रकृष्णके दशनस्चे गोपियोकरि हदये इतने 
९६ दन दूतहृ्क3 धानन्द आर इतने रक्षका उल्मस्ष इ किं उनके 

| हृदयकी सारी बाधि-न्याधि मिट गयी । जेते कमकाण्ड- 

| की श्रुतिर्या उप्तका वणन करते-करते अन्तमें ज्ञानकाण्डका 

मनोरथान्तं श्वुतयो यथा ययुः | प्रतिपादन करने ल्गती हैँ ओर फिर वे समस्त मनोरथेसि 

। ऊप्र्‌ उठ जाती हे, कृतकृत्य ह्यो जाती है वैसे ही 
गोपि मी पूणकाम हो गयीं । अव उन्होनि अपने 
वक्षःसथर्पर लगी हृद रोगी-केस्रसे चिहित ओदनीको 
| अपने परम प्यारे सुद्‌ श्रीकृष्णके विराजनेके च्यि 
स्वीक पञाघनमातमनन्धवे ॥१३॥ | विछ दिया ॥ १३॥ बडवडे योगे अपने योग 
साधनसे पवित्र किये इए हृदयम जिनके य्य आक्तनकी 
| कल्पना करते रहते है, वितु फिर भी अपने इदय- 
| िद्यासनपर्‌ बिढा नह्य पाठे, वही सवेशक्तिमान्‌ मगवान्‌ 
| यमुनाजीकी रेतीमे गोषियोंकी ओदनीपर बैठ गये । 
पहज्न-सहस् गोपियकि बीच उनसे पूजित होकर 
| मगतरान्‌ बडे ही शोभायमान हो रटे थे । परीक्षित्‌ । 
| तीनों गेकमि-- तीनों कामे जितना भी सौन्दयं 
प्रकाशित होता है, वह सब तो भगवानूके विन्दुमात् 
| सौन्दयका आमासभर है । वे उसके एकमात्र आश्रय 
= § । दँ ॥ १४॥ भगव्रान्‌ श्रीकृष्ण अपने इक्त अदो किक 
म रौ किः 
वरन | सोन्दयके द्वारा उनके प्रेम बौर शकाङ्घाको ओर भी 
उभाड रहे ये । गोपियोनि भपनी मन्द-मन्द मुस्कान, ` 
विगासपूण चितवन शौर तिरी भहयसे उनका सम्मान 

छ | क्रिया । किसीने उनके चरणकमर्छेको अपनी गोदमे 
॥ ् सहाशलीलेक्षणविभ्रमभ्रुवा = । रल लिया, तो किसीने उनके करकमेको । वे उनके ` 


{१ रि ् ५ # | 
| 2 धि 
ङ्ध >~ क ५ भ ४ ~ # 
। * ५ ॐ चनि 9 „न्द चक कं र, के ® * 
। क = द. 4 । * र । 
ग ष्ट । ^ । ॥ ` ५4 अ + ॥ = क 
= 4 ~ च ह = ^~ 
~ म फः द । ^ ज हि + ६ 


कृष्णाया दस्ततरलाचितकोमलवाटकम्‌ ॥१२॥ 


+ भ्र, ति (| 
स्वेरुत्तरीयेः कुच कुङमाङ्िते- 





| तत्रोपविश्े भगवान्‌ स ईश्वरो 


योगेश्वरान्तदहंदि कर्पिताखनः । 


यकार गोपीपसिद्रतोऽ्चित- 


सभाजयित्वा तमनङ्गदीपनं 


#. ५ # श. 


ग. ++ ______ब बब बब ब~ ~~~ 









संसप्नेनङ्ककृताद्रिह्तयोः 


संस्तुत्य इषत्ुपिता बभाषिरे ॥१५॥ 
गोप्य ऊचुर 
एक॒ एतद्िपयंयम्‌ | 





भजतोऽलुभजन्स्येक 


नोभयांश्च भजन्त्येक एतन्नो ब्रूहि साघु भोः ॥१६) 
श्रीभगवानुवाच 


 ॥ मिथ भजन्ति ये सख्यः खार्थेकान्तोघमा हिते) 


(न तत्र सोददं धर्मः खार्थाथं तद्धि नान्यथा १७॥ 


भजन््यभजतो ये वे करुणाः पितरौ यथा । 


धमो निरपवादोऽत्र सौहृदं च सुमध्यमाः ॥१८॥ 


॥ ^ प 
| † त 

ष 

र: । न | ५, ५ ई ष  # कनी भिक्षवे कदी श न) क 
५ 


भजतोऽपिन वे केचिद्‌ भजन्त्यभजतः इतः । 





= आत्मारयापा द्याप्रकामा अद्ृठज्ञा गुरुदहः ॥१९॥ 


कक 
प 
॥ 


॥ नाहं.त्‌ सख्यो भजतोऽपि जन्तून्‌ 





नः, 


= „ (54 ४ ई = ५ 
न ५ न क्क्‌ ति, 
व ८ सि - रद्ध १ 
ञे > "लि + 
9 = 
~. 





भजाम्यमीषामनुबत्तिवत्तये 





` 
(नि 
ने ऋ 


+ 


५. 
रे 
प | क 4 < 
> > 
> 
नै 0.4 चै 
+ = र, 








~ 

^ क 

6 च 

४ ०५. 
न = 

ह - 


॥ 





्रीभद्धागवतं 







| अ० ३२ 


संस्श्चका आनन्द ठेती इई कभी कमी कड उटती थीं- 
कितना सुकुमार है, कितना मधुर है | इके बाद श्रीकृष्ण- 
को चिप जानेसे मन-ही-मन तनिक रूठकर उनकं मुंइसे दी 
उनश्ा दोप खीकार करानेके लिये वे कहने र्गी-॥ १५॥ 

गोपि्याने कहा--नटनागर | कुछ छोग तो रेसे 
होते हँ, जो प्रेम करनेवाेदेही प्रेम करते हँ ओर 
कुछ रोग प्रेम न करनेव।खोसे भी प्रेभर करते हँ | परतु 
कोई-कोई दोनो ही प्रेम नदीं करते । प्यारे | इन तीनोमे 
तुम्हें कोन-्ा जच्छा ग्गता है १? ॥.१६ ॥ 

भगवान्‌ भौीरृष्ठने कहा- मेरी प्रिय सखियो | जो 


प्रम करनेपर प्रेम करते है, उनका तो सारा उद्योग ` 


खार्थको लेकर है | केन-देनमात्र है। न तो उनमें 
सौहार्दं है एन तो ध्म | उनका प्रेम केवल खार्थके 
व्यि ही है, इसके भतिरिक्त उनका ओर कोई प्रयोजन 
नहीं है ॥ १७ ॥ सुन्दसियो ! जो ोग प्रेम न करने- 
वाले भी प्रेष काते है--जैसे खभावसे द्यी करुणारीर 
सन भौर माता-पिता-उनका हृदय सौदा से,हितैषितासे 
मरा एता है ओर सच पष्ठ, तो उनके व्यवहारमे 
निरछढ सत्य एवं पूणं धमं भी है ॥ १८ ॥ कुछ ढेग 
एसे होते है, जो प्रेम करनेवाछसि भी प्रेम नहीं करते, 
न्‌ प्रेम करनेवालका तो उनके पषामने कोई प्रन ही नदी 
है । एसे गोग चार प्रकारके होते ह । एकतोवे, जो 
अपने खखूपमे ही मस्त रहत है-जिनकी दिम कमी 
दैत माष्टता ह्वी नहीं । दूसरे वे, जिन्हे दैत तो भाकस्तता 
है, परंतु जो कृतकृध्य हो चुके हे, उनका किसीसे कोई 
प्रयोजन दी नहीं है । तीसरे बे हैँ, जो जानते द्यी नहीं 
करि हमसे कौन प्रेम करता है, ओर चौथेवे है, जो 
जान-बृक्षकर भपना हित करनेवाठे परोपकारी गुर्त॒च्य 
लगसि भी द्रोह करते दहै, उनको सताना चाहते 
& ॥१९॥ गोपियो | मे तो प्रेम करनेवारछोसि भी प्रेभका 
वैसा व्यव्षार नहं करता, जैसा करना चाहिये । सैं 
दसा केवर ईसीग्ि करता द्वं किं उनकी चित्तइृत्ति ओर 
भी मुङ्ञमे खगे, निरन्तर गी ही रदे । जैसे निर्धन पुरुषको 
कभी बद्रत-सा घन मिक जाय ओौरफिर खो जायतो 


(-उसका.दृदय खोये इए धनकी चिन्तासे भर जाता है, 





11 





७९ < - =< 0 ० ^ ^^ = कनक ना 
11.59} 1८1121४६ 1702-1 =, 


{> न्प ७-9५-5 शङ + 
„च. ; 








# 
8 व क ` ए कच्येन न य क्क 9 [ 8 १ > क प नि भ क ह [क च ॥ = 
र 1 ४ र न; क. र र लनः र त # , ५५ कम य-म 9 = ४ - ++ अ द ककन 
४ ५. चक र [ च 2 + "म, ~ + र = क्क ॥ भ न (२८; ॥ > 
1. १ = ^ > इ +. 

= ४ ० चक = जै 7 ू 4 
| +> > ॐ 9 ५, 











[न 
४" ॥ << # # > ५ ५4 1 [4 ( + ¶ | ; ‰~^ ॥, ` \ ५ ४ 
2/1. 0 वक ॥- च> {1 
त # | ॥ ^ च र { = + त प ॥ ज ॥ 4 ९ ह ५५५ 
बि. 1 9 





व 
कक 
^ 
। । 
ह 
; { ` 





1; => ६ 
++ + मै #॥ । 
र ॥ [, +. + कै 
= [110 
ति ग ~क जोक = ^ पका प | 
व "जिः | नि 2 1 9 न ५ 9 9 
(स = =" 5 क द नि नी ` अ न्क =-= 
जके ` ० " क क क क क की = ज इ) दन्न + 








अ० ३३1 दृशम्‌ स्कर 


। 1 १ । ४. 











एवं सदर्थाज्द्ितलोदवेद्‌- गोपियो | इसमे संदेह नीं करं तुमगोर्गोने मेरे च्वि 
गोक-मयांदा, देदमागं भौर अपने सगे-सम्बन्धिर्योको भी 
छोड दिया है| ेसी धितिमे तुम्हारी मनोषृत्ति ओर 
। कहीं न जाय, अपने सौन्दय ओर सुद्ागकी चिन्ता न 
मया परोक्षं भजता तिरेहिवं | करने दगे, सुषम ही ल्गी रहै--इीष्ि परोक्ष्पसे 
 .तुमलोगेसि प्रेम करता हृभ्रादीमेचिपगया धा | 

माष्थितुं मौर्दथ तत्‌ श्रियं भ्रिवाः ॥\२१॥ | इवय त॒मलोग मेरे प्रेभमे दोप मत निकाय । त॒म 

हव मेरो प्यारी हो भौर मँ तुम्हार। प्थारा है॥२१॥ मेरी 

प्यारी गोपियो ! तुमने मेरे ल्यि षर-गृहस्यीकी उन 

न॒ पारदेऽहं निरवद्यसंयुजां वेडिर्योको तोड़ उखा दहै, जिन्हें बडे-वडे योगी-यति 
भी नहीं तोड पाते | सुञ्चसे तुम्हारा यह पिन, यह 


ति 


खारा हि बो मय्यदधध््तयेऽलाः 


लिक संयोग सर्वथा निम॑ल ओर सवया निर्दोष है | 
यदि रै भमर शरीरसे--अमर जीवने अनन्त कालतक 
तुम्हारे व्रेम, सेवा शौर व्यागका बदला चुकाना चर्हरतो 
भी नहीं चुका सकता । मे जन्म-जन्भके ल्य तुम्हारा 
ऋणी द | तुम भपने घ्ौम्य खमावसे, प्रेमसे सुद्धे उचऋण 
कर सकती हो । परंतु मै तो तुम्हारा ऋणी ही ह ॥२२॥ 


सखसुद्रस्यं विबुधायुषापि वः 





या माभजन्‌ दुजेरगेहशृद्लाः 


उ तद्‌ वः प्रतियातु सराघुना ॥२२॥] 








= क 1 ~ # २ € 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दश्चपस्कन्वे ध्ूवीधे । 
रासक्रीडायां गोपीसान्तनं नाम क 
द्रा्रिरोऽव्यायः ॥ ३२ ॥ 














अथ तरयन्िरोऽ्ययः ५ 
महारास - 
श्रीयुक्तं उवाच ` | शआीद्युकदेवजी कते है- राजन्‌ । गोपां भगवान्‌- 
की इस प्रकार प्रेममरी सुमघुर वाणी सुनकर जो दुख 
हत्थं भभवतो गोप्यः श्रुस्वा चाचः सुपेशराः । विरहजन्य ताप देष था, उससे भी सुक्त हो गयीं 


ट. > सोन्दर्थ-माघुर्यनिधि प्राणप्यारेके बङ्ग-संगसे सफल- 
जहुविरहजं तापं तदङ्गोपचिताशिषः ॥। १॥ | नोर हो गयीं ॥ १॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णकी प्रेय 


तत्रारभत गोबिम्दो रासक्रीडाभजुवतैः । | जर सेविका गेपियां एक"दूरेको बोहमबोह डले 
। खड़ी थीं । उन खीरत्नकि साथ यमुनाजीके पुटिनिपर 
मगवानूने अपनी रसमयी रासक्रोडा ग ॥२॥ 

7 वान्‌ । गोपय [का न 






स्रीरतनेरन्वितः प्रीतेरन्योन्याबद्धब।हुभिः ॥ २॥ 
रसोरकशषवः सभ्भ्रबृ्तो गोपीमण्डरुमण्डितः । 


३२४ श्रीमद्भागवत | अ° ३२ 








ति त = क का 





म्रषिष्टेन ग्रहीतवानां कण्ठे खनिर्गेट क्रियः ॥ ३ ॥ | क्रम था । समी गोपियोँ एसा अनुभव करती थीं कि 
हमारे प्यारे तो हमारे ही पाप्त हैँ । इस प्रकार दहस 
सदस गोपियांसे शोभायमान भगवान्‌ श्रीकृष्णकां दिव्य 
| रापतोस्तव प्रारम्भ इभा । उस समय आकाशम रातत 
विभानोंकी भीड़ ल्ग गयी | सभी देवता अपनी-अपनी 
पलिर्योके साथ व्यँ आ पटे । रासोत्सवके दशनकी 
| ठक्तासे, उन्ुकतासे उनका मन॒ उनके वकम नदीं 
दिव$सां सदारणामौरसुक्यापहृतात्मनाम्‌।। ४ ॥ | धा ॥ ३-४ ॥ खर्गकी दिव्य दुनदुमि्यो अपने-आप वज 
| उदटीं | खर्गीय पुष्योकी वर्षा होने ठगी । गन्धवगण 

५ | अपनी-अपनी पलियेकि प्षाथ भगवान्‌के निमल यशका मान 

ततो दुन्दुभयो नेदुरनिपेतः पृष्पव्र्टयः । | करने लगे ॥ ५ ॥ राद्मण्ड््मे सभी गोप्यो अपने 
| प्रियतम श्यामघुन्दरके प्षाय चत्य करने लगीं | उनकी 

| कल्योके कंगन, पैरोके पायजेब ओर करधनीके छोटे- 

जगुशन्धवंपतयः सस्लीकास्तयश्ोऽमलब्‌ ॥ ५॥ | छोटे धबरू एक साथ वज उटे । असंस्य गोपिर्या थी, 
इयि यह मधुर ध्वनि भीव्डे ही जोरकी दहो रही 

1 र धी ॥ ६ ॥ यघुनाजीकी रमणरेतीपर व्रजसुन्दसियोके 
बल्यानां श्टणणा किङ्किणीनां च योषिताम्‌ । | बीचमें भगवान्‌ श्रीकृष्णकी बडी अनोखी रोभा इर । 
र्चा जान पड़ता था, मानो अगणित पीटी-पीटी दभकती 
इई घुवर्ण-मणियोके बीचमें ज्योतिमयी नीर्मणि चमक 
रदी हो ॥ ७ ॥ च्रव्यक्ते प्रमय गोपियों तरह-तरहसे 
टुषुकइमुककर अपने पौव कभी आगे बहातीं ओर्‌ कभी 
पीछे हटा ठेतीं । कमी गतिके अनुष्ठा धीरे-धीरे पौव 
# तत्रातिद्द्मे ताभिभंगवान्‌ देवकीसुतः । रखती, तो कभी बड़े वेगसे; कभी चाककी तरह घूम 
जातीं, कभी भपने हाथ उटा-उठाकर भाव बतातीं, तो 
। कभी विभिन्न प्रकारसे उन्हं चमकातीं । कभी बडे 
| मध्ये मणीनां दैमानां महामरकतो यथा ॥ ७॥ | कध ठगसे यु्कराती" तो कभी मीहे मटका । 
। नाचते-नाचते उनकी पती कमर देसी कचक जाती 
५ ह क धी, मानो दूट गयी हो । इङ्ने, बैठने, उठने ओर 
पादन्या्जविधुतिभिः ससितेभर विलाे- चलनेकी फुतीसे उनके स्तन हिल रहे थे तथा वस्र उडे 
ॐ न जा रहे ये । कानके कुण्डल हिल-हिल्कर कपोर्ोपर 
-< = आ जाति थे | नाचनेके परिश्रमसे उनके सुहपर पक्षीने- 

। की बद श्चव्कने ्गी थीं । केशोंकी चोधियां कु दीडी 
पड़ गथी थीं | नीवीकी गोटे खुली जा रही थी । इष 
अ प्रकार नटवर नन्दलाब्की परम 1 व उनके 
2. | । र [य मा-गाकर नाच रही थीं । परीक्षित्‌ । उप्त समय 
ति 2 कम्ररथनापन यः छशवन्वा त जान पड़ता था मानो बहते श्रीकृष्ण तो संविले- 
0 लावले सेष-मण्डक है ओर उनके बीच-बवीचमें चमकती 


यं मन्येरन्‌ नभस्तावद्‌ भिमानन्नतसङ्कलम्‌ । 











सप्रियाणामभूच्छभ्दस्तुश्लो रासमण्डङे ॥ ६ ॥ 


ज्म कणति ० कन 


५ ध 
क # ~ 
रः > ग 
न ~ 
।} [क १ चि 
४ द्ध 






"श. ~. 

ला 7 # प्ट 

4 , | 4 ^. 

3 "वक क ढक 0 

दौ ५ न र क ह्न 
स 


त रूम ~, ‰. ई 
१ 





ष्का ` _ ‰ 





अ० ३३ | दञ्चम्‌ स्छन्प 





रो ~~~ ~ 


उच्चेजंगुशत्यभाना रक्तकषण्छ्यो रतिप्रियाः | 





जि कि 
कि अ ज आ = किः तिः भि श मी + क 


थी ॥ ८ ॥ गोपिर्योका जीवन भगवान्‌की रति है, प्रेम | 
दै । वे श्रीकृष्णसे सटकर नाचते-नाचते ऊँचे खरसे 
€ श मधुर गान कर रदी थीं । श्रीकृष्णका संस्पदा पा-पाकर 
कृष्णाभिमशणुदिता यद्रीतेनेद भारतम्‌ ॥ ९॥। 3 

4 ओर भी भानन्दमगन हो रही यी । उनके राग-रागिनिर्योसि, 





काचित्‌ समं नदेन खरनादीरमिथिताः । | पूण गाने यड सारा जगत्‌ अव मी गरन रा ई ॥ ९ ॥ 
कोई गोपी मगवान्‌के साथ-उनके खरमें खर मिला- 
| कर गा रदी थी । वह श्रीकृष्णके खरकी अपेक्षा ओर 

उन्निन्ये पूजिता तेन प्रीयता स्रु शोच्विति । | 


। भी ऊचे खरसे राग अपने ल्गी | उक्षके क्श्चण 
ओर उत्तम खरको सुनकर वे बहुत ही प्रसन इए ओर 
तदेव ध्ुवप्रुननिन्ये तस्यं खान चं बहवद्‌।त्‌ ।\९०।। | व!ह-वाह करके उसकी प्रशंसा करने च्छो । उसी रागको एक 
दूसरी स्रखीने धुपदमें गाया । उसका मी भगवान्‌ने बहुत 
काचिद्‌ राषपरिश्रन्ता पाद्ये शदाभृतः । | सम्मान किया ॥ १० ॥ एक गोपी चव्य करते-करते 
थक गयी । उघ्की कलाद्योसे कंगन ओर चोघियोँसे 
| वेलाके एल खिसकने ठ्गे । तव उसने अपने बच्छ 
जग्राह बाहुना श्दन्धं छयद्रक्यमद्टिा ॥११॥ | दी खड़े मुरटीमनोर स्यामसुन्दरके कंघेको अपनी 
| वहसे कक्तकर पकड़ ल्या ॥ ११॥ भगवान्‌ श्रीङृष्णने 
तव्ैकांसभतं बाहं टष्णसखोत्यलसौरभम्‌ । = | अपना एक दाय दरी गापीके केप रड सकला या ॥ 
वह्‌ स्वभावसे तो कमलके समान सुगन्धसे युक्त था ही 
उसपर बडा सुगन्धित चन्दनका लेप मी था । उसकी 
चन्दनाटिष्माघ्राय दृ्टरेमा चुचु्बर ह ।¦१२॥ षुगन्धसे बह गोपी पुच्किंत हो गयी, उसका रोम-रोम 
खिर उठा । उसने ्टसे उसे चूम च्या ॥ १२॥ एक 
गोषी चष्य कर रही थी । नाचनेके कारण उसके ङुण्डच 
कस्याधिनाव्यविशि्धण्डलस्िषमण्डितंम्‌ । हिठ रहे थे, उनकी छटासे उस्तके कपो र भी चमक 
रहे थे । उक्षन ण कपोर्णोको भगवान्‌ श्रीकृष्णे 
। कपोकसे सटा दिया भौर भगवान्‌ने उसके अपना 
शण्ड्‌ गण्डे सन्द थत्या अदात्ताभ्बूलचवितम्‌। ।१२॥ | चाया हआ पान दे दिया ॥ १३ ॥ यो$ र नूपुर 
| कीर करधनीके ्ँधरु्ओको अनकारती इई नाच ओर गा 
ष जञर रही धी । वह जव बहत थक गयी, तब उसने अपने 
यन्ती गायती काचित्‌ इषन् ल नगम ही खडे इयामघुन्दरके चीत कर ङ्म्को अपने ` 
च दोना स्त्नोपर रख व्या ॥ १४ ॥ | 
पार्वस्थाच्धुतहस्त।०जं ्र.न्ताधात्‌ सनयो; शिव १४ | परीक्षित्‌ ! गोपियोका सोमाग्य च्ह्मीजीसे भी 
बदकर है । ल्मीजीके परम प्रियतम एकान्त 
गोप्यो लन्ध्वाच्युतं दान्तं श्रिय एकान्तबछ्ठभम्‌ । | वस्टम मगवान्‌ श्रीङ्ृष्णको अपने प्रम प्रियतमके ख्पमे 
पाकर गोपिर्यो गान करती इई उनके साय विहार करने 
ल्गौ | मगवान्‌ श्रीकृष्णने उनके गर्छोको अपने सुजपाशमे ` 


गृहीतकण्ठ्यस्तदोभ्यो गायन्त्थस्त विजहिरे \१५॥ | बध ख्खा या, उस समय गोपिर्याकी बडी अपूर्व 
१, ते। 




























भ 










३२६ 
कर्णोत्पलालकविरज्कपोलघर्म 
वक्तरभ्चिथो वर्यनुपरषोषवं।येः । 


गोप्यः समं भगवता नवतः स्वक्षेश- 


एवं  परिष्वङ्गकराभिमक्ष 
स्निग्धेक्षणोदामविलाकदक्षेः | 


रेमे रमेशो 
यथा्भकः 


तदङ्गसङ्गप्रयदाङेन्द्रिथाः 
केशान्‌ दङ्लं इवपदटिश्चं बा । 


व्रजखन्दरीभि- 


नाञ्जः प्रहिव्योदमरं बजल्ियो 
विस्रस्तमालाभरणाः इङ्दह ॥१८॥ 
कृष्णविक्रीडितं वीक्ष्य ययहुः खेचरक्नियः । 


काभादितो शरशाङ्कथ सगणो विसितोऽभवत्‌॥।१९। 


^ 4 त्वा ताबन्तमात्मानं यावतीर्मोपियोषितः । 


रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया ॥२०॥। 


५  ताघ्ामंतिविहारेण श्रान्तानां बदनानि सः 
 श्रासृजत्‌ करुणः परेम्णा ्न्तमेनाङ्ग पाणिना ॥२१॥ 


क +. श) कि 


„ शा ६१ स.९९ 


कुण्डलङ्कन्तरतिड- 





श्रीमद्भागवत 








सस्तस्रजो भ्रमरगायकरासोष्ठया्‌।।१६॥ 


खप्रतिविम्बविभ्रम्‌ः ।१५।। 


[ अ०३३ 








च भका क्क 





शोभा थी ॥ १५॥ उनके कानों कमलके कुण्डल ` 


शोभायमान थे | धुघराटी अलके कपोलोंपर ल्टक 
रही थीं । पक्षीनेकी वद ञलल्कनेसे उनके मुखकी छटा 
निराढी ही हो गयी थी | ३ राक्तमण्डल्मे भगवान्‌ 
शरीकृष्णके पाथं सत्य कर रही थीं ¦ उनके कंगन ओर 
पायजे्बोके बाजे बज रषे थे | भरे उनके ताल-सुरमे 


अपना घुर मिशकर गा रहे ये ओर उनके जडं 


भौर चोटिशेमे ये इए प्रल गिरते जा रहे ये \५१६॥ 
परीक्षित्‌ | जेसे नन्दा-पा शिच निर्गिकारभावसे भेपनी 
साथ खेटा है, वैसे द्वी रमारमण भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण कमी उन्हं अपने हृदयसे ल्णा ठेते, कभी 
हाथसे उनका अङ्गस्य करते, कभी प्रेमभ तिरी 
चितवनसे उनकी ओर्‌ देखते, तो कभी टीकसे उन्धुक्त 
हंसी हंसने लगते । इस प्रकार उन्होने व्रजघुन्दसयिके 
साथ क्रोडा की, विहार किया ॥ १७ ॥ परीक्षित्‌ | 
भगवान्‌के भङ्गाका संस्प्चं प्राप्त करके गोपिर्योकी 
इन्द्र्यो प्रेम बोर आनन्दसे विहृ हो गयीं ¡ उनके 
केश बिखर गये । शूटोके हार टट गय ओर गहने 
अस्त-उ्यस्त हो गये । वे शपने केश, वद भौर कचुश्ीको 
मी प्रणंतया सम्हालनेमे असमथ हो गयीं ॥ १८ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यह ॒राक्तक्रीडा देखकर खगकी 
देवाङ्गनाएं भी भिगनकी कामनासे मोहित हयो गीं ओर 
मस्त तारो तथा ग्रहोके साथ चन्द्रमा चकित, वषिस्ित 
हो गये ॥ १९ ॥ परीक्षित्‌ | यथपि भगवान्‌ आत्माराम 
हे --उन्ड अपने अतिरिक्त जीर कि्ीकी भी आवश्यकता 
नहीं है-- फिर भी उन्होंने जितनी गोप्यो थी, उतने 
ही रूप धारण किये ओर खेर-खेकमे उनके प्ताथ इस 


प्रकार विहार किया ॥ २० ॥ जब बहत देरतक गान 
भोर वृत्य आदि विहार करनेके कारण गोपिर्याः यक 
गयीं, तत्र करुणामय भगवान्‌ श्रीकृष्णे बड़ प्रेमसे खयं 
अपने घुखद करकमलोके द्वारा उनके मह पडि 
॥ २१ ॥ परीक्षित्‌ | 
नखस्परासे गोपि्योको बडा आनन्द इ । उन्होने 
अपने उन कपोटकि पौन्दयंसे, जिनपर सोनेके कुण्डक 
जनिमिखा रहे ये नौर धुवराटी अर्के व्टक रदी यी, 


भगवान्‌के कर-कमन शौर 








ककि ` 





कीन कौ 1 












अ० ३३] 


दशम स्कन्ध 








मानं दधत्य ऋषभश्य जगुः कृतानि 


।२२।। 


4 कद्व 


पुण्यानि सत्कररुदस्पशेप्रमोदाः 


| । 
` ताभिग्रृतः श्रमपपाितुमङ्कङ्क- 


गन्ध॑पासि{भिरडद्रुव आविश्चद्‌ क 


श्रान्हो गज्गीभिरिभराडिव 'मिन्धसेतुः २२] 


सोऽभ्भखलं यूबहिभिः परिषिच्यमानः 
. 
मेस्णेक्षिवः प्रहसतीभिशतिष्ठतोऽ ड़) 
वैमानिकैः इुसुसतपिंभिरीच्यमानो 
रेमे खयं खरतिरत्र गजेन्द्ररीङः }\ २४। 
` ततश्च कुष्णोपवने जरखल- 
म्रघनगन्धानिरजुष्टदिक्तटे | 


चचार्‌ भृङ्प्रमदाणणाइतो 





यथा मदच्युट्‌ दिरदः करेणभिः ॥२५५॥ 


तथा उप्त वप्रेमभरी चितवनसे, जो घुधासे भी मीदी 
मुष्ठकानसे उजञ्ञ्वढ हो रदी थी, भगवान्‌ श्रीकृष्णकां 
सम्मान किया ओर प्रमुकी परभ पित्र ठीगर्भोका 
गान करने लगीं ॥ २२ ॥ इक्तके बाद जसे थका इभा 
गजराज ज्िनारोंको तोडता इभ हधिनि्यकि साथ 
जग्मे घुसकर क्रीडा करता है, वैसे ही लेक ओर 
वेदकी मर्यादाका अतिक्रमण करनेवाठे भगवान्‌ने अपनी 
| यकान दूर करनेके व्यि गोपि्योके साथ जच््रीडा 
| करनेके उदेश्यसे यमुनाके जल्मे प्रवेश किया | उस 
समय भगवान्‌की वनमाग गोपि्योकि अङ्गी रणड्से 
| कु कुचल-पी गयी थी. ओर उनके वक्षुःस्थ्की 
के्षरसे बह रगभीगयी थी। उष्के चार्यो ओर 
गुनगुनाते इए मोरे उनके पीछे-पीछे ३ प्रकार चकं 
रहे ये, मानो गन्धवंराज उनकी कीर्तिका गान करते 
इए पीछे पीक चठ रहे हों॥ २३}! परीक्षित्‌ । 
यपुनाजव्मे गोपि्योनि प्रेपभरी चितवन भगवान्‌की 
ओर देख-देखकर तथा हं ्त-हं सकर उनपर इधर-उधर 
जरकी ख्‌ नोऊारं उटीं । जक उीच-उटीचकर 
उन्हें खूत् नहव्गया । विमार्नोपर चदे इए देवता पुरष्पोकी 
वर्षां करके उनकी स्तुति करने ल्गे । इस्‌ श्रकार्‌ 
यपुनाजल्मे खयं आत्माराम मगवान्‌ श्रीकृष्णने गजगराजके 


समान जटवरिहार किया ॥ २४ ॥ इ्के बाद भगवान्‌ 


श्रीकृष्ण व्रजयुवतिर्यो ओर भोँरोकी भीडसे धिरे इए 
यपुनातटके उपवनमे गये । बह बङा ही रमणीय था । 
उसके चारों ओर जल भौर स्थरे बडी सुन्दर घुगन्ध- 


वाठे एूक खिले इए ये । उनकी सुवास लेकर मन्द्- ` 
मन्द वायु चठ रही थी । उपमे भगवान्‌ ईप प्रकार 


व्रिचरण करने गे, जेसे मदमत्त गजराज हथिनिय 


डके साथ धूम ह्वा हो॥२५॥ परीक्षित्‌ ।. 
रारदूकी वद रात्रि जिक्तके रूपमे अनेक रात्र्या पञ्जीभूत 


पि; 9 शा | धः 


| हो गयी थीं, बहूत ही खुन्दर धी । चारों ओर 
बडी घुन्दर चाँदनी छिटक रही थी। काः 


। 5 १३ [-- 


ऋतुकी जिन रस-सामग्नर्योका वणेन । 


स॒सप्यकामोऽलुरताबलागणः । = | यी ग यो स र 


१ भृ चक्र 9 ७ 
= च न्म „क ## कन श ` अकु > 

आ = 2 1 ४ < ध = ॐ, प | 

क ॥; ह, = * | क # >: १ = । 4 

=> 
[4 बः क , 9 ऋ - भम ब =, १ 2 - न ४ 
"च र पि कनन 
2. क कः = ज 





चन्द्रमाकी ` 


 . 
कान्याम शरद्‌ 






















9 


५ = "कः ॐ ॐ पि य काक 




























(४ ४ दरद भीमद्भागवत [ अ० ३२ [ 
4  सिषेव आत्मन्यवरुद्धसीरतः उनके उपवनमे विहार किया । यह बात स्मरण रखनी क 


चाहिये किं भगवान्‌ सत्यसंकल्प क । यष्ट छव उनके 
चिन्मय सकल्पकी ही चिन्मयी टीला है |` ओर उन्होनि 
इस टीटारमे कामभावको, उसकी चेष्टार्थोको तथां 
उसकी क्रियाको सवथा अपने अधीन कर रक्खा या, 
उन्हे अपने-आप कैद कर रक्खा था ॥ २६ ॥ 


लवाः श्चरत्काज्यकथारसाभ्याः ॥२६॥ 


राजोवाच राजा परीश्चितने पुच्--भगवन्‌ | मगवान्‌ श्रीकृष्ण 

सारे जगतके एकमात्र खाधी हैँ | उन्होने अपने अश्च 

संस्थापनाय धम्य ग्रश्ममायेतरय च | श्रीबकराजीके हितत पृणरूपमे क्वतार ग्रहण किया 
अवतीर्भो हि भगवानंरोन जगदीश्वरः ॥[२७॥ | था । उनके अवतारका उदृदे्य ही यह था कि धमकी =. 


स्थापना हो भौर अध्मका नाञ्च | २७ ॥ ब्रह्मन्‌ । 
वे धममर्यादाके बनानेवाले, उपदेश्च करनेवाले न्नर 
रक्षक थे | फि९ उन्होने खयं धमके विपरीत परचिर्योका 
स्पश के किया १२८ ॥ म॑ मानता ह किं भगवान्‌ 
आप्कामो यदुपतिः कृतवान्‌ वे ज॒गुप्ितम्‌ । श्रीकृष्ण पूर्णकाम ये, उन्हें किक्षी भी वस्तुकी कामना 
नहीं थी, पिरि भी उन्हनि किस अभिग्रायसे यह 
किमभिप्राय एत नः संशयं छिन सुव्रत ॥२९॥ | निन्दनीय कमं किया १ परम ब्रह्मचारी सुनीश्चर ! आप 
कृपा करके मेरा यह संदेह मिटा्ये ॥ २९ ॥ 
ीडकदेवजी कहते है- सु, अग्नि आदि ईश्वर 
( समर्थं ) कभी-कभी धममका उल्ल्ग न ओर स्राहसका 
काम करते देखे जते हैँ । परंतु उन कामोंसे उन 
तेजघखी पुर्षाको कोई दोष नहीं होता । देखो, अग्नि 
। सब कुछ खा जाता है, परंतु उन पदा्थेकि दोषसे 
~, 6 चपि नदीं होता ॥ ३० ॥ जिन ठेोरगोमिं देसी सामध्य 
॥( ~ तेनीयर्ता न दोषाय वहेः सवनो यथा ॥२०। नदीं है, उन्हे मनसे मी वेसी बात कभी नहीं सोचनी 
। त चाहिये, दारीरसे करना तो दूर रा । यदि मूख॑तावश्ष 
|  नेतत्‌ समाचरेजातु मन्तापि छनीश्वरः को$ रघा काम कर वैठे, तो उप्तका नाश हो जाता 


है | भगवान्‌ श्ंकरने हत्य विष पी च्या थाः दूत 


विनंश्यत्या चरन्‌ मोद्या्यथारुद्रोऽन्धिजं विषम्‌| ३१॥ | कोई प्रिये तो इह॒ जब्कर भस्म हो जायगा ॥ २३१॥ 
इक्तन्ि इस प्रकारके जो शांकर आदि ईर है, भपने 
। | अधिकारके अनुसा१ उनके वचनको दी सत्य मानना 
ईश्वराणां वचः सत्यं तथवाचरितं क्वचित्‌ । ओर उसीके अनुसार आचरण करना चाये । 
# उनके आचरणका भुक्ररण. तो करदी-कीं दी किया 
जाता है | रस्व्ि बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि 


तषा यत्‌ खत्रचायुक्त बुद्धमास्तत्‌ सभाचरेत्‌। ।२२॥ | छलका जो चरण उनके उपदेदाके अयुकूढ हो, 
१. परीश्चिदुवाच । २, नश्व्याश्वाचर० |. ४, 


स॒ कथं धमंसेतूनां वक्ता कर्ताभिरिता ! 


प्रतीपमाचरद्‌ हान्‌ परदाराभिमशंनस्‌ ॥२८॥ 


(॥ 
¢ 
॥ 
॥ 
; 
| 
ः 
। 
द्र 
॥+ 
। # 
| ~ 
~ 
ध 
1 


श्रीद्युक उवाच 


धमन्यतिक्रमो दृष्ट ई्राणां च साहसम्‌ । 





० ३३ | दृक्षम स्कन्ध 2२९ 


नानानना [न कमि कौ 
¢ णिनि क क 


छुश्षलाचरितेनेषामिह सार्थो न विद्ते । उसीको जीवनम उतारे ॥ ३२ ॥ परीक्षित्‌ | वे 


। पामथ्यवान्‌ पुरुष अहंकागदीन होते &, चमकम करनेमे 
चिपर्थयेण वानर्थो निरहंकारिणां प्रभो ।३३॥। | उनका को सौदारिक लाथ नही होता बौर छम 


लसि कम॑ करनेमे अनर्थ ( नुकसान ) नक्ष होता । वे 
किदताखिरुष्ठखानं तियंङ््यंदिवोकषःय्‌ लां बोर वन्ते जर = 
६कि६ध्येशितव्यानां इुशलाङ्शलान्वयः ।३४।। | उन्हीके स्म्बन्धर्मे एेसी वात ह ठव जो पयः पक्षी, 
मनुष्य, देवता आदि षमस्त॒चशचर जी्वोके एकमात्र 
प्रमु र्वेश्वर्‌ भगवान्‌ हँ, उनके साथ मानवीय द्युभ 
ओर अह्युमका सम्नन्ध वैसे जोडा जा दकता 
हे |} ३४ ॥ जिनके चरणकमर्लोकरे रजका सेवन करके 
स्वैरं चरन्हि ्रनयोऽपि स मद्यमाना- भक्तजन तृप्त हो जाते हैँ, जिनके पाथ योग प्राप्त करके 
| स ध मे योगीजन अपने सारे तः काट 

स्तेच्छयाऽऽतवप्षः कूत्‌ श्व वः । डाच्ते है आर विचार्टीक ज्ञानीजन जिनके त्का 

= 8१११५ विचार रके तच्छख्य हो जाते हँ तथा समस्त कमं 
| बन्धर्नोसि सक्त होकर खच्छन्द विचरते है; वे ही 
| भगवान्‌ अपने भर्छोकी ङ्छासे अपना चिन्मय श्रीविग्रह 
प्रकट करते है; तव. भवय, उनम करपैबन्धनकी कल्पना 
ही केसेषयो सकती है! ३५॥ गोपि्ोके; उनके 
पति्यके ओर सम्पूणं रारीरवारि्योकि धन्तःकरणोमं जो 
आत्माङ्पसे विराजमान है, जो सवके छाक्षी ओर 
परभपति है, वही तो अपना दिव्य-चिन्मय श्रीविम्रह 
अनुग्रहाय भानः 7 प्रकट करके यह ढीला कर रहे हैँ ॥ ३६ ॥ भगकान्‌ 
. ५९ अ ददभार्ितः | जी वोपर्‌ कपा कदर व्यि दही अपनेको मनुष्यरूपमें 
प्रकट करते है ओर रक्षी गीरा कते है, भ 

चते ताध्छीः क्रीडा याः श्रुता तत्परो भवेत्‌ २७] | नकः जीव मगवत्परायण हो जाय ॥ ३७ }} व्रज 
भजते ताद्सीः कडा याः शरुस्वा वत्परो भवेत्‌ {३७ गोणि मगनान्‌ गि तन 
नादयन्‌ खद छष्णाय मोदिवासस्य मायया 1 क्री | वे नकी योगमाया मोहित होकर रे्ठा समञ्च 
ई दहे थे क्ति हमारी पलियां हमारे पास ही ह ॥ २८ ॥ 

नह्याकी रात्रिक बराबर वड रात्रि बीत गयी ¦ ब्रा्मसुदरते 

मन्यमानाः खपा्यवस्ान्‌ खान्‌ खान्‌ दारान्‌ बजौकसः| भाया । यपि गोपियोकी इच्छा अपने घर्‌ शीट्नेकी 
नहीं थी, फिर भी भगवान्‌ श्रङष्णकती आज्ञासे वे अपने-. 

बरहमरात्र उपासे सासुदेवालुभोदिताः । अपने घर्‌ चली गयीं; कर्योकति वे अपनी प्रत्येक चेष्टसे, 


प्रत्येक संकल्पसे वेव भगवान्‌को ही प्रसन्न करना ¦ 
अनिच्छन्त्यो ययुर्गेोष्ड+ खगान्‌ भगवं सिया; ३९ चाहती थी ॥ ३९ ॥ 


१. घामपि । २, वत्ख्रियः | 
० स० लर २. ७२८ 








य॑त्पादप्ड्जपरागनिषेदेत्ा 


© 
योगृप्रभवदिधुताखिरकमवन्धाः 


=> 9 ज 


शापौनां तत्पतीनां च षर णाम डहिनाय्‌ । 








यो ऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः कोडनेनेह्‌ देहभाक्‌।\२६॥। 











१९. भीमद्भागवत [ ० ३३ 





ति त +> ` भि ज जो य = क = 


विक्रीडितं व्रनवधूभिरिदं च विष्णोः परीक्षित्‌ | जो धीर पुरुष व्रजयु्रतियोके साय 
ई ६ भगवान्‌ श्रीकृष्णके इष चिन्मय रास्-विगस्षका श्रद्धाके 
भद्रान्वितोऽलुश्रणुयादथ वणयेद्‌ यः। | साय बार-बार श्रवण भीर वर्णन करता है, उसे 
` | भगवानूके चरणों परा मक्तिकी प्राप्ति होती है ओर 
भक्तिं प्ररं भगवति प्रतिम्थ कामं वह बहत ही शीघ्र जपने हदयके रोग--फमविकारसे 
छुटकारा पा जाता है । उसका कौममाव सवदा 
हरोगमाधपहिनोत्यचिरेण धीरः; ।४०॥ | व्यि नष्ट हो जाता है# ॥ ४० ॥ 
९2 -- 
इति श्रीमद्भागवते महपुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे 
रापसक्रोडावणनं नाम तयञ्चि्चोऽव्यायः ॥ ३३ !! 











~ जा याया === = = जा === = - का क 


१. राक्षक्रीडायां त्रयस्जि° । 

# श्रीमद्वागवतरमे ये रप्कीलके पाँच अव्याय उसके पच प्राण माने जाते हैँ | भगवान्‌ श्रकरष्णकी परम 
भन्तरङ्गलीमा, निजखखूपभूता गोपिकारजो ओर हादिनी शक्ति श्रीराधाजी फ़ साथ होनेवाडी भगवान्‌ की दिव्यातिदिव्य 
त्रोडा, इन अध्यारोपे कड्वी गयी है । 'राक्तः शब्दका मूढ रस है ओ९ रपत खयं,मगवान्‌ श्रीकृष्ण ही है -^रसो 
वे सः । जित दिव्य करीडामें एक ही रस॒ अनेक रसोके खूपमे होकर अनन्त-अनन्त टसका समाखादन करे, एक 
रस ही रस्-समूहकं रूपमे प्रकट होकर न्त्यं द्वी आखाद-आषवादक, डीखा, धाम ओर्‌ विभिन्न आलम्बन एवं 
उदूदीपनके ख्पमे क्रोड। करे--उसका नाम रास है | मगवान्‌की वह दिव्य ठीक भगवानूके दिव्य घाममे दिव्य 
। पसे निरन्तर इभा करती है । यह भगवानूकी क्रोष कृपासे प्रेमी प्ताधकोके हितार्थं कभी-कभी अपने दिव्य 
। धामके साथ ही भूमण्डच्पर मी अवतीर्णं हरा करती है, जिक्षको देख-घुन एवं गाकर तथा स्मरण-चिन्तन करके 
। अधिकारी पुरुष रसखख्म भगवान्‌की इस परम रक्तमयी रीका आनन्द्‌ ठे स्क ओर खयं भी भगवान्‌की 
ीलामें सम्मित होकर अपनेको कृतक्गत्य कर सर्वो । इस पश्वाध्यायीमे वंशीष्वनि, गो पियकि अभिसारः, श्रीङृष्णके 
पाथ उनकी वःतचीत, रमन, श्रीराधाजीके साथ अन्तर्धान, पुनः प्राकव्य, गोपियोके द्वारा दिये हए वसनासतनपर 
विराजना, गोपियोकि कूट प्रन क्रा उत्तर, राव्य, क्रीडा, जच्करेटि ओर वनविहारका वणन है--जो मानवी माषामे 
होने भी वस्तुतः प्म दिव्य है | 
= समयक साथ ही मानव-म्िष्कर भी पर्टता र्ता दहै । कभी अन्तदष्टिकौ प्रधानता हो जाती है ओर कभी 
अ बहिट्िकी । आजका युग ही एेसा है, जितम भगवानकी दिव्य-गीलाओंकी तो बात ही क्या, खयं भगवानूके 
 अस्तितपर ही अविञ्ाप्त प्रकट प्रिया जा रह! है । रेक्षी सथतिपरे इस दिव्य कीलाका रहस्य न समञ्ञकर्‌ छे ग तरह- 
तष्दकी आशङ्क! भ्रकट करे, इसमे आश्चयकी कोई नात नहीं है | यह ठीश अन्तदटष्टिसे ओर मुख्यतः भगवष्कृपासे 
ही समक्षे आती है । जिन भाग्यवान्‌ नौर मगव््छृपाप्राप्त महात्माजनि इसका अनुभव किया है, वे धन्य हैँ ओर 
की चरण-धूकिके प्रतापसे ही त्रिरोकी धन्य है । उन्हींकी युक्तिर्योका आश्रय ठेकर यहाँ रास॒लीलखाके सम्बन्धमे 
यर्किच्चित्‌ जिखनेकी धृष्टता की जाती है | 
चः यह बात पटे ही समश्च ठेनी चाहिये करि भगवान्‌क्ा शरीर जीव-शरीरकी भाति जड नहीं होता । जडकी 
त्ता केव जीवकी दमे होती है, भगवान्‌की दष्िमे न्वी । यह देह है ओर यह देही है, इस प्रकारका भेदः 
केवर शरकृतिके राच्यमे होता है । प्रात गोक्मे--जहँकी प्रकृति भी चिन्मय है--सव छ चिन्मय ही 
ता है; वषं भचितकी प्रतीति तो वव विद्धि अयश्रा भगवानकी लीलाकी सिद्धिक व्यि होती है । इष्य 



















किति 


हि 


७.8३. ..;; = भरः १ ----सकरि 





अ० ३३ । दश्च स्कन्धं व | 















==> ~~ ~~ टः अक 





[म १ 


स्थूठतामे--या यो किये किं जडराज्यमे रहनेवाा मस्तिष्क जवर भगवानूकी अप्राकृत टीकर सम्बन्ध व्रिवार 
करने चता है, तव बह अपनी पूव वास्तनाओक अनुप्तार जडराञ्यकरी धारणार्था, कस्पनाओं ओर क्रियाओंका दही 
आरोप उस ईिव्य राञ्यके व्रिषय्मे भी करता है, इसव्यि दिव्यीलके रष्यको समक्न अपनथं हो जाता है | 
यह रास वस्तुतः परम उञ्ञ रप्तक्रा एक दिव्य प्रक्राश्च ह । जड जगतकीवबाततो दुर्‌ रङ्टी, ज्ञानश्प या 
विज्ञानख्य जगतमे मी यह प्रकट नदीं हता । अघ्रिक क्या, साक्षात्‌ चिन्मय तचे भी इक्त परम हिव्य उञ्ञ रसका 
ठलेशाभास नहीं देखा जाता । इस परम रप्तकी सष्रति तौ परम भावमयी श्रीकृष्णप्रमक्वख्पा मोषीजनोके मधुर हृदयम 
ही होती है । इस ॒रासटीलके यथा्थलह्प ओर परम माधुयक्रा आघाद्‌ उन्दीको मिक्ताहै, दृसरेयेग तो 
इसी कल्पना भी नहीं कर सकत । 
भगवान्‌क्ते समान ही मपि भी परमरसमयी ओर सच्चिदानन्दमयी ही हँ । साधनाकी दषिसे भी उन्दने 
न केव जड इारीरका ही व्याग कर दिया है, वच्कि मुह्म शारीरसे प्राप्त हयोनेवाञे खण, कवल्यसे अनुभव होनेत्राे 
मोक्ष-ओर तो क्या, जताकी दृष्टेकाही त्याग कर दिया है | उनकी दृष्टिमे केवल चिद्रानन्दखश्ूप श्रीन्ष्ण है, 
उनके हदयमें श्रक्रष्णक्रो तृप्त करनेत्ादय प्रमारृत है । उनकी इस अलोकिक तिमे स्थूच्शरीर, उश्की स्मरति 
ओर उष्टके सम्बन्धसे होनेवाले अङ्-सङ्खकी कल्पना किसी भी प्रकार नहीं की जा प्षकती । एेसी कसना तो 
केवट देहातदुद्धिसे जकडे इए जीप्रोकी दी होती दै । जिन्ने गोपिंयोको पहचाना है, उन्होने गोपिरयोकी 
चरणधूलिका स्प प्राप्त करके सपनी कृतकृत्यता चाही है । ब्रह्य, शंकर, उद्धव ओर अजने गोपिर्योकी उपासन 
करके मगवानके चरणो वैसे प्रेमका वरदान प्रप्त किया है या प्राप्त करनेकी अभिलाषा की है । उन गोपि्ोके 
दिव्य भाव्रको साधारण चखी-पुरुषके भाव्र-जैसा मानना गेपिरयाके प्रति, भगवान्‌के प्रति ओ वास्तवमें सत्थकरे प्रति 
महान्‌ अन्याय एवं अपराध है । इस अधराधसे बचनेके लिय भगवरानकी दिव्य ीढारओपर व्रिचार करते समय 
उनकी अग्राङ्गत दिभ्यताका स्मरण रखना परमाव््यक दै । 
भगवान्‌का चिद्‌।नन्दघन शरीर दिव्य ह । वह अजन्मा ओर अविनाशी दै, हानोपादानरहित है | वह 
नित्य एनातन शुद्ध मगवत्छख्प ही है । इसी प्रकार गोपि दिव्य नगत्‌कौ-मगशनूक्ती खखूपभूता अन्तरङ्गरक्तियाँ 
< हें | इन दोर्नोका प्म्बन्ध भी दिव्यदही है | यह उतम भाव्राञ्यकी रीखा स्थूल इारीर ओर स्थूल मनसे परे 
हे | आवरण-भङ्गके अनन्तर अर्थात्‌ चीरहरण करके जव भगवान्‌ खवीकृति देते, तवर इमे प्र्रेश होता है । 
प्राक्त देका निमाण होता है स्थूक; सूम ओर कारण--इन तीन देहके संयोगसे । जव्रतक (कारण्‌- 
शारीर रहता है, तव्रतक इस प्राकृत देष्टसे जीवको छुटकारा नहीं मिल्ता । क।रण-दारीरः कहते है पूर्वत 
कर्मवि उन संस्कार्ेको, जो देह-निर्माणमें कारण होते हैँ । इस (कारण-रारीरः के आधारपर जीवको बार-बार 
जन्म-भृलयुवे चक्रम पडना होता है ओर यह चक्र जीवकी सुक्ति न होनेतक अथवा कारणः का सर्वथा अभवि 
न होनेतक चलता ही रहता है । इसी कर्मबन्धनके कारण पाश्चभोतिक स्थू्शरीर मिक्ता है- जो रक्त, माघ, ` 
अस्थि आदिसे भरा ओर चपडेसे ठका होता है । प्रकृतिके राज्यम जितने रीर होते हैँ, सभी वस्तुतः योनि र 
बिन्दुके संयोगसे दी बनते है; किर चादे कोई कामजनित निङृ्ट मेधुनसे उन्न हो या ऊष्वैरेता 
पङ्कस्पसे, बिन्दुके अधोगामी होनेपर कतव्यखूप श्रेष्ठ मेथुनसे दो, अथवा बिना ही मैथुनके नाभि, हदय, 
क्ण, नेत्र, तिर, मस्तक आदिके स्पेस, बिना ही स्पशेके केवर दषटिमत्रसे अथवा बिना देखे कैव 
ही उत्पन्न ह्यो । ये मेथुनौ-अमेथुनी ( अथवा कभी-कभी खी या पुरुष-दारीरके निना भी उन्न होने सभी 
शरीर दै योनि ओर बिन्दु संयोगजनित ही । ये सभी प्राकृत शरीर है । इसी प्रकार योगियोके दवारा निर्मित 
= (निर्माणकायः यद्यपि अपे [करत टद दै, प्रतु वेमी सि प्राङ्त हयी । पितर्‌ या देवोके दन्य  चष्स्ननताल रारोर्‌ 


५.४ 
ष । ` ऋ 
= कै ४ 1 कः जनै ~.५* 
अ ॥ स ४ ६५ ॐ 


ध {६ ६6 <. = १ छ 










एस 

























#, ` ` णः 
॥ 


0८ 1 


# 
~ -&१-४ कनी 94 
क ~ 4 । । ~ 
५ व 4 ५/१ ५ 
६4 = ॥ क +भ => = | ह~ 
॥ ४६ । त ६ ¢ र ` 
4 1 १71 ह # ॥ 

, # ॥ ४. ~~ 
+} >. )) 
॥ ई 1 ` ष, 


| ३३९ भीमद्भामवत [ अ० ३३ 





~ ध यपं 


भी प्राकृत ही हैँ | अप्राकृत शरीर इन सवसे विलक्षण ई, जो महाप्र्यमे मी नष्ट नहीं होते ओर भगवदह तो सान्नात्‌ 
भगवत्छख्य ही है । देव-ररीर प्रायः रक्त-मांस-मेद-अस्थिवाले नही होते । अप्राक्रत शरीर भी नहीं होते । फिर 
भगवान्‌ श्रीङ्ष्णका भगवःल्लख्प रारीर तो रक्त-मां-अस्थिमय होता द्यी वैसे । वह ते सर्वथा चिदानन्दमय है | 
उसे देह-देही, गुण-युणी, ख्प-ख्पी) नामनामी ओर लीला तथा ठीलापुरूपोत्तमका सद॒ नहीं है । श्रीद्ष्णका 
एक-एक अङ्ग पूण शरी्ष्ण है । श्रीङष्णका मुखमण्डल जैसे पूर्णं श्रष्ण है, वैसे ही श्रीकृगएका पदन मी पूरण 
श्रीकृष्ण हे । श्रीकृष्णकी समी इन्दियोसे सभी काम हो सते हैँ | उनक्ते कान देख सकते है, उनकी आंख दुन 
सकती है, उनकी नाक स्परां कर सकती है, उनकी रसना यूँ सकती ड, उनकी घलचा लाद ऊ सकती है | 
वे हासे देख सकते है, ओंखोसि चठ सकते हैँ | श्रीकष्णका सव्र कुछ श्रीकृष्ण होने कारण वह सरमः एूणेतम 
है । इसीसे उनकी रूपमाधुरी नित्यवद्वनश्ीट, नित्य नवीन सौन्दर्यनयी है । उसमे रेप चपल्दार है कि बह खय्‌ 
अपनेको ही आकषित कर टेती ह । पिर उनके सौन्दर्य-माघुर्यसे गौ-हस्नि जोर दृक्ष-वेढ पुलकित हो जाय 
इमे तो कहना ही क्या हं । भगवानक्े देसे खरूपभूत शरीरसे गंदा मैथुनकर्म सम्भव्र नहीं । मलव्य जो कु 
खाता है, उससे क्रमशः रस, रक्त, मंत; मेद, मञ्जा ओर अदि बनकर अन्तम ह्यक्र बनता है; इसी चयुक्रके 
आधारपर डारीर रहता हँ ओर ॒मेथुनक्रियामे इसी छक्रका क्षरण हआ करता है । भगवानूका दारीर न तो कर्म- 
जन्य हे, न मैथुनी खष्िका है ओरनदैवीदहीहै। वहतो इन सवसे परे सवथा विद्चद्र मगसरूप है ¦ 
उसमे रक्त, मांसः, असि आदि नही हँ; अतएव उसमें छुक्र भी नहीं है । स्सथ्थि उमे व्राक्रत पाञ्चभौतिकः 
शरीरोवाङे खी-पुरुपोके रमण या मेधुनकी कल्पना मी नहीं हो सकती । इसीय्यि भगवादक्ो उपनिषद (अखण्ड 
ब्रह्मचारी वतथधया गया है ओर इसीसे भागवतमें उनके च्य “अव्ररद्रसोरतः आदि शब्द अये & | पिर कीई 
 _ शङ्का करे किं उनके सोलह हजार एक क्षौ आठ रानि्थोके इतने पुपर कँसे हए तो उत्ता सीधा उत्त यही & 
करि यह सारी मागवती सृष्टि थी, भगवान्‌ सङ्कल्पसे इई थी । भगगन््े शरीरम जो रक्त-पांप आदि दिखल्यी 
पडते है, बह तो भगवानूकी योगभायाका चमत्कार है । ईस परिञेचनसे भी यद्ची सिद्ध होता है किं गोपियोके साध 
भगवान्‌ श्रीङ्ृष्णका जो रमण इभा, वह सवथा दिव्य भगवत्‌-राज्यकी टीट है, टौकिक काम-क्रीडा नहीं| 
>< > >, 4 > 
इन गे पिर्योकी साधना पूणं हो चुक्गी हैँ । मगवानूने अगली रात्रियोमे उनके साध विहार करनेका परेः 
सङ्कल्प कर च्य! है । इसीके साथ उन गोपिर्योको भी जो निव्यसिद्धा है, जो लोकद क्विाहिना भी हैँ, इन्दी 
रात्रिये दिव्य-लीखमे स्षम्मिठ्ति करना है । वे अगली राश्रि्योँ कौन-सी है, यह वरात सगवान्‌ री दष्टिके प्षामने 
है | उन्दने चरदीथ रात्रियोको देखा । (भगवानले देखा" --इसका अथं सामान्य नही, विरोष है । जसे खष्टिके 
प्रारम्भे “ख रेश्चत एकोऽह बह स्याम्‌ ।-- भगवानके इस ईक्षणसे जगत्‌की उद्पत्ति होती है, वैसे ही रासके 
"प्रारम्भे भगवानकत व्रेमवीक्चषणसे शरत्काव्की दिन्य रात्रियोंकी सषि होती है । मिका-पुष्प, चन्द्रिका आदि समस्त 
उदीपनघामम्री भगवानके द्वारा वीक्षित है अर्थात्‌ गौकिंक नहीं, अलो किक -- अप्राकरेत है । गोपिर्योने अपना मन 
| ` शके मनने रव्य दिथा था | उनक्गे पाक्त खयं मन न था । अव ्रेम-दान करनेवाठे भीकष्णने विहारके व्यि 
लवीन मनकी, दिव्य मनकी खष्टि की । येगिशवरेर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यदी योगमाया दै, जो रासटीव्यके च्ि 
दिव्य स्थल, दिव्य सामधरी एवं दिव्य मनका निर्माण किया करती है । इतना होनेपर गवानी बोरी बजती द । 
गवानी वोदुरी जडको चेतन, चेतनको जड, चको भचल शौर अचल्को चठ, विक्ि्तको समाधिस्थ 
र समाधिख्को वि। बनाती रहती है । भगवानका प्रेपदान प्राप्त करके गोपियों निस्सङ्गल्प, निश्चिन्त 


1 क । 
र्‌ ^ भु > 


भिक # च 


+> नः =, "अवी म न 
6 ॥ (48 , 2# + स नि 1 प्ण) शन 3 
# 4. + न 9 ् 










९ 1 ६ 
|. व ७१।॥ ५ ब्‌ > | 
। धे 99 = 


ह णा । रषा रके कामे की इं ची, कोर गोदोदन 





न £ 
५ »ज 
प) ~ 





। 0 





ध 1 
क #* = -- 
४, न (~~~ न ननन [ता व 7 7 1 1 त ष का ` क 1 त 7 न 1 यकं 





(न 
पि ## > 


{1 


|} । 1} 


स 
# त 


अॐ० ३३ ! द्श्चष इन्ध 


आणक चको > 











१ 
~~~. 











आदि अथके कामम व्गी ईं थी, कोई क्षाज-शरङ्गार आदि कामके साधनम व्यस्त॒शी । कोई पूजा-पाठ आदि ` = 
| मोक््ाधनमे लगी हई थी । व च्मगी इई थीं अपने-अपने कामम, परंतु वास्तवमें वे उनर्मेसे एक मी पदाधं 
चाहती न थीं | यदी उनकी विशेषता थी ओर इसका प्रव्यन्न प्रमाण यह है किं वं्चीव्वनि सुनते ही करमकी 
पूणतापर उनका ध्यान नहीं गया; काम पूरा करे चठे, रक्षा उन्होने नही सोचा । वे चक पड उस साधक 
सन्यासीके समान, जिप्तका हृद्य वेर्यकी प्रदीप ज्वाखसे परिपूण ह । किंन किसीसे प्रुछा नदी, सकाह नहीं 
की; अस्त-व्यस्त गतिसे जो जैसे थी, केसे दी श्रीकृष्णके पाप परैव गयी । वेर्यको पूणता ओर प्रेनकी पूणता 
एक ही वात है, दो नही | गोपि्या व्रज ओर श्रीकृष्णकरे वीचपें मूर्तिमान्‌ वेराण्य हैँ या मूर्तिमान्‌ व्रेभ; क्या इक्क 
° ` निणय कोई कर सकता है ! 
साधनाक्ते दो भेद है-- १ मर्यादां वैध साधना ओर २--मयादारहित अवध प्रेमसाधना । दोनो 
ही अपने-अपने खतन्त्र निथम हैँ | वैध साधनामे जसे नियर्तोके वन्धनका, सनातन पद्भतिका, कतंन्योका ओर 
विविध पाष्ठनीय कर्मोका व्याग साघनासे चष्ट करनेवाला ओर महान्‌ हानिकर है, वैसे ही अवध प्रस्ताधनारभे इनका 
पाठन कलङ्कय होता दै । यह बात नहीं कि इन सब आत्मोन्नतिके साघनोँको वह अवैध प्रेमसाधनाका साधकं 
जान-वृञ्चकर छोड देता हें । वात यह है कि वह स्तर ही एसा है, जह इनकी आवरयक्रता नही है । ये वहां 
अगने-ाप वसे ही छर जाते है, जेते नदोके पार पर्व जानेपर खाभाविक ही नौकाकी सवारी छुट जाती है | 
जमीनपर्‌ न तो नौश्ञापर वेठर्‌ चलनेका प्रदन उठता है ओर न रक्ता चाहने या करनेवाका बुद्धिमान्‌ ही माना 
जाता है ¦ य सद साधन वर्हीतकः रहते है, जहतक सारी वृत्तयो सहज स्वेच्छासे सदा-सर्वदा एकमात्र मगवान्‌- 
की ओर दोडने नहीं व्ग जातीं ¦ इसीव्यि मगत्रान्‌ने गीतामें एक जगह तो अनस कहा है-- 
न दे पाष्रौल्ति क्त्यं षु रोकेष्चु किंचन । नानवाप्तमरवा्तव्यं वतं एव च कर्मणि ॥ 
यदि दयं न तयं जातु कमरण्यतन्द्रिवः। भम बत्मौचुवतेन्ते मलष्याः पाथं सर्वशः ॥ 
उत्सीदेयुरिमे ख्येक्तः न यी कम॑ चेदम्‌ । संकरस्य च कतौ स्यासुपहन्यामिशषाः अजाः ॥ 
सङः कप्रज्यतिद्वांसो यथा ऊुर्वैन्धि भारत ! इयोद्िद्धास्तथसक्तश्चिकीपुखौकसंगरहस््‌ ॥ ्‌ 
( ३ 1 २२२५ ) -- 


- 

न्प 

| अञ्न ! यदचपे तीन रोकोमें सच्चे कुछ भी करना नहीं है, ओर न सुञ्चे किसी वस्तुको प्राप्त ही करना 4 
दै, जो मुञ्चन प्राप्तहैःतोमभीमेंकम कस्तां । यदि मैं सावधान होकर कन कतो अन । मेरी 
देखा-देखी रोग कर्मोक्तो छोड वेट ओर यों मेरे कम न करनेसे ये सारे ठोक चष्ट हो जार्थं तथाम ्हंवणे- ` 
संकर्‌ वनानेवाज ओर सारी प्राज्ञा नाञ्च करनेवाला बनू । इस्यि मेरे इस आदशेके अनुसार अनासक्त ज्ञानी ` ८ 
पुरुषको भी गेकप्रहके च्य वसे ही कभ करना चाहिये, जेसे कमम आसक्त अज्ञानी ठग करते है = 3 
यँ भगवान्‌ आदरो लोकसंग्रही महापुर्षके ख्पमं बोच्ते हँ, रोकनायक बनकर स॑साधारणको शिश्ना 

देते है । इसीष्ि खयं अपना उदाहरण देकर ेगोको कम॑मे प्रटृत्त करना चाहते है । ये ही भगवान्‌ सी 
 गीतामें जह अन्तरङ्कताकी बात कहते है, वहां स्पष्ट कहते है - < 
सवेधमोन्‌ परित्यज्य मामेकं शरणं व्रजा 
५ ( १८1 ६६ ) = - र 


, कव "वि = क ! 9 #,॥ 
























क्ता (सारे धर्मोका व्याग करके त्‌ केवर एक मेरी शरणमे आ जा 2 
यह बात सवके य्य नहीं है । इसीसे मगवान्‌ १८ } ६४ में इसे सबसे 






न ड ्‌ र 
( प्वेगुद्यतम ) ककर इसवे ही शकम कहते है-- _ ` 
~ श 5 2 


व न । 
= न 





























व श्रीमद्भागवतं [ &० ३३ 


। ~==------------------------------------------------------------- कक आनका = ० कक 
दिः क भः जोकः क ज = = क वि 


1 


न्व # १ ¢ - = प्रे क न्ट ५ 
# ॐ कः त । 
-वव्वन्न 





जि जि 
नि = 





इद्‌ ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाच 
न चद्यश्रूषवे च्य न च मां योऽय्यश्ुयत्ति \ 
( १८ । ६७ ) 
मेया अन | हस सवैगुद्यतम बातको जो इन्दिय-विजयी तपखी न हो, मेरा भक्तन दहो , सुनन। 
न चाहता हो ओर स्॒षमें दोष ल्गाता ह्यो, उसे न कहना | 
श्रीगोपीजन साधनाके इपी उच्च स्तरमे परम आदह थीं । इ्टीसे उन्होने देह-गेह, पति-पुत्र, लोक- 
परव्येक, कतव्य-धम- सबको छोडकर, सवका उष्छङ्कन कर, एकमात्र परमधर्मद्वरूप सगवान्‌ श्रीक्रष्णकरो ही 
पनेके व्यि अमिस्ार करिया था । उनका यह्‌ पति-पुत्रीका व्याग, यह्‌ दर्वधर्मका व्याग ही उनके स्तरे 
अनुरूप खधमं है । 
इस (सतरेधमत्यागः खूप खधमक्रा आचरण गोपिया-जेसे उ स्तके साधको ही सम्भव दहै; क्योकि 
सब्र धमाका यह त्याग वका कर सक्तं €, जो इसङा यथावि प्रा पालन कर्‌ चुकनेे बाद्‌ इस्त परमफल 
अनन्य ओर अचिन्त्य देवदुकभ भगवसपरेमको प्राप्त कर चुकते दै, वे भी जान-वृषचकर तयाग नही करते । सूर्धका 
प्रखर प्रकाश हो जानेपर तैन्दीपककी भति खतः ही येष्रपं उसेव्याग देते | य्न व्याग तिर कारमूढक 
नही, वरं तृपिमूखक ह । भगवस््रमकी ऊंची स्थितिका थही खूप है । देवर्षिं नारदजीका एक सुतर है-- 
'वेदानपि संन्यष्यति केवर्मविच्छिननालुरागं भते । 
४जो वेदोका ८ वेदषूलक समस्त धमेम्यादाओंका ) मी भटीरभाँति व्याग कर देता है, वह अखण्ड, असीम 
भगवत्मेमको प्राप्त करता है | 
जिसको भगवान्‌ अपनी वंशीष्वनि छुनाकर-- नाम ले-लेकर बुायं, वह भला, किसी दूसरे धक्रकी 
ओर त।ककर कब ओर कंसे रुक सकता है | 
रोकनेवाने रोका भी, परंतु हिमाब्यसे निकक्कर समुद्रम गिरनेवाटी ब्रह्मपुत्र नदीकी प्रखर धाराको 
क्या कोई रोक सकता है १ वेन रुकी, नहीं रोकी जा सकी । जिनके चित्तमें कुछ प्राक्तन संस्कार अवरिष्ट 
ये, वे भपने अनधिकारके कारण सदरारीर जानेमे समर्थ न इई । उनका शरीर घरमे पड़ा रह गया, मगवान्‌के 
वियोग-दुःखसे उनके सारे कट्ष धुर गये, ध्यानमें प्राप्त भगवान्‌के व्रेमारिङ्गनसे उनः समस्त सौभाग्यका 
परमफ प्राप्त ह्ये गथा ओर वे भगत्रानके पास सदारीर जानेराखी गो पिर्योके प्टचनेसे पहले ही भगवान्‌के पाक्त 
` पर्टच गयीं । मगवानूमे मिक गयी । यह शाका प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पाप-पुण्यके कारण क्षी बन्धन होता 
दै ओर छभाञ्मका भोग होता है। ्माद्यम करमोके भोगसे जव पाप-पुण्य दोनों न्टहो जत्र है, तव 
जीवकी मुक्ति हो जाती है । यदपि गोपि्याँ पापपुण्यसे रहित श्रीमगवान्‌की प्रेम-प्रतिमाद्लखूपा थीं, तथापि 
लीके व्यि यह दिखाया गया है कि अपने प्रियतम श्रीकृष्णके पासन जा सकनेसे, उनके विरहानलसे 
। ` उनको इतना मान्‌ संताप इभा किं उससे उनके सम्पूणं अघ्चमका भोग हो गया, उनके समस्त पाप न्ट हो 
रः ओर प्रियतम भगक्रानके ध्यानसे उन्हे इतना आनन्द इभा कि उससे उनके सारे पुण्योंका फ मिल 
| इस प्रकार पाप-ण्योका पूरणख्पसे अभाव होनेसे उनकी सुक्ति हो गयी । चाहे किसी भी भावसे हो-- 
कामस, क्रोधसे, गोमसे--जो भगवान्‌के मङ्गलमय श्रीविप्रहका चिन्तन करता है, उसके भावकी अपेक्षा न करके 
त्तराक्तिसे दी उसका कल्याण हो जाता है । यह भगवान्‌के श्रीविम्रहकी विेषता है । भावके हारा तो एक 
रस्तरमूतिं भी परम कल्याणका दान कर प्तकती दैः बिना भावके दी कल्यागदान भगवद्िमहका सहज दान है । 


न । % 4 9 # ब १५.) 
अ ~; * ¦ ~ क नि~ ~ + १ ~ ` = क, 
4 - + 3 रः $ ® 





= डः @ 


। 
------- | छ क 1 पा क क 0 


अ० ३३) दक्लम स्कन्धं 








भगवान्‌ ह वड़े ीलामय । जहा वे अखिढ विश्वके विधाता ब्रह्मा-हिव आदिके मी वन्दनीय, निखिल 
जी्ोंक प्रत्यगात्मा ह, वहीं वे टीढानटवर गोपियोके इशारेपर नाचनेवाले भी है । उन्हीकी शच्छासे, उन्हीकें 
्ेमाह्वानसे, उन्हीके वंरी-निन्त्रणसे प्रेरित होकर गोपियां उनके पास आयीं; परंतु उन्होने दश्री भावभङ्खी 
प्रकट कीः, रेकार्खखवाग बनाया) मानो उन गोपरियकि अनिका कुछ पता हीन हो । शायद्‌ गोपियके महसे वे 
उनवे हदयकी बात, व्रेनक्री बात घुनना चाहवै हो । सम्भव दहे, वे व्रिप्रठम्भके द्वारा उनके मिथ्न-मावको 
परिपुष्ट करना चाहते हों । बहत करके तो एसा माम ह्योता है कि कही लोग इसे साधारण बात न समञ्च 
छं, इसव्ि साधारण छोगोके ल्यि उपदेश ओर गोपियोका अधिकार भी उन्होने सवके सामने रख दिया । 
उन्होनि बतलाया--'गोपियो ! व्रजमें कोई विपत्ति तो नहीं आयी, घोर रात्रिम ययौ आनेका कारण क्या है १ 
घरषाठे इूढते होगे, अव्र यहाँ वहरना नहीं चाहिये । वनकी शोभा देख खी, अव वच्चो ओर वकछडोका भी 
ध्यान करो । ६ मके अनुकर मोक्षके खु इए द्वार अपने सगे-सम्बन्ियोकी सेरा छोडकर वने दर.दर भटकना 
ल्चियोके ल्ि अनुचित ह । सखरीको अपने पतिकी ही सेवा करनी चाहिये, वह केसा भी क्योनदहो | यही 
पनातन धप है । इषीके अनुपार तुम्दं चञ्ना चाहिये । म जानता दँ कि तुम सब सुञ्षसे प्रेम करती हो 1 परंतु 


रेपे शारीरिक शच्िधि बव्रह्यक्त नहीं है । श्रव्रण, स्मरण, दरशन ओर व्यानसे सान्निष्यकी अपेक्षा अधिक प्रेम 
बडत। है । जाओ, तुम एनातन सदाचारका पान करो । इधर-उधर मनको मत भटकने दो | 


श्रोङ्ष्णकी यह शिन्नां गोपिंयोके लिये नह, सामान्य नारी जातिके च्वि है | गोपियोंका अधिकार विशेष 
था ओर ठउक्ठको प्रकट करनेके लिये ही भगवान्‌ श्रीकृष्णने रेसे वचन कहे थे । इन्हं सुनकर गोपिरयोकी क्या 
दशा इई ओर इये उत्तरम उन्होने श्रकृष्णसे क्या प्राना की; बे श्रीङृष्णको मनुष्य नहीं मानती, उनके 
पूणत्र्म सनातन खख्यक्रो भलीर्भाति जनतो है ओर यह जानकर हौ उनसे त्रेम करती है--इस बातका 
कितना सुन्दर प्रिवय दिया; यह सब विषय पूर्मं हौ पाठ करनेयोग्य है । सचमुच जिनके इदयमे भगवान्‌के 
परभतचका वैसा अनुपम ज्ञान ओर भगवादूके प्रति वैसा महान्‌ अनन्य अनुराग है ओर सचाईके साथ जिनकी 
वाणीमें वैसे उद्वार है, वे दी विशेष अधिकाखान्‌ हैँ । 

गोपिर्योकी ब्राथनासे यह बात स्पष्ट है कि वे श्रीकृष्णको अन्तर्यामी, योगेश्वरेश्वर परमात्माके ख्पमे पहचानती 
यीं ओर जैसे दूसरे छोग गुरु, सखा या माता-पिताङ्गे ख्यमे श्रीकरष्णकी उपासना करते है, वैसे ही वे पतिके 
ख्पमे श्रीकरष्णसे प्रभ करती थीं, जो कि शाखे मधुर भावके--उञ्ञ्वर परम रस्के नामसे कहा गया है । 
जव प्रेमके समी माव पूणं होते हैँ ओर साधरकोको खामि-सखादिके रूपमे मगवान्‌ मिकते है, तब गोपिर्योने 
क्या अपरान किया था कि उनका यह उच्चतम भाव--जिक्षमे शान्त, दास्य, सख्य ओर वात्सस्य सब-के- सब 
अन्तमूत है ओर जो सबसे उन्नत एवं सवका अन्तिम खूप है--न पूणं हो { भगवान्‌ने उनका भाव 
पूणं किया ओर अपनेको असंख्य रूपमे प्रकट करके गोपियोके साथ क्रीडा की । उनकी क्रीडाका खूप 
वतते दए कहा गया है“ रेमे रमेदो व्रनघुन्दरीभियेथाभभकः खप्रतिबिम्बविभ्रमः' । जैसे नन्हा-सा शिच 
दर्पण अथवा जके पड़े इए अपने प्रतिबिम्बकं साथ खेर्ता है, वेसे ही रमेश्च भगवान्‌ ओर ब्रनञुन्दस्यिने 
रमण किया; भयोत्‌ शच्चिद्‌ानन्द्घन सर्वान्तयोमी व्रेमरस-खरूप, टीकारसमय परमाम भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपनी 3 
हादिनी-शक्तिङ्पा आनन्द-चिन्मयरसप्रतिमाविता अपनी ही प्रतिमूर्तिसे उत्पन्न अपनी प्रतिबिम्ब-खरूपा गोपयसि ` 
आत्मक्रीडा की । पूर्णत्रहम सनातन रसखरूप रसराज रसिक-शेखर रसपरजरह्म अखिल्रसामूतविप्रह 
श्ीकृष्णकी इस चिदानन्द-रसमयी दिव्य क्रीडाका नाम ही रस है । इसमे न कोई जड शरीर था, न प्राकृत अङ्ग 
था, जीर न इतके सम्बन्धकी प्राकृत ओर स्थूल कल्पना ही थीं । यह था चिदानन्दमय म ानूका दिव्य 
`  विदयार, जो दिल्प टीकधाममें सवेदा हते रनेपर भी कमी-कमी प्रकट होता है । 2 


< "= । 
















॥। 6 
ङ. = १ च + 













| | इद रीसद्भागवत [ अ० ३ 


4 = 
== ------------------~---~----- ~~~ 
८ >~ 

















वियोग ही संयोगका पोषक है, मान ओर मद ही मगवानूकी टीमें वाधक है । भगवानूकी दिव्य 
लीव्यामे मान ओर मद भी, जो किं दिव्य है, इसीन्यि होते है किं उनसे टीकामें रसकी ओर भी पुष्टि हय । 
भगवानकी इच्छसे ही गोषियोे खीकनुख्प मान ओर मदका संचार इआ ओर भगवान्‌ अन्तर्धान दहो गये | 
जिनके हदयमे ठेशमात्न मी मद अवदोष है, नाममात्र भी मानका सरकार रेष है, वे मगवानके सम्भुख रहनेके 
अधिकारी नही । अथवा वे भगवान्‌का, पास रहनेपर भी, दर्शन नहीं कर सकते । परंतु गोपि गो पियो थी, उनसे जमत्‌के 
किसी ्राणीकी तिल्मात्र भी तलना नही है | मगवानूके वियोगमें मो पियोंकी व्या द्या इई, इस बातको रा्तटीटाका प्रत्येक 
पाठक जानता है । गोपिोके शरीर-मन-प्राण, वे जो कुछ धी- सव श्रीकृष्णे एक तान हौ गये | उनके परेमोन्माद्‌ का वह 
गीत; जो उनके प्राणका प्रयक्ष प्रतीक दै, आज मी माबुक भक्तको मावमग्न करके मगवान्कते टीलटोकमे पवा 
देता है । एक वार सरस हदयसे हदयहीन होकर नही, पाठ करनेमात्रसे ही यह गोगि्योकी महत्ता समू 
हृदयमे भर देता है । गोपियोके उस “महामावः--उक्त अढोकिक प्रेमोन्मादको देखवःर श्रीकृष्णः भी अन्तर्हित 
न रह सके, उनके सामने 'साक्षान्मन्मथमन्मथः” ख्पसे प्रकट हए ओर उन्होने पुक्तकण्टसे डीकार किया 
किं गोपियो, मे तम्हारे प्रेममावका चिर-ऋणी ई । यदि यै अनन्त काठ्तक तुम्हारी सेवा करता रहर तो भी 
तुमसे उक्रण नहीं हो सकता । मेरे अन्तर्धान होनेका प्रयोजन तुष्ारे चित्तको दखाना नहीं था, वल्कि 
हारे प्रेमको ओर भी उञ्ज्वक एवं समृद्ध करना था ।› इसके बाद रासक्रीडा प्रारम्भ इई | 
जिन्होने अच्यात्मशाञ्चका खाध्याय किया है, वे जानते हैँ कि योगसिद्धिप्ाप्त साधारण योधी मी कायध्यृहके 
दारा एक साय अनेक रादीरोका निर्माण कर सकते है ओर अनेक स्थानोँपर उपदलित रहकर प्रथक्‌ पृथक्‌ 
कायं कर सकते है । इन्द्रादि देवगण एक ही सपय अनेक स्थार्नोपर सपधित होकर अनेकः यज्ञेन युगपत्‌ 
‡ # + शति खीकार कर सकते ह । निखिल योगिरयो ओर योगे्वरोके ईर सवरंस्तमथं भगवान्‌ श्रीकृष्यः यदि एक ही 
` साथ अनेक गोपियोके साथ क्रीडा करे, तो इसमे आश्व्यकी कौन-सी बात है १जो लेग सगवानको भगवान्‌ 
। 6 नहीं खीकार करते, वही अनेकों प्रकारकी शङ्का-कुशङ्काएं करते हैँ । भगवान्‌की निज टीमें इन तर्कोका 
सर्वया प्रवेद नहं है । 
गोपियों श्रीङ्ृष्णकी खकीया थीं या परकीया, यह प्रईन मी श्रीकृष्णके खख्पको भुलाकर ही उठाया 
जाता है । श्रीकृष्ण जीव नही हैँ किं जगत्की वस्तुओमिं उनका हिस्सेदार दूसरा मी जीव ह्यो । जो बुक भी 
था, हे ओर अगे होगा--उश्चके एकमात्र पतिं श्रीकृष्ण ही हैँ | अपनी प्रार्थनामे गोपियोने ओर परीक्षिते 
प्रद्नके उत्तरम श्रीद्यकदेवजीने यही वात कही है किं गोपी, गोपियोके पति, उनके पुत्र, सगे-एम्शन्धी ओर 
जगत्‌करे समस्त प्राणियोके हृदयमें आत्माखूयसे परमात्मारूपसे जो ग्रमु सित है-- वही श्रीकृष्ण हं | कोई 
^ भ्रमसे, अङ्ञानसे, भे ही श्रीकृष्णको पराया समन्चे; वे किसीके पराये नहीं है, सवके अपने हैँ, सब उनके है 
` #ङष्णकी दष्टिसे, जो किं वास्तविक दृष्टि है, . कोई परकीया है ही नही; सब खकीया ई, लब केवल अपना ही 
^ टीगविलाप्त है, समी खरूपभूता अन्तरङ्गा शक्ति है । गोपियाँ इष बातको जानती थीं ओर स्थान-स्थानपर 
` उन्दनि एसा कहा है । 
एसी सतिम ‹जारभावः ओर “ओपपत्यः का कोई कौकिक अथं नहीं रह जाता । जहां काम नही है 
 अङ्ग-पङ्ग नही है, वह्यं “ओपपवयः भौर “जारभाव की कल्पना ही कंसे हो सकती है १ गोपियां परकीया नही 
ख कीश थी; प्रतु उनमें परकीया-माव था । परकीथा होनेमें ओर परकीयामात्र हनेमे आकार्‌-पाताल्का 
न्तर है । परकीया तीन बातें वदे महकी होती अपने प्रियतमका निर्तर चिन्तन, मिलनकी 
उत्कट उत्कण्ठा ओर दोषदृष्टिका सर्वथा अमाव । खकीः निरन्तर एक साथ रहनेके कारण ये तीनों बातें 


८ - # 2 





केक -कतं ऋक > विक्कः 
१ न व [+ 


क पु -कर्कोन अकिः 
१७ = क. 


किर ञ् > 





















त भ कक वीह्र + 
# 8, 


न्क 


* क्क 


> दः (+ + 
त ~ र~ क 
५ क = क्क + „+ 





।\ आ" सितरवी 2= ~ + =  न 









नहीं करनी चाये 


गौण हो जाती है;परतु परकीया-भावमे ये तीनों माव बने रहते है । कुछ गोपियाँ जारभावे श्रीकष्णको चादती यी; इसका 


ओर उनकी अन्तरङ्गा अमिन्नखटूपा गोपिर्योकी लीला मी देखनेमे कसी ही क्यों न हो, वस्तुतः वह सा 





इतना ही अथं है किवे श्रीकृष्णका निरन्तर चिन्तन करती थी, मि्नेके च्ि उत्कण्ठित रहती यी भौर श्रीकृष्णे प्रत्येक 
न्यवहारको प्रेमकी ओंखसि ही देखती थीं । चौथा भाव विरोष महत्वतका भौर है- वह यह किं ख कीया अपने घरका भपना 
लोर अपने पुत्र एवं कन्याओंका पाव्न-पोषण, रक्षण वर्षण पतिसे चाहती है । वह समञ्चती & कि इनकी देख-रेख 
करना पतिका कत्य है; क्योकि ये सब उसीके आश्रित है ओर वह पतिसे रेसी आदा भी रखती है । किंतनी ही 
पतिपरायणा क्यों न हो, खकीयामे यह सक्रामभाव चपा रहता ही है। परंतु परकीथा अपने प्रियतमसे कुछ 
नहीं चाहती, कुछ भी आशा नहीं रखती; वह तो केव अपनेको देकर दी उसे सुखी करना चाहती है | 
श्रीगोपियोमें यह भाव भी भकीमाोंति प्रस्फुटित था । सी विरोषताके कारण संस्कृत-साहित्यके कईं प्रन्थेमिं निरन्तर 
चिन्तनके उदाहरणखषख्य परकीयाभावका वर्णन आता है । 

गो पियोके इस भावके एक नही, अनेकः दृष्टान्त श्रीमद्धागवतमें मिलते हैँ; इसय्ि गोपिर्योपर परकीयापनका 
रोप उनके भावको न समञ्जनेके कारण है ! जिसके जीवनम साधारण धमकी एक हल्की-सी प्रकाडरेखा आ जाती 
है, उसीका जीवन परम प्रित ओर दूसरोके व्यि आदर्श-सवरूप बन जाता है । फिर वे गोपिर्यो, जिनका जीवन 
साधनाकी चरम सीमापर पदहँच चुका है, अथत्रा जो निध्यसिद्धा एषं भगवान्‌की स्वकटपभूता है, या जिन्न कट्पोतक 
साधन! करके श्रीक्रष्णकी कृपासे उनका सेवाधिकार प्राप्त कर च्या है, सदाचारका उल्लद्कन कंसे कर सकती 
देँ ओर समसत घम-मर्यादाओंके संस्यापक्त श्रीकृण्णपर्‌ धर्मोल्छङ्खनका रान्छन कैसे च्गाया जा सकता है 
श्रीृष्ण्‌ ओर गोपियोके सम्बन्धरपे इस ग्रकारकी कुकस्पनाए उनके दिव्य स्वरूप ओर दिव्यगीलाके विषयमे 
अनभिज्ञः ही प्रकट करती हैँ | 

श्रीमद्वागवतपर, दशम स्कन्धपर ओर रा्तपञ्चाव्यायीपर अबतक अनेकानेक भाष्य ओर टीकार्एं छिखी जा 
चुकी हैँ -जिनके ठेखकोँमें जगद्गुरु श्रीवल् भाचार्य, श्री श्रीधरस्वामी, धीजीवगोस्वामी आदि दै । उन रोगोनि 
बड़े विस्तारसे रासटीक।की महिमा समञ्चायी है । किंसीने इसे कामपर विजय बतखाया है, किंसीने भगवानक्ता 
दिष्य विहार वतलाया है ओर किसीने इसका आघ्यातिक अर्थं किया है । भगवान्‌ श्रीकृष्ण आत्मा है 
आलसाकार वृतिं श्रीयाधा हैँ ओर शेष आलाभिमुख इत्ति्यां गोपि्याँ ह । उनका धाराभ्रवःहर्यसे निरन्तर 
आलमरमण ही रा है ¡ किरी इृष्टिसे देख, रास्तगीटक़ी महिमा अधिकाधिक प्रकट होती है । क 

परतु इक्षसे रसा नहीं मानना चाहिये कि श्रीमद्रागवतपरे ब्णित राप्त या रमण-प्रसङ्ग केवल ख्यक या कल्पना- ` 
मात्र है ) वह सवथा सधय दै जर जेता वणन है, वैसा ही मिग्न-विलापतादि ख्य श्रज्गारका रसाखादन ही इञा याः 
मेद्‌ इतना ही है किं वह रोकिक सरी-पुरपोंका मिकन न था | उनके नायक ये सचिदानन्दविप्रह, परापरतखः, 
पूणतम ख।धीन ओर निरङ्श खेच्छाश्िहारी गोपीनाथ भगवान्‌ नन्दनन्दन ओर नायिका थीं खयं हादिनीशक्ति ` 
श्रीराधाजी ओर्‌ उनकी कायव्यूषरूपा, उनकी घनीभूत मूर्तियां श्रीगोपी जन । अतएव इनकी यह लीय अप्राकृत थी । ` 
सर्वथा मीठी मिश्रीकी अव्यन्त कड़ए इन्द्रायण ( तबे )-जे्षी कोई आक्रति बना खी जाय, जो देलनेमें टीक तृबे-जेषी ` 
ही माद्धप हो, परंतु इक्तसे भस्मे क्या वह मिश्रीका त्रा कड़ा थोडे ही हो जाता है १ क्या तुवेके आकारकी ` 
होनेसे ही मिश्रीके खामाविक गुण मधुरताका अभाव हो जाता है १ नही, नही, वह किसी भी कारमं हो- ` 
सर्वत्र, सवेदा ओर सर्वथा केवर मिश्री-ही-मिश्री है, बल्कि इसमे टीला -चमत्कारकी बात जरूर है । जोग 
हैँ कड्आ तूत्रा ओर होती है वह मधुर मिश्री । इी प्रकार भखिक्रसामरतसिन्धु सचिदानन्दविप्रह भगवान्‌ ्रीकृष 


न्ट 


॥ 
॥ (*१,..३.. + #) ५ 

















4 


ही है । उमे सांारिक गंदे कामका कड्आ खाद है ही नहीं । हा, यह अवस्य है कि इस लीगाकी नकल किसीको 
, करना सम्भव भी नही है । मायिक पदार्थोके द्वारा मायातीत मगव्रानूका अनुकरण कोई 


त भ [न पि; दः 
~ 2 प 


९३८ भीमद्भागवतं | अ ३३ 


जा ० जः क ककि ` ऋ कक कक = = जः य जः चक ` कः = जित ऋ कनके 








~ = = ~ ज = ~ 


कसे कर सकता है ! कङ्ए वेको चषि जेसी घुन्दर मिठाईेकी आङ्ृति दे दी जाय, उ्तका कडुआपन कमी 
मिट नही सकता । हसौष्ये जिन मोहम्रस्त मनुष्योने श्रीकृष्णकी दाघ्त आदि अन्तरङ्ग-लीखार्जोका अनुकरण 
करके नायक्र-नायिकाका रक्षाखादन करना चाद्या या चाहते है, उनका घोर पतन इआ ई ओर होगा । श्रीकृष्णकी 
इन खीकओंका अनुकरण तो केवर श्रीकृष्ण ही कर सकते हैँ । इषीव्यि छकदेवजोने राक्षप्रष्लाध्यायीके 
अन्तम सव्रकरो साप्रधान ऊरते हर कड दिथा है क्षि मगत्रान्‌के उपदेशा तो सव्र मानने चाहिये, परंतु उनके 
पमी आचर्णोका अनुकरण नहतं करना चाहिये | 
जो लोग भगवान्‌ श्रीज्ष्णको केवल मलुष्य मानते दै ओर केवर मानवीय माव एवं आदशेकी 
क्तीटीपर उनके चसििको कसना चाहते &, ३ पृष्ठे ही शासे विपुख हो जाते हैँ, उनके चित्तम धमकी कई 
धारणा ही नहीं रहती ओर वे भगवानको भी अपनी बुद्धिके पीछे चलाना चाहते दँ । इयय साधकरके सामने 





। । 

| उनी उक्ति-युलिर्याका कोई महच ही नहीं रहता । जो श्चाखके श्रीकृष्ण खयं मगान्‌ हैँ” इतत वचनकद्तो नहं 

1 1 मानता, वह उनकी टीखाओंको किस आधारपर सव्य मानकर उनी आलोचना करता दै--यद समञ्चमे नहीं 

। 4. शाता । जेसे मानवधर्भ, देवधर्म ओर पञ्चधर्म प्रथक्‌ -पथक्‌ होते है, वैसे ही भगवद्धम भी प्रथक्‌ होता है ओर 

। | भगवानके चल्िक्ा परीक्षण उक्षकी द्वी कसौटीपर होना चाहिये । मगवानका एकमात्र धम है--ग्रेम-प्रवङताः 
| दयापरवश्चता ओर मर्छोकी अभिव्यषाकी पूर्तिं । यज्ोदाके हासे ऊखटमै वंध जानेवाठे श्रीकृष्ण अपने निजजन्‌ 


गोपियोके प्रेमके कारण उनके साथ नाच यह उनका सहज धम है । 

यदि य हठ ही हो किं श्रीकृष्णका चलि मानवीय धारणार्भ भौर आदश्ेकि अनुकर ही होना चाहिये; 
तो हमे भी कोई भापत्तिकी बात नहीं है । श्रीकृष्णकी अवस्था ` उप्त समय दस वषके च्गमग थी, जेसा किं 
भागवतमें स्पष्ट वर्णन मिक्ता है | गमिं रहनेवाठे बहृत-से दस व्षके बच्चे तो नगे ही रहते हैँ । उन्हे काम्‌- 
दृत्ति ओर खरी-पुरुष-सम्बन्धका कुछ ज्ञान ही नह रहता । ब्डके-ख्डकी एक साथ खेन्ते है, नाचते है, गाते है, 
त्योहार मनाते है, गुङ््गड़रकी चादी करते है, वारात ठे जति हैँ ओर आपसे भोज-भात्त भी करसै हैँ | गोवके 
` बड़े लोग बर्चोका यह मनोरञ्जन देखकर प्रन ही होते है, उनके मनर्मे किसी प्रकारका दु भाव नही आता । 
ठेसे वर्को युवती लि भी नडे प्रेमसे देखती है, आदर करती हँ, नहलाती है, चिलाती हँ | यह तो साधारण 
बर्की बात है | श्रीकष्ण-जेसे असाधारण धी-शक्तिष्म्पनन बाक्क जिनके अनेक सहुण बाल्यका्मे ही प्रकेट हो 
के ये; जिनकी सम्भति, चातुग्थं ओर शक्तिसे बड़ी-बड़ी विपत्तियोसे व्रजवा्तियने ण पाया था; उनके प्रति 
वर्होकीं िर्यो, बाटिकाओं ओर बा्कोका कितना भाद्र रहा होगा-ईइप्तकी कल्पना नहीं की जा सकती | उनके 
सौन्दर्य, साध्यं ओर रेशर्यसे आकृष्ट होकर गोँवकी बाककर-बारिकाएं उनके साथ ही रहती थीं ओर श्रीकृष्ण भी 
अपनी मौलिक प्रतिभासे राग, ताल आदि नये-नये ठगसे उनका मनोरञ्जन क्रते यथे ओर उन्हं शिक्षा देते थे | 
एसे ही मनोर्ञनोमेवे राटी मी एक थी; रसा समञ्चना चाहिये । जो श्रीकृष्णको केवल मनुष्य समञ्षते है, 
॥ उनकी दट्टिमे भी यह दोषकी बात नशी होनी चाहिये । वे उदारता ओर बुद्धिमानीके साथ भागवतमें आये इए 
(1 काधरतिं आदि शब्दोका ठीक वैता हयी अथं समश्च, जैप्ा कि उपनिषद्‌ शौर गीतामें इन शव्दोका अर्थ होता है । 
॥ वास्तवे गोषरियोके निष्कपट प्रेभका ही नामान्तर काम है ओर मगधान्‌ श्रीकष्णका आत्मरमण भयवा उनकी दिल्य 
डा दी रति है । इसीटिये स्यान-स्थानपर उनके व्यि विमु, परमेश्वर, ग््मीपति, भगवान्‌, येगेश्वरेधर, आत्ा- 

मन्भरथमन्मय आदि शब्द भये है जिससे किसीको कोई श्रम न हो जाय । 
(जव गोपि्ो श्रीङष्णकी वंशी्वनि छनकर वनम जाने खी थी तब उनके स॒गे-सम्बन्धिरयोने उन्हे जानेसे 



















णी 9 
[7 [१ [ 


। ^: न अ 
॥, + ~ ग्‌ ; = 
| 


9 


भके 
^ 
ई +# ~ 


अर १ ^> 3 








| या । रातं अपनी बाटिकारजीको भगा, कौन बाहर जाने देता । फिर मी वे चली गयी ओर इससे घर 





[आ | 





४, 

























अ० ३४ | दश्च॑म स्कन्ध 








-----------------~--=--= ~~ --------------------------------------------- ~ -- ॥ 





जिति 


अथ चतु्िशोऽध्यायः 
खदशंन ओर शाङ्खं चूडका उद्धार 
श्रीक उवाच | र सयुकदेवजी कदते ह-- परीक्षित्‌ ! एक बार 
दनावा आदि गोपने शिवरात्रिके अवस्पपर बडी 
उत्सुकता, ` कौतूहठ ओर आनन्दे भरकर वैसे 


| नम्‌ यपर सत्रार होकर अम्विकावनकी यात्रा 
अनोभिरनड्द् प्रयुस्तैऽम्विक्ावनम्‌ ।। १ | | जती इई गाड 
र्नडद्यु क्तः ६) व्‌ की ॥ १ ॥ राजन्‌ | वहं उन रोगन प्षरश्चती नदीमें 


तत्र स्नात्वा दर्छर्यां देवं पश्युपरटिं विश्वस्‌ । स्नान किया ओर सर्बन्तर्यामी पञ्चुपति भगवान्‌ शंकरजी 
का तथा भगवती अम्विकाजीका वड़ी भक्तिश्च अनेक 

¢^ 
आनचुरदंमे ५२८२ देवीं च नृपतेऽम्बिक्ाम्‌ ॥ २॥ | प्रकारकी सामम्नियोके द्वारा पूजन किया ॥२॥ 


न ~ ~~ ~ --  --- -- --- ता क 


१. बादरायणिक्वाच । 
वा्जौरो किसी प्रकाप्की अप्रसतन्नता नहीं इई ओरन तो उन्होने श्रकरष्णपर या गोपिर्योपर किदी ग्रकःश्का 
खाञ्छन ही ख्गाया | उनका श्रीकृष्णपर, गोपिर्योपर विश्चाप्त था ओर बे उनके बचपन ओर खेरसे परिचित ये । 
उन्दं तो रक्ता माद्धम इश, मानो गोपियू हमारे पास हयी है । इसको दो प्रकारसे समञ्च सकते है । एक तो यह 
कि श्रीकृष्णके प्रतिं उनका इतना त्रिश्वापस्त था क्कि श्रीकृष्णके पास गोपिर्योका रहना भी अपने दी पास रहना है| 
यह्‌ तो मानवीयद्ृष्टिहं | दृप्तयी इश्टियह्ू ज्रि श्रीकृष्णको योगमायाने रेसी व्यवष्या कर्‌ रक्खी थी, गोर्पोको वे 
घरमे ही दीखती थीं । किंसी भी दष्टिसे राहगीखा दूषित प्रसङ्ग नही है, बल्कि अधिकाी पुरुषोके च्थि तो 
य सम्ूग मनोमकको नष्ट कने्राटा ह । राप्तटीककि अन्तमं कडा गया है करि जो पुङ्ष श्रद्वा-मक्तिपूतैक राकष- 
लीठाका श्रवण गोर्‌ वणन करता है) उप्तके इदयज्ञा रोग-्राम बहत ही शीघ्र नष्टहो जाता है ओर उपे 
मगवान्‌का ब्रेम प्राप्त होता है | भाग्रतरमे अनेक स्थानपर देक्ता वणेन आता है किं जो भगवानूकी मायाक्रा 
वणन करता है › वक मायाश्च पार हो जाता है । जो भगवानूके कामजयका वर्णन करता है, वङ्‌ क्रामपर 
विजय ग्राप्त करता ह । राजा परीक्षित्ने अपने प्रदरनामिं जो शङ्क की है, उनका उत्तर प्रस्नोके अनुख्प ही 
अध्याय २९ के सछोक १२ से १६ तक ओर अध्याय ३३ के ईखोक २० से ३७ तक श्रीड्किजीने दिया हे । 


उस उत्तरसे वे शङ्काए तो हट गयी क, परंतु भगवान्‌की दिव्यलीटाका रहस्य नकीं खुलने पाया, हम्भवतः ` 
उस रदस्यको गतत र्नेके व्ये द्वी ३२ अव्यायमें रासकलाप्रसङ्ग समाप्त कर दिया गया । वस्तुतः इस कीचके ^ 
गूढ रहस्यकी प्राङृत-जगतममे व्याख्या की भी नदीं जा कती; क्योकि यह इस जगतकी क्रीडा ही नह्य है | ९: 
यह तो उप॒ दिव्य आनन्दमय रसमय राज्यकी चमत्कारभयी टीला है, जिक्तके श्रवण ओर दशोनके चवि पस~ 
हंस मुनिगण मी सदा उच्कण्ठित रहते हैँ । कुछ लेग इस गील्ा-प्रघङ्गको भागवतमे क्षेपक मानते है, वे वास्तवमे ` 
दुराग्रह करते ह; क्योकि प्राचीन-से-प्राचीन प्रतिर्योमं भी यह प्रपङ्ग मिक्ता है ओर जरा विचार करके देखनेसे 
यह सर्वथा सुर्तगत भर निर्दोष प्रतीत होता है । भगवान्‌ श्रीकृष्ण कृपा करके एसी विमढ बुद्धि द, जिससे इमलोग 
इसा कुछ रहस्य समक्षनेमे समथं ह । 


मगवान्‌के इस दिव्य-गीरके वणनका यद्वी प्रयोजन है कि जीव॒ गोपियोके उस अदैतुक व्रेमका, जो | 
श्रीढृष्णको ही सुख पर्हैवानेके व्यि था, स्मरण करे नोर उसके द्वारा भगवान्‌के रसमय दिव्यीरागेकमे भतल 
के अनन्त त्रेमका अनुमव करे । हम रा्षगैकका अध्ययन करते समय किसी प्रकारकी भी शङ्का न करके इस्‌ 


भावको जगाये रखना चादिये। -दइडमानप्रसराद्‌ पोदार क | 9 


क -+ धमि अ ~= द ऋ र त ~ र 


। „ ` ९ भ्‌ १ 9 १ >, क ~ ~ग १ २८ 
9 -, + ध, छ ~. ह ध रं 
ति ~^ ` 4 र ~ क > र" 


न्मे 


एकदः देगयात्रायां माषाला जातदातुःः | 





हतं 


गावो हिरण्यं बास्ांसि मधु मध्वन्नमादताः 
ब्राह्मणेभ्यो ददुः सवे देवो नः प्रीयतामिति }; 
ऊषुः सरखतीतीरे जरं प्रार्य धृतव्रताः 


रजनीं तां महाभागा नन्दस॒नन्दकादयः | ४ ॥। 
कधिन्महानदहिस्तसिन्‌ विपिनेऽतिवुधुशितः 


यद्च्छयाऽऽगता नन्दं जयानमुरगोऽग्रसीत्‌ ॥ ५॥ 
स चुक्रोशाहिना ग्रस्तः ष्ण छृष्ण महानयम्‌ । 
सर्पो मां ग्रसते तात प्रपन्नं परिमोचय॥ ६॥ 


तस्य चाक्रन्दितं श्रुत्वा गोपालाः सहसोत्थिताः 





ग्रस्त च दृष्टा विभ्रान्ताः सप विग्यधुरुख्परुकेः ॥ ७॥ 
अलातेदंद्यमानोऽपि 


तमस्प्श्चत्‌ पदाभ्येत्य भगवान्‌ सार्वतां पतिः॥ ८ ॥ 


नायुच्चत्तमुरज्ञमः 











(| | ॥ ४ स वं भगवतं श्रीमत्प.दस्यकशहताश्ुभः। 
= ४ भेजे सपवगु्ितवा सूपं विद्याधराचितम्‌ ॥ ९॥ 
| ४ तपरप्च्छद्ध्रषीकेश्चः प्रणतं स्ुपयितम्‌ । 
- च । | दीप्यमानेन वपषा पुरुषं ॒हेममालिनम्‌ ॥१०॥ 
` ३ म  भवाच्‌ परया रक्ष्म्या रोचतेऽद्धंतदश्ंनः । 


७ तामेतां गतिं वा प्र।पितोऽवश्चः॥११॥ 


$थ जुग] 
| सर्पं उवाच 
त्‌ सुदशंन इति शं ताः 


द्याधरः काः 
॥ । २. ते श्चभदश्ंन; । ३. स्य ् 


॥ | 






र = 
~ र ह > 
९ जु वं न # पः 
1 । कन + र ५ 






द ~ "ऋक ^ „ 
च 1 " 


श्रीमद्भागवतं 








वहं उन्हनि भादरप्रवक गौर सोना, वज्ञ, मधु ओरं मधुर 


> नौ ११५ 
९ नि 
>= ˆ ~र" 
च =^ 


न्क ५ १ -9 
+ विः 4 शः 8 ॥. 


" 
4 
- 3 





॥ अ० ३४ 


षी वी)  ऋजन्कनक 
चि 





भन्न त्राहर्णोको दिये तयथा उनको चिटाया-पिलाया | 
वे केवर यह्वी चाहते थे किं इनसे देवाधिद्व भगवान्‌ 
राकर हमपर प्रतनन हों ॥ ३ ॥ उस्र दिन परम भाग्य 
वान्‌ नन्द्-सुनन्द शादि गो रने उपवास कर रक्खा था, 
इसच्यि वे छोग केव जठ पीकर रातके समय सरखती 
नदीके तटपर ही बेखटके सो गये ॥ 9 ॥ 


उस अम्बिकावनमें एक बङा मारी अजगर रद्ता था | 
उस दिन वह भूखा भी वहूत था । देषवद्य वह उधर 
दी आ निकटा ओर उक्ठने ्षोये इए नन्द जीको पकड । 
य्या ॥५॥ अजगर के पकड़ ठेनेपर नन्दरायजी चिष्ठाने 
गगे--“वेटा कृष्ण | कृष्ण | दौडो, दौडो ¦ देखो वेटा | 
तुम्हा श्चरणमे | 
|| नन्दबावा- 


यह अजगर मुघ्ये निगल रहा दहै भं 
दरं । जब्दी सुद्ये इस सक्टसे बचाओ ॥£ 


, का चिल्लाना सुनकर स्ब-के-सब गोप एकाएक उट खड़े ; 


ए ओर उन्हें अजगरके संहे देखकर घबड़ा गये । 
अव वे टुंकाव्यिं ( अधजलो टक्डियों) से उ | 

जगरक्तो मारने ट्गे|॥ ७! कितु टुकाधियो्े मारे | 
जाने ओर जठनेपर भी अजगरने नन्दबावःको रोड़ा | 
नी | इतनेमे दी भक्तवत्छल भगान्‌ श्रीकरष्णने वहो | 
प्टचकर अपने चरणोँसे-उस अजगरकरो छ दिया ॥<4॥ । 
भगवान्‌के श्रीचरणोका स्शदहोते ही अजगरके सारे ( 
अञ्युम मस्महो गये गोर वह उसी क्षण अजगरक्ा 
शरीर छोडकर विद्याधराचित सवाङ्गसुन्दर खूपवान्‌ बन 
गया ॥ ९ ॥ उक्त पुरस्पके रारीरसे दिव्य ज्योति निक 
रही थी । वह सोनेके हार पहने हए था | जव बह 
प्रणाम करनेकं बाद हाय जोडकर्‌ भगवानूके सामने 
खडा हो गया, तत्र उन्होने उत्से प्रडा-॥१०॥ (तुम 
कीन हो १ तम्दारे भङ्ग-अङ्गसे सुन्दरता प्रटी पड़ती है । 
तुम देखने बड़े भद्धत जान पडते हो | तुम्हे यहं 
अप्यन्त निन्दनीय अजगर-योनि क्यो प्राप्त दई थी १ 
अवश्य ही तमहं विवदा होकर इमे भाना पड़ा 
होगा ॥ ११ ॥ 


अजगरके दारीरस्रे निकला हमा युष बोखा-- 


भगवन्‌ । मे पहले एक विधाधर या। मेत नाम था 





* द ^ न. > 

न 1 । कष + ₹ ७ 
= # 3 * $ - 
न क 4 ॥ 


। इ 





#। 


> = चक कक. -- ~ "¬| | नः ६ 








धिया खरूपसम्श्च्या विमानेनाचरं दिश्चः ॥१२॥ । उदरान । मेरे पास सोन्द्ं तो था ही ख्दमी मी बहत यी। 


ऋषीच्‌ विरूपानङ्किएखः प्राह रूपदर्पितः । 
तैरिमां प्रापितो योनि प्ररन्पैः स्वेन पर्न ।।१ ३। 
शापो मेऽनुग्रहायेव छरस्तेः कत्णातमभिः । 
यदहं लोक्रयुदणा पद। स्प्रशे हताञ्चमः॥१४) 
तं त्वाहं भवभीतानां प्रषनानां भयापहम्‌ । 
आपृच्छे शापनिर्युक्तः पादस्पर्शादभीवहन्‌ ॥ १५५. 
प्रपन्नऽसि महायोगिन्‌ महापुरुष स्षरपते ¦ ` 
अद्लुजानीहि मां दभ शवंलोकेश्वरेधर ।॥१६॥ 
बरह्मदण्डाद्‌ विुक्तोऽहं सद्यस्तेऽच्युतदशनात्‌। 


यनाम गृह्णन्नखिलान्‌ श्रे तृनात्मानमेव च । 


सद्यः पुनाति छि भूयस्तख स्पृष्टः पदा हि ते ॥१७॥ 
इत्यनुज्ञाप्य दाराहं पत्किम्याभि्षन्य च । 


दशना दिव यादः कुच्छ्रान्नन्दश् मोचितः॥१८। 


निश्चम्य कृष्णस्य तदारमवेभवं 


व्रजोकस्षो विसितचेतसस्ततः। 


[] © 9 
समाप्य तक्षन्‌ नियमं पुनव्रज 


नुपायपुस्तत्‌ कथयन्त आताः ॥५९॥। | इए पुनः ननमे कौट आये ॥ १९॥ ` ¢ 


कदाचिदथ मोषिन्दो रामधाद्भुतविक्रमः 


इससे मे विभानपर चदकर यहं से-वर्हा धरुमता रहता 


था ॥ १२॥ एक दिन मैने अद्धिरा गोत्रके कुप ऋषिर्या- 
को देखा | अपने पीन्द्थैके धमंडसे मेने उनकी हंसी 
उड़ाथी । मेरे इष्ठ अपर।धसे कुपित होकर उन लोगनि स॒द्य 
अजगग्रोनिमे जानेका चाप दे दिया । यह मेरे पार्पोका 
ही फल था ॥ १३ ॥ उन कृपाठु ऋषि्योने अनुप्रहके 
व्ही मुञ्चे शाप दिया था; अर्योकि यह उक्ीका 
प्रभाव है कि भाज चराचरके गुर खयं आपने अपने 
चरणकमोसे मेश स्परो किया है, इससे मेरे सारे अद्म 
नष्ट हो गये ॥ १४ ॥ समस्त पार्पोक। नारा करनेवाठे 
प्रमो | जो कोग॒जन्म-मृव्युरूप संसारसे मयभीत होकर 
आपके चरर्णोकी इारण ग्रहण करते हें, उन्हे आप समस्त 
भयोसे मुक्त कर देते हँ । अवै आपके श्रीचरणेकि स्पर- 
से शपसे छुट गया रँ ओर अपने कोकमें जनिकी अनुमति 
चाहता ह्र ॥१५५॥ मक्तवत्सर | मह।योगेश्र पुरुषोत्तम 
मे आप्रकी शरणमे द्र | इन्द्रादि प्मस्त ेकेखरेकि 
परमेश्वर | खयंप्रकारा परमातमन्‌। सुस्चे आज्ञा दीज्यि। १६। 
अपने खरूपमे नित्य-निरन्तर एकरस रहनेवाले अच्युत । 
आपके दरानमात्रसे मँ ब्राह्मणक शापसे मुक्त हो गया, 
यह कोई आश्चयकी बात नहीं है; कर्पोकि जो पुरुष 
आपके नार्मोका उच्चारण करता है, वह अपने-आपको 
ओर समस्त श्रोतार्जोको भी तुरत पवित्र कर देता है। 
फिर मुञ्ञे तो भापने खयं अपने चरणकमेसे स्पशो 
किया है | तब मला, मेरी सुक्तिमिं क्या संदेह हो 
सकता है १॥१७॥ इस प्रकार सुदशेनने मगवान्‌ श्री- 
कृष्णसे विनती की, -पच्करिमा की जोर प्रणाम किया । 
फिर उनसे आज्ञा ठेकर वह अपने रोकमें चग गया ओर 
नन्दनाना इस भारी संकटसे छट गये ॥ १८ ॥ राजन्‌। 
जब व्रजवासिर्योने मगवान्‌ श्रीकृष्णका यह अद्धत (प्रमाव 
देखा, तब उन्ं बड़ा विस्मय इआ | उन रो रोगोनि ' 
कषेतरमे जो नियम े रक्ले थे, उनको पूणे करके वे बडे 

आदर ओर प्रेमसे श्रकृष्णकी उप्त लीगका गान क्रे 


$ 
>. 













ॐ (9 ^. ./ . 







; 4 > 
+: % 


ट | 
२४२ श्रीमद्भागवत [ अ० ३४ 


३ ; न 
५ ॥ि 
च क 


































। £¶ र = विजहतुवेने राज्यां सथ्य वजयोषिताभर्‌ ।(२०॥ | भगवान्‌ श्रीृष्ण ओर वचक्रामजी रात्रिक समय वनमे 
१ 1- गोपि्योके साथ विवार कर रदैथे॥ २० ॥ भगान्‌ 
उपमीयकानो लरितं द्वीजवेरथद्सौहदैः । श्रीङृष्ण निम पीताम्बर ओह बट्रामजी नीलाम्बर धारण 
कयि हइएथे। दोनोके गल्मे षररके सन्दर-घुन्दर 
हार ख्टक रहै थे तथां शरीरम अङ्धशणः; घुगन्धित 
1 र खलङकतालरिपता ञी सग्बिणौ विरजोऽम्बरो ।|२९।॥ | चन्दन का र नण 
| | 4 | २ इए थे । गोपियोँ कंडे त्रेम ओर आनन्दसे ठच्ति खरम 

¡| नशाद्चल सानयन्ताबुदितोडपतारकम्‌ । उन्हीके गुणोका मान कर रही थी ॥ २१ ॥ अमी-अभी 
सायंकाल इभ था । आकारामे तारे उग॒ आये थे ओर्‌ 
चँदनी छिट्क रही थी | वेके सुन्दर गन्धे मतवाले 
होकर भौरे इधर-उधर गुनगुना रहे थे तथा जलाद्ययमें 
६ खिरी हृं कुपुदिनीकी सुगन्ध टकर वायु मन्द्‌-मन्द्‌ चक 
जगत; सवभूतानां सनःश्रवभमङ्गलम्‌ । रही थी । उप्त समय उनका प्षम्मान करते इए भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण ओर वन्रामजीने एक ददी पस्षाथ मिक्कर 
रग क्कपा । उनका राग आरोह-अवरोह 
खरोके चद़ा्र-उतारसे बहत ही सुन्दर च्म रहा था। 
वह जगत्‌के समस्त प्राणिर्थोके मन ओर कार्नोको आनन्द्‌- 
से भर देनेवाला था ॥२२-२३॥ उनका यह गान छुनकर 
मोपिर्या मोहित हो गयीं । परीक्षित्‌ ¡ उन्हं अपने शारीर- 
की भी घुधि नहींरही कि वे उक्परसे खिप्तकते हए 
खरं भौर चोधियोंसे विखरते इए पुष्पको सम्डाठ 


संसंदद्षलमात्मानं सस्तकेशसजं ततः; ॥२४॥ | सवे ॥ २४॥ 
विन 8 जिक् समय बढराम ओर इपाम दोनों माई इस प्रका 
एवं विक्रीडतोः स्वैरं गायतोः स भ्रस॑त्तवतु । खच्छन्द विहार कर रहे थे ओर उन्त्तकी माँति गा रहे 


शह्ुचूड इति ख्यातो धनदालुचरोऽभ्षमात्‌ २५) | ये, उसी समय वहां दाष्चूड नामक एक यन्न॒ आया | 
४ वह कुबेरका अनुचर था ॥ २५ ॥ परीक्षित्‌ | दोनों 
तयोनिरीश्तो = शजं खलन्नाथं प्रमदाजनम्‌ । भाश््योके देखतै-देखते वह उन गोपिर्योको टेकर बेखटके 
‡ उत्तरकी ओर भाग चटा | जिनके एकमात्र खामी 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही है, वे गोपिर्यो डस समय रो-रोकर 
५ चिच्छने ग्गी॥ २६ ॥ दोनों भायोनि देखा कि जसे 
3 कोर डाकू गोर्भोको ट ठे जाय, वैस ही यह यक्ष हमारी 
काशन्त कृष्न रामेति त्रिलोक्य सपरिग्रहम्‌ । ्रयधिर्योको य्य जा रहा है भीर वे "हा कष्ण | हा राम |' 
त पुकार्कर रो-भीट रदी ह । उसी समय दोनों माई उसकी 
| दस्युना ना ग्रस्ता भ्रातरावन्वधादताम्‌ ॥२७॥ | बोर दौड़ पड़े ॥ २७॥ “डरो मत, डरो मतः इस प्रकार 
¶ ष्टेत्यभयाराबौ शालदस्तौ तरखिनी अमयवाणी कहते इए हाथमे शाटका शृक्ष लेकर बड़े 
द° | २. जस्त तावत्‌ प्रम | | 


= र ४.२ 


~ | 


मट्किकागन्धमत्तालि जुष्टं इुयुदवायुना ॥२२। 





तो कस्ययन्तो युगपत्‌ खरमण्डरभू्छितस्‌ ॥२३॥। 


्ोष्यद्वीतमाकर्य मूच्छिता नाविंदन्‌ सष । 


| | क्रोशन्तं कालयामास दिश्युदीच्याभशङ्क्ति १।२६॥। 












1} | 






























आसेदतुश्त तशखा त्वरितं सुद्यश्धमम्र ॥२८॥। वेगसे क्षणममी उस्न नीच यक्षके पास पंच गये ॥२८॥ 


यक्षे देखा कि काढ भौर मृ्युके मान ये दोनों भाई 
स वीक्ष्य तावलुप्राप्ौ कारमृत्य शवोद्धिलन्‌ । | मेरे पास शा पडे । तव बह मूढ़ घ॒वङ्ञा गया | उसने 


विव्य ज्ञीजनं मूढः प्रदरवजीवितेच्छयः \}२९॥ | गोपियाकरो वहीं ॐोड्‌ दिया, स्वयं प्राण्‌ वचानेके च्वि = ` 
¦ मागा ॥ २९ ॥ तव चिर्योकी रक्चा करनेके व्यि वट्राम- ` 
तमन्वधाषद्‌ भोविन्द यत्र यंत्र स शदति | जी तो वहीं खड़े रह गये, परंतु भगवान्‌ श्रीकृष्ण जकं- _ 
जक वह भागकर गया, उसके पीरे-पीछे दौड़ते गये। _ ` 

वे चाहते ये किं उसके सिरी चूडामणि निकाटटे ॥२०॥ 

कु ही दूर जानेपर भगवान्‌ने उसे पकड़ टिथा नौर 

उस दुश्कं सिरर कसकर एक ॒धूसा अमाया ओर्‌ 
चूडामणिक प्राय उसका पतिर धङ्हे अचा कर्‌ ` 
दिया ॥ ३१ ॥ इस ग्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णने शाङ्घवृडको _ । 
णहचूडं निदत्मैवं मणिमादाय भाखर | मारकर ओर वह चमकीटी मणि ठेकर खट आये तया ^= 
सन ॒गोपि्योके सामने दही उन्न वडे प्रेमे वह सणि 

अग्रजाथाददात्‌ गीत्या दरथन्तीनां च योषिताम्‌) ३२ | वड़े माई बल्रामजीको दे दी ॥ ३२ ॥ 
इति श्रीमद्वागवतै महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दश्चमस्कन्वे 
रविं शङ्खचूडवधो नाम चतुखिश्चोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ 


निरहीपुस्तच्छिशेरत्नं चसथौ र्षच्‌ द्वियो वरः \\३०) 
अधिद्र देवाभ्येत्य ॒श्लिप्स्तख्च दुरात्मनः । 


जहार अषिनेवाज्ग सहचूडामणिं विशु; ॥३१॥। 





< = ५ 
अथ पञ्चत्रिशोऽष्यायः 
युगखूगीत 4 
श्रीक उवाच भीश्चक्देवजी कहते ह- पक्ित्‌ | भगवान्‌ भ 
= _ ~ कृष्णक गोओंको चर नेके चिये प्रतिदिन वनमे चले जने- ` ` 
गोप्य; कृष्णे वनं याते तमलुहुतचेतसः । पर्‌ उनके साय गोपि्योका चित्त भी चमा जाता था | उनका 


मन श्रीङृष्णका चिन्तन करता रहता नौर वे वाणीसे 

नकी रीलाओंका गान करती रहतीं । इस्‌ प्रकार वे 

| . | बही कठिनादईसे अपना दिन बितातीं ॥ १॥ 4 

गोप्य उचुः | गोप्या पसम कद््ती-अरी सखी 1 अपने प्रेमी ` 

जनको प्रेम वितरण करनेवाठे ओर देष करनेवाखोतकको 

| मोक्ष दे देनेवाठे सयामघुन्दर नटनागर जब अपने बाय 

बामाहृतवामकपोरो बरिगतभरूरथरापितवेण्॒‌ । | कपोचको वां हवी भोर च्टका दते है ओर शपनी 

. | भी नचाते इए बोषुरीको अधरोसे च्गाते ह तथा अपनी 

् सुकुमार अंगुखिरयोको उनके छेदोपर फिरते इए म र 
 कोमलाज्रिभिराभ्ितमाग भपय है्यतिषत् न्द; तान डते १ उ६ स ग 

` ९' प्राचीन प्रति 'पूवोरध यह्‌ पाठ » यह पाठ नी है। २ बादरायपि ४६ ~ र + 


, ॥ ह >~, + ॥ न व्न्य # 
#ीं ~ 
(~ ल~, ~ = = र प्म कवे = "~; 
षकः ‡#: 4 4 ~ # » भ # 
= १ ~ ४ न 
कैः नि 


कष्णलीलाः प्रगायन्त्थो निन्युदःखेन वासरान्‌ ।१॥। 











1 
5 | ~ ् 


























अ ग "9 ५ अनिन वेनि = नषि =" च व क कक ५ "= ग "नाक ॥ "क च 


भीमद्भागवत [ ध० ३५ 


व्योमयानवनिताः सह सिद्ध | पति सिद्वगर्णोके साय विमानोंपर चढ़कर शा जाती है 

ओर उस तानको घुनकर घ्यनत द्वी चकित तया 
विस्मित हो जाती हैँ । पहठे तो उन्हे अपने पतियेकि साय 
रनेपर भी चित्तकी यह दशा देखकर र्ञ्जा माद्धम होती 
है, परतु क्षणभरमें ही उनका चित्त कामबाणसे विध जाता 








ह विंसितास्तदुपधायं सलज्जा; । 


व) 
५ समप्तवित्तः है, वे विवश्च ओर अचेत दहो जाती है । उरनं इ 

5 कमलं ययुरपस्म्रतनीन्यः ॥ २ ॥ | बातकी भी घुधि नहीं रहती कि उनकी नीवी घुल 
वि गयी है ओर उनके वस्र खिसक गये हैँ ॥ २-३ ॥ 


अरी गोपियो | त॒म यह आश्चयकरी बात चुनो । 

ये नन्दनन्दन कितने न्दर हँ | जब वे हंसते 
है तब हास्यरेखारं हारका श्प धारण कर ठेती है, 
हारहाप्त उरसि सिरविद्यत्‌ । भ्र मोती-सी चमकने चणती हैँ । जरी वीर ! उनके 
| वक्षःस्थट्पर हदते इए हारे ह।स्यकी किरर्णे चमकने 
लगती हैँ | उनके वक्षःस्थच्पर जो श्रीवत्सकी सुनहरी रेखा 
है, वह तो रेप जान पडती है, मानो स्याम मेधघपर्‌ विजी 
| ही स्थिरखूपसे वेड गयी है | वे जव दुखीजनोको सुख 
नर्मदो यहिं ईजितेणुः ॥ ४ ॥ | देनेके च्यि, विरदि्थोके गृतक शरीरम प्राणका संचार 

| करनेके य्यि बोँघुरी बजाते दै, तव व्रजके च्चुंड-के-ह्युड 

र बैट, गौं ओर हरिन उनके पास ही दौड भते है| 
इन्द्शो वरजघषा मृगगावो केवट अति ही नह, सखी ! दतोसे चाण इआ 
घासका ग्रास उनके मुहमें ज्यों-का््यो पड़ा रह जाता 
है, वे उसे न निगल पाते ओर नतो उगढ ही पाते है| 
दोनों कान खड़े करके इस प्रकार श्िरभावसे खड़े हो 
| जाते ै, मानो सो गये है, या केवर भीतपर लिखि हए 
दन्तद्ष्टक्वला धृतकणां चित्र ह | उनकी रेकी दशा शेना खामािक दही दहै, 

६ क्योकि यद ॒ रबोसुरीकी तान उनके चित्तको चुरा 


निद्रिता छिखितचित्रमिवासन्‌ ॥ ५॥ लेती है ॥ ४-५ ॥ 
इ | पएलाचै- हे सखि | जव वे नन्दको टखाड़के कडि अपने सिरपर 


मोरपंखका सुकुट बाध ठेते है, घुषराखी अरकोमें कखे 
` व गुच्छे खों ठेते दै, रंगीन धातुओंसे अपना अङ्ग- 
 रद्धमर्लपरिबर्हविडम्बः | अङ्ग रग ठेते है ओर नये-नये पर्त्रोसि रेसा वेष सजा 
न ~~ लेते हैँ, जेते कोई बडत वड़ा पदल्वान हो ओर फिर 


हन्त॒ चित्रमबलाः शृणुतेदं 


नन्दद्लचरयमातंजनानां 


वैणवाद्यहतचेतस आरात्‌ । 


23 - । = गोप बल्यमजी तथा ग्वायनाकेकि साय नसुरीमें गो्ओंका 
कर्िंचित्‌ सबल आलि स गोपै नाम छे-लेकर उन घुकाते है, उस समय प्यारी सखियो ! 
1 नदिर्योकी गति भी रुक जाती है। वे चाहती है वि 

& ॥ | वायु उड़ाकर हमारे प्रियतमके चरर्णोकी. धूलि हमार 


1 द कण कि ति 


ऋ जक कको चः के । ऋते = ऋक 


न्न 


























तिं भश्रगतवः शशि वें पास पर्चा दे ओर्‌ उसे पाकर हम निहदाब्हो ज्य, 1 
| प्रतु सियो ! वे भी हमरेदी-जैषी मन्दभागिनी ईहै। ^ 

जसे नन्दनन्दन श्रीकृग्णका आचिङ्गन क्रते समय हमारी _ 
भुजा कोप जाती & ओर जइताखूप सच्चारीभावका 
उदथ हो जानेसे हम अपने इ्ा्थोको हिद भी नहीं 


तत्पदःम्बुजरनःऽनिलनीतम्‌ । 


सथृहयतीनयभिवाव्‌ हयुण्य। - पाती, वेसे ही वे भी व्रेमके दारण कोपने खाती &। 
दो-चार्‌ वार अपनी तरङ्गख्य मुजार्ओको कोँपते-कौपति 
नि उठाती तो भवस्य है, परंतु फिर विवय होकर स्थिर हो । 
४. ९५ जाती है, प्रेभावेशसे स्तम्भित हो जाती हैँ ॥ ६-७ ॥ 
अटुचरैः समदबणितदी्यं अरी वीर ! जसे देवता लेग अनन्त ओर अचिन्त्य 
देश्र्यकरि खामी भगवान्‌ नारायणकी राक्तिर्योका गान 
श्रदिषूव दवाचरुभूपतिः । क्रते है, वसे ही ग्वाल! अनन्तघुन्दर नटनागर । 
श्रीकृष्णकी लीटार्जक्रा गान कसते रहते ह | वे अचिन्व्य- 
वनचरो भनिश्िटेदु चरन्ती । रेश्वरय-सम्पनन श्रीकरष्य जत्र ॒दृन्दावनमे विद्वा करते 4 


च | २इते है ओर बोँघुरी बजाकर गिरिरिज गोवर्धनकी तरा 
(< चरती इई गौ्ओंको नाम ले-रेकर पुकारते है, उस मय 
धनके दृक्ष ओर्‌ व्तारं छ ओर फलोसे व्द जाती दैः 


नरत्वं अआत्सनि विष्णु व्यं 
नऊत^्रन  =1+5 < उनके भारसे र्या छ्ककर धरती छ्रुने व्गती है! 


व्यञ्चथन्स्य इवं ईष्पणूराद्याः । मानो प्रणाम कर द्री हय, वे इक्ष ओर कतार्‌ अपने `: 
| भीतर भगवान्‌ विष्णुकी अभिन्यक्ति सूचित करती 
म्रमतभाश्विदषा यष्ुधारः इई सी प्रेसे पर उब्वी हैँ, उनका रोम-रोम खिल 
6 जाता है ओर सन्‌-की-सव मधुधाराएं उडेख्ने व्गती 
प्रमहटतनवः सदेः स ॥९॥ | ह| ८२ ॥ | 
द्श्चनीयतिलं छ दन धः अरी सखी ! जितनी भी वस्तृए संसारमें या उदके >= ` 


बाहर देखनेयोग्य ह उनमें सबसे सुन्दर, सवसे मधुरः, ` ` 

; सवदे रिरोषणि दहै--ये हमारे मनमोहन । उनके 
सवे नाटपर्‌ केपतस्की खौर कितनी फएबती है--बसः ` 
देखती ही जाभो ! गले घुटनोतकः ल्टकती इई वन- ` 


दिव्यभन्धतुखसी्धुसतैः | 












अङिड्रेरछयुभीतमभीष्ट- | माच, उसमे पिरथी इई तुकसीकी दिव्य गन्ध ओर 

मधुर मधुसे मतवाजे होकर छंड-के-दंड भौरे बडे मनोहर 

~ = # एवं उच खलरसे जार करते रइते है । हमारे नटनागर 
`" माद्विथन्‌ यर्हि सन्थितवे 1 गव 
अ ष । | पलक््‌ ण्‌ १ पिना बहरा स्कन्‌ 
श्सि सारसहशविहङ्ग- | उस ¦ समय पय प स॒सुनिजनमोहन 






च 9 ४५ 


(च सगीतको ५५११ &४ ° ४९ ६1९ { १ | ५ सह < ७1९१ 
नइ र -3 29 ए + अत्त उनः ण ह्‌ ४.६ 1 न 
धारूगोतहूतचेतस एत्य्‌ | । उनम हायसे निकल जाता द, छिन 


= $ ॥ ॐ + 
ष ईन रद च् 


























२३४६ | श्रीमद्भागवत [ अ० ३५ 


------------------------- [वि त) 


 हर्थुषास्त ते यतचित्त 












जाता ह । वे व्रि्दय होकर प्यारे इ्यामघुन्दरफरे पाक्त आ 
बैठते हँ तथा अं मूद, चुपचाप चित्त एकाग्र करे 
उनकी आराधना करने कगते है-- मानो कोई पिहङ्गम- 
बृत्तिके रसिक परमहस ही हो, भना कहो तो यह किंतने 
भाश्चयकी बात है ! ॥ १०-११ ॥ 

अरी त्रजदेव्रियो | हमारे इ्यामसुन्दर अव पुष्पके 
कुण्डल वनाकर अपने कानमे धारण कर ठेते हँ ओर्‌ 
बलरामजीके साथ गिरिाजके क्िखरोपर खड़े होकर्‌ 
पारे जगत्को हर्धित करते हए सुरी बजाने गते 
है- बुरी क्या बजाते है, भानन्दमे भरकर उप्तकी 
ध्वनिके द्वारा सारे विश्वका आलिङ्गन करने कते है-- 
उस प्तमय द्याम मेघ वपुरीकी तानके साथ मन्द-मन्द 
गरजने च्गणता है । उसके चित्तम इस वातकी शङ्का 
बनी रहती है कि कहीं मँ जोरसे गजना कर उट अर 
वह कहीं बँघुरीकी तानके विपरीत पड़ जाय, उसमें 
बेुरापन ठे आये, तो सुक्षसे महात्मा श्रीकृष्णका अपराध 
ह्यो जायगा । सखी ! वह॒ इतना दी नहीं करता; वह 
जब देखता है कि हमारे सखा घनदयाभको घाम च्म रहा 
है, तच वह उनके ऊपर आकर छया कर ठेता है, 
उनका छत्र बन जाता है । अरौ वीर्‌ | वह तो प्रपतन 
होकर बड़ प्रेमसे उनके ऊपर अपना जीवन ही निव 
कर देता है- नन्डी नन्दी फुहियकि रूपमे रेसा बरसने 
लगता है, मानो दिव्य पुष्पाक वर्षा कर रहा ह। । कमी- 
कभी बादलकी ओटमें छिपिकर देधतालेग मी पुष्पवर्षा 
कर जाया करते है ॥ १२-१२ ॥ 

सतीरिरोमणि यदोदाजी । तुम्हारे सुन्दर कुंबर 
गवाल्वारोके साथ खेर खेर्नेमे बड निपुण है | रानीजी । 
तुम्हारे गाइले खर सवके प्यारे तो हही, चतुर भी 
बहुत है । देखो, उन्होने बोरी बजाना किंसीसे सीखा 
नदन | अपने ही अनेको प्रकारकी राग-रागिनिरया उन्होने 
निकाल खीं | जब बे अपने निम्बा-फल्सद्रा सरूलाल 
अधरोपट बुरी रखकर ऋषभ, निषाद आदि लोकी अनेक 
जातिया बजाने च्गते है, उक्त स्मय वंशीकी परम मोहिनी 
जीर नयी तान सुनकर ब्रह्मा; शंकर ओर इन्द्र आदि 
बड-बडे देवता भी--जो सर्वज्ञ ह - उपे नहीं पहचान 








हन्त॒ मीरितद्शो धरतमीनाः ॥१९१॥ 
सत ; सखगवतंसविरासः 
` क्षायुषु शितिभरतो वजदेन्यः। 
हषथन्‌ यदहिं वेणुरवेण 
जातहपं उपरम्भति विश्वम्‌ ॥१२॥ 
| । ु महद तिक्रमणशङ्कितचेता 
मन्दुमन्दमयुगर्जति मेघः । 
सुददमभ्यवपंत्‌ सुमनोभि- 
इछायया च विदधत्‌ प्रतपत्रम्‌ ॥१३॥ 
` विविधगोपचरणेषु विदग्धो 


वेणुवाद्य उरुधा निजशिष्षाः | 


~ 
च 


त्र सुतः सति यदाधरविम्ब 








६2 ४ ८), 
` दत्तवेणुरनयत्‌ खरजातीः॥१४॥ 


द 


पवनदास्तदुपधायं सुरेशाः 


_ © 
(~ 1-11-1 ॥ [:} ४९॥' 






| | पाति। वे इतने मोहित हो जाते दै किं उनका चित्त. 


नच 
क 





+= 
~~ 

॥# 
क 


अ० ३५ ] 


= = ए द । 


कवय आनतक्न्धरचित्ताः 


करप ययुरनििततखाः ॥ १९५ 


निजपदाजदरेष्वंनवज- 
नीरजाङ्कशि चित्रललामेः | 
व्रनखुवः 


शमयन्‌ युर्तोदं 


वष्मेधुयंगतिरीस्तिवेणुः ॥१६॥ 


व्रजति तेन बयं सिरास 


वीक्षणापिंतमनोभववेणाः 


कुजगणतिं गमिता न षिदामः 


कमलेन कवरं वक्नं वा | 


मणिधरः क्चिदगणयन्‌ गा 


मालया द्‌ यितगन्धत॒ङ्खयाः । 
कसे 


शजममाग्रत 


प्रणयिनोऽनुचरसख 


प्रक्षिपन्‌ य॒त्र ॥१८॥ 


कणितवेणुरवदशितचित्ताः 


करष्णमन्धसत कृष्णगृहिण्यः । 


गुणगणाणंमलुगत्य दहरिण्यो 


गोपिका उ वषि्युक्तगरहाशाः ।१९॥ 


कुन्ददामदरवकोतुकवेषो 


गोपगोधनव्रतो 


॥ 


यमुनायाम्‌ । 





दृ्ञम्‌ स्कन्ध 


1 कााायााणयााययमाोमाोााााााि ययन ्नान ग 


३४७ 





"~~ ~~~ 





भिक ति जो कि कः = = 


तो उनके रोकनेपर भी उनके, ह।यसे निकट्कर वंशी- 
घ्वनिमें तद्वीन हयो ही जाता है, धिर भी हुक जाता है, 
ओर वे अपनो सुध-वुध खोकर उसी तन्मय हो जाते 
है ॥ १४-१५ ॥ 

अरी वीर्‌ | उनके चरणकमलमें ष्वजा, वन्न, कमर, 
अङकटा आदिके विचित्र ओर खुन्दर-युन्दर चिह द । 
जव व्रजभूमि गौओके घुरसे खुद जाती है, तब वे 
अपने सुकुमार चरणोसे उसकी पीडा मिटाते इए गज- 
राजके समान मन्दगतिसे आते है ओर वोँसुरी भी बजाते 
रहते ई | उनकी व वंसीध्वनि, उनकी वह चाक ओर 
उनकी वह ॒विव्ासमरी चितवन हमारे हृदयमें व्रेमकरे. 


मिल्नकी आकाक्षाका आवेग बढ़ा देती है | हम उप्त. 


समय इतनी मुग्ध, इतनी मोहित हो जाती हँ कि दिल 
डोरुतक नहीं सकतीं, मानो हम जड वृक्ष हो ! इमे तो 
इस बातका भी पता नदीं चलता किं हमारा जड़ा खुल 
गया है या र्वधा है, हमारे शरीरपरका वचन उतर गया है 
या है ॥ १६-१७ ॥ 


अरी वीर ! उनके गलेमें मणिर्योकी माखा वहत ही 
भली माड्कम होती है । तठीकी मधुर गन्ध उन्दं बहत 
प्यारी है, इीसे तुलक्षीकी मारको तो वे कभी छोड़ते 
ही नही, सदा धारण क्रिये रहते हे । जव वे स्यामघुन्दर 
उस मणिशरकी मागसे गौओंकी गिनती करते-करते किसी 
प्रेमी सखाके गलेमें वोह डाल देते है ओर भाव वता- 
बताकर बुरी वजाते इए गाने टगते है, उस्‌ समय 
बजती इई उस बोँघुरीके मधुर स्वरसे मोहित होकर 
कृष्णसार मूर्गोकी पत्नी हरिनिर्यौँ भी अपना चित्त उनके 
चरणोपर निछावर कर देती हैँ ओर ञेसे हम गोप्यो 
अपने धर-गृहश्यीकी आ्ा-अभमिलकाषा छोडकर गुणक्षागर 
नागर नन्दनन्दनको घेरे रहती हैँ, वैसे ही वे भी उनके 
पास दौड आती हैँ ओर वहीं एकट क देखती इई खडी 
रह जाती है, लोटनेका नाम भी नहीं ठेतीं ॥१८-१९॥ 

नन्दरानी यश्लोदाजी ! वास्तवमें तुम बड़ी पुण्यवती 


हो | तभी तो तुम्हे एेसे पुत्र भिठे है । तुम्हारे वे. 


ल्ाडले लठ बडे प्रेमी है उनका चित्त बडा कोमल 


है 1 वे प्रेमी सखाओंको तरह-तरदसे हास्‌-परिदासके | 


1 (ट) 
= # {॥ 8 | 





२३४८ 


7 0 १ त या शा "य १ क ोकिकयोयककय 





| गीतवेणुरयनेडितष्ीतिः 


उत्छवं भरमरूदापि द्रीना- 











खन्नयन्‌ रुररजश्छरितखश । 


दिर्येति उदाश्चिष श्प 
 देवश्चैजटरभुर्डरजः ।॥२३॥ 
मदतिधुकितरोचन ईैपम- 


4 ~ णनदः खसुृदां बनमाली) 


रदुगण्डं 


मै = हि 


रौ 
= 
च 


> = < 
# 
क ~ श कत र + ~ 
द न क ५ 
॥ 31 ३ [न च. 
4 > ऋ र ~ ए | न ति 
= क ~ ~ क भ भिः 
ॐ न्क 7 3 [9 जि ऋ) 0 
क = ह ' ५ च $ङ्ष्डट ह ह्म्य । 
[हि ~ ४ च. च्छन्‌ श ह 
4५ ~> 9 व, 
ने > - ~~ क > 
म > रि = = च; # ह 
„८, 
) ॐ 





क 


र र -3 न 


॥। ॥] ने 
९ प +त 
० कट + + के. ~ 
च ३ 73 [ह्, ~| ४, र + # 
॥ ऋ; ॥। । 4 ॥ * 
 * {५ = ि ~. 7 
# > | + १ नः 
क +^ 


क + 






भीमंद्भागचेत 





नन्दघदुरनषे तव॒ पत्सों 
लमंद;ः प्रणिन अिजहार २० 
मन्द्वाडुख्पवाप्ययु ङक 
मानयत्‌ मलयंस्प्चेन । 
दन्दिनस्तद्ुषदेवममा ये 
काद्यमीतदकिभिः एर्यिघ्रः ॥२१॥ 
वत्छखो वजगदं यदगध्री 
वन्मान्दरणः पथि शद्धः; 
छःस्न एोधनह्वषेह्य  दिरान्ते 


 अ० ३५ 


चकः न~~ ~~~ ------------------------------------------ 
गकि ` 71 
ऋज जः जायाः भ क 5 भ [3 


दारा संख पट॑चाते है ! ढुन्दकटीका हार पहनकर जब 
वे अनेको विचित्र वेधे सजा ठेते दँ ओर वाक्बाढ 
तश्रा गोभोके साय यज्नाजीदे तटपर्‌ खेलने क्गते &ै, 
उस समथ मब्यज चन्दनके समान सीतठ ओर 
एुगन्धित स्यसे मन्द्मन्द अनुकूढ वहकर्‌ वायु 
त॒म्दारे लख्की सेवा करती है ओर गन्धर्बं आदि 
उपदेवता वदीजनोकि समान गा-वजाकर उन्हे संतुष्ट 
करते हँ तथा अनेकों प्रकारकी सेट देते इए श्चव भोर 
धेरफर उनकी सेवा करते हैँ ॥ २०-२१ ॥ 








[# (4) 


अरी क्षखी ! द्यामघुन्दर त्रजकी गदे वड़ा प्रेम 
करते हैँ । दीनि तो उन्दने गोवर्धन धारण किया 
धा अवते सव्र गीर्भको डौटाकर अते ही दहेगि; 
देखो, सायंकाट हो च्छा है | तव इतनी. देर क्यो 
होती है सखी ? रास्तेमे वहे.वडे परल्ला आदि बयेोद्द्ध 
सौरं शंकर आदि ज्ञानवृद्ध उनके चरणों शी बन्दना जो 
कने छते हँ । अ गोके पीछे-पीछे वँुरी वजाते 
हए वे आते ही हमि | वाठ्वाट उनकी कीरतिका 
गान कर्‌ रहै होगे | देखो न, यह क्या ॐ रहे &। 
गोोके खुरोसे उड-उड़कर वडत-सी धृट वनमाव्पर 
पड़ गथी है । वे दिनभर जगदे धूमते-घूमते यक 
गये ह ¡ फिर भी अधनी इस ओोभासे हमारी ओंखोँको 
कितना सुख, कितना आनन्द देरहे है| देखो, ये 
यशोदाकी कोख प्रकट इए सबको आह्वादित करने- 
वाके चन्द्रमा हम प्रेमी जर्नोकी भलरके न्ये, हमारी 
शा-अभिलपा्ओको पूणे करनेके व्यि ही हमारे पास 
चे आ रष दै ॥ २२-२३ ॥ 

सखी ! देखे कैषा सौन्द्यं है ! मदमरी ओँ 
कुछ चटी इई है ! कुकु खाई व्यि दए कैसी 
भली जान पडती हैँ । गचन वनमाछा ल्हरा री है १ 
सोनेके इुण्डलोकी कान्तिसे बे भपने कोमरु कपोर्लोको 
अक्कृत कर रहै है । इकषीसे मँहपर ` अवपके वेरके 
समान ङुछ पील[पन जान पड़ता है ओर रोम-रोमसे 
विशेष करके सुखकमक्से प्रसन्नता श्री पडती है । ` 
देखो, अब वे अपने सखा ग्वावत्रा्छोका सम्मान करके 


हि 3 
णी णभ नीक 71 


मिम 








| 
। 





(त [1 [1 0 ता अ । रि 


गोपिकागीतं नाम । ३. बादरायणिख्वाच ] ४. सवि° । ५. श्शम्‌ । ॥ 


अ० ३६ ] 


[मो ड * 
भ जज जः ग ॐ आः आदः = काना ज्यः जः 


दशम स्कन्ध | १४९ 











उरन्हे विदा कर रहे है । देखो, देखो सखी ! त्रज- 
विमूषण श्रीकृष्ण गजराजके समान मदभरी चाग्से 
इस संध्या वेमे हमा ओर आ रहे ई | अब 
वरजे रहनेगादडी मौका, हभखोगोका दिनभर्का 
अस्द्य॒विरह्-ताप मिटनेके ल्ि उदित दहोनेवाठे 
चन्द्रमाकी मति ये हमारे प्यारे इ्यामघ्ुन्दर समीप 
चटे आ रहे हँ ॥ २४-२५ ॥ 
श्ीञयुकदेवजी कहते ह-परीक्ित्‌ ! बड़भागिनी 
गोपि्योका मन श्रीकृष्णमें ही ख्गा रहताथां } वे 
्रीकरष्णमय हो गयी वीं | जव भगवान्‌ श्रीज्नष्ण दिने 
गोओंको चरानेके ल्य वनमें चङे जते, तव वे उन्दीका 
चिन्तन करती रहती ओर अपनी-अपनी स्खियेकि साथ 
अखा-अल्मण उन्हीवी लीगर्ओका गान करके उक्षीमे 
पिरेऽदहःसु तन्विचतास्तन्भनस्कछा महेदयाः | २६।} | रम जातीं । इस प्रकार उनके दिन बीत जाते ॥ २६॥ 
<==~€५ॐ~-=-- - 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्कन्े प्रवरे 
वन्दावनक्रौडायां गोपिकायुगव्गीतं नाम 
पश्चत्रिरोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ 





यदुपतेद्रिरदराजशिहारो 
यभिनीपरिखिष दिनन्ते । 
ुदितवर्त्र उपयाति दुरन्तं 


मोचयन्‌ वरजगवां दिनतापम््‌ | २५९] 


| 
श्रीर्युक उवाच 


एवं वजचियो राजस्‌ छष्बलीलः खु मायतीः 1 





१.7 





णै 


अथ षरुत्रिरोऽष्यायः 
अरिष्टास्ुरका उद्धार ओर कंसका भीथक्रूरजीक्ो चअस भेजना 
श्रीक उवाच भरीुकदेशजी क्ते है--परीक्षित्‌ | जिस समय 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण त्रजमें प्रे कर रहे ये ओर वहं 
भआनन्दोत्सतरकी धूम मची इई थी, उसी समय 
अरिष्टासुर नामका एक दैत्य वेका ख्प धारण करके 
आया । उसका ककुद्‌ ( कचेका पुद्धा) या थु । 
ओर डील-डौरु दोना ही बहत वडे-कडे ये । वह अपने 
घुरोको इतने जोरसे पटक रहा थाङ्कि उसे धरती 
करप रही थी ॥१॥ वह बडे जोरसे ग्जरह्याथा 
ओर पैसे धूर उछाल्ता जाता था । परख खडीक्यि 
हए था ओर सींगोंसे चहारदीवारी, खेर्तोकी मेड आदि ` 
तोडता जाता था ॥ २ ॥ बीच-बीचमे बार-बार मूतता 





अथ त्यागतो गोष्ठमश्डि व्रवभाष्वुरः | ` 


सही सहादङ्स्कायः कस्पयन्‌ खुरविशताप्‌ ॥ १॥ 
रम्भमाणः खरतरं पदा च षिङिखन्‌ मदीष्‌ । 
उद्य पुच्छं प्राणि षिषाणाग्रेण चोद्धरन्‌ 1 २॥। 


कषिथिर्‌ किथ्चिच्छकरन्धश्वन्‌ मूत्रयन्‌ स्तन्धरोचनः। 


ओर गोबर छोडता जाता था । ओं फाडकर इधर- ` & 
यस्य निर्हदितेनाङ्ग निष्टुरेण गां नृणाम्‌ ॥ २॥ । उधर दोड रहा था । परीक्षित्‌ । उसके जोरसे 
१. प्रचीन प्रति श्रीश्च उवाच से केकर “` “` महोदयाः । तक्का पाठ मूलम नदीं हे । २. इन्दाबनक्रीडायां 


' ~ 


अ. 
८. द कन क ॐ 





+ ॐ #, हु 
१ क + + + गकु = क "4. 


३५० श्रीमद्भागवत [ अ० ३ 





॥ ~= ~ ~ = न 


हेकडनेसे-- निष्टुर गजंनासे भयवदा लियो ओर मौओंके 
तीन-चार महीनेके गभ स्रवित हो जते ये ओर पँच- 
छः महीनेके गिर जाते थे | ओर तो क्या करट, उप्तके 
कठुदूको पवत समञ्ञकर वाद उत्तपर आकर ठहर 
जाते थे ॥ ३- ॥ परीक्षित्‌ ! उस तीखे सीगवाले 
बेल्को देखकर गोपि्याँ ओर गोप समी भयभीत हो 
गये । पञ्च॒ तो इतने डर्‌ गये कि अपने रहनेका स्थान 
छोडकर भाग दही गये ॥ ५ ॥ उस समय समी व्रजवासी 
श्रीकृष्ण | श्रीकृष्ण ! हमें इस्त मयसे बचाओ इस 
प्रकार पुकारते इए भगवान्‌ श्रीकृष्णकी शरणमे आये । 
भगवान्‌ने देखा किं हमारा गोकु भव्यन्त भयातुर हो 
रहा है ॥ & ॥ तब उन्होने (डरनेकी कोई बात नही 
है यह कहकर सवको टाद्स धाया ओर फिर 
वृपाञुरको ल्ल्कारा, अरे मूं ! महदुष्ट ! तू इन 
गोओं ओर ्वाठोको क्यों डरारहा है? इष्से क्या 
होगा ॥ ७ ॥ देख, तुङ्ञ-जैसे दुरात्मा दुष्टोके वल्का 
घमंड चूर-चूर कर देनेवाला यह मेँ द्र । इस प्रकार 
ढलकारकर भगवान्‌ने ताल टोंकी ओर उसे क्रोधित 
करनेके ल्य वे अपने एक सखाके गल्मम वहि डाल्कर 
खड़े हो गये । भगवान्‌ श्रीकृष्णकी इस चुनौतीसे वह 
क्रोधके मारे तिलमिला उठा ओर अपने खुरोँसे बड़े 
जोरसे धरती खोदता हआ श्रीकृष्णकी ओर ज्ञपट। । 
उस समय उसकी उठायी इइं एके धक्केसे आकाराके 
तितर-बितर होने गे ॥ ८-९ ॥ उपने अपने 
तीखे सींग आगे कर च्ि | ल्-गल ओंखोंसे टकटकी 
लगाकर श्रीकृष्णकी ओर टेढ़ी नजरसे देखता हआ वह 
उनप१ इतने वेगसे द्रूटा; मानो इन्द्रके हाथसे छोड़ा 
हआ वन्न हो ॥ १० ॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णे अपने दोनों 
हाथाँसे उसके दोनों सींग पकड़ व्यि ओर जंसे एक 
हाथी अपनेसे भिइनेवाठे दूसरे ह्ाधीकरो पीछे हटा 
देता है, वैसे ही उन्होने उसे अघारह पग पीके टेर कर 
गिरा दिया ॥ ११॥ भगवानूक्ते इस प्रकार टेल 
देनेपर बह फिर तुरत ही उठ खडा इभा ओर क्रोधसे 
सोऽपविद्धो भगवता पृनरुत्थाय सत्वरः । अचेत होकर छ्बी-ढंवी ससि छोडता जा फिर उनपर्‌ 

ञ्ञपटा । उस समय उक्तका सारा रारीर पसीनेसे 


ह आपतत्‌ खिन्नसर्वाज्गो निःशसन्‌ करोधमूचितः।। १२ | क्थपथ हो रा था ॥ १२ ॥ _मगवान्‌ले जब देखा 


त र ज नमः । २. इव्‌ रानन्‌ संत्यज्य निजगोङलम्‌ । ३. नय । ४" विहम्‌ । ५ माचीन मतिम 
4. (4 


५ ~ 5 
। ६४ 










पतन्त्यकारतों गर्भाः स्तवन्त वः भयेन वे । 
निविशन्ति घना यख कञयचरशङ्या ॥ ४ ॥ 
त तीक्ष्णशरङ्गयुद्रीक्ष्य गोप्यो गोपाश्च तत्रसुः 
पशवो दुदधुभींता राजन्‌ संत्यज्य गोडलम्‌ ॥ ५॥ 
कृष्ण छृष्णेति ते स्वे गोविन्दं सरणं ययुः । 
भगवानपि तद्‌ वीक्ष्य गोरं भयर्विह्तम्‌ ॥ & ॥ 
मा भेष्टेति गिराऽऽश्वाख इषासुरणुपाहयत्‌ । 
गोपालैः पडयुभिर्मन्द त्रासितेः किमसत्तम ॥ ७॥ 
बलदपंहाहं दृष्टानां खदिधानां दुरात्मनाम्‌ । 
इत्यास्फोव्याच्युतोऽरिष्टं तलशब्देन कोपयन्‌ ८ ॥ 
सख्युरंसे यूजाभोगं प्रसायाबसितो हरिः । 
सोऽप्येवं कोपितोऽरिषटः खुरेणावनिथुद्धिखन्‌।। ९ ॥ 















उद्यत्पुच्छश्नरमन्मेधः कृद्धः कृष्णयुपाद्रवत्‌ । 
अग्रन्यस्तविषाणाग्रः सन्धाचग्छोचनोऽच्युतम्‌ । 
कटाधिष्याद्रवत्ूणं मिन्द्रशक्तोऽशनियंथा ॥१०॥ 
गृहीत्वा शृङ्खयोस्तं वा अष्टादज्ञ पदानि सः । 


ग्रत्यपोवाह भगवान्‌ गजः प्रतिगजं यथा ॥११॥ 










अ० ३६ | 





| कडा क चा जके 
डक ~~ [2 त 0 


तमापतन्तं स निगद्य गृङ्घयोः 
पदा समाक्रम्य निपात्य भूतले 
रिष्पीडयामास्ष  यथाऽऽद्रेमम्बरं 
छरा विवाणेन जघान सोऽपतत्‌ ।१३।। 
अलुग्‌ वमन्‌ सूत्रशक्रत्‌ समुत्सृजन्‌ 
किप पादाननवस्यितेक्षणः । 
जगाम कृच्छ्रं निच्छेतेरथ क्षयं 
पुष्पैः किरन्तौ हरिभीडिरे सुरा; ।१४॥। 
एवं कड्कद्‌ पिन हस्या स्तूयमानः खजातिभिः। 
षिदैश गोष्ठं स्वरो गोपीनां नयनोत्सवः ।॥ १५ 
अरिष्टे निहते देत्ये टछष्णेनाद्ुतकमणा \ 
दःसायाथाह भगवान्‌ नारदो देवदश्चेनः ॥१६॥ 
यदोद।यः;युतां कन्यां देदक्याः कृष्णमेव च । 
रामं च रोहिगीपुत्रं वसुदेवेन बिभ्यता ॥१७ 
न्यस्तो खमिन नन्दे बे याभ्यां ते पुरा हताः । 
निशम्य तद्‌ भाजपतिः कोपात्‌ प्रचरितेन्द्रियः। १८ 


निक्लादमसिणदत्त वसुदेव जिघांसया । 


निवारितो नारदेन तत्सुतो भरत्युमार्मनः ।१९॥ 
ज्ञात्वा लोहमयैः पाशवबन्ध सह भायंया । 
प्रतियाते तु देवर्पौ‡कंस आभाष्य केशिनम्‌ ॥२०॥ 
्रषयामास हन्येतां भवता रामकेशवौ । 


ततो मिकचाणूरशरतोकलकादिकान्‌ 11२१।) । बल्साम भौर ृष्णको मार डालो । बह चखा गया 1 इसके बाद 


१. ममाधवो । 


दशम सन्ध 


२५१ 





कि बह अव सुञ्चपर प्रहार करना दी चाहता है, तव उर्हहोनि 
उसके सीग पकड़ व्ये ओर्‌ उसे खात मारकर जमीनपर 
गिरा दिया ओर फिर वैरोसे दवाकर इस प्रकार उसका 
कचूमर्‌ निकाला, जैसे कोई गीला कपड़ा निचोड़ रहा 
हो । इसके वाद उसीका सींग उखाड़कर उसको खव 
पीटा निस्ते वह पड़ा ही रह गया ॥१३॥ परीक्षित्‌ । 
इस प्रकार वह देव्य सँहसे खून उगक्ता ओर गोवर-मूत 
करता इअ पैट पट्कने गा | उस्तकी ओं उलट 
गयीं ओर उसने बडे क्के पाथ प्राण छडे। अब 
देवतालोग भगवान्‌पर श्र बरसा-बरसाकर उनकी स्तुतिं 
करने रगे || १४ | जव भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस रकार 
बैरके रूपमे आनेश्राे अरििपुरको मार डाखा, त सभी 
गोप उनकी प्ररासा करने लगे । उन्होने वज्यामजीके 
साथ गोष्रमे प्रवेद किया ओर उन्हें देख-देखकर गोपियोके 
नयन-मन आनन्दसे भर गये ॥ १५ ॥ 


परीक्षित्‌ ! भगवान्‌की टीका अत्यन्त अद्भत है । 
इधर जब्र उन्होने अरिाघ्ुरको मार डाला, तेव भगवन्मय 
नारद, जो गोगोको शीत्र-ते.शीत्र मगवान्‌का दशन 
कराते रहते है कक्षके पस पर्हैचे । उन्होने उससे 
कह[(-। १६] “कं ! जो कन्या तुम्हरे हाथसे छरटकर 
आकाशमे चटी गयी, वह तो यदोद्‌ाकी पुत्री थी ओर 
वरजम जो श्रीकृष्ण है वे देवकीके पुत्र हैँ | वहा जो 
बलरामजी हैँ, बे रोहिणीके पुत्र हैँ | षसुदेवने तुमसे 
डरकर अपने भित्र नन्दके पास उन दोर्नोको रख दिय। 
है | उन्होने दी तम्हारे अनुचर दैव्योका वध किया 
है | यह वात सुनते ही कसकी एक-एक इन्द्रिय क्रोधवे 
मारे कोप उदी ॥ १७-१८ ॥ उसने वघ्ुदेवजीको मार 
डागनेवे च्वि तुरंत तीखी तच्वार उठा खी, परंतु नारदजीने 
रोक दिया । जब कसको यह माद्धम ह्यो गया किं वघुदेव- 
के ल्ड्के ही हमारी मृष्युके कारण है, तन उसने देवकी 
जीर वसुदेव दोनो दी पति-पत्नीको हथकडी ओर बेडीसे 
जकड़कर फिर जेते डा दिया । जब द्वि नारद चङेगये 
तब कंसने केरीको बुलाया ओर कहा--^तुम त्रजमें जाकर 



































॥ 
द + # छ ` 4 हके चके 
1 " नै 
4 र $ # ५ । | = 
यं इ) व \ 
ी ॥ < २ 
) नि र प 
च # * ॥ 
61 


मच्छ नन्द्वनं तत्र, इतावानकटुनदुभेः 





कीः चि कीः ऋ = 


अमात्यान्‌ हसिपाश्वैव समाहूय।ह भोजरा्‌ । 
भो भो निश्म्यतासेतद्‌ वौश्चाणूरषु्टिको ॥२२।। 
नन्दव्रज श्चिलासाते इुतवानकदुन्दुमेः । 
रामह्कष्णो ततो महयं मृत्युः किल निद्रितः ।२२॥ 





भवद्भ्यामिह सभ््राप्तो हन्येतां मह्टरीलयाः। 
माः क्रियन्तां विविधा मह रङ्गपरिभ्चिदाः। 
पौरा जानपदाः सवं परयन्द स्वैरसंयुगभ्‌ ॥२४।। 
महामात्र त्वया भद्र रङ्गदार्ुपनीयताम्‌ 
द्विपः इबलयापीडो जहि तेन समाहितो \२५॥। 
आरभ्यतां धलुशौगशतदंश्यां यथादिधि । 
विश्चसन्तु पञ्चन्‌ मेध्यान्‌ भूतराजाय सीड्षे \२६॥ 
इत्याज्ञाप्याथतन्त्रज्ञ आहूय यदुपुद्धयम्‌ । 


गृहीत्वा पाणिना पाणि ततोऽवाच ह ॥२७१। 


भौ भो दानपते मद्यं क्रियतां भेत्रमादतः । 


` नान्यस्त्वत्तो हिततमो विद्यते भोजष्रध्णिु ।२८ 


अतस्त्वामाधितः सोभ्य का्यगौरवसाधनस्‌ । 


यये््रो विष्णुमाभरित्य खार्थमप्यगमद्‌ परिः २९॥ 


| लः 


{$ 
१ ^ ~ व्यद 






आसाते ताविदहानेन रथेनानय मा चिरम्‌ ॥२०॥ 


, = ज भ 
कल । ++ 
न क 





४ करिक मे श्त्ुदवेवेङ्ण्टस्रयैः 


. कार्निदर्दितः ध. 





= न= 


श्रीमद्भागवत 





॥ अ० ३8६ 





क कक जक = 
~~~ यययानयणाययया्नयनडयो त पिप ते ककः जक 


कंसने मुक, चणूर, राक, तोशा आदि प्रानो, 
मन्त्रियों ओर महावतोँको बुलाकर कहा-- वीरवर चाणूर 
ओर मुष्टिक ! तुमलोगध्यानपूवक मेरी वात सुनो । १९-२२। 
वघ्ुदेवके दो पुत्र वल्राम ओर कृष्ण नन्दकैं त्रजमें रहते 
हैँ । उन्हीके हासे मेरी पर्यु बतल्यी जाती है ॥ २३॥ 
अतः जव वे यहाँ अवं तन तुमखोग उन्हं कुदती 
लडने-ल्डानेके वह्ने मार डालना । अब तुमटोग मोँति- 
मोतिके मंच बनाओ ओर उन्हं अखाडके चारों ओर 
गोल-गोर सजा दो । उनपर वेठकर नगरवासी ओर 
देशकी दूसरी प्रजा इप्त खच्छन्द दगल्को देख ॥ २४॥ 
महावत ! तुम बड़े चतुर्‌ हो । देखो भ।ई ! तुम दगच्के 
घेरेके फाटकपर ही अपने कुबय्यापीड हाथीको रखना 
ओर जब मेरे शत्रु उधरसे निके, तन उरसीके द्रारा 
उन्हें मरवा डाग्ना | २५ ॥ इसी चतुद शीको ग्रिधि- 
पूवक धनुषयज्ञ प्रारम्म कर दो ओर उसकी संफठ्ताके 
व्यि वरदानी भूतनाथ भैरवको बहूत-से पवित्र परद्युओंकी 
वलि चद़ाओः ॥ २६ ॥ 

परीक्षित्‌ ! कंस तो केवढ खाथ-साधनका सिद्धान्त 
जानता था | इपय्यि उसने मन्त्री, पहच्वान ओर महावत- 
को इसप्रकार आज्ञा देवरं श्रेष्ठ यदुवंशी अक्रूरको बुख्वाया 
आर उनका हाथ अपने हाथमं ठक्कर वोला--। २७] 
८अ्रूरजी ! आप तो बड़े उदार दानी हैँ । सव तरहसे 
मेरे आदरणीय हैँ । आज आप मेरा एक पित्रोचित काम 
कर दीजिये; क्योकि मोजवंशी ओर ब्रण्णवंशी यादर्बो- 
मे आपसे बढ़कर मेरी भलाई करनेवाव् दूसरा कोई नदी 
है ॥ २८ ॥ यह काम बहुत वड़ा है, इ्व्यि मेरे 
मित्र | मैने आपका आश्रय चछा है | ठीक वैसेही 
जेसे इन्द्र समर्थं होनेपर मी विष्णुका आश्रय लेक्रर अपना 
खार्थं साधता रहता है ॥ २९ ॥ भाप नन्दराधके रजे 
जाये । वयँ वुदेवजीके दो पुत्र ह । उन्हें इसी रथपर 
चदाकर यद्य के आईये । बस, अब इस कामम देर 
नही होनी चादिये ॥ ३० ॥ छनते है, विष्णुके भरोसे 
जीनिवाठे देवताओंने उन दोनोको मेरी गरध्युका कारण 
निश्चित किया है । इसन्यिं आप उन दोनोंकरो तो ठे 





अ० ३६ ] 


द्ञ्चम्‌ स्कन्ध 








कि पि सोः गि वः चः चः क 


घातयिष्य इहानीती कालकस्पेन हस्तिना । 
यदि अक्तौ ततो मस्लेघतये वेद्युतोपमेः ॥३२॥ 
तयोनिहतयोस्तक्तान्‌ बसदेवपुरोगमान्‌ । 
तद्बन्धून्‌ निहनिष्याभि इष्णिभोजर शकान्‌ ३३॥ 
उग्रसेनं चं पितरं सविर राज्यकाय॒कम्‌ । 
तद्धादरं देवक च ये चान्ये विद्धिषो सम ॥३४॥ 
ततश्चेषा मही भित्र भषित्री नष्टकण्टका । 
जरासंधो मम गुरुष्टिषिदो दयितः सखा ३५ 


शम्बरो नरको बाणो मय्येव कृतसौहृदाः । 


तेरहं सुरपक्षीयान्‌ हत्वा भोक्ष्ये महषीं नृपान्‌ ॥३६॥ 


एतज्ज्ञात्वाऽऽनय श्षिप्रं रामकृष्णाविहार्भकौ । 
धचुमेखनिरीक्षाथं द्रष्टुं यदुपुरशचियम्‌ ॥३७॥। 
अकर्‌ उवाच 
न । ¢ 
राजन्‌ मनीषितं सध्यङ्‌ तव खावद्यमाजंनम्‌ । 


सिद्धयसिद्धयोः समं याद्‌ देवं हि फरुसाधनम्‌।३८। 


2 7 त त 1 ^ 0 रि 


कः चोः चः चः चि 


तावानय सम॑ भोपनन्दादैः साभ्युपायनैः ॥।३१॥ | दी आशये, साय हीः नन्द आदिं गोर्पोको भी बड़ी-बड़ी ` 


भटोके साथ ठे आशये | ३१ ॥ यह आनेपर मैं उन्हें 
अपने काठके समान कुवख्यापीड हाशीसे मसरा डद्धगा । 
यदि वे कदाचित्‌ उप्त हाथीसे वच गये, तो मेँ अपने 
वन्रके समःन मजव्रूत ओर कर्ति प्रह्वान सुष्िक- 
चाणूर आदिसे उन्हं मखा डर्देण ॥ ३२ ॥ उनके 
मारे जानेपर्‌ बघुदेव आदि वृष्णि, मोज ओर दशाहंवंशी 
उनके भाई-बन्धु शोकाक्ुट दहो जागे । फिर उन्दें मै 
अपने हाथों मार डद्टगा | ३३ ॥ मेरा प्रिता उग्रसेन 
यो तोवृढा हो गगरा है, प्रतु अभी उसको राज्यक। खोभ बना 
हआ है । यह सव कर चुकनेके बाद म उक्षको, उसके 
भाई देवकको ओर दृसरे भी जो-जो मुञ्चसे द्वेष करनैवाठे 
दै-- उन वको तछत्रारके घाट उतार दूंगा ॥ ३४ ॥ 
मेरे मित्र शक्रूरनी ! फिर तो मँ होऊंगा ओर भाष होगे 
तथा होगा इस्त पृथ्वीका अकण्टकः राव्य | जरासन्ध 
हमारे नङ़-वूढे ससुर हैँ ओर वानरराज द्विविद मेरे प्यारे . 
सखा हैँ || २५५॥ रम्बरासुर, नरकाघुर ओर बाणासुर ये तो 


मुञ्षसे मित्रता करते ही है, मेरा मह देखते रहते है 


इन सवकी सहायतासे मेँ देवताओके पक्षपाती नरपतियो- 
को मारकर प्रध्वीका अकण्टकः राज्य मोगरूगा ॥ ३६ ॥ 
यह पव अप्रनी गुप्त वातं मेने आपको बतला दीं | 
अव्र आप जल्दी-से-जस्दी बलराम ओर कृष्णक यहां 
ठे आशये । अभी तो वे वच्चे ही हैँ | उनको मार 
ड[लनेमे क्या च्गता ह १ उनसे केवर इतनी ही बात 
किये कि वे लोग धलुषयज्ञके दशन ओर यदुवंिर्- 
की राजधानी मथुराकी चोमा देखनेके व्व यह आ 
जा्यः | २७ ॥ 


अक्रूरजीने कहा- महाराज ! आप अपनी मृ्यु, 
भपना अरि दूर करना चाहते है, इसल्यि आपका रेसा 
सोचना दीक ही है । मनुष्यको चाहिये कि चाहे सफर्ता 
हो या असफलता, दोनोके प्रतिं समभत्र रखकर अपना 
काम करता जाय । फक तो प्रयत्तसे नही, दैवी प्रेरणासे 





«^ 
9. 

* क 
कै 


मिलते हैँ ॥ ३८ ॥ मनुष्य बड़े-बड़े मनोरथोके पुरु 


वोधता रहता है; परंतु वह यह न्वी जानता किं देवने 





॥ मनोरथान्‌ कःरोत्युच्चेजनो देबहतानपि । ्रारज्धने ईसे पहलेसे ही नष्ट कर रक्खा है । यही कारण ह: 
"न व ) , । 3 ^ । अ भ 


# 

| 5. क 

४ के ( म |, १ ॥ 

९ ४ ॐ. # । ् 

कर ६, ~ “+ क र? । † र 

धि ह~ चि * ५ 4 क ९ # क न नं ^ 
१ कक > "क ॥ चै मै ् ॥ ^ 

१1 र " ओ च । के 9 ह ४ 

#" ऋ क त ऋका ऋ ` च # > [९ १ 





| 


4 0. 


| + ^. # > -* च 
" न क. 
; 

(भ 





र ङ्ग ^ - = =+ क व द = 4 2 कै ~ (५ ९१ 4 ग्ब 
छ ष, ~+ ० >. ~ किष ध ++ ब >< । 

ॐ ~] = ४ 4 न =" 4 १ प = २ न्‌ = 

नद ष = न ~ वु ~~. ऊ, 2 2 न - कनै, 

~ कः ब 4. न ध 


8, 3 १ 
अन्दः ~ कः क क. भ 
"न । न री ५ 
~ नि „ + तः + ५ हि ॥ ५१, च + ब + क ॥ ऋ = 
== चि # ~ 4 
= > च + 8 ॥ य =“ ; ऋ ॥ 
# + + 9 + # + 


३५४ मद्धामवत 


` -~--=- ~~ ~---=== -~-- -- -- -- ----- --~------- < --- - --` ~~ - 


[ अ० २७ 





जाता हैः तो वह हर्षसे ड उठता है भौर प्रतिकूढ 
होनेपर व्िफर हो जाता है तो दोकमरस्त हो जाता है । 
फिर भी मे आपकी आज्ञाका पाठन तो कर ही रहा दर| २९॥ 

शरीडकदेवजी कते है-- कंपने मन्तर्यो ओर 
अकरूरजीको इस प्रकारकी आल्ञा देकर सव्रको विदा कर 
एवमादिश्य चाक्रूरं मन्त्रिणश्च विसृज्य सः । दिया । तदनन्तर बह अने ४ लं गया ओर 
प्रविवेश्च गृहं कसस्तथाक्रूरः स्वमालयम्‌ ।॥४०॥ , अक्रूरजी अपने घर छोट आये ॥ ४० ॥ 


62 


श्रीद्युक उवाच 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे वार्थेऽनूरसत्रेषणं 
नाम भटात्रिशोऽध्यायः | ३६ ॥ 


दवय 


अथ सप्त्रिरोऽध्यायः 

केशी ओ व्योमाखुरका उद्धार तथा नारद्जीके द्वारा भगवानकी स्त॒ति 

शरीक उवाच भ्रीद्युकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! कसने जिस 
केशीः नामक दैत्यको मेजा था, वह वड़े भारी घोडके 
रूपमे मनके समान वेगसे दोडता इआ त्रजमें आया । 
वह अपनी टा्पोसे धरती खोदता आ रहा था । उसकी 
गरदनके चितिराये इए वाके ्ञरकेसे आकाराके बादठ 
ओर विमार्नोकी भीड़ तितर-वितर हो रही थी । उसकी 
भयानक हिनदिनाहटसे सब-के-सव भयसे कोपर रहे थे । 
उसकी बड़ी-बड़ी ओंँखं थी, सह क्या धा, मानो किसी 
बरृक्षका खोड़र ही हो । उसे देखनेसे ही डर ल्गता था । 
बडी मोटी गरदन थी । शरीर इतना वंशा था कि 
माम होता था काली-काटी बादल्की घटा है । उप्तकी 
नीयतमे पाप भरा था । वह श्रीकृष्णको मारकर अपने 
खामी कंसकां हित करना चाहता था । उसके चलनेसे 
भूकम्प होने च्गता था ॥ १-२ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने देखा 


केशी त॒ कंप्रहितिः खरेमहीं 


महाहयो निजेरयन्‌ मनोजवः 
सटावधूताभ्रविमानसङ्कल 

ङु्॑न्‌ नभो हेषितभीषिताखिलः ॥ १ ॥ 
विद्लालनेत्रो विकटाखकोटरो 

बृहद्गरो नीलमहाम्बुदोपमः 
दुराशयः कंसहितं चिकीषु- 

व्रजं स नन्दस्य जगाम कम्पयन्‌ ॥ २ ॥ 


; जा = + वि उधकी हिनदिनादटसे उनके आश्रित रहनेवाग गोकुल 
2 क ५ 8 अयभीत हो रहा है ओर उसकी प्रक नासि बादर तितर्‌- 
। बालबिधूर्णिताम्बुदम्‌ । वितर हो रे ह तथा बह लडनेके व्यि उन्हीको इद भी 
आत्मानमाजी मरगयन्तमग्रणी- रा दहै--तब वे वकर उसके सामने आ गये ओर 


" _सपाहयत्‌ स व्यनन्धरगन्रवत्‌ ॥ २॥ । उ ° ------ स व्यनदनशरगेनद्रवत्‌ ॥ २ ॥ | उन्दानि सिके समान गश्नकर उसे ल्ककारा ॥ ३ ॥ 


१. कंसमन्त्रणे षद्‌० । २. बादरायणिख्वाच 1 





॥ (3 ४५५१ ~ न ऋ, 
न ` # । ह । 
# ए १ प भश + नि च 
४ 
च + 


[~ -न-चच्य्य्य्व्व्य्व्व्य्य्व्वच्च्व व ---- १ 
युज्यते हषंचोकाभ्पां तथाप्याज्ञां करोमि ते ॥२९॥ | दै कि कमी पराख्थके अनुकूल हनपः प्रयल सफठ हो 





(1 
॥ 
( 
त 
|~ , = नकी का क ` प का कक चाक क व 









अ० ३७ | उ स्कन्ध ३५५ 























स॒ तं निज्ञाम्याभिगरुखो मुखेन खं मगवान्‌को सामने आया देख वह ओर भी चिद्‌ गया 
(^ तथा उनकी ओर इस प्रकार संह फडाकर दौड़ा, मानो 
पित्रननिवाभ्यद्रधदत्यम्णः | व ध = ९ 
आकाशको पी जायगा 1 परीक्षित्‌ ! सचमुच कंडीका 
जघान पदुभ्यामरविन्दलोचनं वेग वडा प्रचण्ड था | उस्पर विजय धाना तो कठिन 
६ | या ही, उसे पकड़ टेना भी आप्तान नदीं था । उसने 
दुरा परद्शवण्डजबो दुरत्ययः । ४॥ 


भगवान्‌के पास पहुंचकर दुलत्ती ्ाड़ी ॥ ¢ ॥ परत 
तद्‌ वश्चयित्वा तमधोक्षजो रूपा भगवान्‌ने उक्तसे अपनेको वचा ठया | भका, बह इन्दिया- 
तीतको कैसे मार पाता ! उन्ोने अपने दोनों हा्थोँसे 
उसके दोनों प्ले पैर पकड़ च्य ओर जसे गरुड 
सोपको पकड़कर अटक देते हँ, उसी प्रकार करोधसे 
उसे घुमाकर्‌ वड़े अपमानके साथ चार सौ हाथकी दूरी. 
यथोरगं तार्शद्ुतो व्यवथितः ॥ ५ ॥ | पर फक दिया ओर लयं अकड़कर खड हो गये ॥ ५ ॥ 
| थोड़ी ही देरके वाद केरी फिर सचेत हो गया ओर उठ 

स॒ लकन्धसंज्ञः पुनरुत्थितो रुपा | खड़ा इआ । इसके बाद बह क्रोधसे तिक्मिकाकर ओर 
मह फाड़कर वड़े वेगसे भगवानकी ओर श्चपटा । उसको 
दौडते देख भगवान्‌ सुक्षकराने खगे । उन्होने अपना 
सोऽप्यख वक्त्रे अजय॒त्तरं सयन्‌ वायां हाय उक्तके मुदम इ प्रकार डा दिया, जंसे 
सर्पं विना किसी आशङ्काके अपने बिक्में घुसत जाता 

प्रवेशयामास यथोरगं बिङे ॥ & ॥ | है ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ ! मणवान्‌का भ्यन्त कोमल कर- 


प्रमृद्य दोभ्यां परिविष्य पादयोः 


१ र्ती 


सावज्ञपरत्स॒ज्य धतुःरतान्तरे 


व्यादाय केशी त्रसाऽऽपतद्ररिम्‌ । 


निपेतर्भग कम भी उस समय रेका हयो गया, मानो तपाया इआ 
५ 0 ढोद्वा हो । उसका स्पदां होते दी केशीके दात दट- 
स्ते केरिनस्तप्रमयः स्पृश्चो यथा । दूटकर गिर गये ओर जसे जगेदर रोग उपेक्षा कर देने- 


पर बहुत बढ जाता है, वेसे ददी श्रीकृष्णका सुजदण्ड 
| उसके मुहमे बद़ने ल्ग। ॥ ७ | अचिन्त्यराक्ति भगवान्‌ 

श्रीकृष्णक्रा हाय उसके सुहमे इतना बद्‌ गया कि उ्की 
| सौसिके मी अने-जनेका मागे न रह। | अब्र तो दम 
समेधमानेन स कृष्णबाहुना | धुटनेके कारण वह पैर पीटने च्गा | उसका शारीर 
| पसीनेसे क्थपथ हो गया, ओंखोकी पुतली उट गयी, 
| बह मज-व्याग करने खगा । थोड़ी ही देरमे उक्षका छरीर 
ग्रखिन्नगात्रः परिवृत्तरोचनः निर्चेष्ट दोकर्‌ परथ्वरीपर गिर पड़ा तथा उसके प्राण- 
पखेरू उड़ गये ॥ ८ ॥ उसका निष्प्राण शरीर शग 


पपात लेण्डं विजन्‌ क्षितौ व्यसु; ।॥ ८ ॥ | इभा दोनेके कारण गिरते ही पकी ककडोकी तरह फट 
| गया । महाबाहू भगवान्‌ श्रीकृष्णने उसके शरीरसे अपनी 

ककटिकाफलोपमाद्‌ सुजा खीच टी । उन्हं इससे कुछ भी आश्चयं या गवे 

व्यसोरपाङ्कष्य अजं महायजः । नहीं इभा । निना प्रयत्नके ही राका नाश दो गया । 


वाहश्च तदेहगतो महात्मनो 


यथाऽऽमथः संवव्रधे उपेक्षितः ॥ ७॥ 


निरुद्रवायुश्वरणांअ  विधिपन्‌ । 


तदेदतः, 


$ 





























२.९ भीमद्भागवत [ अ ° १७ 














अंबिसितोऽयत्नहतारिरुत्सयेः देवतारओंको अरस्य ही इससे वडा आश्वरथं हुआ । वे 


प्रसन्न हो-होकर भमगवान्‌के ऊपर पुष्प वरसाने ओर 
हलवर्पदितरिपद्धिरीडितः ॥ ~ उनकी स्वति करने ट्गे | ९ ॥ 


देवपिरुपकषङ्गम्य भागवतप्रवरो सष । । परीक्षित्‌ ! देवपरं नारद जी भगवानफ्रे परम प्रेमी ओर 
| समस्त जीवोके सच्चे हितेषी हैँ । कप्तकरे यदँसे कीटकर 

| वे अनायास हयी अद्भुत कर्म करनेवाले भगवान्‌ शरीकृष्णके 

` दृष्णमाङ्कष्टक रहस्थेतद्भाषत ॥१०॥ पास आये ओर एकान्तम उनसे कहने ठगे--॥१०॥ 
# | सचिदानन्द क्रूप श्रीकृष्ण ! अप्रका खर्प मन आर्‌ 
| | | ` ॥ ५ | वाणीका विषय नहीं है । आप योगेश्वर हैँ । सारे जगत्‌- 
8. | ष्ण छकृष्णाप्रमेयात्न्‌ यागेन जगदीश्वर । का नियन्त्रण आप ही करते है | आप प्षवके हृदयम 
ह. निवास करते हैँ ओर सब-के-सव आपके हृदये निवा 

१ || | करते हैँ | आप भक्तकि एकमात्र वाञ्छनीय, यदुवंश- 
 बसदेवाखिलावास सात्वतां प्रवर प्रभो ॥११॥ | शिरोमणि ओर हमारे खामी है ॥ ११ ॥ जसे एकः ही 
॑ 33 अग्नि सभी लकडिि्योमें व्याप्त रहती है, वसे एक द्वी आप 
(३ मको जय समस्त प्राणियोके आत्मा हं । आल्माके खूयमं होनेपर 
॥ मात्मा सवेभूतानामेको ज्योतिरिंधसाप्‌ । मी आप अपनेको शपाम स्खते है; क्योकि आप प्ञ्च- 
कोशरूप गुफाअकि भीतर रहते हँ । फिर भी पुस्पोत्तम 
के ख्परमे, सवके नियन्ताके रूपमे ओर वक्रे साश्षीके 
रूपमे आपका अनुभव होता द्यी दहै ॥ १२॥ प्रमो! 
आप सबके अधिष्ठान ओर खयं अधिष्ठानरहित है । 
आत्मनाऽऽत्माश्नयः पव मायया सघजे गुणान्‌ । | पने सृष्टिक प्रारम्भे अपनी मायासे ही शुकी सृष्टि 
| की ओर उन गु्णोको ही खीक्रार करै आप्र जगतकी 
उत्पत्ति, स्थिति ओर प्रख्य करते रहते हैँ । यह प्व 
करनेके व्यि अप्रको अपनेसे अपिर्क्ति ओर करिक्ठी मो 
क: वस्तुकी अवश्यकता नक्ष है । क्योकि आप्र सवशक्ति- 
भूधरभूताना दत्यप्रमथरक्षक्ताम्‌ । मान्‌ ओर सव्यपषङ्कल्प दँ ॥ १३ ॥ वही अप दैत्य, 
ज ` | प्रमथ ओर राक्षरसोका, जिन्होने आजकल राजाओंका 
5 अवतीर्णो विनश्चाय सेतू रक्षणाय च ॥१४॥ वेष धारण कर रक्वा है, विनाश्च करनेके घ्य तथा 
त | | धमकी मर्याद ओकी रक्षा करनेके ल्य यदुवंशमें अवतीणं 
व दए हैँ ॥ १४॥ यह बडे आनन्दकी बात है कि 
ते निहतो दत्यो लीरुयायं हयाकृतिः । | आपने सेक-ही-लेकमे धोड़के रूपमे रहनेवारे इस केशी 

` ` व | देध्यको मार डाला । इसकी हिनहिनाहटसे डस्कर देवता- 
यस्य हेपितसंत्र्तास्त्यजन्त्यनिगरिपा दिवम्‌ ॥॥६५॥ ¦ चेग अपना शग छोङकर भाग जाया करते भे ॥१५५॥ 

| प्रमो ! अन परकषीं मै आण्के हाथों चाणूर. युष्टिक, 


। 
ग्र \ 
+ ~ 


कि > 
र र क ऋ १ ० भ ट 


शरदो गुहाशयः साक्षी महापुरुष ईश्वरः ॥१२॥ 


क 


तैरिदं सत्यसंृटपः सजखत्सखवसीश्वरः ॥१३॥। 


१ 
त, 


चाणूरं प्रष्टिक चव म्‌ न्या हस्तिनम्‌ | | 


9 द क ~~~ ~--- => ~~ ~ न~ ~ ~~ ~ ~= प 
---- --- --- = = चनामा 


विस्मितः पद्मभव।दिभिः ` रे; प्रसू २. (+ 1 = 
= ४: 















|, सि ति मि ‰ क = कनि किक शकि 





, 1 ~ = ^ = का क का 
~ 


अ० ३७ | दश्चम स्कन्ध 


ययानया यिय 


- कंसं च निहतं द्रक्ष्ये पस्थोऽहनि वे विभो ।॥१६॥ 
















चो ऋः = च = कको ` = ऋः = च 


| दूसरे पहचान, कुचट्था ड हाथी ओर खं कंस॒को 
। भी मरते देखुगा ॥ १६ के शङ्ख 
तखा शह्वयवनघ्ुराणां नक्ख च । ` या १ ० 
` यत्न, मुर ओर नरकाष्ुरका व्च देगा । आप खगसे 
पारिजातापहरणनिन्द्रख च पराजयम्‌ । १७)  करबरश्च उखाड़ च्येगे ओर इन्द्रे ची -चपड़ करनेपर 
उनको उसका मजा चखार्येगे ॥ १७ ॥ अपि अपनी 
कृषा, वीरता, सोन्दयं आदिका ल्क देकर वीर-कन्यार्ओं- 
1 घ * 9 | विं ब्रह क्र रेते | द्र 
तृमख मोक्षणं पापा दवारश्चायां जमत्पते ॥१८॥ | से ह करेगे ओर जगदीश्वर । आप द्वारका रहते 
| इए चगको पापसे चुडायेगे ॥ १८ ॥ आप जाम्बवतीके 
सखमन्तकख च सभेरादानं सह भार्थया 1 | साधर स्यमन्तक मणिको जम्ववानसे ठे आर्येगे ओर अपने 
| धामसे ब्राह्मणके मरे दए पूत्रोको खा दगे॥ १९ ॥ 
मृतपुत्रप्रदानं च वब्राह्मणख खधामतः ॥१९॥ | इसके पश्चात्‌ आप पैीण्ड्क-- मिध्यावाुदेवका वध 
ले र । करगे । काशं पुरीको ज देगे । युपिष्ठिषके राजसूययज्ञे 
दकस्य वधं पश्वात्‌ कारिपुया् दीपनम्‌ । चेदिराज चिद्युपाख्को ओर वहसे द्यौटते समय उक्तके 
दन्तवक्त्र निथनं चैचसख च महाक्रतौ ॥२०॥ मोसेरे भाईं॑दन्तवक्त्रको नष्ट करेगे ॥ २० ॥ प्रमो | 
दवारकाम निवाप्त करते पमय आप ओर भी वहृत-से 
। पराक्रम प्रकट करगे, जिनं पृथ्वरीके वडे-बडे ज्ञानी ओर 
व = ९२ | प्रतिभाश्चीर पुरुष आगे चलकर गायेगे । मेँ बह सुव 
कता द्रक्ष्याम्यहं तानि गेयानि कषिभिुवि ॥२१॥ | ~ ~ ६ र 
य € त | दंशा ॥ २१॥ इसके वाद्‌ आप पृथ्वीका भार उतारने- 
अथ ते कालदूयस्य क्षपयिष्णोरडष्य बे । । के चयि काठरूपसे अजुनके सारथि वनेगे अर अनेक 
| अक्षो हिणी ५ संहार करेगे । यह सव मँ अपनी 
। ओंखोसे देखूगा ॥ २२ ॥ 


उद्वाहं वीरकन्यानां वीर्थश्चुखकादिलक्षणम्‌ । 





यानि चान्यानि वीयीणि द्वारकामावसन्‌ भवान्‌ । 


अक्षौहिणीनां निधनं द्रक्ष्याम्यनसारथेः ॥२२॥ 


विशचद्रविज्ञानषनं दसंख्या | _ श्रमो | भाष विदद विज्ञानघन हें । आपके खद्पमें 
| ओर किसीका अस्िलर ह ही नहीं । आप नित्य-निरन्तर 

+ समा्ठसबीथंमपोषवाञ्छितम्‌ । | भपने परमानन्दखरूपमे सित रहते है । इसव्यि सारे 
= नि  । पदाथ आपको नित्य प्राप्त दी है । भापका संकल्प 


। अमोव ई । आपकी चिन्मयी शक्तिके सामने माया ओर्‌ 
। माया्चे होनेवाला यह त्रिगुणमय संक्तार-चक्र नित्यनिदृत्त 


11 


गुणप्रवादं  भमदन्तमीमदहिं ॥२२॥ | है- कमी हआ ही नहीं । रेसे अप अखण्ड, एकर, = 
सचिदानन्दषवष्प, निरतिशय रेयसम्पन भगवानकी __ 
त्वामीश्वरं साश्रूयमात्समयया मै शरण ग्रहण कप्त ह| २३ ॥ आप सवके अन्त- | 
। यौमी ओर नियन्ता ह । अपने-आपमें सित, परम 
1 न्र है । जगत्‌ ओर उसके अशेष विंरोषो-- भाव- 
विनिमिताेषविक्लेषकर्पनम्‌ । खतेन्र है । जगत्‌ ओर उस 


अभावखूप सारे भेद-विभेदोकी कल्पना केवर आपकी 

६ मायासे ही इई है 1 इ समय आपने अपनी लील प्रकट 
करीडाथेम्यत्तमनुष्यविग्रहं क्रनेके स्मि मनुष्यका-सा श्रीविप्रह प्रकट किया ह 
| ओर्‌ आप यदु, वृष्णि तथा सालतवेरियोके शिरोमणि बने 

नतोऽसि धुयं यदुद्ष्णिसाखतम्‌ ॥२४॥ _ है । प्रमो ! प आपको नमस्कार करता ह ॥ २४ ॥. 

९. यानि दोषाणि वे श्वि ॥ | | 


























(वक र" त १ 
व: अवि हि न्ड, क य += क केर कक क 
यो त 7 त 1 -9 श प क 
सकि को ज्य कि कमत > 


+ ` -कि-७, == ककत, 


वे 


= ढे 


न+ ` (७ 


+कः 
= 





श्रीञ्ुक उवाच 


एवं यदुपतिं ङष्णं भागवतप्रवरो स॒निः 

प्रणिपत्याभ्यनज्ञातो ययौ तदशेनोरक्षवः 

भगवानपि गोविन्दो ह्वा केशिनमाहवे । 
(५ © 

पञ्चलपाल्यत्‌ पारः प्रीतेव्रनसुखावहः ॥२६॥ 

एवःदा ते पशून्‌ पालाश्वारयन्तोऽद्विक्षाुषु । 


चक्तुनिङायनक्रीडाथोरपालापदेञ्लतः 


तत्रासन्‌ कतिचिचोराः पाराश्च कतिचिन्नृप । 


मेषायिताश्च तत्रेके विजहरङ़तोभयाः ॥२८॥ 


मयपुत्रो महामायो व्यामो गोपालवेषध्क्‌ । 


मेषायितानपोवाह प्रायथोरायितो बहून्‌ ॥२९॥ 


गिरिदिय विनिधिप्य नीतं नीतं महासुरः 
प्रिया पिदधे इारं चतुःपशावदेषिताः 


तस्य तत्‌ करम विज्ञाय कृष्णः शरणदः सताम्‌ । 


॥२०॥ 


गोपान्‌ नयन्तं जग्राह बकं हरिरिवोजसा ॥३१॥ 


स॒ निजं ख्यमास्ाय भिरीन्द्रक्षदशं बलो । 


इच्छन्‌ विभाक्तमात्मान नाश्चक्रोद्‌ ग्रहणातुरः ॥२२॥ 






गृह्याच्युतो दोभ्यां पातयित्वा महीतले । 
देवानां पद्यमारममारयत्‌ ॥२३॥ 


च = 


| १९ ॥ ` ॑ दिवि 
४: 
क नि वभर. 





श्रीमद्भागवत 


॥ २५।। 


॥ २७।। 


| अ० २७ 


¬ ज ति ज जाः जाम = = = ~ 


श्रीद्यकदेवजी कहते है - परीक्षित्‌ ! भगवान 
परमप्रेमी भक्त देवपिं नारदजीने इस प्रकार भगवान्‌की 
स्तुति ओर प्रणाम किया ! मगवान्‌के द शनोके आह्ादसे 
नारदजीका रोम-रोम खिल उठा | तदनन्तर उनकी आज्ञा 
प्राप्त करके वे चङे गये | २५ ॥ इधर मगवान्‌ श्रीकृष्ण 
केरीको लड़ाईमें मारकर फिर अपने प्रेभी प्व ्रसन- 
चित्त ग्वाच्वालके साथ पूववत्‌ पञ्युपाटनके कापमें दण गये 
तथा ब्रजवासिर्योको परमानन्द वितरण करने लगे ॥२६॥ 
एक समय वे सव वाट्वाठ प्रहाइकी चो्िर्योपर गाय 
आदि पड्युओंको चरा रहे थे तधा कुछ चोर ओर कु रक्षक 
बनकर किपने-छिपानेका--टुका-टकीका खेट खेल रहें 
थे | २७] राजन्‌ ! उन छोगोमेसे कुछ तो चे,र ओर कु 
रक्षक तथा कुछ मेड बन गये थे | इस प्रकार वे निभय 
होकर खेल्मे रम गये थे ॥ २८ ॥ उसी समय ख्राठका 
वेष धारण करके व्योमाघुर वरहा आधा । वह माया्रिथोके 
आचाय मयाद्ुरका पुत्र था ओर खयं भी वडा माय्री 
था | वह लेमे बहूधा चोर ही वनता ओर भेड बने 
हए बहत-से बाकोको चुराकर छिपा आता ॥ २९ ॥ 
वह महान्‌ असुर बार-बार उन्हे ठे जाकर एक पहाडकी 
गुफामे डाढ देता ओर उसका दरवाजा एक बडी 
चट्रानसे ठक देता । इस प्रकार ग्ाट्वार्खोमें केवरं 
चार्पोच बालक दही बच रहे ॥ ३० ॥ भक्तवत्सल 
भगवान्‌ उसकी यह करतूत जान गये । जित समय 
वह ग्ाक्बारोको स्यि जा रहा था, उसी समय उन्होने, 
जैसे सिंह भेड्यिको दबोच ठे उसी प्रका उसे धर 
दाया ॥ ३१ ॥ न्योमाघ्ुर बडा बटी था | उसने 
पहयाड़के समान अपना अप्ती रूप प्रकट कर दिया ओर 
चाहा किं अपनेको चुडा द । परंतु भगवानने उसको 
इस प्रकार अपने शिकजेमे फंस च्य या किं वह्‌ 
अपनेको दछुडा न सका ॥ ३२ ॥ तन भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने अपने दोना हार्थोसे जकड़कर्‌ उसे भूमिपर्‌ 
गिरा दिया ओर पञ्की मति गग बोकर मार डाग । 
देवताढेग विमार्नोपर चदकर उनको यद रीव्ग देख 
ददे ये ॥ ३३ ॥ भब भगवान्‌ शरङृष्णने गुफाके 
द्वारपर को इए च्ानोके पिद्यान तोड़ डङे ओर 











अ० ३८ ] 





व च््व्----------- ------- 





द्श्चम स्कन्ध 





स्तूयमानः सुर गपिः प्रविवेश स्वगोकुलमू्‌ ॥३४॥ | बड़े-बड़े देवता ओर पराख्वाग उनकी स्तुति करन 


चो भौर भगवान्‌ श्रीकृष्ण व्रजे चले आये ॥ २४ ॥ 


---‰--ॐ35-इ>-9-*-- 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्रामस्कन्ये 
वधे व्योमाञ्ुखधो नाम सपत्रिशोऽव्यायः ॥ ३७ । | 
~क 
अथाष्टात्रिशोऽध्यायः 


अक्रूरजीकी चजयान्ना 


श्रीद्युक उवाच 

अक्ररोऽपि च तां रात्रिं मधुपा महामतिः। 
उषित्वा रथमास्थाय प्रययो नन्दगोङ्लम्‌ । १॥ 
गच्छन्‌ पथि महाभागो भगवत्यम्बुजेक्षणे । 
भक्तिं पराणुपगत एवमेतद्‌ चिन्तयत्‌ ।॥ २॥ 
क्रि मयाऽऽचरितं भद्र फं तप्तं प्रमं तपः । 

किं वाथाप्यहते दत्त यद्‌ द्रक्ष्याम्यद्य केशवम्‌ ॥ ३ ॥ 
ममेतद्‌ दुंमं मन्य उत्तमश्छोकदशेनम्‌ । 
विषयात्मनो यथा ब्रह्मकीतंनं शुद्रजन्मनः ॥ ४॥ 
चदे + © 

मेवं ममाधमसापि सखदेवाच्युतदशंनम्‌ । 
हियमाणः कालनया क्चित्तरति कश्चन ॥ ५॥ 

* | (अ 
ममाद्यामङ्गलं नष्ट फलवांश्ेव मे भवः । 


यन्नमस्ये भगवतो योगिष्येयाङघिपङ्कजम्‌ ॥ & ॥ 


कंसो बताद्याकृत मेऽत्यनुग्रहं 


` २१. केचिव्योमवधः सत । 


श्ीद्युकेवजी कहते है--परीक्षित्‌ ! महामति 
अक्रूरजी भी वह रात मथुरापुरीमें वरिताकर प्रातःकाठ 
होते ही रथपर सवार इए ओर नन्दवावाके गोकुखकी 
ओर चल दिये ॥ १॥ परम भाग्यवान्‌ अग्रूरजी 
वरजकी यात्रा करते समय मागमे कमठनयन भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण की परम प्रेममयी मक्तिसे परिषूणे हो मये । वे 
इस प्रकार सोचने व्गे-] २ ॥ भने रेसा कौन-सा 
यभ कमे किया है, रेसी कौन-सी श्रेष्ठ तपस्या की है 
अथवा किपी सत्पात्रको रेषा कौन-पा महत््वपूणं दान 
दिया है जिसके फलस्वरूप आज मँ भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
दशान कंगा ॥ २ ॥ मै बडा विषयी ह । रेसी 
सितिरमे, बड़े-बड़े सात्विक पुरुष भी जिनके गुर्णोका 
दी गान करते रहते है, दशान नहीं कर पाते---उन 
भगवानके दशन मेरे व्यि अत्यन्त दुलभ हैँ, ठीक वैसे 
ही, जैसे शद्रकुर्के वाल्कके च्य वेदोंका कीर्तन 
॥ 9 ॥ परतु नदी, मुञ्च अधमको ही भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
दरोन होगि ही । क्योकि जैसे नदीमे बहते इए तिनके 
कभी-कभी इस पारसे उप्त पार चण जाते है, वेसेदही 
समयके प्रवाहसे भी करीं कोई इस संसारसागरको पार 
कर सकता है ॥ ५॥ अवरस्य ही आज मेरे सारे 
अद्म नष्ट हो गये । आज मेरा जन्म सफर हो गया । 
क्योकि भाज मँ भगवानूके उन चरण-कमर्खमं साक्षात्‌ 
नमस्कार करूंगा, जो ब्रडे-बडे योगी-यतियोके भी केव 
ध्यानके ही विषय हैँ ।॥ ६ ॥ अह्यो ! कने तो आज 
मेरे ऊपर बडी हीकृपा की है ! उसी कंप्तके 
मेजनेसे मै इस भूतकपए अत्रतीणे स्वयं भगवानके 


[त क 1 रि 


दरश्येऽङप्रिपशच प्रहितोऽघरुना हरेः । चरणक्मलके दरौन पांगा 1 जिनके नखमण्डख्की 





^> -4 + 4 । व ्‌ ॥ 





















श्रीमद्भागवत [ अ० ३८ 
 कतावतारख दुरत्ययं तमः कान्तिका ध्यान करके पले युगोके ऋषि-महषिं इस 
ज्ञानरूप अपार अन्धकार-राशिको पार कर चुके है, 
परवेऽतरस्‌ यन्नखमण्डलतिपा ॥ ७ ॥ | खयं वही भगवान्‌ तो अवतार ग्रहण करके प्रकट इए 
हे ॥ ७ ॥ ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र॒ आदि बडे-बडे देवता 
1 जिन॒चरणकमर्गकी उपाप्तना करते रहते है स्वयं 
^ | १ ४ भिया च देव्या य॒निभिः सस्रात्वतैः। | भगवती व्दमी एक क्षणके व्यि मी जिनकी सेवा नही 
¦ 3 छोडतीं, प्रेमी भक्तोकि साथ बड़े-बड़े ज्ञानो भी जिनकी 
गोचारणायानुचरेरद्‌ चते आराधनापें संच्प्र रहते हे--भगवान्‌के वे ही चरण- 
कमक गोर्ओको चरनेके ल्य ्वाखना्खोके साथ वन- 

यद्‌ गो पिकानां ङुचडुङ्कमाङ्कतम्‌ ॥ ८ ॥ वने विचरते देँ । वे ही घुरसुनि-बन्दित श्रीचरण 

। गोपियेकि वक्षःस्थक्पर ल्गी इई केसरसे रग जति है, 








यदचितं ब्रह्मवादिभिः सुरे 


द्रक्ष्यामि नलं सुकपोलनासिकं | चिहित हो जते दहं] ८ ॥ में अवद्य-अवद्य उनका 
~ < | दर्यन करंगा । मरकतमणिके समान सुख्िग्धर कान्ति- 
सतावलक्ार्णकञ्ञलाचनम्‌ | मान्‌ उनके कोमल कपोल दहै तोतेकी टोरके समान 
| जुकीटी नासिका है, होर्ोपर मन्द-मन्द मु्तकान, 
खल अडन्द्ख गुडालकातवरत | प्रेममरी चितवन, कमलसे कोमल रतनारे लोचन ओर 


 कपोर्छोपर वुँषराटी अव्ये व्टक रदी हैँ । मेँ त्रेम 
[+ (५1 । [न र 
ग्रदाक्षण म्रचरान्त वें स्रगाः।॥ ९॥ । ओर मुक्तिके परम दानी श्रीमुकुन्दके उस सुखकमल्का 
| ९ ५९/ 9 ~~ 
' आज अत्रय ददान कर्णा | क्योकि हरिनि मेषी 


अप्यद्य विष्णोमनुजतवभीयुषो दायीं ओरसे निकल दहे हैँ ॥ ९ ॥ भगवान्‌ विष्णु 
 पृीका भार उतारनके व्ये स्वेच्छासे मनुष्यकी-सी 

भारत्रताराय शवो निजेच्छया टीव कर रहे है । बे सम्पू ठवरण्यकरे धाम है। 

सौन्दयकी मूर्तिमान्‌ निधि है | आज मुञ्चे उन्हीका 

लवण्यधाम्नो भवितोपलम्भनं । दशन होगा | अस्य क्ोगा ! आज सुञ्चे सहजमें दी 
4 ^ ओखोका फक मिक जायगा ॥ १० ॥ भगवान्‌ इ 


मद्यं॑न न सात्‌ फरमज्ञसा दशः ॥१०॥ | कार्य-कारणरूप जगत्‌के द्रष्टामात्र है, ओर रेसा होनेपर 
| भी द्रष्टपनका भहङ्कार उन छर तक नही गया है । 
उनकी चिन्मयी चक्तिसे अज्ञानके कारण होनेवाखा 
मेदश्नम अज्ञानपहित दूरसे ही निरस्त रहता है । वे 
अपनी योगमायासे द्वी अपने-आपमे भूव्रिलासमात्रसे 
प्राण, इन्द्रिय ओर बुद्धि आदिके सहित अपने खरूप- 
मूत जीवोंकी रचना कर ठेते ह ओर उनके साथ 


८ बरन्दावनकी कुद्मिं तथा गोपियोके घरमे तरह-तरहकी 
ष्वभीयते॥११॥ | टीट करते प प्रतीत होते है ॥ ११ ॥ 







य ईक्ितादंरदितोऽप्यसत्सतोः 
स्वतेजसापास्ततमोभिदाघ्रमः | 








अ० ३८ | 


र ऋ ज कः कक 


यसयासिलासीवहभिः 





ष 


समज्ञस 


यसौ विमिश्रः शुणकजन्धभिः । 


गन्ति छुभ्भन्वि पुनन्ति धे जमद्‌ 


(ऋ 


सस्तादराः श्दश्चथना यताः ॥१२}) 





के 


नङ्क ककन ----4* ` कि ¢ > 3 शनत ॥ जोग | । 
९ [दद्मः क्छ सत्ववोन्यय 


(स न शट 
ठं खद्य नूनं महतां गतिं यु 
= 33 “~ ~रः 
तर खाद्यक्छन्त इ.शमन्पद्त्सवश्रू । 


श्यं दधानं भिय ईष्डितास्पदं 
दक्षे शया्चन्हष्सः युदशेनाः । ९४) 


अथृवरूढः सपदीशयो रथाद्‌ 


अधानपुंसोशरणं खरन्धये | 


॥ धिया धवं योशिभिरष्यदं धरुवं 


+ 3 न ऋ 


= - 
{` .  अप्वङ्तनिपरङे पतिर्य मे विः 


तमस्य आस्यां च स त्रीन्‌ बनोककः ।\ १५ 


दशम्‌ स्कन्ध 








जन समस्त पापेके नाशक उनके परम मङ्गस्मय गुणः 


+ 
~ 


कक 







































१ णि 


क्म ओर जन्मकी टीव्सि युक्त होकर बाणी उनका 
गान करती है, तवर उस गनसे संसारम जीवनक स्फतिं 
होने लगती है, सोभाका संचार द्ये जता है, सारी 
अपकित्नतारणँ घुट्कर पवित्रता सव्य छा जाता है; 
परंतु जिस बाणीसे उनके गुण, रव्य ओर जन्मकी 
कथाएं नहीं गाथी जातीं, वह तो सुर्देको ही खोभित 
करनेवाटी दहै, होनेपर भी नरके समान व्यथ 
है | १२ ॥ जिनके गणगानका हौ रेरा माहात्म्य है; वे 
ही भगवान्‌ खयं यदुवंशमे अवतीर्णं हए हैँ । किसलये १ 
अपनी ही बनायी मर्यादाका पाक्न करनेवाठे श्र 
देवतांक्ा कल्याण करनेके ल्ि । वे ही परम 
दशवर्बश्ाटी भगवान्‌ आज त्रजमें निवास कर रहे 
ओर बहीसे अपने याका विस्तार कर रहे हैँ । उनका 
यज्ञ॒ कितना पवित्र है ! अहो, देवताकोग भी उप्त 
समप्णं मङ्खलमय यश्चका गान करते रहते है ॥ १३ ॥ 
इसमे संदेह नदीं कि आज भँ अवद्य दी उन्हे देषठूरा । 
वे नडे-वडे संतो ओर लोकपार्लोके भी एकमात्र आश्रय हे । 
सवके परम गुरु दहै । ओर उनका सूप-सौन्दय 
तीर्न लोकोक्मि मनको मोह ठेनेवाल्ा है 1 जो नेत्रवाने 
ह, उनके च्य बह आनन्द ओर रस्तकी चरम सीमा 
हे ) इष्टीसे खयं कदमीजो भी, जो सौन्दयकी अधीश्वर 
है, उन्दः पानके ववि क्ट्कती रहती है । ५ तोत 
उन्हे अवरय देगा । क्योकि आज मेरा मङ्गलप्रभात 
हे, आज पुञ्चे प्रातःकाल्से दी अच्छे-अच्छे शङुन दीख 
रषे हैँ ।॥ १४॥ 
जव मै उन्हं देषूगा, तव सवश्रष्ठ पुरू बलराम तथा 
श्रीकृष्णे चरणेमिं नमस्कार करनेके व्ि तुरंत रथसे 
कूद. परईैगाः । उनके चरण पकड दगा । ओह । उनके 
चरण कितने दुम दै ! बडे-बडे योगी-यतिं 
साक्ात्कारके व्यि मन-दी-पन अपने हृदयमे उनके 
की धारणा क्रते है ओर मे तो उने 
जाज्गा ओर लेट जाऊंगा उनपर । उन नोके साय ही 
उनके वनवासी एक ग्वाल्वारके चरर्णोकी भी ` 
वन्दनां कख्गा ॥ १५ ॥ : मेरे अहोभाग्य ! जब नै उनके 
१ म गर जागा, ततर क्य रक्ट 
> कः स ~= 


१ 
~ > 
+ » दः = क + = 
= त 6 ५ । > ट भ, 
` इ 3 ह । # 
1 


( 













9 ॥ न न ॥॥ ॥ 
त्वि १ क 
॥ 







































३६२ श्रीमद्भागवत (ज 

दत्ताभयं कालथुजङ्गरंहसा मेरे सिरपर रख दंगे । उनके वे करकमढ उन रछोगोँको 

क. 1: . सदाके ्ि अमयदान दे चुके है, जो काठखूपी सँपके 
ॐ ॐ:  भ्राद्रेजितानां शरणेषिणां दृणाम्‌ ।॥१६॥ | मयस अत्यन्त घड्ाकर उनऱरी शरण चाहते ओर शरणमे 


आ जते हं ॥ १६॥ इन्द्र तथा दैव्यतज वलन मगवानूके 


© # 
शिक त्र ॥ (4 
समहंणं यत्र निधाय कौशिक उन्हीं क्रकमलमें प्रूजाकी भेंट समर्पित करके तीनों 


¢ र ^ स्तथा बरिश्वाप जगत्त्रयेन्द्रताम्‌ । खो कोका प्रभुत्व -- इन्द्रपद प्राप्त कर च्या | मगवानूके 
= | | ष. उन्हीं करकमरोने, जिनसे दिव्य कमलकी-सी सुगन्ध 
यद्‌ वा विहारे बजयाप्ता नर॑ आया करती है, अपने खदा रासटील्के समय त्रज- 


युषतिर्योकी सारी वषकान पिदा दी थी॥ १७॥ मे 


पेन सोगन्धिकगर्ष्यपासुदत्‌ ॥१७।। | द ८ 
भ | द्‌ ` कृसका दूत द्रं} उसीके भेजनेसरे उनके पास ज! रहा 


न सय्युपेष्यत्यरिबुद्धिमच्युतः दर | कहीं वे मुञ्चे अपना दान्रुतो न स्मञ्घवरैटेगे १ राम 
हितो राम ! वे सा कदापि नहीं समञ्च सकते । क्योकि वे 
कंसस्य दूतः प्रहितोऽपि विश्वदक्‌ | निर्विकार है, सम हैँ, अच्युत है, सारे विश्वके साक्षी 


है, सर्वज्ञ है, वे चित्तके वाहर भी हैँ ओर मीतर भी । 
वे क्षेत्ज्ञरूपसे सित होकर अन्तःकरणकी एक-एक चेष्टा- 
्े्ज्ञ॒ ईधत्यमलेन वक्षा ॥१८॥। | को अपनी निक ज्ञानदषटिके दारा देखते रहते हैँ १८५ 
तव मेरी शाङ्का व्यथं है | अवद्य ही मेँ उनके चरणोमे 


^ योऽन्तमंहिश्चेतक एतदीहितं 


अप्यङ्ध्रिमुकऽवहितं ताञ्च हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़ा हो जागा । वे मुसकराते 

। ६ इए दयाभरी ल्निग्ध दृष्टस मेरी ओर देर्ख॑गे } उस समय 

माभीश्िता सखितमाद्रया दशा । मेरे जन्म-जन्मके समस्त अश्युभ संस्कार उसी क्षण नष्ट 

<< हो जायगे ओर मेँ निःराक्क होकर सदाके चयि परमानन्दे 
सप्यपध्वश्तसभस्तकरिल्बिषो ् र ॥ 


मग्न हो जाऊ्गा ॥ १९ ॥ मँ उनके वुदुम्बका ह 
ओर उनका अत्यन्त हित चाहता द्र | उनके सिवा ओर 
कोई मेरा आराव्यदेव भी नहीं है । एेसी सितिमें वै 
सुह्मं ज्ञातिमनन्यदेवतं अपनी छंबी-लबी हंसे पकड़कर सुस अवश्य अपने 
हृदयसे च्णा टेगे । अहा ! उस समय मेरी तो देह पवित्र 

दोभ्यां बृहद्धयां परिरप्यतेऽथ माभ्‌। होगी ही, वह दूस्ोको पवित्र करनेवाढी मी वन जायगी 
ओर उधी षछमय---उनका आचिङ्गन प्राप्त होते दी- 
आतमा हिं तीथीक्रियते तदेव मे मेरे कर्ममय बन्धन, जिनके कारण मै अनादिकाल्से मटक 
| रहा ह, टट जयंगे ॥ २० ॥ जव वे मेरा आलिङ्गन कर 
बन्धश्च कमात्मक़ उन्कसित्यतः ॥२०॥ चरवेगे ओर में हाथ जोड, सिर छकाकर उनके सामने 
खड़ा हो जागा, तत्र वे मुञ्चे "चाचा अक्रूर !› इस श्रक।र 
कहकर सम्बोधन करेगे ! क्यों न हो, इसी पवित्र ओर 
मधुर याका विस्तार करनेके व्य ही तोवे ढीला कर 
रहे है, तव मेरा जीवन सफर हो जायगा | भगवान्‌ 
श्रङृष्णने जिसको अपनाया नही, जिसे आद्र नही 
दिथा- उसके उस जन्मको, जीवनको धिक्षार है ॥२१॥ 


बोढा शुदं बीठविशङ् उजिताघ्र ॥१९॥ 


= ॥. । (.  छब्धाङ्गसङ्गं श्रणतं कृताञ्ज 
| माँ वक्ष्यतेऽक्रर ततेत्युरुभरवाः 


(६ 


तदा वयं जन्भभृतो महीयश्षा 


मेवादतो यो धिगणष्य जन्म तत्‌ ॥२१॥ | 


ध > रि -4 ^ ५ + ५ को = (+ लि > 
"4 ~ क 0 


‡ गे ~ क = क~ 4 
` ~ नक 
„ 1" क 


# ब कै 
= -- द ~ ह, ५५ 
च, ~ दै च 


ब, म 





१, 2 7 श र ॥ 


अ० ३८ 1 दषम स्कन्धं 





मणी 2 1 त रर ॐ 
जका श = क शि म = क आः ` चक कः @ ® 
[वा "णी की नमी भय रं 


| न तस्य किद्‌ दथितः सु््तमो 


तो उने कोई प्रियदहैओरनतो | | न तो 
उनका कोई आत्मीय सुद्द्‌ दै ओर्‌ न तो शतु । उनकी 
उपेश्वाका पात्र भी कोई नही दै | फिर भी जसे कल्यब्क्च 
अपने निकट आकर याचना करनेतराछको उनकी सुह 
मोगी वक्तु देता है, वसे ही भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी, जो 
उन्हं जिच प्रकार भजता दै, उसे उक्ी ख्यमं भजते 
दै-- त अपने प्रेमी भक्ति दी प्रण त्रम करते ह ॥२२॥ 
मे उनके सामने विनीत भाव्रसे किर ञकाकर खडा हो 
जाऊंगा ओर बलरामजी मुसकरति इंए सुद्धे अगन हृद्रथसे 
च्गणाखेगे ओर फिर मेरे दोनों हाथ पकड़कर सुश्च घरे 
भीतर ठे जार्यगे बह सुव प्रकारसे मेरा सत्कार करगे । 
इसके बाद मुश्चसे पृेगे कि “कंस्‌ हमारे घखाककि साथ 
कंसा व्यव्हार करता ह १ ॥ २३॥ 

श्रीद्यकदेव जी कहत ह परीक्षित्‌ ! श्वफस्कनन्दन 
अक्रूर मागमे इसी चिन्तनमे इवे दवे रथसे नन्द्गवि प्च 
गये ओर सथं अस्ताचकपर चले गये ॥ २४ ॥ जिनके 
चरणकमल्की रजको सभी लोकपाक अपने किंरीटकि 
्रारा सेवन करते है, अक्रूरजीने गोष्ठमे उनके चरणचिहोके 
दरन किये ] कमल, यव, अकश आदि असाधारण 
चिहके द्वारा उनकी पहचान हो रदी थी ओर उनसे 
पथ्वीकी रोमा वद्‌ रही थी ॥ २५ ॥ उन चरणचिहोके 
दशन करते दी अ्रूरजीके हृदयम इतना आ्ाद इआं 
कि वे अपनेको संभाल न प्के, विहर हो गये । व्रेमक्ञे 
आवेगसे उनका रोम-रोम विल उठा, नत्रोमे अंप्न॒ मर अये 
ओर टपटप यपकने खगे । वे रथसे कूद कर उक्त धूलिं 
लोटने कगे ओर कहने व्ो--“अदहो ! यह हमारे प्रुके 
चरणोंकी रज दैः ॥ २६ ॥ परीह्तित्‌ ! कसके सदेशसे 
लेकर यर्होतक अन्रूरजीके चित्तकी जैसी अवस्था रही है, 
यही जीवोके देह धारण करनेका परम लाम है 1 इसव्यि 
जीवमात्रका यदी परम कतव्य है कि दम्भ) मय ओर 
रोकः त्यागकर भगवान्‌की मूत्ति ( प्रतिमा, भक्त आदि ) 
चिह, लीढा, स्थान तथा गुणोके दशेन-श्रबण आदिक 
दयार एसा दी माव सम्पादन करं ॥ २७ ॥ 


वरजमें पर्हचकर अक्रूरजीने श्रीकृष्ण ओर बरराम दोनों 
| मादूयोको गाय दुंहनेके स्थानम विराजमान देखा । श्याम्‌ 
१. संबह्धितपा२० । २. प्राचीन प्रतिमे "देइ ता" ` “ * -भवणादिभिः ॥* यह इरोक मूलम नहीं हे । ` 


। जारित = | ऋः ¬ कः "जाः 
ज जितिः तः च 
















नं चागप्रिभ ष्य उपेक्ष्यणववा। 


#१ 
तभरापि भक्तान्‌ भजते यथ्‌! तथा 
सुरदमो यद्रदहुषश्रितोऽथदः ॥२२॥] 
किथ्वाग्रजो मनतं यदूत्तमः 


[# चदे, 


खय्‌ परिष्वञ्पं गृहीतसञ्जला । 

सुहं प्रवेऽ्याघ्रसमस्तद्वत्करतं 
संगप्रह्यते संसक्तं स्बन्धुषु ॥२२॥ 

श्रीद्युक उवाच 

इति सञ्िन्तयय्‌ कष्ण श्वप्ठस्कतनयोऽध्वनि । 
रथेन गोद्धलं प्राप्तः षयश्ाक्तमिरिं सृषं 1 २४॥ 

पदानि तखाखिख्लोकपाल- 
किरीटज्टामरुपदरेणोः । 

ददश्चं॑गेष्टे शिविकोतुकानि 
विरुक्षितान्थग्जययाङ्कलाघेः ॥२५॥ 

तदशेनाहाद विव्रद्धसस्प्रभः 

्रम्णोष्वंरोमाश्चुकलाङ्लेक्षणः । 

रथादवश्छन्य स॒ तेष्वचेष्टत 
प्रभोरमून्यङ्धिरजांखदहो इति ॥२६॥ 

देहंशरवौमियानथो हित्वा दम्भं भियं चम्‌ । 
संदेश्चाद्‌ यो हरेरिङ्गदणंनश्रवणादिभिः ॥२७॥ 

द्द्‌ छ्ष्णं रामं च व्रजे गोदोहनं मतो । 








































३६९ श्रीसद्धागवत [ अ० ३८ 


न 0 2 त 1 1 7 श लि का त चि 0 क क का जि काः केक कः 
त क को जित नि भ जिः यः भ तो जः ज कज ज = = आ प त कः क ®= क क => [पे 








पीतनीलाम्बरधरौ शरदम्बुरुदेश्चणो || २८।। ! इन्दर श्रीकृष्ण पीताम्बर रारण किये इए ये ओर गोर- 
| सुन्दर बलराम नीलाम्बर । उनके नेत्र शारत्क्राटीन कमलके 
भर 

किशोर श्यामलश्वेतौ श्रीनिकेतो चहद्धजा । समान खिले इए भै ॥ २८ ॥ उन्दने अभा किशोरः 
| अ्रस्थामें परेश ही किया था वे दोनों गौस्द्याम निखिल 
सुसुखो खन्दर्वसै बालद्विरद विक्रमो || २९॥ | सीन्दयक्ती खान ये | घुटनोका स्पदा करनेवाली टत्री-खवी 
 भुजार्पँ, सुन्दर वदन, परम मनोहर ौर्‌ गजद्रावककते 

छ, शः (५4 न्ड, © म भ (ब «~ भ 
ज्वजवज्ाङ्क शाम्भोजेशिह्धितेरङ्धिभिधरेजः । | समान टल्त चाल शरा || २९ | उनकरं चरणोप्रं त्रा 
वरज, अङ्द ओर कपल्करे चिद्ये | जद्वे चते थे, 

४ %। न = ~ ^ ~ 
शोभयन्तो महात्मानावरक्रोशखितेक्षणों [{३२०॥। | उनसे चिहित होकर प्रश्वी शोभायमान हौ जाती धी | 
। उनकी मन्द-मन्द सुप्तकान ओर चितव्रन देती बी, मानो 
= ल क ० = = + ~ ~ ~ ^ 
उदाररूचिरक्णीडं सग्विणा वनमाकिनी | । द्या वरकस्त रहा दो . वे उद्‌ार्ताक्णं ती मानी मूतिंद्ध 
। शे ॥ ३० ॥ उनी एक-एक रीखा उदारता ओर न्दर 
०, ण्ट < - 

पुण्यगन्धाडुलिक्नाङ्गो साता पिरजदाखद्ा ॥२३९।। | कयसे मरी थी | रेमे वनसा आर सभियकरे हार्‌ 
| जगमगा रहे थे । उन्होने अभी-अभी स्नान करै नमल 


र भदै क णे 
4५ = ४ 1 7 <, कि ` - क मौ 4 सौ 
र = क 
हि । अ द >, ७ भ. १। ` "ग्ग न ~ 
त ” ` <~ क्‌ जं 1 
॥ 
कै + च्वौ 4 ह इ . ` ट ध 
| जवि 4 १ ॥ \ + ऋषे १ १ - प 9 १ ककन ह # क 
श "^ हिति थ # ॥ ह फ 1 #, 80 "द ऋ ज क १ ५ = 
# | र = #= * ४। #" मि + ऋ चङ्क १४ ही # १ ४1 ५३, 
ष ॥ + # , ~ । "८ " “+~ कक न य # तं ए न 
ष 4 छि 4 (4. २५ १ ¢ $ भ ¶ 
|. " च धै 1 ॥ भ ध श ॥ छ ऋ | 
हि ४ ध ॥ त † क 2.4; = 4 ४ ॥ | कू 
क २५ ¬) +) * 
+ 9 >) "कककुिषिकिथ ` शु कक 9 व .] ॥ १ ॥ र क, 9/8 
1 ¶ हि" ९ 0 ९ कुत क = ७= ॥ 7 3 नव ^~ 1 ५ च 
१ क त्क | न # ¢ षि - $ ऋ 2 च #> 
„ ~ ~ च भ # ‡ 
7 ॐ । + { ४ 
४ ज १३ 
छ क >, 1 १ ४४१. 


म्रधानपुरुष॑वाचो जगद्द्‌ जगरतौ । | वस्र पहने थे ओर रारीरमं पवित्र अङ्गराग तथा चन्दनकां 
| ठखेपक्रियाधा ॥ ३१ ॥ परीद्वित्‌ | अ््रूरने देखा किं 


अर्तीर्णौ जपत्य्थे स्वांशेन बलश्च ॥।३२।। | जगतके आदिकारण, जगते परमपति, पुरूपोचम दी 
| संसारी रक्षाके च्वि अपने सम्पूर्णं अंशोदे बलयमजी 


दिशो वि्षिमिरा राजन्‌ वाणो परभया खया | | ओर श्रीङ्ृष्णके रूपमे भवतीं होकर अपनी अङ्कान्त 
| | दि्ार्ओका अन्धकार दुर्‌ कर ददे} रेस भ्ठे 
यथा मारतः शैलो रौष्यश्च करकाचितौ ।\३३॥ | माद्धम हते ये, ज॑से सेनेसे म मरकतमणे आर्‌ 


चोँदीके पवेत जगमगा रहे ही ॥ ३२-३३ ॥ उन 
देखते क्षी अक्रूर गी प्रेमावरेसे अधीर ह्योकर रथसे कूद 
पडे ओर भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा बटरामके चरण॑कि पास 


¢ पपात चरणोषान्ते दण्डवद्‌ रामङ्कप्णयोः ।।३४।। | साङ्ग केट गये ॥ २४ ॥ परीवित्‌ ¡ भगवान दशने 
| > उन्हें इतना भाह्ाद्‌ इअ क्रि उनके नेत्र असे सवथा 


भगवदशंनाह्ादबाप्पपथाङ्ले्षणः । भर गय । सारे शरीरम पुख्कावनी छा गयी । उत्कण्ञ- 
वृक गला मर आनेके काएणवे अपना नमभीन 


पुलकाविताङ्ग ओत्कण्ठ्याद्‌ खाख्याने नाशकैन्नृपर२५| बतला सके ॥ २५ ॥ रारणागतवत्छक भगवान्‌ श्रीकृष्ण 

उनके मनका भाव जान गये । उन्ह्योने वड़ी प्रस्तनतासे 
< भगवरंस्तमभिप्रेत्य रथाङ्गाङ्कितपाणिना । चक्राङ्कित क्कि द्वारा उन्द खीचकर उठाया ओर 
२ र्य - हृदयसे च्णा च्या ॥ २६ ॥ इक्षके वाद्‌ जव वे परम 
मेऽग्बुप ्रीतः भ्रणतवत्सरः ॥३९॥ मनखी श्रीब्रामजीके सामने षिनीत मावसरे खड़ ह्यो गये, 


क 6 गले च्गा च्या भौर उनका एक 
१ प्रणतघरुपयुष्च॒ महामनाः । तब उन्हयौने उनको 
"4 अ हयाय श्रीकृष्णने पकड़ा तथा द्रा बकरामजीने । दोनों 


भिना पणी अनयद्‌ नो प[२७॥ | ग द षर कगे ॥ २०॥ === 





। /  रथातर्णमवष्ठत्य सोऽकरः स्नेविहलः । 


जतः क जक भ क -नकाक-वक-क = कक 
"वयोकिकन 





च क = क 4. 
। च. ५ न 





पिन्याकस्य ~~ म 8 त [मी [ । ५1 


र्थ खागतं तस्स निवेद च व्र्‌ाशनम्‌ । घर के जाकर भगवान्‌ने उनका वड़ा खागत-सत्कार 
= किया । बुराछ-मङ्गल पूख्कर श्रषट आसनपरं वेणया ओर 
व्रस्य विवत्‌ षादौ म्‌ पुप॑दिणम।ह || २८।। व्िधिप्र्वक उनके पवि पखारकर मधुपक ( शद मिला 
र 3 | इआ दही ) आदि प्रूनाकी साम्प्रीर्भेट की ॥३८॥ 
निषे गां चातिथये संवाह श्रान्ताः । | इतके वाद भगवान्‌ने अतिथि अक्रूर नीको एक माय दी 
- ओर पैर दवाक्रर उनकी थक्वट दूर्‌ की तथा बडे 
अन्नं बहुं मेध्यं श्रद्रयापाहरद्‌ धिशः ॥३९॥ | आद्र एवं श्रदरास्े उर पकरि ओर अनेक गुणि युक्त ` 
ध तः अन्नका मोजन कराया ॥ ३९ ॥ जत्र वे भोजनं कर चुके, ` 
तस्मं सुक्तयते श्रीर्या रासः परषधसवित्‌ ¦ | तव धरमके प्म मर्मज्ञ मगवान्‌ वकरामजीने डे प्रेःसे ुखव्रास् 
( पान-इलायन्ची आदि ) ओर सुगन्धित मास आद्‌ देकर 
उन अत्यन्त आनन्दित किया | ४० ] इ प्रकार 
सत्कार हयो चुकनेपर नन्दरायजीने उनके पास जकर 
्रढा--“अब्रूरजी ! आपलोग निदयो कंसे जीते-जी 
¢ किस प्रकार अपने दिन काते है १अरे ! उसके रहते अप 
| कसे जीवति दृह्‌ शौनपारा इवाययः ॥४१॥। | लोगोकी वही दशा है,जो क्ताददारा पाटी इई मेडकी होती 
् है | १ ॥ जिक्च इन्दियाराम पापीने अपनी विक्खती इइ 
चान्त ललदुस्वकाच्‌ क्रञ्न्त्या असुतप्‌ खडः| | वहनके नन्दे -नन्हं बरोको मार डाक | भापलेग उसक्षोभ्रना 
= है । फिर आप सुखी है, यह अनुमान तो हम करद्ीकैसे 
च सु {ल्सपजानः चः इश विगक्ञामहे ।४२॥ | सक्ते ई १।४२॥ अ्रूरजीने नन्दवावासे पडले इी कुशठ- 
मङ्गल प्रू च्या थ) । जव इस प्रकार नन्दबावाने मधुर । 
थं द्लृतया वाचा नन्देन सुलभाजितः णीसे करूरजीसे कुराल-मङ्गन प्रा भोर उनका सम्मान 
किया, तब अक्रूरजीके शारीरम रास्ता चबन॑की जो कुछ 
अक्ररः परिषुष्टेन अहादष्दपल्शरिमम्‌ ।४२।। | थकावट यी, वहं सव दूर्‌ हो गयी ॥ ४२ ॥ 











लवासैगन्धमास्येः परां प्रीतिं व्यधात्‌ पुनः।1४०॥ 





| पप्रच्छ सत्छ्ृतं नन्दः कथं थ निरलुग्रहे । 


॥॥ 
क क शङ्खा "क + ५1१. 





[र 












ज कि ऋ कि 





रति [9 से य्‌ ॥ 9 ॐ क द 
इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे एवार्थ €~ 
ऽकरूरागमनं नामाटात्रिरोऽष्यायः ॥ ३८ ॥ ~ 





। + ॥+ ॥ र 
| 


अथेकोनचलारिशोऽधष्यायः 

ीरृष्न-बखरामका मथुरागमन 
श्रीक ऽवाच आीद्युकदेचजी ऊहते है--मगवान्‌ 
+ जीने काम्‌ - 
सुखोपि्टः षयङ्क रसङ््णोरभानितः ॥ व ८ वि. ६ स 
ङेमे मनोरथान्‌ स्वान्‌ पयि यान्‌ स चकार ह ॥ १॥ | की थी, वे सव पूरी हो गयीं ॥१॥ परीक्षित्‌] लक्ष्मीक 
किमलभ्यं भगवति प्रत्ने श्रोनिककेतने । आश्रयस्वान मगान्‌ श्ीष्णके.भरसन्न_होनेपर देसी 

| ९. पकरपुगादस्त्‌ । २. प्राचोन प्रतिप ध्यव" यह पाठ नही दै क 



























२६8 श्रीमद्भागवत [ अ० ३९ 
| = ~ ~ च --- - ---~  - ~ ~ ~ व~ 
कौनसी वस्तु दहै, जौ प्राप्त नहीं हो सक्ती १ फिर्‌ भी 
भगवानके परमप्रेभी भक्तजन किसी भी वस्तुकी कामना 
नहीं करते ॥ २ ॥ देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकरष्णने 
सायङ्काल्का भोजन करनेके बाद अक्रूरजीके पास जाकर 
अपने खजन-सम्बन्धियोके साथ कतके भ्यवहार्‌ ओर 
उसके अगले कायक्रमके सम्बन्धमं प्रडा | ३ ॥ 
भगवान्‌ श्रीरूष्णने कद चाचाजी ! आपका 
हृदय बडा शुद्ध है । आपक्रो यात्रा को$ कष्ट तो नहीं 
इजा ? खगत दै | मै आपकी मङ्कल्कामना करता 
दं । मधुराके हमारे आत्मीय सुहृद्‌ , कुटुम्बी तथा अन्य 
सम्बन्धी सवं कुरार ओर खस्य हैं न ?॥४॥ हमारा 
नामगणत्रका मामा कंस तो हमारे कुच्के ल्य एक भयङ्कर 
व्याधि है | जवतक उसश्ी वहृती हो रष्ठी है, दततक 
अपने वंडवालो ओर उनके वाल-बर््चोका कुराल- 
इल क्या पृं ॥ ~^ | चाचाजी | हमारे सिये यह 
बडे खेदकी वात दहैकि मेरे दही कारण मेरे निरपराध 
ओर सदाचारी माता-पिता शो अनेकों श्रकारक्षी यातनां 
ञञेनी पड़-- तरह-तरह कष्ट उठाने पड़ । ओर तो 
क्र, मेरे ही कारण उन्हं हथक्डी-वेड़ीसे जकड़कर 
जेल्मं डा दिया गया तथा मर द्धी क्ाटण उनके वच्चे 
भी भार डाठे गये ॥ ६ ॥ में बहत दिनोंसे दाहता था 
कि आपलोगोमेप्े किप्ती-न-क्रिसीका दन हो | यह 
बड़े सोमाग्यकी बात है क्रि आज मेरी बह अभिलाषा पूरी 
हो गयी । सौम्यखभाव्र चांचाजी ! अव आप कपा करके 
यह बतलाद्ये कि आपक्रा ज्युभागणनं रिक्त निमित्तसे 
भा १॥ ७ ॥ 


तथापिं तत्परा राजन हि वाञ्छन्ति किशन ॥ २॥ 










साय॑तनाश्चनं कला भगान्‌ देवकीडतः | 
सुदहत्ख इत्तं करय पश्रच्छःन्यचचिकीषितम्‌ ॥ ३ ॥ 


श्रभगवानुवाच 


तातसौम्यागतः कच्चित्‌ शागतं भद्रमस्तु बः | 





अपि खन्ञातिबन्धूनामनमीवसनामयम्‌ ॥ ४ ॥ 
किं चु नः शल एच्छे श्थसाने इराम्ये | 


कंसे मातुलनस्न्यङ्ग खानां नस्तसपरजास् चं ॥ ५॥ 


अहो असदभूद्‌ भूरि पित्रोडजिनमार्ययोः । 


यद्धेतोः पुत्रमरणं यद्धेतोबन्धनं तथोः ।॥ ६ ॥ 


दिष्टाच दशनं खानां महयं वः सौम्य का्कितम्‌ 
संज्ञातं॒वण्यतां तात तवागश्ननकारणम्‌ ॥ ७॥ 


श्री्चक उवाच भ्रीदयकदेवजी कते है परीक्षित्‌ ! जव भगवान्‌ 


श्रीकृष्णने अग्रूर्जीसे इत प्रकार प्रश्च किया, तब उन्दने 
बतलाया किं “कस्ने तो समी यदुधंशि्योसे घोर वैर 
ठान रक्ला है | वह वसुदेव जीको मार डालख्नेका मी 
उदम कर चुका ई” ॥ ८ ॥ अ्रूपजीने कसका सदेश 
्ौर जिस उदेश्यसे उसने खयं अकरूरजीको दूत बनाकर 
मेजां था र नारद जीने जिस प्रकार वछुदेवके घर श्रीकृष्ण- 
वै जन्म ठेनेका वृत्तान्त उसको बता दिया था, सो प्न कह 


[ ऋक ~ => ए 


4. 


पृष्ठो भगवता सव वणंयामास अध्वः । 


वैरानुबन्धं यदुषु वसुदेववधोचमम्‌ ॥ ८ ॥ 
यदथ वा दूतः सुप्रेषितः खयम्‌ । 


न # क क = कके [किरी 
हि 1 11 आ छि = त च त ~~ 





वि 
भ - 9 
^< -क्‌-~ 4 व य 6 क न न 
` (<  &। न ` ४ । | , 4 । ध § 8. | धज ल्भा कदुन्दुभेः ग । । ९ | | 
क 4 वि~ = ९। त. पि = = क वि 
+ = ~ 3 


 @ @ अज 
[पि ्कन्काण्यान्कन्कष्ा्कोग्िय 7 क मी भणी कि मम मीक की नि त सि चः [+ मि  -- ^ चन = = क षा सो मि 


हिति 7 


 --> 


अ० ३९ | 











ुत्वाक्रूरवचः कृष्णो बरश्च॒ परवीरहा । 
प्रहश्य नन्दं पितरं रङ्ाऽऽदि्ं विजक्तः ॥१०॥ 


गोपान्‌ समादिशत्‌ सोऽपि गंत सर्वमोश्सः। 

उपायनानि शुकीष्यं ल्पना एकटानि च ॥११॥ 
याखा्‌ 
्रकष्यसः सुस" 
एवमाचबृत्‌ & 
गोप्यस्तःसतदुपश्वस्य वभूशुव्यथिता भषम्‌ । 


च 
च >. 
ष कक = च 


चै 
पुरः नदुमकरीर 


रम्‌ 
> त्‌ त्कतशन्त धासम्छानच कै 
क{तत्कतह्‌ चापशासम्छानद्चुखाभरषः । 


सखसद्दश्खवरखयदशषगरन्थ्यश्च शन | १४॥ 


~ = द्भ ( प्रत्‌ 
अन्यच्च ^€ यनन तश्च 


क, 


नास्बजाननिग लोकमास्पलोक्क गत्ता इव ॥१५९॥ 


# 
नन 


खरन्त्यथःप्शः शोरेशछरागस्सितिस्तिः 


"पष्य 


हदिस्प्शधित्रयद! भिरः संयुष्हः लियः ॥१६॥ 
गतिं सुखकरं चेष्टं सिग्धहःसवरोकनम्‌ । 


५५९ 


चिन्तयन्त्यो अुङ्न्दस्य भीता विरहकातरः । 





दशम स्कन्ध 


णिग त ॥ 
भ भ जा क क = कः न "णगि मी मि णी कीर 


घुनाया ॥ ९ ॥ अक्रूरजीकी यह वात छुनकर विपक्षी ` 





र गतम्‌ ।१२॥ 


सोकपहानि नमि प्रोदासचरितानि च ॥१७॥ 


न -- -- - 
१. ग्ृह्यन्तां सर्वगोराः । २. संतापा: श्चाख° 1 २. बन्धाश्च 1 ४. तेक्षणाः । 


रातु्ओका दमन करनेवाठे भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बल्राम- 
जी हंक्ने खगे ओर इपके वाद उन्दने अपने पिता 
नन्दजीको कंसकी आक्ञा सुना दी ॥ १० ॥ तवर नन्द- 
नावाने सब गोर्पोको आज्ञा दी कि "सारा गोरक्ष एकत्र 
करो । भेटकी सापग्री ठे ढो ओर छकडे जोड़ो ॥११॥ 
कल प्रातःकाठ ही हम सब मध्ुराकी यात्रा करेगे ओर 
वरह चलकर राजा कसको गोरप्त देगे ] वह एक वहत 
| बड़ा उत्सव हो रहा है । उसे देखनेकें व्ये देशकी सारी 
 प्रनाङइकट्रीहो री है | हभोग भी उसे देखेगे। 
| नन्दवावनि गोँवके कोतवराच्के द्रारा यह घोषणा सारे व्रजे 


नन्द्शोपः खमोड्कङे ॥१२॥ | कणा दा ॥ १२ ॥ 


| परीक्षित्‌ | जत्र गोपियोने छुना किं हमारे मनमोहन 
स्यापञुन्दर ओर गोरसुन्दर नलरामजीको मथुरा ठे जानेके 
च्य अक्रूरजी वरजम आये है, तव उनके इदथमे वड 
न्यया हरं । वे व्यक्रुर हो गयीं | १३ ॥ मगवान्‌ श्री- 
कृष्णके मधुरा जानेकी वात सुनते ही बहु्तोके हृदयम 
एसी जकन इई क्रि गरम सोसि चलने लगी; मुखकमछ 
कुम्हला गया । ओर बहूर्तोकी रेषी दशा इ$- वे इस्‌ 
प्रकार अचेत हो गयीं कि उन चिक्तकी इई ओदनी, 
गिरते इए कणन ओर दीखे इए जूईोतकका पता न 
रहा ॥ १४ ॥ मगव्रान्‌के खख्पका ध्यान आते ही बहुत- 
सी गोपि्योकी चित्तवृत्तिर्योँ सवेथा निश्त्त हो गयीं, मानो 
वे समात्रिख-आतमामे सित हो गयी हो, ओर उन्हें 
अपने सरीर ओर संघारका कु ध्यान ही न रहा ॥ १९५ 
बडत-सी गोपियोके सामने भगवान्‌ श्रीङ्ष्णका ग्रेम; 
उनकी मन्द्‌-मन्द्‌ पुसकान ओर इदयको स्पश करने- 
बाढी विचित्र पर्दोपे युक्त मधुर भणी नाचने कणी । वै 
उसमे तद्कीन हो गथीं । मोहित हो गथ ॥१६॥ गोपियोँ 
मन्‌-ही-पन भगवान्‌की ठ्टकीली चाल, भाव- 

प्रेमभपी सुसकान, चितवन, सारे सोर्कोको मिटा देनेवाल 


== ~ 


हिटोलियो तवरा उद रतामपी ीगाओंका चिन्तन करने 
लगीं ओर उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं । उनका 
हृदय, उनका जीवन-- एब कुछ भगवानके प्रति समपित ` 















8 3 ३६८ श्रीमद्धागवत | अ० ३९ 


क >: 









[0 म ग जना कमो ॐ । आ = क स ॐ 9.0 जि क 99 क क 
` तः त जि क जो कत चको ` चच किकः त 6 = > जि न च 9 + 0 ७ कः ऋ. क क 1 1 1 


समेताः सह्न्शः प्रोखुरश््॒स्योऽच्युतौशयाः ॥१८ | | था | उनकी जंश्वोसे अंस्‌ बह रहे ये । व दंड कौी-दंड 
कटी होकर इष प्रकार कहने ठ || १७-१८ ॥ 
शोपियौने कहा -- धन्य हो प्रिधाता ! तुम सव कुछ 
विधान तो करते हो, परंतु तम्डारे हदयपें दयःका ञश्च 
भी नही है | पष््ले तो त॒म सोद्ादं ओर प्रेपसे जगत्के 
प्राणि्योको ए-दृश्वरेके साथ जोड देते दो, उन्दँं आपसे 
एकः कर देते हो, निद्ादेतेद्यो; परंतु अभी उनकी 
आच्चा-अभिलषार्पं एरी भी नहीं हो पाती; वे तृक भी 
नही हो पाते कि तुम उन्दं व्यथं द्धी अलग-अलग कर 
देते हो ! सच है, तुम्हारा यह खिच्वाड ब्छोँके सेट्की 
तरह व्यथंह्ी दहै ॥ १९ ॥ यह कितने दुःकी वात 
है | विधाता | तुमने पहले हमे प्रेसका वितरण करनेवाछे 
द्यापघुन्दरका मुखकमट दिखाया ! कितना सुन्दर हैँ 
वृह | काले-कारे धुंघराले वाठ कृपो्नौपर श्लल्क रहे 
हैँ | मरकतमणि-चे चिकने घुखिग्ध कपौ ओर तोते 
खोच-सी सुन्दर नाधिका तथा अधर्योपर्‌ मन्द-मन्द 
सुसकानकी सुन्दर रेखा, जो सारे रो्कोको तक्षण 
मगा देती है | विधाता ! तुगने एक वार तो इमे वह्‌ 
परम सुन्दर मुखकमल दिखाया ओर अव उसे ही हमारी 
अखिसि ओश्ञठ करे रदै हो ! सचसुच तम्हारी यहं 
करतूत बहत ही अनुचित है ॥ २० ॥ हम जानती 
है, इसमे अक्रूर्का दोप नही है; यह तो साफ तुम्डारी क्रूरता 
है । वास्तवे तुम्ही अक्रूरके नामसे यदय आये हयो ओर 
अपनी ह्ली दी इई आँख तुम हमसे मूखंकी भोति 
छीन रषे हो । इनक द्रारा हम र्यामघुन्दरके एक-एक 
अङ्गोमें त्म्दारी सृष्टिका सम्प्रणं सौन्दयं निहारती रहती 
धीं | विवाता ! तुम्हे पे नहीं चहिये ॥ २१॥ 
अहो ! नन्दनन्दन स्यामघुन्द रको भी नये-नये लोगो 
से ने छ्गानेकी चाट पड़ गयी है । देखो तो सदही-- 
इनका सोहा, इनका प्रेम एक क्षणम ही कहां चा 
गया १ हम तो अपने षरद्रार, खंजन-सम्बन्धीः पतिःपुत्र 
आदिको छोडकर इनकी दाक्षी बनी ओर इन्हीके य्य 
आज हमारा हदय सोकातुर हो रहा है, परत ये पसे 
किं हमारी ओर देखतेतक नहीं ॥ २२ ॥ 





~~~ ---------- -~ 





निकमे भो = को भजः आ चक च कक 









गोप्य ऊचुः 






अहो बिधातस्तन्‌ न क्रदिद्‌ दया 






योज्य सेन्या प्रणखेन देहिनः । 






तांधाश्ृतार्थान्‌ वियुनङ्कयपारथंकः 






दि कीडितं तेऽ्करचेषटितं यथा ॥१९॥ 







यस्त्वं प्रदर्यासितङ्कन्दलघं 







यङ्न्दवक्त्रं उकपोलदन्नसम्‌ । 






शोद्ापनोदसितलेश्चसुन्दरं 







करोषि पारोक्ष्थमसाधु ते तम्‌ ।(२०॥ 









` कूरस्त्वमकररसमाख्यया स॒ न- 
2 
च्छ 


शष्कु दत्तं॑हरसे वतात्‌ । 




















अ० ३९ ] दश्च सन्ध 


केके किः ऋ =-= = । क क = कनवको क 
[क , ' त श ऋ क छ कको क ॐ तकः कः भक, - ऽ = = क कनका 1 [ ऋ 

। 4० जन श ० 
ऋ = [त का त 1 क 











सुखं प्रभाता रजनीयभाहिषः आजकी रातका प्रातःकाट मधुको ्ियकि व्विये निश्चय 
दी वड़ा मङ्गल्मय दोगा । आज उनकी बहत दिर्नोकी 
सस्या बभूवुः एुरयाषित्ां धुष्‌ । अभिलषाएं अव्य हयी पूरी हयो जार्यगी । जव हमारे ्रनराज 
~ स्यामसुन्दर अपनी तिरी चितवन ओर मन्द-मन्द 
याः संश्रविष्टस्य शुखं वजस्पतेः ५ 8 


पुक्चकानसे युक्त मुखारविन्दका मादक मधु षितरण करते 

पाखन्त्यपाङ्ञोत्कङितखितासवम्‌ ।।२३। | इए मधुरापुरीमे प्रवे करगे, तव वे उसका पान करके 
घन्य-धन्य हो जार्यगी ॥ २३ ॥ यपि हमारे श्याभदुन्दर 
धेयवान्‌ होनेके साथ ही नन्द्बावा आदि गुरुजं्नोकी 
आज्ञामे रहते है, तथापि मधुराकी युवतिं अपने 
मधुकरे समान मधुर वचनोँसे इनका चित्त बरबक्ष 
शिराः अपनी ओर खच ठगी | ओर ये उनकी ड्ज सुस्तान 
४ तथा विरप्षप्रण॒ माव-भगीसे व्यं रम जायगे । पिरि 

मन्‌ 1} २७}] | इभ गवार व्वाणिनोके पास ये ौटकर क्यों आने खगे 
॥ २४ ॥ धन्य दै अज हमारे स्याभघुन्दरका ददान 

करके मथुराके दाश्ाहं, भोज, अन्धक ओर इृण्णिवंशी 


रषत्‌ 


तासां अन्द मधुमञ 


हीठचित्तः परवान्‌ सनृस्व्यपि । 


दालार्हभाजान्धकडष्मिसात्तम्‌ । यादधके नेत्र अवर्य दी परमानन्दका साक्षात्कार करे । 
आज उनके यहां महान्‌ उत्सव होगा । साथदहवाजो 
महोत्सवः श्रीरमणं शुगास्थदं छोग॒ यहे मधुरा जाते इए रमारमण गुणक्तागर 
यमति ये चाध्वनि देवशनोऽवब्‌ ॥२ नटनागर्‌ देवकीनन्दन इयामघुन्दरक। मागमे ददान 

द्रक््यान्त य चाश्वान द्ब्म~उद्‌ ॥ २५५ दरे, वे भी निदाठ हो जायने ॥ २५ ॥ 
मेतदिधस्याङर्णसख नाम भ्र ॥ दलो सली | ० कितन्‌ (८ निडर करितना 
इदयदहीन ह । इधर तो दम गोपिंया इतनी दुःखित हो 
दक्र इत्येतददीव दाणः । रदी ह ओर यह हमारे परम त्रिवतम नन्ददुखारे 
ध स्यामघुन्दरकः हारो ओँखोसे आंञ्चठ करके बहुत दूर ठे 
योऽसावनाश्वास्य सुदुःखितं जनं जाना चाहता है ओर दो बात कहकर हमे घ।रज मो 


नहं बधाता, आश्वसन मी नदीं देता । सचपुच एेखे 
परियास्िथं नेष्यति पारमध्वनः ॥२३॥ | अयन्त बरूर रूपका “अन्रूरः नाम नह्य होना चाहिये 
था ॥ २६ ॥ सखा | हमार ये उयामपुन्दर भी तो कम 


अनद्रधीरष सभाखितौ रथं निर नहीं है । देखो-देखो, वे भी रथपर्‌ बेठ गये । 
आर्‌ मतव्राजे गोपगण छकड़द्रारा उनके साथ जनिके 

तमन्वभी च त्वरन्ति दुर्भदाः। | च्य कितनी जल्दी मचा रदे है । सच्च ये मूखं 

है । ओर हमारे बड-वूढे ! उन्होने तो इन गेगोकी 

मोपा अनोभिः खविरैरुपेकषितं जल्दबाजी देखकर उपेक्षा कर दी है किं “जाओ जो 


मनम अवे, कसे । अब इम क्या करे { आज विधाता 





दैवं च नोऽ प्रतिद्करभीइते ॥२७॥ | सवेथा मारे प्रतिक चेटा कर दया है ॥ २७॥ 





१. नार्यधी° । 











३७० श्रीमद्भागवत | अ० ३९ 
निवारयामः सष्पेत्य माधवं चो, हम खयं ही चच्कर अपने प्राणध्यारे 
इयाभघुन्दरको रोकंगी; ङुर्के नडे-बृदे ओर्‌ वन्धुजन 

करं नोऽकरखिष्यिन्‌ इरश्द्धबान्धवाः | हमारा क्या कर ठेगे १अरी सखी | हम जाघे क्षणके 
भ. | व्यि भी भ्राणवल्लम नन्दनन्दनका सङ्घं छोडनेमें असमं 
खडन्दसज्ञानामाय दस्त्यजाद्‌ थीं | आज हमारे दुर्माग्यने हमारे सामने उनका वियोग 


उपस्थित करके हमारे चित्तको विनष्ट एवं व्याकु कर 
दिथा है ॥ २८ ॥ सियो ! जिनकी व्रेमभरी मनोहर 
यसखयादुरमलङ्तिखितवल्युमन्तर- मुस्कान; रदस्यकी मीटी-मीदी वार्त, त्रिखापतपूर्ण चितवन 
9 ६ ओर प्रेमालिद्गनसे हमने रासटीव्य की ते रा्रियो--जो 
रीलाबलोक्परिरम्भणरासगोष्ठयास्‌ । बहत विशाल धीं--एक क्षणके समान विता दी थीं। 
अब भा, उनके बिना हम उन्हीकी दी इदं अपार 
विरहभ्यथाका पार्‌ कैसे पा्वेगी ॥ २९ ॥ एक दिनकी 
गोप्यः थं न्वतिवरेम तसो दुरन्तम्‌।।२९, नहीं प्रतिदिनकी बात है, सायङ्काथ्पं प्रतिदिन वे 
थः ६ ग्वाव्वा्कसे धिरे इए बग्रामजीके साय वनसे गौरं 
योऽय क्ये बजमनन्तसखः परं न्वराकर्‌ ीटते हं | उनकी काठी-काटी धरा अके 
ओर गच्छे पुष्पद्यार गोओके खुरकी रजसे ठके रइते 
है | वे घुर बजाते हुए अपनी मन्द-मन्द पु्ठकान 
वेणुं णन्‌ खिठकटाश्षनिरीश्रणेन ओर तिरी चितवनसे देख-देखक्षर हमारे इदयको 
|| | चित्त शिण < | ध . डालते ह ¡ उनके बिना भल); हम कंसे जी 
चितं िंणोस्यष्ते लु कथं भवेम ॥२०॥ | सर्गी १ ॥ ३० ॥ 
भ्रीद्ुक उवाच श्रीदुकदैवजी कते हं- परीक्षित्‌ ! गोपियों 
वाणीप्े तो इ प्रकार कड रदी थी; परंतु उनका 
एक-एक मनोभाव भगवान्‌ श्रीङृष्णका सवशे, उनका 
आलिङ्गन कर रह्म था । वे विरहकी सम्भावनासे अत्यन्त 
(=> | व्याकरुरु हो गयीं ओर ज छड़कर्‌ “हे गौविन्द्‌ । है 
कः , शिदज्य ठ्जां इरुदुः स शुखरं दामोदर । है माधव | इस प्रकार ऊंची आवाजसे 
शि ~. ध 4 पुकार-पुकार्कर घुक्ठित खरसे रोने च्गीं ॥ ३१॥ 
५ द्मीद्र माधवेति ॥२१॥ गोपियां इस प्रकार रो रदी थीं | रोते-रोते सारी रात 
बीत गयी, सूर्योदय इ । अक्रूरजी सन्ध्यावन्दन 
६ | नादि | आदि नित्य करमपि निब्ुत्त होकेर रथपर सवार इ९ 
अत्र अक्ररश्चोदथामास्च छृतमत्रादिको रथम्‌ ॥३२॥ । ओर उसे क्यंक ॐ चले ॥ ३२ ॥ नन्दबावा आदि 
ध <. गोपने भी दूध, दही, मक्खन; धी आदिसे भरे मटके 
7ोपास्तमन्वसरज्जन्प नन्दायाः शकरैस्ततः जीर भटक ` बहुतसी साममयं ऊ ली तथा 


श ^" 
दायोपायनं भृरि्चम्भाव्‌ मोरससम्भरतान्‌ ॥२३॥ | उकङ्पर चदरकर उने पीपी चर ॥ २२॥ 


देषैन विध्वंक्धितदीनचैतसाम्‌ ॥२८॥। 


नीः सनः श्षणभिि क्षणदा विनातं 
















ोपेविश्‌ खुररजश्छुरितारकघक्‌ । 


। ` एवं इकाणा िरहदरया भशं 


व्रजश्चियः छष्णविषक्छमानसाः | 





/ द्ीणामेवं स्दन्दीनाषुदिते सबितर्थथ । 











अ० ३९ ] दशम्‌ स्कन्ध ३७१ ` 











नयन कन्यानां र 








~~ च्च्य 





 # क जः > शह हि जकः = = को = › 
णिग मी मी भीभो । अ ` व । गि 


गोप्यश्च द्यित कष्णपरनुव्रज्यातुरञ्जिताः । । इपी समय अनुरागके रग्मे रँगी इई गोपय अपने प्राणष्यारे 

श्रीकृष्णके पास गयीं जौर उनकी चितवन, मुसकान 

प्रत्यादेशं भगवतः काष्वन्त्य्ावतश्धिरे ४।३४॥] , भादि निरखकर कुछ.कु घी इई । छत्र वे अपने 

प्रियतम स्यामघुन्द्रसे कुछ सन्देश पानेकी शकाङ्घासे 

त्रे यदत्त वहं खड़ी. हो गयीं ।॥ २४ ॥ यदुर्ंशिरोमणि भगवान्‌ 

तास्तथा तप्यतीवी्य स्वपर्ाने य प श्रीकृष्णने देखा किं मेरे मथुरा जानेसे गोपियोकि हदयमे 

वडी जलन हो रही है, वे सन्तप्तदहौ रही & तवं 

सहल्त्वश्रामान्त सम्रपधयाद्य इत दोत्यक्ेः || २२९) | उन्होनि दूतके द्वारा “मै आगाः यह प्रेम-सन्देडा भेजकर 

उन्हे धीरज रवेधाया ॥ ३५ | गोपिर्योको जवतक 

यावदासक्ष्यते कैतु्यावद्‌ रेणू रथस्य च | रथकी ध्वजा ओर पहि्योसि उडती दई धृट दीती रही 

तवतक उनके रारीर चित्रिखित-से वहीं ज्यो-क्यो 

खड़े रहे । परंतु उन्हनि अपना चित्त तो मनमोहन 

प्राणवल्लम श्रीक्ृष्णके सराय ही भेज दिया या ॥३६॥ 

अभी उनके मनम आज्ञा थी कि शायद श्रीकृष्ण कुछ 

दूर्‌ जाकर लेट आये । परंतु जव नहीं लौटे, तव वै 

निराश हो गयीं ओर अपने-अपने घर चटी आयीं । 

परीक्षित्‌ ¡ वे रात-दिन अपने प्यारे श्यामघुन्दरकी 

खीगर्ओंका गान करती रहती ओर. इस शकार अपने 
सोकसन्तापको इल्का करतीं ॥ ३७ ॥ 


परीक्षित्‌ ! इधर भगवान्‌ श्रीङ्ृष्ण -मी बल्रामजी 
ओर अकूरजीके साथ वायुके समान वेगे रथपर 


{> र 
न्‌] 


अदुग्रसा पेतारथष्नो टेख्यानीदोपङशितःः । २६) 


ता निराला निवघ्रतर्गोलिन्दविनिवतेने | 
विशोका अहनी निन्युयन्स्यः प्रियचेषटितम्‌।।२७॥। 


भगवानपि शम्परा्षो रापराकररथुतो दप । 


रथेन वायुवेगेन काछिन्दीमघनाक्िनीष्‌ ॥३८॥ भ 
॥२८ ॥ वदां उन लोगोने हाथ-सुह धोकर यप्तुनाजीकां 
॥ कत (> के ५ 
तत्रोपरपृश्य पानीयं पीवा ष्टं मणिष्मम्‌ | मरकतमणिके समान नीला भोर अमृतके समान मीटा 
अक परिया ] इसके बाद बढरामजीके साथ भगवान्‌ 
र ृ्षोके छुरमुटमे खड़े रथपर सवार हो गये ॥ ३९ ॥ 
ए ध त्रस्य घ ६८1 ५ (ध 
क रामा रथमाविशत्‌ ।२९॥ अनूरजीने दोनों भा््थोको रथपर वेधकर उनसे आज्ञा 
अक्रूरस्ताबुपामन्ञ्यं निवेश्य च रथोपरि । 


काङिन्या हदमाभत्य स्नानं विधिवदाचरत्‌ \०॥ | उतत कुण्डमें स्नान करनेवे बाद्‌ वे जञ्में इबर्गी गार 


निमज्ज्य तसिन्‌ सरिखे जपन्‌ ब्रह्म सनातनय्‌। 
तावेव दददोऽकरूरो रामकृष्णौ समन्वित ।॥४९॥ 


तौ रथो कथमिह सुतावानकदुनदुभेः । 


। > केन 


पवार होकर पापनाशिनी यमुनाजीके किनारे जा पधे | 


छ 
"+ ९/; । श कथ 


ठी ओर यमुनाजीके कुण्ड ( अनन्त-तीर्थं या ब्रह) । 
पर आक्र वे विधिपूवेक स्नान करने ल्गे ॥ ४०॥ ` 


गायत्रीका जप करने लगे । उसी स्षषय जच्करे भीतर ` त 
अनररजीने देखा कि श्रीकृष्ण ओर बलराम दोनों माई 
एक साय ही बेठे हए दै ॥ ४१ ॥ अव्र उनके मनमे ` 
यह राङ्का इई कि धघुदेवजीके पुत्रको तो मै रथपर ् 
वेढा आया ह अन वे य्ह जन्मे कसे आ गये १ ६ ~ 





























कै कणः 
अ 


४, न र 
एकक आ; 


1 कीतः 


[क 


गुज मण भु र ककर, ` 
ऋ = ह" क `क न 


२७२ 


क क का प 





तहिं खित्‌ स्यन्दने न स्त इत्युन्मज्ज्य व्यचष्ट सः।४२। 


तत्रापि च यथापू्मासीनौ पुनरेव सः ¦ 


न्यमञ्जद दर्शनं यन्मे मृषा रं सलिके तयोः।।७३') 


भयस्तत्रापि सोऽद्राश्चीत्‌ स्तूयमानमहीश्वरम्‌ । 


सिंद्रखारणगन्धर्वैरसरेनेतकन्धरे ॥४४॥। 


सहस्रशिरसं देवं सदस्रफएणमोकिनम्‌ । 


नीलाम्बरं बिसस्वेतं शृद्धेः इवेतमिव सितम्‌।।४५।। 


तस्योत्सङ्के घनव्यामं षीतकोशेयवाससम्‌ । 


परुं चतुर्थजं शान्तं पडपत्रारुणेक्षणम्‌ ॥४६॥। 


चारुप्रसन्नवदनं चारुहासनिरीक्षणम्‌ । 
सुभ्रन्नसं चारुकणं सुकपोलारुणाधरम्‌ ॥४५७॥ 
प्रलम्बपीवरथ॒जं तङ्गांसोरःस्थलश्चियम्‌ । 


कम्बुकण्टं निम्ननाभि वरिमत्पष्छबोद्रम्‌ ।४८॥ 
बहत्कटितट श्रोणिकरभोरुढयान्वितम्‌ । 
चारुजानुयुगं 


` तङ्गगर्फारुणनखव्रातदीधितिभिदैतम्‌ । 


ह नवाङ्कल्यङ्क्ठद रविरसत्पादपङ्कजम्‌ ॥॥*\०}। 
 हमहार्हमणिव्रातक्षिरीटकटकाङ्गदेः | 
परङुण्डलेः ॥५१॥ 





॥ न चक 
द 1 शः । न „५. ह 
7 क भ 


भीसङ्भामवत 





चारुजङ्कायुगलसं युतम्‌ ॥४९। 


| जग 
क # 
= कर्ने अओ, ए » 
क १ ु ह ६ जने 
र ष क~ + भु ~ + 
त ह "र | कूच ॥ 
4 > + 
ह "9: 
च, र +" ५ 
॥ %† 3 = "= शद 
ह (1 ५ ष्य (क 4 ३ ए 
[ति । ॐ) र ष 
# रववः 3 > # 
ˆ+ नि क 
क ध 


| अ० ३९ 


[2 प "भः जक के क =-@ = ` ऋ ऋक कक नि = निके = क्ये शोक 9 4 क = की ठ 


जब यष हँ तो शायद रथपर नही हेगि । रेखा 
सोचकर उन्होने चिर बाहर निकार्कर देखा ॥४२॥ 
वै उस टथपर भी पूर्वत्‌ बैठे हए ये | उन्होनि यद्र 
सोचकर कि मैने उन्हे जो ज्म रेखा था, वह श्रम 
ही रहा होगा; फर्‌ इनकी स्गायी ॥४३॥ परंतु 
फिर उन्होने वौ शी देखा कि साक्नात्‌ अनन्तदेव 
श्रीरोषजी विराजमान है । ओर सिद्ध, चारण, गन्धर्व एवं 
अष्ठुर अपने-अपने धिर छकार उनकी स्तुति कर्‌ 
रदे 2 || ४४|| रोप्रजीके हजार सिर है ओर प्रत्येक 
फणपर्‌ सकट सश्चोधित है | क्मल्नाख्के पमान 
उञस्वठ शरीरपर नीलाम्बर धारण किये इए हैँ नौर 
उनकी एसी रोभा हो रही है, मानो सहस्र क्लिखतेसे 
युक्त सवेतगरि कयस शोयायमान हो ॥ ४५५ ॥ 
अक्रूरजीने देखा कि रोषजीकी गोदमें श्याम मेधके 
समान घनक्याम विराजमान हो रहे हैं| वे रेरमी 
पीतान्बर पहने इष्‌ हैँ । बड़ी ही शान्त चतुर्युज मूर्तिं 
है ओर ऊपलङे रक्दल्के समान रतनारे नेत्र है 
॥ ४६ || उनका वदन बड़! ही मनोहर ओर प्रसनताका 
सदन हँ ¡ उनका -सधुर हास्य अर चारु चितवन 
चित्तको चुराये केत है । मौह सुन्दर ओर नासिकां 
तनिक ऊंची तथा बडी ही सुधड है । सुन्दर कान, 
कृपौक ओर लारा भधरोंकी छया निराढी ही है 
॥ ४७ ॥ बहि घुट्नोतक स्वी जौर हृष्ट-पु् है । 
कवे ऊंचे भौर वश्चःस्थल कक्ष्मीजीक्रा अआश्रयस्ान है | 
शङ्खके समान उतार-चढ!ववाला सुडौल गला, गहरी 
नाभि ओर त्रिवटीयुक्त उदर पीपच्के पच्तेके पमान 
दोमायमान है ॥ ४८ ॥ स्थर कट््रदेद ओर नितम्ब 
हार्धःकी स्ूडकरे समान जे, सुन्दर घुटने एवं पिंडय्ियों 
हैँ | एडीके ऊपरकी गेटे उभयी इई हैँ ओर गल्-का 
नखेसे दिव्य ज्योतिमय किरणें फक रही हैँ । चरण- 
कमठ्की अंगुच्ँं ओर अंगरूठे नयी ओर कोमल 
पृषुडियोके समान सुरोभित हे ॥ ४९-५० ॥ अत्यन्त 
बहुमूल्य मणि्यांसे जडा हआ सुकरुट, कडे, वाजूबेद, 
करधनी;, हार, नूपुर ओर कुण्डकसे तथा यज्ञोपवीतसे 
वह दिव्यमूतिं अल्ङ्कुत ह्यो खी है । एक हाथमे पद्म 


> 








अ० ४० | 


दश्च स्कन्ध 





 * ऋः २७३ 


न्य्व 








भ्राजमानं पञ्चकर शङ्कचक्रगदाधरम्‌ । 
श्रीव्र्सवशसं भाजत्करस्तुभं चनमालिनस्‌ ॥५२॥ 
0 दिधि 

पापषंदः सनकादिभिः | 

५ ध, ष -- 
{हजात्तम्‌ः ।५२॥। 

४; क, = अ, 

प्रहादनारदयषप्रघखेभौगवतो त्तमेः 


स्तुयमानं परथगभवेवंचोभिरमरात्मधिः ॥५९॥ 
भियः पृष्टया गिश कान्त्या कीर्त्या तुष्टयेलयोजया। 
विद्ययाविद्यया शक्त्या भायथा च निषेवितम्‌ ।\५५५}। 
[ये # षे । न 

विरोक्य सुभृश प्रीतो भक्ट्या परमया युतः । 


हष्यत्तनरुहो भवपरिङ्किन्नातसलोचनः ।॥५६॥। 


ष र~ 


शोभा पा रहा दहै भौर शेष तीन हार्थोमिं शङ्क, चक्र 
ओर गदा, वक्षःस्थलपर श्रीवत्सश्रा चिह, गमे कोस्तुम- 
मणि ओर वनमाग य्टक रदी £ ॥ ५१-५२॥ 
नन्द-पुनन्द शआरादि पाषंद अपने शखाभी', सनकादि 
परमपि पद्यः, व्रह्मा, महादेव आदिः रता पर्वे, 
मरीचि आदि नौ ब्राह्मण प्रजापति" ओर प्रह्माद-नारद 
आदि भगवानूकं परम प्रेमी भक्त तथा आर्त वदु अपने 
परम श्रियतम “भगवान्‌ समञ्षकर भिन-मिन माकि 
अनुसार निर्दोष वेदवाणीसे भगवान्‌की स्तुति कर्‌ रहे 
हैँ | ५३-५४ ॥ पाथ दही कक्षम, पुष्टि, सरखती, 
कान्ति, कीतिं ओर तुष्टि ८ अर्थात्‌ रेखयं, वक, ज्ञान, 
श्री, यरा शौर वैराग्य--ये षडैश्वयेखूप राक्तियोँ ), 
इवा ( सन्धिनी खूप पृ्वी-शक्ति ); ऊजां ८ ठीत्मयक्ति ), 
विद्या-अविया ( जीवोके भक्ष ओर बन्धने कारणख्पा 
बहिरङ्ग शक्ति ); हादिनी, संवित्‌ ( अन्तरङ्गा शक्ति ) 
ओर माया आदि ₹ाक्तिर्यो मूर्तिमान्‌ होकर उनकी सेवा 
कर रही हँ ॥ ५५ ॥ 

भगवानूकती यज् ज्ञोकी निरखकर अक्रूरजीका इदय 
परमानन्दसे च्वाख्व भर गया । उन्हें परम॒ भक्ति! प्राप्त 
हो गयी । सारा शरीर हषविरासे पुक्किंत हो गया । 
परमभावका उद्रेक होनेसे उनके नेत्र ओंँसूसे मर गये 
॥ ५६ ॥ अव अक्रूरजीने अपना साहस बटोरकर 


गिरा धद्दयस्तोषीत्‌ समालम्ब्य सालतः 1 = | मगवान्‌े चरणोमि सिर रखकर प्रणाम किंपा ओर्‌ 
वे उक्षके बाद दहा जोड़कर बडी सावधानीसे 
धीरे-धीरे गद्वद॒ खरसे मगवानकी स्तुति करने 
परणम्य सृष्नौवहितः कृताञ्जलिपुटः छनैः ॥५७॥ | रो ॥ ८७ ॥ 
--न~ॐऽ-ॐ- . 


इति श्रीपद्रागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशभस्कन्वे पूर्धि ऽजरर- 
प्रतियनि एकोन चसारिंशोऽव्यायः ॥ २९ ॥ 





अथ चलारिकोऽध्यायः 


अक्र द्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्ल ती स्तुति 





॥ 


अक्रूर उवाच | अक्रूर जी बोडे--प्रमो । आप प्रकृति आदि समस्त 
नतोऽस्म्यहं 
नाराषणं परुषपा्सन्यम्‌ । १ारायण है तथा थापक ही नाभिकमच्से उन बरहमाजीका 


नः 


नवेऽकरूरप्रतियानं नामेकोन° । 


ज 
स्वाखिरुदैतदतं | कारणोकि परम कारण है । आप ही षविनारी पुरुषोत्त 
१. दान्त । २. 1 











छ '..~ 
२७४ 


ए त 2) 1 1 ` क ` कोः च पे ऋः ऋ तकः ॐ कः ऋ किकः चे जकः ऋत च = चे = 





चन = कष चक == 
9 


यन्नाभिजातादरयिन्दकोशद्‌ 


ब्रह्मा ऽऽविरासीद्‌ यत एष छाकः ।॥ १॥ 


भ॒स्तेयमग्निः पवनः खमा 
इन्द्रियाणि । 
सर्वेन्द्िया्थां विबुधाश्च स्वे 


संहानजादिर्भन 


ये हेतवस्ते जगतोऽज्गभूताः ॥ २॥ 


नेते खस्पं बिदुरात्मनस्ते 


द्यजादयोऽनात्मतया गरहीताः। 
अजोऽचुबद्धः स गुणेरजाया 


गुणात्‌ परं वेद न ते खस्यम्‌ ॥३॥ 
त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमीश्वरम्‌ । 
साध्यात्मं साधिभूतं च साधिदेवं च साधवः ॥ ४॥ 


त्रय्या च वि्यया ऊैचित्‌ त्वा बे बेतानिका दविजाः । 


यजन्ते विततेयहर्नानारूपामराख्यया ॥ ५॥ 
एके त्वाखिलकमाणि संन्यसखोपर्चमं गताः । 


शभ्रीमद्धाभवत 





|| अ० &% 








भाविमांव इधा ड, जिन्होनि इस चाच जगत्की सृष्टि 
की है | मे भापके चर्णोमे नमस्कार करता हैँ ॥ १॥ 
पर्व, जक, भग्नि, वायु, आ क्राठा, अष्द्रुःर, महत्त्व, 
प्रकृति, पुरुष; मन, इद्धिय, म्पूणं इ्दियोके विषय 
ओर उनके अपिष्ठातृदेवता-- यही सद चराचर जगत्‌ 
तथा उसके ग्यवह्ारके कारण हैँ ओः ये सव-के-स॒व 
अपके ही अङ्ष्लखूप हँ ॥ २ ॥ प्रकृति ओर भ्कृतिषे 
उत्पन्न होने्राटे ्षमस्त पदाथ श्दवरत्तिः के दारा ग्रहण 
क्षिये जते हैँ, ऽसम्य ये सन अनात्मा | अनात्मा 
होनेके कारण जड दँ भोर इष्य आपा खसूप नहीं 
जान सक्ते ¦ च्योँकि अप तो छयं आत्मा द्वी दहरे | 
ब्रह्माजी अवश्य ही आपके ख्य हँ ¦ परंतु ३ प्रकृतिके 
गुण रजसुद्धै युक्त £, इसव्विं वे भी आपकी श्रङृतिका 
ओर उसके गुणोंसे परे्ा खशूप नहीं जनते ॥ ३॥ 
साधु योगी खयं अपने अन्तःकरणे दित अन्तर्यामी 
के रूपमे; प्षमस्त भूत-भोतिक पदाथेनिं उ्याप्च परमात्माके 
ख्पमे ओर सूयं, चन्द्र अगि आदिः देवमण्डर्मे सित 
“इष्टदेवता के रूपमे तथा उनवे साक्षी मद्टापुरुष एवं 
नियन्ता शश्वशके रूपमे साक्चात्‌ आपकी ही उपाष्ठनां करते 
हैँ ॥ ४ ॥ नहरत-से कर्मकाण्डी ब्राह्मण कर्ममार्मकः उपदेश्च 
करनेवारी त्रयीविधके द्रा, जो आपके इन्द्र, अग्नि 
आदि अनेक देववाचक्‌ नाम तथा वज्रहस्त; सप्ाचिं आदि 
अनेक खूप बतटखाती है, बड़े-बड़े यज्ञ॒ करते & ओर 
उनसे आपकी ही उपाक्तना करते हँ ॥ ५ ।॥ महुत-से 
ज्ञानी अपने समस्त कर्मोका संन्याक्त कर देते है ओर 
दान्तमावमें सित ह्यो जाते हें । ३ इस प्रकार ज्ञानयज्ञके 


` ज्ञानिनो श्ञानयज्ञन यजन्ति ज्ञानविग्रहम्‌ ॥ ६ ॥ | द्वारा ज्ञानखरूप शापकी ही आराधना करते हैँ ॥ ६॥ 


ध | ` अन्ये च संस्कृतासानो विधिनाभिहितेन ते । 
यजन्ति त्वन्मयास्त्वां वे बहुसत्यकमूतिकम्‌ ॥ ७ ॥ 
| चिवोक्तेन मार्गेण शिवरूपिणम्‌ | 


 बहाचा्विभेदेन भगवन्‌ स्पते ॥ ८ ॥ 


ब्रं एव यजन्त त्व स्वंदेवमयेखरम्‌ 


५ सङ्ते द, वे सुब भी वास्तनमे आपकी ही आराधना 
म (स ¦ 


ओर भी वहुत-पे संस्फारसम्पन अथवा शुद्धचित्त वेष्णव- 
जन आपकी बतकायी इई पाञ्चरात्र जदि परिधि्से तन्मय 
होकर आपके चतुच्यूह आदि अने $ ओर नारायणखू 
एक खरूपकी पूजा करते है ॥ ७ ॥ भगवन्‌ ! दप्षर 
लोग शिवजीके द्वारा बतलछाये इर मार्गे जिसके आवायं- 
मेदसे अनेक अवान्तर.भेद भी है, हिवसखरूप आपकी 
ही प्रजा करते दहै॥ ८॥ खामिन्‌ | जो खोग दूसरे 
देधतार्ओंवी मक्ति करते है ओर उन्दं आपसे भिन्न 


'#. 9 
०) २६५५. 
५ क थ 





क ^ वक क # क्न , ˆ= "कका 
9 ऊ +; कभ + न " भ (क 


अ० ४० | द्श्चम्‌ सन्धं ३७५ 


न" न-----------~------~---------------------------------- 11 रि कत कको 








क ज क क णयः कक क कः भः = @-@ वी प कनक 
~ -------- ~ ~ 














म र म 


` येऽप्यन्यदेवताभक्ता यच्प्यन्यधियः प्रभो ॥ ९॥ | करते द क्थोकरिं अप दी समत द्िताथकि ख्यरमे ह 
। ओर सर्वेधर मीदैँ॥ ९ ॥ प्रमो ! जते पर्वति सव 
यथाद्विय्रभवा नवः पजन्यागूरिताः प्रभो । ओर वहृत-सी नदिर्यो निकच्ती दँ ओर वपरे जसे 
भरकर धूमती-घाभती समुद्रमे प्रवेश कर्‌ जाती है, वैसे 
विशन्ति स॑दः हिन्धुं वक्षसां भवयोऽन्ततः ॥१०॥ | दी समी प्रकारके उपासना-मार्ं धूम-वामकर देर-सबेर 
आपके हयी पाक्त पंच जते है ॥ १० ॥ 
सचखं रजस्तम इति भवतः ्रकरतेगुंणा प्रभो | आपकी प्रकृतिक्र तीन गुण ईस, 
तेषु हि प्राङ्रवाः प्रोक्ता आघ्ङ्मखाःवशदयः ।(११ । रज जर तम । ब्रहमासे लेकर स्थावरपर्न्त समध 
चरचर जीव प्रत ह जीर जसे वञ्च सत्रोसे ओतप्रोत 
है, वेसे हीये सव प्रकृतिके उन गु्णोसे ही 
ओतप्रोत ह ॥ ११ ॥ परंतु आप प्वंख्प होनेपर 








तुभ्यं नतस्तैऽस्स्रविषक्तष्टये 
शवास्ममे संधिं च साक्षिणे । 


शुणप्रगहोऽयमविद्यमा छतः भी उनके साथ रिक्त नदीं हैँ | भापकी दष्ट निर्ठि्त है, 
प्रददे देवनृतिर्थगात्मसु ॥१२} | क्योकि आप समस्त इत्तियोके साक्षी हैँ । यह गुर्णोके 
मिनत तजनिरडमिरीषं प्रवाहसे दोनेवाठी सट अज्ञान है ओ वह देवता, 
"~ मनुष्य; पद्यु-पक्षी भादि समस्त यानिर्योमे व्याप्त है; 

स नमो नाभिस्थे दिशः श्रुतिः । परंतु आप उससे सवथा भव्ग हैँ | इसच्यि मै आपको 
न नमल्कर कएता दं ॥ १२ ॥ अग्नि आपद्य सुख है । 
र पृथ्वी चरण ह । सय ओर चन्द्रमा नेत्र ह । भाकाडा 
क्षिभरत्‌ आराणप्ररुं अ्रकदिपितमू ।१३॥ | नामि है । दिव्या कान है । खरग सिर है । देजनद्रगण 


रोभाणि यृश्षाषधम्र, शिशेर्हा भुजां हँ । समुद्र कोख ह ओर यह वायु ही आप्रकीं 
प्राणशक्तिके खूपमें उपास्नाके च्वि कल्पित इई है ॥१२॥ 
भेषःः प्रखाखिनखानि तेऽरयः वृक्ष ओर ओषध्यो रोम हे । मेव सिके केश हैँ | 
निमेवणं शज्पहनी त्रजापति- पवत आपके अधिस्तमूह ओर नख है । दिन ओर रात 
परक्रोका खोलना ओर मोचना है | प्रजापति जननेन्दिय 
हैँ ओर बृष्टि ही आपका वीयं है ॥ १४ ॥ अव्रिनासी 
त्वय्यव्ययाटमन्‌ पुरुषे प्रकटिता भगवन्‌ । जसे ज्म बहृत-से जठचर जीव ओर गूरः 
के फर्टोमे नन्दे-नन्हे कीट रहते हे, उसी प्रकार उपासनाके 
ल्य च्लीकृत आपके मनोमय पुरषरूपमे अनेक प्रकारके 
यथा जे स्धिहते जरोकषषो- जीव-जन्तुओंसे मरे - डक ओर उनके गेकपाढ ` 
नोस कल्पित कयि गये है॥ १५॥ प्रभो जप क्रीडा 
£ ऽ्युदुम्रे वा. मक्त तान करनेके ग्थि पृध्वीपर जो-जो ख्य धारण करते है वे ` 
यानि यानोह रूपाणि क्रीडनाथं विभषिं दि । ` | सब अवतार कोगोके योकमोहको धो-बहय देते भोर 


तेराृषशच घो रोश्च शुदा गायन्ति ते मः ॥९६॥ | फिर सव लोग बडे आनन्दसे आपके निभर यद्का गान 


. ता विभो । दः ` 2 


दस्तु ॒वृशिस्तव वीयमिष्यते ॥१४।। 


रोका; सफला बहुजीवसङखा : । 













ज [१ क 1 71 
५ ऋजः ऋः ऋ 


नमः कारणमत्खयाय प्रल्यान्धिचराय अ। 


२७६ भ्रीमद्धागयतं | | अ० ९६० 

















करते है ॥ १६ ॥ प्रभो | आपने वेदो, ऋषयो, 
ओषधियों ओर सत्यत्र आदिकी रक्षा-दीक्षाक्रे च्ि 
मतस्य्प धारण किया था ओर प्रव्यक्रे समुद्रम खच्छन्द 
विहार किया या । आपके मत्स्यखूपको मै नमस्कार करता 
द्रं । आपने हयी मघु ओर कौटम नामक्ते असुररोका संहार 
करनेके य्य हयग्रीष अवतार ग्रहण किया था | मै 
अपके उपस खूपको भी नमस्कार करता द्र} १७॥ 
भाने ही वह विशाल कच्छपख्प ग्रहणं करके मन्दराचढ- 
को धारण किया था, आपको मँ नमच्कर करता द| 
आपने ही पृथ्दीके उद्धारकी टीव करनेके ल्य वराहुद्प 
सखीकार किं था, आपको मेरे वार-वार नमस्कार ॥१८॥ 
प्रहाद जसे साघुजनोंका सेदभय मिटानेवाठे प्रभो ! 
आपके उस अठोकिक चसिंहरूपको मँ नमस्कार करता 
द्रं । आपने वामनरूप ग्रहण करके अपने परगोसे तीनां 
लेक नाप लिये ये) आपको मै नमस्कार करता द्र |} १९॥ 
धमेका उल्छङ्कन करनेवाठे घमंडी क्षग्रियोके वनका छेदन 
कर देनेके व्यि आपने ्रगुपति परद्चुरामख्प ग्रहण किया 
था | मँ आपके उ् रूपको नमस्कार करता ह| 
रावणका नाञ्च करनेके व्यि आपने रघुनशमे भगवान्‌ 
रामके ख्पसे अवतार ग्रहण दिया धा । मै अपक्त 
नमस्कार करता द्र ॥२०॥ वेष्णवजनों तथा यटुवंशिर्योका 
पालन-पोषण करनेके व्यि आपने हौ अपनेको वासुदेव, 
स॒ङ्कषण, प्रदयुन्न ओर अनिरुद्--इस चतुय के रूपमे 
किया है । मै आपको बार-बार नमस्कार करता 
द्र ॥ २१॥ दैत्य ओर दानवोंको मोहित करनेके च्य 
अप छ्द्ध अ्हिसामार्गके प्रवर्तक बुद्धका ख्प ग्रहण 
करेगे । म आपको नमस्कार करता दँ । ओर प्रथ्वीके 
क्षत्रिय जब म्लेच्छग्राय हो जा्यंग, ततन उनका नाञ्च 
करनेके व्यि आप ही कल्किके रूपमे अवतीर्णं होने | 
म आपको नमस्कार करता द्वं॥ २२॥ 

भगवन्‌ | ये सब-केसब जीव आपकी मायासे मोहित 
हो रहे हैँ ओर हस मोदके कारण दही यह मेँ द्रं ओर 
यह्न भेरा हैः इस श्ठे दुराग्रहमे फंसकर कमके मागेमिं 
भटक रहे दै ॥ २३ ॥ मेरे खामी | इसी प्रकार मैभी. 






हयशीष्णं नमस्तुम्यं मधुकेटभगरत्यवे ॥१७॥ 






अद्पाराय बृहते नमो मन्दरधाशि | 








शषिद्युद्धारविहाराय नमः षकरसूतये \।१८॥ 






नमस्तेऽद्धुतसिंहाय साधुलोकृभयापह । 







वामनाय नमस्तुभ्यं क(न्तत्रियुवनाय च ॥१९॥ 








नमो भ्रगूणां पतये टपक्षत्रवनच्छिदे | 






नमस्ते रधुवर्याय रावणान्तकराय च ॥२०॥ 






नमस्ते वासुदेवाय नमः सज्नषेणाय चं । 







गरहयम्बायारिरुद्राय सासतां पतये नमः ॥२१॥ 











नमो बुद्धाय शुद्धाय देत्यदानवभोहिने । 


म्ठेच्छपायक्तरदन्र नमस्ते कट्किरूपिणे ।॥२२॥ 
भगवज्ञीवलोक्चोऽयं भादहितस्तव मायया । 


ह 
+ ` 
न 
क 
# ५ 





# ~ 
1 
"त, ~ 
क 
1 
ए 

न्ट => 
, 4 # 







॥ ५ ©. #0 
अहंममेत्यसद्राहा भ्राम्यते कमेवतमेषु ॥२३॥ 
= 4 {८ = | ज # । 


{ 4 "9 6 ° 









# 

५ 0. 

~> [ 
| । 






हं. चात्मात्मजागारदाराथखजनादिषु । खपमे दीखनेवाठे पदा्थेकि समान श्चूठे देह्-गेह, पल्नी- 
9. . | | पुत्र छीर धन-खजन आदिको सत्य समञ्चकर उन्दी 
रमामि खमकल्पेषु धिया विभो ॥२४॥ | मोम फंस दय द नीर भव्क रा दव ॥ २४॥ 


= \ "चक 





॥ ह ~ 
१-* १ <^ त । च त ॥ + 
"क । ह {> ~ 
9) व 
४.५ न प ङ्क 


# {८ + 1; 
गअ अ । -* च 1 ॐ 
7 ~ ~ क  - [क य ~ अ = व 


अ० ४० | दश्चम स्कन्ध ३७७ 








गणकी 


अनिस्यानात्मदुःखेषु विपर्ययमतिद्यहम्‌ । मेरी मूरवैता तो देखिये, प्रभो | मैने अनित्य वस्तुरजको नित्यः 

अनात्माको आत्मा ओर दुःखको सुख समञ्च चिया। 

भटा, इस उच्टी बुद्धिकी भी कोटं सीमा है | इस प्रकार 

अज्ञानवदा सांसारिक सुख-दूःख आदि दरन््रमें ही रम 

| गया ओर यह बात विल्कुर भूट गया किं आप ही हमारे 

यथाबुधो जलं हित्वा प्रतिच्छन्नं तदुद्धवेः । सच्चे प्यारे दे ॥ २५॥ जैसे कोई अनजान मनुष्य 

जच्के चयि ताटा्रपर जाय ओर उसे उसीसे पैदा इए 

सिवार आदि घासोसे ठका देखकर रेक्षा समञ्च टे कि 

यहा जठ नही है तथां सुयकी किर्णमिं इ्ूठमूह प्रतीत 

| होनेवाले जख्के लिये प्रगतृष्णाकी ओर दौड पडे, वैसे 

नोत्सहेऽहं कृपणधीः कामकमेहतं मनः । | ही मै अपनी द्वी मायासे छिपे रहनेके कारण आपको 

छोडकर विषर्योमे सघुखकी आशासे भटक रहा द ॥२६॥ 

मै अविनारसी अश्चर वस्तुके ज्ञानसे रदित द्र । इसीसे 

रो दट्धु प्रमाथिभिश्चाक्षंहियमाणमितस्तत ; । २७ | मेरे मनमे अनेक वस्तुर्ओकी कामना ओर उनके च्य 

| कमे करनेके सङ्कल्प उठते ही रहते हैँ । इतके अतिरिक्त 

इन्द्रियां भी जो बड़ी प्रव एवं दुदमनीय है, मनक 

मथ-मथकर बवय्पू्ंक इधर-उधर घसीट ठे जाती हैँ । 

इसीष्यि इस मनको मै रोक नद्यं पाता ॥ २७ ॥ इस 

तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये । प्रकार भटकत। इजा र्म आपके उन व 

छत्रखयामे आ पर्वा दँ, जो दुषटेकि ल्थि दुर्म हैँ। 

मेरे खामी ! इसे भी मै आपका कृपाप्रसाद द्वी मानता 

पुंसो भवेद्‌ यिं संसरणापवमं- र । क्योकि पद्मनाम ! जब जीवके संघारसे मुक्त होने- 

का समय आता है, तवर स्पुृषोंकी उपासनासे चित्तवृत्ति 

स | आपमें लगती है ॥ २८ ॥ प्रमो ! आप केवर विक्ञन- ` 
| स्त्वय्यतजनाभ सदुपासनया मतिः खात्‌ ॥२८। रूप ह विह्ानषन 2} निनी नी 

| । हि, जितनी भी इतिय है, उन सवके आद ही कारण 

> णि ना ओर अधिष्ठान हैँ । जीवके रूपे एं जीवोके सुख-दुःख 

५.५ ।  आदिके निमित्त काल, कर्म, खभाव तथा प्रकृतिके रूपमे 

मी आप दी हैँ तया आप ही उन सबके नियन्ता भी ` 

पस्पेशप्रधानाय ब्रह्मणेऽनन्तश्नक्तये || २९।। द । जापकी शक्तियाँ अनन्त हैँ । आप खयं ब्रह है । _ 

आपको नमस्कार करता द्र ॥२९॥ प्रमो} 

अप ह) वाञ्ुदेव, आप ही समस्त जीवकि आश्रय 4 

नमस्ते वासुदेवाय सवेभूतक्षयाय च । (रुङ्कषण ) है; तया आप ही बुदि ओर म्नके अधिष्ठात्‌- 


प 
१ 
(9 
१ 


दन्दारामस्तमो विष्टो न जाने त्वाऽऽत्मनः प्रियम्‌। २५ 


अभ्येति मृगत्ष्णां हं पराङ्घुखः ॥ 





सोऽहं तवाङ्घ्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं 



















| ` अ ५ १. हित्वाहं त्वां परा० । क. 


क ५ 


२७८ 


हषीकेश्च नमस्तुभ्यं प्रपन्नं पाहि मां प्रभो ।\३०॥ | 


श्रीद्युक उवाच 
स्तुवतस्तस्य भगवान्‌ दशयित्वा जके वपुः । 


भूयः समाहरत्‌ ष्णो नटो नाव्यमिवातममनः॥। १॥। 





सोऽपि चान्तहितं बी्ष्य जलाहुन्मञ्ज्य सत्वरः 













छृत्वा चावस्यकं सवं विंसितो रथमागमत्‌ ॥ २॥ 
तमण्च्छद्ुषीकेशः फं ते दृष्टमिहाद्धतम्‌ । 


भूमी वियति तोये वा तथा तवां लक्षयामहे ॥ ३॥ 


~= थे गद क्षुण्ण + ॥ + न्व गर तु => ००9 > च्छो 
५ प # 2 # १ 
* $. ५ 


अकर्‌ उवाच 


अद्धुतानीह यावन्ति भूमो वियति वा जङे। 
त्वयि विश्वात्मके तानि कं मेऽष्ष्टं विप्यतः॥ ४ ॥ 
हः ६ &  य॒त्राद्धतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जके । 

तं त्वादुपश्यतो हन्‌ किं मे दृष्टमिहाद्धतम्‌ ॥ ५॥ 
इत्युक्त्वा चादयामास खन्दनं गान्दिनीसुतः 


=» ऋनि + कः 


ध 
क 


२ ४ " ऋ ४९॥. 1 "१ 


त... 
3 


= 4 नि 
"9 ज की ^~ १ 









कृष्णं चेव दिनात्यये ॥ & ॥ 


श्रीमद्भागवत 








[ अ० ४१ 





[१  --- 








देवता हषीके ( प्रदुम्न ओर अनिरुद्ध ) हैँ । मे आपको 
बार-बार नमस्कार करता द्रं | प्रमो | आप सुञ्च रारणागतकीं 
रक्षा कीजिये ॥ ३० ॥ 


` (न -कक्ने$ै>-- 
इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द शामस्कन्वे पर्गरधिऽरूर- 
स्तुतिर्नाम च्वारिोऽ्यायः ॥ ४० ॥ 





अयेकचलारिगोऽष्यायः 


श्रीरृष्णका मथुराजीमं प्रवेद 


श्रीद्युकदेवजी कषत है-- परीक्षित्‌ अत्रूरजी इस 
प्रकार स्तुति कर रहे थे | उन्हें मगान्‌ श्रीकृष्णने जलम 
अपने दिव्यरूपके द्धन कराये ओर फिर उसे चिपा 
च्या, ठीक वैष ही, जेसे कोई नट अभिनयमें कोई रूप 
दिखाकर फिर उसे परदेकी ओम छिपा दे॥ १॥ 
जब भक्रूरजीने देखा किं भगवान्‌का वह दिव्यरूपम अन्त- 
घन ह्यो गया, तब वे जन्ते बाहर निकल आये ओर 
फिर जल्दी-जल्दी क्षारे आवश्यक कमं समाप्त करके रथ 
पर चरे आये । उस समय वे बहुत ही विस्मित हो रहे 
ये ॥ २ ॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णने उनसे प्रूडा---चाचाजी । 
आपने प्रवी, आकारा या जलम कोड अदधत वस्तु देखी 
है क्या १ क्योकि आपकी आकृति देखनेसे पसा ही 
जान पड़ता हैः ॥ ३ ॥ 

अक्रूर जीने कदा- “प्रभो | प्रध्वी; आकारा या 
जवे ओर सारे जगतमे जितने भी अदधत पदाथ है, वे 
सब आपे ही है । क्योकि आप विश्वरूप हैँ । जब मे 
आपको दी देख रहा ह तब रेसी कोन-सी अद्भत वस्तु 
रह जाती दहै, जो मेनेन देखी हयो ॥ ¢ ॥ भगवन्‌ । 
जितनी भी अदभुत वस्तुं हैः वे प्रथ्वीमे हों या जल 
अथवा भाकारामे--सब-की-सव जिनमे है, उन्दी आप- 
को मै देख रहा दँ | फिर भव्या, मेने यदह अदधत वस्तु 
कौन-सी देखी ¢ ॥ ५॥ गान्दिनीनन्दन अक्रूरजीने यह 
कहकर रथ हक दिया ओर भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा 
बलरामजीको लेकर दिन ढल्ते-ढल्ते वे मथुरापुरी जा 


ऋ प हि 
क । । ४ ५4 


व क १ र ॥ 
१7" 19.193. 1 





अ० ४१ | 


मागं ग्रमजना राजंस्तत्र तत्रोपसंगताः। 
वुदेवसुतो वीक्ष्य प्रीता दृष्ट न चाददुः ॥ ७ ॥ 
तावद्‌ व्रजोकसस्तत्र॒नन्दगोपादयोऽग्रतः । 

पुरोपवनमासा् 
तान्‌ समेत्याह भगवानकरर जगदीश्वरः । 


गहीत्वा पाणिना पाणि प्रभितं प्रहस्निव ॥ ९॥ 

भवान्‌ प्रविशतामग्रे सदहयानः पुरीं गृहम्‌ । 

वयं विहाञमुच्याथ ततो द्रक्ष्यामहे पुरीम्‌ ॥१०॥। 
अन्रूर्‌ उवाच 

नाहं भवद्भ्यां रहितः प्रवेक्ष्ये मथुरां प्रभो । 

त्यक्तं नाहंसि मां नाथ भक्त ते भक्तवत्सल ॥११॥ 

आगच्छ याम गेहान्‌ नः सनाथान्‌ डुव॑धोश्चज । 


सहाग्रजः सगोपाठेः सुहृद्धिश्च सुहृत्तम ॥१२॥ 


क"  गषाययकषं 
1 "0" "व ० गं 


पुनीहि पादरजसा गृहान्‌ नो गृहमेधिनाम्‌ । 
यच्छोचेनानुवप्यन्ति पितरः साश्रयः सुराः ।॥१३॥ 
अवनिज्याङ्धरिभुगरमासीचछरोक्यो बलिमंहान्‌ । 
देशर्यमतरं केम गतिं चेकान्तिनां त॒ या ॥१४॥ 
आपस्तेऽङ्घ्रयवनेजन्यद्जीटलं काञ्छुचयोऽपुनन्‌ । 


रिरसाधत्त या चरवः खयोताः सगरात्मजाः ॥१५५॥ 
देवदेव 
यदत्तमोत्तमश्छोक नारायण नमोऽस्तु ते ॥१६॥। 


जगाथ पुण्यश्रवणकीतंन । 





दश्चम स्कन्धं 


परतीक्षन्तोऽवतय्िरे ॥ ८ ॥ | ये 








प्च ॥ ३ ॥ परीक्षित्‌ ! मार्गमे स्थान-स्थानपर गेविकि 
कोग॒मिलनेके लिये आते ओर भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा 
बलरामजीको देखकर आनन्दमग्न हो जाते । वे एकटक 
उनकी ओर देखने च्गते, अपनी दष्टि इटा न पते ॥ ७] 
नन्दवावा आदि व्रजवासी तो पहटेसे ही वहाँ पर्हच गये 
ओर मध्रुरा पुरीके बाहरी उपवनमें रुककर उनकी प्रतीक्षा 


कर्‌ रहै थे॥ ८ ॥ उनके पास्त पर्हुचकर जगदीशर . 


भगवान्‌ श्रीकृष्णने विनीतभावसे खड़े अकरूरजीका हाथ 
अपने हाथमे लेकर मुसकराते इर कडा--॥ ९ ॥ 
्चाचाजी | आप रथ लेकर पहले मथुरापुदीरमे प्रवे 
कीजिये ओर अपने घर्‌ जाहये । हमलोग पहठे यक्षं 
उतरकर फिर नगर देखनेके व्य आयेंगे ॥ १० ॥ 


अक्रूरजीने कदा- प्रभो ! आप दोनेकि बिना मँ 
मथुरामे नहीं जा सकता । खामी । मै आपका मक्त ह| 
भक्तवत्सल प्रभो ! आप समुच्च मत छोडिये॥ ११॥ 
भगवन्‌ ! आदये, चट । मेरे परम हितैषी ओर सच्चे 
सुद्टद्‌ भगवन्‌ ! आप बलरामजी, वाग््राल तथा नन्द- 
रावजी आदि जात्मीयोके साब चलकर हमारा घर सनाथ 
कीजिये ॥ १२ ॥ हम गृहस्थ ह । भाप अपने चरणो- 
की धूलिसे हमारा घर्‌ पवित्र कीजिये । आपके चर्णोकी 
घोवन ( गङ्गाजल या चरणाण्रुत ) से अग्नि, देवता; 
पितर--सब-केसब तप्त े जाते ह ॥ १२ ॥ प्रमो । 
आपके युगठ चरर्णोको पखारकर महात्मा बलिने वह यञ्च 
प्राप्त किया, जिसका गान संत पुरुष करते ह । केव 
य ही नद्ी--उन्दे अतुलनीय रेखयं तथा वह गति 
प्राप्त इई, जो अनन्य प्रेमी भक्तोको प्रप्त होती है ॥१४॥ 
आपके चरणोदक- गङ्खाजीने तोनों लोक पित्र कर 
दिये । सचमुच वे मूतिंमान्‌ पवित्रता ह । उन्हीके स्पर- 
से सगरके पुरत्रोो सद्रति प्राप्त इ६ भौर उक्षी जकको 
खय भगवान्‌ राङ्करने अपने सिरपर धारण किया ॥१५॥ 
यदुवंशरिरोमणे ! आप देवताओके भी भाराष्यदेव है ।' 
जगत्‌के स्वामी हैँ | आपके गुण ओर लीगार्ओका श्ण 
तया कीतन बडा ही मङ्गख्कारी है । उत्तम पुरुष 
आपके गुणोका कीतेन करते रहते हैँ । नारायण | मै 


भापको नमस्कार करता दह ॥ १६॥ 


२७९ .. 


॥ 
4 


१ 
\ 





१.2 [ श्रः = = 





= चक + 
` ककष र कित्वे 


ॐ ॥ # » (नि = कै न ¢ > ' क त 
9. 0 +^ न 1 11. 9, !. ऋः 
^ त च त त ॥ म + # च ध १ 
॥ रः + = ककि ~ ~ 4 ५ १ (१) ~ {4 = 4 र 
५": ` * ®` ;* . त -4 ४७ ह {क 2 4 ४ । 9 
ऋचः ककन = + = को शो $ 2. न -& 1 भ | ^ 1 न र्य 1) 
०~# /4 ॥ 
* * ` जच वे ; [२ कै ~~ = > 
गक + = ~+ न्क । # । भि कः < 4 ४. ॐ त्रः # 





















३८० 





श्रीभगवानुवाच 


आयास्ये भवतो गेहमहमायंसमन्वितः । 


श्रीद्ुक उवाच 
एवयुक्तो भगवता सोऽक्रूरो विमना इव । 


पुरीं प्रविष्टः कंसाय कमावेद्य गृहं ययो ॥१८॥ 
अथापराहे भगवान्‌ कृष्णः सङ्कपणानितः । 
मथुरां प्राविशद्‌ गपेदिदश्चुः परिवारितः ॥१९॥ 
` ददर्थ॑तां स्फारिकतङ्गपोपुर- 
दारां चबृहद्धेमकपाटतोरणाम्‌ । 
ताम्रारकोष्ठां परिखादुरासदा- 
युद्यानरम्योपवनोपञ्ोभिताम्‌ ॥२०॥। 
सौवर्णशङ्धाटकदरम्यनिष्डुटेः 
प्रेणीसभाभिभबनेरुपस्छृताम्‌ । 
वैदूयंवजामलनीरविद्रमे- 


्क्तादरिद्धि्वलभीषु 
जुष्टेषु जालायुखरम्ध्ङ्कटिमे- 


वेदिषु ॥२१॥ 


त्वाविष्टपारावतवर्हिनादिताम्‌ । | 


| 
ससिक्तरथ्यापण पागंचस्वरां | 


घ्रीमद्भागवत 


[ अ० ४१ 








भ्रीभगवानने कहा--चाचाजी ! मै दाऊ भेयाके 
साध आपके घर आज्गा ओर पहठे इस यदुवंशियोकि 
द्रोही कसको मारकर तब अपने सभी सुत्‌-खजर्नोँका 


यदुचक्रद्धहं हत्वा वितरिष्ये सुहृतप्रियम्‌ ॥ १७] प्रिय करेगा ॥ १७ ॥ 


शरी्युकदेवजी कते ह--परीक्षित्‌ ! मगवान्‌के 
इस प्रकार कष्नेपर अक्रूरजी कुछ अनमने-से हो गये | 
उन्होने पुरीम प्रवेश करके कससे श्रीकृष्ण ओर बलरामके 
ठे अनेका समाचार निवेदन किया ओर फिर अपने धर 
गये ॥ १८ ॥ दूसरे दिन तीसरे पहर वटरामजी ओर 
ग्रालवारोके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्णने मश्रुरापुरीको देखनेके 
व्यि नगरमे प्रवेद किया ॥ १९ ॥ भगवानने देखा कि 
नगरके परकोटेमें स्फटिकमणि ( विद्धौर ) के बहत ऊचे- 
ऊवे गोपुर्‌ ८ प्रधान दरवाजे ) तथा धरोमें भी वड-वडे 
फाटक बने इए हैँ | उनमें सोनेके वड़-बड़ किंवाड़ लगे 
है ओर सोनेके ही तोरण ( बाहरी दरवाजे ) बने इए 
हैँ | नगरके चारों ओर तवे ओर पीतल्की चहारदीवारी 
बनी हई है । खारक काएण ओर करी से उस नगरमे प्रवरे 
करना बहत कठिन है । सथान-प्यानपर सुन्दर सुन्दर 
उद्यान ओर रमणीय उपवन ( केवल च्िर्योके उपयोगमे 
अनेवाठे बगीचे ) शोभायमान हैँ || २० ॥ सुव्रणसे सजे 
इए चौराहे, धनिययोके महल, उन्ढीके साधके बगीचे, 
कारीगरोके वैठनेके सान या प्रजावगके समाभवन 
( टाउनहा ) ओर साधारण रोगेकि निव्रासगरह नगरकी 
रोमा बदा रहे हैँ | वेदूय, दीरे, स्फटिक ( विल्लीर ), 
नीलम, मूग, मोती ओर पने आदिसे जडे इए छञ्जे, 
चवरूतरे, ्षरोखे एवं फर आदि जगमगा रहे हैँ । उनपर 
बेटे हए कबरूतर, मोर आदि पक्षी मांति-मोंतिक्रौ बोटी 
बोल रहे है । सडक, बाजार, गली एवं चौराहोंपर ख 
किडकाव किया गया है | स्थान-स्थानपर लोके गजरे 


परकोणमास्याङ्ङरलाजतण्डुल।म्‌ ॥२२॥ जवारे ८ जौके अङ्कुर ), खील ओर चावल व्िखरे इए 


आपू्णङ्गम्भैदधिचन्दनोशितैः 


म्रघूनदीपावलिभिः सपद्ल्वैः { 


। ॐ 


॥ क ~ र, 





है ॥ २१-२२ ॥ धररोके दखाजोंपर दद्दी ओर चन्दन 
आदिसे चर्चित जल्से भरे इए कलश रक्ले हैँ ओर वे 
परल, दीपक, नयी-नयी कोपे, फरपहित केके ओर 
सुपारीके वृक्ष, चोटी-रटी अडियो ओर रेरामी वजोसे 


| सपद्िक | २३॥ | मलीभाति सजाये इए द ॥ २२ ॥ 


` "णव कका “नर 
। | "क 9 व्च 


अ० ४१ | दशम्‌ स्कन्ध ३८१ 


णी नि वणम नेमे कयित 





"णी य क क -------------------------------------~----~-----~--~----------- ~ ----- --------~- ~ 





तां सस्प्रथिष्टो वसुदेवनन्दनौ परीक्षित्‌ ! वघुदेवनन्दन भगग्रान्‌ श्रीकृष्ण ओर 
तौ लस ब मजीने म्वच्छरार्खोके साथ राजपयसे मथुरा नगरीमे 

प्रवेश किया । उस समय नगरकी नार्थो वड उत्सुकतासे 

द्रष्टुं समीयुस्त्वरिताः पुरल्ियो उन्हें देखनेके य्ि ञ्जटपट अटासिोपर चढ़ गयीं ॥२४॥ 
द्म्याणि चैवारुरदुर्मपोतछुकाः ।॥२४॥ किसी-किसीने जस्दीके कारण अपने वस्र ओर गहने 

उकटे प्रन ल्य । किंसीने मूसे कुण्डल, कंगन आदि 

काचिद्‌ विषयेगधतवस्नभूषणा जोडेसे पहने जानेवाले आभूष्णोमेसे एक दी पहना नीर 
चर प्रडी । कोई एक ही कानमे पत्र नामक भाभूषण 
| घारण कर पायी थी; तो किसीने एक ही रपौविमे पाय- 
कुतखपवश्रवणेकन्‌ पुरा जेब पहन रक्खा था | कोई एक ही खमे अञ्न 
ओंज पायी थी ओर दूसरीमे बिना ओजे दही चठ 
पड़ी ॥२५५॥ कटं रमणियोँ तो भोजन कर रही थी, वे हाथका 
अनन्त्यं रष्छास्तदणास्य सोत्सवा कौर एककर चल पड़ीं । सत्रका मन उत्साह ओर 
8 आनन्दसे भर दहा था । कोई-कोई उबटन त्वा रदी 

अभ्यस्यमानं अङतोपमजजनाः । थीं, वे बिना स्नान किये द्वी दौड पड़ीं। जोसो रदी 

थी, वे कोलाहल सुनकर उठ खडी इई ओर उसी 
क दौड़ चीं । जो माता वर्चोको दुघ पलि रही 
1; थीं, वे उन्हं गोदसे हटाकर भगवान्‌ श्रीकृष्णको देखनेके 
्र॑पययन्तयोऽ्भमपोदय मातरः ।।२६॥ | ह च पड़ ॥ २६॥ क 8, 


भिस्म्रस्य चेक युगलेष्वथापराः 


ङकत्या द्वितीयं स्वपशश्च लोचनम्‌।।२५॥ 


भ 


खपन्त्यं उस्थायं निकषस्य निःखनं 


म्र ना तासायरविन्दखोचन ~ मतवाठे गजराजके समान बडी मस्तीसे चर रहे थे | 
& उन्होने लश्ष्मीको भी आनन्दित करनेवाठे अपने उयाम- 

भरगस्भरलीखाहसितावरोकनंः । सुन्दर विग्रहसे नगरनारि्यके .नत्रोंको बड़ा आनन्द दिया 

ओर अपनी विखासपूणं प्रगल्भ हंसी तथा प्रेपभरी चितवन- 

जहार मत्तदिरदेन्द्रविक्रमो से उनके मन चुरा ल्ि ॥ २७ ॥ मथुराकी लिय बहत 


= दिरनसे भगवान्‌ श्रीकृष्णकी अद्भत टीकर नती आ 
दशं ॒ददन््रीरमणात्मनोत्सवभ्‌ ॥२७। | री यां | उनके चित चिरकालतेश्रीष्णके व्यि चक्रल, ` 4 

महः्रतमनुद्रतचेतसस्तं व्याकुल हो रहे ये आज उन्होने उन्हें देखा । मगवान्‌ 
^ | श्रीकृष्णने मी अपनी प्रेमभरी चितवन ओर मन्द्‌ सुसकान- 
त्पक्षण्यत्सितसयधोक्षणलन्धमाना; । | की सुधासे सींचकर उनका सम्मान किया । परीक्षित्‌! ` । 
उन िर्योने नेत्रोके द्वारा मगवानूको अपने इदयमे के ^ 
आनन्दम्‌ त्कयु्य हय > स्मरन जाकर उनके आनन्दमय खसरूपका आच्ङ्नि क्या। 
नत | | उनका शरीर पुख्कित हो गया ओर बहुत दिनोकी _ 
इप्यचयचो जहूरनन्तमरिनद्मापिम्‌ 4 विरह-व्याधि शान्त हो गयी ॥२८॥ मधुराकी नारा अपने- वि 
चु ने महो की भटारयोपर चदकर बलराम ओर श्रीकृष्णप्र ` 4 | 

 श्रीदयुत्फुटयखाम्बुजाः । 

च द िलरारुदाः तयान पुर्पोकी वर्षा करने लगी । उस समय ठन लियो- ` 
अभ्पचषन्‌ सोभनस्पें $ भ्रमद्‌ बरकैरबो ॥२९॥॥ । के मुखकमक प्रेके आवेगसे खिल रह थे ॥ २९ ॥ 4 


द 


[ग 





$. "न व+ >, 
न - नर ~+ ऋ 4 
च षी » 
क क ; ष्व त 
५ 








ॐ 
मे 1 
` ¢ । >, 

( द, १ क ५४ ऋ । १ => 





3 ॥ 1 ४ २, क २, ४ ६ त 
3 1.* 3 व भ ( = = - चा = क ~: ~ ष 7 ~ शु ५ ५ 
० ---4 1 ~ > न प्च 


३८२ श्रीमद्भागवत | अ० ४१ 








ब्रह्मण, क्षत्रिय ओर वै्योने स्थान-स्थानपर ददी, अक्षत, 
जसे भरेपात्र, श्रखोके हार, चन्दन ओर मटकी सामग्रियो 
से आनन्दम्न होकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वल्रामजीकी 
पूजा की ॥ ३० ॥ मगवानूक्तो देखकर सभी पुखासी 
उचुः पोरा अहो गोप्यस्तपः फिमवरन्‌ महत्‌ । शा ने कने धन्य ह | धन्य द! गप 

रेसी कोन-सी महान्‌ तपस्या की है, जिसके कारण वे 

. | मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाठे इन दोनों मनोह 
या द्येतावलुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवो ॥२१॥ | किशोरोको देखती रहती ह ॥ ३१ ॥ 


दध्यक्षतैः सोदपात्रैः सम्गन्धेरभ्थुपायनंः । 


तावानचुः भ्रखदितास्तत्र तत्र दिजातयः ॥२०॥। 


इसी समय भगवान्‌ श्रीकृष्णने देखा किं एक धोबी, 
जो कपड़े रगनेका भी काम करता था, उनकी ओर आ 
रहा है । भगवान्‌ श्रीकरष्णने उक्तसे घुले इए उत्तम-उत्तम 
कपडे मागे ॥ ३२ ॥ भगवान्‌ने कहा-- "माई ! तुम 
हमे रसे वस्र दो, जो हमारे इरीरमें प्र-प्र आ जाँ । 
वास्तवे हमटोग उन वख्रोके अधिकारी हैँ | इसमे 
सदेह नहीं कि यदि तुम हमटोर्गोको वल्ल दोगे, तो 
तुम्हा परम कल्याणह्योगाः ॥ ३३ ॥ परीत्षित्‌ ! मगवान्‌ 
सवत्र परिपणं है । सव कुछ उन्दीका दहै | फिर भी 
उन्होने इस प्रकार मोगनेकी गीर! की; परंतु वह 
मूख राजा कंसका सेवक होनेके कारण मतवाला हो 
रह्या था । भगवान्‌की वक्तु भगवानको देना तो दूर रहा, 
उसने क्रोधमें भरकर आक्षेप करते इए कहा--॥२३४॥ 
(तुमल्येग रहते हो सदा पद्ाड ओर जगर्खोमे, क्या वहाँ 
एसे हयी व्र पहनते हो ! तुभठोग बहत उदण्ड हो गये 
परिषत्त किद्हृतता राजद्रनयाण्यभीप्सथ ॥३५॥ हो, तभी रेसी बढ़-बद़कर बाते करते हो | अव तुम्हं राजा- 
का धन द्टनेकी इच्छा हह है ॥ ३५ ॥ अरे, मूर्खो । 
जाभो; भाग जाओ । यदि कुछ दिन जीनेकी इच्छा 
बध्नन्ति चन्ति छम्पन्ति दपं राजङ्लानि वे ॥३६॥ त ८ श 

६ त जो कुछ उनके पाप्त होता है, छीन लेते हैः ॥ ३६ ॥ 

पव विकत्थमानसख इषितो सुतः । जब वह धोनी इक्त प्रकार बहत कुछ बह क-बहककर 

बातें कटने खगा, तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने तनिक कुपित 

रजकस्य कराग्रेण धिरः क 5 1तत्‌ः॥ *५७॥ होकर उसे र तमाचा जमाया ओर २ 

ज ५ धड़ामसे धड़से नीचे जा गिरा ॥ ३७ ॥ यह देखकर 

तस्यालुजीषिनः सवे वसः कोशान्‌ वियुज्य बे। .। उस धोबीके अधीन काम करनेवाले सन-के-सब कपड़कि 


१. दुर्मुखः । २, बाह्यपोषर्वितत्रयुः । 


। ॥ 
: | + + ^ 


रजक कशथिदायान्तं रङ्ककारं गदाग्रजः 


दृष्ायाचत वासांसि धोतान्यद्युत्तमानि च ॥३२॥ 


देद्यावयोः स्चचितान्यङ्ग वासांसि चाह॑तोः 


भविष्यति परं श्रेयो दातस्ते नात्र संशयः ॥३३॥ 


स॒ याचितो भगवता परिपूर्णेन सर्वतः 


साक्षेपं रुषितः प्राह भृत्यो राज्ञः सुदुमंदः ॥३४॥ 


ईैदश्यान्येव वाक्षांसि नित्यं भिरिवनेचराः 


याता बाकिच्या मेवं प्राथ्यं यदि जिजीविषा 


१ त "1 => 


# च, 
{ चै "कः = 
ः ऋ ~ [ ऋ नक ह 
क र क ॥ > = भ दर क ),५ 
। [2 प 4 4 3 2२ + ~ च ठ 
किन ककु - ४ क व क. १.4 $: 
भे ॥ पि ऋ = ईष ६ / ग १ । ५१ १ -^ # १ च ॐ < ऋ च 
"8 ॥ ५ # १.५४ # । क ५ । । (1 


चै 8) =; ,च 

(1 ५ कै च. 
वर ३ 2) 9 + 
१ गह -= १ भ, शकक 


३ 
,१ 
¢, 4) 


^ ह # 8 १, 





ज््षा) क)्तै ौ। १११1 त्री की 18911 


अ० ४१ 1 दक्षम्‌ स्कन्ध ३८२ 











दुधुवुः सर्वतो मां वासांसि जगेऽच्युतः ॥३८॥ | गदर बही छोड़कर इधर-उधर भाग गये । भगवानूले उन 
वराको ठे च्या ॥ २८ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बराम- 
वसितवाऽऽत्मग्रिे बसर ष्णः सङ्षणस्तथा जीने मनमाने वचर प्रहन य्ि तथा कचे इए वखमिंसे 
बहुत-से अपने साथी ग्वाकबार्गोको भी दिये । बह्त-से 
दोषाण्यादत्त गोपेभ्यो विसृज्य थुवि कानिचित्‌ ३९॥ | कपड़े तो वही जमीनपर ही छोड़कर चठ दिये ॥३९॥ 


ततस्तु वायकः प्रीतस्तयोर्वेषमकर्पयत्‌ 1 मगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बलराम जव कुछ आगे बद, 
तब उन्हे एक दज मिका । भगवानका अनुपम सौन्दयं 
विचित्रवर्णेशेरेयेराकरपेरनुरूपतः ॥४०॥ | देखकर उसे वड प्रसन्नता इई । उसने उन रग-विरगे 
सुन्दर वरखको उनके शरीरपर रेसे ढगसे सजा दिया कि 
नानालक्षणवेषाभ्यां कृष्णरामौ भिरेजतुः । वे सब ठीक-ठीक फब गये 1 ४० ॥ अनेक प्रकारके वल्नसि 


विभूषित होकर दोनों भाई ओर भी अधिक रोभायमान 
च हए । रेसे जान पडते, मानो उस्सवके समय सवेत ओर 
खलङ्कृतो बालगजौ पवंणीव॒ सितेतरो 1\४१। | श्याम गजशावक मीमँति सजा दिये गये ह ॥ ४१॥ 
| भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस दर्जीपर वहत प्रसन इए । उन्न 
तस प्रसन्नो भगवान्‌ प्रादात्‌ सारूप्यमात्मनः। | उसे इस कोकमे मप्र धन-सम्पत्ति, बररेशयं, अपनी 
स्मृति ओर दूरतक देखने-घुनने आदिकी इन्द्रियसम्बन्धी 
। | सेक्े बर | शक्तियाँ दीं ओर मल्युके बादके व्यि अपना सारूप्य 
श्रियं च प्रमां लोके बलशवयस्रतीन्दरियम्‌ ॥४२॥ मोक्ष भी दे दिया ॥ ४२ ॥ 
ततः सुदाम्नो भवनं मालाकारष्य जग्मतुः इसके वाद मगान्‌ श्रीकृष्ण सुदामा माठीके घर 
| गये । दोनों मार्योको देखते ही सुदामा उठ खडा इ 
ओर पृथ्वीपर सिर रखकर उन प्रणाम किया ॥ ४२ ॥ 
। फिर उनको आसनपर वरैठाकर उनके पौव पखारे, हाय 
| धुय ओर तदनन्तर ग्बाबा्छोके सहित सबकी कि 
| हार, पान; चन्दन आदि सामभ्रि्योसि विधिपूवंक प्रजा 
की ॥ ४४ ॥ इसके पश्चात्‌ उसने प्राथना की- “प्रमो । 
राह नः सार्थकं जन्म पावितं च छलं प्रभो । | भाप दोनोकि छमागमनसे हमारा जन्म सुकं ह गया। = 
हमारा कुक पवित्र हो गया | आज हम पितर, ऋषि ओर ` 
पित्देवषेयो मह्यं तुष्टा द्यागमनेन ताम्‌ ॥४५॥ | देवताओके ऋणसे मुक्त हो गये । वे हमपर परमस्तुष्ट 
| है ॥ ४५॥ आप दोनो सम्पूणं जगतके परम कारणर्है । आप 
भवन्तो किल विश्वस्य जगतः कारणं प्रम्‌ । संसारके अभ्युदय-उनति ओर निःश्रेयस-मोक्षके च्वि 
ही इस पृ्वीपर अपने ज्ञान, बढ आदि अंशक साथ अवतीणं 
अवतीणाविहांशेन कमाय च. भवाव +) । इर हँ ॥ ४६॥ ययपि आप प्रेम करनेवाकसि ही प्रेम करते 
नहि वां विषमा दृटिः सुदृदोजमदात्मनो श. है, भजन करनेवार््रोको ही मजते है फिर भी आपकी 
८ , इष्टिम विषमता नहीं है । क्योकि भप सारे जगत्‌के 
समयोः सर्वभूतेषु भजन्तं भजतोरपि !\ ४७ परम इद्‌ ओर आतमा है । जाप समत प्राणियों जीर 





तो दष्टा स ससुत्थाय ननाम शिरसा भुवि ॥४३॥ 


तयोरास्नमानीय पायं ॒वचार्यार्दणादिभिः । 


पूजां साचुगयोशक्रे सरकताम्बूलायुेपनैः ॥४४॥ 





* 
७ 
अन क 
1 = गः ५ 





आ = क ज ज 
[मभि भि की कि ग सी भै 








द्र | आप दोनों मुञ्चे आज्ञा दीजिये कि म आपलोरगोकी 


पुसोऽत्यलुग्रहो द्येष भवद्धिर्य॑न्नियुज्यते ॥४७८॥। | क्या सेवा क । भगवन्‌ ¡ जीधपर्‌ आपका यह बहत 
। वड़ा अनुग्रह है, पूणं कृपा-प्रसांद है कि आप उसे आज्ञा 
मीत देकर किसी कार्यमें नियुक्त करते है ॥ ४८ ॥ राजेन्द्र । 
इत्यभिप्रेत्य राजेन्दर सुदामा शतित्‌* । सुदामा माटीने इस प्रकार प्राथना करनेके बाद भगवान्‌- 
. का अभिप्राय जानकर वड प्रेम ओर आनन्दसे भरकर्‌ 
ण क| ] लि =, र ध 

शस्तः खगन्धः इसुमम।छा विरचिता ददां ॥४९॥ | अव्यन्त खुन्दर-खुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंसे भूथे हए 
। | हार उन्हें पहनाये ॥ ४९ ॥ जव ग्वाला ओर वलराम- 
॥ ताभिः खलङ्कतौ प्रीतौ कृष्णरामौ सहालगौ । जीके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्ण उन सुन्दर-सुन्दर मालाम 
। अलङ्कृत हो चुके, तव उन वरदायक प्रभुने प्रसन्न होकर 
ˆ | ध विनोत ओर शरणागत सुदामाको श्रे बर दिये॥५०॥खुदामा 
( अणताय प्रपन्नाय ददतुवेरदा वरान्‌ ॥५०।। | मालीने उनसे यदी वर मागा कि श्रमो † आप ही समस्त 
 प्राणियोके आत्मा है । सर्वखखूप आपके चर्णोमे मेरी 
अचर भक्ति हो । आपके भक्तसि मेश सौदहादं-मेत्रीका 
सम्बन्ध ह्यो ओर समस्त प्राणियेकि प्रति अद्दैतुक दयाका 
भाव बना रहे ॥ ५१ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने ददामाको 
तद्धक्तु च सहाद मूतेषु च द्यां पराम्‌ ।॥५१॥ | उके मौगि हए वर तो दिये ही दसी क्म भी दी, 
व 3 धिनी जो वंशापरम्पराके साथ-साथ बढती जाय; ओर्‌ प्ता ही 
इति तस्मे वरं दत्वा श्रियं चान्वयवर्धिनीम्‌ । वल, आयु, कीतिं तथा कान्तिक्षा मी वरदान दिया | 
सके वाद्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ वहसे 

बलमायुयशः कान्ति निजंगाम सदाग्रजः ॥५२॥ | विदा हए ॥ ५२ ॥ 





"क 









सोऽपि ववरेऽचखां भक्ति यसिन्नेवाखिलात्मनि। 


च [३ 1.3 क~~ 4 १4. 4 + 1 - > अक 
। 9) 1 न + , कं शै - क ~ = = ॐच १, ¶ 





चन 1. 


इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमक्स्यां संहितायां दशमस्कन्ये प्रबर्ध 
पुरभ्रवेशो नाम एकचत्वारिशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ 








अथ द्विचत्वारिरोऽध्यायः 


कुब्जापर कपा, धुषभङ्ग ओर कंसकी घवराहर 


श्रीययुक उवाच री ्युकदेवजी कते है- परीक्षित्‌ ! इसके बाद 
अ ~ भगवान्‌ श्रीकृष्ण जव अपनी मण्डटीके साथ राजमागसे 
अथ वजन्‌ राजपथेन माधवः आगे नदे, तब उन्दने एक यु्रती खीको देखा । 


त उसका ह तो सन्दर था, परंतु बह शरीरसे कुबड़ी 
जिं गृीताज्गविलेपभाजनाम्‌ | थी । इसीसे उक्षका नाम पड़ गया था “कुन्जाः । वहं 


विलोक्य ङन्जां युवतीं अपने हाथमे चन्दनका पात्र व्यि इए जा रदी थी। 
0 मगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रेमरसका दान करनेवि है, उन्दोनि 








3 थ १ ` ~ टै 
+ + र ॥ ह| क र ~ कि व्ह $, क =+ 


ह” नत $^ ऊ 9 छः -> शन । 

न # # ५ 7. ५ क. ॐ = ०, ॐ १५ 2 9, > १२ कक + १ ॥ >. १8 १ १) न 

क्‌ । ""र ~ ~$ 2 ति - न -" ~~ कै "8 ५ न ॐ 4 । {>> ॐ - ५ - न क न, ` ग > कः ` न 4 ~ ` 
4 ~ # न्क 0 त $ "व क ४, प ॥ ४ क क क ~ ' 1" स (क अला १ व ` का "0 च = वा अद , ह १ १ 7 त तय 


श्रीमद्भागवतं [ अ० ४२ 


तावाज्ञापयतं भृत्यं किमहं करवाणि वाम्‌ । पदारयोमिं समरूपसे सित हैँ ॥ ४७ ॥ मँ आपका दास 


पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन्‌ रसप्रदः ॥ १॥ । कुन्जापर छपा करनेके व्व हसते इए उसे धूञार-॥ १॥ 


शः 































अ० ४२ | दरम स्कन्ध | ३८५. 








का स्वं॑वरोवेतदु दालुङेषनं "न्दरो तुम कौन हो १ यह्व चन्दन किसके व्यि 
फखाङ्गने वा कथयल साधु नः | ठे जा रदीदहो १ कल्याणी ! हमे सब वात सच 


देषावयोरङ्गविलेपएतम सच वतठा दो । यह उत्तम चन्दन, यढ अङ्गराग हमे 
मीदो | इस दानषेओोव्र दही तुम्दःरा परम कल्याण 
भ्रेयस्ततस्ते नचिराद्‌ भविष्यति 1 २॥| दोगाः ॥२॥ 


सेरन्यूवाच उवटन आदि टगनेवाटी सेरन्ध्ी कुञ्डलि कश- 
(परम सुन्दर ! मेँ कंक्षकी प्रिय दासी ट । महाराज 


दाद्यस्म्यहं सन्दर कंससस्मता | सुश्चे वहत मानते ह । मे नाम त्रिवक्रा ( कुन्जा ) 

ठ उनके यहा चन्दन, अङ्गराग च्गानेका काम 

द्विवक्रचासा द्युङेपकभंणि । | करती द्रं | मेरे द्वारा तैयार किये इए चन्दन ओर 

अङ्गराग मोजराज कसको बहत भाते हैँ । परंतु आप 

दोन सि बहकर उसका ओर कोई उत्तम पात्र नहीं 

विना सुखां कोऽन्यतबष्तददति । २ १ । दैः ॥ ३ ॥ मगतरान्‌के सोन्दय, सुकुमारता, रसिकता 

। मन्दहास्य, त्रेमाटप ओर. चार्‌ चितवनसरे कुट्जाका मन 

पयेद्यमधुर्बहसि तारापदी धिरः | । हाथसे निक गया । उसने भगवानूप्रर अपना हदय 

। न्योदावर्‌ कर दिया । उक्षे दोनों भादर्योको वह सुन्दर 

-धरषितात्मा ददं सन्द्रघुभयोरसुखेप नृम्रू | ४॥। | ओर गाढ़ा अङ्गराग दे दिया ॥ ४] तव भगवान्‌ 

श्रीकृष्णने भपने सवे शरीरपर पीठे रगका ओर 

तत॒त्तावङ्रागम खवणतरखोभिना । बटरामजीने अपने गोरे शरीरपर कार रगका अङ्गराग 

गाया तया नामिसे ऊग्रके भागमं अनुरञ्जित 

-सस्प्रादपरमणित शुद्भातेऽयुरञ्जि तो ॥ "५॥ होकर वे अत्यन्त सुशोपित इए ॥ ५५ ॥ भगवान्‌ 

श्रीकृष्ण उस कुव्जापर वहत प्रसन इए । उन्दोनि 

अपने दशनका प्रत्यक्ष फल दिखलनेके स्यि तीन 

चछज्वीं कतुं मनश्चक्रे दर्शयन्‌ दर्शने फलम्‌ ॥ ६ ॥ | जगहसे टद र्ति छुन्दर सुखवाठी बुल्जाको सीषी 
करनेका विचार क्रिया।|६॥मगवान्‌ने अनने चरणोसे कुन्जा- 

-पद्धयामाक्रम्य ग्रपदे दवङ्ख्युत्तानपाणिना । के वैरके दोनों पंजे दवा व्यि ओर हथ ऊँचा करफे दो 


लियो उसकी लेडीमे व्गायीं तथा उक्षके दारीरकरो 
ह॒ चुयुकेऽप्यात्मञदनीनमद्च्छुतः । ७ ॥ तनिक उचका दिया ॥ ७ ]॥ उचकाते ही उसके सारे 


[म 


म्धाधितं भोजपतेरतिभ्रियं 


-प्रसन्ो भगवान्‌ ज्ख्जां त्रिवक्रां रुचिराननाम्‌ 


सा तदजेक्षमानाङ्गी बहच्छोणिपयोधरा । अङ्ग सीघे ओर समान हो गये 1 प्रेम ओर सुक्तिके दाता 

, | भगवानके सरासे वह तत्कारु विशाल नितम्ब तथा 
ततो सूपगुणौदार्यसम्पन्ना प्राह केशवम्‌ । उसी क्षण डुष्जा सूप, गुण जर ` व ते 
सम्पन्‌ हो गथी । उसके मनम सगवान्‌ॐ ए १ नकी 
तरी प्रान्तमाङ्ृष्य सयन्ती जातद्च्छया ।। ९ ॥ | कामना जाग उश | उक्षे उनके दु डकर 


(^ ~ "५५ = त-अ ~ 1 ए र 
"की ¢ * 1 + च र + | 4 "नः न्न म चकः ज क 3 # > 
क च १ = तः क ् ॥ वाः ५ र केः + क@ क 

> क) क, ॥ “ षू क टर क 











* च ` 
न ; = च 











नि व्न्न्ड य 


५ विक ३ = 
नि ककि ८ 
--- = “अ ककनकः ~ 
8; + क~ क 2, 8 - > 
३, * क * 4 क ४ त 
नी ४ ~^ 
> + = 9: छो कये 


१ +,\६१ 
५ ॐ ् 


कश + [~ 


र 
क 


म न्यस 






> च 
जो, = 


~ * ~ - 8 ~ 

# "क्क 

< ~ " छे $ क # 

~+ 1 ^ 


क क >, 9 


0 ह: 
4 क 
चवक -9 (@ 5 क 6 






१.१ + 
9 ॥ि 2 व |. १ (4 १. 
ध ॥ 


१ । = --* 
= ५ ;क ^ = चु पु ५.७ ॐ ~ $ + 
== ° ो ~= किक 1 
8१ ^ । 
1 क ऋ 
` 


~ ५ >“ + 


ै 
५ हि 
नि ही ` क क कू 
> शनैर. ` 


त 9 
1 (न 


[ 
+ च्च # 
| ~ १ 
१ क 


। र 3 ष 











न 
~ 





कनि स्क + ए । न > ~~ र ४ लौ द 


ॐ "णल्‌ धनुषो † क ४ ९ ् = इ 
4 छ 
च च ॐ. 
क क ज्जिव ् क~ ---------------------------------------------~-- 
१डुःजिवः। 
न ॥ ॥ ण्न 
7 न ` = “थ ~ ५॥ ज च 
* = , क [ १ ५ ~ (= 
# ब रन ^ < ~ न क 4 
९ नक + ऋ - । "जः 
॥ ॥॥ च 
[+ ॥ न 9 [4 


३८६ श्रीमद्भागवत | अ० ४२ 





112. 3 व; 


एहि वीर गृहं यामो न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे । | मुसकराते हए कहा--॥ ९ ॥ ध्वीरशिरोमणे ! आईये, 

। | धर चे । अव मै आपको यदौ नदीं छोड सकती 
त्वयोन्मथितचित्तायाः प्रसीद ॒पुरुप्षभ ।१०॥ | क्योकि आपने मेरे चित्तको मथ डाय दे । पुरषोत्तम ! 
मुञ्च दासीपर प्रपतन होये" ॥ १० ॥ जव वल्शमजीकेः 

यवं जिया याच्यमानः कृष्णो रामख परयवः ! | साम्ने ही कुग्जनि इस प्रकार ्राथना की, तव भगवान्‌ 
॑ | श्रीक्रष्णने अपने साथी ाख्वाटेकि मुहकी ओर देखकरं 

| हं €ते इए उससे कहा--॥ ११ ॥ शुन्दसे ! तुम्हारा 
घर संसारी लोगके ब्य अपनी मानक्षिक व्याधि 
र मिटानेका साधन है | मे अयना कायं प्रा कफे अवदय 
एष्यामि ते गृहं सुभः पुसामाधिविकेशेनस्‌ । | वहां भआङगा । हमारे-जंसे वेधरके बटोियोको तुम्दारा ही 
| तो आद्रा दै॥ १२॥ इक्त प्रकार मीदी-मीटी वाते 


साधिता्थेऽयृहाणां नःपान्थानां तवं परायणम्‌॥।१२॥| करे भगवान्‌ श्री्ष्णने उसे विदा करर दिया । जव 
वे व्यापा्ियेकि वाजारमें पट्व॑चे, तव उन व्यापायियोने 
उनका तथा वठक्रामजीका पान; प्ुरके हार, चन्दन 
ओर तरह-तरहकी भैट-उपहारोसे पूजन 
ट ४ व किया ॥१३॥ उनके दशेनमात्रसे च्ियोके हदयमें प्रका 
नानापायनताम्बूलज्लग्गन्यधः सग्रजाऽ्चतः; ॥९२।।| अवग, भिगनकी आकाद्घा जग उठती थी । यर्हँतक 

कि उन्हं अपने शरीरकी भी सुधर न रहती । उनके 





मखं दीकष्याचगनां च प्रहस स्तायवाच इ ६१९१५ 


विसृज्य माध्व्या वाण्या तां ्रजच्‌ मागे वणिद्पधैः। 


वददंनसरश्षोभादएत्मानं नाविदन्‌ खयः । वख, जडे ओर कंगन दील पड़ जातेथे तथा वे 


चित्रटिखित मूर्तियकि समान उ्या-की-त्यां खड़ी रह 
चिस्तवासःकबरलयाङेख्यमूतयः १७ | जाती थीं ॥ १४ ॥ 


ततः पौरान्‌ पृच्छमानो धर्षः स्थानमच्युतः । हके वाद्‌ भगवान्‌ श्रीृष्ण _पुखासि्सि धुप 


यज्ञका स्थान प्रछते इए ॒रगरालामे प्त्रे ओर वहं 


क ४ 
वशिन्‌ भरिष्टो दच्शे भलुरेनद्रमिवाद्धतम्‌ ।\१५॥ | उन्ोनि चद्व तमान एका बद्धत भुभ 


परुपेबहभिरो्म्चितं परमद्धिमत्‌ । देखा ॥ १५ ॥ उस धलुपमं बहृत-सा धन ख्गाया गया 
था; अनेक बहुमूल्य अलङ्कारोसे उसे सजाया गया था | 


 -बायमाणो स॒भिः इृष्णः प्रसह्य धलुराददे ॥१६॥ | उसकी सूल पूजा की गथी.यी नौर बड़त-ते तनिक 


उसकी रक्षा कर रहे थे । भगवान्‌ श्रीकृष्णने रक्षकः 


करेण वामेन सरीलयुदुधतं तेक्नेपर भी उस धनुषको बलात्कारसे उठा 


सज्यं च छत्वा निमिषेण पर्यताम्‌ । . | व्या ॥ १६ ॥ उन्होने सवके देखूते-देखते उप्त धलुषको 
हम नाये हायसे उठाया, उसपर डोरी चदायी ओर एक 
चरणां तिष्य प्रबभज्ञ मध्यतो क्षणमे खीचकर वी चों-वीचसे उसी प्रकार उसके दो 


यथेक्षुदण्डं ट्कडे कर डाले, जैसे बहत बकान्‌ मतवा हाथी 
्‌ श £ मद्कमः ॥९५॥ खेर -दी-लेकमे ईखको तोड़ डाच्ता है ॥ १७ ॥ जबः 


मानख शब्दः खं रोदसी दिश्ः। धूलुष द्य तव उसके शन्दसे आकाशः, प्री ओौर 









के 
ह 
ॐ #, 
ऋ 
७ # 








अ० ४२ | दशम्‌ स्कन्ध ३८७ 


[7 1 मि 








पस्यामास यं शता कंसन्नासुपागमत्‌ ॥१८॥ | दयार मर गी; उसे छनकर कंस भी भवमीत ह 
| गया ॥ १८ ॥ अव्र धनुपषके रक्षक आततायी असुर 
। अपने सहायकोके साथ बहुत द्वी बिगड़ | वे भगवान्‌ 
श्रीढरष्णको घेरकर खड़े हो गये ओर उन्दं पकड़ लेनेकी 
स इच्छासे चिल्यने कगो- "पकड टो, बोत्र लो, जानेन 
अरहीतुकामा आवतरग्यतां वध्यतामिति ।१९॥ | पावे" || १९॥ उनका दुष्ट भभिप्राय जानकर बट्यामनी 
£ | ओर श्रीकृष्ण भी तनिक कऋरोधित द्यो गये भीर्‌ 
अथ तान्‌ दुरभिभ्रायान्‌ विरोक वरक्षेशवो । । धनुषके दुकर्डोको उठाकर उन्दवीसे उनृका काम तमाम 
कर दिधा ॥ २० ॥ उन्हीं धनुषखण्डोसे उन्दने उन 
करुद्धौ धन्वन अआ!दाम शकले तांश्च जघ्नतुः ॥२०॥ | अघुरोंकी स्ायताक्रे व्यि कंप्तकी भेजी इई सेनक 
भी संहार कर डाव । इ्षके बाद वे यज्ञशालाके प्रधान 
-उलं चं क्ंसभ्रहितं हत्वा शलादुखात्ततः | | टारसे ह ।कर्‌ वाईट नकर आय ओर वड आनन्दसे 
। मधुरापुरीकी शोमा देखते इए विचरते खगे ॥ २१ ॥ 
निष्कम्य चेरत निरीक्ष्य पुरसम्पद्‌ः ॥२९१॥ | जत्र नगरएनिवरा्िन दोनो म्योकि इसख॒ अद्भुत 
पराक्रमकी बात ध्रुनी ओर उनके वेज; सहश्च तथा 
। अनुपम ख्यक्रो देवा तव उन्होने यही निश्च कंथा 
क्ति हो-ननहोये दोनों कोई श्रेष्ठ देवता ॥ २२॥ 
इस प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बल्रामजी पूरी 
सखतन्त्रतासे मथुरापुरीमे विचरण करने खगो | जब 
सूर्यास्त हो गया, तत्र दो नो भाई ग्वाच्राकेसि धिरे इए 
तयोविचरतोः स्वेरमादित्योऽसतष्पेथिवान्‌ । | नगरसे वाक्षर अपने रेप, जाँ छकडे थे, लट 
। अये ॥ २३ ॥ तीनां कोकोके वडे-बडे देवता चाइते ये 
इष्णरमौ व्रतौ मोपेः पुराच्छक्रदमीयतुः ॥२३॥ | कि वमी हमे मिले, परंतु उन्होने सवका परि्याग 
। कर्‌ धिया ओर न चाहनेग्राठे मगवानका वरण क्षिया 


-तद्रक्षिणः सानु चराः पिता आततायिनः । 


तयोतदद्धतं वीयं निशाम्य पुरवाधिनः । 


तेजः प्रागर्म्यं रूपं च सेनिरे धिवुधोत्तमो ॥२२॥ 


गोप्यो युडुन्दबिगमे बिरहातुरा या । उन्द्वीको सदाके च्ि अपना निवासप्यान बना च्या । 
| मथुरावासी उन्हीं पुरुषभूषण भगवान्‌ श्रीक्ृष्णके अङ्ख- ` 
। अङ्गका सीन्दयं देख उनका कितना सोमाग्य . . 

आक्ासतादिय ऋता मधुप्धभूवन्‌ । = अर्का सौन्दथ देख रई ६ । द 


| है ! त्रजमें मगवान्‌की यात्राके समय गोपिषोने विरहातुर . . ` 


५ 


होकर मशुरावािथोके सम्बन्धे जो-जो बातें कही यी, 
वे सब यज्या अक्षरशः स्य इइं । सचषुच वे प्रमानन्दमे ` 
मन हो गये ॥ २४॥ रिरि हाध-पेर धोकर श्रीक्ब्ण 
हिस्वेतरान्‌ चु भजतश्चकमेऽयनं श्रीः ।\२५।। | ओर बठरामजीने दधसे बने हए खीर आदि पदार्थाका | 


९ भोजन किया ओर कंस आगे क्या करना चाहता ` 
अवनिक्ताङ भुक्त्वा क्षो तेपे चनम्‌ । ४६ | 
अवनिक्त तरियुगलौ कल क्षो तेपतेचनम्‌ है, इस बाता पता व्णाकर उक्त रातको वहीं आरामसे 


9 [] 2 ~ = । 
 ऊषतस्तां सुखं रात्रि ज्ञाता कसचिकोषितम्‌ ।॥ २५) | सो गये ॥ २५॥ र 
९. तं । 






मुस्पर्यतां पुरुपभूषणगात्ररक््पी 


" क ॐ अव ऋ > = = 


॥ 
। 
} 
1 





# 1 
प भ 9) 2 ज्वा ५ ष न्क किरिः १ = क्का निक ९१ 
न ५ 


३८८ 


श्रीमद्धागवत 


॥ अ० ४२ 








कंसस्तु धनुषो भङ्गं रक्षिणां खबल्सखय च| 


वृधं निञ्भ्य गोदिन्दरामविक्री डित परम्‌ ॥२६।। 


दीषश्रनागरो भीतो दुनिमित्तानि दुर्मतिः । 


बहन्यचष्टोभयथा गृत्योर्दोत्यकराणि च । २७; 


अदनं खरिरषः प्रतिरूपे च सत्यपि । 


असत्यपि द्िवीये च देरूप्यं ज्योतिषां तथा ।२८]) 


छिद्रभतीतिश्छायायां प्राणघोषालुपश्चुतिः । 
खरणप्रती तिृकषेषु 


खष्ने प्रेतपरिष्वङ्गः खरयानं षिषादनम्‌ । 


यायान्नलदमास्येकस्तेछाभ्यक्तो दिगग्बरः ।।२०। 


अन्यानि चेत्थं भूतानि खप्नजागरितानि च । . 


पश्यन्‌ मरणघन्त्रस्तो निद्रां लेभे न चिन्तया ३१) 


वयुष्टायां निति कौरव्य चयं चाद्धयः सष्त्थिते । 


कारयामास वे कंसो मष्टक्रीडामहोत्सवम्‌ ॥२२॥ 


|. . आनञः पुरपा रङ्गं तयमेवंय जघ्निरे । 


। ॑ , मच्वाशर लङ्कताः सम्भ; पताकाचैरतोरणे; ॥३३२॥ 


तेषु पीरा जानपदा बहमत्रष्रोगमाः 


ति कनि य कि 


खपदानामदश्चनय्‌ ॥२९॥। 


४ 





जव कंसने घना किं श्रीकृष्ण ओर बट्रामने धुप 
तोड़ डाटा, रश्चको तथा उनकी सद्ायताके स्यि मेजी 
हहं सेनाका मी संहार कर डाला ओर यह सव उनके 
व्ये केवर एकः खिव््राड़ ही था---इस्त्के ट्यि उन्हे 


कोद श्रम या कचिनाई नदीं उठानी पडी | २६॥ 


तव व्ह वहू> दही डर गया; उस दर्घा वद्ुतं 
देरतक नींद न आयी । उसे जाग्रत्‌-अव्स्थामें तथा 


खप्नमें भी बहृत-से पेचे उपदान इए, जो उदकी 
मृल्युकरे सुच थे | २७] जाग्रत्‌-अत्रस्थामे उसने देखा कि 
जक या दपण शरीरकी परछई तो पडती है, परतु 
तिर्‌ नहीं दिखायी देता, अगरी आदिकी आड्‌ न होनेपर 
भी चन्द्रमा, तारे ओर दीपक आदिशी अयोतियों उसे 
दो-दो दिखायी पड़ती हं २८ सयाम टेद दिखायी 
पडता है ओर कानमे अगुटी डालकर सुननेपर भी 
्ाणोका ध्रु-घू इन्द्‌ नहीं सुनायी पड़ता ' वृक्ष ुनहलेः 
प्रतीत दवे दै ओर बाद्ध्‌ या कीचड्मं अपने पेरोके. 
चिह नहीं दीख पडते ॥ २९ ॥ कंसने खप्नावस्थाम 
देखा कि वहं प्रेतेके गञे खण रहा है, गघेपर्‌ चदृकर 
चच्ता है ओर विष खा रहादहै, उसका क्षारा शरीर 
तेलसे तर है, गलेमें जपाकुघुम ८ अडद्ख ) की मासं 
है ओर नग्न होकर कहीं जा रहा है ॥ २० ॥ खन्न 
ओर जाग्रत्‌-अवस्थामें उसने इसी प्रकारके ओर भी 
बहुत-से अपरशक्रुन देखे । उनके कारण उसे बड़ी चिन्त। 
हो गयी, वह मृप्युसे उर गया ओर उसे नीद 7 
आयी ॥ ३१ ॥ 

परीक्षित्‌ | जन रात बीत गयी ओर सयनारायण 
रवं समुद्रसे ऊपर उठे, त्र राजा कंसने मल्छ्रीडा 
( दगल ) का महोत्सव प्रारम्भ कराया ॥ ३२ ॥ राज- 
कर्मनचारियोनि रंगभूमिको भलीर्भोति सजाया । तुरी, 
मेरी आदि बाजे बजने टगे । लोगकि बेठनेके मश्च ्ख- 
के गजँ, क्चडियो, वल्ल ओर बंदनवारोसे सजा दिये 
गये ॥ २३ ॥ उनपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरक 
तथा म्रामवादी--छब यथास्थानं बेठ गये । राजाखेग 


बथोपजोषं विविञ्च राजानश्च कृतासनाः ॥३४॥] | मीं अपने-अपने निरिित स्यानपर जा उट ॥ ३४ ॥ 





न । 











> 


अ= ४३ | दराम स्कन्ध ३८१९ 








न ----------------------------------------------------- ग्नी 





तृह्‌ परितोऽमात्ये राभश्च उपाविश्चत्‌ | | राजा कस अपने मन्त्रियकि साथ मण्डलेश्वर ८ छोटे- 
"| छोटे राजाओं ) के वीचमें सवसे श्रेष्ठ राजघिंहासनपर 
मण्डङेश्वरमध्यसो हृदयेन बिदूयता ।२५।। ¦ जा वेढा । इस समय भी अपदाकुनेकि कारण उसका 
| चित्त घवड़ाया इभा था ॥ ३५ | तत्र॒ पहच्वानेकि 
ताक ठोकनेके साय ही वाजे बजने कगे ओर गरबीटे 
पहलवान सत्न सज-घजकर अपने-अपने उस्तादकि 
साथ अखाडमे आ उतरे ॥ ३६ ॥ चाणूर, सुक; 
चाणूरो यष्टिकः इटः शचलस्तो्वरु शव च । कूट, शाक ओर तोशढ आदि प्रधान-प्रधान पह्वान 
स वाजोंकी स॒मधुर प्वनिसे उत्साहित ह्योकर अखाडेमे आ- 
त॒ आसद्‌ रुपस्थान चस्थुवादयप्रहषताः ॥ २७) | आकर वैठ गवे ॥ ३७ ॥ इसी समय भोजराज कंन 
नन्दगोपादयो शोषा भोञराजरमाहुताः । | नन्द्‌ आदि भि "ती | उन छोरगोनि भाक्‌ उसे 
| तरह-तरदकी भट दीं भौर फिर जाकर बे एक मच्चपर 

निवे दिवोपायनास्ते एफखिद्‌ मध्व आविश्‌ २८॥! | बैठ गे ॥ ३८ ॥ 

~क वरन 
इति श्रीमद्भागदते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पर्वर्धे 
मल्छरङ्खोपवणनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ 





वाद्यमानेषु तूयषु भरकतालोत्तरेषु च । 


मह्धाःखेलङ्कुतः दपाःरोपाध्यायाःसमादिशचस्‌)३६। 





समथ जिचलारिकोऽध्यायः 


कुवखयापीडका उद्धार ओर असखाडगै भवेद 


्रीुकं उवाच श्रीट्युकदेवजी कहते ह काम-करोधादि शालरओको 
यथ ष्णश्च रामश्च कृतो चो परन्तपं । पराजित करनेवाले परीक्षित्‌ । अब श्रीकृष्ण जर वठराम 


नय भी ` स्नानादि नित्यकमंसे निचृत्त हो दगल्के अनुख्य 
मरसदुन्दुभिनिरधोषं शुल्व द्षुषुपेयतुः 1 १॥) | नगाडेकी व्वनि सुनकर रङगमूमि देखनेके ल्य च> पड १॥ 
व्रं श्रीङृष्णने रङ्गभूमिके द्रवाजेपर प्च कर देखा 
 रङ्कदारं समासाद्य तसन्‌ नागमवयितम्‌ । १५६. 
प १ < कि वहाँ मह।वतकी प्रेरणासे कुवक्यापीड नाभका हाथी ५ 
अपश्यत्‌ कवलयापीडं कृष्णोऽम्बष्ठप्रचोदितम्‌।। २॥ | खडा है ॥ २ ॥ तब भगवान्‌ श्रीङृष्णने अपनी कमर ` 
क्स टी ओर धुंघराटी अल्कें समेट गीं तथा मेके ` 
समान गम्भीर वाणीसे महातको च्टकारकर कहा ॥२॥ ` 
उवाच हस्प वाचा समेघनादगभी्या 1। ३ ॥ | (भदावत, ओ महावत । इम ॒दोनोको ~ रास्ता दे दे । < 
{ | हमारे माग॑से इट जा । अरे, सुनता नही १ देर मत 
अस्बष्ाम्बष्ट माभ नौ देद्यपक्रम माचिरम्‌ । कर्‌ । नही तो मँ हाथीके साय अमी तञ्चे यमराजके ` 
7 वेत्‌ सद्टशयरं घर पटचाता हू ॥ ७ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने महावतको 
नो चेत्‌ स कञ्जरं स्वादय नयामि यमसादनम्‌ । ४॥ ५ 
५ प | जव इस प्रकार धमकायाः, तब वह्‌ क्रोधसे तिग्म उल 
, एवं निभस्वितोऽम्ब्टः कुपितः कोपितं गजम्‌। ओर उसने काठ, मूम्यु तथा यमराजके समान अत्यन्त ` 
क द्‌ नसनन न र गदयविक्वाव | ` न्न १, मष्टरङ्गोपवर्णनं द्विच । २, बादरपयणिर्वाच } | „ अय. व द : 2 


बदुध्वा परिकरं शौरिः सञ्च टिरालकान्‌ । 


१) 
` ल ॥ 





र, 


३९० 


ऋः ` ` 5 चः च 








कक क 





चोदयामास ष्णाय कालान्तकयमोपमम्‌ ॥ ५॥। | 


करीन्द्रस्तमभिद्रत्य करेण तरसग्रहीत्‌ । 
कराद्‌ विंगरितिः सोऽयं निह््याङ्प्रिष्वरीयत।।६॥ 
संक्ृद्धस्तपरचक्षाणो धरणदृष्टिः स केशवम्‌ । 
ष्राघ्रशत्‌ पुष्करेण स प्रसद्य बिनिगेतः ॥ ७। 
युच्छे प्रगद्यातिबरं धनुषः पश्चर्विंशतिम्‌ । 
विचक्ष यथा नागं सुपणं हव लीलया ॥ ८ ॥ 


स ॒पर्यावतंमानेन सन्यदक्षिणतोऽच्युतः । 


बभ्राम भ्राम्यमाणेन गोचत्सेनेव बाङकः ।॥ ९॥ 


ततोऽभिथ्खमभ्येत्य पाणिनाऽऽहत्य वारणम्‌। 


प्राद्रवन्‌ पातयामास स्प्र्यमानः पदे पदे ॥१०॥ 


स धावन्‌ कीडया भूमो पतित्वा सहसोत्थितः । 


तं मत्वा पतितं कुद्धो दन्ताम्थां सोऽहनत्कितिम्‌। ११। 


 श्विक्रमे प्रतिहते इड्ञरेनद्रोऽत्यमपितः । 








चोद्यमानो महामात्रैः ृष्णमभ्यद्रवद्‌ रुषा ॥१२॥ 


तमापतन्तमासाद्य भगवान्‌ मधुष्दनः । 
निगृह्य पाणिना हस्तं पातयामास भूते ॥१२॥ 
पतितस्य पदाऽऽ क्रम्य पगे इव लीलया । 
तथत्पाव् तेनेभं॑हलिपांधाहनद्वरिः ॥१४।। | महावर्ोका काम तमाम कर्‌ दिया ॥ १४॥ 





भ्रीमद्धागवत 


| अ० ४३ 





भयकर्‌ उवल्यापीडको अङ्कशकी मारसे कद्ध करके 
श्ीकृष्णकी ओर बढाया | ५ | दुत्यापीडने भगवान्‌- 
की ओर स्ञपटकर उन्हे बड़ी तेजीसे सङमे च्पेट च्या; 
परतु भगवान्‌ सुडसे बाहर सरक आये ओर उसे एक 
घूसा जमाकर उसके पैोके वीचमे जा चपि ॥ ६ ॥ 
उन्हं अपने सामने न देखकर कुबय्यापीडको वड़ा क्रोध 
हआ । उप्तने मुघकर भगवान्‌को अपनी सूँइसे टयो 
सिया ओर पकड़ा भी; परंतु उन्दोँने वल्पूर्वक अपनेको 
उससे छंडा च्या ॥ ७ ॥ इसके वाद मगवान्‌ उस 
बलवान्‌ हाथीकी पढ पकड़कर खेक-लेकमे ही उसे घौ 
हाथतक पीछे घसीट खाये; जैसे गरुड सपिको धीर 
लते ॥ ८ ॥ जिक्ठ प्रकार वूभते इए वेके साय 
बाठ्क घूमता है अथवा खयं भगवान्‌ श्रीक्रष्ण जिस 
प्रकार वछडसे खेव्ते थे, वेसे ही वे उक्तकी {3 पकड- 
कर्‌ उसे धुमाने ओर खेलने खमे | जव बह दासे 
घूमकर उनको पकड़ना चाहता; तव दे वाये आ जाते 
ओर जव ब्रह वायेकी भर घूमता, तव वे दाये धूम 
जाते ॥ ९ ॥ इसके वाद हाथीकरे सामने आकर उन्हनि 
उसे एक धूसा जमाया ओर वे उसे गिरानेके व्ये इ 
प्रकार उसके सामनेसे भागने लगे, मानो वह अब हू 
केता, तबदछरु ठेता है | १० ॥ मगवान्‌ श्रकरष्णने 
दौडते-दौडते एक बार खेल-खेव्में ही प्वीपर गिरनेका 
अभिनय किया ओर श्चट वहोँसे उठकर माग खड़े इए्‌। 
उस समय वह हाथी क्रोधसे जलख-मुन रहा था | उसने 
समक्ञा कि वे गिर पड़े ओर बड़े जोरसे अपने दोनों 
दत धरतीपर मारे ॥ ११ ॥ जव कुबल्यापीड्का यह 
आक्रमण व्यथ हो गया, तव वह ओर भी चिद्‌ गया। 
महावतोंकी प्रेरणासे वह क्रद्ध होकर भगवान्‌ श्रीकृष्णपर्‌ 
टूट पड़ा ॥ १२ ॥ भगवान्‌. मधुसदनने जब उसे 
अपनी ओर क्चपटते देखा, तब उसके पास चके गये 
ओर अपने एक दवी हयाथसे उसकी सूंड पकड़कर उसे 
धरतीपर पटक दिया ॥ १३ ॥ उसके गिर जानेपर 
भगवानने सिंहके समान खेल-ही-खेलमे उसे पैरोसे दबा- 
दर उसके दत उखाड़ च्ि ओर उन्हींसे दायी ओर 





| । "^ जद 
। अ ४२] दशम स्कन्ध ३९१ 
| अ ----------~---------------------------- 
मृतकं द्विपञत्सृज्य दन्तपाणिः समाविरात्‌ । | परीक्षित्‌ | मरे इए हाथीको छोडकर भगवान्‌ श्री- 
| करष्णने हाथमे उसके दत य्ि-छ्यि दी रंगमूमिमे भ्रवेड 
किया | उस समय उनकी शोभा देखने ही योग्य थी | उनके 
विष्टस्वेदकणिकावदनाभ्वुरुहो बभो । १५] | कथेपर हयाधीका दात ख्खा इथ था, शरीर रक्त ओर 
मदकी वृं दोसे सुद्योभित या नौर मुखकमव्पर्‌ पसीनेकी 
दे ्ञल्क रदी धीं ॥ १५ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
ङ्गं बिविदात्‌ राजन्‌ मजदन्दधरायुधौ ।\ १६}! | ष्ण भर वरा दोनोके दी दाोमे इवय्यापीडवे 
| चड़-बड़े दात शके रूपमे सुरोमित हो रहे ये ओर 
मल्लानाय्चनिनेणां नखरः कुछ ग्वाख्वा उनके साथ-साय चक रहे थे । इस प्रकार 

उन्दने रगभूमिमें प्रवे क्रिया ॥ १६ ॥ जित समय 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण वलरामजीके साथ रगभूमिमें पधारे, उस 
गोपानां खजनोऽसतां कषिदिशथजां समय वे पहट्वानोंको वन्रक्टोरइारीर, साधारण 
| मनुष्यं को नर-र्न; चिर्योको मूर्तिमान्‌ कामदेव, गो्पोको 
खजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाठे शासक, माता-पिताके 





अंसन्यस्तविषाणोऽसुख्द बिन्दुभिरङ्कितः । 


क 


गोपैः कतिपयबंरदेवजमगाद्नो | 


> 
=+ 


न्लीणां खरो मतिमान्‌ 


शास्ता खपित्रोः शिघ्युः) 


विराडविुपां समान बडे-वृदंको शिद्यु, कसको मृत्यु, अज्ञानिर्योको 

मत्युर्भोजपतेविराडविदुषां नियं 

तु ५ विराट्‌, योगिर्योको परम तच्च ओर भक्तशिरोमणि बृष्णि- 
तच्च परं योगिनां वंिर्योको अपने इष्टदेव जान पडे ( सबने अपने- 


दितो भपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भत, श्व्गारः, हास्य, 
इष्णीनां परदेवतेति ? वीर्‌, वात्सल्य, भयानक, बीभतस, चान्त ओर व्रेममक्ति- 
रङ्ख गतः साग्रजः 11 १७}} | स्स्का अनुभव किया ) ॥ १७ ॥ राजन्‌ 1 जसे तो 
र कस बड़ा धीर-वीर था; फिर भी जव उसने देखा कि 
तं इवलथापीडं दषा तावपि दुजयो । इन दोननि कुवल्यापीडको मार डाला, तब उसकी पमञ्च- 
मे यह बात आयी किं इनको जीतना तो बहुत कठिन 
दै । उस समय वह बहत धवङ़ा गया ॥ १८ ॥ शओ- 
तो रेजतू रङ्खगतौ महाजी कृष्ण ओर बररामकी बेह बडी उवी-ख्वी यीं । पुष्पो 
हार, वस्र ओर अ।भूषण आदिसे उनका वेष विचित्र हो 
रहा था; एसा जान पड़ता था, मानो उत्तम बेष धारण ` 
करके दो नट अभिनय करनेके व्यि आये हो । जिनके ` 
नेत्र एक वार उनपर पड जाते, बस, चण ही जते । ` 
मनः क्षिपन्तो प्रभया निरीक्षताम्र ।॥१९॥ | यदी नी, वे अपनी कान्तिसे उक्तका मन मी चुरा ठेते। ` 
व | इस प्रकार दोनों रगभूमिमे शोभायमान इए ॥ १९ ॥ 
निरीक्ष्य वाबुत्तसपूरूषाो जना परीक्षित्‌ ! मर्खोपर जितने लोग बैठे थे- वे मथुराके 
 मञ्चस्िता नाग्ररप्रका चष । नागरिक ओर राष्टके जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगान्‌ 
म श्रीकृष्ण ओर बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्न इए कि 
गरहषवेगोत्करितेश्षणाननाः उनके नेत्र ओर सुखकमल खिल उदे, उत्कण्ठासे र 
पपुनं॒त॒प्ना नयनेस्तदाननम्‌ ॥२०\} । गये । वे नेत्रोके द्वारा उनकी सुखमाधुरीका पान करते 


छः मनस्व्यपि तद्‌ भृश्चयुदहिषिने चप 1:१८} 


विचित्रवेषाभरणसमम्बरो । 


यथा नटावुत्तमवेषधारिणं 














# २९२ श्रीमद्भागवत [ अ० ४३ 
। „` ~` ~= न य नानक 
। पिबन्त इव च्ुभ्यां छिन्त द्व जिह्या ! | करते तृप ही नहीं होते थे २० ॥ मानो ३ 


| टः + न्द नेत्रोसे पी रे हों, ज्ह्वास्े चाट रहें 
ु जिघन्त इव नासास्पां श्छिप्यन्त इव गहुभिः | २१ शा र सनाभय 
ऊचुः परस्परं ते वे यथादष्टं यथाश्चुतम्‌ । दयसे सटा रहे हों ॥ २१ ॥ उनके सौन्दर्य, गुण, 
माधुय ओर निभयताने मानो दर्शकोंको उनकी ठीलार्ओका 

तद्ूपुणमाधु्रागरम्यसरारिता ईव ।।९९।। | स्मरण करा दिया ओर वे ठोग आपसमे उनके सम्बन्धक 

एठौ भगवतः साक्षाद्ररेनरियणसख हि । देखी सुनी वाते कहने-षुनने च्य ॥ २२ ॥ ये दोनो 

~ + साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायणके अंस हैँ । इत प्ृथ्वीपर 

अवतीणाविहांदोन वसुदेवख [१२१ | वदेवनीके वरये अतवी हए है 1 २३ ॥ [ भंगे 
दिखाकर ] ये सँवले-सकोने कुमार देवकौके गभ॑से 
उत्पन्न इए थे | जन्मते ही वष्ुदेवजीने इन्दे गोकु 
कालमेतं वक्षच॒ गधे दृधे नन्द्दे्पनि ।\ २४} पर्चा दिया था । इतने दिनतक ये वह छिग्कर दहे 
प॒तनानेन नीतान्तं॒चक्रवातश्च दानवः | | भौर नन्दजोकरे षरे हौ पटक इतने वड़े इर्‌ ॥ २४ ॥ 
। इन्दाने ही पूतना, तृणावते, शङ्खचूडः, वेशी ओर धेनुक 

अजनो गु्यकः केशी घेदुकोऽन्धे च दहिधाः 1 २५] | आदिका तथा ओर भी दुष्ट दै्योका बध तथा यम्रज्ञुनका 
| उद्वार किया है ॥ २५॥ हन्ने ही गौ ओर प्वायेको 
| दावानलक्री ज्वागस्रे वचाया था | काञियनागक्रा दमन 
कालियो दमितः सपं इन्द्र विमदः कृतः ॥२६॥ | जोर इनका मान-म्दन मी इन्हने ही किया था ॥ २६॥ 
सप्राहमेदस्तेन धृतोऽद्विवरोऽ्ुना। | इन्दोनि सात दिनोंतक एक ही दाथपर गिरिराज 
| गोवधनको उढाये रक्खा ओर उक्षके द्वारा ओंँधी-पानी 

बाताश्चनिस्यथ पसित्रातं च गोलम्‌ | २७] | तया वन्रपातसे गोक्रुखक्रो वच! च्या ॥ २७ ॥ गोपि 


| इनर्व[ मन्द-मन्द सु्ठकान, मघुर चितवन ओर सवदा 
गोप्थोऽश्य रित्यधृदितदितपरक्षणं सखम्‌ । । एकरस प्रसन रहनेवारे मुखारविन्दके द्‌ नपे आनन्दित 


पदयन्त्यो रिविधांस्ताांस्तरन्ति साश्रमं एदा १२८} | श्तौ थीं ओर अनायत ही सव्र प्रकारके त्से भुक्त 
हो जाती थीं ॥ २८॥ कहते हकं ये यदुं रकी 


बद्न्त्यनेन वंशोऽयं थदोः सुबहुविश्वुवः रक्षा करेय । यह विद्यात वं इनके द्वारा मन्‌ 
भियं यश्चो महव च रप्ते परशिरिथितः ॥२९॥ । सद्वि यश ओर गोख प्रप्त करेभा ॥ २९ ॥ ये 
। दूसरे इन्ीं श्यामघुन्दरफे वड़े भाई कमलनयन श्रोबर्यम- 


अय चादाग्रजः श्री पान्‌ रामः कमङखोचनः । जी टै | हमने किसी-किसीके र्यहसे रेखा घुना दै कि 
इन्दनि दी भ्रलम्बाघुर, वत्साुर ओर बकार आदिक 


अलम्बा निहता येन चत्को ये वादयः ॥२३०॥। 
| माराहं॥३०॥ 

अनेष्वैव छुवाणेषु तूयषु निनदस्सु च| | निस समय दर्कमिं यह चर्चा हो रदी थो ओर 
अखाडेमे तुरदी आदि बाजे वज रै ये, उस समय 


छरष्णरामी समाभाप्य चाणूरो वाक्यमन्रवीत्‌॥२९।। | चाणूरे सगवान्‌ श्रोणा आर वराको सम्बोधन 
¡ करे यदं बात कडी-॥ २१ ॥ “नन्दनन्दन श्रीकृष्ण 


हे नन्दनो हे राम भवन्तौ बीरं्ंमतौ | | ओर रामजी | ठम दोनों रोके आदरणोय हयो । 


एष वे क्षि देवक्यां जातो नीतश्च गोङ्करम्‌ । 


गावः पाला शतेन दावाग्नेः परिमिचिताः 








१, संगतौ 


| अ० ४३ | द्श्चम॒स्कन्धु ३९३ 








[7 7 १1 7 


नियुदधङशलौ श्वः राज्ञाऽऽदरतौ दिष्श्चणा ।३२॥ | मरे मद्वाराजने यह घुनकर किं तुमगोग कुरत ज्डनम 
| बडे निपुण हो, तुम्हारा कौश देखनेके व्यि तुं 
पियं रक्षः प्रह्वन्त्यः श्रेयो षिन्दन्वि यै प्रजाः। यहा बुच्वाया & ॥ ३२ ॥ देखो भाई | जो प्रजा मनः 
वचन ओर कमंसे राजाका प्रिय काय करती दै, उसका 
मनसा कर्म॑णा वाचा विपरीतमतोऽन्यथा ॥२३३। मला देता है ओर जो राजाकी इच्छाके विपरीत काम 
करती है, उसे हानि उढठानी पडती है ॥ २३ ॥ 
निस्य प्रसदिता गोषा बत्छपाला यथा स्फुटम्‌ । | यह पमी जानते हैँ कि गाय ओर वछडे चरानेवाठे 
। म्वाय्ये प्रतिदिन आनन्दसे जग्मे कुरती गड-ल्ड़कर 
वनेषु भह्श्ुदधेन कौडन्तश्वारयन्ति गाः ॥३४] खेव्ते रहते हँ ओर गाये चराते रहते दै ॥ ३४॥ 





े  इसय्यि आओ, हम ओर त॒म मिक्कर महाराजको 
तखाद्‌ र्घः प्रियं युयं वयं च छरवाम इ ¦ प्रसन्न कनेक व्ि कुदती लड । रस्ता करनेसे इमपर 
सभी प्राणी म्रसन्न होगे, क्योकि राजा सारी प्रजाका 

भूतानि नः भ्रसौदन्दि प्षवेतरमयो चुः } २५५) प्रतीक & ॥ २५ ॥ 


। परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण तो चाहते दी थे कि 
। इनसे दो-दो हाथ करर । इसव्ये उन्होने चाणूरकी बात 
नियुद्धमारमनोऽभीष्टं मन्पम्‌ःनोऽभिनन्य च\२६॥  उनकर उसका अनुमोदन किया ओर देरा-काटके 
अनुसार यह वात कदही-- ३६ ॥ (चाणूर ! हम भी 
म्रजा भोजपतेरस्य तू य्‌ चपि वनेचश ५ इन माजराज क पकी तनवाक्षा म्रजा हमं इनको 
 प्रस्तनन करनेका प्रयत्न अवर्य करना चाहिये । इसीमे 
1 हमरा कल्याण है ॥ २७ ॥ कितु चाणूर्‌ ! हमढोग 
करवाम प्रियं ॒नित्यं तन्नः परमलुग्रहः ॥३७॥ | मी र 1 (त लाल सतत तचा 
| बाव्कोके साथ ही कुरती कडनेका खे करगे । ङुर्ती 
| समान बल्वालोके साथ ही होनी चाहिये, जिषसे देखने 
वारे सभासदोको अन्यायके समथंक दहोनेका पापन 

भवेननियुद्रं माधर्मः स्पृेन्मर्टं सभासदः ।॥३८॥॥ | गल सभासद प 


त्िराम्या्वीत्‌ कृष्णो देशकालोचितं वचः 


राला वयं तुल्यबलेः कीडिष्यामो यथोचितम्‌ । 


| रगे, ॥ ३८ ॥ 
(८८१५९ | चाणुरने कहा--अजी } तुम ओर बलराम न बालक 
न बालो न किशोरस्त्वं बलश्च बलिनां वरः । | हो ओर्‌ न तो क्रिशोर । तुम दोनों वच्वानोमे शरे 


हो, तुमने अभी-अभी हजार हाथियोंका वल रखनेवाठे 
लड़ना चादिये । इसमें अन्यायक्री कोई बात नहीं है । 


। इसव्ि श्रीकृष्ण ! तुम सुञ्चपर अपना जोर आनमाओो ` 
मयि विक्रष वाष्णय्‌ बलेन सह युकः ।|७०।। ¦ ओर बलरामके साथ सुषिक ठ्डेगा ॥ ९० ॥ 


तसाद्‌ भवद्भयां रिभिर्योद्धव्यं नानयोजत्र वै। 





~~ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दडामस्कन्े प्रविं 
कुबल्यापीडवधो नाम त्रिचतारियोऽव्यायः ॥ ४३ ॥ 
~९---ॐ-^-&---5----* 


॥ र 





१. छ सदः कचित्‌ । २. मच्छक्रीडायां चिच ° । 








पन 


चः 
क ४१ + $ ९ च 9 > ॥ १४ , +) १, 
त्न $ | ज ^ 
+ ॥ त ५ 
न # 
क्क ऋ ०६९ + [य च 
नण तता टुजकनन् 1 - 
|; |) 
ह त 


प्रः नः 


{ द 
- 3 
[ 
{ 
(१ - 
16 
ह ` 
| 










9 ` 


८ वन न 


 -महगय चत्तचस पवा रजस्रमसिद्‌म्‌ 
~ 


ये बलाबलबरह्युद्धं राज्ञोऽचिच्छन्ति पर्यतः 








३९४ श्रीमद्भागवतं [ अ० ४४ 
अथ चतुश्रत्वारिंशोऽध्यायः 
चाणुर, मुश्ठिक दि पहटलवा्नाका तथा कंसका उद्धार 
श्रीयुक्त उवाच | श्रीड्कदेऽजी कते ई परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 


` एवं चचितसङ्ल्पो भगवान्‌ मघुष्दनः । 


आससादाथ चाणूरं यष्टिकं रोहिणीद्धतः ॥ १॥ 
हस्ताभ्यां हस्तयोवंद्ध्या पद्स्यामेव च पादयोः । 
विचृषतुरन्योन्यं प्रसद्य विजिभीषया ॥ २॥, 
अरत्नी दे अरलिनिभ्यां जानुभ्यां चेव जादुनी ¦ 

शिरः 


परिभरामणविक्षेपपरिरम्भावणतनेः । 


शीर्ष्णोरसोरस्तावन्योन्यममिजघतुः ॥ २॥ 


उत्सणापसंणेषान्योन्यं प्रत्यरुन्धताम्‌ ॥ ४ \, 


यन्तम 


उत्थापनेरुनयनेषालनेः स्थापनैरपि 


परस्परं जिगीषन्तावपचक्रतुरात्मनः 
तद्‌ बलाबलवद्युद्धं समेताः सबंयोपितः 


| ^ || 


ऊचुः परस्परं रजन्‌ सालुकम्पा वरूथशः ॥ & ॥ 


| ७ ॥ 


वि~" 


: ` कनः 
9 = 


| करने चस्गे॥३॥ 


श्रीकृष्णने चाणूर आरके वका निश्चित संकल्प कर 
ल्या । जोड़ वद दिये जनेप्र श्रीकृष्ण चाणुरसे ओर 
बलरामजी सुष्टिकसे जा भिड़ ॥ १॥ बे रखोग एक 
दूसरेको जीत लेनेकी इच्छाक्चे हाथसे हाथ वँधकर ओर 
पेरोमे पेर अड़ाकर वलूव क अपनी-अपनी ओर्‌ खींचने 
ल्गे ॥२॥ वे पंजे पंजे, घुटने घुटने, माथेसे 
माधा ओर छतीसे छती भिडाकर एक-दृसरेपर चोट 
इस प्रकार दोव-पेच करते-करते 
अपने-अपने जोडीदारको पकड़कर इधर-उधर धुमाते, 
दूर ढकेक देते, जोरसे जकरड़ ठेते, ल्िपिट जाते, उठाकर 
पटक देते, छ्ृटकर निकर मागते ओर कभी छोडकर 
पीछे हट जाते थे । इस प्रकार एकः-दृसरेको रोकते, 
प्रहार करते ओर अपने जोड़ीदारको पछाड देनेकी 
चेष्टा करते । कमी कोई नीचे गिर जाता, तो दृस्त 
उसे घुटनों ओर पैरोमें दवाकर उठा केता । हार्थोसे 
पकड़कर ऊपर ठे जाता । गले कपट जानेपर टके 
देता ओर आवर्यकता होनेपर हाथ-्पौँव इकट्धे करके 
गोठ बध देता ॥ ४-५ ॥ 


परीक्षित्‌! इस दगच्को देखनेके च्ि नगरकी 
बहूत-सी महिकरएं भी आयी दईं थीं । उन्होंने जव 
देखा कि बड़े-बड़े पहक्वानोके साथ ये छोटे-छोटे बल- 
हीन वाल्क ल्डाये जा रहे है, तव वे अच्मा-अल्ग 
टोला बनाकर करस्णावश आपसे बातचीत करने 
ल्गी-| ६ ॥ ध्यहा राजा कप्तके सभाक्षद्‌ बड़ा अन्याय 
ओर अधमं कर रहे है | कितने खेदकी बात दहै किं 
राजाके सामने हीये बली पहट्वानों ओर निबेल 
बालके युद्धका अनुमोदन करते हैँ ॥ ७ ॥ बहिन | 
देखो, इन ` पहच्वार्नोका एक-एक अङ्गं॑वज्जके समान 
कठोर है । ये देखनेमे बडे भारी पवत-से माद्धम होते 
है | परंतु श्रीकृष्ण ओर बलराम अमी जवान भी नहीं 
हए ह । इनकी किंडर अवस्था है । इनका एक-एक अङ्ग 
अव्यन्त सुकुमार है । करा ये ओर करं वे १॥ ८॥ 


@-~ चौ ज्ककिन्ननश्चः ; "है 








$~. क~ ॥ 





अ० ७४ | द्म स्कन्ध ३९५ 


धर्सव्य तिक्रमो ह्यद्य समाजस्य रुवं भवेत्‌ । 
यत्राधमः घुत्तिष्डेन्‌ स्थेयं ततर कर्हिचित्‌ ॥ ९॥ 


न सभां विशेत प्राज्ञः समभ्यदोषानदुखरन्‌ । 


अन्नुवन्‌ 
वसतः शद्धसयितः करष्णख दए नाम्बुजम्‌ । 
वीक्ष्य भ्रमबायुप्तं वद्मकोरभिवाम्बुमिः ॥१९॥ 


रिं च परयत शमस्य युखमातःम्ररोचनम्‌ । 


4 " * 


` ब 1 1 इ 1 पी जा ज = मः आ त  जा क कः = = 
आ छ ` ककः कोकः ऋ = क चाककः 2 का त कि मि ष ११ 





जितने रोग यहां दइकटये दए ह, देख रषं हं, 

अवद्य-अव्रस्य धर्मोस्लङ्खनका पाप स्गेगा । पएखी ! अत्र 

इमे भी यर्हसे चल देना चाहिये । जहां अधमकी 

प्रधानता हो, बहौ कमी न रहे; यदी चाश्चका नियम 

है ॥ ९ ॥ देखो, दाख कहता है कि बुद्धिमान्‌ पुर्षको . 

सभासदोके दोषोंकोो जानते इए; सभाम जाना ठीक 
¡ है । क्योंकि वहां जाकर उन अवगुणांको कहना, 


चिघुवजनज्ञो नरः कि स्थिषमश्लुते ॥१०॥ | चुप रह जाना अथवा मैं नहीं जानता रसा कह दैना- 


ये तीनों द्वी बातें मनुष्यको दोषभागी बनाती ई ॥१०॥ 
देखो, देखो, श्रीकृष्ण ॒राघ्रके चारो ओर पैतरा बद 
रहे हैँ । उनके सुखपर पसीनेकी वदे ठीक वेसेदही 
खोभा दे रदी है, जसे कमल्कोरापर जक्की वदे ॥११॥ 
सखियो ! क्या तुम नहीं देख रही हो कि बठ्यामजी करा 
मुख मुष्टिकके प्रति क्रोधके कारण कुछ-कुऊ छ 
कोचनाँसे युक्त हो टदा है । फिर भी हास्यका अनिरुद्ध 
आवेग कितना सुन्दर च्ण रा है॥ १२॥ सखी! 


म्र्टिकं भ्रति सामर्षं हाससंरम्भश्चोभिंतम््‌ ॥१२) | सच प्रो तो व्रजमूमि दी परम पवित्र ओर धन्य है । 


धुण्णरा चप व्रजयुको यदयं चलि 


गूढः सुरणपुरुषा चनातचत्रमारथः । 


माः पारयन्‌ संहवेखः कणयंश्च वेणुं 


क्योकि वहा ये पुरूषोत्तम मनुष्यके वेषमें छिपकर रहते 
हैँ । खयं भगवान्‌ शङ्कर ओर र्कष्मीजी जिनके चरर्णो- 
की प्रूना करती है, वे डी ग्रमु वँ रंग-विरंगे जंगली 
पुष्पकी माग धारण कर ठेते हँ तथा वलरामजीके 
साथ वँघुरी बनाते, गए चरते ओर तरह-तरह के खेक 
खेलते इए आनन्दसे विचरते है ॥ १३ ॥ सखी । 
पता नदीं, गोपिर्योने कोन-सी तपस्या की थी, जो नेत्रोके 
दोनोँसे निव्य-निर्तर इनकी खूप-माघुरीका पान करती 


विक्रीडयाश्चदि भरिरित्ररमाचिताङ्धि।।१२)) , रहती हैँ । इनका रूप स्या है, जवण्यका सार ! 


मोप्थस्तपः किस॒चरन्‌ यदमुष्य रूपं 


कावण्यसारमसमोध्वंमनन्यसिद्धम्‌ । 


दम्भः पिबन्त्यनुसबाभिनवं दुराप 


मेकान्तधाम य॒श्चसः भिय रेश्वरख १७] | दै । बह तो गोपियकि दी माग्यमे बदा है ॥ १४ ॥ 


संसारम या उससे परे किसीका भी खूप इनके ख्पके 
समान नदीं है, किर बदकर हेनेकी तो बात ही क्या 


है! सो भी किसीके संवारने-सजानेसे नही, गहने- ` 
कपडेसे भी नदी, बल्कि खयंसिद्ध है । इस रूपको ॥ 
देखते-देखते ति भी नहीं होती । क्योकि यह त 
क्षण नया द्योता जाता है, नित्य नूतन है । समप्र यद 

सोन्दयं ओर पेयं इषीके आश्रित है । सखियो । 
परंतु इसका दशन तो ओरोके ण्ि बड़ा ही दुरुभ 


1 8 ् नद 













त 18 ध 
8 ++ > 
, क +न ^“. 


१ । 














३९६ श्रीमद्भागवतं [ अ० ४४ 
या दोहनेऽचहनने सथनोपरेष- सखी । व्रजकी गोपियाँं धन्य हैँ | निरन्त 
श्रीङकष्णमें ही चित्त !लगा रहनेके कारण प्रेमभरे हृदयसे 

[जं दो ९५, (*९ >~ ~ 
{ ्रहणनाभरुदितोकषणमाजंनादौ । आुभके कारण गद्गद कण्ठसे वे इन्हीकी लीलर्ओंका 
। न धियोऽ ह गान करती रहती हैँ । वे दृध दुहते, दद्द पथते, धान 
। र क ता करूटते, घर रीपते, वारको ञ्जूटा इच्ते, रोते हए 
| । बालक गं वि क ते न्ट स्वर्‌ ते-धुटा ते घरंको 
धन्या बजल्िय उरुक्रमवित्तथानाः॥| ९५ | कालका डु कराते, उन्दः नदलतिलतिः पर 
। ाडतेुह्ारते--कर्होतकः करट, सारे काम-काज करते 
। ्रातव्र॑जाद्‌ जत आविशतश्च सायं तो गणिः गानं ही मी 
॥ १५ !! ये श्रीकृष्णके जव प्रातःकाल गोजको 


५4 नि च श 


9... 


चरानेके व्ये त्रजसे वनमें जाते है ओर सगयङ्काट उन्हें 
लेकर्‌ त्रजमें छोटते हैँ, तन बडे मधुर स्वरसे वाँघुरी 
्रजाते हँ । उक्तकी टेर प्ुनकर गोपयां धरका सारा 
कामकाज छोडकर क्चगपट रास्तेनें दौड़ आती हैँ ओर 
पतर्यन्ति ससितमुखं सदयावलोकस्‌।१६॥। | श्रीृष्णका मन्द-मन्द शुप्तकान एवं द्यामरी चितवनसे 
५ युक्त ॒मुखकमल निहारनिहारकर निहाल होती ह| 
सचमुच गोपियौँ ही परम पुण्यवती है, | १६ ॥ 


गोभिः समं कणयतोऽस्य निक्म्य वेणु । 


निगभ्य तर्ण॑मचलाः पथि भूरिपुण्याः 


एवं प्रभापमाणासु स्त्रीषु योगेश्वरो हरिः 
र ६ भरतवंशशिरोमणे ! जिक्र सपय पुशाधिनी चलि्या 

शछु॑हन्तु मनश्चक्रे भगवान्‌ भरतपंभ ।१७॥ | इस प्रकार वाते कर रही थी, उती मय योगेश्वर 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने मन-ही-भन रइद्लुको मार्‌ डाल्नेका 

सभयाः ख्वीगिरः श्रुर्वा पत्रस्नेदशच!ऽऽतुरो। । निश्चय क्रिया ॥ १७ ॥ चिर्योकी ये भ्पूण वाते माता- 
| ष | पिता देवकी-बसुदेव भी सुन रहै ये । ञे पुत्रस्नेडव 
पितरावन्वदप्येतां पुत्रथोरडधी बलम्‌ ॥१८॥ | तदसि तिचच व रि 1 स 
निय विधिभिवि स पीड़ा होने ठगी । क्योकि वे अपने पुत्रके कट-वीर्यक्रो 
तेस्तनियद्धविधिभिविंविधेरच्ुतेठरो । | नहीं जानते थे ॥ १८ ॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णं ओर उनसे 
| | भिडनेवाय चाणूर दोनों ही भिन्न-मिन प्रकारके दाँव- 
युयुधाते यथा न्योन्यं तथैव बरयुष्टिको ॥१९॥ | फेचका प्रयोग करते हए परस्पर जिस प्रकार लड रहे 
क = ह ये, वैसे दी बलरामजी ओौर मुष्टिक मी मिढे इ९य॥१९॥ 
भगवद्ात्रनिष्पातवेजनिष्पेषनिष्टुरः । भगवानके अङ्ग-प्रत्ङ्ग वन्रसे भी कठोर हो रहे थे | उनकी 
र =, र्स््‌ रगड़से चाणूरकी रग-रग दीटी पड़ गयी । बार-बार उसे एेसा 
चाणूरो भज्यमानाज्गो एग्कानिमवाप ह ।॥२०॥ | माद्धम हो रहा था मानो उसके शरीरके सारे बन्धन 
= | ऊ. टूट रषे हैँ ।उसे बड़ी गलानि, बड़ी व्यथा इई ॥ २०॥ 
स्र स्येनवेगम उत्पत्य युष्ठी्रत्य कराघुभो । अन वह अत्यन्त क्रोधित होकर बाजकी तरह क्ञपटा 
१ जीर दोनों हाथोके धसे बोधकर उसने भगवान्‌ श्रीङृष्ण- 


क्रुद्धो वक्षसखवाधत ॥२१॥ | की छातीपर प्रहार किया ॥ २९ ॥ १२ उसके प्रहारसे 
` # जियो नहं बति कर रही थी, वो निकट दी वञुदेव-देवकी कैद ये, अतः वे उनकी बाते खन पके । 


*1 

9८ ५.५ 
ॐ 

किः 


ए क १ कज काकाः = चा किन चकनकनकेक = » भोकने, च द "जकः छि = को = केक, = निका 
त अदो वक 
# ॥ ए) 


7, = ऋक. | 
" + १:18 1. 
है १ | 
५ ^ & 
कः ‹ ऋ {भे 

॥ "$ ह; 
व 4 ५५ 
र. छ % भ 
त 
| बिः 
५ ऋऋ 4 
॥: 
' चि ,- ३ 
न 
+ 
॥ 
त ् 
३ 
। 1 
१ 
१ ॐ 
ॐ 
[6 
कै 
(च 
1 कै 
] ह 
८ 
1 | 
क 
6 
~ 
1 
,44 6 
४ । 
। ए $> 
४ ॥ ~ 
+ र { 
{- 
# £ 
# ॐ 
| 
§ ^ नि 
4 
§ 
ए. [ 
॥ 
| + 
( ( 
॥ 
1 





गमक्ठ) ५ ने । -ः 5 * = ५ = * 
"नः । = ~ 3 पि, > ५ चः ` ¶‰- 
> $ + ऋ - #. ~ वर - + ‡ 
"क ॐ => ~ 


१९ 





न च क जः क्‌ ऋ ॥ | ब = । ¢ क्र 
स क क ॥ च 4 च ॥ ४५ ^ ~> न्को. + क्ये ह : र्ये 
पि + पन अ "क 8 क न क, १4 २ 
ति नो १ अ : ~व ववि `+ > रि. ~ 4 य्‌ ॥ ४ ~ ५ न न ५. 9 # ८ - दै 
अ र त, र ^ । क = अन > "718 = 4 ४ ५ - = ५२, क 
त र - - - व वि¬ २, ,५१ ॥ ज # ; 
व =, „12 , ^ 4 1 + अ- 4 ५१ 


॥ १ 


कौ ॐ [॥ 


बा काकाावकाक । ` (न च #: + # च 9 ध ~ ४१ 


अ० ४४ | 





नाचरत्तसप्रह^रेण मंरहतं इव दविषः | 


बाहोनिगृद्य चाणूरं बहुश्यो आमयन्‌ हरिः ॥२२॥ 
भूपृष्ठे पोथयामास तरसा क्षीणजीवितम्‌ । 


विश्चस्ताकल्पकरेशश्चगिन्द्रध्वज इवापतत्‌ ।२२॥ 


तथेव यष्टिकः पूवं खद्ष्वयाभिहतेन य । 
वलमद्रण वलिना तलेनाभिहतो भख २४] 


प्रवेपितः स॒ रुधिरञदमन्‌ खदोऽदितः । 
व्यसुः पपाताच्युपस्थे रताहते इवाङघ्रपः 11९१५ 
ततः ऋटभसुप्राप्तं 


राधः हरतां वरः| 


अवधीष्टीरषः राजन्‌ सावज्ञं वामयुष्टिना ।॥२६। 
तर्ष हि शलः ष्णपद्ापहतशीषंकः । 
द्विधा दिदी्ंस्तोश्षङक उभावपि निपेततुः; ॥२७ 
चाणूरे युटि छट शठे ताश्र्फे हवे । 
दोषाः प्रद्ुवुमेस्छाः स्ये प्राणद्दीष्सवः ।।२८]। 
गोपान्‌ दयध्याना्रभ्य तेः &सुज्यं भिजहतुः । 


वाद्यमानेषु तूर्येषु बल्मन्तौ रुतननपुरो ॥२९॥ 


जनाः प्रजहुः सये कमणा रामकृष्णयोः । 
ऋते कंसं विप्रयुख्याः साधवः साघु साध्विति।।३०)) 


हतेषु मरलवर्येषु विद्तेषु च भोजराट्‌ । 


न्यवारयत्‌ खतरयाणि वाकयं चेदमुभाच ह ।३९।॥ गाजे बंद करा दिये ओर अपने सेबकोको यद शा 
र 


१. खग्मिहंत इव । 





दम्‌ स्कन्ध 


[म * ~~ ~ ~ ~ = 9 त ज न आ आ ण जः जक > च 9 पा क क क 
~ य ज य = म क 


२९७ 


भगवान्‌ तनिक भी विचलित न दए, जैसे षरेकि गजरे- 
की मारसे गजराज ! उर्न्यँने चाणृूरकी दोनों मुजारं पकड़ 
लीं ओर उसे अन्तरिक्षम वड़े वेगसे कई वार धुमाकर 
धरतीपर दे मारा । परीक्षित्‌ ! चाणूरके प्राण तो धुमानेके 
समय ही निकल गये थे । उसकी वेप-भूपा अन्तव्यस्त 
हो गयी, केरा ओर माल बिखर गयीं, बृह इन्द्रध्वज 
( इन्द्रकी प्रूनाके व्यि खडे किये गये बड़ इडे ) के 
समान गिर पड़ा ॥ २२-२३ ॥ इषी प्रकार सुष्टिकने 
भी पहले बलराभजीको एक वृसा मारा । इसपर बढी 
बलराम जीने उसे वड़े जोरसे एक तमाचा जड़ दिया ॥२५॥ 
तमाचा कगनेसे वह कप उखा ओर ओधीसे उखडे इए 
वृक्षके समान अव्यन्त अ्यथित ओर अन्तमे प्राणद्धीन 
होकर खून उगक्ता हआ परध्वीपरर गिर पडा ॥ २५ ॥ 
हे राजन्‌ ! इसके बाद योद्धा श्रेष्ठ मगवान्‌ बकराम- 
जीने अपने सामने अते ही कूट नामक पडल्छ्रानको 
खेल-लेच्मं ही वाये हायके धृंेसे उपेश्षापूक मार 
डाला ॥ २६ ॥ उसी समय भगवान्‌ श्रीङृष्णने पैरकी 
लेकरसे क्का सिर धड्से अल्ग कर दिया ओर तोदाट- 
को तिनकेकी तरह चीरकर दो टुकड़े कर दिया । इस 
प्रकार दोनों धरा्चायी हो गये ॥ २७ ॥ जब चाणर, 
मुष्टिकः कूट, रक ओर तोशल- ये पाचों पहच्वान मर 
चुके, तब जो वच रहे थे, वे अपने प्राण बचानेके व्यि 
खयं वहसे माग खडे इए ॥२८]॥ उनके भाग जनेपर्‌ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बल्रामजी अपने समव्रयस्क ग्वार- 
बालोको खींच-खीचकर उनके साथ मिङ़ने ओर नाच- 
नाचकर भेरीष्रनिके साथ अपने नूपुरोकी नकारो 








| मि्मकर्‌ मल्लक्रीडा बुर्तीके खेक करने कगे ॥२९॥ 


भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वर्रामकी इस अदूमुत ीव्को 
देखकरं सभी दशंर्कोको बड़ा आनन्द इना । श्रेष्ठ 
ब्राह्मण ओर साधु पुरुष धन्य है, धन्य है”- इस्‌ प्रकार 


1.1." त ` एन्काकः च 


कहकर प्रशंसा करने र । परंतु कसको इषसे बड़ा 


दुःख हआ । वह ओर भी चिढ गया ॥ ३० ॥ जन्‌ 
उसके प्रधान पहख्वान मार डे गये ओर बचे इए 
स॒ब-के-स॒ब माग गये, तव मोजराज कंस॒ने अपने बाजे- 





॥ ") 
॥ 7, 2 


"+ चक ` का ~ 
च # न 9 





हि 
च ॥ >) 
# 





# ककि त ध ~ 
५ डि कोन ~}, न ~~ ~~ नी क 11 
जन्ये 1 
भोजकः नकन न्क [ि क 


= कन 


1 
॥ 
) 


| 
। 
। 
। 


क कनक 
अ= क य - ---- भ क का = 
त 


„व 9. च रे ब 

पी णि कक वाका र 
ऋः = कक = 

। न्व ग्वा अ 

~~~ ~ 


1 न 


| 
| 
1 हि 
॥ 
| 





श न मड 
+ $ १ 
# ॥ ने न 









न 1 ४ 
॥ ६ > [त ^ क ~ 
४, 
ग्द ध, + >) "कक ्टु, , न "~ *= 
3 (+ 


| छु १ 


* [इक | क 
१ ) ^~. + ॐ । 4 + च + 4 + ( , † 
= अ ४ ४ 9 3: ११. 
#॥ 4 @= "= 4 ~ 
ध न 


१ 


= न्त स 
|; 4 
। #) 
ह, ५ न 
# "च # , $ "कू 
#॥ . १. १४5 न न इ ¶ 
त 
{6 





३९८ भरो सद्धाभृषेते [ अ० ५४ 
निःसारयत दुच्त्तौ बसुदैात्मजो रात्‌ । दी--! ३१ ॥ अरे, बुदेवये इन दुश्चर ल्डकोको 


धनं हरत गोपानां नन्द्‌ डष्नीत दुसंतेर्‌ \३२९॥। 
वसुदेवस्तु दुर्मेधा 
उग्रसेनः पिता चापि ख 
एवं विङ्र्थमाने वे ऊर 


हल्यताभाश्वसत्तभः ! 
एरपष्चभः ।\२३;) 
भ्ड्पिंतोऽव्ययंः । 
लंधिम्नोत्पत्य तरसा मञ्चनतङ्कभःरहः; \\ ३७ 
तमाविशन्तमालोक्य मरत्युभास्सन आदयः; 
मनशौ सदश्रोत्थाय जगृहे शोऽदिवधणीः }। ३५।। 


त॒ खद्खपार्णिं विचरन्तम 


स्येनं यथा दक्षिणरून्यसस्बरे | 
समग्रदीद्‌ दुविषहोभ्रतेजा 

यथोरगं वाश्य॑सुतः भ्रश्द्य \\३६॥ 
प्रगृह्य कैरोषु चखक्किरीरं 


निपात्य रङ्गोपरि त्गमध्वात्‌ । 
तयोपरिष्टात्‌ खयमन्ननाभः 

पपात विशधाश्रय आत्मतन्त्रः ॥२३७॥ 
त॑ सम्परेतं विचकप भूमौ 


हरिवथेभं जगतो विपश्यतः । 
दाहेति शब्दः शुमहांसदाभू- 
दुदीस्तिः स्व॑जनेनरेन्द्र ।।२८॥ | 


` स॒ नित्यदोदिग्नधिया तमीश्वरं 

पिबन्‌ वदन्‌ वा विचरन्‌ शपञ्क्रसम्‌ 
ददश चकराधरुधमग्रतो यत- 

स्तदेव सूपं दुरवापमाप ॥३९॥। 


नरश्च बाहर निकार दो । गोपोका सारा धन छीन जो 
ओर दुबुद्धि नन्दको कद कर ढो ॥ ३२ ॥ वसुदेव 
भी बड़ा दुलुद्धि ओर दुष्ट है । उसे शीघ्र मार डालो 
ओर उग्रसेन मेरा पिता ह्लोनेपर भी अपने अनुयापियोकि 
साथ ख्ञजासं धस इञ हं । इसव्िये उसे भी जीत। 
मत छोडो ॥ ३३ | कंस इस प्रकार वदृ-बटकर्‌ नकवाद्‌ 
कर्‌ रहा था कि अविनाक्ची श्रीकृष्ण कुपित होकर फुतीसे 
वगध्र्रक उछख्कर टीव््से ही उप्तके ऊँचे मञ्चपर्‌ जा 
चदे | २४ | जब मनसी कसने देखा कि मेरे गृ्युखूप 
भगवान्‌ श्रीक्रष्ण सामने आ गये, तत्र वह सहसा अपने 
क्िद्टासनसे उठ खडा हा ओर हाथमे टा तथा तद्वार 
। उठा ढी ॥ २५५] क्वाथे तच्वार लेकर वह चोट करनेका 
। अवर द्रुता इशा पैतरा बदलने ल्गा । आकाशम 
। उडते इए बाजके समान वड कभी दायीं ओर जाता 
तो कभी बायीं भोर । परु भगवान्‌ प्रचण्ड तेज 
अध्यन्त दुस्सह है । जसे गरुड सपको पकड़ ठेते है, 
| वैसे ही भगवान्‌ने वच्प्रूवक उसे पकड ट्या | ३६ ॥ 


| ईसा समय कक्षका मुकुट गिर गया ओर भगवानने उसके 
| केशा पकड़कर उसे भी उस ऊँचे मञ्चसे रगभूमिमे गिरा 
| दिया | फिर परम खतन््र ओर सारे विश्वके आश्रय मगान्‌ 
श्रीकृष्ण उसके ऊपर खय कूद पड़े ॥ ३७ ॥ उनके 


| कूदते ही कसकी पृथु हो गयी ! सबके देखते-देखते 
। भगवान्‌ श्रीकृष्ण कंसकी जाको धरतीपर उती प्रकार 


| घसीयने लगे, जंसे सिंह हाथीको धसीटे । नरेद्र | 
। उस समय सत्रके महसे 
आवाज सुनायी पड़ी | 
 घबड़ाह्के साथ श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता रहता 


हाय ! हाय ! की बड़ी ऊची 
८ ॥ कक निव्य-निरन्तर बडी 


| था | वह खाते-षीते, सोते-चक्ते, बोस्ते भौर सस 
| केते--सन समय अपने सामने चक्र हाथमे व्ये भगवान्‌ 


श्रीकृष्णको दी देखता रहता था । इस नित्य चिन्तनके 
प्ख --- वह॒ चाहे द्रेषमावपे ही क्यों न किया गया 
हयो- -उसे भगवानकते उसी रूपकी प्रापि इई सारूप्य- 
सुक्ति इई, जिसकी प्रापि वडे-बड़ तपश योगियोकि व्यि 


भी कठिन दै ॥ ३९ ॥ 






ऋ ऋ 
३ 
जो चक कः = दोन गरि 


तस्यालुना भ्रातरोऽष्टौ कङ्कन्यग्रोधक्ादयः । कंसवेः कङ्क ओर न्यग्रोध आदि भट छोटे भाई ये। 
वे अपने वडे भाईका वदा छेनेके व्यि क्रोधसे भाग- 

अभ्यधावनभिङ्कद्रा श्रातुनिर्धेशकारिण ¦ ।।४०।। | बवूठे होकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वलरामकी ओर 
दौडे॥ ० ॥ जवं भगवान्‌ कच्शामजीने देखा कवे 
ड़ वेगसे युद्धके छिये तैयार होकर दौड़े आ रहे हँ, तव 
उन्दोनि परशि उठाकर खन्द वैसे दी मार डच, जे 
विह परयुजस्ते मार्‌ डाच्तादै)) ४१॥ उस समय 
आकादाम दुन्दुभिर्यौ बजने कगीं } भगवानङकके विभूति- 
द्य व्रह्मा, शकर आदि देवता वड आनन्दसे पुष्पकौ 
वर्बा करते इए उनकी स्तुति करने चग } अप्सरा 
नाचने च्गीं 1} ४२॥ महाराज! कंस ओर उसके 
तेषां श्चियौ मह पहन्भरणदःदिताः म्गदयोकी चि्यौँ अपने आत्मीय जर्नोकी मृव्युसे अल्यन्त 

ध महाराज ०. लिता । खित इई ¦ वे अपने सिर पीटती इई ओंखमिं ओप 
तत्राभीधुषिनिघन्त्यः शीरपाण्यश्चविरोचनाः ।\४३। | मरे वहाँ आय ।। ४३ ॥ वीरङव्यापर्‌ सोये इए अपने 
पति्योसे ल्पिटकर वरे शोज्ग्रस्त हो गयीं ओर वार-बार 
आंसू वहती इई ऊँचे स्वरसे विलाप करने क्गी ॥४४।॥ 











तथातिरिभरपास्तास्त॒ संयतान्‌ रोहिणीखतः 


५1 16५41 1.1 ~“ ~... 0 आ 


अहस्‌ परिधघ्रुचम्य पदनि गादिपः \\४१।। 


~ ~ 


नेदुदुन्दुभयो व्णोग्नि वके विभूतयः 


सा 


युष्यं ; किरन्तस्तं मरीवाः शश्व यननतुः लियः! ४२ 


रथानाम्‌ दीरशय्याथां एतीनालिङ्गय शोचतीः। 


ति वर नान विन हा नाय ! हे प्यारे! हे घमेज्ञ | हे करुणामय! ह 
पुः स्र नार्यो षिसृजन्त्यो मुहुः शचः ।\७४}) अनायत्त ] आपकी व्ये क 
| गभी ! आज हमारे घर उजड़ गये ¦ हमारी सन्तान 
| अनायु हो गी \} ४५ ॥ पुरुषश्रेष्ठ ! इस पुरीके आप्‌ 
त्वया हतेन निहता वयं ते. सगृहश्रनाः \} ४५4; | दी खी ये ! आपके विद्हसे इक. उत्सर समाप्त हयो 
गे योर संङ्गख्चिह उतर गये | षह हभारी ही भति 
। विध्रत्र होकर सओोमाहीन दहः गयी ॥ ४६ ॥ खामो! 
र श _. आप्ते निस्पयध प्राणियोके साथ घोर द्रोह किया चा, 
न॒ शोभते वथमिव नित्तोत्छवमङ्खा \४६'; , 
न्याय किया फा; इक्षीये आपी यह गति इई । सच 


हा नाथ प्रिय धमेज्न करुणानाथवस्घल । 


स्वया विरहिता पत्या पुरीयं पुरुषषभ ! 


अनागषां खं भूतानां कृतवान्‌ द्रोदञस्बमणद्‌! | टै, जे जगतके जीवसे व्रोह करता है, उनका अदित ¦ 


क्रता है, रेरा क्तेन पुरुष शान्ति पा सकता है १४७] 
ये भगवान्‌ श्रीङ्ष्ण॒ जगतूके समस्त प्राणिर्योकी उः 


सवेषामिह भूतानामेष हि प्रभवाप्ययः । ओर श्रव्यके आधार है| यहो रक्षक मी दै] जो 
इनका बुरा चाहतः है, इनका तिरस्कार करता है, वह 


तेनेमां भो दशां नीतो मूतघुको लभेद शय ¦; ५७ 






श्रीञ्युक उवाच श्रीद्धुकदरेवजी कडते है-परीश्ठित्‌ । स 


जयोषित छ श्रीकृष्ण ही खरे संसारके जीनदाता है ¦ 
रा आश्वाख भगवोह्छोकभावनः । नको दवण स्नः द; 


2 २४ हतानां समकारयत्‌ \ ५९} । असर परनेवार्लोका ञसा न्निया रीता है, वह 
। बामहुलोभि संल हवानां समकारयत्‌ ॥५९॥ ल भव भ 


१ $ = न, 
॥: > ड न 
4 7 + क क. * ~ स, व 
क "4 र = क [4 न + # छ 
[क त + 4 न = त #॥ ऋ = च 
6.5 क ४ । 7 9. ॐअ ‰# ६२६ 
> = ५ ^ ' ०. ~ |: > न ४ ॥. 
9; ~ क - क 3 \ > < क) [४ 
<, र ४ 3 क 4 च क 3 क णं 7 अ 
1 ऋ + ५ व, +~ = "+~ > क > (= 4 
१. „२ ॐ => # त = >, ५ ~> =+ ` अकि ‡ ४ न 
३ ध ॐ ` + + शि + की" +. 9 
॥ न ॥ ५ नि 0; 
ह  ॥ + ॥। ह ‡ 
# ४ न्क स. ५ 
4 ध 









4 -% प क =-+ २१ 
` " चेः => 2 र ८३ 1. 
# (+ ‰॥ ` 
++ ऋय ४.६ (4 


भ 


| आ+ 


अ० ४४ ] दशम स्कन्धं ३९९ ह. - 


गोप्रा च तदवध्यायी न क्रचित्‌ सुखमेधते \} <¦ कभी पुवो नदी दहो पक्ता ॥ %८॥ _ .. 


तः 
# = 

















ख = ततो नो । => क @ ॐ + । _ _न्ग ~~ @ ० कुक क 





= = ४ र 
ॐ, ॥ 1 - 


ददप वशया ण ~ 


"च च 
~ ---- -- च क = न 


कि = जक ) + 


क 
५1 ॥, 











चनव # क + # ज, च चै 


= [ * 3 ५ 
५. अ य क ४.42. - त त 

पि्याीना एको क = > - ~ ~ 

| || । व | वि 
~+,» ५१ ° 
जत १... ५ प 
॥। १ # + न 
~ ~ > † 





~ , । +, ^: ॥ ~ । | ++ 
4 क. 
' ०० -- क 


५ ॥ पिव ` । 
ककन 


~ 9 क 













[व ^ 


[षि 


(र 
, छ ॥ ॥ छ 
# 

रै 


॥ 
। 
क. 
~ "अक 9 ° ५ अ क १1, 
क ->ेर्डददतिः के 
॥ 





>^ कन्न = # 
[9 ए 
च ॥) 
छ 


सर्वाथसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः 


च०० 








मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात्‌ । 


कृष्णरामो ववन्दाठे लिरसाऽऽस्प्ररय पादयोः ।॥५०॥ 


देवकी वसुदेवश्च श्िज्ञाय जगदीश्वरौ । 


छृत्ंबन्दनो पुरो सस्वजाते नं राङ्कितौ ।५१५ 


श्रीमद्भागवत 


| अ० ४५ 


नी मोतो 


सन कराया ॥ ४९ ॥ तदनन्तर भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
ओर बलट्शमजीने जेल जाकर अपने माता पिताको 
बन्धनसे दछुडाया ओर करसे स्प करके उनके 
चरणोंकी वन्दना की ॥ ५० ॥ किंतु अपने पुत्रक 
प्रणाम करनेपर भी देवक्री ओर वघुदेवने उन्हं जगदीश्वर 
समञ्चकर अपने हदयस नहीं कगाया । उन्हे शङ्का हो 
गयी कि हम जगदीश्वरको पुत्र केसे समञ्च ॥ ५१ ॥ 





ˆ" ->---ॐ 5} 
इति श्रीमद्वागघ्रते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्वन्ये पूर्धि 


कप्वधो नाम चतुश्चलारिशोऽध्यायः 


॥ ® | 





अथ पञ्चचलारिदोऽध्यायः 


{शरीकृष्ण-वररामका यज्ञोपवीत ओर गुरुकुखयवेदा 


़ि 
श्रीक उवाच 


पितराुपलन्धार्थो विदित्वा पुरुषोत्तमः । 
मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम्‌ १॥ 
उवाच पितरावेस्थ साग्रजः सात्वतर्षभः । 
प्रभ्रयविनतः प्रीणन्नम्न तातेति सादरम्‌ ॥ २॥ 
नासत्तो युवयोस्ताव नित्योत्कण्डितयोरपि । 
यः ुतराम्पापमनन्‌ क्रचित्‌ २३॥ 


न॒लन्धो देवदतयो्वासो नौ भवदन्तिके । 
यां बालाः पिद्गेहस्था विन्दन्ते लाकिता भुदम्‌॥४॥ 


व रि रि ठ 2 ` 9 ~ ~~ 


श्रीदयुकदेवजी कते ह-परीक्षित्‌ ! मगवान्‌ 
श्रीकृष्णने देखा करि माता-पिताको मेरे रेश्वयका, मेर 
भगवद्वावका ज्ञान ह्यो गया है ९ रतु इन्दं रेता ज्ञान 
होना ठीक नही, ( इससे तो ये पुत्र-स्नेहकां सुख 
नहीं पा सक्गे -¬) रेखा सोचकर उन्हञने उनपर अपनी 
वह योगमाया फेखा दी, जो उनके खजनोँको मुग्ध 
रखकर उनकी टीलामें सहायक होती है ॥ १॥ 
यदुवंरारिरोमणि भगवान्‌ श्रीकरष्ण बड़े भाई बलरामजीके 
साय अपने मोवापके पास जाकर आदरप्रधैक ओर 
विनयस्रे ञुककर "मेरी अम्मा ! मेरे पिताजी | इन 
ङाब्दोसे उन्हं प्रसन्न करते हृए कहने चगे-।॥ २॥ 
(पिताजी | माताजी ! हम आपके पुत्र है ओर आप 
हमारे स्यि सवदा उत्कण्ठित रहे है, पररि भी आप 
हमारे बाल्य; पोगण्ड ओर किशोर अवस्थाका सुख 
हमसे नहीं पासके ॥ ३ ॥ दुरदेवव हमलोरगोको 
आपके प्त रहनेका सौमाग्य ही नहीं मिव । इसीसे 
बाककोको माता-पिताके घरमे रक््कर जो खाङ-प्यारका 
घु मिक्ता है, वह हमे भी नद्य मिठ सका ॥ 9 ॥ 
पिता ओर माता ही इस शरीरको जन्म देते है ओर 
इसका लाल्न-पराल्न करते हैँ । तब कहीं जाकर यह 
दारीर धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्षकी प्रापिका साधन 





१. अदाङ्कि° | २. न्धे कंस । ३. बादरायणिख्वाच । 


। 1 ¶ राता आरि 


अ० ४५ ] | दशम स्कन्ध १ 














न तयोर्याति निवे पि्रोर्भत्यैः शतायुषा ॥। ५॥ बनता है । यदि कोई मनुष्य सौ वधतक जीकर्‌ मात 

| ओर पिताकी सेवा करता रहे, तव भी बह उनके 

यरतयोरापजः रप्‌ आमना च धनेन च । उपका्से उन्रण न्ह हो स्कता॥५॥ जो पुत्र 

। सामथ्यं रहते मी अपने मौ-बापकी शरीर ओर धनसे 

| बसि न्‌ दद्यात्तं पत्य खमांसं खादयन्ति हि।! & ॥ | सेवा नदीं करता, उस्तके मरनेपर यमदूत उसे उसके 

| अपने शरीरका माप्त खिलते है| £ ॥ जो पुरुष 

| मातरं पितरं बुद्धं भाया साष्यीं इतं शिशुम्‌ । | समर्थं होकर भी बृढ माता-पिता, सती पत्नी, बालक 

| संतान, गुरु, ब्राह्मण ओर हारणागत्का भरभ-परोषण 

शुरु विग्र प्रपन्नं च्‌ विभ्च्छ्रमन्‌ श्रुतः \}! ७} | नहीं कर्ता-- व्ह जीता इआ मी सूर्देके समान दही 

है ! ॥ ७ ॥ पिताजी ! हमारे इतने दिन व्यथं ही वीत 

तन्नावक्स्पथः ्ंसाचिर्यपुदहिभ्रचेदसोः । । गये । कर्पोक्ि कंसके मयसे सदा उद्रि्रचित्त रहनेके 

| कारण इम आपकी सेवा कटनेमे अमथ ईहे ॥ ८ ॥ 

सोवयेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वायनच॑दो;ः ¦; ८ ॥ | मेरी माँ ओर मेरे पिताजी ] आप दोनों इमेंश्मा 

| करे । हाय | दुष्ट कंसने आपको इतने-इतने कट 

दिये, परंतु हम परतन्त्र रहनेके कार आपकी कोई 
सेवा-डुश्रषा न कर स्के ॥ ९ ॥ 


पक व 1 भ 3 3 क ् 


तत्‌ क्षन्तुसहंथस्तात मत्न दरतन्त्रयोः 


1 गी 





अक्तो दश्रपां छिष्टयोदु्ेदा अक्षम्‌ ॥ ९ |! 


त धरीदयुकदेवजी कते है-- परीश्षित्‌ ! अपनी 
= टीलासे मनुष्य बने इए विश्वात्मा श्रीहस्किी इस वाणीसे 
इति मायामदुष्यख हरेविश्वास्मनो भिरा। मोहित हो देवकी-बसुदेवने उरे गोदमें उठा न्या 


| ओर हदयसे चिपकाक्रर परमानन्द प्राप्त क्रिया 1 १० ॥ 
मोदितावङ्कमारोप्य पर्ष्विज्यापतु्ंद्‌म्‌ \\१० प & ४ 

५ ^ राजन्‌ ! वे स्नेह-पाशसे वंधकर प्रणतः मोहित ह 

सिश्वन्तावश्ुधाराभिः स्मेहपाक्ञेन चष्रतौ | गये ओर ओँसुओंकी धरारासे उनका अभिषेक करने 

ठगे । य्हौतक कि ओंँघुओके कारण गडा रंध जानेसे 


न किंञिद्‌चत्‌ राजन्‌ बष्पकषण्डो विमोहितो ॥११॥ | वे इछ बोर भी न स्के ॥ ११॥ 


एवमाश्वसख पितरो भगवान्‌ देवकोडतः । देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने इ प्रकार अपने ` 
। & माता-पिताको सान्तरना देकर अपने नाना उग्रसेदको 
मातामहं त्रसेन यदूनामकरोन्परुषस्‌ \\१२॥। यदुवं्चिरयोका राजा बना दिया ॥ १२ ॥ ओर उनसे 
कहा--महाराज ! हम आपकी प्रजा है | अप. 
हमखोगोपर रासन कीजिये । राजा ययातिका चाप 
| 2 होनेके कारण यदुवशी राजसिंहासनपर नही बेठ सकते; ` 
चः ययातिशापाद्‌ यदुभिनांधितव्य॑ नृपासने ॥१३॥ (बरद शत पवा शी 
मयि भृत्य उपाक्षीने भवतो विबुधादयः । दोष न होगा |) ॥ १३ ॥ जन मेँ सेवक बनकर आपकी 
{. सेवा करता ररा, तब बड़े-बड़े देवता भी क्षिर छाः काकर्‌ | 
ध. बर्लिं हरन्त्यवनताः कियुतान्ये नराधिपाः ॥१४। आपको भट देगे ।' दूसरे नरपतियके बारेमे तो कं 





आह चाखान्‌ महारज प्रजा्वाज्ञप्तमर्हति । 








---------------------- ~~ -~~~-~~-~~-~ ~ ~--~~ -~--~-~~----~--~~~---~-~~-------- 
पेषणि 
५... नोचत्‌ 4 





> ति 
ि 
9. त 5 न्य कत 9-9-०५ = 9 = 
= केक " ककत ऋ ` ~ == क ~ न 


त 
1 वि मि कि त त त 1 


त १) 
~ (कि 7 ` । 
नि 6 


ज अ, = 
। ध 





भ जो = जो धाया > कक्‌ जः क कक पर * गत 
चकः नि न (+ =-= विकि ह 7 
# नषि = कम भ 
"कोकः "क्कः क -- # + 
~ 


००२ ं श्रीमद्भागवत [ अ० ४५ 











सवार्‌ खाञ्ज्ञातिसम्बन्धान्‌ दिग्भ्यः कपभेयाद्‌ | ही क्या है ॥ १४॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्र्ष्ण ही 
सारे विश्वके विधाता है । उन्होने, जो वंक्के भयसे 
ग्याकुक होकर इधरउरर भाग गये थे, उन यदु, 
चृण्ण, अन्धक, मधु, दाशार्ह ओर बुर आदि वंशम 
| उसन समस्त सजातीय सम्बन्धियोंको दद -टूढवर्‌ 
सभाजितान्‌ समाश्वाख विदेलावासकश्चितान्‌। बुखवाया । उन्हें घरसे बाहर रहनेमे बड़ा छेदा उठाना 
पड़ा था । भगवानने उनका सत्कार किया, सान्तना 
न्यवासयत्‌ खेदेषु वित्तैः संतर्प्य विशकरत्‌ ।१६९॥ | ग क उने स भनःसमपतत देकर तृप किया तव 
अपने-अपने धरम बा दिया ॥ १५-१६ ॥ अ 
सारे-के-सारे यदुवंशी भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा बलरामजीके 
बाहवलसे सुरक्षित थे । उनकी कृपासे उन्दं किसी 
प्रकारक व्यथा नहीं थी, दुःख नहीं था | उनके सारे 
॥१७॥ मनोर सफ़ल हो गये थे | वे क्रताथंदहो गये थे। 
अब वे अपने-अपने घरमे आनन्दसे विहार करने स्मो 
(द ॥ १५७ ॥ भगवान्‌ श्रीकरष्णका वदन अआनन्दका सदन 
वाक्षन्ताऽहरहः प्रीता यृडन्दवदनाभ्बुजमर्‌ । है । वह नित्य प्रफुधित, कभी न कुम्हटानेवात् 
कमल दहै | उसका सदयं अपार है! सदय हास 
ओर चितवन उसप्र सदा नावदी रहती है । यदुवंश 
दिन-प्रतिदिन उसका दशन करके आनन्दमग्न रहते 
॥ १८ ॥ मधुराके बद्ध पुरूष भी युवकोके समान 
अघ्यन्त॒वत्रान्‌ ओर उत्साही हो गये थे; क्योंकि 
वे अपने नेत्रोके दोनोँसे बारंबार भगवान 
मुखारविन्दका अग्रृतमय मकरन्द-रस पान करते 
रहते थे ॥ १९ ॥ 


यदुङ्ष्ण्यन्धकमधुदाशाहङङ्करादिकान्‌ ॥१५॥ 


छृष्णसंकपंणयजेर्गु्ा = रन्धमनोरथाः 


गृहेषु रेमिरे सिद्धाः इष्णरामगतज्यराः 


नित्य प्रधदितं श्रीमत्‌ सदयस्ितवीक्षणभ्‌ ॥१८॥ 


तत्र प्रचयसोऽप्याषन्‌ युबानोऽतिवरोजसः 


पिबन्तोऽ्षेठं्न्दस्य ुखेाभ्बुजसुधां मुहुः ॥१९॥ 


प्रिय परीक्षित्‌ | अत्र देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्ण 

् | ओर बलरामनी दोनों द्वी नन्दवाकाके पास आये ओर 
केषणद्च राजेन्द्र॒ परिष्वज्येदमू चतु; ।॥२०॥ | गले कगनेके बाद उनसे कहने लगे - ॥२०॥ (पिताजी ! 

| आपने ओर माँ यशोदाने वड़े स्नेह ओर दुतरसे 

पितयुवाभ्थां लिग्धाभ्यां पोषितौ लाङितौ भृशम्‌ । हमारा छन-पाकन किया है । इसमें कोई सदेह नही 
| क्रि माता-पिता संतानपर अपने शरीरसे भी अधिक 

पित्रोरथ्यधिक्ना श्रीतिरास्मजेष्वाटमनोऽपि दि॥२१॥ स्नेह करते है ॥ २१ ॥ निन्हं प॑लन-पोषण न कर 
| सक्नेके कारण खजन-सम्बन्धियोने व्याग दिया है, उन 

स पिता सा च जननी यौ पुष्णीतां खपत्रवत्‌ । नालककोको जो लोग अपने पुत्रके समान ल.ङ्यारसे 
त स प्लत है, वे ही वस्तवे उनके मं-बप हैं ॥ २२॥ 
शित्‌ बन्धुभिहत्शटानकरपंः पोपरशषणे ॥२२॥ | विताजी ! अब आपलोग तरनमे जाये । इमे संदेह 


अथ नन्दं समासाद्य भगवान्‌ देवकीसुतः 


यात युयं जं तात वयं च स्नेहदुःखितान्‌ । नहीं कि हमारे निना वात्सल्य .ेहके कारण आप 








१. भयार्दितान्‌ । 








अ० ४५ ] द्रम स्कन्धं 






र ह ¬ इ ` वा र म कन्दानि सः २ 7 ति क 1 2 तो 3 
रिरि की 


ज्ञातीन्‌ वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुदा सुखभ्‌।।२३॥ | लेगोंको बहत दुःख होगा । यकि घुदद्‌-सम्बन्धर्योको 
सुखी करके हम आपमर्गोसे पिलनेके च्वि अयेगे' 

एवं सान्त्वय्य भगवान्‌ नन्द्‌ सत्रजमच्युतः । ॥ २३ ॥ मगान्‌ श्रीक्रष्णने नन्दवावा ओर दूरे 

अः सः ब्र नगासिर्योको इस प्रकार समन्चा-वुञ्चाकर वड़े आदरके ` 
वता-लच्ररडप्व्यरहयामास्‌ सादरम्‌ ॥२४॥। साथ वद, आभूपण ओर अनेक घातुक बने बरतन 
` | आदिं देकर उनका सत्कार किया ॥ २४ ॥ मगवानक्ी . 
वात सुनकर नन्दवावाने त्रेनसे अनर्‌ होकर दोनो. 
याको गले च्णा ल्यः ओर क्रि नेत्रम ओप 

पूरयद्नश्चुभिरनेत्र इह योपेव्रजं य॒यौ २५६] भरकर गोपात्रे साव व्रजके ल्य प्रान किया ॥२५॥ ` 


अथ सुरसुतो राजन्‌ शुत्रयोः समकारयत्‌ । हे राजन्‌ ! इसके वाद ॒वष्ुदेवजीने अपने पुरोहित 

गर्गाचाय तथा दूसरे ब्राह्मणोसे दोनों पुत्रका विधिपूर्वैक 

पुरोधक्ता बाहमणेश यथावद्‌ हिजसंस्कृतिम्‌ ।२६॥ । द्विजाति-समुचित यज्ञोपवीत-संस्कार काया ॥ २६ ॥ 

उन्होने विविव प्रकारके वज्र ओर आमूषणेसि ब्रा्यर्णोका 
तेभ्योऽदाद्‌ दक्षिणा गावो सुक्ममालाः खलंदरता; । | सत्कार करके उन्द बहत-सी दक्षिणा तथा बछडोवाटी ` 

गीए्‌ दीं । समी गोरं गलेमे सोनेकी माला पहने इए 

सरंक़रतेभ्यः सम्पूज्य सवर्षाः छौममालिनी;।।२७)॥ | थीं तथा ओर भी बहृत-से आभूषणा एवं रेशमी वकी 
| मालाओंसे विमूषित थीं ॥ २७ ॥ महामति वुदेवजीने . ` 
याः कृष्ण्राभजन्भक्ष भनोदत्ता महामतिः । मवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बलराभजीके जन्म-नक्षत्रमे जितनी 
| गौर्‌ मन-ही-मन सङ्कल्प करके दी शीं, उन्ह पठे ` 
ताश्चाददाद्‌चुस्श्रत्य कसेनाधमंती हृताः ॥२८}) | कसने अन्यायसे छीन व्या था । अंब उनक्रा स्मरण 
| करके उन्दने ब्रा्मणोको वे फिरसे दी ॥ २८ ॥ इस 
| * दत सन्धसंस्कारौ जसं प्राप्य सुव्रतौ । | प्रकार यदुवंशके आचार गर्गजीसे संस्कार कराकर व 
| र ‰ रामजी ओर मगवान्‌ श्रीकृष्ण द्विजल्वको प्राप्त इए | ` 
| गगौद्‌ यदुङ्ल(चायौद्‌ गयत्रं ्रतम।खितो \\२९) | उनका व्रमचर्थ्रत अखण्ड,तो धा ही, अव उन 
= गायत्रपूर्वक अध्ययन करनेके, व्ि उसे नियमतः खीकार 
किया ॥ २९ ॥ श्रीकृष्ण ओर बलराम जगत्‌के एकमात्र 
खामी है । सर्वज्ञ है । समी विया उन्हीसे निकली है। 
उनका निर्मल ज्ञान खतः सिद्ध है । किर भी उन्होने 
मनुष्यकी-सी ीला करके उसे छिपा रक्खा धा ॥३०॥ 


अत्र वे दोनो गुरुकुल्मे निवास करने च्छासे 


कारयगोत्री सान्दीपनि सुनिके पास गये, ३ जो न्तीए र्‌ 

( उजैन ) मे रहते थे ॥ ३१ ॥ वे दोनो भाई वििषवक 

गुरुजीके पास रहने को । उस घमयवे वड ही छु 

- ~ अ & ~ सयत, भपनी चेशओोंवं सवथा । नियमि मेत रखे ११ थे ॥ 

। , मथोपाच तौदान्तौ गु िमनिन्दिताम्‌। = । यी तो उनका आद्र कते ये, माच ओह 
४ न भ "+ भ ४ 4 ५ 





 इत्युक्तश्त परिष्वञ्य नन्दः  प्रणयविहङः ¦ 


नज "११ २: त हि... "क "१, चका ` "क ककः 
































प्रभवो पवविद्यानां सव॑ज्ञो जगदीश्वरो । 









नान्यसिद्रामलन्ञानं गूहमान नरेहितेः \ ३०॥ 






अथो गुङले वाकमिच्छन्ताबुपजग्मतु, 





कायं दीपनं नाम ह्यवम्तीपुखासिनम्‌ ॥३१॥ 












॥ 














शिक क 
~ ०9 - 















(^ व) - 
छ | ४१ 5 ४०४ श्रीमद्भागवत [ अ० ४५ ~ 
| | ॥ । ~~ ल -----~ === 
॥; { ग्राह्यन्तादुपेतो ख भक्त्या देवमिवादतो ॥३२॥। | ओर वलरामजी भी गुस्की उत्तम सेवा कंसे करनी 
। | | ॥ 4 | चाहिये, इसका आदरं >ेोगोके सामने रखते इए वडी 
॥| [¦ | तयोद्िनवरस्व्ः शद्धभावाल्रत्तिभिः | भक्तिसे इष्टदेवके समान उनकी सेवा करने लगे ॥२ ९॥ 
॥ £ गुरुवर सान्दीपनिजी उनकी डयुद्धमावसे युक्त सेत्रासे 
#॥ - = & „ _ | बहत प्रपतन हए । उन्होने दोनों भाई्ोको ख अङ्ग 
# | ए दानलिलान्‌ साज्ञोरनिषदो गुरूः ।*६६॥। ओर उपनिषदके सहित सम्पूण वेदोकी शिक्षा दी ॥६३॥ 
॥ [^ [1 न्यायपथासथा | इनके सिवा मन्त्र ओर देवता्ओके ज्ञानके साथ धनुर्वेद, 
। {14 & | मनुस्परति आदि धर्मदाख्र, मीमांसा आदि, वे्दोका 
॥ 17 ल | तात्प वतानेवाठे शाल, तक॑वि्ा ( न्यायशाल्च 
| |. तथा चान्धीक्षिकी परियां राजनीतिं च षड्विधाय्‌| ३४। | आदिकी मी शिक्षा दी । साथ ही सन्धि, विग्रह, यान, 
॥। 7. । | आन, दरे ओर आश्रच-इन छः मेद युक्तं राज- 
| ॑ छव नरवश्श्रेण सव॑विद्याभ्रवतेश्टौ | | नीतिका भी अव्ययनं कराया }| २४ ॥ परीक्षित्‌ 
॥ । भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर ब्टराम सारी व्रिधाअकेः प्रवतक 
| {1 3 3 २ है| इस्त समय केवल श्रेष्ठ मनुष्यका-सा यवहार करते ह 
| सकरन्निभदमत्रंण तो संजगुहतरेप \\२५५॥। ही वे अध्ययन कर रदे थे! उन्होने गुरुजीके केवल 
| । एक वार कदनेमात्रसे सारी विचाएं सीख ली } ३५॥ 
( | 5 - 1 । केवल चौसठ दिन-रातमं ही प्षयमीश्चिरोमणि दोनो 
। अहोरात्रेषत षया संयत्त तावतीः कला; | । माद्योने चस्य कगओन्का ज्ञान प्राप्त कर च्या | 
६ । ग ६ इत प्रकार अध्ययन समाप्त होनेपर उन्दोनि सान्दीपनि 
गुरुदश्षिणयाऽऽचायं छन्द्यामाक्षतुचेष ।३६।}  सुनिसे प्राथैना की कि (आपकी जो इच्छा हो, गुर्‌ 
# चोसट कलर ये ईदै- 

१ गानविध्ाः २ वादच्-मति-भोतिके बाजे बजाना, ३ देय; * नाध्व; ५ चिघ्रकारी, £ वरेख-बूटे बनाना; 
७ चावल ओर पुष्पादिे पूजाके उपहारकी रचना करना, ८ पूर्लोकी सेज बनाना, ९ दोतः वचन ओर अ्गौको रगनाः 
१० मणिर्योकी फं वनानाः ११ शय्या-रचनाः १२ जल्करो बोध देना, १३ विचित्र सिद्ध्यां दिखलानाः १४ हार-माल 
आदि वनानाः, १६ कान ओर चोटीके एूलोके गहने बनाना, १६ कपड़े ओर गहने वनानाः १७ पूरके आभूषणेति शङ्गार करना; 
#॥ १८ कानेकि पर्ताकी रचना करना, १९ सुगन्ध वस्तरप-इत्रः तैर आदि बनाना, २० इन्द्रजाल --जादूगरीः २६ चाद जेसा 
| ' वेष धारण कर लेना? २२ दाथकी तकि काम; २३ तरह-तरह्की खानेकी वस्तुं बनाना, २४ तरह-तरहके पीनेके पदायं 
| वनानाः २५ सुदंका काम; २६ कठपुतटी बनाना; नचाना, २७ पदेछीः २८ प्रतिमा आदि वबनानाः २९ कूटनीतिः 


॥ 
। ३० अ्रन्थकिं पदानेकी चातुरी, ३१ नायकः आख्यायिका आदिकी रचना करनाः ३२ समष्यापूरतिं करनाः ३३ पट्टी? वेतः वाण 
। अदिं बनाना, ३४ गटीचे, दरी आदि बनाना, ३५ बदृ्दकी कारीगरी, ३६ गह आदि वनानेकी कारीगरी, ३७ सोने; 
|: वादी आदि धाठु तथा हीरे पन्ने अदि रत्नो की परीक्षाः ३८ लोना्चोदी आदि बना ठेनाः ३९ मणिके रंगकरो पहचानना, 
। ४० खार्नोकी पहचानः ४१ वृर री चिकित्सा ४२ मेड़ा, सर्गा, वटेर आदिको ल्ड़नेकी रीतिः ४३ तोता-मेना आदिकी 
। ^ बोरा बोख्ना, ४४ उच्ाटनकी बिधि, ४५ केर्शोकी सफ(ईका कौर ४६ म्टीकी चीज या मनक वात वता देनाः 
। ४७ श्लेच्छ-काव्योका समन्न ठेनाः ४८ विभिन देर्योकी भाषाक्रा ज्ञानः ४९ दाकुन-अपशङ्कन जानना, प्रभोकि उत्तरमे 
द्चमाद्यम बतटाना,५०नाना प्रकारके मातृकायन्तर बनामा५५.१२्नोको नाना प्रकारके आकारोमें काटना, ५२ साङ्केतिक भाषा बनाना 
५३ मन्म कटकरचना करना, ५४ नयी-नयी बाते निकालना, ५५ छलसे काम निकलना, ५६ समस्त कोयोका शानः 
५७ समस्त छन्दौका जान, ५८ वरखरको छिपाने या बदङ्नेकी विधा, ५९ दयूतक्रीङ़ाः ६० दूरके मनुष्य या वस्वुओका जाकषण 
कर ठेनाः ६१ बाक्कोकि खेर, ६२ मन्नविधा, ६३ विजय प्राप्त करानेवाखी विधा? ६४ वेताछ आदिको वशम रखनेकी विद्या | 





पि = = , १ ऋ | च 





द्श्चम 


# 


अ० ४ | 


कक 


~ ~ न 
्काकन्योगोोन्यकनयिन 


द्विजस्तगोस्तं सहिमानमद्भतं 
संलक्ष्य शजन्नतिमालुषीं मतिश्‌ । 


भि भ भिः कः = जः द ज ऋ चः 





सस्धन्तय पर्या ट सहाणवे मरतं 
बालं प्रभासे वरयाभ्भूव ह \) २७}; 


तयेत्यथाश््य महारथौ रथं 
भासमाष्ाध दुरन्तविक्रमो । 

वेराद्चुपक्रञ्य निषीदतुः कुण 
सिन्धुविंदित्वादहंणमाहस्तयोः ॥३८॥ 

तमाह भगवानाह. गुद्पुत्रः श्रदीयतास्‌ । 


योऽक्षातिह त्वया ग्रत बालो सहतोधिणा }\३९)॥) 


सत्वरं प्रथः | 
जरमानिर्य तं इत्वा नापदयदुद्रेऽभकथ्‌ \४१।॥। 
तदङ्खप्रभधे शद्मादप्य रथसागन्नत्‌ | 
ततः संयधरनीं नाय यस द्धयितां एरीष्‌ ।॥४२।। 
गत्वा जनदंनः शङ्खं प्रदध्यौ खषकशुधः । 
शहनिहदसाक्यं प्रजासंयमनो यमः ।\४३॥ 
तयोः क्षपय सीं चक्रे भक्त्युपवरहितामर । 
उवावावलतः दष्मंसवंभूचाश्यार्यम्‌ । ` 


~ न ~ नम 
आस्ते तेनाहती नुं वच्छ्त्वः 


रीलाभटुष्य हे करिष्णो युवम; करवाम किम्‌ ॥४४।। 
श्रीभगवानुवाच 


गुरुपुत्रमिहानीतं  निजकमेनिबन्धनम्‌ । 









स्कन्ध 


[ 


४०५ | 
दक्षिणा मांग टँ ॥ ३६ ॥ महाराज ' छार्न्दःपनि मुनिने 
उनकी अद्धुत महिमा ओर अन्धौकिक वुद्धिका अनुभव 
कर लिया था | इसन उन्हनि अपनी पत्नीसे एवह 
करके वह गुरुदक्षिणा मोगी कि श््रभापषक्षेत्रमं हमारा 
वालक समुद्रे इवकर मर गया शा, उसे तुमढोग व 
दो" ॥ ३७ ॥ वल्रामजी ओर श्रीक्ष्णका पराक्रम 








` ऋ जि तेत 





| अनन्त था दोनां ही महारथी थे । उन्न वहत 


अच्छा" कहकर गुश्जीकी आज्ञा खीकार की ओर रथपर्‌ 
सवार होकर प्रमासक्षेत्रमे गये । वे सपुद्रतटपर जाकर 
क्षणभर वरे रहै । उस समय यङ जानकर कि ये 


साक्षात्‌ परमेश्वर है, अनेक प्रकारश्षी प्रना-सामग्ी 
| ठलेकर समुद्र उनके सामने उपास्त इ ॥ ३८ ॥ 
| भगवान्‌ने सपुद्रसे कहा--“समुद्र ! तुम यङ्क अपनी 


| वडी-वड़ी तङ्गोसे हमारे जिस गुरुपुत्रको बद्वा ठे गये 
थे, उसे खाकर शीघ्र हमे दो ॥ ३९ ॥ 
| भचुप्यवेषधारी सयुद्रने कद्--"देवाधिदेव श्रीकृष्ण | 
| मेने उस बाककको नक लिया है । मेरे जलम पञ्चजन 
| नामका एक वड़ा मारी दैव्य जातिका घुर शङ्खके रूपमे 
| रहता है । अवश्य ही उसने बह वाल्क चुरा च्या 
होगा, ॥ ४० ॥ समुद्रकी बात बुनकर भगान्‌ तुरंत 
| ही जल्मे जा धुसे ओर शङ्खाघुरको मःर डान । परंतु 
। वह॒ बाकक उक्के पेटमे नहीं मिला !\४१॥ त्व 
उसके शरीरका राजल ठेकर भगवान्‌ रथपर चङे 
| जये । वसे बब्यामजीके साथ ॒श्रीकृष्णने यन्‌- 
। राजकी प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शाङ्खं बजाया । 
राङ्खका शब्द सुनकर सारी प्रजाक। शसन करनेवाञे 





यमराजने उनका खागत किया ओर अक्तिभघ्रसे. 


भरकर विधिप्रव्रक उनकी बहुत व्डी प्रजाः की । 
उन्होने नघ्रतासे हुक्कर समस्त प्राणिेके हदयते 


विराजमान सच्चिदानन्दरूप मगवरान्‌ श्रीज्ष्नसच कया ` 


“कीलसे ही मनुष्य बने इए सर्वव्यापक परमेश्वर । नै 
आप्‌ दोनोँकी क्या सेवा करू १ ॥ ४२-४४ ॥ 

श्रीभगवानने कइ(--“यपराज ! यहाँ अपने कम- 
बन्धनके अनुसार सेर गुरुपुत्र गय। ८६ गया ह | तुम 


‡ भेरी आज्ञा खीकार करो ओर उसके कमैपर्‌ व्यान 
ध आनय महाराज सच्छासनपूुरस्छत' ९५ | न. देकर उसे मेरे पास्त छे आभो" ॥ ४५ 


ॐ +: 
+ + ऋ; 

६ कक 

धः क; 


॥ 


९१५ 













। ४०९ श्रीमद्भागवत [ अ० ४६ 
+ 1 क ---------------------~-----~---~~~-_~-_~------------------ 
तथेति तेनोपानीतं गुरुपुत्रं यदृत्तमों यमराजने जो (आज्ञाः कहकर भगवानक्रा अ!देश खीकाए 
किया ओर उनका गुरुपुत्र ला दिया । तत्र यदुरवंशरिरोमणि 

पि तं भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बर्राधनी उप्त वाल्कको लेक 
4 दत्वा खुरे भूयो इणीप्वेति तमूचतु; ॥४६॥ उज्जैन टोट आये ओर उसे अपने गुरुदेवको सोपका 
कहा करि 'आप ओर जो कुछ चाहे, मोग टेः | ४६॥ 

गुरृ्वाच गुरुजीने कदा-- ध्वे ! तुम ॒दोनोने भीति 
गुरुदक्षिणा दी । अत्र ओर क्या चाहिये १ जो तुम्हारे 
जेसे पुरुषोत्तमोंका गुर है, उसका कोन-सा मनोरथ 


क" भो दि" (9 
[ , > नः क - 
' = 


[त 1 


+ ष 
॥ 1 | 
क, नीः 





प 
२९ शगाष्कॐ 
----- 


~~ 


नि विसि 1 द [त क कै 
ष क्का, = सो चे कनकः == ५ ऋ क „नन = च 
= क 





॥| ^ ` सम्यङ्‌ सम्पादितो त्स भवद्भ्यां गुडनिष्कयः। 


को यु युष्मदिधयुरोः कामानामवशिष्यते ।४७।। अरूण रह सकता है १! ४७ ॥ वीरो अव तुम 
दोनो अपने घर जाओ । तुम्हें. ठो्कोको प्रत्त्रि कले- 
वाटी कीतिं प्राप्त हलो | तुम्हारी पदी इई विदा इत्‌ 
| ( {| ~ ८ कोक ओर परलोके सदा नवीन वनी दष्टे, कभी 
|४ | छन्दांखयातयामानि भवन्त्विह परत अ ॥४८। व ०८ वपा! न्व 


|. [1 गच्छतं खगृहं वीरो कीतिवमस्¶ पावनी | 


आज्ञा ठेकर वायुके समान वेग ओर मेके समान 
ङाब्दवाठे रथपर सवार होकर दोनों भई मथुरामे ल्ट 

# २ आयातो खपुरं तात्‌ पजेन्यनिन्‌ देन वे [४९ | ६ ॥ ०५९. ॥ मथुराकी प्र जा बहत दिनातक श्रीकृष्ण 
६ | ओर बलरामको न देखनेसे अव्यन्त दुखी हो दी 
समनन्दन्‌ प्रजाः सा द्रा रामजनार्दनौ । = । थी । अव उन्हे आया इथा देख सवकेसव 
परमानन्दमें मग्न हयो गये, मानो खोया हआ धन मिक गयां 


अपद्थन्त्यो बह्वहानि नष्टलन्धधना इव ॥५०॥ हो ॥ ५० ॥ 
~~~ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे गुरुपुत्रानयनं 
नाम पञ्चचत्वारियोऽव्यायः ॥ ४५ ॥ 
नमक 
5 = गो ५ 
अय पट्चलार्‌ ऽन्यूय, 
उद्धवजीको बजयात्रा 

श्रीचक्र उव।च | भरीद्युकदेवजी कते दै यरीक्षित्‌ ! उद्धवजी 
| ब्रण्णिवंरियोमें एक प्रधान पुरुष थे । वे साक्षात्‌ 
वृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णख द्‌थितः सखा । बृहस्यतिजीके शिष्य ओर परम बुद्धिमान्‌ ये । उनकी : 
महिमाके सम्बन्धे. इससे बहढृकर ओर कोन-सी बात 
की जा सकती है किं वे भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्यारे 
तमाह भगवान्‌ प्रष्ठ भक्तमेकान्तिनं क्रचित्‌ । सखा तथा मन्त्री भी ये ॥ १॥ एक दिन इरणागतोके 
। ॥ सारे दुःख हर टेनेवाठे भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने प्रिय 


ग्रहीत्वा पाणिना पाणि प्रपन्नातिंहरो हरि; ॥ २॥ । मक्त ओर एकान्तप्रेमी द्धवजीका हाथ अपने हाथमे 


७ 


गुरुणेवमयुज्ञातों रथेनानिररंहस्त । 


पका १ कर त च कक ' चन्न क चकि न " ¶ नकरीरनयें * = "क च ~ ऋ ऋं किकः = 
>“ +न नि अ न क ~+ -- ~ 4 ~ त (पीनः १». < 
च्व ॥ क 17 का ` ग ` त 
॥ क 
क ~~ 
कण हि 


कका क त षि 
(व + 

= 1 ४ 
छ नदद 9 रंक = ~ = 
कि 
ण्न 
च 


„ , + 
# = 








शिष्यो ब्रहस्पतेः साक्षादुदधयो बुद्धिसत्तमः ॥ १॥ 

















६. गुरुद्ल्घ्र्तिः पञ्च । २. वाद्रायणिरुवाच । 





अ० ४६ |] 


----------------------------------- ~ ------------------------------------------~ 


गच्छोद्ध व्रजं सोभ्य पित्रो श्रीतिमावह । 


` गोपीनां मद्विथोगाधिं मत्संदेशेर्धिभोचय ॥ ३॥ 





ता मन्प्रनरश्ा मसप्रणा मदथ त्यक्तदेहिकाः। 


( मामेव दयितं प्रष्टमार्मानं मनसा गताः  ) 


०५ 


य॒त्यक्त 


मयि ताः प्रियां प्रष्टे दृर्स्थे गोङ्करक्जियः। 
खरन्त्योऽङ् विप्रह्यनित पिरहोव्कण्ठ्यविह गाः ५॥ 


| धारथन्त्यतिश्च्डरेण प्रायः प्राणान्‌ कथथ्चन्‌ । 
प्रत्याम्‌प्रनसंदेशेषष्टव्यो मे मदास्िकाः ।॥ ६ ॥ 
श्रीद्ुक उवाच 


ह्युक्तं उद्भभो राजन्‌ संदेशं भतुराहतः 
आद्य रथमा प्रथयो नन्द गेङ्कुरुश्र ॥ ७॥ 









| भराप्नो नन्दव्रजं श्रीमान्‌ निम्लोचति विभावसो । 
| छन्नयापरः प्रविशतां पशूना सुररेणभि; ॥ ८ ॥ 


| वापिताथेऽभिगुष्यद्धिनीदितं श॒म्मिमिवषै 


| धाबन्तोभिश्च आस्भिहूधोभारे; खवरकान्‌॥ ९1 , अपने-अपने बछडञकी ओर दौड 


५ $ | च नरन 2 
४ ९ 


दशम स्कन्ध 














ऊोकधपोश्च मदर्थं तान्‌ भिभम्येहम्‌ || ४ ]} | प्रिय उद्धव ! मैं उन गोपिर्योका परम प्रियतम दर | मेरे 








लेकर कहा--॥ २ ॥ “सौम्यस््रभाव उद्धव । तुम व्रजरमे 
जाओ । वर्ह मेरे पिता-माता नन्दवावा ओर यशोदा मैया 
है, उन्हें आनन्दित करो; ओौर गोपिर्याँ मेरे विरहकी 
ग्याधिसे बहत ही दुखी हो रदी है, उन्हे मेरे संदेश 
सुनाकर उस वेदनासे सक्त करो ॥ २ ॥ प्यारे उद्धव । 
गोपिर्योका मन नित्य-निरन्तर समुक्षमे दही ल्गा रहता 
है | उनके प्राण, उनका जीवन, उनका स्वल मे 

। मेरे च्यि उन्होने अपने पति-पुत्र आदि सभी 


| सगे-सम्बन्धिर्योको छोड दिया है । उन्हनि बुद्धिसे भी 
| 


मुज्ञीको अपना प्यारा, अपना प्रियतम- नदीं, नहीं 
अपना आत्मा मान रक्खा है । मेरा यह व्रत है किं जो 
 व्मेग मेरे व्यि लौकिक ओर पारलोकिक धर्मोको छोड 
| देते है, उनका भरण-पोषण मैं स्यं करता द्र ॥ ४॥ 


यहाँ चे भनेसे वे मुञ्ञे दूरस्थ मानती हँ ओर मेश स्मरण 
करके अव्यन्त मोहित दहो रही है, बार-बार मूच्छित 
हो जाती हैँ | वे मेरे विरहकी व्यथासे विहर हो रही 
है, प्रतिक्षण मेरे ष्ि उव्कण्ठित रहती है ॥ ५॥ 
मेरी गोपियोँ, मेरो प्रेियां इस समय बडे ही कष 
ओर यत्नसे अपने प्रार्णोको किंपी प्रकार रख रहो है । 
मेने उनसे कडा था किं "पे आगा । वदी उनके जीवनका 
धार है | उद्धव ! ओर तो क्याकरहरँ, मँ ह्वी उनकी 
आसा द्र । वे नित्य-निरन्तर सुञ्षमे ही तन्मय रहती , 
दे ॥ ६ ॥ 
श्रीट्युकदेवजी कहते ह- परीक्षित्‌ ! जब भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने यह बात क्री, तव॒ उद्धषजी बडे आदरसे 
अपने खामीका संदेश केकर रथपर सवार इए ओर 
नन्दरगोवके च्यि चल पडे ॥ ७ ॥ परम सुन्दर ` 
ठद्धवजी सुर्थास्तके समय नन्दबाबाके ब्रजमें पचे । ` 
उस समय जंगल्से गौरं लोट रही थीं | उनके खुररोके 
आधातसे इतनी धूल उड़ रही थी किं उनका रय ् स 
गया था ॥ ८॥ व्रनभूमिमे ऋतुमती गोअके व्यि 
मतवाले सड आपपमे ख्ड रहे थे । उनकी गर्जनासे 
सारा व्रन गूज रहा था । थोडे दिनोकी न्यायी इई . ¦ 
गोपं अपने थोके भारी भारसे द्वी होनेपर 
थी॥ ९ ॥ 

















हि । 


भै चः “~ ॥, 


9 
- 


[त-न , ॐ, 4 ध 


५ 
"कुः ५ 


®= "केतू = ¢ १ 9 1 १ 
क -के-+ > = “कः क जि 
क 
च ऋ = दुक क. =+ 


> 





ज 9 क कज हः 
~ * -नकुकरः =. = ~ ~ = क 


= क 
क 1 1 ~ च ् 
के क» ॐ म 0 
नकि 1 5 | कि ` न 
4 ज = 2 जर 0 क 








49 दो 3 क क = ति तको = = = क + कः = चा ककः = अः जज 
ज 9 ह 1 द [1 = = 





~ > | ^ --* "~~~ 


४०८ श्रीमद्भागवत  अ० ४६ 
इतस्ततो विलङ्कद्धिर्गोवत्सैमण्डितं सितैः | । सफेद रगके बछडे इधर-उधर उछ्ल-कूद मचाते हए बहुत ही 
। भके माद्धम होते थे । गाय दुहनेकी “घर-घर 'निसे ओर 
गोदोदशब्दाभिरवं वेणूनां निःखनेन च ॥१०।; बोँुरि्ोकी मधुर टेष्से अव भी व्रजकी अप्र शोमा 
- | हो रषी थी॥ १० } गोपी ओर गौप सुन्दरघुन्द्र 
गायन्तीभिश्ध कमणि शभानि बलकृष्णयोः | | वख तथा गहर्नोसे सज-धजक्‌र्‌ श्रीकृष्णं तथा बलरामजीके 
| मङ्गलमय चरित्रांका गान कर रहै ये आर्‌ इस प्रकार 
ख ~< अ भ 1 | ^ ८ ~ (3 
लछृताभिगोपीभिगेपिश्च खदिराजितम्‌ ॥११।। तरनकी शोभा ओर भी वद गी थी! ११॥ सोके 
घरमे अनि, सुय, अतिथि, गौ, व्राह्मण ओर देवता- 
अर ० ल क्र म > ~~ © €= च्य (व भ (पि ~ (9 र नर ^ । 9 क 
स्य्क।तिथिभ) वेप्रधितदिवाचनान्वितैः | पिततरका प्रूना का हृं था ¡ धरूषरक्रा सुगन्य चारों अर्‌ 
| ठ रही थी ओर दीपक जगपगा दहे दे} उन धरोको 
धू + ष, < ५ = 
पदी गार्थेश्च गोपावासेम॑नोरसष्‌ १२} | पुष्पोंसे सजाया गय! था । पैसे मनोहर गृह्यसे सारा त्रज 
| ओर भी म्नोरम होरा धा} १२॥ चरँ ओर 
ल ४४ € द, ॐ # 4 > ५ सच # +~ ॐ, => 
घतः पष्पितदनं दविजालिङ्लनादितभ्‌ | वन-पक्तियां षटोसे ब्द रही्थीं | पश्षी चहक रहै 
थे ओर भरे गंजार कर रहे थे! ब्ल जक ओर स्थछ 
से 


हंछङारण्डवाकीर्णेः पञ्यण्डेशच मण्डितम्‌ ।॥१३।। | दोनों ही कमलके वनसे सोभायमान थे ओर्‌ हंसः 


11 


ज~ 


| वत्तख आदि पक्षी वनम व्र कर रहैये॥ १३॥ 
तमागतं समागम्य इृष्णस्याचुचरं प्रियम्‌ । जव भगवान्‌ श्रीकृष्णे प्यारे अनुचर उद्धवजी 


वरजम भये, तब उनद्े मिलकर नन्दवावा बहुत ही 
प्रसन्न इए । उन्होने उद्धवजीको गे दखगाकर्‌ उनका 
वेसे ही सम्मान किया, मानो स्वयं सगवान्‌ श्रीकृष्ण 
जितं व आ गये हों ॥ १४ ॥ समयपर्‌ उत्तम अन्नक्ता भोजन 
भाजितं परमान्नेन संविष्टं कशिपौ खम्‌ । कराया ओर जव वे आरामसे पंलगपर वेड गये, सेत्रकोने 
पाव दबाकर, पंखा चक्कर उनकी धकावट दूर कर दी 
॥ १५ ॥ तत्र नन्द त्रावाने उनसे प्रा --“परम-भाय- 
वान्‌ उद्धवजी ! अब हमारे सखा वुदेवजी जेकपे 
छूट गये । उनके आत्मीय खनन तया पुत्रे आदि 
किदङ्ग महाभाग खा नः शूरनन्दनः | उनके साथै | इस सपय ते सब्र कुराव्ये तो है 
दटवपत्याचे्ु न १॥ १६ ॥ यह वड़े सौमाग्यकी बात है किं अपने 

आस्ते इशस्यपत्याद्ययुक्ता एक्तः सुहृद्‌ बतः ॥ १६॥। पापके फलघ्वरूप पाी कंस अपने अनुथायियोके साथ 
4 | मारा गया | क्योकि स्रभव्रसे हयी धार्मिक परम साधु 

दिष्टया कंसा हतः पापः सालुगः स्वेनपाप्मना । | यदुवंशियोसे बह सदा देष करता था ॥ १७ ॥ अच्छा 
उद्धवजी | श्रीकृष्ण कभी हमलोर्गोकी भी याद करते 


ब्राधूनां धर्म॑करीलानां यदूनां दष्ट यः सदा ॥१५७॥ ह १ यह उनकी मँ है, सजन सम्बन्धी है, सा है, 
| गोप ई; उनको अपना स्वामी ओर सवस माननेवागा 
अपि सरति नः कृष्णो मातरं सदः सखीन्‌ । यह्‌ व्रज है; उन्दीकी गौ, बृन्दावन ओर यह गिरिरिज 


मोषान्‌ बजं चात्मनाथं गाबो इन्दावनं गिरिमू्‌॥॥१८॥॥ रै श्या वे कभी इनका स्मरण करते है १ ॥ १८॥ 


वः ~ 


नन्दः प्रीतः परिष्वज्य वाुदेवधियाऽऽर्चयत्‌।॥\१४) 


गतथमं पय्च्छत्‌ पाद्षवाहनादिभिः ॥१५॥ 


1 + नि । 
च य = 1 # _ + र 1111 भ्त 5; 


488. , 4. + २१, 


4 
+ 


। . तालत्रयं महासारं 


अ० ४६ ] 


यक ॐ क का @ क, 111 पीये 


अप्यायाख्यति गोविन्दः स्वजनान्‌ सञृदीशितुप्‌ । 


द्म रद्न्ध्‌ 


४०९, 


। जो आक क 
भि कः त जि चः दि कः कः जि आः ॐ > ऋः @ॐ> „ 





आप यह तो बतव्गदूये कि हमारे गोविन्द अपने 


 घुदद्‌-वान्धर्वोको देखनेके च्ि एक वार भी यहं 


तहिं द्रक्ष्याम तदक्त्रं सुनघं सुसिवेक्षणभ्‌ ।१९॥ 


। आयने क्या १ यदि बे यह आ जाते तो हम उनकी 
वह सुघड नासिका, उनका मधुर हस्य ओर मनोहर 


` चितवनसे युक्त मुखकमल देख तो स्ेते॥ १९॥ 


दावाग्नेचातवर्षाचच वृषसर्द्च रश्विताः । 


दुश्त्ययेभ्यो मृत्युभ्यः कृष्णेन सुमहारमरा \1०।। 


सरतां छृष्ण्रीयाणि रीलापाङ्गदिरीक्षितम्‌ । 


~= 


हसितं भाषितं चाज्ग सवा नः शिथिरा; क्रियाः! २१। 
सरिच्छेलवनोदेशाच्‌ युङकन्दषद भूषितान्‌ । 
आक्रोडानीक्षमाणानां मनो याति तदा्मताम्‌॥।२२॥ 
मन्ये ङृष्णं च रामं च प्राप्ताविह्‌ सुरोत्तमौ । 
सुराणां महदथाय गख वचनं यथा २३ 
कंसं नागायुतप्राणं महो गजपतिं तथा । 


अवधिष्ट लीलयेव परनि स्गाधिपः ॥\२४॥ 


धलुयंटिमिवेभराट्‌ । 











= 


। उद्धवजी ! श्रीकृष्णका हृदय 





उदार है, उनकी शक्ति 
अनन्त है, उन्हनि दाव्रानटसे, ओँधरी-पानीसे, बृषासुर्‌ 
ओर अजगर आदि अनेकों मृव्युके निमित्तेसे- जिन्हें 
टाटनेका कोई उपाय न था-एक वार नही, अनेक 
वार हमारी रक्षा की है ॥ २०1 उद्रवजी । हम 
श्रीकरष्णके विचित्र चस्ति, उनकी विव्यासप्रूणं तिरी 
चितवन, उन्मुक्त हास्य, मधुर भाषण आदिका स्मरण 
करते रहते हैँ ओर उसमे इतने तन्मय रहते हैँ कि 
अव हमसे कोड काम-काज नहीं हो पाता ॥ २१ ॥ 
जवर हम देखते हैँ कि यह बही नदी है, जिसमे 
श्रीकृष्ण जलक्रीडा करते थे; यह वही गिर्रिज है, 
जिसे उन्होने अपने एक हाथपर उठा च्या था; ये वेदी 
वनके प्रदेश है, जह श्रीकृष्ण गौं चराते हृए बखरी बजाते 
थ, ओर ये वे ही स्थान हैँ, जह वे अपने सखाअके 
साथ अनेकों प्रकारके खेल खेलते थे; ओर साथ दी 
यह मी देखते हैँ कि वहाँ उनके चरणचिह अमी 
मिटे नही &, तव उन्ह देखकर हमारा मन श्रीकृष्णमय 
हो जाता है ॥ २२ ॥ इसमे संदेह नहीं किं में 
श्रीकृष्ण ओर बल्रामको देवरिरोमणि मानता दँ ओर 
यह भी मानता द किं वे देवताओंका कोई बहत बडा 
प्रयोजन सिद्ध करनेके च्थि यहौँ आये इए है । खयं 
भगवान्‌ गर्गाचायजीने मुञ्षसे रेसा ही कहा था ॥२२॥ 





जैसे सिंह बिना किसी परिश्रमके पड्युओको मार डाल्ता | । 
है, वैसे दी उन्दने खेग-लेव्यमे ही दस हजार हाधि्योका 


बल रखनेवाठे कस, उसके दोनो अजेय पह्वानों 
ओर महान्‌ बख्शारी गजराज बुतल्यापीडको मार ` 


डाय ॥ २४ ॥ उन्हनि तीन ताक ख्वे ओर्‌ अत्यन्त 
टद धनुषको वैसे ही तोड़ डाक, जैसे कोई हाथी 





~--- # म 
भा० स० ख २. (~ ४.8 
{ “1 ५ # ध +| ^ 
>~ - कम ने ~ £ = ¢ ~ न 
= ५.४ च> क क श 
4 (ति = (= ॐ 0 रि 
ऋ + वि ~ 
|} चै < % 


क त 


४: किसी छडीको तोड़ डाञे । हमारे प्यारे श्रीकृष्णने एक = 
बभञ्ञेकेन हस्तेन सप्नाहमदधाद्‌ भिरि २५] | हासे सात दिनोतक गिंररिजको उटये रक्खा या४२५ ` 





|, ## ~) 
= १५१41 


(3 = 


९: 4 


है ~ 2.4 
५1. 


१४ क क नि. 


५.७१ 
6:5८.) 


इ । ५ डे 
# 


क 2. ~> ~ १, ॐ ब ५.४ ५). । ध ~ 
१, । । । भ । ~~ >» = ४; ‡ै ५) क$-यि ॐ 9 3२.३१ 
६ ४ ' ४ ॐ क्क व ॐ = + कः ॐ = 
५ „ 0 1 र ण 
१ । ११३ ¢, + । नि -३ १. ~ 44 +> + 
: न ४५ १ न ~ १2 २४4 श ५६१ 34 क 
„+ त, +, ४१ ५१४ # ॐ ॥ 

४ ` क 0). # ¬ ् ~ ¢. 
५ । कै त (न 8 ॥ 4 

प ॥; 

| 


कै ॥ कै [२ 


॥ : 1. क क, {ई 
क. 


१.५ 





१ + । | # 


"५. "ज 


१० 


श्रीमद्भागवत 


[ अ० ४६ 








प्रलम्बो घेलुकोऽरिषटस्तृणावतो बकादयः । 


देत्याः सुरासुरजितो हता येनेह लीलया ॥२६॥ 
श्रीद्चुक उवाच 


इति सस्मरत्य संस्प्रतय नन्द्‌ः कृष्णाुरक्तधीः | 
अत्युत्कण्ठोऽभवत्तष्णीं प्रेमप्रसरविह्वङः ॥२७॥। 
यशोदा वण्यंमानानि पुत्रस चरितानि च ! 


शृण्वन्त्यश्रुण्यवासराक्षीत्‌ स्नेहस्युतपयोधरा ।॥२८॥ 
तयोरित्थं भगवति कृष्णे नन्द्यशोदयोः । 


वी्ष्याचुरागं परमं नन्दमादोद्धबो यदा ॥२९॥ 
उद्धव उवाच 

युवां छाघ्यतमो नूनं देहिनामिह मानद । 
नारायणेऽखिलगुरो यत्‌ छृता मतिरीदृशी ॥२०॥ 
एती हि विश्वस च बीजयोनी 

रामों यन्द पुरुषः प्रधानम्‌ । 
अन्वीय भूतेषु विलक्षणख 

ज्ञानस्य ` चेशात शमो पराणो ॥२१॥ 
यस्िञ्ञनः प्राणवियोणकाठे 

क्षणं समावेक्य मनोऽविशद्धम्‌ । 


निहत्य कमाशायमाद्यु याति 


परां गतिं ब्ह्ममयोऽकंवर्णः ।॥३२॥। 
भवन्तावखिलात्महेतों 

्‌ नारायणे कारणमत्य॑मूरतौ | 

1 


क ह 
# ४ 
ट क >> 


तखिन्‌ 


न. 


> 


^, . 


४ 
(४ - 


यहीं सबके देखते-देखते खेल-खेरमे उन्होने प्रम्ब, 
धेनुक, अरिष्ट, तृणावते ओर बक आदि उन 
बड़े-बड़े दत्योको मार डरा, जिन्होने समस्त देवता 
ओर अघुरोपर विजय प्राप्त कर टी थीः | २६॥ 
श्रीखयुकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ ! नन्दबावाका 
हदय यों ह्वी भगवान्‌ श्रीकृष्णकरे अनुराग-र गमं रंगा हआ 
था | जव इस प्रकार वे उनकी टीलाओंका एक-एक 
करके स्मरण करने लगे, तव तो उसमें प्रमकी बादृदही 
आ गयी, वे विह्वल हो गये ओर मिलनेकी अत्यन्त 
उत्कण्ठा होनेके कारण उनका गला रध गया | वे चुप 
हो गये ॥ २७ ॥ यशोदारानी भी वहीं वेकर नन्द- 
बावाकी वातं सुन रही थीं, श्रीकृष्णकी एक-एक खीला 
पुनकर उनके नेत्रोसे ओं वहते जाते ये ओर पुत्र 
स्नेहकी वाद्से उनके स्तनोँसे दृधकी धारा बहती जा 
रही थी ॥ २८ ॥ उद्भवजी नन्द बावा ओर यश्ोदारानीके 
हृदयम श्रीकृष्णके प्रति केसा अगाध अनुराग है-- 
यह देखकर आनन्दमगन हो गये ओर उनसे कहने 
गे ॥ २९ ॥ | 
उद्धवजीने कहा-हे मानद ! इसमे संदेह नहीं 
कि आप दोनों समस्त उारीरघा्ि्में अत्यन्त भाग्यवान्‌ 
दै, सराहना करने योग्य है । क्योकि जो सारे चराचर 
जगत्के वबनानेवाठे ओर उसे ज्ञान देनेवाले नारायण है, 
उनके प्रति आपके हृदयमे एसा वात्सल्यस्नेह.-- पुत्रभाव 
है | ३० ॥ बलराम ओर श्रीकृष्ण पुराणपुरुष है; वे 
सारे संसारके उपादानकारण ओर निमित्तकारण भी हं | 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण पुरुष हैँ तो वल्रामजी प्रधान (प्रकृति) | 
ये ह्वी दोनों समस्त दारीर्तेमें प्रविष्ट होकर उन्हं जीवन- 
दान देते हैँ ओर उनमें उनसे अत्यन्त विलक्षण जो 
ज्ञानखरूप जीव है, उसका नियमन करते हैँ ॥ ३१॥ 
जो जीव मृष्युके समय अपने ञ्द्ध मनको एक क्षणके 
व्यि भी उनमें खगा देता है, वहः समस्त कमवासनाओं- 
को धो बहाता है ओर शीघ्र ही यके समान तेजखी 
तथा ब्रह्ममय होकर परम गतिको प्राप्त होता है ॥२२॥ 
वे भगवान्‌ ही; जो सवके अत्मा ओर प्स कारण है) 
भक्तोकी अभिकाषा पूणं करने ओर प््वीका भार 
उतारनेके व्ि मनुष्यक्रा-सा इारीर ग्रहण करके प्रकट 





81. 44॥/ 4 


अ० ४६ ] 


भावं विधत्तां नितं मश्ाट्मन्‌ 





कं वावशिष्टं युवयोः सुङृस्यमर्‌ ॥३३॥ 


आशमिष्यत्यदीघण कारेन व्रजमच्युतः 


प्रियं विधायते पित्रोर्भगवन्‌ सात्वतां पतिः ॥२४ 
हत्वा कंसं रङ्गमध्ये प्रतीपं स्वैसात्वताभ्‌ । 
यदाह वः समागत्य कृष्णः सस्यं कृति तत्‌॥।२५५) 
मा खिद्यतं महाभागो द्रक्ष्यथः कृष्णमन्तिके । 
अन्तहदि स भूतानामास्ते उ्योतिखिधति ॥३६॥ 
न हयखात्ति प्रियः किन्नाप्रियो वास्स्यमानिनः । 
नो्तभो नाधमे नापि समानखारमोऽपि वा ॥ ३७ 
न माता न पितातख्य न भायां न सुतादयः । 
नाट्भीयो न परश्चापि न देहो जन्म एव च ॥३८॥ 
न चाख कमं वा लोके सदकषन्मिश्रयोनिषु। 
क्रीडाः सोऽपि साधूनां पर्रणाय कर्पते ।२३९॥ 
स्वं रजस्तम इति भजते निगंणो गुणान्‌ । 
कीडनतीतोऽत्र गुणैः खुजत्यवति हन्त्यजः ।४०॥। 


यथा आपररिकादष्टया आम्यतीव महीयते । 


| भिवे स्रि तत्रात्मा कतवाहंधिया स्मृतः ॥४१। 


दशम स्कन्ध 





इए हैँ । उनके प्रति आप दोनोका रेस चुर वात्सल्य 
माव है; फिर महात्माओ ! आप दोनेकि स्वि अब 
कौन-ता शुभ कर्मं करना रोष रह जाता है॥ ३३ ॥ 
भक्तवत्सर यदु वराशिरोमणि भगवान्‌ श्रीकृष्ण थोडे ही 
दिननोमे व्रजमे आरयेगे ओर आप दोर्नोको --अपने मा 
बापरको आनन्दित करेगे ॥ ३४ ॥ जिप्त समय उन्होने 
समस्त यदुवंशियोके द्रोही कसको रगभूमिमें मार डाय 
ओर आपके पास आकर कहा # भम त्रजमे आगा, 
उस कथनको वे सव्य करेगे ॥ ३५ ॥ नन्दवावा ओर 
माता यशोदाजी ! अप दोनों परम भाग्यश्ञाटी है] 
खेद न क्रं | आप श्रीकृष्णको अपने पास दही 
देखगे; क्योकि जसे कामे अध्नि सदा दी 
ग्यापक ख्पसे रहती है, वेसे दही वै समस्त प्राणियकि 
हदयमें सवद्‌। व्रिराजमान रई ते हैँ ॥२६॥ एक शरीरके प्रतिं 
अभिमान न होनेके कारण न तो कोई उनका प्रिय है 
ओर न तो अप्रिय ! वे प्बमें ओर सबके प्रति समान 
हे; इसच्िग्रे उनकी दिम नतो कोई उत्तम दै ओर 
न तो अधम । यद्ँतक क्रि व्रिषमताका भाव रखनेवारा 
भी उनके च्य विषम नहींदहे॥ ३७ ॥ न तो उनकी 
कोई माता है ओर नपिता। न पत्रीहैओरनतो 
पुत्र आदि | न अपना है ओरन तो पराया | न देह दहै 
ओरनतो जन्मी ॥ ३८ ॥ इस लोकप उनका कोई 
कमं नहीं है; फिर भी वे साघुअकि पस्िाणके च्वि, 
ठीव्ग करनेके व्व देवादि साचिक, मस्स्यादि तामस 


एवं मनुष्य आदि मिश्र योनिर्योमें शरीर धारण क्रते , 
है ॥ २९. ॥ भगवान्‌ अजन्मा हैँ । उनमें प्राकृत सत्व, 


रज आदिमेसे एक मी गुण नद्यं है । इस्त प्रकार इन 
गुणोंसे अतीत होनेपर भी टीकके व्यि खेक-खेच्मे वे 
पच, रज ओर तम- इन तीनों गुर्णोको खीकार कर ठेते 


करते हँ || ४० ॥| जब बचे घुभरीपरेता खेलने च्गते 
दै या मनुष्य वेगसे चक्र गाने ,क्गते है, तब उने 
सारी परथ्वी घूमती इई जान पडती है । वैसे ही वास्तवमे 
सन कुछ करनेवाडा चित्त द्वी है; परंतु उस चित्तम 


अहबुद्धि हो जानेके कारण, भमवञ्च उसे आत्ा-- ४ 


५११ व 


। 


$ 


4 


के 1 
द = 


दै ओर उनके द्वारा जगत्की रचना, पाग्न शौर संहार ` ` 


क ९ ~, श्रीमद्भागवत | अ० ४६ 
युवयोरेव नेपायमात्मजो भपदाच्‌ हरिः । समश्षने गता है ॥ ४१ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण वेवढ 
आप दोनोके ही पुत्र नद्य है, ३ समस्त प्राणियकि 

आत्मा, पुत्र, पिता-माता ओर खामी भी है| ४२॥ 











सवेषामात्मजो ह्य।त्मा पिता माता स ईश्वरः ॥४२॥ 


दष्टं श्चुतं भूतभवद्‌ भविष्यद्‌ नावा ¦ जो कुछ देखा या सुना जाता है-- वह्‌ चाहे 
| भूतसे सम्बन्ध रखता हो, वर्तमानसे अथवा मव्रि्यसे; 
स्थास्लुश्च रिष्णुभेहदल्पकं च । स्थावर हो या जङ्गम हो; महान्‌ हो अथवा अद हो- 


देसी कोई वस्तु दी नहीं है, जो भगवान्‌ श्रीकृष्णसे 
पथक्‌ हो | वावा ¦ श्रीकृष्णके अतिरिक्त रेसी कोई 

नहीं है, जिसे वस्तु कह स्वे | वास्तवमें सब 
वेह्ीदहेः वे ही परमार्थं सत्य है ॥ ४३॥ 


विनाच्युताद्‌ चर्तु तरां न वाच्यं 





स॒ एव॒ सवं परमोर्थंभूतः ॥४३॥ 





# ॥ तवं ११. 














$ ए. 1 एवं निक्ष सा ब्रवतोव्यतीता ~ 
(1 # £ परीक्षित्‌ ¡ भगवान्‌ श्रीकृष्णके सदा उद्धव ओर 
ध = नन्दस्य छष्णालुचरस्य राजन्‌ । नन्दया दसी प्रार्‌ आपसमं बात करते रहे ओर्‌ बह 
न रात वीत गयी । कुछ रात शेष रईनेपर गोपियोँं उदी, 
। , गोप्यः ससुत्थाय निरूप्य दीपान्‌ दीपक जब्ाकर उन्होने घरकी देहिर्योपर वास्तुदेवका 

पूजन क्या, अपने घर्योको आड-बुक्ारकर साफ किया 


¢ [थ ¢ (>, 
बस्त समम्थच्य दधीन्यमन्धन्‌ 11४४ | शौर पि ददी मथने गीं ॥ ४४ ॥ गो 
कग्योमें कणन शोभायमान हो रहे थे, रस्सी खींचते 
समय वे बहूत भटी माद्म हो रही थीं । उनके 


किः दि विरेजू 


ता दीपदीर्मणिर्भि 


रञ्जावकषद्ुजकङ्णसजः नितम्ब, स्तन ओर गलके द्वार हिक रषे थे । कानोक 
| कुण्ड किक-दिल्कर्‌ उनके कुङ्कभमण्डित कपोर्गेकी 
चलन्नितम्बस्तनहारङण्डल- छिमा बदा रदे थे | उनके आभूषणोकी मणिँ 


दीपकदी ज्यो तसे ओर भी जगमगा रद्ध थी ओर इस प्रकार 


विषत्कपोलारुणङ्हमाननाः . ॥४५॥ ४ 
वे अत्यन्त शोभापे सम्पन्न होकर दद्दी मथ रही थीं॥ ४५५ 


„ उद्वायतीनामरषिन्दलोचनं उस समय गोपियां --कमठनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
८ मङ्गकमय चरसत्रिका गान कर्‌ री थीं | उनका वहं 
१ व्रजाङ्खनानां दिवमस्प्श्चद्‌ ध्वनिः । सङ्गीत दद्धी मथनेकी ष्वनिस्षे मिख्कर ओर भी अदूमुत 


हो गया तथा खगंोकतक जा पर्चा, निसकी खर्‌ 
खदरी सव्र ओर पैख्कर दिशाओंका अङ्ग मिटा देत 
निरस्यते येन॒ दिशाममङ्गसम्‌ ।॥४६॥ | है ॥ ४६ ॥ 

-.- जव भगवान्‌ सुवरनमास्करका उदय हज, तब 
व. ्यं॑नन्दद्ारि वरजोकसः । वरजाङ्गनाओने देखा किं नन्दबाबाके दराजेपर एकं 
इ रथं वारौ म्भं कलायमिवि चाव ॥॥४७। | सनेका रय खडा दै । म एन परे णद 
किंका रथ है ¢ ॥४७॥ किसी गोपीने कहा--“कंसका 4. 
प्रयोजन शद्ध करनेवाग अक्रूर ही तो की रिरि नक्ष |. 


। दध निरमन्थनश्दमिभ्रितो 


| 
। 
| 
1 








, 


~ 
4 रिव यः कंसयार्थसाधकः । 





य दत गुणन कअ 


उ न न मा भूत (1 | 





अ० ४७ | दशम स्कन्ध 


„१३ 
५ ९; र 
भ्व > =, १... क 
 ‰१ [श 
% 1 1" "0 य 
0१ 9 
= न्क 
> स्कः रै क ची 
( न द, 9 
> 8 „क 0 क 





क ज क क तजनो 9 2 = चो वक जत क गआ कना आक गना आ ज %जमक ो > क= तर  च १, क थ कः कवक आ का को 
"किणि ^ यी कीणर = न ज जि 





9 भसि क ज जक = = 


येन नीतो मधुपुरीं कृष्णः कमलरोचनः ॥४८॥ | आ गया है ! जो कमलनयन व्यार श्यामघुन्दरको ` 
य्हहसि मधुरा ठे गया वा ॥ ४८ ॥ किंसी दूसरी 
गोपीने कहा--“क्या अव वह हरमे ठे जाकर अपने 
मरे इए खामी कंका पिण्डदान करेगा १ अव यहाँ 
उसके आनेका ओर क्या प्रयोजन हो कता दहै ¢ 
व्रेजव्रासिनी चर्या इसी प्रकार आपसमें बातचीत कर रही 
थीं कि उसी समय नित्यकमसे निवृत्त होकर उद्धवजी 
इति स्लीणां बदन्तीनागरद्धगोऽगात्‌ इताद्धिः)! ४ ९।} | आ पर्डचे ॥ ४९ ॥ 
न्द --- 
इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे परव्भे 
नन्दशोकापनयनं नाम पट्‌ चतारिंशोऽव्यायः }॥ ४६॥ 
अथ सप्तचत्ारिदोऽध्यायः 








कर साधयिष्यत्यखाभिभतुः परेतख निष्कृतिम्‌ । 


उद्धत तथा गोपियोकी बातचीत ओर अमरगीत 


श्रीशुक उवाच शरीड्युकदेवजी कते है- परीक्षित्‌ ! गोपिर्योनि 
देखा कि श्रीकृष्णके सेवक उद्धवजीकी आकृति ओर 
वेषभूषा श्रीङृष्णसे मिल्ती-जुर्ती है । घु्नोतक छवी ` 
प्ररम्बवह नवङ्ञ्लोचनय्‌ 1 | ठंबी जाएं है, नूतन कमढ्दच्के समान कोमल नेतर है, 
शरीरपर पीताम्बर धारण किये इए दै, गलेमें कमच्पु्पोकी 
माग है, कानोमे मणिजटित कुण्ड ्ञखक रदे है भोर 
नुखारविन्दं मणिगरष्ञचण्डलभ ।। १ ॥ | छलारविन्द अत्यन्त परफु्धित है ॥ १ ॥ पतरित् ुसकान- 
सा ए < वाटी गोपियेने आपसमें कदा---यह्‌ पुरुष देखनेमे तो ` 
शुचिखिताः कोऽयमंपीच्यदश्चनः बहत घुन्दर है । परत यह है कौन १ कहेसि आया 
कुथ कस्याच्युतवेषभूषणः । दै { किंसका दूत ह १ इने रीष्ण-जेी वेव-मूषा 
क्यो धारण कर खंखी है ¢ सव-की-सन गोपय उनकां 
इति ख सवी परिववुरतसुका- परिचिय प्राप्त करनेके व्यि अत्यन्त उत्सुकं हो गयीं जौर ` 
लघ्मश्छोकपदम्बुजाश्रयम्‌  ॥ २ ॥ | उनमेसे बहृत-सी पति्कीतिं मगान्‌ शह्ष्णके चरण्‌- 
| - कमलके आश्रित तथा उनके सेवकसखा उद्धवजीको 


तं वीक्ष्य छष्णासुचरं वजच्चियः 


पीताम्बरं पुष्करमालिनं ठस 














तं॑प्रश्रयेणावनताः सुसं चारो ओोरसे घेरकर खडी हो गयी ॥ २ ॥ जब उने ` 

' 4 माद्म इआ किं ये तो रमारमण भगवान्‌ करा 

सवरीडदारेक्षणघ्रृतादिभिः =. सन्देश लेकर आये दहै, तब उन्दने विनयसे ककर 
रहस्यपृच्छन्सुपविष्टमासने ` | सज्ज हास्य, चितवन ओर मधुर वाणी आदिसे 


1 


ध: जीका अत्यन्त सत्कार किया तथा एकान्तम आसनपर 


४ 


विज्ञाय सन्देशं रमापतेः ।। ३.॥ | वैगकर वे उनसे इ प्रकार क्डने च्गी ॥ ३ ॥ ` 


ष्यः क ~ र. 
१" तवर । २. उद्धवयानं । ३ मपूवेद्शे० | ४.4 क 


(६ 1 
6 ४ भ धि 









9 
(१ ४ च्छ 





+ ची कर, 
व+. 
४ 
ह 










व. अन ^ का 


| ९ व ~ 





ह + 
= 
५ 


4; ~ । ४ त १ ~ न्व्‌, 7१६ ५ 
र * १ ३.८ 4, १; च = 
॥ ह #- १, = %» ऋ, गदः ११. | ०४ ह। ~ ह) ~ ४.३ 
५ त र ग च क चै ॥ 
॥ ~ +" र ॥ न न छः.) ् | न न 1] # 
# + 4 द ५ १. ॥ ३ ॥ि 
५ 1 4 ~ ष {3 ६ ९.3 अ ^ ^ अन रः 4 
^ , १ -‰/ ध ' जक ` ह ४.५. च कि >$ र ~~ , ,  &. च्वौ 
3 । ~ | = (व; ध ४. 
केन्टवं  -9-+ 


६ 


का । 


(न्य 9 + 
भ्र । († ~ 


यी न्क ¬~ ~ ~ नी न्यच 
ॐ = चिच, = "+ + ३ # च १ 
॥ 








~> 0 ५. करः न ति क ~ 


४१४ श्रीमद्भागवत 


| अ० ४७ 


~ ------------------------ 





जानीमस्त्वां यदुपतेः पाषंदं सष्वपागतम्‌ । 
भत्र प्रेषितः पित्रोभवार्‌ ग्रिथविकीषंथा ॥ ४ ॥ 
अन्यथा गोव्रजे तख खरणीयं न चक्षमे । 
स्नेहाचुबन्धो बन्धूनां शनेरपि सुदुस्त्यजः ॥ ५॥ 
अन्येष्वथंङृता नेत्री यावदर्थविडम्बन्‌ । 
पुम्भिः स्रीषु कृता यद्वत्‌ सुमनस्खिव षट्पदः! & ॥ 
निस्स्वं त्यजन्ति मणिका अक्पं सपति प्रजाः । 
अधीतविद्या आचाय॑मृत्विजो दत्तदक्षिणम्‌ ।॥ ७॥ 
खगा वीतफलं बश्च क्त्वा चातिथयो गम्‌ । 


द्ग्धं मरगास्तथारण्यं जारो थक्त्वा रतां स्ियम्‌॥। ८ ॥ 


इति गोप्यो हि भोविन्दे गतवाकायमानसाः 
कृष्णद्‌ते व्रजं याते उद्धवे त्यक्तलोक्षिकाः ॥ ९ ॥ 


गायन्त्यः प्रियकरमणि रुदत्यथ गतहियः । 


ॐ | ^ तस संस्म्रत्य संस्त्य यानि कैश्ोरमाल्ययोः ॥१०॥ 





काचिन्मधुकरं दष्टा ध्यायन्ती इृष्णसङ्गमम्‌ । 
प्रियप्रथापितं 


कृ + 3» + क~ 4 ६,.१-०4 त ^ 
९ च म १ ज षे क | {# = क ॥ + ह 1 






री 1 क 
` + १. 


भः भः ` भः जः त भः पः मो भः भो भः दः जो भः भ भो भकः चि भ भि चः जोय 


दतं कलपयितवेदमत्रवीत्‌ ॥११॥ 


“उद्भवजी | हम जानती हैँ किं आप यदुनाथके पार्षद्‌ है| 
उन्हीका संदेश केकर यद्य पधार हैँ । आपके खामीने अपने 
माता-पिताको सुख देनेके व्यि आपको यद्य मेजा है ।४। 
अन्यथा हमें तो अव इस नन्दर्गोवमे-- गौअओके रहनेवी 
जगहमे उनके स्मरण करने योग्य कोई भी वस्तु दिखायी 
नहा पडती; माता-पिता अ।दि सगे-सम्बन्धिर्योका स्नेह- 
बन्धन तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी बड़ी कठिनाईसे छोड 
पाते है ॥ ५ ॥ दूप्रोके साथ जो प्रेम-सम्बन्धका खग 
किया जाता है, वह तो किसी-न-किक्षी खार्थके च्िदही 
होता है । भोरोका पुष्पोंसे ओर पुरूपोका लियोसे पेष 
ही खाथंका प्रेम-सम्बन्ध होता है| ६ ॥ जव वेया 
समञ्नती है कि अव मेरे य्ह आनेवाचेके पास धन नहीं 
है, तब उसे वह धता वता देती है | जव प्रजा देखती 
है कि यह राजा हमारी रक्षा नहीं कर्‌ सकता, तत्र बह 
उक्तका साथ छोड देती है । अध्ययन समाप्त हयो जानेपर्‌ 
कितने शिष्य अपने आचार्योकी सेवा करते हँ १ यज्ञकी 
दक्षिणा मिली कि ऋविजगोग चलते वने || ७ ॥ जब 
वृक्षपर फर नहीं रहते, तव पक्षीगण वहसे विना कुछ 
सोचे-विचारे उड़ जाते हँ । भोजन कर लेनेके वाद अतिषि 
लोग दही गृहस्यकी भोर कव देखते हैँ १ वनमें आग 
ठगी कि पञ्च॒ भाग खड हए । चा खीके इदयमें कितना 
भी अनुराग हो, जार पुर्ष अपना काम बना ठेनेके बाद 
उक्टकर भी तो नदीं देखताः ॥८॥ परीक्षित्‌ ! गोपियो- 
के मन, वाणी अर शारीर श्रीकृष्णे ही तद्कीन ये । 
जन भगवान्‌ श्रीकृष्णके दूत बनकर उद्धवजी व्रजमें आये, 
तब वे उनसे इस प्रकार कहते-कते यह भूल ही गयीं, 
कि कौन-सी वात किंस तरह किसके सामने कहनी 
चाहिये । भगवान्‌ श्रीकृष्णने वचपनसे ठेकर किरोर 
अवस्थातक जितनी भी ीखए्‌ं की थं, उन सबकी 
याद कर्‌-करके गोपि्यां उनका गान करने च्गीं | वे 
आत्मविस्मरृत दह्ोकर खी-घुङभ ल्जाको भी भूढ गयीं 
ओर श्रट-षटटकर रोने च्गीं ॥ ९-१० ॥ एक गोपीको 
उस समय स्मरण हो रहा था मगवान्‌ श्रीकृष्णके मिलन- 
की ठीव्मका । उसी समय उसने देखा कि पास ही 
एक भौरा गुनगुना रहा है । उसने रेषा समञ्ा मानो 


मुञ्चे रूठी इई समक्चकर श्रीकृष्णने मनानेके यि दूत 


मेजा हो । बह गोपी मैरिसे इस प्रकार कने व्गी-। ११ 








अ० ४७ | दश्चम स्कन्ध १५ 


~ ध "णी 









गोप्युवाच 


मधुप करितवबन्धो मा स्प्रलाङ्पि षपलल्य।ः 


डुचविठलितमारङुङ्कसरसश्चुभिरन । 


~~ 


वहतु मधुएतिस्तन्सानिनीनां प्रसादं 


यदुसद क्षि तरिडम्न्यं यख दृतस्स्वमीद्‌ १२ 


सकृदधरसुधां खां माहिनीं फययित्वा 

सुमनम इव सद्यत्तत्यजेऽसान्‌ भवादक्‌। 
परिचरति कथं तत्पादपदयं तु पद्मा 

द्यपि बत हतचेता उत्तमश्छोकजव्यैः।।९ ३ 
किमिह नहु षडङ्घ्रे गायसि त्वं यदूना- 


मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणस्‌ । 


विज्ञयसखसखीनां गीयतां ततप्रसङ्कः 


= 


गोपीने कारे मधुप ! तू कपटीका सखा है 


इसव्ये त्‌. भी कपटी है | तर. हमारे पैरोको मत छर | 
स्ूठे प्रणाम करके हमसे अनुनय.व्रिनय मत कर | 
हम देख रही हैँ कि श्रीद्रष्ण्री जो वनमान्म हमारी 
सोतोके वक्षःस्थव्के स्पर्शसे म्तटी इई है, उक्तका पीट- 
पीठा कुङ्कम तेरी मृ््रैपरभी दगा हज! तु. श्यं 
भी तो किसी वुदुमसे प्रेम नदीं करता, यहाँ से वहं 
उड़ा करता है । जैसे तेरे खामी, वैसा हीत्‌! मघुपति 
श्रीकृष्ण मथुराकी मानिनी नायिकाओंको मनाया करे, 
उनका वह कुङ्कभख्य कृपाप्रसाद;, जो यदुवंशिर्योकी 
समामे उपहास करनेयोग्य है, अपने ही पास रक्चं | 
उसे तेरे द्रारा यहाँ मेजनेकी क्या आवस्यकता है १।१२। 
जैसा तू कालाद, वैसेद्ीये भीँ । तू मी पु्पोका 
रस केकर उड़ जाता है, वैसे दी वे भी निकले । उन्होने 
हमे केवल एक वारर, एेसा ही च्गता है--केवठ 
एक वार अपनी तनिक-सी मोहिनी ओर परम मादक 
अधरसुधा पिखायी थी ओर फिर हम भोटी-माटी गोपिया- 
को छोडकर वे यहँसे चके गये । पता नह्य, सुकुमारी 
ल्मी उनके चरणकमनकी सेवा केसे करती रहती है ! 
अवरस्य ही वे कैक-छबीठे, श्रीकष्णकी चिकनी -चुपडी 
वार्तोमिं आ गयी होगी । चितचोरने उनका भी चित्त 
चुरा छया होगा | १३ ॥ अरे भमर ! इम वनवापिनी 
है । हमारे तो धर्‌द्वार भी नहीं है । त्‌ हमरोगेके 
सामने यदुवरारिरोमणि श्रीकृष्णका बहतसा गुणगान 
कर्यो कर रहा है १ यह सुब मला हमलोगोको मनानेके 


व्यि ही तो १ परंतु नही-नदी, वे हमारे व्यि कोई 


नये नहीं हैँ । हमारे स्थि तो जाने-पहचाने, बि्कुल 
पुराने हैँ । तेरी चापद्सी हमारे पास नहीं चज्गी । त 
जा, य्हसि चला जा ओर जिनके साथ सदा विजय 
रहती दहै, उन श्रीकृष्णकी मधुपुरवासिनी सखियोके 
सामने जाकर उनका गुणगान कर । चे नयी है, उनकी 


लीखा्पै कम जानती है ओर इस समय वे उनकी 


प्यारी है; उनके हृदयकी पीडा उन्हेनि मिटा दी है । 
वे तेरी प्राथना सखीकार करेगी, तेरी चापद्धसीसे 


६.4१ ॥ 1, १कर क" गक क , ~ क 


कषुपितङ्गचरुजस्ते करपयन्तीषटमिष्टा 1१९) | प्रसन्न होकर तुक्चे सहर्मोगी वस्तु देगी ॥ १४ ॥ 





हि 1 ऋ कक ॥ नि मी 





























क ४१६ श्रीमद्भागवत [ अ ०. । 





ने चनः ऋ क्के चे दि 1 ऋ च ॐ त चे कः क जः = चः चः भिः ऋः ज्जि 


- 
ि 
= 


दिति श्वि च रसायां काः श्चियस्तद्‌ दुरापाः भौरि | वे हमारे च्य छटपटा रषे ह, रेसा त्‌ कर्यो कहता 
है १ उनकी कपटभरी मनोहर मुसकान ओर भौहिके 

। इशारेसे जो वमे न हो जार्यै, उनके पास दौडी न अवे-- 
= सी कौन-सी सिया है १ अरे अनजान ! खगम, 
कपटरुचिरहासभ्रविजुम्भसय याःस्युः। | पाताव्मे ओर प्रध्वीमे रेक्षी एक भी खी नही है। 
ओरोकी तो वात ददी क्या, खयं ल्क्ष्मीजी भी उनके 
चरणरजकी सेवा किया करती हैँ ! फिर हम श्री्ष्णके 
लिये किस गिनतीमें ह १ परंतु तू उनके पात जाकर 
कहना कि "तुम्हारा नाम तो 'उनत्तमश्छोकः दै, अच्छे- 
अच्छे छोग तुम्हारी कीतका गान करते है; परंतु इसकी 
| साथकता तो इ्ी्मे है कि तुम दीनोंपर दया करो। 
अपि च छृपणयपक्षे द्यत्तमश्छोकसब्दः।; १५११ | न॑त। कष्ण | ठम्हारा “उत्तम छछाकः नाम इ्यूटा पड 

| ४ जाता है ॥ १५॥ अरे मघुकर ! देख, तु मेरे पैरेपर 

" | तिर मत टेक | मँ जानती रर कितु अनुनय.व्रिनय 
करनेमे, क्षमा-याचना करनेमें बड़ा निपुण है । माट्म 

होता है तु श्रीकृष्णसे ही यही सीखकर आया हं कि 

खूटे हृएको मनानेके यये दृतको-- संदेशवाहकको 
कितनी चाटुकारिता करनी चाहिये । परतु तु पञ्चे 

¦ | | किं यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेकी । देख, हमने श्रीकृष्ण- 

रख नयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्येषंडन्दात्‌ | के चये ह्वी अपने पति, पुत्र ओर दूसरे लोगोको डीड 

। दिया । परतु उनमें तनक भी कृतज्ञता नहीं । वे रसे 
निमे निकले कि हमे छोडकर चकते नने. ! अव तू 

। दी वतां पेसे अकृतज्ञके साथ हम क्या सन्धि करं १ 

खक्रत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यरोक्ा ` |क्या तू अव भी कहता है कि उनपर व्िद्ास करना 
` |  . | चाहिये १॥ १६॥ रेरे मघुप! जववेरामवने थे, 
क:- ट तब उन्होने कपिराज वाको व्याधके समान किपकर्‌ 
| बड़ी निदयतासे मारा था । बेचारी इप॑णखा कामवश 
व्यखजदकृतचेताः किं लु संधेयमसिन्‌॥।१६॥ | उनके पास आयी थी, परत उनहोनि अपनी लीके वच 


४35 | | होकर उस बेचारीके नाक-कान काट ल्य ओर इस 
म्‌ | | प्रकार उसे कुरूप कर दिया । ब्राह्मणके धर वामनके 


कपीन्द्र विन्यधे टन्धधमां खपे जन्म लेकर उन्ोने क्या किया १ वलिने ब 

` | तो उनकी पूजा की, उनकी सुह्मोगी वस्तु दी ओर ४ 

उन्होने उक्तकी पूजा ग्रहण करके भी उसे वरुणपारसे 

ध ~. "अ | नौधकर पाताच्मे डाल दिया । दीक वैसे दी, जसे ` 
ब्ियमङ्त विरूपां सरीजिवः नेतः का कामयानाम्‌ । । वौवा बि खाकर भी न वा अपने अन्य 


॥ 
हि च द 
ॐ 
५ ग ऋ. 
। कि ` 
न 1 





४. चरणरज उपास्ते यख भूतिवंयं का 


विसृज किरसि पादं वेद्म्यहं चाड्कारे- 














> ग्नी द क दुः 
+ र~ +. वतै 


 अ० ४७ | दश्चम स्कन्ध ४१७ 














बलिमपिं वकिमन्तरवेष्टयद्‌ ध्वाह्ववद्‌ य- साथिर्योके साथ मिलकर घेर ठेता है ओर परेशान करता 

है । अच्छा, तो अव्र जाने दे; हमें कृ्णसे क्या, किसी 

भी काटी वस्तुके साथ मित्रतासे कोई प्रयोजन नदीं 

; स्तदलममितसख्येदुस्त्यजसतत्छथार्थः | १७] | है । परतु यदि त्‌ यह कहे कि (जव दा है, तव तुम- ` 
लोग उनकी चचां क्यों करती हो १ तो रमर | हम 

सच कती है, एक वार्‌ जिसे उसका चसका खग जाता 

यदनु वरितिरीला क्णपीयूषच्घ्ुट्‌ है, वह उसे छोड नहीं सकता । पेसी दशारे हम 
चाहनेपर भी उनकी चचां छोड़ नहीं सकतीं ॥ १७ ॥ 

श्रीकृष्णकी लीटाखूप कणामृतके एक कणका भी जो रसा- 

सन्रददरधिधूतदन्धमाः षिन; । खादन कर ठेता है, उसके रागढेष, सुख-दुःख आदि 
सारे हन्द्र रट जाते हँ । यर्तक क्रि वहृत-से खोग 

तो अपनी दुःखमय-दुःखसे सनी इई घर-गृहस्थी 

सपदि गृहङकटुभ्वं दीनघ्त्य॒ज्य दीना | छोडकर अकच्न हो जते है, अपने पास कुछ भी 
| संग्रह-परिग्रह नद्यं रखते, ओर पक्षियोकी तरह चुन- 

| चुनकर--भीख मांगकर अपना पेट भरते है, दीन- 

यौ चरन्ति ॥१८ नियासे जाते रहते हँ । फिर भी श्रीकृष्णकी ठला- 
कथा छोड़ नहीं पाते । वास्तवमें उक्का रस, उसका 


चसका रेसा ही है । यही दरा हमारी हो रही है॥ १८] 





बहव इह विहङ्ख भिष्षु 


~ जसे कृष्णसार पृगकी पत्ती मोटी-भाढी हरिनिर्यां व्याधके 

ववदतातच सक्लव्यह्त शद्वनाः सुमधुर गानका विश्वास कर लेती हं ओर उसके जाव्मे 
॑ पसकर मारी जाती है, वेसे ही हम मोटी-माढी गोपिर्यो मी 
कुलिक्रशतभिनाज्ञाः दष्णदध्वो इरिण्यः। उस छलिया कृष्णकी कपटभरी मीठी-मीटी वारतोमिं आकर 


उन्हे सव्यके समान मान बैटीं ओर उनके नखस्पशसे होने- 

२ बाढी कामव्याधिका वास्वार अनुभव करती रही । 

द दश्युरसशृदेतत्तन्नखंस्पश्चेतीव- इच्यि श्रीम दूत भेरि 1 अन इत वरिभयमे त्‌ ओर 

कुछ मत कह । तुञ्ञे कहना ही हो तो कोई दूसरी बात 

सररुज उपमन्त्िन्‌ भण्यतामन्यवाता ।॥१९॥ | कह ॥ १९ ॥ हमारे प्रियतमके प्यारे सखा ! जान्‌ 

पड़ता है, तुम एक त उधर व ८ चः ध 

पुनराभाः प्रेयसा प्रेषितः हो 1 अवदय ही हमारे प्रियतमने मना ये तु 

। ण भेजा होगा । प्रिय श्नमर ! तुम सब भ्रकारसे हमारे ` 
। माननीय हो । कहो, तुम्हारी क्या इच्छा है १ हमसे जो ` 


वरय क्रिमयुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग चाहो, सो मग लो । अच्छा, तुम सच बताओ, क्या ` 
` दमे वहा ठे चलना चाइते हो १ अजी, उनके पष्ठ ` 
नयति कथमिह।साग दुस्त्यजदन्पा्वं जाकर लौटना बड़ा कठिन है । हम तो उनके प्त 


| जा चुकी हैँ । परंतु तुम हमे बहा ठे जाकर करोगे 
2 क्या १ प्यारे भमर | उनके साय - उनके वक्षःस्थब्पर्‌ _ 
 सततश्रसि सोम्य श्रीवेभूः साकमास्ते ॥२०॥) | तो उन पती रुक्मीजी संदा रहती है न १ तव 


भा० स० ख% २. ५३ ए श 


7 ५ 





5. 
अ ॐ ध, „ + ~ वै ५, ४ ~" 





| 





चै = । ८0 
"9 


1 गद 
ऋक = क = ऋ ऋ 


पि 


== 5, के 


- -~ १ 
॥ 


मी क क 
च # > 24 [न 2 ट स ~क -- 
ज््ःके च्छ र 


१) 


व्ययि ~ 
(++ 
+= 


= -चै #- के करज 
नग्नकः # 





४१८ 





अपि बत सधुपुर्यामाय्रोऽधुनाःऽऽस्ते 
सरति स पिदगेहार्‌ सौम्य बनभ मोपान्‌ । 


कविद्पिस दथा नः फिङ्रीगां यणीते 


युजमधुरगन्धं ूधन्य॑धःखत्‌ कदा खु ॥२१॥। 
श्रीदयुक उक्राच 
अथोद्रवो निशम्यैवं छष्णदर्धनलालसा; । 


सान्त्वयन्‌ श्रिषसंदे लेगषीरिदिमभाषत \ २२ 


उद्धव उवाच 
अहो यप्र ख पूणाथ भवत्यो लोकपूजिताः । 


वासुदेवे भगवति या्ामित्यपितं मनः ।॥२३।। 


 दानवततपोहोमजपखाण्यायक्षंयमेः | 


श्रेयोभिविंविधेश्ान्येः कष्णे भक्तिहिं साध्यते ॥२४॥ 
भमवत्युत्तमदलोके भवतीभिरटुत्तमा । 


भक्तिः प्रवेतिता दिष्टया युनीनामपि दुरंभा ॥२५॥ 


दिष्टया पुत्रान्‌ पती च्‌ दहन्‌ खजनान्‌ भवनानि च। ` 


हित्वादरणीत यूय यत्‌ कृष्णाख्यं पुरषं परम्‌ ॥२६॥। 
सु्व्रात्मभावोऽधि्तो भवतीनामधोक्जे । 


विरहेण महाभागा महान्‌ मेऽनुग्रहः कृतः ॥२७ 


ऋः 
णि निय योक 


वहां हमारा निवह कौसे होगा ॥ २० ॥ अच्छा, हमारे 


[ अ० ४७ 








्रियतमके प्यारे दूत मध्रुकर्‌ ! हरमे यह बतदाजो कि 
आयंपुत्र भगवान्‌ श्रीकृष्ण गुरुकुख्से लौटकर मधुपुरी 
अव सुख्से तो हैन क्या ते कभी नन्दवावा यशोदा 
रानी, यद्टाकरे घर, सगे-सम्बन्धी ओर वाल्वाोकी भी 
क्रते ह १ ओर्‌ स्याहम द्षियोकी मी को बात 
कभी चलाते हैँ १ प्यारे भ्रमर ! हमें यह भी बतदभओं 
कि कभी वे अपनी अगरकरे पमान ईिव्द सुगन्धसे युक्त 
भुजा हमारे षिरोपर र्खे १ स्या हमारे जीवने 
कभी रेसा दयुम अवयर्‌ मीञआयेगा १ २१॥ 


श्रीद्युकदेव जी कते द-- परीक्षित्‌ ! गोप्यो भग्वान्‌ 
श्रीकृष्णके ददानके लिये अघ्यन्त उल्छुक-लालायित 
हो रही थीं, उनके च्य तड्प रही थीं | उनकी बाते 
सुनकर उद्धवजीने उन्हँ उनके प्रियतमक्रा सदेश सखुनाकर्‌ 
सान्वना देते इर र स्हा--) २२॥ 


मरो ¡ तुम कृतकृत्य 
देवियो ! तुम सारे 
संसारके व्यि पूजनीय हो; क्योकि तुमने इस 
प्रकार भगवान्‌ श्रीकरष्णको अपना हृदय, अपना सवेष्व 
मपित कर दिया है| २३॥ दान, त्रत, तप, होम, 
जप, वेदाध्ययन, ध्यान; धारणा, समाधि ओर कल्याणक 
अन्य वित्रिध साधनोके द्वारा भगवानकी भक्ति प्राप्त हो, 
यही प्रयत करिया जाता है ॥ २४ ॥ यह बड़ पौभाग्यकी 
वात है किं तुम खोगेने पवित्रकीतिं भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रति 
वही सर्वोत्तम प्रेभमक्ति प्रप्त की है ओर उसीका आदशं 
स्थापित किया है, जो वडवे ऋषि-पुनियेकि ' च्ि भी 
अत्यन्त दुकंभ है ॥ २५ ॥ घछच्ुच यह कितने 
सोभाग्यकी बात है कि तुमने अपने पुत्र, पति, दे; 
खजन ओर धरोको छोडकर पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
को जो प्तबके परम परति है, पतिके रूपमे वरण कयां 


च 
अही 
~ 


उद्धवजीने कद 
[क 
४ 


हो । तुम्हारा 


वन्‌ सप्र ह 


र) 
> 
ञ्‌ 


है ॥ २६ ॥ महामाग्यवती गोपियो | भगवन्‌ श्रीकृष्ण ` ¦ 
के वियोगसे तुमने उन इन्दियातीत पएमात्माके प्रति बह 
भाव प्राप्त कर च्या है, जो समी वस्तुक रूपमे ` 


उनका दर्यन कराता है । तमकोर्गोका वह भाव भेर 
सामने मी कट हआ, यह्‌ मेरे ऊपर तुम देव्रियं 


ॐ > 


| 


॥# पणी 


। -॥ ५16 


\ त॒जिरन्ध्पाद्ल्द्यानि विनिद्रः प्रत्यपद्यत । 


व । 


 सुदुश्िखप्नजद्धिमीयःइत्तिभिरीयते ॥२३१॥ 







००9 | दशम स्कन्ध 


1 


प्‌ 





































ङ्ग 4 
र -, के, 
= = न र॑ ४ 


श्रुयतां प्रियपतदेश्ो भवतीनां सुखावहः 








बड़ी ही दयां है ॥ २७ ॥ नै अपने खाभीका गुप्त काम ` 
करनेवाव दृत हर । तम्हरे प्रियतम भगव्रान्‌ श्रीकरष्णने २ 
तुमलोगोको परम सुल देनेके च्य यहं प्रिय कषद 
मेजा है । कल्याणियो ! वही केकर मे तुमल्गके पप्र 
आया ह+, अव उपे सुनो ॥ २८ ॥ 
भगवान्‌ शीश्ृष्णने कदा दै-य सवका उपादान 
रण हानेसे सवका आत्म द सतम अदुगत ह; इस 
ग्रसे कभी भी वम्दारा वियोग नदी दौ सकता | 
जसे संतारके सभी मतिक पदार्योमं आच्छा, वायु, 
अग्न, जल ओर्‌ प्व्वी -ये पर्चा मूत व्यद्च हं, इन्दे 
सत्र वेस्तुए बनी हं आर यदी उन व्स्तुओंके ख्यम्‌ ह; 1 
वये ही मै मन) प्राण) पञ्चभूतः) इद्धि ओर्‌ उनके 
वपियोका आश्रय द्रं | वे सुक्षयं हे, मै उनमें द्रं ओर 
सच प्रजो ता सें ही उनके ख्पमं प्रकट हौ रहा द ॥२९॥ 
म ही अपनी मायके द्वारा भूत, ईन्दरिय ओर उनके 
विषर्योके रूपमे होकर उनका आश्रय बन डाता द्र तया 
सयं निमित्त भी बनकर अपने-अपरको दी स्वता 
पालता द्र ओर समेट कतार ॥ ३० ॥ आत्मा माया 
ओर मायाके कार्योसि प्रथक्‌ है । वह विद्युद ज्ञानखख्प, 
जड प्रकृति, अनेक जीव तथा अपने दी अवान्तर मेद्‌ से 
रहित स्वधा शुद्ध है । कोई भी गुण उसका स्पद्यं 
नहीं कर पाते । मायाकी तीन बृ्त्या हं--सुषुपि, 
खमप्न ओर जाग्रत्‌ । इनके द्वारा वही अखण्ड, अनन्त ` 
बोधखख्म आत्मा कभी प्राज्ञ, तो कभी तेज ओर 
कभी व्रिश्वरूप-से प्रतीत होता ह ॥ ३१ ॥ मनुष्यको 
चाहिये कि वह समन्ने कि खप्नमे दीलनेवाठे पदाथेक्रि ` 
समान ही जाग्रत्‌-अवश्थामे इन्दियके विषय मी प्रतीत 
होरहे है वे तरया है । इषील्वि उन विव्रयोका 
चिन्तन करनेवाठे मन ओर ईन्द्रिधाको रोक > ओर 
मानो सोकर उठा हो; इस प्रकार जगत्‌ खानिकं 
विषयोको व्यागकर मेरा पाक्षाकतार करे ॥ ३२ ॥ ` 
जिस प्रकार सभी नदियां वूम-क्षिरिकर सुमे ही 
प्ुचती है, उसी प्रकार मनी पुरधका वैदाभ्यास, ` 
 योग-साघनः, आत्ाना्मविवेकः त्याग, तपस्या, च्दिय्तयम ` 
ओर सव्य आदि समस्त धमे) में प्रापिमे ही समाप्त 
| होते ह । सबका है मेरा त्कार) कंपाक्‌ ` 
प्गाः ॥३३॥ द मनको निरुद्र करके मेरे पास्‌ पचते है ॥३२]॥ 
र अन त 




















यपरादायागते भद्रा अहं भत्‌ रहस्छरः \\२८ 


श्रीमगकानुवाच 
भवतीनां निथोभर दे नहि सवौस्सना कचित्‌ । 
यथा भूतनि भूतेषु खं बा्व्निज॑रुं मदय । 
तथाहं च अनःप्राणयुदैन्द्धशुमा्रयः ॥२९॥ 


वप 


गत्मन्येशात्पराऽऽत्मानं घज हम्भ्यदुषाल्ये । 
आटममायाञ्मावैन अूरैन्द्रिय एुमारमना \\३०)॥। 


आता ज्ञानसप्ः खल्ले व्पदिरिक्तोऽगुभान्वयः 


| १ भायौर्‌ ध्याधेत शषाखमरवहुस्थिवः । 





एतदन्तः समाश्रय थर्‌ संख्यं सनीषिभामू्‌ । 












, ~+ ` ~ - कर सो-4 
८ |: 4 त # 1 |, कु 
१ कनै ~ कि = 


४ क, 
॥ 











यत्‌ त्वहं भवतीनां वे दूरे वतं प्रियो दशाम्‌ । 


मनसः संनिकर्बाथं मददुभ्यानक्राम्यया ॥३४॥ 





यथा दूरचरे प्रेष्ठे मन आविश्य वर्तते| 
~ । 
ल्ीणांचन तथाच": संनिष्ष्टेऽक्षिगोचरे ॥३५॥ 
॥ मग्यवेरयमनः छसनं विशुक्त रेपदत्ति यद्‌ । 
' क 1 
॥ 7 
^ ¬ अङुखरन्त्यो मां नित्यमविरान्ाघुपेष्यथ ॥६६॥ 
¢ | 
४ डता राज्प्रा त्रच आ 
| या मया कीडता रातां बनेऽसिन्‌ वज्ञ आयिवाः। 
¢ ््‌ + 
५ 


अरन्धरास्‌ः कल्याण्यो माऽऽपु्मद्रीर्यचिन्तया। ३७) 


श्रीद्ुक उवाच 


















एवं प्रियत्तभादिष्टमाक्रण्यं वजयोषित | 
ता ऊचुश्द्रवं प्रीवास्तस्सदेश्चागतस्मरतीः ।॥३८॥ 
` गोप्य उचुः 


 दिष्टयाहितो हतः कसो यदूनां साबुगोऽधश्चत्‌। 
 दिषटयाऽपरुन्धसवा्ेःछशरयास्तेऽच्युतोऽघुना३९ 


कचिद्‌ गदाग्रजः सोम्य करोति परयोपिताभू । 


श्रीमद्भागवत 


[त 1 1 त 1 


च क, = = ` = "कः = काः ठ्न वा जि भ ज च = उ 0 को पक द ` जक = च क कः ज ` "क चः" जि क 








गोपियो | इसमें संदेह नहीं कि मेँ तुम्हारे नयनोका 
घुवतारा द्र । तम्हारा जीवन-सवंछ द्र | वितु में 
जो तुमसे इतना दूर रहता हँ, उसका कारण है । बह 
यह्वी कि तुम निरन्तर मेरा ध्यान कर सको, रारीरसे दूर 
रहनेपर भी मनसे तुम मेरी सन्निधिका अनुभव करो, 
अपन। मन मेरे पास रशो | ३४ ॥ क्योकि च्ियां 
ओर अन्यान्य त्रभियेका चित्त अपने परदेदची प्रियतमे 
जितना निश्च भवसे चणा रहता है, उतना ओंखकि 
सामने, पास रदनेवाटे प्रियतमे नदीं गता ॥ ३५ ॥ 
अदोष बृ्तियोँसे रहित सम्यूरणं मन सुञ्चमें लगाकर जव 
तुम खोग मेरा अनुस्मरण करोमी, तव दीघर ही ६दाके व्यि 
मुञ्चे प्रप्त ह। जाओगी ॥ ३६ ॥ कल्याणियो ! जिम 
समय मैने बृन्दावनमें शारदीय प्रूणिमाकी रात्रिम राप 
क्रीडा की थी, उक्त समयनजो गोपि्यां खजनोकै रोक 
लेनेसे व्रजमे दही रह गयी- मेरे साथ राप्तविहारमे 
सम्मिलति न हो सकीं, वे मेरी टीलखओंका स्मरण करने- 
सेही यञ्च प्राप्त्य गयी थीं। ( तु्हं भीमे म्द्ूगा 
अव्रद्य, निरा हानेकी कोड वात नहीं हं ) ॥ ३७ ॥ 


ीद्युकदेवजी कते द--परीक्षित्‌ } अपने प्रियतम 
श्रीकृष्णका यह संदेसा सुनकर गोपियोको वड़ा आनन्द 
हआ । उनके संहेशसे उन्हं श्रीकरृष्णके खरूप आर 
एक-एक टीखकी याद्‌ अने व्णी। प्रेमेसे भरकर 
उन्दने उद्धवजीसे कहा ॥ ३८ ॥ 

गोपियाँने कहा--उद्धवजी } यह वड़े सौमाग्यवी 
ओर आनन्दकी बात है कि यदुवंशि्योको सतानेवाटा पापी 
कंप अपने अयुयायियके साथ मारा गया | यह मी कम 
आनन्दकी बात नींद किं श्रीकृष्णके बन्धु-रान्धिव 
ओ१ गुरुजनोके सारे मनोरथ प्रण हो गये तथा अव 
हमारे प्यारे स्थामञुन्दर उनके साथ सहृ निवास 
कर रहे ई ॥ ३९ ॥ किंतु उद्धवजी ‹ एक वात अप 
हमें बतराहये । “जिप् भ्रकार हभ 4पनी प्रेमभरी ग्जीटी 


मुसकान ओर उन्पुक्त चित उनकी प्रजा करती 
थी नीरवे भी हमसे प्र करते ये; उसी प्रकार 
मधुराकी लियोसि भी केन करते दै या नही १।४०॥ 


| अ० ४७ । 


£ 





अ० ४७ | द्म स्कन्ध 


त मी णि न कीति व 1 ("क रीर पणीरिीौरी 
आ जाः ज = जः = जि 


कथं रतिविशेषक्ञः प्रिष्रश्च वरयोषिताम्‌ । 





८२१ 


` ऋक कक ने ममी गमि 
॥ र कि पि सि च क = लज चोः 0 = जः ज जः = ज कः यः काः कः ऋः 


 तत्रतक दूसरी गोपी बोल उटी-- भरी सखी | 
हमारे प्यारे द्यामघुन्दर तो प्रेसकी मोहिनी 
नादुव्येत तदायैविभरादुमाजित; ।॥४९।॥ | कने विषेण € । समी षठ ति च 
प्यार करती हैँ; फिर भटा जव नगरकी ज्जियां 

। उनसे मीटी-मीठी बातें करेगी ओर हवि-भावसे उनकी 

अपि खरति नः साधो गोषिन्द्‌ः भ्रस्तुते क्रचित्‌ । ओर दे्खेगी तत वे उनध८ क्षां न रीकष्गे ¢ ॥ ४१॥ 
। दूसरी गोपयां वोखीं --"घाध ! आप यई तो बतखइय किं 

ट र । ट _  जवरकभी नागरी नाियोको मण्डटीमे कई बात चती है ओर 
गोष्टीसध्ये पुरस्लीणां ग्राम्याः स्देरद्धथ "तरे ॥४२॥ दभर षयरि वच्छे नना वि 
| वातं करने च्गते दै, तत्र क्या कभी प्रक्तंव हम गंवार 





= 
ऋ 0 क जा जनि ऋः क क ऋक = च = = 





णोप ~ गोः = - = ` ` क =-= चक ` गः र 9 ज अः ति = क तपण 


दाः ‰ निक्षः सरति याह वदाप्रियाभि- | ग्बाकिनोँकी मी याद्‌ करते है ¢ ॥ ४२॥ ङु गोपिर्ोने 

। कह[-- ‹उद्धवजी ! क्या कमी श्रीङ्गष्ण उन रात्रर्योका 

< सति स्मरण करते हँ, जव कुपुदिनी तथा कुन्दके पुष्प खि इए 
न्दने ङषदङ्न्दशशाङ्रम्ये 1 1 


थे, चारों ओर चांदनी छिटक रदी थी ओर बृन्दावन 

अत्यन्त रमणीय हो रहा था | उन रत्रियमिं ही उन्होने 

ल्प तस-मण्डल बनाकर हमरोगोके साथ चव्य किया या। 

रेमे कणच्रणन्‌पुरशसमाष्ख्या- निनी चन्दर चो द 
हमलोगोके पे न्‌ पुर सनञ्चुन-रुनञ्चुन बज रहे थे | हम 

म खाभिरीडितमनोज्ग स्थः कदाचित्‌ ॥४३।॥ सज सखियां उन्द्रीको घुन्दर-घुन्दर टीगाका गान 
कर रही थीं ओर वे हमारे साथ नाना प्रकारके विहार 
कर रै थः ॥५४३॥ कुछ दूसरी गोपि वों 
उश्ी- -“उद्धवजी ! हम सब तो उन्ह्ीके व्रिरहकी 
आगसे जल रही हैँ । देवराज इन्द्र जैसे जक बरसाकर 


वनको हरा-भरा कर देतै हैँ, उसी प्रकार क्या कभी 
संजीवयन्‌ खु ना ग्‌त्रयेथेन्द्रो वन्‌म॒स्वुद्‌ )°5°)) श्रीकृष्ण भमी अपने कसर आदिसे हमं जीतव्रन- 


५ 


॥ न देनेके थ्य यज्कं अ्वेणे ¢ ॥ ४ ॥ तत्रतक एक 
९ ॥ । गोधीने कदा-- “भरी सली ! अव्र तो उन्हनि शत्रु ओंको 
कसार कृष्ण इहायात ्राप्तराज्यो हतादितः। मारकर राञ्यपा चथा है; जिसे देखो, वही उनका 

९ | सुद्‌ बना फिरत। है । अव वै बड़े-बड़े नघ्पतिर्योकी 


न £ विवाह करेगे, . उनके साथ आनन्दपूवंक 
नरेन्द्रफन्या सट्राह्य प्रीतः सत्सुदद्षृतः 1५५) | रहगे; यह हम भँवारसिनिकि पा स्यो आयेगे ¢ ॥४५५॥ 


दूसरी गेषीने कहा-- नदीं सखी ! महासा श्रीकृष्ण ` 

~ ५ { ५ तो स्यं लश्मीपति हैँ । उनकी सारो कामना पूणे 
कोभिरेन्प्मियो महात्मनः । 

किमसमिवन) ५ ही है, वे कृतकृत्य है 1 हम वनवासिनी ग्बालिनो अथवा 
दू राजकरुमासियंषे उनव् केदप्रये जन नदी है । हम ` 

त्मन्‌; 118६1} । लोगे विना उनका कौनसा काम अटक रहा दे॥४२॥ । 


अप्येष्यतीह दाशदस्तप्ा; खङ्दया श्चा 










1 


श्रीपतेराप्तक(मख क्रियेत 









। ॥ । ॥ च ५९ ॥ ॐ चै 

> + क ष 

< १ ^ ऋतिः चिक व (५ व १८ व ¬ र | 

{ ~ ४२२. श्रीमद्भागवत अ० ४७ 

॥ ॐ च # 

॥ ४: "~ 5 ॥: 

ज नोक छः = 5 कः जतः को के = चे = को चो च कि = चः त कि ` कः तः ` चोः क तः ॐ ततः = का कोः कः ऋ 1 


परं सोख्यं हि नैराहयं सेरिण्यप्याह पिङ्गला । देखो वेश्या होनेपर मी पिङ्गलाने च्या दही ठीक 








चकि 


| कहा है-- संसारं किसीकी आखा न रखनादही 


 सवसे वड़ा घुख है ! यह वात हम जानी 

तज्ञानतीनां नः कष्णे तथःप्याला दुरस्य था । ४७) | 2 पि मी ह, मगवरान्‌ श्ीृष्के टीटनेकी आशा 
छोडनेमे असमथ हं । उनके छभागमनरी आसा द्ी तो 

~ हमारा जीवन है | ४७ ॥ हारे प्यारे द्याप्धन्द्रने, 

जिनकी कीतिं गान वडे-वडे महात्मा करते रहते हैँ 


| ; > ह क उत्पत संत्यक्तयुत्त पश्छोकषं विदम्‌ | ` | हिम घे एकान्तम जो मीटी मीने प्रेप्की वातं की चै उन 














छोडनेका; थुलनेका उत्साह भी हम वये दर सकती 
हैँ! देखा तो, उनकी इच्छा -न होनेपर भी खयं 
लक्ष्मीजी उनके चर्णोसेि च्पि्दी रहती हैँ, एक क्षणे 
व्यि भी उनका अङ्ग-सङ्ख छोड़कर कदी नहीं जातीं 


॥ ४८ ॥ उद्धवजी ! ड़ वही नदी ठैः जिसमे वै 


अनिच्छतोऽपि यख श्रीरङ्कान्न च्यवते कचिप्‌।(४८)। 


1 ४ ६ न्द अ ॐ ९ 
। सरिच्छलवनोदेशा गवो वेणुखा दमे । तादयो गवति य) 9 व 
नि करते ये, ओर ये 


च जिनमे वे रात्निके समय राक्टीरा 
¢ वे ही गौर्दुहै, जिनको चरानेके घ्ि वे सुबह-शाम 
हमलेगोको देखते हए जाते-अति थै । ओर्‌ यद्क दीक 
वैसी हयी वीक तान हमारे कानों भूनती रहती है, 
जेसी वे अपने अधरोके संयागसे ठंडा कर्ते घे | 
वटरामजीके साय श्रक्रष्णनं स्न स्थीक्ा देवन किया 
हे ॥ ४९, ॥ यहका एक-९क प्रद एवःकः धृषकिण 
उनके परम सुन्दर चर्णकेमरोसे चिहित है । इन्दं 
जव-जव हम देखत हं, सुनती ह--द्नमर यही तो 
करती रहती द--तव-तव वे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर 
द्नन्दनक्ो हमारे नत्रोके सापने सकर स्ख देते 
है | उद्धवजी हम कसी भी प्रकार-मरकर भी 
उन्दं भूक नहीं सकतीं ॥ ५० ॥ उनकी वह हसको- 
स्‌। सुन्दर चक, उन्मुक्त हास्य, ।वलापप्रूण चित्वन 
जर मधघुमथी वाणी | आह | उन सवने हमार चित्त 
चुरा ल्था है, हमारा मन हमारे वशं नध है; अब 
हम उन्द मूढे तो कि्त तरह १ ॥ ५१॥ हमारे प्यारे 
श्रीकृष्ण । तुम्हीं हमारे अवन्‌क्तो खामी हो, सवख 
हो ] प्यारे! तुभ च्््मीनाय हो 4 क्या इआ !† हमारे 
न्मितो व्रजनाथ दही होम बनगपियाकि एक- 
मात्र तुम्दीं सच्चे खा श । स्यामडुन्द्र । तमने 


८ ॐ न 9.1: । 8१ | ९८ ४ व्र > 


= 







|  संकषंणसष्येन छष्णेनाचरिताः प्रभो ॥४९।। 






पुनः पुनः सआारथरिति नन्दगोपसुतं बद । 
















हतधियः कथं तं विंसराभदे ॥५१॥ 













ह, कद 
५५९ ४ ज ॥ ॥} 


< ८ $ डः ट ॐ 6: च - | द्‌ ध 
ह नाथ ठं रमानाथ व्रजनाथा्तिनाशन । 












शि भीक कि , त च =+ ~~ ~~ 


श्य 
१० (र्णा ब्राह । २, तद्व । २. 


॥ > का 





अ० ४७ | दञ्चम स्कन्ध ४२३. । ^ 


~~~ 
यि दि 


भषर्धुद्धर भोषिन्द भोढुलं व्रजिनाणेबात्‌ ।५५२॥ | है । गोविन्द | तम॒ नौओंसि वृत प्रेम करते हो | 





श्रीद्युकं उवाच 
ततस्ताः "° संदेदधव्येयेदविरहल्वरा; । 
उद्धवं दूजयाश्वक्घुह्घो स्याऽऽत्पानमशरक्षुजस्‌ 1\५३।) 
उवा दतिचिन्पासःर्‌ गोपीनां िसदज्छुचः। 


कुष्णकणीरःभां गायन्‌ रमयामास गोङकरप्‌ 18 


व्रजो श्णप्रावण्वाखन्‌ कृष्णस्य व्‌ःतेखा 1५५५ 
सश्िनभिशिणीवीं श्य्‌ इखधिवान्‌ द्रमान्‌ । 


छष्ण संसारयन्‌ रेमे हरिदःरो व्रजोकष्छास्‌ ५६ 
बेवयादि भोपीनां ङष्मावक्ञात्मविं्धबष््‌ । 


उद्धवः परसप्रीदस्ता नमखन्निदं जभौ \\*अ\। 


एताः प्रं तजुभतो शुचि शपवध्वो 





क्या हम गीर नहीं हैँ १ तम्हारा यह सारा गोकुक-- 
जिसमे ्ाल्व्राठ, पिता-माता, गौर्ये ओर इम गोपियोँ 
सव कोई है दुःखके अपार सागरम इव रा है। 
तुम इसे बचाओ, आओ, हमारी रक्षा कगे ॥ ५२॥ 
श्रीडकदेवजी कते हं - प्रिय परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
श्रकृव्णका प्रिय संदेश सुनकर गोपिरयोकि विरहकी 
व्यथा शान्त हदो गयी थी | वे इद्ियातीत भगवान्‌ 
श्रीकृष्णको अपने आत्मके ख्ये सर्वैर सित समञ्च 
चुकी थीं} अव वे बडे प्रेप ओर आदरसे उद्धवजीका 
सत्कार करने लगीं ॥ ५२॥ उद्धवजी गोपि्योकी 
व्रिरह-व्यथा मिटानेके व्ये कदं महीनोंतक वहीं रदे । 
वे मगवान्‌ श्रीकरष्णकी अनेकों खीटारएं ओर बातें खना- 
घुनाकर त्रनवा्ियोको आनन्दित करते रहते ॥ ८५४ ॥ 
नन्दवावाके ब्रजमें जितने दिनोतक उद्रवजी रहे, उतने _ 
दिनोतक भगवान्‌ श्रीकृष्णकी खीसकी चर्च होते 
रहनेके कारण त्रजवाचति्याको पसा जान पड़ा, मानो 
अमी एकी क्षण इ दो ॥ ५५५1 मगवान्‌के 
परमप्रेभी भक्त उद्धवजी कभी नदीतटपर्‌ जाते, कभी 
वर्नोम विहरते ओर कमी गिर्रिजकी घावियेमिं 
विचरते । कभी रग-विरंगे एलंसे र्दे इए इक्षमिं ही 
रम जाते ओर यँ भगवान्‌ श्रीकृष्णने कौन-सी टीला 
की है, यह प्ूछपूछकरर व्रनव्रा्तिरयोको भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण ओर उनकी लीलाके स्मरणम तन्मय कर 
देते ॥ ५६ ॥ | 
उद्धव जीने त्रजमे रहकर गोपियोकी इस प्रकारकी 
प्रेम-विकर्ता तथा ओर भी बहुत-सी प्रेम-चे्ाए्‌ देखीं । 
उनकी इस प्रकार श्रीकृष्णमे तन्मयता देखकर वे प्रेम 
ओर आनन्दसे भर गये । अब वे गोपियोको नमस्कार ` 
करते इए इष प्रकार गान करने ल्गे--॥ ५७ ॥ स ` 
पृथ्वीप्र केवल इन गोपिर्योका दी रारीर्‌ धारण करना श्रेष्ठ 
एं सफल है; व्योकिः ये संबोरमा भगवान्‌ श्रीक्ष्णके ` 
पर्प प्रेतनप दिव्य महामावमे लित हो गयी 
६ ! प्रको यह ऊंचीसे.ऊंची सिति संसारके भयसे 





+ † वि ` > 1 = त 


# , तिच 








: । | ॥ 



























७२४ श्रीमद्भागवत [ अ० ४७ 
=-= === =-= ---------------- 
वाञ्छन्ति यद्‌ भवभियो यनयो वयं च वाञ्छनीय ही है | हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी । 


सत्य है, जिन्दं भगवान्‌ श्रीकृष्णकी टीला-कथाके 
रसका चसका ल्ग गया है, उन्हे कुटीनताकी 
द्विजातिसमुचित संस्कारकी ओर बड़े-बड़े यज्ञ-यागमिं 
| दीक्षित होनेकी क्या आवद्यकता है १ अथवा यदि 
क्रमाः श्ियो वनचरीव्यंभिचारदृषटाः भगवान्‌की कथाका रस नहीं मिका, उसमे सचि नही 
इई, तो अनेक महाकल्योतक वार-वार ब्रह्मा होनेसे ही 
क्लम !॥ ~८ | कहा ये वनचरी आचार, ज्ञान 
ओर जातिसे हीन गोँवकी वार वालिने ओर कहँ 
साचेदानन्दधघन भगवान्‌ श्रीकृष्णे यंह॒ अनन्य प्रम 
परेम | अहो, धन्य है | धन्य है ! इससे सिद्र हेता 
व २ दै किं कोई भगवानके खखूप ओर रहस्यक्तो न 
न्वीश्वरोऽचुभजतोऽ विदुषोऽपि साक्षा- जानकर भी उनसे व्रेम क्रे, उनका भजन करे, तो 
वे खय अपनी राक्तिसे, अपनी कृपासे उसका परम 

कल्याण कर देते हे; ठीक वैसे ही, जैसे कोई अनजाने 

ह चछरेयस्तनोत्यगद्राज इवोपयुक्तः ॥५९॥ | मी अग्रत पी ठे तो वह अपनी वस्तु-शक्तिसे ही 
५ पीनेवाटेको अमर वना देता है || ५९ | भगवान्‌ 
हः श्रीकृष्णने रासोत्सवके समय इन त्रजाङ्गनाओंके ग्म 
नायं शियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः बाद डाल डालकर इनके मनोरय धरणं विय । हृ 
भगवान्‌ने जिस कृपा-प्रसादका वितरण किया, इनं 
जेसा प्रेमदान किया, वैसा भगवानूकी परमप्रेपवती 
वेता = नित्यसङ्खिनी वक्षःस्थकपर विराजमान टक्ष्मीजीको भी 
खर्योषितां नलिनगन्धहचां कतोऽन्याः । नहीं प्राप्त हअ । कमल्की-सी सुगन्ध ओर कान्तिसे 

॥ युक्त देवाङ्गना्ओंको भी नहीं मिखा । फिर दृसरी 
| चिर्योकी तो बात ही क्या करं १॥ ६० | मेरे च्य 

रासोत्सषेऽख थुजदण्डगरहीतकण्ड- तो सवसे अच्छी वात यही होगी कि मैं इस बृन्दोवन- 
धाममें कोई ज्ञाडी, ठता अथवा ओषधि--जडी-बरूटी - 
ही वन जाऊं | अहा | यदि मे रेसा बन जाऊंगा, तो 
मुञ्े इन व्रजाङ्खनाओंकी चरणधूठि निरन्तर सेवन 
करनेके ल्य मिलती रष्ेगी । इनके चरण-रजमें स्नान 


आसरामहो चरणरेणुजुषामहं खां करके मैँ धन्य हो जाङ्गा । धन्य है ये गोपियों। 
ध | देखो तो सदी, जिनको छे,डना अव्यन्त॒ कठिन है, 


फं ब्रह्मजन्पभिरनन्तकथारससय ।५८।। 


" +^ कः 


ङष्णे क्त चेष परमात्मनि रूढभावः 


` सज्धाशिषां य उदगाद्‌ ्रजवह्वीनाम्‌ ।।६०॥ 


ट उन खजन-सम्बन्धियों तथा लोक -बेदकी आय-मर्यादाका 

 इन्दावने क्रिमपि ुलमरतौपधीनाम्‌ । पलि्याग करके इन्ोने सगवान्‌की पदवी, उनके साथ 
। तन्मयता, उनका परम प्रेम प्राप्त कर च्या है-- 
ओर्तेकी तो बात द्वी क्या--मगवद्राणी उनकी 
| निःश्रास्तखूप समस्त श्रुतिया, उपनिषदं भी अवतक 
` | भगवानूकै परम्‌ ्रेभमय खख्पको द्ढती दही 


1 - द: [4 १ द. +; नि ल “~ पा ॥ ६ १ || ~ 2 
य४उन्द पद्व श्तिभिविद्ग्याम्‌। १ अ "क प 


अ स्तर यथं च दहित्वा 


। कन 
मर = 
क, १ 





4 





"क 
५ + क 


१52 - 
हि ६ ट 


अ० ४७ | 


द्ज्ञम्‌ स्कन्धं 











या वे भियाचितमजादिभिराप्नकामे- 


येगिशवरेरपि यदात्मनि रासमोष्ठचाम्‌ । 
कृष्णस्य तद्‌ भगवतश्वरणारविन्दं 
न्यस्तं स्तनेषु विजहुः परिरभ्य तापम्‌ ॥६२॥। 
बन्दे नन्दव्रजच्लीणां पादरेणुमभीक्ष्णश्चः 


यां हरिकथोद्रीतं पुनाति थुचनत्रयम्‌ ॥।६३॥ 
श्रीश्चुक उवाच 

अथ ॒गोपीरयज्ञाप्य यशोदां नन्दमेष च । 

गोपानामन्त्य दाशार्हो याखन्नारुरुहे रथम्‌ ॥६४॥ 


तं निगंतं समासाद्य नानोपायनपाणयः । 


नन्दादयोऽलुरागेण प्रायोचन्नश्वुरोचनाः ॥६५॥। 


_____ (षणी 


मनसो इत्तयो नः स्युः कष्णपादाम्बुजाश्रयाः। 
वाचोऽभिधायिनीनान्नां कायस्तत्प्रहणादिषु ॥६६॥ 


कमभिम्राम्यमाणानां यत्र क्रापीश्वरेच्छया । 









मङ्गलाचरितिदानं रति ¦ कृष्ण ईश्वरे ॥६७॥ 





एवं सभाजितो गोपेः छृष्णभत्तया नराधिप । 

| 4 4 क. 
उद्धवः पनरागच्छन्मथुरां कृष्णपा 

भार सर लर २. ५४ 







विरह-व्यथा शान्त की ॥६२॥ नन्दवावाके त्रजमे रहनेवाटी 


७ ~ 
दारा उद्धवजीका सम्मान किया | अब वेम 





खयं भगवती क््मीजी जिनकी पूजा करती रहती है; 

ब्रह्मा, शंकर आदि परम समथ देवता, पूर्णकाम आत्माराम 
ओर बड़े-बड़े¶योगेश्वर अपने हृदयमें जिनका चिन्तन 
करते रहते है, भगवान्‌ श्रीकृष्णके उन्दी चरणारविर्न्दो- 
को रास-लीटाके समय गोपिर्योने अपने वक्षःस्थलपर 
रक्खा ओर उनका आचिङ्गन करके अपने हदयकी जखन, 


५ 


गोपाङ्गना्ओंकी चरणधूल्को मँ बारवार प्रणाम करता 
दर-उसे सिरपर चष्टाता ह । अहा! इन गोपियोने 
भगवान्‌ श्रीकृष्णकी टीलाकथाके सम्बन्धमें जो कुख 
गान किया है, वह तीनों लो्कोको पवित्र कर रहा. 
है ओर सदा-सवंदा पवित्र करता रहेगा ॥ ६३ ॥ 


 # > १ ~ 1 


भ्रीद्यकदेवजी कहते है-- परीक्षित्‌ ! इस प्रकार 
कदं महीनोंतक त्रजमें रहकर उद्धवजीने अब मथुरा 
जानेके स्यि गोपियोंसे, नन्दवावा ओर योदा मेयासे आज्ञा 
प्राप्त की | वाक्वाकोसे विद्‌ केकर वहसि यात्रा करनेके च्थयि 
वे रथपर सवार हए ॥६४॥ जब उनका रथ व्रजसे बाहर 
निकला, तव नन्दवाबा आदि गोपगण बहुत-सी भटकी 
सामग्री केकर उनके पास आये ओर ओंखमिं ओस्‌ 
भरकर उन्होंने बड़े प्रेमसे कहा-॥६५॥ 'उद्रवजी ! __ ` 
अव हम यही चाहते है कि हमारे मनकी ९कएक ` 
वृत्ति, एक-एक संकस्प ॒श्रीकृष्णके चरणकमठेके दही 
आश्रित रहे । उन्द्वीकी सेव्राके व्यि उठे ओर उन्हीं 
त्गी मी रषे । हमारी वाणी नित्य-निरन्तर उन्हीके 
नामोका उचारण करती रहे ओर शारीर उन्हीको प्रणाम 
करने, उन्हीके आज्ञा-पाठन ओर सेवामे लगा रहे ।॥६६॥ 
उद्भवजी । हम सच कदते है, हमे मोक्षकी इच्छाः ` 
बिल्कुल नहीं है । हम भगवान्‌की इच्छासे अपने 
कमोके अनुसार चाहे जिस योनिम जन्म ठव ` 
डयुभ आचरण करें, दान करें ओर उसका फक ¢ 
यदी पावे कि हमारे अपने ईश्वर श्रीकृष्णमे हमारी प्रीति 
उत्तरोत्तर बढती रैः ॥ ६७ ॥ श्रिय प्रक्ष त्‌! ४ 
नन्दवाना आदि गोपोने स्स प्रकार श्रीकृष्ण-भक्तिके 


^ ¬ 8 =. 




















= 


।ट आय ॥६<॥ 


४२६ श्री मद्ध गब्रत [ अ० ४८ 


= न 9 = 


~~ -- 
पिपिष ररि 








(पिरि 


कृष्णाय प्रणिपस्याह भक्तयुद्रेकं बजोकसाम्‌ । वह पर्ैचकर उन्होने भगवान्‌ श्रीकृष्णको प्रणाम 
किया ओर उन्दै त्रजवासिययोकी प्रेममयी भक्तिका 


उद्रेक, जेषा उन्होने देखा था, कह सुनाया । 
इसके बाद नन्दवावाने मेटकी जो-जो सामग्री दी थी 
वह उनको, वसुदेवजी, बटरामजी ओर राजा उग्रसेनको 
वसुदेवाय रामाय राज्ञे चोप।यनान्यदात्‌ ॥६९॥ । दे दी ॥ ६९ ॥ 
~ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दङामस्कन्वे पूर्वा 
उद्धधप्रतियाने सप्तचत्वारिंरोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ 














प्रिय करने--उसे सुख देनेकी इच्छसे उसके धर 

सेरन्ध्याः कामतप्तायाः प्रिथमिच्छन्‌ गृहं ययो | १॥ | गये ॥ १ ॥ कुन्जाका घर बट्रमूल्य सामग्रिर्योसे प्तम्पत्र 
र: अ न था | उमे श्ङ्गार-रसका उदीपन करनेवाटी बहृत-सी 
महा्होपस्करराद्यं  कामोपायो | साधन-सामप्री भी भरी इई थी । मोतीकी ्ाररं ओर 
स्थान-स्यानपर ्ंडियां भी ल्गी हई थीं | च॑दोवे 
तने हृए थे । सेजं विछायी इई थीं ओर वैवनेके च्ि 
धूेः सुरभिभिदीषेः संगगन्धैरपि मण्डितम्‌ ॥ २॥ | बहत घुन्दर-घुन्दर आसन लगाये इए ये । धूपकी 
सुगन्ध पैट रही थी | दीपककी शिखां जगमा रही 


---४-39ण-चच््ऊॐ-- 
अथाष्टचलारिंशोऽध्यायः 
भगवान्का कुञ्जञा ओर अक्रूरजीके घर जाना 
| श्री्ुकं उवाच श्रीद्य॒कदेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! तदनन्तर सवके 
| | | अस्मा तथा सव कुछ देखनेवाठे भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
। अथ विज्ञाय भगवान्‌ सर्वात्मा स्व॑दश्चनः । अपनेसे मिकनकी आकाद्भा रखकर व्याकु ई कुल्जाका 
। 


य॒क्तादामपताकाभिविंतानश्चयनासनेः | 


न+ ५ # न 


क 
१ च । 
= क = 


:  ‡8 शह तमाधान्तमवेकष्य साऽऽसनात्‌ यीं । स्थान-स्थानपर श्लोके हार ओर चन्दन रक्खे 
, ० # इए थे ॥ २ ॥ भगवानको अपने षर आते देख कुब्जा 
4 जव $ सयुः था ति 
3३3 सद्यः स्ठतथाय हि जातसम्भरमा । तुरंत हड़बडाकर अपने आसनसे उठ खड़ी इई ओर 
क: , 2 खियोके साथ आगे बहकर उसने विधिपूवक भगवानूका 
$ यथोपसंगम्य सखीभिरब्युतं व य क 
$: सलीभिरच्युतं खलागत-सत्कार किया। फिर श्रेष्ठ भासन आदि देकर विविध 


उपचारोंसे उनकी विंधिप्रवंक प्रजा की ॥ २ ॥ कुञ्जाने 
मगवानूके परमभक्त उद्धवजीकी मी समुचित रीतिसे 


तथोदधवः साधु तयाभिपूजितो | धना की; पतु वे उसके सम्मानके क्वि उसका दिया । 
| ध इभा आसन छकर धरतीपर दही बेठ गयं | ( अपने 


न्यषीददू्व्यामभिशस्य | 1 यामभिषस्य वातनम्‌ | वामक साम | लामीके सामने छन्ने जआस्नपर बैठना उचित न 
र ~ | १. न्धे उद्धब० । २. बादरायणिख्वाच । ३. सुगन्धेरपि । ४ युजात° | 


ऋ ४ च्च ५ 
~ र. 
५ । कः "= म 
( \ = 9 ~ * न+, दः ,# ८ 


€ > शठ + 
ह चः 4 क कतै २ 
् 
= ककल # कच नि 
1. (= 
॥। 


#+ 
¢. 


सभाजयामास्ष सदासनादिभिः ॥ ३॥ 


९१ क 


॥ # १ ७ यं इ +, 
व {1011044 
` " " कने - क $ ॥। 
क 09 क १4 


| । 1 | 1 # | 4 | 
<, | 


। 
मक्ष 
५. 
५4 
) 
(^ 
। 


, कि = ~= 7 ॥ 
क, ~ ॐअ न्दः = न 





जकन 
7 न्व 
~ ककत ~ 





|. च च 
ऋ. 6 - „9 न्न 





अ० ४८ | 





ष्क त 


छष्योऽपि तूणं शायनं महाधनं 
विवेश लोकाचरितान्यनुत्रतः | ४ ॥ 

सा मज्जनाङेपदुङ्रभूषण- 
सग्गन्धतास्बूलसुधाक्षवादिभिः । 
प्रष्ाधितात्मोषशसार माधवं 
सव्रीडटीलोत्सितविभ्रमेकितेः ।॥ ५1 

आहूय कान्तां नवसङ्गमहिया 
विकङ्कतं कङ्णभूषिते करे । 
प्रगृह्य शय्यामधिवेर्य रामया 
रेमेऽलङेपापणपुण्यङेशया ॥ ६ । 

सानङ्घतपङचयोरुरसस्तथाक्ष्णो- 

जिघरन्त्थनन्तचरणेन रुजो सृजन्ती । 

दोभ्यां स्तनान्तरमगतं परिरभ्य कान्त- 
मानन्दमूर्तिमजहादतिदीषतापम्‌ ॥ ७॥ 
सैवं दवस्यनाथं तं प्राप्य दुष्प्रापमीश्वरम्‌ । 
अङ्खरागा्पणेनादो दुभगेदमयाचत ॥ ८ ॥ 


आहोप्यतामिह प्रेष्ठ दिनानि कतिचिन्मया । 
रमख नोरखहे स्यक्तुं सङ्खं तेऽम्बुरुदेक्षण ॥ ९ ॥ 
तस्यै कामवरं दच्वा मानयित्वा च मानदः । 
सहोद्धवेन सर्वेशः खधामागमदद्विमत्‌ १० 


=क्र 
दुराराध्यं समाराध्य विष्णुं स धरम्‌ 


कै 
=+ 


! <^ 2 
च+ त र ~ 2 
क चर ध „> 2 क 
व =>, १२ [ॐ 
+ ४५ द र 


ति 


> हिक १, ह 
' ५ +ड । च + वं क > ग ~ 
६ - * र्य =“ >, ४१.३४ > > १ 
~ +न ह 4 र ~) भते 
न्क रै 
नै ॥ ~ 





क््ङ् 
॥ 





49 ओ द 


क शंम ` 
द्‌ ईक 
[कक नान्यन्न य 
र ख व नि ज 





| जीवके चि बहत ही कठिन दै 


समज्ञा । ) भगवान्‌ श्रीकृष्ण सचिद्‌ानन्दखरूप होनेपर 
भी ोकाचारका अनुकरण करते इए तुरंत उक्षकी 
वह्मूल्य सेजपर जा वटे | £ ॥ तवर कुब्जा स्नान; 
अङ्गराग; वल, आभूष्रण, हार, गन्ध ( इत्र आदि ), 
ताम्बूल ओर सुधास्व आदिसे अपनेको खूत्र सजाकर 
टीलामयी लजीली मुस्कान तया हाव-मावके साय 
भगवान्‌की ओर देखती हहं उनके पास आयी ॥ ५॥ 
कुलजा नवीन मि्नके सङ्कोचसे कुछ च्िञ्चक रही थी | 
तव श्यामञुन्दर श्रीकृष्णे उसे अपने पास बुखा छिया 
ओर उसकी कङ्कणसे सुशोभित कटाई पकड़कर अपने 
पास बैठा च्या ओर उक्तके साथ क्रीडा करने ख्गे। 
परीक्षित्‌ ! कुन्जाने इस जन्ममे केव भगवानको अङ्ख- 
राग अपिंत किया था, उसी एक ्युभकमेके फल्खखूप 
उसे रसा अनुपम अबसर मिखा ॥ ६ ॥ कुन्जा भगवान्‌ 
श्रीकृष्णके चरणोको पने काम-संतप्त हृदय, वक्षःस्थल 
ओर नेरत्रोपर रखकर उनकी दिव्य घुगन्ध लेने र्गी 
ओर इस प्रकार उसने अपने इृदयकी सारी आधि- 
व्याधि शान्त कर गी | वक्षः स्थर्से सटे इए आनन्द- 
मूति प्रियतम द्याभघुन्दरका अपनी दोनों भुजाभसि गाढ 
भआणिङ्गन करके कुव्जाने दीधकालसे वदे इए विरह- 
तापको शान्त किया ॥ ७॥ परीक्षित्‌ । कुन्जाने 
केव अङ्गराग समपिंत किया था | उतनेसे दही उसे 
उन सवशक्तिमान्‌ भगवान्‌की प्राति इई, जो कैवल्य- 
मोक्षके अधीश्वर है भौर जिनकी प्रापि अत्यन्त कठिन है | 
परंतु उस दुभगाने उने प्राप्त करके भी ब्रजगोपिरयोकी 
मति सेवा न रमगकर यदी मँगा--॥ ८ ॥ प्रियतम! 
आप कुछ दिन यदीं रहकर मेरे साथ क्रीडा कीजिये । 


रखनेवाठे ओर सर्वेश्वर हैँ । उन्होंने अभीष्ट वर्‌ देकर 
उसकी पूजां खीकार की ओर फिर अपने प्यारे भक्त 
उद्धवजीके साथ अपने सवे्तम्मानित घरपर लट 
आये ॥ १० ॥ परीक्षित्‌ ! भगान्‌ ब्रह्मा आदि समस्त 





कंयोकि दे कमलनयन । सुञ्जसे आपका-साय नहीं छेड़ा | 
जाताः ॥ ९ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण सबका मान 


ईश्वरोके भी श्वर द । उनको प्रसन कर टेनाभी. 


क 
ह ~ 


ऋ 
रं न ` चाकी ` 


| जो को उन्द 


क 
' न 
0 द 
च ६ 
% 
श्च 
त्न | 


४२८ 


अक्रूरभवनं ष्णः सहरामोद्धवः प्रथः । 
करंचिचिद्ीषंयन्‌ प्राणादन्ररप्रियकाभ्यया ॥१२॥। 
स तान्‌ नरबरशरेष्ठानाराद्‌ वीक्ष्य खबान्धवान्‌ । 
प्रत्युत्थाय प्र्ुदितः परिष्वज्याभ्यनन्दत ॥१२॥ 
ननाम कृष्णं रामं च स तेरप्यभिवादितः । 


पूजयामास विधिवत्‌ कृतासनपरिग्रहान्‌ ॥१४॥ 





पादावनेजनीरापो धारयञ्छिरसा 


नृप । 
अहणेनाम्बरेदिव्येगन्धसग्भूषणोत्तमैः १५ 
8 । अचित्वा शिरसाऽऽनम्य पादावङ्कगतो जन्‌ । 

। प्र्याचनतोऽक्रूरः करष्णरामाचभाषत ॥१६। 


दिष्टया पापो हतः कंसः साचुगो वामिदं लम्‌ । 











भवद्भ्याथुदृत कृच्छ्राद्‌ दुरन्ताच समेधितम्‌॥१७)। 

युवां परभानपुरषो जगद्धेतू्‌ जगन्मय | 
भवद्भ्यां न षरिना किचित्‌ परमस्ति न चापरम्‌ १८॥ 
आत्मचष्टमिदं विश्वमन्वाविश्य खशक्तिंभिः । 
ईयते बहधा नहान्‌ श्रतप्रत्यक्षगोचरम्‌ ।॥१९॥ 
यथा हि भूतेषु चराचरेषु 


म स ः ध 
ब 
चट + = स ८ ` नृग नाक। मद्याद्‌ योनि भारि 
५ मह्यादयो यो छु आन्त नना) 
४. 

- त व ~~ ५ "4 १८५ ~ +< 9 । 
क क ५ + च्च 4 २. ॥ | ^ 
 १-बाचच।र. चा व । ३. कितः। ` 

क ०२4 #.: "~> न 3; 5 क नकी. ५ (ज - > ~ 


(न 





॥ 
4 र ~) # ध = ऋः 













श्रीमद्भागवतं 


< 








यों वरणीते मनोग्राह्यमस्वात कमनीष्यक्तौ ॥ ११॥ | प्रसन करके उनसे विषथ-घुख मागता है, वह निश्चय 


ही दुर्बुद्धि है; क्योकि वास्तवमे विषय-सुख भवतत 
तुच्छ-- नहींके बरावर है ॥ ११॥ 

तदनन्तर एक दिन सवंशाक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रंकूण 
बलरामजी ओर उद्धव नीके साथ अक्रूरजीकी अभिखपां 
पणं करने ओर उनसे कुछ काम ञेनेके च्य उनके 
धर गये ॥ १२ ॥ अकरूरजीने दूरसे ह्वी देख च्या कि 
हमारे परम वन्धु मनुष्यढोकशिरोमणि मगवान्‌ श्रीकर 
ओर वलरामजी आदि पधार रहै है । वे तुरंत उठ्कर्‌ 
आगे गये तथा आनन्दसे भरकर उनका अभिनन्दन 


| ओर आलिङ्गन किया ॥ १३ ॥ अक्रूरजीने भगवान्‌ 


श्रीकृष्ण ओर वल्रामको नमस्कार किया तथा उद्धवजीके 
साथ उन दोनों भाहयेनि भी उन्हे नमस्कार किया | 
जव सव लोग आरामसे आसर्नोपर वैट गये, तद अक्रूरजी 
उन लोर्गोकी विधिवत्‌ पूजा करने ल्गे॥ १४॥ 
परीक्षित्‌ । उन्होने पहकठे मगत्रान्‌के चरण घ्रोकर्‌ चरणो- 
दक स्िरपर धारण किया ओर फिर अनेकों प्रकारकी 
पूजा-सामग्री, दिव्य व्ल, गन्ध, माता भोर श्रेष्ठ आमूषरणो- 
से उनका पूजन क्रिया, सिर छकाकर उन्हं प्रणाम 
किया ओर उनके चरणोंको अपनी गोदमें ठेकर दवाने 
लगे । उसी समय उन्ोने त्रिनयावनत होकर भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण ओर वञ्रामजीसे कहा--॥ १५-१६॥ 
भगवन्‌ | यह बडे ही आनन्द ओर सौभाग्यकी वात 
है कि पापी कंस अपने अनुयावियके साथ मारा गया । 
उसे मारकर आप दोनेनि यदुवंशको बहत बड़े संकटसे 
वचा छा है तथा उनत ओर समृद्ध किया दै ॥१७॥ 
आप दोनों जगत्‌के कारण ओर जगतरूप, आदिपुर्ष 
है | अपिक्रे अतिरिक्तं ओर कोई वस्तु नीं है, न 
कारण ओर न तो काय ॥ १८ ॥ परम्मन्‌ | आपने 
ही अपनी शक्तिसे इसकी रचना की है ओर अप दी 
अपनी कार, माया आदि शक्तियोंसे इस प्रविश होकर 
जितनी भी वस्तुर्य देखी ओर घुनी जाती है, उनके 
हपमे प्रतीत ह्यो रे है ॥ १९ ॥ जसे परथ्बी भादि 
करारणतच्ोसे ही उनके काय स्थावर-जङ्गम शरीर बनते 


है; वे उनमें अनुपरवि्ट-से होकर अनेक ख्यमे प्रतीत 











[ अ० १८ 


क क 10; 1. || 


र 
( 
ई 


कि, 


अ० ४८ | दश्षम स्कन्धं ५२९ 


एवं भवस्‌ केवर आ्मयोरि- 





















है तो केवल आप ह्वी, परंतु अपने कायंख्य 
जगते स्वेच्छसे अनेक रूपम प्रतीत होते है | यह 
भी आपकी एक ठीगहीदहै॥ २० ॥ प्रमो ! आप 
रजोगुण, सत्वगुण ओर तमोगुणखूप अपनी शाक्तिर्योसे 
क्रमशः जगत्‌की रचना, पाग्न ओर संहार करते ह; 
तु आप उन गुणोंसे अथवा उनके द्वारा होनेवाठे 
कर्मोसि बन्धनमें नीं पड़ते, क्योकि आप जद ज्ञान 
सखरूप हँ । देष सितिमें आपके ल्ि बन्धनक्रा क।रण 
दी क्या हो सकता है १॥ २१॥ ग्रमो } खयं आत्म- 
वस्तुमे स्थूकदेह, प्मदेह आदि उपाधियाँ न होनेके 
कारण न तो उसमें जन्ममृत्यु है ओर न किसी प्रकारका 
भेदभाव । यही कारण है कि न आपमें बन्धन है ओर 
न मोश्च | आपर्मे अपने-अपने अमिप्रायके अनुसार 
नन्धन या मोक्की जो कुर कल्पना होती है, उसका 
कारण केवर हमारा अक्रिवेक ही है | २२ ॥ आपने 
जगत्‌के कल्याणक ल्य यह सनातन वेदमागं प्रकट 
किया है | जव-जव इसे पाखण्ड-पथसे चल्नेवाठे दुर 
के द्वारा क्षति पर्डचती है, तत्र-तब आप शुद्ध स॒त्वमय 
रारीर ग्रहण करते हैँ ॥ २३ ॥ भ्रमो ! वदह्वी भाप इस 
समय अपने अद्य श्रीनरामजीके स्गध पृथ्वीका भार 
दूर करनेके च्य यरा वञुदेवजीके धर अवतीणे इए 
ह । आप अपुरोके अंशसे उत्पन्न नामम्रकरे चासर्कोकी 
सौ-सौ अश्षोदिणी सेनाका संहार करेगे. ओर यदुवंशके 


ष्वात्माऽऽत्मतन्त्रो बहधा विभाति ॥२०॥ 
सजसयथो छम्पक्षि पाक्षि विच्छ 
रजस्तमःस्वगुणेः खदशक्तिभिः 


न॒ बध्यसे तद्गुणकर्भभिवा 

इ्ानात्मनस्ते क्र चं बन्धहेतुः ।।२१। 
देदाद्युपाधेरनिरूपितत्वाद्‌ 

भदो न साक्षान्न भिदाऽऽत्मनः खात्‌ । 
अतो न बन्धस्तव नेव मोक्षः 

स्यातां निकामस्त्वयि नोऽविवेकः । २२) 
त्वयोदितोऽयं जगती हिङाय 

यदा यदा वेदथः पुराणः। 
वध्येत पाखण्डपथेरखद्धि- 

स्तदा मत्रान्‌ सचखथुणं शिभति ॥२३॥ 
स॒ त्वं प्रभोऽ बसुदेवगृदेऽचतीर्णः 

खांशेन भारमपनेतुमि्सि धूमेः 
अक्षोहिणीशतवधेन सुरेतशंशच- 

राज्ञामेशयु्य च इलस्य यज्ञो वितन्वन्‌।।२४॥ 


सारे देवना, पितर, भूतगण ओर राजा आपकी मूतिं 


अद्येश नो वक्षतयः ख भूरिभागा 
यः सवंदेवपिव॒भूतनृदेवमूरतिः । 

यत्पादशौ सलिलं त्रिजगत्‌ पुनाति 
स॒ त्वं जगद्गुरूधोश्वज याः प्रविष्ट\॥।२५॥ 

कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयाद्‌ 
भक्त्रियादतमिरः सुद्दः इत्‌ 


होते ह, परंतु वास्तवर्मे त्रे कारणरूप हयी है | इसी 


यरका विस्तार करेगे ॥ २४ ॥ इन्द्ियातीत परमात्मन्‌ । 


है । आपके चर्णोंकी धोवन गङ्गाजी तीनों गेकेको 
पवित्र करतो दँ । आप सारे जगत्के एकमान्न पिता 
ओर शिक्षक हँ । वदी आज आप हमारे घ्र पधारे । ` र 
इसमें सदेह नहीं कि आज हमारे ध्र धन्य-घन्य शो 
गये । उनके सौमाग्यकी सीमा न रदी ॥ २५॥ प्रमो। ` 
आप प्रेमी मक्तौके परम प्रियतम, सत्यवक्ता, अकारण _ ` 













॥; 














४३० श्रीमद्भागवतं | अ० ४८ 
स्वान्‌ ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा- भजन करनेवाटे व्रेभी मक्तकी समस्त अभिलाषा पणर. 


कर देते हँ | य्हातक कि जिसकी कमी क्षति ओर 

नात्मानमप्युषदयापचयों न यख ॥२६॥ ¦ इद्धि नदीं होती--जो एकरस हे, अपने उस आतमाका . 

भीआप दान कर देतेदहैँ॥ २६॥ मक्तवे क्ष. 
मिटानेवाे ओर जन्म-मरतयुके वन्धनसे चछुडनेवाठे 
प्रभो | बड-वड़े योगिराज ओर देवराज भी आपके 
सखरूपको नहीं जान सकते । परंतु हरमे आपका साक्षात्‌ 
दशन हयो गया, यह कितने सौमाग्यकी बात है । प्रमो ! 
क हम सखी; पुत्र; धन, खलजनः, गेह ओर देह आदिक 
छिन्ष्याजु नः सुतकरत्रधनाप्तगेद- मोहकी रस्सीसे वरे इए हैँ । अवश्य ही यह आपकी 
मायाका खेल है | आप्र कृपा करके इस गाढे बन्धनको 


दहादिभोदर्शनां भवदीयमायाम्‌ ॥२७॥ | सत्र काट दीजियः ॥ २७ ॥ 


दिष्टया जनादन भवानिह नः प्रतीतो 


योगेश्वरैरपि दुरापगतिः सुरेशः । 





श्रीद्युक उवाच | श्रीड्यकदेवजी कते दै परीक्षित्‌ ! इस प्रकार 

व. ध भक्त अक्रूर जीने भगवान्‌ श्रीकरष्णकी पूजा ओर स्तुति 
इत्यचितः संस्तुत भक्तन भगवान्‌ हरिः । की । इसके बाद भगवान्‌ श्रीकृष्णने सुसकराकर अपनी 
अक्रूरं ससितं प्राह गीभिः सम्मोदयनिव ॥२८ । | मधुर गणीसे न्दं मानो मोहित करते हए कदय ॥२८॥ 
श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीरृष्णने कहा-*तात ! आप हमारे 


४ } गुरु--दितोपदेशक ओर चाचा है । हमारे वंशम अव्यन्त 
तवं नो गुरुः पिदन्यश श्लाध्यो बन्धु नित्यदा । प्ररासतनीय तथा हमारे सदाके हितैषी है । हम तो आपके 

< ६ बालक ह ओर सदा दी भापकी रक्षा, पारन ओर्‌ कृपाके 
बयं तुरक्ष्याःपोष्याशच अलुकस्प्याः प्रजा हि वः॥।२९॥ | पातर है ॥ २९॥ अपना परम कल्याण चाहनेवारे मलयो 
को आप-जेसे परम पूजनीय शौर महामाग्यवान्‌ सरतोकी 
सवदा सेवा करनी चाहिये । आप-जेसे संत देवताभोसे 
भी बढ़कर है; क्योकि देवताओमें तो खार्थं रहता दै, 
भरेयस्कामै्॑भिनित्यं देवाः खार्था न साधवः ॥२०॥ | परत संतोमिं नक्ष ॥ ३० ॥ केवर जच्के तीर्थं ( नदी, 
सरोवर आदि ) हो तीथं नह्ये है, केवट मृत्तिका ओर 
हिका आदिकी बनी इई मूतियां ही देवता. नही है | 
चाचाजी | उनकी तो बहुत दिनतक श्रद्धासे सेवा की 
जाय, तन वे पवित्र करते है । पठतु स्ततपुरुष तो 
अपने दर्नमात्रसे पवित्र कर देते हँ ॥ २१ ॥ चाचाजी। 


स भवान्‌ सदा वे नः भ्रेयाञ्छेयथिकीषेया | आप हमारे हितैषी ददम सवश्रष्ठ ह । इसय्यि आप 
पाण्डवोका हित करनेके व्यि तथा उनका कुशाछ-मङ्ग 


जिनज्ञासाथं पाण्डवानां गच्छ सं गजाहयम्‌।३२॥ | जाननेके ण्मि हस्तिनापुर जह्य ॥ २२ ॥ हमने देश | 
भः सुना है कि राजा पाण्डवे मर जानेपर अपनी माता ९ 


ऊनतीके साय सुभि आदि पाण्डव बड़े दुःखे प 










भवद्विधा महाभागा निषेव्या असत्तमाः 


नद्यम्मयानि तीथानिन देवा मृच्छिलामयाः 





ते पुनन्त्युर्काठेन दशंनादेव साधवः ॥२१॥ 





> क # क `. 1 "वि 1 क 
क =) क ही च कै तय) 












, पितथपरते बालाः सह मात्रा सुदुःखिताः 








{ + ^ ^ ~द* "भभ न 


अ० ४९ | 


दश्चम्‌ स्कन्ध 


०२१ 








ऋ ककः ज ऋ कि ऋः ति वो ऋ को कि ऋ क 


आनीताः खपुरं राज्ञा वक्षन्त इति शुश्चुम ॥२३॥ | गये ये । अव राजा धृतराष्ट्र वे अपनी राजधानी 


तेषु राजाम्बिकापुत्रो ाव्रपुतरेषु दीनधीः । 
समो न वतते नलं दुष्पत्रवशमोऽन्धद्‌ ।३४॥ 
गच्छ जानीहि तद्व्रत्तमधुना साध्वसाधु वा । 
विज्ञाय तद्‌ विधाखखामो यथा शं सदृदां भवेत्‌॥।३५ 


इत्यक्ररं समाम भगवान्‌ हरिरीश्वरः । 


हस्तिनापुरमे ठे आये हैँ ओर वे बरही रहते हँ |॥२२॥ 
आप जानतेदीदैँ किं राजा ध्रृतराष्टर एक तो अचे है 
ओर दूसरे उनमें मनोबटकी भी कमी है । उनका पुत्र 
दुर्योधन बहुत दुष्ट है ओर उसके अधीन होनेके कारण 
वे पाण्डर्बोके साथ अपने पुर्रो-जेसा--समान व्यवहार 
नही कर पाते 1 ३४ ॥ इसय्यि आप ब्रहम जाये ओर 
माटूम कीजिये कि उनकी स्थिति अच्छीदहै या बुरी 
आपके द्वारा उनका समाचार जानकर यँ पेस्रा उपाय कख्गा, 
जिससे उन खुदो को सुख मिटे ॥३५॥ सर्वैशक्तिमान्‌ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण अक्रूर जीको इस प्रकार आदा देकर 
बटरामजी ओर उद्धवजीके साथ वहसे अपने धर 


सङ्कर्पणोद्धबाम्यां वै ततः स्वभवनं यथो ॥३६॥ । गट भये ॥ ३६ ॥ 





इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहि तायां दामस्वंन्वे पूर्वे 
अष्टचत्वारिशोऽध्यायः ॥१९८ ॥ 
- 


अथेकोनप्लारा 


तमोऽध्यायः 


अक्रूरजीका हस्तिनापुर जाना 


श्री्चुक उवाच 
स गत्वा हास्तिनपुरं पौरवेन्द्रयश्नोऽङ्कितम्‌ । 
ददशं तत्राम्बिकेयं सभीष्मं विदुरं पथाम्‌ ॥ १॥ 
सहपुत्रं च बाह्ीकं भारद्वाजं सगोतमम्‌ । 
कणं सुयोधनं द्रौणि पाण्डवान्‌ सुहृदोऽपरान्‌ ॥ २॥ 
यथाबदुपसंमम्ध अन्धुभिगोन्दिनीसुतः । 


सम्पृष्टस्तेः सुहृढात स्वयं चापृच्छद व्ययम्‌ । ३ ॥ 


उवास कतिचिन्मासान्‌ राज्ञो शृ्विवित्सया । 


 दष््रजश्वारपसंरसख खरच्छन्दनुबतिन; 1 ४॥ 





0 ० 
धि नि * 
पक ॥ स. 
५ हज । त 
= भक चष 


श्रीड्कदेवजी कहते है--परीश्षित्‌ | भगवानूके 
आङ्ञानुसार अकरूरजी हस्तिनापुर गये । वह्णौकी एक-एक 
वस्तुपर पुरूवंश्ची नरपतिर्योकी अमरकीतिंकी छप चग 
रही है । वे वह पहले धृतराष्टः भीष्म, विदुर, कुन्ती; 
बाहीक ओर उनके पुत्र सोमदत्त, द्रोणाचाये, कृपाचार्य, 
कण, दुर्योधन, श्रोणपुत्र अश्वत्थामा, युधिष्ठिर आदि पौरचोँ 
पाण्डव तथा अन्यान्य इष्ट-मित्रंसे भिठे ॥ १-२ ॥ जब 
गान्दिनीनन्दन अ्रूरजी सब इष्टमित्र ओर सम्बन्धि्योसे 
मलीर्भाति मिक चुके, तब उनसे उन छेोगोने अपने 
मथुरावासी खजन-सम्बन्धिर्योकी कुशाल-कषेम प्री । उनका 


उत्तर देकर अक्रूरजीने भी इस्तिनापुरवासियकि कुरा ` । । ^ 


मङ्गरुके सम्बन्धे पूछताछ की ॥ ३ ॥ परीक्षित्‌ । अक्ररजी 
यह जाननेके ज्य कि, धृतराष् पाण्डवोँके साथ कौसा 
व्यवहार करते है, कुछ महीनोतक बँ रहे । सच पूछ 
तो धृतराषटम अपने दुष्ट पुत्रोकी इ्शके विपरीत कुछ 
भी करनेका साहस न था । वे शकुनि आदिं दुर्धोकी 


सलाहके अनुसार ष्टी काम क्ते ये ॥९।॥ 
९. न्धेऽष्टच ० । २. बाद्रायणिरूवाच । ३, वीर्यस्य । 








-9 8 १ 
# 





४३२ भीमद्धागवत [ अ० ४ 











तेन ओजो बलं वीयं अश्रयादीं सदगुणान्‌! ` शनूरजीको इन्ती ओर विदुरने यह बताया कि धृतरष्टके 
ल्ड्के दुर्योधन आदि पाण्डवोके प्रभाव, शज्रकोशल, बक, ` 
ग्रजाचरागं पाथषु न सहद्धिधिकी पितम्‌ ॥ ८५|| वीरता तथा विनय आदि सद्‌ गुण देख-देखकर उनसे जते 
३ रहते है | जब वे यह देवते हैं किं प्रजा पाण्डे 
' ही विशेष प्रेम रखती है, तत्र तो वे ओर भी चिद जाते 
| है ओर पाण्ड्वोका अनिष्ट करनेपर उतार हो जति है । 
। अव्रतक्र दुयोधन आदि धृतरा पुत्रोने पाण्डर्वोपर्‌ कईं 
वार वरिषदान आदि ब्ह्रत-से अल्याचार श्रिये हैँ ओर 

| आगे मी बहत कुछ करना चाक्षते हें | ५-६ ॥ 
जवर अ्रूरजी कुन्तीके घर आये, तव वह अपने 
भाईके पास जा वैटी । अक्ररजीको देखकर कुन्तीके मने 
अपने मायकेकी स्प्रति जग गयी ओर नेत्रम अपु भर्‌ 
| आये । उन्दने कहा--॥ ७ ॥ '्यारे माई ! क्या कमी 
। मेरे मो.वाप, माद््वहिन, मतीजे, कुल्की च्ि्याँ ओर 
। सखी-सहैच्ो मेरी याद करती हैँ १॥ ८ ॥ मैने सुनाहै 
| कि हमरे भतीजे भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर कमकनयन 
भगिन्यो भ्रादपत्रा्च जामयः सख्य एव च।। ८ ॥ | बलराम बड़ दी भजवत् ओर शारणागतरक्षकर है । 


< ¢ । क्या वे कभी अपने इन फुफेरे माइ्यांको भी याद्‌ करते 
आत्रे यो भगवान्‌ कृष्णः रण्यो भक्तवततरः। | & ९।९॥ त रत्नजकि बीच विरकर शोकाकुक हो रही ई। 
मेरी वद्ी दशा है, जेसे कोई हरिनी मेडियकि बीच 

पतृष्सेयान्‌ सरति रामशवाम्बुशुदेश्षणः ॥ ९ ॥ पड़ गयी हो । मेरे वन्वे विना वापके हो गये ह । क्या 
। हमारे श्रीकृष्ण कभी यहो आकर मुञ्चको ओर इन अनाय 

सापलमध्ये शोचन्तीं काणां हरिणीमिव । । बाल्वोको सान्तना देगे १ ॥ १० ॥ (श्रकृष्णको अपरे 
| सामने समञ्चकर कुन्ती कहने ल्गी - ¬) .सचिदानन्द खूप 

सान्त्वयिष्यति मां वाक्येःपितृहीनांश बलकान्‌।१०॥ श्रीकृष्ण ! तुम महायोगो हो, विश्वासा ह्यो ओर तुम सारे 
> विश्वके जीवनदाता हो । गोविन्द ! अपने बचचोके साय 
कृष्ण ङ्ष्णमहायो्िन्‌ विश्ात्मन्‌ विश्वभावन । | दःखपस्दुःख मोग रही द्रं । वम्डारी शरणमे आयी द| 
$ थ मेरी रक्षा करो । मेरे वर्चोको बचाओ ॥ ११॥ मेरे 
प्रपन्नां पाहि गोबिन्द शिद्यभिश्वावसीदतीम्‌। ११॥ | श्रीकृष्ण । यह संसार मृव्युमय है ओर तुम्हारे चरण 
वीक्ष देनेवाले हैँ । मैं देखती द्र कि जो ोग इस संशर्‌- 
 नान्यत्तव पदाम्भोात्‌ पश्यामि शरणं नृणाम्‌। | से डरे इए है, उनके व्यि तुम्हारे चरणकमर्लोके अतिरिक्त 


| ओर को शरण ओर कोई सहारा नदी है ॥ १२॥ । 
‡ मृत्युसं्ारादीश्वरस्यापवमिकात्‌ ॥१२॥ नण । तुम मायके लेशे रदित परम जद हो 1 । 


[ © च 0 
करत च धातराष्टयंद्‌ गरदानाद्पेश्चलम्‌ । 
आचख्यो सवंमेव।स्मे प्रथा विदुर एव च ॥ ६ ॥ 


ए्था तु भ्रातरं प्रापषमक्रर्ुपल्युत्य तम्‌ । 


क ज 


उवाच जन्मनिर्यं खरन्त्यश्चुकलेक्षणा ॥ ७॥ 


अपि सरन्ति नः सौम्य पितरो आतरश्च मे। 





















"" व 
र < (9. = = 4 ^ च्म धे 
५ त । 


ध. मः ष्णाय शुद्धाय जदाणे परमात्मने । 


तुम सख्यं परब्रह्म परमाता हो । समस्त साधनो, ` 









| + । ४ १ उ क्र 9 ॐ त ४4 
क र "रः 2, च+ न ~ नि कै ~ ( [5 ॥ | +र १ १. ग 86 । 81 3 श 
# ॐ ५ ।*4 ग च । ६९ न - १. ^ ।/ -4 ¢. ~ 2 ^ । 
^ "ज 4 पि त्‌ ४. ॐ १ । > प च 


~ क,» 
र । 





4) क, | ज्ये ४ -: न 
^^ (> ~ । इ `. = 4 ९८ (प ‡ चः ॥ 
# ॥, 5 कि) ह: य 
~. 
द्ध 9 


9 र दकः चकः # ॐ ~ 
ह 
१. धि 





| = । अ० ४९ | 


योगेश्वराय योगाय त्वामहं श्चरणं गता ॥१३॥। 


श्रीद्युक उवाच 
इर्ययुस्मृत्य खजन कृष्णं च जगदीश्वरम्‌ । 
प्रारुदद्‌ दुःखिता राजन्‌ भवतां प्रपितामही ॥१४। 
समदुःखसुखोऽक्रूरे विदूरथ महायशाः । 
सान्त्वयामासतुः न्तीं तत्पुत्रोत्पत्तिेतुभिः ॥१५॥। 
याखन्‌ राजानमभ्येस्य विषमं पुत्रलारसम्‌ । 


अवदत्‌ सुहृदां मध्ये बन्धुभिः घौहृदोदितम्‌ ॥१६॥ 
अकर्‌ उवाच ४ 


भो भो वेचित्रवीयं तवं इषूणां कीर्तिवर्धन । 


०००००००० 


श्रातयुंपरते पाण्डावधुनाऽऽसनमास्यितः ॥१७॥ 
धर्मण पालयन्नुवी प्रजाः शीङेन रञ्जयन्‌ । 


वतमानः समः स्वेषु श्रेयः कीतिंमवप्खसि ॥१८॥ 


अन्यथा त्वाचरष्ोके गदितो यास्यसे तमः । 


व, ४ 
१,३११.4 







` नेह चात्यन्वसंबासः करदिचित्‌ केनचित्‌ सह 


~ कि १. २. 





द्श्चम्‌ स्कन्ध 


| निन्दा होगी ओर मरनेके बाद व । 


। समानताका वर्ता कीजिये || १९ ॥ आप जानते दी 





# च, न मी ---% ~ ज 


| नहं रह सकता । जिनसे जडे 


योगों ओर उपायोकि खामी हो तया खयं योग र्भ 
श्रीकृष्ण | मे तुम्हारी शरणमे आयी दँ | तुम मेरी रक्षा 
करो ॥ १२॥ 


श्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! तुम्हारी पर- क 


दादी कुन्ती इस प्रकार अपने सगे-सम्बन्धियों ओर अन्तमे 
जगदीश्चर भगवान्‌ श्रीकृष्णको स्मरण करके अच्यन्त 

खित ह्यो गयी ओर फफक-फफककर रोने चमी ॥१४॥ 
अकरूरजी ओर विदुरजी दोनों ही घुख ओर दुःखको 
समान दष्टिसे देखते थे । दोनों यङष्वी महात्माओनि 
कुन्तीको उसके पुत्रोके जन्मदाता धम, वायु अदिं 
देवतार्ओकी याद्‌ दिलायी ओर यह कहकर किं तुम्हारे 
पुत्र अधमका नादा करनेके व्व ही पैदा इए है, बहत 
कुछ समक्ञाया-वुञ्ञाया ओर सान्त्वना दी ॥ १५ अ्रूरजी 
जवर मथुरा जाने लगे, तन राजा धृतराष््के पास आये । 
अवतक यह्‌ स्पष्ट हो गया था कि राजा अपने पुत्रका 


पक्षपात करते हैँ ओर भतीजेके साथ अपने पुत्रोका-सा ` 


बताव नहीं करते | अव अक्रूरजीने कौखोंकी भरी समामे 


श्रीकृष्ण ओर बलरामजी आदिका हितैषितासे भरा सदेश ` ` 


कह सुनाया ॥ १६ ॥ 
अक्रूरजीने कहा- महाराज धृतराष्टजी ! आप 


कुरुवंशिर्योकी उज्ज्वल कीर्तिको ओर .भी बदादये। 


आपको यह काम विरोषरूपसे इसल्यि भी करना चाहिये 


किं अपने भाई पाण्डुके परलोक सिधार जनेपर अब 
आप्र राज्यसिंहासनके अधिकारी इए है ॥ १७ ॥ प ^ 
धरमसे प्ध्वीका पालन कीजिये । अपने सद्वबवहारसे 
प्रजाको प्रसन्नं रखिये ओर अपने खजनेकि साथ समान 
बरताव कीजिये । एसा करनेसे ही आपको लोके यश < 


ओर परलोके सद्गति प्राप्त होगी ॥ १८ ॥ यदिः 
इसे विपरीत आचरण करेगे तो इस लोकम आपकी 


। इतक्यि अपने पुत्रो ओर पाण्डवोके २ 


। ९114 


९५१. 2 


हँ किं इस संसारे कमी कदं को 


थ 





च । 3 
~क कृषिः क 
ज ऋष्य" 
५ च १ 
कू ' 
हो ध | त ५ | क 





















| ४३४ भीमद्धागवत [ अ० त 
राजन्‌ स्वेनापि देहेन किय जायात्मजादिभिः ॥२०। बिद्कुना पड़ेगा ही । राजन्‌ | यह नात अपने शरीरके 
व्यि भी सोहं आने सत्य है । फिर द्वी, पुत्र, धन 
¦ श्रयते जन्तुरेक एक प्रलीयते । आदि छोडकर जाना पड़ेगा, इसके विषयमे तो कहनां | 
दी क्याहै॥२०॥ जीव अकेठा ही पैदाहोताहै 
ओर अकेला ही मरकर्‌ जाता है । अपनी करनी-धरनी- 
काः पापपुण्यका फल भी अकरा ही मुगतता है ॥२१॥ ` 
जिन सखी-पुर््रोको हम अपना समञ्लते है, वे तो इम 
अधमेपिचितं धित्तं हरन्त्यन्येऽल्पमेधसः | तुम्हारे अपने हैँ, हमारा भरण-पोपण करना तम्हारा धमं 
है" इस प्रकारकी वाते वनाकर मूर प्राणीके अधर्भसे 
सम्भोजनीयापदैरेजंलानीव जरौ कषः ॥२२॥ | इक किय इष धनको दट ठते है, जसे जदमे रहने 
वाले जन्तुओंके सव जल्को उन्हीवे सम्बन्धी चाट 
जाते हैँ ॥ २२ ॥ यह मूख जीव जिन्हे अपना समञ्चकर 
अधमे करके भी पाकता-पोसता है, वे ही प्राण, धन 
ओर पुत्र आदि इस जीवको असंत्॒ट छोडकर ही चठ 
तेऽकृताथ प्रहिण्वम्ति प्राणा रायः सुतादयः ।\२३॥ | जते है ॥ २३॥ जो अपने भर्मसे विसुख है- सच 
प्रिये, तो षह अपना किक ख्ाथं भी नही जानता | 
खयं किर्बिषमादाय वैस्तयक्तो नार्थक्रोविदः । जिनके य्य वहू अधमं करता है, वे तो उसे छोड़ ही 
देगे; उसे कभी संतोषका अनुभव न होगा ओर वह 
् = अपने पार्पोकी गटरी सिरपर चाद कर खयं धोर नरकमे 
असिद्धाथो विरात्यन्धं खधमबि्चुखस्तमः ॥२४॥ | जायगा ॥ २४ ॥ इसलिये महाराज ! यह वात समञ्च 
ठीजिये किं यह दुनिया चार दिनकी चँदनी है; सपने- 
तसाह्ठोकभिमं राजन्‌ खममायामनोरथम्‌ । का विक्वाड़ है, जादृका तमाशा है ओर है मनोराज्य- 
मात्र | आप अपने प्रयत्तसे, अपनी राक्तिसे चित्तवो 
रोकिये; ममतावश्च पक्षपात न कीजिये । आप स्थ 
है, समस्मे सित हो जाये ओर इस संसारकी ओरपे 
उपराम--शान्त हो जाये ॥ २५ ॥ 
राजा ्रृतराषटने कहा--दानपते अक्रूरजी | आप 
मेरे कल्याणकी, भेकी बात कह रहे हैँ | जैसे मरे- 
वाटेको अमृत मिक जाय तो बह उससे तृप्त नही हे 
सकता, वैसे ही मै भी आपकी इन वातोसे तृप्त नहीं । 
हो रहा ह ॥ २६ ॥ फिर भी हमारे हितेषी अक्रूरजी ! 
मेरे चघ्चल चित्तम भापकी यह प्रिय शिक्षा तनिक भी । 
नहीं ठहर रद्य है; क्योकि मेरा हृदय पुत्रोकी ममताके 
कारण अच्यन्त विषम हो गया है । जेसे स्फटिक पवतर 
शिखरपर एक नार विजली कौधती दै ओर दूसरे 8 ^ 


एकोऽनुथद्धे सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्‌ ।!२१॥ 


पुष्णाति यानधमेण खबुद्धया तमपण्डितस्‌ । 


















वीक्ष्यायम्यात्मनाऽऽत्मानं समःशान्तो भव प्रभो। २५) 





धृतराष् उवाच 












[शि च । 
यथा वदति कट्थाणीं वाचं दानपते भवान्‌ । 









| ` तथाः रान दप्यामि म्यः प्राप्य यथारतम्‌ ॥२६॥। 


ॐ. 7 न 
क = 


 अ० ४९] दक्षमं स्छन्धं 









ईश्वरख बिधि को लु विधुनोत्यन्यथा पुमान्‌ । ¦ की है ॥ २७ ॥ अक्रूरजी ! सुना है किं सर्वशक्तिमान्‌ 
मगवरान्‌ प्रष्वीका। भार उतारनेके व्िि यदुकुमे अवतीर्ण 


भूमेभरावताराय योऽवतीो यदोः इरे ।२८॥ | देषा कौन धर्ष है नो ज 
यो दुर्विमर्ध॑पथया निजमाययेदं फेर कर सकं १ उनकी जसी इच्छ होगी, वदी दोगा ॥२८॥ ` 
भगवान्‌की मायाका मागं अचिन्व्य है । उती मायके 
दष्ट गुणान्‌ विभजते तदूवुप्रविष्टः । दास इस संसारक सषि करके वे इसमे श्र करते ह . 
त पिन ओ कमं तथा कमफर्गेका विभाजन कर देते है। इ 
क 11. संसार-चक्रकी वेरोकटोक चालमे उनकी अचिन्त्य लीव- _ 
संसास्चक्रगतये परमेश्वराय ॥२९॥ | रक्िकैः अतिरिक्त ओर कोई कारण नहीं है । मै उन्दी 
परमैश्चयश्ाटी प्रमुको नमस्कार करता टँ ॥ २९ ॥ 
भ्रीयुक उवाच श्रीद्युक्देवजी कते है--इस प्रकार अब्रूरजी 
रियं द्वः | | महाराज धतरा अभिप्राय जानकर ओर कुस्वं्ी खजन- 
क थ्‌ त = सम्बन्धिरयोसे प्रेमपूवेक अनुमति लेकर मथुरा लौट 
४ = । ल, ९० + | 
द्धिः समटज्ञातः पूनर्दषुरीममात्‌ ।। ३० | आय ॥ २० ॥ परीक्षित्‌! उनडन बह भगवान्‌ गरी््ण = । 
ओर वलरामजीके सामने धतराषट्का क्ड सारा व्यत्रहार 
शशंस ॒रामकरष्णाभ्यां श्रतशषटरूबिचेष्टित्‌ | | ताव, जो वे पाण्ड्के साय करते ये, कड नाया; 
क्योकि उनको हस्तिनापुर भेजनेका वास्तवमें उदेदय भी 
पाण्डवान्‌ प्रति कौरव्य यदथ प्रपितः खयम्‌ ॥२१॥ | यही था ॥ २१॥ | 
---*=~>&ई~=~ ~ ज 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयाक्षिक्यामष्टादशाहस्यां पारमहंस्यां संहितायां प 
द्‌ रामस्कन्धे प्त्रे एकोनपच्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ "शी 








षा 


समाप्तमिदं दश्चमस्कृन्धस्य पूरवादध॑म्‌ हः 


त्न कि + ~ = क म 


न ~ र क क र 1 
नरन ग ण ~ "04 भे च न कामकामिनो ् न च 








र 
१4 
१: 
१९ 
् 
र 
¢ 





04 


१९९ श्रीराधाक्रष्णाभ्यां नमः 


श्रीम द्वागवतमहापुराणम्‌ 


दक्षामः स्कन्धः 


( उत्तराद्धः ) 


4 


< 


\- 
© 
(4 


४ 
५ 


--- 


--- 
---~ 


प 


त + र ्- 


१५,..४। 

£ 

~<: ५ 
91: 11; «$ ४ 


1 
| 


७,१.१४ 
ऋ 1 
1 


५, 
जकः 
= १११४3. [ 
\ ~ \ 


4. 








1 = १ * ऋ 
रि ) =, "+ = भ) कि क * $ च> } 8 






8५ 


4 


011, 





न्यः +न 


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ` 


श्रीयद्धानवतपहापुराणम्‌ 


- ~न ड2्-* -- 
द शयः स्छन्च्छ 


( उन्तराद्धः; ) 





अथ पञ्चारात्तमोऽध्यायः 
जससंधसे युद्ध ओर दारकापुरीका निमौण | 
धरी उवाच भ्टयकदेवजी कते है -मरतवंराशिरोमणि परीक्षित्‌। 


अस्तिः प्राचि कं हिष्यौ ९म्‌ । कसकी दो रानिया थी-अस्ति भोर प्राति । पतिकी मृत्यसे 
अस्तिः प्राधषिश्च कंलख भदिष्यौ भरतषभ उद मा दुव इना गैर गनि 


मरते भतंरि दुःखार्तं देतु; स पितुगृदाच्‌ }} १] | चटी गयीं ।॥ १ ॥ उन दोर्नोका पिता था मगधराज ` 5 । 
पित्र जराक्तध । उक्से उन्न बडे. दुःखके साथ अपने 
शृधरा ज १ 0 + 

पित्रे मभधराजाय त दुःलिते । विधवा होनेके कार्णोका वणन किया ॥ २ ॥ परीक्षित्‌ 1 
वेद्थाश्चक्रतुः सवेमात्सबधव्यकारणमू ॥ २ ॥। | यह अग्रिय समाचार सुनकर पहले तो जरासंवको वडा 


| 

| स॒तदष्रियमाकरण्यै जोकामषेयुतो चुप । दोक दुआ; परतु षीके बह श तिलमिक उल । | 
| ९ ; ३\। उसने यह निश्चय करके कि मँ पृथ्वीपर एक भी यदु- 
शा महीं कतु र प । < ॥ | वंशो नहीं रहने दगा, युद्धकी बत बड़ तैयारी की ॥३॥ ` 
अक्षोष्िणीभिर्विशत्या तिस्ुभिथापि संबृतः । जोर ते अक्षौहिणी सेनाके साथ यदुवंशिर्योकी राज- 


[ 


यदुराजधानीं मधुरां न्यरुणत्‌. सवंतोदिशचम्‌ || |} | धानो मथुराको चारों ओरसेघेरच्या॥४9॥ 
निरीक्ष्य तद्बलं ष्ण उद्वेखमिव सागरम्‌ । भगवान्‌ श्रीकृष्णने देखा--जरासंधकी सेना क्या 
| है, उमडता इआ समुद्र है । उन्दने यह भी देखा कि 

उने चारौ ओरसे हमारी राजधानी घेर लीद ओर 
हमारे खजन तथा पुखासी मयभीत हो रहे है ॥ ५॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारनेके व्यि ही मजुष्य- 
का-सा वेध धारण किये इए हैँ । अत्र उन्होने विचार ¦ 
किया कि मेरे अवतारका क्या प्रयोज. +है ओर इस 
| उरि सोचा) यह बड़ा 
जरा्षधने अपने अधीनस्थ नरपतय वा 


त ह किक? 
“नक 









खपुरं तेन संरुद्धं खजनं च भयाङ्लम्‌ ॥ ५॥ 









चिन्तयामास भगवान्‌ हरि; कारणमालुषः । 











| हनिष्यामि बलं हेतद्‌ शुचि भारं समाहितम्‌ । 





मागधेन समानीतं वश्यानां सवेभू्जास्‌ ॥ ७ ॥ 


१ श्रीब्रादरायणिस्वाच । ` 


क अ = क 
॥ विक) ॥ 
क क्‌ चि ह क्‌ ॐ 





> १ 
4 ते, 


~ 


१ ल्क 
† ++ प ॥ क 
ष अ, ऋ ~ 
म > । ४ त "छ 
न नः 
त 4 व # ष 
1 [न क, ॐ ^ ~+ । १ च ! ऋक) 
दि भथ = = > 
् # क = र 

































 ‰४० 
अधौहिणीभिः संख्यातं भटाश्वरथङ्ख्रेः । 
मागधस्त न हन्तव्यो भूयः कता बरोदयमम्‌ ॥ ८ ॥ 
एतदर्थोऽवतारोऽयं भभारहरणाय मे । 
संरक्षणाय साधूनां इतोऽन्येषां बधाय च । ९॥ 


अन्योऽपि धमरक्षाये देहः संभियते मया । 
विरामायाप्यधमंस्य कारे प्रभवतः कचित्‌ ॥१०॥ 


एवं ध्यायति गोविन्द अकाश्चा्‌ ध्यंवच॑सो । 
रथाबुपथिती सद्यः सतो क्षपरिच्छदौ ।११॥ 
| | आयुधानि च दिव्यानि पुराणानि यचच्छया । 
दृषटरा तानि हषीकेशः सङ्कपणमथात्रवीत्‌ ॥१२॥ 
परथायं व्यसनं प्राप यदूनां त्वावतां प्रभो । 


एष॒ ते रथ आयातो दपितान्यायुधानि च ॥१३॥ 

यानमाखाय जद्येतद्‌ व्यसनात्‌ खान्‌ सथद्धर । 

। । | एतदथं हि नौ जन्म साधूनामीश्च शरमशृत्‌ ॥१४॥ 

| | | 8 ्योर्व्त्यनीकाल्यं मूमेारमपाडरु। 

। एवं सम्मन्त्य दाशार्हो दितो रथिनौ परात्‌ ॥१५॥ 
मतु; खायुधाव्यी बलेनास्पीयसाऽऽ्ती । 

शंखं विनिर्गत्य हरिदांस्कसारथिः ॥१६॥ 


' न 


ऋ» च | ॥ 
९।९ ९ 


भूत्‌ परसन्यानां 


भमद्धागबत 













7 च 9 भ तक = = 


पास आ पर्चा है । मै इसका नादा करूगा । परतु 
अभी मगधराज जराक्धको नहीं मारना चाहिये; क्योकि 
वह जीवित रहेगा तो फिरसे असुरोकी बहत-सी सेना 
इकटी कर॒ कयेगा ॥ ७-८ ॥ मेरे अवतारका यही 
प्रयोजन है कि में पृथ्वीका बोञ्च हल्का कर दू, साधु- 
सननोँकी रक्षा कर ओर दृ्ट-दजनोँका संहार ॥ ९ ॥ 
समय-समयपर धर्म-रक्षाके व्यि ओर वदते इए अधमको 
रोकनेके च्वि मै ओर भी अनेकों इारीर ग्रहण करता 
द्रै॥ १०॥ 


परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण इस प्रकार विचार कर 

ही रहे थे कि आकाशसे सयके समान चमकते इए दो 

रथ आ प्ैचे | उनमें युद्धकी सारी सामग्रियों सुसनित 

थीं ओर दो सादथी उन्हें हक रदहेथे॥ ११॥ इसी 

समय भगवान्‌के दिन्य ओर सनातन आयुध भी अपने- 

आप वहं आकर उपस्ित हो गये । उन्हें देखकर भगवान्‌ 

श्रीकृष्णने अपने बडे भाई वलरामजीसे कहा--॥ १२॥ 

८माईजी ! आप वड़े राक्तिराटी हं | इक्त स्मयनजो 

यदुवंज्षी आपको दही अपना खाभी ओर रक्षक मानते 

है, जो आपसे ही सनाथ है, उनपर बट्रत बड़ी विपत्ति 

आ पड़ी है | देखिये, यह आपका रथ है ओर आपके 

प्यारे आयुध हल.मूषक भी आ पहंचे हँ ॥ १३॥ 

अब आप इस्त रथपर सवार होकर शत्रु-सेनाका संहार 

कीजिये ओर अपने खज्नोको इस विपत्तिसे बचाइये । 
भगवन्‌ ! साधुओंका कल्याण करनेके व्ि ही हम 
दोनोने अवतार प्रहण किय है ॥ १४ ॥ अतः अब 
आप यह्‌ तेईस अक्षौहिणी सेना, प्रध्वीका यह विपुल 
भार नष्ट कीजिये । भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वर्रामजीने 
यह सलाह करके कवच धारण किये ओर रथपर सवार 
होकर वे मथुरासे निकञे । उस समय दोनों माई अपने- 
अपने आयुध व्यि इए ये ओर छोटी-सी सेना उनके 


साथ-साथ चल रही थी । श्रीकृष्णका रथ हाक रहा 


था दारक । पुरीसे बाहर निकर्कर उन्होने अपना 
पाञ्चजन्य शङ्क बजाया ॥ १५-१६ ॥ उनके राङ्खकी 
भयंकर ध्वनिं सुनकर शछपक्षकी सेनाके वीर्योका हदय 


हदि उन्दे देखकर मगधराज जरासन्ध- 
दि वित्रासवेषथुः। + मारे थरा उठा । 


कु ३ वि 
+ {0 १ क). 
न श न्न ~ = 
# ने + [न 


[ अ० ५०. 


ज 
$~ 





अ० ५० | 








तावाह मागधो वीक्ष्य हे छृष्ण पुरुषाधम्‌ ॥१७॥ । 


न सया योद्धुमिच्छामि बालेनेकेन लजया । 
गुरेन हि स्वया मन्द्‌ न योत्स्ये याहि बन्धुदन्‌ ॥१८॥ 
तव राम यदि श्रद्धा युध्य भैमुद्रह। 
हित्वा वा सच्छरेशरिछन्नं देहं खयाहि मां जहि ॥१९॥। 
श्रीभगवानुवाच 
न वे शूरा विकत्थन्ते दञ्ैयन्त्येव पौरपम्‌ । 
न गृह्णीमो वचो राजन्नातुरख्य शुमूषेतः ।२०॥ 
श्रीद्युक उवाच 
जरायुतस्ताप्रभिघत्य माधवौ 
महाबलोषेन बरीयसाऽऽब्रणोत्‌ । 
ससेन्ययानध्वरजवाजिक्षारथी 
घूयानलो वायुखिभ्ररेणभिः 
सुपणं तालष्वजचिहितो रभा- 
वलक्षयन्त्यो हरिरामयोधे 
सयः पुराड्ालकहर्थगोपुरं 
समाश्रिताः संहः शचीदिताः 


२९१॥। 


ॐ 44. 


।॥२२॥ 





हरि; परानीकपयोगुचां यदुः 


शिरीश्चखात्युखणवषंपीडितम्‌ । 
सखपेन्यमालोक्य सुराष्ुराचितं 


 उ्यस्फृजयच्छा्गंशरापनोत्तमम्‌ ॥२३। 


१. नचार्पिताः 1/4 


{अ - न य 


भा० सण खं० 2. ५६-- 





द्ञ्चम्‌ स्कन्ध 


१ = । 
= र ह २ # 
=". 


ऋ [+ ब 
॥ 1, ` अ 4२ 
(३ १] 





न ति 
५ 
ठ 
४, 
# 
~ 


ने कहा-- (पुरुषाधम कृष्ण | तुतो भमी निरावच्रा 
है । भकेले तेरे साय व्डनेमे मुञ्चे खज व्ण खी है| 
इतने दिर्नोतक तू न जने कर्हो-करा छिपा फिरता था। 
मन्द | तू तो अपने मामाका दहत्यारा है । इसय्ये 
मे तेरे साथ नहली लड सकता । जा, मेरे सामनेसे भाग 
जा ॥ १७-१८ ॥ वच्यभ | यदि तेरे चित्तम यह 
श्रद्धादहो किं युद्धमे मरनेपर खग मिक्ता दहैतोत्‌ 


+ ` 


आ हिम्मत बँधकर सुञ्चमे ड । मेरे वाणेसि छिन-मिन्न 
| हए शरीरको यदहो छोडकर खर्गमे जा अथवा यदि 


तुञ्चमें र्ति हो तोसुस्ने दी मार डः |॥ १९ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णे कहा--मगधराज } जो डाखीर 


| होते दँ, वे तुम्हारी तरह डी नह हकते, वे तो अपना 


| वल-पौरुष ही दिखते हैँ । देखो, अव तुम्हारी गृ्यु 
तुम्हारे सिरपर नाच रदी है | त॒म वैसे ही अक्त्रक कर 
रहे हो, जैसे मरनेके समय कोई संनिपातका रोगी करे । 
वक्र छो, मेँ तुम्हारी बातपर व्यान नहीं देता ॥ २० ॥ 
श्रीट्युकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! जैसे वायु 
बादलसे सयको ओर धूर्प॑से आगको ठक ठेती हे, 
कितु वास्तवमें वे ठकते नहीं, उनका प्रकारा फिर 
पौक्ता ही है; वैसे ही मगधराज जरासन्धने भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण ओर बलरामके सामने आकर अपनी बहत बड़ी 
वख्वान्‌ ओर अपार सेनके द्वारा उन्दै चारो ओरसे 
घेर व्या-- यर्होतक कि उनकी सेना, रथ, ध्वजा, घोड़ों 
ओर सारथिर्योकः। दीखना भी बद हो गया ॥२.१॥ मथुरापुरी- 
की र्या अपने महर््येकी अटासियों, छ्जों ओर फाटकोपर 
चकर युद्धका कौतुक देख रही थीं । जब उन्होने देखा 
कि युद्धभूमिमे मवान्‌ श्रीङ्ृष्णकी गरुडचिहसे चिहिन ओर 
वर्रामजीकी ताटचिहसे चिहिंत ध्वजावाठे थ नहीं दीख 
रहे हे, तव वे शोकके अवेगसे मूच्छित हो गयीं ॥२२॥ 
जव भगवान्‌ श्रीकृष्णने देखा किं शाघरु-सेनाके वीर हमारी 
सेनापर इस प्रकार बाणोकी वषा कररहे दें, मानो 
बादर पानीकी अनगिनत वृंदे बरसा रहे हां ओर. 
हमारी सेना उससे भव्यन्त पीड़ित, व्यथित ह्यो रही है 
तब उन्होने अपने देवता नौर अघर 
सम्मानित शाङ्गसुषका टकार का 


~ <ये क च यं ् 
न चण ९ ०५ ॐ 4 + 








कः 



















२२ ॥ 
` 



















ष्क # ह ॥ वि क. ॥ „न [र ध र [; „च # 7 
॥ च ॥ व, = ' 1. व 


~ 


1 
४ < 


{त - अ 
2 ॐ. न 


॥ +" ४ कि 9 । ४ १ - क 
ह १ कषः ॥ 












































[२ भीमद्धागवत [ अ० ५७ । | 
गृह्णन्‌ निष्ङ्गादथ संदधच्छरान्‌ इसके बाद वे तरकसमेसे बाण निकाठने, उन्दं धुष्‌ = 
विष्य भुश्वन्छितबाणपूगान्‌ । चदाने ओर धनुकी डोरी खींचकर द्ुड-के-ह्युड बाण = 
छोड़ने कगे | उस समय उनका वह्‌ धनुष इतनी फुतीसि धुम 
निघन्‌ रथान्‌ इल्ञरवाजिपत्तन्‌ रहा था, मानो कोई बड़े वेगसे अटातचक्र (क्कारी)षुग ` 
निरन्तरं यद्वद्‌ सातचक्रम्‌ ।२७॥! | रया हो । इस प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्ण जरातन्धकी 
निर्भिन ४ चतुरद्धिणी-- हाथी, घोडे, रथ भौर पेदल सेनाका 
ङम्भाः केरिणो निपितु- संहार करने खगे ॥ २४ ॥ इसे बह्रत-से हाधिर्याके 
रनेफलोऽश्वाः चरघक्म इन्धराः । सिर्‌ फट गये ओर्‌ वे मर-मरकर गिरने ब्गे । वार्णोकी 


वौछारसे अनेकों ओोड़के सिर धडसे अल्ग हो गये | 
घोड़, ध्वजा, सारथि ओर रथियोंके नष्ट हो जानेसे बहुत. 
पदातयर्छखिज्थुजोहकन्धराः | २५५९] से रथ वेकाम हो गये । पैदल सेनाकी बहि, जौँ ओर्‌ 
सिर आदि अङ्गप्रव्यङ्ग कट-कटकर्‌ गिर पड़ं ॥ २५ ॥ 


रथा  ह्ताच्चव्वजब्तनायकाः 


संछिदयमानद्विपदेभवाजिना- उस युद्धे अपार तेजी भगवान्‌ वलरामजीने अपने 
मङ्गप्रषताः शतशोऽदखुगापगाः । मूसव्की चोटसे बेह॒त-से मतवाठे शत्रुओंको मार्‌-मारकर 

| रि उनके अद्ख-प्व्यङ्गसे निकले इए खूलकी सेकडों नदिय 
श्जाहय, पूर्पद्चषकच्छपा बहा दीं | कहीं मनुष्य कट रदे द तो कद्यं हाथी ओर 
हतदिपद्रीपहयग्रदाङकरा $ २६) घोड़े छटपटा रह है | खन्‌ नदिया मनुष्यांकी मुजाए 

& < घ्ौपके पतमान जान पडतीं ओर दविर इस प्रकार माद्ूम 
करोर्मीना नरकेशशेबला पड़ते, मानो कंद्ुर्ओंकी भीड़ ल्ग गयी हयो | मरे हए 
धनुस्तरङ्धायुधगुर्मसङ्कलाः | हाधी द्रीप-जैसे भौर घोड़े ग्राहके समान जान पडते | 

ध हाथ ओर जी मछल््योंकी तरह, मनुष्योके के 
अच्छरिकावतभयानद्ा महा- सेवारके समान, धनुष तरङ्गोकी माति ओर अख-राख 


मगिप्रवेकाभरणादमशकराः ॥२७)} | स्ता एवं तिनको समान जान पडते । ढाके दी 
मादरम पडती, मानो भयानक भवर हों | बहुमूल्य 

भरवतिता भीशभयवहा पृषे मणि्यौ ओर आभूषण पत्थरके रोड तथा कंकड़कि 
4 मनखिनां हपंकरीः परस्परम्‌ । समान बहे जा रे ये । उन-उन नदियोंको देखकर कायर 
निनि्वारीन्‌ शसरेन दुम॑दान्‌ पुरुष डर रहे ये क्षौर ॒वीरोका भपतमे सूर॒ उत्साह 
( वड रहा था ॥ २६२८ ॥ परीक्षित्‌ ! जरासन्धकी 
= सङ्कषेणेनापरिमेयतेजसा ॥२८॥ | बह सेना समुद्रके समान दुगम, भयावह ओर बडी 
बलं  तदङ्गाणवदुगमेरवं किनारे जीतने योग्य थी । परंतु भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
। ` इतरं ` प्रत्‌ । ` | न व्य रो उनका 


वे सारे जगत्‌के खामी हैँ । उनके ्ि एक सेनाका नाच 
बषुदेचपत्रयो कर देना केवर खिलवाड़ ही तो है ॥ २९ ॥ परीक्षित्‌। 
तजगदशयोः परम्‌ ॥२९॥ | भगवानके गुण अनन्त है । वे लेम्खेकमे ही तीनो 


छडनान्त शवनत्रयद्य यः ` | लोर्कोकी उत्पत्ति, स्थिति ओर संहार करते ह । उनके 


मीहतेऽनन्तगुणः खलीर्या । | व्यि यद कोई बङी नात गा द त 





अ० ५० | दशम स्कन्ध 














न -तख चित्रं परपक्षनिग्रह- ` | सेनाका इस प्रकार वात-की-बातमे सव्यानादा करदे । 
| तथापि जव वे मनुष्यका-सा वेष धारण करके मनुष्यकी- 
स्तथापि मत्याटुविधश्च बण्यंते ।|३०}} सी लीला करते है, तत्र॒ उसका भी वणन कियाद 
जाता है ॥ ३० ॥ र 
जग्राह विरथं रामो जरासन्धं महाप्ररुष्‌ । | इत प्रकार जरा्यककी सारी सेना मारीगवी। 
| रय भी ट गया । इरीरमें केवल प्राण बाकी रे | तब 
भगवान्‌ श्रीवर्रामजीने जेसे एक सिंह दृप्तरे सिंहकों 
कशः ट पकड़ केता है, वेसे ही वच्पूवक महाबटी जरासधको 
हतानीकावचिषटापु . सिंहः सिंहमिवबौजसा ॥३१॥ म स ग्ब 
नरपतिर्योका वध किया घा, परंतु आज उदे बलटरामजी 
वरुणकी फ़ंसी ओर मनुष्योके फदेसे बध रहे थे | 
वध्यमानं हताराविं पर्गीरुणमादुपैः । | भगवान्‌ श्रकृष्णने यह सोचकर कि यह छोड़ दिया 
| जायगा तो ओर भी सेना इकट्री करके खयेगा तया हम 
। सहज दी पृथ्वीका भार उतार सक्गे, वख्मजीको रेक 
~ दिया ॥ ३२ ॥ वड-बडे डरवीर जरासधका सम्मान 
व(रयामास गोषिन्दस्तेन कायेविकोपेया ॥३२) करते ये । इवण्नि वते वव बात 
| इई कि सुस श्रीकृष्ण भौर बग्रामने दया करके दीनकी 
| भोति छोड़ दिया है । अब उसने तपस्या कटनेका निश्चय ` 
| किया | परंतु रास्तेमे उसके साथी नरपति्योने बहत ~ ` 
तपसे कृतसंकरपो वारितः पथि राजभिः ।३३॥  समश्चाया किं “राजन्‌ ! यदुवंशि्योमे क्या रक्खा है ९ वे 


धापको बिस्कु ही पराजित नक्शीं कर सकते थे । आपको । 
हतेषु सबौनीकेषु चृपो बार्हद्रथस्तदा। 


| 


| स म॒क्तो रोकनाथाम्यां व्रीडितो वीरसम्मतः । 


त बा 








^ + (484. 0 कन्व 





वाक्यैः पवित्राथपदेनेयनेः प्राङ्रतेरपि ।  प्रार्यवरा दी नीचा देखना पड़ा है | उन ोगोने 
मगवानकी इच्छा, फिर विजय प्राप्त करनेकी आशा 
खकमबन्धघ्र सोऽयं यदुभिस्ते पराभवः ॥३४।। आदि बताकर तया लौकिक दन्त एवं यो दे | 

| देकर यह बात समभ्रा दी किं आपको तपस्या नही 

| करनी चाहिये ॥ ३३-२४ ॥ परीक्षित्‌ ! उस समय 

र मगधराज जरासंधकी सारी सेना मर चुकी थी 1 भगवान्‌ 
नररामजीने उपेन्नापूवक उसे छेड़ दिया था | इससे ` 
। व बहत उदास होकर भपने देशा २ थ चख ` 
| गया ॥ २३५५ ॥ न 





उपेश्षितो भगवता मगधान्‌ दुमना ययो ॥३५५॥। 





~ नध 


परीक्षित्‌ | भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सेनामे का (कि 
नाका न हआ ओर उन्होने जर १ = तेदेस 
अक्षौदिणी सेनापरः जो सघुदके समान थी, सहज दी 
विजय प्राप्त क्र ली । उस समय बे देवता उनपर्‌ 
¦ 1३६ । काय  अुमोदन- प्रशंसा कर रदे ये ॥ ३९६ ॥ 





¶ =  शङन्दोऽप्यक्षतवसो निस्तीणौखििलारणवः । 







\ 
४ ॥ 1 नि 4 ° 

अमीत 1९ वि > ॥ 

। कि ॥) 
४१. ॐ क > च ् सः १ ४ ¬ > 3" 

-+ | ` क प + ष # न्क 
0 ^ ज > नद ~ $ ४: र ह कर ९ न 
# ७ क ऋ न 9 4 7 रः प 
भ्‌ [क 4 ४५ भ = "क "क $ । ् र व 
५ 3 क „>. = 
# नी र ` #॥ “+ 


माथुरेरूपसङ्गभ्य विज्वरेषुंदितात्मभिः। 


उपगीयमानविजयः सतमागधवन्दिभिः ॥२७॥ 
. शह्दुन्दुभयो नेदुभरीतूर्थाण्यनेकशः । 


बरीणेणु्रदङ्गानि पुरं प्रविशति प्रभो ॥३८॥ 





तिक्तमागां हृष्टडनां पताकाभिरलंकृतम्‌ । 


क क ¬> क ४ 
४ १ 
। 1 न्नः ओ ६ ह? 4 
१ 


1" 


" "+" +र 


, निघुशं ब्रह्मथोषेण को तुकाबद्धतोरणाम्‌ ॥२९॥ 


ह ॥ # + 


निंचीयमानो नारीभिमाँल्यदध्यक्षताङ्करेः । 


# 94 % + # चै ~क १ 1 


निरीक्ष्यमाणः सस्नेह प्रीस्युत्कङ्ितिलोयनेः ॥४०। 


आयोधनगतं वित्तमनन्तं वीरभूषणम्‌ । 











यदुराजाथ तत्‌ सवेमाहतं प्रादिशस्परथुः ॥४१॥ 
एवं सप्तदशचक्रत्वस्तावत्यक्षोहिणीबेलः । 
धये मागधो राजा यदुभिः कृप्णपालितेः ॥४२॥ 
| । । अक्षिषंलद्ररं सवं इष्णयः दृष्णतेजसा । 
| ३ हेष सेषनीकेष त्यक्तोऽयादरिभि्ैपः ।॥४३॥ 
1 ऋ शर्टादशमग्रामे आगारिनि तदन्तरा । 


॥ि ~ अक ~ ४ 


, + 
| 
मै ६५ ् 


॥ 
र 


॥ ३ 
क" ॥ 
ध 
= वि 
। 
भण्ड ~. न 


| वेतो वीरो यवनः प्रत्यदउ्यत ॥४४॥ 
विद्भिम्लच्छकोटिभिः । 


१3 ननि +~ श ध्वन्‌ क वक १ 9 १ क 
9१ 1 
{ ~ 4 कि = व -- 
कि शो = [= 8 ध ९" १ ह" = = * ८१ कक, 
‡ चात्रा 1 (7 ¬ 
र~ के चतचछरातहन्ढाः 
4 + > च क्वि ` र । # 
+» १, ५ +“ 3 ऋ, 6 भवै 
स ^ ॐ =. - ~~ 


= 
न= 4 ॥ 
=+. 1 चकः $ 


-क--= ल ल~ - > 


भः च ( क ् क) ५ 
^ नः ~ = न्न अ धनय विकीर्यः शः = से) ~ ॥ ४ 
"मि ४; £ ॥. च| | (>~ ॥॥ (५ (५ . ष < ॥ | + 
£ विकीयमाणो | र. णीदषः | दनप्रेरिो। 
;.3 ( । * # 9 न ~ 22 ~ च १1 


" "नः 

न क „॥ कः 

क "न लः 
„+ 6 न्ने 


प भि अ~ ~प 4 % < ¢ ने 9 १ नि 
१ र 9 7 # = 
) ॥ = (व 





श्रीमद्भागवत 


ष्णीज्छ्ृत्वाऽऽत्मसम्मितान्‌४५ चेर च्या ॥ ४५ ॥ 


| < 
1 


| अ० ५० 








जरासंधकी सेनाके पराजयसे मथुरावासी भयरहित हो 
गये थे भौर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी विजयसे उनका हृदय 
आनन्दसे भर रहा था। मगवान्‌ श्रीकृष्ण आकर उनमें मिठं 
गये । सत,मागध ओर बन्दीजन उनकी वि जयकरे गीत गा र 
ये ॥ ३७ ॥ जिस समय भगवान्‌ श्रीकृष्णने नगरमे 
प्रवेश किया, उक्त समय वहाँ शङ्क, नगारे, भेरी, तुरी, 
वीणा, बुरी ओर मृदङ्ग आदि बाजे बजने चो 
थे ॥ ३८ ॥ मथुराकी एक-एक सड़क ओर गकीमे 
चिडकाव कर दिया गया था । चारो ओर हसते-खेकते 
नागरिकोकी चहट-पहट थी । सारा नगर कछोटी-छोरी 
अडियो ओर वडी-वड़ी व्रिजयपताकाओंसे सजा दिया 
गया था । त्राह्मणोकी वेदध्वनि गूँज रही थी ओर सव 
भोर आनन्दोत्सवके पचक वंदनवार्‌ वधर दिये गवे 
ये || २९ ॥ जिस मय श्रीकृष्ण नगरमें प्रवेश कर रे 
थे, उक्त समय नगरकी नारियाँ प्रेम ओर उत्कण्डासे भरे 
हए नेत्रोसि उन्हे स्नेहपूवक निहार र्ट यीं ओर एू्गोके 
हार, दही, अक्षत भोर जो आदिके अङ्करोकी उनके 
ऊपर वषां कर रही थीं ॥ ४० ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
रणभूमिसे अपार धन ओर वी्ोके आमूषण ठे आये 
थे । वह सव्र उन्होने यदुवंिर्योके राजा उग्रसेनके पाप्त 
मेज दिया ॥ ४१॥ 


परीक्षित्‌ । इस प्रकार पत्रह बार तेईस-तेईस अक्षो- 
हिणी सेना इकटटी करके मगघराज जरासंधने भगवान्‌ 
शरीकृष्णके द्वारा सुरक्षित यदुष शियसे युद्ध किया ॥४२॥ 
वितु यादर्वोनि मगव्रान्‌ श्रीकृष्णकी शक्तिसे हर बार 
उसकी सारी सेना नष्ट कर दी । जब सारी सेना नष्ट 
हो जाती, तब यदुवंरि्योकि उपेश्षघ्रवक छोड देनेपर 
जरासंध अपन राजधानीमें गट जाता ॥ ४२ ॥ जिस 
समय अठारह संप्राम छिडनेद्ीवाटा था, उसी समय 
नारदजीका मेजा हआ वीर काट्यवन दिखायी पडा ॥४४॥ 
युद्धम काठयवनके सामने खडा होनेवाला वीर संसारमे 
दूसरा कोई न या । उसने जब य्न घना कि यदुवर 
हमारे ही-वैसे बच्वान्‌ ई ओर हमारा सामना कर सकते 


| है, तत्र तीन करोड म्लेच्छोकी सेना केकर उसने मथुराको 








च य + त नु = 


| ऋः ५ 
अ) दशम स्कन्ध ष्प्‌ 











पयो क क 1 
































काख्यवनकी यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान्‌ 
वलरामजीके साथ मिलकर विचार किया- 
“अहो | इस समय तो यदुवंशिर्योपर जरासन्ध जौर 
काल्यवन-- ये दो-दो विपत्तिर्या एक साय ही मंडरा 
रही हैँ ॥ ४६ ॥ आज इक्त परम बल्डाटी यवनने हमें 
आकर घेर ल्या है ओर जरासन्ध भी आज; कठ 
या परसोमें आ दी जायेगा | ४७ ॥ यदि हम दोर्नो 
भाई इसके साय ल्डनेमे टग गये ओर उसी समय 
जरासन्ध आ पर्चा, तो वह हमारे बन्धुओंको मार 
डल्णाया तो कैद करके अपने नगरमे ठे जायगा; 
क्योकि वह बहत वल्वान्‌ है ॥ ४८ ॥ इसल्यि आज 
हमलोग एक रेसा द्ग-रेस। किमा वनाेगे, जिसमें 
किसी भी मनुष्यका प्रवेश करना अव्यन्त कठिन होगा । 
अपने खजन-सम्बन्धियोंको उसी किलेमे पर्हुचाकर फिर 
इस यवनका वध करा्येगेः ॥ ४९. ॥ बल्रामजीसे इस 
प्रकार सतह करके भगवान्‌ श्रीकृष्णने समुद्रके भीतर 
एक रसा दुगम नगर वनवाया, जिसमें समी वस्तुं 
अदूमुत थीं ओर उस नगरकी रबाई-चोडाई अडताटीस 
कोसकी थी ॥ ५० ॥ उस नगरकी एकएक वस्तुं 
विश्वकर्माका विज्ञान ८ वास्तुत्ज्ञान ) ओर शिल्पकलकीं 
निपुणता प्रकट होती थी । उसमें वास्तुराख्के अनुसार 
बड़ी-बड़ी सडको, चोरा ओर ग््योका यथास्थान 
टीकरीक विभाजन किया गया था ॥ ५१ ॥ वह नगर 
रेसे घुन्दरसुन्दर उद्यानों ओर विचित्र-विचित्र उपवनेसि 
युक्त था, जिनमें देवताओंके ब्रक्ष ओर ताए ज्ह्द्याती 
रहती यीं । सोनेके इतने ऊचे-ऊंचे शिखर थे, जो 
आकाङसे बातं करते थे । स्फटिकमणिकी अराय्यं 
ओर ऊंचे-ऊंचे दरवाजे बडे ही सुन्दर गते थे ॥ ५२॥ ` 
अन रणखनेके च्य चाँदी ओर पीतच्के बहृत.से कोठे 
बने इए ये । वहौके महल सोनेके बने इए थे ओर ` 
उनपर कामदार सोनेके कल्दा सजे इए थे । उनके 
शिखर रतोके थे तथा गच पन्नेकी बनी इई बहत मली 
माद्म होती थी ॥ ५२ ॥ इसके अतिरिक्त उस नगरमे नग < 
वास्तुदेवताके मन्दिर ओर छले भी बहत सुन्दर सुन्दर 


 वास्तोष्पतीनां च गूैवरभीमिश् निमितम्‌ । | इए ये । उमे चारो वणक कोग निवास करते श 


तं दृषटराचिन्तयत्‌ कृष्णः संकर्षणसहायवान्‌ । 
अहो यदूनां ¶जिनं प्रप्त ह्यभयतो महत्‌ ॥४६॥ 
यवनोऽयं निरुन्धेऽखनदय तावन्परहाबलः । 
मागधोऽप्यद्य वाश्च वा परश्चो वाऽऽगमिष्यति।।७॥ 
आवयथोयुध्यतोरख यच्चागन्ता जरासुतः । 
बन्धून्‌ वधिष्यत्यथया नेष्यते खपुरं वरी ॥४८॥ 
तखादयय विधाखामो दुभं द्विपददुभेपम्‌ 1 
तत्र ज्ञातीन्‌ समाधाय यवनं घातयापहे ॥४९॥ 


इति सम्पररत्य भगवान्‌ दुगं दाद शयोजनम्‌ । 


अन्तःसघुद्रे नगरं दरस्स्नाद्ुतमचीकरत्‌ ॥५०॥ 













दश्यते यत्र हि त्वां विज्ञानं शिस्पने पुणम्‌ । 

रथ्याचस्वरवीथीभियंथावास्तु विनिरभितम्‌ ॥५१॥ 

सुरद मरतोद्यानविचित्रोपत्रनान्ितम्‌ । 

हेमङ्खेदिधिस्पभभिः स्फाटिकाडारगोपुरे; ॥५२॥ 
५ 


राजतारङ्रैः कोष्टेहं मकुम्भेररकृतेः । 


रतश्कटोगीदैरैमेमहामरकतखथरेः  ।५२॥ 


न 
अत ~ ^ 
ब ऋ दे व, कः € 





वै 


क, क ॥ 1, 1 | 
ह ॐ ~=) न + 
कि अ ~ च 3! क + ह व= न 4 ~क छं 


॥ 0. (ए) ~~ 
(| ५ न 


॥ = ९ श्रीमद्भागवत [अ०५९ 






































चातुण्यंजनाकीणं य॒दुदेवग्रहाष्छसत्‌ ॥५४॥ ` ओर सबके वीचमें यदुवंरि्योके प्रधान उग्रसेनजी, 
वघुदेवजी; बलरामजी तथा भगवान्‌ श्रीक्रष्णके मह 
सुधमा पारिजातं च महेन्द्रः भरािणोद्धरः । जगमगा रदे य ॥ ५४ ॥ परीक्षित्‌ ! उस समय दख. 
राज इन्द्रने भगवान्‌ श्रीकरष्णके व्यि पारिजात वृक्ष ओर्‌ 
छुधर्मा-सभाको भेज दिया । वह समा रेसी दिव्य थी कि 
उसमें बेठे इए मनुष्यको भूख-प्यास आदि मत्यगोकके 
धमं नहीं द्र पाते थे ॥ ५५ ॥ वरुणजीने एसे बहुत- 
श्यामेककणार्‌ वरणो हयाञ्छह्कान्‌ मनोजवान्‌ । से इवेत धोड़े मेज दिये, जिनका एक-एक कान स्यामः 
| वणेका था, ओर जिनकी चाक मनके समान तेज थी | 
धनपति कुवेरजीने अपनी आलो निधि्यौँ मेज दीं ओर 
दूसरे वोकपार्गोने भी अपनी-अपनी विभूतिं मगवान्‌के 
| पाक्त भेज दी ॥ ५६ ॥ परीक्षित्‌ ! सभी लोकपार्खेको 
यद्‌ यदू भगवता दत्तमाधिपत्यं स्वसिद्धये । मगवान्‌ श्रीकरष्णने हयी उनके अधिकारके निर्वाहके यि 
राक्तियों ओर सिद्वियां दी हैँ | जव मगवान्‌ श्रीकृष्ण 
सवं प्रत्यर्पयामासुर्हरै भूभिगते चष ।५७] | पृ्वीपर अवतीणं होकर टीला करने लगे, तव 
सभी सिद्धियां उन्होने भगवानूके चरणोमें समपिंत 
कर दीं || ५७ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने समस्त 
स्वजन-सुम्बन्धियांको अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योग- 
6 3: मायाके द्वारा द्वारकामें पंचा दिया । शेष प्रजाकी रक्चाके 
,।  भ्रजापाङेन रामेण टृष्णः समुमन्तितः । व्यि बलरामजीको मथुरापुरीमें रख दिया ओर उनसे 
` सराह लेकर गलेमें कमर्गकी माला पहने, विना कोई 
[3 अक्ञ-स व्यि खयं नगरके बडे दरवाजेसे बाहर निकल 
/  निजेगाम पुरदारात्‌ पञ्ममाली निरायुधः ॥५८॥ | आये ॥ ५८ ॥ भे 
3 सि == 


इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्वन्ये उत्तरा | 
दुगंनिवेशानं नाम पत्चारात्तमोऽ्यायः ॥ ५० ॥ । 


य 


अथकपन्ारात्तमोऽष्यायः 
काठयवनका भस होना, सुचखुङन्दकी कथा 
श्रीक उवाच , श्रीद्यकदेवजी कहते है प्रिय परीक्षित्‌ | जिस 
= = । समय भगवान्‌ श्रीकृष्ण मथुरा नगरके मुख्य दारसे | 
न्तशजिहानमिवोडपम्‌ । निकले, उस समय देसा माद्म पड़ा, मानो पूव दिशसे ` 
= चन्दोदय हो रहा हो । उनका श्यामक शरीर अत्यन्त 
ही दनीय था, उसपर रेरामी पीताम्बरकी छटा निराडी 


यत्रे चाबखितो सर्य सत्यधर्धेनं युज्यते ॥५५। 


अष्टो निधिपतिः कोशान्‌ लोकपालो निजोदयान्‌।५६। 


. - ~ ---- । [ङ्ख ||| 


तत्र योगप्रभावेण नीला स्वजनं हरि; । 


न ॥ 
नवि ॐ. + 


क 


यी 


हि १ 
॥ि च कै २ ` के # 9 क ॥ 

५ र ष + .= 8 > । = ४ । भ र + ~ = नि र र | - 

¬ च व, कैक ह "द क~ {ज ~ र ज * चिः । ह दं । षु 

~ 4 4 € ह र २ ~ > जक ० 

> ड ॐ 5 

कः = => $ ५ ^ त = ++ (क [न 
छ = द . = = ॥ ०, ~ > ९ 1 9 । धि 
चय * 
== के छै 
५ र च 


~ |} भि 4 त व 4 
~" न नव ~ 


य ~= । ॐ ~ 
[8 = 


| अ० ५९१ । ` दुश्चम्‌ च्कन्ध 














भीवत्सवक्षसं भ्राजत्कोस्तुभायुक्तकन्धरम्‌ ॥ दी थी; वक्षःखन्पर खर्णरेखाके च्यम श्रीवस्स-चिह 
रोभा पा रहा था ओर गले कौस्तुभमणि जगमा खी 

पृथुदीर्यतुबहं नवक्चारणेक्षणस्‌ । २ ॥ | थी । चार सुजा थी, जो ंवी-ठंबी ओर कु मोटी- 
मोटी थीं | हाव्वे खिले दए कमच्के समान कोमल ओर्‌ 

निस्यप्रभरुदितं श्रीमल्सुकणेलं शविसितम्‌ ।  रतनारे नत्र ये । मुखकमलपर राशि.राशचि आनन्द खे 
रहा था । कपोर्वछेकी छट ॒निराटी ही थी । मन्द्-मन्द 

भ्र = मुसकान देखनेवार्छेका मन चुराये ठेती थी । कानमे 

तारित निन्राणं स्र्मक्गडन्छम्‌ ॥। ` | मकराकृत कुण्डल क्चिटमिट व ल्क रहे ये] 


< ५ | उने देखकर्‌ काल्यवनने निश्चय किया किं ध्यही पुरुष 
बाहदेषं ते पुमान्द्रीवत्सरज्छनः। |` ~ हेः कय > 
सुदेवो ह्ययमिति प ^ | वासुदेव है; क्योकि नारदजीने जो-जो कश्षण बतव्ये 


थे-- वक्षःस्थलपर्‌ श्रीवत्सा चिह, चार थुजार्एं, कमच्वे- 
से नेत्र, गलेमे वनमाद ओर सुन्दरताकी सीमा; वे सव 


तेनौरदभोकैरनान्य - इसमें मिक रहे ह । इसव्ि यह कोई दूसरा नदीं हो 
लक्षणेनारदगोक्तेनीन्यो भवितुमहंति । | सकता । इस समय यह्‌ बिना किसी अख-दाखक्रे पेद 


ही इस ओर चला आ रहा है, इसच्यि मे भी इसके. 
निरायुधश्चलन्‌ पद्यां योर्स्येऽनेन निरायुधः ॥ ५॥ | साथ विना अस्र-राके ही लङ्गा ॥ १-५५ ॥ 

इति निथिस्य यवनः प्राद्रवन्तं पराङ्छखम्‌ । एसा निश्चय करके जव काठ्यवन भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
की ओर दौडा, तब वे दूसरी ओर यह करके रण-भूमिसे 
अन्वधावज्ञिध्ुस्तं दुरापमपि योगिनाम ॥ & ॥ | भाग चले ओर उन योगिदुरम प्रभुको पकड्नेके च्य 
कालयवन उनके पीछे-पीछे दौडने च्गा | ६ ॥ रणछोड 
भगवान्‌ टीला करते इए भाग रहे थे; काट्यवन पग- 
पगपर्‌ यही समञ्चता था कि अव पकड़ा, तब पकड़ा । 
नीता दश्चेयता द्र यवनेशोऽद्विकन्द्रम्‌ ॥ ७ ॥ | प्रकार भगवान्‌ उसे बत दूर्‌ एक पदाडकी गुफामे 

ठे गये ॥ ७ ]॥ काख्यवन पीडेसे बार-बार आक्षेप करता 
पलायनं यदुडुले जातस तव नोचितम्‌ । कि अरे साई ! तुम परम यशी यदुवंशमे पैदा इष्‌ ह्यो, ` 
तुम्हारा इस प्रकार युद्ध छोडकर भागना उचित नहीं | 
इति शिपन्ननुगतो नेनं प्रापाहताद्यभः ॥ ८ 1) | है ।› परंतु अभी उसके अद्म निःरेष नहीं इए ये, ` ` 
इसय्ियि वह भगवान्‌को पानेमे समथ न हो सका ॥८॥। 
एवं धिपरोऽपि भगवान्‌ प्राविशद्‌ गिरिकन्दरम्‌। उसके आक्षेप करते रहनेपर भी भगवान्‌ उस पवैतकी 
तान ते गफामें घुस गये । उनके पीठे काल्यवन भी घुसा । ` 
सोऽपि प्र शयानं ददृशे नरम्‌ । ९॥ | वय उसने एक दूसरे दी मनुष्यको सेते इए देखा ॥९॥ 
उसे देखकर काट्यवनने सोच।--'देखो तो सदी, यह 
नन्वसौ द्रमानीय रेते मामिह साधुवत्‌ । मुञ्चे इस प्रकार इतनी दूर ठे आया ओर अव इस्‌ 
इ- मानो इसे कुछ पता ही न हो--साधुबान बनकर 
इति मत्वाच्ुतं मूदस्तं पदा समताडयत्‌ \।१०॥ । सो रहा है ॥ यह सोचकर उस मूढने उसे कसकर ¦ 


ए : 
१.२ त 
कि +~ न = प क्ष र { च १५ ५ 9 ० क 
। ९ भ्राप्यमि { 9. +~ " ~.) भ 9 
+ ५० ` सः 4 
क गे 
क ~ - > दत ज ॥ : 


क्ण ' 
द १ कि # य „च 4 ५५ ' ऋ भैः ॥ धे आहि 
- के [ ~ = ॥ ५१ "न. = "च ॐ त $ 


चतुर्थजोऽरविन्दाक्षो बनमास्यतिसुन्दरः ॥ ४ 1 । 





हस्तप्राप्रमिव्रात्मानं हरिणा स पदे पदे। 





















६. 
=, 


प 
` 9 7 


क. कक $ 
त ` व्क ~ 4 च ~ 
‡ = > ह कायां न प ~= र कं = 
। -~ क. । "न्द्र कलः - भ्त । नि क. २९ >~ च 
च ५ 0 4 # क्र # क" $ क । र म त न. 
१ # च "क ४ ष १ 1 र न  । ~ 
द ~` कर: ^ न 4 1 १ 
ध) क # शन 1 "क 








||| ४४८ ीमद्धागवत | अ० ५१ 
न |. 


ल उत्थाय चिरं सुक्रः ्षनेरुन्मीस्य रोचने । एक खात मारी ॥ १० ॥ वह पुरुष वह बहत दिनि 
छ्लोया इभा था । पैरकी टोकर टगनेसे वह उठ पड़ा 


| दिशो विरो = भर धीरे-धीरे उसने अपनी खं खोली । इधर-उधर 
शि । 
दिशो विलोकयन्‌ ¶ तमदराक्षीद्बखितम्‌ ॥९९। देखनेपर पास दही कालयवन खड़ा हआ दिखायी 


दिया ॥११॥ परीक्षित्‌ ! बह पुरुष इप्त प्रकार ठोकर मारकः 





| स॒तावत्तखय र्टस्य दृष्टिपातेन भारत । जगाये जानेसे कुर रुष्ट हो गया था-| उसकी दष्ट पडते 
| ( ही काट्यवनके इारीरमे आग पैदा हो गयी ओर बह 
देहजेनाभ्रिना दग्धो भखसादभवत्‌ श्वणात्‌ ॥१२॥ | क्षणभरमें जक्कर राखका टेर हो गया ॥ १२ ॥ = 
| | । राजोवाच राजा परीश्चितने पृडा-- भगवन्‌ | जिसके दृष्टि | 
| | पातमात्रसे काट्यवन जठ्कर्‌ भस्म हो गया, वह पुष ` ` 
। ।/ = कौन था १ किप वराका था १ उपमे कैसी शक्ति थी 
४६ || को नामस पुमान्‌ ब्‌ कख तीयं एव च । ओर वह किंसका पुत्र था अप कृपा करके यह भी 
। । | बतलादूये किं वह॒ पर्वतकी गुफामे जाकर क्यं सो हा 
1 || कखाद्‌ गुहां गतः शिश्ये किं तेजो यवनादनः ।१३॥ | था १ ॥ १३ ॥ 
। | | श्रीद्युक उवाच भ्रीद्यकदेवजी कदते ह परीक्षित्‌ | वे दक्वा 
हि. । 


वसी महाराजा मान्धाताके पुत्रे राजा पुचुकुन्द थे | वे 
स इवाज इले जातो मान्धावृतनयो महान्‌ । ब्राह्मणोके परम भक्त; प्त्यप्रतिज्ञ, समरामविजयी ओर 
महापुरुष थे ॥ १४ ॥} एक वार इन्द्रादि देवता अघुरोपि 

यु चङ्कन्द्‌ इति ख्यातो बरह्मण्यः सत्यसङ्करः ॥ १५) भ्यन्त भयभीत हो गये थे | उन्होने अपनी रक्षाके 
स॒याचितः उरगगैरि्रचैरत्मरषणे | | व्यि राजा यन्द राना की ओर उन्दने बहु 
| दिर्नोतक उनकी रक्षा की ॥ १५ ॥ जव बहत दिनके 
असुरेभ्यः पस्व्रिस्तेतद्रक्षां सोऽकरोचिरम्‌ ॥१५॥ | वाद्‌ देवताओंको सेनापतिके रूपमे खामिका्तिकेय मि 
लब्ध्वा गुहं ते खः पार य॒चुङ्कन्दमथात्रवन्‌ । गये, तव उन छोगोँने राजा सुचुकुन्दसे कहा- राजन्‌ | 
आपने हमटोगोकी रक्षाके ल्यि बहत श्रम भौर कष्ट 
राजन्‌ बिरम तां ङृच्छाद्‌ भवान्‌ नः परिपालनात्‌।१६। | उटाया है । अब जाप विश्राम कीजिये ॥ १६ ॥ वीर- 
शिरेमणे | आपने हमारी रक्षाके ट्य मनुष्यगोकका 


प 1 न) 
न क 9, जोक ध 


| 
| 










॥ 01 .| नररोके परित्यज्य राज्यं निहतकण्टकम्‌ । न 
1 ३.13 & ६ र अपना भकण्टक राञ्य छोड दिया भौर जीवनकी 
०.३ | | [ असान्‌ पाल्यतां वीर कामास्ते सवं उजिज्ञताः॥१७॥ | अभिगभाँ तथा मोगोका भी परित्याग कर दिया ॥१७॥ 
` (11 महि नतो ौ बन्धु-बान्धव भौर अमाल्य- 
# ({1 । ॥ ता । अन आपके पुत्र; रानिया; २। रा घव < जल 
| ॥ सुता महिष्यो भवतो ज्ञातयोऽमात्यमन्तरिणः । मी तयां आपकर समयक्षी परनामेसे को$ नही रहा ह । 
(1 (^  भजाधतस्यकालीया नाधुना सन्ति कारिताः । १८॥ | सनको सन कालके गामे चके गये ॥ १८ ॥ काक 
¢}; ~ ब्रिनां आावानीधरोऽव्ययः समस्त बव्वानोंसे भी बच्छान्‌ दै । वहं खय परम सपर्थः 
{` काली बलीयान्‌ वानीश्वरोऽव्ययः। | अविनाशी ओर मगव्खरूप है । जैसे न 
( ˆ अनाः कालयते करीन पटपालो यथा प्चू्‌॥१९॥ | भपने वशम रखते & १ €! १ ~ ~ 
( ॑ | १. परीक्षिदुवाच | २. च इत० | | 






# ` + 
+=» 
9 पवि > हि १ 
"त 


(कौ  . , । । । कीक 


` क ~ 


= रः 
ध र $ 6" 
+~ 










॥ 
॥ 


किक 


अ० ५१] 





व्रं वृणीष्व भद्रं ते ऋते कैवल्यमच नः । 
एक एवेश्वरस्तसय भगवान्‌ विष्णुरव्ययः ॥२०॥ 
एवशरक्तः स वे देषानभिवन् महायशाः । 
अशयिष्ट गुहाविशटा निद्रया देवदत्तया ॥२१।। 


१/६} # प १ 
स्वापं यातं यस्तु मध्ये बोधयेखलामचेतनः 1 


दञ्चम्‌ स्कन्ध 


~ ~ ~ कक ~ 





प्रजाको अपने अधीन रखता दहै ॥ १९ ॥ राजन्‌ । 
आपका कल्याण ह्यो । आपकी जो इच्छा हो हमसे मोग 
ीजिये । हम कैवल्य-मोक्षके अतिरिक्त आपको सब 
कुछ दे घकते है; क्योकि वीवल्य-मोश्च देनेकी सामथ्यं 
तो केवल अव्रिनाशी भगवान्‌ व्रिष्णु्मे ही है ॥ २०॥ 
परम यडाष्वी राजा मुचुकुन्दने देवताअके इस प्रकार 
कहनेपर उनकी बन्दना की ओर वदरत थके होनेके 
कारण निद्राका ही वर मोगा तथा उनसे वर पाकर वे 
नींदसे भरकर पर॑तकी गुफामें जा सोये ॥ २१ ॥ उस 
समय देवतार्ओने कद दिया था किं "राजन्‌ | सोते 
समय यदि आपको कोई मूख बीचमें ही जगा देगा, 


क~ 


स॒ त्वा दृष्टमत्रस्तु भसीभवतु तत्क्षणात्‌ ॥२२॥ तो वह आप्रकी दष्ट पडते ही उसी क्षण भस्म 


[३ च 
यवने भखक्षान्नीते भगवान्‌ सात्वतपंभ्‌ः । 


जायगाः ॥ २२ ॥ 
परीक्षित्‌ ! जब कालयवन भस्म हो गया; तब 


| यदव रारिरोमणि भगवान्‌ श्रीढृष्णने परम बुद्धिमान्‌ राजा 


आलान दशयामास इचुङ्कन्दाय धीमते ॥२३॥ मुचकुन्दको अपना दर्न दिया । भगवान्‌ श्रीकृष्णका 


तमालोक्य घनश्यामं पीतकोक्षेयवाससम्‌ । 
श्रीवत्सवक्षसं आ्राजत्कोस्तुमेन पिराजितम्‌ ।२४॥ 
चतुुजं रोचमानं वेजयन्त्या च मालया । 
यारप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरङृण्डरम्‌ ॥२५५॥। 
्क्षणीयं सृलोकसख सालुरागसितेक्षेणम्‌ । 
अपीच्यवयसं मत्तमूगेन््रोदारविक्रमम्‌ ॥२६॥ 
पयपृच्छन्महाबुद्विस्तेजक्षा तख ` धितः । 
शङ्कितः शनकै राजा दुर्षमिव तेजसा ॥२७॥ 


मुचुकुन्द उवाच 

को भवानिह सम्प्राप्तो विपिने गिरिगहरे 1 
पद्भ्यां पद्मपलान्लाभ्यां विचरस्युरुकण्टके ॥२८॥ 
$खित्तेजखिनां तेजो भगवान्‌ व। विभावसुः 


+> १ ५ ~ 


<^ नन्त्‌- 





तेक्षितम्‌ । ३. अपीता० । 
< अ ~, - नः 


॥ ॐ ~र १७२ 


र्हे थे | होर्ठोपर प्रेमभरी सुसकराहट थी बोर नेत्रोकी 


चाठ | राजा मुचुकुन्द ययपिं बड़े बुद्धिमान्‌ ओर धीर 


छयः सोमो महेन्द्रो वा लोकपालोऽपरोऽपि वा ॥२९॥ अग्निदेव तो नहीं है १ क्या आप सूर्य, चनम, 
प्रतिमे ‹खापं यतः ˆ ˆ यह पूरा श्लोक मूलम नही; 


[52 भि (अ $ ष 


श्रीविग्रह वर्षाकाढीन मेधके समान सौँवला था । रेखमी 


| पीताम्बर धारण किये इए थे | वक्षःस्थलपर श्रीवत्स 


ओर गलेमे कौस्तुममणि अपनी दिव्य ्योति तरिद्ेर रहे ये । 
चार सुजा थीं । वै जयन्ती माला अचल्ण ही घुटर्नोतक 
कटक रदी थी । मुखकमढ अव्यन्त सुन्दर ओर प्र्नता- 
से खिला इआ था ] कानमे मकराकरत कुण्ड जगमगा 


चितव्रन अनुरागकी वर्षा कर रदी यी । अयन्त दशनीय 
तकण अवस्था ओर मतवाञे सिंहके समान निर्भीक 












पुरुष ये, फिर भी भगवानूकी यह दिव्य उ्योतिमयी मूतिं 
देखकर कुछ चकित हो गये--उनके तेजसे हतप्रतिम 
हो सकपका गये । मगवान्‌ अपने तेजसे दुद्धभ जान 
पडते ये; राजाने तनिकं राङ्कित होकर प्रा ॥ २२-२७॥ 
राजा सुचुङन्दने कटा-“आप कौन हैँ १ इष 
काटोसे भरे इए घोर जगल्में आप कमख्के समान ध 
कोमल चरणोसे क्यो विचर रहे है १ ओर इत पर्वतकी _ ` 
गुफामे ही पारनेका क्या प्रयोजन या १॥२८॥ क्या 
आप समस्त तेजलियोंके मूरतिमान्‌ तेज अथवा भगवान्‌ 








रिष्पणी ल्ल ह। > (स्वाप यातः के खानमे ¦ 
धं - ~~ ~ = + ०; 


4 


कपि 
+ द क 
> ॥ 





८५० 


श्रीमद्भागवत 


॥ अ० ५१ 








मन्ये त्वां दैवदेषानां त्रयाणां पुरुषषंभम्‌ । 
यद्‌ बाधसे गुहाध्वान्तं अदीषः प्रभया यथा ॥३०॥ 


शश्रषतामन्यलीकमसाक नरपुङ्गव । 


इन्द या कोर दूसरे गेकपाक हँ १ ॥ २९ ॥ मै तोषा 
समञ्चता ह्रं किं आप देवताओंके आराध्यदेव ब्रह्मा; विष्णु 
तथा शकर-इन तीनोंमेसे पुरुषोत्तम भगवान्‌ नारायण ही 
है; क्योकि जैसे श्रेष्ठ दीपक अंँघेरेको दूर्‌ कर देताहै वैसे 
ही आप अपनी अद्घकान्तिसे इस गसाका अधेरा भगा रहे 


पश्रेघ्र | 
खजन्म कम गात्र वा कथ्यतां यदि रोचते ॥३१॥ | ह ॥ ३० ॥ पुरुषश्रेष्ठ! यदि आपको सचे ते हमे 


वयं तु पुरुषव्याघ्र एेक्ष्वाकाः कषुत्रबन्धवः । 
मुचुङधन्द इति प्रोक्तो योवनाश्चातमजः प्रभो ।॥३२॥ 


चिरप्रजागरश्रन्तो निद्रयोपहतैन्द्रियः। 


अपना जन्म, कम ओर गोत्र तखाइये; क्योकि हम सच्चे 
दयसे उसे घुननेके इच्छुक हैँ ॥ २१ ॥ ओर पुरो 
त्तम | यदि आप हमारे वारम प्र तो हम इश्वाढुवशी 
क्षत्रिय है मेरा नाम है मुचुकुन्द्‌ | ओर प्रमु | म 
युवनाश्वनन्दन महाराज मान्धाताक्रा पुत्र द| ३२॥ 
बहत दिर्नोतक जागते रहनेके कारण मै थक गया था | 


शयेऽखिन्‌ विजने कामं केनाप्युत्थापितोऽधुना॥।३३॥ निद्राने मेरी समस्त इ्धिरयोकी शक्ति छीन ठी थी, उने 


सोऽपि भखीद्रतो नूलमंत्मीयेनेव पाप्मना । 
अनन्तरं भवाज्टरीमान्‌ लक्षितोऽमित्रश्चातनः ॥३४॥। 
तेजघा तेऽविषद्येण भरि द्रष्टुं न शक्ुमः । 
इतोजसो महाभाग माननीयोऽसि देहिनाम्‌ ।३५॥ 
एवं सम्भाषितो राज्ञा भगवान्‌ भूतभावनः । 
प्रत्याह प्रहसन्‌ वाण्या मेषनादगभीरया ॥३६॥ 
श्रीभगवानुवाच 
जन्मकमाभिधानानि सन्ति मेऽङ्ग सहस्रशः । 
न शक्यन्तेऽचसंख्यातमनन्ततान्मपापि हि ॥२३७॥ 
कचिद्‌ रजांसि विममे पाथिवान्युरुजन्मभिः। 
शुणकर्माभिधानानि न मे जन्मानि कर्दिचित्‌।।२८॥ 


कालत्रयोपपन्नानि जन्मकर्माणि मे च्प। 
अयुक्रमन्तो नेवान्तं गच्छन्ति परमर्षयः ॥२९॥ 


तथाप्यद्यतनान्यङ्गं॒श्रृणुष्व गदतो मभ। 


| वेकाम कर दिया था, इसीसे मे इस्त निजंन स्थानें 


निद्रन््र सो रहा था। अभी-अभी किसीने मुञ्चे जगा 
दिया ॥ ३३ ॥ अवश्य उसके पार्पोने ह्वी उसे जटाकर्‌ 
मस्म कर दिया है | इसके वाद शत्रओंके नाश कले 
वाले परम सुन्दर आपने मुञ्चे दरशन दिया ॥ ३४ ॥ 
महाभाग | आप समस्त प्राणियोके माननीय है | थापके 
परम दिव्य ओर असद्य तेनसे मेरी शक्ति खो गयी है | 
म आपको वहत देरतक देख भी नदीं सकता ॥३५॥ 
जब राजा सुचुकुन्दने इस प्रकार कहा, तत्र सुभरस् 
प्राणिरयोके जीवनदाता भगवान्‌ श्रीकृष्णने हेते इए 
मेषध्वनिके समान गम्भीर वाणीसे कहा--॥ ३६ ॥ 
भगवान्‌ ओीकृष्णने कहा-- प्रिय मुचुकुन्द । मेरे 
हजारो जन्म, कमं ओर नाम हैँ | वे भनन्त है, इसब्यि 
म भी उनकी गिनती करके नहीं बत सकता ॥३७॥ 
यह्व सम्भव है कि कोई पुरुष अपने अनेक जन्मोमिं 
ृथ्वीके छोटे-छोटे धूक-कर्णोकी गिनती कर डाठे; परत 
मेरे जन्म, गुण, कर्म ओर नामँको कोई कभी किसी 
प्रकार नह्य गिन सकता ॥ ३८ ॥ राजन्‌ । सनकः 
सनन्दन आदि परमर्भिगण मेरे त्रिकाठसिद्ध जन्म ओर 
कर्मोका वर्णन करते रहते है, परंतु कभी उनका पार 


नहीं पाते ॥ ३९ ॥ प्रिय मुचुकुन्द । पसा होनेपर भी 
न अपने वर्तमान जन्म, कर्म भौर नार्माका वणन करता 


१. च इह विख्याता रे्वा० । २. मार्मजेतैव । ३, नादानः | 


र॑ = + 








अ० ५१] 








विज्ञापितो विर्ज्विन पुराहं धर्मगुप्तये । रै खनो । पदठे ब्रह्माजीने मुञ्जसे धर्मकी रक्षा ओर 


भूमेभारायभाणानामसुराणां क्षयाय च ॥४०॥ 
अवतीर्णो यदुर गृह आनकदुन्दुभेः । 
वदन्ति वासुदेवेति वसुदेवहुतं हि माम्‌ ॥४१॥। 
कालनेमिहतः कंपः प्रलम्बाचयाश्च सद्द्धिषः । 
अयं च यवना दग्धो राजंस्ते तिग््रचक्चुपा ॥४२॥ 
सोऽहं तवानुग्रहाथं गुहामेतामपागतः । 
प्रथितः प्रचुरं पूं स्याहं भक्तवत्सलः ॥४३॥ 
वरान्‌ वृणीष्व राजप सर्वान्‌ कामान्‌ ददामि ते । 
मांप्रपजो जनः कश्चिन भूयोऽहंति शोचितुम्‌ ॥४४॥ 


श्रीद्ुक उवाच 


इत्थुक्तस्तं प्रणम्याह युचुङ्कन्दो भदानितः । 


ज्ञात्वा नारायणं देवं गगंवाक्यमनुखरन्‌ ॥४५॥ 
युचुकृन्द्‌ उवाच 
विमोदहितोऽयं जन ईश मायया 
त्वदीयथा त्वां न भज्यनर्थदक्‌ | 
सुखाय दुःखगप्रभवेषु सजते 
गृहेषु योषित्‌ पुरुषश्च बञश्चितः ॥४६॥ 
| | © ५ 
लब्ध्वा जनो दुरुभमत्र माटुषं 


म कं ह | क १ जः 
"4 "3 श (शय २ 3 ०९.०० 
भ - >| न & ८१३ >) | शस )) £~ नष्‌ 
` क 
^ कु 


तरहल्ञी ओर पुरुष सभीष्गेजा रहे ई॥ ४६॥. 


| पस क | 


परथ्वीके भार वने इर्‌ अघुरोका संहार करनेके य्य 
परायना की थी ॥ ४० ॥ उन्हीकी प्र्धनासे मैने यदू- 
वंरामें वघुदेवजीके यँ अवतार ग्रहण किया है | अवरत 
वघुदेवजीका पुत्र हर, इसच्ि ठोग सुच धवासुदेध' कहते 
हं ॥ ४१॥ अवतक्र मे कालनेमि अघुर्का, जो कसक 
रूपमे पैदा हआ था तथा प्रलम्ब आदि अनेकों साधु- 
द्रोदी अुरोका संहार कर चुका दर| राजन्‌ | यहं 
काट्यतव्न था, जो मेरी ही प्रेरणासे तुम्हारी तीक्षण दृष्टि 
पड़ते ही मस्म हो ग्या ॥ ४२ ॥ वही मै तुमपर कपा 
करनेके च्यि ही इस गुफामें आया द्र | तुमने पे 
मेरी वहत आराधना की है ओर में द्र भक्तवत्सर ॥४३॥ 
इसव्यि राजथ ! तुम्हारी जो अभिकाषा हो, सुक्गसे माँग 
लो । मैं तुम्हारी सारी लाका, अभिलाषारद पूर्णं कर 
दूगा | जो पुरूष मेरी शरणमे आ जाता है, उसके च्वि 
फिर रेसी कोई वस्तु नहीं रह जाती, जिसके व्यिं वह 
शोक करे ॥ ४४ ॥ 

श्रीट्यकदेव नी कते है--जव भगवान्‌ श्रीकष्णने 
इस प्रकार कहा, तब राजा सुचुकुन्दको ब्रद्ध गर्ग॑का 
यह कथन याद आ गया कि यदुवंशे भगवान्‌ अषतीणं 
होनेवाठे हैँ । बे जान गये कि ये खयं भगवान्‌ नारायण 
दै । आनन्दसे भरकर उन्होने भगवान्‌के चर्णोमं प्रणाम 
किया ओर इस प्रकार स्तुति की ॥ ४५ ॥ 


सुच कन्दने कहा--ग्रभो | जगतके सभी प्राणी . 
आपकी मायासे अत्यन्त मोहित हो रहे है । वे आपसे 
विषुख होकर अनथमे ही फंसे रहते हैँ ओर आपका मजन 
नहीं करते । वे सुखके च्ि घरगृहस्थीके उन इं्षटोमें 
फेस जते है, जो सारे दुःखेकि मूढ स्रोत है । इस 











अवयन्त पवित्र कर्मभूमि दहै, इसमे मलुष्यका जन्म होना ` 
दुरम है । मनुष्य-जीवन इतना पूणे है कि 
उसमे मजनके ल्थि कोई मी अदुबिषा नह है । अपने ¦ 
=  छृपासे उसे 
मति, गति 








४५२ श्रीमद्भागवत | अ० ५१ 





पादारविन्दं न भजत्यस्न्मति- अपत्‌ संपा ही चणा देते हैँ ओर तुच्छ त्रिषयघ्ुखके 


न्मयि ही सारा प्रयत्न करते इए घर-गृहस्थीके अंधिर 

गृहान्धङ्कपे पतितो यथा पञ्चः ॥४७॥ | कूर्मे पड़े रहते है भगवानके चरणकमल्रंकी उपासना 

नहीं करते, भजन नहीं करते, वे तो टीक उस पञ्युके तमान 

भमेष कालोऽजित निष्फलो गतो । द, जो तुच्छ तृणके लोभसे अँधेरे कूर्मे गिर जाता 
है ॥ ४७ ॥ भगवन्‌ ! मै राजा शा, राज्यल्मीके 
मदसे मै मतवाडा हो रहा था । इस मरनेवाञे शरीरो 
ही तो मे आत्मा-- अपना खर्प समज्ञ रहा था ओर 
मरत्यात्मवुद्धः सुतदारकोश्चमू- राजकुमार, रानी; खजाना तथा प्रध्वीके टोभ-मोहम ही 
फसा इथा धा । उन वस्तुर्ओंकी चिन्ता दिन-रात मेरे 
गले ल्गी रहती थी । इस प्रकार मेरे जीवनका यह 
अमूल्य समय बिल्कुल निष्फक--व्यश्ं चखा गया ॥४८॥ 
करेवरेऽसिन्‌ घरकर्यसन्निभे जो शरीर रत्य दी वड्‌ ओर भीतके पमान गिद्रीका 
है ओर दस्य होनेके कारण उन्हीके समान शपनेसे 
अच्ण भी दहै, उसीको मेने अपना खरूप मान च्ि 
था ओर फिर अपनेको मान व्रैटा था भनरदेवः | इस 
प्रकार मैने मदान्ध होकर आपरको तो कुछ समश्चा ही 
नहीं | रथ, हाथी, घोड़े ओर वैदट्की चतुरङ्खिणी सेना 
गौ पर्थरंस्त्वागणयन्‌ सुदर्मदः ॥४९॥ | तथा सेनापतियोसे धिरकर मेँ प्रथ्वीमें इधर-उधर धमता 
रहता ॥ ४९ ॥ सुद्ये यह करना चादिये ओर यह नहीं 


राज्यश्ियोन्नद्धमदसख भूपतेः 


ष्वासजमानख दुरन्तचिन्तया ॥४८] 


निरूटमानो नरदेव इत्यहम्‌ । 


वृतो  रथेभाश्चपदात्यनीक्ये- 


म्रमत्तथुस्चेरितिङ्र्यचिन्तया करना चाहिये, इ प्रकार विविध कर्तन्य ओर अकर्त्यो- 
की चिन्तामे पड़कर मनुष्य अपने एकमात्र कर्तव्य 

्रबृद्धलोभं विषयेषु छलसम्‌ | मगवव्प्रातिसे विमुख होकर प्रमत्त हो जाता है, असावधान 

- हो जाता है | संसारम बौध रखनेवाठे प्रिषयोके 

त्वमत्रमत्त' सहसाभिपद्यसे व्यि उसकी ललपता दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती ही जाती 


्टेरिहानो है । परतु जसे भूषके कारण जीम क्पव्पाता हआ 
लहानोऽहििाघुमन्तकः ।५०॥ | सपर अतावधान को दवोच ठेता है, से 
काठरूपसे सदा-सर्वदा सात्रधान रहनेवाठे आप एकाएक 
उस॒॒प्रमादप्रसत प्राणीपर टूट पड़ते हैँ ओर उसे ले 
बीतते & ॥ ५० ॥ जो पठे सोनेके र्थोपर अथतरा 
बड़े-बड़े गजराजोपर चदकर चल्ता था भौर नरदेव 


स॒ एव कठेन दुरत्ययेन ते कहराता था, वही शरीर जापके अबाध कालका प्रात 
बनकर बाहर पक देनेपर पर्षर्योकी विठा, धरतीमें गाड़ 


कठेबरो  दिदमिमसतं्ितः ।॥५१॥ | देनपर खडकर कीङ नौर भागे जम दनेप्र राज 


न्नः "च + क < ( 3 


च # कः भ 4 
ह क. #, १ 4 भवे ष्णु , ~ ~ री 
क =. छ कर £ करक ~ >, 
~ अ = ऊ. + 
। ह ` > मि कय 


पुरा रथेहमपरिष्ठृतेशवरन्‌ 


मतङ्गजा नरदेवसंत्ञितः । 


4 


वि 





इक 


अ० ५१ | द्शम स्कन्य 








न क्ष = ^ +, 4 
ब, 


दि 


11 
~ ~ ` 
च 





रजस्तम जुबन्धनाः 


यः प्राथ्यते साधुभिरेकचर्थया 


न्ष 


तसाद बिसज्याशिष ६श स्तो 


निजित्य॒ दिक्चक्रमभूतविग्रहो ढेर बन जाता है ॥ ५१ ॥ प्रभो | जिने सा 
दिद्धाओंपर विजय प्राप्त कर खी है ओर जिसमे व्डने- = 
वरासनखः समराजवन्दितः । | वाला संसारमें कोई रह नदी गया दै, जो श्रेष्ठ सिंहासन- _ ` 


त र. प्र व्रैठता है ओर बड़े-बड़े नरपति, जो पिले उसके 
गेषु मधुन्बदेषु योषितां समान ये, अव्र जिसके चरणे सिर छकाति दँ, वदी 

9 = पुरुप जव वरिषरय-सुख भोगनेके घ्िये, जो घर-गृहश्थीकीं 
कीडागः पूप ईश नीयते ५२] एक विशेष वस्तु है, ल्ियोके पास जाता है, तत्र उनके 


करोति कमणि तपस्मुनिष्ठितो ` दाधका खिीना, उनका पाठत्‌. पर वन जाता दै ॥५२॥ 
बह्रत-से खोग॒विषय-मोग छोडकर पुनः राञ्यादि मोग 

निचत्तभोगस्तदपेक्षया ददत्‌ । मिकनेकी इच्छसे ही दान-घुण्य करते हैँ ओर नँ फिर 
जन्म ठेकर सवसरे वडा परम खतन्त्र सम्राट होऊं ।' रेसी 

पुनश्च भूयेयमहं श्वराडिति कामना रखकर तपरस्यामें भलीरभोति स्थित हो ञ्यभक्रमं 


करते हैँ | इस प्रकार जिसकी तृष्णा वदी हई है, वह कदापि 

| खी नहीं हो सकता ॥ ५२ ॥ अपने खख्पमें एकरस 
भवापवमों अमतो यदा भदे- (६ रहनेवाले भगवन्‌ । जीव्र अनादिकालसे जन्म- 
मृत्युरूप संसारके चक्रमे भटक रहा है । जब उस 
चक्ररसे च्टनेका समय आता है, तव उसे सत्संग प्राप्त 
होता है । यह निश्चय है कि जिस्‌ क्षण सत्संग प्राप्त 
सरसङ्गमो यहिं तदैव सद्रतौ होता है, उसी क्षण संतोके आश्रय, का्य-कारणद्ूप 
९ जगत्‌के एकमात्र स्वामी आपमें जीवकी बुद्धि अत्यन्त 

परावरेशे त्वपि जायते मतिः ॥५७]] तासे ल्ग जाती है ॥ ५४ ॥ भगवन्‌ । मँ तो रेसा 
समञ्ञता द कि आपने मेरे ऊपर परम अनुगम्रह्की वां 


की, क्योकि बिना किसी परिश्रमके --अनायास ही मेरे 
राञ्यका बन्धन द्ूट गया । साधु-स्रभावके चक्रवती 
राजा भी जत्र अपना राज्य छोडकर एकान्तम भजन- 


ग्रतरद्रतर्षो न सुखाय कसपते ।।*५३॥ 


जनख तद्येच्युत सरसमागम्‌ः 


मन्थे ममायुप्रह श ते ङतो 





राञ्यादुवन्धापगपो यचरच्छया 


॥ 







चनं निविक्षद्धिरखण्डभूमिवैः ॥॥५५॥ 










न॒ कामयेऽन्यं तव पाश्देवना- 





दकरिश्चनप्राथ्यंतमाद्‌ वरं विभो। 


आराध्य कस्त्वां छ्यपवर्गदं हरे 





वृणीत॒ आर्यो वरमात्मबन्धनम्‌ ॥५६॥ 


क 


(= १९ ए 1 र < 
छ ~ न; य यनन 


4 0 
ए" श 


साधन करनेके उदेश्यसे वनमें जाना चाहते हैँ, तब 
उसके ममता-बन्धनसे मुक्त होनेके व्यि बडे प्रेमसे 
आपसे प्रार्थना किया करते हैँ ॥ ५५ ॥ अन्तर्यामी प्रभो! 
आपसे क्या चिप है १ में आपके चरर्णोकी सेवके ` 
अतिरिक्त ओर कोहं भी वर नहीं चाहता; क्योकि . 
जिनके पास किसी प्रकारका संग्रह-परिम्रह नही हे 1 
अथवा जो उसके अभिमानसे रहित हैवेखोगभी 
केवल उसीके व्ये प्रार्थना करते रहते हैँ । मगवन्‌ ! ` 
भला, बतलाइये तो सदही-मोक्ष देनेवाे अ राधना 
करके देसा कौन श्रेष्ठ पुरुष होगा, जो अपनेको बोधने- 
वाके सांसारिक विषर्योक भ ५६ ॥ इसव्यि 

| क. प्रमो । मैं सत्वगुण, रजोगुण ओर तमोगुणसे सम्बन्ध 
॥  / रखनेवाटी समस्त कामनाओको छोडकर केव मायाके 


ह 
। 






४५७ श्रीमद्(गवत | | अ० ५१ 


=------~-~----------------------------------------------~-----~------------- ~~~ --------- -------------------------- ~ 








निरञ्जनं निथणमदयं परं लेरामात्र सम्बन्धसे रहित, गुणातीत, एक--अ्वितीय, 
चि्स्वरूम परमपुरुष आपकी शरण ग्रहण करतां 
त्वां ज्प्षिमात्रं पुरुषं अरजाम्यहमर्‌ ॥५७} | द्वं ॥ ५७॥ मगवन्‌ ! मै अनादिकाटसे अपने कर्मफरेको 
मोगते-मोगते अत्यन्त आतं हो रहा था, उनकी दुःखदं 
चिरमिह घजिनास्तप्यमानोऽलतापै- उवा रात-दिन सुद्चे जलाती रहती थी । मेरे छः श्र 
ष 3 ः ( पाच इन्द्रिय ओर एक मन ) कभी शान्त न होते थे 
रविहषषडमित्रोऽखन्धशान्तिः कथाञ्चत्‌ । उनकी विषरयांकी प्यास बदृती दी जा रदी थी। 
कभी किसी प्रकार एक क्षणक व्यि भी मुञ्चे शान्ति 
इरणद्‌ सयुपेतस्त्वत्पदान्जं परात्म- न॒मिटी | इारणदाता ! अव में आपके मय, मृघ्यु 
व ओर शोकसे रदित चरणकमलोंकी शरणमे आया दव | 
न्नभयम्रतमश्ोक{पाहि माऽऽपन्नमीन् ^<} सारे जगतके एकमात्र खामी ! परमात्मन्‌ | आप सूच 
रारणागतकी रक्षा कीजिये ॥ ५८ ॥ 
श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्चीछृष्णने कटा-- सार्वभौम महाराज । 
गेलि तुम्हारी मति, तुम्हारा निश्चय बड़ा ही पवित्र ओर ऊंची 
सावभौम महाराज मतिस्ते विमलोजिता । कोटिका है | यद्यपि मने तु्ं बार-बार बर देनेका 
प्रढोभन दिया, फ्रि मी तुम्हारी बुद्धि कामनाअके 
अधीन न इई ॥५९॥ मेने तुम्हं जो वर देनेका प्रगोभन 
दिया, वह केवर तुम्हारी सावधानीकी परीक्षके ्ि | 
मेरे जो अनन्य मक्त होवे है, उनकी बुद्धि कमी 
कामनाओंसे इधर-उधर नहीं भटकती ॥ ६० ॥ जो 
लोग मेरे भक्त नहीं ह्योत, वे चाहे प्राणायाम आदिक दात 
अपने मनको वदाम करनेका कितना ही प्रयतत क्यों न 
कर, उनकी वाक्तनाए्‌ क्षीण नहीं होतीं ओर राजन्‌ । 
उनका मन फिरसे विषर्योके ल्य मचल पडता है ॥६१॥ 
तुम अपने मन ओर सारे मनोभार्वोको सुञ्चे समपिंत कर 
दो; सुञ्चमे चखणा दो ओर फिर खच्छन्दखूपसे पृर्वीपर्‌ 
विचरण करो । सुमे तम्हारी विषयवा नान्य निल 
भक्ति सदा बनी रहेगी ॥ ६२ ॥ तुमने क्षत्रियधमंका 
अस्त्वेव नित्यदा तभ्य भक्तेम॑य्यनपायिनी ॥६२॥ | आचरण करते समय शिकार आदिके अवरस्पर बहत- 


पलितो ज ¢ से पञ्यओंका वध किया है | अब एकाप्रचित्तसे मेरी 
शात्रभमखितो जन्त न्यवधीशचगयादिमिः । उपासना करते इए तपस्याके दारा उस पापको धो 





४ | 


वरे; प्रलोभितस्यापि न कामेविंहता यतः ॥५९॥ 
भ्रलोभितो बरैयेरयमप्रमादाय विद्धि तत्‌ । 
न धीमेय्येकमक्तानामाशीभिर्भि्यते कचित्‌ ॥६०। 
युञ्ञानानामभ॑क्तानां प्राणायामादिभि्मनः। 
अधषीणवासनं राजन्‌ दृश्यते पुनरुत्थितम्‌ ।६१॥ 


विचरख महीं काप सय्यावेश्षितमानश्षः । 


=. समादितस्तत्पसा जहयधं मदुपौश्रयः ।६२; | लो ॥ ६३ ॥ राजन्‌ । अगले जन्मने तुम बामण 
9 ९ बनोगे ओर समस्त प्राणियोके सन्ये हितेषी, परम खद्‌ 
ह | जन्मन्यनन्तरे राजन्‌ स्ेभूतसुद्ृतमः । हओ तथा किर मुञ्च विञयद् विज्ञानघन परमा्माको 
| भूत्वा दविनवरसत्ं वै मावैष्यसि केवलम्‌ ।॥६४॥) | प्रा करो ॥ ६४ ॥ 


इति श्रीमद्भागवते महापुराे पाय संहितायां दशामस्कन्वे उत्तरे 
„_ _ अ  सदकदत्ततिनागेकपश्ायतमोऽयायः॥ +~ - --------- भुचकुन्दस्तुतिनांमैकपश्चादात्तमोऽध्यायः.॥ ५१ ॥ 
१" य° । २. कचिदुस्थितम्‌ । ३. पाभयः | ४, न्धे यवनवधो छुुुन्दल ष्य 





` आजगाम 


\ 


अ० ५२ ] 


दशम्‌ स्कन्ध 





७५९५ 








भि काः ` तिः जिः तः ति अजि तं ति जि 


अथ द्विपञ्चारातमोऽधष्यायः 


द्वारकागमनः श्रीवखरामजीका विवाह तथा श्रीकृपष्णके पाख रूकिमणीजीका खन्देशा ठेकर व्राह्यणका आना 


श्री्ुफ़ उवाच 
इत्थं सोऽनुग्रहीतोऽङ् कष्णनेक्ष्वाङ्कनन्दनः 1 


तं परिक्रम्य संनम्य निश्चक्राम गुहाप्रखात्‌ ॥ १॥ 
स वीक्ष क्चुटलकान्‌ मत्यान्‌ पश्चन्‌ बीरुढनस्पतीन्‌ । 
मत्वा कलियुगं प्राप्तं जगाम दिशथुत्तराम्‌ ॥ २॥ 
तपः श्रद्रायुवो भर निःसङ्खो युक्तसंश्चयः। 


समाधाय मनः कृष्णे प्राविशद्‌ गन्धमादनम्‌ ३॥ 


बदयाश्रममासायय नरनारायणालयम्‌ । 
सवदन्द्रसहः शान्तस्तपसाऽऽराधयद्धरिम्‌ ॥ ४ ॥ 


भगवान्‌ पुनराव्रज्य पुरीं यवनवेष्डिताम्‌ । 
हत्वा ञ्ङेच्छबलं निन्ये तदीयं द्वारकां धनम्‌! ५॥ 


नीयमाने धने गोभिनरभिशधाच्युतचोदितैः । 
जरासंधल्लयोविंशत्यनीकपः ॥ ६ ॥ 


विलोक्य ॒वेगरभसं रिपुसैन्यसख माधवौ । 
मयुष्यचेष्टामापन्नो राजन्‌ दुद्रबतद्ंतम्‌ ॥ ७॥ 


विहाय वित्तं प्रचुरमभीतौ भीरुभीतवत्‌ । `. 


पद्भयां पद्मपलाशाभ्यां चेरतबहुयोजनम्‌ ॥ ८ ॥ 


` प्रलायमानो तौ दृटा मागधः प्रहसन्‌ बरी । ` 
 , ` & के । २. मु यने इते। 





शरीटयुकदेवजी कहते ह- प्यारे परीक्षित्‌ | भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने इस प्रकार इद्वाकुनन्दन राजा सुचुकुन्दपर 
अनुग्रह किया | अव उन्हानि भगवरान्‌की परिमा की; 
उन्दं नमस्कार किया ओौर गुफासे बाहर निकटे ॥ १॥ 
उन्दने बाहर आकर देखा कि सन-के-सवर मनुष्य, 
पञ्च; कता ओर वृक्ष-वनस्पति पहकलेकी अपेक्षा बहत 
छोटे-छोटे आकारके हो गये हैँ । इससे यह जानकर 
कि कच्युग आ गया, वे उत्तर दिद्ाकी ओर चर 
दिये ॥ २ ॥ महाराज मुचुकुन्द तपस्या, श्रद्धा, चैवं 
तथा अनासक्तिसे युक्त एवं संशय-संदेहसे मुक्त ये । 
वे अपना चित्त भगवान्‌ श्रीकृष्णरमे च्गाकर गन्धमादन 
पवतपर जा पर्हैवे ॥ ३ ॥ भगवान्‌ नर-नारायणके 
नित्य निवासस्यान बदरिकिाश्रममें जाकर बडे शान्तमाव्रसे 
गमी-सदी आदि दन्द सहते इए बे तपस्याके द्रारा 
भगवान्‌की आराधना करने लगे ॥ ४ ॥ 


इधर भगवान्‌ श्रीकृष्ण मथुरापुरीमें लेट आये । 
अवतक कालयवनकी सेनाने उसे घेर रक्खा था । अब 
उन्होने म्ठेच्छकी सेनाका संहार किया ओर उसका सारा 
धन छीनकर द्वारकाको ठे चठे || ५॥| जिस समय भगवान्‌ 
श्रीकृष्णके आज्ञानुसार मनुष्यों ओर बेरोपर वह धन छे 
जाया जाने च्गा, उसी समय मगधराज जरासन्ध फिर 
(८ अटारहवीं बार ) तेस अक्षौहिणी सेना लेकर आ 
धमका ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ ! शत्रु सेनाका प्रवर वेग देख- 
कर भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बरराम मनुष्योकी-सी टीय 
करते इए उसके सामनेसे बड़ी फुर्तीके साथ भाग 
निकले ॥ ७ ॥ उनके मनमें तनिक भी म्य न था। 


| फिर मी मानो अत्यन्त भयमीत हो गये हइ प्रकार- 


का नाय्व करते इए, वह सब-का-सब धन वहीं छोड़कर 


¦ अनेक योजर्नोतक ते अपने कमख्दल्के समान सुकोमल 


चरणोसे ही- पदु भागते चङे गये ॥ ८ ॥ जब 


¦ महाबली मगधराज जरासन्धने देखा कि श्रीकृष्ण ओर 


वराम तो भाग रहे है, तब वह्‌ हंसने गगा जर 


४५६ श्रीमद्भागवत | अ० ५२ 





=== _________~-_~_____-______________________~_~_~_~_~_~-~-~---~~____ "गी का 


अनध षिद्‌ रथानीकेरीश्चयोरममाणवित्‌ ॥ ९ ॥ | अपनी रय-तेनाके साय उनका पीछा करने वगा । उसे 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बलरामजीके रे, प्रभाव आदिः 
काज्ञान न था | ९ ॥ बहत दूरतक दौडनेके कारण 
दोनों भाई जु थक-से गये | अब वे वहूत ञंचे 
प्रषेण पर्वतपर चद्‌ गये । उस पर्वतका वर्णः 
गिरौ निरीनावाज्ञाय नाधिमम्य पदं नप । नाम इसतव्यि पड़ा था कि वरहो दा हयी मेष वषा 
किया करते ये ॥ १० | परीक्षित्‌ ! जव जगासन्धने 
देखा कि वे दोनों पहाडमें छिप यये ओर्‌ ब्रहत दरँढनेपर 
भी पता न चछा, तव्र उसने ईधनसे भरे हए प्रवर्षण 
तत उत्पत्य तरसा दद्यमानतटादुभौ | | पवतके चार्यो ओर आग खगवाक्र उसे जटा दिया॥११॥ 
| जव भगवानूने देखा कि पवतके छोर जलने लगे है, 
दश्ेकयोजनोतङ्गानिपेततुरधो वि ॥॥१२॥ | तब दोनों माई जरासन्धकी सेनाके घेरो लोँधते इए 
बड़ वेगसे उत ग्यारह योजन ८ चौवाटीक्च कोस ) ॐ 
पवेतसे एकदम नीचे धरतीपर कूद आये ॥ १२ ॥ 
& राजन्‌ । उन्हं जरासन्धने अथवा उस्तके किसी सैनिकने 
स्वपुर पुनरायाता समुद्रपर्खां प १३ | देखा नहीं ओर वे दोनों भाई वहसे चलकर फिर अपनी 
। समुद्रसे धिरी हरं द्वारकापुरीमे चले अये ॥ १३॥ 
। जरासन्धने ्ूठमूढ देक्षा मान लिया कि श्रीकृष्ण ओर 
ध ४ । बलराम तो जल गये ओर किर दह अपनी बहत बड़ी 
बरनाच्न्य छमहन्मगधान्‌ मागधो ययो ॥५४॥। सेना लोटाकर मगधदेशको चला गया ॥ १४ ॥ 
आनत्तीधिपतिः श्रीमान्‌ रेवतो रेवतीं सुताम्‌। | यह बात पै तुमसे पहले ही ( नवम स्कन्धे) 
चोदित कह लुका द्र किं आनतेदेशके राजा श्रीमान्‌ रैवतजीने 
महा प्रादाद्‌ बलाथेति परोदितम्‌। ।९५॥ = नामरी कन्या ब्रह्माजीकी न नलराम- 


भगवान गोविन्द उपयेमे |  -जीके साय व्याह दी ॥ १५ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
र 2 श्रीकृष्ण भी स्वयवर्मे आये इए शिद्युपाठ ओर उसके 


पक्षपाती श्ल्व आरि नरपति्योको बच्प्र्क हराकर 
सबके देखते-देखते, जेसे गरुडने सुधाका हरण किया 
था, वैसे ही विदर्भदेशकी राजकुपभारी रुक्रिणीको हर 





रत्य दूरं संश्रन्ती तङ्गमारुहतां भिरिम्‌ । 


प्रवषंणाख्यं भगवान्‌ नित्यदा यत्र वर्षति ॥१०॥ 


ददाह गिरिमेषोभिः समन्तादननिभुत्य॒जन्‌ ।११॥ 





अलश्यमाणी र्णा सानुगेन यदृत्तमौ । 





सोऽपि दग्धापिति मृषा मन्वानो बलकेशवौ । 


द्भ भीष्मकसुतां भियो मात्रां सयंवरे ॥१६॥ 


` अम्य तरसो रज्ञः शाखवादीश्चेयपकषगान्‌ । ` छाये भौर उनसे विवाह कर च्या । स्त्रिमणीजी राजा 
पश्यतां सवंलोकानां ता्यपुत्रः सुधामिवं ॥१७॥॥ मीपमककी कन्या ओर स्वयं मगवती कदमीजौका अवता 
| 5 1 ९ 


राजा परीक्षित्‌ने पूा-मगवन्‌ | हमने सुना है 
भगवान्‌ भीष्मकसुतां रुक्रिमणीं रचिराननाम्‌ | | किं भगवान्‌ श्रीकरष्णने भीष्मकनन्दिनी परंमञुन्दरी 


विधानेन देवीको बल्धूर्वक हरण करके राक्षप्तविधिसे उनके 
राक्षसेन विधानेन उपयेम इति श्चुतम्‌ ॥१८॥ । रुकिमिणीदेवीको बध्व 


वच्छरोत॒मिच्छामि साय विवाह किया धा ॥ १८ ॥ गरज १ 3 । 
भगव्ट्रो मि इृष्णय्यामिततेजस; | । यषः घुनना चाहता द कि परम तेजखी भगवान्‌ ष्ण 


` ० = 4 34 अ . ~. कः 2 
क # * ^~ ~ - 9 त नर ~ प ¢ 2 23 > त ह त 
2 ॥ (न ~~ ~ क. # ण 
~ क र ४ नः --. 9 प ल + - + = 
ष 3 ४६ ऋ - न्नः । ~ 
स~ + न 


"नवि - ~ र 
() ३१. ॥ प *.५ 4 
न > ^ ॥ द 1 4 ४ नः ++ ^ 
¶ 


4 


8 9 + 
¢ भं ८, 
"क ~ 





१ 


। 
। 
५ 
। 
| 













यथा मागधलशास्वादीन्‌ जित्वा कन्याघुपाहरत्‌।१९॥ 


बह्मर्‌ इष्णक्थाः पुण्या साध्वीर्छाकमरापहाः । 


को चु ठप्येद भृण्वानः श्रुरन्ञो निस्यनूतनाः !\२०॥ 
श्रीकर उवाच 
¢ 


राजासीद्‌ भीष्ण नाम विद्भौधिपतिमंहपद्‌ । 


भ) १ 
तस्य पन्ठाभवन्‌ पुत्राः कन्यका च्‌ वुरर्न्‌ा 1२९ 


रुदस्यग्रजो स्वम्रथो सवसबाहुरनन्तरः । 


सुष्मकेशो हकपपारी ₹किमण्येवां खप्ता सदी ।॥२२॥ 
सोपश्चुत्य ॒युङ्न्दख्य स्यवीर्सुणशिय्‌ः । 


गरहागतेगींयभानंस्तं येने सदशं पतिस्‌ ।॥२३॥ 
तां बुद्धिरक्षणीदायंरूपरीरगुणाशभ्रयाम्‌ । 
कृष्णश्च सदश्चीं भायां सघुद्रोढ़ं मनो द्धे ॥ २४) 
बन्धूनभिच्छतां दातु कृष्णाय भगिनीं चप ¦ 


, ततो निवाय इष्णद्धिड शदमी चैयभपन्यव ॥२५॥ 


तद्वेत्यासितापाङ्गी बेदभीं दुमना भखम्‌ । 


विचिन्त्याप्त द्विजं कश्चिद कृष्णाय प्राहिणोद्‌ ठुतम्‌२६। बहत इछ सोच-वि 


* व्द्रायाणरूवाच । २. मन्‌ त | ¬~ 
भाग स ० ल २. ५८ ह = 





== ~ त 
ह इ ॥ 


> क > = ह 
अ 2 ल ति ` 
व + + # ५ 
= रु ५ = क # 
= "शण; 


जरासंध, दाल्व आदिः नरपतिर्योको जीतकर किंस 
प्रकार रुकिमणीका हरण किथा १॥ १९ ॥ ब्हरधं । भगवान्‌ 
श्रीकृष्णकी छीला्थोके सम्बन्धे क्या कहना है १ वे 
खयं तो पवित्र हैँ ही, सारे जगत्‌ क्षा मन धो-वह्याकरर उसे 
भी पवित्र कर देनेवारी हैँ | उनमें देप टोकोत्तर माधुरी 
है, जिसे दिन-रात सेवन करते रढनेपर भी नित्य नया- 
नया रस मिक्ता रहता है । भव्य ॒देसा कौन रसिकः, 
कोन मर्मज्ञ है, जो इन्दं सुनकर तृप्त न दहो 
जाय ॥ २० ॥ 


श्रीद्यकदेवजी कते है-- परीक्षित्‌ ! महाराज 
भीष्मक विदभ॑देराके अधिपति थे | उनके र्पाोच पुत्र 
ओर एक सुन्दरी कन्या थी ॥ २१ ॥ सतवसे बडे पुत्रका 
नाम था स्क्मी ओर चार छोटे थे- जिनके नामय 
क्रमशः स्क्मरय, स्कमवाहृ, सुक्मकेडा ओर स्क्मपाठी | 
इनकी वहिन थीं सती रङ्गिणी ॥२२॥ जवर उसने 
भगवान्‌ श्रीकृष्णके सौन्दयं; पराक्रम, गुण ओर वैभवकरी 
प्ररांसा सुनी--जो उसके महल्मे आनेश्राठे अतिथि 
प्राय; गाया ही करते थै-- तब उस्तने यदी निश्चय किया 
कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही मेरे अनुरूप पति हैँ ॥ २३ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी समन्ते थे क्कि *रुकिंपणीमें बडे 
सुन्दशसुन्दर छश्रण दै, वह परम बुद्धिमती है; उदारता, 
सौन्दय, शीट्खमाव ओर गुणोमे मी अद्ितीय है।॥ 
इसव्ि रुकिमिणी ही मेरे अनुरूप पती है 1 अत 
भगवानने स्विमिणीजीसे विवाह करनेका निश्चय 
किया ॥२४॥ रुकरिमणीजीके भाईजन्धु भी चाहते ये किं 
हमारी बहिनक्षा विवाह श्रीकृष्णे ही हो । परतु ङक्मी 
श्रीकृष्णसे वड़ा द्वेष रखता या, उसने उन्हे विवाह 
करनेसे रोक दिया ओर शिश्चुपा्को ही अपनी बहिनके 
योग्य वर समज्ञा ॥ २५ ॥ | 







मेरा वडा भाई सक्भी शिञयुपाख्के त साय मेरा 1 


करना चाहता है, तव वे वत उदाः १ हो गयी । उन्होने 


स्कर एक विशवासपात्र ब्राह्मणक 


कः = दद 


= > 








छ -स- = 


= = क कि ॐ 
















~ 61 89११" क 
-<- 3 ०४. 
| + 3 


^ क १ 
१ + च प ॥ 
-= (न - 9 क १ १. 


४ व 5 ५ 2 
४ ५१ ९. 
+ कै ८.2६. ` 2 


" “= ~ ~ ग ठ, ४५६ 


 असतषटोऽसषृष्टोकानाप्नोत्यपिं 


४५८ ` 


भीमद्भागवत 








दारका स समभ्येत्य प्रतीहारे; प्रवेशितः । 


अपरस्यदाद्य पुरुषमासीनं काश्चनासने ॥२७।। 


द्रा न्रह्मण्यदैवस्तभवरद्य निजासनात्‌ । 


उपवेर्याहंयाश्वक्रे यथाऽऽत्मानं दिवौकसः ॥२८} 
तं युक्तवन्तं विभ्रान्तञुषगम्य सतां गतिः । 
पाणिनाभिश्रशन्‌  पादावव्यग्रस्तमए्च्छत ॥२९॥। 
कच्चिद्‌ दिजव्रथेष्ठ॒धर्मस्ते वरद्धसम्मतः । 
वतेते नातिदृष्द्रेण संतु्टमनघः सदा ।२०। 
संतष्टो यदहिं वतत त्राह्मणो येन केनचित्‌ । 
अहीयमानः खाद्धमौत्‌ स य्याखिलकमधुक्‌।। ३१ 
सुरेश्वरः | 
अक्रिचनोऽपि संतुष्टः रोते सर्वाङ्गविज्वरः २२॥ 
विप्रान्‌ खलभंतुशटाच्‌ साधून्‌ भूतसुहृत्तमान्‌। 
निरहकारिणः शान्तान्‌ नमस्ये शिरसासङ्त्‌ ।॥२३॥ 


कृचिद्‌ वः कुश्च ब्रह्मन्‌ राजतो थख हि प्रजा, 


सुख बक्षन्ति विषये पाट्यमानाः स मे प्रियः ।॥२४॥ 


यतस्त्वमागतो दुगं निस्तीयह यदिच्छया । 


£ «= द -- -- 


तुरंत श्रीकृष्णके पास मेजा ॥ २६ ॥ जब वे ब्राहमण- 
देवता द्वारकापुरीमें पदट्॑चे, तब द्वारपा उन्हे राजमहव्के 
भीतर ठे गये । बह जाक१ ब्राह्मणदेवताने देखा कि भादि- 
पुरुष भगवान्‌ श्रीकृष्ण सोनेके सिंहासनपर विराजमान 
है ॥२७॥ ब्राह्मणक परमभक्त गवान्‌ श्रीकृष्ण उन 
ब्राह्मणदेवताको देखते ही अपने आक्षनसे नीचे उतर्‌ गये 
ओर्‌ उन्हं अपने आसनपर वैटाकर वैस दी पूजा की, 
जेसे देवतालोग उनकी ८ भगवान्‌की ) करिया करते 
है ॥ २८ ॥ आदर-सत्कार, कुराल-प्ररनकरे अनन्तर जव 
ब्राह्मणदेवता खा-पी चुके, आराम-विश्राम क्र चुके तत्र 
संतकि परम आश्रय भगवान्‌ श्रीकृष्ण उनके पास गये 
ओर अपने कोमल हारथोखे उनके पैर खडव्यते हुए बडे रान्त- 
भाव्रसे प्रछने गे--॥२९॥ श्राह्यणरितेमणे ¡ आपका 
चित तो सदा-सर्वदा संतुष्ट रहता है न ! आपको, 
अपने पूरव पुरपद्रारा खीकरत धमका पाटन करने कोई 
कठिना तो न्दी होती ॥ २० ॥ ब्राह्मण यदि जो कुछ 
मिक जाय, उसीमे संतुष्ट रषे ओर अपने धमम॑का पालन 
करे, उससे च्युत नहो, तो वह संतोष दही उसकी 
सारी कामनार्पं पूण कर देता है ॥ ३१ ॥ यदि इन्द्रका 
पद पाकर मी किसीको संतोषनदहौतो उभे ुखके 
च्ि एक लोकसे दूसरे कोकमें बार-बार भटकना पड़ेगा, 
वह कहं भी शान्तिसे वेठ नद्यं सकेगा । परतु जिसके 
पास तनिक भी संग्रह-परिपरह नहीं है ओर जो उसी 
अवस्थामे संतुष्ट है, वह सब प्रकारसे स्तापरहित 
होकर घुखकी नींद सोता है ॥ ३२ ॥ जो खये प्रष्ठ 
हई वस्तुसे संतोष कर ठेते है; जिनका शठमाव 
बडा ही मधुर है ओर जो समस्त प्राणि्योके परम हितेषी, 
अह काररहित ओर शन्त है--उन ब्राह्मणको में सदा 
तिर घ्चकाकर नमस्कार करता द्र ॥ ३२ ॥ ब्राह्मणदेवता । 
राजाकी धोरसे तो आपलोोंको सब प्रकारकी सुविधा 
है न ९ जिसके राज्ये श्रजाका अच्छी तरह पाकन होता 
हे ओर वह भानन्दसे रहती है, वह रजा सुद्चे बहत ही 


प्रिय है | २९ ॥ ब्राह्मणदेधता | आप कसि, क्सि ` 


हेतुसे ओर किस अभिकाषासे इतना कठिन मार्ग तय 
करके यह प्ररे ह १ यदि कोई बात विरोष गोपनीय 


चेत्‌ किं कायं कखाम ते ॥३५॥ न हयो तो हमसे किये । इम आपकी क्या सेवा 


| अ० ५३ 


॥ ` ` 


चै ॥ 
# कि # त # 








च आयाः ` = 9 अगो आक द कार तान ॐ "आ न= कः कः कः ¬" जानना क ॐ = १ क 1 1 ५१ 1.1 यिप पिसीम षी मी | "त कः वः जकः कः = चो ऋतकः ` ऋः = 
0 तोमः नि "य-म चक 9 च 


एवं सम्प्र्टसस्त्रश्चो ब्राह्मण; परमेष्ठिना । 


नीमि मी गी 


करे ? ॥२५॥ परीक्षित्‌ ! कीस दी मचुष्यख्य धारण 
करनेवाठे भगवान्‌ श्रीृष्णने जव ईप प्रकार ब्राह्मण- 
देवतासे पृचछा, तव उन्होने सारी बात कह सुनायी । 


इसके वाद वे भगवानूसे स्क्रिमणीजीका संदेश कहने 
॥ २६ ॥ 



























रीरागृहीतदेहेन तस्मै सर्व॑मवणयत्‌ ॥२६॥ 


रषिमण्युवाच खक्रिमिणीजीने कहा है- त्रिभुध्रनघुन्दर ! आपकर 
गुर्णोको जो घुननेवाखोके कानि रास्ते हृदयम भ्रवेदय 
करके एक-एक अङ्गके ताप, जन्म-जन्मकी जन बुञ्ञा 
देते है तथा अपने रूप-पौन्दयको जो नेत्रवाठे जीरवोकि 
ेत्रोके व्यि धम, अथं, काम, मोक्ष-- चारों पुरुषा्थेकि 
फ एवं खार्थ-परमाथं सव कुछ हैँ, श्रव्रण करके 
प्यारे अच्युत ! मेर! चित्त लज, रार्म सव कुछ छोडकर 
आपर्मे ही प्रवे कर रहा है ॥ ३७ ॥ प्रेमखख्प 
रामसुन्दर ! चष्टे जिप्त दषस देख; कुक, शीर, 
खमभाव, सोन्दय, विया, अवस्था, धन-धाम-सभीमें 
आप अद्वितीय हैँ, अपने दी समान हैँ | मनुष्य-लोके 
जितने भी प्राणी हैँ, सबका मन आपको देखकर 
शान्तिका अनुभव करता है, आनन्दित होता है । अब 
पुरुषभूषण ! आप ही बतसखाश्ये-रेसी कौन-घी कुल- 
वती, महागुणवती ओर धैवती कन्या होगी, जो 
विवाहके योग्य समय आनेपर आपको ही पतिके रूपमे 
वरण न करेगी १ ॥२८]॥ इसीष्ये प्रियतम ! मेने आप- 
को पतिखूपस्े वरण किया है । मै आपको आत्मसमर्पण 
कर चुकी ह| आप अन्तयामी हैँ । मेरे इृदयकी बात 
आपसे छिपी नहीं है 1 आप यहाँ पधारकर स॒ञ्चे अपनी ` 
पीके रूपमे खीकार कीजिये | कमख्नयन ! प्राणव्छम ! . 
म आप-सरीखे वीरको समपिंत हो चुकी ह, आपकी ईह, ` 
अब जसे सिंहका भाग , सियार छर जाय, वैसे कदी 
रिड्धपार निकट्से आकर मे स्पशे न कर जाय ॥३९॥ ` 
मैने यदि जन्म-जन्ममे पूतं ८ कूर्भो, बावली आदि खुदः 
वाना ); इष्ट ( यज्ञादि करना ), दान, नियप, ब्रत. 
तथा देवता; ब्राह्मण ओर गुरु भदिकी प्रूजाके द्वारा ` 
भगवान्‌ परमेश्वरकी दी आराधना की हो ओर वे सुञ्चपर 


प्रसन्न हो, तो भगवान्‌ श्रीकृष्ण आकर मेरा पाणिग्रहण 
गृहातु मे न दमघोपसुतादथोऽन्ये ।\४०॥ । करे) शिष्पा अयवा दूर कोई भी पष भेर स्रौ 


श्रुत्वा गुणान्‌ शवनयुन्दर श्रृण्वतां ते 
निर्विश्य कण॑विवरैदरतोऽङ्गतापभ्‌ 1 
ख्यं चछा इश्चिमतामखिराथंराभं 
त्यय्यच्युताविशति वित्तभपत्रप मे ॥२३७ 
का त्वा सकन्द हती खशीलसूप- 
विद्यावयोद्रग्रिणधासभिरात्मतुस्यम्‌ । 
धीश पतिं इकवती न ध्रणीत कन्या 
काडे वृह नरखोक्रमनोऽभिरामम्‌ ॥२८॥ 
तन्मे भवाय्‌ ख वरतः पतिरङ्क जाय्‌- 
मातमार्पितश्च भवतीऽत्र बिभो विधेहि । 
मा वीरभागमभिमशंतु चैच आराद्‌ 
गो मायुबन्परगपतेबं लिमम्बुजाक्ष ॥३९॥ 
पूर्त्टदत्तनियमव्रतदेवविप्र- 
गुवचंनादिभिरलं भगवान्‌ परेश्चः । 


आराधितो यदि गदाग्रज एत्य पाणि 





न 
ॐ 


१,९ क. च क र भ्व ह र च 
। >| > ॐ ~ स» ॥ 


न) | क्रे क ५ 4 


{= # ~ 
# ¢ कैः ॥ =, 


गन 1१ त े + > "जः ~ ह "| | 


























1, 
व 4१. १; &१ १ 
"५४, । , 
4 न्क + 
॥ |] „4 
1 ४ # । "ॐ 
ए १ ++ ॐ १ 
छ + १ ९३ 
0 ` क्कि ५1 
# ^ € {१ 
क # 
म्‌ 


यस्या्विपङ्कजरजः स्नपनं 





श्वोभाविनि त्वमजितोदढहने विदान्‌ 
गुप्रः समेत्य प्रतनापतिभिः परीतः 
निम॑थ्य॒चे्यदगधेन्द्रबरं प्रस्य 
मांराक्षसेन दिधिनोदढह वीयंञयर्ास्‌।।४१।। 
अन्तःपुरन्तरचरीमनिहत्य बन्धु 
स्त्वायुढदे ङथमिति प्रवद्‌।्युदायय्‌ । 
पूवरस महती इलदेषियात्रा 
यखां बहिनंबचधूनिरिजाष्टपेथात्‌ ॥४२॥ 
महान्तो ` 
बाञ्छन्त्युमापतिखित्मतमोऽपदहस्यै। 
यद्यम्बुजाक्ष न कमय भवत्प्कादं 


जद्याम्रन्‌ वरतञ्रशाञ्छतजन्मभिः यात्‌॥।४३॥ 
बेद्धण उवाच 


` इत्येते गुध्संदेश्ा यदेव `मयाऽऽहृताः । 





श्रीमधागवत 


न कर स्के ४० ॥ प्रभो | 


[ अर ५३ । 1 











आप अजित हैँ | जि 


दिन मेरा विवाह होनेवाला हो, उसके एक दिन पहले 
आप हमारी राजघरानीमे गुप्खूपसे अ जाद्ये णोर फिर 
वडे-बड़ सेनापवियोके सथ रिद्युपार तथा जरासंधकी 
सेनाओंको मथ डस्य, तहस्त-नदस कर दीजिये ओर 

रूल क राक्ष्तिधिसे वीरताका मूल्य देकर मेरा पाणि 
प्रहण कीजिये ॥ ४१॥ यदि आप यह सोचते कि 
(तुम तो अन्तःपुरमे भीतरद्े जनाने मह्मं पहसके 


द्र रहती हो, त॒ 


हारे भार्‌-वन्धु्ओंक्रो मारे विना में 


तुमं कौसे ठे जा सकता द्र तो इसक्ता उपय मै आपको 
वतलये देती द्र | हमारे कुञ्का दक्षा नियम है किं 
विवाहके पहले दिन दुख्देधीका दशन करनेके च्य 
कृ वहत वङ़ी यात्रा होती ह, जुद्धप्त निकक्ता दै-- 


जिषमं विवाह जानेवाटी क्न्याकः 





कपटनयन । उमापति भगग्रान्‌ संकर 
मह पुर्ष मी आस्मञ्युद्धिके ल्य अःपन्ने 
धूलसे स्नान करना चाहते दँ । यदि 


के लिये सेकड़ां जन्म क्यौ न येने पड 


छहिनको नगरे 
बाहर्‌ गिरिनादवीके मन्दिरमे जाना पडता 


॥ ४२॥ 


समानं वड़-तेड 
चरणकमलं 


[1 


मे आपका वहू 
प्र्ाद्‌, अपक वहन चरगधृर नहीं प्राप्त कर क्षकी तो 
दवारा शचयीरको दुखाकर प्राण छोड दूंगी | चाहे 


भी-न-कभी 


तो आपका वह प्रप्ताद अवरस्य ही मिसा ॥ ४३ ॥ 
बरह्मणदेषतने कदः-यदुवंशशिरोमणे | यदी सुकिमणी- 


के व्यन्त गोपनीय संदेश हैँ, निन्द 


रुविमण्युद्राहप्रस्तावे द्विपन्चारात्तमोऽव्यायः ॥ ५२ ॥ 
 -~अ+- 


अथ तरिपञ्चारात्तमोऽध्यायः 


सक्रिमिणीदरण 
। श्री्यकदेवजी कहते दै परीक्षित्‌ !। भगवान्‌ 


ठेकर्‌ में आपके 
आया ह| इसके क्म्बन्धमें जो कुक करना हो 
विचार कर गीजिथे ओर तुरत ही उसक्रे अनुसार कायं 
विस्य कतु यच्चात्र क्रियतां तदनन्तरम ।४४॥ | कीजिये ॥ ४४ ॥ 


शि 0 वकने 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दखमस्कन्धे' उत्तरार्धे 


अ० ५३ 1 


्रृ्य पाणिना पार्णिं प्रहसन्निदमत्रवीत्‌ ॥ १॥ 


ओ का ॐ क न कनन क 








| श्रीभगवानुवाच 
तथाहमपि तचित्तो निद्राच न रभे निशि) 


दद्य निवार्तिः।। २) 


वेदाहं रुकिमणा हेः 
तासानयिष्यं उन्मथ्य राजन्यापसदान्‌ मृधे । 


सत्एराषनचयाङ्गीगेधसोऽग्निहिखाभिव ॥३॥ 


श्रीयुक्त उवाच 
उद्वाहं च धविज्ञायं रुविप्ण्या सधुद्ूदनः । 
रथः संुज्यतापाञ्च दारुकैस्याह सारथिर ॥ ४॥ 


स॒ चाखंः सेव्धसुप्रीवमेषदुष्प । 
युक्तं रथद्रुएनीय दयो ब्रज्ञङिरयतः ।॥ ५॥ 


आर्घ्य खन्दनं सौरिद्धिजमारेप्य त्थगेः | 
आनत्तदिकरात्रेण विदभानभमद्धयेः ॥ & ॥ 
राजा स इण्डिनपततिः पुत्रस्नेहवक्षं गतः 1 

शिप स्वां न्यां दप्खन्‌ करमाण्य्धारथत्‌।७॥ 
पुर 
चिद्रष्वजपतकाभिस्तेरणेः 


सम्डटसंहिक्तमामरण्याचतुष्पथम्‌ । 
समलङ्कतम्‌ । ८ ॥ 
सगगन्धपराल्याभरणेविरनोऽस्बरूषितेः । 
जष्टं द्वीपुरुषैः शरीमद्गृदैरगुरुधूपितेः ॥ ९ ॥ 
< पितन्‌ देवान्‌ समभ्यच्यं विप्रश्च विधिवन्तूप । 








एक 


द त भो र जयित्वा यथान्यायं वाचयामास मङ्गरप्‌ ॥९० भोजन कणा शीर नियम्‌ पा स 


द्श्षम इन्ध 


कः क 





+ । (न 

ल थ [३ ^ 
= ट =, ६ १ कै 
५) प € ~ मी च द 
, भ 
१ न> 
ति "न्यक 
र [1 निनय नत 6 
8 प ¢" 








सुनकर अपने हाये ब्राह्मणदेतरताका हाय पक्ड च्या 
ओर हंक्ते इए यों बोडे ॥ १ ॥ 

भगवान्‌ श्रीरकृष्णने कदा-्राह्मणदेवता ! जैसे 
विदर्भराजङुमारी मु्े चाहती है वैसेद्ीमे भी उन्दें 
चाहता तर । मेरा चित्त उन्मि लगा रहता है । कँ 
तक कद्रुः मुञ्चे रातके समय नीदतक नहीं आती । मै 
जानता द्र कि रुश्मीने देषवद् मेरा किवाह रेक दिया 
दै ॥ २ ॥ परतु ब्राह्मणदेवता | भाप देखियेगा, जसे 
रकड्योको मथकर---एकःदूसरेसे रगड़कर मनुष्य 
उनमेसे आग निका केता है, वैसे ही युद्धे उन नाम- 
धारी क्षत्रियज्ुक्कचङ्कोको तहस-नहस करके अपनेसे 
प्रेम करनेवाी परमघुन्दरी राजकुमारीको मै निकाठं 
लाज्गा ॥ २॥ 

भीद्यकडेवजी कहते है-परीक्षित्‌ ! मधुसूदन श्री- 
कष्णने यह जान कर्‌ किं रुक्मिणीके क्रिाहकी खन परसो 
रात्निमं ह्वी है, सारथीको आज्ञा दी किं (दारुक ! तनिक 
भी विलम्ब न करके रथ जोत ओः ॥ ४ ॥ दासक 
भगवानूके रथे ओेन्य, घुम्रीव, मेधपुष्प श्नौर्‌ वत्हक 
नामके चार घोडे जोतकर्‌ उसे > आया ओर हाय 
जोडक मगवानके सामने खड़ा हो गया |] चूरनन्दन 
श्रीकृष्ण ्राह्मणद्वताको  पहङे रथपर चढाकर फिर आप 
भी सवार हए ओर उन शीघ्रगामी घोडके द!रा एक ही 
रातमरे आनतेदेरसे विदर्भदेशमे जा पहैचे ॥ ६ ॥ ` 


कुण्डिननरेरा महाराज भीष्मक अपने बडे ङ्के 
रभीके स्नेहवरा अपनी कन्या शिद्यपाठन्तो देनेके व्वि ` 
विवाहेतससवकी तैयारी करा रहे ये ॥७॥ नगरके राजपथ, 
चोराहे तथा गकी-कूये ्ाड्-बुहार दिये गये ये, उनपर 
किडकाव शिया जा चुका था 1 चित्र-विचित्र, रग-िरगी, ` 
छोटी-बडी श्लवियां ओर पतकार्पं चणा दी गधी थीं॥ 
तोरन बोध दिये गये ये ॥ ८ ॥ वहके ची-पुरुष पुष्प- ` 
माज हारः इतरसुञेढ, चन्दन, गहने ओर निन बसे र = 
सजे इए थे । वर्हकि सुन्दर-सुन्दर घरोमिसे अगरके धूपकी 


सुगन्ध फठ रही थी ॥९॥ परीक्षित्‌। राजा भीष्मकने पितर ` 


द 


ओर देवताओंका विषिपूर्वक पूजन करके ्राहमणोंको 3 













न्द > 
१ + ति च । न < 
। ऋः ७ 4९. अ 
+ & च्‌ चैः ४, 
.* प क 
नध 3 3 








( 
॥ \ 











++ 4  # 

श किः» + 

1 ^ च #. 

-- 1 | + पि ट 

ज ५ । अक, 

= । 4 ४ 
रं #५। + 2 ~ भम 
षि ¢ १1 † "व 
| क. | ह च्यु. ^ का 

॥ 8, 4 

| # १४ ह € 
॥। ~ 
क 


४६२ 





चरकाः ऋ 
{1 क य ` क 9 ^ नि 


सुस्नातां सुदतीं कन्यां ृतकोत॒कमङ्गलाम्‌ । 





अहतांशकयुग्मेन भूषितां भूषणोत्तमेः ॥११॥ 


९.३0 


चक्तः सामग्यलमंन्त्रव्॑वा रक्षां द्विजोत्तमाः । 
पुरोहितोऽथविंद्‌ बे जुहाव ग्रहशान्तये ॥१२॥। 
हिरण्यरूप्यवासांसि तिलांश्च गुडमिभितान्‌ । 
प्रादाद्‌ धेन विप्रेभ्यो राजा विधिविदां बरः॥१३॥। 


एवं वचेदिपती राजा दमधोषः सुताय वें। 


५ © व 


कारयामास मन्त्रज्ञः सवेमभ्युदयोचितम्‌ ॥१४॥ 


न्त, 


मदच्युद्धिगंजानीकैः 


खन्दनेहेममालिभिः। 
परयश्वसङ्कसेः सेन्यः परीतः इण्डिनं ययौ ॥१५॥ 
तं बे विदभोधिपतिः समभ्येत्याभिपूज्य च । 
निवेशयमाघ्च खदा कलिपितान्यनिवेशने ॥१६॥। 
तत्र लवो जरासन्धो दन्तवक्रो विदूरथः । 
आनग्धुधेचपक्षीयाः पोण्ड्का्याः सदस्सश्षः ॥१७॥। 


ङष्णरामद्विषो यत्ताः कन्यां चे्याय साधितुम्‌ । 


(1 । ॥  यदागत्य हरेत्‌ ष्णो रामा्ैयदुभिंंतः ॥१८॥ 







; 6 
काव  - त=) 
== आओ # 


"क ` 
नि ` = 


"क "दु 


क 
त + 


योत्स्यामः संहतास्तेन इति निितमानषाः | 


॥ व ए © 
॥  आजग्ुभूश्चजः से समग्रबलवाहनाः ॥१९॥ 


धतेतद्‌ भगवाच्‌ रामो विपक्षीयनृपो्यमम्‌ । 


।.१६. त 


4 ध्‌ ~ 

# "दः 

¢ ॐ $ $ श क्यं 

गं चकं यतं हतु कन्यां करहशचङ्कितः। 

^। चतः ग = ध 9 

_" 3 4 की 9 ४१ 

द्‌ ^ (० ॥ 1 ध ( 
. विद्धि 


द्िजुश० । २.भिःसह। ` 
क ` 


शीमद्धाणवतं 





त ¬ अ 


| अ० ५३ 





चः कः = २ काः जः ` यातः = = त = चोका कके [रि 
भ ~ = 


सुश्चोमित दँतोवाटी परमघुन्दरी रजकुमापी 
रुकिमणीजीकरो स्नान करःया गया, उनके ह्ाथोमे मङ्गल- 
सूत्र कङ्कण पहनाये गये, कोहर बनाया गया, दो नये- 
नये वख उन्हें पहनाये गये ओर वे उत्तम-उत्तम आभूषर्णो- 
से त्रिभूषित की गयीं | ११॥ श्रे ब्राह्मगेनि साम, 
क्‌ ओर यजु्वेदके मन्तरोसे उनकी रक्ता की भर जथव- 
वेदके विद्यान्‌ पुरोहितने ग्रह शान्तिके व्यि हवन किया] १२। 
राजा भीष्मक कुरुपरम्परा ओ शासख्लीय भरिप्रियकि बड़ 
जानकार थे | उन्होने सोना, चदी, वख, गुड़ मिले इए 
तिल भौर गों ब्राहर्णोक्तो दीं ॥ १३॥ 

इसी प्रकार चेदिनरेश्च राजा दभपघोषने भी अपने पुत्र 
चिद्युपारुके ल्यि मन्त्रज्ञ ब्राह्मनोँसे अयने पुत्रके विवाह- 
सम्बन्धी मङ्घच्कृव्य कराये ॥ १४ ॥ इसके वाद्‌ वे मदं 
चुआते इए हायि, सोनेकी मालाओेसे स नये इए र्थो, 
पैदल तथा घुडसवारोकी चतुरद्धिणी सेना साथ लेकर 
कुण्डिनपुर जा पर्हैचे ॥ १५ ॥ विदभराज मीष्मकने 
आगे भाकर उनका खागत-सत्कार ओर प्रथाके अनुसार 
अचन-पूजन किया । इतके बाद उन गोगो पहले 
ही निश्चित किये इए जनवाोँम आनन्दप्रवक ठहरा 
दिया ॥१६॥ उस वारातमं ज्ञात्व, जरासंध, दन्तवक्त्र; 
विदूरथ ओर पौण्डक आदि शिद्यपाख्वे सहसरं मित्र 
नरपति आये ये ॥ १७ ॥ वे सव राजा श्रकृष्म ओर 
बरुरामजीके विरोधी ये शोर राजकुभारी सक्िणी शिद्युपाल- 
को ही मिले, इस विचार्ये आये थे । उन्होने अपने- 
अपने मनमें यह पहले ही निश्चय कर स्वा था कि 
यदि श्रीकृष्ण बलराम आदि यदुवंरियोके साथ आक्‌ 
कन्याको हरनेकी चेष्ठा करेगा तो हम सत्र मिककर्‌ 
उससे क्डंगे । यदी कारण था कि उन राजाभनि अपनी- 
अपनी पूरी सेना ओर रथ, धोडे, हाथी आदि भी अपने 
साथर ष्िये॥ १८-१९॥ | 

विपक्षी राजार्ओकी इस तेयारीका पता मगतान्‌ 
बकरामजीको चज गया भौर जब उन्होने यक सुना किं 
मैया श्रीङृष्ण अकेठे ह्वी राजकुमारीका इरण करनेके 
न्म चङे गये दै, तब छन्दं वरां खडाई-क्गड़ेकी बद 


क 


श 





भवि । 
कैः ॐ 
4 १1 


~ नो) मो ~ न्ध = ˆ =@ "^ बव 
क 





अ० ५३ ] द्ञ्चम स्कन्ध ˆ बव ४६३ 








क 


इर ॥ २० ॥ यद्यपि वे श्रीकृष्णका बर-विक्रिम 
जानते थे, फिर भी भ्रातृस्नेहसे उनका इदय मर आया; 
वे तुरंत ही ह।थी, घोड़े, रथ ओर वैदर््ोकी वडी भारी 
चदुरङ्गिणी सेना साथ ठेकर्‌ कुण्डिनपुरके स्यि चठ 
पड़े ॥२१॥ 

इधर, परमुन्दरी रुक्रिमिणीजी भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
दयभागमनकी प्रतीक्षा कर रही थीं । उन्होने देखा श्री- 
कृष्णकी तो कौन कषे, अभी त्राह्मणदेवता भी नहीं लेटे! 
वे वड़ी चिन्तामें पड़ गयीं; सोचने व्णीं ॥२२॥ “अहो ! 
अव मुञ्च अभागिनीके विवाहम केवल एकं रातकी देरी 
दै । परंतु मेरे जीवन्वै कमठनयन भगवान्‌ अव 
भी नङ्षीं पधारे ! इसका क्या करण हो सकता है, कुछ 
निश्चय नहीं माम पड़ता । यही नही, मेरे संदे ठे 
जानेवाले ब्राह्मणदेवता भी तो अभीतक नहीं लौटे ॥२३॥ 
इसमें संदेह नहीं किं भगवान्‌ श्रीकृष्णका खरूप परम 
शद्ध दै ओर विड्युद् पुरुष ही उनसे प्रेम कर सक्ते 
है । उन्होनि सुषम कुछ-न-कुर बुराई देखी होगी, तभी 
तो मेरा हाथ पकडनेके व्ि-सुञ्चे खीकार करनेके 
विये उत होकर वे ययँ नहीं पधार रहे हैँ ॥२४॥ 
टीक है, मेरे भाग्य ही मन्द्‌ है | विधाता ओर भगवान्‌ 
शांकर भी मेरे अनुकूक नहीं जान पडते । यह भी सम्भव 
है कि रुद्रपत्नी गिरिराजकुमारी सती पावंतीजी सज्जसे 
अप्रसन होः ॥ २५ ॥ परीक्षित्‌ । स्विंभणीजी इसी 
उधेङ़-लुनमे पड़ी इई थीं । उनका प्षम्पूणं मन ओर. 
उनके सारे मनोभाव ॒भक्तमनचोर मगवानूने चुरा व्यि 
ये । उन्होने उन्हीको सोचते-सोचते (अभी समय है 
ठेसा समञ्चकर अपने ओंँसूभरे नेत्र बद कर व्यि ॥२६॥ 
परीक्षित्‌ । इस प्रकार रृक्िमिणीजी भगवान्‌ श्रीकृष्णे 
छुमागमनकी प्रतीक्षा कर रदी थीं । उी स्मय उनकी ` 
वायी जपि) धुना ओर नेत्र फड़कने खो, जो ` 
प्रियतमके आगमनका श्रिय संवाद सूचित कर रहे 
थे 1 २७ ॥ इतनेमें ही भगवान्‌ श्रीकृष्णके भेजे इए 
वे ब्राह्मणदेवता आ गये ओर उन्होनि अन्तःपुरमें राज- 


[म ६, 
+ 
च #॥ # क, 
॥ 
क ॥ 
॥ 


कुमारी रक्िमिणीको इस प्रकार देखा, मानो कोर ध्यान- 


बलेन महता साधं भराव्रस्नेहपरिष्ठतः । 
































त्वरितः ङण्डिन प्रागाद्‌ गजाश्चरथपत्तिभिः ॥२१॥। 
भीष्मकन्या वरारोहा काष्वन्त्यागमनं हरेः । 
प्रत्यापत्तिमपर्यन्ती डिजश्याचिन्तयत्तदा ॥२२॥ 
अहो त्रिया प्रान्तरित उद्वे सेऽद्पराधस्षः । 
नागच्छत्यरविन्दाक्षो नाह बेद्भ्यत्र कारणम्‌ 
सोऽपि नावतेतेऽयापि मलसंदेशहरो दिजः 1\२३॥ 
अपि मय्प्रनवदयात्मा शटा किञ्िज्जुगुप्सितम्‌। 
मत्पाणिग्रहणे नूनं नायाति हि कृतोचमः ।२४।॥ 
दुभगाया न से धाता नाञुकूरो महेश्वरः । 


देवी वा विग्रुखा गोरी रद्रणी गिरिजा ती ॥२५॥ 













एवं चिन्तयती बाटा गोषिन्दहतमानसा। 
न्यमीरुयत कारक्ञा नेत्रे चाश्रुकलाङ्कले ॥२६।। 
एवं वध्तराः प्रतीक्षन्त्या गोविन्दागपनं चप । 
वाम्‌ उरुथजो नेत्रमस्फुरन्‌ प्रियभाषिणः २७॥ 


` अथ छृष्णपरिनिदिष्टः स एव द्विजसत्तमः । 









अन्त्ःपुरवरीं देवीं राजपुत्रीं ददं ह ।२८ 


| | ^: सा तं अृष्टवदनमव्यग्रात्मगति सरी । 








0 ., ; 6 | 
। 41 ४६४ श्रीमद्भागवतं | अ० ५३ 











किसी प्रकारकी घबराहट नहली है । वे उन्हे देखकर 
जक्षणोसे ही समञ्च गयीं कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण आ गवे। 
फिर प्रसनतासे खिल्कर उन्दने त्राह्मणदेवतासे 
प्रा ॥ २९ ॥ तब ब्राह्यमदेवताने निवेदन कियिाकि 
भगवान्‌ श्रीङ्ष्ण यह पधार गये हैँ ¦; जौर उनकी मूहि 
भूरि प्रशसा की} यह भी बतलाया किं 'राजक्ुमारीजी। 

पको ठे जनिकी उन्होने सत्य प्रतिन्ञा की हैः ॥३०॥ 
भगवराचढः दयुमागपनक्ा स्पाचररि सुनकर सुक्रिपणीजीकां 
हृदय आनन्दातिरेकसे भर्‌ गया } उन्होने इ्के वदते 
| व्यि सनवानूॐ अतिरिक्त ओं 
देखकर केवठ नमस्कार कर च्या } अर्थात्‌ 
| समग्र लक्ष्मी ब्राह्मणदेवताको सोप दी ॥३१॥ 


आलय रक्चषणाभिज्ञा समण्रच्छच्छुचिसिता ॥२९॥ 


मक ता 
= =| 


1 
ह 4 गरि 3१ [ए = चश 
॥ न न्नर च उ + नः त 
ति 2 
र रौ । 














॑ तस्था आवेदयत्‌ प्रां शशस यदुनन्दनम्‌ । 
|£ उक्तं च सत्यवचनमात्मोपनयनं प्रति !\२०॥ 


| | | तमागतं समाज्ञाय वेदभीं हष्टमानशा । 


||| न पर्थन्ती जायणाय प्रियमन्यन्ननाम सा ॥३१॥ 
। 


राजा भीषणकने घना कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर 
लरामजी मेरी कन्याका तरिवाह देखनेके धि उत्सकता- 
व यहा-पधारे ह । तव तुरद्ी, सेरी आदि बाजे वजवाते 
हए पूजाकी सामग्री टेकर उन्होने उनकी अगवानी 
की ॥ २२ । ओर मघपक, नि्मरु वद्ध तथा उत्तम 
उत्तम भट देकर विधिपूवक उनकी पूना की ॥ ३३॥ 
भीष्मकजी बडे बुद्धिमान्‌ ये ¦ भगवान प्रति उनकी 
बड़ी भक्ति थी | उन्होनि भगवान सेना ओर सापियोके 
सहित समस्त सापश्रियोंपे युक्त निवाक्ष्यानमे ठहराया 
ओर उनका यवयावत्‌ आतिथ्य-सत्कार किया ॥ ३४॥ 
विदभराज भीष्मकजीके यद्ग निमन्त्रणे जितने राजा भये 
थे, उन्होने उनके पराक्रम, अवस्था, बट ओर धनके 
| अनुक्तार पारी ₹च्छित वस्तुएं॒देकर्‌ सनका खूव्र सत्कार 
किया ॥ ३५॥ बरिदभदेश्चक्षे नागसरिकरोने जव सुना किं 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण यह पारे है तब वे लेग मगरानूके 
निवासुस्थानपर आये जर अपने नयनोकी अंजलिं भर- 
भरकर उनके वदनारविन्दका मधुर मकरन्द~रस पान 
करने ल्मे ॥ ३६ ॥ वे आपसे इस भ्रकार बातचीत 
करते थे--क्गिमणी इन्दीकी भद्ध ङ्गिनी होनेके योग्य 
है ओर ये परम पकितरमूतिं स्यामघुन्दर सुक्मिणीके हयी 
योग्य पति हैँ । दूसरी कोई इनकी परली होनेके योग्य 
नहीं है । ॥ २७ ॥ यदि हमने अपने पूरव॑जन्म या इ 


प्राप्तो श्रुत्वा खदुदितरुढाह्ेक्षणोर्सकषौ । 


||| अभ्ययात्तयंषोषेण रामह्नष्णो समर्हणैः ॥३२॥ 
मधुपकपानीय वासांसि विरजांसि सः 
उपायनान्यभीशानि विधिवत्‌ समपजयत्‌ ॥३३॥ 


तयोनिवेशनं श्रीमदुपकरप्य मामति; । 


सतन्यशेः सालुगयोरातिथ्यं विदधे यथा ३४॥ 


ऋ | 
प तोतो 
क #। ॥ त क 


एवं राज्ञां समेतानां यथावीयं यथावयः । 


जकर 
# च + 0 
(ति 


ए 


टक 
“~~ - 4 ५ 
न > ^ ® आ» ५५६. = 


यथाबलं यथावित्तं सर्वेः कापः समर्दयत्‌ ॥२५॥ 

छृष्णमागतमाकण्यं  विदर्भपुरासिनः । 

आगत्य नेत्राज्ञलिभिः पृपुसतन्धुखपङ्कजम्‌ ॥२६॥ 
क) भषित हंति 

अस्येव भायां भवितुं रुकिमण्यर्हति नापरा । 


असाव्प्यनवद्ात्मा भेष्म्याः सथुचितः पतिः॥३७॥ 


क्रिशित्पुचरितं यननस्तेन त्टक्ञिरोकञृत्‌ 





जन्ममे कुछ भी सत्कमं किया हो, तो त्रिेकःविधात । 








अ० ५३ ] १ 
+ क्रं श्याम- 
अलुगूह्वातु गृह्णातु वैदम्याः पाणिमल्युतः ॥३८।। | भगवान्‌ मपर प्रसन हों वीर देशी कृपा करं 
न सुन्दर श्रीकृष्ण द्वी विदभराजकुमारी रुक्मिणीजीका 
< पाणिग्रहण करं ॥ ३८ ॥ 
एवं प्रेमकरबद्धा बदन्ति स पुरांकसः । परीक्षित्‌ ! जिस समय प्रेम-परद्च होकर पुखासी 
रोग परस्पर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, उसी 
कन्या चान्तः पुरात्‌ प्रागा भटयु्ान्बकार्यम्‌। २ ९। समय रुकमिणीजी अन्तःपुरसे निकय्कर्‌ देवीजीके 
~त 3 मन्दिरके लिये चीं | बह्रुत-से सेनिक उनकी रक्षाम 
रे १ द्र भवान्याः पादपद्छवम्‌ । 
त नियुक्त थे ॥ ३९ ॥ वे व्रेमूतिं श्रीकृष्णचन्द्के चरण 
कमलंका चिन्तन करती इई भगवती मवानीके पाद- 
1 चानुध्यायती सम्यडङन्दचरणाम्बुजम्‌।४०॥ ^, 
= = ५ पछ्र्वोका दरान करनेके धिये पैदल ही चीं ॥ ४० ॥ 











यतवाद्चातभिः साधं सखीभिः परिारिता । | वे खयं मोन थीं ओर माताएुं तया सखी-सदेवियां सव 
~ क | ओरसे उन्दं घेरे हए थीं । शखीर राजपैनिक हारथेमि 
गुष्ठा राञंभट; शूरः सन्नद्ख्यतायुधः 1 | भलर उटाये, कवच पहने उनकी रक्षा कर रहे थे । 


च | उस समय मृदङ्ग, राङ्क, ठोठ, तुरद्टी ओर मेरी आदिं 
प्लिर्‌ ॥४५९॥ | बाजे वज रहे ये ॥ ४१ ॥ बहुत-सी त्रा्मणपलियौ 
पुष्पमाला, चन्दन भादि सुगन्ध द्भ्य ओर गहने-कपड़ंसे 
सज-धजकर प्षाथ-साय चछ रही थीं ओर अनेकों 
| ५ | प्रकारके उपहार तया पूजन आदिकी सामग्री लेकर 
सग्न्धवज्ञाभरणदिजपलन्यः खलङ्कुता; ॥४२॥ | सदश श्रे वाराङ्नारेः मी साय थ ॥ ४२ ॥ गतै 
गाते जाते थे, बाजेवाले बाजे बजाते चलते ये ओर सत, 
मागध तथा वंदीजन दुकहिनके चारो ओर जय-जयकार्‌ ` 
अः ~ करते --व्रिरद्‌ बखानते जा रहे ये॥४२॥ देव्रीजीके मन्दिर- ¦ 
खा 1 ज णु ‡ छ म्‌ चव ण्दन्‌ ‡ ५३/ ~~ सुकोमल 
माणन मे पंचक रुक्मिणी जीने अपने कपल्के सदर सुकोमल 
देवीसदनं धौत -पैर धोये, आचमन किया; इसके भाद बाहर-भीतससे 
आसाद्य देवीसदनं धौतपादकराम्बजा ८ ॑ ९ 
व वा पवित्र एवं शान्तभावसे युक्त होकर अम्बिकादेवीके 
न्दिरमे प्रवेश क्रिया ॥ ४ ॥ बहृत-सी विधि-विधान 
- उपस्पृश्य शुचिः शान्ता प्रविवेशाम्बिकान्तिकभ्‌। ७४। = 
५ जाननेवाटी बडी-बृदी ब्राह्मण्यां उनके साथ थीं। 
= >~ __ + ~ ~ उन्होंने भगवान्‌ शं करी अद्धाङ्खिनी मवानीको ओर 
तां वे प्रयसा बालां विधिज्ञा विग्रयोषितः 
< षितः । भगवान्‌ राकरजीको भी रुकिमिणीजीसे प्रणाम 
आर्भव वाया ॥ ४५५ | रुकिंमणी जीने भगवतीसे प्राथना की- 
भवानीं बन्दयाश्चह्युभवपतीं भवास्विताम्‌ ॥४५॥ | कर 
~ अम्बिका माता ! आपकी गोदमे वैठे इए आपके प्रिय 
नमस्ये त्वाम्बिकेऽभीकष्णं खसन्तानयुतां शिवाम्‌ । | उर गणेशजीको तथा आपको मे बारंबार नमस्कार 
२ । | करती है । आप रेसा आशीवद दीज्यि करं मेरी ` 
भूयात्‌ पतिर्भ भगवान्‌ दृष्णस्तदजुमोदताम्‌ ।।४६॥ | अभिभा शरणं हो ! मवान्‌ श्ीष्ण ही मेरे पति 
च | |" ॥ ४६॥ इसके बाद सकरिणीजीने जल गन्ध, 
3 अद्धिगन्धाक्षतेधपे्वास सद्याद्यभूषणः | भक्तितः धूप, वल्ल, पुष्पमाख) गा» ‹ 
"व्व = ~ ~ त -- | =: ५१५ न 
१. द्भ्य। वधिवत्पाि | २. दपविं | "= द कः = 2 २३ (> 3 
शा ~ ~~ 


म्रदङ्कशङ्खपभवास्तयं सेयश्च 


नानोपदारखलिभिवरयसख्याः सहसरल्ञः । 


भायन्तय् स्तुवन्तश्च मायच्ा वाद्यवादकाः। 
































क 
(अ 4 = १७ अ य 
वी श 
















वि) > 
| #६-३. - 





` नानोपहारलिभिः प्रदीपावकिभिः पथक्‌ ॥४७॥ | प्रका्के नैवेय, ट ओर आरती आदि सामग्रियोषे | 


` विप्रह्ञियः; पतिमतीस्तथा तेः समप्‌जयत्‌ । 


लबणापूपताम्बलकण्टप्रत्रफलेश्चुभिः ॥४८॥ 


तस्ये द्वियाः प्रददुः शेषां युयुजुराशिषः । 
ताभ्यो देव्ये नमश्चक्रे शेषां च जगृहे वधूः ॥४९॥ 
` य॒नि्रतमध त्यक्त्वा निधकरामाभ्विकागृहात्‌ 
्रगृह्य पाणिना भृत्यां रत्नयुद्रोपशोभिना ॥५०॥ 
तां देवमायामिव बीरमाहिनीं 
सुमध्यमां ण्डलमण्डिताननाम्‌ । 
इ्यामां नितम्बापिंतरत्नमेखलां 
=्यज्ञरस्तनीं ङन्तलशङ्कितेक्षणाम्‌ ॥५१॥ 
छचिसितां बिम्बफलाधरघयति- 
शोणायमानदिजन्दमलाम्‌ । 
पदा - चलन्तीं कलहसगामिनीं 


शिज्ञत्कलानुषुरधामेशोभिना । 


.. विलोक्य बीरा धयः समागता 


यशखिनस्तत्ृतहच्छयार्दिताः ॥५२॥ 


„. कि 
४ १ न्व 







यां वीक्ष्य ते चपतयस्तदृदारहाप- 
ौडाव्रलोकः 


१. कुण्डक० | २. द्‌ 





------ -- 


दैतस उज्ज्िताल्नाः 1 ` 


= 7 


श्रीमद्भागवत 





` | कर रही थीं । उन्हे देखकर भर उनकी टी सुसकान ` 






| अ० ५३ 





अम्विकादेवीकी प्रूना की ॥ ४७ ॥ तद्नन्त्‌ उक्त | 
सामप्न्योसे तथा नमक, प्रजा, पान, कण्टत्र, फल शेर्‌ ` 
ईखसे सुद्टागिन ब्रा्मगिर्योकी मी पूजा की॥ ४८॥ 
तव ब्राह्मणिर्योने उन्हें प्रसाद देकर आशीर्वाद दिये ओर्‌ 
दुकहिनने ब्राह्मणियों जौर माता अम्व्रिकाको नमस्कार 
करके प्रपताद प्रहण सरिया ॥ ४९ ॥ पूजा-अचौकी 
विधि समाप्त हो जानेपर उन्होने मौन-्रत तोड़ दिया ओर 
रत्नजटित अगूटीसे जगमगाते हए करकमलके द्वारा एक 
सदे का हाथ पकड़कर बे गिरिजामन्दिरसे वाह > 
निकली || ५० ॥ 


परीक्षित्‌ ! रुकिपणीजी भगवान्‌की मायाके समान 
ही बड-बड़ धीर-वीरोंको भी मोदित कर लेनेवाटी थी | 
उनका कटिभाग वहत दयी सुन्दर ओर पतया था | 
मुखमण्डक्पर कुण्ड्लोकी शोभा जगमगा रही थी । वे 
किद्योर ओर तस्ण अवरश्थाकी प्षधिमे धित शीं। 
नितम्बपर जड़ाऊ करनी रोभाययान ह्यो रही थी 
वक्षःस्थल कुछ उभरे हए ये ओर उनकी दृष्टि ठ्टकती 
इई अक्कोकि कारण कुछ चञ्चर हो रदी थी ॥ ५१॥ 
उनके होढोंपर मनोहर मुस्कान थी । उनके दतोकी 
पोत थी तो कुन्दकरीके समान परम उञ्ज्वक, परतु , 
पके इए कुदरूके समान लाल-गल होटोकी चमकसे 
उसपर भी अलिमा आ गथी थी । उनके पवक पायजेव 
चमक रहे ये ओर उनमें र्गो हृए छोटे-छोटे घुष 
रुनञ्चन-सुनघ्युन कर रहे थे । वे अपने सुकुमार चरण्‌- 
कमलोसे पैदल ही राजहंसकी गतिसे चठ रही थी। 
उनकी वहन अपूर्वं छनि देखकर वँ आये हए बडे-बे 
यराखी वीर सब मोहित हो गये | कामदेवने ही 
मगवान्‌का कायं सिद्ध करनेके व्यि अपने ा्णोसे उनका 
हृदय जर्जर कर दिया ॥ ५२ ॥ र्विमणीजी इक प्रकार 
हस उत्सव-यात्राके बहाने मन्द-मन्द ॒गतिसे चछ्कर्‌ 
भगवान्‌ श्रीृम्णपर अपना राशिःराि सौन्दय निछावर 





पेतु; शितो गजरथाश्वगता विमदा तथा ठजीटी चितवनपर्‌ अपना चित्त दुटकर्‌ वे बडे- 
वा बड़े नरपति एवं वीर इतने मोहित ओर वेदो हयो गये 
यात्राच्छल्ेन हरयेऽपेयतीं खश्लोभाम्‌ ।५३॥ | किं उनके यतिभ छर गि 


० = खयं भी रथ; हाथी तथा बोडसेि धरतीपर आं 

सपं ानेवलयती चलपञ्को शे गिरे ॥ ५३ ॥ इस प्रकार स्क्रिभणीजी भगवान्‌ श्रीकृष्णके 

प्रानं तदा भगवतः प्रसमीक्चमाणा |॥ ड्युभागमनकी प्रतीक्षा करतीं द्र अपने कमस्की कीक 

६ < 8९ समान सुकुमार चर्णोको बहत दी धीरे-धीरे आगे बढा 
उत्साय वामकरजरल्कनपार्ज्ञः रदी थीं । उन्होने अपने बयं ह्ाधकी अगु्िसि 


प्राप्तान्‌ प्रियेक्षत चृपान्‌ दद्शेऽच्युतं सा।५४॥ सुखक्री भोर क्टकती हई अक्के हटा्यीं ओर वह अये 
पन्‌ सप्‌ दद्यजच्यु नरपतिर्याकी ओर ठ्जीटी चितवनसे देखा । उकी 


तां राजकन्यां रथमारुरुक्षतीं समय उह दयामध्ुन्दर भगवान्‌ श्रीकृष्णके ददन 
इए ॥ ५४ ॥ राजकुमारी रकमिणीजी रथपर चदृना 
अउहार्‌ ष्णा द्विषता समीक्षताम्‌ | . | ही चाहती थीं कि भगवान्‌ श्रीङ्कष्णने समक्त शात्रअकि 


देखते-देखते उनकी भीड्मेंसे सक्रिपणीजीको उव य्या 
ओर उन सेका राजाअकि सिरपर पँव रखकर उने 

राजन्यचक्र परिभूय माधवः ।५५॥ | अपने उस रथपर ढा लिया, जिसकी व्वजापर्‌ गर्डका 

व 3. ` | चिह खगा इञ था ॥ ५५ ॥ इसके बाद्‌ जसे सिंह 
तता यया रमपुरागमः रनः सिथाररोके बवीचमेसे अपना भाग ठे जाय, वैसे दही 
रुक्मिणी जीको द्र भगवान्‌ श्रीकृष्ण बटरामजी आदिः 
यदुवंरियोके साथ वरसि चर पडे ॥ ५६ ॥ उस समय 


रथं समारोप्य सुपणंरक्षणं 


सृगारुमध्यादिष भागहद्धरिः ॥५६॥ 


रि र 
तं मानिनः खाभिभवं यश्चशक्षयं जरासन्धके वशवर्ती अभिमानी राजाओंको अपना यह 


बड़ा भारी तिरस्कार ओर य.कीतिका नाश सहन न 
हआ । वे सब-के-सब चिदकर कहने ल्गे-“अहो, 
क हममे धिक्तार है । आज हमठोग धनुष धारण करके खड़े 
अह वगस्ाच्‌ यञ्च आत्तधन्यनां = >" 
द & ही रहै ओर ये वाठे, जसे सिंहके भागको हरिनि ठे 
क, $ # ( श, ९ 
गाप केषरिणां ग्रग्‌ारव ॥५७॥ जाय, उसी प्रकार हमारा खारा यश छीन ठे गये ॥७]] 


"~> 
इति श्रीमद्वागवते महपुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरमस्वन्ये 
उत्तरार्धे रुकिमिणीहरणं नाम त्रिपञ्चारात्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ 


६. परे जरासंधवश्चा न सेदहिरे। 











अथ चतुःप्ारत्तमोऽध्यायः 

* शिश्यपालकै साथी राजाभंकी जर सकमीकी हार तथा थीकृष्ण-खकिमिणी.विवाह ` ` 
श्रीक उवाच स भीद्यकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ | ` श" 

| कहव-सुनकर सुनके ¡ करोधसे 
` ससंरन्धा वाहानारुद्य दंरिताः। | उठे शौर कलच पहनकर अपने. 

















कर = गे 
ह~ 





| &८ 


ऋ 


तानापतत आलोक्ष यादवानीकयुथपाः ) 


अशग्ष्ठं गजस्कन्धे रथोपस्थे च कोविदाः । 


पतयुबलं शरासारेश्छन्नं वीक्ष्य सुमध्यमा । 
सव्रीडभेशषततद्रक्त्ं  भयगिद्वलरोचना ॥ ४॥ 
ग्रहस्य भगवानाह मा स भैर्वामलोचने । 

विनङ्घयत्यधुनेवेतत्‌ तावकैः शात्रवं बलम्‌ ॥ ५॥ 


तेषां तद्रसं बीरा गदसङ््षणादयः । 





अमृष्यमाणा नाराचेजेध्युहंयगजान्‌ रथान्‌ ॥ ६ ॥ 
पेतुः शिरांसि रथिनामधिनां गजिनां शुषि । 
सङकण्डलक्रिरीटानि सोष्णीषाणि च कोटिशः ॥ ७॥ 
हस्ताः सापिगदेष्वासाः करभा उरवोऽङ्गयः । 












ति 
1 ५१ | ति 
` ५. ॥ ; 
। । | 
३ १1 
1.4 । ` & ~~ । नि 
ह (` 
श, । ५4 
५4 ॥ 1 # 
| 7 
०) ॥। 
1 | 


(¢  इन्यमानबलानीका इष्णिभिजंयकाष्धिभिः । 


अश्ाश्वतरनागोष्खरमत्य्॑ञिरां्ि च ॥८॥ 


। | । ४ राजानो विध्रखा जग्घुजरासन्धपुर {सराः ॥ ९ ॥ 


| ¦ 3 ` शिष्पालं समभ्येत्य हृतदारमिवातुरम्‌ । 


क, 


क ~ | नष्टवििषृं ४ 
- 
`, ~ च 

(-, 


गतोरसाहं शछष्यद्दनमघ्लवन्‌ ॥१०॥। 


५ 


भ ो भोः पुरुपशादृ दौम॑नखमिद सथज.। 





1 व | 
१ मघाल्नञाय यथाद्रषु | 
4 क, ~. 


श्रीमद्भागवत 








स्वः स्वेषले; परिक्रान्ता अन्वीुर्ध॑तकार्थुकाः ॥१ | 







तस्थुस्ततकषयुला राजन्विस्फूज्यं खधनूःपि ते ॥ २॥ 


युयुः शर्वशांणि सेधा अद्विष्वपो थथा ॥३॥ 


न प्रियाप्रिययो राजन्‌ निष्ठ देष्िषु द्यते ॥११॥ 
~ ~ = = त = अ ~ 


| अ० ५४ 


7. 177 1.11 1 प 
ए, क 1 णपरम भीभीम णीभीभी 





हो गये । अपनी-अपनी सेनाके साथ सव धलुष ठे.ङेकर्‌ 
भगवान्‌ श्रीृष्णके पीछे दौड़े ! १ ॥ राजन्‌ | जवं 
यदुवंशि्योके सेनापति्याने देखा किः शत्रुदछ हमपर चढ़ा 
आ रह है, तत्र उनह्यँने भी अपने-अपने धनुषक्रा टकार 
किया ओर चूमकर उनके सामने उट गये ॥ २॥ 
जराप्तन्धकी सेनाके रोग कोई घोड़ेपर्‌, कई दह्यायीपर्‌ तो 
कोटं रथपर चदे हए थे} वे सभी धनुर्रैदके बडे स्म 
थे | वे यदुवरिर्योपर इत प्रकार बाकी वर्थ करने 
लगे, मानो दल-के-दल बादर पहाज्खोपर मूदार पानी 
बरसा रहे हां ॥ ३ ॥ परमघुन्दरी सक्रिमणी जीने देखा 
कि उनके पति श्रीकृष्णकी सेना बाण्‌-वपांते टक गयी 
है | तव उन्हयोनि ठज्नाके प्राथ भयभीत नेत्रे भगवान्‌ 
श्रीृष्णकरे मुखकी ओर देखा |  }¡ भगवानूने हँसकर 
कहा-- “सुन्दरी ! डरो मत | तुम्हरी सेना अभी तुम्हार 
रातुओंकी सेनाको नष्ट किये डाच्ती है"! ~^} इधर 
गद ओर संकषण आदि यदुवंशी वीर अपने रात्तुओका 
पराक्रम ओर अधिक न सह सके । वे पने वाणोसे 
दाघ्रुभकि हायी, घोडे तथा र्थोको छिन-भिन्न करने 
ठगे | £| उनके बाणेसे रय, घोड़ ओर हापि परर वटे विपक्षी 
वीरोके कुण्डल, किरीट ओर पमडियसे घुशोभित कसेडं 
सिर, खड्ग, गदा ओर धनुपुक्त हय, पटं बे, जवं ओर पैर 
कट-कटकर परश्व्रीपर गिरने ख्गे। इसी प्रकार षोड, 
खचर, हाथी, ऊंट, गघे ओर मनुष्यके सिर्‌ भी कट-कटकर 
रणभूमिमे खोटने लगे ॥ ७-८ ॥ अन्तम विजयकी 
सची आकाङ्घावाठे यद्ुवंशियोने रावुजओंकी सेना तहस- 
नहस्त कर डाढी । जरासन्ध आदि सभी राजा युद्धसे 
पीठ दिखाकर भाग खड इए ॥ ९ ॥ 


उधर शिद्युपाल अपनी भावी पत्नीके दिन जानक 
कारण मरणासन-सा हो रहा था । न तो उस्तके हृदयमें 
उत्पाह रह गया था ओर न तो शरीरपर कान्ति । उघ्का 
मुह सूख रहा था । उसके पाक्त जाकर जरासन्ध कने 
व्गा-॥१०॥ “शिद्युपाकजी | जप तो एक श्रेष्ठ पुरुष हं 


यह उदाकषी छोड दीजिये | क्योंकि राजन्‌ ! कोई भी बात 
सर्वदा अपने मनके अनुकूल ही हो या प्रतिकूल डी हो, 
इस सम्बन्धमें कुछ स्थिरता किी भी प्राणीके जीवने 





~ ॥ < ड 


५ द, 


| - मि 
अ० ५४ | दशम स्कन्ध ४६९ ` 











यथा दारूपयी योपरिननृत्यते कहफेच्छया । | नहीं देखी जाती ॥ ११ ॥ जसे कट्ुतगी वाजीगरकी 


तन्नोऽ्य इच्छके अनुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी 
वमीश्रतन्त्रोऽयम खयोः ॥ 
एवमी्र्तन्तराऽ्यपीदते सुखदुःखयोः ॥१२॥ भगवदिच्छके अधीन र कर्‌ सुख ओर दुःखकर स॒म्बन्धमे 
शौरेः सषदशाहं वे संरुगानि पराजितः] | ययाशक्ति चेष्टा कता रहता है ॥ १२ ॥ देखिय 
श्रीकृष्णने मुञ्चे तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेनाभके साथ 
तरया्विंश्षतिभिः सेन्यजिग्य्‌ एकमहं परम्‌ ॥१३॥ | सन्रह वार हर। दिया, ने केवर एक वार-अगरदवीं 
वार उनपर्‌ विजय प्रप्त की॥ १३॥ पिर भस 
तथा शाचा दव्याप्म्‌ कषा ते र 
धव्यह्‌ न शचा न हव्या कहयचत्‌ | | बातको केकर भँ न तो कभी योक करता = लौट न 
कटेन द धुन जें नन्‌ पि चितं जगत्‌ | १ ¢ || तो कभा हषः; क्योकि में जानता त्र कि प्रारघ्धके 
। अनुसार कारमगवान्‌ ही इस चराचर जगत्‌को श्रकञ्चोरते 
अधुनापि वयं कवं वीरयुथपयूथपाः। रहते हँ ॥ १४ ॥ इसमें संदेह नदीं कि दमोग वदे 
3 बड़े वीर्‌ सेनापति्योके भी नायक हैँ । किरि मी, इस 
रिपवा निग्युरधुनः छर आत्माचुस्ारिणी । स व द्वा ह न ९५॥ इ बार हमारे 
रातुर्ओकी ही जीत इई, क्योकि काल उन्हयकि अनुकर 
तद्‌] बयं विजेष्यामो यद्‌ कालः प्रदक्षिणः ॥१६॥ | या । जव काक इमार दाने होगा, तव इम भी उने 
जीत र्गेः ॥ १६ ॥ परीक्षित्‌ ! जब मित्रेनि इस भ्रकार 
एं प्रमोधितो मित्रैश सम्चाया, तव चेदिगज शिद्यपाट अपने अयुयायियोके 
मृ प्रबाधत पत्रश्च्॑राऽ गात्‌ सदुगः पुरम्‌ । 
४ साथ अपनी राजधानीको गेट गया ओर उक्षके मित्र 
हतशेषाः पुनस्तेऽपप यथुः स्व स्यं पुरं सुपा | | १७ | जा भी, जो मटनेसे चचे थे, अपने-अपने नगरोको 
चङे गये ॥ १७ ॥ | 


र्मी त॒ राक्षसोद्राहं इष्णद्धिडस न्‌ खष्ठुः । रुक्मिणी जीका वड़ा भारं रुक्मी भगवान्‌ श्रीकृष्णसे 


बहुत द्वेष रखता था । उष्ठको यह बात बिल्कुल सहन 

न इई कि भेरी बदहविनको श्रीकृष्ण हर ॐ जायं ओर 

 राक्षसरीतिसे वल्पूवक्र उसके साय विवाह करं । स्क्मी 
नटी तो था दी, उपने एक अक्षौदिणी सेना साथ जे ४ 


ृष्ठतोऽन्वगमत्‌ प्णमक्षोदिण्य। बरतो बरी ॥१८॥ 


सुक्म्यपपीं सुसंल्ः शृण्वतां स्वभय॒जाम्‌ । 


^ | | ओर श्रकृष्णका पीछा किया ॥ १८ ॥ महाबा ` 
प्रतिजङ्े सहाबाहुदश्चितः सशरासनः ॥१९॥ | इवभी क्रोधे मारे जठ रहा था । उसने कवच पहनकर ` 
जीर धनुष धारण करके समस्त नरपति्यकि सामने यह ` 
प्रतिज्ञा की--॥ १९॥ म आप गेगोकि बीचमें यह शपथ ` 
करता द्र कि यदि भै युद्धम शरीङष्णको न मार सका ओर ` 
अपनीःबहिन रुकिपणीको न लीटा स॒का तो अपनी राजधानी ` 


कुण्डिनपुरमे प्रवेशा नदीं करूगा, ॥२०॥ परीक्षित्‌ । यह 
इत्युक्त्वा रथमारुह्य सारथि प्राह सत्वरः । ककर ब रथपर वार हो गया ओर सारथीसे बोग- 


॥ २१ ॥ 


चो ४ 
१ 
न | रं 
। 
"ब 
न + , 
२१ 


॥. 
इ > 4 
क 


अहत्वा समरे दृष्णमप्रतयूह्च च रुकिपिणीप्‌ । 


ङुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद्‌ बवीमि बः॥२०॥ 





४७० श्रीमद्धाजवत [ अ० ५४ 


तो कठ यन्के च = क्न जत = ऋ" जज कायान" ज = त्का ना कन्त जोत ए कोद कात च कत श = चक नय `को = क तो # = "क ` च "का" चक्क के 











अद्याहं नि्िते्बणि्मोपालखय युदुसेते ४ | आज मे अपने तीखे बाणोंसे उस खोटी बुद्धिवाठे ` 
र्मम | | ग्राटेके बल्यीर्यका घमंड चूर-चूर कर दूंगा । देखो 
नेष्ये वीयंमदं येन खसा मे प्रभं हृता ॥२२॥ | तो उसका साह, बह हमाी वदिनको कसू 
विकत्थमानः मतिरीश्वरस्याप्रमाणवित्‌ । | ९ वा ॥ २९ ॥ पवित । . क 
| विगंड़ गयी थी । वह भगवानूके तेज-प्रभविको निच्छुलं 
रथेनेकेन गोषिन्दं तिष्ठ तिष्टेत्यथाद्वयत्‌ ॥२३॥ | नदीं जानता था । ईइसीसे इस प्रकार वहकवहककर्‌ 
ध म्ण तरिभिः थर | वातं करता हअ; वह एक ही रथसे श्रीकृष्णके पाप 
चखवष््व उह जध्नं छण तराम; शरः; । | पटं चकर ठकाशने खगा -'खड़ा रह ! खडा रह ! ॥२३॥ 
र = ~ ६ | उसने अपने धनुषको बढपूवक खींचकर भगवान्‌ 
ह चत्र श्ण तिष्ठ यदूना इलपासन ।२४॥। श्रीकृष्णो तीन दाम्‌ मारे र कहा-- “एकः क्षण 
छत्र याति खसारं से शषित्वा धवाह्वद्धविः। | मेरे सामने ठहर ! यदुवंशियोके कुल्कच्छकु | जेसे कोभ 
| होमक्षी सामग्री चुरकर उङ्‌ जाय, वैसे ही तु मेरी 
हण्ष्यिऽ््य मदं मन्द मायिनः कूटयोधिनः ॥२५॥ | वहिनको चुराकर करडा मागा जा रदा ह १ अरे मन्द | 
| तू वड़ा मायावी भौर कपट-युद्धमे कुदाल दै । आज में 


यावन्न मे हतो बाणः शयीथा श्च दारिकामू्‌। | तेरा घ्ारा गर्वं ख किये स्ता द्र ॥ २४-२५॥ 
देख | जबतक मेरे बाण तुच्चे धरतीपर दुवा नहीं देते, 
सयन्‌ कृष्णो धलु्छित्वा षडभिविन्याध रुकिपणभ्‌२६| उसके पले ही इतत वुचचीको छोड़कर माग जा ।' 
स सक्भीकी बात सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण मुक्तकरने ब्गे। 
भिथतुरो वाहान्‌ द्यां धरत ध्वजं त्रिभिः । उन्होने उसका धलुष काट डाटा ओर्‌ उस्पर्‌ छः बाण 
च छोडे ॥ २६ ॥ साथ ही भगवान्‌ श्रीकृम्णने आठ वाण 
स चान्यद्‌ धनुरादाय कृष्णं विन्याध पश्चभिः॥ २७ | उसके चार घोडोपर ओर दो सारथीपर छोड ओर तीन 
¦ ५) ~ २ वस्त बाणोंसे उसके रथकी ध्वजाको काट डाखा । तव रुश्भीने 
॥ ‹ || ^ (5 भर चिच्छेद वुत्त | दतरा धनुष उठाया जर भगान्‌ श्रीकरष्णकरो पाच बाण 
{1 | | मारे ॥ २७ ॥ उन बाणोके खगनेपर उन्होने उसका 
^“ £. पुनरन्यदुषादत्त च्छिनदन्ययः | र 
३. ^ क ४ वह धनुष भी काट डाला | 8 इसके बाद एक 
1 1॥ ` परिषि प्रविं चलं चं व ओर धयुष च्या, परंतु हाथमे लेते-ही-ठेते अविनाशी 
1[| परिष पिशं शलं चमसौ शक्तितोमरो । | अन्युतने उसे मी काट डाय ॥ २८ ॥ इ प्रकार 
| ह = रुक्मीने परिव, पट्टिश, शूल, ढा, तलवार, शाक्तिं ओर 
|| यद्‌ यदायुधप्रादत्त तत्‌ सवं साऽच्छिनद्वरिः ॥२९॥ तोमर जितने अलख-शख उठाये, उन समीको भगवानूने 
== ¦ हः - प्रहार करनेके पहले ही काट डउाखा॥२९॥ अब 
ॐ ततो रथादवष्ठत्य सङ्गपाणिजिषांसया । रुक्मी कऋरोधवश हाथमे तच्वार्‌ लेकर भगवान्‌ श्रीढृष्णको 
द | मार डाकनेकी इच्छासे रथसे कूद पड़ा ओर ईस प्रकार उनकी 
' ष्णमभ्यद्रबत्‌ छदः पतङ्गं इव पावकम्‌ ॥२०॥ | ओर श्षपटा, जैसे पिंगा भागकी ओर ्पकता है ॥२०॥ 
ह ध जब भगवानने देखा. किं स्कंमी सुञ्षपर चोट करना 
तख - चापततः खङ्गं तिलश्वर्मं चेषुभिः । | चाहता है, तन उन्होने अपने नाणोंसे उ्की दाच 
न. 


१. तिष्ठेति च जुवन्‌ । २. दच्युतः । ३. चमांपिदाक्तितोमरान्‌ । ४. दधात्तत्तच्छिनद चुतः । 
















[१ "स ~ अ, ` ` "> = कज 
| अ० ५४ |] द्श्चम स्कन्ध 





हः डाठनेके लिये हाथमे तीखी तट्वार्‌ निकाठ ठी ॥ ३१ ॥ 
दृष्ट्रा आत्वधाद्यों रुकषिणी भयविंहयला । जव र्क्िमिणीजीने देखा कि ये तो हमारे भाईको अव 
` | मार ही डालना चाहते है, तव्र वे भयसे विहर हो 
पतित्वा पादयोभतरुवाच करुणं सती ॥३२॥ | गयीं ओर अपने प्रियतम पतिं भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
चर्णोपर गिरकर करुण-खरमे बोटीं--॥ ३२ ॥ 
योगेधरा्रमेयात्मन्‌ देवदेव जगत्पते । 'देवताअकि भी आराध्यदेव ! जगत्पते ! आप योगेश्रः 
ह । आपके खरूप ओर इच्छार्जोको कोई जान नही 
हन्तुं नर्दति कस्याण भ्रातरं मे महाज ॥३॥ | सकता । आप परम कलान्‌ ठै; परंतु कसयाणख्प ' 
भी तो हैँ | प्रमो ! मेरे भैयाको मारना आपके योग्य ` 
काम नहीं हैः ॥ ३३ ॥ 
श्री्चुक उवाच श्रीद्युकदेवजी कते ह--रुकिमिणीजीका एक-एक 
अङ्गं भयके मारे थर-थर कोप रहा था । शोककी प्रबटता- 
से मुह सख गया था, गन रंध गया या । आतुरता- 
वरा सोनेका हार गछेसे गिर पड़ा था ओर इसी अवस्थां 
वे मगवान्‌प्े चरणकमक पकडे इए थीं । परमदयाडु 
भगवान्‌ उन्हं भयमीत देखकर करुणासे द्रवित हो ` 
कात्य॑विस्ंसितहेममालया गये । उन्होने स्कभीको मार डाल्नेका विचार छोड 
दिया ॥ ३४ ॥ फिर भी स्कमी उनके अनिष्टकी चेष्टसे 
। गहीतपादः करुणो ल्यवतेत | २३५ | विष्ुख न इंआ । तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने उसको उसीके 
क 2: च दुपषेसे वाध दिया ओर उसकी दादी-मू तथा केश 
„>, ॐ चरेन म्वा तमसाघुकरारण कड्‌ जगहसे मूडकर उसे कुरूप बना दिया । तबतक 
यदुवंशी `वीरोने रा्रुकी अदधत सेनाको तहस-नहस कर 
डाला--टीक वैसे ही जैसे हाथी कमव्वनको रौद ` 
डाक्ता है ॥ ३५ ॥ फिर वे गोग उधरसे रौटकर 
श्रीकृष्णके पास आये, तो देखा किं सक्मी दुपञेसे 
इआ अधमरी -अवश्यामे पड़ा इआ है । उसे देखकर ` 
सवराक्तिमन्‌ भगवान्‌ बलरामजीको बड़ी दया आयी 
ओर उन्होने उसके बन्धन खोलकर उसे छोड दिया तथा 
्ीकष्णसे कहा--॥ ३६ ॥ ष्ण । तुमने यङ्‌ अच्छा 


| किसासिमाददे तिगमं सुकिमिणं हन्तमचतः ॥२१॥ | तच्वारको तितिक करके काट दिया ओर उसको मार 


तया परित्रासविकम्पिताङ्गया 


शुचावह्ष्यन्छुखरुद्रकण्डया `) 


सरमश्वुकेशं प्रवपन्‌ व्यरूपयत्‌ 1 













ते, 9 
तावन्ममदुः परसेन्यमद्धतं 





यदुप्रवीरा नलिनीं यथा गजाः ॥३५॥ 









कृष्णान्तिकुपव्रज्य दट्शसतत्र रुक्मिणम्‌ । 
तथामूतं हतप्रायं॒॑दष्रा सङ्कषणो विथः \ 





विशरुच्य बद्धं करुणो भगवान्‌ दृष्णमव्रवीत्‌ ॥२६॥ | नदीं क्रिया । यह निन्दित कार हमले योप्य नही 
=+ ब ट असाथ्िदं त्वया कृष्ण कृतमखज्जुगुप्सितम्‌ । है । अयने सम्बन्धीकी दादी-मू मूडकर उसे कुख्प 






कर्‌ देना, यह तो एकं प्रकारका वध ही है |॥ ३७ ॥ 
8 रेमणीको सम्बोधन करके 
मेनासान्‌ साष्व्यश्मयेथा भ्रात्वेरूप्यचिन्तया । हारे माका रूप विकृत कर दिया 






3 वपनं इमश्ुकेशानां वैरूप्यं सुहदो वधः ॥३७॥ 


। ट शः 


क १ 


कयन वाया क 







न्क ` 
कत क ऋ ऋक ~< 
करक 


+ 
ि 


निक 
) 


< ॥ र 
कै जनै + त 


प 
^~ -= ~ ~ - = 
ग ॐ तक > ` द 


[1 ॐ 


कै 0 न ॥ क 
नथ तः = (८ ॥ 
(3 =: [व , - 
॥ कोकः योन 
नि त जक क) 


त क (न 


श नोः ज क क भक = कदा 
0 शः ~ 
१ " च्कुषछेण्ो- ` ` ` चक + + क = +" कः णक, त # 





४७२ ओमद्भागवत [ अ० ५९ 

| ` (~ 
सुखटुःखदो न चान्योऽस्ति यतः सकृ तक्‌ पुमाच्‌२८ गया है, यज॒ सोचकर हमरोगोसे बुरा न मानना; 
= रवम क्योकि जीवको सुख-दुःख देनेवाला को$ दूखरा नहीं है | 
बन्धुवेधाहदोषोऽपि न बन्धावेधमहेति । उसे तो अपने ह्वी कर्मका एल भोगना पड़ता है, ॥|२८॥ 
अव श्रीकृष्णसे बोले-- (कृष्ण ! यदि अपना सगा-सम्बन्धी 





त्याज्यः स्वेनेव दोषेण हतः फं हन्यते पुनः ॥३९।। | वधर करने योग्य अपराध करे, तो मी अपने ही सम्बन्धियेक्ष 
| हारा उसका मारा जाना उचित नदीं है | उसे छोड 
| देना चाहिये । वह तो छपने अपराधटे दी मर चुक्रा 
| है, मरे हृएको फिर क्या मारना ? | ३९ ॥ फिर 
। सुकिमणीजीद्धे बोरे साध्वी ! व्रह्मा जीने क्षत्रियका 
हि ६ येन परतरत्तः॥४०॥ | धर्म की रेया बना दिया हे वि. सणा मा भी जै 


भाईको मार डाट्ता है | ह्वये यह्‌ क्षात्रधर्मं अल्यन्त 
राज्यस्य भूमेवि्तस् क्रिया मानख तेजसः । | घोर है, ॥ ४० ॥ इसके वाद श्रीकृष्णे वोले--“माई 
| कृष्ण | यह टीक है किजो छोग धने नकम अंह 
मानिनोऽन्यस् वा हेतोः श्रीमदान्धाः क्षिपन्ति दहि १ रहे ह ओर अभिमानी है, ३ राज्य, पृथ्वी, दैप, बी 
मान, तेज अथवा किसी ओर कारणस्रे अपने बन्धु्थका 
3 € भी तिरस्कार कर दिया करतेरहैः | ४१॥ अववे 
तवेयं विषमा बुद्धिः सवभूतेषु दुहंदाम्‌ । | रक्मिणीजीसे बोले--साधयी ! तुम्हारे माई-बन्धु सुपरस्त 
 प्राणियोके प्रति दभाव रखते हैँ । हमने उनके मङ्गल्के 
यन्मन्यसे छएदाभद्रं स॒दृदां भद्रमङ्ञवत्‌ ॥४२॥ | व्यि ही उनके प्रति दण्डवरिधान क्रिया ह । उसे तुम 
अज्ञानियांकी भोति अमङ्गट मान रही हो, यह तुम्हारी 
आत्ममोहो चृणामेप कल्प्यते देवमायया । | बुद्धिकी विषमता ह | ४२ ॥ देवि ! जो लोग भगवानूकी 
मायासे मोहित होकर देहको ही आत्मा मान वैठते हैँ 
। उन्दीको रसा आत्ममोह होता है कि यह मित्र है, यह 
सुद्‌ ददासीन इति देहात्ममानिनाम्‌ ।४३॥ शतु है ओर यहं उदासीन है ॥ ४२ ॥ समस्त देह- 
धासियिोंकी आत्मा एक ही है ओर काय-कारणसे, मायासे 
= < उसक। कोई सम्बन्ध नहीं है । जक ओर घड़ा आदि 
एक एव्र परो धात्मा सवषाप्रपि देहिनाम्‌ । २ व 
पदार्थं ओर आकाश भिन-भिन माम पडते है; पस्तु है 
नानेव गृह्यते मटयंथा ज्योतिर्यथा नभः ॥४४॥ | एक दही, वैसे ही मूं लोग रारीरके मेदसे आत्माका 
मेद मानते है ॥ ४४ ॥ यह रारीर आदि ओर अन्तवात्य 
है | पच्चभूत, पञ्चग्राण, तन्माता ओर त्रिगुण ही इसका 
वेद आचन्तवानेप्र द्रवयपराणगुगात्मकः । | रूप ह । आतमामे उसे अहानसे दी इसकी कल्पना 
हई है ओर वह कल्पित शरीर ही, जो उसे भे" सम्चता 


आत्मन्यविधयाक्कप्तः सं्ारयति देहिनम्‌ ॥४५॥ | है, उसको जन्म-मृ्युके चकरसमं ठे जाता दे ॥ ४५ ॥ 


0 मन्य 


क्षत्रियाणामयं धर्मः प्रजापतिविनिर्भितः 





= विष अ) नि क" "~ इक्क + कः 
ह व . र 
ध - 
॥ , 


अ० ५४ ] 


चऋन्क्ीः ` ^ 


दशम स्कन्ध 











$ च, द, कि 


नात्मनोऽन्येन संयोगो वियोगश्चासतः सति । 


तद्धेतुस्वात्तसरसिद्धेदंग्रपाम्यां यथा रवेः ॥४६॥ 


© 


जन्मादयस्तु देहस्य विक्रिया नात्मनः कचित्‌ । 


~~ ४ 
21 
41 
= 
04 
2 
42 


कृलानामिव स्य॒ इद ॥०५७॥। 


यथा शयान आत्मानं विषयाच्‌ फलमेव च । 


अचुञङक्तेऽप्यसत्यथे तथाऽऽसोत्ययुधो भवम्‌।।४८।) 


तसखरादज्ञानजं शोकमात्मश्चोषविमोहनम्‌ । 


तच्चज्ञानेन निहत्य खया भव श्ुचिसिते ॥४९॥ 


श्रीद्युक उवाच 
एवं भगवता तन्वी रामेण प्रतिबोधिता । 


वैमनस्यं परित्यज्य मनो बुद्धया समादधे ॥५०॥। 
 प्राणावशेष उत्खुष्टो दिडभिहतबलग्रभः । 
स्मरन्‌ विरूपकरणं वितथारममनोरथः ॥५१॥। 


च भजक्ट नाम्‌ नवाय महत्‌ फम्‌ । 





अहत्वा दुमंतिं छृष्णमप्रसयूह्य यवीयसीम्‌ । 


| 


ङण्डिनं न भ्म ्ष्यामीस्युक्र 


वि 


| (९ (<. ८ 


॥ -१ ८ =" 


 चित्तकी सारी आशा-अमिकषाएं व्यथं ह्यो चुकी यीं 


जिना मे ं कुणि १७९ । ११द॥ ठ ५ 
त्रावकद्‌ रुषा ।॥५२॥ करके वह वही रहने व्णा ॥ ५२ ॥ 





साध्वी | नेत्र ओर रूप दोनो ही प्यके द्वारा प्रकारित 
होते है | पय ही उनका कारण दहै । इसलिये सुर्के | 
साय नेत्र ओर रूपका न तो कभी वियोग होता है भैर 
न संयोग । इसी प्रकार समस्त संसारकी सत्ता आतस॒त्ता- 
के कारण जान पडती है, समस्त संपारका प्रकारक 
आतमा ही है । फिर आत्मके साथ दप्तरे अपतत्‌ पदार्थो- 
का संयोग या त्रियोग हो ही कैसे सकता है१॥४६॥ 
जन्म लेना, रना, बढ़ना, वदलना, घटना ओर मरना-. 
ये सारे प्िकार दारीरके ही हेते है भामके नही | ` 
जेसे कृष्णपक्षे कल्ओका ही क्षय होता है, चन्द्रमाका 
नही, परंतु अमावस्याके दिन व्यवहारे खोग चन्द्रमाका 
ही क्षय इ आ कहते-सुनते है; वैसे हयी जन्म-मृद्यु आदि 
सारे विकार शरीरके ही होते है, परंतु गोग उसे श्म 
वश्च अपना--अपने आत्ाका मान ठेते &॥४७॥ 
जेसे सोया हआ पुरुप्र किसी पदा्थके न दहोनेपर 
भी खम्नमें मोक्ता, मोग्य ओर भोगख्य फ्येका अनव 
करता है, उसी प्रकार अज्ञानीरोग ब्ढमूढ संसारचक्र 
अनुमत्र करते ह ॥ ४८ ॥ इसय्ि साध्वी | अज्ञानके 
कारण होनेवाले इस शओकको त्याग दो । यह शोक 
अन्तःकरणको मुरक्चा देता है । मोहित कर देता है । 
इसघ्ि इसे छोडकर तुभ अपने खरूपमें स्थित हो 
जाओोः ॥ ४९ ॥ 

श्रीड्यकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ । जत्र बल्राम- ` 
जीने इत प्रकार समक्ञाया, तज परमघुन्दरी स्विपणीजीने 
अपने मनका मैक मिटाकर वित्रेकबुद्धिसे उसका घमाधान 
किया ॥ ५० ॥ र्क्मीकी सेना भीर उसके तेनका 
नाश हो चुका या | केवर प्राण व्च रहेये। उप्के . 










ओर रात्रुओंने अपमानित करके उसे छोड़ दिया या, ` 
उसे पने विख्प किये जनेकी कष्टदायक स्प्रति भू 
नहीं पाती थी ॥ ५१ ॥ अतः उसने अपने रहनेके 


व्यि भोजकट नामकी एक बहत बड़ी नगरी 8 १ ०५। पी | 
उसने पहले ही यह्‌ प्रतिज्ञा कर ् ८ 


ग्व क थी 












~+ 


ध कृष्णको मारे बिना ओर आए ॥॥ ©।८। © | टगत्‌), | 






 ॥ 


४७४ श्रीमद्भागवत [ अ० ५५ 
---= ज्ज्य 
भगवान्‌ भीष्मङ्कसुतामेवं निजित्य भूमिपान्‌ । परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्णे इस प्रकार एव 
पुरमानीय विधिवहुपयेमे $रूद्वह ॥५२॥ राजा्भको जीत ल्या ओरं विद्भरजढुमारी रकिमिणी- 
जीको द्रारका्मे छ।कर्‌ उनका विधिपूत्रक पाणिग्रहण 
किया ॥ ५२ ॥ हे राजन्‌ । उस समय द्वारकापुरीमे 
घर धर्‌ बड़ा ही उत्व मनाया जने वगा | क्यो न हो, 
बरहकि सभी रोगोंका यदुपति श्रीकरष्णकरे प्रति अनन्य ्रेम 
जो था ॥४]) वहे समी नर-नारी मणि्योकि चमकीठे 





तदा मशेत्सवो चरणां यदुपुयां गृहे गहे । 


अभूदनन्यभवानां कृष्णे यदुपतो चप ॥५४॥। 
नरा नायंश्च सदिताः प्रगृष्टमणिङ्कण्डलाः | 


पारिहहपाजहर्वरयोर्चित्रवाससोः ४] | ण्डक धारण किः इए य । उनधोनि भान्द म 
रू विचित्र यख पहने दूल्दा ओर दुकहिनको अनेक मटकी 

सा इृष्णिपुयुंततभितेन्द्रकेतभि- सामभ्रियां उपहारमें दीं} ५५ ॥ उस समय द्रारकाकी 
~ द अपूव शोभा हो रदी थौ । कहौ वड़ी-वड़ो पताकां 
वरधचित्रमास्याम्बररत्नतोरणेः | बहत ऊँंचेतक फहरा रही थीं } चित्र-विचित्र मारण 

जभौ रतिदवायुपक्लपतमङ्गले- ` | वस्र ओर रत्नोँके तेरन र्वे हए थे) द्वार-द्वारपर दृव 


खीक आदि मङ्गल्की वश्तुएं सजायी है थीं । जलभरे 

रापूणंडधम्भागुरुधूपदीपवे ; ॥५६॥ | कच्छा; अरगजा ओर धूपकी सुगन्ध तया दीपावरीसे 

६ बड़ी ही विलक्षण शोभा हो रही थी | ५६ ॥ मित्र 

सिक्तमागो मदच्युद्धिराहतप्रष्ठमूथजाम्‌ । नरपति आमन्त्रित किये गये ये । उनके सतवाठे हाधिरयो- 

| लास्स पूगे के मदसे द्वारकाकी सडक ओर गिर्योका छिडकाव हो 
| गज गो लः 

| परादषटरम्भापूरोपशोभिता ।॥५७॥ गया था । प्रत्येक दरए्वाजेपर केर्लोके खमे ओर सुपारीके 

इरुखुञ्यफे ङेय बिदरभ॑यदुङ्खन्तय - | पेड़ रोपे हए बहत ही भठे माद्म होते थे ॥ ५७ ॥ 

मिथो अदिरे | उस उत्सव्रमे कुतूहट्वदा इधर-उधर दौड़-धूप करते हए 

# त जर्हो-तहोँ सुकिमिणी-हरणकी ही गाधा गायी जाने चगी । 

राजाना राजकन्या बभूवुभरंशविसिताः ॥५९॥ ` उसे सुनकर राजा ओर राजकन्यां अत्यन्त विस्मित हो 

दरारायामभूद्‌ र्‌ ९ | मगव्रती ल्श््मीजीको स्विंमणीके 

द्ारशषायामभद  पुरीकसा गयी ॥५९॥ महाराज 
क गदाम्‌ ५५ , रूपमे साक्षात्‌ ल्स्ष्मीपति भगवान्‌ ्रीङष्णके साथ देखकर्‌ 
रुकरिमिण्या रमयोपेतं दषा कृष्णं भियः पतिम्‌ |॥&६०॥ द्रारकावासौ न र-नारियोंको परम अनन्द इआ ॥ ६० ॥ 





#; 
चै 


*& # । 
॥ 





हि १. 
(ति >; ड 
क ॥ प ह 
५१९ ` ध 3} {द ~; ++ 
वि न" ४; (1, ५ कि 

र | "१५ भद # # ४ = ष. ‡ - ह क न =, चि 
- "१" "५" लकरः 

। न्क व) ४ 4 4 1 


इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरमस्वन्वे उत्तरे 
रुकिमिण्युद्राहे चतुःपच्चारात्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ 
-->+4<+ << € 


अथ पन्नप्चारात्तमोऽध्यायः 


च+ + ४ त १ 


१. 


|, 
{..१.१ 


"^ 18 ९ च ^ ४. । 
चेष १११, + 
६~\ ~ ^ ५९ ८ 
). 4 ¢ १ 


५ 
(त 1 < 









1 = पदयुम्नका जन्म ओर शाम्बराखुरका वध 

= श्र्च उराच श्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ । कामदेव भगवान्‌ 
(क वासुदेवा =. | डा ह । ३ पहठे रुद्रमगवानकी करोधारभि- 
१. देवांशो दग्धः प्राग्‌ रुद्रमन्युना। ' वघुदेवके्ी अशत) _ _ 


--- = ----~-~--~------- रू 
ह 


+ ष्‌ क 
+ > की ,। \ ४ च ् २. ~ `. (नि बादरायणिरूवाच 
+ " +, तः ॥ ४ 9 राजन्‌ श ~. “~, = ^ प ॥ र~ ४, (1 ४ ७५ 0 -- 0. 8२ 
| „= + १ = वहू = {-+ -# + "^ क ( = ~^ > ५ ^ 53 ४ 3 + [) 
^ । ५ १ । { ¶ क „ गज्त्ः ् क ~ + 4 ॥ ~> करि र # च (~ क #9 
४ अ व्क ॐ ल ज (क, 4 ॥ + ति ~ 
र ॥ * ‡ 


| क च = क्र { 
ऋ : ॥ = "५ 
9, ना. 1 ट्‌ 





< । 4 ष्क 
द 


आ # 4 े क. # ` अ+ 
6 । + न ४ १ ह ~न 
~ = १ च, > ॐ कि ~ = च > 
1 ५ -छनक न व क न 
“ न += छ. 
4 ¶ # 7 > 9 (५ ज $ 
* शक ~क त ४" ङ 


१.0 ६. कनः केक, छ => + क च्छ > ऋ च 8 \ कः ~क 





१ क ° क = 1" = नक 
अ० ५५ | दशम स्कन्धं 






* क क > = व, 


देहोपपत्तये भूयस्तमेव प्रस्यपद्यत ॥ १॥ से मस्म दहो गये यै । अव रिर शरीरप्रातिकेिन्यि ` 

= € ट अपने अंशी भगवान्‌ वाघुदेवका दही आश्रय 
स॒ एव जातो वेद्या कृष्णवीयसमुद्धवः । का ॥ १॥ वेही काम अवकी वार भगवान्‌ श्रीकृष्णे द्वारा 
स्क्रिमणीजीके गभसे उत्पन इए ओर प्रद्युम्न नामसे जगतमं 
परसिद्र इए । सौन्दय, वीय, सौशील्य आदिं सदृशुणेमिं 
भगवान्‌ श्रीङृष्णसे वे किसी प्रकार कमनये॥२॥ 
वाल्क प्रद्युम्न अभी दस दिनके भीन इए येकि काम- 
रूपी राम्बराुर वेष वदल्कर सूतिकागृहसे उन्हें हर 
ठे गया ओर समुद्रम फेककर अपने धर टट गया । 
उसे म्म हो गया था कि यह मेरा भावी रात्र 
हे ॥ ३ ॥ समुद्रम बाक्क प्रयुम्नको एक वड़ा भारी 
मच्छ निगल गया । तदनन्तर मद्युओने अपने वहत बड़ 
जाल्म कसाकर दूसरी भछ्ल्मियोके साथ उस मच्छको भी 
पकड य्या ॥४॥ ओर उन्होने उसे ठे जाकर शम्ब्राघुरः- 
को भटके रूपमे दे दिया । इाम्बराघुरके रसोदये उस 
अदधत मच्छको उठाकर रसोईघर ठे आये ओर 
कुरहाडियोंसे उसे काटने चो ॥५५॥ रसो्ष्योनि मत्स्यके 
पेटमे बाक्क देखकर उसे रम्बराघुरकी दासी मायावती- 
को समर्पित किया । उ्तके मनम बड़ी राङ्का इई । तब 
नारदने आकर बाक्कका कामदेव होना, श्रीकृष्णकी पत्री 
रक्रिमणीके गभ॑से जन्म लेना, मच्छके पेटमें जाना सब 
कुछ. कह सुनाया ॥ & ॥ परीक्षित्‌ ! बह मायावती ` 
कामदेवकी यडाखिनी प्ली रति ही थी। जिस दिन. 
दाकर ओके क्रोधसे कामदेवका रारीर भक्ष हो गया था, 
उसी दिनसे वह उसकी देहके पुनः उत्प होनेकी 
प्रतीक्षा कर रही थी ॥ ७ ॥ उसी रतिको शम्बराघुरने . 
अपने यहाँ दाक-भात बनानेके कामम नियुक्त कर खवा, 
या । जब उसे माटम इ कि इस शिक ख्पमे 
यति कामदेव ही दहै, तन वह उस्तके प्रति बहत ग्रे 
करने च्गी ॥ ८ ॥ श्रीकृष्णक्कुमार मगान्‌ प्रचुम्न बहुत 
थोड़े दिनोमे जवान हो गये । उनका ख्यलावण्य ना 




























प्र्युस्न इति विख्यातः सवंतोऽनवमः पितुः ॥ २॥ 
शम्बरः कामरूपी हत्वा तोकमनिद्ञम्‌ । 

स विदित्वाऽऽत्पनः घरं प्राखयोदन्वस्यगाद्‌ गदम्‌ ३ 

तं निर्जगार बलवान्‌ मीनः सोऽप्यपरे; सदह । 


वृतो जालेन महता अरीतो सस्खयजीषिभिः ॥ ४॥ 


तं॑ शम्बराय कवत उपाजहरूपायनम्‌ 1 
घ्रूदा महानसं नी त्वावद्यन्‌ खधितिनाद्भुतम्‌ ॥ ५॥ 
दष्टा तदुदरे बारं मायादत्ये न्थवेदयन्‌ । 
नारदोऽकथयत्‌ सवं तखाः शङ्कितचेतसः । 
व।लश्य त्श्रुत्पचतिं मरस्योद्रनिवेशनम्‌ ॥ ६ ॥ 


सा च कामस वै पली रतिर्नाम यशषिनी । 










पत्युनिरदग्धदेदस्य देदोत्पत्ति प्रतीक्षती ॥ ७॥ 





“ निरूपिता रम्बरेण सा षपोदनष्राधने। 
कामदेवं शिश्चं बुद्ध्वा चक्र स्नेहं तदार्भके ।॥ ८ ॥ 


नातिदीर्धण काडेन स काष्णीं रूढयौवनः । 






जनयामास नारीणां वीकषन्तीनां च विभ्रमम्‌ ॥ ९॥ 


ए 


क्षा तं पतिं पद्दलायतेक्षणं 






न भ 
अ अः 
6 


प्रलम्बबाहुं नररोकसुन्द्रम्‌ | बद जीर म 


॥। 
ऋ) कः 


1 
काणणे 
ल ज क 
क शण्कोक्यनिकककवयक अओ क 
(येये) व्योः द, 
५ 
तिः 1 किक का > 
| 
१" 1 
१ क प [ 
(य क न कै ॥  । 
~ #= ॐ "+ 


क 9 वि वयक कक ह्रं 













"क ज 
न ब्द 
च क +त कीक ज न्--७=. 
५ 


४७६ 


भ्रीभद्भागवतं 


[ अ० ५५ 





सत्रीडदासोततमितभरवेक्षती 
्रीत्योपतस्थे रतिरङ्ग सोरतेः ॥१०। 
तामाह भगवान्‌ काष्णिमातस्ते मतिरन्यथा । 
मातभावमतिक्रम्य घतंसे कामिनी यथा ॥११॥ 


रतिरुवाच 


भवान्‌ नारायणतः शम्भरेणाहतो गृहात्‌ । 
अहं तेऽधिक्कता पली रतिः कामो भवान्‌ प्रभो ॥१२॥। 
एष त्वानिदंशं सिन्धावक्षिपच्छम्भरोऽसुरः । 
रस्योऽग्रसीत्तदुदरादितः प्राप्तो भवान्‌ प्रभो ॥१३॥ 
तमिमं जहि दुधंषं दुजंयं शत्रुमात्मनः । 
मायाद्यतविद्‌ स्वं च मायाभिर्मोहनादिभिः ।॥ १४॥ 


परिशोचति ते माता इररीव गतप्रजा। 


पत्रस्नेदाला दीना विवत्सा गौरिवातुरा ॥१५॥ 


ग्भाष्येवं ददौ विं प्रद्यम्नाय महात्मने । 


मायावती महामायां सवेमायाविनारिनीम्‌ ॥१६॥ 


स च शम्बरमभ्थेत्य संयुगाय समाह्ययत्‌ 1 
अविषद्येस्तमाक्षेपेः क्षिपन्‌ संजनयन्‌ कलिम्‌ ॥१७॥ 





हास्यके साथ मोह मटकाकर उनकी ओर देखती ओर 
परेमसे भरकर खी-पुरुपसम्बन्धी भाव व्यक्त करती इई 
उनकी सेवा-डश्रषामे खण रहती ॥ १०॥ श्रीकृष्णनन्दन 
भगव्रान्‌ प्रदयुम्नने उसके मरमं पयितंन देखकर कहा-- 
देवि | तुम तो मेरी मौके समान हो | तुम्हारी बुद्रि 
उर्टी कंसे हो गयी ? मै देखता द्र किं तुम माताका 
भाव छोड़कर कामिनीके समान हाव-माव दिखा रही 
होः ॥ ११॥ 


रतिने कटा--्रमो ! आप खयं मगवान्‌ नारायणकरे 
पुत्र हैँ । शम्बराघुर आपको सृतिकागृहसे चरा यां 
था । आप मेरे पति खयं कामदेव हैँ भौर मै आपकी 
सदाकी धमंपती रतिर १२॥ सेरे कामी ! जव अप 
दस दिनके भीन थे, तव्र इस शम्बर्‌सुरने आपको हरकर 
समुद्रम डाक दिया था । वह एक मच्छ अप्रको निगल गया 
ओर उसीके पेटसे आप यहां सुच प्राप्त इए है ॥ १३॥ 
यह रदाम्बरासुर सकडां प्रकारद्ीी माया जानता है | 
इसको अपने वरामं करटेनाया जीत टेना वहत ही 
कठिन है | आप अपने इस्त शत्रुतो मोहन आदि मायाओं- 
के द्वारा नष्ट कर डाटिये ॥ १४॥ खापिन्‌ ! अपनी सन्तान 
आपके खो जानेसे आप्री माता पुत्रसेहसे व्याकु 
हो रदी है, बे आतुर होकर अत्यन्त दीनतासे रात-दिन 
चिन्ता करती रहती हैँ | उनकी टीक वेसी ही ददा 
हो रही है, जंसी बच्चा खो जानेपर कुररी पक्षीकी अथा 
बडा खो जानेपर वेचारी गायकरी होती हैः ॥ १५॥ 
मायावती रतिने इस प्रकार कहकर परमशक्तिराटी 
प्रदुम्नको महामाया नामकी त्रिया सिखायी । यह विद्या 
एसी दहै, जो सब प्रकारकी मायाओंका ना कर देती 
है ॥ १६ ॥ अब प्रद्युम्न जी शम्जरघुरके पास जाकर 
उस॒पर बडे कटुकटु आक्षेप करने लगे । वे चाहते थे 
कि यह किसी ्रकार क्ञगड़ा कर नेठे । इतना ही नही, 
उन्होनि युद्धके च्य उसे स्पष्टखूपसे लल्कारा ॥ १७ ॥ 


्रयुम्नजीके कटुत्रचनोंकी चोटसे शम्बराुर तिढ- 
मखा उडा | मानो किसीने विषैले सोपिको पेरसे ठोकर 
मार दी हो । उसकी अं क्रोधसे क हो गयीं । 
बह हाये गदा कर बाहर निकढ भाया ॥ १८ ॥ 








॥ ॥1. ११११. 1१.11. 


५ जै 1 रै 





गदमाविध्य तरस। प्रद्युम्नाय महारमने । 
प्रक्षिप्य व्यनदन्नादं वजनिष्पेषनिष्टुरम्‌ ॥१९॥ 
तामापतन्तीं भगवान्‌ प्रहयुभ्नो गदया गदाम्‌ । 
अपाख चरत्रवे कृद्धः प्राहिणोत्‌ खगदां चप ।॥२०॥ 
स च मायां समाश्रित्य दंतेयीं मयदचिताम्‌ । 


युप्रचेऽख्रमयं वपं कर्ष्णो वैहायकरोऽसरः ॥२१॥ 


य 


वाध्यभानोऽखवर्पण रोकिमिणेयो महारथः 
सत्वातिमिकां महाविचां सवमायोपमर्दिंनीम्‌ ॥२२ 
ततो शौह॑कगान्धवंवेलाचोरगराक्ष्ठीः । 
प्रयुद्क शतशो देस्य; काष्णिव्यंधमयत्‌ स ताः॥२३॥ 
निरातमसिय्॒यम्य सश्चिरीटं सङ्कण्डलम्‌ । 
शम्बर्य शिरः कायात्‌ तस्रऽपश्रोजसाहरत्‌॥२ 


आकीयंमाणो दि विजेः स्तबद्धिः इसुभोत्रैः। 


` भायंयाम्बरचारिण्या पुरं नीतो विहायसा ॥२५।! 


अन्तःपुरवरं राजन्‌ ङुलन।शतसंङरथ्‌ । | 
विवेश परन्। गमनाई्‌ बिधत बराहकः ॥२६॥ 
तं द्ष्रा जर्दश्यामं पीतकशेयवाससम्‌ । 


प्रलम्बबाहुं ताम्राक्षं खुसितं रुचिराननम्‌ ॥२७॥ 


नीलबक्रारकालिभिः. 


‡ के 


तञ्चुख(म्भोजं 


~ - 


दंश्चेम स्कन्धं 


+ 6 







उसने अपनी गदा वड़े जोरसे आकाश्मे घुमायी नौर 
इसके बाद प्रयुम्नजीपर चना दी । गदां चक्ते समय ` 
उस्ने इतना ककंश सिंहनाद किया, मानो बिजली ` 
कड़क रदी हो ॥ १९. ॥ परीक्षित्‌ । भगवान्‌ प्रद्युम्ने _ 
देखा क्रि उसकी गद बडे वेगसे मेरी ओर आ रदी है । 
तव उन्होने अपनी गदके प्रहारसे उसकी गदा गिरा 
दी ओर क्रोधमें भरकर अपनी गदा उसपर चल्यी ॥२०॥ 
तव वह दैत्य मयासुरकी वतलरयी इई घुरी मायाका 
आश्रय टेकर्‌ आकाशम चखा गया ओर वहसे प्रद्युम्न जी- 
पर॒ अच-राखोंकी वषं करने लगा ॥ २१॥ महारथी 
प्रयुम्न जीपर वहृत-सी अक्ष-वषां करके जव वह उन्हें 
पीडित करने लगा, तब उन्होने समस्त माया्ओंको शान्त 
कलेवाढी सच्वमयी महाविद्याका प्रयोग किया ॥ २२॥ 
तदनन्तर श्म्बरासुरने यक्ष; गन्धवं, पिंडाच, नाग ओर 
राक्नसोकी सेकडां मायाओंका प्रयोग किया; परतु श्री- 
कृष्णङ्कुमार्‌ प्रद्युम्न जीने अपनी मह्ाविदयासे उन सबका 
नाड कर दिया॥२२॥ इसके बाद उन्हनिएक 
तीक्ष्ण तव्छार उठायी ओर शम्बराुरका किरीट एवं ` 
कुण्डल्से घुशोमित सिर, जो काल-छ दादी.मूरछेसे ` 
बड़ा भयंकर टग रहा था, काटक्र्‌ धड्से अब्ग क्र 
दिया ॥ २४॥ देवतालोग प्ष्पोकी वषौ क्रते इए 
स्तुति करने लगे ओर इप्तके वाद मायावती रति, जो 
आकारामे चलना जानती थी, अपने पति प्रदुम्नजीको 
आकाशमागसे द्वारकापुरीमे > गयी ॥ २५॥ 


परीक्षित्‌ ] आकाशते पनी गोरी पनीकेसायसंविके 













मेघका जोड़ा हो । इस प्रकार उन्होने भगवरानके 
उत्तम अन्तःपुरमे प्रवेश किया, जिप्तमं सैकड़ों श्रेष्ठ 
रमणियों निवास करती थीं ॥ २६ ॥ अन्तःपुरकीं 
नारियोने देखा, प्रदुम्नजीका रारीर वषौकाटीन 
समान श्यामवणे दहै । रेशमी पीताम्बर धारण किये इर 
ह । धुटनोंतक ठ्बी युजा है, रतनारे नेन ह 8 । 
सुन्दर सुखपर मन्द-मन्द सुपकानकी ` 
है | उनके खुलारविन्दपर & (1 र ५ 6६ अक्क 


४७८ ए श्रीमद्भागवत [ अ० ५५ 














कृष्णं मत्वा जियो हता निलिल्युस्तत्र तत्र ह।।२८। हों । वे सब उन्हें श्रीकृष्ण समज्ञकर सकुचा गयीं ओर 
धरोमें इधर-उधर टुक चिप गयीं ॥ २५७-२८ ॥ फिर 
अवधाय रनेरीपद्वलक्षण्येन योषितः ` | धीरे-धीरे जिर्योको यह मादम ह्यो गया कि यें श्रक्कष्ण 
उपजग्धः प्घुदिताः सस्रीरत्नं खुिसिता; ॥२९॥ नहीं है; क्योकि उनकी अपेन्ञा इनमें कुछ विलक्षणता 
| 8 अवदय है । अब वे अस्यन्त आनन्द ओर विस्मयसे भर- 
अथ तनासितापाङ्गी वेंद्भीं वल्गुभाषिणी । कर इस श्रेष्ठ ॒दम्पतिके पाकस् आ गयीं | २९ ॥ इषी 
2 ६ समय वरहा रुक्रिमिणीजी आ पर्ची । परीक्षित्‌ | उनके 
असरत्‌ खसुतं नष्टं॑स्नेहस्छुतपयोधरा ॥२०॥। | नेत्र कजरारे ओर बाणी अयन्त मधुर शी । श्ल नवीन 
[सि 5 , दम्पतिको देखते ही उन्हे अपने खोये इए पुत्रकी याद्‌ हो 
को न्यं नखेदूयंः कख वा कमलेक्षणः । आयी । वात्सल्यस्नेहकी अधिकतासे उनके स्तने 
दूध ्षरने चणा ॥३०॥ रक्मिणीजी सोचने ठगी-- 
नररत्त कोन है १ यह कमल्नयन्‌ किंसका पुत्र है १ किप वड़- 
भागिनीने इसे अपने गममं धारण कतिया होगा १ इसे यह 
कौन सौभाग्यवती पतीखूपमें प्रपत इ दै १ ॥ ३१॥ 
मेरा भी एक नन्हा-सा शिद्य खोगयाथा | न जाने 
कौन उसे सतिकागृहसे उटा ठे गया । यदि वह्‌ कही 
जीता-जागता होगा तो उप्तकी अवस्था तथा ख्य 
भी इसके समान इजा होगा ॥ ३२ | मे तो इ बातसे 
क ६ हैरान ह कि इसे मगवान्‌ श्यापञुन्दरकी-सी ख्य-रेखा, 
आषछत्याचयवेगत्या सरहासावलाकन; ॥२२॥ | अङ्गोकी गठन, चाल-ढाल, सुसकान-चितवन ओर वोढ 


~~ 1 चाक कासे प्राप्त इई १॥ २३ ॥ हो-न-हो यह्‌ वही 
स एव वा भवेन्नूलं यो मे मभ शतोऽभ॑कः । नाकक है, जिसे मैने अपने गभ॑मे घारण क्रिया था; 
क्योकि खभावसे ही मेरा स्नेह इसके प्रति उमड़ रहा 
है ओर मेरी बायीं नोह भी फड़कः रही है" ॥ ३४ ॥ 


एवं मीमांसमानायां वेद्यां देवकीसुतः । जिस समय रुक्मिणीजी इस प्रकार सोच-वरिचार 
| वर्‌ रदी थीं-- निश्चय ओर संदेहके च्ूलेमें श्ल रही 










धृत कया चा जरे केयं ङन्धा त्वनेन वा ।३१॥ 
मम्‌ चाप्यात्मजो नष्टो नीतो यः दतिकागुहात्‌ 


एतत्तस्यदयांरूषो यद्‌ जीवति इुत्रचित्‌ ॥२३२॥ 


कथं त्वनेन संप्राप सारूप्यं शाङ्गधन्बनः 


अश्चुभ्मिन्‌ प्रीतिरधिका वामः स्फुरति मे युजः २४) 


"अः क्या 2 थी, उसी समय पवित्रकीतिं भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने 
प. दवक्यानकदुन्दुभ्यात्तमरलोक आगमत्‌ ॥२५॥ | माता-पिता देवकी-वसुदेवजीके साथ वँ पधारे ॥२५५॥ 
0 4 ॑ | भगवान्‌ श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे । परंतु वे बु 
( क्ताः ऽपि भगवां स्तृष्णीमास जनादंनः। न बोरे, चुपचाप खड़े रहे । इतनेमें ही नारदजी वहो 

¢ १... आ पचे ओर उन्न प्रथुम्नजीको राम्बरापुरका हर ठे 


समरे पैक देना आदि जितनी भी टना 
ऽकथयत सच्‌ जाना, सषुद्र ना आदद्‌ जत, घटनाए 
< नारदो च भम्रादरणादिकम्‌ ५ घटित हं थीं? वे सब कह सुनायीं ॥ ३६ ॥ नारदजी- 









न । 
 #७ ५ । ५, 
च 





क. के द्वारा यह महान्‌ आश्चयमयी घटना सुनकर मगवान्‌ 
तच्छ्रत्वा महदाश्यं दङृष्णान्तःपुरयोषितः। श्ी्ृ्णके अन्तःपुरकी निया चकित हो गयीं लौर 


उपधार्य ° न) ९ ५ | 








~ ~ 


> अ 


श नि क 4 ¢ जे ॥ क्वो ह, ॥। 
5 


= क ८ जः नकी, 91 ५ कि 
न्क्ष = क ०» 7 क क = 1 

3 क ५ 1 क 

१ न "व्र, च 





अ० ५६ 1 











अभ्यनन्दन्‌ बहुनब्दान्‌ नष्ट मृतपिवागतम्‌।!३७] | बहत वर्षोतक खोये रहनेके बाद कौटे इए प्रथुम्नजीकां 
इस प्रकार अभिनन्दन करने ल्गौ, मानो कोहं मरकर जी । 
देवकी वसुदेवश्च कृष्णरामो वथा स्ियः । उठा हो ॥ ३७ ॥ देवकीजी, वघुदेवजी, भगवान्‌ श्री- 
कृष्ण्‌, बलराम्॑ी, रुक्मिणीजी ओर किर्या--सव उस्न नव- 
दम्पती तौ परिष्वज्य रुकिपणी च ययुयुदम्‌॥॥३८॥ | दम्पतिको हृदयसे कगाकर बहत द्यी भानन्दित इए ॥३८॥ 
जव द्वारकावासी नर-नार्स््यको यह माद्धूम इआ कि 
नष्टं ्रयुम्नमायादसाभ्य दारकोकस १ । खोये इए प्रद्युम्नजी लोट आये हैँ 3 तव वे परस्पर कहने 
कगे--- "अहो, कैसे सोमाग्यकी बात है कि यह वाच्क मानो 


अहो भृत इवाय।तो मालो दिष्ट्येति हान्‌ | ३९॥ | मरकर फिर रौर आयाः ॥ २९ ॥ परीित्‌ । परुम्नजीका 
खूप-रग भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इतना मिलता-ज॒ल्ता था कि 


यं वे पहः पितखरूपनिज्ेशभावा- उन्दं देखकर उनकी मातां भी उन्हें अपना पतिदेव श्रीक्ब्ण 
ह ॥ समञ्चकर मधुरभावमें मग्न हो जाती थीं ओर उनके 
स्तन्पातये यद्भजन्‌ रदरूढभावाः ) सामनेसे हटकर एकान्तमे चटी जाती थीं । श्रीनिकेतन 
भगवानूके प्रतिबिम्बसखरूप कामावतार भगवान्‌ प्रदुम्नके 

चित्रं न तत्‌ खल्‌ रसास्पद विम्बति्बे दीख जानेपर रेसा होना कोई आश्वयेकी वात नह्य है । 


फिर उन्हें देखकर दूसरी च्ियोंकी विचित्र दशा हो 
कामे सरेऽक्षिविषये किमुतान्यनायंः ॥४७०।॥ जाती थी, इसमे तो कना दी क्या है ॥ ४० ॥ 
| ~€ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्ध प्रदयुम्नोत्पत्िनिरूपणं 
नाम पञ्चपञ्चारात्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ 





=<> दद † 


अथ षरपञ्ारात्तमोऽधष्यायः 


स्यमन्तकमणिकी कथा, जाम्बवती ओर सत्यभामाके साथ ्रीकृष्णका विवाह ~ 









्रीह्ुक उवाच | श्रीद्यक्देवजी कहते हँ- परीक्षित्‌ ! सत्नाजितने 
सत्राजितः खतनयां कृष्णाय छृतक्रिसििषः । श्रीकृष्णको च्ूठा कलङ्क खणाया था । फिर उस अपराधका ` 
माजन करनेके चयि उसने खयं स्यमन्तकमणिस॒हित अपनी 
स्थमन्तकेन मणिना खयञुधम्य दत्तवान्‌ ।। १॥ | कन्या सत्यभामा भगवान्‌ श्रकृष्णको सीप दी ॥ १॥ 


राजोवाच राजा परीश्षितने पृा- भगवन्‌ ! सत्राजितः 


श्रीकृष्णका क्या अपराध किया था १ उसे 
सत्राजितः क्रिषकरोद्‌ ब्रह्मन्‌ ष्णस्य किल्विषम्‌ । । † 17 ध 
| # न्तकमणि क्सि मिटी १ ओर उसने अपनी कन्या 
स्यमन्तकः ङतस्तख काद्‌ दत्ता सुता हरेः ॥ २॥ उने क्यों दी १॥२॥ 
अ }: श्रीञयुक उवाच 

आसीत्‌ सत्राजितः सूरयो! भक्तय प्रम; सखा । 
१. न्धे शम्बरवधः पञ्च | = , 


र ३१ [५ २६ 4; 
पी प~ > ~= 
प की # ४" ॥ 
ष्ण क ॥ = = दू 











(न ध 


र 


० 
~ 
१ ॥ 1 ॐ कचन 
कन र च क 
॥ क" क-- च 3 ५ र ५ + क 
1१ =, क च्छ # + ६. 
~ ~=» 
८ 


१ तो ` ति = ` ` 
क त 
न 


"क कग ऋका क 


= 1 


क ~ 
कको > = 


ष्क कक्षे = ` 


[वि क व त 1 
ॐ केः दु 


मि 
= छोर 


प ` क "तो शो मु नण तिह क क, => = = = 
केष न्को) 4 ~. ऋ ~ न्य 


।१ ५ 


[तै 9 । रे 
म स > । । द किनि 
र्रर 

+ ॥ 


"णी सी 
`" जेः ~= चिती -चक्ष०@। = क 


। 4॥॥.. 


॥ | च > 
„ + +भ म मि [ 
ष कै 





८ ० 


भ्रीमद्भामवत 


[ अ० ५६ 





=-= 





ज भ = 


प्रीतस्तस्मै मणिं प्रादात्‌ दर्यस्त्टः खमन्तकम्‌ । २ ॥ 
स तं बिभ्रन्भरणि कण्डे आाजमानो यथा रविः 


प्रविष्टो दारकं राजस्तेजसा नोपरधितः ॥ ४॥ 





तं विलोक्य जना दुरात्तेजस्ा अुषटश््टयः । 
दिव्यतेऽधैभेगवते शशंसुः सर्यशङ्किताः ॥ ५॥ 
नारायण नमस्तेऽस्तु शद्धचक्रगद्‌ाधर । 
दामोदरारविन्दाक्च गोविन्द यदुनन्दन | ६}; 
एष आयाति सविता त्वां दिदक्षर्जगत्पते । 
मुष्णन्‌ गभस्िचक्रेण नृणां चक्षुषि तिम्मगुः ॥ ७॥ 
नन्धन्विच्छन्ति ते माग त्रिलोक्या;विबुधर्षभाः। 
ज्ञात्वा गूढ यदुषु द्रष्टं त्श यात्यजः प्रभो ॥ ८॥ 
श्रीद्युक उवाच 

निशम्य बालवचनं प्रहयाम्बुजलोचनः । 
प्राह नासो रविर्दथः सत्राजिन्मणिना ज्वलन्‌ ।॥ ९॥ 
सत्राजित्‌ खगं श्रीमत्‌ ृतौठकमङ्गलम्‌ 
विद्य देवसदने मणिं वि न्यवेशयत्‌ ॥१०॥ 


दिने दिने खणंभारानष्टौ स ख॒ञति प्रभो । 
दुर्भिक्षमायर्छिनि सर्पाधिन्याधयोऽञ्चभाः । 


# भारा परिमाण इस प्रकार है 


चतुभिर्ीहिभिरगज्ञं 


अष्टो धरणमष्टौ च करप 
प्ाहूभार 


वरं पल्दात 





गुज्ञान्पञ्च पणं 





होकर उसके वहत बढ़े मित्र बन गये ये । स्यं मगवान्‌ने 
ही प्रस्तन्न द्योकर बडे प्रेमसे उसे स्यमन्तकमणि दी 
थी ॥ ३ ॥ सत्राजित्‌ उस मणिको गठेमें धारणकर रेसा 
चमकने चणा, मानो खयं सूय दी ह्यो | परीक्षित्‌ | जव 
सत्राजित्‌ द्वारकामें आया, तत्र॒ अव्यन्त तेजखछिताके 
कारण लोग उसे पहचान न उरे ॥ ४ ॥ दृरसे दी उसे 
देखकर टोगोकी ओँल उसके तेजसे चौँधेया गयीं । 
त्गोने मञ्चा कि कदाचित्‌ खयं भगवान्‌ सूयं आ रहे 
हं । उन ोरगोने भगवान्‌ॐ पास आकर उन्हें इ वातकी 
पचना दी । उस समय सगवान्‌ श्रीकृष्ण चौर खेक 
रहे थे ॥ ५ ॥ टल्ोोने कदा --्ाह्क-चक्र-गदाधारी 
नारायण ¡ कमलनयन | दापोदर } यदुव्शरिरोमणि 
गोविन्द्‌ | आपको नमस्कार है ! ६ जगदीश्वर ! देये, 
अपनी चमकीटी किर्णोसे छोगेकि नेत्रंको चोंधियाते 
इए प्रचण्डररिम भगवान्‌ सय आपका ददान करने आ 
रह हैँ ॥ ७॥ प्रभो ! सभी श्रेष्ठ देता त्रिलेकीमे 
आपकर प्राप्तिका मागं दढते रहते है; कितु उसे पते 
नहीं । आज आपको यदुवं में छिपा हआ जानकर खयं 
पथनारायण आपका दशन कएने आ हे है ॥ ८ ॥ 
शरीश्युकदेव जी कहते ह--परीक्षित्‌ | अनजान 
पुरर्षोकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
हैकतने व्मो । उन्होनि कहा --“अरे, ये प॒यदेव नहीं हैँ । 
यह्व तो सत्राजित्‌ है, जो भणिके कारण इतना चमक 
रहा हैः |॥९॥ इसके बाद सत्राजित्‌ भपने समृद्ध घरमे 
चखा आया । घरपर उसक्रे शयुभागमनके उपलक्षये 
मङ्गल-उत्सव मनाया जा रहा था । उस्ने ब्राह्मणोके द्वारा 
स्यमन्तकमणिको एक देवमन्दिरमे स्थापित करा दिया॥१०॥ 
परीक्षित्‌ । वह मणि प्रतिदिन आठ भार सीना दिया 
करती थी । ओर जहाँ वह पूजित होकर रहती थी, वहां 
ुर्भिन्न, महामारी, प्रहपीडा, सर्प॑भय, मानसिक ओर 





पणान्‌ । 
तांश्चतुरः पलम्‌ । 
स्यार्दिरतिस्वखः | 


अर्थात्‌ ध्वार ब्रीद ( धान ) की एक गुज्ञा,. पोच गाज्ञाका एक पण? आठ पणका एक भरण, ^ रद्गकरा एक 
कर्षः चार कर्षका एकं पल, सौ पल्की एक तटा ओर बीस वलाका एक मार्‌ कहलाता ई । 





= 








| तत्र दृटा भणिश्रष्ठं बालक्रीडनकरं कृतम्‌ । 


अं० ५६ । दश्चसं स्कन्ध ४८१ 


च क जित ` नो = ज: साक ` > = " = = 








ग के चि सकरन क्कः ` जन्ते द क [न ऋः आ रः दि भन्ये त + ` ` शोध ऋक ऋति तत चति "= ` 
भो मि 








+ ^ ज कको न 
"गमित कि 





2 स 


न्‌ सन्ति मथिनत्तत्र यत्रास्तिऽभ्यचिती मणिः ॥९१।॥ रारीर्कि व्यधा तथा मायातियोच्छा उपद्व आदि कोई 
भी अद्म नहीं होता धा ॥ ११॥ एकत वार भगवान्‌ 
श्रीकृ्णने प्रसङ्गवद कदा सत्राजित्‌ ! तुम अपनी 
त याचितो मणिं कापि यद्ुराजय शौिा । मणि राजा उग्रसेनको दे दो | परंतु वह इतना अर्थ- 
ल्रदुप--व्येभी था कि मगवानकी आज्ञाका उल्टङ्खन 
दोगा, इसका कुछ भी विचार न करके उसे अखीकार 
तेवाथकादुकः प्रादाद्‌ यान्जाभङ्कपतकयम्‌ ॥१२। | कर दिया ॥ १२ ॥ 





तबेकद्‌ः धरणि ण्डे प्रतिद्धच्य महाप्रभम्‌ । एक दिन सत्राजितेक्े भाई प्रसेनने उप्त प्म प्रकार 
| मयी मणिक्रो अपने गस धारण कर्‌ छिथा ओर द्विर्‌ बह 
दयां हयसइह था इय॒न्वरड्‌ इम ॥१२॥ | घोड़पर सवार होकर चिकार खेने वनम चटा गया ॥ १२॥ 
ट 2 व्हा एक सिंहने धो सहित प्रसेनकौ मार डा ओर उस 
प्नं सहयं हत्छ मणिमाच्छिय केसरी । >. छीन हि अमी पौ =+ ~ 
मणिको छीन ल्या | वह अभी पवतस्री गुफामें प्रवेडा 


भिरि पिज्ञम्बवदा निहतो मणिभिच्छता ।१४॥। | कर ही रदा था कि मभिक्र छि ऋश्वराज जाम्ववान्‌ने 


उसे मार डाटा ॥ १४ ॥ उन्न वह भणि अपनी युफामें 
चक्र वारस्य मघ अगेडनक एषे । ठे जाकर वच्येको खेटनेके चिदे दी । अपने भाई 
प्रसेनके न ठीटनेसे उसके भाई सत्राजितो वडा दुःखं 
हआ ॥ १५ ॥ वह॒ कने गा, वहत सम्भव है श्री- 
कृष्णने ही मेरे भाईको मार डाल हो; क्योकि वह 
मणि गमे उाच्कर वनम गया था ] स॒त्राजित्‌क्तीं यह 
| वात सुनकर ठोग आपसमं काना-्सी कसे चो ॥१६॥ 
जव भगवान्‌ श्रीकृष्णने सुना कि यह कलङ्कका दीका 
भग्वाह्ठदुयश्चैस्य दुयंशो लिक्षमात्मनि । मरहयीसिर्‌ लगाया गया दहे, त्‌ वे उसे धोःबहानेके 
ः उदेद्यसे नगरके कुछ सभ्य पुरभोको साथ र्कर्‌ प्रसेन- 
मष्ट प्रसेनपद्बीमन्वपद्यत नागरः ।१७॥ | को दनेके ल्म वनम गये ॥ १७ ॥ बर्ह खोजते- 
खोजते ल्गोन देखा कि घोर जंगक्मे सिने प्रसेन ओर 
हतं प्रसेनमश्वं च वीक्ष्य केषरिणा चरै । उसके घोड़को मार डाल है । जव वे खोण सिंहके 
पैरोका चिह्न देखते इए अगे वदै, तव उन व्मेगोने यह 
तं॑ाद्विषष्ठे निहतमृ्षेण दद्छा्जनाः ॥१८॥ परतप एक रीछने सिंहको भी मार डावर 
८ 


मावान्‌ श्रीकृष्णने सब लोको बाहर ही विन _ ` 


ई दिया ` व व 
एको विवेश भगवानवयाप्य बहिः प्रजाः ॥१९॥ आर भके दी घोर अन्धकपरसे सरी इर | य 
राजकी भयंकर गुफामे प्रवेश किया ॥ १९ ॥ भगवानूने 


अपश्यन्‌ श्रात.र्‌ आता सत्राजित्‌ एयेतप्यत {१५ 


प्रायः छन्यनं निहतो समिग्रीवो वनं गतः । 


५ 


श्रादा सभेत ६ [ कभ कणऽजपड्चनाः ॥१६॥ 


ऋष्षराजधिरं भीममन्धेन तमसाऽऽदृतमर । 


` भा ० लं° २--द१-- ` 


त ति ५५ ~ ् ~ 
॥ ! . र ~ [क २ च कै ॥ > र 
१ =, ` १ ~ = न? ++ +" नि ग क 1 ५ 





वहां जाकर देखा कि श्रेष्ठ मणि स्मन्तक्को वर्का ` 
ठं छतमतिसतकषि्रवतस्थेऽभका न्तके ।।२०॥ | दिलोना बना दिया गय दै । वे उस इर ठनवौ इच्छसे 





५८२ श्रीम्कागवतं | अ० ५६ 


क 8 7 | ० कः + क कः 9 काः चज = फो = == क ऋ छ ७ के ॐ (पा व क 
य ऋ. । +| = = ऋ =>. क 


ऋ + 
च चकः = चः कतत 


` चदेक 7 कोने कर क क जत वतक द्यति = भ क 9 कि क = ~~ = न्क भक 
न 1 व "गेण वको नि ^> 


तमपव नर दष्टा धात्री इक्रःश्च भीतवत्‌. व्च्चकेपसजा रूडे इए २०} उस्त युफामें एक 
परिचित मवुष्यको देखकर वच्चेकी ध।य भयभीतकीं 


त्र्त्वाभ्यद्रवत्‌ छुद्धो जास्ववान्‌ बलिनां २२१।।९ र | मात चिल्खा उ९{ | उसक चि त्टाहट घछनकर प्रम 
| ब्य ऋश्षराज जम्तवान्‌ रोपित हौकर्‌ वहा दोड 


| 
1 


प क "नय" $ - } ' आये ॐ ~¬ ^ (~ 
स वे भगवतः तेन युधुधे स्वाभिन।ऽऽस्मनः । । आय ॥ २१ ॥ परीक्षित्‌ ! जाम्बवान्‌ उस समय कुपितं 











। | रे थे । उन भगवान महिमा, उनके प्रभवका 

| । (1 पुरुष प्राङ्त अत्ता कुपिता नाङ्भाववि त्‌ ।५२२॥ | तान चला } उन्ह्ाने उन्हं एक साधारण मचुध्य 

। { (|. -- | समञ्च चथा ओर वे अपरे खारी मगवरान्‌ श्रक्रपवे युध 

| { । | \ दन्दयुद्धं खतण्लद्ुभणो वीजिगीपद्तैः । | कएने कगे ॥ २२ ॥ जिस प्रकार मांसके व्थि दो बाज 

| [| 114 | आपततमे वते दै, वैते ही विजयाभिवापरी मगवान्‌ श्री 
| | (1: | आयुधाइमद्ु मेदोभिः क्रव्यार्थे स्येनयोशििि । ६३॥ | कृष्ण्‌ ओर जाम्तत्रान्‌ आपसे करने गे | 
१111; | पहले तो उन्होने अल-शजोका प्रहार किया, र्‌ 
¦ | | ॥ । | आसीत्तदष्टाविंशाहधितरेतरय॒षटिभिः । रिवखओंका । तत्पश्चात्‌ वै दश्च उ लाङ्काए एकं दृसरेपर्‌ 
।। ||| ४ ने छे | अन्तम धद्धयद् होते गा ॥ २३॥ 
| । | | | वजरनिष्पेषपर्पेरविश्रममहनिंशू ।॥२४॥ | परीक्षित्‌ ! वज्र-प्रहारके सपान केर धूते आपस 
॑ ॥ (11. | वे अद्धाईस दिनतक त्रिना विश्राम किये रात-दिन ठते 
५।।[. छृष्णयुषटिविनिष्यातनिष्पिशङ्खोरुदन्धनः । रे ॥ २४ ॥ अन्तम भावान्‌ श्रीकर पसोकी चेटसे 
| | | । ४ जाम्बवान्‌ हीरको एक-एक गोट द्रूट-घट गयी | 
# । (1 “णकः स्िनगात्रश्तमाह(सीव विश्च; ।२५। | उत्सादं जाता र्दा । सदए पलनेसे टथतय हो गया । 
८171 >. उन्न जलान्त बरिस्मिति---वमकतं इक्र मव्राच्‌ 


श्ीकृष्णसे कद्व | २५ ॥ श्रमो ! तँ जान गया । अप 
ही समस्त प्राभियके खामी) रक्षक, पुमर्य भावरान्‌ 
( तिष्णमथीशरम ।२९ विष्णुदहे | जपदौ सवके प्राण्‌, उद्धियव्र, मनोर 
॥ य धरणश्रुषं मभविष्णुमधीश्वरम्‌ ।\२६॥ | लर शरीक ह ॥ २६॥ आण विने स्वयिता जां 
¡ हि विष्ठां आदिको भी बनानेवले है} वनय दर्‌ पदर्थम भी 
त्वं हि विश्वद्यजां सरा सुज्यानासपि यश्च स्च । | सत्तख्पसे आपदही विराजमोन ह । काल्कै जितने भी 
| | अवयव है, उनके नियामक परम काठ अप ह्ये है ओर 

कारः करुयतामीशः पर आसा तथाऽऽस्म्‌ नरस्‌ २७] | दरीर-मेदसे भिन-भिन् प्रतीयमान अन्तरत्मा्थकरि पल 
[1 | | अत्मा जी अपदही है॥ २७॥ प्रमो | सुश्च सण 
यस्येषदुत्करितरोषरकटक्षमोक्षै- ` है, आपने अपने नेम तनिक-सा क्रोधका भाव लेक 
~. तिर्छी दृष्टिसे समुद्रकी ओर देखा था । उस सपय 
= = ह | स दर्‌ र्नैवाे नड़-वड़े नक्र ( घड़याठ ) 
` ` वैत्मादिशद्‌्वभितनक्रतिमिद्धिरोऽभ्धिः । ० व हयो गये ये ओर र | 

` [मर्गं देदिया था | तब आपने उसपर्‌ सेतु बधक 
© छत, स्वय उञ्ज््रारुता च लङ्का | घुन्द्र यजकी स्थापना की तथा ठद्काका विष्व किया । , 
1 आपके बांस कट-कटकर राक्षसोके सिर धष्वीपर गेट 
शंसिश्रि चेत रष युक्तानि ॥२८॥ ददेय) ( अवद्य दी भप मेरे वे दी !एमजी' श्रीङृष्णके 


च ॥ अन्व ग्यः 
5 र 
क. । ह 


जाने त्वां स्भूतानां प्राण आजः सहे बङ्‌ 
















न ~ 40- 
। निः ॥ ५ 


[ककः 





व्रि जय ककन, ® # रि क शा य 
& 


व्याजहार सहारा भग्वान्‌ देवकीसुतः ।\२९॥ 





जा ज पन == ऋ = => 


दि्तातविहानम्रक्षराजानश्च्युतः । 


अभिष्हयरबिन्द्क्षः पाणिरा ककरण दस्‌ ¦ 


कपया प्रा अकर प्रेमश्स्भीरया गिरा !:३० 


मणिहेलोरिहि पराप्ता वयष्श्पते निखम्‌ | 
भिथ्यामिश्लपं ्रसजनाद्यनो अनिनाधुना ।३१। 


अहेणाथ स॒ भणिनः ङष्णायोपजहार इ \; ३२ 
अदृष्टा निशेमं॑ छोर: पशिटख भिरं जनाः | 


सनृ दादश्दहानि ७ रतत (< प्र्‌ यदु ।२२३॥ 


स त्दथोऽशोचन्‌ विखत्‌ कभ्णमनि्तध्‌ ।\ ३४ 
साजित शपम्तस्ते दुःखिता द्ारस्ौरूषः। 


न 


उपतस्थुसंहाषाथां दमौ दष्णोररन्धये ।२५॥ 
तेवां त देव्युपखानात्‌ रत्यादिष्ाङषा स च| 
प्राुष॑भूय शि 


हीङ्शं खतं युनशििगतध्‌ । 


दारा हर्थयनं इरि; \३६। 


उपरस्य 


स पन्या सभिग्रीषं रुषं जारमहोर्सनाः !*२७] 
सत्राजितं समाहथ सभायां रजकतिधौ | 


४ [म 
"कील छ 


प्रं चार्या भगवान्‌ सभि तस्म न्धवेद्यत्‌।। ३८) 


कौ कके ~ 


च ६4 
।*च(°ङता रत्न ग्रद।सब्‌ ङ खस्तत 


१ | र # ‡ ॐ 
दश्च च्छन्द 


त पिः त कोकः जो कः चक तकः च 


उन्हं 
९. 










ज = = श 
` - 2.५4 ~ 
~ - ¬ 2 








पमे आये & ॥ २८ ॥ परीक्षित्‌ ! जव क्षरा 
जाम्बवानूने भगवानको पहचान च्या, तव कमलनयन 
श्रीकृष्णने अपने परमकल्याणकाी शीतक करकमव्को 
उनके रारीरपर फेर दिया ओर फिर अहैतुकी कृपासे 
मरकर प्रेमगम्भीर वाणीसे अपने भक्त जाम्बवान्‌ 
जीसे कहा-॥ २९-२० ॥ (ऋश्चराज | हम मणिके लिये 
ही तुम्हारी इस गुफामे आये हैँ । इस मणिके द्वार मे 
अपनेपर लगे ठे कठङ्कको मिटाना चाहता द्र ॥३१॥ 
भगवान्‌के एेसा कहनेपर जाम्कानूने बडे आनन्दसे 
उनकी पूजा कश्नेके व्यि अपनी कन्या कुभारी जाम्बवती- 
को मणिके साथ उनके चर्णेमिं समपिंत कर दिया ॥३२॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण जिन स्ोगोको गुफाके बाहर छेड 
गये थे, उन्होने वाद्ह दिनतक उनकी प्रतीक्षाकी। 
परं तु जवर उन्होने देखा कि अवतक वे गुफामंसे नही 
निकले, तव वे अत्यन्त दुखी होकर द्वारकाको च्रे 
गये ॥ ३२ ॥ वर्ह जव माता देवकी, र्क्मिणी, ` 
वूसुदेवजी तथा अन्य सम्बन्धियों ओर कुटुम्बिर्योको यह 
माद्धम इआ क्रि श्रीकृष्ण गुफार्मेसे नदीं निकले, तव 
वड़ा दोक इआ ॥ ३४॥ सभी द्वारकावासी ` 
अत्यन्त दुःखित होकर सत्राजितो भला-बुरा कहने 
खरो ओर सवान्‌ श्रीकृष्णकी प्रातिके व्यि महामाया 
दुगदिवीकी शरणमे गये, उनकी उपासना करने 
तमो । ३५ ॥ उनकी उपासनासे दुर्गद्वी प्रसन इडं 
ओर उन्होने आरीर्वाद दिया । उसी समय उनके वीचमें ` 
मणि ओर अपनी नवत्र जाम्बवरतीके साथ सफलमनोरथ 
होकर श्रीकृष्ण सबको प्रसन करते इए प्रकट हो ` 
गये {} २६ ॥ समी द्वारकावासी भगवान्‌ 
पत्नीके साथ ओर ग्लेमे मणि धारण कयि इए देखकर 
प्रणनन्दमे मम्न हो गये, मानो कोई मरकर लट आया 
हो ॥ ३७ ॥ 


क, 1 
र 


भः वि 1 त > 




















उप्रसेनके पास बुलतराया ओर जिस प्रकार मणि प्रा 
| इई थी, वह सब कथा सुनाकः  उन्हाने व्ह, मणि 
 सत्राजितको सोप स 


~ व [क = ६ 


~ सत्राजित्‌ 8 
सं ५ हो या मणि तो उसने ठेली, प्रतु उसका 


नीच॑को ओर्‌ ठयक गया ] अपने अपराधपर उसे 





















्रीमद्भागवतं [ अ० ५७ 





अनुतप्यमानो भवनमगमत्‌ स्वेन पाप्मना ।॥२३९॥ | वडा पश्वात्ताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपन 
घर्‌ पर्चा ॥ ३९ ॥ उसके मनकी ओंखेके सामने 
सोऽयुष्यायंस्तदेगधं बरपद्विग्रहाङखः । निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता । बल्वानूफे साध 
विरोध करनेके कारण वह भयभीत भी हो म्या था। 


६ कथं सृजाम्णात्मरजः प्रसीदे द्‌ बाच्युतः कथयू।\४०॥ अव्‌ बह यही सोचता रहता किं “भँ अपने अपराधका 

| माजन कैसे कर १ सुञ्ञपर भग्वान्‌ श्रीकरष्ण कसे प्रस 

| 1 | ) {~ ३ ञ्च क्रत्वा साध मह्य; तवेद वा जनों यथा | हं | | 1 ५ | | मे एेसा कोन-सखा ताम नात्कं जिसे मेरा 
। ({..; प कल्याण हो ओर वेग सज्ञे कोस नहीं । सचमुच मै 


अदूरदरी, क्षुद्र हर । धनके व्येभसे नँ वड़ी मूडताका 
काम कर वेठा }॥ ४१॥ अव मै रणिर्योमं रनकै 
समान अपनी कन्या सत्यभामा ओर वह ॒स्यन्तकमणि 
दोनो ही श्रीहृष्णको दे दू । यह उपाय वदरत अच्छा 
स, - है । इसीसे मेरे अपराधका मार्जन हो सकता है ओर 
उयःथोऽयं समीचीनस्तख्य शचान्तिने चान्यथा 11४२॥ को्डपाय नह्य ह | ४२ }; सत्नाजितने अपनी विनिवा 
वुद्धिसे एेसा निय करके खयं ही इषवे व्यि उद्योण 
एव व्यबाक्ता बुद्धया सश्ाजत्‌ खषा इभ किया ओर अपनी कन्या तथा स्यमन्तकभणि दोनों ही 
ठे जाकर श्रीकृष्णको अपण कर दी ॥! ३ !! सव्यमाभा 
मणि च खधषुचयस्य दष्णाथौपजकषर हं !।४३॥ | रील-खमभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सदूयुर्णेसे 
सम्पन थीं । बहूत-से खग चाहते थे कि सत्यमामा हमे 
तां सत्यभाभां भगनाडपयेमे यथाविधि । | मिटे ओर उन लगोनि उन मो भी था । परंतु अव 
। भगवान्‌ श्रीकृष्णने विधिप्र्क उनका पाणिग्रहण 
किया ॥ ४४ ॥ परीक्षित्‌ ! मणवान्‌ श्री्नष्णने सत्राजित्‌- 
से कहा-ह५ स्यमन्तकमभणि न ठँगे | आप सूर्य 
भगव्रान्‌के मक्त है, इत्ये वह आपके ही पापसर रे । 
भगवानाह न मणि भरवीच्छप्रो वयुं नप्‌) हतं तो धवल उसके प्के अवति वसत 
हए सोनेके अधिकारी है । वी आप हमेदे दिया 

तवौस्तां देवभक्छखं वथं च फरुभाभिनः | ४५॥ । करेः ॥ ४५ ॥ 


| | ह, 6 ६ स ~त 
| ` ` अदीषद्श्नं क्ष्रं षदं द्रधिभलेदम्‌ ।।४९।। 


1 व ~ 
1 - 
#, क थ 7 
9 ` प्क क = छः 
^ 


दास्ये दुहिषरं स्मे स्लीरत्नं रलमेव च । 


त | चत १ 
"त + पि ् 
+ ` 


क अहुमिर्याचितां शीलह्पौदार्यगुणान्विताम्‌ ।\४४॥ 


_ = स र = 
पि श्रीमद्भागवते हापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशषर्छन्धे उत्तरार्थ 
हः स्यमन्तकोपाल्याने षट्‌ पश्चारात्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ 





ई ग 
<= 





वि = क-, ~. 
4 ह 
४2 ~ 











` अथ स्तपारातमोऽध्यायः 

व: ४ ` स्यमन्तक -दरण, रातधन्वाका उद्धार ओर अक्रूरजीको फिरसे द्वारका बुखना 
शर्क उवाच्र श्रीश्ुक्दैवजी कहते हँ- परीक्षित्‌ ! यचपि मगवान्‌ 
श्रीङ्ष्णको इस बातका पता था कि लाक्षागृहकी आगसे 


च्वै-~ , 


विन्शो दग्धानाक्ण्यं पाण्डवान्‌ | 


पाण्डर्ोका 


















पाण्डर्वोका नाक भी अंका नही इआ है, तथापिजव 
पु; | 1; ,* व्रास्त द्‌वभः १ । षेः स्ममन्तकाहरणं त॒ हरण षद्पृच्चा° । 4 3 | 


१५ = क = अ क 
= च ए = -4 -् क चे नवै #1 ई 
४: द. ऋ इ ( धि, ति. न "4 ~अ ॐ 
भनी 4 अद 7 9 (= र क १. ~” (क प > र द ~ त = 

[म ५ ६ पि 2४ ४ ~ * 6 

७१ परः स्किः 3 = > 9 १ क "क ॥ र~ ह" च + + 

ऋ क क तन नः 4 क ॥ ० < ^+ भिः ‰. 

५ १ कर 2 क च च § ५, „ध. ~ ऋ 

=| ५७ व ॥ 


५ कैन क 9. ८. ३ 


अ० ५७ | 










० भ + यं ` १ क 





ड इन्त च इर्य दरणं सरम परयो इरन्‌ ।' १॥ उन्होने सुना किं कुन्ती ओर पाण्डर जल मर व ं 
समयका दुर-परम्परोचित व्यवहार करनेके वे बे वल्यम 
जीके साथ त्िनापुर गये ।॥ १ ॥ वँ जाकर भीष्म- 
भीष्य कृषं सशिहुरं सन्धारीं द्रोणमेव च । पितामह, कृपचाय, व्िदर, गान्धारी ओर द्रोणाचा्यसे 
मिकर उनके साथ समत्रेदना--सहानुभूति प्रकट की 
ओर उन स्ेगेसे कहने क्गे--द्वाय-दाय ! यह तो 

दस्यडःखौ च सङ्घस्य हा कष्टमिति होचतुः ॥ २॥ वड़े ही दुःखकी वात इई ॥ 


लञध८दन्तरं राजप रतधन्दानसूचतुः | भगवान्‌ श्री्ृष्णवे हस्तिनापुर चले जानेसे द्रारकारमे 
अग्रू ओर कृतवमौको अवस मिट गया } उन ल्ोगोनि 
य्‌ सौणौ तरणिः काः गद्यते ॥ २ ॥ | शतपनवासे भाक कान सत्रानितसे मणि 
नहो छीन क्ते १॥३॥ स्त्राजितने अपनी श्ेषठ 
। कन्या सत्यभामाका विवाह हमसे करनेक्रा वचन दिया 
। था ओर अव उसने हमनरेगोका तिरस्कार करके उसे 
श्रीकृग्णक्रे साथ व्याह दिया है| अव सत्राजित्‌ भी 
पने माई प्रसेनकी तरह क्यों न यमपुरीमें जाय १ ॥ 9 ॥ 
रातधन्वा पापी था ओर अव तो उसकी मव्य भी. 
एव॑ भिन्सतिस्तास्पां प्त्राितग्रषठत्तमेः । उसके सिरपर नाच रद्री थी । अत्र ओर छृतवरमकि 
इस प्रकार ध्वहकानेपर शतधन्वा उनकी वातेमं आ गया 
ओर उस महादु्टने ठोमवश सोये इए सत्राजित्को मार 
डाला | ५ ॥ इस समय -चियँ अनाथके सपान रोने- 
चिल्खने ठगी; परंतु रातधन्वाने उनकी ओर तनिक भीं 
ज्लीणां दिक्रो्चमाननां ऋन्दन्तीन।सनाथवत्‌ । यान न दिया; जैसे कसाई पञचरगेकी हत्या कर्‌ डाक्त 
ट | दै, वतसे दी वह सनराजित्को मारकर ओर मणि ठेकर 
दत्वा पश्‌ सानिकयन्धभि प्रदाय जग्िित्‌॥। &॥ | वहसे चपत हो गया ॥ ६ ॥ < 
सत्यभ उ पितरं हतं वीक्ष्य ज्यचारपिंत् ।  सव्यभामाजीको यह देखकर कि मेरे पिता 
डके गये . है, वड़ा दोक इआ ओर वे हाय पिता # ८. 
हाय पिताजी ! मै मारी गयी इस प्रकार पुकार 
पुकारकर वित्रप करने गीं } बीच-बीचमें वे बेहोर्‌ 
र हो जातीं ओर होशम अनेपर रि वित्प करने 
~ तेरुद्रेण्यां सृषं प्राञ्च जभाम शजषषहषम्‌ | लगती ॥ ७ | इसके वाद्‌ उन्होने अपने पिताके शवक 
तक्के कड्ष्टेम रवा दिया ओर्‌ आप्र हस्तिन 
गयीं । उन्होने वड दुःखसे मगतान्‌ श्रीकृष्णक्तो अष 


(2 


दुष्णाय्‌ विदिशथौष इद्ऽऽचर्परं पितुमेधम्‌॥८॥ | पिताकी वभ हत्याका कृतान्त सुनाया---य्यपि इन वातोक 
चः मगः ~ गा पहर्से हा जानतथ ॥] ८ ] परान्षित्‌ 


>~ . 


< | सवशक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर बट्रामजीने स 









अक्र 
योऽखथ्यं संप्रति्त्य चंन्यारत्नं विग्य नः । 


५ 
+ 


छष्णायाद्‌।च सत्राजित्‌ कसाद्‌ आातरमन्विसाट्‌)}४॥ 


रयानप्वधीषह्छोभात्‌ स पापः क्ीणसीरितः ॥ ५॥) 













ठषुङूपतावं तातेति हा हतासीति अद्यपी ॥ ७॥ 








= 






क क ~ जः # 
५" = 


न ~ 
ध 


| ॥ च श - % . =$ च्‌ | 
^ ध व "अ= 9 = ~~ ~--~---- छ +. १ चच 
क कभक " { इ + + ॥ चष र ८1ल-सा = © ध ह त 4 
तुः {५4५९६ ९५1 १९. भ १९०।५.८। ८: | 1 गन ।< ९५ री ५ म) ९<॥ 1 १।.<॥ 

















अ > "ह 


+ कि क ` 


;4 क“ दु २4 


"देक नि त ध ॐ क 
=) क २ ड ~ 
। +>. = = च 


च चके 
क 





















# 
ड च वि ह 
[व । क १ + कर्णि ^ = की > - कछ | १1 ~> ॐ न+ ट 
1. + 


भा यययतययरययाषच्यापया्योषयान्या्या्याग्न्याणया्यादाण्ायदागदाणकोयधयण्याणकाणकण्कान्यण्कनकोन्यन्कण्कनकन्दोन्कन्कच्काणकाकान्काकन्कानक्कान्यान्या्या्ये न्यायनय 
[भै 2 3 कक क 2 


आगत्य भगव!स्तसात्‌ एभार्यः साग्रजः पुरस्‌ । 


शतधन्वानमारेभे हन्तं हतं स्थि ठतः ॥१०॥ 


सोऽपि ङष्णोसंज्ञात्वा भीदः प्राणपरीष्छया। 
साहाय्ये छषरर्भाणमयत्वत स चाव्रवीत्‌ ।११॥ 
नाहभीश्चरयोः इयां हेरनं रामक्ृप्णयोः । 
को चु ध्ेमाय कर्प तयोषज्िनमः र्न्‌ \\ १२! 
कसः सहटाचुगोऽपीता यद्ढषस्याजितः शिया 
जरासथः शप्रदश्च संयुगः विरथो शतः ॥१३॥ 


श्रत्याख्यातः स चाच्रं पाष्णिग्राहशयाचत । 


। || / सोऽप्याह को विरुष्यैत विद्वानौशवःयो॑रष्‌ ॥१४। 


र य इद्‌ रीलय। दिशं सृजस्यधल्लि हन्वि च । 


चेष्टं विश्वदजो यख्य न ॒विहुर्गेिताजया ।*१५॥ 
यः सप्रह्ययनः शेरद्ुरणव्यङेन पणिना । 

लीलया बा उच्छिङीन्धरयित्राभकः ॥१६। 
भश्ठते छष्णायाद्ुतक 


 क्टसयायात्सने नम्‌, ॥ १७ 


स 4 
न 


एतधन्वाभः 





अहो नः परमं कषटमित्यसराश्नौ षिदेपतुः ॥ ९॥ 


| 1 1 1 
५५ ५६ + 
4 ह ~ क >. 
9 = ५ [ 





| भी उसे कोरा जवाव दे दिया) तव रातधन्वाने स्यमन्तक- 


| अ० ५७ 
ओंसू भर ल्य ओर विलाप करने च्छो किं अहो | हम 
लोगोपर तो यह वहत बड़ी विपत्ति आ पडी ! ॥ ९ ॥ 
इसके वाद भगवान्‌ श्रीकृष्ण सत्यमामाजी ओर वत्राम- 
जीके साथ हस्तिनापुरसे द्वारका टोट आये ओर इत- 
धन्वाको मारने तथा उससे मणि छीननेका उद्योग करने 
गे ॥ १०॥ 











जव रातधन्वाको यह माट्म हुआ किं भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण मुञ्चे मारनेका उदोग कर रहे हैँ, तत्र वह वहत 
डर गया ओर अपने प्राण वचानेके व्ि उसने कृतत्र्मासि 
सहायता मागी । तव कृतवमांने कहा--। ११ ॥ 
८मगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वलटरामजी सर्वदाक्तिमान्‌ ईश्वर 


| ह । नँ उनका सामना नहीं कर्‌ सकता । मल, रेसा 


कौन दहै, जो उनके साथ त्रै वधक इस्र लोकं 
ओर परखरेकमे सकुराक रह स्के १॥ १२॥ तुम 


| जानते हो करि कस उन्हीसे द्वेष करनेकरे कारण राञ्य- 


लक्मीको. खो बेडा ओर अपने अनुयापियोके साथ मारा 
गया | जरासंभ-जेसे शरारवीरको भी उनके सामने सत्रह वार 
मैदानमे हारकर त्रिना रथके ही अपनी राजधानीमे लौट जाना 
पड़ा थाः ॥ १२ ॥ जवर कृतवमाने उसे इस प्रकार टका- 
सा जवाब दे दिया, तव इतघन्वाने सदायताके च्ि . 
अत्ररजीसे प्राथना की । उन्होने कहा-- भाई ! ेसा कौन 
है, ओ सव॑राक्तिमान्‌ भगवानक्ता वट-पोरपम जान- 
कर भी उनसे वैर-विरोध ठाने । जो भगत्रान्‌ खेक-खेवमे 
ही इस विश्चकी रचना, रक्चा ओर संहार करते हें तथा 
जो कवर क्या करना चाहते है--इस वातको मायासे 
मोहित ब्रह्मा आदि विश्व-विधाता भी नहीं समञ्च पाते; 
जिन्होंने सात वर्षकी अवस्थामे--जवर वे निरे वाल्क 
थे, एक हाथसे ही गिरिराज गोवधंनको उखाड़ च्या 
ओर जसे नन्श-नन्के बच्चे बरसाती छत्तेको उखाङ्कर 
हाथमे रख छेते है, वैसे दी खेर-खेकमे सात दिनोतक 
उसे उठये रखा; मे तो उन भगवान्‌ श्रीङृष्णको 
नमस्कार करता दँ | उनके क्म अदधत ह । वे अनन्त, 
अनादि, एकरस ओर आत्मखरूप ह । उन्हें नमस्कार 
करता द ॥ १४--१७ ॥ जत्र इस प्रकार अक्रूरजीने 












दशम्‌ स्कन्ध 





र 
# 
नद 


9, 
द च = ॐ $= ऋ 
च । 9 4 + 
८७. 
=्--~ ` ` --------------ज्व्य्व्य्य्य्व्व्य्य्य्चच्व्व्य व्यच ज्च्वव्---------- 
॥ 





ह । 
पणि उन्दकरं पास रख दी ओर आप चार सौ शः 
ख्गातार्‌ -चटनेवले धोडपर सवार्‌ होकर वहसि बडी ` 
फु्तीसे मागा ॥ १८ ॥ | 


परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वट्राम दोनो भाई 
अपने उस रथपर सव्रार इए, जिसपर गरुडचिहसे 
चिहित ध्वजा फहरा रदी थी ओर बड वेगवा घोडे 
उते इए ये । अव्र उन्होने अपने चद्युर स॒त्राजित्को 
मारना शातघन्वका पीडा किया}! १९ ॥ विधिव्- 
पुरीके निकट एक उपवनमें रलधन्वाका घोडा गिर पड़ा, 





तस्मिन्‌ व्याशधमासद्य शतयोजनमं ययौ ॥ १८} 














गरुडध्वजमारुड्य रथं रामजनार्दनौ । 
अन्वयातां महःवेगरखं रजन्‌ युरुदढुहस्‌ ॥१९॥ 
भिधिलायाद्पवने विश्ुज्य पठितं हय्‌ | 


पद्धयापम्रधावत्‌ सत्रश्तः कष्माऽप्यन्वयद्रचदू इषा ।२०। 





: क अव्र वह उसे होड्कर वैदठ ही भागा । वह अत्यन्त 
पदातेभंगवांस्वछ्च पदातिस्तिगपनेमभिना । मयभीत हो गया था । मगवान्‌ श्रकनण भी क्रोध कके ` 
= ॥ 
~ उसके पीछे दौड़े दरातधन्वा पैदल दी भाग 
चक्रेण शिर इत्छत्य वाससोग्यचिनोन्मणिमू ।(२१॥ | सन्न ५७ ८।४ ॥ २० ॥ रतभन्वा चद हयी भाग 
रहा था, ईइसयं भगवान्‌ने भी पदक दही दौडकर 
अरुब्धमजिरागस्य छ्रष्ण आह ग्रजान्ति मू । अपने तीर्ण धासाले चक्रसे उसका पिर उतार च्वि हु 
३ 4 ओर उसके वरखोमिं स्यमन्तकमणिको द्रा ॥२१॥ 
वथा [र] ६ दतधञ्चुमम्स्त्त्र ण्‌ विदधते । । र्‌ ९ | प्रतु ज्रं मि पिी "नह [ तत्र भगवान्‌ श्री र ष्ण प 
न > । वड भाई वल्यमजीकं पास आकर कदह्ा-इमने रत- _ ` 
आह्‌ बर ~] ९] भ्रः अत्थ्न्वना = ~ = ६ 
411 धन्वाको व्यथं ही माश । क्योकि उसके पास स्यमन्तक- 
मणितो है दी नही" ॥ २२ ॥ बल्रमजीने कदा-- ` 


कस्मिंश्चिद्‌ युषे न्यस्तष्ठयन्वेषं पुरं व्रज ॥२३॥ 






समे सदेह नहीं किं इातधन्वाने स्यमन्तकमणिक्रो 
किंसी-न-किंसीके पास रख दिया है । अव्र तुम द्वारका 
जाओ ओर उसका पता क्गाओ ॥ २३ ॥ नैं विदेह- ` 
राजसे भिल्ना चाहता द्भ क्योकि वे मेरे बहत ही प्रिय 
मित्र है । परीक्षित्‌ ! यह कहकर यदुवंराशिरोमणि ` 
वल्रामजी मिथिला नगरीमे चे गये ॥ २४ ॥ जवर ` 
मिधिलानरेरने देखा कि प्रूजनीय बखरापरजी महाराज ` 
पधारे हैँ तत्र उनका हदय आनन्दसे भर गया । उन्होने 
्टपट अपने आसनसे उठकर अनेक सामभ्रियोसे 
पूना की ॥ २५ ॥ ईसके नाद भगवान्‌ बलरामजी कर ' 
वर्षातक मिथिकापुरीमं ही रहै 1 महात्मा जनके बड़ 
प्रेम ओर सम्मानसे उन्दं खला । इसके बाद ` 
धृतराष्टके पुत्र दर्योधनने बल्रामजीसे गद्‌ शिक्षा 
म्रहण की ॥ २६ ॥ अपनी श्रिया त्यः य काय 
करके मगवान्‌ श्रीङृष्ण द्वारका कौट अये ओर उनको 
समध्वार इना, कि शतधन्वा 

अप्राप्नि च मणेः प्राह प्रियायाः श्रियद्‌ विशु २७)| स्यम; उर 


वरर्हण्यं न 






५ न 
अहं £देहमिच्छामि 2४ अपरम मध) 
# => । 






इत्युट 1 थिखां रजय विवेश यदुनन्दनः 11२४ 






तं दृष्ट सहसोत्थाय मथः भ्रीतमानक्षः । 





अहयामा्ठ भिधिवद्दणीयं सपणः ॥३५॥ 






उधास तखा कतिचिन्मयिखायां समा विुः। 





मानितः प्रीतियुक्तेन जनकेन महामना । 









4 ॥ ^. । 1 # 









 ततोऽंशधद्‌ अदां ठे धतराप्रः खयोधनः। २६ 
< केशो दारकामेत्य निधनं चवधन्नः । 











ट. रदनः 


१, ने। र व६ह -4 ठे ५१द्ण. [~ - 


+ ` 


च (क 
"व ‡ अद्‌ - ~ 
' ऋ, 
= = 






| ॐ० ९५५ 


शीमद्धगद् 


















त न 
ति कत तिः भः ॥ मि कः पिः 


इसके वाद उन्होने माई्‌जन्धुअकिे साथ अपने छ्य 
सत्राजित्‌की वे सव ओध्वदेहिक त्रिया करायी, जिनसे 
मृतक प्रागीका परोक सुधरता ई ॥ २८ ॥ 
















५ ततः छ क्ारथामास क्रिया न्धोदैरख यै । 
= | 
साक्ष सुहृद्धिभैगवार्‌ श याः स्थुः.सास्परयिकाः। | 


अक्रूर ओर कृतवर्माने खातधन्वाको सत्राजिते वधके 
च्यि उत्तेजित किया था | हृसन्यि जव उने सुना 
कि भगवान्‌ श्रीक्ृष्णने दातधन्वाको मार डाव ह, तत 
वे अत्यन्त भयमीत होकर द्वारकासे भाग खड इर २९ ॥ 
परीक्षित्‌ । कु व्येग एेसा मानते हँ किं अक्रूरके दारका- 
से चे जानेपर्‌ द्वारकावाधिर्योको बहत प्रकारके अनिष्ट 
ओर अरिथेका सामना करन। पड़ा | दैविक जर भौतिक 
निभि्तोसे गार्‌-बार वहके नागरिकको दारीस्कि ओर 
मानसिक कष्ट सहन। पड़ा । परंतु जो लोग रसा कहते 
है वे पहले कही इई वार्तोको भूल जति हैँ । सत्या; 
यह भी कभी सम्भव ह किं जिन भगवान्‌ श्रीक्रष्णमें द्मस्त 
ऋषरि-युनि निवास करते हैँ, उनके निवासखान द्र च्ि- 
म उनके रहते कोद उपद्रव खडा हो जाय | ३०-३१॥ 
उस सपय नरके बड़-बृदे व्वेगोने कदा-- “एक वार 
काडीनरेरके राश्यमे वर्षा नहीं हो रदी थी, सुद्धा पड़ 
गया था । तत्र उन्होने अपने राज्यं आये हए अक्रूरे 
पिता खपफल्कको अपनी पुत्री गान्दिनी व्याह दी | तत्र 
उस प्रदेदामं वधा इदं । अगरु मी दपल्कके ही पुत्र 
हैँ ओर इनका प्रभाव भी वेसा ही है । इसन्यि जहौ 
जाँ अक्रूर रहते है, वहा -वहों लुत वर्ज ह्येती टै तथा 
किसी प्रकारका कष्ट आर महामारी आरि उपद्रवं नहीं 
होते । परीक्षित्‌ | उन लोगोकी बात सुनकर भगवान्‌- 
ने सोचा कि ईस उपद्रवका यदी कारण नहीं हैः यह्‌ 
जानक भी भगवानले दूत भेजकर अक्रूरजीको इढवाया 
ओर आनेपर उनसे बातचीत की ॥३२--२४॥ भगवान्‌ने 
उनका खृब्र स्वागत-सत्कार किया ओर मीटी-मीदी प्रेमकी 
बातें कहकर उनसे सम्भाषण किया । परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
सवके चित्तका एक-एक सङ्कल्प देखते रहते है । इस- 
व्यिं उन्होने मुसकरति इए अ्रूरसे कहा--॥ ३५ ॥ 
(चाचाजी | आप दान-घमंके पाठ्क हैँ 
। यह बात पहल्से दी मद्धम है कि रातधन्वा 


अक्र छतदसा चं शुलषा शतधनोदधय्‌ 
ज्परर्ठुभ्‌ पवि्रह्तै दासय; भयाजक्ज 1९; 


अनु परोषितैऽरिशान्यासस्‌ वै दवारम ॐ६।६्‌ । 


= र (कि ध ४२ +~ 
न न ~ 
[२०८ त व र 


नौ ॥ = 9, 4 रि 
4 
न्ब + #॥-^ 1 ¬, द र त 










न्व 


सरीरा मानक्षास्ताय शुडर्देदिकभोरिषाः | २०}; 


१ "म 0 
कति च न्प * 


क )} 
8 भे १ 
कै #३१ च ॥) ॥ि 


इस्यज्गोरदिशन्त्येके विस्खत्य प्रागुः!६ 


छनिदासनिदसिं $ धटेतारिद नद २३१। 
देवेऽवव॑ति दादीश्चः श्वफश्छःयागताय वे । 
खुं बन्दिनीं प्रादात्‌ तसोऽधपेद्‌ ख काशिय्‌।३२। 
"4 वतव दत यत्रे यत्र हं। 


दे्ोऽभिवषते तत्र नोपताणा न सारिः ॥२३॥ 


इति ब्द्धवचः शरुत्वा नंता्दिह करणम्‌ । 


7 ~ [१ 
त ै: 


क ला + 


इरि वि त्वा वभानाय्य प्राहाकरूरं जनादन्‌ः ॥२४॥ 










पूजयित्वाभिभाष्यनं कथयित्वा प्रिषाः कथाः। 


9-3 4 १ क ^ ५ 


विज्ञाताखिर वितङ्ञः खयमान ।उवाच ह ॥३५॥ 
` न 


ऋ ` 


दषते न्यस्वस्त्व यथ दर्ठवन्वना | 


-~ --~--~> 





~~ --- 
^ - च + †  -ॐ"  ( [५ १ 

9 त = च ॥) ॐ ८4 

| > &९ । । ^ 4 


नु ~ 


कर = 


॥4॥.001॥ 14 4 .॥, 51 4 14॥1/. || | || | 


अ० ५७ | 








स्यमन्तको मणिः श्रीमान्‌ विदितः पवंमेव न।।३६॥ | आपके पास वह स्यमन्तकमणि छोड गया है, जो बडी 
ही प्रकादामान ओर धन देनेवारी है॥ ३६॥ अप 


सत्राजितोऽनपत्यत्वाद्‌ गृह्ठीयुदुंहितः सताः। 

दायं निनीयापः षिण्डान्‌ विषुच्यणं च शेषितय्‌।(३७) 
तथापि दुधेरस्त्वन्येस्त्वय्यास्तां सुव्रते मणिः 

कितु मामग्रजः सम्यङ्‌ न प्रत्येति मणि पति ॥ ३८१, 
दशय महाभाग बन्धूनां शान्िमबह । 
अन्युच्छिन्ना मखास्तेऽ् वरन्ते रबमधेद यः ३९; 
एवं सामभिशलन्धः शधण्स्कतनयो मणिस्‌। 
आदाय वा्ठसाच्छन्नं ददौ घयंसमप्रभम्‌ ७०) 
स्यमन्तकं दशथित्वा ज्ञातिभ्यो रज आत्मनः] 
विशरज्य मणिना भूयस्तस्मे प्रस्यपंयत्‌ प्रथः ॥४१।। 


यस्त्वेतद्‌ भगवत इश्वरस्य विष्णो- 
वींयाद्यं इजिनहरं समङ्गरं च। 


आख्यानं पठति श्रणोर्यनुखरेद्‌ वा 


दुष्कीति दुरितमपोद्य याति शान्तिम्‌ ।४२॥ | अनुभव करता है ॥ ४२ ॥ 


य 


इति श्रीमद्वागवते महपुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तर्घे 
स्यमन्तकोपाख्याने सप्तपञ्चाशत्तमोऽव्यायः ॥ ८७ ॥ 


२१. न्धे षत। 


भ।० स> खः २.६२ 





दुञ्चम्‌ स्कन्व्‌ 





। गण र = ऋ = अः भिक 


जनतेदी दहै करि सत्राजित्क्रे को$ पुत्र न्हीहै।. 
इसलिये उनकी छ्डकीके खडकरे--उनकरे नाती ही उन 
तिज्ञनि ओर पिण्डदान करेगे, उनका ऋण चुका्यगे 
ओर जो कुछ वच रष्ेगा, उसके उत्तराधिकारी होगे ॥२७॥ 
इस प्रकार शाखीय दष्टिसे ययपि स्यमन्तकमणि हमारे 
पुत्रको ही पिलनी चाहिये, तथापि व्ह मणि अपके 
ही पाठ रहे । क्योकि आप वडे त्रतनि्र ओर पवित्रात्मा 
हें तथा दूसरोके व्यि उस मणिक्रो रबना अच्यन्त कठिन भी 
है | परतु हपारे सामने एक वहत वडी कलठिनाईं यह 
आगयी है कि हमारे बडे भाई वल्रापजी मणिके 
सम्बन्धमें मेरी वातका प्रा व्रश्चा नहीं करते ॥ ३८ ॥ 
इसव्िये महामाग्यव्रान्‌ अक्रूरजी ! अप वह मणि दिखा- 
कर॒ हमारे इ्ट-मित्र--वलटरामजी, सत्यभामा ओर 
जाम्बवतीका संह दूर कर दीजिये ओर उनके हृदयम 
सान्तिका संचार कीज } हमे पता है किं उसी 
मणिके प्रतापसे आजकठ आप कणतार ही एेसे यज्ञ 
करते रहते, जिनमे सोनेकी वेद्यो बनती है ॥ ३९ ॥ 
परीक्षित्‌ ! जव्र भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस प्रकार सान्त्वना 
देकर उन्हे समज्नाया-जु्ञाया, तत्र अक्ररजीने वचखमें क्पेदी 
दुई सूर्यके समान प्रकाडामान वह मणि निका 
ओर भगवान्‌ श्रीकृष्णक्रो ॥1- ४० ॥ मावान्‌ 
श्रीकृष्णने वह स्यमन्तकपणि -अपने जाति-माड्योको 
दिखाकर अना कञ्छ्कु दूर किया ओर उसे अपने ` 
पास रखनेम समर्थं होनेपर भी पुनः अक्रूस्जीको लेया 
दिया ॥ ४१॥ 

सवेशक्तिणान्‌ सत्रेपापएक भगवान्‌ श्रीकृष्णके परा- ` 
करभोँसे परिपूर्णं यह आख्यान समस्त पापो, अपराधो ओरं 
कलङ्कोँका माजन करनेवाला तथा परम मङ्गल्मय है 1. 
जो इसे णढता, सुनता अथवा स्मरण करता है, वह सब 
प्रकारकी अपकोतिं ओर पपोसे छ्टकर 














© मद्धाग 
०९ शीमद्धागवत [ अ० ५८ 
अथाष्टपञचारात्तमोऽध्यायः 
भगवान्‌ श्रीकृष्णके अन्यान्य विवाहो की कथा 
श्रीदयुंक उवाच भ्रीद्युकदेवजी कहते दै परीक्षित्‌ ! अत्र पाण्डवो 
एकदा षाण्डबाच्‌ द्रष्ट प्रतीतान्‌ युरुपोत्तमः | का पता चर गया \॥ कि ते दाश्षाभवनमे जले नही हैँ | 
६ एक्‌ वार भगवान्‌ श्रीकृष्ण उनसे मिच्येकरे लिये इन्द्रप्रस्थ 
६ इन्द्रभ्र्थं गतः भीमान्‌ युणुधानादिभितव्रेतः।॥ १॥ | पारे । उनके साथ सात्यकि आदि बहृत-से यद्धरी भी 
अ ः थे ॥ १ ॥ जव वीर पाण्डश्रोने देखा कि सूर्रश्रर सगवान्‌ 
| | | दृष्टा तमागतं पाथ युङ्न्दमखिङेश्वरम्‌ । श्रीकृष्ण पारे है तो जसे प्राणका संचार होनेपर सभी 
8 ९ ९ इन्द्रियां सचेत हो जाती है वैसे ही वे सव-के-सतर एक साय 
# उत्त्थुयुमपद्‌ वीराः प्राणः सुख्यमिवागतम्‌।। २ ॥ | = त त (9 अ 
| | । उट खड इए ॥ २ ॥ वीर पाण्डीने भगवान्‌ श्रीढ्ष्णका 
क क, आलिङ्गन किया, उनके अद्भ-सद्गसे इनके सारे 
^ परिष्वज्याच्छुतं वीरा अङ्खङ्गहतेनसः | त 
अः घु गये | भगव्रान्‌की प्रेमभरी पुसकराहट्ये सुशोभित 


शः -* 
व (1 


मुख प्ुषमा देखकर वे आनन्दमें ममन हो गये ॥ २ ॥ 
मगवान्‌ श्रकृष्णने युधिष्ठिर ओर भीमसेनके चर्णैमं 


युधिष्टिर भीमख एृत्थः पादाभिवन्दनम्‌ । प्रणाम किया ओर अर्जुनको हटयसे ठगाया । नकुल ओर 


फाल्गुनं ¶रिरभ्याथ यमाभ्यां चाभिंन्दितः ॥ ७ ॥ | भगवान्‌ श्ीष्ण श्र सिंहासनपर वरिाजमान दौ गये, तव 
। परमसुन्दरी द्यामवर्णां द्रौपदी, जो नव्रक्रिाहिता होनेके 
परमासनं आसीनं दष्णा दृष्णसनिन्दिता। कारण तनिक छ्जा री शी, धीरे-धीरे भगवान्‌ श्री- 
कृष्णके पास आयी ओर उन्द प्रणाम किया॥ ५५॥ 
नवोढा व्रीडिता फिंचिच्छनेरेत्याभ्यवन्दत । ५ ।। | पाण्डर्ोने भगवः न्‌ श्रीकृष्णके सपान दही बीर सात्यकिका 
8 भी खागत-सत्कार ओर अभिनन्दन-वन्दन किया । वे 
[~ पथम सात्यकिः पाथः पजितवाभिवन्ितः। एक्र आसनपट वैठ गये । दूसरे यदुवंशिर्योका भी यथा- 
1 : = योग्य सत्कार किया गया तथा वे भी श्रीकृष्णके चार्य 
<== निषादाकयेऽन्ये च प्रजितः पयपास ॥ & ॥ | ओर आसनोँपर वरैठ गये ॥ ६ ॥ इसके बाद भगत्रान्‌ 
: ` "` चः श्रीकृष्ण अपनी प्रभा कुन्तीके पास गये ओर उनके 
9 शथां समागत्य कृताभिवादन- चरणोमं प्रणाम किया । कुन्तीजीने अत्यन्त स्नेहवङा 
=> सतयातिहादरहश्या भिर उन्हं अपने दयसे चमा च्या । उस समय उनके नेत्रोमे 
द्शाभिरम्मितः । प्रेमके ओप छच्क आये । कुन्ती जीने श्रीकृष्णसे अपने 
मा्तन्धुओंकी कुराल-क्षेम प्री ओर भगवान्‌ने भी 
उनका यथोचित उत्तर देकर उनसे उनकी पुत्रवधू 
द्रोपदी ओर लयं उनका कुराल-मङ्गख प्रा ॥ ७ 1 उस 
< व समय प्रेमकी विह्ृटतासे कुन्तीजीका गदा रुध गया था, 
तमाह  ग्रेमवेक्कव्यरंद्रकण्टाश्रुशेचना ेत्रोसे ओस्‌ वह रदे ये । भगवान्‌ पूनेप्र उन 
--- ` ६. बाद्यायगिश्वाच 1 २. वादितः । ३. नासी । ४. नन्दितः । ५. ने रम्ये | £. वीक्षितः । ७. बद्ध | 


[3 


ण्यी र, ५.४४ प्क 


सायुरागसिवं वक्त्रं वीक्ष्य तख अदं यश्ुः।। ३॥ 


+ भ" । क. ^ ; = जका तिः 


[> शकः क = १ 
नजर? है" = = व 






।  आणरटवांस्तां ईशरं सहस्लुपां 


पिव्रष्वसारं परिप्ष्टवान्धवः ॥ ७॥ 


च 


नि 
कै 
: 
। न्य, ~ 4 ~ । । < 
4 ज ग नै र र # क [ 
य भव ^ क ~ १ । ८ १ १ 
के न र ध च ~ * अ 9 स 9 + ज 
र, न्न, +> - ~= कः 49: 1, # 
र [त = ध्र प & 
ऋ मी 


^ +, 232, न १,१ ऋ 


6.3.18 914 


2. त ` तत्राविष्यच्छरेग्ाघा्‌ घकरान्‌ महिषान्‌ रुरून्‌ ` 





ज्प्र ए = २ 
{ 3 ए क ए | व्योः 


क, क । ४८ 
` ्ररभान्‌ गवयान्‌ खङ्गार्‌ 


अं० ५८ | 


क तोः क ज = कोक = = 7 चज 


कतकः च 
दः अक योन भ कक 





सरन्ती तान्‌ वहन्‌ क्छेशान्‌ ठेशपा।यात्मदद्यनभ्‌।<। 


ष्ट, $ 
तदव ईशरं ऽभूत सनाथास्ते कृता वयम्‌ । 


ज्ञातीन्‌ नः खरता दष्ण भ्राता मे त्रेपितस्त्वया ॥९॥ 
न तेऽस्ति खपरश्रान्तिविश्वख सुहृदात्मनः । 
तथापि सरतां लश्वत्‌ क्लेश्चान्‌ हंषि हदि सितः) १०) 


युधिष्टिर उवाच 


किंन आचरितं श्रेयो न बेदाहमधीश्वर । 
योगेश्वरःणां दुर्दर्शो यनो इष्टः ङुमेधसाम्‌ ।११। 
इति वे वार्पिश्ान्‌ माघ्ार्‌ राज्ञा सोऽभ्यथितः सुखम्‌ ¦ 
जनयन्‌ नयनानन्दभिन्द्रभसोकसां विशु; ॥१२॥ 
एकदा रथमारुद्य विजयो वानरध्वजम्‌ । 
गाण्डीवं धनुरादाय तूणौ चाक्षयक्षायकौ ॥१२॥ 


साकं कृष्णेन संनद्धो शिहतुं विपिनं वनम्‌ । 


 बहन्यालष्रगाकीणं प्राविशत्‌ परवीरहा ।॥१४॥ 


द 


39 


अ ति क न, 


। ^ 
[न न र "+ १ 


4 ज 
कैर 


दशम न्ध 


= जा जाः नः जक "नि मो १ 









रिणाज्छशर छकान्‌ ५५। | आदि पञ्चजपर्‌ अपने त 4 ¦ 







। क ~ ५९१. 
5 , 

अपने पहटेकरे क्टदा-पर-क्ट्छ याद्‌ अनि च्मेओरवे 
अपनेको बहत सम्हाख्फर, जिनका ददान समस्त क्छर्योका 
अन्त केके चयि ही हआ करता दहै, उन मगान्‌ 
श्रीकरष्णसे कहने वच्गी--]) ८ ॥ श्रीकृष्ण । 
जिस समय तुमने हमलोगोको अपना वुदुम्बी, 
सम्बन्धी समङ्षकर स्मरण विया ओ हमारा कुदाल-मङ्गल ` 
जाननेकरे व्यि भाई अक्रूरो भेजा, उसी समय हमारा 
कल्याण हो गया, हम अनाथो तुमने नाथ कर्‌ 
दिया ॥ ९ ॥ में जानती द्रः कि लुम सम्पूणं जगतके 
प्रम हितैषी सुद्‌ ओर आत्मा हौ । यह अपना है ओर 
य पराथा, इस प्रकारकी शान्ति तुम्हारे अंदर नीं 
है । एेसा होनेपर भी, श्रीकृष्ण ! जो सदा तुष्ं सरण ` 
करते है, उनकरे हदये आकर तुम वैठ जतेद्ो ओर 
उनकी क्ठेरा-परम्पराको सदाके व्ि मिटा देतेहोः ॥१०॥ _ 





युधिष्ठिरजीने कदा--सरशवर श्रीकृष्ण | हमें इस 
बातका पता नहीं है किं हमने अपने पूवजन्सोमे या इस्‌ 
जन्मे फोन-सा कल्याण-साधन किया है १ अपका दद्यन 
वडे-बड़ योगेश्वर भी वडी कठिनितासे प्राप्त कर पाते है 
ओर हम वुधुद्धियोंको धर बैठे ह्वी आपके ददन हो रहे 
॥ ११॥ राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार भगवानका 
लू सम्मान किया ओर कुछ दिन वहीं रहनेकी प्राना 
की | इसपर भगवान्‌ श्रीकृष्ण इइन्दरप्श्यके नर-नास्यिंकों 
अपनी खूपमाधुरीसे नयनानन्दका दान करते इए वरसात- ` 
के चार महीनोतक सुखप्रलक वह रहै ॥ १२ ॥ | 


& क ^ व, # 2. त 













॥ | 
च्छ 


परीक्षित्‌ ! एकवार वीररिरोमणि अज्ुनने गाण्डीव ` 
धनुष ओर अक्षय वाणवाठे दो तरक व्यि तथा मगवान्‌ 
श्रीकृष्णक्रे साथ कवच पहनकर अपने उस रथपर सवार्‌ . 
इए, नि प्तप बवानर-चिहसे. चिहिंत ध्वजा ल्गी इई थी ।. 
इसके वाद 1वपद्षी वीरोका नारा करनेवाठे अङ्खुन उस 
गहन वनम शिकार खेखने गये, जो बहुत-से बाघ 
आदि भयकर जानवरोसे भरा इआ था ॥ १३-१४ ॥ 
वहाँ उन्होने बहुत-से बाघ, सूअर, भसे, काले हिन, 


| शरभ, गवय ८ नीत्णपन व्यि इए ` भूरे रगका एकं बड़ा 


हिरन ), गेडे, हरिन, खरगोरा ओर राल्ख्क ( सादी ) 


ख्गाया ॥१५५॥ 


बक 


नि ज 


4 ~ ~ + ॐ 
५१ ऋ ^ -5- 


,। 
१. 
# 


चीरः कन्थ [पि ^ । 


न्क - 2 7 


# 
नि्क्व [य 1, मकम 
9 ॥ इ # हि =# * कर्निदके किकः क ^ ` क ि 
क # » ककव क क 


+ ज क्क जङ्ग 


8 ऋक 


पवििककित् † = 


५५५. जकन केकि कं । ~ 2 # ~ ~> ^= , ¶ 9५०५ ५ क ० 


ह * @ क जः (न कि, । 


(च ऋ च कक ॥ 
करनकि ०० 
॥ 1 ने =» क्क ककन 


॥ ^ कालिन्दीति समाख्याता वसामि यशुनाजले । 





( निमिते भवने पित्रा याबदच्युतदर्शनम्‌ ॥२२॥ 


तथावदद्‌ गुडाकेशो वासुदेवाय सोऽपि तापू । 








भ च ज 


[ अ० ५८ 


[1 
व 1 
व र 
योनो "का का छ [1 7 0, 0, व 


उन्मेस जो यन्ञके योग्य ये, उन्हें सेवकगण पर्वका समय 
जानकर राजा युधिष्ठिरके पास ठे गये । अञ्न शिकार 
खेलते-खेल्ते थक गये थे। अव वे प्यास क्गनेपर 
यमुनाजीके किनारे गये | १६ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर 
अजुन दोनों. महारथि्ोने यमुनाजीमें हाध-पैर धोकर 
उनका निर्मल जल पीया ओर देखा कि एक परमसुन्दरी 
कन्या वहां तपस्या कर रही है ॥ १७ ॥ उस श्रेष्ठ 
सुन्दशीकी जंघा, दात ओर मुख अत्यन्त सुन्दर थे । 
अपने प्रिय क्त्रि श्रीक्ृष्णकरे मेजनेपर अघुनने उसके 
पास जाकर प्रछा-) १८ ॥ न्दर ! त॒म कोन हो 
किसकी पुत्री हो १ कर्ौसे आयी हो १ ओर क्या करना 
चाहती हो १ सें रेसा समश्चता रहर कि तुम अपने योग्य 
पति चाह रदी हो । हे कल्याणि । तुन अपनी सारी 
वात बतलओं ॥ १९ ॥ 


०५९२ श्रीमङ्कागवत 

















 " भम ` जाक = 99 = ¬ क = 
जिः ग ` णोः जो । च णः 9 किः च = ज = न 


तान्‌ निन्युः ककरा राज्ञे येध्यान्‌ पव॑ण्युपागते | 














तटूपरीतः परिश्रान्तो बीभल्सुयंुनाममात्‌ ॥१ ॥ 
तत्रोपस्प्रश्य विशदं पीत्वा वारि सहारथो | 
कृष्णो दद शतः कन्यां चरन्तीं चारुदर्शनाम्‌ \ १७}; 
तामासाध वरारोहां खद्विजां रुचिराननाम्‌ । 
पप्रच्छ प्रेषितः सख्या फार्गुनः अरमदोत्मास्‌। १८॥ 
का वं कस्यासि सुश्रोणि इतोऽपि कि चिकीर्षसि । 
मन्ये त्वां पतिभिच्छन्तीं सवरं कथय शोभने ॥१९॥ 
कालिन्दीने कदा--मँ भगवान्‌ सुयदेघकी पुत्री 
हर । मे सवश्रेषठ वरदानी भगवान्‌ विष्णुको पतिक खपे 
प्राप्त करना चाहती द्र ओर इसी यह कठोर तपस्या 
कर रदी द्र ॥ २०॥ वीर अन | मै टक््मीके पम 
आश्रय मगवानको छोडकर ओर किंपीको अपना पति 
नहीं वना सकती । अनाथोके एकमात्र सहारे, प्रेम 
वितरण करनेवाे भगवान्‌ श्रीकृष्ण सुज्ञपर प्रसन 
हों ॥२१॥ मेरा नाप है कालिन्दी । यसुनाजल्में मेरे पिता 
सूयने मेरे ल्य एक मरन भी वनवा दिया है । उसीमें 
म रहती द्र | जवतक मवान्‌क्रा दशन न होगा, मेँ 
यहीं र द्रंगीः ॥ २२॥ अनने जाकर भगवान्‌ श्रीकृष्णसे 
सारी बातें कही | वे तो पहटेसे दही यह सव कुछ 
जानते थे, अव उन्होने कालिन्दीको अपने रथपर बैठा 
व्या जर धर्मराज युधिष्िरके पास ठे आये ॥ २३॥ 


काटिन्दुवाच 


अहं देवस्य सितुदुंहिता पतिमिच्छती । 
शिष्णुं वरेण्यं वरदः तपः प्रममाख्िता ।(२०॥। 
नान्यं पतिं इणे वीरं तमृते श्रीनिकेतनम्‌ । 


तष्यतां मे स भगवान्‌ युङन्दोऽनाथक् श्रयः ॥२१॥ 


रथभरोप्य तद्‌ विद्धान्‌ ध्भेराजपुशगमत्‌ ।२३॥ 
== भ ~> इसके वाद्‌ पाण्डर्वोकी प्राथनासे भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
यदेव ङष्णः संदिष्टः पाथौनां परमाद्धतम्‌ । . य वायन छत जर विति 


कार्यामाप्त नगरं विचित्रं विखकरमणा .॥२४॥ | नगर विखकभकि द्वारा बनवा दिया ॥ २४ ॥ भगवान्‌ 
इस बार पाण्डरवोको आनन्द देने ओर उनका हित करनेके 


भगवांस्तत्र निवक्षन्‌ खानां प्रियचिकीकया । छथ बो बहुत दिनोतक दे । हसी बीच अगिरेवको 


अद्ये खण्डवं दातुमर्नश्यास सारथिः ॥२५॥ | ाण्डव-बन दिखनेके चल्ि वे अ्ुनके सारथी भी 


१, तो वा ङग । २. रमते पुरुषमीश्वरम्‌ । ३. यथेव । 
































वहत प्रसन इए । उन्होने अुनको गाण्डीव 
धनुष, चार स्वेत घोडे, एक रथ, दो अद्रूट वार्णोवाले 
तरकस ओर एक रेसा कवच दिया, जिसे कोई अक्- 
राखरधारी मेद न सके ॥ २६ ॥ खाण्डव-दाहके समय 
अज्नने मय दानवको जल्नेसे वचा लिया था । इसय्यि 
उसने अजुनसे मित्रता करके उनके च्ि एक परम 
अदूयुत समा बना दी । उसी समामे दुर्योधनको जवम 
स्थ ओर स्थम जकका श्रम हो गया था ॥ २७॥ 

कुछ दिनके वाद भगवान्‌ श्रीकृष्ण अजुनकी अनुमतिं 
एवं अन्य सम्बन्धिरयोका अनुमोदन प्राप्त करके सात्यकि 
आदिके साथ द्वारका खोट अये ॥ २८ ॥ वदँ आकर 
उन्होने विवाहके योग्य ऋतु ओर अ्यौतिषराखके अनुसार 
प्ररासित पवित्र चनम काठिन्दीजीका पाणिग्रहण किया । 
इससे उनके स्वजन-सम्बन्धियोको परम मङ्ख ओर 
परमानन्दकी प्राति इई ॥ २९ ॥ 

अवन्ती ( उज्जैन ) देशके राजा थे विन्द ओर 
अनुविन्द । वे दुर्योधनके वदावतीं तया अनुयायी थे । 
उनकी बहिन मित्रविन्दाने स्वयवरमे भगवान्‌ श्रीकृष्णको 
ही अपना पति वनाना चाह। । परतु विन्द ओर अनुविन्दने 
अपनी वहिनको रोक दिया ॥२ ०] परीक्षित्‌ । मित्रविन्दा 
श्रीकृष्णकी परू राजाधिदेवीकी कन्या थी । मगवान्‌ 
श्रीकृष्ण राजाओंकी भरी समामे उसे बल्मपू्ंक हर ठे 
गये, सवर रोग अपना-सा मह स्मि देखते ही रह 
गये ॥ ३१ ॥ ध 

परीक्षित्‌ | कोसव्देशके राजा थे नगनजित्‌ । वे 
अत्यन्त धामिक ये । उनकी प्रमघुन्दरी कन्याका नाम 
था सत्या; नग्नजितकी पुत्री होनेसे वह नाग्नजिती 
भी कहलाती थी । प्ररीततित्‌ | राजाकी प्रतिज्ञाके ` 
अनुसार सात दुर्दान्त वेलोपर विज प्राप्त न < 
कर सकनेके कारण कोई राजा उस कन्यासे विवाह 
न कर सके । क्योकि उनके सींग बडे तीखे थे ओर वे 
बेर किसी वीर पुरुषरकी गन्ध भी नह्य सह सक्ते 
ये ॥३२-३३॥ जत्र यदुवंशशिरोमणि भगवान्‌ श्रीडृष्णने 
यह समाचार सुना किं जो पुर्प्र उन बेछोको जीत लेगा 
जगाम को्ट्यपुरं सैन्येन महता चतः ॥३४) | उसे दी सत्था प्राप्त होगी; तव वे बत बड़ी सेना ऊेकर 
बुव | इषु | | 4 ख्पुरी । क 


९ न यै र क `: 4 र. ष (६ । 


अ० ५८ | देशम न्ध ४९३ 

सोऽग्नस्तुष्टो धयुरदाद्वयाञ्छषेतान्‌ रथं नृप। वने ॥ २५ | खाण्डव-नका भोजन मिक जनेसे 
अजैनयक्षयौ तूणौ वर्मं॑चामेयमस्िभिः ॥२६॥ 

॥ 

| 


। मयश्च मोचितो बहवः सभां सख्य उपाहरत्‌ । 


यस्मिन्‌ दुर्योषनस्यासीजरखलदशिभ्रमः ॥२७।॥। 


+ स तेन समनुज्ञातः सुहृद्धिशालुमोदितः) 
आययौ द्वारकां भूयः सात्यविग्रमुखेशैतः ।२८॥ 


अथोपयेमे कालिन्दीं सुपुण्यत्वरश्च ऊजिते । 


भितन्वन्‌ परमानन्दं खानां परमपङ्गल्‌ ॥२९॥ 
विन्दानुविन्दावाचन्त्यां दुर्योधनवश्चालुगो । 


स्ब्रयंवरे स्वभगिनीं कृष्णे सक्तां न्यषेधताम्‌ ॥३०॥ 
राजाधिदेव्यास्तनयां मित्रविन्दां पितष्वसुः। 


प्रषद्य हृतवान्‌ ष्णो राजन्‌ राज्ञां प्रपरयताम्‌॥३१॥ 
नग्नजिन्नाम कौकऽस्य आसीद्‌ राजातिधामिकः । 
तख रयाभवत्‌ कन्य; देवी नाग्नजिती नृप ॥३२॥ 
न तां शेक्पा वोुमजिलय। सप गो पान्‌ 

तीक्ष्णश्ङ्गान्‌ षुदुधपौन्‌ वीरगन्धासह(न्‌ ख सान्‌।२२। 


तां श्रुता बृषजिष्टभ्यां भगवान्‌ साततां पतिः! 











4 

॥ि 

# = 

+ 
4 


++ ~; भना +, भ यं 





७९४ श्रीमद्भागवत [ अ० ५८ 








स कोसल्पतिः प्रीतः प्रद्युत्थानासनादिभिः। | कोसल्पुरी (अयोध्या) पचे | २४ ॥ कोद्टनरेश महाराज 
| नग्नजितने बड़ी प्रसननतासे उनकी अगवानी की ओर आसन 

आदि देकर बहत बड़ी प्रूजा-सामग्रीस्े उनका सत्कार 
किया । भगवान्‌ श्रीकृष्णे भी उनका वहृत-बहृत 
अभिनन्दन किया ॥ ३५ ॥ राजा नग्नजित्की कन्या 
सव्याने देखा किं मेरे चिर-अभिकपित रमारमण भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैँ; तवर उसने मन-ही-मन यह 
अभिलाषा की कि ध्यदि मैने ब्रत-नियम आदिका पान 
करके इन्हीका चिन्तन किया हैतोयेद्ी मेरे पति हों 
ओर मेरी विद्र क्साको पर्णं करे" ॥ ३६ ॥ नागन- 
जिती सत्या मन-ही-मन सोचने च्गी--भगवती लक्ष्मी, 
ब्रह्मा, शकर ओर वड़े-वड़ ठोकपा जिनके पदपङ्कजका 
पराग. अपने सिरपर धारण करते हँ ओर्‌ जिन ग्रमे 
अपनी वनायी इई सयांदाका पाटन करनेके व्यि ही 
समय-समयपर अनेकों टीदावतारं प्रहण चये है वै 
प्रथु मेरे किंस धमं, तरेत अथव्रा निथमसे प्रस्नन होगे १ 
वे तो केवर अपनी कृपासे ही ग्रसन हो सकते ईः ॥३७॥ 
परीक्षित्‌ | राजा नग्नजित्‌ने भगवान्‌ श्रीक्ृष्णकी विधि 
पूवक अर्चापूजा करके यह प्रार्थना दी--“जगतुक 
| स्वाभी नारायण | आप अपने स्वरूपभूत 
आनन्दसे ही परिपूणं है ओर भँ द्र एक तच्छ मनुष्य | 
मे आपकी क्या सेवा कर !* ॥ ३८ ॥ 

श्रीद्युकदेवजी कते दे--परीक्षित्‌ | राजा नग्नजित्‌- 
का दिया हआ आसन, प्रजा आदि स्वीकार करके 
भगवान्‌ श्रीङ्ृष्ण बह्रत संतुष्ट इए । उन्होने सुस्तकराते 
इए मेधके समान गम्भीर वाणीसे का ॥ ३९ ॥ 











अहंणेनापि गुरुणा पूजयन्‌ प्रतिनन्दितः ॥३५॥ 


वरं विरोक्याभिमतं समागतं 





। 

। 

॥ 

४, 1 .  नरेन्द्रकन्या चकमे रमापतिम्‌ 


भूयादयं मे पतिराशिषोऽमलाः 


9-‡ „ > र र ज 
० - १, क ~ 


9 » हन = च 
ग + ० क = 


+ कूज + > [वि | 
^ >. क~ व क  , ~, 2 ग) 


करोतु सत्या यदि मे धरतो व॑तेः॥२६॥ 
यत्पादपङ्जरजः क्षिरसा बिभतिं 


। + = त 
"क श ~ 
क्न ~, 
च त अ. 


| 
॥: 
< 
। 


श्रीरन्जजः समिरिशः सदलोकपालेः । 
लीलातन्‌ः खश तसेतुपरीप्सये शः 
काले दधत्‌ स भगवान्‌ मम केन तष्येत्‌। २७; 
अवितं पुनरित्याह नारायण जगत्पते । 

















आ्मानन्देन पृणंख कैरवाणि किमल्पकः ॥३८॥ 
श्रीद्युक उवाच 


तमाह भगवान्‌ हं्टः कताहनपरग्रहः । 
मेघगम्भीरया चाचा ससितं इरुनन्दन ॥३९॥ 


श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा-- राजन्‌ ¡ जो श्षत्रिय 
नरे विगर्ह अपन = म्‌ मे ~ उस कुछ ^~ ५७, ट 
द्र याच्जाकविभिर्धिगरहिता पने धममें सित है, उसका कुछ भी मांगना उचित 


नदीं । धमज्ञ विद्वानोँने उसके इस कर्मकी निन्दा की 

दै | फिर भी मे आपसे सीहादका--ग्रेमका सम्बन्ध 

स्थापित करनेके व्यि आपकी कन्या चाहता द्र । हमारे 
~ यहां इसके बदले ङु छस्क देनेकी प्रथा नदय 
4  „ ढन्यां तदीय) न हि ्यदकद्‌ा ¶यस्‌॥।४०।। | द ॥ ४० ॥ 

~ ` ५ २, प्राचीन प्रतिमे “यत्पादपङ्कज'  “” इत्यादि पूरा इरोक (अर्चितं पुनरित्याद " “इस पूरे इखोकके बाद्‌ 


ट्लरा है । २. ङष्णः। 
> < दः ~ न 
श ~ म, > द्‌ प ^" । | र न = 


= <  शजन्यवन्धोनिजधर्मवतिनः । 
ए तथापि याचे तव सौहदेच्छय। 


+ नि ज 





~न 
कै ह । # > = 

~ _ 7. 
# न [8 


11 ४. ट. । हि 









छ क कक क बर्यछयका्यायाययण्ययाण्यकन्ययययदाययाण्याययया नानानना (न 


राजोवाच 
कोऽन्यस्तेऽस्थिकछो नाथ कन्याच्‌र दहेप्सितः। 


गुणैकधाभ्नो यखाङ्गे श्रीवंसस्यनपायिनी ।४१॥ 


किलखाभिः कृतः पू्च समयः सातलतपेभ । 


रीप्छएया ।\ ४२ 


शदमग्नाः उबहवः (ननमा इषात्म जाः ॥ ८२) 


यद्‌भं (जगुद्यदचा; सयुस्त्य्यव्‌ यदुनन्दन । 


ग्रता दहि दः ५ ईः 
वृर भव्रादधमतवा इष्टठभ ध 


एवं समयस्य उद्ष्वरा परिढरं प्रथः 1 , 
आदरमान सपधा द्रस्य न्यगुह्नाद्टीखयेष सान्‌ ७५ 
! को सिभिग्नदपौन्‌ इतौजसः 


बद्ध्वा तय्‌ द्‌ 
उ्यक्पंट्धीर्या बद्धान्‌ बाजे दारुमयार्‌ खथा।॥७६॥ 
ततः शीतः खुं राजा दद कर्णाय विशिवः। 

तां प्रत्यगृह्णाद्‌ भगवान्‌ धि धेघत्‌ खटी प्रस, ९७ 


9 [ क 


रशजपरन्यश्च दुष्टतुः छरष्ण उन्मना त्रय पतम्‌ । 


लेभिरे शरशारन्दं जात श्रमोरसवः) ७८1] 


श्धमे श्रनरा नेदुगीवमाचदहिजाक्निषः । 


नरा नायः प्रषुदितवाः सग्रारःस्षगरंद्ताः 1४९ 


| दशधेद्ुसह्साभि पारिवमदाएद्‌ विशः । 





। युवतीनां श्रिसादसं निष्कप्रीवसुगाष्टसाम्‌ \\५०11 
र । श्-भ्रियःपतिः। ` 


दशम्‌ स्कन्ध 


यदि 
यू! एदे }'५४। 


९९५ 








राजा नग्नजितने कहा--्रमो | आप समस्त गणेकि ` 


धाम हे, एकमात्र आश्रय हैँ | आपके वक्षःसख्थल्पर 
भगवती ल्मी निव्य-निरन्तर निवाक्त करती है । आपसे 
वदृकर कन्यके च्य अभीष्ट वर भवा ओर कौन हो 
सकता हे १॥ ४१ ॥ परंतु यदुवंशरिरोमणे ! हमने 
पहले ही इस विष्रयमें एक प्रण कर स्यि है। 
कन्याके य्यि कौन-सा वर उपयुक्त है, उसका वल-पौरुष 
कसा है--इत्यादि वतिं जाननेके व्यि ही रेसा क्रिया 
गया हे ॥ ४२ ॥ वीरश्च श्रीकृष्ण | हमारे ये सातं 
वट किंसीके वशम न आनेवाठे ओर विना सधाये इ 

इन्होने वदहत-से राजङ्मारोके अङ्गोको खण्डित 
करके उनका उत्साह तोड़ दिया है | ४३ ॥ श्रीकृष्ण ! 
दे इन्दं आप दही नाथे, अपने वशम कर टे, तो 





लक्ष्मीपते | आप दी हमारी कन्यके ल्य अभीष्ट वर 
हागेः ॥ ४४ | भगवान्‌ श्रीकृष्णने राजा नग्नजित्का 
एसा प्रण सुनकर कमरमे फ कस टी ओर 
अपने सत खूप वनाकर खेल-देव्मे ही उन वेको 


नाथ व्या | ४५ ॥ इससे वेर्लोका घमंड चूर हो गथा 
ओर उनका वल-पौरुष भी जाता रहा, । अव भगवान्‌ 


श्रीकृष्ण उन्हं रस्सी वोँधकर इस प्रकार खीचने कगे, 


जेसे खेकते समय नन्हा-सा वाल्क काठके वे्छेको 


घसीगरता है ॥ ४६ ॥ राजा नग्नजितको वड़ा विस्मय इआ । 
उन्ोनि प्रसन्न होकर भगवान्‌ श्रीकृष्णको अपनी कन्याका 
दान कर दिया ओर सवंशक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
भी अपने अनुख्प पत्नी सव्याका व्िधिषूक पाणिग्रहण 
किया ॥ 9७ | रानियोने देखा कि हमारी कन्याको 
उसुक्रे अन्यत्त प्यारे मगत्रान्‌ श्रीकृष्ण ही पतिक्रे खये 
प्रप्त हो गये है | उन्दै वडा आनन्द हआ ओर चारं 


। ओर वडा भारी उत्सव मनाया जने च्णा ॥ ४८ ॥ 
। साह, टोल, नगारे बजने खगे 1 स॒त्र ओर गाना-ब जाना 


होने च्णा । ब्राह्मण आरीर्वाद देने रगे ] सुन्दर वच, 
पुष्पके हार ओर गहनस सज-धजकर्‌ नगरे नर-नारी 
आनन्द मनाने खगे \} 9९. 1} राजा नण्नजितने दस्‌ 


# + 
॥ 


# + च ९११ 
र १) ॥॥ 
तै # च 19 \ 4, - कज 


† 


५.0 + 
8 ५ | ग्वे ^ ` क || 


ध, कं रै - १ + ५ 
~ ४4 ~ 


17 


हजार गौं ओर तीन हजार रेसी नवयुवती दास्यो, 
जो सुन्दर वञ्च तथा गस स्वणेहार पहने इए थी, ` 





नवनागसहस्राणि नागाच्छतगुणान्‌ रथान्‌ । 
रथाच्छतणुणानश्चानश्वाच्छतयुणान्‌ नरान्‌ ॥५९१॥ 
* दम्पती रथमानेप्य महत्या सेनया व्रतौ । 


स्नेहभरङ्किहदयो यापयामात कोसल; ॥५२॥) 
न्त ५ * 
त्वेतद्‌ रुरुधुभुपा नयन्तं पथि कन्यकाम्‌ । 


भ्गनवीयाः सुहमंषौ यदुभिः पुरा ।।५२॥ 


तानस्यतः शरत्रातीन्‌ बन्धुप्रियकृदर्ज॑नः । 


गाण्डीवी कालयामास सिंहः द्रश्रमानिव ॥५४॥ 





पारिबहेधुपाग॒ह्य द्वारकामेत्य सत्यया | 















रेमे यद्नागरषभो भगवान्‌ देवकीसुतः ॥५५॥ 
श्चुतकीतंः सुतां भद्रायुपयेमे पिदरष्वसुः । 


दकेयीं भावभिर्दत्तां ष्णः संतर्दनादिभिः ॥५६॥ 


सतां च मद्राधिपतेल्ष्मणां लक्षणेुताम्‌ । 


॥ | खयंवरे जदारंकः स रुपणंः शुधामिव ॥५५७॥ 
/ अन्याथरवंविधा भायाः कृष्णस्यासन्‌ सदसः 

 - = 
ओम हत्वा तन्निरोधादाहताारुदशना; ॥५८ 


~ ॥: ~ ५4 9 


॥ 
कः + १ 
= १ क 
[क १ 4 
ॐ क 


ओमद्भागवत 





< हि प्राचीन प्रतिमे (उत्तरार्धे पाठ न्दी हे | 


[ अ० ५८ 





देम दीं । इनके साय ही नौ हजार हाथी, नौ लख 
रथः नौ करोड़ घोडे ओर नौ अरव सेवक भी दहेजमे 
दिये ॥ ५०-५१ ॥ कोसकनरेशा राजा नग्नजित्‌ने कन्या 
ओर दामादको रथपर चद्ाकर्‌ एक बड़ी सेनाके साथ 
विदा किया | उस समय उनका हदय वात्सल्य-स्नेहके 
उद्रेकसे द्रवित हो रहा था ॥ ५२ ॥ 
परीक्षित्‌ ! यदुवंशि्योने ओर राजा नग्नजित्‌के 
बैरन एहले बहृत-से राजाओंका वल-पौर्ष धूमे मिव 
दिया था | जव उन राजाओने यह समाचार सुना, तव 
उनसे भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यह ॒वरिजय सहन न इद | 
उन छोगोने नाग्नजिती सत्याको लेकर जाते समय मागमे 
भगवान्‌ श्रीकृष्णको घेर ल्या | ५२३ | ओर वे वड़े वेगसे 
उनपर्‌ बाणोकी वर्षा करने गे | उस समय पाण्डववीर्‌ 
अनने अपने मित्र॒ भगवान्‌ श्रीकृष्णका प्रिय करनेके 
य्यि गाण्डीव धनुष धारण करके-जेसे सिंह ॒कछोटे-मोटे 
परञ्चओंको खदेड दे, वैसे ही उन नरपतियोको मार- 
पीटकर भगा दिया ॥ ५४ ॥ तदनन्तर यदुवंरारिरोमणि 
देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस दहेज ओर ॒सत्याते 
साथ द्रारकामे आये ओर वँ रहकर गृहस्थोचित विहार 
करने जगे | ५५ ॥ 


परीक्षित्‌ | भगवान्‌ श्रीकृष्णकी आ श्रुतकीतिं 
केकय-देशमे व्याही गयीं थीं । उनकी कन्याका नाम 
था भद्रा । उसके भाई सन्तदन आदिने उसे खयंद्यी 
भगवान्‌ श्रीकृष्णको दे दिया ओर उन्होने उसका पाणि- 
ग्रहण किया ॥ ५६ ॥ मद्रप्रदेराके राजाकी एक कन्या 
थी लक्षणा । वह अत्यन्त सुलक्षणा थी । जैसे गरुडने 
स्वर्गसे अमृतका हरण किया था, वैसे ही भगवान्‌ श्री- 
कृष्णने स्वयंवरे अकेले ही उसे हर ल्या ॥ ५७ ॥ 

परीक्षित्‌ | इसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णकी ओर भी 
सहनं लिया थीं । उन परम खन्दरियोको वे भोमासुरको 
मारकर उसके बदीगृहसे छडा लये ये | ५८ ॥ 


इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दङामस्कन्धे उत्तरार्धे 
अष्टमहिष्युद्राहो नामाष्टपन्चारात्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ 





[वि त 





~~~ 


८4 ---- 
ग 


द । + 


नी श ४) :1) 





। 


१ 


अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः ए 





भोमासुरका उद्धार ओर सोह हजार पक सौ राजकन्याओंके साथ भगवान्का विवाद 


राजोवाच 
यथा हतो भगवता भौमो येन च ताः यः) 
निरुद्धा एवदाचक्ष्व विक्रमं शाङ्गधन्वनः ।\ ६ ॥ 
श्रीद्युक उवाच 
` हतङ्"डलख्बन्धुना । 


इन्द्रेण हतच्छत्रेण 


हतामराद्विख्थामेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम्‌ । 


सभार्यो गशडारूढः प्राण्ज्योतिषषुरं थयो \ २॥! 


गिरिदर्गेः शचस्रदुरगेजलाग्न्यनिल्दुगमं्‌ । 


¢ 


धुरपाच्ापुतेषोरेष्टेः समेत  अध्रतम्‌ ॥३॥ 


गदया निर्बिभेदाद्रीन्‌ श्स्लदुगांणि सायकः । 
च॒क्रेणाग्नि जर वायुं धुरषाशांसथासिना ॥ ४ ॥ 


श्वनादेन यन्त्राणि हृदयानि मनखिनाम्‌ । 


प्राकारं गद्या गु्या निर्बिभेद मदाधरः ॥ ५॥ 


॥ | चै  पाञ्चजन्यश्वनिं श्ुत्वा युगान्ताशनिभीषणम्‌। 
| ड (2 १. : 
1 प ~ 
९० खम खं 









॥ 8 क 
६३. ~~~ = धः कनः 2: 


` । बिजकीकी कड़कके समान महामयंकर थी । उसे सुनकर 





#। == 
् ; 





राजा परीष्चितने पूा-मगवन्‌ | भगवान्‌ श्रीकृष्ण-* 
ने भौमासुरको, जिसने उन चलियोको वदीगृह्मे डाक 
रक्ला था, क्यों जर वौसे मारा १९ आप कृपा कटके 
शाङ्ं-धनुषधारी भगवान्‌ श्रीकृष्णका वह विचित्र चस 
सुनाइये ॥ १ ॥ 


श्रीद्युक्देवजीने कहा- परीक्षित्‌ ! भौमाघुरने वरुण- 

का छत्र, माता अदितिके कुण्डल ओर मेर पवेतपर्‌ 
सित देवतार्ओंका मणिपवंत नामक स्यान छीन चिया 
था । इसपर सवक्रे राजा इन्द्र दारका अये ओर 
उसकी एक-एक करतूत उन्होनि भगवान्‌ श्रीकृष्णको 
सुनायी । अव भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्य- 
मामाके साथ गरुडपर सवार हए ओर भोमाघुरकी राज- 
धानी प्रागृज्योतिषपुरम गये ॥ २॥ प्रागज्योतिषपुरमं प्रवरा 
करना बहुत कठिन था । पहटे तो उसके चारो ओर 
पहाडकी किठेवदी थी, उसके वाद रार्खोका घेरा ल्गाया 
हआ था । फिर जल्से भरी खाईं थी, उसके बाद 
आग या बिजलीकी चहारदीवारी थी ओर उसके 
भीतर वायु (मेस ) बंद करके रक्खा गया था } इससे ` 
भी भीतर सुर दैव्यने नगरके चारों ओर अपने दस्‌ 
हजार घोर एवं घु फदे ( जा ) जिछा रक्खे थे॥ २॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपनी गदाकी चोटसे पहाङको 
तोड-फोड डाला ओर शबखकी मोरचेवंदीको बाणोसे 
किन-मिन्न कर दिया । चक्रके द्रारा अनि, जल ओर . 
वायुकी चहारदीवार्स्ोको तहस्-नहस कर दिया ओर ` 
मुर दैत्यके फदोको तल्वारसे काट-कूटकर अल्ग रख 
दिया ॥ ४ ॥ जो बड़े-बड़े यन्त्र- मशीनें वहाँ र्गी 
इई थी, उनको तथा वीरपुरुषोके इदयको शङ्खनादसे 

विदीणे कर दिया ओर. नगरके परकोटेका गदा 
भगवान्‌नते अपनी भारी गदासे ध्वंस कर डाला गर ॥ ५ ५\॥ 
भगवानके पाञ्चनन्य र्खंकी ध्वनि प्रख्यकालन 





















१ (च = 
> 
| जग 8 १ 


०९८ श्रीमद्भागवत [ अ० ५९ 








मुरः शयान उत्तशथो देत्यः पश्चश्षिरा जलात्‌ | ६। सुर देत्यकी नीद द्रूटी ओर वह बाहर निकल आया । 
उसके पाच सिर थे ओर अबतक वह जक्के भीतर सो 


त्रि्चूलचम्य सदुनिरीकषंणो राया ॥ ६ ॥ वह दैत्य प्रज्यकराटीन सूर्यं ओर 

च युगान्तधूर्यानलरोचिरुख्धर्णः । अग्निके समान प्रचण्ड तेजस्वी था । वह इतना भयंकर्‌ 
सिरो = था कि उसकी ओर ओंख उठाकर देखना भी आसान 

सं ञिलोकोमिव पथ्वभिश्लेः काम नहीं था | उसने त्रिक उटया ओर इस प्रकार 
रभ्यद्रवत्ताक्थघुतं यथोरगः ॥ ७ ॥ | मगवानूकी ओर दौडा, जैसे संप गणुडजीपर टूट पडे । 
उस समय रेसा मादरम होता था मानो वह अपने रपचों 
मुखो से त्रिव्येकीको निग जायगा ॥ ७ ॥ उप्तने अपने 


ह = ~------~ 11717 ५५. | | 


आविष्य शलं तरसा गर्स्मते 


= © 
निरस्य वक्त्रैव्यनदत्‌ स पञ्चभिः। ्रिद्यूख्को वड़े वेगसे धुमाकर गरूड जीपर चाया ओर ~ 
स॒ रोदसी सवं दिश्चोऽन्तरं मह।- फिर अपने पोच मुखोसे घोर सिंहनाद करने च्णा । 


उसके सिंहन।दका महान्‌ शब्द प्रथ्वी, आकार, पाताट 


नाष पजनण्डकटाहमादृणोत्‌ ॥ < ॥ ओर दसों दिदाओमे फठकर सारे ब्रह्माण्डमें मर गया|॥८॥ 





तदापतद्‌ बे त्रिशिखं गरुत्मते भगवान्‌ श्ीृष्णने देखा वि सुर दैक ्रिदूढ गरुडकी 
हरिः शचराम्यामभिनच्रिधोजसा। ओर वड़े वेगसे आ रहा है | तवर अपना हस्तकोशल 


~अ दिखाकर फुतीसे उन्होने दो वाण मारे, जिनसे बह 
रखेष॒तं॒चापि श्रेरताडयत्‌ खाकर फुतीसे उन्होने दो वाण , नसे ह 
त्रिशूल कटकर तीन द्रूक हो गया । इसके साथ ही मुर 

` तस्मे गदां सोऽपि रुपा व्यगुश्चत॥ ९ ॥ | दौयके सुखम भी मगवान्‌ने बद्भत-से वाण मारे । इससे 











तामापतन्तीं गदया गदाः मघे वह दैत्य अत्यन्त करुद्ध हो उठा ओर उसने भगवानूपर 

रा्रजो निर्बिभिदे अपनी गदा चल्टायी | ९ ॥ परंतु भगवान्‌ श्रीकृष्णने 

गरृग्रजों निविभिदे सहस्तधा । अपनी गदाके प्रहारसे मुर देव्यकी गदाको अपने पास 
उदन्य बाहूनभिधावतोऽजित १ पर्चनेके पहूठे ही चूर्‌-चूर कर दिया | अव्र वह्‌ अल्- । 


शिरसि चक्रेण जहार लीलया ।१०॥ | दीन हो जानेके कारण अपनी ुजाएं फैलाकर श्रीकृष्णकी ` 
ओर दौड़ा ओर उन्होने खेल-खेरम ही चक्रसे उसके 
४ पपाताम ग स व 
वयजः पपाताम्भसि करततशीपो पाचों सिर उतार च्यि॥ १०॥ किर कटते ही सुर 
निश्तशङ्गोऽद्विरिविन्द्रतेजसा । दैतव्यके प्राण-पेरू उङ्‌ गये ओर वह ठीक वैसे 
तस्यात्मजाः सपन पितुर्बधात्राः ही जलमें गिर पडा जेद्ये इन्द्रके वञ्जसे शिख कट 
अिनरियामजषः जानेपर कोई पवत समुद्रम गिर पडा हो । सुर 
भ्रति १; सथुधता; ॥११॥ | देत्यके सात पुत्र ये--ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, 
ताग्रोऽन्तरिश्वः ्रवणो विभावसु- वसु, नभस्वान्‌ ओर अरुण । ये अपने पिताकी 
| मृत्युस त्यन्त उठे ओर फिर बद्‌ ल | 
वंसुनंभखानरणथ ; अत्यन्त शोकाडुल हौ उ 
<: न ई ४, ध सतम्‌ | लेनेके चयि क्रोधसे भरकर राज्राख्रसे घुसनित हो गये । 
पीठ पुरस्कृत्य चमूपति मृधे तथा पीठ नामक दैत्यको अपना सेनापति बनाकर 


भौमग्रधुक्ता निरन्‌ ध्रतायुधाः ॥१२॥ | भौमाघुरके भदेरसे श्रकृष्णपर चद आये ॥११-१२॥ 


+» क्त ~ -- = ५ दु 9 
। (= ठ ष ष १ + ण 1 ४: 9 णब र | 
च » प ~ 2 6 ॥। ए क्कः न ॥ि ह 
न द 9 अः । ॐ = 5 वि, 
4 
। ज द ॐ क ए - "नी कदन व ~ ~ >~ - । = ् कर 
ध च न,  व-> ¬ > 
च ॥ 3 नल 3 1 > = 


# १ 
"५, च 
१ 


५  #) ध ९ । ५ । ‰ ५ ~ ४ १ । ५4 ॥ । यो. 
। षे ॥) त र ॥.। के नै 4 
५. 
त । त र 4 


॥; ‰ 





` ॥.. - 
। 3 39 १५ „५ : च 
, # 
4२ 
+त = 


४ + 







 ‰ 4.91 
त # 
५ 







त क ॥ {५ = 


.4 
1 ९15} 


१ (9 
। 


क, | # ¢ 1 [क क * 
र श 1 #्, 
ध त 
+ सनत र (शा. 


॥ (१ 
(4 कै 
4 > श 
च 







{६ 
ष्‌ हे न्यो चै 


= 4.११ पर ५५ 
ति =; वाना च ६4 ~~ ०. क 
~ ५ ` `न त 
1 ~ 9 , ८.२, कु 
। ह ग ४ । 
भ क = १ तिरेक ५२. ५. वि 1 ग. - + 
3 व 


| = ५ । क. 


- 
वः "न + 
। 9 






पि 
०." च कमु 
= 


अ० ५९ | दशम स्कन्धं ४५९ 


नय~ ~~~ -- ~= ------------------ 

















प्रायुज्ञताक्षाद्य च्रानसीन्‌ गदाः | वे वर्ह आकर बड़े क्रोधसे भगवान्‌ श्रीकृष्णपर बाण, 
शक्तयृषटिशूलान्यजिते रुपोखणाः। गवा, श्चि, चवि नरवन 
तच्छन्ञहटं भगवान्‌ खमार्गनै- रास्रोकी वषां करने खगे | परीक्षित्‌ |  मगवानूकी राक्ति 
र ६ “अमोघ ओर्‌ अनन्त है । उन्होने अपने बाणोसे उनवें 
रम।घीयंस्िलशकृतं ह ९ २॥ | कोटि-कोटि शाखाज् तिर-तिठ करके काट गिरयि ॥ १२॥ 
तान्‌ पीटयुख्याननयद्‌ य मक्षयं भगवानके राल्नग्रहारसे सेनापति पीठ ओर उसके साथी 
तिश्नतशीपोरुथजाडचिवर्मणः । देत्योके सिर, जोरघे, भुजा, पैर ओर कवच कट गये ओर 
= उन सभीको मगवानने यमराजक्रे धर पर्वा दिया | 
चानीकपानच्ुत २ जव पृथ्वीके पुत्र नकार ८ भमा्षर ) ने देखा कि 
स्तथा निरस्तान्‌ नरको धरासुतः ॥१४॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णके चक्र ओर वाणोसे हमारी सेना ओर 
निरीक्ष्य दुमपण आस्तवन्मदै- सेनापतियोका संहार हो गया, तव उसे असद क्रोध 
गजः पयोधिप्रमवेनिराक्रमत्‌ । हआ । वह समुद्रतर्पर पैदा इए बहुत-से मदवाञे 
1 4 हाधिर्योकी सेना केकर नगरसे वाहर निकखा । उसने 
= देखा भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी प्नीके साथ आकारे 
घर्योपरिष्टात्‌ सतडिद्धनं यथा | गरुडपर खित है, जसे मर्यके ऊपर त्रिजटीके साय 
कष्ण स तस्यै व्यस्य जच्छतध्नीं वषाकाठीन इ्याममेघ शओोमायमान हो | भोमासुरने स्वय 
< = भगवान्‌के ऊपर शतघ्नी नामकी राक्ति चटायी ओर 
योधा सव युगपत्‌ स विव्यधुः १५॥। उसके सव्र सैनिर्कोनि भी एक ही साथ उनपर अपने- 
तद्‌ भोमसेन्यं भगवान्‌ गदाग्रजो 
विचित्रवाजंनिं्ितेः शिरीश्ुखेः। 
 निन्रत्तबाहूरुशिरोध्रविग्र 
चकार तद्यव॒हताश्वङ्ञ्जरम्‌ ।॥१६॥। 


अपने अचख-राक्ञ छोड ॥ १४-१५ | अव भगवान्‌ 
श्रीकरष्ण भी चित्र-विचित्र पंखवाठे तीखे-तीखे बाण 

यानि योधैः प्रुक्तनि शघ्ाख्नाणि इखूढह । 

हरि्तान्यव्छिनततीष्णे; यरेरेकेकशखिभिः ॥ १७॥ 






















चलने रगे । इससे उसी समय मोमाघुरके सेनिकोकी ` 
मुजार्पँ, जपि, गदंन ओर धड़ कट-कटकर्‌ गिरते रगे 
हाथी ओर घोडे भी मरने खगे ॥ १६ ॥ 
परीक्षित्‌ । मोमासुरके सेनिकने मगवान्‌पर जो-जो 
अ्ञ-राज्ञ चलये थे, उनर्मेसे प्रवयेकक्रो भगवान्‌ने तीन- 
तीन तीखे वाणोसे काट गिराया ॥ १७ ॥ उस समय ` 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण गरुडजीपर सवार यथे ओर गरुडजीं 
अपने पखसे हायिर्योको मार रहे थे । उनकी चच, पख ` 
ओर पंजोंकी मारसे हायि्योको बडी पीडा इई ओर वे. 
सव-के-सब आतं होकर युद्धभूमिसे भागकर नगरमे धुस्‌ ` 
गये । अब वह अकेग भोमासुर ही क्डता र्या । त नव 
उसने देखा किं गरुडजीकी मारसे पीडित होकर मेरी 
सेना भाग रही है, तब उसने उनपर वह राक्ति चलाय, 
जिसने वञ्जको भी विफल कर दिया था | परंतु उसकी 


१. प्राचीन प्रतिमे ध्यानि योधैः " 'कराल्िभिः' इत इरोककी जगह एेसा पाठ है-सुक्तानि चाख्नाणि कुरूढहामुना 
3 क भि । 


उद्यमानः सुपर्णेन पक्षाम्ां निष्भता गजान्‌ । 


गरुत्मता हन्यमानास्तण्डपक्षनखेगजाः ॥१८॥ 





पुरमेवाविशन्नातौ नरको युष्ययुष्यत । 


द्र विद्रावितं सन्यं गरुंडनादितं खकम्‌ ॥१९॥ 


। गमी र र यणी 






। १५०० 


तं भोमः प्राहरच्छक्तया चजः प्रतिहतो यतः। 
नाकम्पत तया षिद्धो माराहत इव दिपः ॥२०। 


व 7 ०२० = 
~ ~ ग * ' (नक = - 


# कत कन हं केक्णै 


किः "गितो कनं 
। # 


च 4 क ] १ 
शूं भोमोऽच्युतं हन्तुसाददे वितथोघमः। 
 तद्विसयौत्‌ परव॑मेव नरकख क्षरो हरिः । 





॥: । अपाहरद्‌ गजखसख चक्रेण ्षुरनेभिना ॥२१॥ 

सङ्ण्डलं चारुकिरीटभूषणं 

बभो एथिव्यां पतितं सयुञ्ज्वलत्‌। 

। |! हाहेति क्षाध्वित्युपयः सुरेश्वरा 

। ्, | । माव्येभङ्कन्दं वि किरन्त ईडिरे ॥२२॥ 

| ततश्च भरः ृष्णष्ुपेत्य ङण्डले 
प्रतप्रनाम्बूनदरलभाखरे । 

वनमालयापैयत्‌ 





सबेजयन्त्या 
प्राचेतसं छत्रमथो महामणिम्‌ ॥२२॥ 

अस्तोषीदथ विवेश देवी देषवराचितग्र्‌ । 
ग्राञ्जलि; प्रणता राजन्‌ भक्तिश्रबणया धिया ॥२४॥ 


भूमिरुवाच 


नमस्ते देचदेवेश्च श्ङ्कचक्रशद्‌।धर । 


 भक्तच्छोपात्तरूपाय परमात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ।२५५॥ 


| नमः पङ्कजनाभाय नमः पङ्कजमारिनि। 


पङ्कजनेत्राय नमस्ते पडूजाह्गये ॥२६॥ 


// नमो भगवते ठम्पं वादेवाय रिं्णवे । 


त ए << ई % माग्ाविद्ध । २. भूरुवाच । ३. चक्रिणे । 


श्रीमद्भागवत 








| अ० ५५९ 








चोटसे पक्षिराज गरुड तनिक भी विचलित न इए, मानो 
किंसीने मतत्राले गजराजपर लोकी मासे प्रहार 
किथा ह्यो ॥ १८-२० ॥ अन भोमाघुरने देखा कि मेरी 
एक भी चाठ नहीं चरती, सारे उद्योग विफक होते ज। 
रह है, तव उसने श्रीकष्णको मार डाल्नेके व्यि एक 
विड उठाया । पर्तु उसे अभी वह छोड़ भी न पाया 
था किं भगवान्‌ श्रीकृष्णने ह्ुरेके समान तीखी धाराल 
चक्रसे हाथीपर बेटे इए भोमासुरका सिर काट डाल ॥२१॥ 
उसका जगमगाता हआ सिर कुण्ड ओर सुन्दर किरीटके 
सहित प्रध्वीपर गिर पडा । उसे देखकर भोमासुरके 
सगे-सम्बन्धी ह।य-हाय पुकार उठे, ऋकरिलेग 'साधु- 
साधु" कहने रगे ओर देवताठोग॒ भगवानूपर पु्पोकी 
वषां करते इर स्तुति करने ल्मे ॥ २२ ॥ 

अव पृथ्वी भगवान्‌के पास आयी । उसने मावान्‌ 
श्रीकरष्णके गेम वेजयन्तीके साथ वनमाला पहना दी 
ओर अदिति माताके जगमगते दए कुण्डल, जो तपाये 
हृए सोनेके एवं सुनजटित थे, मगवान्‌को दै दिये तथा 
वरुणका छत्र ओर साथ ही एक महामणि भी उनको 
दी ॥ २३ ॥ राजन्‌ | इसके वाद्‌ पृथ्वीदेवी वहे-बड़े 
देवताओके द्वारा पूजित विरतरेशवर भगवान्‌ श्रीकृष्णको 
प्रणाम करके हाथ जोड़कर भक्तिभावमभरे हदयसे उनकी 
स्तुति करने च्गीं ॥ २४॥ 

पृथ्वीदेवीने कहा-राह्खचक्रगदाधारी देवदेवेश्वर ! 
मे आपको नमस्कार करती द्व । परमात्मन्‌ । आप 
अपने भक्तों की इच्छा प्रण करनेके व्यि उपीके अनुप्तार 
खूप प्रक्रट किया करते हैँ । आपको मेँ नमस्कार करती 
र| २५॥ प्रभो । आपकी नाभिसे कमल प्रकट हआ है । 
आप कमलख्की माटा प्रहनते हैँ | अपके नेत्र कमल-से 
विले इए ओर दा न्तिदायक हैँ । आपके चरण कमलके 
समान सुकुमार ओर भक्तोके हृदयको शीतल करनेवाले 
ई । आपको भै वारा नमस्कार करती द्वं ॥ २६ ॥ 
आप समग्र रेशर्य, धमं, यदा, सम्पत्ति, ज्ञान ओर 
वैराग्यके आश्रय है । आप सवन्य्ापक्त होनेपर्‌ भी 
स्वयं बसुदेवनन्दनके रूपम भ्रकट दै । मे आपको नमस्कार 


# ~ ६८५५७ ` + ५१८५ 











पुरूपाय(दिषीज।य पूर्णगोधाय ते नमः ॥२७॥ । करती द्वै । अप दी पुद्ष हँ ओर समस्त कारणेके भी 


अजाय जनपित्रेऽख वबअहाणेऽनन्वद्यक्तये । 


परम कारण है । भप स्यं परणं ज्ञानखख्य है । तैं 
आपको नमश्कार कती दर ॥ २७ ॥ अपर खयं तो हैँ 
जन्मरहित, प्ररंतु इस जगतक्रे जन्मदाता आप ही हैँ | 





परावरातमन्‌ भूतात्मन्‌ परशात्मन्‌ नमाऽस्तु ते| २८ | अप ही अनन्त राक्तियेकि आश्रय ब्रह्म हें | जगत्ता 


सं बे ्िघक्षू रज उच्छं प्रभो 
तसो निरोधाय बिभष्यकषव्रतः। 
स्थानाय सं जगतो जगत्पते 
सारः प्रधानं पुरुषा भवान्‌ प्रः ।२९॥ 
अहं पयो ज्योतिरथानिलो नभो 
मात्राणि देवा प्रन उच्द्रिपाणि। 
कर्त मडानित्यखिलं खर यरं 
त्व्थरद्रतीये भगवन्नयं त्रमः ॥३०॥ 
तस्यात्मजोऽयं तव॒ एादपङ्जं 
भीतः प्रपनातिंहरोपस्ादिः ! 
तत्‌ पालयैनं इर इतथं 
कषिर्खषटष्याखलकर्मषापहम्‌ ॥३१;; 
श्रीश्युक उवाच 
इति भूमभ्याथितो वाभ्भिभगवान्‌ भक्तिनम्रया। 
दत्वाभयं भोमगृहं प्राविशत्‌ सकरद्धिपत्‌ ॥३२॥ 
तत्र राजन्यकन्यानां पट्‌हदक्ताधिकायुतम्‌ । 
` भोमाहृतानां विक्रम्य राजभ्यो ददृशे हरिः ॥३३॥ 


.५* ‡६* न कव 


भं परविष्टं ्नियोरीक्ष्य नरवीरं विभोहिताः। =- 





| त > 9 * 


| श्रीङ्ृष्णको देखा; वे मोहित हो गयीं 


जो कुछ भी काय-कारणमय ख्य है, जितने भी प्राणी 
या अप्राणी है--सव आपके ही ख्य हैँ । परमान्‌ | 


| आपके चरणो मेरे वार-वार नमस्कार ॥ २८ ॥ प्रभो । 


जव आप जगत्‌की रचना करना चाहते हैँ, तव उत्कट 
रजोगुणको ओर जव इसका प्रक्य करना चाहते है, 
तव तमोगुणको तथा जव इसका पाटन करना चाहते 
है, तत्र सच्गुणको स्वीकार करते है । परंतु यह सव 
करनेपर भी आप इन गुणोंसे टकते नही, रिक्त नहीं 
होते । जगत्पते | आप स्वयं ही प्रकृति, पुरुष ओर ` 
दोनोकि संयोग-वियोगके हेतु काठ हैँ तथा उन तीनोसे 
परे भी है ॥ २९॥ भगवन्‌ ! मै ८ पध्वी ) जक, अग्नि, 
वायु, आका, पञ्चतन्मात्र, मन, इन्द्रिय ओर इनके 
अधिष्ठातृ देवता अहंकार ओर महत्त -कर्हातक करट 
यह सम्पूणं चराचर जगत्‌ आपके अद्वितीय खख्पमें 
श्रमके कारण दी प्रथक्‌ प्रतीत होरहादहै॥ ३२० ॥ 
रारणागत-भय-भज्ञन प्रभो ! मेरे पुत्र भोमासुरका यह = 
पत्र भगःत्त अत्यन्त भयमोत ह रद है । मे स्से आपके 
चरणकमलकी शरणमे > आयो ह्रं । प्रभो ! आप इसकी 
रक्षा कीजिये ओर इसके धिरपर अपना वह करकमलं 
रलिये जो सारे जगतके समस्त पाप-तार्पोको नष्ट करने- ` 
वाख है॥३१॥ & 


श्रीद रदेवजी कते है--परीश्चित्‌ ! जव पृथ्वीने ` 
भक्तिमावसे वरिनग्र होकर इस प्रकार भगवान्‌ श्रीङृष्णकी 
स्तुति-प्राथना की, तव उन्होने भगदतत्तको अमय न 
दिया ओर भोमासुरके समस्त सम्पत्तर्योसे सम्पन मह्मं 
्रवेरा किया ॥ २२ ॥ वहं जाकर भगवानने दे 
भोमासुरने बल्ूवक रजाओंसे सोज्ह हजार राजकुमापयिं 
छीनकर अपने यहो रख छोडी थीं ॥ ३३ ॥ जब उन 
राजङ्माियोने अन्तःपुरमे पधारे इए नरश्रेष्ठ भगवान्‌ 


न्होनि उनकी 


----------- ~~ ` ---- == =-= 





















। | > र भीमद्धागवत [अ० ५९ 





मगवान्‌को अपने परम प्रियतम पतिके रूपम वरण कर्‌ 


भूयात्‌ पतिरयं मद्यं॑धात। तदलुमोदताम्‌ । ल्या ॥ ३४ ॥ उन राजकुमासियिंमेसे प्रव्येकने अव्ग- 
४ अलग अपने मनम यही निश्चय किया किं ये श्रीकृष्ण 


इति स्वाः पृथक्‌ कृष्णे भावैन हदयं दधुः ॥३५५॥ | दी मेरे पति हो ओर वि्ाता मेरी इस अभित्षाको रणं 
करे । इस प्रकार उन्होंने प्रेम-मावसे अपना हृदय 
ताः प्राहिणो्‌ द्वारतीं सुखरष्टविरजोऽम्बराः । भगवान्‌के प्रति निंर कर दिया ॥ ३५ ॥ तव भगवान्‌ 
ध. श्रीङृष्णने उन राजकरुमाियोंको सुन्दर-स॒न्दर निमछ 
गरयानमहाकोशान्‌ रथाश्वान्‌ द्रषिणं १हत्‌ ॥३६॥ | वल्लाभूधण पहनाकर पाठकिसे द्वारक! मेज दिया ओर 
उनके साथ ही बहुत-से खजाने, रथ, घोडे तथा अतुल 
एिरावतङ्कलेभां्च चतुद॑न्तांस्तरखिनः । सम्पत्ति भी मेजी ॥ २६ ॥ रेरावतके वंशम उत्पनन हए 
पाण्डराथ चतुःषष्टिं प्रेषयामास केशवः ।३७॥। | भवयन्त वेगवान्‌ चारचार दतरा सफेद रगके चौँपठ 
हाथी भी भगवान्‌ने वर्हसे द्वारका भेजे ॥ ३७ ॥ 
गता सुरेन्द्रभपरनं दच्चादिस्ये च कुण्डले | इसके वाद भगवान्‌ श्रीकृष्ण अमरावतीमें सित 
४ देवराज इन्द्रके महेम गये । वहाँ देवराज इन्द्रने अपनी 
परजितल्िदशेन्द्रेण सहेन्द्राण्या च सप्रियः ॥३८॥ पत्नी इन्द्राणीके साथ सत्यभामाजी ओर भगवान्‌ श्रीकृष्ण- 
ट हर की प्रूना की, तत्र मगवान्‌ने अदितिके कुण्डक उन्हें दे 
चोदितो भाययोत्पाव्य पारिजातं गरुत्मति । दिये॥ ३८ ॥ वयसे ब्योटते समय सत्यमामाजीकी प्रेरणासे 





भगवान्‌ श्रीकृष्णे कल्पवृक्ष उखाडकर गरुडपर रख चा 
ओर देवराज इन्द्र॒ तथा समस्त देवताओंको जीतकर उसे 


स्थापितः सत्यभामाया ग्रहोदयानोपदोभनः | दवारकाम ठे अयि ॥ ३९ ॥ भगवान्‌ने उसे सत्यभामाके 
महल्के बगीचेमे लगा दिया । इससे उस बगीचेकी शोभा 


अन्धयुभर॑मरा; खर्गात्‌ तद्वन्धाक्चवलम्पशः ॥४०। अत्यन्त बढ गयी । कल्पदृक्षके साथ उसके गन्ध ओर 
| मकरन्दके ल्मी मोरे खगंसे. दवारकाम चले आये 


आरोप्य सेन्द्रान्‌ विबुधान्‌ निजित्योपानयत्‌ पुरभ्‌ ३९ 














ययाच आनभ्य किरीरकोटिभिः थे | ४० ॥ परीक्षित्‌ ! देखो तो पदी, जव न्द्रको 

॥ अपना काम बनाना था, तव तो उन्होने अपना सिर 

पादौ सण्शन्च्युतमथंसाधनम्‌ | दुकाकर सुकुटकी नोकसे भगवान्‌ श्रीकृष्णके चर्णोका 

[व व स्पा करके उनसे सहायताकी भिक्षा मोगी थी, परतु 

क क -एि एतेन विगृह्यते महा- जब काम वन गथा, तब उन्दने उन्दी मगवान्‌ श्री- 

# - ~ क. । कृष्णसे र्डाईं छान टी । सचमुच ये देवता भी बडे 

३ ८ ~ - नहा घुशणां च तभो धिगाढ्यता१।.४१॥ | तमोगुणी है ओर त्से वड़ा दोष तो उनमे धनाव्यता- 
का है | धिक्कार है ेसी धनाब्यताको ॥ ४१ ॥ 

 अभाद्हूत एकसिन्‌ नानागारेषु ताः स्त्रियः तदनन्तर भगवान्‌ श्रीङ्कष्णने एक ही मुद्रतमे अग्ग- 


अकग भवनोमे अख-अल्ग ख्प धारण करके एक दही 


भनसा सत्िरेऽभीष्टं पतिं देवोपसादितम्‌ ॥२४॥ | अहैतुकी कृपा तथा अपना सौभाग्य समञ्ञकर मन-ही-मन 


॥ 


जक = श 
कक 





अ० ५९] दशम 
यथोपयेमे 


गृहेषु ताक्षामनपाय्यतक्यद्ग- 





निरस्तसाम्यातिशयेष्यव स्थितः। 
रेमे रमाभिनिजस्छाम्तण्प्टुतो 

यथेतरो गाहेकमे धिकांश्वरन्‌ \\४३॥ 
इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ता 

ब्रह्मादयोऽपि न | विदुः ष्दवीं य दरीयाम्‌ । 

भेजभरंदाधिरतमेधितयाजुराग- 

हाक्ाबलोकनवसंगमजस्पख्जाः ।७४। 
परसयुद्रमासनवराहंण पादसोच- 


ताम्बूल बिश्रमणवीजनगन्धमास्यैः । 


भगवां स्तावद्रषधरोऽन्ययः ॥४२॥ | साय सव राजकुमा््योका शाज्ोक्त वरिधिसे पाणिग्रह 


चः ^ क 


| ~ 4 ~क ८ ९ ३ 
स्कन्ध _ १: ८ ~ = 
' > -+-* "काद व 


कः + ४ ० 8" क "क 





"त = >“ 
कि - म 





किया । सवेशक्तिमान्‌ अविनाशी मगवानूके व्यि इसमे 
आश्वयक्री कौन-क्षी वात है ॥४२॥ परीक्षित्‌ | भगवान्‌- 


की पलियोके अत्ा-अकग मह्नेम देती दिव्य सामन्यो 


मरी इई थीं, जिसके बरावर जगतूमे करी भी ओर कोई 
भी सामग्री नहीं है; पिर अधिककी तो बात ही क्या 
है । उन महरम रहकर मति-गतिके परेकी रीका 
करनेवाठे अविनाञी मगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने आत्मानन्दमे 
मग्न रहते हए ग्ध्मीजीकी अंशसखशखूपा उन पल्नियोकिं 
साय ठीक वसे ही विहार करते थे, जेसे कोई सधारण 
मनुष्य घर-गृहस्थीरमे रहकर गृहस्य धमके अनुसार आचरण 
करता हो ॥ ४२ ॥ परीक्षित्‌ ! ब्रह्मा आदि वडे-बड़े 
रता भी भगव्रानकरे वास्तव्रिक स्वरूपको ओर उनकी 
प्रा्तिके मागेको नहीं जानते । उन्हीं रमारमण मगवान्‌ 
श्रीकष्णको उन लिर्योने पतिके ख्पमे प्राप्त किया था । 


अत्र निव्य-निरन्तर उनके प्रेम ओर आनन्दकी अभिनब्रद्वि ` 


होती रहती शी ओर वे व्रेमभरी ससकर।हट, मधुर 
चितवन, नवस्तमागम, प्रेमालप तथा भाव बढानेवाी 
लजासे युक्त होकर सत्र प्रकारसे भगवानकी सेवा करती 
रहती थीं ॥ ४४ ॥ उनमेसे समी पलियोके साथ सेवा 
करनेके य्ि सैकड़ं दातिर्यो रहती, फिर भी जव उनके 


महल्मै मगत्रान्‌ पधारते त वे स्वयं आगे जाकर 


आदरपूषरक उन्द चवा खाती, श्रेष्ठ आसनपर वेगी, 
उत्तम सामग्िर्यासे पूजा करती, चरणकमल पखारतीं, 
पान व्याकर चिकातीं, पाव दत्राकर थक्रावट दूर करती, 
पंखा जलती, इत्र-ुञेक-चन्दन आदि क्गातीं, शरलके 


केराप्रसारशयनस्नपनोपहार्ये- हार पठनातीं, केश सवारी, सुरातीं, स्नान करातीं ओर 
अनेक प्रकारके भोजन कराकर अपने ही हार्थो 
< दासीशता अपि विभोर्विदधुः स दाख्म्‌॥। ४५५] की सेवा करतीं ॥ ४५५ ॥ ` 


म्ब -->->->& 5 
ॐ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्कन्धे' उत्तराधै ` 

पार्जिातहरणनरकवधो नाम एकोनषष्टितमो 
ऽध्यायः ॥ "५९ ॥ 





पि ५ - 


नन्द ; = "~ 
, श्रः ११ = # 
व .-9 2 


भि नु अ +, न, 


न 
५. 
9 क १, 
^ > = नकी ~ कष्ण 
[+ कः 
== ~£ ऋ क 2. ----- त ध 4। 8१ 
् , 
> 






































6 ह | 


। 4 
1 षक्‌, ह 
् र, 4 = * 
# क ९.५ ~ -4 
“ ; र क त नल ३. ५ ० 
् १ ` फे . च न्द ५ ^ ५ , @ # 
 # ` ् [1 @ ष 
> क श । ९ श्‌ 1 भीमद्भामवत 
के 3! ओ प नौ क कः 9. 7 अ © द © 
* ् कृ ४ 
नि यं # 
|} क भ # व व 
++ 8 = 9 क "जू व 
चै े (4 ज्ये [4 4 यनयतन क्य्कनयन्यन्नयन्कन्कनकनयन्यन्यन्यन्ण्ण्ण्काकक्नयषनयणणकयनानय्यन 
॥ ह 1} 
क ॥ र~ ¶ [६ क) 
1 


अथ षष्टितमोऽध्यायः 
श्रीकूष्ण-रुकिमिणी-संवाद 
श्रीक उवाच | श्रीद्यकदेवजी कहते है-परीक्षित्‌ ! एक दिन समस्त 
ष तान जगत्‌के परभपिता ओर ज्ञानदाता भगवान्‌ - श्रीकृष्ण 
करदिचित्‌ सु क 1 नगद्गुम्‌। रुकिमिणीजीके प्टेगपर आरामसे वैटे इए थे । भीणकः- 
| नन्दिनी श्रीरुक्रिमिणीजी सखि्योके साथ अपने पतिदेवकी 
सेवा कर रही थी, उन्दें पखा अल रही थीं॥ १॥ 
यस्त्वेतल्छीरया विश्वं सुजत्यत्यवतीश्वरः । परीक्षित्‌ ! जो सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ खेल-लेके ही इस 
जगत्की रचना, रक्षा ओर प्रज्य करते है वही अजन्मा 
प्रमु अपनी वनायी इई धभै-मर्यादाओकी रक्षा करनेके 
ल्मे यदुवंरि्योमिं अवतीणं इए हैँ ॥ २ ॥ रक्रिमिणीजीका 
महल वड़ा ही खुन्दर था । उसमे पेसे-रेसे चंदोवे तने इए 
ये, जिनमे मोतियोंकी डि्योकी आटे ट्टक रही थीं | 
मणियोके दीपक जगमगा रहे थे ॥ ३ ॥ वेला-चपेटीके 
छठ ओर हार मंह-महं महक रहे थे । छपर छचुंड- 
केल्ुड भौरि गंजार कर रहे थे । घुन्दर-सुन्दर अरोखों- 
की जाच्ियोमेसे चन्द्रमाकी शश्र किरणें महल्के भीतर 
छिटक रही थी ॥ 9 ॥ उद्यानमे पारिजातङे उपवनकी 
सुगन्ध केकर मन्द-मन्द इीतल वायु चर रही थी । 
करोखोकी जावियोमसे अगरके धूपका धूओंँ बाहर निकल 
रहा था ॥ ५ ॥ रेसे महध्मे दूधके फेनके समान कोमल 
ओर उज्ज्वल विक्छीनोँसे युक्त सन्दर पठैगपर भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण बड़े आनन्दसे विशजमान थे ओर रुक्रिमिणीजी 
त्रिखोकीके खामीको पतिखूपमे प्राप्त करके उनकी सेवा 
कर रही थीं ॥ & ॥ रसृत्रिमिणीजीने अपनी सखीके 
| वह चवर ठे छया, जिप्तमें र्नोंकी डँडी च्गी 
थी ओर परमख्पवती क्क्ष्मीरूपिणी देवरी रुक्िमिणीजी 
उसे इला-इत्कर ,भगवानकी सेवा करने व्गीं ॥ ७ ॥ 
उनके करकमर्छोमे जड़ाऊ अंगू्िरयो, कंगन ओर चवर 
शोभा पा रहे ये । चर्णोमें मणिजटित पायजेब सनघ्चन- 
र्नञ्चुन कर रहै ये । अच्चलके नीचे छिपे हए स्त्नोकी 
केदारकी लालिमासे. हार लारा जान पडता था ओर 
चमक रहा था । नितम्बभागमे बहुमूल्य करधनीकी 
ठडियौँ र्टक रही थीं । इस प्रकार वे भगवानूके 
पास ही रहकर उनकी सेवामे सखन थीं॥ ८॥ 
च । २. मिर्ष्ट्दि° । ३. सोऽखणेः । ४. साप्यच्युतं । - ` ` 


१९ ॥ ॥ 1 । ` > ४ 
~~ र त ॐ ~+ ग 
क # कण्ड्‌ न । ५ च न ह 4 भे न वी 
॥ि ५ # । $ ति १ ५ 
॥ हि 





पतिं पयंचरद्‌ भेष्णी व्यजनेन सखीजनैः }! १॥ 


स॒ हि जातः खेतूलां गोपीथाय यदुष्वजः ॥ २॥ 












तसिन्नन्दगृहे भाजन्छक्तादामविरुभ्बिना । 
चिराजिते वितानेन दीपैमणिमयैरपि ॥ ३} 
मद्िकादामभि; पष्येिरेफङ्लन'दितैः | 


जालरन्धप्रविष्टेश गोभिधन्द्रमसोऽमलेः ॥ ४॥ 














पारिजातवनामोदवायुनोदानकश्चालिना । 
धूपेरगुरुजं राजन्‌ जालरन्धविनिर्मतैः ॥ ५॥ 
पयःफेननिमे शभे पये करिपृ्ते । 
उपतस्थे सलासी नं जगताभीश्वरं पतिम्‌ ॥ ६ ॥ 
क, - बालव्यजनमादाय रलदण्डं सखीकरात्‌ । 
` हेन वीजयती देवी उपासाशचक्र ईरम्‌ ॥ ७॥ 


ष 


सोपाच्युतं कणयती मणित्‌ पराभ्यां 


न । 








अ० ६० | दशम स्कन्ध 


[० स 











ऋक #ॐ 
ओः जाको" "चः == ॐ क कोचर जय = को, ` क ` का = ज = च कि ॐ =` च वि 















तां रूपिणीं श्रियमनन्यगतिं निरीक्ष्य | सकिमणीजीकी बरारी अवे, कानोकर कुण्डल ओरग्के 

ू खणंडार अत्यन्त विलक्षण थे । उनके मुखचन्द्रसे 

द मुसकराहटकी अगरतव्रषां हो रदी थी | ये स्व्रिभणीजी 

या रीलया ध्रततनोरचुरूपरूफा । अदकिक रूपखावण्यवती च्छ्मीजी दी तो है । उन्ोने 

जव देखा किं भगव्ानूने रीत्यके व्यि मनुष्यका-सा शरीर 

ग्रहण किया है, तव उन्होने भी उनके अनुख्प ख्प प्रकट 

कर्‌ दिया । भगवान्‌ श्रीक्रष्ण यह देखकर वहत प्रसन्न 

हए कि सुकिंमणी जी मेरे परायण है, मेरी अनन्य प्रेयसी 

यक्त्रोष्धसस्सितसुधां हरिराबभाषे । ९ 1 | है । तव उन्डने बडे ्रेभसे सुसकरति इए उनसे 

कदा ॥ ९ ॥ 

श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृष्णे कदा-राजकुमारी ! बड़-बड़ 

नरपति, जिनके पास टोकपाेके समान रेश्चयं ओर 

सम्पत्ति है, जो बडे महानुभाव ओर श्रीमान्‌ दँ तथा 

न्दरता, उदारता ओर ववम भी बहत अगे वहे इए 

है; तुमसे विवाह करना चाहते थे ॥ १० ॥ तुम्हारे 

पिता ओर भाई भी उन्दीके साथ तुम्हारा क्वाह करना ` 

चाहते थे, यर्हातक कि उन्होने बग्दान भी कर दिया ` 

तान्‌ प्राह्ठानर्थिनो हित्वा चेयादीन्‌ सरदुमदान्‌। था । रिद्युपाठ आदि वडे-बडे वीरको, जो काोत्मत्त ` 

होकर तुम्हारे याचक वन रे थे, तमने छेड़ दिया 

८ 5 ओर मेरेजैसे व्यक्तिको, जो किसी प्रकार तुम्हारे समान 

दत्ता भ्रात्रा खपित्रा च कसान व्ृषेऽसमान्‌ ॥११॥ | नहीं है, अपना पति खीकार किया । एसा तमने क्यो ‡ 

किया १ 1 ११ ॥ सुन्दरी ! देखो, हम जरासंध आदि 

राजभ्यो विभ्यत्‌ः स॒भ्रः सथ॒द्र शरणं गतान्‌ राजाओंसे डउरकर्‌ ससुद्रकी रारणम जा वसे हे | वड़-बडे 

् बल्छरानसे हमने वैर वध खा है ओर प्रायः राज- 

सिंहासनके अधिकारसे भी हम वच्चित ही हैँ ॥ १२ ॥ ` 

सुन्दरी ! हम किस मारगके अनुयायी है, हमारा कौन- 

8 सा मार्ग है, यह भी कोगोको अच्छी तरह माद्धम नहीं ` 

अस्पष्टवत्मनां पंसामलोकपथमीयुषाम्‌ । है । हमल्ेग ठीकिक व्यवहारका भी टीकःटीक पाठन्‌ ` 

नहीं करते, अनुनय-विनयके द्वारा चियोको 

(५ नदीं । जो र्या हमारेजंसे पुरूपोका अनुसरण करती 

। आखिताः पदवीं सुभः प्रायः सीदन्ति योषितः । १३ | है, उन्दं प्रायः क्टेश-दी-क्लेशा मोगना पडता है ॥१३॥ 

¦ क घुन्दरी ! हम तो सदाके अर्किचन है तो हमारे 
पास कमी छ था ओर न रहेगा । से  अर्विचन 

लोगेसे हम प्रेम भी करते हैँ ओर वे लोग भी हमसे प्रेम 

| = करते ह । यदी कारण है कि अपनेको धनी समञ्नेवाछे 

तसात्‌ प्रायेण नद्याद्या मां भजन्ति सुमध्यमे | मध्यमे ॥१४॥। | जग प्रायः हमसे प्रेम नदीं करते, हमारी सेना नही 


ग्रतः खयन्रकक्कण्डलनिष्ककण्ड- 


॥ रौ 


राजपूत्रीण्सिता भ्रपलेकपाखविभरूतिभिः 





महानुभवः श्रीमद्धी रूपोदायंबरोनितेः ।\१०\ 












बलबचद्धिः छरतद्वेषान्‌ प्रायस्त्यक्तनृपासनान्‌ ॥१२॥ 























 निष्किश्चना चयं श्वन्निष्किश्चनजनत्रेयाः । 
9 | 


् - अक 
च ~ ~ २१ र 





# 4 "छ 


नु ।  -¶ १ श्रा 
भा० ख०् क्० २" दषे 


की. 
श 


~ : . 
9 ॥॥ 
६ । ॥ 


९५ 


५.4 


कक क = => कन्द क्न नक द ` अ ˆ 
~+ ५०१ 9.4 0: जिन # | 


कतै श्ट क्कः क (` 


ह प त भद 


च्यः" "ककः क 


धि 


। 


॥॥ 
नि 
भ, 


क क १ # 
पि 


न " व । += = कैक = कनी 


१ 
क ~ क्क + ~ ~ 3 
४. 
# 
# 1 


धे छ न्द्ध 


व अ. ॥ 


) 





+ 


~*" न्क + 


५०६ 


= == 


क क 


ययोरात्मसमं वित्तं जन्मेखर्याकृतिमवः 1 





तयोर्विवादो मेती च नोत्तमाधमयोः कचित्‌ ।॥ १५५ 
वेदभ्येतदविज्ञाय त्वयादीघंसमीक्षया । 
छता वयं गुणेहीना भिष्वभिः छपिता युधा ॥१६॥ 
अथात्मनोऽनुरूपं वै भजख कषत्रियषभम्‌ । 
येन त्वमाशिषः सत्या इदाष्ुत्र च रुप्स्यसे 1१७1 


चैयलाल्वजरासंधदन्तवक्त्रादयो नृपाः । 


मम द्विषन्ति वामोरु रुक्मी चापि तवाग्रजः ॥१८॥ 


तेषां बीर्यमदान्धानां द्तानां खयलुत्तये । 
आनीतासि मया भद्र तेजोऽपहरतासताम्‌ ।॥१९॥ 


उदासीना वयं ननं न सत्यपत्याथकायुकाः । 


आत्मन्ध्याऽऽसखहे पण गेह्योज्योतिरक्रियाः।२०। 
री उवाच | 
एताबदुक्त्वा भगवानात्मानं वस्कभामिव । 
मन्यमानामविदरेपात्‌ तदपश्च उपारमत्‌ ॥२१॥। 
इति त्रिलोकेशपतेस्तदाऽऽत्मनः 
प्रियस्य . देव्यश्रुतपूवंमप्रियम्‌ । 
आश्रुत्य भीता हदि जातवेपथु- 
चिन्तां दुरन्तां सूदती जगाम ह ॥२२॥ 
पदा उखजातेन नखारुणश्रिया 
शवं लिखन्त्यश्वभिरञ्जनासतितेः। 
१. बादरायणिख्वाच । 


श्रीमद्भागवत 





| अ० &° 


च = जी चजानकायारय= च" ज = = काण भन भ ये क & = ५ = > ^ --चनकक् » क (च द कत = त क छ" तो च त क जा ओ" ०, "क जिः [व 


क्रते | १४ ]| जिनका धन, कुर, रेश्र्थ, सौन्दर्य 
ओर आय अपने समान होती है- उनसे विवाह ओर 
मित्रताका सम्बन्ध करना चहिये | जो अपनेसे श्रे या 


। अधम हों, उनसे नदीं करना चदिये ॥ १५] विदर्मराज- 


कुमारी । तुमने अपनी अदूरदरिताके कारण इन वातोका 
विचार नहीं किया ओर विना जने-वृञ्चे भिक्षुकोसे मेरी 
बूट प्रशसा सुनकर मुञ्च गुणद्धीनको वरण कर 
च्य ॥ १६ ॥ अव भी कुछ विगड़ा नहींदहै | तुम 
अपने अनुखूप किी श्रेष्ठ क्षत्रियको वरणं क्र छ | 


जिसके द्वारा तुम्हारी इदव्येकः ओर परलोकक्ी सारी 
आरा-अभित्ापापं 


पूरी हो सकं ॥ १७ ॥ सुन्दरी । 
तुम जानती दही हो कि शिद्ुपाट, शाद्व, जरासंध, 
दन्तवक्त्र आदि नरपति ओर्‌ तम्दारा वड़ा माई स्क्मी-- 
सभी मुञ्चसे देष करते थे | १८ ॥ कल्याणी ! वे सुव 
वर-पौर्षके मदसे अघे हो रदे ये, अपने सामने किंसीको 
कुछ नहीं गिनते थे | उन दुका मान मर्दन करनेके 
व्यि ही मैने तम्दारा हरण किया था ओर कोई 
कारण नहीं था॥ १९ ॥ निश्चय ही हम उद्रासीन 
हे | हम दी, संतान ओर धनके ब्मेटप नहीं है| 
निक्िय ओर देद-गेहसे सम्बन्धरहित दीपरिखाके 
समान साक्षीमात्र है | हम अपने आत्ाके साक्षव्कारसे 
ही पूर्णकाम है, कृतद्ृत्य हैँ | २० ॥ 
ध्रीदयुकदैवजी कते दै--परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
श्रकृष्णके क्षेणभरके च्वि मी अख्ण न होनैके कारण 
रुकिमणीजीको यह अभिमान हो गया था कि भैं इनकी 
सवसे अधिक प्यारी द्व । इसी गवकी शान्तिके च्य 
इतना कहकर भगवान्‌ चुप दो गये ॥ २१ ॥ परीक्षित्‌ | 
जव स्किमणीजीने अपने परम प्रियतम पति त्रि्ोकेश्वर 
मगवान्‌की यह अग्रिय वाणी सुनी--जो पहले कमी 
नहीं खुनी थी, तव वे अत्यन्त भयभीत हयो गयी; उनका 
हृदय धड़कने लगा, वे रोते-रोते चिन्ताके अगाध समुद्रम 
इवने-उतराने च्छं ॥ २२ ॥ वे अपने कमक्के समान 
करोम. ओर नवेोकी लखील्मासे कुछङुछ लक प्रतीत 
होनेवारे -चरणसे धरती ङुरेदने लगीं । अज्नसे मिक 


ऋ ^ ` १ नन्त 


अ० &० | 





आसिथ्वदी इुङ्कमरूषितो स्तनौ 
तश्वधोगुख्यतिदुःखरुद्रवाक्‌ ॥२३॥ 
तखाः उदुःखभयशेकबिनटवुद्- 


हेसताच्छथष्टरुयतो व्यजनं पपात । 


रम्भेव बायुधिहतः मरयिकीयं केशान्‌ ।।२४। 
तद्‌ दृष्ट भगवान्‌ कृष्धः प्रिभायाः सेमबन्धनम्‌। 
हाखप्रोदिमनानन्व्शः छरूणः सोऽन्यकस्पत ।॥ २५ 
प्य्ादवसद्यास्च ताद्रथाप्य चतुथः । 
केशान्‌ सथुद्य तकत प्रःमरूजत्‌ पञ्चपाणिना ।\२६॥ 


च च 


क ( 
ग्रमृज्याश्वुले सत्रे स्तना चोपहतो शचा । 


आश्छिष्य बाहुना रजनननन्यविषयां सतीम्‌ 1२७ 
सान्त्वयासस सान्त्यः कृपय! द्पणां प्रयः | 


हश्यप्रोदिभ्रमचित्ायतदष् स 


श्रीभगवानुवाच 





मामा वैदभ्यंध्चयेधा जादे तवां भत्परायणाम्‌। 


1 ` ४ 
~ च्च ` 
[= 
च्ल ् 


अलं च प्रमसंरम्भस्फुरितधरमीकितभ्‌। 


धे => ~ 2 जि 
^ च 


१. हास्यः पर 


= ' " ` ~ 4 "ननु कन्व 


दम्‌ खन्ध ` 


-स्किंमणीजीको बहम भरकर छातीसे च्ा च्या ॥२७॥ ` । 


गतिं; 1२८] 






खः श्रोतकमिन क्षवेस्याऽऽचरितमङ्गने ।।२९॥ 


चाहता था कि मेरे यों कडनेप 
< क  ग्रणय-कोपसे किस प्रकार 





# ^ भगी त 


















उनकी वाणी रुक गयी ओर्‌ वे ठिठिकी-सी रह गयीं ।२३। 
अत्यन्त व्यथा, मय ओर शोके कारण विचारदक्तिटुप्त 
हो गयी, वियोगकी सम्भावनासे वे तत्क्षण इतनी दूवटी 
हो गयीं कि उनकी कठादका कंगनतक दिसक गया | 
हाथका रचैवर गिर पडा, बुद्धिकी विकल्ताके कारण वे 
एकाएक अचेत हो गयीं, केरा व्रिखर गये ओर वे वायु- 
वेगसे उखडे हए केव खंभेकी तरह धरतीपर गिर 
पड | २४ | मगवान्‌ श्रीकृष्णने देा किं मेरी त्रेयसी 
रुकिमणीजी हास्य-वरिनोदकी गम्भीरता नहीं समञ्च रही 
है ओर प्रेम-पारकी दृदतके कारण उनकी यह दद्या 
हो रही है । खमावसे ही परम कारुणिक भगवान्‌ ` 
श्रीकृष्णका हदय उनके ग्रति करुणासे भर गया ॥२१५॥ 
चार भुजाओंवाठे वे भगवान्‌ उसी समय पठेगते उतर 
पडे ओर रुक्मिणीजीको उखा च्या तथा उनके खुठे ` 
हए केरापारोको र्वौधकर अपने शीतल करकमखसे 
उनका मुंह पो दिया ॥ २६ ॥ मगवानूने उनके 
नेत्रोके ओप ओर शोककरे ओंषुओंसि भीगे इए स्तनोको ` 
पोखकर अपने प्रति अनन्य प्रेममावर रखनेवाठी उन सती ` 


मगवान्‌ श्रीकृष्ण समञ्चाने-वुश्चनेम बडे कुराक ओर अपने ` 
प्रेमी भक्तोकर एकमात्र आश्रय हैँ । जव उन्दने देवा 
कि हास्यकौी गम्भीरताके कारण रस्क्रिमणीजीकी बुद्धि ` 
चक्रमे पड गयी है ओर वे अव्यन्त दीन हो रही है, 
तब उन्होने इस अवश्थाके अयोग्य अपनी प्रेयसी रुक्मिणी- ` 
जीको समज्ञाया ॥ २८ ॥ - 



























भगवान्‌ ीरृष्णने कहा- वरिदर्भनन्दिनी ! तम 
मञ्से बुरा मत मानना । सुञ्चसे खूछना नहीं । मैँ जानता 
कि तुम एकमात्र मेरे ही परायण हो । मेरी प्रिय 
सहचरी ! तम्हारी प्रेममरी बात घुननेके व्थि ही न 
सीरसीमं यह्‌ छलना की थो ॥ २९ ॥ तै 1९ 
९ 2©-<+< 216 
फडके लगते २) हार्‌ 






|+ 
धनः 







द - = 


[ अ० ६9 






























 /  कटाक्षेपारुणापाङ्ख सुन्द्रभुद्कटीतटम्‌ ।।३०॥ | कराक्षपूर्वक देखनेसे नेत्रम कैसी वटी छा जाती है 
५ ~ ओर भे चढ़ जानेके कारण तुम्हारा मड कैसा सुन्दर 
गता है ॥ ३० ॥ मेरी परमप्रिये ! स॒न्दरी ! घरक 
काम-घधोमे रात-दिन ठगो रहनेवाटे गृहस्थोके ट्िये घर 
गृहस्थीमे इतना ही तो परम व्यम दहै किं अपनी प्रिय 
यननर्मेनीयते यामः प्रिथया भीरु भामिनि ॥२१॥ | अद्वङ्गिनीके साथ दास-परिहास करते दए कुछ धडियो 
ुखसे विता टी जाती हैँ ॥ ३१॥ 





। अयं हि परमो लाभो गृहेषु गृहमेधिनाम्‌ । 


श्रीलुक उवाच श्रीटयुक्देवजी कते है-राजन्‌ | जव मगवान्‌ 
तवं २ - श्रीकृष्णने अपनी प्राणग्रियाको इस प्रकार समञ्चाया- 
सेवं भगवत्ता राजम्‌ वं दभीं पारसाल्त्वता | वुञ्लाया, तब उन रस व्रातक्रा विश्वास हों ग्या क्कि मेरे 


्रियतमने केवर परिहासे ही रेसा कहा `था | अव 
उनके हृदयसे यह भय जाता रहा कि प्यारे हमें छोड 
बभाष ऋषभ पुसां सीश्चन्ती भगवन्धुखम्‌ | द्ग ॥ २९ ॥ परीक्षित्‌ | अव वे सठज हास्य ओर 

| र ्ेमपूणणं मधुर चितव्रनसे पुरूपमूषण भगवान्‌ श्रीकृष्णका 
सत्रीडदहासरुचिरसिग्धापाङ्न भारत्‌ २२) | मुखारविन्दं निरखती हहं उनसे कहने ल्गी--॥ ३३ ॥ 


` ज्ञात्वा तत्परिहासो क्कि भ्रियत्यागभयं जरौ ।२२॥ 


रुत्िण्युवाच खुकिमिणीजीने कलहा- कमलनयन ! आपका यह 
कहना टीक है कि रेश्वयं आदि समस्त गुणोंसे युक्त 
नन्वेवमेतदरबिन्दविरोचनाह अनन्त॒भमगवान्‌के अनुरूप पै नहीं द्र । आपकी 


समानता मं किसी प्रकार नहीं कर सकती | क्ट तो 
& ह अपनी अखण्ड महिमार्मे सत, तीनों गुणोके खामी 
यद्‌ वे भवान्‌ भगवतीऽसदशी विभूम्नः तथा ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित आप भगवान्‌; ओर 
कहां तीनों गुणोके अनुसार सखभाव रखनेवाटी गुणमयी 
= प्रकृति मे, जिसकी सेवा कामनाओके पीछे मटकनेवाठे 
के स्वे महिस्न्यभिरतो भगवारत्यधीरः । | अज्ञानी लेग ही करते है ॥ ३४ ॥ मला, म आपके 
| समान कव हो सकती दँ | खामिन्‌ ! आपका यहं 
कहना भी ठीक ही है कि आप राजाओंके भयसे 
समुद्रम आ छिपे हँ । परंतु राजा शब्दका अथं प्रथ्यीके 
राजा नही, तीनों गुणखूपर राजा है । मानो आप 
उन्दीके भयसे अन्तःकरणखूप समुद्रम चंतन्यघन अनु- 
भूतिखखूप आत्मके ख्पमे व्रिराजमान रहते दहै । इसमें 
सन्देह नहीं किं आप राजाओंसे वैर रखते हँ । परंतु वे 
न राजा कौन है १ यही अपनी दुष्ट इन्द्र्यो । ५ तो 
(=-= कदिद्दियगणै | आपका वैरदहैद्दी | ओर प्रमो ! आप राजस्हासन 
ऋ. छतविगरहस् „| रहित है यह भी टीकं दी है; क्योकि आपके चरोकी 
"श सेवा करनेवा््ँने भी राजाके पदको धोर अज्ञानान्धरकार 
५, पदं विध तमोऽन्धम्‌ ॥३५॥ | समन्नकर दूरसे ही दुत्कार्‌ रक्खा है । फिर आपके 


4, ~ थ जथ । । ध 


कर कि श न्दः + कनद ` (> च चे 
' ~ 











( > ० 
7 ~ 





अ० 8० | दशम्‌ स्कन्धं 














त्वत्पाद प शमङ्रन्दजुषां अुनीनां व्यितो कहना ही क्याहै॥ ३५ ॥ आप क्ठतेहै 

हमारा मार्ग स्पष्ट नहीं है ओर हम टीकिक पुरस्षो- 

जेसा आचरण भी नहीं करते, यह वात भी निस्संदेह ` 

विभाव्यम्‌ | सत्य है । क्योकि जो ऋषि-मुनि आपकर पादपर्मका 

मकरन्द -रस सेवन करते है, उनका मार्गं भी अस्पष्ट 

रहता है ओर विषयमे उच्छे इए नरपद्य उसका 
यस्मादलोकूमिदेहितथीश्वरस्य अनुमान भी नहीं च्गा सकते । ओर हे अनन्त | 

आपके माग॑पर चटनेवाठे आपके भक्तोकी भी चेष्टं 
जव्र प्रायः अीकिंक ही होती है तव॒ समस्त रक्तिं 

ओर रेश्वयेकिं आश्रय आपकी चेटा अनकक हों 
इसमे तो कहना ही क्या है १ ॥ २६ ॥ आपने अपनेको 

निष्छिनो नद भवान न यतोऽस्ति छिश्िद अकिञ्चन वतलाया है; परंतु आपकी अकिच्चनता 

य कतना भवान्‌ न यतात र्‌ दख्रिता नहीं है । उसका अर्थं यह है किं आपके 

अतिरिक्त ओर कोई वस्तुन होनेके कारण अप ही 

यर्म बहि बलिद्जोऽपि हरन्त्यजादयाः । | सव ङ दै । आप पास रखनेके विमि कु नहीं है । 

परतु जिन ब्रह्मा आदि देवरताओंकी पूजा सवर च्ोग 

करते है, भेट देते हैः वे ही ठोग आपकी प्रूना करते 

नत्वा विदन्स्यसवरपोऽन्तकमाट्यतान्धाः रहते हैँ | आप उनके प्यारे हैँ ओर बे आपके प्यारे 
है । ( आपका यह कहना भी सर्वथा उचित है किं 

धनाठ्य लोग मेरा भजन नहीं करते; ) जो लोग अपनी 

री भवे बकिथुजासपि तेऽपि तुभ्यम्‌ ॥२७॥ | धनाव्यताके अभिमानसे अंवे हो रदे हैँ ओर इ्दि्योको 
तृप्त करनेमे द्ील्गेदहै वेन तो आपका भजन-सेत्रन 

ही करते ओर न तो यह जानते हैँ किं अप मृ्युकें 

रूपमे उनके सिरपर सवार हँ ॥ ३७ ॥ जगत जीवक 
व्यि जितने भी वञ्छनीय पदार्थं है घर्म, अर्थ 

काम, मो्न--उन सवके ख्पमे आप ही प्रकट है| 

आप समस्त वृत्तर्यो-- प्रवृत्तियों, साधन, सिद्धयो ओर 

साध्योके फल्खखूप है । विचारशीक क अपकरो 

। विभावित प्रात करनेके वि सव कुछ छोड़ देते है । भगवन्‌ ! 

तेपां विभो खद्चिते भवद्‌; समाजः उन्हीं विवेकी पुरुपका आपके साथ सम्बन्ध होना ` 

॥- चाहिये | जो रोग ५ सहवाससे प्राप्त होनेवाठे 

~ एस्‌; सखियाश्च रतयोःसखद;चिनोर्म छख या दुःखकरं वडाीूत ह, वे कदापि आपका सम्बच्य _ 
छ ४ । <, {सय सतमाः सखद खनने) २८) रातत कले योग्यं नदी & । २८ दीक ड विं १ 

भिश्चुकाने आपकी प्रशसा कीं है । परंतु किन भिक्ुक्रोने १ 

न्यस्तदण्डषनिधिंमदि उन परमशान्त सन्यासी महात्माओंने आपकी महि 

त्वर १.न्‌(भगदल्दुभष् नैर पग 1 विने अ अपराधी से 

अपराधी व्यक्तिको भी दण्ड न देनेका निश्चय कर्‌ छेया 

 आत्साऽऽस्सदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । | है । मने अदृरददिीतासे नदी, इस बातको समञ्जते इए 


[1 {4 
41. 
८‰॥ 

८ ~ 


भूम॑स्तयेदितमध्य असु ये भवन्तम्‌ ।३६॥ 
















(# + 1. 


9 क्ण ,४ 
त्वव सयस्तदुर्षाधमम्रः एरात्सा 


यहाज्छया सुमतयो विसृजन्ति करखम्‌ । 










चद पि 


९० श्रीमद्भागवत [ अ० ६9 


ऋ > क, | 





हित्वा भवद्श्रव उदीरितिकारुवेग- | आपको वरण किया है किं आप सारे जगत्के आत्मा 

हे ओर अपने प्रेमियोको आत्मदान करते हैँ । तने जान- 

ूञ्ञकर उन ब्रह्मा ओर देवराज इन्द्र आदिका भी इसग्ययि 

परित्याग कर दिया है कि आपकी भौहोके इदारेसे पैदा 

ष्वस्तारिषोऽन्जभवनाकपतीन्‌ कुतोऽन्ये 1 ५१ अ" 
पर पानी फेर देता है | एर्‌ दृसरोकी-गिद्युपाठ 


दन्तवक्त्र या जरासन्धकी तो वातदह्ीक्यादहै१॥ ३९॥ 


जाड्यं वचस्तव गदाग्रज य॑स्तु भूषान्‌ सर्वेश्वर आर्यपुत्र | आपकी यह वात किसी प्रकार 
युक्ति-सङ्गत नदीं माटम होती कि आप राजाओंसे भय- 

| विद्राव्यललाङ्निरदेन जर्थ मां त्वम्‌ मत हकर ससुद्रर्म आ वस € | क्याकिं आपनं केवकं ^ 
(0 अपने शाद्ध॑धनुधके टङ्कारसे मेरे विवाहके समय आये हए 
1 शे ८ समस्त राजाओंको भगाकर अपने चरेम समर्पित मू 
म सिंहो यथा स्वबहिमीश पएद्रन्‌ स्वभागं दासीको उसी प्रकार हरण कर ट्या, जंसे सिंह अपनी 
। 0 कर्वरा ध्वनिसे वन-पड्यओंको भगाकर अपना माग ठे 
तेभ्यो भयाद्‌ यदुदर्धि सारणं प्रपन्नः ॥०।} | आव | ४० ॥ कमलनयन | आप केसे कहते दहं कि जो 
मेरा अनुसरण करता है, उसे प्रायः क्ट ही उदाना 
पड़ता है, प्राचीनकाच्के अङ्क, प्रथु, भरत, ययाति ओर 
गय आदि जो वडे-वड़े राजराजेश्वर अपना-अपना एकच 
साम्राज्य छोडकर आपको पानेकी अभिलखापासे तपस्या 
जायन्तनाहुवगयादय एेकयत्यम्‌ | | करने वनम चे गये थे, वे आपके मारगका अनुसरण 
करनेके कारण क्या किसी प्रकारका कष्ट उठा रहे 
राज्यं विज्य विविशुवंनसम्बुजाक्ष है ॥ ४१॥ आप कहते है कि तुम ओर किसी राज- 
कुमारका वरण कर खो । भगवन्‌ | आप समस्त गुणोके 
एकपात्र आश्रय हँ | बड़े-बड़े संत आपके चरणकमसय्रेकी 
सुगन्धका वान करते रहते है । उसका आश्रय लेने- 
मात्रसे ल्ग संसारके पाप-तापसे सक्त हो जते है| 





ककन कै र ” >» 


[+ शत ` त ऋ 


= ~ = शकन == क 


ह कक्र्नद् ५ ण न म = 1 १ 


= क ऋ क ~ 
= = श 5, 


यद्वाज्छया सरपशिखामणयोऽङ्खवेन्य- 


सीदन्ति तेऽदपदवीं त इहायिताः किम्‌ ॥७१॥ 


कान्यं श्रयेत तव पादसरोजगन्ध- ल्मी सर्वदा उन्मि निवासं करती है । पिर आप 
चतलाह्ये किं अपने खार्थं ओर परमको भटीर्मोति 

मात्राय सन्धुखरितं जनतापवभम्‌ । समञ्चनेवाटी रेसी कौन-सी ली है, जिसे एक वार उन 

| चरणकमल्ेकी सुगन्ध संघनेको भिक जाय ओर फिर वह 

लक्षम्याल्यं त्वविस्भय्य युणालयसख उनका तिरस्कार करके एेसे लोगोको बरण करे जो सदा 


रयु, रोग, जन्म, जरा आदि भयोसे युक्त है । कोई 
मर्त्या सदोरूभयमर्थविविक्तषटिः ॥४२॥ | भी बुद्धिमती खी रेखा नदीं कर॒ सकती ॥ ४२ ॥ 


वि 7 शि 


ज यि ` नाः भा ----- * पः क्यभ्यो्यासास्यक) --~ अः को ज क 


= (4 * यश्च 1 








क । प । न वक ५ * ङ्क, ~ = | ४ 
तं त्वानुरूपमभजं ` त लारूपमभजं जगतामधीश्- प्रभो ! आप सारे जगते एकपात्र खामी हँ । अप ` 
ही इस सेक ओर परलोकमं समस्त आद्ाओको पूणं | 






















मात्मानमंत्र च परत्र च कामपररम्‌ । करनेवाटे एवं आत्मा हँ । मेने अप्को अपने अनुह्म 
समञ्चकर ही वरण करिया है । मुञ्चे अपने क्मेकिं 
स्यान्मे तवाह्धिररणं सृतिभिभ्रमन्स्या अनुसार विभिन योनिरथमे भटकना पड़, इसकी मुञ्चको | 


परा नदीं है । मेरी एकमात्र अभिटलपा यही है किमे 
यो वें भजन्तयुपयात्यतापवगः \\८२।) सरा अपना भजन करनाका मिथ्या ससतरश्नम ध 
करमेवाठे तथा उन्हं अपना खसखूपतक दे डाटनेवाठे 


६ < ~. आप न क्रे रणोर्का [न दार णमे 9 ४ 

तस्याः स्युरच्युत चपा भवतापदिष्ठः प॒पमे्चरके चरक! रणम र॑ ॥ ४२ ॥ 
अच्युत ! शत्रुसूदन ! गोके समान घरका वोन्ञा टोने- 

वाठ, वेके समान गृहस्थीके व्यापरोमं जते र 
सीणां येषु खरगोश्वविडालमत्याः व सान्‌ 
क्च उठानेवाटे, कुत्तोके समान तिरस्कार सहनेधाठे, 
6 3 विखवके समान कृपण ओर हिंसक तथा क्रीत दासक 

यत्कर्णस्रलमरिकर्पग नोपयायाद्‌ 1. 


समान सख्ीकी सेवा करनेवाठे शि्युपार आदि राजाल्छोग 
वरण करनेके च्ि आपने मुञ्चे सकेत किया है- 
उसी अभागिनी डीके पति हो, जिनके कानोमं भगवान्‌ 
दाकर, ब्रह्मा आदि देवेश्वरोकी समामे गायी जानेवाटी 
आपकी टील्कथाने प्रवेद नदीं किया है॥ ४ ॥ 
यह मनुष्यका रउारीर जीवित होनेपर भी मुदां ही है। 
ऊप्रसे चमडी, दादी-मूढ, रोर, नख ओर केशोसे ठका 
हआ दहै; परंतु इसके भीतर मांस, दड़ी, खु, कीड़े, ` ` 
मल-मूत्, कफ, पित्त ओर वायु भरे पडे हँ । इसे वही 
मूष खी अपना प्रियतम पति समश्चकर सेवन करती है, 
निसे कभी आपके चरणारविन्दके मकरन्दकी सुगन्व ` 
सूधनेको नहीं भिद्यी हं ॥ ४५ ॥ कमलनयन ! अप्‌ 
आत्माराम हैँ । तै सुन्दरी अथवा गुण्रती द इन वार्तो- 
प्र आपकी दृष्टि नहीं जाती । अतः आपका उदासीन 
रहना खामाविक है, फिर मी आपके चरणकमलेमे मेरा 
| सुद अनुराग हो, यदी मेरी अभिलाषा है । ज आप 
इस संसास्की अभिदद्धिके व्यि उत्कट रजोगुण स्वीकार 
करके मेरी ओर देखते है, तव वह भी आपका पम ` 
अनुग्रह दी है ॥ ४६ ॥ मधुसुदन ! आपने कदा कि 
किसी अनुरूप वस्को वरण कर च्रे ! मै आपकी पकी १ इस! 
बातकतो भी चठ नहीं मानती । क्योकि कमी-कमी' 
| पुरूके द्रा जती जनिपर भी काशीनरेशकी कल्या 
9 अम्बावें समान्‌ ¦ किसी भ च सोको दूसरे ए षम भी प्रात्‌ 




















युष्मत्था खृउविरिश्वसभास भील 1\७७) 
त्वकूदमश्रुरोमन खेर पिनद्रमन्त- 
| मौसास्िरक्तदरमिविटुरषूपित्तवातम्‌ । 


¦ जीवच्छवं भजति कान्तमतिर्धिमूढा 


य। ते पद्‌{जमङरन्दभजिध्रती सी 1५५५) 












अस्त्वम्बुजाक्ष मम ते चरणालुराग 
आतन्‌ रतख मयि चानतिरिकि ष्टेः। 


ह य्सय ॒बृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो 


[| 7 ग 


। मामीक्षसे तदु ह नः प्रमालुकम्पा 1\४६॥ 


= (9 अ ॥ 
। (य ४ ज वारी 
न स र 
हि "= क न्‌ त ५८ कमह 


५४ च ° १ क ऋ 
र न्थ. की 
१ न क ~ भ 





+ 
श 


जः यि 


"म क म्य 2 कक । 


व्यूटायाश्चापि पुंश्चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम्‌ । 


म | 
# कवारिः 
ज वो यनि क = ॐ 


जो क क । क र 1 
= ऋ [ कि स 5 


(^ / 6 उनाणिष्णनिविगि 7 
~  #' 


बुधोंऽसतीं न बिथरयात्‌ तां विभ्रदुभयच्युतः ॥४८॥ 


ध, श 
[भि , 


श्रीमगवानुबाच 


क क्न कछ ` क , > 


च ज 
ऋ = = ° चकर्त 


साध्व्येतच्छ्ीत॒कामेस्त्वं राजपुत्रि प्ररम्भिता । 
मयोदितं यदन्वात्थ सवं तत्‌ सत्यमेव हि ।४९।। 
यान्‌ यान्‌ कामयसे कामान्‌ मय्यकामाय भामिनि । 
4 सन्ति द्यकान्तभक्तायास्तव कर्याणि नित्यदा।५० 
उपलन्धं पतिप्रेम पातिव्रत्यं च तेऽनघे । 
यद्वाक्येश्राल्यमानाया न धीरमय्यपकपिंता ॥५९१॥ 


ये मां भजन्ति दाम्पत्ये तपसा ततचयया । 


च 
च 
ॐ ॐ "निः 
+ 1 
॥ 
1 ॥) 


क(मात्मानोऽपवरगेश्यं मोहिता भम भायया ॥५२॥ 


न 


। + 1 १ 
` "नकिग्ड कनः ये ४ 
जक न्क )= ॐ 


मां प्राप्य मानिन्यपव्भसम्पदं 


बाज्छन्ति ये सम्पद्‌ एव तत्पतिम्‌ । 


चन 


१ र पि 
। + 


ते मन्दभाग्या निरयेऽपि थे च॒णां 


भ्त किः ` ` किच > किक कति 
चक =कष्लिते >+ 
४ च्छ 
क कके 


कनो ति दि ` भ, न जकर शकक ड 










मात्रात्मकत्वानिरयः 


= कैक शकर 2-कक , @ 


: काक दु 5. 9 १. 


स॒सगमः ॥५३॥ 


[98 | + 









॥1 141 ..71 
॥ 64 ॥। ् क 


दिष्टया गृहेशर्यसकरन्मयि त्वया 


॥ 
। अ 
„$ + 


क (श # 


| 


नि ~ + 9.१ 
क, ` 


खले; | 


` 2 न त त 5 , 
4 ऋ 4 , अजड # ` † 
॥ न , 
1 क व 
^ ° 


१. यं यं कामयसे काम म० | २. मायया हि मे। 





-नष्थे 
ऋच # 
~. 
ष 









नः 
। च्ल 


४.१ 
म ६. 
(किः ॥ि धे 
` क क 
> च, ४ 






~ ~ | 
श कलनं ०१ 


श्रासद्कगवतं 





| अ० &9 





[वरे = का री यि डि क 1 क वाः 


रती है ॥ ४७ ॥ कुर्या सखीका सन तो विवाह हो 
जानेपर्‌ भी नय-नय पुरुषाको ओर खिचता रहता हं | 
बुद्धिमान्‌ पुर्पको चाहिये कि वह देसी कुट्टा खीको 
अपने पास न रक्खे । उसे अपनानेवाटा परक्ख टोक 
ओर परदोक दोनों खी तैटता है, उभयश्रष्ट हो जाता 
है ॥ ४८ ॥ 

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कटा-- साध्वी ! राजकुमारी । 
यही वातं सुननेके व्यि तो भने तमसे हंसी-दसीमें 
तुम्हारी वञ्चना की थी, तुम्हं छकाया था | तुमने मेरे 
वचनोकी जेसी व्या्या की है) वह अक्षरशः सत्य 
है ॥ ४९ ॥ सुन्दरी ! तुम मेरी अनन्य त्रेयसी हो | 
मेरे प्रति तुम्हारा अनन्य त्रम है | तुम सज्जसे जो-जो 
अभिषाँं करती हो, वे तो त॒म्दं सदा-सव्रदा प्राप्त दी 
हैँ | ओर यह बात भी है कि सुशसे की इई अभित्षारप 
सांसारि कामनाअके समान बन्धनम डकनेधाटी नहीं 
होती, वचि वे 


रिक कर यि 1४ ने 


वे समस्त कामनाओंसे सक्त कर देती 
हैँ || ५० ॥ पुण्यमयी प्रिये । मेने तम्दारा पतिप्रेम ओर 
पातिव्रत्य भी भ्ट्ीभांति देख च्या । मैने उर्दी-सीधी 
वात॒ कह-कहकर तुम्ं विचलित करना चदा था; 
प्रतु तुमारी बुद्धि सुञ्चसे तनिक भी इधर-उधर न 
दई ॥ ५१ ॥ प्रिये । मँ मोक्का खामी द्रं । सेगोको 
संसार-सागरसे पार करता द्र । जो सकाम पुरम अनेक 
प्रकारके त्रत ओर तपस्या करके दाम्पत्य-जीवनके 
विषयसुखकी अभिलापासे मेरा भजन करते है, वे मेरी 
मायासे मोहित दहं ॥ ५२ ॥ मानिनी प्रिये ! मेँ मोक्ष 
तथा सम्पूर्णं सम्पदाओंका आश्रय द, अधीश्वर द| 
मुञ्च प्रमात्माको प्राप्त करके भी जो लोग केव्रक विषय- 
सुखके साधन सम्पत्तिकी दी .अभिकपा करते है, 
मेरी पराभक्ति नहीं चाहते, वे वड़े मन्दभागी है, क्योकि 
विषयघुल तो नरकमं ओर नरकंके ही समान सूककर- 
कूकर आदिं योनियं भी प्राप्त हो सकते ह । परंतु 
उन लोगोका मन तो विषमं ही च्मा रता है, इस- 
व्यि उन्हे नरके जाना भी अच्छा जान पडता है ॥५३॥ 
गृषेश्चरी प्राणप्रिये | यह बड़े आनन्दकी बात है कि 
तुमने अबतक निरन्तर ॒संसारः-बन्धनसे सखुक्त करनेवाली 
मेरी सेवा की है । द पुरुष एसा कभी नही कर 


[ति सा| - | मती.रेवा हि 1. धप सा क न्‌ 





क ज त्किं ३ ओ इ ) 











अ० ६० | 
सुदुष्करासो सुतरां दुराशिपो 


दयमुम्भराया निद्र्तिजुषः च्याः ॥५४। 
न त्वाद्यीं प्रणयिनीं गरहिणीं गेषु 

परयामि मानिनि यया स्वविवाहकाले । 
प्रप्ान्‌ चृपानवगणय्य रहोहरो मे 

म्रयापिति दविज उपश्रुतसत्कथस्य ।)५"५॥ 
भ्रातुर्विंखूपकरणं युधि निजितस्य 

्रोद(हपवेणि च तद्धमक्षगो्टयाम्‌ | 
दुःखं समुत्थमसखहोऽखदयोगभीत्या 

नैवात्रवी; किमपि तेन बयं जितास्ते 1५६ 
दृतस्त्वयाऽऽस्मरभने सुविविक्तमन्त्र 

प्रखापितो मयि चिरावति शून्यमेतत्‌ । 
मत्वाजिहास इदमङ्गमनन्ययोभ्यं 


तिष्ठेत तखयि वयं प्रतिनन्दयामः ॥\५७। 
श्रीञ्चुक उवाच 


[] (र ] ७४, 
एवं सोरतसंरापभगवाञ्जगदीश्वरः । 


स्वरतो रमया रेमे नरलोकं विडम्बयन्‌ ५८ | 


तथान्यासामपि विथचगृहेष॒ गृहवःनिव । 


न तति मं उत 


शं २२. ६५ च 8 षड स < 


द्रम स्कन्ध 


इतना अंश नहीं है । 
= 








सकते | जिन ॒च्िर्योका चित्त दुषित कामनाओंसे भरा 
दरआ है ओर जो अपनी इन्िर्योकी तृतिमं ही च्छी 
रहनेके कारण अनेकों प्रकारके छल-छन्द्‌ रचती रहती है 
उनके व्िये तो एसा करना ओर भी कठिन है | ५४॥ 
मानिनि ! मुञ्चे अपने घरभरमें तुम्हारे समान व्रेम करने- 
बारी मायां ओर कोई दिखायी नहीं देती | क्योकि 


। जिप्त समय तुमने मुञ्चे देखा न था, केवल मेरी श्रडंसा 


सुनी शी, उस समय भी अपने विवाहम आये इए 
राजाओंकी उपेश्ना करके ब्राह्मणके द्वारा मेरे पास गुप्त 
सदेडा भेजा था ॥ ५५ ॥ तुम्हारा हरण करते समय 
मेने तुम्हारे भाईको युद्धम जीतकर उसे विख कर 
दिया था ओर अनिरुद्रके करिवाहोत्सवमे चौसर खेटते 
समय वटरामजीने तो उसे मार ही डाखा । वितु हमसे 
व्रियोग हो जनेकी आडाकासे तुमने चुपचाप वह सारा 
दुःख सह च्या | मुञ्चसे एक वात भी नहीं कदी । 
तुम्हारे इस गुणसे मैं तुम्हारे वदा हो गया दर| ५६ ॥ 
तुमने मेरी प्र्तिके व्यि दृतके दारा अपना गुप्त संदेदा 
मेजा था; परंतु जव तुमने मेरे पर्हुचनेमे कुछ ॒बिटम्ब 
होता देखा, तव तुम्दं यह सारा संसार सूना दीने 
स्पा | उस समय तुमने अपना यह ॒सांङ्गसुन्दर शारीर 
किसी दूसरेके योग्य न समञ्ञकर इसे ओडनेका सङ्कल्प 
क्र य्या था । तुम्हारा यह प्रेमभाव तुम्हारे ही अंदर 


रहे । हम इसका वदत नहीं चका सकते । तम्हारे इस ` 


सर्वोच्च व्रेमभावका केवट अभिनन्दन करते हैँ ॥ ५७ ॥ ` 


श्रीद्युकदेवजी कते है- परीक्षित्‌ ! जगदीश्वर 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण आत्माराम हैँ । वे ज मनुष्योकी-सी 


टी कर रहै है, तव उसमे दाम्पव्य-प्रेमको बहानेवाठे 
विनोदभरे वार्ताखाप भी करते हैँ ओर इस प्रकार कस्मी- 


3 
८ 


। 


रूपिणी रुकिमणीजीके साथ विहार करते हैँ 1 ५८ ॥ 
भगवान्‌ श्रीक्रष्ण समस्त जगतकतो रिता देनेवाञे ओर्‌ 
सर्वव्यापक है । ब इसी प्रकार दूसरी पलिनयोके महरम 


भी गृहस्थोके समान रहते ओर गृहस्थोचित धर्मका 
आस्थितो गृहमेधीयान्‌ धरमारलोकगुरुदेरिः ५९1 पाठन करते ये ॥ “९ ॥ ~ 
-- => 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददामस्कन्धे उत्तरार्धं 
कृष्णस्विमणीसंबादो नाम ॒पशितमोऽध्यायः 1 ६० ॥ | 
------->6< + ~~ -- $ 


~ 
न्द 
न 


॥ । 
कु । कृ ¢ 
३.२ 
=+ न्वी > 


भ 
+ ॥ 


क 


६ 0.5.१५ 
+> 7 
^^ 20. 
१ १ #^^ 











[क] 7 [हिः 








५९४ श्रीमद्भागवत [ अ० ६ 
अथेकषष्टितमोऽध्यायः 
भगवान्की संततिकरा वर्णन तथा अनिरुद्धके विवाहम रूक्मीका मागा जाना 
श्रीक उवाच श्रीश्यकदेवजी कहते हँ--परी्नित्‌ ! भगवान्‌ 
3 श्रीकृष्णकी प्रत्येक पतनीके गभ॑से दस-दस पुत्र उत्पन्न 
एकेकशस्ताः ष्णस्य पुत्रान्‌ दश दशाबलाः । ह रमो अपने पिता भ 


श्रीकृष्णसे किसी वाते कम न थे || १ ॥ राजकरुमारियं 
देखतीं कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण हमारे महलसे कभी बाहर 
ग्रहादनपगं वीक्ष्य राजपुत्योऽच्युतं स्थितम्‌ नहीं जाते । सदा हमारे दी पास वने रहते हैँ । इससे वे 
त: . म: यही समञ्लतीं किं श्रीकृष्णको मैं ही सव्रसे प्यारी द्र | 
ए 1 जाद्‌. सम्‌, । २) | परीक्षित्‌ | सच छो तो वे अपने पति भगवान्‌ श्रीकृष्ण- 


अजीजनन्ननवमान्पितः ` सवौत्मसम्पदा ।॥ १ 


¢ ् र - उनकी ी हि नही (ग नीः > ९ 
युन्द।रथा अपन आत्मानन्दमं एकरस सित ॒ भगत्रान्‌ 

सरसवीक्षितवल्गुज षरे [9 ॐ क (= 
स॒प्रमहासरसवीक्षितवल्गुजल्पेः ` । श्रृप्णक्रं कमल-कलाक्रं समान सुन्दर मुख). विंडाठ 
सम्मोहिता भगवतो न मनो विजेत वाहु) कर्णस्प्डा नेत्र, व्रेमभरी म॒सकान, रपमयी चितवन 


विथ ओर मधुर वाणीसे खयं ही मोहित रहती थीं | वे अपने 
सव विभरमःसमशकन्‌ बनिता विभूः ।॥ ३1 | शरदवारसम्बन्धी दावा से उनक मनको अपनी ओर 
खीचनेमे समथ न हो सकी ॥ ३ ॥ वे सोकट हजारसे 
अधिक थीं | अपनी मन्द्-मन्द मुसकान ओर तिरी 
चितवनसे .युक्त मनोहर भहोके इरारेसे एेसे प्रेमक्रे वाण 
£ चच्यती थीं, जो काम-कटाके भार्वेसे परिपूर्णं होते ये | 
पत्न्यस्तु भाडशसहछ्मनङ्गबाण- परतु किसी भी प्रकारसे, किन्हीं साधनक द्वारा वे भगवानूकते 
मन एवं इन्द्रियम चच्चटता नदीं उत्पन्न कर सकीं ॥ ४ ॥ 
परीक्षित्‌ ! ब्रह्मा आदि बड़-वड़े देवता भी भगवानत्र 
इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं सियस्ता वास्तत्रिक खरूमको या. उनकी प्रा्तिके मार्गको नहीं 
- | जानते । उन्हीं रमारमण भगवान्‌ श्रीकृष्णको उन क्ियोने 

ब्रह्मादयोऽपि न विदुः पदवीं यदीयाम्‌ । पतिके खू्पमं प्राप्त किया था । अव नित्य-निरन्तर उनके 


स्मामानलोकर्बदरितभावहारि 


0 ण्डे ०2 च, 
नमण्डलग्राहतसर्तमन्त्रयण्ड \ 


यस्येन्द्रियं विमथितं करणैनं शङ्कुः ।॥ ४ ॥ 


परेम ओर आनन्दकी अभिद्द्धि होती रहती थी ओर वें . 


भजंदाविरतमेधितय 0 । 
छिरग- परेमभरी मुसकराहट, मधुर चितवन, नवसमागमकी खलप्ता 


= आदिसे मगवान्‌की सेत्रा करती रहती थीं ॥ "+ ॥ उनसे 
¢ शम्‌; 1 + समी पल्नियोके साथ सेवा करनेके स्थि सैकडं दासिर्य 


रहतीं । फिर भी जव उनके मह्मं ` भगवान्‌ पधारते 


(९ 
म्रत्युद्रमासनवराहणपादशोच- 0 | 
| | तव वै खयं आगे जाकर आदरधूर्वक उन्दे चवा सतीः 
ताम्बूलविश्रमणवीजनगन्धमाव्ये ; । रष आसनपर वेठती, उत्तम सामग्रियोसे उनकी प्रूजा 


१. तात्मान न तु तच्वविदः | 





न 
क षि 


||| 1॥॥॥॥॥1॥॥|1। 1 .11॥ 1. । 









अ० ६१ | 


[का गि ०००11111 1 "गीरा 


केशमप्रसाररयनस्रपनोपहा्यै- 





दौसीश्चता अपि विभोर्विदधुः स दाखम्‌।। & ॥ 


तौसां या दशपुत्राणां कृष्णस्लीणां पुरोदिताः 
अष्टौ महिष्यस्तत्पुत्रान्‌ प्रध्युञ्नादीन्‌ गृणामि ते।। ७ ॥ 
चारुदेष्णः सदेष्णश्च चारुदेहश्च वीयंवान्‌ । 
सचारुथारुगुंश भद्रचारुस्तथापरः ॥ < 1 
चारुचन्द्रो विचारश्च चारुश्च दशमो हरेः 1 
्र्यु्नभरमुखा जाता रुक्मिण्यां नावमाः पितुः 1) ९ 1 
भानुः सभावः स्वभालुः प्रभानुभायुमांस्तथा । 
चन्द्रभानुर्हद्धाुरतिभावुस्तथा्टमः  ।१०॥ 
श्रीभानुः प्रतिभानुश्च सत्यभामात्मजा दश्च । 
साम्बः सुमित्रः पुरुजिच्छतजिच सहस्षजित्‌ ॥११॥ 
विजयध्चित्रकेतु् वसुमान्‌ द्रविडः क्रतुः । 
जाम्बवत्याः सुता ह्येते स म्बा्राःपिठसंमताः।१२। 
वीरन्द्रोऽश्चसेनश्च चित्रगुर्वेगवान्‌ वृषः । 
आमः शङ्ख सुः श्रीमान्‌ ऊुन्तिनाग्रजितेः सुताः॥१३॥ 
श्चुतः कविर्पो वीरः; सुबाहुभद्र एकलः । 
शान्तर्दशेः पणमासः काठिन्याः सोमकोऽवरः।। १४॥ 
प्रपोपो गात्रवान्सिंहो बः प्रवर ऊर्ध्वगः । 
माद्रयाः पुत्रा महाशक्तिः सह ओजोऽपराजितः।। १५ 
वृको हर्पोऽनिलो गृधो व्धनोऽन्नाद एव च | 
महाननः पावनो वदहिमित्रविन्दात्मजाः श्चधिः॥ १६] 
संग्रामनिद्‌ बरहत्सेनः शरः प्रहरणोऽरिजित्‌ । 
जयः सुभद्रो. भद्राया वाम आयुश्च सत्यकः ॥१७॥ 
दीभिमांस्ताम्रतसाद्या रोदिण्यास्तनया हरेः 1 ` 
्रयुस्राचानिरुद्रोऽमूद्क्मवत्यां महाबरः ॥ १८] 


ही 


क ऋ) = %. 
~ क, ' 


दशम्‌ स्कस्व 


५९५११ 
करतीं, चरणकमल पणार्ती, पान लगाकर खिलातीं, + 
पव दवाकर थकावट्‌ दूर्‌ करती, परखा अ्जटरती, इ 
फुट, चन्दन आदि लगाती, षटोके हार पहनाती, 
केरा संवारतीं, सुकातीं, स्नान करातीं ओर अनेक प्रकार- 
करै भोजन कराकर अपने हाथां भगत्रानकी सेवा 
करतीं ॥ ६ ॥ 

परीक्षित्‌ ! में कह चुका दर कि भगवान्‌ श्रीकृष्णकी 
प्रत्येक पत्तीके दस-दस पुत्र ये | उन रानियोमे आठ 
पटरानि्यो थीं, जिनके विवाहका वणेन म पह कर 
चुका द्व | अव्र उनके प्रयुभ्न आदि पुत्रोंका वणन करता 
ह ॥ ७ ॥ रुक्तिणीके गभसे दस पुत्र इए--ग्रदुम्न, 
चारुदेष्ण, सुदेष्ण, पराक्रमी चारुदेह, सुचार्‌, चार्गपत; 
भद्रचारु, चारुचन्द्र, विचार ओर द सर्वाँ चार्‌ । ये अपने पिता 
मगवान्‌ श्रीकृष्णसे किसी वातमे कम न थे ॥ ८-९ ॥ 
सत्यमामके भी दस पुत्र थ-- भानु, सुभानु, खमन, 
प्रभानु, मानुमान्‌, चन्द्राय, ब्रहद्वायु, अतिभानु, श्रीमानु 
ओर प्रतिमानु । जाम्बवतीक्रे भी सम्ब आदिं दस पुत्र 
थे-- साम्ब, सुमित्र, पुरुजित्‌, शतजित्‌, सहस्नजित्‌ 
विजय, चित्रकेतु, वसुमान्‌, द्रविड ओर क्रतु । ये सव 
श्रीक्रष्णको बहत प्यारे थे ॥ १०-१२ ॥ नाप्रजिती 
सत्याके भी दस पुत्र इए- बीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगु, 
वेगवान्‌, वृष, आम, शङ्क, वघु ओर परम तेजखी 
कुन्ति ॥ १३ ॥ काढिन्दीके दस पुत्र ये थे--श्रुतः, ` 
कवि, वृष, वीर, सुरा, मद्र, शान्ति, दश, प्रणमास॒ 
ओर सव्रसे छोटा सोमक ॥ १४ ॥ मद्रदेरशकी राज- 
कुमारी सक्ष्मणके गम॑से प्रधोष, गत्रतरान्‌, सिह, बर) 
प्रबल, ऊर्व्वग, महाराक्ति, सह, ओज ओर अपराजित- 
का जन्म इआ ॥ १५ ॥ भित्रविन्दाके पुत्र थे--दृक 
हर्ष, अनि, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महारा, पावन वहि 
ओर क्षुधि ॥ १६ ॥ मद्रके पुत्र थे-सप्रामजित्‌,. 
घरृहत्सेन, इरः प्रहरण, अरिजित्‌, जय सुद्र, वामः ` 
आयु ओर सत्यक ॥ १७ ॥ इन पटरानियोके अतिरक्त 
मगवानकी रोहिणी आदि सोल्ड हजार एक सौ ओर 
भी पतिर्यो थीं । उसके दीपिमान्‌ ओर ताघ्रतप्त आदि 
दस-दस पुत्र इए । रुकिमणीनन्दन प्रयुम्नका मायावती 


र दीप्तिश्च | ३. पितृवत्सला 1 ४. चारुचन्द्रोऽग्रसेनश्च । ९९. पत्राधाः 1 


(# र 


~ ५१६ श्रीमद्धागघत [ अ० ६१ 


-__----वच्च्च्व्य्य्य्य्य्च्व्य्य्य्व्य्य्व्य्य्य्व्यववव्व्व-- वचच्व्य्प्च्चचचयययन्य्= कः 








। रुक्मिणं च, च पुरे ॥ ~> म (न + र [५4 
पत्यत रुकिमिणो राजन्‌ नाश्ना भोजकरे पुर्‌ । सतक अतिरक्त भांजकटनगरनेघासती रुक्मीको पुत्री 
| | रुक्मवतीसे भी विवाह दृआ था । उसके गर्भसते परम 

एतेषां पुत्रपौत्राश्च वभरबुः काटला वप । वलङाटी अनिरुद्रका जन्म इआ । परीक्षित्‌ ! श्रीकृष्णके 





; | ुत्रोकी माता ही सोब्ह इ जारसे अधिक शीं | इस्‌- 
॑ | । मातरः कृष्णजातानां सहस्राणि च पोडख ॥।१९। व्यि उनके पुत्र-पीत्रोकी संख्या करोडोंतक प्च 
# गयी ॥ १८-१९ ॥ 
। राजोवाच राज्ञा परीक्षितने पृ्ा-परम ज्ञानी मुनीश्वर | 
भगवान्‌ श्रीक्ृष्णने रणभूमिमें स्क्मीका वड़ा तिरस्कार 
कथं स्वम्यरिपुत्राय प्रादाद्‌ दुहितरं युधि । किया था । इसलिये वह सदा इस बातकी धातमं रता 
था कि अवसर मिते ही श्रीकृष्णसे उसका वदरा दँ ओर += 
उनका काम तमाम कर डाद्टर | रेखी धितिमें उसने अपनी 
कन्या स्क्मवती अपने रा्ुके पुत्र प्रदुम्नजीको कैसे व्याह 
दी १ कृपा करके वतदख्टये । दो रात्रुओमे--श्रीकृष्ण 
। एतदाख्याहि मे विदन्‌ द्विषोर्वेवादिकं मिथः 1\२०॥ | ओर स्वमी फिरसे परस्पर कैवादिकः सम्बन्ध कैसे 
+ इआ १ ॥२० ॥ आपसे कोई वात छिपी नहींहै। 
~ अनायतमवीडं च बर्मानमदीन्दरियम्‌ । क्योकि योगीजन भूत, मिष्य ओर वर्तमानकी सभी 
| वातं भलीभोंति जानते हैँ । उनसे एेसी वाते भी छिपी 
विपदृष्टं वहितं सम्यक्‌ परयन्ति योगिनः ॥२१॥ 4 र 1 | 
ध नीच्मे किसी वस्तुकी आड दहदोनेके कारण नहीं | 
। दीलतीं | २१॥ 





छृष्णेन परिमतस्तं हन्तुं रन्धं प्रतीक्षते । 


१ च्छो नि [ 
व = "क 
कन ' इनकम 1 भम 


श्रीक उवाच ्रीद्यकदेवजी कते है- परीक्षित्‌! प्रयु्नजी मर्त | 
मान्‌ कामदेव थे | उनके सौन्दय॑ ओर गुणोपर रीन्षकर 
वरतः खयवरे साश्षादनङ्गोऽङ्गयुतम्तया । रुक्मवतीने खयंवरमे उन्दीको वरमाव्य पहना दी । 


र प्रयुम्नजीने युद्रमे अकेठे ही वहाँ इट इए नरपतियोंको 
राज्ञः समेतान्‌ निभिंत्य जहार कस्थो युधि ॥२२॥ | जीतच्या ओर सुवभवतीको हर चये ॥२२॥ यपि मगवान्‌ 
ड, व श्रकृष्णसे अपमानित होनेके कारण रुक्मीके हृद्यकी | 
यद्यप्यलुसरन्‌ वरं स्क्रमी कृष्णावमानितः । क्रोधाग्नि शान्त नहीं दईं शी, वह अव भी उनसे वैर | । 
गडि दए था, फिर भी अपनी बहिन रुकिमिणीको प्रसनन | 
व्यतरद्‌ भागिनेयाय स॒तां ङन्‌ खसुः प्रियम्‌।२३॥ | करनेके ल्यि उसने अपने भाने प्रुम्नको अपनी वेदी 
¦ व्याह दी ॥ २३ ॥ परीक्षित्‌ ! दस पुत्रके अतिरिक्त 


स्विंमणीर्ज | भप 


रुकिमण्यास्तनयां राजन्‌ कृतवमंसुतो . बली । के एक परभ घुन्दरी अड़-बडे नेत्रोवारी कल्या 
थी । उसका नाम था चारुमती । कृतवमीके पुत्र बलीने 


उपयेमे विशालाक्षीं कन्यां चार्मतीं किल ।२४॥। | उसके साथ विवाह किया || २४॥ 
९. तोऽसौ | २. प्राचीन प्रतिमे रतः स्वरयबर'- “ “रथो युधिः. यह इलोक 'यद्यप्यनुस्मरन्‌ ˆ ” इस तर्दसवे 
छोकके वाद हे । 


| ३, 
ई 
= ३3 ४ 











¢ ॥ 


` १ सि 


अ० ६१ | द्शम स्कन्ध पअ 





+ च ७ 6 ध [अनन [न [५ र 
दोहित्रायानिर्द्रयि पत्रा स्कम्यददाद्ररैः | | परान्षित्‌ ! स्क्नीक। भगवान्‌ श्रीक्रष्णके साथ पुराना 

क | वैर था। फिर भी अपनी वहिन सक्रिमणीको प्रसन्न 
रोचनां बद्भवराऽपि स्वसुः प्रियचिकीपया। | करनेके च्य उसने अपनी पौत्री सेचनाका विवाह 


९ र ८ | रुकिंमणीके पौत्र, अपने नाती ( दौहित्र ) अनिरुद्रके 
जानन्नधम तद्‌ यानं स्नहपाश्ादुवन्धनः; ॥ २ ^ | साथ कर दिया | ययपि स्क्मीको इस वातका पता था 
कि इस प्रकारका विवाह-सम्बन्ध धमके अनुकर नहीं 
है, फिर भी स्नेद-बन्धनमे वँधकर उसने रेसा कर 
दिया ॥ २५ ॥ परीक्षित्‌ ! अनिरृद्रके विवाहोत्सव 
सम्मिलित होनेके व्ये भगवान्‌ श्रकरष्ण, वट्रामजी, 


तसिन्नभ्युदये राजन्‌ रुक्मिणी रामकेशवो 


पुरं भोजकटं जग्युः सास्वप्रदयुस्नकादयः ॥२६।। | 


च 


तसिन्‌ निवृत्त उद्वाहे काणिङ्गपरमुखा सपाः । सत्रिमणीजीः प्युम्न, साम्ब आदि द्वारकावासी भोजकट 
नगरमे पधारे ॥ २६ ॥ जव विवाहोत्सव निर्वित्र समाप्त 

दप्ास्ते रुक्मिणं प्रोचर्बलमर्विनिर्जय ॥२७॥ | दो गया, तव कलिद्गिनरेश आदि धमंडी नरपतिरयोनि 
रुक्मीसे कहा किं (तुम बल्रामजीको पासके खेलमे जीत 

अनक्षज्ञ ह्ययं राजनपि तद्व्यसनं महत्‌ । लो ॥ २७ ॥ राजन्‌ ! वट्रामजीको पासे डाठ्ने 
तो अते नहीं, परंतु उन्हें खेल्नेका वहत वडा व्यसन 

इत्युक्तो वलमाहूय तेनाक्षे सुक्स्यदीव्यत 11२८ दे. । उन व्ेगोके वहकनेसे रुक्मीने बल्रामजीको बुल- 
वाथा ओर वह उनके साथ चौसर खेलने चणा ॥ २८॥ 
बल्रामजीने पहले सो, फिर हजार ओर इसके बाद्‌ दस हजार 
तं तु सवम्यजयत्तत्र कालिङ्गः प्रहसद्‌ बलम्‌ । मुदरोका दव व्गाया । उन्हें रुकमीने जीत लिया । रुक्मीकी 
जीत होनेपर कलिङ्खनरेरा दत दिषा-दिखाकर व्हाका मार- 

दन्तान्‌ संदश्य युच्च नामृष्यत्तद्रलायुध ; 11 २९॥) | कर वट्रामजीकी हंसी उडानेव्णा | बररामजीसे वड हंसी 
सदन न इई । वे कुछ चिढ़ गये || २९. ॥ इसके बाद रुक्मीने 

ततो रक्षं सुवम्यगृह्णाद्‌ गहं तत्राजयद्‌ बलः । एक जख मुहरोका दौर बाया | उसे बस्ामजीने 
जीत च्या | परतु रुक्मी धूततासे यह कदने त्मा किं 

जितवानहमित्याह सूकमी केतवमाभरितः ॥३०॥ | कैन जीता हैः ॥ ३० ॥ इसपर श्रीमान्‌ वल्रामजी 
क्रोधसे तिलमिला उटे | उनके हृदयम इतना क्षोम इआ, 
मानो पू्णिपाके दिन सपुद्रमे ज्वार आ गया हो । उनके 
4 5 नेत्र एक तो स्वमावसे दी सखल-द्मल ये, दूसरे अव्यन्त 
जात्यार्णाक्षाऽतरपा न्यबुद्‌ गखहमादद्‌ ॥२९॥ | क्रोधे मारे वे ओर भी दहक उठे । अव उन्होनि दस 
८ य करोड़ मुहरोका दोव रक्खा ॥२१॥ इस बार भी 

तं चापि जितवान्‌ रामो धमणच्छरमा्रतः । यूतनियमके अनुसार वट्रामजीकी ही जीत इई, परत 


दातं सदखमयुतं रामस्तत्राददे पणम्‌ | 


मन्युना क्षुभितः श्रीमान्‌ सुद्र इ पर्वणि । 


रुकभीने छल करके कहा-- भेरी जीत दै । इस निषयके ` ` 


रुक्मी जितं मथप्रेमे वदन्तु प्राधिका इति ॥।३२ ॥ | विरेषक्ञ कलिङ्गनरेश आदिं समासद्‌ इसका निगय कर 


र 


(0 + ^ (# ज 
0५ क, श 
# अ १ ५ 


॥} 
क “4 


॥ 1, ॥ । 
९" 


देः ॥ ३२ ॥ उस समय आकाशव्राणीने कडा--ध्यदि ` 


तदात्रवीन्भोवाणी बलेनैव जितो उखहः ¦ धर्मपूर्वक कहा जाय, तो वल्रामजीने ही यह दोव जीता ` 








+ म कवक ॐ = जः जनि ` कः ऋ चः चय जकः | 


१. श्रुवन्तु । 











त न्ख , 
~ १ ४. 
= ^ 
, ककन 


ष्टे हि मी र + ` 1) + 


[का क 
` नक अत्कः = 
त 
+ 


त 
५. *कर्नो -े य ष र = ~ र ग # 
क) 1, 90 को = उन्न, =: "क ^ ७४७० ७, "2 न 


=. ३ = ज 
जकः चा वौ. च +न 

* जो ~ ४ 
अनकक भ शै 1644 १ 








५५१८ श्रीमद्भागवत | अ० ६२ 
धमतां वचनेनेव रुक्मी वदति वं खषा ॥३३। है | सुक्मीका यह कहना सर।सर शूठ उसने 


क 


तामनारत्य - वेदभों दुष्टराजन्यचोदितः 
सङ्कषणं परिहसन्‌ बभाषे कारुचोदितः ।२४॥। 
नेवाक्षकोविदा युयं -गोपाला वनगोचराः । 


अक्षेदीन्यन्ति राजानो बाणे न भवादशाः ।॥ २५ 


रुकरिमिणेवमधिश्िप्रो राजमिथोपहासितः 


रद्ध परिषयुद्यम्य जघ्ने तं लुम्णसंसदि ॥।३६॥। 


करिङ्गराजं तरसा गीत्वा दश्षमे पदे 


१ 


दन्तानपातयत्‌ द्धो योऽहसद्‌ भिच्तेद्जः । २७ 


१ र 


अन्ये निभिनवाहूरुशिरसो रुधिरोक्षिताः 
राजानो दुदधुबुभीता बलेन परिघार्दिताः 11३८1 
निहते रुक्मिणि स्यार नात्रवीत्‌ साध्वसाघु वा 
रुविंमणीबख्यो राजन्‌ स्नेहभङ्गभयाद्धरिः ॥२९॥ 
ततोऽनिरुद्धं सह॒ घयंया घरं 
रथं समारोप्य ययुः ङशखरीम्‌ । 


रामादयों भोजकटाद्‌ दयार्हा; 


" सिद्रालिलाथां मधुखदनाश्रयाः ॥४०॥। 


जीता हेः ॥ ३३ ॥ एक तो स्क्मीके सिरपर्‌ मोत सवार्‌ 
भी ओर दूसरे उसके साथी दुष्ट राजाओंने भी उसे 
उमाड़ रक्खा था । इससे उसने आकाडवाणीपर कोई ध्यान 
नं द्या अर बटरामजीकी हसी उडाते हए कहा--।३५। 
'बटरामजी । आखिर आपद्ोग वन-वन भटकनेवाठे 
ग्वाल ही तो ठहरे ! आप पासा चेटना क्या जानें { 
पासो ओर बाणोसे तो केवट राजात्रेग दही चेका करते 
है, आप-जंसे नही" ॥ २५ ॥ सुक्मीके इस प्रकार आक्षेप 
ओर राजाओंके उपहास करनेपर वटरामजी करोधसे 
आगवतरूल हो उठे । उन्होने एक मुद्गर उठाया ओर 
उस माङ्गलिक सभाम ही रकिमीको मार डाला ॥ ३६॥ 
पहले कटिद्गनरेरा दत दिखा-दिखाकर हँसता था, अव 
रगे भग देखकर वरहोसे भागा; परततु वटरामजीने दस 
ही कदमपर उसे पकड़ ट्या ओर क्रोधसे उसके दत 
तोड़ डे ॥ ३७ ॥ वटरामजीने अपने मुद्ररकी चोरे 
दूसरे राजाओंकी भी वह, जघ ओर सिर आदि तोड़ 
फोड़ ङे । वे खूनसे लथपथ ओर भयभीत होकर 
व्ोसे भागते वने ॥ ३८ ॥ परीक्षित्‌ भगवान्‌ श्री- 
कृष्णने यह सोचकर कि बटरामजीका समर्थन करतेसे 
रुक्मिणीजी अप्रसन्न होगी ओर स्क्मीके वधको बुरा 
वतठानेसे वल्रामजी सश होंगे, अपने साटे सुक्मीकी 
मृत्युपर भटा-वुरा कुछ भी न कहा--॥ ३९ ॥ इसके 
वाद अनिरुद्भजीका विवाह ओर राघ्रका वध दोनों 
प्रयोजन ,सिद्र हो जानेपर भगवान्‌के आशित बट्रामजी 
आदि यदुवंशी नवविहिता दुठहिन रोचनके साथ 
अनिरृद्रजीको श्रेष्ठ रथपर चद़ाकर भोजकट नगरसे 
दरारकापुरीको चरे आये ॥ ४०॥ 





`+. += 


9 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददामस्वन्धेः उत्तरे 
अनिरुद्रविवाहे सुकिमिवधो नामैकपषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥ 
षि ग: ~ ष्यः) 
अ द्विषष्टि र) क 
थ तमोऽध्यायः 
ऊषा-अनिरुद्-मिरख्न 


राजोवाच 
बाण तनयामषायपयेमे यदृत्तमः । 
, ९. तातं कुसखदि । २. न्धे एकपषटि° | 


राजा परीक्षि तने पुच्ा-महायोगसम्पन सुनीश्वर ! 
तने सुना है किं यदुवंशारिरेमणि अनिरुद्रजीने बवाणाघुर- 
























की पुत्री उपासे काह किया था ओर इस प्रसङ्गम 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर शांकरजीका वहत वड़ा धमासान | 
युद्ध हआ था । आप कृपा करके यह वृत्तान्त विस्तारसे 


तत्र॒युद्धमभरद॒ धारं हरिशंकरयोर्महत्‌ । 


एतत्‌ सवं महायोगिन्‌ समाख्यातं त्वमर्हसि ॥ १॥ 


सन्ये ॥ १ ॥ 
श्री्चुक उवाच श्रट्युकदेवजीने कहा- परीक्षित्‌ ! महात्मा वची 
कथा तो तुम सुन ही चुके दो । उन्होंने वामनख्पधारी 
७, ऋ #। [^ [१ (~ ० सौ. 
बाणः पुत्रदातज्येष्टो वरेरासीन्महात्मनः 1 . | मगवानक्तो सारी प्रवीक। दान कर द्विया था उनके सौ 


ट्ड्के थे | उनमें सवसे बड़ा धा बाणासुर ॥ २॥ दैत्यराज 
येन वामनरूपाय दरयेऽदायि मेदिनी 1 २॥ | वट्किा ओरस पुत्र बाणासुर मगवान्‌ शिव्रकी भक्तिमें 
सदा रत रहता था । समाजमे उसका वडा आदर था । 
तसयारसः सता बाणः शशवभाक्तरतः; सदा । उसकी उदारता ओर बुद्धिमत्ता प्ररासनीय थी । उसकी 
प्रतिज्ञा अटक होती थी ओर सचमुच वह वातका धनीं 
मान्यो वदान्यो धीमां सत्यसंधो टृटत्रत्‌ः 1 २॥ | था | २ ॥ उन दिनों वह परम रमणीय शोणितपुरं 


राञ्य करता था | भगव्रान्‌ शकरकी कृपासे इन्द्रादि 


शोणिताख्ये पुरे रम्ये स राज्यमकरोत्‌ परा । देवता नौकर-चाकरकी तरह उसकी सेवाः करते ये । । 
१ सः उसके हजार भुजार्पं थीं । एक दिन जवर भगवान्‌ शंकर र 
तद्य शम्भोः प्रसादेन किंकरा इव तेऽमराः । ताण्डवनरृत्य कर रहे ये, तव उसने अपने हजार हासे 


& अनेकों प्रकारके वजे बजाकर उन्हे प्रसन कर चा ॥४॥ 
सहस्रवाहुवायेन ताण्डवेऽतोषयन्मृडम्‌ 1 ४ ॥ सचमुच भगवान्‌ शांकर वड दी भक्तवत्सर ओर रारणा- 
सवते श | गतरक्षक है । समस्त भूतोके एकमात्र खामी प्रसूने 
भगवान्‌ सवभरतेश्चः शरण्या भक्तवत्सटः । वाणासुरसे कहा-- तुम्हारी जो इच्छ हो, सुङ्जसे मोग 
लो ।' वाणासुरने कहा-- (भगवन्‌ ! आप मेरे नगरकी 
वरेणच्छन्दयामास स तं वव्रे पुराधिपम्‌ 1 ५॥ | र्ना करते इए यहीं रहा करं ॥ ५ ॥ 


स एकदाऽऽह गिरिशं पार्धस्थं वीर्यदु्मदः । एक दिनि बल-पौर्परके धमंडमे चूर वाणासुरने अपने 
८४ समीप ही सित भगवान्‌ शंकरके चरणकमरेको स्के 
किरीटेनाकवर्णेन संस्शंस्त्पदाम्बुजम्‌ 1 £ ।। | समान चमकीरे सुदुटसे चछर प्रणाम किया ओर 
कहा--॥ ६ ॥ ष्देवाधिदेव ! आप समस्त चराचर्‌ जगतकरे ५ 
गुरु ओर ईश्वर है । मै आपको नमरकर करता द्वै । 
जिन लोगोके मनोरथ अवतकर पूरे नहीं इए है, उनको 
पूर्णं करनेके स्थि आप कस्पवृ्च हैँ ।७॥ मगवन्‌ ' आपने 


नमस्ये त्वां महादेव रोकानां गुरुमीश्वरम्‌ । 








[ © र [९ | 
पुंसामपर्णकामानां कामपरामराङ्घरिपम्‌ ॥ ७ ॥ 


= स्सहसतं त्वया दत्तं परं भाराय मेऽभवत्‌ । 


य 
८4 


१. दाब! | ~ जन 









५२० श्रीमद्भागवत 


[ अ० &२ 


जाः को ज 


कियद = न= = = ~~~ ह 
ज वकः आ क = 








कण्डूत्या निभतेदोभियुयुतसुदिग्गजानहम्‌ ॥ | जो मुञ्चसे ठ्ड स्के ॥ ८ ॥ आदिद ! एक वार्‌ मी 
। बाहों ल्डनेके ल्य इतनी एुजलाहट इई कि तै 
आद्यायां चूणयनद्रीन्‌ भीतास्तेऽपि परदुद्ुुः ।। ९॥ दिगर्जोकी ओर चठ । परतु वे भी डरे मरे मा 
खड दए । उस समय मागम अपनी वहोंकी चोमे 
मनं बहृत-से पहाडको तोड-फोड डाल था ॥ ९ ॥ 
। बाणाघुरकी यह प्राना सुनकर भगवान्‌ शंकरने तनिक 
अः । करोधसे क। --र मूढ | जित समय तेरी ध्वजा दरक 
त्वहपध्नं भवेन्म्ट संयुगं मत्समेन ते ॥१०॥ | गिर जायगी उस समय मेरे ही समान योद्धासे तेरा युद्ध 
दोगा ओर वह युद्ध तेरा धमंड चूर-चूर कर देगा ।१५। 
इत्युक्तः कमतिह्टः खगं प्राविशन्नृप | | परीक्षित्‌ । वाणासुरकी बुद्धि इतनी विगड़ गयी शरी कि 
| भगवान्‌ शकरकी वात सुनकर उसे वडा हषं इआ ओ 
अपने धर टोट गया | अव्र वह यूखं भगवान्‌ शंक 
| अदेशानुसार उस युद्धकी प्रतीक्षा करने वणा, जिम 
~ 2 व्व | उस्रं वट -त्रीयका नारा होनेवाय धा | ११॥ 

तखषिा नाम दु।हता खयर प्राद्युभ्नना रातिम्‌ । | परीक्षित्‌ । बाणाघुरकी एक कल्या थी, उसका नाम था 
| ऊपा | अभी व्ह कुपारीदही भी करि एक दिन खप्नमें 
| कन्यारुभत कान्तेन प्रागद्ष्टश्चुतेन सा ॥१२॥ | उसने देखा किं परम खुन्दर अनिरुद्रजीके साथ मे 
। समागम हो रहा है ।' आश्वयकी वात तो यह थी किं 
1 सा तत्रसमपद्यन्ती क्रासि कान्तेति वादिनी । उसने अनिरुद्रजीको न तो कमी देखा था भौर न ना 
¦ ठी था॥ १२॥ खर्म ही उन्हं न देखकर वह बोल 
हतीती & उटी-- श्राणप्यारे ! तुम कडां हो £ भौर उसकी नीद 
सलीनां मध्य उत्ता विह्वला व्रीडिता भृशम्‌ ।१३। | टट गयी । बह अत्यन्त व्हक्ताके साथ ङठ वटी ओर 
यह देखकर कि मै सखियोके वीचमं द्र, बहुत ही जित 
बाणसय मन्त्री इम्भाण्डश्चित्रलेखा च तत्सता । द्रई ॥ १३ ॥ परीक्षित्‌ ! वाणाञ्चुरके मन्तरीका नाम था 
कुम्भाण्ड । उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था 
चित्रा । ऊषा भौर ॒चित्ररेवा एक -दूसरेकी सदैवो 
थीं । चित्रटेखाने ऊषासे कोत्‌हय् प्रा--॥ १४ ॥ 
व प सुन्दरी | राजकुमारी । म देखती दह कि अभीतक 
कत्वं एगयत खशः कोद्शस्ते मनोरथः । किंसीने तुम्हारा पाणिग्रहण भी नहीं किया है | रिरि तुम 
किसे दरूढ रदी हो ओर तुम्हारे मनोरथका क्या खरूप 

हस्तग्राहं न॒ तेऽधापि राजयुच्युपलक्षये ॥१५॥ | रै ¢ ॥ १५॥ 





नि क त श) 
@ # 


४७९. 


कन = कोके विनिन्ये णौ 9 न 
= 


~ - "द "दुय 
1» 


तच्छत्वा भगवान्‌ करद्धः केतुस्ते भज्यते यदा 


प्रतीक्षन्‌ गिरिशादेशं खघीयनश्चनं धीः ॥११॥ 


सख्यच्छत्‌ सखीमृपां कोतूहरसमन्विता ॥१४॥। 


ऊषोवाच ऊषाने कदा--सखी । मैने खप्नम एक बहत ही 
सुन्दर नघयुवकको देखा है । उसके शरीरका रग 
दृष्ट किनरः खम श्यामः कमरलोचनः । सरग -सौव्-सा है । नेत्र कमल्दक्के सान है। 


दारीरपर पील-पीका पीताम्बर फहरा रहा है । मुजाए 
पीतवासा ब्रहद्राहर्योपितां हृदयङ्गमः ।१६॥ , च्ी-कवी है ओर वह लि्योका चित्त चुरानेवाल है ॥ १६॥ 





, १ 


| = 0 ~ = + = ७ छ + = 


+= + ह्च? 


अ० ६२ ] 








तमहं मरगये कान्तं पाययित्वाधरं मधु 1 उसने पहटठे तो अपने अधरौका मधुर मधु सुद 
पिरया, परंतु भै उसे अधाकर धी ही न पायी थी ` 
कि वह मुद्रे दुःखकरे सागरम डाच्कर्‌ न जनि कटा ¦ ज 
चल गया । मँ तरसती ही रह गयी । सवी ! मँ अपने _ 
उसी प्राणवरल्कभको दढ रही द्रं ॥ १७ ॥ । 
चित्रटेखोवाच ` चि्रठेखाने कहा--'सली ! यदि तुम्हारा चित्तचोर ` 
तरिढोकीमे कहीं भी होगा ओर उसे तुम पहचान सकोगी 
तो मेँ तुम्हारी विरह-व्यथा अव्रद्य शान्त कर्‌ दंगी । मे 
चित्र बनाती द, तुम अपने चित्तचोर प्राणवल्छभको 
पहचानकर वतटा दो । फिर बह चाहं कहीं भी होगा, 
इत्युक्त्वा देवगन्धवेसिद्धचारणपन्नगान्‌ म उस तुम्ह रे पास ठे आऊगीः ॥ १८ ॥ यों कहकर 
चित्रटेाने वात-की-वातमे बहृत-से देवता, गन्धवं, सिद्धः 
चारण, पन्नग, दैत्य, वियाधर, यश्च ओर मनुष्योके चित्र 3 
वना दिये ॥ १९ ॥ मनुष्यो उसने बृष्िव्रंडी वछुदेव- 
जके पिता शूर, खयं वसुदेवजी, वट्रामजी ओर मगवान्‌ ` 
श्रीकृष्ण आदिके चित्र वनाये । प्रद्यु्नका चित्र देखते ही 
उपरा ठननित हो गयी ॥ २० ॥ परीक्षित्‌ ! ज उसने 
अनिरुद्रका चित्र देखा, तवर तो जके मारे उसका 
सिर नीचा हो गया | फिर मन्द-मन्द सुसकराते इए 
उसने कहा---भेरा वह प्राणव्रल्छम यही है, यही 
हेः ॥ २१॥ | 3 

परीक्षित ! चित्ररेला योगिनी थी 1 बह जान गयीं 
कि ये भगवान्‌ श्रीक्रष्णकरे पौत्र ह | अवर वह आकाड- 
मार्गसे रात्रिम ही भगवान्‌ श्रीकृष्णकरे द्वारा सुरक्षित 
दारकापुरीमे पर्हची ॥ २२ ॥ व्हा अनिरुद्रजी वहत 
ही खुन्दर पलप सो रहै थे । चित्रेला वग द्विके 
परभावसे उन्दः उठकर दोणितपुर ठे आयी ओर अपनी 
सी ऊप्राको उसके प्रियतमका दरोनं करा दिया ॥२३॥ 
अपने परम सुन्दर प्राणवल्लमको पाकर आनन्दकी 
अधिकतासे उसका सुखकमल प्रफुस्ठित हो उठा ओर वह 
साच तं सुन्द्रबरं बिरोक्यः अदितानना । अनिरुदरजीके साथ अपने महल विहार करे कमी ` 
न 1 | परीक्षित्‌ ! उसका अन्तःपुर इतना सुरक्षित 

इ्मह्य खगे पुम्भी रेमे श्रह्धाम्नना सममू ' उसकी ओर कोड पुरुष $ कतकः नहीं सकता था ॥२४॥] 


ष्यामि । + 


` क्रापि यातः स्प्रहयतीं क्षिप्त्वा मां व्रनिनाणवे ॥१९७॥ 















व्यसनं तेऽपक्छपीमि त्रिलोक्यां यदि भाव्यते । 


तमानेष्ये नरं यस्ते मनोहतौ तमादिश्च ॥१८।। 


देत्यविद्याधरान्‌ यक्षार्‌ ससजा धच यथाङिखत्‌ \१९। 
मञुज्ञेषु चं सा वरष्मीन्‌ शरमानकटुन्दुभिम्‌ । 


व्यल्खिद्‌ रामकष्णो च प्रघ्युभ्नं वीक्ष्य ठज्ञिता।।२०॥ 


अनिरुद्रं विखिखितं वीक्ष्योपावा्खी हिया । 









सोऽसाव्रसाविति प्राह सथमाना महीपते ।२१॥। 


चित्ररेखा तमाज्ञाय पोत्रं कृष्णस योगिनी । 








ययो विहायसा रजन्‌ द्वारकां कृष्णपारिताम्‌ ॥२२॥ 








तत्र सुप्र खपयङ्के प्रादयभ्नि योगमाखिता । 
















गृहीत्वा शोणितपुरं सख्ये ्रियमदशयत्‌ ॥२३॥ 











भौ * ) शक 
अ सर र्ट २२. द ९६--~ 


। । | 
= रर. श्रीमद्भागवत | अ० ६द्‌ 
| ध ~~~] 
प्राध्यवासःसग्गन्धधूपदीपासनादिभिः । ऊषाका प्रेम दिन दूना रात चौगुना अढता जा रहा 
था । वह बहुमूल्य वख, पुष्पके हार, इत-फुटेक, धूप- 
~ दीप, आसन आदि सामग्रियोसे, सखमधुर पेय ८ पीनेयोग्य 
| ध. पानभाजनभक्ष्यश्र वाक्यः शशरषंयाचितः ॥२५५॥। पदाथ-दृ्, रारवत आदि ), भोञ्य ८ चाकर खाने- 
क, योग्य ) ओर मद्य ८ निगल जानेयोम्य ) पदार्थ तथा 
मनोहर वाणी एवं सेवा-दुश्रुपासे अनिरुद्रजीका वडा 
सत्कार करती । ऊप्राने अपने व्रेमसे उनके मनको अपने 
वरामं कर ल्या | अनिरुद्रजी उस कन्याके अन्तःपुरमें 
छिपे रहकर अपने-आपको भूक गये | उन्हें इस बातका 
भी पतान चखा कि मुञ्चे यद आये कितने दिन वीत 
४ गये ॥ २५२६ ॥ 
। तात्या यदुवीरेण अज्यमानां हंतव्रताम्‌ । परीक्षित्‌ ! यदुकुमार अनिरुद्रजीके सहवाससे उपाका 
| कु्ओरपन नष्ट हो चुका था । उसके शरीरपर से चिह 
हेत॒भिलंक्षयांचक्रराप्रीतां दुरवच्छदे; ।॥। २७] ¦ प्रकट दो गये, जो स्पष्ट इस वातकी सूचना दे रहे ये 
ओर जिन्हें किसी प्रकार दिपाया नहीं जा सकता था | 
| ऊप्रा बहत प्रसन्न भी रहने ट्गी । पहरेदारने समञ्च 
किया कि इसका किंसी-न-किंसी पुस्पसे सम्बन्ध अवदय 
हो गया है । उन्होने जाकर बाणासुरसे निवेदन किया-- 
विचेष्टितं रक्षयामः कन्याया; इख्द्षणम्‌ ॥॥२८।॥ रजन्‌ ! हमलोग आपकी अवरिवाहिता राजक्रुमारीका 
जंसा रग-ठ्ग देख रहे हैँ, वह आपके कुट्पर वद्र 
नपायिभिरसाभिर्गुायाश्च गहे प्रभो | ल्गानेवाखा है ॥ २७-२८ ॥ प्रभो ! इसमे संदेह नही 
किं हमलोग विना क्रम ट्टे, रात-दिन महट्का पहरा 
।. देते रहते है । आपकी कन्याको बाहरकर मनुष्य देख भी 
कन्याया दूषण पुम्भदुष्प्रक्षाया न विद्महे ॥२९॥ नहीं सकते | फिर भी वह कलङ्कित कंसे हो गयी ! 
ङ । इसका कारण हमारी समञ्च नहीं आ रहा हैः ॥ २९॥ 





षं ॥ ज क्क ११५११. 
जाकी , ५ #- ह 0, न वि 1 ४ 
; 
|; 





~य 


गूढः कन्यापुरे शत्‌ प्रद्धस्नेहया तया 





४.८. नाहगणान्‌ स बुबुधे ऊषयापहतेन्द्रियः ॥२६॥ । 


भटा आवेदयांचक्र्‌ राजंस्ते दुहितर्वयम्‌ । 


= ^ नी 
१ भ +) 10, 
[मि चकु उरि र ग, * "4, को है -* 














#। 


र 1 


॥ कषक क #; ` ॐ. क 
= 94 
अध~ | 

न #ै 
क, 
17. 


[ति ्रन्यथितों बाणो दुहितुः श्वुतद्षणः ` ' परीक्षित्‌ । पहरेदारोसे यह समाचार जानकर किं 
। कन्यका चस्ति दूषित हो गया है, बाणाघुरके हृदयम 
` ~ कन्यकागारं ्राप्रोऽद्रा्षीद्‌ यदद्रहम्‌ ।॥३०॥ बडी पीडा इई । वह श्षटपट ऊषाके महत्वम जा धमका 
| ओर देखा किं अनिरुद्रजी वहोँ बैठे हए हैँ ॥ २० ॥ 
3 स = ; प्रिय. परीक्षित्‌ । अनिरुद्धजी खयं कामावतार प्रदुप्नजीके 
[वि 0 ८ अवनर्द्‌ ` पुत्र थे । त्रिभुवनमे उनके जैसा खन्दर ओर कोई न 
~ था । सोँवरा-सकोना शरीर ओर उसपर पीताम्बर फहराता 

श्याम पिशाङ्गाम्बरमम्बुजेक्षणम्‌ | हआ, कमक्दकके समान बड़ी-बड़ी | कोमल अखि, 


च पषणाचतः । २. वपाम्‌ 
- +) = 


भ सरक १. 
ह ९) । 
८॥ शै क 
8 


॥ 41 ग 
4 4. १1 ॥ 









; ट 





» ङ # ४, १ वत । = 
[ # न 0१ 
ग ~ नः. 
ती 4 +न ई +न्‌ 
ॐ ४ की > 


५७० सकय ककि 9 ७2 + र 0 [ 11 अ 
$ 


बृहद्धज ङण्डलङ्कन्तरत्िपा 


सितावलोकेन च मण्डिताननम्‌।\२१॥ 


दीव्यन्तमक्षैः प्रिययाभिं नम्या 


तदङ्गसङ्गसतनकुङ्कमघजम्‌ 


बाहयोर्दधानं मधुमर्लिकाथितां 


तस्याग्र आसीनमवेक््य पिसितः। २२ 


सतं भ्रविष्टं वरतमाततायिभि 


भरेरनीकेखलोक्य माधवः । 


उद्यम्य मोवं परिषं व्यवसितो 


यथान्तको दण्डधरो जिघांसया) ३३1 


जिघक्षया तान्‌ परितः प्रसर्पतः 


शुनो यथा छकरयुथपोऽहनत्‌ । 


ते हन्यमाना भवनाद्‌ बिनिगता 


निभिनन्रभोरुजाः प्रदुद्रुवुः ।॥३७॥ 


तं नागपाेबलिनन्दनो बी 


न्तं स्वसेन्यं कुपितो बबन्ध ह । 


उपा भ्रं सोकविपादविह्ला 


वद्धं निम्यश्रकरक्ष्यरोदिषीत्‌॥। २३५५ ओंसूकी धारा वहने व्गी, वह रोने व्मगी ॥ ३५ ॥ 
---सटयऽ-+-- 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरा्धे- 
ऽनिरुद्धवन्धो नाम द्विषष्टितमोऽव्यायः ॥ ६२ ॥ 


अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः 


भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ वाणासुरका युद्ध 
श्रीञ्ुक उवाच 







। 











ठवी-ट्वी भुजा, कोपर धरँधराटी अच्क ओर 
वुण्डलकी ज्खिठमिलाती दई अ्थोति, हो्ठोप्र मन्द्-मन्द 
मुस्कान ओर प्रेममरी चितवनसे मुखकी रोमा अनृूटीं 
टोरी थी ॥ ३१ ॥ अनिरुद्रजी उस समय अपनी 
सवर ओरसे सज-धजकर्‌ बेटी इई ग्रियतमा ऊपाके साथ 
पासे चेर रहे थे । उनके गयम वसती वेचक वहत 
ए॒न्दर पुष्पका हार सुशोभित होरा शा ओर उस 
हारम ऊपावे अङ्गका सम्पकं होनेसे उसके वक्षःस्थच्कीं 
कैदार च्गी इई शी | उन्हें उप्रके सामने दही वेड 
देखकर वाणासुर विस्मित--चकित ही गया ॥ ३२ ॥ 
जव अनिरुद्रजीने देखा कि वाणासुर्‌ बहुत-से आक्रमण- 
कारी राख्राखसे सुसज्जित वीर -सेनिकोके साथ मह्मं 
घुस आया है, तव वे उन्दँं धराशायी कर देनेकरे च्वि 
लोहेका एक भयंकर परि केकर उट गये, मानो स्यं _ 
कालदण्ड छ्कर मृत्यु (यम) ख्डाहो ॥३३॥ 
वाणादुरके साथ आये इए सैनिक उनको पकडनेके ष्य 
ज्यो -व्यों उनकी ओर ञ्ञपटते, व्यो-त्यो वे उन्हें मार-मारकर 
गिरते जते--टीक वैसे दी, जसे सृअरेके दव्का ` 
नायक कुत्तोको ' मार ,डाठे ! अनिरुद्रजीकी चोरसे उन 
सैनिकोके सिर, सुजा, नघा आदि अङ्ग दूट-शट गये 
ओर वे महसे निकर मागे ॥ ३४ | जव वरीं 
बाणासुर देखा कि यह तो मेरी सारी सेनाका सहार ` 
कर्‌ रहा है, तव वह क्रोधसे तिक्मिल् उठा ओर उसने 
नागपारासे उने बौध च्या | ऊषाने जव सुना कि 
उसके प्रियतमको बोधि चया गया है; तब वह अत्यन्त 
शोक ओर विषादसे विहृ हो गयी; उसके नेत्रोे 















नि 


न्क, 


[त ` 1 


न 
+ +¬ निः 


~ पि । नम कनक) = 





न, = 


"क "कक = चः 
^ क 
नि 





| ¢  अवह्मादयः खराधीशा सनयः सिद्धचारणाः.। 
॥ गन्धर्वाप्सरसो यक्षा विभनिद्ष्टुमागमन्‌ ॥ ९। 
॥  शङ्करालचराञ्छोरिभुंतप्रमथगुद्यकान्‌ । 


„ श्रतमात्रपिशाचांश कृष्माण्डान्‌ ्हमराक्षसान्‌ । 
। द्रावयामास तीक्ष्णाग्रः चरेः शोङ्धयर्च्य॒ते; ।॥११॥ 


क, 
वनद 


प्रत्यस्त्रः रामयामान्न शओाङ्गपाणिरविसितः ॥१२॥ 
ब्रह्माञ्चख च त्रह्मस्त्रं बायव्यख च पावतम्‌। 


` भर श्रीमद्भागवत [ अ०{६३ 


नी रिग नी 2 2 1 


` चः यः ` क = जः ` आ चः धः जः त [य 





नः चः द, प भः त पः योः ति पि कः कः कः” जः = जकः भक 


चत्वारो वापिका मासा व्यतीयुरचुशोचताम्‌ ॥ १ ॥ | चला । उनके घरक खोग, इस घटनासे बहत ही शोकाक्कुख 
हो रहे थे ॥ १ ॥ एक दिन नारद जीने आकर अनिरुद्रका 


¢ ¢ 
^ बात बद्धस्य कम॑ च) शोणितपुर जाना, वँ बाणासुरकरे सैनिकोको हराना 
ययुः शोणितपुरं इष्णयः इृष्णदेवता; ।॥ २) | ओर फिर नागपाामे वधा जाना यह सारा समाचार 
्र्यस्नो युयुधानश्च गदः साम्बोऽथ सारणः । छुनाया | तव श्रीकृष्णको दी अपना आराव्यदेव माननेवाले 
यदुवरि्योने शोणितपुरपर चढ़ाई कर दी ॥ २ ॥ 


् ष्णासर्व (<- + ४ स ६ ४ = 
अक्षोहिणीभिद्रादशभि ¦ समेताः सवताददङम्‌ । सभी यदुवंशी प्रुत, सात्यकि, गद, साम्ब, सारण, नन्द; 
‡ उपनन्द ओर भद्र आदिने वारह अक्षौहिणी सेनके सा 
रुस्धुबाणनगरं समन्तात्‌ सात्वतपभाः 1 ४ ॥ | ५ अ ना, १ सावी 
< & व्यूह वनाकर्‌ चारो ओरसे वाणासुरकी राजघ्रानीको घेर 
भज्यमालपुराद्यनप्र्छराडइल्गापुरम्‌ । य्या ॥ ३-४ ॥ जव वाणाघुरने देखा कि यदुवंि्की 
रक्षमाणो रुपाविषटस्तुल्यसेन्योंऽभिनियंयो । ५ ॥ 




























सेना नगरे उदान, प्रको, बुजा ओर रसिदरातैको 
तोड-फोड़ री है, तव उसे वडा क्रोध आया ओर वह 
भी वरह अक्षौहिणी सेना येकर्‌ नगरसे निकट प्रडा ॥५॥ 
वाणुरकी ओरसे साश्नात्‌ मगवान्‌ शंकर वपर ज नन्दप्र 
सवार होकर अपने पुत्र कार्तिकेय ओर ग्ेके साथ रण- 
भूमिम पधारे ओर उन्होने मगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा वटरामजीसे 
युद्ध किया ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ ! वह युद्ध इतना अद्धत 


१ ३ भर, ण्ट, 0) ॥ 
बरणाथं भगवान्‌ स्द्रः ससतः प्रमथव्ृतः। 
आरुद्य नन्दिवपभं युयुधे रामटृष्णयोः 1.६ ॥ 
॥ ओ । क (“ णं 
आत्‌ यतय युद्धमद्धुतं रोमहषणम्‌ । 
कृष्णञङ्करयो राजन्‌ प्रद्युश्नगुहयोरपिः 1 ७ ॥। 
जाते थे | भगवान्‌ श्रीकृष्णसे शंकरजीका ओर प्रद्युप्तसे 
सामिकतिकका युद्ध हआ ॥ ७ ॥ वटरामजीसे कुम्भाण्ड 
ओर कूपकर्णका युद्ध इआ । वाणाघुरके पुत्रके साथ 
साम्ब ओर खयं वाणासुरके पाथ साव्यकि भिड़ गये ॥८॥ 
ब्रह्मा आदि वड़-वडे देवता, ऋषि-सुनि, सिद्ध-चारण, 
गन्धव-अप्सराएं ओर यश्च विमानोपर चद-चछवर युद्ध 
देखनेके च्रे आ प्च. ॥ ९ ॥ भगवान्‌ श्रङघष्णने 
अपने शा््खधनुषके तीखी नोकवाठे वाणोसे शंकरजीके 
अनुचरो- भूत, प्रेत, प्रमथ, गुद्यकः, डाकिनी, यातुधान; 


ङम्भाण्डक्ूपकणाभ्यां वरेन सह संयुगः । 


साम्ब बाणपुत्रेण बाणेन सह सात्यकेः ।॥८ ॥ 


डाकिनीयातधानांश वेतालान्‌ सविनाथकान्‌॥।१०॥ 


ओर ब्रह्मरा्षसोको मार-मारकर खदेड़ दिथा ॥ १०-११॥ 
पिनाकपाणि शंकरजीने भगवान्‌ श्रीकृष्णपर भांति-मतिके 
अगणित अख्र-शखरोका प्रयोग किया, परंतु मगवान्‌ श्रीकरष्णने 
बिना.किंसी प्रकारके विस्मयके उन्दः विरोधी राख्राखसे 
शान्त.कर दिया ॥ १२ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णे ब्र्माञ्चकी 
शान्तिके च्वि ब्रह्मा्लका, वायन्याखके व्ये पार्वताख्रका 


पथग्विधानि प्रायुङ्क पिनाक्यश्राणि शाद्खिणे। 


१* सपुत्रः । २. भूतमाद्र ° । ३. शाः शाङ्गयुतर्धम्‌ 1 


ओर घमासान इआ कि उसे देखकर रँगटे खड हो. 


वेतार, विनायक, प्रेतगण, मातगण, पिंदाच, कूरष्ाण्ड 


अ० ६३ 1 


दशाम स्कन्धं २ 






~ 





१ [द ¢. = + 
आग्नेयस्य च पाजन्यं नंज पारापतस्य च ॥१२॥ 
मोहयित्वा तु गिरिशे जम्भगाखेण जुम्भितम्‌ । 
वाणस्य प्रतनां चलोरिजिघानासिगदेषुभिः ।१४॥ 


स्कन्दः प्र्ुस्नवागोवेरयमानः समन्ततः । 


असृग्‌ विगुश्चन्‌ गात्रे स्यः शि खनपक्रमद्‌ रणात्‌ १५ 


भी 


कुस्भाण्डः कूपकर्ग् पेततग्र॑ंसार्दिती 


ु्ुबुस्तदनीकानि इतनाथानि सवतः ॥\१६॥ 


एसी 


विच्ीर्यमागं स्ववं दृषा ्नोऽत्यमर्वणः 
दरष्ममभ्थ द्रवत्‌ संख्ये रथी दित्येव सात्यकिम्‌) १७॥ 
धनृष्यक्रष्य युगपद्‌ वाणः पश्चश्यतानि बे । 

एेकस्मिज्छरो ढौ ढौ संदधे रणदुमेदः ॥१८॥ 


8 क ५५ 


तानि चिच्छेद भग्रान्‌ धनूपि युगपद्ररिः 


मीक 


सारथिं रथमा हत्वा शाद्धमपूरयत्‌ ॥१९॥ 
तन्माता कोटस नम नग्ना सुक्तशषिरोरुदा । 
पुरोऽवतस्थे ष्णस्य पूत्रप्राणरिरश्षया २०] 


~ ततस्तियङ्णुखो नग्नामनिरीक्षन्‌ गदाग्रजः । 









ॐ 
न्व १ के 
भृत्गणे ज्वरस्तु त्रिशिराश्िपात्‌ 


~ गीष 
। 1 


कः 
ॐ 





बाणश्च तावद्‌ विरथश्छिन्नधन्वाविशत्‌ पुरम्‌।२१॥ 


एकी कि 


रिः शयुं । २. च्छतानि पञ्च सन्दधे । ३, तत्र वि° 



























आग्नेयाख्के -ल्यि प्जन्याञ्चका ओर पाड्पताक्के चि 
नारायणाख्रका प्रयोग किया | १३ ॥ इसके वाद्‌ भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने जम्भणाल्लसे ८ जिससे मनुष्यको जमाई-पर- 
जमाई आने क्गती है ) महाद्वजीको मोहित कर दिया । 
वे युद्धसे विरत होकर जमाई लेने खगे, तव भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण शंकरजीसे दुधी पाकर तच्छार, गदा ओर 
वाणोसे वाणासुरकी सेनाका संहार करने खगे ॥१४॥ 
इधर प्रदुम्नने बार्णोकी वोछारसे खामिकार्तिकको धाय 
कर दिया) उनके अङ्ग-अङ्गसे रक्तकी धारा वहं चटी, ` 
वे रणभूमि छोडकर अपने बाहन मयूट्रारा भाग 
निकले ॥ १५ ॥ वटरामजीने अपने मूसव्की चोटसे 
कुम्भाण्ड ओर कूपकणंको धाय कर दिया, बे रणभूमिं 
पडे । इस प्रकार अपने सेनापतियोको हताहत 
देखकर वाणासुस्की सारी सेना तितसत्रितर हो गयी ॥१६॥ 
जव रथपर सवार वबाणासुरने देखा किं श्रीङ्ब्ण ` 
आदिक प्रहारसे हमारी सेना तितर-बितर ओर तहस- 
नहस हो रदी दहै, तव उसे वडा क्रोध आया | उसने 
चिढकर सात्यकिको छोड़ दिया ओर वह भगवान्‌ 
श्ीकृष्णपर आक्रमण करनेके व्ि दौड़ पड़ा 1 १७॥ ` 
परीक्षित्‌ ! रणोन्मत्त बाणासुरमे अपने एक हजार हासे ` 
एक साथ ही पच सौ धनुष खींचकर एक-एकपर दो- 
दो वाण चदाये ॥ १८ ॥ परंतु मगवान्‌ श्रङ्ष्णने , 
एक साथ ही उसके सारे धनुष काट डले ओर सारथी, 
रथ तथा घोडोको भी धराशायी कर दिया एवं शङ्ख- 
ध्वनि की ॥ १९. ॥ कोटरा नामकी एक देवी बाणासुर 
धर्ममाता थी, वह अपने उपासक पुत्रके प्रा्णोकी रक्षाव 
व्यि वाक विखेरकर नंग-धडंग भगवान्‌ श्रीकृष्णके सापने ` 
आकर घड़ी हो गयी ॥ २० ॥ भगवान्‌ श्रीडृष्णने 
सव्ये कि कहीं उसपर दष्ट न पड़ जाय, अपना 
फेर च्या ओर वे दूसरी ओर देखने कगे 
बाणासुर धनुष कट जाने ओर रथहीन हो 
अपने नगरमे चखा गया ॥ २१1 


¢ 


९ -। 


4 ५७ 


द्र » = 








। इधर जव भगवान्‌ शंकरके ूतगग इष भाग गये 
तब उनका छोड़ा इआ तीन सिर ओर तीन पैखाल्य ज्वर्‌ 


कः १.4 > ~ प : |> 


५२ स 


५५ {1 =-= 


अथ नारायणो देवस्तं रष्रा व्यस्यूजज्ज्वरम्‌ । 
माहेश्वरो 
माहेखरः 


अङ्न्ध्वाभयमन्यत्र भीतो माहेश्वरो ज्वरः । 


वेष्णवश्च युयुधाते ज्वरावुभो ॥२३॥। 


समाक्रन्दच्‌ वेष्णवेन बलार्दितः । 





। शरणाथ हषीकेशं तष्टा प्रयताञ्जलिः ॥२४॥ 
ज्वर्‌ उवाच 

नमामि त्वानन्तराक्िं परेशं 

सात्मानं केव॑लं ज्ञपिमात्रम्‌ । 
विश्वोत्पत्तिखानसंरोधहेतं 

यत्तद्‌ ब्रह्म ब्रह्मलिङ्खं प्रशान्तम्‌ । २५५ 
कालो देवं कम जीवः खभावो 

द्रव्यं कषतर प्राण आत्मा विकारः। 
तत्सङ्गातो बीजरोदप्रवाद- 

स्त्वन्मायेषा तन्निषेध प्रप ॥२६॥। 
नानाभावंरींरयेवोपयन्ने- 

देवान्‌ साधूल्लोकसेतून्‌ बिभि । 
हंस्य॒न्मार्गान्‌ दिसया बवतंमानान्‌ 

जन्मेतत्ते भारहाराय भूमेः ॥२७॥ 


तप्तोऽहं ते तेजसा दुरपदेन 
चान्तोग्रणात्युल्बणेन ज्वरेण । 
तावत्तापां देहिनां तेऽङ्प्रिमलं 
नां सेवेरन्‌ यवदाञ्ाजुबद्धाः ॥२८॥ 


# १ १,९३ सान ह + # ५4 ॥ 















1 ` श्रीयगकानुमाच 





दाव । २. बन्धाः; | ३. 


, (^+ ५ 8 का ॐ क 


श्रीमद्भागवतं 


शिरस्ते भ्रसन्नोऽसि व्येतु ते मञ्ज्वराद्‌ भयम्‌ । | प्रसन द्व । अव तम भर 


॥ अ० ६३ 








अभ्यधावत दाशाहं दहन्निव दिशो दश्च ॥२२॥ | दों दिशा्ओंको जलता दआ-सा भगवान्‌ श्रृष्णकी 


ओर दौड़ा ॥ २२॥ मगवान्‌ श्रीक्रष्णने उसे अपनी 
ओर अते देखकर . उसका मुकवा करनेके च्थिि 
अपना ज्वर छोड़ा । अव वैष्णव्र ओर मद्ेश्वर दोनों 
"तर्‌ आपतसतम च्डन टग्‌ || २३ ॥ अन्तम वष्णत्र ज्वर्कं 
तेजसे मष्ेश्वर अवर पीडित होकर चिल्छाने ठ्गा ओर 
अत्यन्त भयभीत हो गया | जव उसे अन्यत्र कहीं त्राण 
न मिला, तवर वह अत्यन्त नप्रतासे हाध जोड़कर 
शरणमे लेनेके लिये भगवान्‌ श्रीकरष्णसे प्रार्थना करने 
क्गा॥ २४ ॥ 
ज्वरने कहा- ग्रमो | आपकी राक्ति अनन्त है | 
आप ब्रह्मादि ईश्वरोके भी परम महेश्र हैँ । आप सते 
आत्मा ओर सर्वखरूप है । आप अद्धितीय आर केव्रक 
ज्ञानखरूप है । संसारकी उत्पत्ति, स्थिति ओर संदारके 
कारण आप ही हैँ | श्रुतियोके द्वारा अप्रका दी वर्णन 
ओर अनुमान किया जाता है | आप समस्त विकारेसे 
रहित खयं ब्रह्म हं । मे आपको प्रणाम करता ट्र ॥ २५] 
कच्छ द्व ( अदृष्ट); कम, जीर) सखमाव्र, सूत्मभूत, 
दारीर, सूत्रात्मा प्राण, अहंकार, एकादश उन्दियां ओर 
पच्चमूत-ईइन सवका संघात लिङ्गरारीर ओर वीजा ङ्करन्याय- 
के अनुसार उससे कर्म ओर कर्मसे फिर लि्गदारीरकी 
उत्पत्ति-- यह सव आपकी माया है | अप्‌ मायाके 
निषेधकी परम अवधि हैँ | मे आपकी दारण ग्रहण करता 
द्रं ॥ २६ ॥ प्रभो | आप अपनी ठीखसे दी अनेकों 
खूप धारण कर ठेते हँ ओर दधता, साधु तथा व्यक 
मर्यादाओंका पाक्न-पोपण करते है । साध ही उन्मागं- 
गामी ओर हिंसक असुरोका संहार भी करते हैँ । आपका 
यह अवतार प्रध्वीका भार उतारनेके च्वि ह्वी हआ 
है ॥ २७ ॥ प्रभो | आपके शन्त, उग्र ओर अच्यन्त 
मयानक दुस्सह तेज उ्वरसे म अत्यन्त सन्तप्त हो रहा 
ह्र | भगवन्‌ | देहधारी जीवको तभीतक तप-सन्ताप 
रहता है, जवतक वे आदाके फदोमे फंसे रहनेके कारण 
आपके चरणकमलकी शरण नहीं ग्रहण करत ॥ २८ ॥ 
भगवान्‌ श्रीरृष्णने कहा-“त्रिरिरा । मे तमप्‌ 
उ््ररसे निभय हो जाओ । 





ग ५ थ क 
4 ५ ह । 3 





= जा ज जोकि कः च > न 


ह कि „५, 


अ० ६३ | 


[षयि मीर कि खेम 
„~~ ------~--~-----~--~-----~----~--~--~------~--~-~-~--~-~-----------------------------~-~~-~-~--~---~-~--~-----~---~---~---~-~--~-~-~--~-~-~-~ जा ज ज जे 








इत्युक्तोऽच्युतमानम्य गतो माहेश्वरो ज्वरः। 
बाणस्तु रथमारूढः प्रागा्योरखज्जनादंनम्‌ ॥३०॥। 
नानायुधधरोऽसुरः । 


ततो बाहुसहस्चेण 


मुमोच परमक्रद्रो वाणांशक्रायुधे सृप ।२१॥ | चक्रपाणि भगवानूपर वा्णोकी वर्षा करने च्णा | ३१ ॥ 


तस्यास्तोऽखाण्यसकृच्चक्रेण क्रनेमिना । 


चिच्छेद भगवान्‌ वाहम्‌ शाखा इव वनस्पते; ।॥॥३२॥  चक्रसे उसकी भुजां काटने लगे, मानो कोई किंसी 


वाहुपुच्छिदयमनेषु बाणसख भगवान्‌ भवः। 
भक्तायुकम्प्युपत्रञ्य चक्रायुधमभाषत्‌ ।२२॥। 
श्रीरुद्र उवाच 


त्वं हि ब्रह्म परं ज्योतिगूटं ब्रह्मणि बाञ्ये । 


यं पर्यन्त्यमरात्मान आकाशमिव केवलम्‌ ।३४॥ | व्यापक ओर निर्विकार ८ निरे ) खरूपका साक्षात्कारं 


नाभिनेभोऽम्निर्ुखमम्बु रेतो 
द्योः शीपंमाश्ा श्र॒तिरङ्पिख्वीं । 
चन्द्रो मनो यस टगकं आत्मा 
अहं सथ॒ुद्रो जठरं 
रोमाणि यस्योपधयोऽम्बुवाहाः 
केशा, विरिश्वो धिषणा विसगेः। 
प्रनापतिहेदयं यख धमः 
म वे भवान्‌ पुरुषो रोककर्पः \३६॥ 
तवावतारोऽयमङ्कण्टधामन्‌ 


धमेख ाप्त्यै जगतो भवाय 1 
वयं च स्वे भव्रतानभाविता 
विभावयामो वनानि सप ।२७॥ 


=: तमेक ` आद्यः - पुरुषोऽद्वितीय- 


खटग्धेतुरदैतरीसः 





व मिनिम कि 


यो नौ सरति संवादं तख त्वन्न भवेद्‌ भयम्‌ २९) | संसारम जो कोई हम दोनकि संवादका स्मरण करेगा; 


यजेन्द्रः ॥२५॥ | सुजा 1 ३५ ॥ धान्यादि ओषध्य रोम है, मेष केरा हैँ 


































उसे तुमसे कोई भय न रहेगा?२९॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
इस प्रकार कहनेपर महेश्वर ज्वर उन्हं प्रणाम करके 
चचा गया । तवतक बाणासुर रथपर सवार्‌ होकर्‌ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके च्वि फिर आ पर्चा ॥२०॥ 
परीक्षित्‌ । वाणासुरने अपने हजार हाथमे तरह-तरहके 
हथियार ठे रके थे | अव वह अत्यन्त क्रोधं भरकर 


जव भगवान्‌ श्रीकृष्णने देखा किं वाणाघुरने तो वार्णकी 
खडील्गादीदहै, तत्र वे दछुरेके समान तीखी धारा 


बृक्षकी छोटी-छोटी उाग्ियँं काट रहा हो ॥ २२॥ 
जत्र भक्तवत्सल भगवान्‌ राकरने देखा कि वाणासुरकी 
भुजा कट री है, तव वे चक्रधारी मगान्‌ श्रीकृष्णके 
पास आये ओर स्तुति करने ठ्गे ॥ ३२ ॥ 

भगवान्‌ राकरने कहा- प्रभो ¡ आप वेदमन्त्रमे 
तात्पयंरूपसे चिपे इए परम्योतिःखरूप पखहय ई । 
डृद्रहदय महत्मागण आपके आकाडके समान स्वै 


करते है | ३४ | आकादा आपकी नामि है, अग्नि 
सुख है ओर जक वीर्य । खर्म सिर, दिशार्प कान ओर 
पृथ्यी चरण है । चन्द्रमा मन, सूर्य नेत्र ओर मे रिव 
आपका अहङ्कार हँ । समुद्र आपका पेट है ओर इन्द्र 


ओर व्रह्मा बुद्धि । प्रजापति चि्ग है ओर धमं हृदय । ` 
इस प्रकार समस्त लोक ओर लछोकान्तरोके साथ जिसके 
रारीरका तुकना की जाती है, वे परमपुरुष अप हीं 
है ॥ ३६ ॥ अलण्ड ज्योतिः खूप परमात्मन्‌ ! आपका 
यह अवतार धमकी रक्षा ओर संसारके अभ्युदय- 
अभिब्रद्धिके व्यि दरआ है । हम सव भी आपके प्रभावसे ` 
ही प्रभावान्वित होकर सातां भुवनोका पालन करते 
है ॥ ३७ | आप सजातीय, विजातीय ओर खगतमेदसे ` 
रहित है--एक ओर अद्ितीय आदिपुरुष है | मायाक्रत_ ` 
जाग्रत्‌, खप्न ओर सुषुपति-इन तीन अवसाओमे 
अनुगत ओर उनसे अतीत तुरीयत्व भी आप ही है । 
अप किसी दूसरी वस्तुके द्वारा प्रव काशित्‌ नही दत । 


न | 








५२८ 


7----1~ णण 


प्रतीयसेऽथापि यथाविकारं 
खमायया ` सवंगुणग्रसिद्धये ॥३८॥। 

४ क © पिहितद्छायया 

यथेव च्यः पिहितश्छायया खया 


छायां च रूपाणि च सश्चकास्ति | 
एवं गुणेनापिहितो गणांस्त्व- 
मात्मप्रदीपो गुणिनश्च भ्रमन्‌ ।३९॥ 


पुत्रदारगृहादिषु | 
उन्मज्ञन्ति निमजन्ति भ्रसक्ता वृजिनार्णवे ॥॥४०॥ 


यन्मायामोहितधियः 


देवदत्तमिमं रष्वा नृरोकमजितेन्द्रियः। 
थोनाप्रियेत त्वरपादो स शोच्यो द्यात्मवश्चकः ॥७१॥ 
यस्त्वां विसृजते मत्यं आत्मानं प्रियमीश्वरम्‌ ! 
विपययेन्दरियाथाथं विषमच्यमरतं त्यजन्‌ ॥४२॥ 
अहं ब्रह्माथ विबुधा सुनयश्वामलाशयाः । ` 
सवोत्मना प्रपन्नास्त्वामात्मानं ्रमीधरम्‌ ।४२॥ 
तंत्वा, जगत्थित्युदयान्तहेतं 
समं प्रान्तं सु्दात्मदेवम्‌ | 
अनन्यमेकं जगदात्मकेतं 
भृवापवगाय. भजाम, देवम्‌ ।।४४॥ 
अयं ममेष्टो दयितोऽचुवतीं 


मयाभयं दत्तमषष्य देव । 


श्रीमद्भागवत 








[ अ० ६३ 


सयं प्रकारा हँ । आप सबके कारण है परंतु आपका 
न तो कोई कारण दहै ओर न तो अपम कारणपना ही 
है । भगवन्‌ | टेसा होनेपर भी आप तीनों गणकी 
विभिन विषमताओंको प्रकाशित करनेके घ्यि अपनी 
मायासे देवता, पञ्च-पक्नी, मनुष्य आदि ररीरेके अनसार 
मिन-मिन ख्पोमें प्रतीत होते है ॥ ३२८॥ ग्रमो | 
जसे सूर्यं अपनी छाया वादस ही ठक जाता है ओर 
उन बादलों तथा विभिन रूपोको प्रकारित करता है, 
उसी प्रकार अप तो स्यप्रकाठा है परंतु गणेकरे द्वारा 
मानो ढक-से जाते है ओर समस्त ग॒णं तथा गृणा- 
भिमानी जीवोको प्रकादित करते हैँ | वास्तवे आप 
अनन्त हँ || ३९ ॥ 

भगवन्‌ | आपकी मायासे मोहित होकर छोग खी पुत्र, 
देह-गेह आदिमे आसक्त हो जाते हैँ ओर पिर दुः खक अपार 
सागरमे इवने-उतरने कगते हैँ | ४० ॥ संसारके मानवे 
को यह मनुष्य-ररीर आपने अत्यन्त कृपा करके दिया है । 
जो पुर इसे पाकर भी अपनी इन्दियोको वामे नही 
करता ओर आपके चरणकमल्रेका आश्रय नहीं छेता-- 
उनका सेवन नहीं करता, उसका जीवन अत्यन्त शोचनीय 
है ओर वह खयं अपने-आपको धोखा दे रहा है ॥ ४१॥ 
प्रमो | आप समस्त प्राणि्योके आत्मा, प्रियतम ओर 
ईश्वर है । जो मल्युका ग्रास मनुष्य आपको छोड देता 
है ओर अनातम, दुःखरूप एवं तुच्छ विप्ोमे सुख 
युद्धि करके उनके पीछे भटकता है, वह इतना मूख है 
कि अम्रृतको छोडकर व्रि पी रहा है॥ ४२ ॥ मैं 
ब्रह्मा, सारे देवता ओर विद्ध हृयवाठे ऋषि-पुनि सब 
प्रकारसे ओर सर्वात्ममावसे आपके रारणागत हैँ; क्योकि 
आप दही हमठोगोके आमा, प्रियतम ओर ईश्वर 
है || ४२ ॥ आप जगत्की उत्पत्ति, स्थिति ओर प्रकयकरे 
कारण है । आप सवम सम, परम शान्त, सवके खुदृद्‌ 
आत्मा ओर इषटदेव है । आप॒ एक अद्वितीय ओर जगत्‌के 
आधार तथा अधिष्ठान है । है प्रभो ! हम सव संसारसे 


मुक्त. ्ोनेके न्थ आपका भजन करते ह ॥ ४९ ॥ . 


देव । यह बाणासुर मेरा परमप्रिय, इपापात्र ओर सेवक 
है | भने इसे अमयदानं दिया है । प्रभो । जिस प्रकार 








की ) क, न क > । त न "नीः 


० ६३ | 









सम्पाद्यतां तद भवतः प्रसादो 


श्रीभगवानुवाच 
यदात्थ भगवंस्त्वन्नः छ्रवास प्रियं तव । 


भवतो यद्‌ व्यवसितं तन्ये खध्वुमोदितम्‌ ।४६॥ 


५५ 


अवध्योऽयं ससाप्येप बेरेचनिसुतोऽसुरः । 


1. 


दर्पोपिज्नमनायाख्य ब्रैवृक्णा बाहवो मया । 
घरदितं च वं भुरि यच्च भारोथितं शवः ॥७८। 
चत्वारोऽखय यजाः लिटा भविष्यन्त्यजरामराः। 
पार्बदश्ख्यो भवते नञ्कदधिद्धयोऽसुरः ॥४७९॥ 
इति छल्ष्वाभयं छरष्णं प्रणस्य शिरसासुरः । 
रायु रथमारोप्य सख्वच्व सश्ंरनयत्‌ ॥५०॥ 
अक्षोदिण्या परितं <बाशःखमलङ्कतम्‌ । 
मपल्ञीकं पुरस्कृत्य ययौ रद्राजुमोदितः ।॥॥५१॥ 
स्व॑राजधानीं समरङ्कता ध्वजः 
संतोरणेरुशितमागचत्वराम्‌ ॥ 


विवेश शज्ञानक्टुन्दुभिखने- 





# 


इसके परदादा द॑व्यराज प्रह्नादपर आपका कपप्रसाद्‌ 
यथा हि ते दैत्यपतौ प्रसादः ॥४५।। वैसा दी कृपप्रसाद्‌ अप इसपर भी करं ॥ ४५ ॥ 


देता 
किया था--मेने इसकी मुजार्‌ काटकर उसीका अचु- 


| दैत्यराज वचा पुत्र है 
| नहीं कर सकता; वयोकि मैने प्रहादको बर्‌ 
प्रहादाय वरो दत्तो न वध्यो मे तवान्वयः ॥७७]। | है कि भं तम्दारे वंशम पैदा होनेवाले किंसी भी दैत्यका 


थी । इस प्रकार भगवान्‌ श्रीकूष्णने अपनी ` पानम 
 पोरणुदृद्ादजातिभिः ॥५२॥। | प्रवेरा किया ॥ ५२ ॥ 
























भगवान्‌ श्रीकृष्णने कदा-भगवन्‌ | आपकी बात ` 
मानकर-- जैसा आप चाहते है, मेँ इसे निर्मय किय ` 4 
। आपने पहले इसके सम्बन्धे जंसा निश्चय 


पदन किया है ॥ ४६ ॥ मै जानता द्र कि वाणाघुर 
इसल्िय मे भी इसका वध 
दे दिया 


वध नहीं करूगाः ॥ ४७ ॥ इसका धमंड चूर करनेके 
व्यि ही मैने इसकी भुजां काट दी हैँ । इसकी बहुत 
वड़ी सेना प्रथ्वीके चि मार हो री थी, इसीष्ि 
मैने उसका संहार कर दिया है ॥ ४८ ॥ अव इसकी 
चार्‌ भुजां वच रही हँ | ये अजर, अमर बनी रहेंगी । 
यह बाणासुर आपके पषदोमें मुख्य होगा । अव इसको 
किसीसे किसी प्रकारका भय नदीं है ॥ ४९ ॥ 


# 


्ीकरष्णसे इस प्रकार अभयदान प्राप्त करके 
वाणासुरने उनके पास आकर धरतीमे माधा येका, 
प्रणाम किया ओर अनिरुद्भजीको अपनी पुत्री उपक 
साथ रथपर वेटाकर भगवान्‌के पास ठे आया ॥ "+° ॥ 
इसके वाद भगवान्‌ श्रीकृष्णने महादेवजीकी सम्मतिसे 
वखालङ्कारविभूषित ऊषा ओर अनिरुद्रजीको एक अक्षौ- 
हिणी सेनाके साथ अगे करके द्रारकाके च्वि प्रस्थान 
किया ॥ '५१ ॥ इधर द्रारकामें भगवान्‌ श्रीकृष्ण आदिके 
शयुभागमनका समाचार सुनकर अडियो ओर तोरणे 
नगरका कोना-कोना सजा दिया गया । बड़ी-बड़ी सड़कों 
ओर चौराहोंको चन्दन-मिश्रित जलसे सीच दिया गया । ` 
नगरके नागरिको, जन्धु-वान्धवों ओर ब्राह्मण म गे. 
आकर खूब धूमधामसे भगवान॒का खागत किया । उस्‌. 
समय शङ्क, नगारो ओर टोलवी ` तुमुल ध्वनि हो री 








[क 


चक्की 


| + त क क्क जक १) 


कश ` न ७२ 


च 3 1" का 


च १२ ९, 
भोति भकः 

^= विक व्यक्तानि 
वि 1 । 


(1 
जर कतकोत्यक्विः ` " ^ 
॥ १1 


+ 
निगो क नकि > 
चः क 


व 


~ = क 
( > 7 १ [त ज 


चो # ~ न्क 
---*- ~~ 


कि 7 नि म अन्कक-> = ` ~ 


कि धिः भ्य १७ 


[ _ क 





५२० श्रीमद्भागवत | अ०° ६४ 


[१ । त 11 1 ऋः ॐ हाः ओ जः जाः ¬= ` जा क => दग्न्त ट्ण 
नाक नान्यन्न (= च, "भी भ भ भका त म ॐ > कःय कः पः च भिः = = "= ऋ = > ` च 4 क । > + = चे 


परीक्षित ! जो पुरुप श्रीरांकरजीके साथ भगवान्‌ 
श्रीृष्णका युद्ध ओर उनकी वरिजयकी कथाका प्रातः- 
काल उटकर स्मरण करता है, उसकी पराजय नहीं 
संसरेत्‌ प्रातरुत्थाय न तख खात्‌ पराजयः ॥५२॥ | होती ॥ ५२ ॥ 








यै कक कि ५ ति 


य॒ एवं कृष्णविजयं शङ्रेण च संयुगप्‌ । 




















इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददापस्कन्धे उत्तरार्धै- 
ऽनिरद्धानयनं नाम त्रिषशितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥ 


----=० => ~>... 


अथ चतुःषष्ितपोऽध्यायः 


चग राजाकी कथा 





श्रीशुक उवाच | श्रीदयुकदेवजी कते है- प्रिय परीक्षित्‌ ! एक 

~ अः 5 | | दिन साम्ब, प्रदयु्न, चास्भानु ॐर्‌ गद्‌ आदि यदुवंशी 
एकदोपव जग्य्रयंटङ् ६ - प 
7 मारक | राजकुमार धुमनेके किये उपत्रनम गवे ॥ १॥ वही 


वहत ॒देरतक खे खेर्तं दए उन्हें प्यास चा अपी | 

अव वे इधर-उधर जल्की खज करनं ल्गे | वे एक 
क्रीडित्वा किर ¢ ` 61 ५ (ऋ [ क $ क ~ छ ~> 

९ खचर त॒त्र लचन्यन्तः पास्ता; | वृक पास गयः; उस्म जठ ता धा नह |, एक वड़ा 





विहतं साम्बग्रद्युञ्नचारुभादगदादयः ॥ १ 1 


जलं निरुदके करूपे ददशः सत्वमद्तम्‌ ।\ २॥ विचित्र जीव दीख पडा॥२॥ वह जीव पवतके 
समान आकारका एक गिरगिट था । उसे देखकर उनके 


9 ४ [> सत्‌ 3 § ~: ४. 
ककरसासं गिरिनिभं वीक्ष्य विसितमानसाः । आशर्यकी सीमा न दी | उनका ह्य कश्णासे भर्‌ 

च, च ( अ ये तर त्व त. त निकारनेकः प्रयः > 7 
तख चोद्धरणे यतनं चक्कस्ते कृपयान्विताः ।। ३॥ | अया ओर वे उसे बाहर्‌ निकालनेका प्रयन करन 
ख्गे॥ २॥ परत जव वे राजकुमार उस गिरं इए 
गिरगिर्को चमड ओर सृतकी रस्सियोसे त॑ चकर बाहर 


१ मी 


चमजेस्तान्तवेः पाोर्वद्ध्वा परतितमभकाः 


- वः मय ब्रत्तान्त मगवरान्‌ श्राद्रप्णक पसि जकर नित्रदन 
90 ता भमवान्‌ क्वनत्तनः किंथा | ¢ | जगत्‌ जीवनदाता कमटनथन भगवान्‌ 


बरीक्ष्योजहारं वामेन तं करेण स॒ रीरया ॥ ५ ॥ | श्हृष्ण उस कूपर आय । उस दलकर उन्ट।न वाय 
ह[थसे खेल-खेकम--अनायास दी उसको बाहर निकाट 


ए णौ 


तु उत्तमरलोककराभिग्रट व्या ॥ ५ ॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णके करकभलोका स्पा 
विहाय सथः इकरासरूपम्‌ । होते ही उसका गिरगिट्प जाता रा ओर वह एक 

वि रणं : खर्गीय देवताके खूपमे परिणत हो गया । अव उसके 
त भा रारीरका रग तपाये हए सोनेके समान चमक रहा था | 


खग्यद्धतालंकर्णीम्बरस्तक॒ ॥ ६ ॥ | ओर उसके शरीरपर अद्भत वख, आमूषण ओर पुष्पो 


च ग कक) क भकः ककः @ क 





[व नि दि क ता ` 1 1 चकः [वि त त 2. ०, जणे 5 › 7) ज कमि तः क कनक क ग्वे 





`" अ न्धे बाणासुरसग्रामे ऊष्णविजयः । २. वादरायणिरुवाच । ३. चेतसः । ४. तं बद्ध्वा तान्तवेः पाडः पतितं च 
तमर्भक्राः । ५. तत्र गत्वारवि ० | ६. णोपपन्नः 


त्र ~ -- 





प्रच्छ वबिहनपि तन्निदानं 
जनेषु विश्यापथितुं मुन्दः । 
कस्त्वं अह्ाभाग वरेण्यरूपो 


देवोत्तमं त्वां गणयामि नूनम्‌ 1 ७ ॥ 
ददामिमां बः कतमेन कर्णा 


सश्प्रापितोऽस्यत्तदहः खभद्र । 
आहत्मानमाख्याहि विवित्सता नो 


यन्पन्यसे नः क्ष॒ममत्र यक्तम्‌ ॥ 
श्र उवाच 
इति खं राजा सथ्पठः कष्णेनानन्तसतिना | 


माधवं प्रणिपत्याह दिरीटेनास्वचंसा ।॥ ९॥ 
नृगा उवाच 
नृगो नाम नरेन्द्रोऽदहंमिक्ष्वाङ्गतनयः प्रभो । 
दानिष्वाख्यायमानेषु यदि ते क्णसस्परलम्‌ ।१०॥ 
रकि नु तेऽविदितं नाथ सवंभृतात्ससाकषिमः। 
काठलनाव्याहतच्छा चस्येऽथापि तवाज्ञय! ।॥११॥ 
यावत्यः सकते भ्रयेयाबत्यो दिति तारकाः । 
यावत्यो ववधाराश्च तावतीरददां ख गा; ।॥१२॥ 
पयस्विनीस्तरुणीः शीखसूप- 
गुणोपपन्नाः कपिला देमगृङ्गीः । 
न्यायाजता रूप्यघुराः सवत्सा 
दुक्रकमालभ्रणा ददावहम्‌ ।१३। 
स्वछक्रतेभ्यो गुणशीरुवद्भ्यः 
ग्रीदत्करटुस्बेभ्य ऋतत्रतेभ्यः । 
तपःश्रतन्रह्मवदान्यसद्भ्भ! 


षि वभि र 


द्रम स्कन्ध 


१५२१ 
हरि रोमा परार्हे ये ॥ ६ ॥ यद्यपि भगवान्‌ श्रीठ्रष्ण 
जानते थे किं इस दिव्य पुरूषको गिरगिट-योनि क्यो 
पिटी शी, पिरि भी व्ह कारण सवंसाधारणको पाद्म 
हो जाय, उसव्थियि उन्डोने उस दिव्य पुरुषस पृञ्-- 
महाभाग ! तुम्हारा ख्प.तो बहत ही युन्धर है । तुम 
हो कौन १ मतो एेसा समद्यतादरकि तुम अव्रश्य ही 
कोई श्र देवता हो ॥ ७ ॥ कल्याणमूर्ते ! किसर कमक 
फसे तुम्हं इस योनिम आना पडा था १ वास्तव्रमं तुम 
इसके योग्य नहीं हो । हमटोग तुम्हारा वृत्तान्त जानना 
चाहते हें | यद्वि तुभ हम्मगोको बह वतदाना उचित 
समञ्चो तो अपना परिचय अव्य्यदोः॥ ८ ॥ 

श्रीद्युकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! जव अनन्त- 
मूतिं भगवान्‌ श्रीकृष्णने राजा चृगसे [ क्योकि वे ही 
इस ख्पमे प्रकट इए थे ] इस प्रकार पूछा, तत्र उन्डोने 
अपना सूयके समान जाञ्वल्यमान लयुकाकर 
भगवान्‌को प्रणाम किया ओर वे इस प्रकार कहने 
र्ग | ९ ॥ 

राजा चृगने कदा- ग्रमो ! मे महाराज इक्ष्वकुका 
पुत्ररजानरग द| जव कभी किस्षीने आपके सामने 
दानियोकी गिनती की होगी, त उसमे मेरा नाम भी 
अवद्य ही आपके कानोमें पडा होगा ॥ १० ॥ प्रभो ! 
आप॒ समस्त प्राणियोकी एक-एक बृरत्तिके साक्षी है । 
मूत ओर भव्रिष्यक। व्यवधान भी आपके अखण्ड ज्ञानमें 
किसी प्रकारकी वाधा नहीं डाक सकता । अतः अपसे 
छिपादहीक्याहै!? रि भी म आपकी आज्ञाका पालन 
करनेके ल्य कहता द्र | ११ ॥ भगवन्‌ ! प्रथ्वीमे 
जितने धूल्किण हैँ, आकादामे जितने तारे हैँ ओर वषमे 
जितनी जक्की धारां गिरती है मैने उतनी दी गए 
दान की थीं | १२॥ बे सभी गों दध्रार, नौजवान, 
सीधी, सुन्दर, सुलक्षणा ओर कपित्य थीं । उन्हें वने 
न्यायकरे धनसे प्रपत किया था | सवके साथ बछ्डं थे | 
उनके सीगमिं सोना मद्‌ दिया गया धरा ओर सरोम 
चौ दी । उन्दै वख, ह।र ओर गहनसे सजा दिया जाता 
था | एसी गों तैनेदी शीं ॥ १३॥ भगवन्‌ ! मे 
युवावस्थासे सम्पन्न श्र्र त्राह्मणकुभारोको-जो सद्‌- 





प्रादां युवभ्यो द्विजपुज्गवेभ्यः।१७॥) | गुणी, सीठसम्पन कमे पड़ इट वुटुम्बवाले, दम्भरहित 





१. वाद्रायणिख्वाच । २. ऽदं मानवे वरुणात्मजः । 


ष त १ त 1 त यो श 








कन्याः सदासीस्तिलरूप्यराय्याः । 


वासांसि रत्नानि परिच्छदाच्‌ रथा- 


" ` „ ` अ ह "सा ह क क त 
"त वक सनयो "गकोनकी भणानि 
अ +र शट, दाः र~" कविं क 


[कि 


निष्टं च यज्ञेथरितं च प्तम्‌ ।१५॥ 
। । कयच्‌ द्विजएख्यस्य ष्टा गौर्मम गोधने । 


सम्णृक्ताविदुषा सा च मया दत्ता हिजातये ॥१६।। 
तां नीयमानां तत्स्वामी द्ष्रोवाच मयेति तम्‌। 
ममेति प्रतिग्रा्याह नृगो मे दत्तवानिति ।१५७॥ 


विप्रो विवदमानौ मासचतुः स्वार्थसाधकौ । 


सा 


भवान्‌ दातापहताति तच्छत्वा मेऽभवद्‌ भ्रमः ॥१८॥। 


अलुनीताबुभो विप्रो धर्मन्रच्छ्गतेन तै 





सथद्धरत मां च्छ्रात्‌ पतन्तं निरयेऽटचौ ।२०॥ 
नाहं प्रतीच्छ वै राजकचित्युक्त्वा स्वास्यपाक्रमत्‌। 


नान्यद्‌ गवामप्ययुतमिच्छामीत्यपरो ययौ | २१ 







„  एपसिनन्तरे याम्येदतेनीतो यमक्षयम्‌ । 


२ ~< (^ 
` ~ 1 


न पृष्टस्तत्राहं देवदेव जगत्पते ॥२२॥ 





८ 


र 
4 +~ 
~ 





ट 
ऋः न 
# 


द ; 
५४ # 
ए, 
^ 4 व, 
# 


न्वियं ऋ + 
ह । ~ 
| 1 र 
4. 2 ह, र 
कतं ह ष 
4 (= न्क ध 
छ) धि ~> न 
> +, » 4 2; तिक 
क ^, ~. वुः 


= ऋ- 
॥ नि 


। हेः ॥ १७॥ वे दोनों ब्राह्मण आपसमें 








श्रीमद्भागवते [ अ० ६४ 

स इ~~ . ` ` -------- = ----------------------- =--------- 
गक्नृषरण्यायतनाश्वहस्तनः तपखी, तेदपाटी, रि्प्योको विदादान करनेवाछे तथा 
सचस्ि होते --वल्राभूषणसे अलङ्कत त करता ओर उन 


गोओंका दान करता ॥ १४ ॥ इस प्रकार चैने बहत 
सी गौपए, प्र्वी, सोना, घर, धोडे, हाथी, दासियेकिं 
सहित कन्याए, तिके पर्व॑त, चोँदी, राच्या, वच्च, रत, 
गृह-सामम्री ओर रथ आदि दान किये | अनेकों यज्ञ 
किये ओर वहृत-से कुँ, वावी आदि बनवाये ॥ १५ 

एक दिन किसी अप्रतिग्रही ८ दान न ठेनेवाले ) 
तपखी त्राहमणकी एक गाय विच्छुडकर मेरी गौओमें आ 
मिली । सुन्चे इस वातका व्रिल्ुरु पता न चद । 


 इसच्िये मैने अनजानमे उसे किसी दूसरे ब्राह्मणको दान 
कर दिया ॥ १६ ॥ जव उस गायको वे ब्राह्मण छे 
। चे, तन उस गायके असटी खामीने कहा---श्यह गो 


मेरी है । दान ठे जानेवाले ब्राह्मणने कहा--भ्यह तो 
मेरी है, क्योकि राजा नृगने मञ्चे इसका दान करिया 
अगड़तं इए 
अपनी-अपनी बात कायम करनेके स्थि मेरे पास आये । 
एकने कहा-ष्यह गाय अभी-अभी आपनेसुस्ञे दी है, ओर 
दूसरेने कहा किं ध्यदि री वात है तो तुमने मेरी गाय 
चुरा छी है । भगवन्‌ | उन दोनों तराद्यणोकी वात 
सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया |॥ १८ ॥ चैने धर्म 
संकटमे पड़कर उन दोनोँसे जड़ी अनुनय-विनय की 
ओर कहा किं भै बदलेमे एक व्यख उत्तम गौं दूगा | 
आपल्ीग सुद्चे यह गाय दे दीजिये ॥ १९ ॥ भै आप 
त्गोका सेवक द्र | मुश्चसे अनजानमे यह अपराध 
वन गया है । मुञ्चपर आपरोग कृपा कीजिये ओर 
मु्ये इस घोर क्टसे तथा घोर नरक गिरनेसे 
वचा लीजिये ॥ २० ॥ (राजन्‌ | मँ इसके वदलेमे कुछ 
नहीं दगा । यह कहकर गायका खामी च्छ गया | 
तुम इसके वदेम एक खख ही नही, दस हजार गौरं 


ओरदोतो भी मै ठेनेका नहीं । इस प्रकार कहकर 


दूसरा ब्राह्मण भी चल गया ॥ २१ ॥ देाधिद्ध जग- 


दीश्वर ! इसके बाद आयु समाप्त होनेपर यमराजके दूत 
आये ओर सन्ने यमपुरी ऊ गये । वहो यमराजने सुञ्जसे 


£“ तो । २. नान्यां धतीच्छे राजेनद्र इत्युक्ता स्ाम्युपा० । २. दूतरयाम्यनति । 


------------ रर 


न सिं [श (1 १. क त व 


क = न 0 म ५ 


~~ | जो जः जाः = जः आ आत ओ जिः ` = ऋः त कत क = = = ~ च 
[ ऋ क 

ज त त 1 
क्क्व क्क क थ न 


अ० ६४ | 


` जोक को 


प्रवं त्वमरभं शद्ग उताहो दयते छभम्‌ । 


[ 











4 षै ५ प लोकख १ = 
नान्तं दनद धमस पररय कंक भखतः ॥२६॥ 


= 


॥4 देवाह्भं (५ [क 
पूव देवाछ्भं यज्ञ इति प्राह पतेति सः 
तावदद्रक्षपात्यानं कृशूकस्ं पतच्‌ ग्रभो ।।२४। 


ब्रह्मण्यस्य वदान्यस्य त्व दासस्य कैरव 


स्पतिनौच्यापि विध्वस्ता भवत्संदर्छनार्भिनः ॥२५॥ 


स॒ त्वं थं अप दिभोऽकषिपथः परात्मा 
योगेश्वरैः शतिच्छामरुहहठिभाव्यः | 
साक्षादधोक्षज उसुन्यसनान्धवुद्धः 

सयान्मेऽनुद्र्म इह यख भवापवर्गः ॥२६॥। 

देवदेव जगन्नाथ गौचिन्द पुरूषोत्तम । 

नारायण हषीके पुण्यश्छोकाच्युताव्यय ॥२७॥ 

अनुजानीहि मां कृष्ण यान्त' देवगतिं प्रभो । 

यत्र कापि ततश्चेतो भूयान्मे त्वत्पदास्पदम्‌ ।२८॥। 


0 ४ 
नमस्ते सवभावा व्रह्मणेऽनन्तयक्तये । 


ईष्णाय वासुदेवाय योगानां पतये नमः ॥२९॥ 


गी १ 
न्य 


शक्वातं परिक्रम्य पादो सृ वमोरिना ) 





न । ब ~~ 








रं क्क "न # + कक 9 
{न्क 1 ४ = ५ क ` 1 ॥ि ४ प ~: च > ५ < 
% कि) हि" =निः 21 चै क. + $  * हृ # “4 क १ 
न्क र 1 <१ल | ^ " पि = (4 ठ 3 व, च >. 
कह. ह न क क्‌ क ++ ।,॥ 
च = जे ष. ( 
~ 9 ॥ ॐ 
4 






-ः ५३३ ` 


म 


4: _ य र 



























अ. - ~ च 
इशक, - 


परछा-॥ २२ ॥ राजन्‌ ! तुम पहठे अपने पापका फट 
मोगना चाहत हो या पुप्यक्रा ? तृम्दारे दान ओर धर्मक 
पफलखखूप तम्द एेसा तेजखी टोक प्राप्त होनेवाव् है, 
जिसकी कोई सीमा दी नहीं है ॥२३॥ भगवन्‌ ! 
तव ने यमराजसे कहा-ष्वेव ! पहले मेँ अपने पापका + 
फल भोगना चाहता द्र | ओर उसी क्षण यमराजने 
कहा-^तुम गिर॒ जाओ ।› उनके रसा कहते दही में 





क क च 


वर्होसि गिरा ओर गिरते ही समय मैने देखा कि मे गिर- 
गिटदहो गया दर| २४॥ प्रमो] मैं ब्राह्मणोका सेवक, 


उदार, दानी ओर आपका भक्त था | मद्ये इस वातकी 
उत्कट अमितकघा थी कि किसी प्रकार आपके ददान हो 
जारं । इस प्रकार आपकी पासे मेरे पूरवजन्मोकी स्मरति 
टन दई ॥ २५॥ भगवन्‌ ! आप परमात्मा है । 
बड़े-बड़े जुद्ध-हदय योगीश्वर उपनिषदोकी दष्टिसे ( अभेद्‌- 
दृष्टस ) अपने हृदथमे आपका ध्यान करते रहते हं । इन्द्िया- 
तीत परमात्मन्‌ ! साक्षात्‌ आप मेरे नैत्रोके सामने कंसे 
आ गये १ क्योकि मेँ तो अनेक प्रकारके व्यस्षनो, दुःखद 
कममेमिं फँसकर्‌ अवा हो रहा था । आपका दशन तो 
तव होता है, जव संसारके चक्षरसे चछुटकारा मिल्नेका 
समय आता है ॥ २६ ॥ देवताओंके भी आराव्यदेव ! 
पुरुषोत्तम गोविन्द ! आप ही व्यक्त ओर अव्यक्त जगत्‌ 
तथा जीवोके खामी हैँ । अव्रिनारी अच्युत ! आपकी ` 
कीतिं पवित्र है । अन्तयोमी नारायण । अप ही समस्त 
वृत्तियों ओर इन्दरियोके खामी दहै ॥ २७ ॥ ग्रमो । 
श्रीकृष्ण | मै अव देवताओके रोके जा रहा द । आप 
सुने आज्ञा दीजिये । आप रेसी कपा कीजिये कि मै 
चाहे कहीं भी क्यों न रह मेरा चित्त सदा आपके ¦ 
चरणकमरमं दी चणा रहै ॥ २८ ॥ अप समतप्त कया | 
ओर कारणेकर ख्यमे वियनान हैँ । आपकी शक्ति अनन्त्‌ 
है ओर अप खयं व्रह्म है | आपको मेँ नमस्कार करता 
र| सचिदानन्दसरूय सर्वन्तर्याधी वदेव श्रीकृष्ण 
आप समस्त योगोके खाभी, योगेधर दै । आप्कत 
नार्‌-वार नमस्कार करता द्व ॥ २९ 
राजा चगने र ककर भगव्रानकी परिमा 
भोर भपन ञुङ्कटसे नके नरणाकां स्प करके 


22 क त "ग्रे 
ज य ऋ पवि ~र --= -- ~ ~~ 


स विक क द ्- 5, ` 


स्वदत्तां परदत्तां वा वहम्रसिं हरेच यः 





। } 
+ प 
1 


| ब्रह्मण्यदेवो धसामा राजन्यानलुशिक्षयन्‌ ॥२९। 


। १९ = (५। 


राञ {ना रलङ्कल्यश्च तावतोऽन्दाक्िरदखःः 


कुपु पच्यन्ते चह्यदायापहारिण; 








` कः कनरका कको चातो क क न त = = को आक 
ऋ चः किः च = क जः यि चकः आक == ऋः ऋ ऋ पः चः ज च क ज == 





च 
"णीयो 


कृष्णः परिजनं प्राह भगवात्‌ देवफीसतः | 


¢$ ] ७२, (५ (५ 
दुजरं बतत बहस्वं युक्तमण्ने्मनागपि । 
तेजीयसोऽपि कितं राज्ञामीश्वरमानिनाम्‌ ।२२॥ 


गहि इह मन्यं वषं यस्य प्रतिक्रिया | 


ब्रह्मस्वं हदि विषं श्रोत्तं नार्य प्रतििधय ।२३।। 


हनस्त विषमत्तारं वद्िरङ्धिः प्रलाभ्यति | 
छर सश्र दहति ब्रह्मस्वएरणिपावशः ।२५। 


नरस्य इरचज्ञात शक्तं हन्ति वतरिपुरुपम्‌ | 


रस्य त बराद्‌ शुक्तं दश पर्वान्‌ दद्चपरान्‌ ॥३५॥ 
राजानो राजलक्ष््यान्धा नात्मपातं विचक्षते । 
नर्य येऽभमन्यन्ते बहमस्वं साधु बाक्छिः | ३६॥। 


न्ति यवतः वांख्ल्‌ कन्दतामश्रबिन्दवः । 


विक्रा हतङृ्ीनां वदान्यानां इट्म्बिनम्‌ ॥३७। 


|| २८ 


प्िवर्यसहस्ाणि विष्ठायां जायते कृमिः ॥२९॥ 


श्रीमद्भागवत 





क्वाकरं उसका चरकिःसा 


[ अ० ६४ 


क्का क 
[र्णी ` जक [रि अ 





अयज्ञातो वेमानाग्रयसाखुह्‌ पश्यतां चणाम्‌ 1३०} | प्रणाम किया । फिर उनसे आक्ञा चकर सरके देखते 


देखते ही वे श्रेघ्र विमानपर्‌ सवार हो गये॥ ३० ॥ 


राजा चरणके चरे जानेपर्‌ ब्राह्मणोके प्रर प्रेमी) धमते 
आधार देधकीनन्दन मगत्रान्‌ श्रीकरृष्णने श्षत्रियोको शिश्वा 
देनेके व्यि व्हा उपध्ित अपने कुटुम्बक ट्ोगोसे 
कडा-]। २१ ॥ “जो रोग अग्निक समान तेजखी है, 
वे भी ब्रा्मणोका शोड-पे-थोडा धन हडपकर नदीं पचा 
सक्ते । फ़र्‌ जो बरहा ूठ-म९ अपनेको लोगो- 
का खाधी समञ्जते हैँ बे राजा तो क्या पच सकते 
है {॥ २२ ॥ तै हटखाहक विपको त्रिप नद्रीं मानता, 
वि ती ह | वस्तुतः त्राह्मणाका 

धन ही परम विष है; उसको पचा टेनेके टये प्रध्वीमं 


(>. 


कोई ओषध, कोई उपाय नहीं है | ३३ ॥ हदल 
वरिष क्रैव्रट खाने्रस्का दी प्राण खेता है ओर आग 


भी जच्के द्वारा बुञ्चायी जा सकती है; परंतु ब्राह्मणक 
घनरूप अरणिसे जो आग पैदा होती है, क्छ सारे 
कुल्को समूल जला उट्ती है ॥ ३४ ॥ ब्राह्मणक 
धरन यद्व उसकी पूरी-पूरी सम्भति लिये विना भोगा जाय 
तव तो वह भोगनेवाठे, उसके डके ओर पौत्र---इन 
तीन पीदवियोको ही चौपट करता है । परंतु यदि वल- 
पूवक ह८ करके उसका.उपयोग क्रिया जाय, तव तो 
पूवर पुशू्मोकी दस पीदि्यौ ओर अगिक्री भी दम पीडय न 
हो जाती है | ३५५ ॥ जो बुखं राजा अपनी राजलक्ष्मी- 
के धमंडसे अघे होकर ब्राह्मणको धन हडपना चाहते 
है, सपश्चना चहिये किं बे जान-वरञ्चकर नस्कमं जानेका 
रास्ता साफ कर सकते हैं| तरे देखते नहीं कि उन्हे 
अधःपतनके कैसे गहरे गङमं गिरना पड़ेगा ॥ ३६ ॥ 
जिन उद्रदय ओर वद्रकुटम्बी ब्राद्म्ोकी वृत्ति छीन 
टी जाती है, उनके रोनेपर की तब्रूदोसे 
धरनीकरे जिननै प्रल्किः भीगते वधतिक 
ब्रा शके सत्वे खीननेव्राये उस राजा ओर 
उसके वंदा ऊम्भीपाक नरकमें दुःख मगना पड़ता 
॥ २७-३८ ॥ जो मनुष्य अपनी या , दूसेकी दरी 
्राश्रणेोकी बृत्ति, `उनकी जीव्रिकाके साधन . छीन 
ते हें, वरे साठ हजाद्‌ वध्तक विष्ठाके कीड होतें है| ३९ ॥ 


उन 2 


¢ ~ 
ह 
त 

# 


९ 
उतः) 


>~7-=ः 
> र 


४ (4) 1 


अ० ६५ | दश्चम स्कन्ध ५३९ 


1 ए ` 








~~ ~~~ 
न मे ब्रह्मधनं भूयाद्‌ थद्‌ गृद्ध्वास्पायुषो नराः व्सव्नि भै तो यही चाहता द्व कि व्राह्ोका 
घन कभी भूच्चे भी मर्‌ कोपमं न आय 
क्योकि जो द्ग ब्राह्मणोके धनकी इच्छा भी करते ह-- 
उसे छीननेकी बात तो अद्य र्ी-व ईक्ष जन्ममं 
अल्पायु, राघ्चुभसे पराजित ओर राज्यन्रष्ट हा जतं हँ 
ओर पर्युके वाद्‌ भी वे दूसरोको क्र दने संपि दी 
होते है ॥ ४० ॥ इसव्वय मेरे आत्धीयो । यद्वि ब्राह्मण 


पराजितारच्युता राज्या भवन्त्युद्धेजिनोऽदहंयः।) ४०॥ 


1 = 


वित्र करत्तमसयप नव द्यत मसक्म, 


ज्यः 


न्तं बहु शपन्तं बा नमररुत नित्यशः ॥४१।। | अपरा कर, तो मी उससे दप मत करो । अद नाट्‌ ह 
क्योनव्ेठे या वहूत-सी गार्य यादापद्दीक्यान 
द, उसे तुमव्मोण सदा नमत्कार दी क्रो ॥ ४१॥ 
जिस प्रकार म बड़ी सावधानी तीनों समयं ब्रह्मणेकों 
प्रणाम करता दँ वसे ही तुमव्रेग भी किया करा । जों 
तथा नसव यूयं च योऽन्यथा मे स दण्डी 11२) | मेरीडइस आज्ञाका उल्लद्खन करेगा, उसे भें क्षमा नहा करूंगा, 
दण्ड दूंगा | ४२ ॥ यदि त्राह्मणके धनका अपहरण 
हो जाय तो वह अपहत धन उस अपहरण करना 
को-अनजानमे उसके द्वारा यह अपराच इभा ह्यं तों 


गी 


यथाहं प्रणये धिप्रानदकाकं समादिङः 


ब्राह्मगीर्थो द्यपहूतो हतीरं पातयत्यधः 


अजानन्तमपि घनं च्रगं त्राह्मभमोरिि ॥९३॥ | भा--अधःपतनके गड़ढेम डाल दता हं । जस ब्राह्मणक 
गायने अनजानमें उसे छेनैवार राजा चरंगको नरकमें डाक 
एवं विश्राव्य भगवान्‌ मुद्कन्दो ए एषः । दिया था ॥ ४३ ॥ पर्षत्‌ ! समस्त लोकोको पवित्रं 
करनेवाठे मगवान्‌ श्रीकृष्ण ॒द्वार्कावासिथोको इस प्रकार 
पावनः स्ब॑रोकानां विवे निजभन्दिर१्‌ 11४४॥। | उपदेश देकर अपने मह्मं च गयः ॥ ४४ ॥ 
-"-* च्ञ | 
ति श्रोद्धागवते धह वुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उस्र 
च्रगोपाख्यानं नाम चतुःपषटितमोऽ्यायः ॥ ६४ | 
--००० ज डञ ~न 
अथ पञचषष्टितमोऽध्याय 


भ्र सामजा। नजमसन 





श्री्यैक उवाच श्रीदयुक्देवजी कहते है--परी्नित्‌ ! भगवान्‌ वल- 
रामजीके मनमें त्रजके नन्दवाबा आदि खजन-सम्बन्धियो- 
से मिटनेकी बडी इच्छा ओर उत्कण्ठा थी | अव बे 
सुहदिदश्चुरुत्कण्ठः प्रयया नन्दगाङ्खम्‌ ॥ १ 1} | र्थपर्‌ सवार्‌ होकर दारकसे नन्दबावके रनम आये ॥१॥ 

{ इधर उनके छिथ व्रजवासी गोप ओर गोपियो भी बहत 
परिष्वक्तधिरोत्कण्डेमेपिगंपीमिरेव च । दिनोंसे उत्कण्ठित थीं । उन्हे अपने बीचमे पाकर सबने 


१. व्रपाः । २. हि ये । ३. द्वारकाप्रजाः । ४. प्राचीन प्रतिमे “उत्तरार्धे इतना अंश नदीं हे । ५. बादरायणि- 
खवाच । ६, गोपगोपी ° । 


बलभद्रः इर्श्ेष्ठ भगवान्‌ रथमायितः । 








रामोऽभिवाद्य पितराबाक्लीभिरभिनन्दितः ॥ २॥ 





चिरं नः पाहि दाशाहं सानुजो जगदीश्वरः । 


क चः 


इत्यारोप्याङ्मालिङ्गय नेत्रः सिपिचत॒जठैः ॥ २ ॥ 


गोपवृद्धाश्च विधिवद्‌ यविष्टैरभिवन्दितः। 





। | | 
^ । ^ यथावयो यथासख्यं यथासम्बन्धमात्मनः ।। ४॥ 
83 ~} 
1 १ 
| | । । सयुपेत्याथ [क „९ 
^ । सथपेत्याथ गापालान्‌ हाखहस्तग्रहादिभिः । 
{4 


विश्रान्तं सुखमासीनं पप्रच्छः पयपागताः ॥ ५॥ 



















` पृष्टाधानामयं स्वेषु प्रेमगद्रदया गिरा। 
| ध.  छष्णे कमरपत्ा्षे संन्यस्ताखिरुरधसः ।। ६॥ 
# । को ान्धया राम सर्वः इारमसते। 
| ¢ , कचित्‌ सरथ नो राम यूयं दारसुतान्विताः ॥ ७॥ 


(* कंसो हतः पापो दिष्टया शक्ताः सुजनाः । 


हत्य निनित्य सिप दिष्टया दुगं ससाभिताः ॥८॥ 
गोप्यो हसन्त्यः पप्रच्छ रामसन्दशेनाद्ताः 


॥ प 1 ॐ 


कृचिदास्ते उखं ष्णः पुरल्ीजनवर्रभः ।॥ ९॥ 


[= । 
+ 
= = 
प 
| 


कचित्‌ सरति वा बन्धून्‌ पितरं मातरं च सः 


` अप्यसौ मातरं द्रुं सकृदप्यागमिष्यति । 


ऽसाक्रमनुसेबां महाथ॒जः ॥१०॥ 


>? भद नि 
१ हिशामिवादितः भिवादितः । २. ते बे | 
॥ कय“ 


4 १ - >< 


कन ~~ ~ 





हम लेगोकी सेवाका भी छ स्मरण करत 








| अ० ६५५ 


जर नक ककः कठ = `= ` र आकि च भः जज जः ऋ ककः को = = जा जनको ऋक न च = = = ककः ॐ क कका 
[ये गि > कि) ~ => ० 





बड़ प्रेमसे गले च्गाया । बल्रामजीने माता यदोदा ओर 
नन्दबावाको प्रणाम किंथा | उन टोगोँने भी आीरवाद 
देकर उनका अभिनन्दन किया | २ ॥ यह कहकर 
किं बल्रामजी | तुम जगदीश्वर हो, अपने छोटे भाई 
श्रीकृष्णके साथ सव॑दा हमारी रक्षा करते रहो, उनको 
गोदमें ठे च्या ओर अपने प्रेमाश्रुञंसे भिगो 
दिया ॥ ३ 1 इसके वाद वड़-बड़ गोपक बट्रामजीने 
ओर छोटे-छोटे गोपोने वल्रामजीको नमस्कार किया | वे 
अपनी आयु, मेल-नोट ओर सम्बन्धके अनुसार सवसे 
मिले-जुठे ॥ ¢ ॥ ग्वाट्वारके पास जाकर किसीसे 
हाथ मिकाया, किंसीसे मीठी-मीरी वातं की, किसीको 
लू हंस-हंसकर गले लगाया । इसके वाद जव बट्राम- 
जीकी थकावट दूर्‌ हो गयी, वे आरामसरे वेठ गये, तव 
सव ग्वार उनके पास आये । इन ग्वाटोने कमटनयन 
मगवान्‌ श्रीकृष्णके च्य समस्त भोग, खगं ओर मोक्ष- 
तक त्याग रक्खा था | वटटामजीने जव उनके ओर उनके 
घरवाेके सम्बन्धमे कुराटप्ररन किया, तव उन्होने प्रेम- 
गद्गद्‌ वाणीसे उनसे प्ररन किया ॥ ~-६ | वट्रामजी | 
वघुदेवजी आदि हमारे सव॒ भाई-बन्धु सढुदाक हैँ न १ 
अव आपलोग सखी-पुत्र आदिके साथ रहते हँ, बाल- 
बच्चेदार हो गये दहै; क्या कभी आपटोगोको हमारी 
याद भी आती है १ ॥ ७ ॥ यह बड़े सौमाग्यकी वात 
है किं पापी कसको आप्रलोगोने मार डाटा ओर अपने 
सुदद्‌-सम्बन्धियोको वड़े कषटसे बचा ल्या | यह भी 
कम आनन्दकी बात नहीं है कि आपलोगोने ओर भी 
वहत-से रा ओंको मार्‌ डाल या जीत ट्या ओर अब 
अत्यन्त सुरक्षित दुग ८ किं ) मं आपटोग निवास 
करते हैः ॥ ८ ॥ 

परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ वल्रामजीके दशानसे, उनकी 
वरेमभरी चितबनसे गोपियोँं निहाल हो गयीं । उन्होने 
हेसकर पू --“क्यो बटरामजी । नगर-नारियोके म्राण- 
वल्लम श्रीकृष्ण अब सकुदाक तो है न १॥ ९ ॥ क्या 
कमी उन्ह अपने भाईबन्धु ओर पिता-माताकी भी याद्‌ 
आती है १ क्या वे अपनी माताके दशानके च्वि एक 
नार्‌ भी यँ आ सर्वेगे १ क्या महाबा श्रष्ण की 
हे ॥ ९५॥ 



















हव अ०६५1 ^? द्म स्कन्ध 





मातरं पितरं भ्रातृन्‌ पतीन्‌ पुत्रान्‌ स्वसुरपि । आप जानते ह कि स्वजन-सम्बन्धर्योको छोडना बहत ही ` 
ष ६ कठिन है फिर भी हमने उनके च्यिर्मा-बाप, माई ^ 
सस र बन्धु, पति-पुत्र ओर बहिन-वेविर्योको भी छोड़ दिया। । 
यदथ जाहेम दाशाहं दुस्त्यजान्‌ खजनान्‌ प्रभा ॥११॥ | पतु प्रमो ! े वात-की-नातमे हमारे सौहार्दं ओर व्रेम- ` 
का बन्धन काटकर्‌, हमसे नाता तोड़कर परदेश चे 
ता नः सद्यः परित्यज्य गतः संछिनसोददः । गये; हमलोगोको विल्ठुर ही छोड दिया । हम चाहतीं 
तो उन्हं रोक छ्ेती; प्रतु जव वे कहते किंहम 
तुम्हारे ऋणी है तुम्हारे उपकारका वद्धा कभी नहीं 
कथं लु तादशं सख्ीभिनं श्रद्धीयेत भाषितम्‌ 1\१२॥ | चुका सकते, तवर देसी कौन-सी खी है, जे उनकी 
मीटी-मीटी वातोपर्‌ विश्वास न कर ठेती 1 ११-१२ ॥ एक 
गोपने कहा-बर्रामजी ! हम तो गँवकी गंवार वालिनं 
ठहरी, उनकी बातेमें आ गयीं । परंतु नगरकी जियो तो बड़ी 
चतुर होती हैँ | भला, वे चच्चक ओर कृतघ्र श्रीकृष्णका _ 
वातेमिं क्यो फंसने लगीं; उन्हे तो वे नहीं छ्का पाते 
होगे ! दूसरी गोपीने कदा- नहीं सखी, श्रीकृष्ण 
वाते वनानेमे तो एक दी हैँ । रेसी रगविरंगी मीटी- 
मीटी वाते गदते है कि क्या कहना । उनकी खुन्दर ` 
मुसकराहट \ओर प्रेमभरी चितवनसे नगर-नारिय भी 
प्रमावेशसे व्याकुल हो जाती होगी ओर वे अव्य उनकी 
वातोमे आकर अपनेको निछावर कर देती होगी" 1 १२॥ 
तीसरी गोपीने कहा--अरी गोपियो ! हमलोगको ` 
उसकी वातसे क्या मत्व है १ यदि समय ही काटना 
है तो कोई दूसरी बात करो । यदि उस निष्टुरका समय 
हमारे बिना बीत जाता है तो हमारा भी उसीकी तरह 
मले ही दुःखसेक्योन हो, कट ही जायगा ॥ १४॥ 
अव गोपिर्योके भावनेत्रोके सामने भगवान्‌ श्रीकषपव 
हंसी, प्रेममरी बातें, चारु चितवन, अनूटी चाल ओर 
्रेमालिङ्गन आदि मूतिमान्‌ होकर नाचने गे । वेउनं 
वातोकी मधुर स्परतिमे तन्मय होकर रोने व्गीं ॥१५ 


न~ 


५.1 9; .11 1.1.111... {9 1001 1॥13.1|.. 


कृथं जु गृह्णन्त्यनवख्ितात्मनो 


वचः कृत्स बुधाः पुरख्ियः) 


गृह्णन्ति वें चित्रकथस्य सुन्दर- 









सितावलोकोच्छ्रसितसरातुराः १३ 


किं नस्तत्कथया गोप्यः कथाः कथयतापराः । 







यात्यसाभिविना कालो यदि तस तथेव नः ॥१४।॥। 





इति प्रहसितं शौरेजस्पितं चारु वीशितम्‌ । 










गतिं प्रेमपरिष्वङ्गं खरन्त्यो रुरुदुः सियः ॥१९५ 













परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ वकरामजी नाना प्रकारसे अनुनय 
विनय करनेम बड़े निपुण ये । उन्होने भगवान्‌ श्रीज्ष्णक्रे ` 
हदयस ओर दुभावने वुनाकर गोपियोको ` 
वसन्तके दो महीं क चैत्र ओर 


संकर्षणस्ताः कृष्णस्य सदेशेहेदयङ्खमेः । 
सान्त्वयामास भगवान्‌ नानालुनयकोविदः ॥\१६॥ 


दौ मासौ तत्र चावात्सीन्मधुं माधवमेव च। 


भत स० ख द ८-~ 


५३८ श्रीमद्भागवत [अ० ६ 
पणंचन्द्रकलाम॒ष्टे र नेखुदीगन्धवायुना राम ही जो ठहरे ! | १७ ॥ उस समय वुमुद्विनीकी 
= प "~ एुगन्ध॒ लेकर भीनी-भीनी वायु चती रहती, पूरण 
यथुनोपवने रेमे सेविते स्रीगणेरतः ॥१८।। चन््माक चोद्नी टिटककर यमुनाजीके तचरं उपव्रन- 

| को उञ्ज्वल कर देती ओर भगवान्‌ वटराम गोपियोके 
| साध वहीं विहार करते ॥ १८ ॥ वरुणदरेधने अपनी 
पुत्री ब्रारृणीरवीक) वां मेज द्वियाथा | वह एक 
बरक्षवे खोड़रसे वह निकटी । उसने अपनी सुगन्धसे 
सारे वनको सुगन्धित कर्‌ द्विया | १९।मधुध्राराकी वह सुगन्ध 





[त क्दक्यनक्मेरि 1 = 7 कन 


वरुणप्रेषिता देवी वारुणी व्रक्षकोटरात्‌ । 


पतन्ती तद्‌ वनं सव स्वगन्धेनाध्यवासयत्‌ ॥१९॥ 


तं गन्धं मधुधाराया वायुनोपहूतं बरः। वायुने वलरामजीके परास पर््ैचायी, मानो उसने उन्दं 
। उपहार दिया हो ! उसकी मँकसे आक्रुर होकर 


आघायोपगतस्त्र ललनाभिः समं पपौ || २०। | वठरामजी गोपियों को टेकर वटौ पर्दरैच गये ओर उनके 
साथ उसका पान किया ॥ २० ॥ उस्र सप गोपियां 
वलरामजीके चायो ओर उनके चस्रिका गान कर रही 
थीं ओर वे मतव्राटे-से होकर वनम विचर्‌ रहे धे। 
वनेषु व्यचरत्‌ श्षीबो मद विह्यलोचनः ॥२१।। | उनके नेत्र आनन्दमदसे ब्रह हो रदे भे ॥ २१॥ 

त गल्मै पुष्पका हार ठोभा पा रहा था। वैजयन्तीकी 
खग्व्येकङ्ण्डरो मत्तो वेजयन्त्या च मारया । माला पहने इए आनन्दोन्मत्त हो रहे मे । उनके एक 
=< < कानमे वुण्डल लटक रहा था । मुखारविन्दपर मुस- 
विभ्रत्‌ सितखाम्भोजं स्वेदप्राङेयभूषितम्‌ ॥२२॥| वराकी लोमा निराटी ही शरी । उपर पसीनिकी 
बदरं हिमकणके समान जान पडती शीं | २२ ॥ सव- 
राक्तिमान्‌ वक्रामजीने जक्क्रीडा करनेके टये यमुना- 


उपगीयमानचरितो वनिताभिरहरायुधः । 


"क काका कक त्क 8२३ 


वि ॥ 


स॒ आजुहा्र यनां जलक्रीडाथमीश्वरः । 

निजं वाक्यमनाष्टत्य मत्त इत्यापगां बल; । जीको पुकारा; प्रतु यमुनाजीने यह समञ्लकर कि ये 
(2 तो मतव्राले हो रहे हे, उनकी आज्ञाक। उल्टङ्कन कर 
अनागतां हरग्रेण कृपित विचकषं ह ॥२३॥ | दिया; वे नहीं आयीं | तव॒ वल्रामजीने त्रोधपूर्वक 
| ~. द: अपने ह्वी नोकसे उन्दे खीचा ॥ २३॥ ओर 
(0 & कामचारिणी आज्ञाका उस्लङ्कन करके यरा नदीं आ रही है, मेरा 
न्य ता खङ्गलाग्रण शतधा कामचारिणीम्‌।।२४। | तिरस्कार कर री हे ! देख, अवर ज्र तुचे ते खेच्छचारका 


` ^ ~~ € फट चखाता दै | अभी-अभी तज्ञे हल्की नोकसे सौ 
एवं निभत्सिता भीता यथना यदुनन्दनम्‌ । लो रवद ये देता क ॥ २४ ॥ जन बलात 


(४ व यमुनाजीको दस प्रकार डद-फटकर तव त चकित 
उवाच चकिता वाचं पतिता पादयाच्चप ।२५। ओर भयभीत होकर वल्यामजीके चरणोपर गिर पड़ीं 


+ ओर गिडगिडाकर प्राना करने व्गी--॥ २५५ लोका- 
राम राम महबाहान जाने तव विक्रमम्‌ | मिराम वल्रामजी । महाबाहो ! भै आपका पराक्रम भूल 
---______-______________------------ 


= १. पपौ समम्‌ । २. नैति | 
र" >. । ष 

ङ्क भः क - 9 ~ अ त 

५ > = ^ "भ स 
ह, ~ ~= ` "त - ~ 4 ` ~? ह क पी 









अ० ६8 | 


द ातयायनयानकाणयन्ययकयकक्यकणकाकान्यानकयक्यकयक्यकयकयक्कयक्यकनयकनयकनवनयकयककयकनकानकनकनयकनकन्कन््कन्कनकन्कन्कन्कनकन्कन्यक्कग्कष्कन्या यक षदग्कष्याण्यायकयकणकाषकाष्कानकान्यकयकान्य 
= कि म 








यस्येकादेन विध्रता जगती जगर्तः पते 11२६॥ | 


परं भावं भगवतो भगवन्‌ मामजानतीम्‌ । 


मोक्तमर्हसि विश्वात्मन्‌ ग्रपन्नां भक्तवत्सल 1 २७॥। 
ततो व्यथश्चद्‌ य॑श्रुनो यधचत्ी भगवान्‌ बलः 
विजगह जरं शचीभिः फरेणुभिरिवेभरष्ट्‌ ॥२८॥। 
कामं विहृत्य सिखादुत्तीगोयासिताम्बरे 
भूषणानि महाहौणि ददौ कान्तिः शुभां जम्‌ ।२९। 
वसित्वा वाससी नीले मारामापुच्य काश्चनीम्‌। 
वारणः ॥२०॥ 
अयापि च्छ्यते राजन्‌ य्नाऽऽकृष्टवत्मना । 
बललानन्तवीयख चीयं सूचयतीव दहि ॥३१॥ 


एवं सर्वा निरा यता एकव रमतो व्रजे! 


-- --=५(0.र2----- 
इति श्रीमद्धागवते मह पुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्ये ` उत्तरार्धं 
चकदेवविजये यमुनाकषणं नाम पञ्चष्टितमोऽच्यायः ॥ ६५५] 
स 


अथ षटषष्टितमोऽष्याय 


पौण्ड्क ओर कारिराजका उद्धार 


रामस्क्षिप्रचित्तय माधुर्येँव्रजयोपिताम्‌ ॥३२॥ 
श्रीक उवाच 


नन्दव्रजं गते रामे करूषाधिपतिनैप । 


"रि 2 कि 


दञ्चम्‌ स्कन्धं 


वा षि मिग 





१. मुञ्चद्धगवान्‌ याचितो यमुनां बलः । २. न्धे यमुनाकषणं पञ्चष ° | ३. बाद्रायणिरुबाच । 





गयी थी | जगत्पते ' अव में जान गयी किं आपे 
अदामात्र देषजी इस सारे जगतको धारण करते हँ ।२६। 
मगवन्‌ ! आप परम रेश्वर्यशाटी दै | आपके वास्तव्रिकं 
सखरूपको न जाननेके कारण ही मुञ्चसे यह अपर्‌ध बन 
गया है । सवखश्प भक्तवत्सक ! में आपकी दारणमें 
र । आप मेरी भूल-चूकत क्षमा कौजियं, मञ्चे छोड 
दीजिये ॥ २७ ] 

अव्र यमुनाजीकी प्रधना खीकार करके भगवान्‌ 
वदराभने उन्हे क्षमा कर्‌ दिया ओर फिर जसे गजराज 
हथिनि्योके साथ क्रीडा करता है, वरैसे हीतरे गोपियके 
साध जच्क्रीडा करने ल्गे ॥ २८॥ ज्व वे यथेष्ट 
जट-व्रिहार करके यमुनाजीसे वाहर निकटे, तव रक्ष्मी- 
जीने उन्हें नीव्यम्बर्‌, वद्मू्य आभूप्रण ओर सोनेका 
सुन्दर हार दिया ॥ २९ ॥ वद्रामजीने नीठे वचर पहन 
व्यि ओर सोनेकी माल गमे डाक खी । बे अङ्गराग 
लगाकर, सुन्दर भूषणोसे विभूषित होकर इस प्रकार 
रोभायमान दए मानो इन्द्रका खेतवर्णं रेरतवरत हाथी 
टो || ३० ॥ परीक्षित्‌ ! यमुनाजी अव भी बट्रामजीके 
चे दए मागंसे वहती देँ ओर वे एसी जान पडती 
है, मानो अनन्तशक्ति भगवान्‌ बट्रामजीका य गान 
कर रही हों ॥ ३१॥ वटरामजीका चित्त त्रनवासिनी 
गोपियोके माधुय॑से इस प्रकार मुग्ध हो गया कि उन्हें 
समयका कुछ ध्यान ही न रहा, वहूत-सी रात्रिया एक 
तके समान व्यतीत हो गयीं | इस प्रकार वट्रामजी 
त्रजमें विह।र करते रहे ॥ ३२ ॥ 





श्रीदयुकदेवजी कहते हं- परीक्षित्‌ ! ज्र भगवान्‌ 
वकरामजी नन्दबावावें वरजम गयं इए थे, त पीछेसे कख्ख 





कण्वन्करक्केद ०.4” - ~ 


न ८ कट 


४ ~` ङ्गक कि = » ~ = प्क „~ , 


४ 
3 
9 
न्नव 
== 


- 


५५४० 





बाखदेवोऽहमित्यज्ञो दूतं कृष्णाय प्राहिणोत्‌ ॥ १ । 
त्वं वासुदेवो भगवानवतीर्णो जगत्पतिः । 
इति प्रस्तोभितो बालेरमेन आत्मानमच्युतम्‌ ॥ २ ॥ 
दूतं च प्राहिणोन्मन्दः कृष्णायाव्यक्तवरत्मने । 
द्वारकायां यथा बालो सृपो बालकृतोऽबुधः ॥ २ ॥ 
दूतस्तु दारकामेत्य सभायामास्थितं प्रथम्‌ । 
ष्णं कल्ल राजसंदेशमत्रवीत्‌ । ७ ॥ 
वासुदेवोऽवतीर्णोऽहमेक एव न चापरः । 
भूतानामुकम्पाथं तवं त॒ मिथ्यामिधां त्यज । ५ ॥ 
यानि स्वमसचिह्वानि मोद्याद्‌ बिभषिं सात्वत। 
त्यक्त्वेहि मां त्वं शरणं नो चेद्‌ देहि ममाहवम्‌।। ६ । 


श्रीशुक उवाच 


त्थन॑ तदपाकण्यं पौष्द्कस्याद्यमेधसः। 


उ्रसेनादयः ` सभ्या उच्कौजंहसस्तदा ॥ ७ ॥ 


उवाच दृतं भगवान्‌ परिहासकथामयु । 


उत्स्रक्ष्ये मूढ चिद्वानि येस्त्वमेवं विकत्थसे ॥ ८ ॥ 


खं 


तदपिधायाज्ञ॒ कङ्गधवरैवरतः। 


शयिष्यसे हतस्तत्र भविता शरणं छनाम्‌ ॥ ९ ॥ 


इति दृतत्तदाक्षेपं॑सामिने सवरमाहरत्‌। 


ीमङ्कागवत 
र (ज 


| अ० ६& 





देराके अज्ञानी राजा पौण्ड्कने भगवान्‌ श्रीकृष्णकरे पास 
एक दूत भेजकर यह कहल्ाया किं (भगवान्‌ वासुदेव 
महर ॥ १ ॥ मूर्खल्मेग उसे बहकाया करते ये किं 
आप ही भगवान्‌ वाञुदेव है ओर जगत्की रश्चाके च्ि 
प्रथ्वीपर अवतीणं इए हैँ | इसका फल यह इआ किं 
वह मूर अपनेको ही भगवान्‌ मान वैटा | २ ॥ जैसे 
च्ये आपसमें खेकते समय किसी वाट्कको ही राजा 
मान ठेते हैँ ओर वह राजाकी तरह उनके साथ व्यवहार 
करने ठगता है, वैसे ही मन्दमति अज्ञानी पोण्ड्कने 
अचिन्त्यगति भगवान्‌ श्रीकृष्णकी टी ओर रहस्य न 
जानकर दवारकाम उनके पास दूत मेज द्विया ॥ ३॥ 
पोण्डूकका दूत द्वारका आया ओर राजसममं वैठे ह 
कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णको उसने अपने राजाका 
यह॒संदेदा कह सुनाया--॥ ४ ॥ (एकमात्र मै दही 
वासुदेव हँ । दूसरा कोई नहीं है । प्राणिरयोपर्‌ कृपा 
करनेके व्यि मेने दी अवतार ग्रहण किया है | तुमने 
च ठ-मूठ अपना नाम वासुदेव रख य्या है, अव उसे 
छोड दो ॥ ५ ॥ यदुवंशी ! तुमने मूर्ैतावशा मेरे 
चिह धारण कर रक्खे ह । उन्हें छोडकर मेरी शरणमे 
आओ ओर यदि मेरी बात तुम्हें खीकारनदहो, तो 
मुञ्षसे युद्ध करोः ॥ ६ ॥ 


्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ । मन्दमति 
पोण्ड्ककी यह बहक घुनकर उग्रसेन आदि सभासद्‌ 
जोर-जोरसे हसने लगे ॥ ७ ॥ उन ठोगोकी हँसी समाप 
हीनेके वाद भगवान्‌ श्रीकृष्णने दूतसे कहा-- तुम 
जाकर अपने राजासे कह देना कि ९ मूढ । मै अपने चक्र 
आदि चिह यों नहीं छोडगा । इन्द मेँ त॒ञ्ञपर छोईगा 
ओर केवर तुञ्चपर ही नही, तेरे उन सव साथियो 
भी, जिनके बहकानेसे तू इस प्रकार बहक रहा है । 
उस समय भूख | तू अपना सुह छिपाकर-ओँधे मह 
गिरकर चील, गीध, बटेर आदि मांसभोजी पक्षियोसे 
धिरकर सो जायगा ओर तू मेरा शरणदाता नही, उन 
कुत्तोकी रारण होगा, जो तेरा मांस चींथ-चींधकर खा 
जा्थगेः ॥ ८-९॥ परीक्षित्‌  मगवानूक्ता यह तिरस्कारपूर्ण 
संवाद केकर पौण्डूकका दूत अपने खामीके पास गया । 
ओर उसे. कड घुनाया । इधर भगवान्‌ श्रीकृष्णे भी 








अ० ६8६ ] 


कृष्णोऽपि रथमाखाय कारीप्रुपजगाम ह ॥१०॥ | रथपर सव्रार हकर काडीप्र्‌ चद्राई 


पोण्डकोऽपि तदुद्योगघुपरभ्य महारथः । 
अक्षोदिणीम्यां संयुक्तो निशवक्राम पुराद्‌ द्तम्‌।।११॥ 
तख कािपतिर्मतरं पाण्णिग्राहोऽन्वयान्तृप | 
अक्षीहिगीभिस्िसृभिरपश्यत्‌ पोण्ड्कं हरि; ॥१२॥ 
शङ्काय सिगदााङ्गश्रीवत्साद्युपरक्षितम्‌ । 
बिभ्राणं कोस्त॒भमणिं वनमालाविभरपितम्‌ ।१३॥ 
कोरोयधाससी पीते वसानं गरुडध्जम्‌ । 
अमूस्यमोस्याभरणं 
द्रा तमात्मनस्तस्यर्वेषं दत्रिममास्यितम्‌ । 
यथा नरं रङ्गगतं विजहास भृशं हरिः ॥१५५। 
शूलेगदाभिः परिषेः 
अतिभिः पद्टिशे्षणेः 


शक्तयुधिग्रासतोमरेः । 
प्राहरन्रयो हरिम्‌ ।१६॥ 
ङृष्णस्तु तत्पोण्डककारिराजयो- 

वसं गजख्यन्दनवाजिपत्तिमत्‌ । 
गदासिचक्रेुभिरादयद्‌ भूदं ` 

भा युगान्ते हत जाः।\ १७) 
आयोधनं तद्रथवाजिक्रञ्चर- 

दहिपत्खरोष्टरररिणव्रखण्डितेः । 
वभो चितं मोदवहं मनखिना- 


माक्रोडनं 


अथाह पौण्टकं शोरिभ भोः पोण्डक यद्‌ भवान्‌ 1 





स्फुरन्मकरङण्डलम्‌ ॥१४॥) | पीठे वख पहन रक्खे थे ओर रथकी ध्वजापर्‌ 


भ्रतपतेखिोखणम्‌ 11१८ | कीडस्थली हो । उसे देखददेदकर शीरोका उतसाह 


मामाह तान्यस्राण्युत्सृजामि ते \\९९\ । छोड दो, सो अब मे उन्हे तुप छोड # 


& क ~ क प ध * प, = ~ ९५ २, ए, र ॐ [6 प 
दक्ञम्‌ स्कन्ध ` ५० 



































| ( क्योकि 
वह॒ करख्ूयका राजा उन दविनां वहीं अपने भित्र काि- 
राजकरे पस रहता था ) ॥ १० ॥ । 

भगवान्‌ श्रीकरष्णकरे आअक्रमणकरा समाचार पाकर 

रथी पोण्डूक भी दो अश्राहिणी सेनके साथ दीत्र 
ही नगरसे बाहर निकल आया ॥११॥ काडीका राजा 
पोण्डूकका मित्र था | अतः वह भीं उसकी सहायता 
करनेकरे सि तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ उसके पीके- 
पीछे आया । परीश्नित्‌ ! अव भगवान्‌ श्रीढरष्णने 
प्ण्डूकको देखा ॥ १२ ॥ पेोण्डूकने भी राङ्ख, चक्र, 
त्वार, गदा, शाङ्खधलुप ओर श्रीवत्सचिह्न आदि धारण 
कर्‌ रचे थे | उसके वक्षःस्थक्पर वनावटी कोस्तुम- 
मणि ओर बनमाला भी कटक रही धी ॥ १३ ॥ 


गरुडका चह भी चणा रक्खा था । उसके सिरर 
अमूल्य मुकुट था ओर कानोम मकराकृत कुण्डक 
जगमगा रहे थे ॥ १४॥ उसका यइ सरा-का-सारा 
वेष वनावटी था, मानो कोई अभिनेता रगमचपर 
अभिनय करनेके च्ि आया हो | उसकी वेष-भूषा 
अपने समान देखकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण खिलखित्कर्‌ 
हसने लगे ॥ १५ ॥ अब रातरुओने भगवान्‌ श्रीकृष्णपर 
्रि्यूल, गदा, सुद्रर, राक्ति, ऋष्टि, प्रास, तोमर, त्वार, 
पदट्टिरा ओर बाण आदि अल्ञ-शजोसे प्रहार किया ॥१६॥ 
प्रश्यके समय जिस प्रकार आग सभी प्रका प्राणियो- 
को जढा देती है, वैसे ही भगवान्‌ श्रीकृष्णे भी गद्‌) 
तलवार, चक्र ओरं वाण आदि शल्नाख्रसे पोण्ड्क तथां 
कारिराजके हाथी, रथ, घोडे ओर पैदक्की चतुरङ्गिणी 
सेनाको तहस-नहस्र कर दिया ॥ १७ ॥ . बह रणभूमि 
मगवरानके चक्रसे खण्ड-खण्ड इए रथ, घोडे, हाथी, ` 
मनुष्य, गधे ओर ऊयेसे पट गयी । उस समय रेखा 
माम हो रहा था, मानो वह भूतनाथ शंकरकी भयंकर 


ओर भी बढ रहा था ।॥ १८ ॥ वि 
अव भगवान्‌ श्रीकृष्णे पैण्ड्कसे कहा-रे पोण्ड्क | 
तते दूतके द्वारा कहया था किं मेरे चिह अल-रख्ादि 


त, 
४४ ॥ ३ 
क ~ श ४4 म “2 "व १ 






` व्याजयपिष्येऽभिधानं मे यच्वयाज्ञ सषा धृतम्‌ । 























 वजामि शरणं तेऽद्य यदि नेच्छामि संयुगम्‌ ॥२०॥ 
इति कषिप्ता शितेबाणेविरेथीडृत्य पौण्ड्कम्‌ । 
रिरोऽब्रशद्‌ रथाङ्गेन वजेणेन्द्रो यथा गिरेः ।॥२१॥ 


तथा काशिपतेः कायाच्छिर उत्दरत्य पत्रिभिः 


| ॥ | न्यपातयत्‌ काशिपुर्यां पडकोशमिवानिलः ॥२२॥ 


१ री 


एवं मत्सरिणं हत्वा पोण्कं ससखं हरिः 
दारकामाविद्यत्‌ सिद्धेगीयमानकथा्रतः ॥२३॥। 
स नित्यं भगवद्धयानप्रध्वस्ताखिख्बन्धनः । 
बिभ्राणश्चं हरे राजन्‌ खरूपं तन्मयोऽभवत्‌ ।२४॥ 
शिरः पतितमालोक्य राजदारे सङुण्डलम्‌ । 
किमिद. कस वा वक्त्रमिति संरिष्िरे जनाः॥२५॥ 
राज्ञः काशिपतेज्ञातवा महिष्यः पुत्रबान्धवाः । 
टः ` पारा हा हता राजन्‌ नाथ नाथेति प्रासूदन्‌ ॥२६॥ 
सुदाक्षणस्तख सुतः कृत्वा ससाविरधि पितुः 
निहत्य पितृहन्तारं यास्याम्यपचितिं पितुः ।॥२७॥। 
् इत्यात्मनाभिसधाय सोपाध्यायो महेचरम्‌ । 
` सुदश्चिणोऽचंयामास परमेण समाधिना ।॥२८॥ 


ग्रीतोऽविययक्तं भगवांस्तस्में वरमदाद्‌ भवः 
5 


पिरदन्कवधो ए स बरे वरमीम्तितम्‌ ।।२९॥ 





च श्रीमद्धागंवत [ अ° && 





= 


तून च्ू-मू मेरा नाम रख स्यि है | अतः मूर्ख॑। 
अव मे तुञ्चसे उन नामोको भी चछुडाकर रद्रैगा ! रही 
तेरे रारणमें अनेकी वात; सो यदि मँ तुश्चसे य॒द्रन 
कर सदगाता तरा इरण ग्रहण करूगाः॥ २०॥ 
भगवान्‌ श्रीकृप्णने इस प्रकार पेण्ड्कका तिरस्कार करक 
अपने तीखे वाणाँसे उसकरे रथको तोड-फोड डाटा ओर 
चक्रसे उसका सिर वैसे ही उतार च्या, जैसे इन्द्रने 
अपने वन्रसे पहा ङ्की चोधियोको उड़ा दिया था ॥२१॥ 
इसी प्रकार मगव्रान्‌ने अपने वर्णते कारिनरेशका 
सिर भी धड़से ऊपर उडाकर कारीपुरीमं गिरा दिया, जसे 
वायु कमल्का पुष्प गिर्‌ देती है ॥ २२॥ इस प्रकार 
अपने साथ डाह रखनेवाये परण्डरकको ओर उसे सखा 


कारिनरेराको मारकर भगवान्‌ श्रीकरऽ्ग अपनी राजरानी ` 


द्रास्कामे लट आये । उस समय सिद्भगण भगवानूकी 
अग्रतमयी कथाका गान कर रहे थे ॥ २३ ॥ परीक्षित्‌ । 
पोण्डूक भगवान्‌के रूपका, चह वड किसी माव्रसे हो 
सदा चिन्तन करता रहता था । इससे उक्षकरे सारे 
वन्धन कट गये | वह भगवान्‌का वनवर्टी तेप धारण 
किये रहता था, इससे वार-वार उसीका स्मरण होनेके 
कारण वह भगवान्‌के साख्स्यको ही प्राप्त इ ॥२५॥ 

इधर कारीमें राजमदहर्के दरपराजेपर एक कुण्डक 
मण्डित सुण्ड गिरा देखकर टोग॒तरह-तरहका संदेह 
करने लगे ओर सोचने ल्मे कि ध्यह क्या है, यह 
किंसका सिर है ¢ ॥ २५५ | जव यह माद्टम दभा किं 
वह तो कारिनरेशका दही सिर है, तव रानिर्यो, राज- 
कुमार, राजपसिरके ठोग तथा नागरि रो-रोकर विपि 
करने ल्गे--हा नध ! हा राजन्‌ | हय-हाय | 
हमारा तो सवेनाश हो गयाः ॥ २६ ॥ कारिनरेदाका 


पुत्र था सुदक्षिण | उसने अपने पिताका अन्त्येष्टि- 


स्कार करके मन-दी-मन यह निश्चय किया किं अपने 
पितृघधातीको मार दही मे पिताक ऋणसे उऋण हो 
सगा । निदान वह अपने कुच्धुरोहित ओर आचयोकिं 
साथ अव्यन्त एकाग्रतासे भगवान्‌ शकरकी आर[धना 
करने खगा ॥ २७-२८ ॥ काशी नगरीमे उसकी आरा- 
धनासे प्रसनन होकर भगवान्‌ शंकरने बर देनेको कहा । 


सुदक्षिणने यह अभीध वर्‌ मगा कि स॒न्चे मेरे पितघाती- 


^ # ; 


1 फः क ॥-1 [५ | य्‌ ४ $ + + ~ 


५4 

त 1: | 

|, 
7, 


भ० ६९] 
दक्चिणाभं परिचर बाहणेः समम्रतिजम्‌ । 
अभिचारविधानेन स चाग्निः प्रमथैवेतः ।॥२०॥ 


साधयिष्यति संकृस्पमव्रह्मभ्ये प्रग्रोजितः । 
इत्यादिष्टस्तथा चक्रे कृःगापाभिचरन्‌ व्रती ॥२१॥ 
ततोऽग्चिरुत्थितः ङइण्डान्सतिमानतिभीपणः । 
तप्तताप्रशिखएमश्वरङ्गारो द्रारिलिचनः ॥३२॥ 
दप्रग्रभरक्टीद॑ण्डकोरास्यः सखजिह्धया 1 
आलिहन्‌ सुक्रिणी नसो विधुन्यंस्िरिखं ज्वलन्‌ ।३३। 


पद्यां तारग्रमाणास्यां कम्पयनवनीतलम्‌ । 


` सोऽभ्यधावद्‌ इतो भरत द्रां प्रदहन्‌ दिशः ।। ३४ 


तमाभिचारदहनमायान्तं दारकोकसः । 


विलोक्य तत्रस॒ः सवे वनदाहे मुंगा यथा ॥३५५॥। 


अक्षे सभायां क्रीडन्तं भगवन्तं भयातुराः । 


दशम स्कन्धं ` 


। सिद्ध करेगा ।' भगवान्‌ शंकरकी एसी आज्ञा प्राप्त करके 


, वह भगवान्‌ श्रीकृष्णके लये अभिचार ८ मारणका 
1 ~. ५ 
` पुरश्चरण ) कएने खगा ॥ ३०-३१ ॥ अभिचार परणं 


लोकोके एकमात्र स्वामी ! द्वारका नगरी इस 




























क 7 "क (ह 
` = 
ऋ 9 


# 


ह च्छ 
त 


के वधका उपराय वतटहये |॥ २९ ॥ भगवान्‌ शाकरने 
कहा- तुम त्राहमणोके साथ मिख्कर यक्ञके दवता 
ऋतवरभूत दक्षिणाग्निकी अभिचरवरिधिसे आराधना करो । 

इससे वह अग्नि प्रमथगणोके साथ प्रकट होकर 
ब्राह्मणोकरे अमक्तपर्‌ प्रयोग करनेसे तुम्हारा स्कव्प | 


एुदक्षिणने अनुष्ठानके उपयुक्त नियम ग्रहण किये ओर 


होते दी यज्ञकुण्डसे अति भीषण अग्नि मूतिमान्‌ होकर ` 
प्रकट इआ ! उसके केरा ओर दादी-मूछ तपे इए तेविके 
समान खाल-काल थे । ओंखोंसे अगारे वरस रहे ये ॥३२॥ 
उप्र दाष ओर टेदी श्कुवियोके कारण उसके मुखसे 
्ररता टपक रदी थी । वह अपनी जीमसे सुंहके दोनों 
कोने चाट रहा था | शरीर नंग-धडंग था | हाथमे 
त्रिक च्वि दए था, जिसे वह वार-वार घुमाता जाता 
था ओर उससे अग्निवी कपटे निकठ रदी थी ॥३३॥ 
ताडके पेडके समान वडी-वडी टोगं थीं | वह अपने 
वेगसे धरतीको कंपाता इआ ओर उ्वाठाओंसे दसो 
दिशाओंको दग्ध करता इआ द्वारकाकी ओर दौड़ा ओर 
वात-की-व्ातम द्वारकाके पास जा पर्हुचा । उसके साथ _ 
वहृत-से भूत भी थे ॥ ३४ ॥ उस अभिचारकी आगको ` 
विल्ुल पास आयी दई देख द्वारकावासी वैसे ही डर 
गये, जंसे जग्मे आग क्गनेपर हरिनि डर जते. 
हैँ ॥ ३५ ॥ वे लोग . मयभीत होकर भगवानकरे पास | स॒ 
दौड इए आये; मगान्‌ उस समय समामे चोसर खेल ` 

रहे थे । उन छोगोने भगवानसे प्राधना की- तीनों 


1 
दु 

क 
नक 





मस्म होना चाहती है । आप हमारी रक्षा कीन्ि । ` 
आप्रके सिवा इसकी र्षा ओर कोई वर्‌ 
सकता ॥ ३६ ॥ शरणागतवत्सर भगवान्‌ने देखा किं 
हमारे खजन भयभीत हो गये हैँ ओर पुकारपुकारकर 
व्िकलताभरे स्वरसे हमारी प्रार्थना कर रेह; ततर 


4 १. 


उन्होने हंसकर कहा--डरो मतः मै तमलोगोकी र्ता 
== 1 न च 






























| | -  सवैस्यान्तवबंहिःसाक्षी कृत्यां माहेश्वरीं बिथः । परीकित्‌ । भगवान्‌ सबके बाहर-भीतर्क) जानने 
¦ क वाठे हैँ | वे जान गये किं यह काशीसे ची इई 


तदिषाताथं (५ 
विज्ञाय तद्विषाताथ पा्वस्थं चक्रमादिशत्‌ ।।२८॥॥ 1 जनि व 


्र्कोखितिमं ९, अपने पास दही विराजमान चक्रसुदशनको आज्ञा 

तत्‌ रिग्रतिमं सदशनं र ९ &.\. 
दी ॥ ३८ ॥ मगान्‌ सुकुन्दका प्यारा अस्र सुददान- 

जाज्वस्यमान प्रख्यानठम्रभम्‌ । चक्र कोटिकोटि सृथेकि समान तेजखी ओर प्रस्यकाटीन 


अग्निके समान जाज्वल्यमान है । उसके तेजसे आका, 
ट दिशाँ ओर अन्तरिक्ष चमक उठे ओर अव उसने उसु 

चक्र अङकन्दास्तमथाात्रमादयत्‌ ॥२९॥। | अभिचार-अग्निको कुचल उद्य ॥ ३९ ॥ भगवान्‌ 
छृत्यानलः अ्रतिहतः स रथाङ्गपाणे- रृष्णके असख छुददानचक्रवकी राक्तिसे कृत्यारूप आगका 
मुह दटूट-्ट गया, उसका तेज नष्ट ह्यो गया, राक्ति 


खतेजसा खं ककुभोऽथ रोदसी 


रखरोजसा स सृप भम्रयुखो निदरत्तः। कुण्ठित हो गयी ओर वह वहसे दोटकर काी आ 
| बाराणसीं परिसमेत्य सदक्षिणं तं गयी तथा उसने ऋलिज आचायेकि साथ सुदक्षिणको 
(1 |¦ - छि र.) जलाकर भस्म कर दिया | इस प्रकार उसका अभिचार ` 
॥ ( उसीके विनाडका कारण इआ ॥ ४० ॥ कत्याके षीछे- 
| चक्र च॒ विष्णोस्तदयुप्रविष्टं पीछे सुदर्यनचक्र भी कासी पर्हुचा | कारी वड़ी 
4 वाराणसीं साडसभाल्यापणाम्‌ । विशा नगरी थी । वह वड़ी-वड़ी अयासियिं, सभामन, 


= य बाजार, नगरदवार; रोके शिखर, चहारदीवासियों, 
सगाप्रराद्ल्ककएिसङल 1 टक्कर क [९ क [१ भ भ 
क ० खजाने, हाथी, घोडे, रथ ओर अन्नोके गोदामसे 


सकोशदस्त्यधरथानरशाखाम्‌ ॥४१॥ एुसनित शी । भगवान्‌ श्रीकृष्णके सुदशनचक्रने सारी 
द्श्वा वाराणसीं सँ विंष्णोधक्रं सुदशंनम्‌ । | कारीकौ जलकर भस्म कर दिया ओर पिर बह 
न नल 1 परमानन्दमयी रीवा करनेव्राछे भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास्‌ 
 , भयः पावग॒ुपातिषठत्‌ कृष्णसाङ्धिष्टकमणः ॥४२॥ | लौट आया ॥ ४१-४२ ॥ 
य एतच्छ्रावयेन्मत्यं उत्तमश्छोकविक्रमम्‌ । जो मनुष्य पुण्यकीतिं भगवान्‌ श्रीकृष्णके इस चसि- 
4 को एकाग्रताके साथ सुनता या सुनाता है, वह सारे 
समाहितो वा शृणुयात्‌ सवेपापे; प्रच्यते ॥४३॥ | पपोसे द जाता है ॥ ४२ ॥ 

-- नर+ - 
। इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्कन्धे उत्तराधें 
| पौण्डूकादिवधो नाम षट्‌पष्टितमोऽभ्यायः ॥ ६६ ॥ 





अथ सप्तषष्टितमोऽध्यायः 


ः द्विविदका उद्धार | 
राजोवाच < राजा परीक्षितने पूा--भगवान्‌ बल्रामजी सर्ब 


दाक्तिमान्‌ एवं सि-प्रक्यक। सीमासे परे, अनन्त है [& 
उनका खरूपर, गुण, . रील च = 








4 ४. १ 











` ऋ 





अ० ६७ | दश्चम स्कन्धं ५४५ 











अनन्तस्याप्रमेयस्य यदन्यत्‌ कृतवान्‌ प्रथु; ॥ ९ ॥ | वाणीके विषय नहीं ह | उनकी एक-एक टीला लोक- 
मर्यादासे विलक्षण है, अनधौकिंक है । उन्होने ओर जो 
कुछ अदधत कमं किये हों, उन्दः मँ पिर सुनना चाहता 


द्र॥ १॥ 
श्ीद्ुक उवाच श्रीश्युकदेवजीने का--प्रीश्षित्‌ ! द्विविद नामका 
द एक वानर था । वह भोमाघुरका सखा, सुम्रीवका मन्त्री 


नरक सखा कचिद्‌ द्विषेदा नाम वानरः । ओर मेन्दका शक्तिराटी माई था | २ ॥ जव उसने छुना 


कि श्रीङ्गष्णने भोमासुरको मार डा, तत्र वह अपने 

मित्रकी मित्रताके ऋणसे उऋण होनेके व्ये राषटू-विंष्व 

सख्युः सोऽपचिति ुर्बच्‌ वानरो राषट्ूविषुवम्‌। | करप उतारू हो गया । वह वानर वङ़ड़ नगरे 

गवि, खानों ओर अहीरोकी वस्तियोमे आग ख्गाकर 

पुरग्रासाकरान्‌ धोषानदहद्‌ बह्धिुत्घुजस्‌ ।। ३ ॥ | उन्दं जलने व्गा ॥ ३ ॥ कभी वह बड़े-बड़े पडाडको 

उखाडकर उनसे प्रान्त-के-प्रान्त चकनाचूर कर देता 

ओर विप करके एेसा काम वह आनतं (काल्यावाड) 

आनर्तान्‌ सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरिः 1। ४ ॥ | दमं दी कता था । करोकि उपक मित्रको माल 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसी देरामें निवास करते थे ॥ % ॥ 

कचित्‌ समुद्रम्यखो दो्याघुरकषप्य तञ्जलम्र। | दिविद वानरम दस हजार हाधिर्योका वर था । कभी- 

कभी वह दुष्ट समुद्रम खडा हो जाता ओर हासि 

शात्‌ नाभायुतग्राणो वेलाकरूखानमज्जयत्‌ ॥ ५ ॥। | इतना जक उञछकता किं समुद्रतटके देदा इव जते ।५] 

वह दुष्ट बड़े-बड़े ऋषि-सुनियोके आश्रमोकी सुन्दरःखुन्दर 

आश्रमी पियुख्यानां स्वा भग्नवनस्पतीन्‌ | टता-वनस्पतियोको तोड़-मरोककर चौपट कर देता ओर 

3 उनके यज्ञसम्बन्धी अग्नि-कुण्डोमे मलमूत्र डाठ्कर अग्नियोको 

अदूषयच्छदधनसूत्रेरनीन्‌ वेतानिकान्‌ खरः 1 & ॥ | दूषित कर देता ॥ ६ ॥ जैसे भगी नामका कीडा दूसरे 

कीडको ठे जाकर अपने विक्मे वंद कर्‌ देता है, वैसे 

दी वह मदोन्मत्त वानर च्ियों ओर पुरूषोंको ठे जाकर 

निक्षिप्य चाप्यधाच्छैलैः पेशस्कारीव कीटकम्‌।।७॥। | पाकी वाट्य तथा युम ल देत । र 

वाहरसे बड़ी-बड़ी चद्ठानें रखकर उनका समह॒ वंद कर 

एवं देशान्‌ विप्रह्वन्‌ दपयंथ ङरच्ियः देता ॥ ७ ॥ इस प्रकार वह देरावासियंका तो तिरस्कार 

करता ही, ङुलीन च्ियोको भी दूषित कर देता था। 

शरुत्वा सुलकितं गीतं गिरिं रैवतकं थयो !। ८ 1 | एक दिन बह दुष्ट सुललित संगीत सुनकर रैवतकं 

| परव॑तपर गया ॥ ८ ॥ 

तत्रापर्यद्‌ यदुपतिं रामं पुष्करमाङिनम्‌ | वहं उसने देखा कि यदुवरशिरोमणि वल्समजी 

| सुन्दर-सुन्दर युवतियोके शुम विराजमान हैँ | उनका 

एक-एक अङ्ग अव्यन्त सुन्दर ओर दानीय है ओर 

` सुदशेनीयसरवाङ्गं  रलनायुथमध्यगम्‌ ।। ९ ॥ । वक्षःस्थलपर कमलकी मात्म लटक री है ॥ ९ ॥ 

1 ता =्~--- (व ---- ् 
भा० स० खं० २. ६९- 


# 
+ कै 
= 


सुग्रीवसचिवः सोऽथ राता मेन्दसख वीर्यवान्‌ 1 २ ॥ 


[क 


कचित्‌स शेखानुत्पाव्च तेदेशास्‌ समचूणेयत्‌ । 


पुरूपात्‌ योपितो दकः क््माभरद््रोणीगहासु सः। 





[क 
च ॥ र 

द्द = ~ 
= नी न भा 


५९४६ 





श्रीमद्भागवत 


| अ० &७ 


व्व ्व्व्व्व्य्व्व्य्व्व्य्य्व्य््य्यव------------------ च्य 


गायन्तं वारुणीं पीत्वा मदबिह्वललोचनम्‌ । 


` विभ्राजमानं वपुषा भ्र॑भिन्नमिव वारणम्‌ ।।१०॥ 


दष्टः शाखघ्रगः शाखामारूटः कस्पयंन्‌ द्रुमात्‌ । 
चक्रे किंलकिलाशन्दमात्मानं सम्प्रदर्शयन्‌ ।११॥ 
तस्थ धाष्टयं कपेबींष्य तरुण्यो जातिचापलाः | 
हासप्रिया विजहसुबंरुदेवपरिग्रहाः ॥१२॥ 
ता हेरुयामास कपिभरकषेपेः सम्पलादिभिः। 
दशंयन्‌ खगुदं तासां रामस्य च निरीक्षतः १३ 
तं आरव्णा प्राहरत्‌ कद्ध बल; प्रहरतां वरः। 

स वश्चयित्वा ्रावाणं मदिराकरुशं कपिः ॥१४। 
गृहीतया हेलयामास धूतंस्तं कोपयन्‌ हसन्‌ । 
निभिय कर्शं दष्टो वासांसखास्फारयद्‌ बलम्‌॥१५॥। 
कदथीटरत्य बरुवान्‌ विग्रचक्रे मदोद्धतः । 

तं त्याविनयं द्रा देशांश तदुपद्रतान्‌ १६ 


क्रद्रो य॒सलमादत्त हलं चारिजिघांसया । 


द्विविदाऽपि महावीयः शाटयुदयम्य पाणिना ॥१७॥ 


अभ्येत्य तरसा तेन वरं॑मूधन्यताडयत्‌। 


वे मधुपान करके मधुर संगीत गा रहे ये ओर उनके नेतर 
आनन्दोन्मादसे विद्व हो रहे थे । उनका शारीर इसु 
प्रकार शोभायमान हो रहा था, मानो कोई मदमत्त 
गजराज हो | १० | वह दुष्ट वानर बरक्षोकी राखाओंपर्‌ 
चद जाता ओर उन्हे अकश्चोरं देता | कभी सिये 
सामने आकर किंक्कारी भी मारने च्गता ॥ ११ ॥ 
युवती ख्ि्यो खभावसे दी चञ्चल ओर हास-प्िसमें रुचि 
रणनेवाटी होती हे । वल्रामजीकी लिय उस वानी 
दिठाई देखकर हसने व्गीं ॥ १२ ॥ अव वह वानर 
भगवान्‌ वल्रामजीके सामने दी उन क्ियोकी अवहेटना 
करने लगा | वह उन्दँ कभी अपनी गुदा दिखाता तो 
कभी भींहे मटकाता, फिर कभी-कभी गरज-तरजकर 
सुह वनाता, घुडकता | १२ ॥ ब्रीरशिरोमणि वर्रामजी 
उसकी यह चेटा देखकर क्रोधित हो गये । उन्होने 
उसपर पत्थरका एक टुकड़ा फंका । परंतु द्विविदने उससे 
अपनेको वचा लिया ओर ञ्लपटकर मधुकल्दा उखा छया 
तथा बटरामजीकी अहेकना करने लगा । उस धूर्त 
मधघुकक्राको तो फोड़ दही डाटा, ल्ियोके व्र भी फाड़ 
डाले ओर अव बह दुष्ट हंस-हंसकर वल्रामजीको करोधित 
करने र्गा | १४-१५॥ परीक्षित्‌ ! जव इस प्रकार 
वत्छान्‌ ओर मदोन्मत्त द्विधिद बल्रामजीको नीचा दिखाने 
तथा उनका घोर्‌ तिरस्कार करने खगा, तव उन्होने उसकी 
दिठई देखकर ओर उसके द्वारा सताये दए देरोकी 
दुदंशापर विचार करके उस श्रको मार डाकनेकी इच्छसे 
करोधपूरव॑क अपना हल-मूसक उठाया । द्विविद भी वडा 
वलवान्‌ था । उसने अपने एक ही हाथसे राक्का पेड 
उखाड़ ठ्या ओर बड वेगसे दोडकर बट्रामजीके सिर- 
पर उसे दे मारा । भगवान्‌ बकराम पवेतकी तरह अविचल 
खड़े रहै । उन्होने अपने हाथसे उस व्ृक्षको सिरपर 


न्क य  ? [4 त 


चव च 
च ~: "(ऋः 


तु सक्षणा सर्धं पतन्तमचलो यथा ॥१८॥ गिरते-गिरते पकड़ लिया ओर अपने सुनन्द नामक मूसलसे 


उसपर्‌ प्रहार किया । मूस ल्गनेसे द्विविदका मस्तक ` 
फट गया ओर उससे खूनकी धारा बहने व्गी । उस ` 
समय उसकी रेसी सोमा इई, मानो किसी पवेतसे गेखूका 
सोता बह रहा हो । परंतु द्विविदने अपने सिर फटनेकी 
को$ परा नदं की । उसने कुपित होकर एक दूसरा 


भ ४ ५४ ४१, 


ग्रतिजग्राह बक्वान्‌ सुनन्देनाहनच तम्‌ 


सखहतमस्तिष्को षिरेजे रक्तधारया ॥१९॥ 


> ण 
॥॥ 





 गिरियथा गेरिकिया प्रहारं नादुचिन्तयन्‌। ___ कोई पला नह ५ , - 
१. प्रमत्तमिव | २. यन्द | 


अ० 8७ | 


दशम स्कन्धं 


५४७ 









नागाननाय 7 मभ ्कन्न्कन्य 





पुनरन्यं सथ॒स्किप्य कृत्वा निष्पत्रमोजसा ॥२०॥ 
तेनाहनत्‌ ससक्षद्धस्तं वरः शतधाच्छिनत्‌ । 
ततोऽन्येन रूपा जघ्ने तं चापि शतधाच्छिनत्‌ ॥२१॥ 
एवं युध्यन्‌ भगवता भग्ने भग्ने पुनः पुनः । 
आदरष्य संतो व्रक्षान्‌ निर्क्षमकरोद्‌ वनम्‌ ॥२२॥ 
ततोऽगुश्चच्छिलावपं बलस्योप्यमपिंतः । 
तत्‌ सवं चुणेयामास रीय! मुसलायुधः ।२२॥ 


अ 


स बाहू तारुसंकाश। युष्टीकरत्य कपीश्वरः । 
आसाद्य रोदिणीपुत्रं सास्यां वक्षस्यरूरुजत्‌ \\२४॥ 
यादवेन्द्रोऽपि तं दोभ्थां त्यक्त्वा मसरललाङ्गठे' । 
जत्रावभ्यदयल्छरुद्धः सोऽपतद्‌ रुधिरं वमन्‌ ।२५॥ 
चकम्पे तेन पतता सरङ््‌ः सवनस्पतिः । 
पेतः इरुशादृल . वायुना नौरिवाम्भसि ।२६॥। 
जयशब्दो नमःखनब्द्‌ः साधु साध्विति चाम्बरे। 
सुरसिद्रनीन्द्राणामासीत्‌ कसुमवर्षिंणाम्‌ ॥२७॥ 


एवं निहत्य दविविदं जगदुव्यतिकरावहम्‌ । 


संस्तयमानो भगवाञ्जनेः स्वपुरमाविरत्‌ ।॥२८॥ 


बश्च उलाडा, उसे अआड्-्चू कर्‌ विना पत्तेका कर्‌ दिया 
ओर फिर उससे वखरामजीपर वड़े जोरका प्रहार किया । 
वट्‌मजीने उस ब्रश्चके सेकडों टुकड़े कर दिये । इसके 
वाद्‌ द्विविदने वड़े क्रोधसे दूसरा ब्क्ष चाया, परतु 
भगवान्‌ व्रटरामजीने उसे भी शतधा दिन्न-भिन्न कर्‌ 
दिया | १६--२१ ॥ इस प्रकार वह उनसे युद्र करता 
रदा । एक वृक्षक टट जानेपर दूसरा व्रश्च उखाइता 
ओर उससे प्रहार करनेकी चेष्टा करता । इपर तरह सव 
| वरश्च उखाङ़-उखाङकर लडते-टडते उसने सारे 
वनको ही वृक्षदीन कर दिया ॥ २२ ॥ वृक्ष नरे, 
तव द्विविदका क्रोध ओर भी वद गया तथा वह वदरत 
चिदटकर वट्रामजीके ऊपर वडी-वडी चश्चनोकी वपां 
करने क्गा । प्रतु भगवान्‌ वल्रामजीने अपने मूसक्से 
उन समी चश्ननोंको खे-खेख्मे द्वी चकनाचूर्‌ कर 
दिया ॥ २३ ॥ अन्तमे कपिराज द्विविद अपनी ताडके 
समान क्त्री वहसे धूसा वधिकर वल्रामजीकरी ओर 
इपरटया ओर पास जाकर उसने उनकी छातीपर प्रहार 
किया ॥ २४ ॥ अव्र यदुवश्रिरोमणि वट्रापजीने ह्- 
ओर मूसक अवल्ग रख दिये तथा क्रुद्ध होकर दोनों 
हाथसे उसके जन्रुस्थान ८ हंसी ) पर प्रहार किया । 
इसे वह वानर खून उगक्ता हआ धरतीपर गिर 
पड़ा | २५ ॥ परीक्षित्‌ । ओंँधी अनेपर जसे ज्म 


डोगी डगमगाने लगती है, वसे ही उसके गिरनेसे बडे- । 


बडे वृक्षों ओर चोवि्योके साथ सारा पर्व॑त हि 
गया ॥ २६ ॥ आकाङमे देवतालोग “जय-जयः, सिद्ध 
लोग (नमो नमः ओर बड़े-बड़े ऋषि-मुनि 'साधु-साधुष्के 
नारे लगाने ओर वल्रामजीपर शटोकी वर्षां करने 
लगे ॥ २७ ॥ परीक्षित्‌ । द्विविदने जगत बडा उपद्रव 
मचा रक्खा था, अतः भगवान्‌ वल्रामजीने उसे इष 
प्रकार मार डाक ओर पिरि वे द्यारकापुरीमे लोट अये । 
उस समय समी पुरजन-परिजन भगवान्‌ बल्रामकीं 
प्रशंसा कर रहे थे ॥ २८ ॥ 


---``~~~-टच्-ध्रट2-- ~ 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददामस्वन्धेः उत्तरार्धे 
द्विविदवधो नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥ 


~य र9ञ्््व्- ~ 


श | व. व~ ९" ज्ञटो । २. न्धे द्विविदवधः सपत्० । 











नोक 


# = = र 


^ 


१ 4.2 ~ हौ - => क 
१) नवरी 


1" 
7.“ 

# ९ ` ककिर क ४ | ॥ 
त 


1 व ॥ 
+ 7 ५५.५.५४ । 
॥ १ * ५ । # अन 
१ ड 14 „क 2. क, १.३ 4 १ 
„५ न्‌ ७ डं. 
ष," ६,» ॥- 
त + त 
१1 व 
॥ । »" ई # 
3 # 
# जँ | 





५४८ श्रीमद्भागवतं 





7 भी 








[ अ० &€ 





अथाष्टमोऽध्यायः 


कौरघोंपर वलरामजीका कोप ओर साम्धका विवाह 


श्रीद्युक उवाच 


दु्योधनखतां राजन्‌ रक्ष्मणां समितिंजयः 


स्वयंबरस्थामहरत्‌ साम्बो जाम्बवतीसुतः ॥ १ ॥ 


१ ति 


कोरवाः पितौ उचुदुविनीतोऽयमर्भकः 
कदथीट्रत्य नः कन्यामकामामहरद्‌ बलात्‌ \\ २॥ 
बधीतेमं दुविनीतं फं करिष्यन्ति इृष्णयः । 
येऽखत्परसादोपचितां दत्तां नो थञ्ते महीम्‌ ३1 
निगरहीतं सुतं श्रुत्वा य्येष्यन्तीह दृष्णयः । 
भग्नदपो समं यान्ति प्राणा इव रुसंयताः 1 ४ ॥ 
इति कर्णः शरो भूरियंज्ञकेतुः सुयोधनः । 
साम्बमारेभिरे बद्धं ङरुबद्धासमोदिताः ॥ ५ ॥ 


दृष्राचुधावतः साम्बो धातेराष्रान्‌ महारथः 


रग रुचिरं चापं तयौ सिंह इवेकटः ॥ ६ ॥ 
तं ते जिघ॒क्षवः कद्धास्तिष्ठ सिष्टेति भाषिणः। 
आसाद्य धन्विनो बाणेः कणाग्रण्यः समाफ्रिरन्‌।७]। 
सोऽपविद्धः इरश्रेष्ठ॒ इरुमियंदुनन्दनः । 

(= © अ, 
नाम्रष्यत्तदचिन्त्याभः सिंहः शुद्रसरगखि ॥ ८ ॥ 


विस्फज्यं रुचिरं चापं सर्वान्‌ विव्याध सायकैः। 





१. ताः प्रोचु° । २. ऽति° 


श्रीदयकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! जाम्बवती- 
नन्दन साम्ब अकेठे दी बहत वड़-वडे वीरोपर विजय 
पराप्त करनेवारे थे । वे स्वयंवरे स्थित दुर्योधनकी कन्या 
स्मणाको हर टये ॥ १ ॥ इससे कोको वड़ा क्रोध 
हआ, वे बोटे---ष्यह वालक वदरत टीट है | देखो तो 
| सह) इसने हमलोगोको नीचा दिखाकर वल्यपूव्क हमारी 
| कन्याका अपहरण कर च्या | व्ह तो इसे चाहती भी 
न थी॥ २॥ अतः इस टीटको पकड़कर वध ठो। 
यदि यदुवरीच्परेग रुष्ट भी होगे तो वे हमारा क्या व्रिगाड 
छेगे वे खेग हमारी ही कृपासे हमारी ही दी हई 
धन-धान्यसे पर्प्िण प्रथ्वीका उपभोग कर रहे है ॥ ३॥ 
यदि वे खोग अपने इस ल्डकेके वदी होनेका समाचार 
खुनकर यहां आयेगे, तो हमोग उनका सारा धमंड 
चूर्‌-चूर कर देगे ओर उन द्ोगोकिं मिजाज त्रैसे दी ठंडे 
हो जार्यगे, जसे संयमी पुरुष्के द्वारा प्राणायाम आदि 
उपा्योसे वशम की द्ईं॑इन्दिया | ४ ॥ रेसा विचार 
करके कणं, रा, भूरिश्रवा, यज्गकेतु ओर दुर्योधनादि 
वीरोने कुरुबंराके बड़-बृ्ोकी अनुमति टी तथा साम्वको 
पकड़ ठेनेकी तैयारी की ॥ "^ ॥ 

जव महारथी साम्बने देषा किं धृतरटके पुत्र मेरा 
पीडा कर रे है, तवर वे एक सुन्दर धनुष चद़ाकर्‌ 
सिंहके समान अकेठे ही रणमूमिमे उट गये ॥ ६ ॥ 
इधर कणको मुखिया बनाकर कौरवी धनुष चढाये 
इए साम्बके पास आ पर्हैचे ओर क्रोधम मरकर उनको 
पकड़ लेनेकी इच्छासे खड़ा रह ! खड़ा रह | इस 
प्रकार रक्कारते हए वाणोकी वपां करने खगे ॥ ७ ॥ 
परीक्षित्‌ ! यदुनन्दन साम्ब अचिन्धयेधयशाटी .भगवान्‌ 
श्रकृष्णके पुत्र ये । कौरोके प्रहारसे बे उनप्र चिद्‌ 
गये, जेसे सिंह तुच्छ हरिनोका पराक्रम देखकर चि 
जाता है ॥ ८ ॥ साम्बने अपने सुन्दर धयुषका टकार 
करके कार्णं आदि छः वीरोपर जो अलग-अलग छ 











„ कर्णादीन्‌ पदथान्‌ वीरांस्तावद्धियंगपत्‌ एथक्‌ ॥ ९ ॥ । रोपर सवार थे, छः वाणोसे एक साथ _अलग-अयग 








अ० ६८ | 








------------------------ --= =-= =-= ॥ न मि 


चतभिश्वतरो वादानेकेकेन च सारथीन्‌ । 





रथिनश महेष्वासांस्तसखय तत्तेऽभ्यपूजयन्‌ ॥१०॥ 
तंतु ते विरथं चक्कुथस्वारशथतुरो हयान्‌ । 


एकस्तु सारथिं जघे चिच्छेदान्यः शरसनम्‌ ॥११॥ 
तं वद्ध्वा बिरथीकरत्य दछरच्छरेण रवो युधि । 
कुमारं खख कन्यां च खपुरं जयिनोऽविशन्‌ ॥१२॥ 
तच्छ्रत्वा नार्दोक्तेन राजन्‌ संजातदरन्यवः । 


छुरून्‌ प्रत्युद्यमं चक्रसुप्रसेनभ्रचोदिताः \\१३॥। 


सान्त्वयित्वा तु तान्‌ रापः संनद्भान्‌ बरृष्णिपुङ्कवाद्‌ 


नेच्छत्‌ ङण वृष्णीनां करं कलिमरापहः ॥१४। 


जगाम हास्तिनपुरं रथेनादित्यवचंसा । 


बराह्मणैः लब्धे वृतथन्द्र ख ग्रहेः ।॥१५। 


गत्वा गजाह्थं रमो बाद्योपवनमाखितः । 


च 


उद्भवं प्रेपामाम्न 


सोऽभिवन्छाभ्विकापुत्रं भीष्मं द्रोणं च बाह्िकम्‌ । 


(- तेऽतिप्रीतासतमाकष्यं प्राप रामं सु्तमम्‌ 1 


तमचेयित्वाभिययुः सै भङ्गरुपाणयः \\१८\। 


^. ** रजंस्तेषां बुषु° । 


दशम स्कन्धं 


॥ 





= ~ = 


~~ 


वंरियोको वडा क्रोध आया । वे महराज उग्रसेनकी 










धरंतराघ्रं वुथुत्सया ॥१६॥ 


दुर्योधनं च दिधिवद्‌ रासमगतमन्रवीत्‌ 1१९७1 


५५८९, 





जि ` जि अ आः कि त ऋरि 





प्रहार किया ॥ ९ ॥ उनसे चार-चार वाण उनके 
चार-चार धोड़ंपर, एक-एक उनके सारथि्योपर ओर एक- 
एक उन महान्‌ धञुषधारी रथी वीरोपर छोडा । साम्ब 
इस अद्धत दस्तत्घवको देखकर विपक्षी वीर भी सुक्त- 
काष्ठे उनकी प्रासा करने व्गे ॥ १० ॥ इसके वाद्‌ 
उन छ्हों वीरोने एक साथ मि्कर साम्बको रथदीन कर 
दिया । चार वीररोनि एक-एक वाणसे उनके चार धोड़को 
मारा, एकने सारथीको ओर एकने साम्वरका धनुष काट 
डाव् | ११ ॥ इस प्रकार कौरवोने युद्धम वड़ी कठिना 
ओर कसे साम्बको रथद्ीन करके बोधि चिया । इसके 
वाद्‌ वे उन्हे तथा अपनी कन्या कश्मणाको चेकर्‌ जय 





मनते हए हस्तिनापुर कोट आये ॥ १२ ॥ 


परीक्षित्‌ ! नारदजीते यह समाचार सुनकर यदु- 


आज्ञासे कोरपंपर चढ़ाई करनेकी तेयारी करने खगे ॥ १३॥ 

वटरामजी कठडग्रधान कलियुगके सारे पाप-तापक्रो भिटाने- 

वाये है | उन्दोनि कुरुवंरियो ओर यदुवं रियेकिं ठडई-्रगड़- 

को ठीक न समज्ञा । ययपि यदुवंशी अपनी तैयारी पूरी कर 
तुके थे, फिर भी उन्दने उन्हें शान्त कर दिया ओर खयं 
सूर्यके समान तेजखी रथपर सवार होकर हस्तिनापुर 
गये । उनके साथ कुछ व्राह्मण ओर यदुघं शके बङ़-बूढ 
भी गये । उनके वीचम अल्रामजीकी पेसी शोभा हो 
रदी थी, मानो चन्द्रमा म्रहोसि धिरे इए हों ॥ १४-१५॥ 
हस्तिनापुर पर्हचकर वल्रामजी नगरके बाहर एक उप- 
वनम ठहर गये ओर कौरवोग क्या करना चाहते हे, 
इस बातका पता कगनेके ल्म उन्होने उद्धवजीको धृत- 
राष्ट्रे पास भेजा ॥ १६ ॥ 


त ॥ ४५, -क + ॥ £ ्ी 
न. क्वि क, 


> ` 


>+ न 4 क्ल, १ , -. ५/4 ३ & + 7 +. ह, 


उद्धवजीने कौरवोकी समामे जाकर धृतराष्टः भीष्प- 
पितामह) प्रोणाचाये, बाह्लीक ओर दुर्योधनकी विषिपूवक ` ` ` 
अम्यर्थना-बन्दना की ओर निवेदन किया किं बल्ामजी ` 
परे है ॥ १७ 1 अपने परम हितैषी ओर प्रियतम 
बलरामजीका आगमन सुनकर कौरवोकी प्रसनताकीं 
सीमा न रही 1 वे उद्भवजीका विधिपूेक सकार करके ' 
अपने हाथमे माङ्गव््ि सामग्री लेकर बर्एमजीकी 





+ , क 
[= 

#* ~ 

३ 





१ “ „` क्क 





















तं संगम्य यथान्यायं गामघ्यं च न्यवेदयन्‌ । 
 तेषांये तत्म्रभावज्ञाः प्रणेयः शिरसा बलम्‌ ॥१९॥ 
बन्धून्‌ डशरिनः शरुत्वा पृष्टा शिवमनामयम्‌ । 


परस्परमथो रामो बभाषेऽविङ्खवं वचः २०] 


शुण्ड क ड = । = 
+ 3. 4 


` उग्रसेनः क्ितीरोशो यद्‌ ब आज्ञापयत्‌ प्रथुः 


[र 


तदव्यग्रधियः श्वुत्वा ुरुध्वं माविरम्बितम्‌ ॥२१॥। 





य॒द्‌ युयं बहवस्त्वेकं जित्वाधमेण धामिकम्‌ । 


४ ॥ 
( | र # 11 $ नि 
४ # 1 1 त ति क + 
न छ क ष. + 1. च 9 4 ॥ 
प व नि ~ ~ + ~~ 
# त 1१ + ची *> १ +) +, ` + 4 


अबध्ीताथ तन्पृष्ये बन्धूनामेक्यकाम्यया ॥२२॥। 
वीयंगोयंबलोनद्भमात्मराक्तिसमं वचः । 
रयो चरुदेवस्य निम्योचुः प्रकोपिता; ॥२३॥। 
अहो महचित्रमिदं कारुगत्या दुरत्यया 1 


, आररकषत्युपानद्‌ वै शिरो ुङ्कटसेवितम्‌ ॥२४॥ 


1 एते यनेन सम्बद्वाः सहशाय्यासनाशनाः 


^  ष्णयस्तुरयतां नीता असदतनृपासनाः ।।२५।। 


र ज, 
7 => ४. 
= अ ्ः 
< त ॥ 
01 र + 1 त 


` चामरव्यजने शद्खमातपत्रं च पाण्डुरम्‌ । 

किरीटमासनं शय्यां थ॒जन्त्यसदुपश्षया ।।२६॥ 
~ ~ । 
यदूनां नरदेवलाज्छने- ` : 


त, क ह 4 ५ = 
क ^~ 
(+ ` . ऋ, ् १ | ॥ 
छ | कथ 9. छ 
" ,ी। श्री 
६. 9 
"व 


चक 







ॐ [1 
# ` ध ~ व ना" म ` 
आ, $ ¬>. श 
+~ भग ~, 4. 
# क 


श्रीमद्भागवत 








[1 
„2 >} ~ 

पैम ती १ 
ह: { दी, 6 > 


[ अ० ६८ 








अगवानी करने चले ॥ १८ | किर अपनी-अपनी 
अवश्या ओर सम्बन्धके अनुसार सव लोग व्रा मजी 
मिले तथा उनके सत्कारके च्वि उन्हे गो अर्पण की 
एवं अभ्य प्रदान किया । उनमें जो त्मेग भगवान्‌ बल- 
रामजीका प्रभाव जानते थे, उन्दनि सिर स्चकाकर उन्दँ 
प्रणाम किया ॥ १९ | तदनन्तर उन व्रेगोने परस्पर 

दूसरेका कुराक-मङ्गख पृ ओर यह घुनकर किं 
सव भाई-बन्धु सङुराक है, वर्शमजीने वड़ी धीरता ओर 
गम्भीरताके साथ यह वात कद्ी-। २० ॥ सर्वसमर्धं 
राजाधिराज महाराज उग्रसेनने तुमव्मगोको एक आज्ञा 
दी है । उसे तुमलेग एकाग्रता ओर सावधानीके साथ 
सुनो ओर अविकम्ब उसका पाटन करो ॥ २१ ॥ उप्र 
सेनजीने कहा दहै-- हम जानते हैँ कि त॒मोगेनि 
कयोने मिक्कर अधरमसे अके धर्मात्मा साम्बरको हरा 
दिया ओर वदी कर ल्या है| यह सव्र हम इसब्ये 
सह छेते हँ कि हम सम्बन्धियोमं परस्पर षट न पड़, 
एकता वनी रहै । ( अतः अव ञ्गड़ा मत वदाओ, 
साम्बको उसकी नक्धूके साथ हमारे पास्त मेज दो )।॥२२॥ 

परीक्षित्‌ | बल्रामजीकी वाणी वीरता, इारता ओर 
बल-पोरुपके उत्कषंसे परिपूर्णं ओर उनकी राक्तिके 
अनुख्प धा । यह वात सुनकर कुरवंदी क्रोधसे तिठ- 
मिला उठे । वे कहने ल्ग २३ ॥ “अदो, यह तो 
बड़े आश्वयंकी बात है | सचमुच काट्की चाख्को 
कोई टाक नहीं सकता । तभी तो आज पैरौकी जूती 
उस सिरपर चढ़ना चाहती है, जो भ्रष्ठ मुकुरे सुरो- 
मित है ॥ २४ ॥ इन यदुवशियोके साथ किसी प्रकार 
हमल्तोगोने विवाह-सम्बन्ध कर च्या | ये हमारे साध 
सोने-वेठने ओर एक पक्ति खने च्छो । हमटोगोने दयी 
इन्दे राजसिंहासन देकर राजा बनाया ओर अपने बरा- 
बर बना छया ॥ २५ ॥ ये यदुत्ररी वरः पंखा, राख, 
स्वेतछत्र, मुकुट, राजर्सिहासन ओर राजोचित शय्याका 
उपयोग-उपमोग इसलिये कर रहे ह किं हमने जान-बूञ्ञ- 
कर इस विषयमे उपेक्षा कर रकी है ॥ २६ ॥ बस- 
बस, अव्र हो चका । यदुवरियकि पास अव राजचिहं 
ट्नेकी आवद्यकता नदी, उन्॑ उनसे छीन लेना 


चाहिये । जैत सपको दघ पिना पित्नेवाखेके ल्यं 


दी हमार 


"पि 


क. 4 ^ 
द + कक, ७७ 


दिये इए राजचिहोको ` 





नन जच्य्य्य्य्य्य्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्व्व्यय्व----------------------- 


येऽखत््रसादोपचिता हि यादवा ठ्कर ये यदुवंशी हमप्षे ही व्रिपरीत हो रदे है । देखो 


तो भला हमारे ही कृपा-ग्रसादसे तो उनकी वदती इई 
आश्ञापयन्त्यद्य गतत्रपा बत्‌ ॥ २७] , ओर अव ये निठंन होकर दभीपर हंकंम चव्मने चरे 
हे । शोक दहै ! शाक है ! ॥ २७ ॥ जसे सिका रास 
भेडा नहीं छीन सकता, वैते ही यद्वि प्म, द्रोण, 
अजुन आदि करवीर जान-्रुञ्चकर न श्रेड दं) नदे 
द तो खयं देवराज इन्द्र भी "किसी व्तुका उपभोग 
कंसे कर सकते हँ १॥ २८ ॥ 

्रद्युकरदेवजी कहते हं--परीक्नित्‌ ! कर्वंरी 

अपनी कुटीनता, वान्धवो-पसिरघाव्े ८ भीष्मादि ) के 
वक ओर धनसम्पत्तिके घमंडमें चर्‌ हो रहे थे ¡ उ 
साधारण शिष्टाचारकी भी परसा नहीं की ओर वे भगवान्‌ 
वटरामजीको इस प्रकार दुवंचन कहकर हस्तिनापुर च्ट 
गये 1 २९ ॥ वट्रामजीने कौरोकी दष्टता-अशिष्रता 
देखी ओर उनक्रे दुधचन भी सुने । अव उनका चेहरा 
क्रोधसे तमतमा उठा । उस समय उनकी ओर देखातक 
नहीं जाता था | वे वार्‌-वार्‌ जोर-जोरसे हंसकर कहने 
टगे--॥२०॥ सच है, जिन दुष्टोको अपनी कुलीनता, 
वल-पौरुप ओर धनका घमंड हो जाता है, वे शान्ति नही 
चाहते | उनको दमन करनेका, रास्तेपर खछानेका उपाय 
समञ्चाना-युञ्चाना नही, बल्कि दण्ड देना है--टीक वैसे 
ही, जैसे पञ्ओंको ठीक करनेके ज्य डंडेका प्रयोग 
आवद्यकर होता है ॥ ३१ ॥ भला, देखो तो सदी-- 
सारे यदुवंशी ओर श्रीकृष्ण भी क्रोधसे भरकर ठ्डाईके 
व्यि तैयार हो रहै थे । मै उन्हं रानैः-दानैः समञ्ा- 
वुश्चाकर इन क्गोको शान्त करनेके लिये, सुख करने- 
के ल्यि यहं आया ॥ ३२ ॥ फिर भी ये मूखं रेसी 
दुष्टता कर रहे है ! इन्द शान्ति प्यारी नही, कलह 
प्यारी है । ये इतने धमंडी हो रहे हैँ कि बार-बार मेरा 
तिरस्कार करके गाल्ियौं बक गये हैँ |] २२ ॥ ठीक 
है, भाई ठीक दहै । पृथ्वीके राजाओंकी तो बात दही 
क्या, त्रिल्येकीके स्वामी इन्द्र आदि ठोकपाल जिनकी 
आज्ञाका पान करते है, वे उग्रसेन राजाधिराज नहीं 
है; वे तो केवर भोज, वृष्णि ओर अन्धकवंशी यादबोके 
ही स्वामी है! ॥ ३४ ॥ क्यो १ जो सुघमासभाको 


























कथमिन््रोऽपरि इरुभिभीप्मद्रोणाजनादिमिः । 
अदत्तमवरुन्धीत सिंहग्रस्तमिवरणः ।\२८॥ 
्री्युक उवा 
जन्मवन्धु्रिषो न्न द्रसदास्ते भरतपंभ । 
आश्रान्य्‌ रासं दुवाच्यमसम्याः पुरमाविशन्‌ ।२९॥ 
रूणां दाःसीर्यं श्रुत्वाचाच्यानि चाच्युत्‌ः। 


क, 


अवोचत्‌ कोपसंरब्धो दुष्््ष्यः प्रहसन्‌ यहुः ।२०॥ 
ननं नानामदोनद्राः शान्तिं नेच्छन्त्यसाधवः। 
तेषां हि प्रशमो दण्ड; पदानां ख्णुडो यथा ॥३१॥। 
अहो यदून्‌ सुसंरञ्धान्‌ ष्णं च कपितं शनेः 1 
सान्त्वयित्वाहमेतेषां शममिच्छननिहागतः ॥३२॥। 
त इमे मन्दमतयः कठहाभिरताः खलाः । 
तं मामवज्ञाय युहृदुभाषान्‌ मानिनोऽदधबन्‌ ।।३३॥ 
नोग्रसेनः किट विशभोजद्ष्ष्यन्धकेशरः । 
|= लोकपाला यस्यादेशायुबतिनः 1३९ 


 छमोऽजस्यते धेन पारिनातोऽगद्निपः\ 
` ९" बाद्रायणिसवाच । 


क ¬ । [1 0 











अधिकारमे करके उसमे विराजते है ओर जो देवताओके 





5 


= =, 
त न 
ककत = कैकः के 
~ ` # कान अकिः = 
1 7 = क ॥ 
 । त 
त ७३ 
>. ङि. = -2के ॥ क) 6 कै जेत 
+ 


(क 7 का ^ 3 
॥ ता प 


जितः को 


क का व 





५५५२ 


भ्रीमद्भागवत्‌ 


[ अ० &€& 








आनीय युज्यते सोऽसौ न किलाध्यासनाहणः ३५५ । 
यस्य पादयुगं साक्षात्‌ भीरुपास्तेऽखिङेश्चरी । 
स नाहेति किर श्रीशो नरदेवपरिच्छदान्‌ ।३६॥ 


यस्याङ्परिपङजरजोऽखिररोकपाले- 
मेष्युत्मेधतय॒पासिततीर्थतीर्थम्‌ । 
ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कठाः कलायाः 
श्रीर्चोद्हेम चिरमस्य चपासनं कर ।।२७॥ 
शते ङरुभिद्॑तं भूखण्डं ब्रष्णयः किख । 
उपानहः किंरु वयं खयं तु रवः रिरः ॥३८।। 
अहो एेस्वयमत्तानां मत्तानामिव मानिनाम्‌ । 
असम्बद्धा गिरो रुक्षाः कः सहेतायु शासिता ॥३९॥ 
अद्य निष्कोरीं पृथ्वीं करिष्यामीत्यमपितः । 
गृहीत्वा हलत्तस्थो दहन्निव जगत्रयम्‌ ॥४०॥ 
लाङ्गलाग्रेण नगरणद्विदायं गजाहययम्‌ । 
विचकप स॒ गङ्खायां ्रहरिष्यन्नमपित ¦ ॥४१॥ 


जलयानमिवाघूणं गङ्गायां नगरं पतत्‌ । 


आकरष्यमाणमालेक्य कौरवा जातसम्भ्रमाः ॥ ४२ 


तमेव शरणं जग्मुः स्कटम्बा जिजीविपवः । 


सलक्ष्मणं पुरस्कृत्य साम्बं प्राज्ञरयः प्रथम्‌ ॥४२॥ 


नन 





बरक्ष॒पारिजातको उखाडकर ठे आते ओर उसका उप- 
भोग करते हैँ; वे भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी राजरसिदासनके 
अधिकारी नहीं है ! अच्छी वात है! ॥ ३५] सारे 
जगत्की सखामिनी भगवती कक्ष्मी खयं जिनके चरण- 
कमलोंकी उपासना करती है वे लक्ष्मीपति भगवान्‌ 
श्रीकृष्णचन्द्र छत्र, चवर आदि राजोचित सामग्रियोको 
नहीं रख सकते ॥ ३६ ॥ टीक है भाई | जिनके 
चरणकमल्छकी धृक संत पुरुषोके द्वारा सेवित गङ्गा आदि 
तीर्थोको भी तीथं वनानेवाटी है, सारे लोकपाठ अपने- 
अपने श्रेष्ठ मुकुटपर जिनके चरणकमलकी धृट धारण 
करते है; ब्रह्मा, शकर, म ओर टक्ष्मीजी जिनकी कटा- 
की भी कल्य हैँ ओर जिनके चरणोकी धृट सदा-सर्व॑दा 
धारण करते हें; उन भगवान्‌ श्रीकृष्णके य्ि मलम, 
राजसिंदासन कट रक्वा है ! ॥ ३७ ॥ वेचारे यदुवंडी 
तो कोरवोंका दिया इभ प्रथ्वीका एक टुकड़ा मोगते 
दे । क्या खव | हमत्रेग जूती हैँ ओर ये कुरुवंसी 
खयं सिर है ॥ २८ ॥ ये छोग रेश्र्थसे उन्मत्त, धमंडी 
कौरव पागल-सरीखे हो रहे हैँ । इनकी एक-एक बात 
कटुतासे भरी ओर वेसिर-पैरकी है । मेरजेसा पुरुष-- 
जो इनका शासन कर सकता है, इन्दं दण्ड देकर इनके 
होरा ठ्किनि ठा सकता है --भलख, इनकी वातकी 
कैसे सहन कर सकता है १ ॥ ३९ ॥ आज मँ सार 
पृथ्वरीको ` कोरवहीन कर ड्धंगाः इस प्रकार कहते-कहते 
बलरामजी क्रोधसे एेसे भर गये, मानो त्रिव्योकीको भस्म 
कर देगे | वै अपना हर ठेवर खड हो गये ॥ ४० ॥ 
उन्होने उसकी नोकसे बार-बार चोट करके हस्तिनापुर 
को उखाड़ ल्या ओर उसे इवानेके व्ये बड़ क्रोधसे 
गङ्खाजीकी ओर खीचने व्गे ॥ ४१॥ 
हसे खीचनेपर हस्तिनापुर इस प्रकार कपे लगा, 
मानो ज्म कोई नाव डगमगा री हो । जब कोर्वेने 
देखा कि हमारा नगर तो गङ्खाजीमें गिर रहा है, तब वे 
धड़ा उे ॥ ४२ ॥ फिर उन व्योगोनि च्छषमणाके 
साथ साम्बको आगे किया ओर अपने मणोकी रक्षाके 
व्यि बुटुम्बके साथ हाथ जोङ्कर सर्शक्िनानू 
उनी भगवान्‌ बट्यामजीकी शरणमे .गय ॥ ४२ ॥ 





4 
त 


। अ० ६८ ] दञ्चम स्कन्ध ५५३ 











राम रामाखिराधार प्रभावं न विदाम ते। भोर कहने लगे-श्योकाभिराम बकरामजी | आप सारे जगत्‌- 

के आधार शेषजी हैँ | हम आपका प्रमाव नही जानते । 
म्ढानां नः इवुद्धीनां श्न्तुमहेस्यतिक्रमम्‌ ॥४४॥ | प्रमो | हमल््ेग मूढ़ हो रहे है, हमारी वुद्धि त्रिगड़ गयी है; 
इसन्यि आप हम्ेर्गोका अपराध क्षमा कर दीजिये ॥४५॥ 
आप जगत्‌की स्थिति) उत्पत्ति ओर प्रटयके एकमात्र 
कारण हैँ ओर खयं निराधार सित दै | सर्वशक्तिमान्‌ 
प्रमो ! बड़े बडे ऋषि-मुनि क्ठतेदहैकि आप चिदडी 


स्थित्युत्पच्यप्ययानां त्वसेको देतर्निराश्रषः । 


ठोकान्‌ क्रीडनकानीस ऋीडतस्ते वदन्ति हि ॥४५॥। 


क त ^ सीजनौ हं ओर ये सव्र-के-सव ठोक आपके दिक्ीने है ॥४५५॥ 
प अनन्त | आपके सहश्च-सहसर सिर हँ ओर आप खेट- 

भूमण्डलं ॒विभि सहस्र्थन्‌ । खेलमें ही इस भूमण्डकको अपने सिरपर रके रहते हैँ । 

| जत्र प्रयका समय आता है, तत्र आप सारे जगत्‌करो अपने 


अन्ते च यः खात्मनि रुद्रविश्च ४ भीतर टीन कर ठेते ह ओर केवरं आप्‌ ही वचे रहकर 
अद्धितीयरूपसे रायन करते हँ | ६ ॥ भगवन्‌ ! अप 

रोपेऽद्वितीयः परिरिष्यमाणः ।७६॥ | जगत्‌ सिति ओर पालनके व्यि विहुद्र स्वम 
शरीर ग्रहण किये इए हैँ । आपका यह क्रोध द्वेष या 

कोपस्तेऽखिलशिक्षाथ न ढेपान च मत्सरात्‌ । मसरके कारण नहीं है | य्ह तो समस्त प्राणिर्थोको 
शिक्षा देनेके व्यि है ॥ ४७ ॥ समस्त शक्ति्ोवो 
धारण करनेवाले सवप्राणिखश्ूप अविनाशी मगवन्‌ । 
त 6 आपको हम नमस्कार करते है । समस्त विश्वके रचयिता 
नमस्त सवभूतात्मन्‌ सव शकक्तिथरान्यय | देव ! हम आपको वार्‌-बार नमस्कार करते हैँ । हम 
विश्वकमेन्‌ नमस्तेऽस्तु त्वां बयं शरणं गताः ॥४८॥ श 1 । आप चा ण 
क धरीञ्चुकदेवजी कहते है परीश्चित्‌ ! कौरतरोका 

न नगर डगमगा रहा था ओर वे अव्यन्त धघवराहटमे पड़े 

एवं प्रपन्तैः संवि्नर्पमानायनैर्वङः । हए थे । जवर सव्र-के-सव कुरुवंशी इस्त प्रकार भगवान्‌ 
वकरामजीकी शरणमे आये ओर उनकी स्तुति-प्राधथना 

प्रसादितः संप्रसन्न मा भेष्टेस्यभयं ददौ ॥४९॥ | की व व प्रसन्न हो गये ओर “डरो मतः देसा कहकर 

ह ८58 2 उन्हं अभयदान दिथा ॥ ४९ ॥ परीक्षित्‌ ! दुर्योधन 
दुर्योधनः पारबहं ङञ्जरान्‌ ष्हायनास्‌ । अपनी पुत्री लक्ष्मणासे वडा प्रेम करता था | उसने 
[= 3 शतान्ययुतानि तरङग ४ द्हेजमे साठ-साठ वेके बारह सौ हाथी, दस हजार 
| ददा च दश्षरतान्ययुतानि तुरङ्गमान्‌ ॥ ५०1 घोडे सूर्के समान चमकते इए सोनेके छ: हजार 


६५1 


[ ऋ, 


बिभ्रतो भगवन्‌ सं सितिपालनतत्पर ॥४५७॥ 








। रथानां षटसदस्राणि रोक्माणां खयंवचंसाम्‌ । र्थ ओर सोनेके हार पहनी इई एक हजार दासि्ो 
(~ निष्ककण्टीनां सदस दुहितचत्सरः ॥५१॥ दीं ॥ ५०-५१ 1 यदुवशारिरोमणि भगवान्‌ बल्यम- 


९ ९ ने यह सव दषेन खीकार किया ओर्‌ नवटम्पति 
भ्रत्य त॒ तत्‌ सब भगवान्‌ सात्वतपभः । = | लप्मणा तथा म्बके साथ कौसोका अभिनन्दन 
सुतः सस्युषः प्रागात्‌ स॒हद्धिरभिनन्दितः॥५२). खीकार करके द्रकाकी यात्रा की ॥ ५२ ॥ 
९* स्ते खज रिक्षा० । २. बाद्रायणिरुवाच । ३. द्विशतसाहखं हयानामयुतानि च । < 
 भा० स० खं० २. ७०-- 
न ८ कः 3 


दन > अ+ ~ । † 4 
~ ग † > क व 






































५४ - + त ¦ > च § र च छ - ५ न -"बकर्वाश >; | न निन 
(^ नि = र॑ 8 
॥॥ र ॥ ८; 4 

2 








४ श्रीमद्भागवत [ अ० ६९ 
` -- ~ 
ततः प्रविष्टः खपुरं हलायुधः अब ब्रामजी दारकापुरीमें पट्च ओर अपने प्रेमी तथा 


ध समाचार जाननेके व्ये उत्सुक बन्धु-बान्धरववसे मिले । 
समेत्य बन्धूनलुरक्तचेतसः । उन्दने यदुवरिर्थोकी मरी समामे अपना वह सारा 


शशंस सवं यदुपुङ्खवानां चरित्र कह छुनाणः; जो हस्तिनापुरमे उन्होने कौरवक 

मध्ये सभायां इरुषु खचेष्टितम्‌ ॥५३॥ । साय क्षिया था ॥ ५३ ॥ परीक्षित्‌ ! यह ॒ हस्तिनापुर 
आज भी दक्षिणकी ओर ऊँचा ओर गङ्धाजीकी ओर 
कुछ छ्चका हआ है ओर इपत प्रकार यह भगवान्‌ वराम- 
सयुन्नतं दक्षिणतो गङ्गायामनुदश्यते ॥५४।। | जीके पराक्रमी सूचना दे रहा है ॥ ५४ ॥ 


अद्यापि च पुरं ह्येतत्‌ दवचयद्‌ रामविक्रमम्‌ । 


४ £ -----~र्छ-्व्दर------ 
14 ि । इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे 
3 हास्िनपुरकषरणद्ूपसङ्क्षणविजयो नामा्टष्ितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ 
~ 
अथेकोनसप्ततितमोऽध्यायः 
देवषिं नारदजीका भगवानकी गृ्टच्यी देखना 

श्री क उवाच भरीश्चुकदेवजी कइते हँ- परीक्षित्‌ | जव देवर्षि 

नारदने घुना किं भगवान्‌ श्रीकृष्णने नरकासुर ( भौमासुर ) 

नरकं निहतं श्चुता तथोद्वाहं च योषिताम्‌ । ` को मारकर अकेले ही हजारों राजक्कुमासियेकि साथ 


विवाह कर च्या है, तब उनके मनम भगवान्‌की रहन- 

कृष्णेनेकेन बह्ीनां तद्‌ दिदृश्चुः ख नारदः ॥ १॥ | सदन देखनेकी बड़ी अभिलाषा इई | १ ॥ वे सोचने 
खगे--अहो, यह कितने आश्चयैकी बात है किं भगवान्‌ 

चित्रं बतेतदेकेन वपुषा युगपत्‌ पथक्‌ । श्रीकृष्णने एक ही रारीरसे एक ही समय सोलह हजार 
॥. महटोमें अक्ग-अच्ग॒ सोलह हजार राजङुमारियाका 
` गृहेषु दयष्टसाहघं सिय एक उदावहत्‌ | २॥ | पाणिग्रहण किधा ॥ २॥ देवपिं नारद इस उभ कृतासे 
्‌ प्रित होकर भगवानकी खीला देखनेके च्यि द्वारका आ 
५ र इत्युत््ुको दारवतीं देवधरदरष्टुमागमत्‌ पर्हचे । वहकि उपवन ओर उद्यान खिञे हए रंग-बिरगे 
६ पुष्पोसे ल्दे वृक्षोसे पणं ये, उनपर तरह-तरदके 

/  प्राष्यतापवनारामद्विजाजिङ्ककनादताम्‌ ॥ २॥ | पक्षी चहक रटे ये ओर भरे गुल्ञार कर रे थे ॥ २॥ 
4 निर्मल जल्से भरे सरोधरोमें नीठे, खर ओर सफेद 
/  उत्छृव्ेन्दीवरम्भोजकहारङ्दोत्परः । | रगके भोति-भोतिके कमक विले हद ये । सुद (को$ 
क + छरितेष ३ ओर नवजात कमलोकी मानो भीड़ ही र्गी इहं थी । 
सरस्खच्चेः इूजितां दंससारसेः ॥ ४ ॥ क तार कल्म कर ति 

रं स्फारिकराजतेः दारकापुरीमें स्फटिकमणि ओर चाँदीके नो गख महक 
थे । वे फशं आदिमे जड़ी इई महामरकतमणि ( पन्ने ) 
खर्णैरत्नपर्च्छिदेः ॥ ५ ॥ | की प्रमासे जगमगा रे थे भौर उनमे सोने तथा हीरोकी 


५ =, वाइ यत्‌ । ^ 
च उवाह यत्‌| =" "क क 
= क #ः ).- भ । त ॥ # जै 


0 क ह त ~ 






1 का 


"4. चै # 
^ "4 | 
1] ति प ॥ ए » ~ ज्व --% 4 
रः = 





र अ० ६९ | ५ दकम स्कन्ध 





































विभक्तरथ्यापथचत्वरापणेः बहत-सी सामग्नियँ शोभायमान थीं ॥ ५ ॥ उसके राज- ` 
पथ ( बड़ी-बड़ी सङके ), गिरयो, चौरे ओर बाजार ` % | 
शा शस्भाभी रुचिरां स्राटयेः । वहत ही घ॒न्दर-घुन्दर ये । घुडसाट आदि प््यअकि 
रहनेके स्थान, सम-मवन ओर देव्-मन्दिरोके कारण _ 

संतिक्तमार्गाङ्गणवीथिदेहरीं उसका सोन्दयं ओर भी चमक उदा था | उसकी 


सडको, चोक, गरी ओर द्रवार्जोपर छिडकाव किया 

गया था । छोटी-खोदी ञ्चडि्याँ ओर वडे-वड़े डे जगह- 

¶ह पहरा रहे थे, जिनके कारण रास्तोपर धप नदी 
| आ पती थी॥ ६ ॥ 

तस्थामन्तःपुरं श्रीमद्चितं सवंधिष्ण्यपेः 1 उघी द्वारका नगीम भगवान्‌ श्रढ्ष्णका वहत ही 

घुन्दर अन्तःपुर था । बड़े-बड़े छोकपार उसकी प्ूना- 1 

प्रशंसा किया करते ये । उसका निर्माण कटेन | 

तत्र॒ पोडदभि; सदसहरैः समलंङृतम्‌ । विश्वकर्मानि अपना सारा कला-कौराक, सरी काीगी 1 

च्गादीथी ॥७॥ उस्र अन्तःपुर ( रनिवास ) में | 

विवेद्कतमं शौरे; परनीनां भवनं महत्‌ ॥ ८ 1) | भगव्रानक्षी रानियोके सोल्ड इजारसे अधिक मह 

| शोमाथमान थे, उनर्मेसे एक बडे भवनम देवर्षिं नाप्द- 

जीने प्रवेश किया ॥ ८ ॥ उस मह्मं मूंगोके खमे, 

इद्रनीलमयेः छृडयेजरगत्या चाहतत्विपा ।। ९.॥ | वदूधके ऽत्म-उचम कञ्जे तथा इनद्रनीठ-मणिङ्गी दीवार 

व जगमा री थीं ओर वर्होकी गचें भी एसी हद्रनीक ` 

वितानेनि्ितस्त्वष्रा य॒क्तादामविरम्बिभिः। मणिरयोसे बनी इई थीं, जिनकी चमक किकी प्रकार 

कम नहीं होती ॥ ९ ॥ विश्वकर्भाने बहत-से रेसे 

चरोवे बना रक्े थे, जिनमें मोतीकी ल्डिरयो की आकरं 

दा्ीमिनिम्ककष्टीभिः सुवासोभिरलंछृतम्‌ । कटक रदी थीं । हाथीरदोतके वने इए आसन ओर 

| परण ये, जिनमे श्रेष्ठ-प्रष्ठ मणि जडी इई थी ॥ १०॥ 

पुम्भिः सकञ्चुश्ोष्णीषंइवस्नमणिङ्कण्डले ; ॥११॥ | बइत-सी द्षियाँ गलेमे सोनेक। हार पहने ओर धुन्दर 

वसो से घुसजित होकर तथा बहूत-से सेवक भी जामा- 

रत्नप्रदीपनिकरद्य तिभि्निरस्त- पगड़ी ओर घुन्दर-सुन्दर वख पहने तथा जङाऊ कुण 

| | धारण किये अपने-अपने कामम व्यस्त थे ओर मइलक्री 

भ्वान्तं विचित्रवरुभीषु शिखण्डिनोऽङ्क 1 | रोभा बद। रहे थे ॥ ११ ॥ अनेकों रल्न-प्रदीप अपनी 

5 जगमगाहटसे उसका अन्धकार दूर कर रहे थे । : 

चृत्यन्ति य॒त्र विहितागुरुधूपमधै- धूप देनेके कारण अरोखोसे धूओं निकल रहा था । 

उसे देखकर रंग-बिरगे मणिमय छनेपर बैठे इए मोर 
जन्ये निर्यान्तमीक्ष्य घनबुद्धय उन्नदन्तः ।॥१२॥ | बदल्यके भभसे कूक-कूककर नाचने लगते ॥ १२ ॥ ` 


१. थिशोभां । २. प्रा° प्रतिमे “` ˆ *वारितातपाम्‌ ॥° इश्च छोकके बाद 'उत्छुर 
घु सरस्सुञ्चेः कूजितां हंससारसेः ॥ पुथिितोपवनारामद्विजाच्छख्नादिताम्‌ ।› इस 


। | नी { | ३. त१।५ आवक यत्नतः कार्स्त्यन्‌ लि सतव पे जाङमरकतोत्तम्‌ः | ५. ष्‌! ३ बासो मपि 


[+ ५. 
पततपताकाध्वजवारतातपाम्‌ ।॥६॥ 


हैरेः कौशलं यत्र तवष्रा कार्स्न्येन द्थितम्‌ ॥७॥ 


विष्टब्धं  विद्रूमस्तम्भर्ेदूथफलकोत्तमेः । 


दान्तेरास्नपयंङ्मण्युत्तमपरिष्कतेः ॥१०॥ 


1 





न नी च. 
कि - ~= ह + क 





। ६ ॥ २ 
| +48 श्ीमद्धागवेतं [ अ० ६९ 
| (\ 71 च्च्य च्व 
। तसिन्‌ समानगुणरूपवयस्सुवेष- देवषिं नारदजीने देखा किं भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस महट- 





















भ 


की स्वामिनी रुक्मिणीजीके साथवरैठे हए हैँ ओर वे 
अपने हाथां भगवान्‌को सोनेकी डँडीवाले चैवरसे हा 
क! रही है । यपि उस मह््मे रुकमिणीजीके समान 
ही गुण, खूप, अवस्था ओर वेषर-भूपावाटी सहस्रो 


दार्यं भी हर समय विद्यमान रहती थीं ॥ १३॥ 


दासीसदस्रयुतयालसवं गरहिण्या । 
|, विभ्रो ददं चमरव्यजनेन स्क्म- 


दण्डेन सात्वतपतिं परिवीजयन्त्या ॥१३ । 


तं संनिरीक्ष्य भगवान्‌ सहसोत्थितः शरी- नारदजीको देखते दी समस्त धार्भिोके सुकुटमणि 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुकिमिणीजीके पठ्णसे सहसा उठ खड 
दए । उन्दोनि देवर्षिं नारदके युगलचरणोमे मुकुट युक्त 
सिध्से प्रणाम किया ओर हाथ जोड़कर उन्दं अपने 
आसनपर बेठया ॥ १४ ॥ परीक्षित्‌ ! इसमे संदेह 
नहीं कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण चराचर जगत्‌कै परम गुरु 
हैँ ओर उनके चरणोक[ धोवन गङ्गाजल सारे जगतुक्ो 
पवित्र करनेवाला है, फिर भी वे परमभक्तश्रत्सल ओर्‌ 
संतोके परम आदर्श, उनके खाभी है । उनका एक 
अपाधारण नाम ब्रह्मण्यदेव भी दहै | वे ब्राह्मणेक्ो ही 
अपना आराच्यदेव मानते हँ | उनका यह नाभ उनके 
गुणके अनुरूप एवे उचित ही है । तभी तो भगवान्‌ 
श्रीङकष्णने खयं ही नारद जीके पौव पलारे ओर उनका 
चरणाभ्रत अपने सिरपर धारण किया ॥ १५ ॥ न 
शिरोमणि नरके सखा सदशी पुराणपुस्प भगवान्‌ 
नातयणने शाज्ञोक्त विधिसे देवपिंरिरोभणि मवान्‌ 
नारदकी पूजा की । इसके वाद अमृतसे भी मीठे 
पितु थोड़े शन्दोमे उनका ख्वागत-सत्कार किया ओर 
फिर कह्ा---प्रमो ! अपि तो खयं समग्र ज्ञान, वराग्य, 
धमं, यश, श्री ओर रेश्वयंसे पणं हँ ¦ आपकी हम 
क्या सेवा करं ! ॥ १६ ॥ 

देवषिं नारदने कहा- भगवन्‌ ! आप समस्त 
डोकोके एकमात्र खामी हैँ । आपके ल्थि यह कोई 
नयी बात नहीं है किं अप अपने भक्तासि प्रेम 
करते हँ ओर दुटेको दण्ड देते है । पए्मयशखी प्रमो | 
आपने जगतकती स्थिति ओर रक्षाके द्वारा समस्त जी्वोका 
कल्याण करनेके च्वि स्वेच्छासे अवतार ग्रहण किया 


।{ पयेज्तः सकरुधर्मभृतां बरिषटः । 


आनस्य पादयुगरं शिश्सा फिरीर- 
जुष्टेन साञ्नलिरवीविशदाक्षने स्वे ॥१४॥ 
तस्यावनिज्य चरणौ तदपः खमूर्धा- 
बिभ्रजगद्गुरूतरोऽपि सतां पतिर्हि । 
॑ ब्रह्मण्यदेव इति यद्गुणनाम युक्छं 
| ओ | तस्येव यचरणशौ चसरोपतीर्थम्‌ ॥१५॥ 
| छम्पूज्य देवचऋपिवयस्रपिः पुराणो 
नारायणा नरसखो विधिनोदितेन । 
वाण्याभिभाष्य मितयाग्रतमिष्टयातं 


प्राह प्रभो भगवते करवाम हे किम्‌ ५१६॥ 






गर्द उवाच 






नेवाद्धतं त्वयि विभोऽखिरुलोकनाथे 
ह. मत्री जनेषु सकररेषु दमः खलानाम्‌ । 
॥ =  . निःश्रेयसाय . हि जगत्थितिरक्षणाम्यां 







भ "मे 


"+ 


अ० ६९ | 





दशम्‌ स्कन्ध 


९१५.9 





यायक रिरि यिय 


दृष्टं तवाडघिगुगरं जनतापवं 








ब्रह्मादिभिहदि विचिन्त्यमगाधबोधेः । 


संसारष्रूपपतितात्तरणावलम्बं 


ध्यायंशराम्ययुगरहाण यथा स्मृतिः खात्‌ ॥१८॥ 
ततोऽन्यदाविद्‌ गेहं छष्णपरन्याः स नारदः । 
योगे्रेरस्याङ्ग योगमायाविचित्छया \) १९ 
दीग्यन्तमक्षेस्तत्रापि प्रियया चोद्धवेन च। 
पूजितः परया भक्त्या प्रस्युत्थानासनादिभिः ॥२०॥ 
पृष्टधाविदुषेवासौ कदाऽऽयातो भवानिति । 


क्रियते किं यु पूण्यनापपू्णेरसदादिभिः \२१॥ 


(क [ कने क 


अथापि ब्रूहि नो चबन्‌ जन्मेतच्छोभनं कुरु । 
स॒ तु विसितउस्थाय तृष्णीमन्यदगाद्‌ गृहम्‌ ।॥२२॥ 
तत्राप्यचष्ट गोचिन्दं सखयन्तं संताञ्छिशल्‌। 


ततोऽन्यसिन्‌ गहेऽपश्यन्मजनाय कृती्यम्‌।।२३॥ 


जुहन्तं च बितानाग्नीन्‌ यजन्तं पश्चभिमेखेः 1 


१, शिघ्रून्‌ सुतान्‌ । 





है || १७ ॥ यह बड़ सौभाग्यकी वात दहै किं आज 
। मुञ्चे अपकरे चरणकपटोके दर्शन इए दै । अपके यें 
चरणकमल सम्पूण जनताको परम साम्य, मोक्ष देनेमं 
समथं हँ | जिनके ज्ञानकी को$ सीमा दी नहींहै, वै 
ब्रह्मा, शंकर आदि सदा-सवदा अपने द्यम उनका 
चिन्तन करते रहते हैँ । वास्त्रं वरे श्रीचश्ण ही सं्ार- 
ख्प वुर्पम॑ गिरे इ व्ोगोके बाहर निकल्नेके च्वि 
अवरटम्बन हैँ | आप रेसी कृपा कीजियि किं अपके उन 
भटोकी स्मृति सवदा बनी रहे ओर म चहि जँ 
जेसे रह, उनके ध्यानम तन्मय रद्र ॥ १८ ॥ 

परीन्षित्‌ । इसके वाद देवमिं नारदजी योगेश्वरोके 
भी ईद्वर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी योगमायाका रहस्य जाननेके 
व्यि उनकी दूसरी पत्नीके महल्मे गये ॥ १९ ॥ 
वहाँ उन्होने देखा कि मगतरान्‌ श्रीकृष्ण अपनी प्राभप्रिया 
ओर उद्धवजीके साथ चौसर खे रहं हैँ। वहं भी 
भगवान्‌ने खड हो र उनका खागत किया, आसनपर्‌ 
वैठाया ओर विविध स्मग्रियोदारा बड़ी भक्रितसि उनकी 
अचा-परूना की ॥ २० ॥ इक्षके बाद भवान्‌ने नारद- 
जीसे अनजानकी तरह पूडा--*आप यहा कब पधारे । 
आप तो पपिपू्णं आस्माराम-- आप्तकाम है ओर हमलोग 
है अपूर्ण । रूसी अवस्थामे भस हभ आपकी क्या सेवां 
कर सक्ते हँ ॥ २१ ॥ रिरि भी ब्रह्मखख्प नारदजी | 
आप कुछ-न-कुछ आज्ञा अवध्य कीजिये ओर हमं 
सेवाका अवसर देकर हमारा जन्म॒ सफक कीजिये ।' 
नारद जी यह सव देख-सुनकर चकित ओर विस्मित 
हो रहे थे । वे वसे उठकर चुपचाप दूसरे महल्मे चले 
गये ॥ २२ ॥ उस महल्मं भी देवषिं नारदने देखा कि 
मगश्रान्‌ श्रीकष्ण अपने नन्हे-नन्हे ब्चोको दुर रहे है| 
वहसे फिर दूसरे महत्मे गये तो क्या देखते हैँ कि 
भगवान्‌ श्रीक्रष्ण स्नानकी तैयारी कर रहे है ॥ २३ ॥ 
८ इस प्रकार देवि नारदने. विभिन महत्यैमे भगवानक्तो 
भिनन-मिन कायं करते देखा 1) कीं वे यज्ञकुण्डोमं 
हवन कर रहे हैँ तो कहीं पञ्चमहयायज्ञोसे देवता आदिकी 
आराधना कर रहे है । कहीं ब्रह्म्णोको भोजन करा 












भोजयन्तं द्विजान्‌ क्षापि शञ्ञानमवशेपितप्‌ ॥२४॥ | रदे है, ते की यक्षका अवशेष खयं भोजन कर रे 


ण " व्वकधे == ` क, कके = ` क" ` अः च 


` 
“+ 
+ + व 


र 


५५५८ 





कापि संध्याणपासीनं जपन्तं बह्म वाग्यतभ्‌। 
एकत्र .चासिचमेभ्यां चरन्तमसिवर्त्मसु ॥ २५ 


० 


अच्वेगंजं रथः क्रापि विचरन्तं गदाग्रज । 
कचिच्छयानं पयंङ्‌ स्तूयमानं च वन्दिभिः ।॥२६॥ 
मन्त्रयन्तं च कसिधिन्मन्तरिभिधोद्धवादिभिः। 
जलक्रीडारतं क्रापि वारणुख्याबलाद्रतभ्‌ ॥ ९७॥। 


कुत्रचिद्‌ द्िजयख्येभ्यो ददतं गाः खलंकृताः। 





इतिहासपुराणानि शृण्वन्तं मङ्गलानि च ॥२८॥ 
| हसन्तं हासयकथया कदाचित्‌ प्रियया गृहे । 


कापि धमं सेवमानमथंकामो च इत्रचित्‌ ॥२९॥ 















ध्यायन्तमेकमासीनं पुरषं प्रृते; पर्‌ । 
थवन्त रूच्‌ कापि कोमेभगिः सपर्यया ॥३०॥ 
वन्तं विग्रहं केथित्‌ संधि चान्यत्र केरवभ्‌ । 


५  उत्रापि सरहरामेण चिन्तयन्तं सतां शिवम्‌ ॥२१॥ 
(1 पुत्राणां ददिेणां च कारे विष्युपयापनम्‌ । 
दारवैरस्तस्सद्शेः कल्पयन्तं विभूतिभिः ॥९२॥ 
ग्रापनोपानयनेरपत्यानां ‡ महोत्सवान्‌ । 
वीक्ष्य योगेश्वरेशस्य येषां लोका विसिसिरे ॥२३॥ 
यजन्तं सकलान्‌ देवान्‌ कापि करत॒भिरूनितेः । 
पूतंयन्तं चिद्‌ धमं इपाराममठादिभिः ॥३४॥। 
चरन्तं स्रगयां कापि हयमारुह्य सेन्धवभ्‌ । 
तत पयन्‌ मेभ्यान्‌ परीतं यदुपुङ्गवं, ॥२५॥ 





। 3 
> = च 
क # ^ 


= (त 


हि 1 


आीमद्धागवत 
-----------______-_-_-_-~-_--~-~-~-~-~-~--~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~--~-~-~-~-~-_-~-_-_-~-~-~-~-~-~-~-~~~_ ययी 


गायन्तं । २. ध्याय “नास्ते क चात्मानं | ३. मभोगे° | 


[ अ० ६९ 





| जः यक, 


हे ॥ २४ ॥ कहीं संव्या कर रहे है, तो कटी मौन 
होकर गायत्रीका जप कर रह हैँ । कहीं हाथमे ढक- 
तच्वार केकर उनको चर नेके पैतरे बदर रहे है ॥२५॥ 
कही घोडे; हाथी अथवा रथपर्‌ सवार होकर श्रीकृष्ण 
विचरण कर रहे हैँ । कहं पल्गपर्‌ सो रहे है, तो कीं 
बंदीजन उनकी स्तुति कर रहे है| २६॥ किसी 
महल्मे उद्धव आदि मन्त्रियोके स।थ किकी गम्भी 
विषयपर परामश कर रै रहै, तो कीं उत्तमोत्तम 
वारङ्गनाओंसे धिरकर जक््रीडा कर रहे है ॥ २७ ॥ 
कीं भेष ॒ब्राह्मणोंको वल्ञाभूषणसे सुसनित गौओंक्रा 
दान कर रहे है, तो कहं मङ्गटमय इतिहाद्-पुराणोंका 
श्रवण कर रहे है ॥ २८ ॥ कीं किंसी पतनीके महल्मे 
अपनी प्राणप्रियाके साथ हास्य-विनोदकी बातें करके 
हस रहे है, तो कहीं धमका सेवन कर रहे है । कह 
अथंका सेवन कर रहे है--धन-संप्रह ओर धनबृद्धिके 
कायम लगे इए है, तो कहीं धर्मायुकूढ गृहस्थोचित 
विषर्योका उपभोग कर रहे हँ ॥ २९ ॥ कीं एकान्तमे 
बेठकर प्रकृतिसे अतीत पुराण-पुरुषका ध्यान कर रहै 
है, तो कहीं गुरुजना को इच्छित मोग-सामग्री समर्पित 
करके उनकी सेवा-॒ुषा कररहे हं॥ ३० ॥ देवर्षि 
नारदने देखा किं भगवान्‌ श्रीकृष्ण किसीके साथ युद्धकी 
बात कर रहे है, तो किक्षीके साथ सन्धिकी। कही 
मगवान्‌ बर्रामजीके साथ बेठकर सत्पुरुषोके कल्याणे 
बारेमे विचार कर रहे हैँ ॥ ३१ ॥ कं उचित समयपर्‌ 
पुत्र ओर कन्याओंका उनके सच्छा पत्नी ओर वरोवें 
साथ बड़ी धूमधामसे विधिवत्‌ षिव।ह कर रहे ह ॥३२॥ 
कहीं घरसे कन्याओंको विदा कर रहे है तो कदी 
बुखनेकी तेषारीमे लगे हए है । येोगेखर भगवान्‌ 
श्रीकृष्णके इन विराट्‌ उत्सवोको देखकर सभी ठोग 
विस्ित-चकिंत हो जते थे॥ ३३॥ कहीं बड़े-बड़े 
यज्ञोके द्वारा अपनी क्रूप देवताओंका यजन-पूजन ओर 
कहीं कूं, बगीचे तथा मठ आदि बनबाकर इष्ापूतं धमंका 
आचरण कर रहे है ॥ २४ ॥ कीं शरेष्ठ यादवोंसे धिरे 
हए सिन्धुदेशीय धोड़ेपर चढ़कर ग्रगया कर रहे हँ ओर 
उसमे यज्ञे ल्म मेष्य पद्यभका द्वी वध कर रे 








अ० ६९ | दच्चम्‌ स्कन्धं ` ५५९ भ 








वेष बदलकर छिपे ख्पसे सवका अभिप्राय जाननेके च्य 


कचिचचरन्तं योगेशं तततद्धावयुथत्सया ॥।३६॥। | विचरण कर दे है । को न हो, भगवान्‌ योगेश जो 
दे ॥ ३६ ॥ | 
अथोवाच हृषीकेशं नारदः प्रहसननिव । परीक्षित्‌ | इस प्रकार मनुष्यकी-सी टी करते इए 
हृषीकेदा भगवान्‌ श्रीकृष्णकी योगमायाका वैभव्र॒ देकर 
देवषिं नारदजीने सुसकराते इए उनसे कहा-॥ ३७ ॥ 
ध्योगेश्वर ! आत्मदेव | आपकी योगमाया ब्रह्माजी आदि 
बड़े-बड़े मायावियोवे स्थि भी अगम्य है | परंतु हम 
आपकी योगमायाका रदस्य जानते दै; क्योकि आपके 
चरणकमर्गेकी सेवा करनेसे वह खयं द्वी हमारे सामने 
प्रकट हो गयी है ॥ ३८ ॥ देवताओंके भी आराच्यदेव 
भगवन्‌ | चौदह सुबन आपके सुयङासे पप्पिणं हो रहे 
है । अब सस्रे भज्ञा दीजियि कि मै आपकी त्रिसुवन- 
प्यटामि तवोद्रायन्‌ रीरां ुबनपावनीम्‌ ।|३९॥ | पानी लीलकरा गान करता भा न लोकमि विचरण 
कह | २९ ॥ 
भरीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहः- देवपिं नारदजी ! सै ही 
धर्मका उपदेशाक, पालन करमेवाख ओर उसका अनुष्ठान 
ब्रह्मन्‌ धमस वक्ताहं कृतां तदुमोदिता करनेवार्गेका अनुमोदनकतां भी = | इसय्य संसाएको 
धमकी शिक्षा देनेके उदैश्यसे ही मेँ इस प्रकार धम॑का 
आचरण कशता द । मेरे प्यारे पुत्र! तम मेषी यह 
योगमाया देखकर मोहित मत होना ॥ ० ॥ 


अब्यक्तरिङ्गं ्रकृतिष्वन्तःपुरगृहादिषु । ई ॥ २५ ॥ भौर की प्रजाम तथा थन्तःपुरके महि 
। 
| 


योगमायोदयं वीक्ष्य मादुषीमीयुषो गतिम्‌ ।३७॥। 


विदामयोगमायास्ते दुर्दशा अपि मायिनाम्‌ 1 
योगेधरात्मन्‌ निभौता भवत्पादनिषेवया ३८ 


अनुजानीहि मां देव रोकांस्ते यश्चसाऽऽप्ठुतान्‌ 1 




















तच्छिक्षयष्टोकमिममास्ितः पत्र मा खिद्‌; ॥४०॥ 


श्रीञ्चुक उवाच भ्रीश्कदेवजी कहते है इस प्रकार मगान्‌ ` 
इत्याचरन्तं सद्धमोन्‌ पावनान्‌ गृहमेधिनाम्‌ । श्रीकृष्ण गृहस्थोको पवित्र करनेवाखे श्रेष्ठ धर्मोका आचरण ` ` 


तमेव सर्वगेहेषु सन्तमेकं दद्म ह' ४१ | क रहे ये । यदपि वे एक दही है फिर भी देवषिं -4 | । 
$ष्णसानन्तीस् योगमायामहोदयम्‌ । नाएजीने उनको उनकी प्रत्येक पत्नीके महरम अर्ग- 4 
§ अरग देखा ॥ ४१ 1]. मगवान्‌ श्रीढृष्णक्री शक्ति अनन्त 
धेर ऋषिरभूद्‌ विखितो जातकोतुकः । ४२। | है । उनकी योगमायाका परम रेशचयै बरार देखकर ` ' 
ह्यर्भकामधरेषु कृष्णेन श्रद्ितात्मना \ देवप नारदके विस्मय ओर कौ तइ्की सीमा न रही ॥ 9 २. । ६ | 

दारकामै भगवान्‌ श्रीकृष्ण गृहस्थकी मेति रसा भचरण ; 
सम्यक्‌ सभाजितः परीतसतमेवालसरन्‌ मयो ॥४२॥ कते थे, मानो धर्म, अर्थं ओर कामरूप पुरुषाथमि । 


। । 

# मनुष्यपदवीमनुबतेमानो ९ | 
एव्‌ मुष्यपदवी मरुबतुम्‌। ॥ उनकी बडी श्रद्धा हो । उन्होने देवर्षिं नारदका बहुत __ ` 
नारायणोऽखिलभवाय गृरीतशक्तिः । ' सम्मान किया । वे अत्यन्त प्रसन्न होकर मगवानक्षा ` 


$ ह ~क - १ क्‌ 6 द 





। त = ५ 

1 = च ध = > ब 3. ~ मे ३4 १ 

= ॥ द्ध (द ङ ४ ध 4 न, क 9; ~ „2 
=, "क ^ 


% त म 
¢ ॥ + + त 4 ॥ 4 = ~~ न अवा - - क 
॥ {3 १ 8} (9 भ = ॐ नि धक. ^ = ति ~> 








६ 
& ९० श्रीमद्भागवत [ अ० ७० 
' ^ वि) ~व जज जजजजजजजज=--------------------------- 
॥¢ &.| रेमेऽङ्ग॒षोडशसहस्रवराङ्गनानां स्मरण करते हए बहास चरे गये ॥ ४३ ॥ राजन्‌ ! 
|| भगवान्‌ नारायण प्षारे जगतके कल्याणके ल्मे अपनी 
| 3 इस प्रकार मनुष्योकी-सी टी कते हैँ | द्वारकापुरीमें 
॥; - व | सोलह हजारसे भी अधिक पलिया अपनी सल्न एवं 
[ \ यानी वि (~ ६ 
१ ह बिधविलयाद्बहततिहेठुः प्रमभरी चितवन तथा मन्द्-मन्द्‌ मु्तकानसे उनकी सेवा 
। | 5 करती धीं ओर वे उनके साथ विहर करते ये| ४४॥ 
| ¶ कमाण्यनन्यविषयाणि हरिथकार । भगवान्‌ श्रीकृष्णने जो टीलाए्‌ की है, उन्दं दूसरा कोई 
॥ ' नहीं कर सक्ता । परीश्षित्‌ ! वे विश्चक्री उत्ति, स्थिति 
# | यस्ट गायाति श्ण }व्यनुमोदते वा ओर प्रलटयके परय कारण है | जो _ उनकी र्ट कार्ओंका 
| गान, श्रवण ओर गान-श्र्रण करनेवागेका अनुमोदन 
[^ 7 करता है, उसे मोक्षके मागंखरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
# 0 भूरि £ (५ 0 ० ०१ ^ जा ^ = 
| क्तभवेद्‌ भगवति द्यपवगेमागे ॥४५॥ | चरणेमिं परम प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ४५५॥ 
१! | =-= - 
। इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दराभस्कन्धे' उत्तरम 
कृष्णगाहस्थ्यदशनं नामेकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥ 
--ग- टय 
ञ्‌ ~ 9 
थ सप्तितमोऽ्याय्‌ः 
भगवान्‌ श्रीङ्कष्णकी नित्यया ओर उनके पास जरासन्धके केदी राजाओंके तक्रा आना 
18 (| श्रीक उवाच | श्रीञ्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! जब सवेरा 
; | | # ह < होने च्गता, बुक्कुर ८ पुरगे ) बोखने टगते, तव वे 
¦ | अर्धपस्युषह्त्ताया इक्छटाच्‌ इूजताऽशपन्‌ । श्रीकृष्ण-पलिियौँ, जिनके कण्टमे श्रीकृष्णने अपनी भुजा 
= डाक रखी दहै, उनके विछोहकी आशङ्कसे व्यकुक हो 


। ५ पतिभिर्माधिः = ४ उ त 
।  गदीतकण्टः व्यो विरहातुराः ॥ १। जाती ओट उन सरश कोतने गतीं || १ ॥ उस 
कि 1 तीत बन्दिनः समय पास्जिातकी घुगन्धसे सुव।सित भीनी-भीनी वायु 
स्रूल्वच्‌ कृष्ण चधयन्ताव वान्दन; । बहने कगती | भीरि तारश्लरसे अपने सङ्गीतकरो तान छेड़ 
निए = देते । पक्षियोंकी नीद उचट जाती ओर वे वंीजनोकी 
गृ ण मन्दर ; ॥ ५ > स्यि 
९ । 1 | मति भगवान्‌ श्रीकृष्णको जगानेके च्वि मधुर खरसे 


ङ भुजपारासे वेधी रहनेपर भी आटिद्गन छट जनेकी 


पिम्भणविर्टेषात्‌ प्रियबाहुन्तरं गता ॥ ३॥ आराङ्कासे अत्यन्त सुहावन ओर पित्र ब्रह्मसुहूतंको भी 
| असह्य समक्षे क्ती थीं ॥ २ ॥ भवान्‌ श्रीङृष्ण 


त्राते यतं उत्थाय वार्ुप्््य माधवः। | प्रतिदिन ब्राह्मे ही उठ जाते भोर यड धोकर 

` छ {आ अपने मायातीत आत्मखखूपका ध्यान करने काते । उस्‌ 
॥ 1 द्यो प्रसन्नकरण आत्मानं तमसः परम्‌ । ४।! । समय उनका रोम-रोम आनन्दसे दिक उठता था ॥४॥ 
~ , 8 | १ इ =~--# `` 
^" : न्ये एकोन ° । २. बाद्रायणिख्वाच | 


(+ = 
~ 


न 
"र रे । @ क ति 
"च व 
गक = >, 8 








च = णि ¢ 
त २ । >~ + [; > ॥ ४ , 
"न. जैः ' + ~न = वी न | ह 
[4 न्वे ^ ऋ च, >" कै # ( क्र ~ ऋग ५ = अ 
क क 9 शोः ४ ८ 1 











इ >~ 


| ` {41 


+ 
- ॐ 































अ० ७० | दशप स्कन्ध 
~~~ ~~ द | + 
एं खयजञ्यातिरनन्यमन्ययं परीक्षित्‌ ! भगवान! वह आम्य सजातीय, 


विजातीय ओर खगतमेदसे रहित एक, अखण्ड दहै | _ 
क्योकि उस्म किसी प्रकारकी उपति या उपाधिके कारण 


खस्ंखया निस्य निरस्तकल्मपम्‌ | होनिवाया अत्य स्का यस्तिव नही है । ओर गही । 1 
| कारण है कि वह अविनाशी सत्य है । जसे चन्रमा 
ब्रह्माख्यमखोवनाश्चहेतभिः सूयं भारि नेत्रइन्दियके द्वारा ओ नेत्रन्दिय चन्द्रमा 


सूयं आदिक द्वारा प्रक।रित हती है, वैसे वह आत्म- 
क खरूप दूप्रेके द्वारा प्रकादित नही, खयप्रका् है । | 
स्वशक्ति क्षितभावनिद्रतिम्‌ । ५॥ | इक्तका कारण यद्‌ है कि अपने खख्यमं ही सदा-सवंदा {. 
ओर काट्की सीमाके परे भी एकरस शित टइनेके 
कारण अविया उसका स्पा भी नहीं कर सक्ती। | 
इपीसे प्रकादय-प्रकाशकमभाव उसमे नहीं है । जगतक्ती = ॥ 
उत्पत्ति, स्थिति ओर नाशकी कारणमूता ब्रहि, | 
विष्णुरक्ति ओर रद्रशाक्तियोके ह।रा केवर इस ॒वातकां ४ 
अनुमान हो सकता है कि वह खरूप एकरस सत्ताख्प 
ओर आनन्दखरूप है । उसीको समश्चानेके च्य श्रह्मः 
। कहा जाता है । मावान्‌ श्रङृष्ण अपने उसी 
आत्मखल्पका प्रतारन व्यान करत ॥ "~ ॥ इसके बाद्‌ 
वे व्रिधिपू्वक निम ओर पित्र जख्मे लन करते | 
फकिर्‌ शुद्ध धोती पहनकर, दुपद्रा ओदकर यथाविधि 
नित्यकम सन्ध्या-व्रंरन आदि क्रते । इसके वाद हवन 
करते ओर मौन होकर गायत्रीका जप कएते | क्योन हो, ` 
वे सद्पुरुपोके पात्र आदश जो है ॥ ६ ॥ इक्के बाद 
सर्यादय होनेके समय सूर्योपस्यान करते ओर अपने 
कलाखरूप देवता, ऋषि तथा पितरोका तपण क्ते | ` 
फिर कुतख्के बडे-वूदं ओर ब्राहमणोकी विषिपू्क पूजा 
करते । इसके बाद प्रम मनखी श्रीकृष्ण दुधार, पहे- 
पटक व्यायी इई, बछ्डवाटी सीधी-शान्त गोओंका 
कते । उस समय उन्दँ खुन्दर वज्ञ ओर मोतियोकी 
माल पहना दी जाती । सीगमें सोना ओ खुरोमं 
चोदी मढ़ दी जाती । वे बरा्को वल षणेसे 
घुसजित करके रेशमी वख, मृगचमं रौर तिच्के साथ 
प्रतिदिन तेरद ह जाए चौरासी गोए इस प्रकार दान 
| करते ॥ ७-९, ॥ तदनन्तर तिख्प गौ, 
| ब्राह्मण, देवता, डुक बङ-बूढ, गुश्नन ओर समस्त 


अथाष्ुतोऽम्भस्यमङे यथाधिधि 


~~ 
अ 


क्रियाश्ङापं परिधाय वाससी | 
चकार संध्योपगमादि सत्तमो 

हुतानलो व्रह्म जजाप वाग्यतः} &॥ 
। उप याकंयुचन्तं तर्षयित्वाऽऽस्मनः कराः । 

 देवातरपीन्‌ पितर्‌ बद्धान्‌ विभ्रानभ्यच्यं चात्मवान्‌।७) 


धेन॒नां सुवमधृङ्गीणां घाध्वीनां मोक्तिकसजाम्‌ । 


पयखिनीनां गृष्टीनां सवन्सानां सुबाससाम्‌ 1 ८ ॥ 











द, 


ददौ रूप्यघुराभ्राणां क्षोमाजिनतिरे; सह । 


१ 
। 






अरुङ्कतेम्यो विग्रेम्यो बदरं बं दिने दिने ॥ ९॥ 


> 





। भूतानि सर्वश 
घ्य । २. च॒द्धान्‌ गुरून्‌ | (स 3 
भा० स°० ल० --७१- 







४ न ज 2 | + भौ ~ 
क वभो खभासा कङकभोऽवभास्यन्‌ 
(~ £ त्मनो भूती० । २. वीक्षणेः। ३. मो विराजयन्‌ | 


५६२ श्रीमद्भागवत [ अ० ७० 


मि + कि 











मी 


नसस्छृत्यात्मसम्भूतीमङ्गलानि समस्पृशत्‌ ॥१०॥ प्राणियोको प्रणाम द॑रके माङ्गव्कि वस्तुभोका खं 


ज ~ करतें ॥ १० ॥ परीक्षित्‌ | यद्यपि भगवान्‌के शरीरका 
| 1 रक्षणम्‌ । । सहज सौन्दयं ही मनुष्यो ऽका अलङ्कार है, पिं 


र | भी वे अपने पीताम्बरादि दिन्य वच, कौस्तुमादि 
् मिभूषणे रे, (9 न, ; ~ ३ ९ | (8 
दव्यश्चगणयुरेपनेः भूषण, पप भ = 

वासा खीयदिव्यस्षगचुरेपनः ॥११॥ जआमूषण, पुष्पो क हार ओर चन्दनादि दिव्य अङ्घरागसे 


| ~ ~ = ^ 
| अपनेको आभूपितत करते ॥ ११॥ इसके वाद वेधी 


* „4 (@ 
वि गूद्ष + >| ४ पणें ७9 (~ द ण्ह (द) 
अवेशष्याज्यं तथाऽऽदश दजद्वताः । | ओ दपण अपना सुलारविन्द देखते; याय, वैक, 
ण त (र ब्राह्मण ओर देवप्रतिमा्ओंका दर्शन करते । किट 
कासां सवव न्त्‌ःपुर्दारिणं प ध ~ 0 
07 रन्वङप्वाप्याम्‌ । पुरवासी आर अन्तःपुरमं रह नेवारे चाले वेकि टोगोकी 


तान्य गतयनन्दत १२ अभिलाषा प्रण क्ते ओर फिर अनी अन्य 
दाप्य भरकृतीः कामः स्वनन्दत ५५५।। | ( प्राभवासी ) प्रजकी क्राभनाद्रतिं क्के उसे संतुष्ट 
१ [१ ऋ क = 
= => तामबू रेपे करतें ओर इन स्वकौ प्रसन्न देखकर खयं वहत ही 
संबिभज्याग्रतो विप्रान्‌ सक्ताम्बुलायुठेषनेः । ४ ह 
ल्‌ भइल आनन्दित होते ॥ १२॥ वे पुष्पमालाः) तम्ब 


सुहृदः प्रछृतीदःरादुपायुङ्क ततः खयम्‌ ॥१३॥ चन्दन ओर अङ्गराग आदि वस्तु पटले ब्राह्मण, खजन- 


सम्बन्धी, मन्त्री ओर रानियौकरो बट देते; ओर उनसे 
नची इदं खयं अपने काममें लते ॥ १३ ॥ भगत्रान्‌ 


ताचत्‌ छतं उपानीय खन्दनं परमाद्ुतम्‌ । 2 
| यह सव करते होते, तबतक दारुक न{पका स्रा्थी 


सुग्रीव आदि धोडोंसे जता आ अत्यन्त अदधत रथ 
ठे आता ओर प्रणाम करकैः भगवानूके सामने डा 
हो जता ॥ १४॥ रक्षके वाद्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णं 
सात्यकि ओर उद्धवजीके साथ अपने हासे सारथीका 
हाथ पकड़कर रथपर सवार होते-ठीकः वंसे दी जसे 
मुबनभास्कर भगवान्‌ सूय उदयाचट्प आखू होते 
इशितोऽन्तःपुरख्रीणां सव्रीखगरेमवीक्षितेः। . | ह ॥ १५॥ उस समय रपिवाक्तकी लियं ठ्ना एवं 
| तरमसे मि चितवनसे उन्हं निहारने च्तीं ओर बड़ 
कच्छाद्‌ विदयषटो निरगाजातदासो हर्‌ मनः ॥१६॥ | कष्टसे उन्हँ विदा करतीं । भगवान्‌ शुस्कराकर उनके 
चित्तको चुराते इए महसे निकरे ॥ १६ ॥ 
सुधममाख्यां समां स्वबरेष्णिभिः परिवास्तिः । परीक्षित्‌ | तदनन्तर मवान्‌ श्रीकृष्ण समस्त 
यदुवंडिके साथ धमां नाभकी समाने प्रवेद वरते । 
प्राविशद्‌ यनिविष्टानां न सन्त्यङ्ख पड्मेयः ॥१७]। | उस समाकी रएेसी महिभा दहै किं जो ठोग उस समामे 
जा चैठते है, उन्दं भूख-प्यास; श ओर जरा, 
> मृत्यु- ये छः ऊरभिर्यां नदीं सतता ॥ १७ ॥ इस्‌ 
तत्रापवेष्टः परमासने विथ- प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्ण सब रानियोसे अलग-अलग 
निदा होकर एक ही रूपमे खुधमा-समभामं प्रवेश करते 
ओर वरहो जाकर श्रेष्ठ सिदाक्तनप९ विराज जाते । उनकी 
न 


सुगरीवाददये युक्तं भ्रणभ्यावसितोऽग्रतः ॥१४। 
गृहीत्वा पाणिना पाणी सारथेस्तमथारुहत्‌ । 


सात्यक्युद्धवसंयुक्तः पूाद्िमिव भास्करः ॥१५॥ 


4 च 
 , ८9. # ~ ` (कः 
क्र 













वृतो रिेयंदभिर्यदृत्तमो 
यथोड्राजो दिवि दारकागणैः ॥१८॥ 
तत्रोपमन्विणो राजन नानादाखससेर्विथुम्‌ । 
© 


उपदस्थुनटाचाय नतंक्यस्ताण्डवेः पृथक्‌ ।१९॥ 


मृदङ्वीणाद्ुरजवेणताख्दरखनेः ` | 


|च = च ॥ ¢ 
ननृतुजंगुस्त॒ष्टु तरागधयन्दिनः 1२०) 


तत्राहु्र॑ण्तः केवचिदासीना व्रहवादिनः 1 


पूववा पुण्ययशसः रप चाकथयच्‌ कथाः ६१) 
र (च 


२{ञजन्‌(त{ऽपचं दसन्‌; । 
विज्ञापितो भगवते प्रदीदरेः भरवेितः ¦ २२॥ 


स नम्र्दत्य्‌ छङष्मद्‌ भ्रश्चास वाज्ञाः ) 


रज्ञामावेदयंद्‌ दुभ्खं जशसं धनिरोधजम्‌ ।२३॥ 
ये च दिग्विजये तख संनतिं न॒ ययुचपाः। 


प्रसह्य ॒रद्रास्तेनादनय्ते दे 


= 


गि,रेद्रजञे 11२५ 
कृष्ण द्ष्गाप्रमेयःत्थच्‌ अपद्धभयभञ्नन । 
वयं तसा शरणं यासो भवभीता प्रथभ्धियः ! २५ 
७ क, ५ ¢ ® 
लोका चिशमनिरतः इक्र प्रमत्तः 
ङपरण्ययं व्वदुदिते भवद चये स्वे) 


यस्तावदस्य वर्वानिह जोविताशां 


सयश्छिनत्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मे २६ 


१- खन्धविरो* | २. ण्यपि | 


दशम स्कन्ध 








५६२ 
अद्घकान्तिसे दिशां प्रकारित होती रहती । उस समय 
यदुवंशी वीरोके बीचमें यदुवंशशिरोभणि भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
की एेसी शोभा होती. जसे आकाराम दासे धिरे इए 
चन्द्रदेव शोभायमान होते हैँ ॥ १८ ॥ परीक्षित्‌ | सभा- 
मेँ विदूषकलोग विमिन प्रकारके हास्य विनोदसे, नटाचायं 
अभिनयसे ओर नत॑किथौँ कत्ू्णं लर्योसे अख्ग-अलग 
अपनी टोलियोके साथ भगवान्‌की सेवा करतीं ॥ १९ ॥ 
उस समय म्रदङ्ग, वीणा, पखावज, रवौषुरी, शश्र ओर 
राज्घं बजने र्गते ओर सूत, मागध तथा वंदीजन न्चते- 
गाते ओर भगवान्‌की स्तुति करते ॥ २० ॥ कोको 
व्या्याक्रुराठ ब्राह्मण बहौ वेखकर वेदमन्त्रोकी व्याख्या 
करते ओर कोई पूरव॑क।लीन पवित्रकीर्तिं नरपतिर्योकि चस्ति 
कह-कहकर सुनाते ॥ २१॥ 

एक दिनकी बात दहै, द्र'रकापुरीम राजसभाके 
दवारपर एक नया मनुष्य आया । द्वारपाले भगवानको 
उसके आनेकी सूचना देकर उसे सभाभव्रनमे उपस्थित 
किया ॥२२॥ उप्त मनुष्यने परमेश्चर भावान्‌ 
श्रीकृष्णको हाथ जोड़कर नमस्कार किया ओर . उन 
राजाओंका, जिन्होंने जरासन्धके दिगिजयके सभय उसके 
सामने सिर नहीं इकाया था भौ बल्रूवंक कौद कर 
व्यि गये ये, जिनकी संख्या वीप्त हजार थी 
जर।सन्धके वंदी बननेकां दुःख श्रीकृष्णके सामने 
नित्रेदन किया - | २३-२४ ॥ सचिदानन्दखरूप 
श्रीकृष्ण | आप मन ओर वाणीके अगोचर्‌ हैँ । . जो 
आपकी शरणमे आता है, उसके सारे भय आप न्ट 
कर देते हँ | प्रमो | हमारी भेरःबुद्वि मिरी नहीं है । 
ह¶ जन्म मृल्युखूप संपाते चक्रे भयभीत होकर 





आपकी रारणमे आये हँ ॥२५॥ भगवन्‌ ! अधिकांश . 


जव एेसे सकाम ओर निषिद्र कर्मोमि फंसे इए है कि 
वे अपके बतठलाये हुए अपने परम कल्याणकारी कमं, 
आपकी उपासनासे विप्ुख हो गये है ओर अपने जीवन 
एवं जीवनक्म्बन्धी आशा-अभिकाषाओंमे भम-भरक 
रहे हं । परतु आप बड़े बख्वान्‌ हैँ । अप काठखूपसे 
सरा-सवदा सावधान रहकर उनकी आशाक्ता रा तुरंत 
समूल उच्छेद कर डल्ते है | हम आपके उस 






























श्रीमद्भागवतं | अ० ७9 
| = -. = ~ =-= 
लोके भवाञ्ञगदिनः करुयावतीणं काठरूपको नमस्कार करते हैँ ॥ २६ ॥ आप खयं 


जगदीश्वर हँ ओर आपने जगते अपने ज्ञान, बठ 

| आदि कठार्ओंे साथ इसव्यि अवतार ग्रहण किया 
सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय चान्यः। है कि संतोकी रक्षा करे ओर दुर्ोको दण्ड देँ । रेसी 
अवस्थामे प्रमो | जरासन्ध आदि कोई दक्र राजा 

आपकी इच्छा ओर आज्ञाके विपरीत हमे वैसे कष्ट दे 

कथित्‌ त्वदीयमतियाति निदे शमील रे ह यह बात हमारी पतमञ्जमे नहीं आती } यदि यह 
कहा जाय कि जरासन्ध हम कष्ट नहीं देता, उसुवे 

प रूपमे--उसे निमित्त बनाकर हमारे अह्युम क्म ही 

 किवाजनः खन्रतमच्छति तन्न विद्मः।।२७॥ हमे दुःख पवा रहे है; तो यह भी ठीक नहीं| 
क्योकि जव हमरेग आपके अगते है, तद्र हमारे 

म दुष्कमं हम फल देनेमे वैसे समध हो सक्ते है ! 
सखसायितं॒नृपसुलं परतन्त्रमीश इसव्िये आप कृपा करके अक्सय ही हम इक्र क्टेशसे 
। मुक्त कीजिये ॥ २७ ॥ प्रभो ! हम जानते हैक 

राजापनेका सु प्रारग्धके अधीन एवं विपयपताध्य है | 


- ४ के ऋ, > `. 
पृ $ क = ५ = 
(१) ¢ #। कैक "द १ च 
॥ किव द 
नि ॥ चक 


4 १ ४.१ । 
"8 १९० ।# 


नीती 

=> कङ्ै ह ॥ 
+ "वैक, + की । 
४4 9 ऊन 


{1 


शश्वद्धयेन गतकेन धुरं वहामः । ओर सच केँ तो खम्न-सुखके समान अत्यन्त तुच्छ 
ओर असत्‌ है । साथ ही उस सुखको मोगरेवावम यह 
हित्वा तदात्मनि खं त्वदनीहरस्यं | भी एक प्रकारसे सुरदा ही है ओर इप्तके पीछे 


4 1 
9 
^. ०८६८ ; 
४४ कन जद् + )। 
४ 1 ॥ । 
[ ५ 
दद ^ 
+ {५ | 4 


सदा-सवदा संक प्रकारके भय लगे रहते है | पर॒ 

द्िश्यामहेऽतिक्रपणास्तव माययेह ॥२८॥ | हम तो इपीके द्वारा जगते अनेकों मार टो रहे है 

ओर यही करण है कि हने अन्तःकरणके निष्काम 

तन्नो भवान्‌ प्रणतशोहराङ्घियुग्मो भाव ओर निस्संकल्य सितिसे प्राप्त होनेवाले आस- 
£ पुखका परस्त्याग कर दिया है । सचमुव हम अत्यन्त 

अज्ञानी हैँ ओर आपकी मायके फदेमे पफंसकर क्ठेरा- 
पर-क्लेदा भेगते जा रहे हँ ॥ २८ ॥ भगवन्‌ | अपके 
चरणकमक रारणागत पुर्षोके समस्त रोक ओर 
मोहको नष्ट क देनेवाले है । इसव्ि आप ही 
जराप्तन्धख्पय केकि टन्धनसे हरे चुडादये । प्रभो | 
यह अकल्य ही दत हजार हाभ्ियोकी राक्ति रता दहै 
ओर हम लोगोको उक्ती प्रकर बंदी बनाये इर है, जसे 
सिह मेको घेर रक्डे | २९ ॥ चक्रपाण | आपने 
अठारह बार जएसन्धसे युद्ध किया ओर पत्र बार 
उक्तका मान-मर्दन करके उसे छोड दिया । परंतु एकः 
बार उसने आपको जीत चला । हम जानते हँ कि. 
। आपकी शक्ति, पक्षा बल-पौरुष अनन्त है । पिर 
| भ मनम्बेका-सा आ रण करते इ आपने हारनेका 





बद्धान्‌ वियुङक्ष्व मगधाहयकर्मपाशात्‌ । 







यो भूय॒जोऽयुतमतङ्गजवीर्यमेको 





~ 


विद्‌ रुरोध भवने सरगराडिवावीः ॥२९॥ 







( 
वि क , 
[० 
# 





ग 6 र 
४1 1 ^ 
५१ 


यो वे त्वया द्विनवक्रत उदात्तचक्र 







र. ५९ 


{ 
॥ 





† क क, ^ 
॑ । ॑ | क ग. 
| अ० ७० | द्रम स्कन्ध ` + 





जित्वा शरोकनिरतं सक्ृदृददर्ो 


युष्मरप्रजा श्जति सोऽजित तद्‌ विधेहि ॥३०॥ 


दूत उवाच | 
| 
| 


इति आागशसल्द्रा शचृदश्म्‌ समवमीद्लणः; | 


मपाः एादषरूक ते दीरए्नां चं विधीयताम्‌ ॥२१॥ 

श्रीशुक उवाच । 
देवि; परमद्युतिः ] 

विभ्रत्‌ पिज्ननटाभरं भदुरासीद्‌ सथा रविः ॥३२॥ 


सव॑लोेश्वरेरः । 


५ 
र 
~~] 
ल 
2 । 
८ 
1 
(4 
= 
९७ 
4 


पररग्रहय्‌ । 


सत्ते त्‌ "= 


वभावे शत्तेव॑द्येः श्रद्धया तपयन्‌ मुनिम्‌ ॥३४॥ 


अपं वदच क्न बयाणारसङ्कताभयम्‌ । 


सु भयाद्‌ धणदतो लोकान्‌ पर्यतौ गुगः ॥२३५॥ 


21 


(+ ~ ९ 


न हि तेऽविदितं क्षिशिर्लेदषेष्वीश्वरकर्रैष । 
थृ पृच्छामहे युष्मान्‌ पाण्डवानां चिकी पितम्‌।।२६।' 


श्रीनाष्द उवाच 






>. | [न - त = पु । = के 
च्छा मखा ते बहुशो दुरत्यया 
= । 4 +, श = ~ "न अ 4 । 
(च. ॥ (, न्क क "+ 
] „= ` ` "क ् र 


(८ | बिभो ९ 





0 
कि 3 । ह क कव 


24६4 ७ 


न १ आप तीनों टोक्ोमे विचरण करते रते है, इससे 






। मः नहीं पा सं 
३ मायिनः | अचि 





























अभिनय क्रिया । परंतु इसीसे उसका धमंड बढ़ गया 
है । हे अजित | अव्र बह यह जानकर हम्े्गोक्ो 
ओर भी सताताहै कि हम आपके भक्त है, आपकी 
प्रजा ह । अव आपकी जसी इच्छा हे, वैसा 


कीजि?' ॥ ३० ॥ 

दूतने कद्ा- भगवन्‌ ! जरासन्धके वंदी नरपतिर्योने 
इस प्रकार आपसे प्राथना की है] बे आपकर 
चरणकमल्योकी शरणमे हँ ओर आपका दशन चहते 
हैँ । भाप कृपा करके उन दीनोका कल्याण 


क (= गे 


कीजिये ॥ ३१ ॥ ॐ 

श्रीद्युकदेवजी कते है--परीक्षित्‌ 1! राजार्थका 
दूत इस प्रकार कह दही रहा था किं परमतेजखीं | 
देवरं नारदजी वर्ह आ पटर | उनकी सुनहरी 
जगएं चमक रही थीं । उन देकर रेषा माद हयोः 
रहा था, मानो साक्षात्‌ भगवान्‌ सूयं ही उदय हो 
गये हों ॥ ३२ ॥ व्रह्मा आदि समस्त लोकपाटेकिं 
एकमात्र खामी भगवान्‌ श्रीकृष्ण उन्ह देखते दी समाषदों 
ओर सेवकरोके साथ र्षित होकर उठ ख्डे दए ओर 
सिर इुकाकर उनकी बन्दना करने खगे ॥ ३३ ॥ ज ` 
देवर्ष नारद आसन खीकार करके वैठ गये, तव मगत्रान्‌- 
ने उनकी विधिप्र्॑क पूना की ओर अपनी श्रद्रासे 
उनको संतुष्ट करते हृए वे मधुर वाणीसे बोले--॥ २४॥ 
दर्षे | इस समय तीनों व्येकोम कुराल-मङ्गक तो है 


हमे यह बहुत बड़ा खाभ है कि घर बेटे सवका समाचार 
मिक जता है ॥ ३५ ॥ दखसके द्वारा सचे इए तीनो 
ोककोमि पेसी को$ बात नहीं है, जिसे अप न जानते ` 
हों । अतः हम आपसे यह जानना चाहते है किं 
युधिष्ठिर आदि पाण्डव इस समय क्या करना चाह 
ह! ॥३६॥ | ~= 

देवि नारद्जने कदा-- सवभ्यः न्त 1 आप 
विश्वके निभोता हैँ ओ८ इतने बडे मायार्व हैक वबङ़्- 
बड़े मायावी व्रह्मा आपकी मायका पार 
प्रमो | आप स॒वके ४ घटम अपनी 
से व्याप्त प्त रहत ह--टेक वसे ही, १ अस 

















+ भीमद्धागवत [ अ० ७० 


भूतेषु भूमधरतः खशक्तेभि- अग्नि व्कड़योमें अपनेको छिगराये रखता है । लोगोँकी 
वो दृष्टि सत्व आदि गुणोपर दही अटक जती है, इषसे 
उ न॒मेऽद्धतम्‌ ।२७।। | आपको वे नही देख पाते । ने एक बार नही, अनेज 
बार आपकी माया देखी है । इसव्यि आप जो यों 


तवेहितं कोऽदंति साधु वेदितुं अनजान बनकर पाण्डवोका समाचार प्रते है, इससे 
ल मुञ्चे कोई कोतूहर नहीं हो रहा है ॥ २७ ॥ भगवन्‌ | 

खमाययेदं सृजतो नियच्छतः । आप अपनी मायासि ही इस जगत्की रचना ओर संहार 

करते हँ ओर आपकी मायाके कारण दी यह असत्य 

र्‌ बद्यमानात्मतयावभासते ~ | होनेपर भी सत्यके समान प्रतीत होता है | आप कव 


= त $ क्या करना चाहते हँ, यह वात मटीँति कौन समञ्च 
तस्म नमस्त खबिलक्षणात्मने ।*३८॥। सकता है | आपका खरूप सर्वथा अचिन्तनीय है । 


म तो केवल वार-बार्‌ आपको नमस्कार करता र | २८॥ 


जीवस्य यः संस्रतो विमोक्षणं दापीर ओर इससे सम्बन्ध रखनेवाी वासनाओंमे रफैसकर 
जीव जन्म-मृत्युके चक्रमे भटकता रहता है तथा यह 

न जानतोऽनथंवहाच्छरीरतः | नहीं जानता कि मै इस शरीरसे कैसे यक्त हयो सकता 
ट द्र | वास्तवमें उसीके हितके च्वि आप नाना प्रकारके 
र; खयश्चप्रदीपकं टीलावतार ग्रहण करके अपने पवित्र याका दीपक 


जल्प देते है, जिसके सहारे वह इस अनथंकारी शरीरसे 

भ्राज्वाखयत्ला तमहं प्रपद्ये ॥३९॥ , मुक्त हो सके । इसव्थिे पँ आपकी शरणमे द्र ॥ २९॥ 

प्रभो | अप खयं पण्रह्य हैँ तथापिं मनुष्ोकी-सी 

अथाप्याश्रावये व्रह्म नरलोकविडम्बनम्‌ । लीलाका नाय्य करते हए सु्चसे प्छ रहे हँ । इस्व्थये 
~ आपके फेरे माई ओर प्रेमी भक्त राजा युधिष्टिर क्या 
८ ~. राज्ञः पतृष्वसेयस्य भक्तस्य च चिकी पितम्‌ ॥४०॥ | करना चाहते है, यह वात मै आपको ुनाता द्र ॥४०॥ 
^ क इसमें सह नहीं कि ब्रह्मटोकमे किसीको जो भोग 
यक्ष्यति त्वां मखेन्द्रेण राजघ्रयेन पाण्डवः | प्राप्त हो सकता है, वह राजा युधिष्ठिरको यहीं प्राप्त 

् है । उन्हें किसी वस्तुकी वामना नहीं है । फिर भी वे 


पारमेष्टयकामों चृपतिस्तद्‌ भवानुमीदताम्‌ ॥४१॥ | *8 यक्च रा नपुयकरे दारा आपी प्राक्तिके ल्यं आपकी 
आराधना करना चाहते है । आप कपा करके उनङ्गी 


| तसिन्‌ देव क्रतुवरे भवन्तं वै सुरादयः ५. 
उस श्रेष्ठ यज्ञम आपका दर्शन करनेके चये बड़े-बड़े 


दिदक्षवः समेष्यन्ति राजानश्च यराखिनः ॥४२॥ | देवता चौर यशली नएपतिगग प्त होगे ॥ ४२ ॥ 
६ प्रमो | आप खयं विज्ञानानन्दघन ब्रह्म है । आपके 


वणात्‌ कीरवनाद्‌ ध्यानात्‌ पूयन्तेऽन्तेवसायिनः । | श्रवणः कीतेन ओर ध्यान केम अन्यन भी पवित्र 
हो जते है । फिर जो आपका दर्यन ओर स्पशं प्रात 


त्व वहममयस्येवा किय किष के्तेक्षाभिमर्िनः ।॥४३॥ | करते हँ, उनके सम्बन्धम्‌ तो कहना ही क्या है ॥४२॥ 
1 ~ - 2 


» (यु 
प, ५ क्‌, ६ 
= 


: 


,४ ध "% 
४ ५, 









41 






"ख 


क न [५ ~ -4 
1 = - "२ ~ 1 4 
~ % ^ क ~ क~ १.4 चृ ॥ 

# ह ॥ < ४5 ~ न व ७ क च | रु" = च, कर ् रः । 

(1 * # क्‌ 3 { ॥ च # त ~ 
4 व ॥ >" < ¶- "गङ्ख २-९.-४ 4 ॐ ऋ, अन 

+ दरम > 3 ह | 4 न द 4 
(/ क 1 (१ ह । 
© 2 ~ - । ९५ ६७ 
॥ र 
[व क कस 2 रि 








यस्यामरं दिवि यश्चः प्रथितं रसायां ्रिभुवनपङ्गल ! आपकी निर्मल कीतिं समस्त दिशामि 


| भूमौ च ते ्ुवनमङ्गल दिग्वितानम्‌। | छारही दहै ठथा खगं, पृध्वी ओर पाता्मै व्याप्त ह्यो 


र ध हीह; ठीक वेते ही, जैसे अपकरी चरणमरतधारय ` 
गवत वा 
मन्दा्रिनीति देषि भगवतीति चधा खगे मन्दाकिनी, पाता्मे भोगवदी ओर मर्त्यलोके 


गङ्ग त चहं चरणाम्डु पुनाति विश्वभ्र|।४४५।। | गङ्खाके नामसे प्रवाहित होकर सारे विश्वको पवित्र कर 
रही हे ॥ ५४ ॥ 

श्रीद्युर उवाच श्रीद्यकदेवजी कहते दै - परीक्षित्‌ ! समामे जितने 

यदुवंरी बेटे ये, वे सव इस बातके व्यि अव्यन्त 

उत्सुक हो रहे थे कि पहले जरासन्धपर चढ़ाई करके 

उसे जीत दिया जाय | अतः उन्हं नारदजीकी बात 

पसंद न आयी । तव ब्रह्मा आदिके शासक भगवान्‌ 

वाचे; सन्‌ स्त्यद्द्धवं प्राह केरावः ।। ७५11 | श्रकरष्णने तनिक सुसकराकर बड़ी मीही वाणीम उद्धध- 
जीसे कदा--॥ ४५ ॥ 


कि 
॥ ५ ॥ 























# + क 


तत्र॒तेष्वात्मपक्षेष्वगृह्णर्खु धेजगाषया । 


श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ थीरृष्टने कदा-- उद्धव | तुम मेरे हितैषी 
घुहद्‌ हो । जम सम्मति देनेबाञे ओर कार्थके तको मली- ` 
मति समञ्षनेवाछे हो, इसील्ियि हम तुम्हं अपना उत्तम 
नेत्र मानते हैँ । अव तुम्हीं बताओ कि इस विषयमे हमे क्या 
अथत्र ब्रह्य ष्टे यं श्रद्ध्पः करवाम तत्‌ ॥\८६६&॥} | करना चाहिये । तुम्हारी बातपर्‌ हमारी श्रद्धा हे | इसल्ये 4 
हम तुम्हारी सखाहके अनुसार ही काम करगे ॥ 9 ६॥ ` 
इत्युपामन्त्रितो भत्र सव॑ङ्नापि युग्धवत्‌ जव उद्धवजीने देखा कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण सवज्ञ होनेपर 
भी अनजानकी तरह स्ह प्रू रहे हँ, त वे उनकी 
निदे शिरसाऽऽधाय उद्धवः प्रत्यभापत ७७ | अज्ञा रिरोधायं करके बोट ॥ ४७ ॥ | 


त्वं हि नः परमं चक्चुः सुन्यन्त्रार्थक्वयवित्‌ । 


. --9०्डन्-० 6 
इंति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामश्कन्धे 
उत्तरार्धे भगवद्यानविचारे सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥ 







अथेकसपतितमोऽध्यायः | ~ र 
श्रीरृष्णभगवानका इन्द्रस्य पधारना = ~ 

श्रीद्ुक उवाच । श्रीटुकुदेव ज्ञी कहते है परीक्षित्‌ (- भगवान्‌ 
| श्रकृष्णके वचन सुनकर महामति उद्धवजीने देवं 
= देवपरुद्नो ं द्वोऽत्रनीत्‌ ।  श्ीहकष्णे णके मतपर्‌ विचार 















४, = 


पीर" ष 
त्न ` > 


सभ्यानां 





४. = कु 
२ सक 
व =) त - "ध =" 


क + 2 


५ 1 & न (^ = ॥ 2 & + ऋ ध्‌ र ह + ४. ॥ 
॥ # ष. न क्ष कि 
> 


ई 


1] ++ क 





















या भ नज क 
ज ` > चोन चोरः योः चः जः कः = व = आकः कि ` चि तः कः जक जः ` क 


उद्धव उवाच 


नव रप जा 
॥ 6 


> १ & यदुक्तशपिगा देव साचिव्यं यक््यतस्त्वया । 
| कायं पेतरष्वसेयस्य रक्षा च रारणेषिणाम्‌ ॥ २1 
यष्टव्यं राजघयेन दिक्चक्रजयिना विभो । 
अतो जराङतजय उभयार्थो मतो मम ॥३॥ 
असां च महानर्थो दयेतेनेव भविष्यति 1 
| |  य्चध तव गोविन्द राज्ञो बद्धान्‌ विगुश्चतः ॥ ४॥। 
सवै दुर्विषहो राजा नागायुतसमो बले । 


1रिनामपि चान्येषां भीमं समबरं विना ॥ ५॥ 


~ = -- ` - ~ -- 


दवेरथे स तु जेतव्यो मा शताक्षौदिणीयुतः । 
„ अहण्योऽम्यरथिंतो विग्नं प्रत्याख्याति कर्िचिद्‌।६। 


ब्रह्मवेषधस्े गत्वा तं भिक्षेत ब्रकोदरः। 


~~न 
[न 
क, ¬~ 


निष्यति न संदेहो द्वैरथे तव संनिधौ ॥ ७॥ 


॥ 
+ च 


मे्तं॑परमीशस्य॒विश्वसर्गनिरोधयोः 


5 ष. क 


[> ~ क्ले 
1९.५०1 दाव काटस्यारूपणस्तव ॥ < ॥ 
न = 
> देव्यो 
यन्ति ते विंश्चदकमं गृहेषु देन्य 
~. 
2 ॐ _ - ~ ~ क स्त 
बां खात्रबधमात्मविमोक्षण च । 





श्रीमद्धांणवतं 


हि 
= क 
कि ~ 


[| अ० ७१ 


ऋ = चः ज जः कः वि श ॥ गि श त (मी ज 
१ जः ऋः ये 


उद्धवजीने कहा -- भगवन्‌ ! देवर्पिं न,रद जीने आप- 
को यह सखह दी है कि फुफेरे माई पाण्डवोंकरे राजसूय 
यज्ञम सग्मिलित होकर उनकी सहायता करनी चादिये | 
उनका यह कथन टीक ही है ओर साथदही यह भी 
ठीक है कि दारणागतोकी रक्षा श्रदयकतत्य है | २॥ 
प्रमो | जब्र हम इस दष्िसे विचार करते हें कि राजसुय 
यज्ञ वही कर सकता है, जो दसों दिद्याथोपर विजय 
प्राप्त कर ठे तव हम इक्त निणयपर्‌ विना किंस्षी दुविध्राके 
पंच जते दहं कि पाण्डोके यज्ञ ओर खरणाःतोकी 
रक्षा दोनों कामके लि जरासन्धो जीतना अव्रदयक 
है ॥ ३॥ प्रभो ! केव जराप्षन्ध्को जीत ठेनेसे ही 
हमारा महान्‌ उद्य सफल ह्यो जायगा, साथ दी उक 
वंदी राजाओंकी सुक्ति ओ उसके सारण आपको 
पुयशकी भी प्राति ह्यो जायगी ॥ ४ | राजा जरासन्ध 
बड़े-बड़े टोगक्रे भी दत खद्रे क दता है; क्योकि 
दस हजार हाथियोंका वल उसे प्रप्त है} उसे यदि हश 
सकते हैँ तो केवर मोमक्तन, क्योकि वे ओीवसे दही 
बली हैँ ॥ ५॥ उसे अमने-सामनेके युद्धम एक वीर 
जीत ठे, यदी सवसे अच्छदहै। सौ अश्नोहिणी सेना 
टकर जव वह युद्धके व्यि खड़ा दोगा; उप्त समय उसे 
जीतना भासान न होगा | जरासन्ध बहत वडा ब्राह्मणमक्त 
है | यदि ब्राह्मण उसे किसी वातकी याचना करते है, 
तो वह कभी कोरा जवाब नही देता ॥ & ॥ इसय्यि 
मीमदधेन ब्राह्मणके वेदाम जाये ओर उक्षे युद्रकी भिन्ना 
मागि । भगवन्‌ । इसमं संदेह नदीं किं यदि आपकी 
उपल्ितिमे भीमसेन ओर जदासन्धका द्नयुद्र हो, तो 
भीमद्ेन उसे मार उदेगे ॥ ७ ॥ प्रमो ! आप सवं 
दाक्तिमान्‌, रूपरहित काल्खरूप हँ । विश्वकी स्ट 
जीर प्रख्य आपकी दी राक्तिसे होता है । ब्रह्मा ओर 
दाकर तो उसमे निमित्तमात्र है । ( इसी प्रकार जयासन्ध- 
करा वध तो होगा आपकी शक्तिसे, भीमसेन केव उसमें 
निमित्तमात्र बनेगे ) ॥ ८॥ जब ईस प्रकार अप 
जरासन्धका वध कर डाठेगे, तव कैदमं पड हए राजाओं 
की रानियां अपने महेम आपकी इस विडयद्ध रीका 
गान करेभी कि आपने उनके शुका नार कर दिया ओर 


उनके प्राणपतियोको अ ङा दिया । ठीक चस ही, जसे 
~ > न 
9 "इ स, (न+ व + क 9. * 
ग क 
ध + 2 19 न ^~ 
र 9, = ऋनिन्णन्केष श न=. थ न्क, ज छ ४ भ त । ४ 





कि १ 


र 
रिः =” 


॥. च ॐ 
"> 1. 
त ॥ छ 


५ 


अ० ७१ | 


मोप्यश्च ङञ्रपतेजनकात्मजायाः 











पित्रोश्च रुब्धद्चरणा मुनयो बयं च ॥ ९ ॥ 


जरासंधवधः भयंथीयोपकर्पते \ 


र 


कुष्ण 


प्रायः पाकविपाकेन तव चाभिमतः क्रतु; \\१०।] 
श्रीश्चुक उवाच 
इत्युद्धववचो राजन्‌ सवतोभद्रमच्युतम्‌ 1 


देवपियेद्ब्रद्राध कृष्ण प्रत्यपूजयन्‌ ॥११।) 
अथादिश्चत्‌ प्रयाणाय भगवान्‌ देवकोसुतः 
भृत्यान्‌ दारुकजं त्रादीननुज्ञाप्य गुरुन्‌ वियु १२] 
निगंमय्यावरोधान्‌ खान्‌ ससुतान्‌ सपरिच्छदान्‌ \ 


संकपणमनुज्ञाप्य यदुराजं च रातरुहन्‌ 1 
छूतोपनीतं सखरथमारुहद्‌ गरुडध्वजम्‌ ॥\१३। 


ततो रथदिपभटसादिनायकेः 
करारया परिघत॒ आत्मसेनया । 
मदङ्गभेयानकराङ्धगोय॒खेः 

प्रधोपघोपितकङकभो निराक्रमत्‌ ।१४॥। 
सृवाजिकाश्चनशिबिकाभिरच्युतं 

सहात्मजाः पतिमलु सुव्रता ययुः 
व्राम्बराभरणविलेपनसखजः 

सुसंवृता नृभिरसिचमंपाणिभिः ॥१९५॥ 
नरोष्रगोमहिपखराश्चतयेनः- 
करेणभिः परिजनवारयोषितः। 
कटकुिकम्बलाम्बरा- 
युपस्करा ययुरधियुज्य संतः ॥१६॥ 
भा० स० खं० २. ५१ त ४ 


क धः ठ 


स्वलकरृताः 





2 
वमे क 
# नि + ञे 





गोप्यो शङ्खचूडसे छुडानेकी टीका, आपके रारणागत॒ ` 
मुनिगण गजेन्द्र ओर जानकीजीके उद्रारकी टीगका' 
तथा हमलोग आपके माता-पिताको कंसके कारागारसे 
छुडानेकी ीटाका गान करते हँ ॥ ९ ॥ इसब्धिये ग्रमो | 
जरासन्धका वध खयं ही बहूत-से प्रयोजन सिद्ध कर देगा | 
वंदी नरपतियोके पुण्य-परिणामसे अथवा जरासन्धके पाप- 
परिणामसे सच्चिदानन्द खख्प श्रीकृष्ण ! आप भी तो 
इस समय राजसूय यज्का होना ही पसंद कत्ते हँ 
८ इसछिपे पहठे आप वहीं पधास्यि ) ॥ १० ॥ 

भीद्युकदेवजी कते है- परीक्षित्‌ | उद्वजीकी 
यह सखाह सव प्रकारसे हितकर ओर निर्दोष थी। 
देवरं नारद, यदुवंशके वडे-बृढे ओर खयं मगवान्‌ 
श्रीकृष्णने भी उनकी वातका समथन किया ॥ ११ ॥ 
अव अन्तयोमी भगवान्‌ श्रीकृष्णने वसुदेव आदि गुरु- 
जनोंसे अनुमति चकर दारुक, जैत्र आदि सेवकोंको 
इन्द्रप्रस्थ जानेकी तेयारी करनेके व्यि आज्ञा दी ॥१२॥ 
इसके बाद भगवान्‌ श्रीकृष्णने यदुराज उग्रसेन ओर 
बलरामजीसे आज्ञा लेकर बाल-ब्योके साथ रानियां ओर 
उनके सव सामानको आगे चता दिया ओर किर दारुकके 
लये हए गरुडध्वज रथपर खयं सवार इए ।॥ १३ ॥ 
इसके बाद रथो, हाथिर्यो, घुडसवारों ओर पैदखकी 
बडी भारी सेनाके साथ उन्होने प्रश्यान किया । उस्‌ 
समय मृदङ्ग, नगारे, ठोल, राङ्क ओर नर्षिगोकी ऊंची 
घ्वनिसे दसो दिशा गूज उठी ॥ १४ ॥ सतीरिरोमणि 
रुकिमणीजी आदि सदसत श्रीकृष्ण-पल्नियो अपनी संतानो ` 
के साथ सुन्दर सुन्दर वस्त्राभूषण, चन्दन, अङ्गराग ओर 
पर्पोके हार आदिसे सज-धजक्र डोधिरयो, रथो ओर 
सोनेकी बनी इई पारकिंयोम चदकर अपने पतिदेव भगवान्‌ 
श्रीकृष्णके पीछे-पीठे चीं । पेदक सिपाही हाथोमे 
तल्वार केकर उनकी रक्षा करते इए चरु रहे थे ॥१५॥ 
इसी प्रकार अनुचरो शी सियो ओर वाराङ्गनाए मलीभाति 
श्ङ्गार करके खस आदिकी श्चोप, मोति-भंतिके 
तंबुओं; कनातों, कम्ब ओर ओढनेबिछाने आदिक 
सामग्रियोको वेमे, मसो, गधों ओर खचरोपर खदकर ` 
तथा खयं पाख्की, ऊँट, छक्डोँ ओर हधिनिरयोपर 
= ~ ` - अ 







































+ ओ 


र्ट = 


५७० | ` श्रीमद्भागवत [ अ० ७१ 
न वव्व्व्व्व्यवववववववववव=--वववववव्व्व्व्य्य्य्यन चव्य 
बलं चहट्ष्वजपटछत्रचामरे- सवार होकर चट्टी ॥ १६ ॥ जसे मगरमच्छो ओर हरो - 
की उचछछ-कूदसे क्षुन्ध समुद्रकी शोभा होती है, ठीक वैसे 


ही अत्यन्त कोलाहलसे परिपूणं फहराती इई बड़ी-बड़ी 
पताका, छतो, र्चवरो, श्रेष्ठ अक्च-राखो, वल्रामूषर्णो, 


मुकुटो, कवर्चो ओर दिनके समय उनपर पडती हई सूरय- 
को किरणोंसे भगवान्‌ श्रीकृष्णक्ी सेना अत्यन्त शोभायमान 
इई ॥ १.७ देधर्पिं नारदजी भगव्रान्‌ श्रीकरष्णसे सम्भानित 








वेरायुधाभरणकिरीटवर्मभिः । 
दिवांश्चभिस्तुपरलपवं बभो रवे- 


यंथाणवः श्चुभिततिमिद्िरोमिंभिः ॥ १७)। 


दी मनिर्मदुपतिना सानि: ` होकर ओर उनके निश्रयक्रो सुनकर वहत प्रसन्न इए | 
भगवान्‌ क दशनसे उनका हदय भौर समस्त इन्द्रिय परमा- ~ 

प्रणम्य तं हृदि विदधद्‌ विहायसा । दमे मप्र हो गयीं | विदा होनेके समय भगवान्‌ श्रीकृष्णने 

. उनका नाना प्रकारकी सामग्रियोसे प्रूनन किया | अव दें 

निशम्य तद्व्यवसितमाहृताहणो नारदने उन्दँं मन-दी-मन प्रणाम किया ओर उनकी दिव्य 


वयन मूतिको हृदयम धारण करके आङ्नारामागसे प्रश्यान 

यङ्कन्दसद शनानव्रतेान्द्रयः ।\९८॥। | किया ॥१८॥ इसके वाद्‌ भगवान्‌ श्रीकृप्णने जरासन्धकें 

वेदी नरपतियोके दूतको अपनी मधुर वाणीसे आ्ाप्तनन 

राजद्‌तय्वाचेदं भगवान्‌ प्रीणयन्‌ गिरा । देते इए कहा--'दूत ! तुम अपने राजाओंसे जाकर 

४ दः कहना--“डरो मत ।› तुम लोगोका कल्याण हो । में 

मा भष्ट दूत भद्र वा घातयिष्यामि मागधम्‌ ॥१९॥ | जरासन्धको मसा डादगाः ॥ १९ ॥ भगवानकी सी 

आज्ञा पाकर वह दूत गिचखिज चा गया भौर नरपतिर्योको 

इत्युक्तः प्रसित दतो यथावदबदन्नृपान्‌ । भगवान्‌ श्रीकृष्णका संदेश उयो-का्यो सुना दिया | 

; वे राजा भी कारागारसे छरृटनेके व्यि शीघ्र-से-शीप्र 
तेऽपि संदशनं शौरेः प्रतयेक्षन्‌ यन्धुय॒क्षवः॥२०॥ | मगवान्‌के छम दरानकी बाट जोहने कगे ॥ २० ॥ 
आनतंसोवीरमसू्तीर््वा विनशनं हरिः | पर्‌ क्षित्‌ } अव भगवान्‌ श्रीकृष्ण आनत , सौवीर, 

मरु, कुरक्षेत्र ओर उनके बीचमे पड़नेवाटे पवत, नदी; 

गिरीन्‌ नदीरतीयाय पुरं्रामवरजाकरान्‌ ॥२१॥ | नगर, गव, अहीरोकी बस्तियां तथा खानोको पार कते 

इए अगे. बदने ल्गे ॥ २१ ॥ मगवान्‌ 

ततो चषदटतीं तीर्त्वा भुडन्दोऽथ सरखतीम्‌ । मुकुन्द मागमे दृषद्वती एवं सरखती नदी पार करके 

। पाञ्चाल ओर मत्स्य देशम होते इए इन्द्रप्रस्थ जा 

पर्हचे ॥ २२ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्णका दरंन 

अव्यन्त दुरम है । जब अजातश महाराज युधिष्ठिरको 

यह समाचार मिला किं भगवान्‌ श्रीकरष्ण पधार गये है, 

तब उनका रोभ-ोम आनन्दसे लिक उठा । -वे अपने 

8 आचार्यो ओर खजन-सम्बन्धियोके साथ भगवानकी 

अजातराघु्निरगात्‌ सोपाध्यायः खुहृद्ढृतः ॥२२॥ | अगवानी करनेके ल्म नगरसे बाहर आये ॥ २३ ॥ 


मङ्गक-गीत गाये जाने रगे, वाजे बजे गो, बहरत-से 


(` पश्चारानथं मत्यां राकरग्रमथागमत्‌ २२ 


` तणपागतमाकण्यं श्रीतो दुर्दशनं चणाम्‌ । 






गीतवादित्रधापेण व्रक्षधोषेण भूयसा । | ब्रामण मिख्वर ऊँचे खरसे वेदमन्त्रोका उच्चारण करने 
क - ^ 1 न 9 
~ च क इ । + 


न 
ॐ ` - 


अ० ७१ | दशेमं स्कन्धं ५७१ 








एम वे ॥ 
नः ५ = =-= कः न वि 


अभ्ययात्‌ स हपीकेशं प्राणाः प्राणमिबादतः ।।२४॥ | खगे । इस प्रकार वे बड़े आद्रसे इीकेश भगवानूका 
सखागत करनेके ग्य चले, . जसे इच्ियाँ स॒ख्य प्राणसे 
मिकने जा रही हो ॥ २४ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णको देख- 
कर॒ राजा युधिष्ठिरा हदय स्नेहातिरकसे गद्गद हो 
गया | उन्हं वहत दिनपर अपने प्रियतम भगवान्‌ 
श्रीकृषगको देष्टनेका सोभाग्य प्रप्त इआ धा | अतः वें 
उन्हं वार-वार अपने दयसे ख्गने ठ्गे ॥ २५ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णका श्रीविग्रह भगवती कर्मीजीका पवित्र 
ओर एकमात्र निवासस्थान है । राजा युधिषिर अपनी 
लेमे परशं निष्ेतिसश्वलोचनो ता रसि ८. दः = 
न तापोसे द्ुट्कारा पा गये । वें सवतोभावेन परमानन्दके 
हृ्यत्नुविस्शृतलोकविश्रमः ॥२६॥ | सरमे मग्न हयो गये । नेत्रम भसु छलक आयि, अङ्ग 

| | अङ्क पुलकित हो गया, उन्हं इस क्दविप्रपन्चके मका 
तनिक्र भी स्मरण न रहा ॥ २६ ॥ तदनन्तर भीभसेनने 
मुस्कराकर अपने ममेरे माई श्रीकष्णका भाटिङ्गन किया । 





दृटा विद्धिनहृदयः दृष्णं स्नेहेन पाण्डवः । 
चिराद्‌ दृष्टं प्रियतमं सखजेऽथ पुनः पुनः । २५॥। 
दोभ्यां . परिष्वज्य रमामरारयं 


यञन्दगाघ्रं चरपतिहेताङभः । 


तं मातेयं परिरभ्य निब्रृतो 





भीमः सयन्‌ प्रेमजबाङ्कलेन्द्रियः । | इससे उन्दे बडा आनन्द मिखा | उस समय उनके 
हृदयम इतना प्रेम उमड़ा क्ति उन्हं बाद्य विस्मृनि-सी 
यमो शिरीटी च सुत्तमं भदा हो गयी 1 नकुक, सहदेव ओर अजुनने भी अपने परम 


प्रियतम ओर हितेषी मगवान्‌ श्र कष्णका वड़े आनन्दसे 

रहद्रवाष्पाः परिरेभिरेऽच्युतम्‌ । २९७]! | आलिङ्गन प्राप्त किया । उस समय उनके नेत्रम 

| ओंघुर्ओकी वाद-सी आ गयी थी ॥ २७ ॥ अजने पुनः 

अजुनेन परिष्वक्तो यभाभ्य(पभिवादितः । मत्रान्‌ श्रीकृष्णका आलिङ्गन किया, नङ्क ओर 
सहदेवने अभिव्रादन किया ओर खयं भगवान्‌ श्रीकृष्णने 

ब्राह्मणेभ्यो नमस््रत्य व्द्रेभ्यरच यथाहतः ॥२८॥ | व्राह्मणं ओर कुर्वंशी बृद्धोको यथायोग्य नमस्कार 
| किया ॥ २८ ॥ कुः, सृज्ञय ओर ॒वेक्रय देके नर 

मानितो मानयामास इुरुसृज्रयकफेकयाच्‌ । पतिरयोने भगवान्‌ श्रीकृष्णका सम्मान किया ओर भगवन्‌ 
` | श्रीकृष्णने मी उनका यथे चित सत्क किया । सूत, 

दूतमागधगन्ध्ब बन्दिनस्चोपमन्त्रिणः ॥२९॥ | मागध, वंदीजन ओर ब्राह्मण भगवान स्तुति कएने 
लगे तथा गन्धर्वं, नट, विदूषक आदि मृदङ्ग, शङ्ख, नगरे, 

मृदङ्कशङ्खपरहवीणापणवंगोपखेः | हि वीणा, टोक ओर नरसिगे बजा-बजाकर कमलनयन 
भगवान्‌ श्रीकृष्णको प्रसन करनेके लिये नाचनेगाने 

विन्दं (नत्वग; । रगे ॥ २९-२० ॥ इस प्रकार पप्मयरसखी भगवान्‌ 
१ | श्रकृष्णने अपने सुद्‌-खजनोके साथ सब प्रकारसे 
सुसजित इन्द्रप्रस्थ नगरम प्रवेरा किया । उक्त समयं 


| जोग आपसे भगवान्‌ श्रीृष्णकी प्रशं्ा करते चठ 
संस्तूयमाना भगवान्‌ बिवेशाटंकृतं पुरम्‌ ॥३१। रदे ये ॥ ३१ ॥ 
१, जलङ्क ° । २. मानिनो° । ३. ववेणुभि० । 


एवं सुहद्धिः पयस्तः पुण्यश्छोकशिखामणिः। 





| = 14 1 


~ नी न न 















५५७२ श्रीमद्भागवतं | अ० ७१ 








| ४ संपिक्तवत्मं करिणां मदगन्धतोयै- इन्द्रम्रस्य नगरकी सङके ओर गव्यो मतवा 

हाधियोके मदसे तथा सुगन्धित जक्से सीच दी गयी 

| थीं । जगह-जगह रग-विरंगी शडिययाँ च्गा दी गयी थीं। 
सुन == +~, क (र कु जलभरे 

र्ात्मभिर्नवदुदरविभूपणसख- | उन तोरन बोधे इए व सोनेके जकभरे कला 

। स्थान-स्यानपर्‌ रामा पा रषे थे । नगरके नर-नारी नहा- 


गन्यै्नभिर्युवतिभिश्च विराजमानम्‌।।३२॥ | पोकर्‌ तथा नये वस्र, आमूषण, पुकि हाए इत-फच्लं 
आदिसे सज-धजकर धूम रे ये ॥ ३२ ॥ धर-घसमे 


| रिचत्रध्वजेः कनकतोरणपूणङुम्भैः । 





उदीप्रदीपबलिभिः प्रतिस्यमजाल- टोर-टोरपर दीपक जल्रये गये थे, जिनसे दीपावटीकी- 
सीख्टयाक्ो रही थी। प्रत्येक धरके श्ररोखोसे धूपका 

नियांतधूपरुचिरं विरुसत्पताकम्‌ घूओं निकलता हआ वहत ही मवग माम होता था | 
वमत रण सभी धघरोके ऊपर पताका फहरा रदी थीं तथा सोनेके 
पर रजतारुषृङ्ञ- कलश्च ओर चौदीके रिखर जगमगा रहै ये | मगवान्‌ 


श्रीकृष्ण इस प्रकारके महलस परपणं॒पाण्डवकी 


| जष्टं दद्दर भवनैः छरुराजधाम ।३३।॥ हनम 
राजधानी इन्द्रप्रस्थ नणरको देखते हए अगे वदृ रहे 


प्राप निशम्य नरलोचनपानपात्र- ये ॥ ३३ ॥ जव युवतिर्योने घुन। किं मानव-नेत्रकि 
~ । पानपात्र अर्थात्‌ अत्यन्त दशनीय भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
मात्सुक्यावनछावतकन्शदुद्सबन्धाः। राजपथपर्‌ आ रहे है, तब उनके दश्चनकी उत्ुकताके 


आव्रेगसे उनकी चोष्यं ओर साङर्थोकी गरे दीटी 
= ६. पड़ गयीं । उन्होने रका काम-काज तो छोड ही दिया, 
द्रष्ड यथुयुवतयः स ॒नरेन्द्रमाग ॥३४॥ | सेजपर सोये इए अपने पतिर्योको भी छोड दिया ओर 
भगवान्‌ श्रीक्ृप्णक। दर्शन करनेके ल्िि राजपथपर दौड 


सयो विधुज्य गृहकपे पतींश्च तपे 


तसिन्‌ खङल इभाशधरथद्वषद्धः आयीं | ३४ ॥ सडकपर हाथी, घोडे, रथ ओर पैदल 
| 1) मः सेनाकी भीडल्णरहदी थी उन स्ियोने अशसियोपर 
कृष्या सभायसुपलन्य गृ्वापवरूढाः । चदकर रानियोके सहित भगवान्‌ श्रीकरष्णका ददान 


नाया तिद्धीयं ङुधुेर्मनसोपगुद्य किया, उनके ऊपर पुष्पोकी वर्षा की ओर मन-ही-मन 
आलिङ्गन किया तथा प्रेममरी भ्रुसकान एवं चितवनसे 

सुखयागतं विदधुरुत्सयवीक्षितेन ॥३५॥ | उनका सुखागत क्रिया ॥ ३५ ॥ नगरकी शिया राजपथ- 

प्रियः पथि निरीक्ष्य ॒धन्दपतरी पर चन्द्रमाके साथ विराजमान ताराओके समान श्रीकृष्ण- 
जुः शरियः पथि निरी = की पल्नियोको देखकर आपसमे कहने ल्गी-सखी | 
इन बङ़भागिनी रानियोने न जाने एेसा कोन-सा पुण्य 
किया है, जिसके कारण पुरुषरिरोमणि भगवान्‌ 
यचश्चुषां पुरुषमोिरुदारहास- श्रीकृष्ण अपने उन्धुक्त हास्य ओर वितसपूणं कयाक्षसे 


तीलाबलोककलयोत्सवमातनोति | उनकी भोर देखकर उनके नेत्रोको परम आनन्द प्रदान 
५ -। | करते हे ॥ २६ ॥ इसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्ण राज- 


| पौरा मङ्गरपाणय! । पयसे चक ददे चे | स्यान स्यानपर बहृत-से निपाप 


स्तारा यथोडपसदाः किमकायमरभिः । 


[क का --------- 








के, अ 





(क 





` मोचयित्वा मयं येन रा्गे दिव्या सभा कृता ॥४५॥ | समा तेयार कर दी ॥ ५ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णं राजा 

































अ० ७१ | द्श्म स्कन्धं ५७२ ४ हः 








चक्कुः सपया कृष्णाय श्रेणीयख्या हतेनसः ॥२७॥ धनी-मानी ओर रिव्पजीवी नागसिकिनि अनेकों माङ्गलिक 
वस्तुं ल-रकर्‌ उनकी पूजा-अर्चा ओर वागत-स॒त्कार 

किया | ३७ ॥ 

अन्त {पुरजनं १ प्रीत्या यृङकुन्दः फुलटरोचनेः ॥ अन्तःपुरकीं लियो भगवान्‌ श्रकरष्णको देकर प्रेम 
ट ष ओर आनन्दसे भर गयीं । उन्कंने अपने प्रेमव्रिह्वठ ओर 
ससम्ध्रमेरभ्युपेतः प्राविशद्‌ राजमन्द्रम्‌ ।२८।। आनन्दसे खिले नेतरेकि द्वारा भगवान्‌का खागत किया 
| ओर श्रीकृष्ण उनका खागत-सत्कार खीकार करते इए 

पथा विलोक्य भात्रेयं कृष्णं त्रिथुवनेश्वरम्‌ | राजमहट्में पधारे ॥ ३८ ॥ ज्र कुन्तीने अपने त्रिभुवन- 
भः पति भतीजे श्रीकृष्णको देखा, तव उनका हृदय प्रेमसे 
्ीतात्मोत्थाय पर्यङ्ात्‌ सस्लुपा परिषखजे ।३९॥ | भर आया । 9 पलंगसे उठकर अपनी पुतन दपदीके 
साथ आगे गयीं ओर भगवान्‌ श्रीकृष्णको हदयस च्गणा 

गोविन्दं ग्रहमानीय देवदेवेशरमारतः । य्या ॥ ३९ ॥ देवदेवेदवर भग शन्‌ श्रीढृष्णको राज- 
मक्के अंद्र कर राजा युधिष्ठिर आदरमाव ओर 

पूजायां नाविदत्‌ कृत्यं प्रमोदोपहतो चेष; \।७०]] | आनन्दके उद्वैकसे आत्मविस्मृत हो गये; उन्द इस 
९ वातकी भी सुधि न रही कि किंस क्रमसे भगवानकी पूजा 
पित्ष्वसुगुरुस्रीणां कृष्णश्चक्रंऽभिवादनम्‌ 1 करनी चाहिये ॥ ४० ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपनी 
पूज ठुन्ती ओर गुरुजनोकी पल्नियोका अभिवादन 
किया । उनकी बहन सुमद्र। ओर द्वोपदीने मगवानकतो 

श्चश्चा संचोदिता क्ष्णा करष्णपलीश्च सर्वशः | नमस्कार किया ॥ 9 ९ ॥ अपना सास कुन्ताकरा पररणासे 
द्रोपदीने व्र, आमूषण, माका आदिकं दवारा रुक्मिणी, ` 

आनचं रुकिमणीं सत्यां भद्रां जाम्बवतीं तथा ॥४२॥ | सत्यभामा, भद्रा, जाम्बवती; कालिन्दी, मित्रविन्दा, _ ` 
टक्ष्मणा ओर परम साष्वी सत्या-- भगवान्‌ श्राकृष्णकीं 

कालिन्दं भित्रविन्दां च चन्या नागनजितीं सतीम्‌ | इन पटरानियोका तथा बहोँ आयी इई श्रीृष्णकी अन्यान्य 


रानियोका भी. यथायोग्य सत्कार किया ॥ ५२-४२ ॥ 
अन्यध्वास्यागता यस्तु वा्ःज्ञण्डनादिभिः ४२ धर्मराज युधिष्ठिरने मगवान्‌ श्र्ृ्णको उनकी सेना, ^ 


खयं च कृष्णया राजन्‌ भगिन्याचाभिवन्दितः) ४१॥ 


सेवक, मन्त्री ओर पल्ियोके साथ पेसे स्थानमे ठहराया _ 
जहो उन्हे नित्य नयी-नयी सुखकी सापग्नियो प्राप्त हो ।४४॥ ज 
ससेन्यं सानुगामात्यं सभाय च नवं नवम्‌ ॥४४। | अ्धनके साथ रहकर भगवान्‌ श्रीृष्णने खाण्डव वनकं 

दाह कराकर अग्निको तत्त किया या ओर मयाषुरको ` 
तर्पयित्वा खाण्डवेन वहं फाल्णुनसंयुतः । उसपे बचाया था । परीक्षित्‌ ! उस मयाघुरने ही 
धर्मराज युधिष्ठिरके च्ि भगवानकी आज्ञासे एक दिव्य 


सुखं निवासयामास धमराजो जनादनम्‌ । 


युधिष्ठिको आनन्दित कनेक व्यि कर महीनोतक ` 
उवास फतिचिन्मासान्‌ राज्ञः परियचिकीषया। । चन्रमस्थमं ` ही रे । वे समय-समयप्र अयने उवास तिविनपासान रः निषि - व 
१. तया । ¦ | 


# 
# य 
















चै 4 
। कोने के प कोरक [ > 
ध न 


(ऋ 1 क 1 
न 


` ` "नक क जाणा + छ 


पर्छ 


श्रीमद्भागवत 
न 


विहरन्‌ रथमारुह्य फाल्गुनेन भटैवरेतः ७६ | रथपर सत्रा होकर विहार करनेके च्वि इधर-उधर चले 


॥ अ० ७२ 





भाः कका त ० ~ = 





जाया करते थे । उस समय वड़े.वड़ वीर सैनिक भी 
उनकी सेवके ल्यि साथ-साथ जते ॥ ४६ ॥ 





इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्वन्ये उत्तरां 
कृष्णस्यनद्रमरस्थगमनं नामेकसक्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥ 





अथ द्विसमप्ततितमोऽष्यायः 


पाण्डवांके राजस्दूययज्ञका आयोजन ओर जरासन्धका उद्धार 


श्रीद्ुकं उवाच 
एकदा त॒ सभामध्ये आखितो अनिभिर्वतः । 


बराह्मणेः क्षत्रियेवेद्येर्ातभिश्च युधिष्ठिरः ॥ १। 


आचार्यैः ङलब्रदधेश्च ज्ञातिसम्बन्धिवान्धवैः । 


शृण्वतामेव चंतेषामाभाष्येदयुवाच ह ॥ २॥ 
युधिष्टिर उवाच 
करतराजेन गोविन्द राजघ्येन पावनीः । 


| यक्ष्ये विभूतीरभवतस्तत्‌ सम्पादय नः प्रभो  ३॥ 


"44 










"नत शद" 
¢ 


तद्‌ देवदेव भवतइचरणारविन्द 


त्वत्पादुके अविरतं परि ये चरन्ति 
`  ध्यायन्त्यभद्रनशने छचयो गरणन्ति। 
विन्दन्ति ते कमलनाभ भवापवर्ग- 


मारासते यदि त आशिष ईश नान्ये ॥४॥ 


९ च सेवादुभावमिंह पद्यत रोक एषः 











ये त्वां भजन्ति न भजन्त्युत बोभयेष 


वि 
नति - 





त, अ 
~~]: न ब्‌] [= 


की» द 
धः ० 
नी ५ भ 


श्रीश्युकदेवजी कहते ह~ परीक्षित्‌ ! एक दिन 
महाराज युधिष्ठिर वहृत-से सुनि, ब्राह्मणो, क्षत्रियो, 
वस्यो, भीमसेन आदि मायो, आचार्यो, कुख्के बड़- 
वू, जाति-बन्धुओं, सम्बन्धियों एवं बुटुम्वियोके साथ 
राजसमामे बेटे इए ये । उन्होने सव्रके समने ही 


भगवान्‌ श्रीकृष्णको सम्बोधित करके यह वात 
कही ॥ १-२ ॥ 


धमराज युधिष्ठिरने कहा गोविन्द्‌ ! मँ सर्वर 
राजसूय यज्ञके द्वारा आपका ओर. आपके परम पावन 
विभूतिखरूप देवताओंका यजन करना चाहता द | प्रमो । 
आप कृपा करके मेरा यह संकल्प प्रा कीन्यि ॥ २॥ 
कमटनाम | आपके चरणकमल््रैकी पादुकां समस्त 
अमङ्खलोको नष्ट करनेवाटी है । जो रोग निरन्तर 
उनकी सेवा क्रते है, ध्यान ओर स्तुति करते 
हे, वास्तवमे वे. ही पवित्रात्मा हैँ । वे जन्म-मृल्युके 
चक्रसे छुटकारा पा जाते है ओर यदि वे सांसारिक 
विषयोकी अभिलाषा कर, तो उन्हं उनकी भी प्राप्ति हो 
जाती है । परंतु जो आपके चरणकमल्मकी शरण प्रण 
नहं करते, उन्है सुक्ति तो मिक्ती दी नही, सांसारिक 
भोग भी नदीं मिकते ॥४॥ देवताओके भी आराध्यदेव । 
तै चाहता द्र किं संसारी लोग आपके चरणकम्ेकी 
तेवाका प्रमाव देखें । प्रमो | कुस्वंशी ओर खज्ञयवंसी 
नंति जो लोग आपका भजन करते ह ओर जो 


ग्रद्ेय विभां इरुषजयानाम्‌॥ ५॥ | नहीं करते, उनका अन्तर्‌ अप जनताको दिला 








न ब्रह्मणः खपरभेदमतिस्तव स्यात्‌ 
सवोत्मनः समदृशः खसुखानुमूतेः । 
संसेवतां सुरतरोरि ते प्रसादः 


+ सेवानुरूपमदयो न विपर्ययोऽत्र 1 £ ॥ 
श्रीभगवानुवाच 


सम्यग्‌ व्यवसितं राजन्‌ भवता शत्रुकर्दान । 
कल्याणी येन ते कीतिंलोकानजु भविष्यति 1\ ७ 1] 
ऋषीणां पित्देवानां सुदृदासपि नः प्रभो । 
सर्वेषामपि भूतानामीप्सितः क्रतुराडयम्‌ ॥ ८ ॥ 
विजित्य नृपतीन्‌ सवान्‌ कृत्वा च जगतीं वशे । 
सम्मृत्य सवंसम्भारानाहरसख महाक्रतम्‌ । | ९॥ 
एते ते भ्रातरो राजन्‌ लोकपाटांश्चसम्भवाः । 
जितोऽस्म्यात्मवता तेऽहं दुजयो योऽढृतात्मभिः।१०। 
न काशन्सत्परं सोके तेजसा यशसा श्रिमा 


~ विभूतिभिवाभिभवेद्‌ देवोऽपि किं पार्थिवः ॥११॥ 


श्रीद्ुक उवाच 





निशम्य भगवद्रीतं प्रीतः फु्ुखाम्बुजः 





बात सुनकर महाराज युधिष्ठिरा हृदय भानन्दस भर 
। र गया ] अव उन्होने 
ग > तवं द द्‌ द्या । भगवान्‌ 
नी शक्तिका संचार करके उनको 


र _ व कः क~ ~ ~> 
ककन - ---श-- न ~ 






दीजिये ॥ ५ ॥ प्रभो ! आप सवके आत्मा, स समदरी 
ओर खयं आत्मानन्दके साक्षात्कार है, खयं ब्रहम द । 
आपे "यह मेँ दँ ओर यह दसरा, यह अपना है - ओद्‌ 
यह परायाः-- इस प्रकाए्का मेदमाव नहीं है । फिर भी 
जो आपकी सेवा करते हे, उन्हें उनकी मावनाके अनुपा 
फच पिल्ताद्ीदहै- ठीक वैसे ही, जैसे कल्यब्रक्षकी 
सेवा करनेवालेको । उस फछमे जो न्यूनाधिकता होती 
है, वह तो न्यूनाधिक सेवराके अनुख्प ही द्योत है । 
इप्तसे आप विषमता या निदंयता आदिं दोष नहीं 
आते ॥ & ॥ 

भगवान्‌ ्रीरृष्णने कष्ा-रातरु-विजयी धमराज । 
आपका निश्चय बहत ही उत्तम है | राजसूय यज्ञ करनेसे 
समस्त ठोकोमे आपकी मङ्गटमयी कीर्तिकरा विस्तार 
होगा ॥ ७ ॥ राजन्‌ ! आपज्ञा यह महायज्ञ ऋषियों 
पितरे, द्वेवताओं, सगे.सम्बन्धिर्यो, हमे --ओर कर्डतक 
कँ, समस्त प्राणियोको अभीष्ट है ॥ ८ ॥ महाराज । 
ृरथ्वीके समस्त नरपतिर्योको जीतकर, सारी प्रथ्वीको 

अपने वराम करके ओर यज्ञोचित सम्पूणं सामभ्री एकत्रित 
करके फिर इस महायज्ञका अवुष्ठान कीज्यि ॥ ९ ॥ 
महाराज ! आपके चारे माई वायु, इन्द्र आदि टखोक- 
पालके अंशसे पैदा इए हैँ } वे सब-के सब बड़ वीर 
है । आप तो परम मनखी ओर संयमी हैँ दी । आपठोगेनि 


अपने सद्गुणो ते सुद्चे अपने वामे कर चया है । निन. 


लोगो ने अपनी इद्दियो ओर मनको वशम नहीं किया है 
बे मुञ्चे अपने वामे नहीं क सकते ॥ १० ॥ संसारमं 
को$ बडे-से-बड़ा देवता भी तेज, यरा, र्द्मी, सोन्दयं 
ओर रेशर्थं आदिके द्वारा मेरे भक्तका तिरस्कार नहीं कर 
सक्ता । फिर कोई राजा उसका तिरस्कार कर दे 
इसकी तो सम्भावना ही क्या है १॥११॥ 
श्रीट्युकदेवजी कहते है-- परीक्षित्‌ ! भगवान! 


कन्वी 
[# 


4 8 ध ^ [व 
¶ अ. 118 कक १.11 





र च्छ 


ह 
त 
९ 


५७8 ीमद्भागवत्‌ | | अ० ७२ 








* शनक यित 


| ' सहदेवं दकषिणस्यामादिशत्‌ सह संजयः । अत्यन्त प्रभावी बना दिया या ॥ १२॥ धर्मराज 
| युधिष्ठिरने सृन्नयवंरी वीरोके साथ सहदेवको दक्षिण 
दिशिगप्रतीच्यां नङ्लय॒दीच्यां सव्यसाचिनम्‌ । दिशामे दिग्विजय करनेके ल्य मेजा । नकुकको मत्स्- 
देरीय वीरोके साथ पश्चिमम, अञ्जुनको केकयदेश्ीय 

प्राच्यां वृकोदरं मत्स्यैः केकयैः सह मद्रकैः ॥१३। | वीरोके साथ उत्तरम ओर भीमसेनको मद्रदेशीय वीरोके 
साथ प्रवं दिशामें दिण्िजय करनेका आदेश दिया ॥१३॥ 

ते विजित्य चपान्‌ बीरा आजहूर्दिगम्य ओजसा । परीक्षित्‌ | उन भीमसेन आदि वीोने अपने बल-पोरषसे 


। सब ओरके नरपतियोको जीत च्या ओर यज्ञ॒ करनेके 
। अजातश्चत्रवे भरि द्रविणं नप यक्ष्यते ॥१४॥ यि उद्यत महाराज युधिष्ठिरको बहत-सा धन खाकर 
॑ नः १५ दिया ॥ १४ ॥ जव महाराज युधिष्ठिरने यह चुना किं 
शत्वाजितं जरासंधं चपतेध्यायतो हरिः । अवतक जशसन्धपर विजय नहीं प्राप्त की जा सकी, तव 
वे चिन्ता पड़ गये । उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन्हे 
वही उपाय कह सुनाया, जो उद्धव जीने वतटाया था | १५। 
परीक्षित्‌ | इसके बाद भीमसेन, अजुन ओर भगवान्‌ 
श्रीकरष्ण--ये तीनों ही ब्राह्मणका वेष धारण करके गिछिज 
गये । वही जरापन्धकी राजधानी थी ॥ १६॥ राजा 
जरासन्ध ब्रा्मणोका भक्त ओर गृहस्थोचित धर्मोका पान 
करनेवात् था । उपरक्त तीनां क्षत्रिय ब्राह्मणका वेष 
धारण करके अतिधि-अभ्यागतोके सतकारके समय 
जरासन्धके पात गये ओर उससे इस प्रकार याचना 
न्रहमण्यं समयाचेरन्‌ राजन्या ब्रह्मलिद्खिनः ॥१७॥ | की--॥ १७ ॥ "राजन्‌ ! आपका कल्याण हो । हम 
तीनो आपके अतिथि हैँ ओर बहत दूरसे आ रहे है । 
राजन्‌ विद्धयतिथी न्‌ प्राप्तानर्थिनो द्रमागतान्‌ 1 | अवश्य ही हम यहाँ किसी विरोष प्रयोजनसे ही आये 
हैँ । इसव्िि हम आपसे जो कुछ चाहते हे, वह अप 
तन्नः प्रयच्छ भद्रं ते यद्‌ वयं कामयामहे ॥१८॥ । दमं अवश्य दीजिये ॥ १८ ॥ तितिष्च पुरुष क्या नही 
सह॒ सकते । दुष्ट पुरूष बुरा-से-बुरा म नहीं १ 
~ 0 सकते । उदार पुरुष क्या नहीं दे सकते ओर समदरीवि 
कि दप तितिक्षणां किमकाय॑मसाधुभिः । स्यि पराया कौन है १ ॥ १९ ॥ जो पुरुष खयं समथ 
होकर्‌ भी इस नादावान्‌ शरीरसे एेसे अविनारी यका 
स्रह नहीं करता, जिप्तका 1 गान 
> 1 क्रे; सच प्रिये तो उसकी जितनी निन्दा को जाय, 
योऽनित्येन शरीरेण सतां गेयं यशो श्वम्‌ । मोदी ह | हका जीवन शोक करनेयोम्य है ॥ २०॥ 
ति | राजन्‌ ! आप तो जानते ही होगि--राजा हरिश 
नाचिनोति खयं कल्पः सवाच्यः शोच्य एव स|२०। | रन्तिदेव, केवल अनके दाने बीन-लुनकर नवाह के- 

| | वाठे महात्मा सुद्र, हिवि, बड, ध्याप ओर कपोत । 

हरिथन्द्रो रन्तिदेव उच्छबत्तिः शिगिरबलिः । य 





" „~ वाका द इ ` 731. 2 4 ४ ~~ ~> रि + 
॥ | @ ` + 4 


9 क नक 


"म द ` 
न + 
[त 
9 0 1 त 


ॐ 
[कक +, 


(= 1, 
# 


9 = 
+ - 4 > न 


आहोपायं तमेवाद्य उद्धवो ययवाच ह ॥१५५॥ 
भीमसेनोऽजनः कृष्णो बह्मलिङ्धराखरयः 1 
जग्ुगिरखििजं तात बृरहद्रथसुतो यतः ॥१६॥ 


ते गत्वाऽऽतिथ्यवेलायां गेषु गृहमेधिनम्‌ । 


किं न देयं बदान्यानां कः परः समदर्शिनाम्‌ ॥१९॥ 


~> जि र 


१, थीनस्मानर्थिनो । 










० ५९ | । 


व्याधः कपोतो बहवो ह्ध्रवेण श्रुचं गताः ॥२१॥ 





श्रीञयुकक उवाच 


खरेराकृतिभिसतांस्त शोष्टेऽमहेरपि | 
राजन्यवन्धृन्‌ विज्ञाय टष्टपूवोनचिन्तयत्‌ ॥२२॥ 
राजन्यवन्धवों हेते त्रहमशिङ्गानि बिभ्रति । 
ददामि भिधितं तेभ्य आत्मानमपि दुस्त्यजम्‌ ।२३॥। 
बलेलु॑शरूयते कीतिर्वितता दिक्ष्वकरमपा । 
एेश्वयाद्‌ भ्रंशितस्यापि विम्रन्याजेन विष्णुना ॥२५४।॥ 


श्रियं जिहीष॑तेन्द्रस्य विष्णवे द्विजरूपिणे । 


जाननपि महीं प्रादाद्‌ वायंसाणोऽपि देत्यराद्‌।।२५५॥ 


+~ 38; 


¢ 


वता बाह्मणाथाय को न्वथं 


| 
॥ । 


क्षत्रचन्धुना । 


देहेन पतमानेन नेहता विपुलं यशः ॥२६॥ 


इत्युदाएरमतिः प्राह ॒कृष्णाजुनवरकोदरान्‌ । 


श्रीभगवानुवाच 


युद 6 ६ नो देहि राजेन्द्र इन्द्रश्चो यदि मन्यसे । 


ए कः 


भाग ण्म यट. ६७; १. 


न 
॥ + कः [ ४ , ` ~+ 
न, 
त ॥ 


॥, 
नं 
=: 


~न 


दसम्‌ स्कन्ध 


1०0 
= ^ क जय ए त न 


हे विप्रा व्रियतां कामो ददाम्यात्मरिरोऽपि च५॥२७]]| अपना सिर भी दे सकता हू ॥ २७॥ = 


> भी 


नालकगा्ण, ॥२८॥ । इल्युद्धकी षा दीजिये ॥ २८ ॥ देखो, ये पाण्डुपुत्र 
द्यम्‌) =; र है 


इस नाडात्रान्‌ दारीरके द्रा अव्रिनङ्ी पदको ग्राप्त हो ^= 
चुके हे । इसच्ि आप भी हमलोगोकौ निरादा मत 
कीजिये ॥ २१॥ 

धीड्ुकटेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! जरासन्धने 
उन छोगोंकी आवाज, सूरत-ङकर ओर कदर्योपर पड ~. 
टुए घनुषकी प्रव्यञ्चाकी रगइके चिहोको देखकर पहचान 
च्या करिये तो ब्राह्मण नी, क्षत्रिय है| अव बह 
सोचने चा कि मेने क्यी-न-कहीं इन्दं देषा भी अवय 

॥ २२ ॥ फिर उसने मन-दी-मन यह्‌ विचार किया 
कि ध्ये क्षत्रिय होनेपर भी मेरे मयसे ब्राह्मणका वेष 
। बनाकर आये हैँ | जव ये भिश्चा मौगनेपर ही उता 





। ¶ ) | 


हो गये है). तव चाहे जो कुछ मोग, यहद दूंग। 
याचना करनेपर अपना अत्यन्त प्यारा ओर दुस्यन 
रारीर देनेमे भी मुदे हिचकिचाहट न होगी ॥ २३ ॥ ` 


कः 


विष्णुभगवान्‌ने ब्राह्मणका वेष धारण करके वच्छिका धन, 
 पेश्वये--सव कुछ छीन लिया; फिर भी वलिकी पवित्र 
| कीरति सव ओर फैली इई है ओर आज भी लोग बडे 
आद्रसे उसका गान करते है ॥ २४ ॥ इसमे संदेहं 
नदीं कि विष्ुमगवान्‌ने देवराज इन्द्रकी राञ्यलक्मी बदिसे 
छीनकर उन्हं टौटानेके व्ययि ही ब्राह्मणखूप धारण किया 
था । दैत्यराज वलिको यहं बात माम हो गयी धी ओर 
गुक्राचाथने उन्हे रोका भी; परंतु उन्होने प्रध्वीका दान ` 
कर ही द्विया ॥ २५॥ मेरा तो यह्‌ पक्ता निश्वयदहै 
कि यह शरीर नाश्वान्‌ हें । इस उरीरसे जो विपुल ` 
यङ नहीं कमाता ओर जो क्षत्रिय ब्राह्मणक व्थि ही 
जीवन नहीं धारण करता, उसका जीना व्यथ हं ॥२६॥ । । 
परीश्नित्‌ ! सचमुच जरासन्धकी बुद्धि बडी उदार शी . 
| उपयुक्त विंचार करके उसने तब्रा्मण-वेषधारी श्रीकृष्ण, ` 
अजुन ओर भीमसेनसे कहा--ष्राह्मणो । आपटठोग मन- 
चाही वस्तु -र्मोग ठे, अप चाहं तो मै आप गोको 












° " ` व सकाः 





भगवान्‌ भीरृष्णने कषा-राजेनद्र | हमलोग अन्नवे 
इच्छक त्राण नहीं हैः क्षत्रिय है; इम आपके 
यद्धे लि आये हैँ । यदि आप की 







। = # = 6 
(न्य १, स्तः 


ह) ॥ = == 


› ओर भै 


। 4 
५७८ श्रीमद्भागवत | अ० ७२ 


ज 





~ ~~ ~ - 


अनयोमातरेयं मां ष्णं जानीहि ते रिपुम्‌ ।॥२९॥ 


"~~~ स्यस्व ~ ~ 





~= 


इन दोनोका ममेरा भाई तथा अपक्रा पुराना श्र कृण 
द्र" | २९ ॥ जत्र भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस प्रकार अपना 
` परिचय द्विया, तवर राजा जरासन्य टठाकर हंसने खगा | 
आह चामपितो मन्दा युद्धं तहिं ददौमि बः ॥३०॥ ओर चिक वोला--*अरे मूर्वा | यदि तुम्दं युद्रकी 
दीइच्छाहैतोटो वैँ तुम्हारी प्राना खीकार करता 
न त्वया भीरुणा योत्स्ये युधि विङ्कघचेतसा । | ३० ॥ परंतु कृष्ण ! तुम तो वड़े डरपोक हो । 
युद्धम त॒म धतरा जाते हो । यर्होतक कि मेरे उपसे 
तुमने अपनी नगरी मधुरा भी चछेड दी तथा समुद्रकी 
अयं तु वयसा तुल्यो नातिसन्वो न मे समः] | सरण ली है । इसि मै ठमदारे साय नही कदा ३१। 
ह ९ यह अजुन भी कोई योद्धा नहीं है । एक तो अवश्यम 
अनो न भवेद्‌ योद्धा भीमस्तुस्यवलो मम ॥२३२॥ । मुक्षसे छोटा, दूसरे कोई विरोष वल्वान्‌ भी नहीं है । 
ह्य वी इसि यह भी मेरे जोडका वीर नहीं है । मै इसके 
त्युक्त्वा भीमसेनाय प्रादाय महतीं गदाम्‌ । साथ भी नही गा । रहे भीमसेन, ये अवश ही भे 
द्वितीयां खयमादाय निर्जगाम पुराद्‌ बहिः ॥३३॥ | समान वच्वान्‌ ओर मेरे जोकके हः ॥ ६२ ॥ जरसन्धन 
यह कहकर भीमसेनको एक वदत बड़ी गदा दे दी 

ततः स्मे खले वीरो संयुक्तावितरेतरो । ओर खयं दूसरी गदा टकर नगरसे बाहर निक 





एवमावेदितो राजा जहासोच्चेः स मागधः । 


मथुरां खपुरं त्यक्त्वा सुद्र शरणं गतः ॥३१।॥ 


आया ॥ ३३ ॥ अब दोनों रणोन्मत्त वीर अखाडमं 

आक्र एक दूसरेसे भिड़ गये ओंर अपनी वन्रके समानं 

मण्डलानि विचित्राणि सव्यं दक्षिणमेव च । | कठोर गदाओंसे एक दृसरेपर चोट करने ल्गे ॥ ३५॥ 

| वे दा्-्ाये तरह-तरहके पते बदलते हए पेसे शोभाय- 

चरतोः शशमे युद्धं नरयोखि रङ्धिणोः ॥३५५॥ | मान हो रहे थे-- मानो दो श्रे्र नट रुगम॑चपर युद्धका 

| अभिनय कर रहे हों ॥ ३५ ॥ परीक्षित्‌ ! जव एककं 

ततश्चटचटाशब्दो वज्जनिष्पेषघंनिभः 1 | गदा दूसरेकी गदासे टक्रराती, तत्र पसा माद्ूम होता 

मानो युद्ध करमेवारे दो हाधियोके दत आपसम भिक 

गदयोः धिप्रयो राजन्‌ दन्तयोखि दन्तिनः ॥३६॥ | चस्वशर रहे हो, या वड़े जोरसे त्रिजढी तड़क रही 

हो ॥ ३६ ॥ जवर दो हाथी क्रोधमे भरकर ठडने क्गते 

है ओर आककी उलि तोड-तोड़कर एक-दृूसरेपर , प्रहाए 

| करते है, उप्त समय एकदूसरेकी चोटसे वे ड्या 

चूर-चूर हो जाती है; वैसे ही जब जरासन्ध ओर भीमसेन 
चूणीबभूवतरुपेस्य यथाकंशाखे | बड़े वेगते गदा चख-चलकर एक-दूसरेके कं्धो, कमरे, _ 

वैरो, हार्थो, जर्धो ओर हसव्ि्योपर चोट करने रगे; 


संयुभ्यतोदिरदयोखि दीप्तमन्य्नो | २७] | तब उनकी गदां उनके अङ्खोसे टकरा-टकराकरर चकनाचूर्‌ 
होने लगीं ॥ २७ ॥ इस प्रकार जब गदाए चूर-चूर हो 


< = प्रहतयोगंदयोर्चैवीरौ (५ ~ ] # ट तसि 
॥ | रो गयीं, तब दोनों वीर क्रोधमे भरकर अपने धूर एक 
कृदो खघष्टिभिरयः स्यशेरपिं्टाम्‌ | दूसरेको कुच डाल्नेकी चेष्टा करने जगे । उनके धूमे 
न ~ --- 


जघ्नतुचजकस्पाभ्यां गदाभ्यां रणदु्मदौ ॥२४॥ | 


ते बे गदे भूजजवेन निपात्यमाने 


अन्योन्यतोऽसकटिपादकरोरुजत्रन्‌ । 





१. दानि । ९, निषष० । ३. रयःषद्े° । 


ह । 








ग क क 








अ रान ` ५ 28 ~" ^ न 


अ० ७२ | 





= -----------~-- 7-11-7 --- = व-=--=--------------~-=--------- 








= मा 


दशम स्कन्ध 


१५७९ 








शब्दस्तयोः प्रहरतोसिभियोरिवासी- 


(=--~- (५ क 
निवततिजपद्षस्तलताडनोत्थः ।:३८॥ 


तयोरेवं प्रहरतोः समशिक्षावरौजसोः । 
निविंशोपमभृद्‌ युद्धमध्षीणजवयोर्यप ॥२९॥ 


एवं तयोर्महाराज युध्यतोः सप्तविंशतिः 


न 


दिनानि निरग॑स्तत्र खुहृढनिक्षि तिष्ठतोः ॥४०।] 


एकदा मातुङेयं यें प्राह राजन्‌ ब्रकोदरः 


न शक्तो ऽहं जरासंधं निर्जेतुं युधि माधव ॥४१॥ 
शत्रोजंन्मण्ती विडढान्‌ जीवितं च जराकृतम्‌ । 
पाथंमाप्याययय्‌ स्वेन तेजसाचिन्तयद्धरिः ॥४२॥ 
संचिन्त्यारिवधोपायं भीमसामोधदरशनः 
दशेयामाप्त विटपं पाटयनिव संज्ञया ॥४३॥ 
तद्‌ विज्ञाय महासस्वो भीमः प्रहरतां वरः । 
गृहीत्वा पादयोः श्रं पातयामास भूतङे ।॥७४॥ 
एकं पादं पदाऽऽक्रम्य दोभ्यामन्यं प्रगृह्य सः 
गुदतः पाटयामास शाखामिव महागजः । ४५५ 
एकपादोरुब्रपणकिपृष्ठस्तनां सके । 
एकबाहकषिभरुकर्णे शकटे दद्युः प्रजाः ।॥४६॥ 


हाहाकारो 


महानासीनिहतिे मगधेश्वरे । 






जकः 


देसी चोट करते, मानो खोष्ैका धन गिररहादह्ो। 
एक-दूसरेपर घुल्कर चोट करते हए दो हायिर्योकी तरद 
उनके थप्पड़ ओर धृंसोका कठोर खब्द॒व्रिजटीकी 
कड़कड़ाहटके समान जान पडता धा ॥३८॥ परीक्षित्‌ । 
जरासन्ध ओर भीमसेन दोनोकी गदायुद्धं उुदाटता, बक 
ओर उतसाह समान ये । दोनोकी शक्ति तनिक भी श्रोण 
नहीं हो ददी थी । इस प्रकार लगातार प्रहार करते 


दोनो 9 अ 


रहनेपर भी दोनो्मेसे किंसीकी जीत या हार न इई ।३९। 





। दोनों वीर रातके समय मित्रके समान रहते ओर दिनमे 


छरुटकर एक दृसरेपर प्रहार करते ओर छइते | महाराज | 
इस प्रकार उनके ल्डते-डते सत्ताईस दिन वीत गये 1  ५। 

प्रिय परीक्षित्‌ ! अद्काईसवे दिन भीमसेनने अपने 
ममेरे भाई श्रीकृष्णसे कहा--श्रीकृष्ण ! में युद्धम जरा- 
सन्धको जीत नहीं सकता ॥ ४१ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
जरासन्धके जन्म ओर मृ्युका। रहस्य जानते थे ओर 
यह भी जानते थे कि जा राक्षसीने जशसन्धकै शरीरके 
दो दुकडोको जोड़कर इसे जीवनदान दिया है । इस- 
व्ये उन्होने मीमसेनके शरीरम अपनी रक्तिका सश्ार 
किया ओर जरासन्धके वधका उपाय सोचा ॥ ५२ ॥ 
परीक्षित्‌ ! भगवानका ज्ञान अबाध है । अव्र उन्होने 
उसकी मृत्युका उपाय जानकर एक वृक्षकी ड॑लीकरो 
वीचोवीचसे चीर दिया ओर इदारेसे भीषसेनको 
दिखाया ॥ ४३ ॥ वीरदिरोमणि एवं परम शक्तिशाटी 
भीमसेनने मगवान्‌ श्रीकृष्णका अभिप्राय समञ्च छया ओर 
जरासन्धके पैर पकड़कर उसे धरतीपर्‌ दे मारा ॥४४॥ 


फिर उसके एक पैरको अपने पैरके नीचे दाया ओर 
दूसरेको अपने दोनों हाथोसे पकड च्या । इसके वाद 
भीमसेने उसे गुदाकी ओरसे इस प्रकार चीए गल, जेसे ` 
गजराज वृक्षकी डाली चीर डले ॥ ४५ ॥ लोगेन ` 


देखा किं जरासन्धके शरीरके दो ट्कडे हो गये हैँ 
ओर इस प्रकार उनके एक-एक पैर, जोध, अण्डकोरा 
कमर्‌, पीट, स्तन, कधा, भुजा, नेत्र, भह ओर कान 


अला-अल्ग हो गये हे ॥ ४६ ॥ मगधरज जरन्वकी 
मृत्यु हो जानेपर वर्हौँकी प्रजा बड़े जोरसे हाय हाय ! 


पुकारने कगी 1 भगवान्‌ श्रीङृष्ण ओर अजने भीमसेन 





2 


* 
+ 


का आलिङ्गन करके उनका सत्कार किया ॥ ४७ ॥ 











क "न किक न -क्ठः = * क १७. 


८९ ८० | अ० ७२ 


ऋक 


श्रीमद्भागवत 





सहदेवं ` तत्तनयं भगवान्‌ भूतभावनः । 








सवेशक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णके खूप ओर विचारको 
कोई समञ्च नहीं सकता । वास्तवमै वे ही समस्त 
प्राणि्योके जी्रनदाता हं । उन्होने जरासन्धके राजर्सिहा- 
सनपर उसके पुत्र सहदेवका अभिषेकः कर दिया ओर 
जरासन्धने जिन राजाओंको कदी बना रक्खा था, उन्हें 

मचचामात्त राजन्यात्‌ सरुद्रा मागर्धन चं ॥४७८॥ कारागारसे मुक्त कर दिया |॥ ८ ॥ 
~~~ नन्व 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे -पाप्महंस्यां संहितायां द्ङामस्कन्वे उन्तरर्भे 

जरासन्धवधो' नाम द्विसक्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥ 


= 9१ = 
त्रिदक्षि म 
अथ निकपघन्ततमाऽव्यावः 
ज तसन्यके जेखसे छट हप राजाभमोकी विष्ई आर भगवानका इन्द्र 
श्रीशुक उवाच श्रीश्युकदेवजी कहते है-- परीश्षित्‌ 


अभ्यषिश्चदमेयात्मा मगधानां पति प्रथः | 





पर खोर आना 
! जरासन्धे 


। अनायास ही वीस हजार आठ सो राजाओंको- जीतकर 


। पहाड़ंकी धार्म एकः किलक मीतर कद कर रक्वा 
। था । भगवान्‌. श्रीकृष्णके छोड देनेपर जव वे वहाँसे 
गिखद्रिण्यां मलिना  मलवाससः ॥ १॥ | निकले, तव उनके दारीर ओर वचर मैले हो रहे ये ॥१॥ 
वे भूखसे दुक हो रहे थे ओर उनके मह सृख गये थे | 
जेल वंद रहमेके कारण उनके शरीर का एक-एक अङ्ख 
दीवा पड़ गया था ] वहसि निकठ्ते ही उन नरपतिर्या- 
ने देखा किं सामने भगवान्‌ श्रीकृष्ण खड़े हैँ । वप- 
कालीन मेधके समान उनका सँवत्म-सल्येना शरीर है 
ओर उसपर पीठे रगका रेरामी वख. फहय रदा है ॥२॥ 
। चा भुजाए ह-- जिनमे गदा, शङ्ख, चक्र ओर कमठ 


अयुते हे शतान्यष्टौ रीरया : युधि निजिताः 1 
ते निगता 
षुक्षामाः शाष्कवदनाः संरोधपरिकर्शिताः । 


दद्खस्ते घनश्यामं ` पीतकोशेयवाससम्‌ ॥ २॥ 


श्रीवत्साङ्गं चतह पद्मगभारुणेक्षणम्‌ 1 


चारपरसमवदनं  स्फुरन्मकरडण्डलम्‌ ॥ २॥ सुशोभित ह । वसथलपर सनहरी रेखा श्ोवसका 
। 0 पि चिह है ओर कर्के भीतरी भागक समान कोमल 
ि  पङ्धातर परितप्‌ । = | रतने नह: चुर बदन प्रतता सदन ४) 
। कामं मकराकृति कुण्डल ज्ञि मित्य रहे हं । छन्दर 

किरीटहारकटककटिभूत्रङ्गदाचितम्‌ ॥ ४॥ सकु, मोतिपोका हार, कड, कनी ओर वाजू 


अपने-अपने स्थानपर सोभा पा रहे है ॥ ३-४ ॥ गले 
कोस्तुभमणि जगमगा ददी है ओर वनमाश क्टक रही 
है । भगवान्‌ श्रीक्कष्णको देखकर उन राजाभकी रएेसी 
सिति हो गयी, मानो वे नेत्रोसे उन्हें पी रहे हैँ । जीमसे 
चाट रहे है नासिकासे घँ रहे ह ओर बाहुभोसे 


भ्राजढरमणिग्रीवं निवीतं वनमालया | 


पिबन्त इव चक्चभ्या छिन्त इव निहया ॥ ५॥। 


जिघ्न्त इव नासाभ्यां रम्भन्त इव बाहुभिः । 


* गते 721 क निय -~ भो ऋ = क 


६. वधक ० 


जि क ज ` जक 
जकः जः कक ॥ अ षक 
= 





| आलिद्गन कर टे है । उनके सारे पाप तो भगवान्‌के 
व ~ 


काककायकृककाकककष्काा च क १ न + 








अ० ७३ ] दश्चम स्कन्ध ५८१ 








-च्ययय्यय्य्न्य--------व्व्य्ययनय्यय्यव्व्व्व्य्य्व् चव्य थ््यय------------------------ 








प्रणेमुहतपाप्मानो मधमि ; पादयोहरेः ॥ & ॥ द्शनसे ही धुर चुके थे । उन्दनि भगवान्‌ श्रीकरष्णक 

| चपर अपना सिर दडकर प्रणाम श्रिया ॥ ५-६ ॥ 

य ५ भगवान्‌ श्रीकृष्णके दर्शानसे उन राजर्को इतना 

कृष्णस्दरानाह्दध्वस्तसरधनद्भाः । अधिक आनन्द्‌ दओ कि कौदमं रहनेका क्टेड विल्कुट 

समके गी | जाता दा । वे हाथ जोड़कर विनम्र वाणी भगवान्‌ 
ग्रशदरसुहषाशछश गीर्भिः प्राञ्जलयो यपा; । ७ ॥ | श्रीकृष्णकी स्तृति कश्ने स्मे | ७॥ 

राजान उचुः । राजा्जने कदा--दारणागतेकि सारे दःख ओर 

नमस्ते वदेवेश॒ प्रपनातिंहराग्यय । | हर लेनेवाटे व्वदेवेश्वर ! सचिदानन्दखरूप अग्रिनादी 

4 न श्रीकृष्ण | हम आपको नमस्कार करते दै । अपने 

पान्‌ पाह नः कृष्ण निरविष्णान्‌ वोरसंचृते,11८1) | जरासन्धे कारागारे तो हमे चछडा ही दिया, अर 

इतत जन्म-्रल्युख्य घोर संसार-चक्रसे मी छडा दीजिये; 

क्योकि हम संसारम दुःखका कटु अनुभव करके उससे 





ननं नाथान्वघ्रूयासो मागधं सधुषदन । 


अलुग्रहो यद्‌ भवतो रज्ञां राञ्यच्युतिर्धिभो ॥ ९ 1 | उत गवे हँ ओर आपकी शरणमे आवि है । प्रभो । 
| अव आप हमारा रक्षा कौजे ॥ ८॥ मधुसूदन । 


। 
हमारे खामी ! हम मगधराज जर।सन्धका कोई दोष 
| नहं देखते । भगवन्‌ ! यह तो ` आपका बहत बड़ा 
त्वन्मायामाहेतीऽनित्था सन्यते सम्पदोऽचलाः। १०। | अलुप्ह है करि हम राजा कहमनेवाले लोग राञ्यलक्मीसे 
च्युत क्र दिये गये ॥ ९ ॥ क्योकि जो राजा अपने 
राव्य-रेश्वयके मदसे उन्मत्त ह्यो जाता है, उसक्तो सच्चे 
सुखकी-- कल्याणकी प्राप्ति कभी नहीं दहो सकतीं । 
एवं ¡ सेका र्कं मायासयुक्ता वस्तु ` चक्षते ॥११॥) वह आपकी ' मायासे मोहित होकर अनित्य सम्पत्तियोकों 
ही अचल मान वेठता है ॥ १०॥ जैसे मूखंलोग 
मृगतृष्णाके जय्को ही जलाशय मान क्ेते ह, वैसेदी 
द्रयलोदु ओर अज्ञानी पुरुष भी इस पचिर्तनसीक 
मायाक्ो स्त्य वस्तु मान लेतेहेँ॥ ११॥ भगत्‌ ) 





राज्येधयंमदोन्नद्धो न श्रेयो विन्दते चपः | 





मगतृष्णां यथा वाल मन्यन्तं उदकाशयम्‌ । 


वयं पुरा श्रीमदनंषट्टयो 


जिगीपयासा तरेतरस्प्रधः य तन नेमे 
स्तरतरस्दभ पहले हमगोग धन-सम्पत्तिके नरोमे चूर होकर अधे हो 


रहे थे । इस प्रथ्वीको जीत लेनेके क्य एक दूसरेकी 
होड करते थे ओर अपनी ही प्रजाका नादा करते रइते 
थ । सचमुच हमारा जीव्रन अत्यन्त क्रूरत॑से भरा इओआ 
था ओर हमट्ोग इतने अधिक मतवाये ह्यो रहे थे कि 
आप ग्र्युरूपसे हमारे सामने खड़े है, इस बातकी भी 
हम तनिक परा नहीं कत्ते ये ॥ १२॥ सचिद्रानन्द 
सरूप श्रीकृष्ण ! काट्की गति बडी गहन है 1 वह 
इतना वल्ान्‌ है किं किसके टे टरुता नहीं । क्यो 
न हो, बह आपक्रा शरीर ही तो है । अव्र उसने हम- 


| भः आकः म भ मा = कः [णि म 


[ क 


घन्तः प्रजाः खा अतिनिधरणाः प्रभो 


मृत्युं पुरस्त्वाविगणय्य दुमेदाः ॥१२॥ 
त एव कृष्णाद गभीररंहसा 


दुरन्तवीयेण विचारिताः भियः 
१. नष्टञुद्धयो | 











"ऋ 
जकः ककर 
अछ कन्कननय =े=  अि" = ध 


(श रसैः 
~ ` ` त च~ ज # केकयो कया < "२. 


क, क क "क ` के [ 
[ष क 7 ककर = क व २१ ५ ऊ +^ 
"= अ -" ७" शक 
[वी 
कै 






क १ ए 9 १ क 
क 


~ क | | 
"॥  आओमदाद्‌ भरिताः स्थानाद्‌ देवदंत्यनरेश्वराः॥|२०॥ ' नरपति श्रीभदके कारण अपने स्थानरस 


चक्क कक => 
= न 


ग 
क 
# न+ 4०० ॥ 
५ क,.4 क. 4८० त 


॥ 
वि । शसक "क न> - क 


५८२ श्रीमद्भागवत [ अ० ७२ 


ययया । ~ अका 


 , न 
| # = के 








तोः जः कत क क ० भ जा ज ऋः > क 
यो भोज गः ज जाः ` भ = य-म = 
= 





"णि 


भः भ पमी कि ` कि 2 = ण 


"भिर 8) 


कालेन तन्वा भवतोऽलकम्पया | छोगोको श्रीहीन, निधन कर दिया है । आपकी अहैतुकं 

अनुकम्पसे हमारा धमंड चूर-चूर हो गया । अव हम 

विनष्टदपार्चरणो स्मराम ते ॥ ९२॥ आपके चरणक्ृमर्लोका स्मरण करते हं ॥ १३ ॥ विमो। 

यह रीर दिनो-दिन क्षीण होताजारहा है | रोगोकी 

| तो यह जन्मभूमि ही है । अत्र हमें इस शरीरसे भोगे 

दन | जानेवाठे राज्यकी अभिकापा नहीं है ¦ क्योकि हम समञ्ञ 

देहेन शश्वत्‌ पतता श्जां युवा । । गये हैं कि वह मृगतृष्णाके जक्के क्षमान सवथा मिथ्या 

व. कि. | है । यदी नही, हमे कर्मके फर खर्गादि लेर्कोकी मी 

उपासतन्य स्टृह्यामह वभा जो मरनेके बाद मिलते ह, इच्छा नहीं है | क्योकि 

क्रियाफलं प्रेत्य च क्णरोचनम्‌ ।।१४॥ , म जानते € किं वे निस्सार हैँ! केवल सुननेमं दी 

आक्रषंक जान पड़ते हं ॥ १४॥ अव हरमे कपा करके 

तं नः समादिशोपाय येन ते चरणान्जयोः | आप वह उपाय बतलयं, जिससे आपके चरणज्मल्की 

विस्मृति कमी न हो, सवदा स्मृति वनी रहे । चाहे हमें 

समरतियथा न विरमेदपि संसरतामिह । १५५1  संसारकी किसी भी योनिम जन्म क्यो न छेन पड़ | १५ 

प्रणाम करनेवाखोके क्टेराका नादा करनेवाठे श्रीकृष्ण, 

वाुदेष, हरि, परमात्मा एवं गोिन्दके प्रति हमारा वार्‌- 
बार नमस्कार है ॥ १६ ॥ 


श्रीद्युकदेवजी कते है-परीक्षित्‌ ! कारागासे 
मुक्त राजानि जत्र इस प्रकार करुणावरुणा्य मगवान्‌ 


9 ` = चभ ज, र्ण 


अथो न राज्यं म्रगत्ष्णिरूपितं 


कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्सने । 





प्रणतक्लेशनाशाय गोबिन्दाय नमो नमः ॥१६॥ 
 श्रीन्चुकं उवाच 





[ ५ (+ अ, ~ 
सस्ततमान्‌। भगवान्‌ राजभिरक्तनन्धनः ।  श्रीकृष्णकी स्तुति की, तब दारणागतरक्षक प्रभुने बडी 
| प 4 
तानाह करुणस्तात शरण्यः क्ष्णा गिरा ॥१७॥। . मधुर वाणीसे उनसे कहा ॥ १७ ॥ 
श्रीभरावानुवाच | भगक्छन्‌ श्रीकृष्णे कहा-नरपतियो | तुमोगो- 
ने जैकी इच्छ प्रकट की है, उस्षके अनुसार आजसे स॒मे 
अद्यप्रभृति वो भूपा मय्यात्मन्यखिलेश्वरे । | तुम लोगोकी निश्चय ही सुद्ढ़ भक्ति होगी । यह जान 


| ल कि मै सवका आत्मा ओर सवक्षा खाभी हँ ॥१८॥ 

सुदृढा जायते भक्ति्वाढमाशंसितं तथा ॥१८॥ नयतियो ! तम॒ णेगोनि जो निश्चय कंथा है, वह 
| सचमुच तम्हारे व्रि वड़े सौभाग्य ओर आनन्दकी 

दिष्टया व्यवसितं भूषा भवन्त ऋतभाषिणः | | बात है | त॒मकोगोने सुसे जो ठु कहा है, वह 
विद्छुठ ठीक है । क्योकि म देखता द धन-सम्पत्ति 

त्रियधयमदोन्नाहं पर्य उन्मादकर चृणाम्‌ ।|१९॥ | ओैर दर्रे मदते चूर होकर बहत-से लोग उच 
| ओर मत्रे हो जते रै ॥ १९ ॥ दद्य, नष, 


| वेन, राव्रण, नरकाघ्ुर आदि अनिको देवता, दैत्य ओट 
पदसे च्युत दहो 


 हेहयो नहुषो वेनो रावणो नरकोऽपरे । 


॥ मि [मि 2 त जक कका => 


१. नमाम । 


नि ~” "क य 




































इसके ए 


भवन्त एतद्‌ विज्ञाय देहादयत्पा्यमन्तवत्‌ । गये ॥२०॥ तुमव्येग यह समश्च लो किं शरीर ओर इसके (६ 
सम्बन्धी पैदा होते दै, इयय उनका नाश भी अवद्यम्भावी 
हं । अतः उनम आप्तक्ति मत करो । बडी साव्रधानीसे मन 
ओर इद्िर्योको दामे रखकर यज्ञोके द्वारा मेरा यजन करे 
, ओर धमप्रू्क प्र जाकी रक्षा करो ॥२१॥ त॒मयेग अपनी & 
संतन्यन्तः प्रजातन्तूत्‌ सुखं दुःखं भवाभवो । । वंश-परम्परकी रश्नाके व्यि; भोगकर व्ये नदी, संतान उत्पन्न 
। । करो ओर प्रारन्धके अनुसार जन्म-ग्रद्यु, घुलनदुःख, लाभ- 
 हानि--जो कुछ भी प्रप्त हो, उन्ं समानभावसे मेरा 
प्रपाद्‌ समञ्ञकर सेवन करो ओर अपना चित्त सुश्चमं खगा- 
कर जीवन व्रिताओ ॥ २२ ॥ देड ओर देहके सम्बन्धिरयेसि 
` किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर उदाक्षीन रहो, अपने- 
उदासीनार्च देहादाबात्सारामा ध्रतव्रताः 1 आपे, आत्मामं ही रमण करो ओर भजन तथा आश्रमके 
। योग्य व्रतोका पालन करते रहो । अपना मन भटीमाति सुकषमे 
लगाकर अन्तमें तुमलोग मुञ्च ब्रह्मखखूपको दही प्राप्त हो ` 
जाओ ॥ २३॥ 





मां यजन्तोऽध्वरेयुक्ताः प्रजा धर्मेण रक्षथ ॥२१॥ 


ग्राप्ं प्राप्रं च सेबन्तो मित्ता विचरिप्यथ ।॥२२॥। 


मय्यावेश्य मनः सम्यङ्‌ मामन्ते त्रह्म यास्यथ । ९३। 


। ओआश्चकदेवजी कदने ईै- -परीक्षित्‌ ! समुवनेश्वर 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने राजाओं शो यह अदेश देकर उन्हें 
स्नान आदि करानेके य्ि वहूत-से सखी-पुर नियुक्त 
कर॒ दिये ॥ २४ ॥ परीक्षित्‌ ! जरासन्धके पुत्र 
सहदेवस उनको र।जोचित वञ्ल-आमूषण, माल-चन्दन 

६ त आदि दिल्वाकर उनका खुव्र॒सम्भान करवाया ॥२५५॥ 

सपयां कारयामास सहदेवेन भारत्‌ । जव्र वे स्नान करके वसख्राभूषणसे सुतजित हो चुके 
~ = क 3 तवर भगवान्‌ने उन्हं उत्तम-उत्तम पदार्थोका भो 

नरदना्चतवस््रभूपणः सखग्वलपनः ॥ ९५1 कराया ओर पान आदि त्रिविध प्रकारके राजोचित 


भोजयेत्वा बरान्नेन खस्रातान्‌ समलंकरतान्‌ । भोग दिच्तराये ॥ २६ ॥ भग गन्‌ श्रीक्ृष्णने इ्च प्रकार 


क ० (५ ५ (= ५ - . 
भोगोस्व बिविधैर्ुक्तास्ताम्बूखा्ै ज॑पोचितेः \\२६। | उन वदी रानाओको सम्मानित किया । अ वे समसत 
क्लेशोसे दछुटकारा पाकर तथा कानमे ज्ञिकमिटाते इ 


ते पाजता यृङ्खन्दन राजाना म्रषटङ्ण्डलाः; । षुन्दर-सुन्दर कुण्डल पहनकर रसे शोभायमान इए+ 
। वपोश्रतुका अन्त दहो जनेपर तारे ॥ २७ 

विरेजरमोचिताः केशात्‌ प्रान्ते यथा ग्रहाः।।२७॥ | पिर सगवान्‌ श्ी्षणने उन्हे सुवणं ओर मणियेहे 

रथान्‌ सदश्चानारोष्य मणिकाश्चनभूतान्‌। | भूषित एवं श्रेष्ठ षोडसे युक्त रथोपर चढाया, मधुर 
अ वाणीसते तृप्त किया ओर फिर उन्हे उनके देशोंको भेज 

श्रीणय्य घ नृतेवौक्यः खदेशान्‌ प्रत्ययापयत्‌।।२८॥ | दिया ॥ २८ ॥ इस प्रकार 

| ~ 7 च्छ्रा = श्रीकृष्णे उन राजाओको महान्‌ कष्टक सुक्त किया 
न त एवं मोचिताः कृष्णेन्‌ सुमहात्मना) बन त ना णते | ग ज यण ओर 
स्तमेव ध्यायन्तः कृतानि च जगरपते; \\२९। । ठीगओका चिन्तन करते इए राजघानीठ 


९१ तेषामयु 


श्री्युक उवाच 
इत्यादिश्य न॒पाच्‌ दरष्णो भगवान्‌ ुवनेश्चरः 


तेषौं न्यधुङ्क पुरुषान्‌ स्ियो मज्ञनकमंणि ।२४॥ 








ति > -- ॥ 


= छि त 
~ ~ 
१ 


६ । ० 
= कनक 


क 
। 1 
ह ५ 
मद क ॥ ॥ क ,- 








१. ॥ 1 
+ न > ~ = _ = १ ऋ द = श क का 


५८४ श्री म्कागचत ॥ अ० ७४ 





क क ऋः 





जगदुः प्रकृतिम्यस्ते महापुरुपचेष्टितम्‌ । | चटे गये ॥ २९ ॥ वर्ह जाकर उन लोगोनि अपनी- 
| अपनी प्रजासे परमपुरूपर भगवान्‌ श्रीङृष्णकी अद्भुत 
| कृपा ओर लीव कह सुनायी ओर पिर बड़ी सावधानी 
भाव्रन्‌के आज्ञानुसार वे अपना जीवन व्यतीत करने 
[| रि | टगे २ © 

यथान्वशा्षद्‌ भगवांसतथा चक्षुरतन्द्रिताः ॥३०॥ | =! ॥ <° । 
| पदी्तत्‌ ¦ इस प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्ण मीमसेनके 
हारा जराप्न्धका वव करवाक्र भी मसेन ओर अजने 
4 ~. । साथ जराप्तनधनन्दन सहदेत्रसे सम्मानित होकर इन्द्र 
पार्थाभ्यां संयुतः प्रायात्‌ सहदेवेन पजितः ॥३१॥ | ` ~ `~ "| ९ 
् तर -तष्टसनन  प्रस्थके व्यि चले । उन विजयी वीयोने इन्दरप्रस्थके पास्‌ 
| प्टुचकर अपने-अपने राङ्क वजाये, जिससं उनके 


| ~> = = 
इष्टमित्रांको सुख ओर रघ्रुभओको वडा दुःख इथ 


जरासंधं घातयित्वा भीमसेनेन केशवः । 


गत्वा ते खाण्डवप्रस्थं शङ्खान्‌ दध्छजिंतारयः) 


हर्षयन्तः खसुहृदो दर्हदां चासुखाबहाः 1\३२। ¦ ॥ २१३२ ॥ इन्र धनिवासिर्योका मन उस शङ्ख 
व्वनिको सुनकर खिल उट । उन्होने प्तमञ्च ल्या कि 
जरासन्ध मर गया ओर अव राजा युधिष्टिरका राजसूय 
| | यज्ञ॒ करनेका सकद एक प्रकारसे परा हो गया 
मेनिरे मागधं शान्तं राजा चाप्रमनोरथः ।३३) | ॥ ३२३ ॥ भी मसेन, अजुन ओर भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
अभिवन्याथ राजानं भीमानजनार्दनाः । ^ वः 

< सुनःया-जो उन्दं जराकस्षन्धके वधके चि करना पड़ा 
सवमाश्रावयाचक्कुरात्मना यदुष्ठितंम्‌ ।॥२४॥ | था ॥ ३४ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
इस परम अनुग्रह्की बात सुनकर प्रेभक्ते भर गये, 


^ १ 6 


उनके नेसे आनन्दके आँसुओंकी बरद टपकने लगीं 


(>, 


| 
तच्छ्रत्वा प्रीतमनस इन्द्रभखनिवासिनः) | 


निदचम्य धमराजस्तत्‌ केशवेनालुकम्पितम्‌ । 


आनन्दाश्चकखां य॒श्वन्‌ प्रेरणा नोवाच किश्वन।] ३५) | ओर ¶ उन उ भा कठ न सक ॥ ६५ ॥ 


नन्व 6र-~--- 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददामस्कन्धे उत्तर 
कृष्णाच्यागमने त्रिसप्ततितमोऽ्यायः ॥ ७३॥ 
--5-{32- 
ल (र (~ यः [ 
अथ चुःसप्ततितमोऽष्यायः 


भगवानक्ती अप्रपून। ओर शिद्युपाख्का उद्धार 


श्रीचक्र उवाच | शआरीशुकदेवजी कते द -परीक्तित्‌ । धमराज 
"एवं युधिष्ठिरो ` राजाः जरासंधवधं विभोः । | युधिष्ठिर जरासन्धका वभ ओर सवंशक्तिभान्‌ भगवानु 


श्रीक्कष्णक्ी अदधत महिमा सुनकर बहत प्रसन हए ओर 


कर्णस्य चालुभाष तं ` श्ुत्वा श्रीतस्तमत्रवीत्‌ ॥ १ ॥ , उनसे वोटे ॥ १॥ < 
युधिष्टिर उवाच . | धर्मराज युधिष्ठिस्ने कहा--संचदानन्दलस्प 
श्रीकृष्ण ! त्रिरोकीके स्वामी ब्रह्मा, रखकर आदि ओर 


ये स्युस्त्रैरोक्यगुरः सवे लोकमहेखराः 1 | इन्द्रादि स्येकपाल---सन आपकी भाज्ञा पानेके ` व्यि 
१. ज्ञ दध्णु° । २. न्वे राजूयदिग्धिजये द्विखत्त° । ३, यादरायणिखवाच न (ब ४, प्रमोः | ५. च । 








|= णा "च इक, "श 4. - ^ 


अ० ७४ | 





्कन्कन्कन्कन्कन्कन्कानकन्ककन्कनकक कितिति ति भिन्न 


वहन्ति दुरुभं रुभ्ध्वा शिरंसेवानुश्ासनम्‌ 








स॒ भवानरविन्दाक्षो दीनानामीश्मानिनाम्‌ । 


धत्तेऽनुशासनं भूरमस्तदत्यन्तविडम्बनम्‌ ॥ ३ ॥ 


१ -ग्ी 


न द्येकयादितीयसख ब्रह्मणः परमार्मनः 


कर्मभिर्वर्धते तेजो हस्ते च यथा रेः॥ ४॥ 


न वें तेऽजित भक्तानां ममाहमिति माधव । 


स्वं तवेति च नानाधीः पशून मिव वेता ।॥ ५॥ 
श्रीञ्युक उवाच 

इत्युक्त्वा यज्ञिये काले वते युक्तान्‌ स ऋतिजः । 
कृष्णाजुमोदितः पार्थो ब्राह्मणान्‌ ब्रह्मवादिनः । & ॥ 
देपायनो भरद्वाजः सुमन्तुर्गोतमोऽसितः । 
वसिष्ठश्च्यननः कण्वो मेत्रेयः कवषचखित; । ७॥ 
विश्वामित्रो गमदेवः सुमतिर्जमिनिः क्रतुः; । 
पलः पराशरो गर्गो वैशम्पायन एव च ॥ ८ ॥ 
अथवा कर्यो धोम्यो रामो भागव आसुरिः । 
। वीतिहोत्रो मधुच्छन्दा बीरसेनोऽकृतव्रणः । ९। 
। उपहृतास्तथा चान्ये द्रोणभीष्मकृपादयः। 
। धृतराष्टः सहसुतो बिदुर्च महामतिः ॥१०॥ 
( बाह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शद्रा यज्ञदिदकवः। ` 
 तत्रेुः सवराजानों राज्ञां प्रकृतयो नृप ॥११॥ 
` १. धिरला मेऽु० । २..विक्रिया | 

भा० स० खं० २.७४ 


॥ 


=, 





दशम स्कन्ध 








 श्रद्धासे उसको दिरेधा्यं करते ई ॥ २ ॥ अनन्त! 


। पात्र, परंतु आप हमारी आज्ञा खीकार करते हैँ ओर 





























क ॐ 3 "+ 3 
कक > व + ~ क 
द # [1 ५ 
= ह द 1 
= ^ मौ र कत + < 
+ ८५८५ ; 
1 ई क 
" 0] _ ॥ ~= 
ज " ऋण 
~ - १4 न 
0 |: 4 
= ~प: 
^ एकि $ 
४। 1, 


तरसते रहते हैँ ओर यदि वद मि जाती है तो बडी 





हमल्ोग हैँ तो अत्यन्त दीन, परंतु मानते हँ अपनेको 
भूपति ओर नरपति । एसी तिमे हँ तो हम दण्डके 


उसका पालन करते हैँ । सवंशक्तिमान्‌ कमठ्नयन 
भगवानूके व्यि यह मनुष्य-लीलखका अभिनयमात्र 
है | २ ॥ जसे उदय अथवा अस्तके कारण पुयके तेजमें 
घटती या वदती नहीं होती, वसे ही किंस्ीभी 
प्रकारके कमेपि नतो आपका उल्यस होता है ओर 
नतो हास्त दही] क्योकि आप सजातीय, विजातीय 
ओर खगतमेदसे रदित स्वयं पर्रह्म परमात्मा हैँ ॥ ४ ॥ 
किसीसे पराजित न होनेवाञे माधव ! ध्यह में दह ओर 
यह मेरा है तथा यह तू है ओर यह तेरा--इस 
प्रकारकी विकारयुक्त मेदबुद्धि तो पञ्यु्ओकी होती है । 
जो आपके अनन्प मक्त दहै, उनके चित्तम एेसे 
पागक्पनके विचार कभी नहीं आते | फिर आपमे तो 
दाग ही कर्होसि १ ८ इसब्िये आप जो कुछ कर रहे 
है, वह रीर-ही-लील है ) ॥ ५ ॥ 

ध्रीड्यकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! इस प्रकार 
कहकर धमराज युधिष्ठिरने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी 
अनुमतिसे यज्ञके योग्य समय आनेपर यज्ञके कमेमिं 
निपुण वेदवादी ब्राहमणोको ऋविज, आचाय आदिके ` 
ख्पमे वरण किया ॥ & ॥ उनके नाम ये है-- 
श्रीङ्ृष्णदधेपायन व्यासदेव, भरद्वाज, सुमन्तु, गोतमः, 
अतित, वसिष्ठ, च्यवन) कण्व, मेत्रेय, कवष, त्रित, ` 
विश्ामित्र, वामदेव, सुमति, जेमिनि, क्रतु, पैल, 
पराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कदयप, घोम्य, 
पर्रम, डक्राचाय, आघुरि, वीतिहोत्र, मघुच्छन्दा, 
वीरसेन ओर अकृतव्रण ॥ ७--९, ॥ इनके अतिरक्त ` 
धमंराजने द्रीणाचायं, भीष्मपितामह, कृपाचाय, धृतराष्ट्र 
ओर उनके दुर्योधन आदि पुत्रो ओर महामति विदुर ` 
आदिको भी बुव्वाया ॥ १० ॥ राजन्‌ । | 
यज्ञका दरान करनेके व्यि देशके सब राजा, उनके 
मन्त्री तथा कम॑चारी, ब्राह्मण क्षत्रिय, वैय, इद्र 
सन-के-सब वहां भये ॥ ११ ॥ ् 


न - 













4 


५ न, ॥ 
39. 















# + ॐ =. # पुः 
न ङ ~ 

क + 
= नकं छा म = = ॥ 









च ` नज = भ = 
ग्व ` = न्य का 1 
५ + -#~= ४ - (3 ~ १ १ ४1 # 
[३ #॥ ५.५८ 
9 # 1 कै ृ्) कै द 


म कि भज > 
५ पणिः "चै. र ॐ 
ऋ च 


न 


6 


% वि ५ नि जिका ॥ क 
"न 
काक -क9 


॥ + १ 
# ऋ ॥ सो = काकतावािकुयेकेकः 
५, 


0) + 


 : ॥ # क = + „~, + पि ची # ' = श, = ~~ 
++ + प > स 0 र 8 + । र न्दो = 
> 
४. + ® ् # = ए क = क भ |} [व प्‌ 
६ क न्येन ५ ५4 # क १ ट 
:* - ८ ~ शकत ५ 
११.१४ (1. 
[यि क - 
4 +, ह + ण न < 
र ई ९ क, च 
५ कर श 
> , म । 
॥ #॥॥ 
+ । 
। ओ 
पतीं 
र 
^. 9 + -येग्िनके ५ 9 
कः 


# ५७ न ५ -+ 


# क री म व र = न ~> 











ततस्ते देवयजनं बाह्मणाः खणराङ्करेः 
कृष्टा तत्र यथाम्नायं दीक्षयाश्चक्रिरे सपम्‌ ।१२॥ 
हैमाः किरोपकरणा वरुणसख यथा परा । 
इन्द्रादयो लोकपाला वपिरि्विभवसंयुताः ।।१३॥ 


सगणाः सिद्धगन्धवां विद्याधरमहोरगाः 
यनयो यक्षरक्षांसि खगकिन्नरचारण।ः ॥१४।। 
राजानश्च समाहूता राजपलन्यश्च सर्वशः । 
राजघमं समीयुः स राज्ञः पाण्डुसुतसख चै ॥१५॥ 
मेनिरे छष्णभक्तस् - शपपन्नमविसिताः । 
अयाजयन्‌ महाराजं याजका देववर्चसः । 
राजघ्येन विधिवत्‌ प्राचेतसमिबामराः ।॥१६॥ 
सोत्येऽहन्यबनीपारो याजकान्‌ सदसस्पतीन्‌ । 
अपूजयन्‌ महाभागान्‌ यथावत्‌ सुसमाहितः ।१७॥। 


सदस्याग्या्हणार वै विमरशन्तः सभासदः । 


नाध्यगच्छननैकान्त्यात्‌ सहदेवस्तदात्रवीत्‌ ॥१८। 
अहंति च्युतः शरेष्ठं भगवान्‌ सासतां पतिः। 


एष वे देवताः सर्वा देरकाल्धनादयः ॥१९॥ 


 थदात्मकमिदं विद्वं क्रतवश्च यदात्मकाः 1 


अग्निराहृतयो मन्त्राः सांख्यं योगश्च यत्परः ॥२०॥ 


श्रीमद्भागवत 


---~-~-~-~-~-~-~-~-~-~~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~-~~-~-~-~~~-~~~-~-~-~-~~-~-~ ~ -~--~-~---- -----~---~----~-~~~--- ~- 


॥ अ० ७४ 





इसके बाद ऋत्विज ब्राह्मणोने सोनेके हतत 
यज्ञभूमिको जुतवाकर राजा युधिष्ठिरको चाख्ानुक्तार 
यज्ञको दीक्षा दी ॥ १२॥ प्राचीन काल्मे जैसे 
वरुणदेवके यज्ञम सब-के-सव यज्ञपात्र सोनेके बने इए 
थे वैसे ही युधिष्टिरके यज्गमै भी ये] पाण्डुनन्दन 
महाराज युषिष्ठिरके यज्ञम निमन्त्रण पाकर ब्रह्माजी) 
शकरजी; इन्द्रादि टोकपाट, अपने ग्णोके साथ सिद्ध 
ओर गन्धर्थ, वियाधर्‌, नाग, मुनि, यक्ष, राक्षस, पक्षी, 
किंनर, चारण, वडे-वड़ राजा ओर रानिया ये सभी 
उपस्ित इए ॥ १३-१५ ॥ सवने विना किसी 
प्रकारके कोवूहच्के यह वात मान टी किं राजसूय 
यज्ञ॒ करन युधिष्ठिरे योग्य ही है; क्योकि मगवान्‌ 
श्रकृष्णके भक्तके व्यि पेसा करना कोई बहुत बड़ी 
बात नहीं है । उस समय देवताओके समान तेजखी 
याजकोने धमराज युधिष्टिरसे विधिष्ठंक राजसूय य्न 
कराया; ठीक वैसे ही, जसे पूवंकाल्े द्खताओंने वरुणसे 
करवाया था ॥ १६ ॥ सोमलतासे रस॒ निकाठनेके 
दिन महाराज युधिष्िरने अपने परम॒ माग्यवान्‌ याजको 
ओर यक्ञक्रम॑की भूल-चूकका निरी्षण करनेवाे 
सदसस्पतियोंका बड़ी साकधानीसे विधिप्ूवक पूजन 
किय। | १७ ॥ 

अत्र॒ सभाप्तद्‌ लोग इस्त विषयपर्‌ विचार करने कगे 
किं सदश्योमे सवसे पहले किसकी प्रूना--अग्रप्रूना 
होनी चाहिये । जितनी मति, उतने मत | इसय्यये 
सवसम्भतिसे को$ निणय न दहो सका देती धितिमें 
सहदेषने कहा--॥ १८ ॥ 'यदुवंश्ियेमणि भक्तवत्सक 
भगवान्‌ श्रीडृष्ण ही सदस्योमे सवेशरेष्ठ ओर अप्रपूनाके 
पात्र है; क्योकि यही समस्त देवताओके ख्यमं है; 
ओर देश, काल, धन आदि जितनी भी वस्तुं है, 
उन सबके खूपमे भी येद्दी है॥ १९ ॥ यह सार 
विश्च श्रीकृष्णका दही खूप है । समस्त यज्ञ भी श्रीक़ष्ण- 
खखूप ही दै । भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही अग्नि, आहति 
ओर मन्त्रके रूपमे है । ज्ञानमागं ओर कमंमागं--ये 
दोनों भी श्रीङृष्णकी प्रापिके ही दहेत &॥२०॥ 


समास्षदो ! मै कतक वर्णन कर, भगवान्‌ श्रीकृष्ण 


बृह एकरस अद्वितीय ब्रह्म दैः जिसमे सजातीय, 


स | निजातीय ओर खगत-मेद नाममात्रका भी नहीं है । 
८ एक एवाद्वितीयोऽसगतदारम्यमिदं जगत्‌ । । 


कनक्ष्क^कि >: ऋ क # ‰~ 
वि 1 11 = नि 


८ - 








+ ७४ | दरम्‌ स्कन्ध ५८७ ` 


















आत्मना -त्माश्रय, सभ्याः सुजत्ववति हन्त्यजः २१, यइ सम्पूर्णं जगत्‌ उन्ीका खख्प्र है । वै अपने-आप 
~ 4 ही दित ओर जन्म, अस्ति, बृद्धि आदि छः भाव- 
। विविधानीह कमणि ज नयन्‌ यददेक्षया । वरिकारेसे रहित है । वे अपने आख्य संकल्पसे 
दी जगत्की सृष्टि, पाटन ओर संशर करते हैँ ॥२१॥ 
सारा जगत्‌ श्रीकृष्णके दही अनुग्रहसे अनेकों प्रकारके 
कमका अनुष्ठान करता इभा धर्म, अर्थ, काम ओर 
मोक्षरूप पुरुषार्थोका सम्पादन करता दहै ॥ २२॥ 
इसलिये सबसे महान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णकी ही अग्रपूजा 
होनी चाहिये । इनकी पूजा करनेसे समस्त प्राणिर्योकी 
तथा अपनी भी प्रन हो जाती है॥२३॥ जो 
| अपने दान-धमंको अनन्त भावसे युक्त करना चाहता 
हो, उसे चाहिये किं समस्त प्राणियों ओर पदाथि 
अन्तरात्मा, सेदभावरहित, परम॒ शान्त ओर परिपणं 
भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही दान करे ॥ २४ ॥ परीक्षित्‌ 1 
सहदेव भगवान्‌की महिमा ओर उनके प्रभावको जानते 
ये|] इतना कहकर वे चुप हो गये । उस समय 
धर्मराज युधिष्ठिरकी यक्ञसभामे जितने सत्पुरुष उपित 
थे, सवने एक खरसे (हूत टीक, बहुत टीक' कहकर 
सहदेवकी बातका समयन किया ॥२५॥ धमंराजयुषिष्ठिरः ` 
व ने ब्राह्मणोकी यह आज्ञा सुनकर तथा समापस्तरोका अभिप्राय ` 
समहेयद्‌ ध्दीकंं श्रोतः प्रणयत्रिह्लः ।॥२६॥ जानकर बड़े आनन्दसे, प्रेभोद्रेकसे विहृ होकर भगवान्‌ ` 
शरीहृष्णकी पूजा की ॥ २६ ॥ अपनी पल्ली, माई, मन्त्र | 
तत्पादाववनिञ्यापः शिरसा लोकपावनीः । ओर कुटुभ्नबियोके साथ धमराज युधिष्ठिरने बडे प्रेम ओर ` 
| आनन्दसे भगवान्‌के पौव पलारे तथा उनके चरणकपले- । 
का खोकपावन जक अपने पिरपर धारण क्रिया ॥२७॥ 
उन्होने भगवानको पीठे-पीठे रेशमी वख ओर बहुमूस्य 
आमभूषण समपिंत किये ] उस समय उनके नेत्र प्रेम 
ओर आनन्दके ओँघुओंसे इसे प्रकार भर गये कि वे 
9 & भगवान्‌को भलीर्भाति देख भी नहीं सकते थे ॥ २८॥ 
अहयित्वा्ुपूणाक्ो नाशकत्‌ समवेक्षितुम्‌ ।।२८॥ | यज्ञसमामे उपस्थित सभी लोग भगवान्‌ श्रीकृष्णको इस्‌ 
प्रकार पूजित, सत्कृत देकर हाथ जोड़े इए नमो 
इत्थं सभाजितं वीक्ष्य सवं प्राज्ञङ्यो जनाः । ` नमः } जय-जय !> इस प्रकारके नारे टगाकर उन्हे 


नमस्कार करने लगे ! उस समय आकाश्से यदी 
| -चमा जयति नेष्सतं निषेदः पृः ॥२९॥ पकी व होनेकमी | २९॥ जयेति नेषस्तं निषेदुः भ्पृष्टयः ॥२९॥ । पु्ोकी वर होने च्गी | २९ ॥ = र 





क © अ, ऋ [न 

दहते यदयं सर्व; श्रेयो धर्मीदिलक्षणम्‌ ।॥२२।। 
तसात्‌ कृष्णाय महते दीयतां परमारणम्‌ 

एवं चेतु सवंभूतानामात्मनशराैणं भवेत्‌ ॥२२॥ 

© भू { भू सषि 

सवंभूतात्मभूताय कृष्णायानन्यदर्शिने । 

देयं शान्ताय पणाय दत्तखानन्त्यमिच्छता ।२४॥ 
इत्युक्त्वा सहदेषोऽपृत्‌ तष्णीं कष्माजुभाववित्‌ । 
तच्छ्रत्वा तुष्डुयुः सवं साघु साध्विति सत्तमाः ॥२५॥। 


शसा हिजेरितं राजा ज्ञात्वा हादं सभासदाम्‌ । 


[1 


ऋ) ४0) ४ 
रि ‰# 


© ष ०९ 
सभायः स्षद्चुजामात्यः सङटइम्बाऽवहन्युदा ।॥२७।। 


+ 


(केर 


वासोभिः पीतकोशेयेभूषणेश्च महाधनैः । 


१10. 
41.41.11 





५८८ श्रीमद्भागवत | अ० ७४ 








गन 
क 2 ए वा । $ जी क त 9 त त नाक 





कि) भिम कः 


इत्थं निशम्य दमघोषसुतः खपीटा- परीक्षित्‌ | अपने आसनपर बैठा हआ रिद्युपाक 
| यह सव देख-सुन रहा था । भगवान्‌ श्रीकृष्णके रुणं 
दुत्थाय छृष्णगुणवर्णनजातमन्युः । सुनकर उसे क्रोध हो आया ओर वह उठकर खड़ा हो 


गया | वह भरी प्तभामें हाय उटाकर्‌ वडी अप्हिष्णुता, 
कितु निभयताके साथ भगवान्‌को सुना-सुनाकर अत्यन्त 
कणेर वातं कहने टगा--॥ ३० ॥ समसदो ! 
श्ुतियोका यह कहना सर्वथा सत्य है किं काठ दही 
ईश्वर है । ख चेष्टा करनेपर भी वह अपना काम करा 
£ क ही लेता है- इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने देख ल्या कि 
शो दुरत्ययः कार ईति सत्यवती शवुतिः । या वच्च ओर मूर्खोकी वातसे बड़े-बड़े वयोवृद्ध ओर 
ज्ञानवृद्धोकी बुद्धि भी चकरा गयीदहै॥ ३१ ॥ परर 

शद्ानामपि यद्‌ बुद्धिबाखवाक्येविंभिद्यते ॥३१। मानता द्र किं आपलेग अग्रवरूजाके योग्य पात्रका निणेय 
| करनेमे सवेथा समथ है । इसध्ये सदसस्पतिणे ! आप- 
युयं पात्रविदां श्रेष्ठा मा मन्ध्वं बारुभाषितम्‌ । तपरेग वाक्क सहदेवकी यह बात टीक न मानें कि (कृष्ण 
ही अग्रप्रूनाके योग्य हैः ॥ ३२ ॥ यहा बड़े-बड़े तपखी, 
विद्रान्‌, त्रतधारी, ज्ञानके द्वारा अपने समस्त पाप-तापोको 
शान्त॒ करनेवाले, परमज्ञानो परमर्षि, व्र्मनिष्ठ आदि 
ह उपयिित है -- जिनकी पूजा बड़े-वड़े लोकपाल भी 
तपाोबिदयाव्रतधरान्‌ ज्ञानविष्वस्तकरमपान्‌ । करते हैँ ॥ ३३ ॥ य्गकी भूल-चूक बत गनेवाटे उन 
सदसस्पतियोंको छोड़कर यह कुच्कलङ्क ग्वाला मला 

परमषीन्‌ ब्रह्मनिष्ठान्‌ रोकपारेश पूमितान्‌ ॥३२। | अग्रपूनाका अधिकारी कैसे हो सकत। है १ क्या कौज 

| | कमी यज्ञके पुरोडाराका अधिकारी हो सकता है १॥३४॥ 

न इसका कोई वणं है ओरन तो आश्रम | कुर्मी 
इसका ऊँचा नहीं है । सारे धमेसि यह बाहर है । वेद 
ओर लोकमर्यादाओंका उदछङ्गन करके मनमाना आचरण 
करता है । इसमे कोई गण भी नहीं है । रेसी श्ितिमं 
यह अग्रप्ूनाका पात्र कसे हो सकता है १॥ ३५॥ 
आपलोग जानते हैँ किं राजा ययातिने इसके वंशको 


स्वेरवती गुणहीनः सपयां कथमर्हति ॥३५॥ | शाप दे रखा है । इसघ्यि सप्पुरुषोने इष वंशका दी 
तिनैष। न ९ बहिष्कार कर दिया है । ये सब्र सवदा व्यथं मधुपानमें 
ययातिनंपां हि इलं शप्तं सद्धिबदिष्ृतम्‌ । | आसक्त दहते है । किर ये भपूगके योग्य वैते दो । 
सकते ह १ ॥ २३६ ॥ ईन सबने ब्रह्षियोके द्वारा संवित 
मथुरा आदि देयोका पराग कर शिया ओर ब्रह्- 


उल्क्षिप्य बाहुमिदमाह सदस्यमषीं 


संश्रादयनच्‌ भगवते पुरुषाण्यभीतः ॥३०॥ 


सदसस्पतयः स्वे कृष्णो यत्‌ सम्मतोऽदणे ॥२२॥ 


सदस्पतीनतिक्रम्य गोपालः इलपांसनः । 


यथा काकः पुरोडाशं सपयां कथमर्हति ॥३४॥ 


वर्णाश्रमङ्कलापेतः स्वधमंबदहिष्ठृतः । 


वृथापानरतं शश्वत्‌ सयां कथमरहति ॥२६॥ 








बरहमिंसेवितान्‌ देशान्‌ हितवेतेऽब्रहमवर्चसम्‌ । ` | वके विरोधी ( वेदचचारदित ) समं किंटा जन" 
१. ब्रज्थ । ततल 





७99 ५. 








अ० ७४ | 





द्ञ्म स्कन्य 


५५८९ 


-___-_-_-~----~-~-~-~-~-~-~~~~-~-~------------------------------न-न------------------- 





सुद्र दुगंमाश्चित्य बाधन्ते दस्यवः प्रजाः ॥ ३७ | कर रहने लगे । वरसि जव ये वाहर निकल्ते ई, तो 


एवमादीन्यभद्राणि बभाषे नष्टमङ्गलः । 
नोनाच किंचिद्‌ भगवान्‌ यथा सिंहः शिवारुतम्‌। २८) 
भगवननिन्दनं श्रुत्वा दुःसहं तत्‌ सभासदः । 
कर्णो पिधाय निजंगुः रापन्तश्चेदिपं रषा ३९ 
निन्दां भगवतः शृण्वस्तत्परस्य जनस वा । 


ततो नापेति यः सोऽपि यात्यधः सुङृताच्च्युतः।।४०।। 


ततः पाण्डदुताः करुद्धा मत्खकेकयसज्ञयाः । 
उदायुधाः समुत्तस्थुः शिद्युपारजिघां संवः ॥४१॥ 
तत्चेयस्त्वसम्धान्तो जगृहे खङ्चर्मणी । 
भतसंयन्‌ कृष्णपक्षीयान्‌ राज्ञः सदसि भारत ॥४२॥ 
तावदुत्थाय भगवान्‌ खान्‌ निवायं खयं रुषा । 

रिरः श्वरान्तचक्रेण जहारापततो रिपोः ॥४३॥ 
शब्दः कोलाहरोऽप्यासीत्‌ शिश्चपाङे हते महान्‌ । 
तसालुयायिनो भूपा दुद्रुजींविते पिणः ॥४४॥। 


चैघदेहोर्थितं ज्योति्ाुदेवयुपाविशत्‌ । 


पश्यतां सवेभूतानायस्केव वि खाच्च्युता ।४५॥ 
< _ रे, _ 9 | 
जन्मत्रयावुशुणितवेरसरब्धया धिया । 


ध्यायंस्तन्मयतां यातो भावो हि भवकारणम्‌ \)५६॥ 
१. सया) 


डाकुर्भोकी तरह सारी प्रजाको सतते हैः ॥ ३७ ॥ 
परीक्षित्‌ | सच पूरो तो शिद्युपाख्का सारा छम नष्ट 
हो चुका था । इक्षीसे उसने ओर भी बहृत-सी कड़ी- 
कड़ी बाते भगवान्‌ श्रीकृष्णको घुनायीं । परततु मैसे 
सिंह कमी सियारकी “हृ्ओं-दर्जंः पर ध्यान नहीं देता, 
वैसे ही भगवान्‌ श्रीकृष्ण चुप रहे, उन्दने उसकी वातो 
का कुछ भी उत्तर न दिया॥ ३८ ॥ परंतु सभसदोके 
य्य भगवान्‌की निन्दा सुनना असद्य था । उनर्म॑से 
कई अपने-अपने कान बंद करके क्रोधसे रिद्युपाख्को 
गाटी देते हए बाहर चठे गये ॥ ३९ ॥ परीक्षित्‌ । 
जो भगवान्‌की या भगवत्परायण भरक्तोकी निन्दा घुनकर 
वर्हसे हट नहीं जाता, वह अपने ज्यभकरमेसि च्युत हो 
जाता है ओर उसकी अधोगति होती है ॥ ४० ॥ 
परीक्षित्‌ ! अव शि्युपाट्को मार डाल्नेके य्य 
पाण्डव, मत्स्य, केकय ओर सृञ्जयवंशी नरपति क्रोधित 
होकर हार्थो हथियार ठे उठ खड़े इए ॥४१॥ परत 
रिञ्युपाल्को इससे कोई धबड़ाहट न इई । उसने विना 
किसी प्रकारका आगा-पीछा सोखे अपनी दाल-तल्वार 
उखा ली ओर वह भरी समामे श्रीकृष्णके पक्षपाती 
राजाओंको ख्ल्काश्ने लगा ॥ ४२ ॥ उन लोर्गोको कडते- 
ञजगड़ते देख भगवान्‌ श्रीकृष्ण उठ खड़े इए । उन्होने 
अपने पक्षपाती राजाओंको रान्त किया ओर खयं क्रोध 
करके अपने ऊपर परते शिद्ुपाल्का सिर छरेके 
समान तीखी धारवाे चक्रसे काट च्या ॥ ४३॥ 
शिद्युपारके मारे जानेपर वहं बडा कोलहर मच गया | 
उसके अनुयायी नरपति अपने-अपने प्राण बचानेके 
व्ये वर्होसि भाग खड़े इए ॥ ४४ ॥ जेसे आकारासे 
गिरा हआ छक धरतीमे समा जाता है, वैसे ही सब 
प्राणियोके देखते-देखते शिज्ञुपार्के दारीरसे एकं ज्योति 
निकख्कर भगवान्‌ श्रीकृष्णे समा गयी ॥४५॥ परीक्षित्‌ । ` 
शिद्युपाटके अन्तःकरणमे क्गातार तीन जन्मसे वैरभावकी 
अभिवृद्धि हो रदी थी । ओर इत प्रकार, वैरमावसे ही 
सही, ध्यान करते-कःएते वह तन्मय हो गया-- पाषद हयो 
गया । सच है-- मृव्युके बाद होनेवाटी गतिम भावं 





^ 






















स न २ । = ५९ @ ) श्रीमद्ध ५ 
 : = `. भमद्धागनव गवत. [अ० ७४. 








मीम 








तो कि त ततः चो चोज विक > नोना ॥ , 





ऋत्विग्भ्यः ससदस्येभ्यो दक्षिणां विपुखामदात्‌ । । दी कारण ह ॥ ४६ ॥ रिद्चपाय्वी सद्गति होनेके 
। बाद चक्रवती धर्मराज युधिष्ठिरने सदस्य ओर ऋलिजेको 
सवान्‌ सम्यूज्य विधिवचचक्रऽवभृथसेकःराट्‌ ॥४७॥। | पुष्कल दक्षिणा दी तथा सवका सत्कार करके विधिपूरवैक 
| यज्ञान्त-स्नान---अवभ्रध-स्नान किया ॥ ४७ ॥ 
परीक्कित्‌ ¦ इस प्रकार योगेश्वरेश्वर मगवान्‌ श्रीकृष्णने 
धमराज युधिष्ठिरका राजघुय यज्ञ प्रण किया ओर अपने 
उवास कताचन्मासाच्‌ खहाद्धरभियाचितः ॥४८। सगे-सम्बन्धी ओर घु्टदोकी प्राथनासे कुछ महीनोतकं 
| वह रे ॥ ४८ ॥ दसके वाद्‌ राजा खधिष्ठिरकी इच्छा 
न होनेपर भी सव्यक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णने उनसे 
अनुमति ठे खी ओर अपनी रानिर्थो तथा सन्तियोके साथ 
इन्द्र प्रस्थसे द्वारकापुरीकी यात्रा की | ४९ ॥ परीक्षित्‌ 
वर्णितं तदुपाख्यानं मया ते बहुविस्तरम्‌ । = | 1 यड उपाल्मान तुदं हत विस्तारे (सातवे स्कनपमे) 
| खना का द्व जि वैदुण्ध्वासी जय आ जयको 
वेङ्कण्डासिनोजेन्म विप्रज्चापात्‌ पुनः एनः 11५०1 | सनकादि ऋप्रियोके शापरसे बार-बार जन्म केना पड़ा 
था | ५० ॥ महाराज युधिष्टिर राजसूयका यन्ञान्त-स्नान 
राजघ्याबभ्रथ्येन स्नातो राजा युधिष्ठिरः, करके ब्राहमण ओर श्षत्रियोकी समामे देवराज इन्द्रके 


समान शोभायमान होने चमे ॥ ५१ ॥ शजा युषिष्ठिएले 
| नक्ष्षत्रसभामप्ये शभे सुरराडिव ॥५१॥ । वरता, मनुष्य ओर आकाश्चचास्यिका यथायोग्थं सत्कार 


राज्ञा सभाजिताः सवं सुरमानवखेचशः । | किया तधा वे भगवान्‌ श्रीकृष्ण एवं राजसुय यज्ञकी 

| प्रशंसा करते इए वड़े आनन्दे अपने-अपने ल्योकको 
। चरे गये | ५२ ॥ परीक्षित्‌ ! सब तो छदी हए, परतु 
 दु्ोधनसे पाण्वोंकी यह उञ्ञ्वल राजल्द॑मीका उत्कपे 
दुयोधन्रते पापं कटिं ङुरङ्ककामयम्‌ । । सहन न इआ । क्योकि वह खमावसे दी पापी, कण्- 
प्रेमी ओर कुरुकुटका नारा करनेके व्यि एक महान्‌ रोग 


था ॥ ५२ ॥ 

परीक्षित्‌ ¡ जो पुरुष भगवान्‌ श्रीकरष्णकी इस 
टीलाका--शिद्युपाच्वध, जरारन्धवध, वंदी रशजाओंकी 
मुक्ति ओर यज्ञानुष्ठ।नका कीर्तन करेगा, बह समस्त 
शजमोक्षं वितानं च सवपापेः प्रषुच्यते ॥५४॥ , पपे छट जायगा ॥ ५९ ॥ 


साधयित्वा क्रतु राज्ञः कृष्णो योगेश्वरेधरः । 





ततोऽज्ञाप्य राजानसनिच्छन्तसपीश्वरः । 


क 


ययो सभार्थः सामात्यः खपुरं देवकीसुतः ॥४९॥। 


छृष्णं कतं च शंसन्तः खधामानि यंयुर्धुदा ।॥५२॥ 


योन सेहे यं स्फीतां दद्रा पाण्डुसुतस्य ताम्‌ ।।५३॥ 


य इदं कीर्तयेद्‌ विष्णोः कर्म चैयवधादिकम्‌ । 


क भीभो म श्यति त 





ऋ आ = कक = = 


इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददामस्वन्ये उत्तरार्धं | 





नि~ 
क वति च 
नि 


शिद्युपाट्वधो नाम चतुःसप्ततितमो- 
~. स. | ऽध्यायः ॥ ७४ ॥ 
~~ ~ "~, - + । ~ -; 
"~ग ` @ ~ - ~ 5 ज = 
र? ~ ५ + $ ट ह ~ = " र 
ध अ --:-------=~---- ~~ 
उन्-- ~ = ध ॥ 
? मद्‌ ॥। (९  ॥ # { र क । र # ~ २९१९ "= `= स १ 4 
॥ व= ब ~ 
१ 1 ~ > 
कि ४ य न ग~ -- ॥ = ४ 








क ककाककककाककचकाकरतक क ` ` ~  : 


त 
- 
# ओ 
| 
(। 
॥, # 


अ० ७५ | दशम स्कन्ध ५९१ 


= ा्यया्यान्यकच्यकयकन्कन्य््यग्ययकयययाम 
किनि ननन 
ज ककि 


ति त = = ॐ 
> क ॐ य 











॥्वोीरियोगयनयो यि 
नदन्ति न्क 
ल % भ ५ 


अथ वद्सप्रतितमोऽध्यायः 

राजश्वूल यद्की पतिं ओर दुर्योधनक्रा पमान 
राजोवाच सजा परीश्षितने पू भगवन्‌ ! अजातचतर 
 अजातदयत्रोस्तं॑ दृष्ट्रा राजघयमहोदयम्‌ । ५/८ = भपम॒यदवम्प्लवरक देखकर] 
। जितने मनुष्य, नरपति, ऋषि, सुनि ओर्‌ देवता आदिं 
सें युभ्ुदिरे हात्‌ चुदेवा ये समागताः ॥ १॥ | आये थे, वे सव आनन्दित हए । परंतु दुर्योधनको 
दुर्योधनं वजेयित्वा राजानः सषेयः सुरः 1 | वड़ा दुःख, बड़ा पीडा दृ8; यह बात म॑ने आपके मुख्य 
इति श्रुतं नो भगवंत कारणषच्यतामर्‌ । २ ॥ छन ९ । भगवन्‌ । आप छमा करक इसका कण 

वत्छाई्य ॥ ९-२ ॥ 

धीड्युकदेश्वजी महःखजने कदा- परीक्षित्‌ ! तुम्दारे 
दादा युधिष्टिर वड़े महात्मा थे । उनके प्रेमबन्धनसे 
धकर सभी बन्धु-वान्धर्ोने . राजसूय यज्ञम विभिन्न 
वान्धवाः परिचयौयां दखाकन्‌ प्रेमबन्धनाः \} ३ ॥ ` सेवाकाये खीकार किया था ॥ ३ ॥ भीमसेन भोजना- 
| । ्यकौ देखल-रेल करते थे । दुर्योधन कोषाव्यश्च थे । 
सहदेव अभ्यागतोके खागत-त्कारमे निथुक्त ये ओर 
सहदेवस्तु पूजायां नङ्घले द्रव्यसाधने ॥ ४11 नकु विविध प्रकारको सामग्री एकत्र करनेका काम 
मुरङ्भवणे जिष्युः ष्णः पादावनेजने देखते थे ॥ ४ अजुन गुरुजनोकी सेवा-द्युश्रषा करते थे 
०, । ओर खयं भगवान्‌ श्रीकृष्ण आये इए अतिथियेकरे पौव 
परिवेषणे द्रपदजा कर्णो दाने महामना; \। ५ ॥ | पलारनेका काम करते थे । देवी द्रौपदी भोजन परसनेका 
| काम करतीं ओर उदाररिरोमणि कणं खु हां दान 
यु खुधघ्न। विक्णंर्च हादंश्यो विदुरादयः | दिया काते ये | ५५ ॥ परीक्षित्‌ । इसी प्रकार सात्यकि 
नह शयुन्। भयौद्या ये सन्त्दनाद्‌य; ॥ & ॥ | विकण, हार्दिक्य, विदुर, भूरिप्रवा आदि वाह्वीककरे पुत्र 
नरूप्ता सहायन् नान कस ठे तट्‌ । | ^ य <. 
३ नलवी नियुक्त थे । वे सव-केसव वेसा ही कम करते ये, 
भवतन्ते स राजिन ज्ञः प्रियचिकीपवः ।। ७ ।) | जिससे महारान युधिष्िका प्रिय ओर हित हयो ॥६-॥ ` ५ 
ऋत्विकंसदस्यबहु वरु सुहत्तमेषु परीक्षित्‌ ] जव ऋविजः सदस्य ओर वहत पुरषो 
खिष्टेषु सून॒तखमर्हणदकिणभि ¦ | का तधा अपने इष्टमित्र एवं बन्धु-वान्धवोका सुमधुर 
< प वाणी) विविध प्रकारकी प्रूजा-सामग्री ओर दक्षिणा आदि- 
चथ च सात्वतपतेश्चरणं भ्विषट से भीति सत्कार हो चुका तथा रिश्पाक भक्त- 
चकरस्ततस्त्ववभूथस्नयनं धन्याम्‌ ।} ८ 1 | बसल भगवानके चरणेमें समा गया, तब धमराज 


रदङगरद्धपणवधुन्धुमीनकगोलाः = । | वणर गङ्गजीमं य्न्तस्नान करने गये ॥ ८ ॥ उष॒ 


(~~ ^^ +९ ८९ समय जब वे अवभ्थ्‌-स्नान करे लगे, तब मृदङ्ग, र 
> विचित्राणि नेदुराबभृथोत्सवे ॥ ९ 1 | शङ्ख, दो नैन न 


नर्तक्यो नसृतदेष्टा ायका युथशो जगुः \ तरहके वाजे बजने कगे ॥ ९ ॥ नतैकियौ आनन्दसे 


कषिरेवाचं 


पितामष््य ते यज्ञे राजये महाद्यनः 


=^ 


भीमो महानसाध्यक्षो धनाध्यक्षः दुयोधन \ 


१, गी 


की 

















१. बादरायणिरवाच । २. सतां शुर | 








५९२ श्रीमद्भागवत | अ० ५५ 








बीणावैणुतलोन्नादस्तेषां स॒दिवमस्पृशत्‌ ॥१०॥। , चमः मकर नाचने र्गौ । छचंड-वे छंड गवये गाने ल्मे 


च 


| ओर वीणा; बुरी तथा श्ौक्ञ-मँजीरे वजने चगो । इनकी 
| चित्र्वजपताक्षाभेरिभेन्द्रखन्दनावंभिः । तुषु ध्वनि सारे आकाशम गूज गयी ॥ १० ॥ सोने 
वं [ऋः न के हार पहने इए यदु, सृञ्ञय, कम्बोज, कुरु, केकय 
^  खल्शृतभट भूपा नय स्क्ममारनः ॥११॥ | ओर कोसल देशके नरपति रंग-बिरगी ध्वजा-पताकाओंसि 
¦ युक्त ओर खूब ॒सजे-धजे गजराजो, रथो, घोड़ों तथा 
पुसनित वीर सेनिकोके साथ महाराज युधिष्ठिरको अगे 
करके पृ्वरीको कंपते हए चल रहे थे ॥ ११-१२॥ 





नौ 


 । अयदुखुज्ञयकाम्बोजङ्रुकेकयकोसलाः 


कम्पयन्तो यवं सेन्येयंजमानपुरस्सराः ।१२॥ 


धु 
| ॑ ॐ क यज्ञके सदस्य, ऋत्विज ओर बहुत-से श्रेष्ठ त्राण वेद्‌- 
11 । । सदखलिग्दिजश्रेष्ठा ब्रह्मघोषेण भूयसा । मन्त्रोका ऊचे खरसे उच्चारण करते इए चञे । देवता, 
4: | ऋषि, पितर, गन्धवं आकाशसे पूपोकी वर्षा करते हए 
(1 |  देवशरिपिकगन्धवासतष्डुः पूष्वगरिणः ।।१३। | उनकी सतुति करने कगे ॥ १३ ॥ इमस्य नट-नार 


इ₹त्-फुले, पुष्पके हार, रग-विरंगे वख ओर वहरमूल्य 


(7 : + रै 

^ गन्ध । = 
। ध खलता नरा नाय गन्धल्लम्ूषणाम्बर्‌ः । आभूषणं सज-धजकर एक-दृ ्रेपर जल, तेल, दूध, 
|  । विरिम्पन्त्योऽभिषिश्न्तयो धिजिविध रसेः।।१४॥ | मडल आदि रत॒ डज्कर मिगो देत, एक 
। जः श शरीरम गा देते ओर इस प्रकार क्रीडा करते हए चलने 
| ॥ - 1 =| न नकनि हरिद्रासान्द्र घ लगे नार्‌ पोको ते, गो 
॥ || तेरगोरसगन्धोदहरिद्रासान्द्रङङमेः | ॥ १४ ॥ वाराङ्गनाएं पुरूपोको ` तेढ, गोरस, 
# श लो पुगन्धित जल, हल्दी ओर गाढ़ केसर मर देतीं ओर 
रः 8 १ श्रहिम्पन्त्या १ || १२५ त ग ~ 

। । ुभ्भिलिंप्ताः प्रलिम्पनः विजहुवोरयोषित ॥९ ५। पुरुष भी उन्हे उन्दी वस्तुओंसे सरावोर कर देते ॥१५॥ 


गुक्ठा चभिनिरगमन्यपलब्धुमेतद्‌ उस समय इस उत्सवको देखनेक्रे व्यि जसे उत्तम- 
उत्तम॒विमानोपर चदढकर आकाशम बहूत-सी देविषों 

` आयी थी, वैसे ही सैनिकोके द्वारा सुरक्षित इनदरस्थकी 
देव्यो यथा दिवि विमानवरेनेदेव्यः। बहुत-सी राजमदिव्ं भी घुन्दघुन्दर॒षपालकिर्योपर 
सवार होकर आयी थीं | पाण्डवोके ममेरे भाई श्रीकृष्ण 
ओर उनके सखा उन रानि्योकि ऊपर तरह-तरहके रंग 
आदि डाक रषे थे । इससे रनि्योके मुख ठ्जीटी 





ता मातञेयसखिभिः परिषिच्यमानाः 


। | । विरे मुसकराहटसे खिल उठते थे ओर उनकी बडी शोभा 
कि. सत्रीडहासबिकसददना विरेजः ॥१६॥ | होती थी ॥ १६ ॥ उन ठोगोकि रंग आदि डालने 
। | | . | रानि्योके वज्ञ भीग गये थे । इक्तसे उनके शरीरके अङ्ग- 
नि | सिपिचुकष्तीभिः व्यङ्ग वक्षःस्थल, जंघा शीर कटिमिाग कुछ-कुछ दीख-से 
५, ता देवरात सखीन्‌ सिपिचुश्तीभिः । सय | 3 आ दिका वीर पमि सां सरन 


अपने देवरो लर उनके सलारभोपर उड़ेक रदी थ । 
स 8 ङ्धिन्नाम्बरा विवृतगात्रकुचोरुमध्याः | ` | प्रममरी उत्घुकताके कारण उनकी चोियों ओर जङ़के 


९" णादिभिः। 





[व । ` ~ ~~ ~ कु अक 





अ० ७५ ] दशम स्कन्ध रचः 


व्वव्वववव्ववववववव्वव=-----=च------------ 





| ओंत्सुक्यभुक्तकबराच्च्यवमानमास्या 4 बन्धन दी पड़ गये थे तथा उनम गुये ए श्ल 
गिरते जा रहे ये । परीक्षित्‌ | उनका य रुचिर्‌ ओर 
। पवित्र विहार देखकर मलिन अन्तःकरणत्राढे पु््पोका 
2 चित्त चश्चर हो उठता था, काम-मोहित हो जाता 
क्षोभं दधुमेलधयां रुचरोवहारः ॥{७।॥। | था ] १७॥ 

स सम्राड रथमारूढः सदश रुक्ममालनम्‌ ॥ चक्रवर्ती राजा युधिष्टिर द्रौपदी आदि रानियोके साथ 
सुन्दर घोडोंसे युक्त एवं सोनेके हारोसे सुसन्ित रथपर्‌ 

व्यरोचत खपतीभिः क्रियाभिः करतुराडिव ॥१८] | सवार होकर ए शोभायमान क रहे च, मानी छ 

| राजसूय यज्ञ प्रयाज अदि क्रियाओके साथ मूतंमान्‌ 
पतीसंयाजावभृध्यैर्चरित्या ते तमृत्विजः । = | दोक प्रकट हो गया हयो ॥ १८ ॥ ऋलिजेनि पनी 
संयाज ८ एक प्रकारका यज्ञकमं ) तथा यज्ञान्त-स्नान- 

आचान्तं सरापयांचक्कगेङ्गायां सह इृष्णया ।६९॥ सम्बन्धी कमं करवाकर द्रोपदीके साथ सम्राट्‌ युधिष्ठिर- 
को आचमन करवाया ओर इसके बाद गङ्गास्नान ॥ १९॥ 

देवदुन्दुभयो नेदुनरदुन्दुभिभिः समम्‌ 1 उस समय मनुष्योकी दुन्दुभिययोके साथ दही देवतार्भोकी 
दुन्दुभिर्यो भी बजने लगीं । बड़े-बड़े देवता, ऋषि-सुनि 

य॒य॒चुः पुष्पवर्षाणि देवविंपितृमानवा; ।२०॥ | पितर ओर मलुष्य-पुपोकी वपी करने रगे ॥ २० ॥ 
महारज युधिष्ठिरके स्नान कर ठेनेके वाद समी वणो 
एवं आश्रमके छेोगेनि गङ्खाजीमें स्नान किया; क्थोकिं इस्‌ 
स्नानसे बडे-से-वड़ा महापापी भी अपनी पाप-राशिसे तत्का 
महापातक्यपि यतः खद्यो मुच्येत किल्वषात्‌ ॥२१॥ मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिले 
न | नयी रेशभी धोती ओर दुपद्य धारण किया तथा वित्रिध 

अथ राजाहते क्षोमं परिधाय खल्कृतः । प्रकारके आमूषणेसे अपनेको सजा लिया 1 फिर ऋविजः 
सदस्य, ब्राह्मण अआदिको वल्ञामूषण दे-देकर उनका 

ऋत्विक्दस्यविप्रादीनानचभरणाम्बरेः ॥२२॥ पूजा की ॥२२॥ महाराज युधिष्ठिर मगवत्परायण थे, उन्हें 
बन्धुज्ञातिृपान्‌ मित्र ुहृदोऽन्यांश्च सवशः । , सबमे भगवानके ही दशन होते । इसव्थयि वे भाई-बन्धु, 
अभीक्ष्णं पूजयामास नारायणपरो नृपः ।२३॥। नी, नरपति" ए 
५ नार-बार पूजा करते ॥ २३ ॥ उस समय सभी लोग 

स्वँ जनाः सुरुचो मणिङ्ण्डलस्- जड़ाऊ कुण्डल, पुष्पोके हार, पगड़ी, लंबी अगरी 
| ई दुपद्वा तथा मणिके बहुमूल्य हार पहनकर देवताञके 
गुष्णीपकञ्चुकदुकूलमहाघ्यहाराः । समान शोभायमान हो रहे ये 1 खियेकरे ुखोकी भी दोनों 

९ त कानकि कणेष्टक ओर घुंघराली अख्कोसे बड़ी शोमा ¦ 
द व हो रदी थी तथा उसके कटिभागम सोनेकी करधनियां 
व॒क्त्रभ्रियः कनकमेखलया विरेजुः ।।२४॥ 


ह  . २ तो बहत द्वी भली माम हो रदी थीं॥२४॥ 
 अथलिजो -महाशीला ¦ सदस्या ब्रह्मवादिनः । परीक्षित्‌ | राजसूय यज्ञम जितने येग अये ये-- 
 ब्रहमक्षत्रियबिटञ्चद्रा राजानो ये समागताः ॥२५५]। 


8 परम शीव्वान्‌ ऋविजः, ब्रह्ादी सदस्य, बराह्मणः क्षत्रिय, 
४. देलभरिपिठ्मूतानि लोकपालाः सहाजुगाः । | वैय, शद, राजा, देवता, ऋषि) सुनि, पितर्‌ तथा अन्य लोकपाराः सहादगाः । वेश्य, इर, राजा, देवता, ऋषि) सुनि, पितर तथा अन्य 


सस्नुसतत्र॒ ततः सर्वे वणौश्रमयुता नराः । 








च 
~ 1 क च = 
भव @ . ६५ 1 | 


4 न्क &¶ >, त = ¢ + = # १ 

ति 

"+कः क कः = {9 4 १; #\ च, 0 ~ 
् ॥+ मक्का 







क अ. ~ किः 4. ॐ केकि चति क स क 
4 
४ 
(9 9 रुणो छ क = 


` ॥ = [` %५१ ` 
4 के क ऊक वीनि १ वीनि + (शन 63 अनन धि 99 क 
वि 1 
~ ¶ 5“ धनै 0 
कै 














(+ न दवी 


कन त्य ` + - + ^^ # / + न्क तकारे र्यी - ई ग्द 
क~~ 4. 1 क, „ च 1८ च. ९ 
~ क ११ । > १ ष्क र ९ +^ - "त 
४ ~; ^, कद ६ १९ १ ^ # + "वदीकःर + क -४ | 
ष 










१ ( { | 
~» ॐ. ४. ३ 
8 ¦ ¢ 1. 
१६३ | 
¶ 1 ४ 
| 3. 
{ 


तिव नम्टोक्लोन त >> 





५९४ ओमद्भागचत 











पूजितास्तमनज्ञाप्य खधामानि ययु्ेप ॥२६॥ | प्राणी भौर अपने भनुयायि्यके साय लोकपा इन 


हरिदाससखय राजर्षे राजदयमहोदयम्‌ । 


नेगातप्यन्‌ प्रशंसन्तः पिबन्‌ मर््योऽसृतं यथा | २७ 
ततो युधिष्ठिरो राजा सहर्सम्बन्धिबान्धवान्‌ | 
म्णा निवासयामासि ष्णं च त्यागक्रातरः | २८॥। 


भगवानधपं तत्राङ्क न्यवात्सीत्तस्पियंकरः । 
प्रसाप्य यदुवीरांश साम्बादींध ङश्स्थरीम्‌ ।२९॥ 
इत्थं राजा धम॑सुतो मनोरथमहार्णवम्‌ । 


सुदुस्तरं सय॒त्तीथे कृष्णेनासीद्‌ गतल्वरः ।॥३०॥। 


एकदान्तःपुरे तख वीक्ष्य दुर्योधनः भ्ियम्‌ । 
अतप्यद्‌ राजघ्यस्य महित्वं चाच्युतात्मनः ।॥२१॥ 
यसिन्‌ नरेन्द्रदितिजेन्द्र सरेन्द्ररक्ष्मी- 

नाना व्रिभान्ति किल रिथसजोषवप्ताः | 
ताभिः पतीन्‌ द्रपदराजसुतोपतस्थे 

यस्यां | विषक्तहदयः 


कुरराडतप्यत्‌ ॥३२॥ 


यर्धिस्तदा मधुपतेमहिपीसदस्ं 


(क 


भे 


श्रोणीभटेण शनफ़ः कणदङधिशोभम्‌ । 








सबकी पूजा महाराज युधिष्ठिरने की । इनके वाद वै 
लोग धमंराजसे अनुमति लेकर अपने-अपने निवासस्थान- 
को चङे गये | २५-२६ ॥ परीक्षित्‌ ! जैसे मनुष्य अग्रत- 
पान करते-करते कभी तृप्त नहीं हो सकता, वैसे ही 
सबं लोग भगवद्भक्त राजर्धिं युधिष्ठिरके राजसुय महायज्ञ- 
की प्रशसा करते-करते तप्त न होते ये॥ २७॥ 
इसके बाद धर्मराज युधिष्रिरने बड़े प्रेमे अपने हितेषी 
सुद्द्‌-सम्बन्धिर्यो, माईै-बन्धुओं ओर भगवान्‌ श्रीकरष्णको 
भी रोक दिया, क्योकि उन्हे उनके विद्ठोहकी कल्पनासे 
ही बड़ा दुःख दहोता था ॥ २८ ॥ परीक्षित्‌ } भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने यदुवंशी वीर साम्ब आदिको द्वारकापुरी भेज - 
दिया ओर खयं राजा युधिष्रिरकी अभि्पा पूणं कलने- 
के लिय, उन्हे आनन्द देनेके व्यि वहीं रह गये ॥२९॥ 
इ प्रकार धमंनन्दन महाराज युधिष्ठिर मनोरथोके महान्‌ 
समुदको, जिसे पार करना अत्यन्त कठिन दहै, भगवान्‌ 
श्रीकृष्णकी कृपासे अनायास दही पार कर गये भौर्‌ 
उनी सारी चिन्ता मिट गयी ॥ ३० ॥ 


एक दिनकी बात है, भगवानूके परमत्रेमी महारज 
युधिष्ठिरके अन्तःपुष्की सौन्दयं-सम्पत्ति ओर राजसूय- 
यज्ञ्रारा प्राप्त मक्श्चो देखकर दुर्योधनका मन डाहसे 
जलने खगा ॥ ३१ ॥ परीक्षित्‌ | पाण्डवोके च्य मय 
दानवने जो महल बना दिये थे, उनमें नरपति, देत्य- 
पति ओर पुरपतिणेकी विविध विभूतिं तया श्रेष्ठ 
सौन्दर्य स्थान-स्थानपर शोभायमान था । उनके द्वारा 
राजरानी द्रौपदी अपने पतियोकी सेवा करती थीं । उस 
राजभवनमे उन दिनों भगवान्‌ श्रकृष्णकी सहल रानियां 
निवासत करती थीं । नितम्बके भारी मारके कारण जब | 
वे उस राजभवनमें धीरे-धीरे चने क्गती थीं, तव उनके 
पायजेबोकी कचनकार चारों ओर फंड जाती थी । उनका 
कटिमाग बहत ही बन्दर था तथा उनके वक्ष {स्थलपट्‌ | । 
कमी इई केसपकी कालिमासे मोतियोके सुन्दर सेत हए 
भी खड-गढ जान पडते ये । कुष्ड्येकी भोर धुषराट 
अलक्ोकौ चश्चर्तसि उनके य॒लकी शोभा -ओर भी. 


ऋ 








अ० ७५ ] 





ज ^ ~~~ ^-^ 


मध्ये सुचारु इचङङ्मशोणहारं 








श्रीमन्युखं प्रचलङ्कण्डलङ्कन्तलाद्यम्‌ ॥३३॥ 
सभायां मयक्लप्तायां कापि धभंसुतोऽधिराद्‌ । 
वृतोऽनुजेबन्धुभिथ कृष्णेनापि खचक्षुपा ¦ ३४॥ 
आसीनः काश्चने साक्षादासने मघवानिव । 


पारमेष्ठयभ्चिया जष्टः स्तूयमानश्च बन्दिभिः ॥३५ 
तत्र दुर्योधनो मानी परीतो भ्रातभिच्ष । 
किरीटमाटी न्यविक्लद सिहस्तः क्षिपन्‌ रुषा ।३६॥। 
खलेऽभ्यगरृह्णाद्‌ वस्रान्तं जरं मत्वा खेऽपतत्‌ 


जठ च खलचद्‌ भ्रान्त्या मयमायाविमोदहितेः ।२७॥ 
जहास भीमस्तं षरा सियो सृपतयोऽपरे 
निवायमाणा अप्यङ्ग राज्ञा कृष्णानुमोदिताः ॥३८॥ 
स॒ व्रीडितोऽवाग्बदनो रूपा ज्वलन्‌ 
निष्कम्य तुष्णीं प्रययौ गजाहययम्‌ । 
हाहेति शब्दः सुमहानभूत्‌ सता- 
मजातश्खुविंमना इवाभवत्‌ । ` 
बभूव तुष्णीं भगवान्‌ भुवो भर 
समुजिदीषुभ्रेमति स यदुदशा ॥३९॥ 
एतत्तेऽभिहितं राजन्‌ यत्‌ परष्टोऽहमिह त्वया । 
सुयोधनखय दोरास्म्यं राजघ्ये महाक्रतौ ॥४०॥ 


इति श्रीमद्वागवते 


द्श्चम्‌ स्कन्धं 


= क क ० 
से पिः ॐ चि 


९९९५ 





जि 


बढ़ जाती थी । यह सव देखकर दुर्योधनके इदयमें 


बड़ी जखन होती । परीक्षित्‌ | सच प्रो तो दुर्योधन- 
का चित्त द्रोपदी आसक्त था ओर यदी उसकी जयन- 
का मुख्य काएण भी था ॥ ३२.३३ ॥ 

एक दिन राजाधिराज महाराज युषिष्िर्‌ अपने मार्य, 
सम्बन्धियो एवं अपने नयनोके तारे परम हितैषी मगवान्‌ 
श्रीकृष्णके साथ मयदानवक्ती वनायी सममे वर्णदा 
सनपर देवराज ्द्रके समान विराजमान ये | उनकी 
मोग-सामग्री, उनकी राज्यलक्ष्मी ब्रह्माजीके रेश्वर्यके 
समान धी । वदीजनं उनकी स्तुति कर रहे ये॥२४-३५॥ 
उसी समय अभिमानी दुर्योधन अपने दुःशासन आदि 
माह्योके साथ वहां आया । उसके सिरर सुकुट, 
ग्ल्मे मागा ओर हाथमे तव्वार थी । परीक्षित्‌ | वह 
क्रोधवश द्रारपागें ओर सेवकोंको ज्ञिडक रह। था ॥ ३६॥ 
उस समाम मयदानवने रक्ती माया फैखा रक्ी थी कि 
दुर्याधनने उससे मोहित हो स्थघ्को जक समञ्जकर अपने 
वख समेट व्यि ओर जल्को स्थर समज्ञकर वहं उसमें 
गिर॒ पड़ा ॥ २७ ॥ उसको गिरते देखकर भीमसेन, 
राजरानि्यां तथा दूसरे नरपति हंसने च्गे । यद्यपि 
युधिष्ठिर उन रेका कशनेसे रोक रदे ये, परंतु प्यारे 
परीक्षित्‌ ! उन्हं इशारेसे श्रीङृष्णक अनुमोदन प्राप्त यो 
चुका था ॥ ३८ ॥ इस्तसे दुर्योधन जनित हो गया, 
उसक। रोम-रोम करोधसं जढने लगा । भव वह अपना 
मुह ठ्टनगकर चुपचाप समाभवनसे निकच्कर हस्तिना- 
पुर चल गया । इस धटनाको देखकर स्पुद्षोमं हदादा- 
कार मच गया ओर धमराज युपिष्ठिरक। मन भी कुछ 
विन-सा हो गया । परीक्षित्‌ यह सब होनेपर भी 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण चुप थे । उनकी इच्छ थी क्रं किसी 
प्रकार प्रथ्वीका भार उतर जाय; ओर सच प्रमो, तो 


 उन्हीकी दृष्टिसे दुर्योधनको वह श्रम इआ था ॥ ३९ ॥ 


परीक्षित्‌ ! तुमने सुञ्चसे यह पूरा था कि उस महान्‌ 
राजसूय-यज्ञमे दुर्योधनको डाह क्यो इअ १ जग्न क्यो 
इरे १ सो वह सब भेने तुम्हे बतला दिया ॥ ४०॥ 


- =>. 


महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददामस्कन्वे 


उत्तरार्धं दुर्योधनभानमङ्गो नाम पञ्सप्ततितमोऽधष्यायः ॥ ७५ ॥ 


१. न्ने दुर्यो° | 

४" गक प 9 ह ¬* ४ ~ 

=. 4 कः कि इ कु) “ 
^ न य) = क र ~ 





ननम र्न गोः 


पकककनकयककित्ण क वरवे ~ कको 
18३) । क व श न च 


। [#। ऊ 
नं ॥ # 
{ कः 
#. ‡ 9२. 
# (अ 





र्णी जै 
क ` 
ॐ ध + 
"ऋः , 
६ भ 


^ 











५५९६ 








श्रीमद्भागवत 





अथ षटूसप्तततमोऽध्यायः 


काल्वके साथ याद्वाका युद्ध 


श्रीद्युक उवाच 
अथान्यदपि छष्णसख श्रृणु कमाद्धतं नृप । 
॥ १। 


क्रीडानरशरीरख यथा सौभपतिर्हतः 


शिडपारुक्षखंः शाल्वो रुक्मिण्यु दाह आगतः 
यदुभिनिंजितः संख्ये जरासन्धादयस्तथा ॥ २॥ 
शाल्वः प्रतिज्ञामकरोत्‌ शृण्वतां सर्वभूय॒जाम्‌ । 
अयादवीं क्ष्मां करिष्ये पोरुषं मम परयत ॥ २॥ 
इति म॒टः प्रतिज्ञाय देवं पड्ुपतिं प्रथम्‌ । 
आराधयामास चप पास्ट सद्रद्‌ ग्रसन्‌ ।॥ ४॥ 
संबरसरान्ते भगवानाद्युतोप उमापतिः । 


वरेणच्छन्दयामासर चशाख्वं शरणमागतम्‌ ॥ ५; 


देवासुरमल्ष्याणां मन्धर्वरगरक्षसाम्‌ । 
अभेद्यं कामगं चतरे स यानं द्रष्णिभीपगम्‌ ॥ & ॥ 
तथेति गिरिशादिष्टो मयः पररजयः | 
पुरं निमाय शाख्वाय श्रादात्सोभमंयसयम्‌ ॥ ७॥ 


स लब्ध्वा कामगं यानं तमोधाम दुरासदम्‌ । 


[नि नी क 2 क 1 इ 


१, तः । २. मयोमयम्‌ | 





ीद्युङदेवदजी कइते हँ-- परीक्षित्‌ | अव मनुष्य- 
की-सी रील करनेवाले भगवाम्‌ श्रीकृष्णका! एक ओद ` 
भा अद्धूत चत्र सुनो ! इसम यह वताया जायगा 
किं सोभनामक व्रिमानका अधिपति शाल्व किस प्रकाट्‌ 
भगवानके हाथसे मार! गया ॥ १ ॥ शास्र शिद्यपाठ्का 
सखा था ओर सुक्रिमिणीके विवाहके अवसरपर बारा्मे 
शिद्यपाल्की ओरसे आया इआ था । उस समय यदु- 
वरियोने युद्धम जरासन्ध आदिके साथ-साथ साल्वको 
भो जीतच्याथा॥ २ ॥ उस दिन सब राजाकिं 
सामने शासने यह प्रतिज्ञा की थी क्रि रँ परध्वीसे 

वंरियोको मिटाकर्‌ छोडंगा, सव लोग मेरा बट 
पौरुष देखनाः ॥ ३ ॥ परीक्षित्‌ ¡ मृढ॒शाल्वने इस 
प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव भगवान्‌ पड्युपतिंकी 
आराधना प्रारम्म की | वह उन दिनों दिने केवल 
एक वार सुदीमर राख फक य्या करता था॥ ४॥ 
यो तो पावंतीपति भगवान्‌ शांकर आशुतोष है, भोदत- 
दानी हे, फिर भी बे शाल्वका धोर सङ्कल्प जानकर 
एक वके वाद प्रसनन इए ¦ उन्होने अपने शरणागत 
दात्वसे वर मागनेके व्यि कहा ॥ ५॥ उस समय 
राल्वने यह वर मागा कि भुञ्चे आप एक रेसा विमान 
दीजिये जो देवता, अघुर, मबुष्य, गन्धवे, नाग ओर्‌ 
राक्षसोसे तोडा न जा स्के; जर्हो श्छ हो वहीं 
चा जाय ओर यदुवंशियोके व्यि अत्यन्त भयंकर्‌ 
होः || ६ ॥ भगवान्‌ शंकरने कह दिया तथास्तु ॥ 
इक्के बाद उनकी आज्ञासे विपक्षियोके नगर जीतनेवाठे 
मय दानवने रहेका सौभनामक विमान बनाया भट 
शाख्वको दे दिया ॥ ७ ॥ वह विमान क्या था एक 
नगर ही था । वह इतना अन्धकारमय था किं उसे 
देखना या पकडना अत्यन्त कठिन था । चखनेवागं 
उसे जौ छे जाना चाहता; वहीं वहं उक्तके ईच्छा 


ह ध 











अ० ७६ |] दशम स्कन्ध ५९७ 
क  ------ ------------------------ 
ययो द्रारवतीं शास्यो वेरं वृष्णिकरतं स्मरन्‌ ८ | करते दही चदा जाता था । शाल्ने बह ॒श्रिमान प्राप्त 
` कके द्रारकापर चदाह कर दी, क्योंकि वह बृण्णिव्ञी 
यादर्बेद्रारा क्रिंथै इए वैरको सदा स्मरण रखता 
था॥ < ॥ 
निरुद्रय सेनया च्ास्वो महत्या भरतषभ । . परीक्षित्‌ । शाल्वने अपनी वहत बड़ी सेनासे 
त 3 < द्वारकक्रो चारों ओरये घेर स्यां ओर फिर उसे 
पुरीं बभञ्जोपवनान्युद्यानानि च सव्रं्ञः 1 ९॥ फलश्व्से वदे इए उपवन ओर उवा्नोको उजाडने 
सगोपुराणि द्वाराणि प्राषादा्ारुतोलिकराः । | ओर नगदद्रार, फाटको, राजमह्, अटां, दीवार 
` ओर नागरिकोके मनोत्िनोदके स्थानोँको नश-श्र करने 
विहारान्‌ स विमानाभ्यान्निपेतुःशश्चब्ृष्टयः ।॥१०।। । गगा । उस शर्ठ विमानञ्च शोक ज्ञी ठग गयी ॥९-१०॥ 
०७ ५५. 
८ ¢ , बड़ी-बड़ी चदानं, वृक्ष, वज्र, सपं ओढे बरसने 
शेला दुमाश्चाशनयः स्पा आसारदराः | = । वदीउडी चने, शय, क्र, स५ ओर नोक बर 
¦ लगे } वड़े जोरका वक्रंडर उट खड़ा इआ । चास ओर 
प्रचण्डशक्रवाताऽभरदु रजसाऽऽच्छादिता दिकः १९। धूलनदी-धूल छ गयी ॥ १९१ ॥ परीक्षित्‌ ! प्राचीन 
¦ कार्म जसे त्रिपुरारे सारी पृ्वीको पीडित कर 
 रक्ला था, वैसे दी शास्के विमानने द्वारकापुरीको 
नाभ्यपद्यत शं राजंछिपुरेण यथा मही ॥१२॥ | अयन्त पीडित कर दिया । वीक नर-नापििको क 
< 4 एक्‌ क्षणके व्यि भी शन्ति न मिख्तीथी॥ १२॥ 
म्रद्युम्ना भगवान्‌ वीक्ष्य बाध्यमाना नजाः प्रजाः ) | परमयदाक्ली वीर भगवान्‌ परदयुम्नने देखा - हमारी प्रजाको 
मा भेष्टेत्यभ्यधाद्‌ वी स्थारूढो महार्थाः ।१३॥ , बडा क्ट हो रहा दहै, तव उन्होने रथपर सवार्‌ होकर्‌ 
द 8 सवको दद़स धाया ओर कह! किं डरो मतः ॥१३॥ 
सात्यकन्रुदन्णत्र साम्ब्राञक्कूरः सहदादुजः। उनके प्रीके-पीछे सात्यकिं, चारुदेष्ण, साम्ब, माइयेकिं 
| अक्रूर, कृतवा, भाठुविन्द, गद, छक, साएण 
आदि बहुत-से वीर वड-बड़े धनुष धारण करके निकठे। 
ये सव-के-सत्र महारथी थे । सबने क्वच पहन रक्ले 
ये ओर सबकी रक्षके स्थि बहइत-से रथ, हाथी, धोड़े ` 
निर्भदति = तिमिः ।\१॥ | तषा वैद सेन। साथ-सथि चल रही थी ॥ १४-१५॥ 
नसश्ुददता युत्ता रथभाश्वपदाताभः ॥९५।) = 
४ इक्के बाद प्राचीन कार्म जसे देवताओके साथ 








इत्यद्यमाना सौभेन दृष्णख नगरी भृक्षम्‌ 


। हार्दिक्यो भादुविन्दश्च गदश्च शुकसारणौ ॥१४॥ 


१ ग 


अपरे च महेष्वासा रथयूथपयूथपाः 


ततः प्रवदते युद्धं शास्वानां यदुभिः. सह । अघुरोक्ा घमासान युद्ध इआ था, वैसे ही शाखे 
का सेनिको ओर यदुषंरियोका युद्ध होने य्गा । उसे देख- 
यथाष्ुराणां विबुधंस्तुमलं रोमहषणम्‌ ॥१६॥। 


| कर ठोगेकि रोगटे खड़े हो जाते ये ॥ १६ ॥ प्रयुम्न- 

ताश्च सोभपतेमीया दिव्यास्त्र रुकिमिणीसुतः । न न स 
क्षणेन नाश्चयामास नैशं तम इवोष्णगुः 1 १७।॥ | अपनी प्रखर किरणोसे रात्रिका अन्धकार भिय देते 
हैँ ॥ १७ ॥ प्रदुम्नजीके बाणम सोनेके पंख एवं 
विव्याध पञ्चविंशत्या ख्णृदधैरयोष्ुखेः | गेहेके फल कगे हए थे । उनकी गोटे जान नहीं पडती 
` २. पैरिकृष्णमलुखरन्‌।२ वेरिकृष्णमनुसरन्‌। २, प्रकाराद्ल० | ३, रथः। 



























| „16५. ४१, +~ ~~ ~ 
न. 


व क व न = = 
9 


५९८ 


आमद्भागवत 





[ अ० ७६ 


न ~ ___ ` 


शाल्वस्य ध्वजिनीपां शरे; संनतपवंभिः ॥१८॥ 
शतेनाताडयच्छासवमेकेकेनासखय से निकान्‌ । 
द्शाभिदंशभि्नेतुन्‌ बाहनानि त्रिमिलिभिः ॥१९॥। 


तदद्भुतं महत्‌ कमं प्रघयुम्नसखय महात्मनः । 


थीं । उन्होने रेसे ही पचस बाणोंसे शाघ्वके सेना- 
पतिको धायल कर दिया ॥ १८ ॥ परममनखी प्रयुम्न- 
जीने सेनापतिके साथ दही शालको भीसौ बाण मारे 
। फिर प्रत्येक सेनिकको एक-एक ओर सारथियोंको 
दस-दस तया वाहनोको तीन-तीन बाणोसे धाय 
किया ॥ १९ ॥ महामना प्रुम्नजीके इस अदधत ओर 
महान्‌ कमंको देखकर अपने एवं परये--क्तभी सैनिक 


द्रा त पजयामासु;ः सवं खपरसंनिकाः ॥२०॥ | उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २० ॥ परीक्षित्‌ ! मय 


बहुरूपेकसूपं तद्‌ दश्यते न च द्यते । 
मायामय सयकृतं ॒दुविभाव्यपरेरमूत्‌ ।२१॥ 


कचिद्‌ भूमो कचिद्‌ व्योम्नि गिरिमृध्नि जरे कचित्‌। 


 अलातचक्रवद्‌ राम्यत्‌ सोभ तद्‌ दुरबयितम्‌ ॥२२॥ कोई दर्मही टुकारियोकी वनेटी भोज 


यत्र॒ यत्रोपरक्ष्येत ससौभः सहसैनिकः । 


दानवका बनाया हआ राल्वका वह विमान अत्यन्त 
मायामय था | वह इतना विचित्र था किं कभी अनेक 
ख्पोमें दीखता तो कभी एक रूपपर, कभी दीखता तो 
कभी न भी दीखता । यदुवंरियोंको इस बातका पता 
हीन चर्ता कि वह इस सभ्य क्ौहै॥२१॥ 
वह कभी प्ृध्वीपर आ जाता तो कमी आकाशम उड़ने 
क्गता | कभी पहाडकी चोटीपर चढ़ जाता, तो कभी 
जलम तेरने ठगता । वह अलात-चक्रके समान--मानो 
रहा हो--धरूमता 
रहता था, एक क्षणके ल्य भी कहीं ठहरता न 
था ॥ २२ ॥ शाल्व अपने विमान ओर सैनिकके साथ 
जर्हा-जहां दिखायी पड़ता, वहीं ब्रह यदुवंशी सेनापति 


शाट्वस्ततस्तताऽयु न्‌ शरान्‌ सात्वतयुथपाः ॥२२॥ | ब्णोक्री श्ड़ी वगा देते धे ॥ २३ ॥ उनके बाण सूर्य 


शरेरगन्यकसंस्प्यैराशीविषदुरासदः । 


॥ (  पीव्यमानप्ुरानीकः शाल्वोऽय्॒यत्‌ परेरितैः ॥२४॥ 










| |  शाल्वानीकपरब्लोषेडेष्णिवीरा भृशार्दिता; 


ऋ? 


ह 


$ ४ । ` न तत्यज रणं स्वं स्वं लोकद्वयं जिगीषवः 


त्यो द्यमाच्‌ नाम प्रघम्नंप्राकूप्रपीडितः । 


ट 
साद्य त 
१* तरय । २. गुष्यं 








वि [|] 
1 


न्क = 
लि कः 


ओर अगिके समान जल्ते इए तथा विषैले सौपकी 
तरह असह्य होतै थे । उनसे शात्वका नगराका१ विमान 
ओर सेना अत्यन्त पीडित हो गयो, यतक किं यदु- 
वंशियोके बाणोसे शास्र खयं मूच्छित हो गया ॥ २४॥ 

परीक्षित्‌ । शाल्वके सेनापतियोने भी यदुवंशि्योपर 
खूब शा्खोको वषां कर रक्ली थी, इससे वे अत्यन्त 
पीडित थे, परंतु उन्होने अपना-अपना मोचा छोड़ा 


|| २९५॥ | नद्यं । वे सोचते थे किं मरेगे तो परल्येक बनेगा ओर 


जीतेगे तो विजयकी प्राप्ति होगी ॥ २५ ॥ परीक्षित्‌ । 
शाल्वके मन्त्रीका नाम था दमान्‌; जिसे पहले प्रथुम्न- 
जीने पचीस बाण मरे ये । वह बहत बी था । उसने 
शषपटकर प्रदुम्नजीपर भपनी फोव्दी गदासे बड़े जोरसे 


मौर्व्या व्याहत्य व्यनदद्‌ बरी ।२६। | परहार क्या ओौर (मार च्या, मा च्याः कक 





| 7 + | स 











° ७७ | ध ५९९ 
== 
्रहम्नं गदया दीणंवक्ष;खलमरिन्दमम्‌ । गएजने च्गा ॥ २६ ॥ पदीकषित्‌ | गदाकी चोट 


६ 7 दर्वाः राुदमन प्रदयुम्नजीका वक्षःस्यक फट-सा गया । दारुकका 
| अपोवाह रणात्‌ छतो धमविद्‌ द्रुकात्मजः ॥२७॥। | पुत्र उनका रय होक टा था । वह सारथिर 
4 1 नः । अनुतर उन्हें रणभूमिसे हटा ॐ गया ॥ २७॥ दो 
` छन्धसंज्ञो मुहूर्तेन काष्णिः सारथिमतरवीत्‌ । षदाम प्रयुग्नजीकी मूर द्रटी । तद स तरयी 
कह[-- सारथे | तूने यह बहत बुरा किया | हाय; 
दाय । तु सुस्चे रणभूमिसे हथ टाया १ ॥ २८ ॥ सूत ! 
हमने एत्ता कमी नहीं सुना कि हमारे वंशका कोई भी 
वीर कभी रणगभूमि छोडकर अक्ग हट गया दहो | यह 
कण्ङ्कुका टीका तो केवक मेरे ही सिर लगा | सचमुच 
सूत ! त्‌ कायर्‌ है, नपुंसक है ॥ २९॥ बतला तो 
फं लु वक्येऽभिसंगम्य पितरौ रामकेशवौ । सही; अव म अपने ताऊ बट्राभजी ओर पिता 
श्रीकृष्णके सामने जाकर क्या कटरंगा १ अव तो सव 
युद्धात्‌ सम्यगपक्रान्तः पृष्टस्तत्रात्मनः क्षमम्‌ ॥२०॥ टो यही करेगे न, कि म युद्धसे भग गया १ उनके 
पूछनेपर म अपने अनुरूप क्या उत्तर दे सकूंगा ॥२०॥ 
व्यक्तं मे कथयिष्यन्ति हसन्त्यो भ्राठजामयः। मेति भामियां दंती इई सुञ्रसे साफ-साफ पूरछेमी कि 
कहो, वीर । तुम नपुं्तक कैसे हो गये १ दूसरोने युद्धमे 
क्लेन्यं कथं कथं वीर तवान्यैः कथ्यतां मृ ॥३९॥ | हं नीचा कंसे दिखा दिया १ सूत । अव्य ही तमने 
सुद्धे रणमूमिसे मगाकर अक्षम्य अपराध किया है (॥३१॥ ` 
सौरधिरुवाच सारथीने का--आयुष्मन्‌ | मनि जो कुछ किया ` 
| है, सारथीका धमं समञ्ञकर दी किया है । मेरे समर्थं 
सवामी | युद्धका रेसा धमं है कि सङ्कट पड्नेपर सारथी 
एथीकी रक्षा क( ठे ओर रथी सारथीकी ॥ ३२ ॥ 
| इस धम को समञ्षते इए ही मने आपको रणमभूमिसे 
एतद्‌ विदिला तु भवान्‌ मयापोवाहितो रणात्‌ | हटाया है । शात्रने आपपर गदाका प्रहार किया धा, 
| जिप्से आप मूरठित ह्ोग्ये ये, बडे स॒ङ्कस्मे ये; ` 
| उपसुषटः परेणेति म॒च्छितो गद्या हतः ॥३३॥ इसीसे मुञ्चे एसा करना पडा ॥ २३ ॥ 
~ ---८« उट. 
इति श्रीपद्वागवते महापुराणे पाए्महंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे 
शाख्युद्रे षट्‌ सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥ 





अहो असाध्विदं घत यद्‌ रणान्मेऽपसपंणम्‌ ॥२८॥। 
न यदूनां के जातः श्रूयते रणविच्युतः । 


विना मत्‌ क्रोवचित्तेन खतेन प्राप्तकिल्बिषात्‌।।२९। 


धमं विजानताऽऽयुष्मन्‌ कृतमेतन्मया बिभो । 


व्रतः कृच्छ्रगतं रक्षेद्‌ रथिनं सारथि रथी ॥२२॥ 





अथ सष्ठसप्रतितभोऽध्यायः 
श्ल्व-उद्धार 
श्रीशुकं उवाच आओीश्यक्देवजी कहते है-- परीक्षित्‌ | अब प्रयुम्नजीने 


स्‌ तूपस्परश्य सखि दशित धृतकायकः \ ह।थ-मुह धोकर कवच पहन धनुष धारण किया ओर सारथी- 
नय मां दयुमत पारं वीरस्यस्याह सारथिम्‌ ॥ १॥ ` सेका कि ^ वीर दुमानके पाम्‌ फिरसे ठे चलो, ॥१॥ 
१-सकस्मषात्‌ | २. सूत॒ उवाच \ ३. न्धे `` ए सवङ्यद1 र सूत उवाच \ ३. न्वे सौमवधे } ४. बादणयणिरुवच । 





। 
| ५ 
हि 


"3 







र ` ऋ = कनो % 
ख = 


&०० श्रीमद्भागवत [ अ० ७७ 
विधमन्तं स्वतेन्यानि द्युमन्तं रुकिमणीखतः 1 उप समय दमान्‌ यादवसेनाको तहस-नहक्त कर रा 
था | प्रदयुम्नजीने उसके पास पर्॑चकश उसे एेसा करनेसे 
रोक दिया ओर सुसकराकर आठ बाण मारे ॥ २॥ चार 
चतुभिथतुरो वाहान्‌ शतमेकेन चाहनत्‌ । वाणोसे उसके चार घोड़े ओर एक-एक बाणसे सारथी, 
प क धुप ध्वजा ओर उसका सिर काट डाटा ॥३॥ 
दाभ्या धलुञ्च केतं च शरेणान्येन बे शिरः ॥ ३॥ इयर गद, सात्यकि, सान्न शादि यहुवी वीर भी गालः 
गदसात्यकिसाम्बादया जघ्चुः सोभपतेबंरम्‌ | की सेनाका संहार करने ल्गे। सौम विमानपर चदे 
इए सेनिकोकी गरदनें कट जातीं भर वे समुद्रम गिर 
पड़ते ॥  ॥ इक प्रकार यदुवंशी ओर शात्वके सैनिक 
एवं यदूनां श्ाल्वानां निघ्नतामितरेतरम्‌ । एकः-दूसरेपर प्रहार करते रहे । वड़ा ही घमासान ओर 
भयंकर युद्ध हआ ओर वह क्गातार सत्ताईंस दिनतक 
चरता रहा ॥ "~ ॥ 


इन्द्रपस्थं गतः इष्ण आहूतो धर्मघलना । उन दिनों भगवान्‌ श्रीकृष्ण धमराज युधिष्ठिरके 


॥ राजस्रयेऽथ निवृत्त शिङ्पाले च संखिते ॥ ६ ॥ बुखानेसे इनदरप्रस्य गये इए थे । राजसूय यज्ञ हो चुका 
३ था ओर शिद्यपाल्की भी मृत्यु हो गयो थी | ६॥ व्हा 


इरुबद्वानलज्ञाप्य सनी सघुतां पथाम्‌ । भगवान्‌ श्रीकृष्णने ५ देखा कि बड़े भयं र अपर्ुन हो 
रहे हँ । तव उन्होने कुरस्वंदाके बड-वृो, ऋपि-मुनियो, 

निमित्तान्यतिषोराणि परयन्‌ दवारवतीं ययो ।॥ ७॥ | इन्ती ओर पाण्डवोँसे अनुमति लेकर द्वारकाके य्य 
| | प्रस्थान किया ॥ ७ ॥ वे मन-ही-मन कहने लगे कि 
आह चाहमिहायात आ्रमिश्राभिसंगतः | भं पूज्य माई बच्रामजीके साथ यह चखा आया | अत्र 
- ह. सः र शिद्युपाक्के पश्नपाती क्षत्रिय अवस्य ही द्वारकापर आक्रमण 
(1  राजन्याश्चयपक्षीया नृनं हन्युः पुरीं मम.॥ ८ । क्र दहे है ॥८॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णे द्रारकामें 
घ ओ ^ प्हुचकर देखा कि सचमुच यादवेंपर वड़ी विपत्ति आयी 
हि - न्य तत्‌ कदनं सवानां निरूपय पुररक्षणम्‌ | है | तव उन्होने बक्रामजीको नगरकी रक्षाके च्ि 
। नियुक्त कर दिया ओर सौभपति शालको देखकर अपने 
सारथी दारुकसे कहा--॥ ९ ॥ (दारुक | तुम शीघ्र-से- 
ठीघ्र मेरा रथ शात्वके पास ठे चखो । देखो, यह शाख 


























प्रतिहत्य भ्रत्यविध्यननाराचेैरष्टभिः स्मयन्‌ ॥ २॥ 


पेतः सथद्रे सोभेयाः सर्वे संछिनकन्धराः ॥ ४ ॥ 


यद्ध॒ त्रिणवरात्रं तदमू्तुयुरघरुल्बणम्‌ \ ५॥ 


¶ क 


(1.  सोभं च शास्वराजं च दारुकं प्राह केशवः ॥ ९॥ 


रथं प्रापय मे खत शाल्वस्यान्तिकमाद्यु वै | 
. ~ वड़ा मायावी है, तो भी तुम तनिक भी भयन करनाः ॥१०॥ 
 ॥  सम्भमस्ते न कर्तव्यो मायावी सौभराडयम्‌ ॥१०॥ | मगवानूकी ेसी आज्ञा पाकर दारुक रथपर चढ़ गया ओर 
| उसे शाल्वकी ओर ठे चला । भगवान्‌के रथकी ध्वजा गर्ड- 
ह्युक्तशोदयामास रथमास्ाय दारुकः । | निसे विहित थी । उसे देखकर यदुवियो तथा शात्वकी 
| सेनाके लोगोने युद्धभूमिमे प्रवेश करते ही भगवानूको 
द्युः सर्वे स्वे परे चास्णानुजम्‌ ॥११॥ नान वा ९१॥ परित). अबतक शासको 


7ल्वर्व छभ्णमालोक्य हतप्रायबलेश्वरः। । सारी सेना प्रायः न्ट हो चकी थी । भगवान्‌ श्रीडृष्णको 
यमा० । द । 


॥ 
[१ 
क न्क 
१ १ [ [न 
॥ क ~ च 
॥ ,* . ‡ 
# 








ि "अ 
ज. [च 


"0 +. 


 अ० ७७] 


प्राहरत्‌ कृष्णघ्रताय चक्ति भीमरां सधे ॥१२॥ | देखते ही उसने उनके सारधीपर एक बहत बड़ी 


तामापतन्तीं नभसि मशील्कामिव रंहसा । 
भक्षयन्तीं दिशः शौरिः सायकैः शतधाच्छिनत्‌॥। १३॥ 
तं च पोडशभिंविंद्भ्वा वाणेः सोमं च खे भ्रमत्‌ । 
 अविष्यच्छरसन्दोहैः खं खयं इव रद्भिः ॥१४॥ 
रास्वः शौरेस्तु दोः स्यं सशाङ्गं शाङ्गधन्वनः । 
विभेद भ्ययतद्रस्तात्‌ शाङ्गमाीत्तदद्धुतम्‌ ॥१५॥ 
हाहाकारो महानासीद्‌ भूतानां तत्र पर्यतामू 1 
निनद सौभराङ्च्चैरिदमाद अनादंनम्‌ ॥१६॥। 
यया भट नः सख्युश्रौतु भयां हतेक्षताम्‌ । 
 ्रमत्तः स सभामध्ये त्वया व्यापादितः सखा ॥१७॥ 
तं त्वाद्य निरिते्बाणिरपराजितमानिनम्‌। 


नयाम्यपुनराडसति यदि तिष्ठेभमाग्रतः ॥१८॥ 


4 {8 2. ~~ 


श्रीमगवानुवाच 
बृथा स्वं कत्थसे मन्द्‌ न पर्यखन्तिकेऽन्तकम्‌ । 


पौरुषं दश्चयन्ति स शरा न बहुभाषिणः ॥१९॥ 






| इत्युक्ता भगवान्छालवं गदया भीमवेगया । 
१ तताड जत्रौ संरन्धः स चकम्पे वमन्नसुक्‌ ॥२०॥ 


गदायां सनिइृत्तायां शाल्वस्त्वन्तरधीयत्‌ । 







£ ~ ~ 
ततो अहतं आगत्य परुषः रिरसाच्युतम्‌ 
१० {; बागेविद्‌ रं: भं = | ठ ६ - 





व्रा० @ ष्रि २, ६९ } {~ क 


 दृश्चम्‌ स्कन्ध 


~~~ ~ -----------~---~--~----- किं करः 








 पटचकर्‌ उनको सिर. त्‌ हर्‌ प्रणाम र्‌ 






ऋक = कन ऋः 3 ज ` जः तः जिः ` कः = जः आ कनि जि त = = ऋक = भ 


॥ 





राक्ति चखायी । वह राक्ति वडा भयंकर शब्द करती 
इई आकाशम वड़े वेणसे चछ ददी थी ओर बहुत बडे 
टक्के समान जान पडती थी । उसके प्रकारासे दिदाए्‌ 
चमक उटी थीं । उसे सारथीकी ओर आते देख भगवान्‌ 
श्र्ष्णने अपने वाणोसे उसके सेकडं टुकड़े कर 
दिये ॥ १२-१३ ॥ इसके वाद उन्होने साल्वको सोढ 
बाण मारे ओर उक्तके विमानको भी जो आकारामं धूम 
रहा था, असंघ्य बाणोंसे चलनी कर दिया--टीक 
वैसे ही, जैसे स्यं अपनी किरणोसे भाकाश्को भर देता 
है ॥ १४ ॥ शाल्वने मगवान्‌ श्रीकृष्णकी वायीं युजम _ 
जिसमे शाङ्गधनुष सोभायमान था, वाण मारा इससे ` 
शाङ्गपलुष भगवानके हासे छट्कर गिर्‌ पड़ा । यह्‌ 


। ॥ | ॥] 


~= 
एक अद्धुत घटना घट गधी ॥ १५ ॥ जो लेग आकाञ्च 
या प्ृरथ्वीसे यह युद्ध देख रहे थे, वे बड़े जोरसे (इाय- 
हायः पुकार उटे। तत्र॒ शाल्वने गरजकर भगवान्‌ न 


श्रीकृष्णसे यों कहा--॥ १६ ॥ मूढ । तने हमलोगोके 
देखतेदेखते हमारे माई ओर सखा शि्पाख्की पत्नीको 
हर च्या तथा भरी समामे, जवर कि हमारा भित्र 
शिद्धुपाक असावधान था, तूने उसे मार उच ॥ १७ ॥ 
मनै जानता ह्व कि तू अपनेको अजेय मानता हैं । यदि 
मेरे सामने ठहर गया तो मै आज तुद्चे अपने तीखे 
बाणेसे बह पंचा दंगा, जसि फिर कोई जोटकर 
नहीं आताः ॥ १८ ॥ 
भगवान्‌ भीरुष्णने कहा--'रे मन्द । त्‌ वृथा ही 
बहक रहा है । तञ्च पता नहीं क्कि तेरे सिरपर मोत ` 
सवार है । शरवीर॒व्य्थकी नकबाद नहीं कते, वे 
अपनी वीरता ही दिखाया करते है" ॥ १९ ॥ इस्‌ 
प्रकार कहकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने क्रोधित हो 
अल्यन्त वेगवती ओर भयंकर गदासे शात्वके जचरुष्यान ` 
( हंसटी ) पर प्रहार किया । इससे वह खून उगल्ता ` 
इभ कोपने ठ्गा । २० ॥ इषर जब गदा भगवानके 
पास लट आयी, तब शास अन्तर्थान हो गय। । इतके 
नाद्‌ दो घड़ी बीतते-बीतते एक मनुष्ये भगवान्‌क पास्‌ 
् भ्रण म॒ किया ओर वहू 


























॥ 
चकः चे 
प 
ध 


कर = 8 + सि =, } > 
| ॐ कक ति को को 
= क = ०७ "णक ५१० ण 
= मीके ह्न ~ > #: ण्न 


[मी 


^ क कणिक न क किनि ००७9 
॥ शक ५ 
यकि 


भ ज भायि ड 9 = => 9 क निनद = 0 , १ ~ 
~ ५ = 


नित +) ति 


जा 5 त ज 
=+ च 





नव त कुक 
४.११ ॥ छ" ॐ ककि 


म. ॥॥ 
[क । 
ि 





९०२ 


श्रीमद्भागवत 


| अ० ७५ 








देवक्या प्रहितोऽखीति नत्वा प्राह वचो रुदन्‌ ।॥२१॥ | रोता इआ बोक-- “मुञ्चे आपकी माता देधकीजीने 


कृष्ण कृष्ण महा्राहो पिता ते पित्वत्सर । 
बद्ध्त्रापनीतः शास्वेन सोनिकेन यथा पशुः ॥२२॥ 
नि्चम्य विप्रियं कृष्णो मानुषीं प्रकृतिं गतः । 
बिमनस्को घृणी स्नेहाद्‌ बभाषे प्राकृतो यथा ।२३॥ 


कथं राममपम्प्रान्तं जित्वाजेयं सुरारेः । 


शाखवेनास्पीयसा नीतः पिता मे बलवाच्‌ विधिः॥। २४॥ 


इति न्रवाण गोविन्दे सोभराट्‌ प्रत्युपसितः । 
व॒सुदेवमिवानीय दृष्णं चेदमुवाच संः ॥२५॥। 
एष॒ते जनिता तातो यदर्थमिह जीवसि 1 
वधिष्ये वीश्चतस्तेऽपरुमीरश्चेत्‌ पाहि बारिश ॥२६॥ 
एवं निभेत्स्यं मायावी खङ्गे नानकटन्दुमेः । 
उल्छत्य शिर आदाय खस्थं सोभं समाविात्‌ ।२७॥ 
ततो यहूतं परकृताबुपप्ठतः 
खबोध आस्ते खजनायुषङ्गतः । 
महाचुभावस्तदबुद्भयदासुरीं 
मायां सर शास्वप्रसृतां मयोदिताम्‌ ॥२८॥ 
न तत्र दृतं न पितुः कलेवरं 
्रबुद्ध॒ भाजो समपर्यदच्युतः । 


स्वाप्नं यथा चाम्बरचारिणं खु 


सोभयमालोश्य निहन्तुु्यतः ॥२९॥ 


। 
॥ = + ~ प्क ण्व ङ्ख ` 


मेजा है ॥ २१ ॥ उन्होने कहा है किं अपने 

पिताके प्रति अत्यन्त प्रेम रखनेवाछे महाबाहू 

श्रीकृष्ण । शस्व तुष्हारे पिताको उक्ती प्रकार 

बोधकर ठे गया है, जैसे कोई कसाई पञ्चको बोधकर 

ठे जाय | ॥२२॥ यह अप्रिय समाचार चुनकर भगवान्‌ 

श्रीकृष्ण मनुष्य-से बन गये । उनके श्ंहपर्‌ कुछ उदासी 

छा गयी । वे साधारण पुरुष्के समान अत्यन्त करुणा 

ओर स्नेहसे कहने क्गे--। २३ ॥ “अहो ! मेरे भाई 
नलरामजीको तो देवता अथवा असुर कोई नहीं जीत 
सकता । वे सदा-सवंदा सावधान रहते हैँ । शाल्वका 
बल-पोरुष तो अत्यन्त अल्प है । फिर भी इसने उन 
कैसे जीत छया ओर कैसे मेरे पिताजीको बोधकर छे 
गया १ सचमुच, प्रारब्ध बहत वच्चान्‌ है ॥ २४ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण, इस प्रकार कह ही रहै थे किं शाख 
वसुदेवजीके समान एक मायारचित मनुष्य ठेकर्‌ वहां 
आ पंचा ओर श्रीकृष्णसे कहने ल्गा--॥ २५ ॥ मूर्खं | 
देख, यही तुद्चे पैदा करनेवादा तेरा बाप हं, जिसके 
्यित्‌जी रहा है। तेरे देखते-देखते भ इसका 
काम तमाम करता दह्रं । कुछ वल-पौर्प दहो, तो इसे 
वचाः ॥२६॥ मायावी रात्वने इ प्रकार भगवानूको 
फटकारकर मायारचित वसुद्धक। सिर तव्वारसे काट 
ज्या ओर उसे केकर अपने आकाशस्य विमानपर जा 
बेढा ॥ २७ ॥ परीक्षित्‌ ¡ भगवान्‌ श्रीकृष्ण खयंसिद्ध 
ज्ञानखखूप ओर महानुभाव हँ । वे यह घटना देखकर 
दो घड़ीके स्यि अपने खजन वघुदेव्जके प्रति अत्यन्त 
परम होनेके कारण साधारण पुरुषोके समान शोकम इब 
गये । परत किर वे जान गये किं यह तो शाल्वकीं 
हेगयी इई आसुरी माया हयी है, जो उसे मय दानवने 
नतय थी ॥ २८ ॥ भगवान्‌ श्रीकष्णने युद्धभूमिमें 
सचेत होकर देखा- न वरहा दूत ई ओर्‌ न पिताका 
बह शरीर; जसे खप्नमें एक दद्य दीखकर इत हयी गया 
हो | उधर देखा तो शाल्व विमानपर चढकर आकाशम 
किर रद्वा है | तब वे उसका वध कनेक व्यि उद्यत 


हो गये ॥ २९. ॥ 


४ र * ५ 





२ 


११ 
५१ 

| 
6 














एवं बद्न्त राज्य ऋषयः के च नान्विताः । प्रिय परीक्षित्‌ । इस प्रकारकी बात पूर्वापका विचार ५4 


न करनेवाले कोई कोई ऋषि कहते है । अव्रद्य ही वे 

यत्‌ खवाचो बिरुष्येत नूनं ते न खरन्त्युत ॥।३०॥ | श्स॒बातको भूक जाते है किं श्रीकष्णके सम्बन्धे 
ह ध सा कहना उन्ही वचनोके विपरीत है ॥ ३० ॥ कँ 

कत शोकमोहा स्नेहो घा भयं व येऽज्ञसम्भवाः । भज्ञानि्योमे रहनेवाले शोक, मोह, स्नेह ओर भय तथा 
करा वे परिपूर्णं मगवान्‌ श्रङष्ण--जिनका ज्ञान, विज्ञान 


क चाखण्डितविज्ञानज्ञानैधयस्त्वखण्डितः ॥।२३१॥ | ओर षवे भवण्थ्त ह, रकस 2 
१, 


यत्पादसषेवोभिंतयाऽऽत्पविचया वैसे मावोकी सम्मावना ही कहाँ है १ ) ॥ ३१ ॥ बडे 
वड़े ऋषि-सुनि भगवान्‌ श्रीकष्णके चरणकम्ोकी सेवा 

हिन्वन्त्यनाद्यास्सनिपयेयग्रहभ्‌ | कर्वे आत्मविद्य।का भडीमंति सम्पादन क्रते ह ओर 

उसके द्वारा शरीर आदिमे आत्मबुद्धिरूप अनादि अज्ञान- 

लभन्त आत्मीयमनन्तमेशवरं को मिटा डालते है तथा आत्मसम्बन्धी अनन्त देश्य 


पराप्त करते हैँ । उन संतोके परम गतिखरूप भगवान्‌ 
कुतो जु भहः परमसख सदतेः ॥३२॥ श्रीकृष्णमे भल, मोह कंसे हो सकता है ! ॥ २२ ॥ 


तं शन्ञपूमंः प्रहरन्तमोजसा । अब शाल्व भगवान्‌ श्रीकृष्णपरट बडे उत्साह ओर 
लाटवं शरैः क्ौरिरमोधविक्रमः । वेगसे राखकी वर्षा करने खगा था | अमोघशक्तिं भगवान्‌ 


४ ह ४  श्रीकृष्णने भी अपने बाणेसे शाल्वको धायकं कर दिया 
बिद्ध्वाच्छिनद्‌ चमं धु; शिरोमणि ओर उसके कवच, धुप तथा सिरकी मणिको छिन- 


सौभं च शत्रोर्भदया र्रोज ह ॥३३॥ , कर दिया । साय ही गदाकी चोटसे उसके विमानको 


रिया विचितं भी जजर कर दिया ॥ ३३ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ | 
तत्‌ छृष्णहस्तेरितया विचूणितं 
त्‌ ॥। श्रीकृष्णके हाथोसे चयी इई गदासे वह विमान ` 


रो गद्या 
पपति ताये गदया सहस्रधा । चूर्‌-चूर होकर समुद्रम गिर पड़ा । निरेके परे 


विक्ष्य तद्‌ भरूतलमायिते गदा- ही शाल्व हायमे गदा लेकर धरतीपर कूद पडा जौर ` 
धम्य शास्वोऽच्युतमम्यगाद्‌ डतम्‌ ॥३४॥ | सावधान होकर बड़े वेगसे भगवान्‌ श्रीृ्णक्री ओर्‌ ` 
शषपटा ॥ ३४ ॥ शाल्वको अक्रमण कते देख उन्होने 
मालेसे गदाके साय उसका हाथ काट गिराया | ` 
भल्लेन छिन्वाथ रथाङ्गमद्धुतम्‌ । पिर उसे मार डालनेके च्य उन्होने प्रल्यकागीन 
वधाय शाखस्य लयाकसन्निभं सूयके समान तेजखी ओर अत्यन्त अदूमुत चुद्ोन 
. चक्र धारण कर छिया । उस समय उनकी देसी शोमा 

हो रदी थी, मानो सूयके साय उदयाचठ शोभायमान 
जहार तेनेव शिरः सङ्कण्डलं हो ॥ ३५ ॥ मगवान्‌ श्रीकृष्णने उस चक्रे प्रस 
किरीय्युक्तं पूुरुमायिनो हरिः । मायावी शाल्वका कुण्डल-किरीटसहित सिर धडसे अलग । 

कर दिया; ठीक वैसे ही, जेसे इन्दने वज्रसे चत्राषुरका 
तिर काट डाव था। उस समय शाल्वके सैनिक र 
बभूव हाहेति वचस्तदा चरणम्‌ ॥३६॥ | अत्यन्त दुःखसे "हाय-हायः चिल्ल उठे ॥ ३६ < 


आधावतः सगदं तस बाहुं 


बिभ्रद्‌ बभो साकं श्वोदयाचरः ॥२५॥ 





श वृत्रस्य यथा पुरन्दरो 


क स) + अ चपि 


१ 1ज्ञानसम्भवम्‌ । 


क ~ 
कैक क्र 
ह" ऋ 






















2 ॥ 


#॥ ॥ 





विकि, 9 5 व कनि 
ग्व त 


५ न्क न ई“ दय्टरतः अ 


+ 
¢ 
॥ 

५ 

. 

{ 


8 त्ाण्यपेम्यज्ञ मित्राणां मित्रवत्सलः । 
-{ ` २ गे सोमगाब्ववधः। 


8०४ 





` -----------~--------- य #िणीषमीष णभभिकीयी 2 क  प्ठ जि 


तसिन्‌ निपतिते पापे सौमे च गदया 1 





नेदुदुन्दुभयो राजन्‌ दिषि देवगणेरिताः । 





| अ० ७८ 








परीक्षित्‌ | जब पापी शाल्व मद गया ओर उसकां 
विमान भी गदाके प्रहारसे चू-चूर हो गया; तव 
देषता लखोग॒ आकारा दुन्दुभियाँ बजाने लगे । दीक 
इसी समय दन्तवक्त्र अपने मित्र शिद्युपा आदिका 
बद लेनेके व्यि अत्यन्त क्रोधित होकर भा 


सखीनामपचितिं वेन्‌ दन्तवक्रो स्पाभ्यगात्‌॥।२७॥ ` पर्वा ॥ २७ ॥ 


कै + 
--ईः 
- ४ 9 + 


८.22 57. 


इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशामस्कन्वे उत्तरार्घे 
सोभवधो नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥ 
तद~ 


अथादटप्षषतितमोऽष्यायः 


दन्तवक्त्र ओर विदुरथका उद्धार वथा तीथंया्राम वलराथजीके ्ाथसे खतजीका दध 


श्री्युक उवाच 

शि्धपारख शाल्व पौण्डरकखापि दुर्मतिः । 
प्रलोकगतानां च वन्‌ पारोक्ष्यसौहृदम्‌ ॥ १ । 
एकः पदातिः संकृद्धो गदापाणिः प्रकम्पयन्‌ । 
पद्भ्यामिमां महाराज महासत्वो व्यदृश्यत ॥ २॥ 
तं तथाऽऽयान्तमालोक्य गदामादाय सत्वरः 1 
अवप्छत्य रथात्‌ कृष्णः सिन्धुं बेरेव प्रत्यधात्‌॥ २ ॥ 
गद्‌य॒दयम्य कारूषो अुङन्दं प्राह दुर्मदः । 


दिष्टया दिष्टया भवान्य मम चषटिपथं गतः ।॥ ४॥ 


त्वं मातलेयो नः ष्ण मित्रधां जिषां तसि । 


अतस्त्वां गदया मन्द हनिष्ये वजकसपया ॥ ५॥ 


श्री्युकदेवजी कदते है-- परीक्षित्‌ ! रिद्युपाट, 
शाल ओर पौण्ड्कके मारे जनेपर उनकी मित्रताका 
रूण चुकानेके व्यि मूं दन्तपरक्त्र अकरेटा दही पदक 
युद्धभूमि्मे आ धमका । वह क्रोधके मारे आग-वनूा 
हो रहा था । शस्रके नामपर उसके हाथमे एकमात्र 
गदा थी । परंतु परीश्नित्‌ ! छोगोने देखा, वह इतना 
शक्तिराटी है किं उसके पैरोकी धमकसे पृथ्वी हिक 
रही है ॥ १-२ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने जब उसे इस 
प्रकार आते देछा;, तब टपट हाथमे गदा छेकर वे 
रथसे कूद पड़े । फिर जेसे समुद्रके तटकी भूमि उसके 
उवार्‌-मटेको अगे वढनेसे रोक देती है, वैसे ही 
उन्होने उसे रोक दिया ॥ ३ ॥ घमंडके नशेमे चूर , 
कर्ूषनरेश दन्तवक्चने गदा तानकर भगवान्‌ श्रीकृष्णसे 
कहा- -'वड़े सोभाग्य ओर आनन्दकी बात है कि 
आज ठम मेरी ओंखोके सामने पड़ गये॥ ४॥ 
कृष्ण्‌ | तुम मेरे मामाके ल्डके हो, इसल्ि तुम्दं 
मारना तो नहीं चाहेये; परंतु एक तो तुमने मेरे 
मित्रोको मार डाला है भौर दूसरे सुद्ध भी मारना चाहते 
हो । इसलिये मतिमन्द । आज मेँ- तुम्हं अपनी 
बन्रकर्क॑श गदासे चूर-चूर कर डांग ॥ ५ ॥ मूखं । 
वैसे तो तम मेरे सम्बन्धी हो, फिर भी दहो शतरुही, 
जैसे अपने ही शरीरम रहनेवाद कोई रोग हो ! 





अ० ७८ | देशम स्कन्ध ६०५ ` 
वन्धुरूपमरिं हत्वा व्याधं देहवरं यथा 1} & \\ | अपने मित्स बङा प्रेम करता द, उनका मुदषपर ऋण 

| है । अव तुम्हे मारकर ही मेँ उनके ऋणसे उण हो 
एवं ङकैस्तुदन्‌ वाक्यैः कृष्णं तोत्वरैरि दिषम्‌। | सकता द्र ॥ & ॥ जेसे महावत अङ्कदासे हाथीको 

| घायक करता द्वै, वेसे ही दन्तवक्तने अपनी कड्वी 
गद याताडयन्मध्नि सिंहवद्‌ व्यनच्च सः 1 ७11 , बर्तते श्रीकृष्णको चोट पर्हैचारेवी चेष्टा की ओर 
फिर वह उनके सिरपर वड़े वेणसे गदा मारकर सिंहके 
गदयाभिहतोऽप्याजो न चचार यदट्रहः । समान गरज उठा ॥ ७ ॥ रणभूमिमे गदाकी चोट 


कि. ५ खाकर भी भगवान्‌ श्रीकृष्ण टस-से-मस न इए । 
` दछृष्णोऽपि तमद्‌ गुव्या कौमोदक्या स्तनान्तरे ॥ ८ उन्होने अपनी बहत बड़ी कौमोदकी गदा सम्हाख्कर 
उससे दन्तवक््रके वक्षःस्थक्पर प्रहार किया ॥ ८ ॥ 
गदाकी चोटसे दन्तवक््रका कठेजा फट गया । वह 
महसे खून उगल्ने खगा } उसके बघार बिखर गये, 
भुजां ओर पैर फक गये । निदान निष्प्राण होकर 
वह धरतीपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥ परीक्षित्‌ । जेसा किं 
शिद्युपाल्की मल्युके समय हा था, सवर प्राणियोके 
क ~. & सामने ही दन्तवक्त्रके मृत इरीरसे एक अत्यन्त सुक्ष्म 
परयतां सवं धूतानां यथा चचवधे चष ॥\१०॥ | ज्योति निकली ओः वृह बडी त्रिचित्र रीतिसे भगवान्‌ 
श्रीकृष्णमे समा गयी ॥ १० ॥ 
दन्तवक्तरके माईका नाप था विदूरथ । वह अपने 
सिवर्मम्या््रतंलजिषां ५.9, | माईैकी मृष्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो गया । अब वह 
अगच्छद्‌ास् चर्मस्याद्ुच्छ्षस्ताजघांसया २९): क्रोधके मारे ठवी-ढवी सस छता इभ हाथमे दाठ- 
तस्य चापततः छृष्णर्चक्रेण क्षुरनेमिना । तवरा चकर मगान्‌  शह्णकी ` मार्ग 
इच्छसे आया ॥ ११ ॥ राजेन्द्र ! जत्र मगवान्‌ श्रीहृष्णने 
शिरो ज द्र सकिरीटं स्कण्डलम्‌ + देखा कि अव वह प्रहार करना ही चाहता है, तब 
० पिट सण्‌ १२ | उन्होने अपने छुरेके समान तीखी धाखाङे चक्रसे 
` एवं सौभं च शाल्वं च दन्तववत्रं सहालुजस्‌। किरीट ओर कुण्डल्के साथ उसका सिर धड़से अछ 
| कए दिय ॥ १२॥ इस्त प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
हत्वा दुिपहानन्येरीडित;ः सुरमानवैः ॥१३॥ ८ उसके निनान सोम, दन्तववन्न नोर विदयवो, 
क जन्हं. मारना दूसर्के व्यि अराक्य था, मकर 
दःरकपुरीमे व्रा किया । उस्‌ समप देवता ओर 
मदुभ्य उनकी स्तुति कर रहे ये } बड़े-बड़े ऋषि-सुनि, 
सिद्ध -गन्धवै, प्रियाधर्‌ ओर वासुकि आदि महानागः 
भप्पराए्‌, पितर, यश्च, किंनर तथा चारण उनके ऊपर 
< ुष्पोकी वां करते हए उनकी विजयक्रे गीत गा रहे 
उपगीयमानवि जयः कुरुमंरभिवर्षितः। थे. । भगवानूके प्रवेशके अवसरपर पुरी खूब सजा 
दी गयी थी शौर बड़े-बड़े वृ्णिवंसी यादव वीर 
दृतश्च इष्णिप्रवरेविवेशारडकरतां पुरीम्‌ ।१५॥) | उनके पीपी च रदे ये ॥ १३-१५॥ 











गदानिर्भिजहदय उद्रसन्‌ रुधिरं सुखाद्‌ 1 
प्रसायं केशवाहङघ्रीन्‌ धरण्यां न्यपतद्‌ व्यञ्च ९॥ 


ततः सक्ष्मतरं ञ्योतिः रृष्णमाविशदद्तस्‌ । 


विद्रथस्तु तद्भ्राता आदशेकपरिप्ठुतः 1 


य॒निभिः सिद्धगन्षवेविंवाधरमहोरभेः 


अप्सरोभिः पितगणेयक्षैः किलरचारणेः ॥१४॥ 























| - * + 9 क 8 
~ ६०६ 





+ अध्यासीनं च तान्‌ विग्रंस्वुकोपोदीक््य माधवः।२ ४ | 


= "९9 न "न "अ । 
ध ह, + 6 4 । 








एवं योगेश्वरः कृष्णो भगवाञ्जगदीश्वरः । 
इयते पशदष्ीनां निर्जितो जयतीति सः ॥१६॥ 
्ुत्वा युद्धोद्यमं रामः ङरूणां सह पाण्डवः । 
तीर्थाभिषेकन्याजेन मध्यस्थः प्रययौ किर १७ 


स्नात्वा प्रभासे संतध्यं देवर्पिंपितरमानवान्‌ 
सरखतीं प्रतिस्रोतं ययो 


पृथूदकं विन्दुसरखितक्पं 


ब्राह्मणसंडृतः ॥१८॥ 
सुदशेनम्‌ । 
विशालं ब्रह्मतीथं च चकर प्राचीं सरखतीम्‌ ॥१९॥ 
ययुनामनु यान्येव गङ्खामनु च भारत । 
जगाम नेमिषं यत्र॒ ऋषयः सत्रमासते ।॥२०॥ 


तमागतमभिप्रेत्य अनयो दीषं्त्रिणः। 





सोऽ्चितः रुपरीवार; कृतासनपरिग्रहः । 


' रोमहषणमासीनं महर्षः रिष्यमेक्षत ॥२२॥ 






 अग्रत्युत्थायिनं 


घूतमनरतश्रहणाञज्ञलिम्‌ । 









 कसादसाविमान्‌ विप्रानध्यास्ते प्रतिलोमजः । 


भ + क 
क ` ६ 


2, (४ 


*॥ 1 ९१।९ 


भीमद्भागवत 


कः = तोक ऋ 


अभिनन्ययथान्यायं प्रणभ्योत्थाय चार्चयन्‌ ।२१॥। 











यो चातक == = अ ज ज 
0 जापो जः क क ० चः = = किः ऋ = ` = मीक क 


योगेश्वर एवं जगदीश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण इसी प्रकार अनेकों 
खे खेकते रहते हँ । जो पञ्युभके समान अविवेकी है, 
उन्हे कभी हारते भी देखते हैँ । परंतु वास्तवे तो वे 
सदा-सवंदा विजयी ही & ॥ १६ ॥ 


एक वार्‌ बक्रामजीने छुना किं दुर्योधनादि कौएव 
पाण्डर्वके साथ युद्ध करनेकी तैयारी कर रे है । वे 
म्यस्य ये, उन्हें किंसीका पक्ष ठेकर ल्डना पसंद 
नहीं था । इसथ्िये वे ती्थर्भिं स्नान करके बहाने 
द्यएकासे चे गये ॥ १७ ॥ वर्हसि चलकर उन्होनि 
प्रमासक्षेतर्मे स्नान किया ओर तर्पण तथा ब्राह्मण- 
भोजनके द्वारा देवता, ऋषि, पितर ओर मनुष्योको 
तृप्त किया । इतके वाद वे कुछ ब्राह्मणेके साथ 
जिधरसे सरखती नदी आ रही धी, उधर ही चठ 
पड़े ॥ १८ ॥ वे क्रमराः प्रथूदक, विन्दुसरः, त्रितकूप, 
षुदशनतीथ, विराकदीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, चक्रतीथं भौर 
परवेवाहिनी सरखती आदि तीथेमिं गये ॥ १९ ॥ 
परीक्षित्‌ | तदनन्तर यमुनातट ओर्‌ गङ्गातटके प्रधान- 
प्रधान ती्थमिं होते इए वे नेमिषारण्य क्ेत्नमे गये । 
उन दिनों नैमिषारण्य क्षत्रमे बड़े-बड़े ऋषि सत्सङ्गर्प 
महान्‌ सत्र कर हे ये ॥ २० ॥ दीधंकाठ्तक सत्सङ्ग 
सत्रका नियम लेकर वेठे हए ऋषियोने बट्रामजीको 
आया देख अपने-अपने आस्तनोंसे उठकर उनका खागत- 
त्कार किया ओर यथायोग्य प्रणाम-आ्ीवांद करके 
उनकी पूजा की ॥ २१॥ वे अपने प्षाथि्पोके साथ 
आसन ग्रहण करके वैठ गये ओर उनकी अचा-परूना 
होः चुकी, तब उन्होने देखा किं भगवान्‌ व्यासुके 
शिष्य रोमहर्षण व्यासगदीपर बेठे इए है ॥ २२॥ 
बलरामजीने देखा किं रोमहषणनी सूत-जातिमें उद्यन 


होनेपर भी उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोसे ऊंचे आसनपर बेठे इए्‌ 


है ओर उनके अनेपर न तो उठकर खागत करते 
है ओर न हाथ जोड़कर प्रणान दही । इप्‌ 
बटरामजीको क्रोध आ गया ॥ २२३ ॥ वे कहने कगे 
कि (यह रोमहर्षण प्रतिलोम जातिका हनेपर भी इन 


रेष्ठ ब्राह्मणेसे तथा धमेके रक्षक हमनेगेसे ऊपर बेग 
|२४॥ | इभा है, इसव्ि यद्‌ र्द्ध मृत्युदण्डका पात्र दै ॥२४॥ 











प्वद्धर- -  - ) र 7. + 2 
५. ~अ (1 न 
अ० ७८ | दशम्‌ स्कन्ध &०७ 








| व्यास॒देवका दिष्य होकर इसने इतिहस्‌, 
पुराण, धर्म॑शा्न आदि वहूत-से शओाज्ञोका अव्ययन 
मी क्रिया है; परतु अभी इसका अपने मन- 
पर संयम नहीं है । यह विनयी नही, उदण्ड ह । 
इस अनजितात्माने ब्ूढमूढ अपनेको बटत वड़ा पण्डित 
मान रक्खा है । जसे नटकी सारी चेष्टाए्‌ अमिनयमात्र 
होती रहै, वैसे ही इसका सारा अध्ययन खोगके च्य 
है । उससे न इसका वाम है ओर न किसी दूसरेका 
॥ २५२६ ॥ जो लोग धर्म॑का चिह धारण करते दै 
परंतु धमका पाकन नही करते, वे अधिक पापी है 
ओर वे मेरे व्ि वध करनेयोग्थ है । इस जग्म 
इसीव्ि मैने अवतार धारण किया दहै ॥ २७॥ 
भगवान्‌ बलराम यद्यपि तीथयात्राके कारण दुष्टकि वधसे 
भीञ्खणदहोगयेये, फिर भी इतना कहकर उन्डोनि न 
अपने हाथमे सित कुदाकी नोकसे उनपर्‌ प्रहार | 
कर दिया ओर वे तुरंत मर गये । होनहार दी रेसी 
थी ॥ २८ ॥ सूतजीके मरते ही सव ऋषि-मुनि हाय- 
हाय करने लगे, सबके चित्त छिन हयो गये 1 उन्होने देवाधि- 
देव भगवान्‌ बटरामजीसे कहा--्रमो । आपने यह बहत 
बड़ा अधमं किया ॥ २९ ॥ यदुवंशरिरोमणे ! सूतजीको 
हमी रोगन ब्राह्मणोचित आसनपर बेठाया था ओर 
जबतक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तवतकके च्य 
उन्दं शारीर्कि क्से रहित आयु भी दे दी थी ॥२०] 
आपने अनजानमे यह एसा काम कर दिया, जो ब्रह्म 
हत्याके समान है । हमगोग यह मानते है कि आप 
योगेश्वर है, वेद मी आपपर शसन न्धी कर सकता । 
फिर भी आपसे यह प्रायना है कि आपका अवतार 
तः ५ लोगोंको पवित्र करनेके च्वि इभा है; यदि आप किसीकी ` 
यद्यत्‌ त्यायाः पावनं खक्रपावन । रर - चास .. 
चरिष्यति भर्वो्टोकसंग्रदोऽनन्यचोदित्‌ः ॥३२ प्रायश्चित्त कर्‌ ठगो तो इससे रोर्गोको बहत शिक्षा ~ ४ 

मिली ॥ २१-३२ ॥ य 
श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ बररामने कदा- मै रोगको शिक्षा: त 8 ट थ 


कंस्य  बधनिर्वेशं लोकालुग्रहकाम्यया । 


९९ 


ऋवेर्भगवतो भूत्वा शिष्योऽधीस्य बहूनि च । 
















सेतिहासपुराणानि धरमंशान्नाणि सवंशषः ॥२५५॥ 


॥ ॥ 1, 
(4५ # 1 द" थ 
५ + # „2 ^ 


अदान्तस्याविनीतखय वथा पण्डितमानिनः । 
न गुणाय भवन्ति स नटस्येवाजितास्मनः ॥२६॥ 


एतदर्थ हि लोकेऽसिन्नवतारो मया कृतः । 


कैन १३. 


व्या मे धर्मभ्भेजिनस्ते हि पातकिनोऽधिकाः 1२७} 
एतावदुक्त्वा भगवान्‌ निवत्तोऽसद्वधादपि । 


भावित्वाच इशाग्रेण करस्थेनाहनत्‌ प्रथ; 1\२८1 

















हाहेति षादिनः सवे थनयः खिनमानसाः । 

उचुः संकषंणं देवमधमेस्ते कतः प्रभो ॥२९॥ 

अख ब्रह्मानं दत्तमसाभियंदुनन्दन । 

आयुश्वात्माछ्खमं तावद्‌ यावत्‌ सत्रं समाप्यते ।॥२३०॥ 
र प 

अजानतंवाचरितस्ववया बह्मवधाो यथा । 


योगेश्वरस्य भवती नाम्नायोऽपि नियामकः ॥२३१॥ 













प्रायश्चित्त अवस्य कर्णा, अतः इसके 
्रेणीका जो प्रायश्चित्त हो, आपलोग उका विधान 


। ह ॥ १ "(= +> " 2 ~व टः 
(- व अ = + 


च ) $ 
= 4 + 
# च ५ ि 4 <“ हि । ४ ॥ "क = न ॥ त 
ऽर 4 ४ = = क = क २ = ५५ ‡ 
+ भ 5. ५ वि~ ५ न न 
> कीः [1 ॥ भ्न ता, १? रे ‡ ४१ ॐ छ 
[ [१ क, ~ = कु ६ ॥8 + £ स १ = 
"ऋ य # (1 ॥ कः ^ क 4 ॥॥ 
¶ १३. । = =. (य | ४ । 1 
| ~ म "क 0, ६ 
"$ > = ह ॥ । नक ॥ 
त्र 1; न ५ 







नियमः प्रथमे कर्ये यावान्‌ स तु बिधीयताम्‌॥३३॥ 


नय न. च + क ~ 


त = 


क 
दुनु. श > 


। + "तन्मम 
श: 
"कषकः ` कक 





~| । । ततः पर्वण्युपाडतते भवण्डः पांडुवर्षणः । __ | भनेपर बहा भ्यकए ० --- -------- 


क ~ = 
ति ब्र - - ~ 
कै 4 = ऋ 
= 


६०८ श्रीमद्भागवतं | अ० ५९ 


आनः साया १८ को. नः? कका चान क मति कः = दि शा क 9. = = क त ऋ काः राका ` कका 9 कः क ~ क जा == = 59 8 
"मी भीम मी म मोम 











जः = चवा ~ = योः, जर उकः स+ क = ~ ककत 
ए कि 














दीषंमायुरबतेतस्य सत्वभिन्द्रियसेव च । कीजिये ॥ ३३ ॥ आपठेग इस सनको च्वी आधु. 

नर, इन्द्रिय -शक्ति आदि जो कुछ भी देना चाहते हो, 

आशापितं यत्तद्‌ श्रूत साधये योगमायया ॥३४॥ इदे वतला दीजिवे; भै अपने योगवलसे सव बु 

; सम्पन्न क्रिये देता हँ ॥ ३२४ ॥ 

ऋषय ऊचुः | ऋषिर्याने कहा-- वल्रामजी † भाप रेसा को 

वि रसादमेव | उपाय कीजिये, जिक्तसे आपका राख, पराक्रम ओर इनकी 

अल्ल्य तव तीयंस सृत्योरसाक्रमेव च । | यु मी वयन हो भौर हमलोनोनि जहे जो बलान 
यथा भवेद्‌ वचः सत्यं तथा राम विधीयताम्‌ ॥२५५} दिया था वह भी सत्य हो जाय ॥ ३५ ॥ 

श्रीभगवानुवाच | भगवान्‌ वलरासने कदा ऋषयो ! वेदोका रसा 

| कहना है कि आत्मा ही पुरक ख्यमें उत्पन होता है । 

इसव्यि रोमहष॑णकरे स्थानपर उनका पुत्र आपलोगोको 

पुरार्णोकी कथा घुनायेगा । उसे मै अपनी शक्तिसे 





आत्मा वे पुत्र उत्पन्न इति वेदायुश्ाघनम्‌ । 


तसादस्य भवेद्‌ वक्ता आयुरिन्द्रियसत्चवान्‌ ।।३६॥ | दीधायु, ₹न्दियशछि आर वल दथ दत द ॥ ३६ ॥ 
| ऋषियो } इसके अतिरिक्त आपटोग ओर जो कुछ भा 


किं षः कामो युनिशरेष्ठा ब्रूताहं सरवाण्यथ । | चाहते हो, दुक्षसे किये । ये आपव्येगोकी इच्छ परणं 
। कल्गा । अनजान सुञ्चसे जो अपराध हो गया है, 


अजानतस्त्वपचितिं तथा मे चिन्त्यतां बुधाः ॥३७॥ , उसक्ता प्रायश्चिच भी आपलेन सोच-विचारकर वतसे; 
- । | क्योकि आपलोग इस विषये विद्धान्‌ है ॥ ३७ ॥ 


कषय ऊचुः | पषि्योने कहा-- बटरामजी | इत्वखका पुत्र 
बस्वर नामका एक भयंकर दानव है । वहं प्रत्येक पर्व 
इस्वरुख सुतो धारो बस्वलो नाम दानवः । पर यहा आ परचता है ओर हमारे इस ॒सत्रको दूषित 


पयति ~ > पर कर देता ह ॥ ३८ ॥ यदुनन्दन । बह यहां भाक्‌ 
याति च्‌ १ त्र ट 0 ध ८ = ७ ¢ 

9 ध र त्यि पचा प्रव् ॥९८॥ पीन, खून, विष्ठा, मूत्त, शराब ओर सांसतकी वर्षा कने 

त पाप जह दाशा तन्नः छश्रुपण परम्‌ लगता है । अप उक्त पापीको मारे ड।ध्यि । हमलोगोकी 

यह बहत बड़ी सेवा हयोगी ॥ ३९ ॥ इसके बाद अप 


गितविष्स्जरामांसाभिवपिंण मि त 
पूयरोणितविण्स॒व्र्रमांसाभिवर्पिणम्‌ ॥२९॥ एकामविचसे वीेमिं स्नान करते इए नट गीती 


ततश्च भारतं वपं परीत्य सुसमाहितः । तकः भारतव्धकी परिमा करते इए विचरण कौनिये | 
चरित्वा ढादच्च मासांस्तीधंस्नायी विङद्धयबे ॥४०॥ इससे आपकी हद्धि हो जायगी ॥ ४० ॥ 
-----<=-€ॐ->----- 


इतिं श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तएर्थ 
बढदेवचसिन्नि बल्वच्वधोपक्रभो नामाष्टस्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥ 
- "भदस । 
अथेकोनार्शातितमोऽध्यायः 
बल्वलका उद्धार अर बरखुरामजीकी तीथयाजा । 
श्रीक उवाच श्रीद्युकदेवजी कते दै--परीक्ित्‌ । पक्ता | 
| आनेपर बड़ा भयंकर भधड चलने ठ्गा ।  धूथ्की 








अ० ७९ | 








=== 
भीभो गायुरभूद्‌ राजस्‌ पूयगन्धस्तुं सबक; ।॥ १॥ , ने खी ओर चारो ओरसे पीवक्गी दुगन्ध अनि त्री 
व विनिमितम्‌ ॥ १॥ इसके वाद यक्गरालमं वल्क दानवने 
ततोऽमेध्यमय वषं बस्धलेन षि मलमूत्र आदि अपत्रित्र वस्तुर्थोकी व्र की । तदनन्तर्‌ 
नि हाथमं त्रिशूट व्यि वह खयं दिखायी पड़ा॥२॥ 
अभवद्‌ यज्ञशासायां सोऽन्वच्इ्यत श्रलश्क्‌ ॥ २ ॥ | उल्का डील-डौल वहत वड़ा था, देका जान पड़ता 
मानो देटका-देर कालि इक्डा कर दिया गया दहो। 
उसकी चोटी ओर दादी.-मूछ तपे इए तेविके समान वल- 
तपतताभ्रहिखादमश्चं॑ द्रो इटीसुखम्‌ 1 ३ ॥ | यक था । बड़ी-बड़ी द द ओर मौँहोके कारण उस्तका 
् मुंह वड़ा भयावना च्णता थ | उसे देखकर भगवान्‌ 
सार मुस्र रामः परसेन्यरिदारणम्‌ | बलराम जने दा्च-पेनाकी कुदी करनेवाठे मूसक ओर 
दैव्योको चीर-फाद डालनेकठे हय्का स्मएण किया । 
हलं च देत्यदमनं ते तूणंम्ुपतसखतुः ॥ % || | उनके स्मरण करते ही बे दोनों श्च तुरत वर्ह आ 
पचे ॥ ३-४ ॥ बल्रामजीने आकाश्चमे विचरनेवाखे 
तमाछृष्य हराग्रेण बल्वलं गगनेचरम्‌ 1 वल्ल दैत्यको अपने हव्ये अगे भागसे खींचकर उख 
्रह्मद्रोदीके रपर वड़े क्रोधसे एक मूम्तल कसकर ्‌ 
जपराया, जिससे उसका कलाट फट गया ओर वह खून ` 
उगक्ता तथा आर्तलरसे चिल्छता हआ धरतीपर गिर ` 
पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे वज्नकी चोट खाकर गे आदिसे 
य॒ञचन्नार्वखरं शोको यथा वजरहतोऽरुणः ॥ & । | जर इअ कोई पक्षाङ गिर पड़ा हो ॥ ५.६ ॥ नेमिंषा- ` 
- रण्यवाक्तषी मडामाग्यवान्‌ सुनियोने वल्रापजीकी 
स्तुति की, उन्हे कभी न व्यथं होनेवाछे आङीवाद दिये 
ओर जैसे देवतालोंग देवराज न््रका अमिधेक करते है, 
अभ्यपिश्वन्‌ महाभागा इत्रष्नं विबुधा यथा ।। ७॥ | वैसे दी उनका अभिक ज्ञा ॥ ७ ॥ इसके ऋद्‌ 
| ऋषिरयोनि बल्रामजीको दिभ्य वच्च ओर दिव्य आभूषण । 
दिये तथा एक रेसी वैजयन्ती माका भी दी, जो सोन्दये- 8 
ऋ 


तं विलोक्य शृहत्कायं भिन्नाञ्ञनचयोपमम्‌ । 


॒सलेनाहनत्‌ कद्ध सू्ध्नि व्रहमद्रूदं बरः ।॥ ५॥ 


सोऽपतद्‌ शुवि निर्भिन्नललाटोऽखक्‌ सशरतखजन्‌ । 


संस्त॒त्य श्ुनयो रामं प्रयुज्यावितथाशिषः । 





। वैजयन्तीं ददुमालां श्रीधामाम्लानपङ्जाम्‌ । 





का आश्रय रवं कमी न सुर्ानेत्राठे कमर्करे पुष्पोपते युक्त 
रामाथ वाससी दिव्ये दिव्यान्याभरणानि च। ८ ॥ | है ॥ ८ ॥ 
अथ तरभ्यनज्ञातः कोशिकीमेत्य ब्राह्मणे; । तदनन्तर नैमिषारण्यवासी ऋषियोसे विदा हो श 
उनके आज्ञानुसार बलराम जी ब्राह्मणोके साथ कौशिकी = 
स्नात्वा सरोबरमगाद यतः सरयुरासबत्‌ ॥ ९ ॥ | नदीके तटप्र ये । वद स्नान कएके वे उस सरेकएयर 
गये, जैसे सरयू नदी निकठी है ॥ ९ ॥ बहस 
 अचस्ोतेन प्रु ॑प्रयागय॒पगम्य सः सरयूके किनारे-विनारे चने तो, किर उसे छोर 
वि | प्रयाग आये; ओर वह स्नान तथ। देवता, ऋषिं एवं 
स्नात्वा संतप्यं देवादीन्‌ जगाम पुलदा्मम्‌। १०] | पिरका तपैण करके वहसि प्रम गये ॥ १० ॥ 


| ;* छक 3 + । १० अ | र रसयन्‌ । 


॥ 
ह 





"चः 












= क भरा स० खं> २.७ 
| सि. ~+ 


^ 


। च 
9, 
> 
+ + 
न 
ह न 
च = क 7 
~ 
५ 4 
क > 
(ऋ 
१ 
3 ऋ 
कः ।, 
, 
5 
४ र 
५ 
5 + 
# १ 
ऋं 
क 
त क्छ 
= 
¢ > 
[= 
> र 
#१ 
५ 
®= 
-+ 
(क) 
+ ; 


६, 

ए 
ज प 
~> ‰& - 
| + या 
बि = 
न्क +| 
अ, > 4 
2 {९4. 
+ 
प 


। # | > - 
# 
१५ 





+ = 
॥. 
ै 


== क ऋद्खी ° ~ .* ~ ‡ व 
(भ "सा 
के ् # # त क 
शि क, 1 1 1 8 


६१० श्रीमद्भागवत [ अ० ५९ 








जि ऋक = 


गोमतीं गण्डकीं स्नात्वा विपाशां शोण आष्ठतः। 





गयां गत्वा पितरनिष्र॒ गङ्गासागरसङ्गमे ॥११॥ 


उपस्पृश्य महेन्दराद्रो रामं दषटराभिवा् च । 
सप्तगोदावरीं वेणां पम्पां भीपरथीं ततः ॥१२॥। | 


1 
श्रीरीलं $ = | 


स्कन्दं षट ययो रामः श्रीशेर गिरिशाल्यम्‌। 
द्रविडेषु महापुण्यं दष्टं वेङ्टं प्रथुः ।॥१३॥। 
कामकोष्णीं पुरीं काश्वीं कावेरीं च सरिढराभ्‌। 
श्रीरङ्गाख्यं महापुण्यं यत्र संनिहितो हरि; ।॥१४ । 
चछषभाद्रिं हरेः कषत्रं दक्षिणां मथुरां तथा । 
साणुद्र सेतमगमन्महापातकनाशनम्‌ ॥१५। 
तत्रायुतमदाद्‌ धेसुत्राहमणेम्यो हरायुधः । 
छृतमालां ताम्रपर्णीं मर्यं च इलाचलम्‌ ॥१६॥ 
तत्रापस्त्यं समाक्षीनं नमस्दछ्रत्याभिवा् च । 
योजितस्तेन चाशीर्भिरलज्ञातो गरोऽर्णवम्‌ । 
द्िणं तत्र कन्याख्यां दुर्गां देवीं ददश सः ॥१७॥ 


तत्‌, फाल्यनमास्ाय पच्वाप्सरसय॒त्तमम्‌ । 


विष्णुः संनिदितो यत्र स्नात्वास्पर्शद्‌ गवाधुतम्‌१८ 


ततोऽभिव्न्य भगवान्‌ केरलांसत त्रिगर्तकान्‌। 
मोकर्णाख्यं पिवेत सांनिध्यं यत्र धूजंटेः ॥१९॥ 
आयां दवेपायनीं दृष शर्पारकमगाद्‌ बलः । 
तापीं पयोष्णीं निकिन््याघुपस्गव्याथ दण्डकम्‌।२०। | 





तः यः दः भि भ त = ज य जि ज का = अ गिव ायारयायया 






---- म ` भ 
न क 


वहसे गण्डकी; गोपती तथा विपाशा नदियों स्नान 
करके वे सोननदके तटपर गये ओर बहोँ स्नान क्रिया। 
इसके वाद गथामे जाकार पितत्तँका वुदेवजीके आङ्ञा- 


 यस्ार प्रूजन-यनन क्रिया । फिर गङ्घा-सागर-संगमप््‌ गये; 
वहां भी रनान आदि तीर्थ -क््यो से निवृत होकर महेनदर 


पवतपर गये । बहौ परञ्यरायजीका दर्शन ओर अभिवादन 
किया | तदनन्तर सप्तगोदाक्री, वेणा, पन्या ओर भीमरथी 
आदिमे स्नान करते द्र खामि-कार्तिकका दर्शन करने ग्ये 
तथा वर्हासे महदेवजीके निवास-स्यान श्रीरौटपर्‌ पहवे । 
सके बाद भमवान्‌ क्ठरामने द्रविड देशके परम पुण्यभय 
स्थान वेङ्कयचल (बालाजी) का दर्शन करिया अर वहसि 
वे कामाक्षी-- रिषकाश्ची, विष्णुकाच्ची होते हए तथा श्रेष्ठ 
नदी कावेीमं स्नान करते हृए पुण्यमय श्रीरगक्षेत्रमे षषैचे। 
श्रीरगक्षत्रमे मगवान्‌ विष्णु सदा विराजमान रहते है 
॥ ११-१४॥ वर्हे उन्होने विष्णुमगवान्‌के क्षत्र ऋषम 
पत, दक्षिण मथुरा तथा वडे-वड़े महापापोको न्ट कमे. 
वाले सेतुत्न्धकी यात्रा की ॥ १५॥ व्यौ बट्रामजीने 
ब्राह्मणोको दस हजार गोरं दान कीं । किर वरस कृतमाव्र 
ओर ताब्रपर्णी नदियों स्नान कते इए वे मल्यपूर्वतपर 
गये । व्ह पवंत सात कुच्पर्धतोमेसे एकं है ॥ १ ६॥ वरहौपर 
विराजमान अगस्त्य मुनिको उन्होने नमस्कार ओर अभि- 
वादन किया ¦ अगघ््यजीसे आशीवांद ओर अनमति प्राप्त 
करके वलरामजीने दक्षिण समुद्की यात्रा की । वौ उन्होने 
दुगादेधीका कन्याङ्कमादीके रूपमे दशान किया ॥ १७॥ 
इसके बाद वे फाद्णुन तीथ-- अनन्तश्चयन क्षत्रमें गये 
ओर वके सवश्रे्ठ पन्चाप्सरस तीम स्नान किया | 
उस तीथमें सव्रदा विष्णुभगकन्‌का सानिध्य रहता ह | 
वहाँ बल्रामजीने दस हजार गों दान कीं॥ १८॥ 


अव भगवान्‌ बलराम व्षंसे चल्कर केएल भौर 
त्रिगतं देदोमे होर मगवान्‌ शंकरे क्षत्र गोकणतीथमं 
आये । वयँ सदा-सर्बदा भगवान्‌ शंकर विराजमान रहते 
है ॥ १९ ॥ वरहोसि जठ्से धिरे द्वीपे निवास कलै 
वाढी आयदिवीका दशन स गये ओर फिर उस द्वीपसे 


क्षेत्री यात्रा की, इसके बाद तापी, 
स्नान करके वे दण्डका. 


चर्कर पारक ¢ 
पयोष्णी ओर निर्विषया नदियोमं स्न 





। 4 # ऋ क क 3. 


| 

॥ 
शं » 

= 
= 9 


नं तद्राक्य अगहतुवद्ध 


अ० ७९ | 


प्रविश्य रेवामगसद्‌ यत्र॒ माहिष्मती परी । 

















मजुतीथञ्पसश्य प्रभाम पुनरागमत्‌ ॥२१॥ 
श्रुत्वा द्विजः कथ्यमातं इुरुपाण्डवसंयुगे । 
सवेराजन्यनिधनं भारं सेने हतं शवः \\२२॥ 
स॒भीमहुर्योधनयोगेदास्यां युध्यतोश्ये 
यारयिष्यन्‌ विन्नं जगाम यदुनन्दनः ॥।२३॥ 
युधिष्ठिरस्तु तं दद्रा यमो कृष्णाैनावपि । 


अभिवाच्याभवंस्तूष्णीं किंविवक्षुरिदागदः ।॥२४। 


गदापाणी उभो च्छ्रा संरब्धौ चिजयेपिणौ । 
मण्डलानि विचित्राणि चरन्ताविदमन्रवीत्‌ ।३५॥ 
युवां त॒स्यबलो वीरो हे शजन्‌ हे वृकोदर । 
णु 0 9 ०५ न्दे, 9 (५ 
एक प्राणाधक मन्ये उतेकं शिक्षयाधिकम्‌ ॥२६॥ 


को 


तसादेकतरस्येह युवयोः समधीर्ययोः । 
न ठक््यते जयोऽन्यो घा विरमत्वफ़लो रणः ॥२७।। 
पाथवत्‌ | 


अनुखरन्तावन्योन्यं दुरुक्तं॑दुष्ठृतानि च ॥\२८॥ 


दिष्टं तदनुमन्वानो रामो हाखतीं ययो । 


उग्रषेनादिभिः प्रीतेज्ञातिभिः रष्पागतः ॥(२९॥ 





दशम स्कन्ध 





९११ 


[षी 








एण्य्मे आये ॥ २०॥ वहौँ होकर वे नर्मदाजीके 
तटपर गये । परीक्षित्‌ । इस पवित्र नदीके तटपर ही 
माहिष्मतीपुरी है । वर्ह मनुतीर्थमे स्नान करक वे फिर 
प्रभास॒क्षेत्रमं चले आये ॥ २१ ॥ वहीं उनहोनि ब्राहमणोसे 
सुना कि कोर ओर पाण्डवोँके युद्धम अधिकां क्षत्िर्यो- 
का सहार हो गया । उन्होने पेक्षा अनुभत्र किया कि 
अव पृथ्वीका बहुत-सा भार उतर गया ॥ २२ ॥ जिस 
दिन रणभूमिं भीमसेन ओर दुर्योधन गदायुद्ध कर रे 
थे, उसी दिन बल्रामजी उन्हं रोकनेके च्वि कुरक्षत्र 
जा प्हैचे ॥ २३ ॥ 

महाराज युधिष्टिर, नकु, सहदेव, भगवान्‌ श्रीङ्ष्ण 
ओर अञ्युनने बल्रामजीको देखकर प्रणाम किया तथा 
चुप हो रषे । वे उरते हए मन-ही-मन सोचने को कि 
ये न जाने क्या कहनेके व्यि यँ पधरारे है १॥ २४॥ 
उस समय भीमसेन ओर दुर्योधन दोनों ही हाथमे गदा 
केकर एकःदूसरेको जीतनेके य्य क्रोधसे भरकर मोति- 
भौतिके पेते वद्र रहै थे । उन्हें देखकर वल्रामजीने 
कहा--}! २५॥ राजा दुर्योधन ओर भीमसेन ! तुम 
दोनों वीर हो । तुम दोनोँमे बल-पौर्ष ओ समान है । 
नै रेसा समञ्ञता द करि भीमसेनम बरु अधिक है ओर 
दुर्योधनने गदायुद्धमे शिक्षा अधिक पायी है ।॥२६॥ इसव्थय 
तुमलोगों -जेसे समान वल्शाव्वोमे किसी रककी जय या 
पराजय नहीं होती दीखती । अतः तुमखोग व्यथंकां 
यद्ध॒ मत करो, अव इसे वेद कर दोः ॥ २७ ॥ 
परीश्षित्‌ | बलरामजीकी बात दोनोके च्य हितकर थी । 
परंतु उन दोनोँका वैरभाव इतना दृदमूल हो गया या 
कि उनन्ोने क्छरामजीकी वात न मानी । वे एकलदृष्रेकी 
कटु वाणी ओर दुभ्यवहारोका स्मरण करके उन्मत्त-से 
हो रहे ये ॥ २८ ॥ भगवान्‌ बल्रामजीने निश्चय क्षिया 
करि इनका प्रारब्ध पेसा ही है; इसब्थिये उसके सम्बन्धमें 
विशेष आग्रह न करके वे द्वारका लोट गये । दारकामे 
उग्रसेन आदि गुरुजनं तथा अन्य सम्बन्धर्योने बडे 
प्रेमसे आगे आकषर उनका खाण्त कधिया ॥२९॥ 
वहसे बट्रामजी फिर नैमिषारण्य क्षेत्रमे गये 
वहा ऋषियोने विरोधभावसे--युद्धादिसे निद्त्त 
बठरामजीके द्वारा बडे प्रेमसे सव प्रकारके यज्ञ कराये । ` 






























श "= 


श्रीमद्भागक् 


| अ० ण 


=-= 





क्रत्वङ्ग क्रतुभिः सर्वैिदत्ताखिरषिग्रहस्‌ ॥२०॥ 
तेभ्यो विश्चद्धविज्ञानं भगवान्‌ व्यतरद्‌ विथुः। 
येनेवात्मन्यदो विश्वमात्मानं विश्वगं विदुः ॥२१॥ 
खषटन्याचभरथस्नातों ज्ञातिबन्धुसुहृदबतः । 
रेजे खज्योरस्नयेवेनदुः सुवासाः सुष्ट्वलडकृतः। २२ 
इटग्विधान्यसंख्यानि बरख बरुशालिनः । 
अनन्तस्याप्रमेयसय मायामत्य॑स्य संन्ति हि ॥२३॥ 
योऽलुखरेत रामस्य कमौष्यद्धतकर्मणः । 


सायं भ्रातरनन्तख विष्णोः स दयितो भवेत्‌ ॥३४॥ 


परीक्षित्‌ | सच प्ूछछो तो नितने भी यज्ञ है वे बल्शम- 
जीके अंग हयी हँ । इसव्ये उनका यह यज्ञानुष्ठान ठोक- 
संम्रहके च्वि ही था ॥२०॥ सव॑समर्थं भगवान्‌ बलगमने 
उन ऋष्रियोको विशुद्ध त्छज्ञानका उपदेश क्रिया, जिक्षसे 
वे तेग इस सम्पूणं विश्वको अपने-आप ओर अपने- 
आपको सारे विश्रमे अनुभव कले लगे ॥ ३१ ॥ इतके 
नाद बल्रामजीने अपनी पत्नी रतीके साथ यज्ञान्त-स्नान 
किया ओर घुन्दर-घुन्दर वञ्ज तथा आभूषण पहनकर 
अपने माई-बन्धु तथा खजन-्भ्बन्धियोके साथ इस प्रकार 
रोभायमान इए, जसे अपनी चन्द्रिका एवं नक्षत्रेकि 
साथ चन्द्रदेव होते है ॥ ३२ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
वराम खयं अनन्त हँ । उनका खर्प मन ओर वाणी- 
के परे है । उन्होने ठीत्मके ष्ि ही यह मनुर््पोका- 
सा दारी ग्रहण करिया है | उन बलशाढी बल्ामजीके 
एेसे-एेसे चस््रंकी गिनती भी नदीं की जा सकती ।३३। 
जो पुङ्ष अनन्त, सवेऽयापक. अद्धतकर्मा भावान्‌ 
बलरामजीके चरसिरंका सायं-प्रातः स्मरण करता है, वह 
भगवान्‌क्रा अत्यन्त प्रिय ह्यो जाता है ॥ ३४ ॥ 


भ "वव्न्कब्यद 


इंति श्रीमद्धागवते महापुराणे 


पारमहंस्यां सष्टितायां द दामश्कन्धे 


वल्देवतीर्थयान्नीनिदूपणं नामेकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ 





अथाशीतितमोऽध्यायः 


श्रीरुष्णके दारा खदामाजीका स्दागत 


राजोवाच 
भगवन्‌ यानि चान्यानि थ्कन्दस् महात्मनः । 
वीर्याण्यनन्तवीर्यखय श्रोतुमिच्छामहे प्रभो ॥ १॥ 


को चु त्वा करद्‌ बह्न्य॒त्तमश्छो सत्कथाः । 


विरमेत विदेषज्ञो विषण्णः काममार्गणै; ॥ २ ॥ | का श्रत्रण करके भी उनसे विषुख होना चद्टिगा ॥ २॥ 


१. तराया प्रटुसप्ततितमो । २. मह्रक्म० । 


५ चक्ति ज, ` 
# ॥ 


| राजञा परीक्षित्‌ने पूा--मागवन्‌ | प्रेम ओर पुक्तिे 


| दाता पशए्रह्म परमात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्णकी शक्ति अनन्त 


है | इमे उनकी माधुर्यं ओर ेश्वयसे भरी टीका भी 
अनन्त दहै | अत्र हम उनकी दप्तरी टी, 
जिनका वर्णन आपने अत्रतक नदीं किया है, घुनना ` 
चाहते है ॥ १ ॥ ब्रह्मन्‌ ! यह्व॒ जीव विष-सुखको ` 
खोजते-खोजते अत्यन्त दुखी हयो गया है । वे बाणक्री 
तरह इसके चित्तम चुभते रहते है । एेसी स्थितिमे देक 
कौन-सा रस्तिक- रक्षका विंरोषक्ञ पुरुष इागा, जो ब 
बाट पवित्रकीर्तिं भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मङ्गलमथी लील्यो 














अ० ८० | 


। 
ता 
जि = कः चि = जक क 
भ ऋक 


सा वाग्‌ यया तख गुणान्‌ गृणीते 

करो च तत्कर्मकरौ मनश । 
सरेद्‌ वसन्तं स्थिरजङ्कमेषु 

शृणोति तत्पुण्यशथाः स कर्ण; ॥ ३॥ 
रिरस्त॒ तस्याभयलिङ्गमानंमे- 
तदेव यत्‌ परयति तद्वि चक्षुः | 
तज्ञनानां 


अङ्गानि विष्णोरथ 


पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम्‌ ।\ ७॥ 
सूत उवाच 


विष्णुरातेन सम्पृष्टो भगवान्‌ बादरायणिः । 
वाषुदेवे भगवति निमग्नहृदयोऽत्रवीत्‌ ॥ ५ ॥। 
श्रीद्युक् उवाच 

कृष्णयखासीत्‌ सखा किद्‌ त्राक्मणो ब्रह्मवित्तमः । 
विरक्त इन्द्रियाथेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ॥ ६ ॥ 
यच्च्छयोपयपन्नेन वतमानो गृहाश्रमी । 

तस्य भायां कचेरंख क्षुरक्षामा च तथाविधा ॥ ७॥ 
पतिव्रता परति प्राह म्खायता वदनेन सा| 
दरिद्र सीदमाना सा वेपमानाभिणम्य च ॥ ८ ॥ 
मयु ब्रह्मन्‌ भगवतः खखा साक्षच्ड्रियः पतिः । 
ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च भगवान्‌ सात्वतर्षभः ॥ ९॥ 
तयुहि महाभाग साधूनां च परायणम्‌ । 
दाति द्रविणं भूरि सीदते ते इडम्बिने ॥१०॥। 


आस्तेऽधुना द्वाखत्यां भो जवृष्णण्यन्धकेधरः । 
१. नं तदेव । २, खा च° | 


7 ^, ह्र, = "क. (क्क य = > 


दशम्‌ स्कन्ध 








न ५ ए च 


६१ 








जो वाणी भगवान्‌के गुर्णोका गान करती है, बही सुची 
वाणी है । वेदी क्थ सच्चेद्ाय है, जो भगवानक्री 
सेवाने व्यि काम करते ह । वही मन सच्चा मनद, 


जो चराचर प्राणियोम निवाक्त करनेव्राछे भगवानूका 


स्मरण कशता है ओर वे ही कान वास्तवमें कान कहने योग्य 
हं, जो भगवान्‌की पुण्यमयी कथार्ओक। श्रबण करते ई।३। 
वही सिर सिर है, जो चशचर जगत्‌को भगवान्‌की चट- 
अचल प्रतिमा समञ्चकर्‌ नमस्कार करता दहै; ओर जो 
सवत्र भगवद्नि्रहका दरंन करते है, वे ह्वी नेत्र वास्तवरने 
नेत्र है । शरीरके जो अङ्ग भगवान्‌ ओर उनके भक्तोकि 
चरणोदकका सेवन करते हैँ, वे ही अङ्ग वास्तवर्मे अङ्ग 
हे; सच प्रथय तो उन्हीका होना सकढ है ॥ ¢ ॥ 

सस्त जी कहते ह--रोनकादि ऋषयो । जब राजा 
परीक्षित्‌ने इस प्रकार प्ररन किया, तब भगवान्‌ श्रीद्यकदेव- 
जीका हृदय भगवान्‌ श्रीकृष्णे ही तच्खीन हो गया । 
उन्होने परीक्षिवसे इस प्रकार कटा ॥ ५ ॥ 

धरीश्चकदेवजीने कटा-- परीक्षित्‌ | एक ब्राह्मण 
भगवान्‌ श्रीकृष्णके पए्म मित्र थे | वे बड़े ब्रहज्ञानी, ` 
विषर्योसे विरक्त, शान्तचित्त ओर जितेन्रिय ये ॥ ६ ॥ ` 
वे गृहस्थ होनेपर भी किंसी प्रकारका सप्रह-पसिह न 
रखकर प्रार्यके अनुसार जो कुछ मिरु जाता, उसीम 
संत्॒ट॒ रहते थे | उनके व्खतो फटे-पुराने थे ही, | 
उनकी पत्नीके भी वैसे ही थे । वह भी अपने पतिके १ 
समान ही भूखसे दुबटी हो रही थी ॥ 9 ॥ शक दिन 
दद्धिताकी प्रतिमूति दुःखिनी पतित्रता भूखके मारे ` 
कोँपती हई अपने पतिदेके पास गयी भर पुरञये ` 
हए सहसे बोी--। ८ ॥ (भगवन्‌ । साक्षात्‌ ल्दमीपति 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण आपके सखा हं । वें भक्तवाञ्छाक्तपतरु, ` 
रारणागतवरत्सक ओर त्राहणेके परम भक्त ह ॥ ९ ॥ ` 
पएम माग्परान्‌ आयेपुत्र ! बे साधु-संतेके, सत्पुषषकि ` 
एकमात्र आश्रय है । आप उनके परस जाथे । जब 
वे जानेगे किं आप वुदटुम्बी हैँ भोर अलके बिना दुखी ` 
हो रहे है, तो वे आपको बहुत-सा धन देगे ॥ १० 1. 
आजकल वे भोज, वृष्णि ओर अन्धकवंशी यादवोके 
स्वामीके रूपमे द्रारकमे दही निबासु 


























| 4 ९९४ श्रीमद्भागवत | अ० ८० 
| । न नच्च्यच्च्व्य्य्व्व्य्य्व्व्य्व्व्व्य्व्यचचच्यवव व्यय च्च्प्य--------------------- 
॥ ( ` सरतः पादकमरमात्मानमपि यच्छति । इतने उदार हं किं जो उनके चरणकमर्छका स्मरण काते 


है, उन प्रेमी भक्लोको वे अपने-आपतकका दान कर 
डालते है । ेती स्ितिमे जगद्गु भगवान्‌ श्रकरष्ण 
ताद : थित) | अपने भक्तोकरो यदि धन ओौर वरिषय-सुख, जो अव्यत्त 
त एन भायया वित्रा बहुशः प्रथत बदु । वज्छनीय नही है, देदे, तो इमे आश्वर्यदी कोनी 
ब्रातं ॥ ११॥ इस प्रकार जव उन ब्राह्मणदेवताकी 
पत्नीने अपने पतिदेवसे कई बार बडी नग्रतासे प्राथेना 
इति सचिन्त्य मनसा गमनाय मति दधे । की, तव उन्होने सोचा कि शधनकरी तौ कोई बात नहीं 

है; प्रतु भगवान्‌ श्रीक्ष्णकता दर्शन हयो जायगा, यह 

अप्यस्त्युपायनं किञ्चिद्‌ गृहे कर्याणि दीयताम्‌ १३] | तो जीवनका वहत वडा टाम हैः | १२ ॥ यदी विचर 

करके उन्होने जनेका निश्चय करिया जीर अपनी पत्नीसे 

ह | याचित्वा चतुरो य॒ष्टीन्‌ विप्रान्‌ परथुकतण्डुलान्‌ ! | ब्रेले-- "कल्याणी ! धरये ठु भेट देनेयोग्य क्तु मी 
$. (£ रलण्डेन < हैक्या १ यदि दोतोदेदोः॥ १३६ ॥ तत्र उस 
| चेरुखण्डेन तान्‌ बद्ध्वा भत्र प्रादादुपायनम्‌ ॥१७॥ | तराहमणीने पास-थडो्के व्रादमणोके धरये चार स्री 
चिउड़ मौगकर एक कपडमे बोध दिये ओर भगवान्‌की 


जित कतः कतः ` आक द ४ 
(म ग जज = ५ 
~न 


किन्वथंकामान्‌ भजतो नात्यभीषटाञ्गद्गुरः।।११५ 


अयं हि परमो लाभ उत्तमर्लोकदर्दन्‌ ।\१२॥ 


| ॥ ( स तानादाय षिप्राग्यः प्रययो रकां किर । भट देनेके व्यि अपने पतिदेवको दे दिये ॥ १४॥ 
(6 ६ इसके वाद वे ब्राहमणदे्ता उन चिउ्ौको टेर द्रारका- 
॥। 1 । कृष्णस॒न्द्ञ्न्‌ मह्य कथ सादिति चिन्तयन्‌ ॥१५॥ | के व्यि चल पड़े | वे मार्गमे वह सोचते जातेये करि 


पञ्चे भगवान्‌ श्रीकृष्णे दरान कैसे प्राप्त होगे १ ॥१५॥ 

त्रीणि गुमान्यतीयाय तिसः कक्षाश्च स द्विजः। परीक्षित्‌ | दवारकाम पर्हैचनेपर बे ब्राह्मणदेवता दस्र 

ब्राह्मणोके साथ सेनिकोंकी तीन छातरनिर्यौ ओर तीन 

ञ्योदिर्थां पार्‌ करके भगवद्रमका पालन करनेवाले 
[| भ आ दरो मादनेकि दमन, न्दा १३ 

भ अत्यन्त कथिनि है, जा परे ॥ १६ ॥ उनके बीच 

| भगव्रान्‌ श्रीकृष्णका सोह ह नार रानिथोके मह ये | 

विवेशेकतमं श्रीमद्‌ ब्रह्मानन्दं गतो यथा ॥ १७) | उनसे एकम उन ब्राह्मणदेवतताने प्रवेश किया | वह 

| महक सूत्र सजा-मनाया---अत्यन्त समायुक्त था । 

उसमें प्रतेदा करते समय उन्हं रक्रा माद्धम हआ, भानौ 

तं विलोक्याच्युतो द्रात्‌ प्रियापय॑ङ्कमाय्यितः । वे त्रह्मानन्दके समुद्रम इन-उतग रदे हों ¡ ॥ १७॥ 

इस समय मगवान्‌ श्रीङकष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणी 

जके पगपर व्रिराजे हए ये । ब्राह्मण देवताको दूरसे 

ही देखकर वे हसा उह खड दए ओर उनके पास आकर 

= व बड़े आनन्दसे उन्हें अपने मुजपाशमें बोध व्या ॥१८॥ 

सख्युः प्रियसख विग्रपरङ्गपतङ्गातिनिव्रततः | प््षित्‌ ! परमानन्दस्वरूप भगवान्‌. अपने यारे सखे 

॥ ^| ब्रह्मणदेवताके अङ्ग-्पशसे अव्यन्त आनन्दित इए । 

| | 1 
= १ गुद्मानित्रीण्यती० 1 २ माश्रितः । 


बेभ्रोऽगम्यान्धकवरष्णीनां गरहेष्वच्युतधर्मिणाध्‌। १६ 


नकी ~ 
क 
किषणम्‌ छ जकः 


१19.112, 


" ऋ-न शनो भ ~ वि 


(2 
का~ 


/ ^ सहसोत्थाय चाभ्येत्य दोभ्यौ पयंग्रदीन्दा ॥१८॥ 














( ० ० | 

| इ ,१६ च ५ 
अथोपवेश्य यय॑ङ्क खयं सख्युः समदंणम्‌ । 
उपहत्याघनिञ्यासख पादां पादावनेजनीः ॥२०॥ 
अग्ररीच्छिरसा राजन्‌ भगर्वोष्टोंकपावनः । 


व्यकिब्यद्‌ दिव्यगन्धेन चन्द नागुरुङ्ङमे; ।२१॥। 


न 


धूपः 


अर्चित्याऽऽवेद्य ताम्बं गां च्‌ स्वागतसमत्रधीत्‌॥। २२ 


सरभिभिर्भित्र प्रदीपावलिभिपरंदा । 


न्रे ¢ 


कुचेलं मलिनं क्षामं दिजं धसनिरततम्‌ । 


देवी पयंचरत्‌ साक्षाच्वामरव्यजनेन वे ॥२३। 


अन्ताषरयजनो दध्र दष्णनापरुश्चतिना । 


बिखितोऽशरदतिभ्रीत्या अवधूतं सभाजितस्‌ ।२४।। 
किमनेन छतं पुण्यभवधूतेन भिक्षुणा । 
भ्रिया दीनेन लेक्ेऽसिन्‌ गर्हितेनाधमेन च ॥२५॥ 


न्दः 


योऽसो त्रिखोकणुरूणा श्री निवासेन सम्भृतः । 
पयङ्स्णां भियं हित्वा परिष्वक्तोऽग्रजो यथा।(२६॥। 
कथयाश्चक्रतुगथाः पूवां गुख्डकढे सतोः । 
आत्मनो लिता राजन्‌ करो गृह्य परस्परम्‌ ।॥ २७॥ 
श्रीभगवानुवाच 
अपि ब्रह्मन्‌ गुरुङ्राद्‌ भवता रब्धदक्षिणात्‌ । 


“ऋ समाच्त्तेन धमन भारयोटा सद्शो न वा ॥२८॥ 


द्ञ्चम स्कन्ध 
नन व्वन्नन-न-चच----------------व्य्व्----------------~ न्न 


' ट्गे ॥ १९ ॥ परीक्षित्‌ । कुछ समयकरे बादर भगत्रान्‌ 








श्रीङष्णने उन्हें ठे जाक अपने पटगपर वरटा दिया ओर 
सयं प्रूजनकी प्ामग्री खाकर उनकी एजा की | प्रिय 
परीक्षित्‌ ! भगवरान्‌ श्रीकृष्ण प्षभीको पवित्र करनेवाे 
हे; फिर भी उन्होने अपने हार्थो ब्राह्मणद्वताके पवि 
पल्ारकर उनका चरणोदक अपने सिरपर धारण किया 
ओर उनके इारीरमं चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिध्य 
गर्धोका ठेपन किया ॥ २०-२१ ॥ फिर उन्दनि वड 
आनन्दसे घुगन्धित धूप ओर दीपावक्पसे अपने मित्रकी 
आरती उतारी । इस प्रकार पूजा करके पान एवं गाय 
देकर मधुर वचनोँसे “भले पधार रेसा कहकर उनका 
सखागत किया ॥ २२ ॥ तब्राह्मणदेवता फटे-पुराने वच 
पहने हए थे । दारीर अत्यन्त मिन ओर दुव॑ था | 
देहकी सारी नसं दिखायी पड़ती थीं | खयं भगवती 
रुकिमिणी जी चवर इकर उनकी सेवा करने गीं ।२३। 
अन्तःपुरकी ज्जियां यह॒ देखकर अध्यन्त॒तव्रिस्मित हलो 
गयीं किं पवित्रकीतिं भगवान्‌ श्रीकृष्ण अतिशय प्रेते 
इस ॒मैले-कुचेले अवधूत ब्राह्मणकी पनज कर रहे 
हं | २४ ॥ वे आपसर्मे कहने क्गी~.- ईस नग-घड्ग, ¦ | 
निधन, निन्दनीय ओर निकृष्ट भिखमगेने रेसा कौन-सा 
पुण्य किण है, जिप्तसे त्रिठोकी-गुरं श्रीनिवास श्रीकृष्ण ` 
खयं इसका आदर-सत्कार कर रषे है । देखो तो सदी, ५ 
इन्होने अपने पल्गपर सेवा करतीं हई खयं रक्ष्मी- । 
रूपिणी स्क्रिमणीजीको खोडकर इस ब्राह्मणको अपने बड़ ` 
माई वक्मजीके समान इदयसे च्णाया है ।२५-२६॥ 
प्रिय परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वे ब्राह्मण दोनों 
एक-दूसरेका हाथ पकड़कर अपने पूवंजीवनकी उ 
आनन्ददायक घटनाओंका स्मरण ओर वणेन करने लग 
रुक्मे रहते समय षटिति इर धी ॥ २७॥ ` 


। 
| 
। 





भगवान्‌ भीक्ृष्णने कडा--धर्मके मर्मज्ञ ब्राह्मण- ` 
देच | गुरुदक्षिणा देकर जब आप गुरुकुरुपते लेट आये, ` 
तब आपने अपने अचुखूप जीसे विवाह किया या. 
नही १ ॥२८॥ मै जानता ह किं आपका चित्त 
गृहस्थीमे रहनेपर भी प्रायः विषय-मोगमें सक्त 



























1 ६१६ श्रीमद्भागवत [ अ० ८० 


= ------------------------------------=------------~-~-~-~-~-~-~~-~-~-~-~-~-~~--~-~- ~ 
[वि 2 1 प वि ` ¬ प क) 7 1 का 7 भः जो भको 9 कः कः.) को य क, 














नेवातिग्रीयसे विदन्‌ धनेषु विदितं हि से।॥-९ | नदींदहै। विद्रन्‌ | यह भी सुने माद्म दहै क्षि धन 
१ आदिमं भी अयक्ती कोई प्रीति नदीं है॥२९॥ 
ॐ केचित्‌ इवेन्ति कर्माणि कानैरहतचेतसः । जगत्‌ त्रिरछे ही व्येण देसे होते है, जो भगवानकी 
{ मायासे निमित विषयसम्बन्धी वासनाओंका त्याग कर 
व देते हैँ ओर चित्तम विर्योकी तनिक भी वासना न 

न्तः अतीदं बीयथाहं कोकसंग्रहम्‌ ।।३०॥ | रहनेपर भी मेरे समान केवर ्ोेवदिकषके लिये वं 
करते रहते हँ ॥ ३० ॥ ब्राह्मणिरोमणे ! क्या आपको 
उतत समयकी बात याद्‌ है, जत्र हम दोनों एक साथ 
॥ | गुरुकुले निवात करते ये । सचमुच गुरुङव्मे ही 
च | दिजातियों को अपने ज्ञात्य वस्तुका ज्ञान लता है, 
५३3 दिजो विज्ञाय विज्ञे यं तमसः पारमश्चुते ।३१॥ जिसके दारा वे अज्ञनान्धकारसे पार हो जाते हें ॥२१॥ 
मित्र | इप्त संसारम शरीरका कारण- जन्मदाता पिता 

४. भ. < प्रथम गुरु है । इसके वाद उपनयन -- संस्कार करके 
हि --स बे सत्कमेणां साश्ाद्‌ द्विजातेरिह सम्भवः । सत्कर्माकी रिक्षा देनेवाल दूसरा गुर है । बह मेरे दी समान 
पूज्य हं । तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्माको प्राप्त 
भादोऽद्ग यत्राश्रमिणां यथाह ज्ञानदो गु₹ः।।३२॥ करानेवाल्य गुरु तो मेरा खख्य दी है । वर्णाश्रमियेकिं 
। यं तीन गुरु होतेह ॥ ३२ ॥ मेरे परे मित्र] गुरुके 
खरूपमे खयं मेँ ह्व । इत जगतमे वर्णाश्रमिर्योमे जो 

मन्वथंकोविदा ब्रह्मन्‌ व्णाभ्रमवतामिह । जोग॒ अपने गुरुदेवके उपदेकानुसार अनायास ही भत 
सागर पार कलते है, वे अपने खार्थं ओर परमार्थे 

थे मया गुरुणा वाचा तरन्त्यञ्ो भवार्णवम्‌ ॥३३॥ | सच्चे जानकार दं ॥ २३ ॥ प्रि मित्र ! भँ सत्क 
आत्मा ह, सवके हृद्यमे अन्तयांमीरूपसे व्रिराजमान द| 

मे गृहश्थके धमे पञ्चमहायज्ञ आदिसे, ब्रह्मचारीके धर्म 

नाहमिव्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा| उपनयन-वेदाव्ययन आदिते, वानपरस्थीके धर्म॑तपस्यासे 
| ओर सव्र ओरसे उपरत हो जना--इक्त संन्यासीके 

1 ४. | धमसे भी उतना सतुष नहीं होता, जितना गुरुदेवकी 
(4 तप्येयं सर्धभूतात्मा गुरु्श्रषया यथा ॥३४॥ । सेवा-छशरूषासे संतष्ट होता ह ॥ ३४ ॥ 


कचिद्‌ गुरुकुले वासं बह्मन्‌ सरसि नौ यतः। 


अपि नः सयते ब्रह्मन्‌ वत्तं निवसतां गुरौ । | व्रह्मन्‌ ! जित समय हमव्मेग गुरुुख्मे निवास कर 
४: रहे थे, उस समयकी वह बात आपको याद है क्या, 
लानेके च्वि जंगल्मै भेजा था ॥ ३५ ॥ उस समय 

 - हभवेग एक धोर जग्मे गये इए थे ओर विना ऋछतु 
३ २ ‡ ¦ ही बड़ा भयंकर आधी-पानी आगयां था। अकामं 
तिवष॑मभूत्तीवं निष्डुराः स्तनयितवः ॥२९॥ अ तमी वी | २६॥ जव सूल टो 
यश्वास्तं तमघ्ता चादृता दिश्चः। | गया, चारों ओर क्घरा-दी-्अथेरा फैल गया । धरतीपर्‌ 
० 3 | < न हः 


ग 
“4 प क 5 > 
च 
०द..-५ "क 


महारण्यमपर्तौ सुमहद्‌ द्विज । 













च 
- वि ष्व 
# 4 # ५ 
न 
५ क = 
= # कवे 
क "अक 


~प . 


= 





५ > न शः 







वाष्करऋ - 


अ० ० | 


द्ञ्चम्‌ स्कन्ध 











निम्नं सूरं जरुमय न प्राज्ञायत किचन २३७] 
वयं भृशं तत्र महानिलाम्बुभि- 
निंहन्यमाना य॒हरभ्बसम्पुवे । 

दिशोऽबिदन्तोऽथ परस्परं बने 

गरदीतहस्ताः परिबभिमातुराः ॥ २३८1 
एतद्‌ बिदित्वा उदिते रो सान्दीपनिगुरूः 
अन्वेषमाणा नः लिष्यानाचार्योऽपश्यदातुरान्‌। ३९॥ 
अहो हे पुत्रका युयमसदथंऽतिदुःखिताः 
आत्मा वे प्राणिनां ्रष्ठस्तमनादत्य मत्पराः ॥४०।॥। 
एतदेव हि सच्छिष्ये; कतंग्यं गुरुनिष्कृतम्‌ । 
यद्‌ वे विशुद्धभावेन सबांथौत्मापणं गुरौ ।॥४१॥। 
त॒ष्टाऽदहं भो द्विजश्रेष्ठाः सत्याः सन्तु मनोरथाः । 
छन्दांययातयामानि भवन्त्विह परत्र च ॥४२॥ 
इत्थंबिधान्यनेकानि वसतां गुसुवेर्मघु । 


गुरोरलुग्रहेणेव पुमान्‌ पूणः प्रशान्तये ॥४२॥ 
न्रह्िण उवाच 


किंमसाभिरनिवत्तं देवदेव जगद्गुरो 1 


भवता सत्यकामेन येषां वासो गुरावभूत्‌ ॥४४॥। 


यस्यच्छन्दामयं बह्म देह आवपनं विभो । 
न = १. भे । २. नि । ३. प्रभो। 


भागर्सम गलं 2२. \७८-- ॥ 





्ाग्कागय्योगककषयिष्ककक ५ प दे । ककय 


इस प्रकार पानी-दी-पानी हो गया किं करो गदा दहै, 
कहां किनारा, इक्षका पता ही न चख्ता था ॥ ३७ ॥ 
वह ॒वषां क्या थी, एक छेटा-मोय प्रवय ही था। 
ओधीके टको ओर वर्षाकी बौखासेसे हमलेोर्गोको बडी 
पीड़ा इई, दिशाका ज्ञान न रहय । हमट्ोग अत्यन्त 
आतुर हो गये ओर एक दूसरेका हाथ पकड़कर जग्मे 
इधर-उधर भटकते रहे ॥ ३८ ॥ जव हमारे गुरुदेव 
सान्दीपनि मुनिको इसर॒वातक। पता चखा, तव वे 
सूर्योदय होनेपर अपने ्चिष्य हभ्ोर्गोको दरढते इए 
जंगम पर्हैचे ओर उन्होनि देखा कि हम अत्यन्त आतुर 
हो रहे हँ ॥ ३९ ॥ वे कहने क्गे-- आश्चयं है, 
आश्चयं है| पुत्रो ! तुम लोगोने हमारे स्वि अव्यन्त 
कष्ट उठाया ] सभी प्राणि्योँको अपना शारीर सबसे अधिक 
प्रिय होता है; परतु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके 
हमारी सेवामे ही संलन रहे ॥ ४० ॥ गुरुके ऋणसे 
मुक्त होनेके छिये सत्‌-शिष्योंका इतना दी कतव्य है कि 
वे विशयुद्धभावसे अपना सव कुछ ओर इरीर भी गुरुदेशकी 
सेवामें समपिंत कर दं ॥ ४१ ॥ द्विजरिरोमणियो ! में 
तुमटेगोंसे अत्यन्त प्रसन दँ । तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी 
अभिलषाएं प्ण हों ओर तुमव्येगोने हमसे जो वेदाध्ययन 
किया है, वह तुम्हं सव॑दा कण्ठस्य रहे तथा इस लोक 
एवं परल्ेकमें कहीं भी निष्फल न हो ॥ ४२ ॥ प्रिय 
मित्र | जिस समय हमलोग गुरकुछमे निवाक्ष॒ कर रहें 
थे) हमारे जीवनमे पेसी-रेसी अनेकों घटनाएं घटित 
इई थीं । इक्षमे संदेह नकीं कि गुरुदेवकी कृपासे ही 

नष्य शन्तिका अधिकारी होता ओर पणेताको प्राप्त 
करता है ॥ ४३ ॥ 


बर हण देवतान कदा-देवताओके आराध्यदेव जगद्‌- 
गरु श्रीकृष्ण । मल, अव हमें क्या करना बाकी है १ 






| 
1 


| 
>. 
ध 
ग 


गुरुकुलमं रहनेका सोभाग्य प्राप्त इ था ॥ ४ ॥ 
प्रभो | छन्दोमय वेद्‌ धर्म, अर्थं, काम, मोक्ष-- चतुरि 


पुरुषाथके मू स्लोत है; ओर वे है आपके शरीर । बही 





+ च 
त ् च 
[नी 
। = 
४४ 


६१८ भीमद्धागवत्‌ [ अ० ८१ 


[~ ॥ म न मी मि नि 9 = श, । जमानत पक्क > क" चक कः के 









=-= 


भेयतां तस्य गुरु वासोऽत्यन्तविडम्बनम्‌ ।४५॥। | आप वेदाध्ययनके व्थि गास्ुच्मे निवास करे यह ८ 
मवुष्य-लीलाका अभिनय नहीं तो ओर क्या है ॥४५॥ 





शक 
[त का 2 2 





॑ इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दरामस्वैन्ये उत्तरा 
£ | | श्रीदामचरितेऽशीतितमोऽष्यायः ॥ *८० ॥ 


॥ मि 1 


अथेकाशीतितमोऽष्यायः 


खदामाजीको पेरवर्यकी प्राप्ति 


श्रीशुक उवाच शरीद्कश्रवजी कते है- त्रिय परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
# | श्रीकृष्ण सवके मनकी वात जानतेहैं } वे ब्राह्मणको 
। 9 क [; [९ = र ४ ९ 
। स इत्थ डि जयुख्ये = ‡ ~. ~¬ 
दत्य ए न सह सकरथयनच्‌ हर्‌; । परम भक्त, उनके क्टेराके नाशक तथा संतोके एकमात्र 


॥ सवंभूतमनोऽभिज्ञः यमान उवाच तंम्‌ | १ ॥ | आश्रम द । वे श्त परकाले उन त्रासणेलतक 
९ साथ वहत देरतक बातचीत करते रहे । अव्र वे अपने 

| नहण्यो ब्राह्मणं कृष्णो भगवान्‌ प्रहसन्‌ प्रियम्‌ । प्यारे सखा उन त्राह्मणसे तनिक सुसकराकर विनोद 
म्णा निरीशमेरैव ~ करते हए वोटे। उस समय मगत्रान्‌ श्रीकृष्ण उन 
१ १ र्षन्‌ खल सतां गतिः ॥ २॥ ब्राह्मणदेवताकी ओर त्रेमभरी दष्टिसे देख रहे ये ॥१-२॥ 


भगवान्‌ श्रीकष्णने कदा ब्रह्मन्‌ ! आप॒ अपने 


श्रीभगवानुवाच < 
घरसे मेरे स्यि क्या उपहार कये दहै १ मेरे प्रेमी भक्त 
+ नीतं च क [३ ^, ११ > [11 
कि्ुपायनमानीतं ब्रह्मन्‌ मे भवता गृहात्‌ | | जब प्रमे योड़ी-सौ वस्तु भी सुदचे अपण करते है, तो 
= इः | वह मेरे य्यि व्रत दहो जाती है ! परंतु मेरे अभक्त 
अप्युपाहतं भक्तः ब्रस्णा मूयव मे भवेत्‌ | | यदि वहत-पी समग्री भी सुश्च मे करते है, तो उससे 


¢ स+ = | मै संतुष्ट नहीं होता ॥ २॥ जो पुस्प त्रेम-भक्तिसे 
भूयप्यभक्तापहृतं न मे तोपाय करयते ।\ २ ॥ फाल-ष्रट अथवा पत्ता-पानीमेसे कोई भी वस्तु स्च 
वि >, समपिंत करता दहै तो मै छद्धचित्त भक्ता वह्‌ 
पत्र धं शक तोयं या मे भक्त्या प्रयच्छति । ्रेभोपहार केवर खीकार ही नही करता, बल्कि तुरत 
+ 5 भोग ल्णां छेत ह ॥ 9 ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
तदह ` भक्तचुपहूतमश्नाम प्रयतात्मनः ॥ ५ ॥ श्रीक्ृष्णके रेसा कहनेपर भी उन बराह्मणदेवताने 
नेऽपि दविजलस्तै व्रीडित लज उन लक्ष्मीपतिको वे चार समुद्री चिउड़े नहीं 
इत्युक्ताऽपि दविजस्तस्मरे व्रीडितः पतये भियः । दिये । उन्होनि संकोचसे अपना ह नीचे कर चयि या। 
र परीक्षित्‌ । भगवान्‌ श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोके हदयका 
एथुकग्रल ति राजन्‌ न प्रायच्छदवाङ्यखः ॥ ५॥ | एक एकर संकल्प ओर उनका अमाव मी जानते दै । उन्न 
¢ ्राह्मणके आनेका कारण, उनके हश्यकी बात जान 
सव भूतात्मक साक्षात्‌ तस्यागमनकारणम्‌ । = | ठी । अन वे भिचा६ कलने को कि क तो गह मे 


प्यारा सखा है, दृक्ष इने पले कभी ल्कमीकी कामना- 


¢ 

। 

( 
9 

॥ 


विज्ञायाचिन्तयन्नायं श्रीकामो माभजत्‌ पुरा ॥ & ॥ विज्ञायाचिन्तयन्नायं शीकामो माभजत्‌ पुरा ॥ ९॥ । ए सल ९ ~ ---------- 
९, न्धे सत्तपप्ततितभो 1 २. ह । ३. ती राज° । 








कन ` ` ` "चुका ` ` ` ` ` ` 
अं० ८१ | दशम स्कन्ध ९६१९ 





ययया 


पूरन्याः पतिव्रतायास्तु सखा प्रियचिकीषेया । | से मेरा भजन नही किया दै । इस्त समय यह अपनी 
१ =, पतित्रता पनीको प्रसन करनेके व्व उसके आग्रहसे यहां 
प्राप्नो माम दाखाम्‌ सम्पद्‌ाऽमत्यदुकंभाः ॥ ७ ॥ | आया है । अव ैँ इसे देसी छम्धत्ति दूंगा, जो देवताभकि 
ना 3 य्य भी अत्यन्त दुरुभ है ॥ +--७ || भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
सत्थ ।वाचन्त्य वसनाच्.रवद्भान्ढजन्मनः । ठेसा विचार करके उनके वखमेसे चिधड़ेकी एक पोटटी- 
म वधा हआ चिउडा ध्यह क्या है-एेसा कहकर 
खयं द्वी छीन व्या ॥ ८ \ ओर वड़े आदरसे कहने 
नन्वेतदपनीतं मे परसभ्रीणनं सखे । ख यारे भर | म तो ठम भर व्यि =, 
ध प्रिय भेट ठे आये ह्यो | ये चिउड़े न केवट मञ्चे, वल्कि 
तपयन्त्यज्ग भां विथयेते प्रथुकतण्डलाः \\ ९ ॥ सु ह. व १ 6 
देषा कहकर वे उस्मेसे एक मुद चिडउडा खा गये 
इति टं सकृजगधवा दविरीयां जग्ुमाददे । | ओर दूसरी छी ज्य ही मै, त्व ही रु्मिणीके पमं खयं 
भगवती कक्ष्मीजीने भगवान्‌ श्रीकृष्णका हाथ पकड़ 
व्या । क्योकि वे तो एकमात्र मगवानूक्ते पयण है, 
उन्दं खोडकर ओर कयं जा नहीं सकतीं ॥ १० ॥ 
रुकिमणीजीने कहा--पविश्वात्मन्‌ । वस्-वस । मनुष्यकं 
इस वकम तथा मरनेके बाद परटोक्में भी समस्त 
सम्पत्तियाकी समृद्धि प्राप्त करनेके च्य यह एक सुधी 
अस्मिष्टोकेऽथवा ह्ुष्मिन्‌ पुंसस्त्वत्तोपकारणस्‌॥। ११ | चिउडा दी बहत है; क्योकि आपके व्ि इतना ही 
प्रसनताका हेतु बन जाता हैः ॥ ११॥ 
ब्राह्यणस्तां तु रजनीञुषित्वाच्युतमन्दिरे । परीक्षित्‌ | ब्राह्मण देवता उस्‌ रातको भगवान्‌ श्रीकृष्ण्‌- 
के महरम ही रषे । उन्दने बड़े आराषसे वह्यं खाथा- 
पिया ओर एेसा अनुभव किया, मानो मेँ वेकुण्व्मे ही 
प्च गया दहर ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ । श्रीकृष्णसे बाह्मण- 
को प्रव्यक्षक््पमे कु भी न मिल । फिर भी उर्दोनि 
जगाम खालयं तात प॑थ्यलु्ज्य नन्दितः ।१३॥। | उनसे क मा नही । ३ भप चिति कुतप 
लनित-से होकर भगवान्‌ श्रीङृष्णके दशनजनित आनन्द- 
स चारुब्ध्वा धनं द्र'णान्न तु याचितवान्‌ खयम्‌ 1 | मे इते-उतराते अपने घरकी ओर चल पड़ ॥ १३-१४॥ 
| वे मन-दी-मन सोचने लगे-- "अहो, कितने आनन्द 
खगरहान्‌ व्रीडितोऽगच्छन्महदशेननिव्रेतः ॥१४॥ | ओर आश्वर्यकी वात है । त्राहर्णोको अपना इषव 
माननेवाे भगवान्‌ श्रीङृष्णकी ब्राह्मगभक्ति आज मेने 
अहो जह्मण्यदेवस्य ट्टा ब्रहण्यता मया । अपनी खो देख छी । धन्य है | जिनके वक्षःस्थरूपर 
| खयं लक्ष्मीजी सदा विराजमान रहती है, उन्नि सुञ् 
| दरिद्रितमो लक्ष्मीमाश्वि्टो बिभ्रतोरसि ॥ १५ | अयन्त दद््रिको भपने इदयसे ल्णा व्या ॥ १५ ॥ 


१. इति सश्चिन्त्य मनसा चीर० | २. परिष्वङ्गाति० । ३. सख्युनं च । 








[र (अ 
~ 


खयं जहार फिमिदभिति प्रुकतण्डुरास्‌ \\ ८ ॥ 


तावनच््रीजंगरहे हस्तं तत्पयसा पररेष्ठिनः \\१०11 


एतावतालं विश्वात्मन्‌ सव॑ सस्पत्समद्धये । 


थक्त्वा पीत्वा खं मेने आत्मानं खगेतं यथा ॥१२ ` 


श्रोते विश्वभावेन खडुखेनाभिवन्दितः 


॥11 1.114.091 111 111॥1 81434... 








~ 1. ९ १ 1#* #." 7.1. 1 

















0 - ९२० श्रीमद्भागवत | अ०° ८१ 
काह दर्द्रिः पापीयान्‌ क कृष्णः श्रीनिकेतनः करा तो मै अव्यन्त पापी ओर ददि, बौर कहँ स्धमी 
के एकमात्र आश्य भगवान्‌ श्रीकृष्ण | परतु उन्होने 
“ नहमबन्धुरिति साहं बाहुभ्यां परिरम्भितः \१६॥ यह ब्राह्मण है'-- रेता समञ्चकर सन्चे अपनी भुजाओमे 
भरकर हदयसे व्गा च | १६॥ इतना ही नही, 
उन्होने सुद्चे उस पलठंगपर्‌ सुया, जिसपर उनकी 
प्राणप्रिया रुक्िमिणीजी शयन करती हैँ । मानो मैं उनका 
सगा माई द्र | कर्हतक्‌ कर १ में थका हआ था, इस. 
शशया परमया पादसंवाहनादिभिः । व्यि खगं उनकी पटरानी स्करिमणी जीने अपने हे 
चेवर्‌ लाकर मेरी सेवा की ॥ १७ ॥ ओ ¦ देवताओं 
पूजितो देवदेवेन यिप्रदेवेन देववत्‌ ॥१८।। | के आराध्यदेव होकर भी त्राहर्णोको अपना इषव 
माननेव्राठे प्रमुने पौव दवाकर, अपने हाथो विग-पिदर- 
खगांपवगयोः पुसां रसायां श्वि सम्पदाम्‌ । कर मेधी अत्यन्त सेवा-छश्रूषा की ओंर देवताके समान 
। मेरी पूजा की \ १८ ॥ खग, मोक्ष, प्रथ्वी ओर रसा- 
सवांसामपि सिद्धीनां मलं तचचरणाचनम्‌ ॥\१९} तठकी सम्पत्ति तथा समस्त योगति द्वोकी प्रातिका मूढ 
| उनके चरणोकी प्रजा दीह ॥ १९ ;¦ ।एर मी परम- 
| दयादु श्री्ष्णने यह सोचकर मुदे थोडा-सा भी धन नह 
तिंकारणिष्तो ननं धनं चेऽथरि | दिया कि कीं यह दद्र धन पाकर विल्छु मतवात् 
इति कारुणिको सनं धनं मेऽभूरि नाददात्‌ !.२०॥। धि ॥ २० ॥ 
छ प्राप्नो निजगृहान्तिकश््‌ 1 दस प्रकार मन-दी-मन मिचार करते-करते ब्राह्मण- 
| देवता अपने वरके पाक्ठ पर्हूच गये ¦ वे वहां क्या 
संकाशेनिमानैः सर्वतो : वतुम्‌ ॥२६१॥ देते है कि स॒व-का-सव स्थान सयं, अग्नि ओर्‌ चन्द्रभाके 
~ ५८ ¢ समान तेजलली रत्ननिर्भित महसे धिरा इआ है । टोर- 
त्राप्वनाचानंः इजदुद्धिजङ्खाङछेः । ठर चिनवितन उपन नोर उयान वने इए है ता 
क इ ष । उनमें घ्ंड-के्ंड रंग-विरंगे पक्षी कक्ख कर रहे है | 
^ भरुृड्णदाम्भोजकहारोत्पलखवारिभिः ॥२२॥ | सरोवर बुसुदिनी तथा दवेत, नील नौर सौगन्धिक 











निवारितः प्रियाजष्टे प्॑ङ्े भातरो यथा 1 


महिष्या बीजितः श्रान्तो बारव्यजनहस्तया ॥१५७।। 


अधनोऽयं धनं प्राप्य माचयन्युच्चैनं मां सरत्‌ । 


# > (क च 


मति-मतिके कमल खिले इए है; छन्दरघुन्दर सी- 
पुरुष बन-उनकर इधर-उधर विच रहे हैँ । उस स्थान- 
को देखकर ब्राह्मणदेवता सोचने व्गे-- भ्म यह क्था 
¢ देख रहा ह्र १ यद किप्तका स्थान है १ यदि यह वही 
चि: वापि स्थान है, जह मै रहता था, तो यह रेता कैसे हो 
णव: तं नरा, नार्योऽमरप्रभाः ! गया | २१-२३ ॥ इस प्रकार बे सोच हीरे ये कि 
व ¢ देवताओं समान घुन्दर-छन्दर स्री-पुर्ष गाजे-बाजेके 
श्रत्यगरह्णन्‌ महाभागं गीतवाद्येन भूयसा ॥२४॥ | साथ मङ्गख्गीत गते इए उस महाभाग्धवान्‌ ब्राह्मणकरी 
अगवानी करलेक ल्य आये ॥ २४॥ पतिदेवका छमा- 


पतिमागतमाकण्यं  पल्युद्वपारविसम्भमा । गमन नकर ब्रामणीको भपार शानन्द इभा नौर ब 
वि ~ | = 


=> ‰ "व 9 == = =: 
यि = "हक क ०. हः १ 
१, ति मानि 8 स ¦ । 
क = 4 ट क अ & ~ ॥ 4 ॥ बै चि ¬ - क = # = = क > ५ + < + 
ल ध > क अ" "5 
1 , [त ¢, ह, 


/ जष्टं खरङतेः पुम्भिः सीभिथ हरिणाक्षिभिः। 


किमिदं कल बा खानं कथं तदिदमित्यभूत्‌ ।\२३॥ 








` ` > का का ` व  } च 


+ 


६२१. 





कन्व णय र शा 
[त निः 


निथक्राम गृह्ाचणं रूपिणी श्रीखिख्यात्‌ ॥२५)) | ड़वडाकर जल्दी-जल्दी धरसे निकल आयी, वह एसी 


पतिव्रता पतिं टर प्रमोत्कण्डाश्चुलोचना । 


मीलिताक्ष्यनमद्‌ बुद्धया मनसा पखिखजे ॥॥२६॥ 
पत्नीं वीक्ष्य विस्फुरन्तीं देवीं वेमानिकीमिव । 
दासीनां निष्ककण्ठीनां सध्ये भान्तीं स विस्मितः २७] 
रीत; खयं तया युक्तः प्रविष्टो निजमन्दिरम्‌ । 
मणिस्तम्भश्तोपेतं महेन्द्रभवनं यथा }(२८] 
पयःफेननिभाः शय्या दान्ता सुक्सपर्च्छिदाः । 
देमंदण्डानि चामरव्यजनानि 


पयेङ्ा ।\२९॥ 


आसनानि चं ईमानि ददृपस्तरणानि च । 
शुक्तादमविरम्ब्रीनि वितानानि चयुमन्ति च ।३०॥ 


सखच्छस्फाटेकङ्व्येषु महामारकतेषु च । 


माद्ूम होती थी मानो मूर्तिमती च्छ्मीजी दही कमव्वनसे 
पारी हो ॥ २५ ॥ पतिदेवको देखते ही पतिव्रता 
पत्नीके नेत्रम त्रेम ओर उत्कण्डाके आवेगस्ते जसू छच्क 
आये । उसने अपने नेत्र वद्‌ कर च्थियि | ब्राह्मणीने 
वड प्रेमभावसे उन्हँ नमस्कार किया ओर मन-ही-मन 
आलिङ्गन भी ॥ २६ ॥ 

प्रिय परीक्षित्‌ ! ब्राह्मणपत्नी सोनेका हार पहनी 
हई दापि्योके वीचमे विमानसित देवाङ्गनके समान 
अत्यन्त रोभायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी । उसे 
इस रूपमे देखकर वे विमित हो गये ॥ २७ ॥ उन्होनि 
अपनी पत्नीके साथ बडे प्रेमसे अपने महम ग्रवेदा 
किया । उमका महक क्या था, मानो देवराज इन्द्रका 
निवासस्थान । इसमे मणि्योके सेकंड खंमे खडे 
ये॥२८॥ हा्थीके दौतके बने इए ओर सोनेके 
पातसे मेदे इए पलगोपर दूधके फेनकी तदह खेत ओर 
कोमल त्रिछछोने विछ रहे ये । वहत-से चवर वह रक्चे 
हूए थे, जिनमे सोनेकी उडिर्या ट्गी इई थीं ॥ २९ ॥ 
सोनेके सिंहासन शोभायमान हो रहे थे, जिनपर्‌ बडी 
कोमल-कोमल गिरयो ल्गी इर थीं । देसे चदोवे भी 
क्चिटमिला रहे थे, जिनमे मोतियांकी लडिर्यां कटक रही 
थीं || ३० ॥ स्फटिकमणिकी खच्छ भीतोपर पन्नेकी 


रत्नदीपा भ्राजमाना रखनारत्नक्युताः ॥३१॥ | पचीकारी को इई थी । रलननिमित चीमूतियोकि हार्थो 


विलोक्य ब्राह्मणस्तत्र सख॒द्धीः सवंसम्पदाम्‌ । 
तकयामास् निव्य॑म्रः खसमृद्विमैतुकीम्‌ ॥२२॥ 
दुभंगख 


सून वतेतन्मम 


शश्वद श्रिय समूद्विहेतः । 


महाविभूतेरवरोकतोऽन्या 


नैवोपपयेत्‌ यदुत्तमसख ।३३॥ 
नन्वघुबाणो दिते समक्ष 


याचिष्णवे भूयेपि भूरिभोजः 1 
१. द्वि। 


; 4 


म रत्नोके दीपक जगमग। रई थे ॥ ३१ ॥ इस प्रकार 
समस्त सम्पत्तियोकी समृद्धि देखकर ओर उसका को 
प्रत्यक्ष कारण न पाकर, बड़ी गम्भीरतासे ब्राह्मणदेवता 
विचार कने कगे कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति कसे 
आ गयी ॥ २२॥ 


राठी यदुवेशरिरोमणि भगवान्‌ श्रीकृष्णके कपाकटाक्षके 
अतिर्कि ओर कोई कारण नहीं ह्यो सक्ता ॥ ३३ ॥ 


मन-ही-मन कहने ल्गे--े ‰ 
जन्मसे ही माग्यहीन ओर दद्धि दर| पि भेदी इस ॥ 
सम्पत्ति-समृद्धिका कारण क्या ह ९ अवरस्य ही पलेश्वय- ` 





+. 1. 4, 
+ , "कक. + ~क "१ ` चक जाः 


क । 


4 


= 





3 


यह सब कुछ उनकी करुणाकी दही देनदहै। खयं ` 


भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रणेकाम ओर रक्ष्मीपति हयनेके कारण 
अनन्त भोगसामभ्रिरयोसे युक्त है । इसल्यि वे याचक 





भक्तको उसके मनका माव जानकर बहुत कुखृदेदेते 


वकण ल न - ~ ल = ~ -- ~~~ ~ 


त 
~ 


। 











पजंन्यवत्तत्‌ खयमीक्षमाणो 
दाराहकाणाम्रषभः सखा मे \३४।) 


` किंचित्करोत्युवपि यत्‌ खदत्त 

सुहत्छृतं एरवपि भूरिकरारी । 

मयोपनीतां पृथुकेकयु्ट 

्रत्यग्रहीत्‌ श्रीतियुतो महात्मा ।३५५॥ 
मे सौहदसख्यमेत्री 
















तस्येव 
दास्यं पुनजन्मनि जन्मनि स्यात्‌ । 


महाचभावेन गुणालयेन 


` विषजतस्तत्पुरुपप्रसङ्गः ।\३६॥। 


भक्ताय चित्रा भगवान्‌ हि सम्पदो 
$ [कर ¶नं © 
राञ्यं॒॑विभूतीनं समथंयत्यजः । 


अदीषंबोधाय विचक्षणः खयं 


पश्यन्‌ निषातं धनिनां मदोद्धवम्‌ ॥ २७)! 


इत्थ व्य॒घधितो बुद्धया भक्तोऽतीव जनार्दने । 


[ह ~ 
। क 


५ निः - 
‡ ~व 
[4 
॥। ष | श 
त यव |} 
3 


व्रिपयाञ्जायय। त्यक्ष्यन्‌ बुभुजे नातिरुम्पटः ॥३८॥ 


तख वं देवदेव हरेयज्ञपतेः प्रभोः 
१ 


बराह्मणाः प्रभवां देवं न तेभ्यां विद्यते परम्‌ ॥३९॥ 


४4 वि 
; स॒ विभ्रां भगवस्सुहतदा 
। $ = # 

~ {क ¢ ‡ ~ १३ क 


४ ¶ "द, 
¢ 
१ 


श्रीमद्भागवतं 


ह 1 र 1 पि 








[वि 2 क 1 पि मौ वा ` 1 
॥ 7 य सि नि दक 9 27 या ~ कक = क षि ति ) "व 1 


है, परतु उसे समन्ते है बहुत थोडा; ईसव्ि सामने 
कुक कहते नदी । मेरे यदुवंरारिरोमणि सखा स्याम- 
सुन्दर सचमुच उस मेधसे भी बदृकर उदार है, जो 
ससुद्रको भर देनेकी राक्ति रखनेपर भी किसानके सामने 


[ग म क र क 





न बरसकर्‌ उसके सो जनेपर रातमें वरशसता है ओर ` 


बहत बरसनेपर भी थोड़ा दी समञ्ता ह ॥ २४ ॥ 
मेरे प्यारे सखा श्रीकृष्ण देते हैँ बहत, पर उसे मानते 
हैँ बहत थोड़ा ! जौर उनका प्रेमी मक्त यदि उनके 
व्यि कुछ भीकर दे, तो वे उसको वहत मानते 
हैँ । देखो तो सदी ! मेने उन्हे केवर एक सुद्र चिउड़ा 
भेट किया था, पर उदार-क्िरोमणि श्ीकृष्णने उसे कितने 
प्रमसे खीकार किया ॥ ३५५ ५ सुञ्चे जन्म-जन्म उन्हीका 
प्रेम, उन्हीकी हितेषिता, उन्ीकी मित्रता ओर उन्हीकी 
सेवा प्राप्त हो । मुदे हम्पत्तिकी आवरद्यकता नदीं, सदा- 
सवदा उन्हीके गुणोके एकमात्र निवाटस्थान महानुभाव 
भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरणोमे मेश अनुराग वदता जाय 
ओर उन्हीके प्रेमी मक्ताका सत्संग प्राऽ हो ॥} २६ ॥ 
अजन्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण सम्पत्ति आदिके दोष जानते 
ह| वे देखते है कि बड़े-बड़े धनि्योका भन ओौर 
टे्यके मदसे पतन हो जाता है । इसि वे अपने 
अदृरदशीं भक्तकमे उसके मांगते रहनेपर भी तरह-तरह- 
की सम्पत्ति, राञ्य ओरं रेश्वयं आदि नहीं देते । यह्‌ 
उनकी बड़ी क्रपादहै ॥ ३७} परीक्ष्‌ ! अपनी 
बुद्धिसे इ प्रकार निश्चय करके वे ब्राह्मणदेषता व्याग- 
पर्क अनासक्तमावसे अपनी पत्नीके साथ मात्रस्रसाद- 
ख विषयोको ग्रहण करने ल्मे ओर दिनोंदिन उनकी 
प्रन-भक्ति बदृने ची ॥ ३८ ॥ 

प्रिय परीक्षित्‌ | देवताओंके भी आराध्यदेव भक्त- 
भयहारी यज्ञपति सवेराक्तिमान्‌ भगत्रान्‌ खय ब्राहर्णोको 
अपना प्रमु, अपना इष्टदेष मानते है । इसव्यि ब्राहर्णो- 
से बदकर शौर को$ भी प्रणी जगते नहीं हे ॥२९॥ 
इस प्रकार भगवान्‌ श्रीकुष्णके प्यारे सखा उस ब्राह्मणने 
देखा कि '्यवपि भगवान्‌ अनित है, किंपीके अधीन 
नदी है; क्षर भी वे अपने सेवकोके अधीन हलो जाते 


| 
त ~ 
व । ह - ग क ~ न 
० न न ~ -. 


क 


+ 2 "क, - ~ 


4 


॥ च इ ५.५५... .- ,~ १ 8. 
छक ` 





अ० ८९ ] 


तद्धयानवेगोद्‌ग्रथितातमवरन्धन- 





सद्राम छेमेऽचिरतः सतां गतिम्‌ ४०] | धाम, जो कि स्तोका एकमात्र आश्य है, प्राप्त किया 
। ॥ ४० ॥ परीक्षित्‌ ! व्राहमणोको अपना इष्टडेव मानने- 
| एतद्‌ ब्रह्मण्यदेव शरुत्वा ब्रह्मण्यतां नर्‌! } वाटे भगवान्‌ श्रीकृष्णकी इस ब्राह्मणप्रक्तिको जो घनता 
है, उसे मावानके चरणोमिं प्रेमभाव प्राप्त हो जाता दै 
रन्धभावो भगवति छमबन्धाद्‌ बिुच्यते \\७१।॥ ओर वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४१ ॥ 


<‡?१<~< ~~ 


इति श्रोमद्धगघरते महपुरणे पारमहंस्यां संहि तापा दशपस्कन्वे 








उतरा प्रथुकोपाख्यानं नामैकाीतितमोऽष्यायः ॥ ८१ ॥ = 
अथ हचङी्ितमोऽध्याय 8 
भगवान्‌ भरौरष्ण-वरर{मस्े गोप-गोपियोकी सेर 
भीक उवाच श्रीदयुक्देवजी कष्टते ह-- परीक्षित्‌ | इसी प्रकार 
अथैकदा छ्राखल्यां बसतो रामङ्कष्णयोः । = | भगवान्‌ श्रीष्ण जीर बव्यानजी द्वारकां निवास कर 
रहे थे । एक वार्‌ सवग्रा सूयग्रहण व्गा, जैसा किं 
ए्यपरणः महानासीत्‌ कल्पक्षये यथा ।! १॥ | प्रय्यके समय लगा करता है ॥ १॥ परीक्षित्‌ । 
मवुष्पोको उ्योतिषिययोके द्वारा उक्ष म्रहणका पता 
तं ज्ञाटा सुजा राजन्‌ पुरस्तादेव सर्वतः । पहलेसे ही चल गया था, इसव्यि सव छोग॒ अपने- 
| अपने कल्याणके उदृदेदयसे पुण्य आदि उपाजन करनेके 
समन्तपञ्चकं कषत्रं यथुः श्रेयोविधित्सया ॥ २ ॥ | व्ि समन्तपञ्चक-तीथंदुरधेत्रमे भये ॥ २ ॥ 
समन्तपञ्चक क्षेत्र वह है, जहां राक्लधारियेमिं श्रेष्ठ 
निशकष्ियां सदी इन्‌ रासः शश्नभतां वरः| परञ्रामजीने सारी परवीको क्षत्रियहीन करके राजारओकी ` 
रुधिरधारासे पांच बडे-बडे दुण्ड वना दिये थे ॥३॥ ` 
चृपाणां रुधिसेषेण यत्र॒ चक्रे महाहदान्‌ ॥ ३ ॥ | जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने पापकी निव्ृत्तिके ` 
व्ि प्रायश्चित्त करता है, वैसे ही सवदाक्तिमान्‌ भगवान्‌ 
हेज च भगवान्‌ रमो यत्रा्पृष्टोऽपि कर्षणा । अपने साय क्मका कुछ सम्बन्ध न॒होनेपर 
व्यैकमयादाकी रक्षके व्यि वहीपर्‌ यज्ञ किया ` 
रोक ग्राहयन्नीशो यथान्योऽघापलुक्तये 11 ४॥ | था ॥ ४ ॥ < 
महत्यां वीथयात्रायां तत्रणच्‌ भाष्तीः प्रजाः परीक्षित्‌ ! इ महान्‌ तीर्थयात्राके अवसरपर ` 
अ मारतवपेके सभी प्रन्तोकी जनता कुरकषे्न आयी ची । 





प आदि बड-बुदे तथा 
 दृष्णयश्च तथाक्रर्सुदेवाहुकादथः \ ५ ॥ न 


"कक 
















६२४ ीमद्भागवत [ अ० ८२ 
गदप्रद्यम्नसाम्बाद्याः सुचन्द्रश्चकस्षारणेः ॥ & ॥ | ये दोनों षच, क, सारण दिके साय नगरकी 
रक्षाके व्यि द्वारका रह गये ये । यदुवंशी एक तो 

ननि खभावसे दही परम तेजघी ये; दूसरे गभ सोनेकी 
आस्तेऽनिरुदधो रक्षायां छृतवमा च यूथपः । माल्य, दिव्य पुष्पेकि हार, वहरमूल्य वच भौर कवचेसि 
एुप्तनित होनेके कारण उनकी दोश ओर भी बढ 
गयी थी । वे तीथ-यात्राके पथमे देवताओके विमानके 
समान र्थो, समुद्रकी तरद्गके समान चठनेवाटे घोड़ो, 
गजैन॑दद्धिरभामेनभिवियाधरयभिः | | नादोके समान विरा(ख्काय एवं गजना क्ते इर 
- हाथिर्यो तथा विदाधरोके समान मनुष्येके द्व टदोयी 

ल स | जानेवाटी पारकियोपर अपी पलियोके साथ इष 
न्यराचन्त्‌ महातेजाः पथि काश्चनमाकिनिः॥ ८ ॥ | प्रकार शोभायमान हो रहे ये, सानो खर्गकरे देवता ही 
यात्रा कर रहे हों । महापाग्वान्‌ यदुरिर्थोने कुर- 
दिन्यस््बक्षसननाहाः करत्रेः खेचरा हव 1 षेत्रमे पहुंचकर एकामग्रचित्तसे संयमप्रवंक स्नान किया 
ओर ग्रहणके उपल्श्ष्यमें निश्चित काटतक उपव्प् 
किया ॥ ५-९ ॥ उन्होने ब्राह्मणोंङो गोदान क्के | 
दसी गो्भोक। दान किया, जिन्दं वख की सुन्दर-सुन्दर 
अवि टे, पुष्पमायरएं एवं सोनेकी जं शरे पहना दी गयी 
ब्ाहणेभ्यो ददुर्धतूबास {सग्ुक्ममाकिनीः | यी | इसके वाद प्रहणक्रा मोक्ष हौ जनेषर्‌ 
पल्छ्युरामजीके बनाये इए वुण्डोमे यदुवंरिोने विधि- 

रामहदेषु विधिवत्‌ पुनराष्टुत्य व्रष्णयः ॥१०॥ | पवक, स्नान किया ओर सत्पात्र तराहम्णोको खुन्दर-घुन्दर 
| पकवानोंका भोजन कराया ! उन्होंने अपने मनम यहं 
ददुः खन्नं द्विजाग्येभ्यः कृष्णे नो भक्तिरस्त्विति। | संकल्प किया था कि भगवान्‌ श्रीङृष्णके चणणोमिं 
हमारी प्रेमभक्ति बनी रहे] भगवान्‌ श्रीक्ृष्णक्रो ही 
खयं च तदनुज्ञाता ष्णयः दृष्णदेवताः ॥११॥ | अपना आदश ओर इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियोने 
ॐ 4 ब्राहम्णोसे भनुमति ठेकर तब खयं मोजन किया ओर 
` त युक्त्वोपविषिडुः कामं स्निग्धच्छायाङ्घि एङघिषु | पिर घनी एवं ठंडी छयावाले वक्षोके नीचे अपनी- 
` ` ` | अपनी इच्छके अनुघ्ार डा डाव्कर ठहर गये । 
परीक्षित्‌ | विश्राम कर लेनेके बाद यदुवंशियोने अपने 
3 सुद्‌ ओर सम्बन्धी राजासि मिखना-्मेटना श्य 


छ वि - ग मत्स्य, उङीनर, कोसक 
. ` मत्योशीनरकोल्यविदरभहकरुस॒ञ्ञयान्‌  । किया ॥ १०-१२ ॥ वहा मत्स्य कोसल, 

















८ भ श को 








0 


ते रथेदवधिष्ण्याभे््यैघ तरलषवैः । ७॥ 


तत्र स्नात्वा महाभागा उपोष्य सुसमाहिताः! ९ ॥ 


॥। 
+ ॥ &. 
| 
ॐ | 
| 


 ततरागतासते दद्यः सहत्सम्बन्धिनो नपान्‌ ॥१२॥ 


>, 


विदर्भ, कुरु, सञ्चय, काम्बोज) कैकय, मद्रः न्ति, 
` आनर्त, कैर एवं दुसरे अनेकों देशोके-अपने 
काम्बोजकंकयान्‌ मद्रान्‌ इन्तीनानतकेरलान्‌ ।|१३॥ | प्के तथा रातपक्षके--सैक्ो नरपति आये इप्‌ 
^~ अ. थे । परीक्षित्‌ ! इनके अतिरि वि परम 
न्यारस्चिवाः वात्मप यान्‌ परां अ शतो नृप | | हितैषी बन्धु नन्द आदि गोप तथा शा द्रानके 


१, म्बाश्च ) २. ददश्वाननं। ५ । ~न 
१. म्ब्राश्च 1 ९ वा 44 ~+ 
५ ~ क 29 "^ अ भ, । (4 ह 
"^ य द. श "ड ह 1: + 
र 1 ~ क 97 कै 1 " + भ 
>~ ~ कमी = क र न 
= ॥ दद न ४५५५ = ~ त + प +, १ क ^ +: नवि 
॥ ; + चः कि ४ त +. ~ = त कक = 1. 3 चि 


॥ 1) 


1; + 4 के ७ ०.५७७.०७० ०७७१ ७७०.०, व्व 0, 
¢+ 


____ ^ 


` ~ न क त 





अ० ८२ | दशम स्कन्ध ६२५ 





दियो यि  ------ = ------- 


नन्दादीन्‌ खुदो गोपान्‌ गोपीश्वोत्कण्ठिताशिरम्‌ १४ | व्व चिटकाकसे उत्कण्ठित गोपिरयो भी वहां भावी इड 
थीं | यादर्वोने इन सबको देखा ॥ १३-१४ ॥ 





अन्योन्यसंदशेनह्षरंहसा परीक्षित्‌ ! एक-दूसरेके दशन, मिलन ओर वार्ताल्पसे 
| सभीको बड़ा आनन्द हभा । सभीके इदय-कमरु एवं 
प्रोतफुरलहदक्त्रसरोरुहभ्ियः । मुख-कमल खिल उठे । सत्र एक-दूसरेको भुजाओं भरकर 

इदयसे कुगाते, उनके नेत्रो से ओंषुओंकी ञ्जड़ी कग जाती, 

आष्िप्य गादं नयने; सरवजला रोम-तोम लिक उठता, प्रेमके आवेसे बोटी बंद हो 


६ त जाती ओर सन-के.-सव आनन्द-समुद्रभं इने-उतराने 
हष्यच्चचो शुद्धगिरो ययु्ुदम्‌ ।॥१५॥ | र्गते ॥ १५ ॥ पुर्पोकी भति लिया भी एकदृषरेको 
| देखकर प्रेम ओर आनन्दसे भर गयीं । वे अत्यन्त 


स्रियथ संवीक्ष्य मिथोऽतिसोहद- सोहा्द, मन्द-मन्द मुसकान; परम पवित्र तिरी 
चितवनसे देख-देखकर परस्पर भेट-्अकवार भरने ठगी । 

सितामलापाङ्गचखोऽभिरेभिरे । वे अपनी भुजाओंमे भरकर केषर लगे इए वक्षः 
स्थलोको दूसरी जिर्योके वक्षःस्थलोसे दबातीं ओर 

स्तनं; स्तनान्‌ ऊुङ्कमपङ्करूषितान्‌ अत्यन्त आनन्दका अनुभव करतीं । उस समय उनके 


दा नेतरोसे प्रेमके ओंसू छलकने र्गते ॥ १६ ॥ अवघ्या 

निहत्य दाभिः प्रणयाश्वुलोचनाः ॥१६॥ | आदिमे छोयेनि बडवर्दोको प्रणाम किया ओर उन्दोनि ` 

अपनेसे छोर्येका प्रणाम खीकार किया । वे एक दूसरेका _ 

खागत करके तथा कुशा मङ्गल आदि प्ूछकर 4 - 

खागतं शरं पृष्ठा चदु: कृष्णकथा मिथः ॥१७॥ | 9९ श्ीृष्णकी मधुर लीनं जपसमे कदनेदनने 

| ल्गे॥ १७ ॥ 1 

पृथा भ्रातन्‌ खसवींकषय ततपुत्रान्‌ पितरावपि । परीक्षित्‌ ! कुन्ती वघुदेव आदि अपने माद्य, 

4 चक बहिनों, उनके पुत्रो, माता-पिता, भाभि्यो ओर भगवान्‌ _ ` 
भ्रात्रपत्नीञङन्दं च जहो संकथया शुचः ॥१८॥ | श्रीकृष्णको देखकर तथा उनसे बातचीत करके अपना 

सारा दुःख भूर गयीं ॥ १८ ॥ 4; 

न्तन वश्छुदेवजीसे कहा- मेया । मे सच्च 

बड़ी अभागिनरदह्रु | मेरीएकमभीसाध प्री न इडे । 


# ~, 


7 


आप-जेसे साघु-खभाव सजन भाई आपत्तिके समय ` 


{ह ८ मे घुषि भी न ठे, इससे बढकर दुःखकी बात क्या ` 
यद्‌ वा आपत्सु मद्वातां नानुसरथं सत्तमाः ॥१९॥। । | 
स्ख ॐ ^ ह्यागी १॥ १९ ॥ मेया । विधाता जिसके बाय हो = 


त~ 


सुहदो ज्ञातयः पुत्रा भातरः पितरावपि । ` | जाता है, उसे खजन-सम्बन्धी, पुत्र ओर माता-पिता ` 


^ 2 द्व) भी भू जाते हैँ । इसमे आपटोगोका कोई दोष 
` नाुखरन्ति खजनं यस्य देवमदक्षिणम्‌ ॥२०॥ | नहीं ॥ २० ॥ 


ततोऽभिवाद्य ते बद्धान्‌ यविष्टेरभिवादिताः । 


र कुन्त्युवाच 


आयं भ्रातरं मन्थे आत्मानमकृतारिषम्‌ । 





"` “ह ध क र 
- वसुदेव उव्‌।च “भ व्ुदेवजीने कड्ा-- बहिन ! उगहना मत दो । 
अम्ब मासानद्रयेथा दंवक्रीडनकान्‌ नरान्‌ । | हमसे बिज्ग न मानो । समी मनुष्य दैवे लिलते 








चै 
धि नकर + + ~ 
+ „+ # 







& २९ श्रीमद्भागवत [ अ० ८२ 

















देशस्य हि वरे लोकः रुते कारयतेऽथवा ।।२१। | ह । यढ समप गोका करके वदाम रवर कम करता 
है ओर उसका फल भोगता दै ॥ २१॥ बहिन । 
कसप्रतापिताः सें वयं याता दिशं दिश्चम्‌ । कससे सताये जाकर हमलोग इधर-उधर अनेकं 
दिरामिं भगे हए ये | अमी कुछ ही दिन इए, 


भ्र ष 
एतध्चव पुनः खान देवेनासादिता : खसः ॥२२॥ | दशवरक्ृपासे हम सव पुनः अपना स्थान प्राप्त कर सके 





द ॥ २२॥ 
श्रीद्युक उवाच | श्रीद्युकदेवजी कहते है-- परीक्षित्‌ ! वहाँ जितने 
भी नरपति आये ये- वसुदेव से 
दरेवागसेनायथरभिसत -- वसुदेव, उग्रसेन आदि 
यंदुभिस्तेऽचिता चपाः । | यदुवंशियोने उनका खूब सम्मान-सत्कार किया । वे 
१ स [ज सान्‌ ्रीकृष्णका दन पाकर परमानन्द ओर 
अ्तनिच्युतस्दखपरमानन्दानव्रेताः ।॥२३॥ | शान्तिका अनुभव करने ठ्गे ॥ २३ ॥ परीक्षित्‌ । 


भीष्मो दरोणोऽम्बिकापुत्रो ान्धारी ससुता तथा। भीष्मपितामह, रणाचायः धृतराष्ट्र दुर्योधनादि पुत्रके 
साथ गान्धरी, पल्नियोके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, 


सदाराः पाण्डवाः न्ती सृञ्जयो विदुरः कृपः ।|२४॥ | बन्ती, सज्ञय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, 
दअ £ १२ भीष्मक, महाराज नग्नजित्‌, पुरुजित्‌, द्रुपद, शल्य 
इन्तिभोजो विराटश्च भीष्मको गः नाजन्महान्‌ । धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिनरेदा, 
= ; शस्यो क्र „ | मद्रनरेश, केकयनरेदा, युधामन्यु, घुराम, अपने 
धर द्‌ पदः शयो शरक: 0 प९५। पत्रोके साथ बाहीक ओर 6 भी युधिष्ठिरके अनुयायी 
चृपति भगवान्‌ श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन 
> विग्रह ओर उनकी रानिर्योको देखकर अत्यन्त विस्मित 
युधामन्युः खशम च संसुता बाहिकादयः ।॥२६॥ हो गये ॥ २४-२७ | अन वे वल्रामजी तथा मगवान्‌ 
श्रीकृष्णसे भलीर्मोति सम्मान प्राप्त करके बड़े आनन्दसे 
श्रीकृष्णके खजनो--यदुवंरियोंकी प्रशंसा करने लगे । 
श्रीनिकेतं वपुः शोरेः सस्रीकं वीक्ष्य विसिताः॥ २७॥ ॥२८]॥ उन रोगेनि मुख्यतया उग्रसेनजीको सम्बोधित 


9 © = 6 | पूचिये 
अथ ते रामद्ष्णाभ्यां सम्यक प्राप्तसमर्हणाः । कर॒ कहा-- “भोजराज उग्रसेनजी ! सच पथय तो 
क इत जगतके मनुष्योमे आपलोगोंका जीवन ही सफ 


दमघोषो विशालाक्षो मेथिलो मद्रकेकयौ । 


राजानो ये च राजेन्द्र युधिष्ठिरमलुवताः । 


प्रशसुधदा युक्ता बृष्णीन्‌ कृष्णपरिग्रहान्‌ ॥२८॥ | है, धन्य है | धन्य है | क्योकि जिन श्रीकृष्णका 
त क य श्‌ दर्शन बड़-बद़े योगि्योकि य्यि भी दुम दहै, उन्ीको 

अहो भोजपते युयं जन्मभाजो म 
र्‌ भाजो णामह । आपोग॒नित्य-निरन्तर देखते रहते है ॥ २९ ॥ 


यत्‌ पञ्यथासन्रत्‌ कृष्णं ददंशंमपि योगिनाभर ॥२९॥ | वेदने बडे आदरके साय भगवान्‌ श्रकृष्णकी कीतिका 
यद्विशचुति + तदमलं | गान किया है | उनके चरणधोवनका जर गङ्गाज, 

` इत १६ उनकी वाणी- शाख ओर उनकी कीतिं इस जगत्‌को 
पादावनेजनपयश्च वचश्च शाखम्‌ । अत्यन्त पवित्र कर रदी है । अभी हमढोगोके. जीवनक 








= 


-~ ॥ ॥ १ कै 
= त 
6. च = प णे | 


८  १* एतदेव । २. शेभ्यो शषकेद॒श्च काशि ° । ३. यु्ाबन्तिकादयः । 


किः 
ककय = भध, # ~ = 
न नकन 1, 


अ० ८२ | 





=-= === ~~ ~~~ 


भूः कालभजितभगापि यदङ्धिपद्म- 





स्पर्ोत्थशक्तिरभिवरषति नोऽखिलार्थान्‌ ॥३०॥ 


तदशेनस्पदानानुपथग्रजस्प- 
न्तत ¦ । 
येषां गृहे निरयवत्मनि वतंतां वः 
खगपवगंविरमः खयमास विष्णुः ॥३१॥। 
श्रीञ्युक उवाच 
नन्दस्तत्र यदून्‌ प्राप्तान्‌ ज्ञात्वा कृष्णपुरोगमान्‌ । 
तत्रागमद्‌ वतो गोपेरनःखा्थे्दिदक्षया ॥३२॥ 
तं दृष्टा बृष्णयो हृष्टास्तन्वः प्राणमिबोल्थिताः | 


परििखनजिरे 


वसुदेवः परिष्वज्य संम्प्रीतः प्रेमविहकः | 


सरन्‌ क॑पकृतान्‌ क्छे्ान्‌ पुत्रन्यासं च गोडटे॥ ३५४ 


कृष्णरामौ परिष्वज्य पितरावभिवा्य च । 





दशम स्कन्व 











`" याय कः == = 


गादं चिरदश्चनकातराः ॥३३॥। 


६२७ 


[9 
॥ + 


| ही बात है, समयके फेरे प्रण्यीका सारा सौमाप्य नष्ट हो 


चुका था; परंतु उनके चरणकमेके स्पर्शसे पृथ्वीम 
फिर समस्त श्ति्योका सच्चार दहो गया ओर अव वह 
फिर॒ हमारी समस्त अमिलाषाओं -- मनोरथोको परण 
करने ख्गी ॥ ३० ॥ उग्रसेनजी ! आपढोर्गोका 


 श्रीकृण्णके साथ वैवाहिक एवं गोत्रसम्बन्ध है । यही 


नही, आप हर समय उनका दशन ओर स्पर्ख श्राप्त 
करते रहते हैँ । उनके साथ चकते है, बोर्ते &ै 
सोते है, बैठते हैँ ओर खाते-पीते &। ्योतो आप- 
कोग गृहस्थीकी अक्ञटोमें फंसे रहते £ जो नरकका 
माग है, परंतु आपलोगोकि घर वे सर्वव्यापक विष्णु- 
भगवान्‌ मूतिमान्‌ रखूपसे निवास करते है जिनके 
द शंनमात्रसे खगं ओर मोक्षतक्की अभिगाषा मिट 
जाती है ॥ ३१॥ 


ीद्यकदेवजी कते है--परीक्षित्‌ ! जब नन्दबाबा- 
को यह बात माद्धम ह्ई॑किं श्रीकृष्ण] आदि यदुवंशी 
कुरुक्ेत्रमे आये हए ई, तत्र वे गोपौके साथ अपनी 
सादी सामग्री गादि्योपर गदकर अपने प्रिय पुत्र 
श्रीकृष्ण-बल्राम आदिको देखनेके स्थि वह आये 
॥ २२ ॥ नन्द आदि गोपोको देखकर सब-के-सब 
यदुवंशी आनन्दसे भर॒ गये । वे इस प्रकार उठ खड 
हए, मानो ग्रत शरीरमें प्राणोका सञ्चार हो गया हो! 
वे लोग क-दूसरेसे पिलनेके घ्य बहुत ॒दि्नोसे भातुर 
हो रे थे । इसव्ये एक-दूसरेको बहत देरतकं 
अत्यन्त गाढमावसे आचिङ्गन करते रहे ॥ ३२ ॥ 
वघुदेवजीने अत्यन्त प्रेम ओर आनन्दसे विह्वल होकर 
नन्दजीको हृदयसे चणा चिया | उन्दै एक-एक करके 
सारी बातं याद हो आपीं--कस किस प्रकार उन्हे ` 


सताता था ओर किप प्रकार उन्होनि अपने पुत्रको 


गोकुर्मे ले जाकर नन्दजीके धर रख दिया था 
॥ २० ॥ भगवान्‌ श्रीङ्ृष्ण ओर बल्रामजीने माता 
यरोदा ओर पिता नन्दजीके हइृदयसे लाकर उनके 
चरणोमे प्रणाम किया । परीक्षित्‌ | उस समय प्रेमे 
उद्रेकसे दोनों माइयोका गत्य रंध गया, वे कुछ भी 


न किंचनोचतुः प्रेम्णा साश्रुकण्ठो इुरूढह ।।३५॥ । बोल न सके ॥ ३५ ॥ महाभाग्यवती यशोदाजी ओर 


। 
१. प्रतीतः ।. 
ॐ क य 
9 न= 3 = हः र प्श ( व 
न ५. ग - ऋः 
= ध कि विष ~ = क 
++ र -* क 3 ~ ,५ र> 






"स 2 


= [वं त ५१ » - 4 
- न ^ ~+ 


६२८ श्रीमद्भागवत [ अ० ८र 
| (~ ----~ ~ ~ 
तावात्मास्नमारोप्य बाहुभ्यां परिरभ्य च । नन्दवावाने दोनों पुत्रको अपनी गोदे रै ल्या ओः 
| अुजाओसे उनका गाढ आलिङ्गन किया | उनके हृदयमे 

चिरकाल्तक न मिल्नेका जो दुःख था, वह सत्र मिट 

यशोदा च महाभागा सुता विजहतुः शचः ॥३६।। | गया ॥ ३ ६ ॥ रोहिणी ओर देवकी जीने व्रजेश्वी यरोदाको 
अपनी अकवाटमे भर चिया । यशोदाजीने उन खोगोके साध 
मित्रताका जो व्यवहार किया था, उसका स्मरण करके दोनों 

| क। गला भर आया । वे यशोदाजीसे कहने गी--। ३७॥ 
'यरोदारानी ! आपने ओर त्रजेश्वर नन्दजीने हमरोगेकि 
साथ जो मित्रताका व्यवहार किया है, वह कभी मिन 
वाला नहीं है, उसका बदला इन्द्रका ेशव्य पाकर भी 
| | + हम किसी प्रकार नही चुका सकतीं । नन्दरानीजी | 
| का विसरेत बां मृत्रीमनिडृत्तां बजेशवरि । भला रेसा कौन कृत्न है, जो आपके उक्त उपकारको 
| ~ स मू सके १॥ ३८ ॥ देवि ! जिस समय बल्गाम 
| अवाप्याप्यन््रमेश्चयं यस्या नेह प्रतिक्रिया ॥२८॥ ओर श्रीकृष्णने अपने मा-बापको देखातक न था ओर्‌ इनके 
| पिताने धरोहरके खूपमें इन्दं आप दोनोके पास रख डोडा 





पिः 


रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य व्रजेश्वरीम्‌ । 


खरन्त्यो तत्छृतां मेती ब्यकष्ठ्यो समचतुः ॥२७॥। 





एताबदृष्टपितरो युवयोः स पित्रोः था, उस समय आपने इन दोर्नोकी इस प्रकार रक्षा की, 
जसे पलक पुतव्ियोंकी रक्षा करती है तथा आपलोगेनि 
सम्प्रीणनाम्युदयपोषणपारनानि । ही इन्द खिलाया-पिलाया, दुलार किया ओर रिञ्ञाया; हनके 


मङ्खखके व्ये अनेकों प्रकारके उत्सव मनये । सच पूथिये, 

त इनके मा-बाप आप हयी खोग हैँ | आपलोगोकी देख-रेखमं 

्राप्योषतुर्भवति श्णो- इन्हें किंपीकी ओंचतक्र न र्गी, ये सवंथा निमय रहे, रेसा 

"५ करना आपगगोके अनुखूप ही था; क्योकि सत्पुशषोकी 

६ । द्म अपने-परायेका मेद्‌-माव नहीं रहता | नन्दरानीजी । 
नयस्तानङ्त्रचभयो न सतां परः खः ॥३९॥ | सचपुच आपलोग परम संत है, ॥ ३९ ॥ 

श्रीदं उवाच श्रीञ्यकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ । मै कह चुका 

| ह कि गोपियोके परम प्रियतम, जीवनसवंख श्रीकृष्ण 

= श ह ही ये | जब उनके दशेनके समय नेत्राकी प्के गिर 

अ छृष्णणुपलमभ्य चिरादभीष्ट पडती, तब वे परठ्कोको बनानेवानेको ही कोने 

| खगतीं । उन्हीं प्रेमकौ मूतिं गोपियोंको आज बहत 

दिनके बाद भगवान्‌ श्रीकृष्णका दशन इभा । उनवे 


यत्पक्षणे दश्िषु पक्ष्मङृतं शपन्ति । मनम रसे छथि कितनी खला थी, इसका अनुमान 
| भी नहीं किथा जा सकता । उन्होने नेत्रोके रास्ते अपने 
टम्भिहृदीङृतमलं परिरभ्य सर्वा ्रियतम श्रङकष्णङ्गो हृदयम ठे जाकर्‌ गाद्‌ आलिङ्गन 


ध किया जौ मन-दी-मन आणिङ्गन करते-करते तन्मय हवो 

=. गयीं । परीश्चित्‌ ! करयातक करर वे उस भावको प्राप्त 

्द्भावमापुरपि नित्यभुजा दुरापम्‌ ॥४०॥ | हो गयी, जो निषय-निन्तर अम्य करनवणि योगिवेनि 
व 








र "क 


अ० ८२ | 


व [गी "ग ण 


भगर्वांस्तास्तथाभूता 


दशम स्कन्ध 


६२९ 











लिये भी अव्यन्त दुभ हे ॥ ४० ॥ जत्र भगवान्‌ श्री- 
। कृष्णने देखा किं गोपि्या सुञ्जसे तादात्म्यको प्रा्त- 
| एक हो रही ई, तन वे एकान्तम उनके पास शव, 
आष्छिप्यानामयं प्रा प्रहसनिदमव्रवीत्‌ ।\४१।\ , उनको हदयसे व्गाया, कुशल-मङ्गल पूछा ओर हसते 


विविक्त उपसंगतः । 


च) 


। इए यो बोके-॥४१॥ ।सदियो ! हमटोण अपने खजन- 


अपि सरथ नः षख्यः खानामर्थचिकीर्षया । 


| ्म्बन्धियोंका काम करनेके य्ये व्रजसे बाहर चले आये 
ओर इस प्रकार तुम्हारी-जेसी प्रेषसिर्थोको छोडकर हम 


। शात्रुभंका षिनाश करनेन उज्ज गये | बहत दिन बीत 


४२} | 


गतांधिसययिताञ्छश्चुपक्षक्षपणचेतसः | 


अप्यवध्यायथासान्‌ खिद ृतन्ञाविशङ्कया । 
सूनं भूतानि भगवान्‌ युनक्ति वियुनक्ति च ।\४३)। 
वायुर्यथा धनानीकं वणं तूलं रजांसि च । 
संयोज्याकषिपते भूयस्तथा मतानि भृत्रत्‌ ॥४४॥। 
मयि भक्तहिं भूतानाममृतत्वाय कर्पते । 


दिष्टया सदासीन्मस्स्नेहो भवतीनां मद।पनः ॥४५५॥। 


अहं हि सवंभूतानामादिरन्तोऽन्तरं बहिः । 
भोतिकानां यथा खं वार्भवायुरज्योतिरज्ञनाः , ४६॥ 
एवं ह्येतानि भूतानि भूतेष्वात्माऽऽत्यना ततः। 


उभयं मग्यथ परे परयताभातमक्षरे ।४७॥। 
ध्र शके उवाच 


अध्यात्मशिक्षया गोप्य एवं कृष्णेन शिक्षिताः 1 


१, ऋषिरूवाच 





गये, क्या कभी तुमलोग हमारा स्णण मी करती 
हो ॥ ४२ ॥ मेथी प्थारी गोपियो | कहौं तुम लोगोकि 
मनमें यह आशंका तो नहीं हयो गयी है कि नँ अकृतज्ञ 
ओर ेक्ता समञ्चकर तुमखोग हमसे बुरा तो नीं 
मानने ल्गी हो १ निस्सदेह भगवान्‌ हयी प्राणिर्योकि संयोग 
ओर वियोगके कारण हैँ | ४३ ॥ जैसे वायु बादर, 
तिनर्को, रूईं ओर धूठ्के कर्णोको एकःदूषरेसे मिला 
देती है, ओर फिर खच्छन्दख्पसे उन्हे अब्ण-अस्ग क 
देती है, वेसे दी समस्त पदार्थोकि निर्माता भगवान्‌ भी 
वका संयोग-व्रियोग अपने इच्छानुसार करते रहते 
हैँ ॥ ४४ ॥ सियो ! यह बडे सोभाग्यक्गी बात है किं 
तुम सवर छोर्गोको मेरा वह प्रेम प्रप्तहो चुका दहै, जो 
मेरी ही प्राप्ति करानेवाग है; क्योकि मेरे प्रति की इई 
प्रेम-भक्ति प्राणिर्योको अग्रृतत्व ( परमानन्द-धाम ) प्रदान 
केम समथ है ॥ ४५ ॥ प्यारी गोपियो ! जैसे घट, 
पट आदि जितने भी भौतिक पदाथ है, उनके आदि, अन्त 
ओर मध्यमे, बाहर ओर भीतर, उनके मूल कारण प्रवी, 
जल, वायु, अनि तथा आकाश दी ओतप्रोत हो रहे ह, 
वेसे ही जितने भी पदाथ है, उनके पहले, पीठे, बीच, 
बाहर ओर भीत केवठ मँ-ही-नै ई | ४६ ॥ इसी प्रकार 
सभी प्राणियोके शरीरमें यही पचो भूत कारणख्पसे स्थित 
है ओर आला मोक्ताके ख्पसे अथत्रा जीव रूपसे सतह । 
परतु मेहन दोनो परे अव्रिनारी सत्य हर । येदोनँ मेरे ही 
अद्र प्रतीत हो रहे है, तुमरोग रेपा अनुभा करो॥४७॥ 


ध्रीद्यकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
्रहृष्णने इस प्रकार गोपिधोको अव्याल-ज्ञानकी रिक्षासे 
रिक्षित किया । उसी उपदेशकरे बारबार स्मरणे 


~~~ बब ~~~ ~ 
~~ तकन कत कः चक ऋ = > 
न ॥ 


न्‌ 





भे 





&२० श्रीमद्भागवत | अ० ८३ 
--------------- ज च्व्य्य्य्व्व्व्व्य्य्च्य्च्य्च्च्व्य व 
तदलुखरणध्वस्तजीषकोज्ास्तमध्यगन्‌ ।॥४८॥ | गोपि्योका जीवकोश- लिङ्गशरीर न्ट हो गया ओर वे 
| भगवानूसे एक हो गयी, भगवान्‌को दी सदा-स्वंदाके 
व्यि प्राप्त हो गयीं ॥ ४८ ॥ उन्होने कहा--“हे कमल- 
नाम | भ्रगाधबोधसम्पन बड़े-बड़े योगेश्वर अपने हदय- 
| कमलम आपके चरणकमर्छेका चिन्तन करते रहते है । 
योगेशवरेहदि विचिन्त्यमगाधबोधैः | जो लोग संसारके कुर्मि गिरे इए दै उन्े उससे 
निकलनेके व्ये आपके चरणकमठ ही एकमात्र अव- 
ठम्बन हँ | प्रभो ! आप रेसी कृपा कीजिये कि आपका 
वह॒ चरणक्रमठ, घर-गृहस्थके काम कर्ते रहनेपर भी 
सदा-सवंदा हमारे हृदयम विराजमान रहे, हम एक 

गेहञ्जषामपि मनस्युदियात्‌ सदा नः ॥४९॥ । क्षणके च्वि भी उसे न भूरे ॥ ४९ ॥ 

नङ्क 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्वौन्घे उत्तरार्धे 
बृष्णिगोपक्षङ्गमो नाम द्रधदीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥ 


अकर 
अथ त्यरीतितमोऽध्यायः 


भगवानकी पटरानियोके साथ द्रोपदीकी बातचीत ` 
श्रीक उवाच भीद्यकदेवजी कषते है- परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण दही गोपियोको शिक्षा देनेवाले हैँ ओर वही उस 
शिक्षाके द्वारा प्राप्त होनेवाटी वस्तु हैँ । इप्तके पहले, 
जेसा किं वर्णन किया गथा है, भगवान्‌ श्रीकृष्णे 
उनपर महान्‌ अनुप्रह किया । अब उन्होनि धमराज 


युधिष्ठिरमथाप्रच्छत्‌ सर्वाश्च सुहृदोऽव्ययम्‌ ॥ १॥ | युधिष्ठिर तथा अन्य समस्त सम्बन्धियोसे कुरा-मङ्गल 
पूछा ॥ १ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरणक्रमलका दर्ान 

















आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं 


संसारङूपपतितोत्तरणाधलम्बं 





तै 4 # + = # ह 
क क भक ॥ शि # # 
1 
बम भभ क ` त त जनकः त किक जित कः> कक क = = = ॐ 















तथानुगृद्य भगवान्‌ गोपीनां स॒ गुरुर्गतिः । 


त एवं लोकनाथेन परिपृष्टाः सुसस्कृताः । करलेसे ही उनके सारे भश्यम नष्ट हो चुके ये | भब 
` | जव भगवान्‌ श्रीकृष्णने उनका सत्कार किया, कुराल- 
क. ्रत्यूचु्टमनसस्तत्पादेश्षाहतांहसः || २॥ | मङ्गल परा, तन वे अत्यन्त आनन्दित होकर उनसे 
# कने खगे-॥ २ ॥ (भगवन्‌ । बड़े-बड़े महापुरुष मन- 
कुताऽरिवं त्वचरणाम्बुजाप्तवं ही-मन आपके चरणारविन्दका मकरन्दर प पान करते रहते 
शि हैँ | कभी-कभी उनके मुखकभकसे लील -कथाके रूपमे वह 
4 „ महन्मनस्तो सखनिःघतं॑कचित्‌। | रस छटक पड़ता है । प्रमो ! बह इतना अद्कत दिव्य रस 
ध है कि कोई भी प्राणी उसको पी ले तो बह जन्म-म्युके 
पिब्रन्ति ये कणपृटेरल प्रभा चक्रमे डारनेवाटी विस्मरति अथव। अविधाको नष्ट कर 


` "न्क देता है । उसी रसको जो ग्ग अपने कानके दोन 
दहम्भतां देद्रदस्परतिच्छिदम्‌ ॥ २॥ 


एमस्कर जीभर पीते है उनके भमङ्ग्की आशङ्का 


~ +कः कप ॐ: 
+ = 5 > ० 
 तीथमाल्ायामेकरोनश्तितम न्न 





। कठ, च, ¶ 
८ क थ ॥ 
[व १ क) 1 





अ० ८३ ] १ दशम न ९३ 




















हित्वाऽऽत्मधामविधुतात्मकृतत्यवय-  |ही क्याहै१॥ ३॥ भगवन्‌ | आप एकरस ज्ञानखल्प 
| ओर अखण्ड आनन्दके स॒तुद्र ह । बुद्धि-वर्तिर्योके कारण 

होनेवाटी जाग्रत्‌, खप्न, पुपृ्ति--ये तीनों अवध्यापं 
आपके खछयप्रकाडश खख्पतर् पर्हच दही नदीं पातीं 
दूरसे ही नष्ट हो जाती है । आप परभहं्घोकी एकमात्र 
> न गति है | समयके फेरसे वेर्दोका हाप होते देखकर 
कार 1 सिरामातत आतमा उनकी रक्षाके लिये आपने अपनी अचिन्त्य योगमाया 


| द्वारा मलुष्यका-सा शरीर ग्रहण किया है | हम आपके 
मायाकृति परमहंसगतिं नताः स्म } ४ ॥) | चरणोमि बार. वार नमस्कार करते हैं| 9॥ 





मानन्दस्म्पवमखण्डमङण्डबोधम्‌ । 


ऋषिरुवाच भ्रीद्यकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! जिस समय 

दूसरे रोग इस प्रकार मगान्‌ श्रीकृष्णकी स्तुति कर्‌ 

इत्युत्तमश्छोकशिखामणिं जने- रहे ये, उप्ी समय यादव ओर कौर-कुख्की चि 

ष्वभिष्टुवत्खन्धककोरवस्ियः । एकत्र होकर आप्ते मगत्रान्‌की त्रिमुवन-वि्यात 

समेत्य गोविन्दकथा मिथोगर्ण- ठीलाओंका वणेन कर रही थीं । अव्र मैं तुम्हे उन्ीकी 
स्िरोकगीताः श्वृणु व्णेयामि ते ॥ ५ ॥ | बति सुनाता टं ॥ ५ ॥ 

रौ पदुवाच द्रौपदीने कदा -हे रुक्मिणी, मदे, हे जाम्बवती, 


सत्ये, हे सत्यमामे, कान्द), दोन्ये, लक्ष्मणे, रोहिणी 


हे सत्यभामे कालिन्द लैन्ये रोहिणि लक्ष्मणे ॥६ ॥ ओर अन्यान्य श्रीकृष्णपत्नियो ! तुमल्छेग हमें यह्व तो 
ठ न्द्‌ रान्य राहयण ट्म बतानी कि लवं न 


हं छ ःणपल्न्य एतन्ना ब्रूत चा भगवान्‌ खयम्‌ । | लेरगोका अनुकरण करते हए तुमनेोगका ककि प्रकार 
पयेमे च, © 
उ यथा ठोकमनुङकवन्‌ खमायया ॥ ७॥ | पाणिग्रहण किया १॥ ६-७ ॥ 


हे वेदभ्यंच्युतो भद्रे हे जाम्बवति कोसले । 


रुकिमिण्युषाच रुकिमणीजीने कहा- दरोपदीजी । जरासन्ध आदि 
सभी राजा चाहते ये कि मेरा विवाह रिष्युपाच्के साथ 
चै्याय मार्षयितुष्यतकार्धुकेषु हो; उनके ल्य सभी राक्चाख्से सुसनित होकर युद्धके 


व्म्ि तैयार थे । परंतु भगवान्‌ सुच वैसे ही इर जये, 
जैसे सिंह बकरी ओर मेडोके श्चुडरमसे अपना भाग छीन 







राजखजेयभटशेखरिताङ्धिरेणु । ले जाय । क्यों न हो-- जगते जितने भी अजञय वीर 
है, उनके सुकुर्योप इन्हीकी चरणधूडि सोभायमान 
निन्ये मृगेन्द्र छ भागमजावियुथात्‌ होती है । द्रोपदीजी ! मेरी तो यहो अभिखषा है कि 
. | भगवानूके वे दी समस्त सम्पत्ति ओर सौन्दर्ये आश्रय 
व तच्छरीनिकेतचरणे ¢ चरणकमठ जन्म-जन्म सुद्धे आराधना करनेके व्ये प्राप्त ` ९ 
््रीनिकेतचरणोऽस्त॒ ममाचनाय ।। ८ ॥ | होत रहत उनी सामे कमी ह ¢ | 
सत्यभामोवाच सत्यभामाने कष्ा-- द्रौपदीजी ! मेरे पिताजी अपने ` 
भाई प्रसेनकी मृव्युसे बहुत दुखी हो रहे ये, अतः 





। ` लिक्षाभिशापमपमाषटुपाजहार । | उस कङ्कको दूर करनेके व्यि मगवानने ऋषषरान ` 






























द 


ॐ च कन्वी 


= ऋ क ष्क हक क (रि =. न क 
+> (4 [ह छ + =+ + + १ ् ॥ ४१ न 
1 = ~ चै (> ध 4 + * र ९ 
[> 34 क ~ 89) -# नकि 14. ॥. क 9४ $ ह ~ _ + (ए +) ॥ (अ 1 ध ५9 " ॥ (क, क 3 
१ च {4 +£ - ^ 2, न्कधिणिन्यवृषः जक | - ~ > 
+ "क २ ह ॥ च, # ~ 
# ॥ "ऋ # अम्‌ ++ ¬ ~ 0: "++ त 
~+ ॥ ५ र - क न~ 79 ५ 
# क ऋ कीः > । +. ५ भ . “+ +^ (क, व न + 4 # 
ष 2 क| क 9) नोक @ र ह द ॥ कृ ; 4 धी) 9, १. #, 
॥ि १ १५ 1 १७१ शक १ द 9 ॥ क (~^ ॥ ण हि 
क ल ५ ४१४ ५ ॥ # २ 9 4 
॥ 4 ॥ क 
| क ऋ) नि" $ 1, व ~+ त्व च, (कन्व प ` ज ॥ + + अ 3 
ह ^ १ प क 
~ =) न १ क्कच „9.8 ~ १. भने 9 नि भि । <# 
९7 ,# ५, + 8. 1 [१५ ॥ 
4.4 ++ ५ 


न 
४ 9 4 


त= .. 
४ ॥ ४ १ 
। 9 1 
षि ॐ अः 
नदि. ऋ 


^ ^ ` पवक क 


अवाक = च [र 2 ` { ष ता र 7 1 


जित्वक्षेराजमथ रत्नमदात्‌ स तेन 





भीतः पितादिश्चत मां प्रभवेऽपि दत्ताम्‌ ॥ ९ ॥ 
+ जाम्बवत्युवाच 


प्रज्ञाय देकृदथरं निजनाथदेवं 

सीतापतिं त्रिणवहान्ययुनाभ्ययुभ्यत्‌ । 
ज्ञात्वा परीकित उपाहरदर्णं मां 

पादो प्रगृह्य मणिनाहमयुष्य दासी ॥ १०1 


क1टिन्दुवाच 


तपशथ्रन्तीमाज्ञाय खपादस्पशेनाक्चया 


सख्योपेत्याग्रहीत्‌ पाणि योऽहं तद्गरदमाजनी " ११॥ 
मिंत्रविन्द्‌ोव।च 
.यो मां खयंबर उपेत्य विजित्य भूपान्‌ 
निन्येशचवुभगमिवात्मबि दविपारिः। 
आतृ अ मेऽपङुरुतः खपुरं धियो 
| सतसयास्तु मे ऽलुभवमड्भ्यवनेजनःवम्‌ ॥१२॥ 


` स्य) वाच 


सपतक्षणोऽतिबर्वीयंसुतीशष्णभृङ्गान्‌ 


पित्रा छृतान्‌ शितिपवीयंपरीक्षणाय । 
तान्‌ चीरदुमदहनस्तरसा निगद्य 
बन्ध ह यथा शिर ऽजतक्रान्‌। १२) 


डन्‌ बब 


~~ 
+ +न क -9 दर 


श्रीमद्भागवत 






ती 
[न नत > 
ह~ शः कै; १ अहिः , 
0 


[1 न १1 


[ अ० ८३ 





जाम्बवानपर विजय प्राप्त की ओर वह रत्न लाक मेरे 
पिताको दे दिया । अब तो मेरे पिताजी मिथ्या कलङ्क 
खगानेके कारण डर गये । अतः यथपि वे दूसरेको मेरा 
वग्दान कर चुके थे, पिरि भी उन्होने सुश्च स्यमन्तक 
मणिके साथ मगवान्‌के चरर्णोमिं ही समपिंत कर 
दिया ॥ ९ ॥ 

जाम्बवतीने कषा--द्रोपदीजी ! मेरे पिता ्रक्ष- 
राज जाम्बवान्‌को इस बातक्रा पतान था कि यही मेरे 
खामी भगवान्‌ सीतापति दै । इसलिये वे इनसे सत्ताईस 
दिनतक ल्डते रे । परंतु जव परीश्ा पूरी इई, उन्दने 
जान ल्या किं ये मगान्‌ राम ही हैँ, तव उनके 
चरणकमल पकड़कर स्यमन्तकमणिके साथ उपहारके 
रूपमे सुद्चे समपिंत कर दिया । मेँ यही चाहती दँ कि 
जन्म-जन्म इन्दींकी दासी वनी ष्ट्रं | १९ 

कालिन्दीने कदा-द्रोपदीजी ! जव भगवान्‌को यह 
माम हज कि मै उनके चरणणोका स्पर्शं करनेकी 
आश्चा-अभिलाषासे तपस्या कर रही दै, तवर वै भपने 
सखा अयुनके साथ यसुना-तटपर अये ओर मुञ्च 
सखीकार कर च्या | मेँ उनका घट्‌ बुह्यारनेवाटी उनकी 
दती द्रं॥ ११॥ 


मिजविष्दाने कहा--द्रोपदीजी | मेरा खयंबर हो 
रहा था । वहां आकर भगवान॒ने अव राजाओंको जीत 


य्य ओर जेषे सिह ञंड-के-द्ंड कुत्तोमेसे अपना भाग ` 


ले जाय, वैसे हयी सञ्च अपनी शोभामयी द्यरकापुरीमे ठे 
आये । मेरे माईययोने भी सुन्चे मगवानसे दुडकर मेरा 
अपकार करना चाहा, परतु उन्होने उन्ं भी नीचा 
दिखा दिया । मे रेसा चाहती द्र कि मुञ्चे जन्भ-जन्म 
उनके पव पखारनेका सोमाग्य प्राप्त होता रदे ॥ १२॥ 

सध्याने कह। - द्रोपदीजी ! मेरे पितार्जने मेर 


खय ` आये इए राजाओंके बन-पौरषकी परीक्षके ` 


व्यि बड़े बट्वान्‌ ओर पराक्रमी, तीखे सीगवाले सात 
बैर रख छोड थे | उन नेलोने बड़े-बड़े वीरोका धमंड 
चूर-चूर कर दिया था । उन भगवान्‌ने खेल-लेगमे 


ही ज्ञपटकर- पकड च्या, नाथः छा ओर बध दिया; ` 
वैसे दी, जैसे ओट-छोट बच्चे बकरीके वर्को 


~ (4 निअ = च श - 

< ~ ४ | ४ = 

न क द ~ | ह 9 ् ति > 
ग ५ 3 र (थ ४ । ह = 

` च्छ क~ धि १ क~, 





क 
क 


अ० ८३ | 








य इत्थं वीर्यश्चल्कां मां दासीभिश्वत्रङ्किणीम्‌ । 


पथि निजित्य राजन्यान्‌ निन्ये तदाखमस्तु मे।१४॥। 
भद्रोवाच 

पिता मे मात॒ङेयाय स्वयमाहूय दत्तवान्‌ 

कृष्णे कृष्णाय तचित्तामक्षोरिण्या सखीजनेः।।१५॥ 


अख मे पादसंस्पर्शो भवेजन्मनि जन्मनि । 


कमेमिभ्रौम्यमाणाया येन तच्छरेय आत्मनः 11१ ६॥ 


लक्ष्मणोवाच 
ममापि राक््यच्युतजन्मकरमं 
श्रुत्वा अहुनोरदगीतमास ह । 


चित्तं युङघन्दे किल पद्महस्तया 

वृतः सुसंमरश्य विहाय लोकपान्‌ ॥१.७॥। 
ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितवत्सलः। 
बरहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायमचीकरत्‌ ।१८॥ 
यथा खथंबरे रा्ञि मत्यः पार्थेप्सया कृतः । 
अयं तु बदहिराच्छनो दस्यते स जले परम्‌ ।१९।। 

=, 0. भू मरि 

्रुत्वेतत्‌ सवती भूपा आययुमतिपतुः पुरम्‌ 
स्वीखररख्तचज्ञाः सोपाध्यायाः सहखश्चः 11२०॥ 
पित्रा सम्परजिताः सव यथावीयं यथावयः । 


आददुः सशरं चापं वेद्धुं पषदि मद्धियः 11२१1 
१. प्रेम्णा ] 






। कि न # 
गणो च > शो 
„अष 


"क 2 न ^ » 


गस्ओके साथ मेरे पिताजीकी 





पकड ठेते है || १३ ॥ इस प्रकार भगव्रान्‌ वट-पौरुषके 
द्वारा मस्रे प्राप्तकर चतुरङ्गिणी सेना ओर दासियेकिं 


अ 


साथ द्वारका ठे आये । मागमे जिन श्षतरिर्योन विध्न 
डाच) उन्हं जीत भा ल्या | मदा यहा अभिलवा टं 
कि मुञ्चे इनकी सेवाका अवसर सदा-सवंदा प्राक्त हीता 
रहे ॥ १४ ॥ 

भद्राने कहा- ्रोपदीजी ! भगवान्‌ मेरे मामाके 
पुत्र हैँ । मेरा चित्त इन्दीके चरणोमिं अनुरक्त हो गया 
था । जव मेरे पिताजीको यह बात माम इड, तब 
उन्दने खयं ही भगवान्‌को वबुटाकर अक्षौहिणी सेना 
ओर वहत-सी दासि्योके साथ मुञ्चे इन्टीके चरणमिं 
समापतत कर दिया ॥ १५॥ म अपना परम कल्याण 
इसीमे समञ्नती द्र कि कमंके अनुसार मुञ्चे जर्हा-जहा 
जन्म लेना पडे, सवत्र इन्दीके चरणकमरका संश्पद 
पराप्त होता रहे ॥ १६ ॥ 

ठक्ष्मणाने कहा-रानीजी ! देवर्षि नारद वार- 
वार्‌ भगवानूके अव्रतार ओर रीखाओंका गान करते 
रहते थे । उसे सुनकर ओर यह सोचकर कि च्मी- 
जीने समस्त लोकपालंका व्याग करके भगवान्‌का ही 
वरण किया, मेर्‌ चित्त भगवान्‌के चरणों आसक्त हो 
गया ॥ १७ ॥ साध्वी ! मेरे पिता बृहत्सेन सुञ्चपर 
वहत प्रेम रखते थे | जव उन्हें मेरा अभिप्राय माद्टम 
हआ, तव उन्होने मेरी इच्छकी पूर्तिक स्वि यह उपाय 
किया ॥ १८ ॥ महारानी ! निक्ष प्रकार पाण्डववीर 
अजुनकी प्राप्तिके च्वि आपके पिताने सखर्यवरमें मल्स्य- 
वेधका आयोजन किया था, उसी प्रकार मेरे पिताने भी 
किया । आपके खयवरकी अपेन्ना हमारे यहाँ यह 
विशेषता थी किं मत्स्य वाहरसे ठका इअ था, केवर 
ज्म ही उसकी परख दीख पडती थी ॥ १९ 1 
जव यह समाचार राजाओंको भिका, तव सत्र ओरसे 
समस्त अख्र-शसखरोके तच्छज्ञ॒ हजारो राजा अपने-अपने 
राजधानी आने 
ल्गे ॥ २०॥ मेरे पिताजीने आये इए सभी राजाओं- 
का बक-पोरुष ओर अवस्थाके अनुसार भीमेति खागत- 
सत्कार किया । उन रोगेने मुञ्चे प्राप्त करनेकी इच्छसे 
स्यवरसभामे रक्खे इए घुष ओर बाण उश्ये ॥२१॥ 


= [पे वि ए 7 २ र रि 217 


5 [1 । ~ (न 


कमयत ऋतन्कन्पक भ 

















~+ ह - 
ऋ न ¬, 3 -* 
१; - =-= = 
। | | [शधि श्चर्दाकप्षकदाक्षमाक्ष पक्षे 
| ज [= ५ 
॥ न्वै क क 4 द 4 ५ 
॥ १ ५ 
3 "ष ~ > 
कक) ल 
॥ 2 ३ = 
। ४: ओ 


नीतयः चदा ज जा 7 न 


# ॥ न #१ (५ 
हि > + 
पि [1 7 क) नि 
के + कः ॥+ प) 7 ॥ 





६२३४ 





आदाय व्यसृजन्‌ केचित्‌ सज्यं कतुंमनीश्वराः । 
आकोटि ज्यां सयत्छृष्य पेत॒रेकेऽयुना हताः ॥२२। 
सज्यं कृत्वा परे वीरा मागधाम्बष्ठचेदिपाः | 
भीमो दुर्योधनः कर्णो नाविन्द॑स्तदबयितिम्‌ ।२३॥। 
मत्खयाभासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा च तदवयितिम्‌। 
पार्थोयत्तोऽसृजद्‌ बाणं नाच्छिनत्‌ पस्परदो परम्‌।२४। 
राजन्येषु निव्त्तेष॒ भभ्रमानेषु मानिषु । 
भगवान्‌ धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ रीख्या ॥२५]। 
तसिन्‌ संधाय विशिखं मत्स्यं वीक्ष्य सकृजठे । 
छिच्वेषुणापातयत्तं चयं चाभिनिति स्थिते ॥२६॥ 
दिवि दुन्दुभयो नेदुजंयशब्दयुता थुवि । 
देवा कसुमासारा्‌ यखचदर्पविद्धाः ।।२७॥ 
तद्‌ ॒रङ्गमाविशमहं कलमुपुराभ्यां 
पद्भ्यां प्रगृह्य कनकोज्ज्वलरतमालाम्‌। 
नत्ने निवीय परिधाय च कोशिकाग्रये 
सव्रीडहासबदना कबरीधतक्तक्‌ ॥॥२८॥ 


उन्नीय वक्त्रय्ुरुङ्कन्तर्कण्डलत्विड- 


जयोति ` जाक त `आ क @ जोक न वि 


श्रीमद्भागवत 


| अ० ८३ 


== ~ ~- 





उन्मसे कितने ही राजा तो धनुषपर्‌ रतौतभीन चदा 
सके । उन्होने धनुषको ज्यो-का-त्यों रख दिया | कयोने 
धलुपकी डोरीको एक ॒सिरेसे वोँधकर दूसरे सिरेतक 
खींच तो च्या, प्रतु वे उसे दूसरे सिरेसे बोधन 
सके, उसका टका ल्गनेसे गिर पड़ ॥ २२॥ 
तनीजी ! वडे-वड प्रसिद्ध वीर--जंसे जरासन्ध, अम्वरघ्र- 
नरेद, शिद्युपाट, भीमसेन, दुर्योधन ओर कणं- इन 
लयोगोने धनुपपर डोरी तो चदा ठी । परंतु उन्हें मदटीकी 
सितिका प्रता न चका | २३ ॥ पाण्डकव्वार्‌ अजुननं 
जलम उस मछटीकी परछईं देख टी; ओर यद भी जान 
च्या कि वह करौ है | वडी सावधानीसे उन्होने 
वाण छोड़ा भी; परंतु उससे स्येव न द्आ, उनके 
वाणने केवर उसका स्परामत्र क्रया | २४ ॥ 

रानीजी ! उस प्रकार वड़-त्रड अभिमानियोका मान 
मदन हो गया | अधिक्ांडा नरपतियोने मुञ्च पानेकी 
ल्पा एवं साध-दी-साथ सक्ष्यवेधकी चा भी छोड 
दी । तव॒ भगवान्‌ने धनुप उठाकर खेल-खेलमं-- 
अनायासद्ी उसप्रर डोरी चदा दी । बाण साधा ओर जवम 
केवट एक वार मछटीकी परइ देखकर वाण मारा 
तथा उसे नीचे गिरा दिया । उस समय ठीक दोपहर 
हो रहा था, सर्वाधसाधक “अभिजित्‌? नामक मुरतं 
बीत रहा था ॥ २५-२६ ॥ देव्ीजी ! उस समय 
पृथ्वीम जय-जयकार होने चणा ओर आकाशम दृन्दुभिर्यो 
वजने च्गीं । वड-वड देवता आनन्द-विह्वट होकर 
पुष्पकी वषं क्रने ट्गे ॥ २७॥ रानीजी ! उसी 
समय रने रगशालमें प्रवेश किया । मेरे परोके पायजेव् 
रुन्चन-रुनघ्यन वोक रदे थे । मेने नये-नये उत्तम रेशमी 
वख धारण कर रक्खे थे । मेरी चोवियोमे माका धी 
हई थीं ओर मुंहपर कजामिश्चित मुसकराहट थी । मैं 
अपने हाथमे र्नोका हार च्वि इए थी, जो बीच-वीचमें 
ल्गो इए सोनेके कारण ओर भी दमक रहा था। 
रानीजी ! उस समय मेरा मुखमण्डल धनी धुरली 
अल्वोसे शोभित हो रहा था तथा कपोछपर कुण्डलोकी 
आमा पड्नेसे वह ओर भी दमक उठा था । मैने एक 
बार अपना मुख उठाकर चन्द्रमाकी किरणेके समान 


न 
ति 
[1 वि 





+ = ५ ~ 
(८ ष, ऋ $ ह 9 

+ क नक, ह 

^ १ 4 ५ ॐ 


५ ठ क (क 
¢ 9] 44 
= 9 


* नि क ज स श ए. र 


01) | 





7 









= निरीक्ष्य परितः शनकमरारे 


रसेऽयुरक्तहृदया निदधे खमासाम्‌।।२९॥॥ 





ताबन्मृदङ्गपरदहाः शङ्खभेयोनकादयः । 


प ९ 


नत्या 


। 


नेनेदुनैट ननूतुगौयका 


न्य्‌ 


जगुः ॥३०॥॥ 


‡ छ, क 


एवं बते भगवति सयेशे चृपयुथपाः 


| 
न सेहिरे याज्ञसेनि स्पधेन्तो हच्छयातुराः ।।३१॥ 


मां तावद्‌ रथमारोप्य हयरलनचतुष्टयम्‌ 1 | 


शाङ्खमुद्यम्य संनद्रस्तयावाजौ चतुः ॥३२॥ 
दारुकशोदयामास काश्चनोपस्करं रथम्‌ । | 
मिषतां भू जां राज्ञि रगाणां म्रगराडिव ॥।३३॥ | 
तेऽन्वसज्ञन्त राजन्या निषेद्धुं पथि केचन । 


संयत्ता उद्धृतेप्वासा ग्रामर्सिंहा यथा हरिम्‌ ॥२४॥ 


जनक 


ते शाङ्गच्युतबाणौेः कृत्तवाहङ्किकन्धराः 


निपेतुः ग्रथने केचिदेके संत्यज्य दुद्ुबुः ।२५॥ 


9 
॥ । 


ततः पुरीं यदुपतिरत्यङंकृतां 


रविच्छदध्वजपटचित्रतोरणाम्‌ । 
कुशस्थलीं दिवि यवि चाभिसंस्त॒तां 
समाविशत्तरणिरि खकेतनम्‌ ॥॥२६॥ 


वः +~ 
^ ५# 1 
न [५ 


क 









© पजयामास <+ 


 पितामे पजयामास सुूत्सम्बन्धिबान्ध न्‌ 
१. मयेमे | : ६ ~> 


* नयाद्धु म्मता | 





[का ान्ग्कन्कन्कनकनकरनक्यकच्यकराकया्यकाकान्यकाषक्यक्यकयककयककककगयककन्यकककन्यकककक्यकषकककककन्यकण्क्यक्यक्न्कन्कन्वम्वम्वग्कणररराकवकयोग्यग्यो यिय 


अनुरक्त धा ॥ २८-२९ ॥ मेने ज्यों दही वरमा & 


। ~ 
। शाज्गघनुष लेकर तथा कव्रच पहनकर युद्ध करनेके 


। कुछ राजाओंने धनुष टकर युद्धके व्यि सज-धजकर ` 


- | इए ॥ २५ ॥ 


`| छ्गाये गये थे कि उनके कारण 


= > "क 
न्न न्त 0 


सुशीतल हास्यरेखा ओर तिरी चितवनसे चात ओर 
बैठे इए राजाओंकी ओर देखा, फिर धीरेसे द 
वरमाला मगव्रान्‌के गमे उठ दी | यह तो कह दही 
चुकी ह्व किं मेरा हृदय प्रहलेसे ही भगवानूके प्रति 







पहनायी त्यों ही मृदङ्ग, पखावज, शङ्ख, टो, नगारे आदि 
बाजे वजने ठ्गे ] नट ओर नतेकि्यौँ नाचने च्गीं॥ 
गवेये गने रगे ॥ २० ॥ । 
दरोपदीजी ! जव मेने इस प्रकार अपने खामी ग्रिय- 
तम भगवानूकतो बरमाला पहना दी, उन्हें वरण कर्‌ 
विया, तव॒ कामातुर राजाओंको वडा डाह इआ । वे 
ब्रहत हा चिद गयं ॥ ३१ ॥ चतुमुज मगवानूने अपने 
्रष्र चार बोडोवाटे रथपर सद्चे चढ़ा ल्या ओर हाथमे 


के, = (०, छ 


3 # 


¢+ "1 ^ 01 (र १ 
का 41 क ~ / 


१ क ॥ 














वे रथपर खड़े हो गये ॥ ३२ ॥ पर रानीजी ! दारुकने 
सोनेके साज-सामानसे ट्दे द्रप रथको सव राजाओंकें 
सामने ही द्रारकके व्यि हक दिया, जैसे कोई सिह 
हरिनोके वीचसे अपना भाग ठे जाय ॥ ३३ ॥ उनमेसे 


इस उदे स्यसे रास्तेमं पीटा किया किं हम भगवानूको 
रोक ठे; परंतु रानीजी ! उनकी चेश ठीक वैसी ही 
थी, जसे कुत्ते सिहको रोकना चाहं ॥ ३४ ॥ याङ्ग 
धनुषके द्ृटे इए तीरोसे किंसीकी र्बोह कट गयी तो 
किसीके पैर कटे ओर किंसीकरे गर्दन ही उतर गयी । 
बहृत-से च़्ेग तो उस रणमभूमिमं ही सदके ्ि सो 
गये ओर बहुत-से युद्धभूमि छोडकर भाग खड ` 





तदनन्तर यदुधंशरिरोमणि भगवानले सूर्यकी 
अपने निवासस्थान खग ओर प्थ्वीमे सवत्र प्रशंसित ` 
दारका-नगरीमं प्रवेरा किया । उस दिन वह विशेषखूपसे 
सजायी गयी थी । इतनी ज्ञडिर्यौ, पताकां ओर तोरण 


द > 













तक नह आ पाताथा॥ ३६॥ 


| हो जानेसे पिताजीको बहुत प्रसनता इई । उन्दने ल | उन्दने 


8 वि ९ > श्रीमद्भागवत [ ज० ८३ 
महाहवासोऽलंकारेः ` शय्यासनपरिच्छदेः ॥२७] बहुमूल्य वक्त, आभूष्रण, शय्या, आसन ओर विविध 
प्रकारक सामग्रि्यो देकर सम्मानित किया ॥ ३७ ॥ 
भगवान्‌ परिपूणं हँ तथापि मेरे पिताजीने प्रेमा 
उन्हं बहृत-सी दासिर्यो, सव प्रकारकी सम्पत्तियौ, 
आयुधानि महाहौणि ददौ पूणस भक्तितः ॥३८॥ | सैनिक, हाथी, रथ, घोडे एवं वदरत-से वदरमूल्य अख-शख 

समर्पित किये ॥६८॥ रानीजी ! हमने पूर्वजन्म सवकी 
आत्मारामस्य तस्येमा वयं वें  गहदासिकाः । आसक्ति छोडकर कोई बद्रत वडी तपस्या की होगी, 
तभी तो हम इस जन्ममें आत्माराम भमगवान्‌की गृह 
` सवेसङ्गनिचच्याद्भा ` तपसा च बभरविम ॥३९॥ | सियो इई दै ॥ ३९ ॥ 











नि 








"दासीभिः स्वंसम्पद्धिभं टेभरथवाजिभिः 


महिष्य ऊचुः सोलह हजार पत्नियोंकी ओरसे रोदिणीजीने 
कहा-भोमासुरने दिन्विजयके समय बदहत-से राजाओंको 
भोमं निहत्य सगणं युधि तेन रुद्रा जीतकर उनकी कन्या हमटोगोको अपने मह्मं वदी 


बना रक्खा था । भगवान्‌ने यह जानकर युद्धम भोमा- 
` ज्ञात्वाथ नः क्ितिजये जितराजकन्या; । | सुर ओर उसकी सेनाका संहार कर॒ उाव् ओर खयं 
पूणकाम होनेपर भी उन्होने हमघ्येगोको वर्ति छडाया 
निय॑च्य संसृतिविमोक्षमनुखरन्तीः तथा पाणिग्रहण करके अपनी दासी वनां व्या | 
ल रानीजी । हम सदा-सवदा उनके उन्ीं चरणक्रम्रका 
षलास्बुजपारणनाय य्‌ अप्तकामः।।४०॥ | चिन्तन करती रहती शी, जो जन्म-मरृव्युखूप संसारसे 
प मुक्त करनेवठे हं || ४०॥ साध्वी द्रोपदीजी ! हम 
न वयं साध्वि साम्राज्य खाराज्यं भोज्यमप्युत । साम्राज्य, इन्द्रपद अथवा इन दोनेके भोग, अणिमा 
वि आदि देद्य, ब्रह्माका पद, मोश्च अथवा सालेक्य, 
 । वैराज्यं च आनन्त्यं चा हरेः पदम्‌ ।॥४१॥ | सारूप्य आदि कु 
~ ॐ रू केव्रटं इतना ही चाहती हं कि अपने प्रियतम प्रमे 
[1 ह एतस्य शरीमत्पाद्रजः श्रियः सुकोमल चरणकमव्यकी वह श्रीरज सर्वदा अपने सिरर 
{ । ¬ । वहन किया करे, जो कर्मीजीके वक्षःस्थल्पर ट्गी दई ` 
 ( कचज्ङ्मगन्धाद्यं मधं बोढुं गदाभृतः ।।४२॥ | केररकी एगन्धसे यक्त है ॥ ४१-४२ ॥ उदारदिर- 
3 मणि मगवान्‌क जिन चरणकमव्रैका स्पशं उनके गौ 
व्रजच्ियो यद्‌ बाज्छन्ति पलिन्यस्तणवीरुधः चराते समय गोप, गोप्यो, भीषिने, तिनके ओर धास- 
रछ्ताएतक करना चाहती शी, उन्हीकी हमे भी चाह 
गावश्वारयतो गोपाः पादस्पशं महात्मन; ।४२॥ | है ॥ ४२ । 
"८९ अ च ष्2.-- 
- इतिऽ श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां 
` -द्शमस्वन्धे उंत्राघे त्य्ीतितमोऽध्यायः ॥८३॥ 



























४ 


# )। () नै र { 
# ^ 4 क 9 [क कवक ` व 7 न 9 क ॥ त धि क) यदि = ५ कि 
 ॥# = + न्क 1 4 


क, 
क ति तै चै 
ग न † 
1 2.1 ^. {1 
"रीय 


। कि 





अ० ८४] ` दृश्चम स्कन्ध ६२७ 














जि जि 


अथ चतुररीतितमोऽध्यायः 


वसदेवजीका यज्ञोत्सव 
श्रीक उवाच | श्रीद्यकदेवजी कहते ह- परीक्षित्‌ । सर्वात्मा भक्त- 
ज्नसेनी भयहारी भगवान्‌ श्रीकृष्णक्रे प्रति उनकी पल्ियाका 
शरुत्वा प्रथा सुबलपुच्यथ याह 


कितना त्रेम है--यह वात कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी 
सुभद्रा, दृसरी राजपत्नियों ओर भगवान प्रियतमा 
कृष्णेऽखिरात्मनि हरी प्रणयालुबन्धं गोपियोने भी सुनी । सव-की-सव उनका यह अ्नरविक 
स्वा वििस्म्युररमश्चकलाङ्घलाक्ष्यः ॥ १॥ म देकर अवन्त सन नन 
१. सवके नत्राम प्र॑मके असू च्च्क आये॥ १॥ इस 

प्रकार जिस समय चस्ियोसे चर्यो ओंर पुरुषोंसे पुरुष 


माधव्यथ क्ितिपपरन्य उत खगोप्यः । 


इति सम्भाषमाणं सीभिः स्रीषु नृभितरेषु । 


आययुप्र॑नयस्तत्र करष्ण्रामदिदक्षया | | 4 | | बातचीत वर्‌ रषं थे, उसी समय बरहुत-से ऋषि-पुनि 

[4 न [8 च म = (न भ 
८६ ग £ भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वट्रामजीका ददान करनेके ज्यं 
देपायनो नारदश्च च्यवनो देवलोऽसितः । > | 


वदँ आये ॥ २ ॥ उनमें प्रधान ये ये-- श्रीकरष्णद्रेपायन 
व्यास, देवि नारद, च्यवन, देवक, असित, विश्वामित्र, 
रामः साश्ष्या भगवान्‌ वास गाला भ्रूखुः । । भरद्वाज, गोतम, अपने शिष्याकें सहित भगवान्‌ 
पुलस्त्यः करयपोऽत्रि् माकंण्डयो बृहस्पतिः 11 ९ ॥ | युतम वतत, गाल 9 असला क 
मार्कण्डेय, ब्रहस्पति, दित, त्रित, एकत, सनक, सनन्दन, 
दवितखितभेकतशथ बहापूत्रास्तथाङ्धिराः । सनातन, सनत्कुमार, अर्धिरा, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य ओर 
वामदेव इत्यादि | २--~ | ऋषिर्योको देखकर पडलेसे 
बैठे हए नरपतिगण, युधि्ठिर आदि पाण्डव, भगत्रान्‌ 
तान्‌ दष्टा सहसोत्थाय प्रागासीना रूपादयः । व स क = 
ओर सवने उन विश्ववन्दित ऋषियोंको प्रणाम किंया ।६। 
पाण्डवाः कृष्णरामो च प्रणेयुविंशवन्दितान्‌ ।। £ ॥ | इसके वाद्‌ खागत, आसन, पाद्य, अव्य, पु्यमाद््, धष 
५ त ओर चन्दन आदिसे सव्र राजाओने तथा वल्रामजीके 
तनानदयथा सव सहरामाऽच्युताऽचयत्‌ । साथ खयं भगतव्रान्‌ श्रीकरष्णने उन सव ऋषियोकी 
स्वागतासनपाद्याध्यमारयधूपानुरेपनेः ॥ ७ ॥ | वििपूवंक पूजा की 1७॥ जव सत्र छषरनि आरामसे 
बैठ गये, तवर धर्मरक्के च्थिि अबतीणे भगवान्‌ श्रीकरष्णने 
उनसे कहा । उस समय वह वहत वडी स॒मा चुपचापं 
सदसस्तस्य . महतो यतवाचोऽनुभयृण्बतः ।। € 1) | भगवानूका माण सुन रही थ ॥ < ॥ 


विश्वामित्रः शतानन्दो भरद्राजोऽथ गोतमः \\ २\ 


अगस्त्यो याज्ञवल्क्यश्च वामदेवादंयोऽपरे 1 ५1 


उवाच सुखमासीनान्‌ भगवान्‌ धरमयुश्ुः । 


श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा- धन्य है । हमोगोका 
स = ` जीवन सफ गया, आज जन्म लेनेका हरम प्रा-पूरा 
अहा वय जन्मभृता रन्ध कात्स्न्यन तर्फरम्‌ । दोगा क 


फर मिल गया; क्योकि जिन योगेश्वरोका दशन जडे- 
देवानामपि दुष्प्रापं. यद्‌ योगे्रदशेनम्‌ । ९ ॥ । बडे देवताओंके ल्म भी अव्यन्त दुरम है, उन्हीका 
१.भिः। २.योग्रप। 


| अ 
९८ श्रीमद्भागवत | अ० ८४ 











किं स्वर्पतपसां नृणामचायां देवचक्षुषाम्‌ । दशन हमें प्रप्त दज है ॥ ९ ॥ जिन्न वहत ॒धोडी 
1 तपस्या की है ओर जो लोग अपने इश्देवको समस्त 
द्शनस्परनपरक्षप्रहपादार्चनादिकम्‌ ।॥९०॥) | प्राणियोके हदये न देखकर केवल मूर्तिविदोषमें दी उनका 





दरशन करते है, उन्हे आपलोगोके दर्शन, स्परा, कुराल-ग्रदन 
प्रणाम ओर पादप्रूनन आदिका सुअव्रसर भटा कव 
| ते पुनन्त्युरुकारेन दर्शनादेव साधवः ॥११। ४, श ५ व ह. 
। ०. ( कहटातं न सिद्राया ५.६४ न 
=-= स ही देवता नहीं होती; संत पुरुष दी वास्तवमे ती 
सन छ न च चनद्रतारका ओर देवता है; क्योकि उनका वहत समयतक से्रन 
| किया जाय, तत्र वे परवित्र करते है; परंतु संत पुरुष 
। न भजर खं शवसनोऽथ वानः तो दर्शानमात्रसे ही कृतार्थं कर ठेते टै || ११॥ अग्नि 
। सूय, चन्द्रमा, तरे, प्रथ्वी, जल, आकाड, वायु, वाणी 
। उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं ओर मनके अधिष्टातृ-देवता उपासना करनेपर भी पापका 
। पूरा-प्ररा नादा नहीं कर सकते; क्योकि उनकी उपासना- 
से भेद्-बुद्धिका नादा नहीं होता, व्ह ओर भी वदती 
है । परंतु यदि धडी-दो-घड़ी भी ज्ञानी महापुरुषोकी 
सेवा की जायतोवे सारे पराप-ताप मिटा देते है; 
यस्यात्मबुद्धिः इणपे त्रिधातुके क्योकि वे भेद-बुद्धिके विनाशक हैँ ॥ १२ ॥ महात्माभ 
| ओंर समासदो ! जो मनुष्य वात, पित्त ओर कफ--इन 
तीन धातुओंसे बने दए ॒राव्रत॒ल्य दारीरको ही आत्मा- 
अपना भैः, द्ली-पुत्र आदिको ही अपना ओर मिद्ध, 


न ्यम्मयानि तीथानि न देवा मृच्छिलामयाः 


विपञ्चितो घ्रन्ति युदहत॑सेवया ॥१२॥ 













स्वधीः कठत्रादिषु भोम इज्यधीः 


© @ @< (~^ = का (~ थिव त्रिकः = [न इदे टेव 
यत्तीथवुद्विः सरिङे न कर्हिचि- ८ १२, का स पा १९) हा ध मानता 
ॐ हे तथा जो कवक जल्को ही तीथं समञ्नता है--ज्ञानी 
; स महापुरूषोंको नदी, वह मनुष्य होनेपर भी पट्ओंमे भी 


जनेष्वभिज्ञे एव गोखरः न री है 
¶ स॒ एव गाखरः।।१३॥ नीच गघ्रादह्ादहं॥ १३॥ 


श्रीक उवाच भ्रीटयुकदेवजी कहते हँ- परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्री- 
ः [ कृष्ण अखण्ड ज्ञानसम्पनन ह | उनका यह गूढ माषण 
1. निराम्येत्थं भगवतः कृष्णयाङ्कण्टमेधसः | सुनकर सव-के-सव्र ऋश्रिसुनि चुप रह गये । उनकी 


+ यद्धि चक्रम पड़ गयी, वे समञ्च न सके किं भगवान्‌ 
। , वचो इरन्यं विप्रास्तष्णीमासन्‌ भ्रमद्धियः ।१४॥ | यह क्या कह रदे है ॥ १४ ॥ उन्होने बहुत देरतक 
~ विचार करनेके वाद यह निश्चय किया किं भगवान्‌ 


{= $्थरस्येदितव्यताम्‌ (~ सर्वेश्वर होनेपर भी जो इस प्रकार सामान्य, कम-परतन्तर 
वः विस्य धनय सतन्यताम्‌ । जीवकी भति व्यवहार कर रहे टै---यह केव लोक 


£ संप्रहके च्य ही है । रेखा समञ्चकर वे मुसकराते इए 
भनसग्रह इत्यूचुः स्मयन्तस्तं जगद्गुरम्‌ ॥१५५॥ | जगद्गुरु मगवान्‌ श्रीकृष्णसे कहने रगे ॥ १५ ॥ 


१. समरन्त० । 
4 नङ र क) 
[ का, 
क 


 "~--~-~ 





नि, 








अ० ८४ | 


गृनय ऊचुः 

यन्मायया तच्चविदुकत्तमा वयं हमटोग मोहित हो रहे हैँ । अप खयं ईर होते इए 
=-= ८ भी मनुष्यकी-सी चेशञओंसे अपनेको चिपाये रखकर्‌ ` च 
विमोहिता विंधसुजामधीश्चराः । नीबकी भोति भार्ण कते ६1 न 
यदीरितन्यायति गूढ॒ईहया आपकी टीटा अत्यन्त विचित्र है । परम आर्मी 
है ॥ १६॥ जंसे प्रवी अपने विकारो-व्रक्ष, पत्थर 

अहो विचित्रं भगवद्विचेषटितम्‌ ।१६॥ | घट आद्विके द्वारा वहृत-से नाम ओर ख्य ग्रहण कर्‌ 
३ | ठेती है, वास्तवमं वह एक हीह, वैसे ही आप एक । 
ताद एतद नद्यक् आत्मना । ओर चे्टदीन होनेपर भी अनेक ख्य॒ धारण कर छेते | 
टजत्यवत्यत्ति न वध्यते यथा | दै ओर अपने-आपसे ही इस जगतकी स्वना, रका आ 
- संहार करते है । पर यह सव्र करते दए भी इन करेसि 

भोमेहि भूमिवंहुनामरूपिणी चिक्त नहीं होते । जो सजातीय, विजातीय ओर खगत 


















| 
_ | मेदशून्य एकरस अनन्त है, उसका यह चस्ति टीव्य- 
अहा विृञ्न्वारतं वडञ्बनम्‌ \\ १७ | मात्र नदीं तो ओरक्या है १ धन्य है आपकी यह 
टीत् ! | १७ ॥ भगवन्‌ ! यद्यपि आप प्रकृतिसे पर, 


अथापि काटे स्वजनाभिग | = 
भ्‌ त स्य वप्रख्रह्म परमात्मा ह; तश्रा सपय-समवपर्‌ मक्त 


विभपि सं खलनिग्रहाय च । जनोकी रक्षा ओर दुका दमन करनेके स्मि वियद 
| समय श्रीविग्रह प्रकट करते है ओर अपनी टीककि 
्‌ स्वलीलया वेदपथं सनातनं द्वारा सनातन वैदिक मार्गकी रक्षा करते है; क्योकि 


सभी वर्णो ओर आश्वमोके रूपमे आप खयं दी प्रकट 
है ॥ १८ ॥ मगवन्‌ ! वेद्‌ आपका विद्र हदय है; 
तपस्या, खाध्याय, धारणा, ध्यान ओर समाधिके दवाय ` 
उसीमे आपके साकार-निराकार ख्प ओर दोनोकरे 
यत्रापब्धं सद्‌ व्यक्तमव्यक्तं च ततः परम्‌ ॥१९॥| अभिष्ठानखरूप प्रह परमात्माका साननात्कार दाता 
हं ॥ १९. ॥ परमात्मन्‌ ! ब्राह्मण दही वेदाकरे आरभत 
तसाट्‌व्रहम्करं ब्रह्मन्‌ शाख्यानेस्त्वमातमनः । आपके खख्प्रकी उपठ्ध्धिके स्थान ठै; इसीसे आप 
ब्राह्मणोका सम्मान करते है ओर इसीसे आप ब्राह्मण- ` 
सभाजयत सदाम तर्‌ बम्याग्रमीभवान्‌ ॥२०॥ | भक्तोमे अग्रगण्य भी है ॥२०॥ आप सर्वव्रिध कल्याण- 
साधनोकी चरम सीमा दै ओर संत पुरुषोकी एकमात्र 
गति है । आपसे मिक्कर आज हमारे जन्म, विद्या, तप ओर ` 


५ 2 ज्ञान सफल हो गये । वास्तवमें फल आप्‌ 
` स्वया संगम्य सद्वत्या यदन्तः श्रेयसां परः ॥२९१॥ ` | ७ 
न 1 


नमसतस्मे भगवते कृष्गायदष्ठमेधये। ` खयं सचिदानन्दखरपर परह्य पमात्मा म 


` = ग्न 


वणाश्रमात्मा पुरुपः परो भवान्‌ ॥१८॥ 


रह्म ते हृदयं श॒क्रं तपःखाध्यायसंयरेः | 





अद्य नो जन्मसापस्य विद्यायास्तपसो च्याः 





1 ~ कैः 


(> प ~ क - “+^ ~ न "5 
५१ अ + 10; ५ ` +. र 


। = 5 ॥ श्रीमद्भागवत [ अ० ८४ 


नन्वव नि नायानयोगयकनयनोनय ज~ = 


खयोगमाययाच्छन्नमहिम्ने परमात्मने ॥२२॥ | आपने अपनी अचिन्त्य शक्ति योगमायाके द्वारा अपनी 
महिमा छिपा रक्खी है, हम आपको नमस्कार करते 
द ॥ २२ ॥ ये समामे बैे हए राजालोग ओर दूसरोकी तो 
नात ही क्या; खयं आपके साथ आहार-विहार करने- 
| | $ 1 बाल यदुवरा छोग भी आपको वास्तवमें नदीं जानते; 
^ माथाजवनिकाच्छन्मात्मानं कालमीश्चरम्‌ ।२२।। | क्योकि आपने अपने खरूपको जो सवका आतमा, 
(6 । | जगत्का आदिकारण ओर नियन्ता है--मायाके परदेसे 
। 5 ` ठक रक्खा है ॥ २३ ॥ जत्र मनुष्य खप्न देखने ठ्गता 
ह, उस समय खप्नके मिध्या पार्थको ही सत्य समञ्च 
केता है ओर नाममात्रकी इन्दियोसे प्रतीत होनेवाले 
नाममत्र्द्रयाभात न वेद रहितं परम्‌ ॥२४॥ | अपने खमप्नशरीरको ही वास्तव्रिक शरीर मान करैवता है | 
उसे उतनी देरक चे इस वातका त्रिलकरुख द्वी पता नहीं 
रहता कि खप्नरारीरके अतिरिक्त एक जाग्रत्‌-अवस्थाका 
| । रारीर भी है ॥ २४ ॥ ठीक इसी प्रकार जाग्रत-अव्थामे 
। भी इन्दियोकी प्रवृत्तिरूप मायासे चित्त मोहित होकर 
, मायया विभ्रमचित्तो न वेद स्म्रत्युपरवात्‌ | २५॥ | नाममात्रके विषयमे भटकने क्गता है | उस समय भी 
; 6 | चित्तके चक्रसे वित्रेकदाक्ति ढकः जाती है ओर जीव यह 
| नहीं जान पाता कि आप इस जाग्रत्‌ संसारसे परे 
है ॥ २५॥ प्रभो ! वडे-वड़े ऋषि-म॒नि अत्यन्त परिकर 
योग-साधनाके द्वारा आपके उन चरणकमलको हृदयम 
तीथास्पदं हदि कृतं सुविपक्षयोगैः। | धारण करते है जो समस्त पापराशिको नष्ट करनेवाले 
| गङ्गाजक्के भी आश्रयस्थान है | यह बड़े सौमाग्यकी बात 
| है किं आज हमें उन्हीका दर्शन इआ है । प्रमो | हम 
उत्सिक्तमेक्तयुपहताशयजीवकोरा | आपके भक्त है, आप हमपर अलुप्रह कीजिये; क्योकि 
| आपके परम पदकी प्राति उन्ीं सेगोको होती है, जिनका 
टिङ्गरारीरखूप जीव-कोडश आपकी उत्करष्ट॒भक्तिके द्वारा 
नष्ट हो जाता है ॥ २६ ॥ 
श्री्युक उवाच श्रीञ्यकदेवजी कहते हैँ-राजे । हि इस 
९ 5. प्रकार स्तुतिं करके ओर उनसे, राजा धृतराष्टूसे तथा 
इत्यनुज्ञाप्य दाराह शतरा्र युधिष्ठिरम्‌ | धर्मराज युधिष्ठिरजीसे अनुमति लेकर उन ल्येगोने अपने- 
राजष खाश्रमान्‌ गन्तं म्रुनयो दधिरे मनः ॥२७॥ | अपने आश्रमपर जानेका विचार किया ॥ २७ ॥ परम 
यरास्वी वहुदेवजी उनका जानेका विचार देखकर उनके 
तद्‌ वीक्ष्य तालुपत्रज्य वसुदेवो महायंशाः | पास आये ओर उन प्रणाम किया बोर उनके चरण 


करने लगे 
प्रणम्य चोपसंगृह्य॒बभाषेदं सुयन्तित ॥॥२८। | पकड़कर बडी नम्रतासे निवेदन े॥२८॥ 








न य॒ विदन्त्यमी भूपा एकारामाश्च ब्ष्णयः | 








था शयानः पुरुष आत्मानं गुणतच्चदक्‌ | 





एवं॒त्वा नाममात्रेष॒॒विषयेषविन्दियेहया | 


केटः त नक ग्व, १ ` = न 






तस्याद्य ते ददशिमाङघिमधघोघमपं- 


आपूर्भवद्रतिमथोऽुगहाण भक्तान्‌ ॥२६॥ 





3 अ के ०५ ~ ~ -* > 





= 
वसुदेवजीने कहा- ऋषयो ! आपे स्वदेव- 
खर्प हैँ । म आपलोर्गोको नमस्कार करता द्र । आप- 
ठोग कृपा करके मेरी एक प्राना घुन टीनिये । बह ~= 
यह कि जिन कमेकि अनुष्ठानसे कर्मा ओर कमवासनाओं- क 
का आत्यन्तिक नादा-मोश्च हो जाय, उनका अप 


क (0 = 


मुद्ये उपदेडा कीजिये ॥ २९ ॥ 


वसुदेव उवाच 










नमो वः सवेदेवेभ्य ऋषयः श्रोतुमर्हथ 1 


कमणा कमनिर्हारो यथा खानस्तदुच्यताम्‌ ॥२९। 


नारदजीने का-ऋषियो ! यह कोई आश्वयकी 
वात नहीं है किं वसुदेवजी श्रीकृष्णको अपना बाखकं 
समञ्जकर शुद्ध जिज्ञासाके भावसे अपने कल्याणका 
साधन हमटोगोसे पृ रहे दै |॥ २० ॥ संसारम बहुत 
पास रहना मनुष्योके अनादरका कारण दआ करता 
है | देखते है, गङ्गातटपर रहनेवाटा पुरुष गङ्खाजल ` 
छोड़कर अपनी डद्विके व्यि दूसरे तीर्धमे जाता 
हे ॥ २३१॥ श्रीङृष्णकी अनुभूति समयक फेरसे होन- ` 
वाटी जगत्की घष्टि, सिति ओर प्रख्यसे िटनेवाटी 
नहीं ह । मह॒ खतः किसी दूसरे निमिंत्तसे, गुणोंसे 
ओर्‌ किसीसे भी क्षीण नहीं होती ॥२२॥ 
उनका ज्ञानमय खख्य अव्रिया, राग-दवेष आदि क्छेडा, ` 
पुष्य-पापमय कमं, सुख-दुःखादि कर्मफल तथा स॒त्छ 
आदि गुणोके प्रवाहसे खण्डित नहीं है । वे खयं अद्वितीय 
परमात्मा ह | जब वे अपनेको अपनी ही राक्तिया-- 
प्राण आदिसे ठक लेते हैँ, तव मूख॑कोग पेखा समते है, 
कि वे ठक गये; जसे वादल, कुहरा या ग्रहणक द्रा 
अपने नेत्रोके ठक जानेपर पूर्यको ढका हआ मान छते 
हे ॥ ३२ ॥ 


नरद्‌ उवाच 


नीतिचित्रमिदं विप्रा वसुदेवो बु्त्सया । 





कृष्णं मत्वार्भं यन्नः पृच्छति श्रेय आत्मनः ॥३०॥ 





संनिकर्षो हि मस्यानामनादरणकारणम्‌। 







गाङ्ख हित्वा यथान्याम्भस्तत्रत्यो याति श्चद्धये \\२१।। 






यस्यालुभूतिः कालेन खयोत्पत्यादिनाख वे । 






स्वतोऽन्यखाच गुणतो न कुतश्चन रिष्यति ।३२॥ 






॥ लेशकमं ( न प्रवाहै 
तं क्लेशकमंपरिपाकगुणग्रवाहे- 







रव्याहतानुभवमीश्वरमद्वितीयम्‌ । 







प्राणादिभिः स्वविभवेरुपगूढमन्यो 






मन्येत घछयंमिव मेषहिमोपरागेः ॥२३॥ 






परीक्षित्‌ ! इसके वाद्‌ ऋषियोने भगवान्‌ श्रीङ्ष्ण । 
वलरामजी ओर अन्यान्य राजाओंके सामने ही बुद्व- 
जीको सम्बोधित करके कहा- २४ ॥ "कमेक 
कम॑वासनाओं ओर कमंर्कोका आत्यन्तिक ना करने- ` 
का सवस अच्छा उपाय यह है कि यज्ञ दारा 
समस्त यज्ञोके अधिपति भगवान्‌ विष्णकी _ पूः 
आराधना करे ॥ ३५ ॥ त्रकाठ्दरी ज्ञानियोने 
| दृष्टिसे यही चित्तवी उपाय, खगम मोक्षस्‌ 


अथोचुुनयो राजन्नाभाष्यानकटुन्दुभिम्‌ । 









सर्वेषां शृण्वतां राज्ञां तथेवाच्युतरामयोः ।॥।२४॥ 





कमणा कम॑निहीर एष साधु निरूपितः । 









यच्छ्रद्धया यजेद्‌ विष्णुं स्वेयज्ञशवरं मसः ॥३५॥ 


चित्तसयोपशमो ९ 


चित्त्योपशमोऽयं वे कविभिः शासरचश्ुषा । 


कछ ऊर 














8 9 





। 
१ 
हि 71 
५ 
। 
श 


क नो # = च 










"ह 
न्क, 


१ 
की 
| ) 1 
॥ 4 त र 
8 
र 
बसी 


` -----~ 


ज) 
"र क 

~ 

ॐ, ^ ६ 


च 
+ कै ४.० 
प 
"24 ॥ ऋ ‡ 


= {7 


^ १ अरः ए भो 
+ 
‡ अ 8 $ ॐ 
न 


| तसिन्रयाजयव्‌ क्षेत्रे मखेरुत्तमकस्पकैः 
र । ‰ तदीक्षायां ग्रघरत्तायां वृष्णयः पुष्करस्चजः | 
४ 


&७२ 





अयं स्वस्त्ययनः पन्था दिजातगहमयेधिनः 


1) 


यच्छ्द्याऽऽप्रवित्तेन शक्लेनेज्येत प्रुपः ॥२७॥ 
ित्तेपणां यक्ञदानेगृहेदं 
आत्सलोकेषणां देव कालेन पि 
ग्रामे त्यक्तेपणाः र्वे मयुधीरास्तपोवनम्‌ ।\२ 
ऋणेद्धिभि्टिंजो जातो देधपिपितणं प्रभो । 

यज्ञाध्ययनपुतरस्तान्यनिस्तीयं त्यजन्‌ पतेत्‌ ।२९॥ 


त्वं त्वच्य शक्तो दास्यां वेच्पिपित्रोमहषसते । 


(र 0 क  (@ क, 
यज्ञदबणषन्छुच्य निक्रणोऽशरणो भव ॥४०। 


वसुदेव भवास्‌ लनं 


© 


भक्त्या परमया हय्‌ । 
जगतामीधरं प्राचः स यद्‌ वां पुत्रतां गतः ।॥४१॥ 


गे 
श्रीशुक उवाच 


इति तद्वचनं श्रुत्वा वसदेवा महामनाः | 
ताचरषीशलिजो वेत्र पर्धाऽऽनंम्य प्राय च ॥४२॥ 


त एनय्रषया राजन्‌ व्रता धर्मण धामिकम्‌ | 


॥ लताः खवाससो राजन्‌ राजानः सशवङ्कुताः।४४। 







५ र्मा न्मा हेष्यश्च दिता निष्ककण्य्यः खवाससः 


=> ॥ क त 


रि 
| 9 /** 
= = 


। ~+ न 


श्रीमद्भागवत 


यज्ञे 
ट्या ॥ ४२॥ 
| धर्मपूवक ऋपि्ोको वरण कर लिया, तव उन्होने पुण्य 
क्षत्र बुरश्षनमे परम धार्मिक वघुदेवजीके द्वारा उत्तभोत्तभ 
॥४२॥। | सामभ्रसते युक्त यज्ञ काये ॥ ४२ ॥ परीकचित्‌ ! ज 
वरसुदेवजीने यज्गकी दीक्षा ठे दी, तव यदुवंरि्योनि एनान 
करक सुन्दर व्च ओर कपलकी माव्ं धारण कर 


[ अ० ८४ 











है || २६ ॥ अपने न्यायार्जित धघनसें श्रद्रापूव क पुस्पोत्तम 
भगवान्‌की आराधना करना ही द्विजाति--त्राह्मण), क्षत्रिय 
ओर त्रेय गृहस्थके चयि परम कस्याणक्ा मागं 
हे ॥२७॥ वसुदेवजी ! विवासान्‌ पुर्ग्की चहिये कि यज्ञ 
दान आदिक द्वारा घनकरी उच्छ, गरडयोचित बोगाद्रारा 
खी-पुत्रकी उच्छको आर काट्क्रमस ख्वगाद्‌ भागमा 
नट दहा जातं ह-इस विचर सक्पणाका व्याग द्‌ | 
दस प्रकार धीर पुरुप घरमे रते द्रृए्‌ ही तीनों प्रकारकी 


एप्रणा्ा----उच्छाञत्रा परस्वमगि ऋ तपोवन [ रास्ता 


सतय वपुर्न ¦ व्रा, 
चरि अर पितरा- 
के ऋगासि दछुट- 


व्या क्रत भ्रं | २८॥ 
श्प्रिय अर वैव्य--य तीनों देवता, 


काच्रणच्करदहीपदा होते द! 5 


कारा मिटता है यन्न, अध्ययन अर संतानात्पत्तिसे | 
इनसे उण द्रण चिना दी जो संसारका व्याग करता 


है, उसका प्रतन हो जाता है | ३९. ।} परम बुद्धिनान्‌ 
ब्रुदेवजी ! आप॒ अतवतक ऋति अर पितरयोकरे ऋसं 


{अक्रा 


तो मुक्तदहो चके हं । अव यज्ञोके द्रा दव 
ऋण चुका दीजिवे ओर इस प्रकार सवस उच्छण इक 
गृहत्याग कीजिये, मगवानूक्ती रारण दौ जवि । ४० ॥ 
वसुदेव जी । आपने अवद्य द्व परत भ क्ति जगदीश्वर 
मगवानूकी आराधना की है; तमी तो वे आप दोनकि 


# 


पुत्र दए दहं॥ ४१॥ 
श्रीद्यकूदेवजी कत ह-परीनित्‌ ! एन मनक्ती 


वसुदेवजीने ऋषियोकी यह व्रात सुनकर, उनके चरणो | 


मे सिर रण्वकर प्रणान क्रिया; उन्हें प्रसन्न किया अर 
व्यि ऋषिजोके ख्पमे उनका वरण कर्‌ 
राजन्‌ ! जव इस प्रकार वघुदधवजीत 


†; राजाटोग वल्लामूधणि लू छंस्तज्त हा गय ॥ ४४|| 


बुदेवजीकी पल्नियेनि छखन्दर चख, अर्तररग आर सोने 


हरासि अप्रनेकरा सजा चपि अर्‌ पर्‌ वे सुतर वड 





न 
चित्ते । २. वादरायणिख्वाच । ३. नम्योपलतप्यं च । ४. तस्मिन. महिष्यो सुदि । 





~ ~~~ ~~~ 











अ० ८४ | दाम स्कन्ध ६४३ 
दीक्षाशालघुपाजश्रारिप्ता वस्तुपाणयः ॥४९]। ¡ आनन्दसे अपने-अपन हरथिमिं माङ्गलिक सापग्री लेकर 

| यज्ञराटमे आयीं ॥ ¢^ ॥ उस समय मृदङ्ग 
नेदख्दङ्धपटदंशह्वमेयानकादयः | | प्रखात्रज, शङ्ख, टोट ओर नगारे आद्रि वाजे बजने छो । 


नट ओर नर्तकियां नाचने गी | मृत ओर मागध स्तुति- 

नचतुनटनतंश्यस्तष्ट्वु; सतमागधाः गान करने च्छो । गन्ध्रक्े साथ सुरी गचवाटी गधर् 
पत्तियां गन करने च्गीं | ४६ ॥ वघुदरेवजीनें पह 

जुः सुकण्डयो गन्धच्यः संगीतं छृहभवंखाः 11७६) | नेतरेमिं अंजन ओर 


“~= 


टारीरमं म॑क्वन चख्णा टिया; छर्‌ 

उनकी देवकी आदि अगप्ररह प्रनि्धोके साध उन्दं 
तमभ्यपिश्चन्‌ विधिबदक्तमभ्यक्तम्रत्विजः ऋत्विजेनि महामितरेकक। विधिम वैसे ही अभिक कराया, 
जिस प्रकार प्राचीन कामं नक्नोकरे साथ चन्धमाका 
अमित्रक दृआ धा] ४७॥ उस सपय यन्नमं दीस्नित 
होनेके कारण व्छुदत्रजी ते। मृगचमे ्रारण क्रिये इए 
थ; परत] उनकी पन्नियां सुन्धरयुन्दर साडी, कंगन, 


~~~ 


पलीभिरष्टादरभिः सोमराजमिवोडभिः \) ८६७1 


ताभिहुकूलचख्यह)रल पुरकण्डसे । 


टार, प्रायजेव ओर कष्टं आद्रि आभूषणोसे खत 
स्वर्रताभिनिवभा दीकषिदाऽजिनसंद्तः 1५८1) | सजी दह शीं । वे अपनी पनियोके साथ भदीर्भोति 
दांभायमान दए ॥ ४८ ॥ सडराज ! वसुद्छजीके 
ऋतिज आर सद्य र्ननटित आभूषण तथा रेशभी 
वख श्रारण करके वसे दही सुशोभित दए, जंसे पहले 
ससदसया पिरेलस्ते यथा इणोऽप्वरे ॥४९॥ | हक ऋ इए च ॥ ५०, ॥ उस सव भवात 
श्रकरष्ण ओर वटरामजी अपने-अपने भाद्बन्धु ओर 
2 स््री-पु्रोके साथ इस प्रकार ओोभायमान दए, जसे अपनी 
तदा रामश दरप्णध स्वः स्वचन्धुभरन्वता । शक्तिवोके साथ समस्त अीतरेकि श्र खयं मवान्‌ - 
सपि जीरके अभिमानी श्रीसंकधंण तथा अपते विशुद्ध 
नारायण्चख्यमं दोमायमान होते हं 1 ~° ॥ 


तस्यलिजा सष्ाराज रलक्षारेयपसमः 


॥ गी 


रेजत्‌ः स्थसुतेदीरे जीवि स्वविभतिभिः ॥॥५०॥ 


$जेऽलयज्ञं विधिना अधरिहोत्रादिरक्षणेः । वदेव जीने प्रत्येक यज्ञम उ्योतिग्रोम, दश, प्रगनासं 
आदि प्राकृत यज्ञो, सोरसत्रादि वेङ्कत यज्ञो ओर अग्नि- 
तवेद्तेयज्ञदव्यज्ञानकरियेशवरम्‌ |५१॥} | होत्र आदि अन्यान्य यज्ञे दवारा द्र्य, क्रिया ओर उनके 


्ञानवे--मन्त्रोके खामी विध्णुभगवानकछती आराधना 

(6 हथ की | ५१ ॥ इसके वाद उन्होने उचित संमयपर्‌ 
अथव्वरम्याञद्दात्‌ कार यथान्नाति स दगा; । | ऋलिजोको वस्त्राकंकारोसे सुसननित किया ओर 
दास्त्रके अनुसार ब्हुत-सी दक्षिणा तथा प्रचुर 
धनके साथ अलकरृत गें, प्री ओर ख॒न्द्री 
. कन्यां दीं ॥ ५८२ ॥ इसके वाद महश्रियोने 
पत्नीसंयाजावभृ्यैश्वसत्वा ते महषयः । पनीसंयाजन नामक यज्ञाङ्ग ओर अवभ्रधस्नान अर्थात्‌ 

ल वा 2 ~ 


स्वलंकरृतेभ्योऽरशरत्य गोभूकन्या महाधनाः ॥५२॥ 








__ ---~~--- नाः या ना द 
काः भ काः य जान 


सस्न॒रामहदे विप्रा यजमानपुरस्सराः 11 ५२॥ 





ततः स्वकृतो बणानाश्वम्योऽन्नेन पूजयत्‌ ॥।५४।। 
बन्धून्‌ सदारान्‌ ससुतान्‌ पारिबर्हेण भूयसा । | 


विदभेकोसरङ्गरून कारिकेकयसञ्ञयान्‌ ।५५ | 


सदस्यत्विक्सुरगणान्‌ चभूतपितचारणान्‌ । 





श्रीनिकेतमयुज्ञाप्य शंसन्तः प्रययुः कतुम्‌ ।।५६॥ 


घतराष्टोऽचुजः पाथा भीष्मो द्रोणः प्रथा यमो । 





नारदो भगवान्‌ व्यासः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवाः॥५७॥। 

बन्धून्‌ परिष्वज्य यदून्‌ सोहदात्‌ ्चिनचेतसः । 

ययुिरहकच्द्रेण स्वदेशशवापरे जनाः ॥५८॥ 
3 =. 5 ५४ 

7न्दस्त॒ सह गापालेच्हत्या पजयाचितः । 

कृष्णरामोग्रसेनाेन्यवात्सीद्‌ बन्धुवत्सलः ॥५९॥ 

वस॒देवोऽञ्जसोत्तीयं  मनोरथमहा्णवम्‌ । 


सुहदठरतः प्रीतमना नन्दमाह करे स्पृरान्‌ ॥६०॥ 


वसुदेव उवाच 


भ्रातरीश्क्रतः पायो नृणां यः स्नेहसंक्ञितः 


१, नानार । २ शनपरे । ३. न्दश्च | 


श्रीमद्भागवत 
| 


। अगे करके परञ्ुरामजीके बनाये हदरमे-रामहदमे 


स्नौतोऽलङ्ारवासां सि वन्दिभ्योऽदात्तथा च्ियः । | 


| दे दिये तथा खयं नये वल्लाभूषणसे सुसेनित होकर 
| उन्होने ब्राह्मणोंसे लेकर कुत्तोतकको भोजन कराया ॥५४॥ 





यज्ञान्त-स्नानसम्बन्धी अवशेष कमं कराकर वसुदेवजीको 


स्नान किया | ५२ ॥ स्नान करनेके वाद्‌ वसुदेवजी 
ओर उनकी पल्नियोने वंदीजनोको अपने सारे वच्नामूषण 


तदनन्तर अपने भाई-बन्धुओं, उनके खी-पुत्रं तथा 
विदभं, कोसल, कुरु, कारी, केकय ओर सृञ्जय आदिं 
देराके राजाओं, सदस्यो, ऋषविजों, देवताओं, मनुष्यो, 
मूतो, पितरो ओर चारणं को विदाईके रूपमे बहुत-सी 
भेट देकर सम्मानित किया । वे ल्ग लक्ष्मीपति भगवान्‌ 


श्रीकृष्णकी अनुमति केकर यज्ञकी प्रशंसा करते इए 


अपने-अपने घर चे गये ॥ ५५-५६ ॥ परीक्षित्‌ ! 
उस समय राजा धृतराष्टः विदुर, युधिष्ठिर, भीम, अजुन, 
मीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कुन्ती, नकु, सहदेव, नारद, 
भगवान्‌ व्यासदेव तथा दूसरे खजन, सम्बन्धी ओर 
बान्धव अपने हितेषी बन्धु यादरवोंको दछडइकर जानेमें 
अत्यन्त विरह-व्यथाका अनुभव करने त्रो । उन्होने 
अत्यन्त स्नेहाद्रं॑चित्तसे यदुधरंशि्योका आचिङ्गिन किया 
ओर बड़ी कठिनिाईसे किंसी प्रकार अपने-अपने देशको 
गये । दूसरे रखोग भी इनके साथ ही बहँसे राना ह्ये 
गये ॥ ५७-५८ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण, वल- 
रामजी तथा उग्रसेन आदिने नन्दवावा एं अन्य सवर 
गोपोकी बहुत बड़ी-बड़ी सामग्रियोसे अर्चा-पूजा की; 
उनका सत्कार किया ओर वे प्रेम-प्रवदा होकर वहत 
दिनोतक वहीं रहे ॥ ५९ ॥ वछुदेवजी अनायास दही 
अपने वहूत बड़े मनोरथका महासागर पार कर गये ये | 
उनके आनन्दकी सीमा न थी । सभी आत्मीय सखजन 
उनके साथ थे । उन्शने नन्दबानाका हाथ पकड़कर 
कहा ॥ ६० ॥ 


वखदेवजीने कदा माईजी ! भगवानने मनुष्योके 
व्यि एक बहुत वडा बन्धन बना दिया है । उस्‌ बन्धन- 
का नाम है स्नेह) ` प्रेमपाड । मे तो एसा समञ्चता द्र 


तं दुस्त्यजमहं मन्ये श्राणामपि योगिनाम्‌ ॥६१॥ | कि बड़े-बड़े इखीर ओर योगी-यति भी उसे तोडने 








| अ० ८४ ¶- 





क ~ क पि 


की क 


नन्दो गोपाश्च गोप्यश्च गोषिन्दचरणाम्बुजञ । 





= यत्‌ कृतान्ञेषु सत्तमे: । असमर्थं है ॥ &१॥ आप्रने हम अक्क प्रति ` ४ 
अनुपम मित्रताका व्यव्हार किया है | क्योन दहो, आप- ` 
सरीखे सत-रिरोमणियोका तो टेसा खभाव दही होता 

मेज्यपिंताफला वापि न निवर्तत कर्ंचित्‌ ।६२॥ | है । हम इसका कमी वद्ला नहीं चुका सकते, आपको ` 









इसका कोई फल नहीं दे सकते । फिर भी हमारा यह 
मेत्री-सप्वन्ध कमी दरूटनेवाद नहीं है | आप इसको 
ग्रागकल्यञ्च इश्च आ्रात्तर { नाचरास हि | सदा निभाते रंगे ॥ ६२ ॥ मादनी | पहठे तो वेदी- 
गृहमे बद्‌ होनेके कारण हम आपका कुछ भी प्रिय ओर 
हित न कर सके। अव हमारी यह ददा हो रही दहै 
अधुना श्रीमदान्धाक्षा न पश्यामः पुरः सतः ।६३॥। | कि हम धन-सम्पततिके नरोसे- श्रीमदसे अवे हो रहे 
है; आप हमारे सामने हैँ तो भी हम आपकी ओर 
नहीं देख पाते ॥ ६२ ॥ दस्रोको सम्मान देकर खयं 
मा राज्य श्रीरभरत्‌ एसः भ्रेयस्कामसख मानद । सम्मान न॒ चाहमेव मर्जी ! जो कल्याणकामी हे ` 
उसे राञ्यकशष्मी न मिले-इसीमें उसका मखा है; क्योकि 
खजनानुत बन्धून्‌ बा न पश्यति ययान्धदक्‌ 11६91 | मयुष्य रव्यमीस अना हो जाता है ओर अपने माई + +" 
- बन्धु, खजनोतकको नहीं देख पाता ॥ ६४ ॥ ` | । + 
श्रीचयुकः उवाच भीद्यकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! र 
दत कहते-कहते वसुदेवजीका इद्य ्रप्र॑स्े गद्गद ङ्ध । | 
एवं शेथल्य चत्त आनकदुन्दुभि; । उन्हें नन्दतरावाकी मित्रतां ओर उपकार स्मरण हो 
£ स आये । उनके नेत्रोमि के उमड़ आये) वे गने लगे 
रुराद्‌ तत्कृता मत्रं सरन्नश्चुविलोचनः ६५५ ॥ ६५ ॥ नन्दीभथुपः द वूुदेवजीको' प्रसनन 
~ ~ = ~, | करनेके स्यि एवं भगवान्‌ श्राकृष्ण ओर वठ्रामजीके 
न सख्युः भरस्णा ग { 
ग्दस्तु सख्य प्रयज्रत्‌ म्रस्णा गावविन्द्रामयाः ्रेमपारामें ग्र्कर आज-कल करते-करते तीन महीनेतक 
(= ९ (५ मनितो ५ च्य सम्मान न्‌ 
अद्य च इति मासांस्रीन्‌ यदुभिमौनितोऽवसत्‌॥।६६॥ , 1€। ए च । वु सवन अमर उनको ५ 1 
किया ॥ ६६ ॥ इसके वाद॒बहमूह्य आभूषण, सं 
ततः कामैः पूर्यमाणः सव्रजः सहबान्धवः | ¦ वख, नाना प्रकारकी उत्तमोत्तम सामप्रिय ओर गोसे 





नन्द्वाबाको, उनके ब्रजव्रासी . साथियोको -श्चीरं 
वान्धवोको खूव॒तृष्॒ किया ^~ ६७ ॥ त्रसुद्वजङ्ग 
उग्रसेन, श्रीङ्गष्ण, वल्राम ` उद्ैश्ीदिटुतररियोनि 


पराष्याभरणक्षोमनानान््यंपरिच्छदेः ॥६७॥ 


वसुदेवोग्रसेनाभ्यां कृष्णोद्धववबलादिभिः । ¦ 
बिदा करनेपर उन सब सामभ्रियोको लेकर नन्दावा 


अपन वत्रजके कये राना इए ॥ ६८ ॥ नन्दवाबाः, ` 
गोपां ओर गोपिका चित्त भगवान्‌ श्रक्ष्णके चरण्‌- 


@ 2 क अ यदुभियं च्ल, 
दत्तमादाय पारिबहं यापितो यो ॥६८।] 





भी उसे वहसि लेटा न सके । घुतां बिना ही 


| ४ ^. ॐ 


अलग-अक्ग॒उन्ह अनेकों प्रकारकी भेट दीं | उनके 


कम्मे इस प्रकार ठग गया किं वे फिर प्रयत्न करने ४ £ | 


६ छ र 
२०६ श्रीमद्भागवत [ अ० ५५ 








जवर सव॒ वन्धु-वान्ध्र वर्हसि विद्रा ह्यो चुके, तत्र 
भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही एकमात्र इध्देत्र॒माननेवाटे 
यदुवंरि्योने यह देखकर कि अव वर्षां ऋतु आ" ^ 


(> 


 पर्टरुची है, द्वारकाके च्य प्रश्ान किया ॥ ७०॥ 


बन्धुषु प्रतियातेषु इष्णयः कप्णदेवताः । 


५ वीक्ष्य प्रावृषमासचां यणुद्रौरतीं पुनः ॥७०॥ 


जनेभ्यः कथर्यांचक्रयद्देवयहत्सयम्‌ । वौं जाकर उन्दने सव्र ट्ोगोसे वघुदेवजीके यज्ञ- 
। महोत्सव, खजन-सम्बन्धियोके दर्शन-मिखन आदि 
यदापीत्तीथयात्रायां सहत्संदर्दानादिकप्‌ ।७१।। | तीर्बयात्राके ग्रसङ्गोको कड सुनाया ॥ ७१ ॥ 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां ददामस्कन्धे उत्तरर्भे 


¢ ¢^ ° ^ (~ 
तीधयात्रानुवणनं नाम चततुरस्ीतितमोऽध्यायः ॥ ८% ॥ 


॥ वि नः >>> > "वक 


अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः 

गवानके दासा वश्डदेवजीको व्रह्मज्ञानका उपदे नथः देवकाजाके छः पुंचराक्रा खख खना 
श्री बादरायणिर्वाच | श्रीद्ुकदैवजी कदत ह-परीक्नित्‌ ¦ इसके वाद्‌ 

| एक दिन भगवान्‌ श्री्ष्ण ओर वट्रामजी प्रातःकाटीन 
प्रणाम करनेके ट्य माता-परितिके पास गये | प्रणाम 
| कर टेनेपर वसुदेवजी वदे त्रेमसे दोनों भार्योका 
~ =. ~ (> ^ & । अभिनन्दन करके कहने द्गे ॥ १ ॥ वसुडेवजीने वड 
` वखुदवामनन्याह्‌ ब्रात्या सङ्क पमच्युता | १ ॥। | वड़े ऋषिययोके मंहसे भगवान्‌की महिमा सुनी शी तथा 









कल्ल, ~ | उनके रेच्र्यपूर्ण चि भी देखे धे । इससे उने 
श्ुनीनां स वचः श्रुत्वा ५ पुत्रयोधौमद्वचक्षम्‌ | | इस वतका दृढ विवास हा ग्या शा किय सत्रिण 


पुरुष नही, खयं भगवान्‌ ह । इसलिये उन्होने अपने 
तदीद्ैनातिशवः श पत्रोको प्रेमपूर्वक सम्बोधरित करके यों क्ा- | २॥ 
| ६ | ‡ प्य (न ~ तो +) 


तुम दोनों सनातन हो । मै जानता 


+ ` 
छप महथोगिच्‌ संङ्कपंण सनातन । कि तुम दोनों सारे जगते साक्षात्‌ कारणरूप 
स प्रधान ओर पुरुपके भी नियामक पररमेधर हो ॥ २॥ 
क र ~ | इस जगत्करे आधार, निर्माता ओर निर्माणसामग्री भी 
ट - यत्‌ सक्त प्रधानपुरूषा परो ॥ ३॥ तुम्ही हो । इस सारे जगतके खामी तम दोनों शो 
"न ओर तुम्हारी ही क्रीडकेे स्यि इसका निर्माण दआ 


है । यह जिस समय, जिस खूप जो कुछ रता है, 
। होता है-- वह सव तुम्हीं हो । इस जगते प्रकृति- 
| खूपसे भोम्य ओर पुरुषरूपसे भोक्ता तथा दोनोँसे परे 
स्यादिदं भगवान्‌ सक्षात्‌ प्रधनधुसपेरः ॥ ७ ॥ । दोनोकि नियामक साक्षात्‌ भगवान्‌ % वहो ॥ ४ ॥ 


यत्र थेन यतो यस्य यस्म यद्‌ यद्‌ यथा यदा । 








= १ न्प तीर्थं ७ | २. तद्रायेजाति° 1 २, जगतः प्रधाचऽ | 
क ,# ^) 4 





904. 4; 








अ० ८५ ] 
एतन्ननाविधं विश्वपार्मयुष्टमधोक्षज । 


आत्मनारुप्रवित्यात्मन्‌ प्राणो जीवो बिधप्यजः 1)4॥ 


प्राणादीनां दिश्वद्जां शक्यो याः परस्य कः | 


ऋ) तुमारी ही है ॥ 


काल्तस्तजः प्रभा सत्त चन्द्रण्न्यकश्चविद्युताम्‌। 
यत्‌ स्थय सभरत भसन चिगन्धाञ्थता भक्रान्‌ 11७1 
तपणं प्राणनसमवां देवत्य ताश्च द्रमः 


‰9 
५ # 
(यकि 
<| 

च कः 
न्ने 


(म) 


दिशां त्वमवकाशोऽसि डिशः खं स्रो आश्रयः । 


न्दा वणस्त्टमाशर अन्तान्‌ 









दश्चम स्कन्ध 
न~~ 


इन्दरियातीत ! 


हा घञ चेष्ठा गतिषषोस्तयेश्चर ।॥ ८ ॥ 


प्रथ्‌ कतिः । ९।) 


जन्म, अस्तित्व आद्रि भावव्रिकारोसे 
रहित परमामन्‌ ! इस चित्र-वरिचित्र जगतका तुम्टीनं 
निर्माण किथा है ओर इसमें खयं तुमने दी आत्माख्यसे 


प्रवेश भी किया है । तुम प्राणं ( क्रियादाक्ति) ओर जीव 


८ ज्ञानशक्ति ) के ख्पमें इसका पाठन-पोपण्‌ कर्‌ शृ 
हो ॥"॥ क्रियाराक्तिप्रधान प्राण आदिमं जीं 
जगतकी वस्तुजओंकी सृष्टि करनेकी सामथ्यं है, वह 
उनकी अपनी सापरथ्य नही, तुम्दारी ही हे । क्योकि 
वे तुम्ारे समान चेतन न, अचेतन है; खतन्त् 
न्धी, परतन्त्र हं | अतः उन चेष्सचीट प्राण आदिमं 
केच चे्रामात्र होती हे, टाक्ति नीं | शक्ति तो 
|| प्रभो ! चन्द्माकी सान्ति, 
अर्का तेज, मू्यकी प्रभा, नक्षत्र आर्‌ व्रिद्यत्‌ आद्िकी 
स्फुरणखूपसे सत्ता, पवतंकी सिरता, प्रष्वीकी खाघ्रार्भ- 
राक्तिखूप वृत्ति ओर गन्धख्य युण --ये सव वास्तवं 
तुम्टीं हो | ७ ॥ परमेश्वर ! ज्म तुक्च करन, जीवन 
देने आर शुद्र करनेकी जो राक्तियां ह, वे तुम्डारा 
दी खरूप हँ । जक ओर उसका रख भी तुश्डौ ह्यो 
प्रभा ! इन्द्रियदाक्ति, अन्तःकरणकी शक्ति, दारीरकी 
उसका दिलना-डोलना, चलना-किरना-पे 
व वायुकी शक्तियाँ तुम्हारी दी दहें।॥ ८ ॥ दिशां 
आर उनके अवक भी तुम्रं हो| अका ओर 
उसक्".आश्रयभूत स्फोट---राव्दतन्मात्रा या परा 
वी, नाद्र--पद्यन्ती, ओंकार -मध्यपा तथा वं 
८ अश्र ) एवं पदार्थाका अकग-अखा निर्देश करनेवाछे 
पदख्य वेखरी वाणी भी तष्दीं हा ॥ ९ ॥ 
इन्द्र्यो, उनकी विपयप्रकारिनी राक्ति ओर अधिष्ठात्‌- 


राक्ति, 


(-देत्रता तुम्डीं हो । बुद्धिकी निश्वयात्तिका शक्ति ओर 


कि जीवव विरुद्र स्मरति भी तुम्हींहो ॥ १०॥ भूतेमिं 






उनका कारण तामस अहंकार, उन्द्ियोमे उनका कारण 
तजसुङ्ूषट कार ओर उन्दरियोके अधिष्रात-दवताभमं 


लत कारण साक अहकार तथा जीवकं अवा- 
| गमनका कारण माया भी तुम्हीं हो ॥ ११ ॥ भगवन्‌ ' 






नश्रेषिह भावेषु तदस्ति स्वमनश्चरम्‌ । 


जसे ~~ ^^ [र क [क = 
जसे मिष्ट आदि वस्तुओंके विकार धड़ा, बरक्च आदिमे 


मिद निरन्तर वतमान है ओर बास्तव्मे वे कारण 


१. स्तथेश्वर । २. इन्दियाणीद्धियाणां च देवाश्च त्वद्‌ ° | 









` „क 


६५८ श्रीमद्भागवत [ अ० <५ 











यथा द्रव्यविकारेषु द्रव्यमात्रं निरूपितम्‌ ॥१२॥ | ( पृ्िका ) रूप ही दै उसी प्रकार जितने भी 
विनाशान्‌ पदार्थं है, उनमें तुम कारणखूपसे अविनाडी 


सत्वं रजस्तम इति गुणास्तदूनरत्तयश्च याः ) तत्व हो । वास्तव वे सव तुम्हारे ही खूप हैँ 

॥ १२ ॥ प्रभो ! सच्च, रज, तम-- ये तीनों गुण 
त्वय्यद्धा बरह्मणि परे कल्पिता योगमायया ।१३॥ | ओर उनकी इर्यो ( परिणाम }--महत्त्ादि परह 
परमात्मार्मे, तुममे योगमायाके द्रारा कष्पित हँ ॥ १३॥ 
इसण्िये ये जितने भी जन्म, अस्ति, ब्रद्धि, परिणाम 
आदि माव-विकार है, वे तुममे सर्वथा नहींहं | जव 
तुममे इनकी कल्पना कर टी जाती है, तत्र॒ तुम इन 
विकारोमे अनुगत जान पडते हो । कल्पनाकी निवृत्ति 
हो जानेपर तो निवकल्प परमाथठरूप तुम्हीं तुम रहं 
जाते हो ॥ १४ ॥ यह जगत्‌ स्व, रज, तम--इन 
तीनों गुणका प्रवाह है; देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण, 
गति ्ष्मामबोधेन संसरन्तीह कर्मभिः ॥ १९५ | सुख, दुःख ओर राग-कोभादि उन्दीके कायं ह । 

इनमे जो अज्ञानी तुम्हारा, सवात्माका सूद्मखख्प नहीं 


तसान्न सन्त्यमी भावा यं्हित्वयि विकल्पिताः । 
त्व चामीषु विकारेषु हन्यदाव्यावहारिकिः ॥१४। 


गुणप्रवाह एतसिन्नवुधास्त्वखिलात्मनः 


य॒द्च्छया चृतां प्राप्य सुकर्पामिह दुंभाम्‌। जानते, वे अपने देहाभिमान अज्ञानके कारण दही 
कमेकिं फदेमे फसकर वार्‌-वार जन्म~मल्युके चक्रमे 
स्वाय प्रमत्त वया गत त्वन्माययेश्चर ॥१६॥ | भटकते रहते हैँ ॥ १५ ॥ परमेश्वर ! मुस्र यभ 
प्रारब्धकरे अनुसार इन्दरियादिकी सामथ्यसे युक्त अत्यन्त 
असावहं ममेवेते देहे चाखान्वयादिषु । दूढम मनुष्य-दारीर प्राप्त हआ; र्कितु तुम्हारी मायके 


वरा होकर मै अपने सच्चे खाथं-परमाथंसे ही असावधान 
हो गया ओर मेरी सारी आयु यों ही वीत गथी ॥१६॥ 
प्रभो ! यह शरीर नै दर ओर इस दारीरके सम्बन्धी 
= मेरे अपने है, इस अहंता एवं ममताखूप स्नेहकी 
धुना न नः सुता सक्षात्‌ प्रपानपुरुपशरौ । फँसीसे तमने इस सारे जगत्को बोध रक्खा है 

॥ १७.॥॥; मै . जानता द्र किं तुम दोनों मेरे पुत्र नहीं 
भूभारशत्रक्षपण अवतीर्णो तथाऽऽत्थ ह ॥१८॥ | हो सम्पूरणं प्रकृति ओर जीर्वोके खामी हो । प््वीके 
 |भभारभूत राजाओंके नाइके व्यि ही तुमने अवतार्‌ 
विय है | यह बात तुमने मुञ्चसे कदी भी थी 
ज्डसदिि दीनजनेके हितेषी, शरणागतवत्सल । 
चरणकमलोंकी शरणमे ह; क्योकि 


स्नेहपारोनिबधाति भवान्‌ सर्वमिदं जगत्‌ ।।१५७] 






तत्त गता -स्म्यरणसमद्य पदारावन्द्‌- 






„काः ॥ १६ 
मापन्नसंस॒तिभयापहमारतबन्धो |. | तै अव 
| वै ही शरणागतोके संसारभयको मिटानेवाले ह । अब 


ॐ द एतावतारमलमिन्द्रियलारसेन इ्ि्योकी लोटपतासे मर पाया ! इसीके कारण 


मैने मृल्युके ग्रास इस ङारीरमँ आत्मबुद्धि कर ली | 
मत्यात्मटक्‌ त्वयि परे यदपत्यबुद्धः॥१९॥ । ओर तममे, जो किं परमातमा हो, नबद्धि ॥ १९ ॥ 
१. ये हि । २. क्षपणार्थाय । ३ ५५५ क ५. 
= + 


त्ती ह ऋ - ° 
कैः त 


षे ॐ छ ~. श #, ~ ॥ ॥ 4 4 
जि: + + क +~ ^ ` क 1 





अ० ८५ | दशम स्कन्ध ६७९ 











जिः 





घूतीग्रहे नलु जगाद भवानजो नों प्रमो ! तमने प्रसव-गृहमें ही हमसे कटा था किं “यचपि 
नं 9 ॐ अ+ [^ ^ ५४ ¢ 

मे अजन्मा दँ, फिर भी मैं अप्रनी ही वनायी दृं धम- 

जज्ञ इत्यनुय॒गं निजधर्मगुप्त्ये मर्यादाकी रक्षा करनेके चि प्रव्येक युगम तुम दोनेकिं दरार 


अवतार ग्रहण करता रहा द्र | भगवन्‌ ! तुम आकाडके 

समान अनेकों दारीर ग्रहण करते ओर डते रहते 

ठो । वास्तवमें तम॒ अनन्त एकरस सत्ता हो । तम्दारी 

आश्वर्यमयी शाक्तिं योगमायाका रहस्य भदा) कोन जान 

को वेद भूस उरुगाय विभृतिमायाम्‌ ।\ २० | सकता है १ सव्र टोग॒तुम्दारी कीरतिका ही गान करते 
रहते ट ॥ २० ॥ 


नानातनगंगनवद्‌ विदधजहासि 


श्री्ंक उवाच 


श्रीद्यकदेवजी कहते हँ- परीक्षित्‌. ! व्रसुदवर्जके 
आकर्ण्येल्थं पितुर्वाक्यं भगवान्‌ सात्वतपभः 


ये वचन सुनकर यदुवंरादिरोमणि भक्तवतसर भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण म॒सकराने चो । उन्होने व्रिनयसे ञ्जुककर मधुर 
वाणीसे कडा ॥ २१ ॥ | 


ह णर 


ग्रत्याह प्रश्रयानम्रः प्रहसजञ्छ्छक्ष्णया गिरा ॥२१।। 


श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृप्णने कहा- पिताजी ! हम तो 


आपके पुत्र ही हैं| हमं सक्षय करके आपने यह 
ब्रह्यज्ञानका उपदशा किया है | हम आपकी एक-एक 
वात युक्तियुक्त मानते दहं ॥ २२ ॥ पिताजी ! अप 
यन्नः पुत्रान्‌ सय॒दिश्य तग्राम उदाहृतः ।।२२॥ लेग, मै, भया वल्रामजी सारे द्वारकावासी समप 
चराचर जगत्‌--सव-केस आपने जंसा कहा, वेस 
ही है, सत्रको ब्रह्मरूप दी समञ्चना चाहिये 1 २३ ॥ 
पिताजी ! आत्मातो एक दही है । परंतु वह अपनेमे 
ही गुणोवी सृष्टि कर ठेता है ओर गुणोके द्वारा 
वनाये इए पञ्चमूतोमं एक होनेपर भी अनेक, खयं 
प्रकारा होनेपर भी दद्य, अपना खख्य होनेपर्‌ भी 
अपनेसे भिन्न, नित्य होनेपर भी अनित्य ओर निगुण 
आत्मा देकः खयंञ्योतिनित्योऽन्यो निर्युणो गुणैः । | देन भौ सण रूपमे प्रतीत हता ई ॥ २४ ॥ 


वचो व; समवेताधं तातेतदुपमन्महे 1 


अहं यंयमसावायं इमे च द्वारकोकसः 


कः = क ~~ -~ 
~ ~ य जा ~ क 


सर्वेऽप्येवं यदुश्रेष्ठ विगमर्याः सचराचरम्‌ ॥२३॥ 


न्द, स 


जसे आकाडा, वायु, अग्नि, जर ओर प्रध्वी-यें 

परञ्चमहामूत अपने कायं घट, कुण्डल आदिमे प्रकट 
आत्मस्ुष्टेस्तत्कृतेषु भूतेषु बहुधेयते 1 २४।॥ | अप्रकट, वड-छेटे, अधिक-थोडे, एक ओर अनेक से 
प्रतीत होते है प्रतु वास्तवमे सत्ताख्पसे वे एक 

ख वायुज्योतिरापो भूस्तत्छृतेषु यथाद्ययम्‌ । दी रहते हैः वते ही आत्मामं भी उपाषियेकि भदसे 
ही नानात्वकी प्रतीति होती है । इसब्ि जो में 


आवे स्तिरोऽस्पभूयका नानात्वं यात्यस्रावपि ॥२५॥ | दी है ॥ २५॥ 


१. वादरायणिरुवाच । २. प्रियो समाचायं | 
भा० स° खं० २. <र- 


\ ह 








| 
। 
† 
१ 











° = 4 
॥ 1 ।,.¶। इव 1 द ४, १ + ४ 
। ४१. 


` १", 







{+ क१।। 


ई, 


"दै 


। # प 





‰ ५ 1 # 
4 + ए। ४ 29 
॥ 1 ॥ ९ ह 


५१ 111 “+^ ‰# 


£ १ ६ १ च 










६५० श्रीमद्भागवत [ अ० ८५ 

("=-= जय्य 

श्रीक उवाच शरीश्युकदेवजी कहते हँ- परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 

5 श्रीकृष्णके इन वचनोको सुनकर वसुदेवजीने नानाव- 
एव भगवता राजन्‌ वसुदेव व॒ उदाहृतम्‌ । = ि प्‌ 

जन्‌ बसुदेब उदाहृतम्‌ बुद्धि चड़ दी; वे आनन्दम मग्न होकर वाणीसे मोन 

ओर मनसे निस्सङ्कत्प हो गये ॥ २६ ॥ कुरुश्् । 

शत्वा विनष्टनानाधीस्तुष्णीं श्रीतमना अभूत्‌ ।। २६ उस समय वरहा सर्वदेवमयी देवकीजी भी वैढी दई थी | 

& र वे बहत प्हटेसे ही यह सुनकर अत्यन्त विस्मित थीं 

अथ तत्र॒ इरुश्ेष्ठ देवकी सबेदेवता । | कि श्रीकृष्ण ओर व्रटरामजीने अपने मरे दए गुरुपुत्रको 

यमलोकसे वापस चखा दिया | २७ ॥ अव अपन 

चुत्वाऽऽनीत गुरोः पूत्रमात्मजाम्यां सुविसिता।। २७ | उन पुत्रौकी याद आ गयी, जिनं कंसने मार उदा 

| था | उनक्रे स्मरणसें देवकीजीका हदय आतुर हो गया, 


कृष्णरामौ समाश्राव्य पुत्रान्‌ कंसवि्हिसितान्‌। | नत्से आंसू वहने कगे । उन्टोनि वदे ही करण 
| खरसे श्रीकृष्ण ओर वटरामजीको सम्बोधित करके 


सरन्ती कृपणं प्राह वेङ्कव्यादश्वुलोचना ॥२८॥। | कडा ॥ २८ ॥ 








देवक्युवाच देवकीजीने कदा-टोकाभिराम राम ! तुम्हारी 

2 क शक्ति मन ओर बाणीसे परे है । श्रीकृष्ण ! तुम योगेश्वरोके 

राम रामाप्रमेयात्मन्‌ कृष्ण यागेश्चरेधर । ५ इश्रर हो । दै जानती ड ठ कि 
भा इश्वर हो | मं जानती द्भ कि तुम दानां प्रजापतियाके 


भी ईशर, आदि पुरूष नारायण हो ॥२९]) यह भी मुञ्च 

वेदाहं वां विश्वस्जामीश्वरावादिपुरुषो ॥२९॥ | निश्चित खूपसे माम हे कि जिन लोगोनि काटकमसे अपना 

धैय, संयम ओर सगुण खो दिया है तथा शाच्चकी 

काठविध्वस्तसत्वानां राज्ञा॒च्छाखवतिनाम्‌ । आज्ञाओंका उछछङ्गन करके जो स्वेच्छाचारपरायण हो रहे 
हे, भूमिके भारभूत उन राजाओंका नाश करनेके च्व 

भूमेभारायमाणानामवतीर्णौ किलाद्य मे ॥३०॥ | दी तुम दोनों मेरे गर्भसे अवतीर्णं इए हो ॥ ३० ॥ 
विश्वात्मन्‌ ! तम्हारे पुरुपरूप अंशसे उत्पन्न इई मायासे 

यस्ाशांशांशभागेन विश्ोत्पत्तिखयोदयाः । गुणोकी उत्पत्ति होती है ओर उनके खेदामात्रसे जगतकी 
उत्पत्ति, विकास तथा प्रय होता है | आज में सर्वान्तः- 


। भवन्ति कि विात्म॑स्त त्वायाहं गतिं गता ।३१॥ | करणसे तम्हारी ररण हो रही द्र ॥ ३१॥ मेन 


सुना है किं तम्हारे गुरं सान्दीपनिजीके पुत्रको मरे 


चिरान्रतसतादाने गुरुणा कार्चोदितो । बहत दिन हो गये ये । उनको गुरुदक्षिणा देनेके व्यि 
उनकी आज्ञा तथा काल्की प्रेरणासे तम दोनोने उनके 


आनिन्यथुः पित॒स्थानाद्‌ गुरवे गुरुदक्षिणाम्‌ ।।३२॥ | पुत्रको यमपुरीसे वापस खा दिया ॥ ३२ ॥ तम दोनां 


योगीश्वरोके भी ईश्वर हो । इसव्ि आज मेरी भी 
मै रुतं कामं युवां योगेश्वरेश्वरो । अभिलाषा पूरण करो । मै चाहती दँ किं त॒म दोनों मेर 
उन पुत्रको, जिन्हे कंसने मार डात् था, त्र दो ओर 

| | उन्हें मै भर ओंख देख दं ॥ २२ ॥ 


> 
न ~ ~ ०६ <^ 
# ॐ 


त ॐ = 


भोजराजहता त्रान्‌ कामये #- 








४२. (अवज "ध जी 14 








अ० ८५ ] दशम स्कन्ध 














ऋषिरुवाच श्रीटयुकदेवजी कहते है-ग्रिय परीक्षित्‌ | माता ` 
एवं स्चोदितौ मात्रा रामः कृष्णक्च भारत । = | देवकीजीकी यह वात छुनकर भगवान्‌ श्रहृष्ण ओर = 
ग ~ ~ ~ | वकराम दोनोने योगमायाका आश्रय लेकर घुतव्ोकमै 
संतटल स॒ववश्चतुयागमायायपााश्रता ॥ २४) प्रदा किया ॥ ३४ ॥ जत्र दैत्यराज व्रव्मि देखा कि 

तसिन्‌ प्रविष्टाबुपलभ्य देत्यराड्‌ जगतके आत्मा ओर इदेव तथा मेरे प्रम खमी 

विश्ात्मदैवं सुतरां तथाऽऽत्मनः भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वटरामजी सुतर्टोकरमे पारे 

< ह, ततर उनका हृदय उनके दर्शनके आनन्दम निमग्न 
16 तारः हो गया । उन्होने टपट अपने कुटुम्बक साथ आसनये त 
सद्यः संगरत्थाय ननाम सान्वयः ॥३५।। | उठकर भगवान्‌के चरणोमें प्रणाम किया ॥ २५ ॥ 
तयोः समानीय वरासनं मुदा अत्यन्त आनन्द्से भरकर दैत्यराज बलिने भगवान्‌ 
क $£ श्रीकृष्ण ओर वटरामजीको श्रेष्ठ आसन दिया ओर जब 
निक्रष्टयास्तत्र महात्सनास्तचाः बे दोनों महापुरुष उसपर विराज गये, तवर उन्होने 
दधार पादाववनिज्य तज्जलं उनके पौव प्रखारकर उनका चरणोदक परिारसहित 
सनन्द आत्रह्म पुनद्‌ यदम्बु ह ।।३६॥ अपने सिरपर धारण किया । परीक्षित्‌ | भगवानूकं 
चरणोका जल ब्रह्मापयन्त सारे जगत्को पवित्र कर देता 
है ॥ ३६ ॥ इसके वाद्‌ दैत्यराज बलिने बहुमूल्य वख, 


। 


॥ ।###। +) # ‰#/ {| 



















समहेयामास स तौ विभूतिभि- 


महादवखाभरणानुेषनेः | आमूषणः, चन्दन, ताम्बरूक, दीपक, अमृतके समान 
तीम्बूरदीपापरतभक्षणादिभिः भोजन एवं अन्य विविध सामग्रियोसे उनकी पूना की 


ओर अपने समस्त पिर, धन तथा दारीर आदिको 
उनके चरणोमे समपरिंत कर दिया ॥ ३७ ॥ परीक्षित्‌ ! 
दैत्यराज वलि वार्‌-वार भगवानूक्रे चरणकमको अपने 


| स्वगोत्रवित्तात्मसमपणन च ।॥३७] 
स॒ इन्द्रसेनो भगवत्पदाम्बुजं 


विभ्नन्युद्धः प्रेमविभिन्नया धिया। वक्षःस्थल ओर सिरपर रने खगे, उनका हृदय प्रेमे ` 
उवाच हानन्दजलाङ्खलेक्षणः रिह हो गया । नेत्रोसे आनन्दके ओंसू व्हनेल्गे। 


प्रहृष्टरोमा नुप गद्गदाक्षर॑म्‌ ॥२८॥। ोम-रोम लिक उखा | अव वे गद्रद खरसे भगवानक्तीं 
स्तुति करने खगे ॥ ३८ ॥ 
दैत्यराज विने कहा-वल्रामजी ! आप अनन्त 
है | आप इतने महान्‌ हँ कि शेष आदि सभी विग्रह 
नमोऽनन्ताय बृहते नमः ष्णाय वेधसे | आपकर अन्तमूत ह | सचिदानन्दस््रखूप श्रीकृष्ण ! _ 
| आप सक्छ जगतके निर्माता हँ । ज्ञानयोग ओर भक्ति- 
 सांख्ययोगवितानाय ब्रह्मणे परमात्मने ।।३९॥। | वेण दोनो प्रवतकः आप ही हँ । आप स्यं ही प्रस 


= परमात्मा ह । हम आप दोनोको बार-बार नमस्कार ` 


दशनं वां हि मूतानां दुष्मापं चौप्यदुभम्‌ । 


व(टिख्वाच 








रजस्तमः खभावानां यनः प्राप्तो यख्च्छया ॥४७०॥ | इपा करके हम ` 


च्य रजोगुणी 9 
+ 4 ~~ = ०, 
| च्ल 1 


6 14 -- धू ~ ३ क्षरः | ४, महते ५. च ठे 3 ~ 3 क = हः ध 























&५२ श्रीमद्भागवत 


क अण त ----------------- 


देत्यदानवगन्धरवाः सिद्धविद्याधरचारणा; ] राको मी दशन दिया है ॥ ४० ॥ प्रभो ! हम जर ' 


| हमारे दी समान दत्य, दानव, गन्धर्वं, सिद्ध, व्रिया- 
 यक्रक्षःपक्लाचार्च अतवप्रपथनासकाः ॥४१।॥ चर, चारण, यक्ष, राक्षस, (पराच, भूत ओर प्रमधनायव्छ 


| 1 अपिका ब्रेमसे मजन करना तो दूर्‌ रहा, आपसे 
विदद्रसत्वधाम्न्यड़ा त्वाय शाञ्वश्रीरिणि <तदा द्द्‌ चरमाव रखते है; परंतु आपका श्रीविग्रह साश्नात्‌ 


व ^ वेदमय ओर विद्र स्वखरूप है । उसव् हमन्गेमिंसे 
त्य निबद्धवेरास्ते वयं चान्ये च ताद्राः ॥४२ हतान द्द वैरमावसे, ऊुखने भक्तिसे ओर ङुने 
कामनासे आपका स्मरण करके उस पथो प्रप्त किया 

। ह, जिसे अपकरे समीप रहनेवाटे सचप्रधान दें रता आदि 
न, तथा सच्वसंरन्धाः संनिगर्ाः सुरादयः ॥७३।। | * नह । प्रात कर॒ सकते ॥ ४१-४३ | योगेश्रके 
श्वर . वडवे योगेश्वर भी प्रायः यह वात 

नह जानते कि आपकी योगमाया यह हं आर एेसी हे; 
फर हमारा तो वाती क्याहै१॥ 9४ || इसव्यिय 
न वदन्त्यपि यागेरा योगमायां कृतो वयमू।।४७॥ | सामा “ सुञ्षपर देसी कृपा कीजिये कि सेरी चिन्त-टृत्ति 
आप्रकं उन चरणकम््मे खग जाय; जिसे किंसीकी अपेन्ना 


फेचनाोद्भद्रवेरेण भक्त्या केचन कामतः 


इदमित्थमिति प्रायस्तव योगेश्वर 


तनः प्रसीद निरपेकषविमूण्ययुष्मत्‌- न॒रलनतराल परमहंसखोग द्रँढा करते है ओर उनकः 
आश्रय चकर मं उससे भिन्न इस धघर-गृहस्थीके अवरे 
पादारविन्दधिषणान्यगृहान्धक्रात्‌ | डुरसे निकठ जाऊँ । प्रभो ! इस प्रकार आपके उन 


चरणकमव््रेकी, जो स।र जगतके एकमात्र आश्रय > 
रारण ककर शन्त हा ज[ऊ आर जक्रडा ह विचरण 
करू | यदि कमी किसीका सङ्ग करना ही पडतो 
शान्तो यथकःउतसर्वससेक्चरामि ।४५।। | सवके परम हितैषी सतोय ही ॥ ४५ ॥ प्रभो ! अप 
सस्त चराचर जगत्के नियन्ता ओर स्वामी है | आप 
शाध्यखानीशितव्येदा निष्पापान्‌ कुर नःअभो | | दमे आज्ञा देकर निष्पाप वनाय, हमारे पर्पोका नाच 
। कए ज्य; क्याकिं जो पुरुप श्रद्राके साध आपकी 
५ ; 8 ^ मान्‌ यन्छरद्रयाऽऽतिष्टंस्चोदनाया विुच्यते।|४६। | आज्ञाका पाटन करता है, वह विधि निमेधने बन्भनते 
मुक्त हो जाता है ॥ ४६ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा- दैत्यराज ! स्वायम्भुव 
सन्‌ मरीचेः पट्‌ पुत्रा उर्गयां रथमेऽनतर मन्वन्तरमं प्रजापति मरीचिकी पत्नी ऊणकिं गर्भे छः 
असन्‌ मरीचेः पट्‌ पुत्रा ऊर्गायां प्रभमेऽन्तरे। व थ 
देवाः कं जहसुबी्ष्य सुतां यभितुयुदयतम्‌ः॥ ४७ | किं ब्रह्माजी अपनी पुत्रीसे समागम कनेक च्म उबत 


नासुरीमगन्‌ योनिंमधघुनावचक हैः हंसने लगे ॥ ४७ ॥ इस पर्डिसल्प अपराधके 

च 4 1, कष्ण उन्हे ब्रह्माजीने शाप दे दिया ओर वे 1 

' नीतास्ते योगमायया ॥४८॥ | हिरण्यकशिपु पुत्रल्पसे उयल इए । अव योग 
छ उन्हे बहास व्यकरं ` देवकीके गर्भम रख दिया 1 

उद्र जाता राजन्‌ कसवरि्िभिताः । उनको उत्मन होते ही कंसने मार उाव्य । दैत्यर 


- > च + = 


निष्कम्य विधशरणाङ्घ्युपलन्धटत्तिः 


श्रीमरावानुत्राच 


7 9 द 
@ *"""ऊ्क्ड्क् द न्न कक क कनन कं क = ५9 ~ 








"~~ च 
॥ [ 4 ब्‌ | 11६. 


५. 
+ च १ 
1 





वद पे (व ॐ 9 सः जः ष > 
। दुः 9 ॐ 
न ' २ त = 


अ० ८५ | 


द्श्चम्‌ स्कन्व 


६५२ 





ननन 








[यि क म्मे 


इतं एताच्‌ प्रणेष्यामो मातशलोकापदुत्तये । 
ततः शापाद्‌ विनिथक्ता लोकं यास्यन्ति विज्वराः।५०। 
सरोद्रीथः परिष्वङ्गः पतङ्कः श्वुद्रभर्‌ धरणी । 
पडिमे मदस्रतादेन पुनयाखन्ति सद्रतिम्‌ ॥५१॥ 
इत्युक्त्वा तान्‌ समादाय इन्द्रसेनेन परजितौ । 
पुनद्वरवतीमेत्य मातुः पुत्रानयच्छताम्‌ ॥\५२॥ 
तान्‌ दष्रा बालक्रान्‌ देवी पत्रस्नेहस्युतस्तनी । 
परिष्वज्याङ्कमारोप्य परध्न्यजिघ्रदभीक्ष्णश्चः ।५२॥ 
अपाययत्‌ स्तनं प्रीता सुतस्प्चपर्ष्टिता | 
मोहिता मायप( पिष्गोपरथा सृष्टि; प्रवर्तते । 
पीतवारतं पयस्तखाः पीतशेषं गदाभृतः । 
11441 


नारायगाङ्गसंस्पशग्रतिर्धात्मदर्नाः 


ते नमस्छृत्य गोविन्दं देवकीं पितरं बलम्‌। 


मिपतां सवभूतानां ययुधीम दिवौकसाम्‌ ।५६॥॥ 


तं द्रा देवकी देवी मृतागमननिर्गमम्‌ । 
मेने सुविसिता मायां कृष्णसख रचितां चुप ॥५७।॥ 


एवविधान्यद्धुतानि कृष्णख परमात्मनः । 


सा वान्छोचत्यारमजान्‌ खास्त इसेऽध्यासतेऽन्तिके४९| माता दत्रकीजी अपने उन पुत्रके लिये अत्यन्त शोकातुर्‌ हो 


रही हँ ओर वे तुम्हारे पास है ॥ ४८-४९ ॥ अत 
हम अपनी माताका शोक दूर करनेके चये इन्दं यहे 
ठे जायगे । इसके वाद ये शापसे मुक्त हो जार्येगे ओर 
आनन्दप्रूवंक अपने लोकम चे जार्येगे ॥ ५० ॥ 
नवे छः नाम दहै स्मर, उद्रीथ, परिषङ्ग पतङ्ग; 
्षुद्रश्रत्‌ ओर घ्रणि । मेरी कृपासे पुनः सद्गति 
पराप्त होगीः ॥ ५१ ॥ परीक्षित्‌ | इतना कहकर भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण चुप हो गये । देत्यराज बलिने उनकी पूजा 
की; इसके वाद्‌ श्रीकृष्ण ओर बल्रामजी वाठ्कोको 
लेकर फिर द्वारका सट अये तथा माता देघकीको उनके 
पुत्र सोप दिये ॥ ५२ ॥ उन वार्धोको देखकर देवी 
देवकीके इद थमें वत्सल्य-घ्नेहकी वाद आ गयी । उनके 
स्तनोसे दृध वहने लगा | वे बार-बार उन्हें गोदमें कर 
छातीसे व्गातीं ओर उनका सिर सूंधतीं ॥ ५३ ॥ 
पुत्रके स्परके आनन्दसे सरावोर एवं आनन्दित देवकीने 
उनको स्तन-पान कराया । वे विष्णुमगवरानूकी उस 
मायासे मोहित हो रदी थी, जिससे यह सृष्ठि-चक्र 
चरता है | ५४ | परीश्चित्‌ ! देवकीजीके स्तनोका 
दूर साक्षात्‌ अग्रत धां; क्योंन हो, भगवान्‌ श्रीकृष्णं 
जोउसेधी चुके थे । उन वा्कोने वही अग्रतमयं 
दूध पिया । उस दृधकरे पीनसे ओर भगवान्‌ श्रीकृष्णे 
अङ्गका संष्पश होनेसे उन्हें 
गया ॥ ५५५५ || इसके वाद्‌ उन ल्योगोने भगवान्‌ श्रीकृष्ण, 
माता देवकी, पिता वसुदेव ओर वटरामजीको नमस्कार 
किया । तदनन्तर सवके सामने दही वे देवरोकमे चे 
गये ॥ ५६ ॥ परीक्षित्‌ ! देवी देवकी यह देखकर 
अत्यन्त विस्मित हो गयीं कि मरे इए वाक्कः लेट आवे 
ओर फिर च्छे भी गये | उन्शने रसा निश्वंय किया 
कि यह श्रीकृष्णका ही कोई टीका-कौराक है ॥ ५५७ ॥ 
परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण खयं परभातमां है, उनकी 
र्ति अनन्त है | उनके एेसे-रेसे अदूमुतं चस्ति इतने 


है किं किसी प्रकार उसका पार नहीं पाया जा 


वीयोण्यनन्तवीर्यय सन्त्यनन्तानि भारतः ॥५८॥ । सक्ता ॥ ५८ ॥ 





१, मृतोपमं त्‌ पीत । 





आलमसन्षत्कर दहो ` 








, परै; सभाजितोऽभीक्ष्णं रामेणाजानता च सः ॥ ४ ॥ 
एकदा गृहमानीय आतिथ्येन निमन्त्य तम्‌ । किया ओर उनको वे अपने घर्‌ के अये । ्रिदण्डी- 
[त नद~ = ~ ------------3- 


६५७ श्रीमद्भागवत [ अ० ८६ 


[य ` ~" ^~ ~--~-~  ्य्रयदुष्युणयलय्यकययहरषय 














सूत उवाच सूतजी कहते हं रोनकादि ऋषियो ! भगवान्‌ 

्रीकृष्णकी कीतिं अमर है, अमृतमयी है । उनका चत्र 

य इदमनुशृणोति श्रावयेद्‌ बा मुरारे जगत्‌के समस्त पाप-तापोंको मिटानेवाव् तथा भक्तजनों 
| के कणेबुहरौमे आनन्दघ्ुधा प्रवाहित करनेवात्म है । 
अरितमम्रतकीतवर्णितं व्यास पुत्र | इसका वणन खयं व्यासनन्दन भगवान्‌ श्रील्युकदेवजीने 

किया है । जो इसका श्रवण करता है अथवा दूसरेको 

जगदघभिदलं तद्ध ्तसत्कणपुर पुनाता है, उसकी सम्पूणं चित्तवृत्ति भगवानूमं खग 


| जाती है ओर वह उन्हीके परम कल्याणखरूप धामको 
भगवति छृतचित्तो याति तरक्षमधाम्‌।॥५९। प्रात होता है ॥ ५९ ॥ 
# ~. 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्वे' उत्तरार्धे 
मृतप्रजानयनं नाम पश्चारीतितमोऽध्यायः ॥ ८५५ ॥ 











अ >> < 
थ षडशीतितमोऽध्यायः 
ख्भद्रादरण ओर भगवानक। मिथिखापुरीम राजा जनक ओर श्रुतदेव ब्राह्यणके धर एक ही साथ जाना 
राजोकाच राजा परीक्षितने पूक्ा-मगवन्‌ ! मेरे दादा 


अजुनने भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वट्रामजीकी बहिन 
पुमद्राजीसे, जो मेरी दादी थी, किस प्रकार विवाह 


ज्मन्‌ वेदितमिच्छामंः स्वसारं रामकृष्णयोः । र 5 ५ 
५५ किया ? मेँ यह जाननेके व्ये बहत उत्सुक दर| १॥ 


` श्रीशुक उवाच राक्तिराटी अजुन तीर्थयात्राके व्यि पृध्वीपर व्रिचरण 
करते इए प्रभासक्षेत्र पर्हचे । वरय उन्होने यह सुना 


अजनस्तीर्थयात्रायां पयंटन्नवनीं ग्रयुः। कि बलरामजी मेरे मामाकी पुत्री एुभद्राका विवाह 


ुरयोधनके साथ करना चाहते हैँ ओर्‌ वदेव, श्रीकृष्ण 


गतः ्रभासमश्ृणान्मातुङेयीं स आरमनः । २ ॥ | आदि उनसे इस विषयमे सहमत नहं हे । अव नि, 
| दुर्योधनाय रामस्तां दास्यतीति न चापरे के मनम सुभद्राको पनेकी च्ट्सा जग आयी | वे 


त्रिदण्डी वैष्णवका वेष धारण करके द्वारका पर्हचे | २-३ । 


तद्टिप्सुः स यतिमूत्वा त्रिदण्डी दारकामगात्‌॥ २ ॥ | अय॑न खमद्राको प्राप्त करनेके लिये वर्ह वर्षाकाख्म चार 


महीनेतक रहे । बँ पुरघासियां ओर बल्रामजीने 


तंत्र वै वार्षिकान्‌ मासानवात्सीत्‌ स्वाथसाधकः। | उनका सूल सम्भान किया । उन्दे यह पता न चला 


किये अजुन दै] ४॥ 
एक दिन वट्रामजीने आतिथ्यके व्थियि उन्हे निमन्त्रित 








%: न्ते मृतौ | २, मि । ३, तत्रास | ४. मानिन्ये | 


____ ~ "` "क ` 


+= ग्ण 


अ० ८६ | दशम स्कन्ध षष 











श्रद्धयोपहृतं भक्ष्यं बेन बजे किल ॥ ५॥ | वेपधारी अ्युनको वल्रामजीने अयन्त श्रद्धाके साय 

। भोजन-सामम्री निवेदित की ओर उन्डोनि बड़ प्रमसे 

| भोजन किया ॥ ५ ॥ अनने भोजनके समय हां 

सोऽपदयतत्र महतीं कन्यां वीरमनोहराम्‌ । | विाहयोगय परम नदरी घुमदराको देखा । उसका सैन्य 

| वडे-वड़ वीरोका मन॒ हरनवाा था | अजुनके नत ्रेमसे 

प्रफुल्कित हो गये । उनका मन उसे परानेकी आकाङ्घासे 

रयु््लकषणस्तखां भोवकु्धं मनो दधे ।। ६ ॥ | र दो गमा ओर उनने उते पतली वनानेका च 

| निश्चय कर च्या ॥ ६ ]॥ परीक्षित्‌ ! तम्हारे दादा 

| अजुन भी बडे ही घुन्द्र थे । उनके दारीरकी गठन, 

सापि तं चकमे वीक्ष्य नारीणां हृदयंगमम्‌ । माव-भङ्गी लिर्योका हदय स्पशं कर लेती थी । उन्हें 

देखकर सुभद्राने भी मन्म उन्हीको पति बननेका 

निश्चय किया | वह तनिक मुसकराकर कजीटी चितननसे 

हसन्ती त्रीडितापाङ्गी तन्न्यस्तहदयेश्षणा 1 ७ ॥ | उनकी ओर देखने ठगी । उसने अपना हदय न्दं 

समपिंत कर दिया ॥ ७ ॥ अव अजुन केवल उसीका 

चिन्तन करने गे ओर इस बातका अवसर द्रँढने चे 

कि इसे कव हर ठे जाऊं | सुमद्राको प्राक्त करनेकी 

म व उत्कट कामनासे उनका चित्त चक्र काटने ल्गा, उन्हें 
न लेभे शं भ्रमचित्तः कामेनातिवरीयसा ।॥ ८ ॥ | तनिक भी शान्ति नहं मिलती शी 


तां परं ममयुध्यायन्नन्तरं त्रप्सुरजज॑नः। 


महत्यां देवयात्रायां रथस्थां दुगंनिगताम्‌ । एक वार सुभद्राजी देव-दशेनके च्वि रथप्र सवार 
होकर द्वारका-दगंसे बाहर निकटीं । उसी समय महारथी 
अजुंनने देवकी -वसुदेव ओर श्रीकृष्णकी अनुमतिसे सुभद्रा 
काहरण कर्‌ च्या | ९ ॥ रथपर सवार होकर बीर 
९ छ अजने धनुपर उठा छा ओर जो सैनिक उन रोकनेके 
रथस्था धयचुरादाय शराश्रारुन्धता भटान्‌ । | जयि आये, उन्हें मार-पीटकर भगा दिया । सुभद्राके 
निज-जन रोते-चिल्छाते रह गये ओर अञयुंन जिस्‌ प्रकार 

विद्राव्य क्रोशतां स्वानां खभागं मृगराडिव ॥॥१०॥ | सिंह अपना भाग छेकर चक देता है, वैसे ही सुभ्द्रा- 
को ठेकर चट पडे ॥ १० ॥ यह समाचार सुनकर 

तच्छ्रुत्वा भिता राम्‌ः पवंणीव महाणव १ वलरामजी वहत विगड़ | ते वेसे ही द्व्य हो उटे, जेसे 
प्रणिमके दिन समुद्र । परंतु भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा 

गृहीतपादः कृष्णेन सुहद्धिश्चान्वशाम्यत ११ | अन्य सुदद्‌-सम्बन्धियोनि उनके पैर पकड़कर उन्हे बहत- 
| कुरे समज्ञाया-बुज्चाया, तव वे शान्त इए ॥ ११ ॥ 


जहारानुमतः पित्रोः कृष्णस्य च महारथः ।॥ ९ ॥ 


प्राहिणोत्‌ पारिबर्हणि वखध्वोधंदा बलः |. | इसके वाद बल्रामजीने प्रसन्न होकर वर-वधूके ल्म 
3 | बहुत-सा धन, सामग्री, हाथी, रथ, घोडे ओर दासी- 
महाधनापस्करेभरथाश्चनरयोपितः ।॥१२॥ दास दषेजम भेजे ॥ १२ ॥ 


१. स्मरक्षु ° । २. अ्ानुसान्त्वितः । 





५ कृद ~ = श ~ 


॥ ६५६ श्रीमद्भागवत [ अ° ८६ 








श्रीञुक उवाच श्रीटुकदेवजी कहते ह परीक्षित्‌ ! विदेहवी 
राजधानी मिथिखामे एकः गृहस्थ ब्राह्मण थे । उनका नाम 
था श्रुतदेव । बे भगवान्‌ श्रीकृष्णके परम भक्त थे । वे 
एकमात्र भगवद्रक्तिसे ही पूणंमनोरथ, परम शान्त; ज्ञानी 
ओर विरक्त थे | १३ ॥ वे गृहस्थाश्रममें रहते इए भी 
किसी प्रकारका उद्योग नहीं करते थे; जो कुछ मिट 
जाता, उसीसे अप्रना निर्वाह क्र ठेते थे॥ १४॥ 
प्रारब्धवश प्रतिदिन उन्हें जीवन-निर्वाहमरके व्यि सामग्री 
मिल जाया करती शी, अधिक नहीं | वे उतनेसे ही 
संतुष्ट॒भीं ये ओर अपने वर्णाश्रमके अनुसार धमपालन- 
मे तत्पर रहते थे ॥ १५ ॥ प्रिय परीक्षित्‌ ! उस देशके 
राजा भी, ब्राह्मणक समान ही भक्तिमान्‌ थे । मेथिट- 
वंडाके उन प्रतिष्टित नरपतिका नाम धा वहश्च | 
उनमें अहंकारका छेदा भी न था | श्रुतदेव ओर वरश्च 
दोनों ही भगवान्‌ श्रीक्रष्णके प्यारे भक्त थे ॥ १६॥ 

एक वार भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन दोनपर प्रसन्न 
होकर दारुकसे रथ ॒मंगवाया ओर उसपर सवार होकर 
दरारकासे विदेह देशकी ओर प्रस्थान किया ॥ १७॥ 
भगवान्‌ के साथ नारद, वामदेव, अत्रि, वेदव्यास; परद्युराम, 
असित, आरुणि, में ८ छ्ुकदव ), बृहस्पति, कण, 
मैत्रेय, च्यवन आदि ऋषिभी ये ॥.१८ ॥ परीक्षित्‌ ! 
वे जर्हो-जर्हो पर्ंचते, वहाँ वर्की नागर्कि ओर ग्राम- 
वासी प्रजा पृूजाकी सामग्री ठेकर उपश्ित हाती | 
पूजा करनेवा्को भगवान्‌ एेसे जान पड़ते, मानो प्रहोकिं 
साथ साक्षात्‌ सयनारायण उदय हो रहे हों ॥ १९ ॥ 


छृष्णस्यासीद्‌ द्विजश्रेष्ठः श्रुतदेव इति श्रुतः । 
कृष्णकमत्तया पर्णा्थः शान्तः कबिरम्पटः।॥।१३। 
स उवास विदेहेषु मिथिलायां गृहाश्रमी । 
अनीहयाऽऽगताहायं निब तंतनिजक्रियः १४ 
यात्रामात्र त्वहरदर्देवादुपन म॑तयुत । 
नाधिक तावता त॒ष्टः क्रियाश्चक्रं यथोचिताः । १५] 
तथा तद्राष्रपारोऽङ्ग बहुलाश्च इति श्रुतः 


मेथिलो निरहम्मान उभावप्यच्युतप्रियो ॥१६॥ 
तयोः प्रसन्नो भगवान्‌ दारुकेणाहतं रथम्‌ । 


आरुह्य साक य॒निभिषिदहान्‌ प्रययो प्रः 11१७ 
नारदो वामदेवोऽत्रिः कृष्णो रामोऽसितोऽरुणिः । 
अहं बहस्पतिः कण्वो मेत्रेयङ्च्यवनादयः .॥१८। 


तत्र तत्र॒ तमायान्तं पोरा जानपदा चष । 


मका ममान 


उयतस्थुः साष्यंहस्ता रैः शर्थमिवोदितम्‌ ॥१९॥ 


आनर्वधन्वङुरुजाङ्गलकङ्मत्ख- परीक्षित्‌ ! उस यात्रामे आनते, धन्व, करुजांगल यङ्क, 
। मत्स्य, पाञ्चाक, कुन्ति, मघु, केकय, कोसक, अणं आदि 

पाश्चारकुन्तिमधघुकेकयकोसलाणाः । अनेक देशक नर-नास्यिंने अपने नेत्ररूपी दोनसि भगवान्‌ 

¢ श्रीकृष्णके उन्मुक्त हास्य ओर प्रेमभरी चितत्रनसे युक्त 

अन्ये च तन्ुखसरजयदारहदास- मुखारविन्दके मकरन्द-रसका प्रन किया ॥ २०॥ 


खिग्धेक्षण नृप पपुददिभिननायः ॥|२०]। | त्रिकोकगुरु भगवान्‌ श्रीकृष्णके दरोनसे उन लखोगोंवी 


। ¦ खवीशषणविनष्टतमिल्ररग्भ्यः अज्ञानदृष्टि नष्ट हो गयी । ग्रसु दशन करनेवाले नर 
० ९४ नास्विंको अपनी दृष्टिसे परम कल्याण ओर तस्ज्ञानका 


क्षेमं त्रिलोकगुरूरथदश्चं च यच्छन्‌ । । दान करते चर रे ये । स्थान-स्थानपर मनुष्य ओर देवता 
१. मत्ययम्‌ । 


+ 
॥ 
ध 
9 
४ 
=; 








^ ऋ ` च्व चकः ` क क क, + "क ` अ पो ^ ` न क" नी = = _ ˆ ^ क न म ~ क 
" "ज ५ 9 = 
+ ~ 














अ० ८& ] दाम स्कन्ध ६५७ 
शृण्वन्‌ दिगन्तधवलं स्वयश्चोऽङ्भध्नं भगवरान्‌की उस कीर्तिका गान करके खुनाते, जो समस्त 


दिद्ा्ओंको उञ्ज्वट वननिवाटी एवं समस्त अद्युभोका 
विना करनेवाटी है । इस प्रकार भगवान्‌ श्रीकरच्ण 
गीतं सुर्भिरगाच्छनकै्विदेहान्‌ ।।२१।। | धीरे र विदेह दशमं ६चे ॥ २१ ॥ 

तेऽच्युतं प्राप्तमाकण्यं पोरा जानपदा च्र॑प। परीक्षित । भगवान्‌ श्रीकृष्णके छुभागमनका समाचार 
| सुनकर नागरि ओर ग्रामवासियोके आनन्द्रकी सीमा 

| | न रही । बे अपने हाथमे पूजाकी विविध सामग्रियों 

अंभीयुर्दितास्तसे गुहीतार्दणपाणयः 1) २२1) | ठेकर उनकी , अगवानी करने आये ॥ २२ ॥ भगवान्‌ 
श्रीकरप्णक्रा दडान करके उनके हय ओर मुखकमट 
तरेम ओर आनन्दसे खिट उटे | उन्होने भगवानकी 
तथा उन मुनिर्योको, जिनका नाम वेत्र सुन रक्वा 
था, देखा न धा--दहाथ जोड मम्तक ्काकर प्रणाम 


रा त॒ उत्तमश्छोकं प्रीर्युर्फुह्ाननारयाः । 


> ^ ~< =< © ^^ 

द्ताञ्जलिभिनमुः धतपवास्तश्रा मनान्‌ ॥२२॥) | करिया ॥ २३ ॥ मिधिकानरेदा वद्ररटाश्च ओर श्रुतव्छने 
_ यह समश्चकर विः जगदगुरु भगवान्‌ श्रीकृष्ण हमा 

स्वानुग्रहाय सस्प्राप्रं मन्वानो तं जगद्गुरम्‌ । पर अनुग्रह करनेके च्ि ही परतरारे हँ, उनके चरर्णोपर्‌ 

< | ४ गिरफर्‌ प्रणाम किया ॥ २४॥ बद्ुटश्च ओर श्रुतद् 


मधः श्रृतदबश्च प्रदाः पततु; प्रभाः 1२४८॥ दोनोँने ही एक साथ हाथ जोड़कर म॒नि-मण्डर्ीके सहित 


भगवान्‌ श्रीकृष्णको आतिथ्य ग्रहण करनेके य्व 
निमन्त्रित किया ॥ २५५ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण दोनोकी 
मथिलः श्रतदेवश्च युगपत्‌ संहताञ्जली ॥२५॥ प्राधेना खीकार करके दोनोको ही प्रसन्न करनेके च्वि 
भ एक ही समय प्रथक्‌ पृथक्‌ ख्पसे दोनके घर प्रधारे आर 
भगवांस्तदभिप्रत्य द्योः प्रियचिकीषया। यह वात एक-दूसरेको माद्टम न इडं किं भगवान्‌ श्री- 
कष्ण मेरे धरके अतिर्क्ति ओर कहीं भी जा रहे 

उभयोराविशट्‌ गेहयभास्यां तदलश्षितः ।॥२६॥ | दै ॥२६॥ व्रिदेहदराज ब्रहरटाश्च वड मनखी थे; उन्ोनि 
यह देखकर कि दुष्ट-दुराचारी पुरुष जिनका नाम भी 
नहीं सुन सकते, बे दी भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर ऋषि- 
आनीतेप्वासनाग्येषु सुखासीनान्‌ महामनाः ।२७॥ | सनि मेरे वर पारे है, छनदरछुन्दर आसन गायि ओर 
= भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा ऋषपि-पुनि आरामसे उनपर वेठ 

प्रद्रग्त्त्या उद्धषहूदयास्राविलेक्षणः । गये । उस समय वहूटाश्चकी विचित्र दडा थी } व्रेम- 
भक्तिके उद्रेकसे उनका हदय भर आया था । नेत्रम 
ओंसू उमड़ रहे ये । उन्होने अपने पूज्यतम अतिथियोके 
सङ्कटम्बो बहन्‌ म्रध्ना पजयांचक्र $श्रान्‌ । चरणोमिं नमस्कार करके पो पलार ओर अपने बुध्यते 
के साथ उनके चरणोका छोकपावन जक सिरपर्‌ धारण कयां 
गन्धमास्याम्बराकर्पधूपदीपाध्यंगोवषे ; ॥२९॥ | ओर फिर भगवान्‌ एवं मगवत्खरूप ऋषिर्योको गन्ध, माद, 
| वख, अलङ्कार, धूप, दीप, अर्ध्य, गो, वैल आदि समपि 

वाचा मधुरया श्रीणन्निदमाहान्नतपितान्‌ | करके उनकी पूजा की ॥ २७-२९ ॥ जवर सूत्र छोग 


न्यमन्त्रयेतां दाचाहमातिथ्येन सह दिजः ] 


भरोतमप्यंसतां द्रान्‌ जनकः खगृहागतान्‌ । 


नत्वा तदङघरीन्‌ प्रक्षास्य तदपो रोकपावनीः ॥ २८ 


1 ति स 2 


९. पाः । २. प्रतीयु° । ३. प्यध तान्‌ | 
भा० स० ख० २. ८२- 





९५८ श्रीमद्भागवत [ अ० ८६ 
न वववववव्ववजजजजजजजजजज==---------------------------------------------- 


पादावङ््गतो विष्णोः संस्पृशञ्छनकेयंदा ॥२०॥ | भोजन करके तृप्त हो गये, तव राजा वटश्च भगवान्‌ 
श्रीकृष्णके चरणोको अपने गोदमे ठेकर वैठ गये | ओर 
नडे आनन्दसे धीरे-धीरे उन्हे सह्यते इए बडी मधुर 
वाणीसे भगवानकी स्तुति करने लगे ॥ ३०॥ 

















५ राजोवाच | राजा वहुखण्वने कहा-- प्रभो ! आप समस्त 


प्राणि्योके आत्मा, साक्षी एवं खयप्रकाश्च है | हम 
सदा-सवरदा आपके चरणकम््रका स्मरण करते रहते 
हे । इसीसे आपने हमवरेगोको दर्शन देकर कृतार्थं 
कियाहै॥ ३१ ॥ भगवन्‌ ! आपके वचन है कि 
मरा अनन्यप्रमी भक्त मुद्ध अपने खर्प वटरामजी, 
ए. व अद्धाङ्गिनी क्षमी ओर पुत्र ब्रह्मासि भी वद्ृकर्‌ प्रिय 
स्त कठमसद्‌टग्‌गाचरा भवान्‌ । दै । अपने उन वचनोको सव्य करनेके व्विही 
च क - आपने हमलोगोको ददान दिया है ॥ ३२ ॥ भटा, 
यदात्थकरान्तभक्तान्मे नननन्तः ज्रारजः प्रयः ।२२॥ ठेसा कोन पुरुप है, जो आपकी इस परम दयादता 
ओर प्रेम-परवदाताको जानकर भी आप्र चरणकमल्ंका 

को लु त्वचरणाम्भोजमेवंबिद्‌ विसुजेत्‌ पुमान्‌ 1 परित्याग कर सके १ प्रभो ! जिन्होने जगत्की समसत 
- वस्तुओंका एवं शरीर आदिका भी मनसे पस््याग कर 

निष्किचनानां शान्तानां मुनीनां यस्त्वमात्मद्‌॥२२॥ | दिया है, उन परम दान्त म॒नियोको आप अपने- 
[~ तकको भी दे डाल्ते है ॥ ३३ ॥ आपन यदुवंशमें 

योऽवतीयं यदोवंशे न॒णां संसरतामिह । अवतार ठेकर्‌ जन्म-मृल्युके चक्रमे पड़ हए मनु्योको 
| | । उससे सक्त करनेके लये जगते रेसे विद्युद्ध याका 

} यद्यो वितेने तच्छान्त्यै त्रलोक्यवरूजिनापहम्‌ ॥ ३४) | विस्तार किया है, जो ्ि्ेकीके पाप-तापको शान्त 
(3 43, करनेवाद्य है ॥ ३४ ॥ ग्रमो ! आप अचिन्त्य 
- > 


भवान्‌ हि स्भूतानामात्मा साक्षी खटग्‌ विभो । 


अथ नस्त्वत्पदाम्भोजं सरतां दर्शनं गतः ।३१॥ 













~ ¢ र ८ (+ (= (4 च्ञ ४ ~ 
। „ अनन्त पेश्चय ओर माधुयकी निधि हं; सवके चित्तको 
` नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाङ्कण्ठमेधसे । = | - _ ` ~. 
। | अपनी ओर आकषित करनके लिये अप सचचिदानन्द्‌- 


[1 | 
द 


3 यामतव्र आपका ज्ञान अनन्त हे ! 
[प य सान्तं तप युषे ।२५॥ | < म कान न अतत 
प्रम शान्तिका विस्तार करनेके व्यि आप दी नारायण 


1 ऋषिके ख्पमें तपघ्या कर रहे हं । मे आपको नमस्कार 
ध दिनानि कतिचिद्‌. भूमन्‌ गृहान्‌ नो निवस्‌ दविजैः । करता द्र ॥ २५॥ एकरस अनन्त ! आप कुछ 
न दिनोंतक. सुनिमण्डटीके साथ हमारे वहां निवास 
^ समत; पादरजसा पनीहीदं निमेः कलम्‌ ।३६॥ | कीजिये ओर अपने चरणोकी धूट्से इस निमिवंशको 
पवित्र कीजिये, ॥ ३६ ॥ परीक्षित्‌ ! सवके जीवनदाता 
इत्युपामन्वितो राज्ञा भगर्वोह्ोकमावनः। | मगवान्‌ श्ी्ष्ण राजा बहलाशचकध गह प्राचना सीकर 
६ करके मिथिलावासी नर-नारिर्योका कल्याण करते हए 


वास करवन्‌ कल्याणं मिधिलानरयोपिताम्‌ ॥३७॥ ! ङु दिनोतक वहीं रदे ॥ २ । 
बाना० | २. जं वन्दित्वा विख० । 


4 ^ ~ 
9 4 स ह ¶ ५ =. क, १ ऋः + ५ ५६ 
~न च, - र "द ५ ज. ॥ व्‌ 
~ - भ कः न कः = ~र क क 


= ~ 





। त 
€ = ७ 0५ कै-क = जक 


# 
ऋनि = 9 





अ० ८६ | दञ्चम स्कन्ध ६५९ 


भा क व प वि की तिणि) 





ए 


श्रुतदवाऽच्युत ब्राप्त खगहाञ्जनछा यभा । प्रिय परीक्षित्‌ ! जंसे राजा वद्रदाश्च भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण ओर सुनि-मण्डटीके पत्रारनेपर आनन्दमगन हो 
गये थे, वैसे ही श्रुतदेव ब्राह्मण भी भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
ठणपीरवृसीप्वेतानानीतेषुपवेश्य श  । ओर ुनिरयोको अपने धर आ या देखकर आनन्दर्रिद्रट ` 
| | हो गये; वरे उन्दं नमस्कार करके अपने वच्र उदछाटः 
सखागतेनाभिनन््ाडघीन्‌ सभार्योऽवनिने मदा॥।२९॥ | उछाक्कर नाचने लगे ॥ ३८ ॥ श्रुतदेवने चश्रई, षदे 
। ओर कुशासन विंद्धाकर उनपर भगव्रान्‌ श्रीकरष्ण] ओर्‌ 
मुनि्यंको वरेटाया, . खागत-भापण आदिके द्वारा उनका 
नापयांचक्र उद्धर्षो लन्धसर्वमनोरथः ।०।। | अभिनन्दन किया तथा अपनी प्नीकै साथ वड 
आनन्दसे सवके पाव परखारे ॥ ३९ ॥ परीक्षित्‌ ! 
। महान्‌ सोभग्यश्चाटी श्रुतदेधने भाव्रान्‌ ओर ऋषियके 
। चरणोदकसे अपने धर ओर उुटुभ्िर्ोको सींच दिया । 
| इस समय उनके सारे मनोरथ पूण हो गयेथे। वें 
दर्पातिरेकसे मतवाटे हो रहे थे ॥ ४० ॥ तदनन्तर्‌ 
। उन्दनि फक, गन्ध, खससे सुव्रासित निमंरु एवं मधुर 
सपयेयः = 19१1 | अ 1 व 
| अनायासप्राप्त पूजा-सामग्र ओर सत्वगुण बदानेवाखे 
स॒ तर्कयामास कुता ममान्वभृद्‌ । अन्ने सव्रकी आराधना की ॥ ४१ ॥ उस समय 
1 । श्रुतदेवजी मन-ही-मन तक्रना करने ल्गे कि भतो 
.| घर-गृहस्थीके अंधेरे कूर्म गिरा इआ द्र अभागा दः 
| मुने मगव्रान्‌ श्रीकृष्ण ओर उनके निवासस्थान ऋषि- 
| मुनियोका, जिनके चरणोकी धूढ ही समस्त तीर्थकरों 
तीथं बननेवाटी है, समागम कौसे प्राप्त हो गया १ 
॥ ४२ ॥ जवर सव लोग आतिथ्य खीकार करके 
आरामसे वेठ गये, तव श्रुतदेव अपने खी-पुत्र तथा 
अन्य सम्ब्रन्धियोके साथ उनकी सेवरामे उपस्थित इए । 
वे भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरणकमर्छोका स्पशं करते इए 
कहने खगे ॥ ४२ ॥ 


प का क का „छ ता 2 म 1 1 1 


नत्वा नान्‌ सट्टा धस्वन्‌ चासा ननतं इ 1२८ 


तदम्भसा महाभाग आत्मानं सगृंहान्वयम्‌ । 


फलाहंणोशीरशिवाग्रताम्बुभि- 


मृदा. सुरभ्या त॒लसीङ्काम्बजैः 


चन्त 


आराधयामास  यथोपपन्नया 


गृहान्धक्रूपे पतितसख संगमः 

यः सवतीथासदपादरेणुभिः | | 

कृष्णेन चाख्यात्मनिकेतभूुर; ॥४२॥ | 
एूपवि्टान्‌ कृतातिभ्यनछरतदेव उपस्थितः 

सभायंखजनापत्य उवाचाङ्घ्यमिमर्धनः ।।४३॥। 


ुतदेव उवाच शवुतदेवने कहा-ग्रभो ! आप व्यक्त-अन्यक्तरूप 

। प्रकृति ओर जीवोंसे परे पुरुषोत्तम हैँ । मुञ्चे आपने अजं 

नद्य ना दशन प्राप्तः पर्‌ परमपरषः। ही दर्शन दिया हो, रेसी बात नहीं है । आप तो 
यदीदं शक्तिभिः सूषा प्रविष्टो हयात्मसत्तया ४४ | तभीसे सव लोगेसे मिले इए है! जवसे आपने अपनी 
राक्तियोके द्वारा इस जगत्की रचना करके आत्मसत्तके 

यथा शयानः पुरुषो मनसेवात्ममायया । र्पसे इसमे प्रवेश किया है ॥ ४४ ॥ जैसे सोया ` 


१. वेशय॑न्‌ | २. माल्या । ३. यदिदं । 


 । ६६० श्रीमद्भागवत [ अ० ८६ 











सष सोकं परं स्यापमयुविर्यावभासते ॥४५। | इआ पुरुप खमप्नव्रस्थामे अव्रि्यावश् मन-ही-मन खप्न- 
जगत्‌क्री सृष्टि कर केता है ओर उसमें खयं उपश्चित 
होकर अनेक र्पपोमें अनेक कमं करता आं प्रतीत 
होता है, वैसे ही आपने अप्रनेमे ही अपनी मायासे 
न ह. | जगत्की रचना कर खी है ओर अव उसमे प्रवेद 
सृणा श्वदतासन्तद्{द्‌ भाद्यमलात्मनाम्‌ ॥४६॥ करके अनेकों खूपोंसे प्रकारित हो रे है ॥ ४५५ ॥ 
जो रोग सवदा आपकी टीव्यमकथाका श्रवण-कीर्तन 

ह रः = | तथा आपकी ्रतिमाओंका | अचन-वन्दन करते हैँ ओर 
ट ५) आप्रसमे आपकी दही चर्चा करते है, उनका हदय 

यद्ध हो जाता है ओर आप उसमें प्रकाशित हो जते 
हैँ ॥ ४६॥ जिन यर्गोका चित्त लरोकिक-वैदिक 
आदि कर्मोकी बासनासे विमुख हो रहा है, उन्वें 
हृदयम रहनेपर भी आप उनसे वहत दर है; वितु 
नमोऽस्ततेऽध्यात्मविदां परात्मने जिन लोगोने आपके गुणगानसे अपने - अन्तःकरणको 
सटहुणसम्पन्न वना च्या हे) उनके द्ये. चित्तवरृ्तियोसे 

अग्राह्य होनेपर भी आप अत्यन्त निकट हं || ५७ ॥ 
अनात्मने खात्मबिभक्तमृत्यवे । प्रभो ! जो येग आत्मतच्छको जाननेवाट है उनके 
आत्मके खूपमं ही अप यित आर जौ दारीर 
अको ही अपना आत्मा मान वैठे हैँ, उनके व्िि 
| आप अनात्माको प्रप्त होनेवाटी म्ध्युे स्पमं हें । 
| आप महत्तर आदि का्य्॑रव्य ओर प्रङ्ृतिखूम कारणक 
खमाययापस्ंव्रतरुद्रर्टये ॥४८। शिशन न द -आसकः र ५ श ९. भाप 
अपनी दृष्टिर्‌ पर्दा नहीं डाक सकती, रितु उसने 

दूसरोकी दृश्िको ल्क रला है | आपको मै नमस्कार 

करता ह| ४८॥ सखयप्रकाश प्रमो ! हम अपं 


शृण्वतां गदतां शश्दच॑तां त्वौमिवन्दताम्‌ । 


आत्मराक्तेभिरग्राह्योऽप्यन्त्युपेतगुणात्मनाम्‌।। ४७ 








“ 9४ 


4/0 


सकारणाकारणलिङ्गभीयुषे 


सत्वं याधि ट ९ वि देवं क ५ | ठ है च] @ (= क = (आ [9 
। 11449 महे । सेवकः है | हमे आज्ञा दीजिये किं हम आपकी क्या 
{ 9 क, भ ज ५ क त | 
, सेवा करे १ नेत्रो द्वारा आपका ददान दहोनेतक दी 
॥ ^ रके (९ ७९ हें = = & =+ (\ 

जीवेकि क्ठेरा रहते दहै | आपके दशनम दी समस्त 


/ एतदन्तो चणां क्लेरो यद्‌ भवानकषिगोचरः ।४९॥ | क्टेशोकी परिसमाति है ॥ ४९ ॥ 
| श्रीट्युकदेवजी कहते है- परीक्षित्‌ ! रारणागत- 


£ श्रीशुक उवाच क मयदहारी भगवान्‌ श्रीकृष्णने श्रुतदेवकी ्राथना सुनकर 
तद क्तममलत्युषाक्ण्य भग्व्रान्‌ प्रणतात्हा | अपने हाथसे उनका हाथ प्रकड़ छया ओर मुसकराते 


गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रहसंसयुत्राच ह ॥५०॥ | हए कह; | ५० ॥ 
श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीक्कष्णने कदटा-- प्रिय श्रुतदेव | ये वड़- 


व्रहमस्तेऽनुग्रहा्धाय शम्प्राप्तान्‌ विद्धयम्रन्‌ ञुनीन्‌। । बडे ऋषि-खुनि मपर अलुगहं करे ण्वि दी यह ही यहाँ 
१. चामि० | २. ते | 








= = कै क ऋक = । कक , 


अ० ८& ] 





क कष्यायगगोगकययीग्काकययययदयययाययायवायकागकाकायाच्यवाष्यवाचावययवायदाययावया श ्िणिणयषासयसदायायाययाायययायदायदाययकाय्यकाय्यकायदायदाचयायकय्यं 
[ । नभ 


दद्म स्कन्ध 





९६६१ 





संचरन्ति मया रोकान्‌ पुनन्तः पादरेणुभिः 11५९1 
देवाः श्रेत्राणि वीनि दद्यनस्यरनार्चनेः । 
तदप्य्द्येश्चया ।५२॥ 
ब्राह्मणां जन्पना भ्रेयार्‌ सर्वेपां प्राणिनाभिह । 
तपसा विद्या तष्खया किमु मत्कख्या युतः ।५३॥ 
न व्राल्ममान्मे दयितं रूपमेत्चतुथजप्‌ । 
सच॑बेदमय तः सुचदेवभयो यहम्‌ 1\५४॥। 


+ च 


दुष्यज्ञा अविदित्येवमवजानन्त्यद्धययः 


१ की 


गुरुं मां विम्रमात्मानमचदाविल्यद््टयः ॥५५॥ 
चराचरमिदं विश्वं भवा ये सख हेतवः | 


मदूपाणीति चेतम्याधत्ते विप्रो मदीक्षया ५६ 


तसाद्‌ बरह्मऋषीनेतान्‌ बदान्‌ मच्छद्रयार्चय । 


एवं चेदचितोऽस्म्यद्धा नान्यथा भृष्पनितिभिः।।५७। 
श्रीशुक उवाच 

स॒ इत्थं प्र्ुणाऽऽदिष्टः सहकृष्णात्‌ द्विजोत्तमान्‌ । 

आराध्येकात्ममवेन मेथिलश्राप सद्रतिम्‌ ॥५८॥ 


एवं खभक्तयो राजन्‌ भगवान्‌ भक्तभक्तिमान्‌ । 
१. बादरायणिरुवाच । 


पारे हैँ । ये अपने चरणकम्छोकी धृट्से छोगों ओर 
ल्रेकोको पित्र करते दए मेरे साध विचरण कर रहे 
हे ॥ ५१ ॥ देवता, पुप्यक्षेत्र ओर तीथं आदि तो 
दशन, स्पशं, अर्चन आदिक द्वारा रेरे वहत 
दिनम पवित्र करते हे; परंतु संत पुरुष अपनी दष्टिसे 
दी सवको पुत्रित्र कर देते हैँ । यही नही; देवता 
आदिमे जो पवित्र करनेको दक्ति है, व्ह भी उन्दं 
संतोकी दष्टिसे दी प्राप्त होती दहै ॥ ५२ ॥ श्रतदे 
जगते ब्राह्मण जन्मसे दी सव प्राणिरयोसि श्रेष्ठ है | 
यदि वह तपस्या, त्रिया, संतोष ओर मेरी उपासना- 
मेरी भक्तिसे युक्त हो तवर तो कहना दी क्या है ॥*५३॥ 
मुञ्चे अपना यह चतुमुजख्प भी ब्राहमणोकी अपेक्षा 
अधिक प्रिय नहीं है| क्योकि ब्राह्मण सूर्वैवेदमय है 
ओर मे सवदवमय द्र ॥ ५४ ॥ दुबुद्धि मनुष्य इसं 
चातको न जानकर केवल मूति आदिमं ही पूज्यवुद्धि 
रते हं ओर गुणोमें दोष निकाल्कर मेरे खशख्प 
जगदगुरु ब्राह्मणका, जो कि उनका आत्मा ही है, 
तिरस्कार करते हँ ॥ ५५ ॥ व्राह्मण मेरा साक्षात्कार 
करके अपने चित्तम यह निश्चय कर केता है कि यहं 
चराचर जगत्‌, इसके सम्बन्धकी सारी भावनां ओर 
इसके कारण प्रकृति-महत्त्रादि सर-के-सव आत्मखख्य 
मगवानूक ही ख्य हें ।॥ "६ ॥ इसव्ये रुतद् ! तुम 
इन ब्रहम्षियोको मेरा दी खरूप समश्चकर प्री श्रद्रासे 
इनकी पूजा करो । यदि तुम एेसा करोगे, तव तो तुमने 
साश्वात्‌ अनायास ही मेरा पूजन कर च्या; नहीं तो 
बडी-व्रडी वहूुमूल्य सामग्रियोसे भी मेरी पूजा नहीं हो 
सकती ॥ ५७ ॥ 

श्रीटयुकदेवजी कहते है--परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ 
श्रीकृष्णका यह आदेशा प्राप्त करके श्रुतद्छने भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण ओर उन ब्रह्मर्पियोकी एकात्मभावसे आराधना 
की तथा उनकी कपासे वे भगवत्खरूपको प्राप्त हो गये । 
रजा बहुलाश्चने मी वही गति प्रप्त की ॥ ५८ ॥ 
प्रिय परीक्षित्‌ । जैसे भक्तं भगवान्‌की भक्ति करते है, 


वैसे ही भगवान्‌ भी भक्तोकी भक्ति करते है । वे अपने 


क भी 7 रे 


६६२ श्रीमद्भागवत [ अ० ८७ 


# मी मीर एमे मी भभ भ भभम व म म ति 








उषित्वाऽऽदिश्य सन्माग पुनद्वारतीमगात्‌ ॥५९॥ | दोनों भक्तोको श्रसन करनेके ल्य कुछ दिनतक 
मिथिव्पुरीमें रहे ओर उन्हं साधु पुरूपोके मागका 
उपदेश करके वे द्वारका खोट आये ॥ ५५९ ॥ 


इति. श्रीमद्भागवते महापुराणे पारशहस्यां संहितायां ददामस्कन्धे उ्रार्भर 
श्रुतदेवानुग्रहो नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥ 


अथ सप्ताशीतितमोऽध्याथः 
वेदस्तुति 
` परीक्षिदुवाच राजा पपीक्षित्‌ने पूत्का-भगवन्‌ ! ब्रह्म कार्य ओर 
कारणसे सवथा परे है । सच, रज. ओर तम-ये 
तीनों गुण उसमे रहै दही नदीं } मन ओर बाणीसे 
सकेतख्पमे भी उसका निर्देडा नदीं किया जा सकता । 
ब्रह्मन्‌ बह्मण्यनिर्द्श्ये निगेणे गुणच्त्तयः । दूसरी ओर समस्त श्रतिर्योका विपथं गुण दीदे 
८ वे जिस विषयकरा वणन करती हँ उसके गुण, जाति, 
क्रिया अथवा रखूटिका ही निर्दा करती ह ) रेसी 
सथितम श्रुतिर्यौ निगुण त्रह्मका प्रतिपादन किस प्रकार 
कृथं चरन्ति श्रुतयः साक्षात्‌ सदसतः परे 1 १॥ | करती हैँ १ क्योकि नि्युण व्स्तुका खूप तो उनकी 
। प्हैचके परे है ॥ १ ॥ 

श्रीडयकदेवजी कहते ह --परीतरित्‌;'! ८ भगवान्‌ 
सवशक्तिमान्‌ ओर गुणक निधान दै | श्रुतियौँ स्पष्टतः 
सगुणका ही निखूपण करती हैँ परत विचार करनेपर 
उनका तात्पयं निणुण दही निक्रल्ता है | व्रिंचार 
; करनेके व्यि ही ) भाव्रानूने जीवोके च्ि बुद्धि 
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान्‌ जनानामसृजत्‌ प्रथः । इन्द्रिय, मन ओर प्राणोकी सृष्टि की दहै । इन्के द्वारा 
वे स्वेच्छासे अथं, धर्म, काम अथवा मोक्षका अर्जन 
कर सकते हैँ । ८ प्राणेके द्वारा जीवन-धारण, श्रचणादि 
इन्दियोके द्वारा महावाक्य आदिका ण, मनके द्वारा 
त्रां च भवार्थं च आत्मनेऽकस्पनाय च ॥ २ ॥ | मनन ओर बुद्धिके द्वारा निश्चय करनेपर तियोके तात्यं 
| निपुण खद्पका साक्षात्कार हो सकता है । इसन्थि 
श्ुतिया सगुणका प्रतिपादन करनेपर भी वस्तुतः निर्गुण- 
ह | परक दहै ) ॥२॥ ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाटी 

४. ¢ 
^ | उपनिषदूका यही ख्य है । इसे प्रजे भी पूर्व 
पनिषद्‌ ब्राह्मी पूवषां पूवजधता । सनकादि ऋभियेनि आ्मनिधयके द्र भाण किया है । किया है । 


श्रीलयुकं उवाच 








दशम्‌ स्कन्थ 


६६२ 





~= ~-------------------------------------------------------------------------------- ~ 





रि 





श्रद्धया धारयेद्‌ यस्तां क्षमं गच्छेदकिंचनः ॥ ३ 11 ] जो भी मनुष्य इसे श्रद्रापूवक धारण करता है, 


छ 


अत्र ते वणंपिष्यामि गाथां नारायणान्विताम्‌ । 
नारदस्य च संवादस्रषेनोरायणसखय च । ४॥ 
एकदा नारदो लोकान्‌ पयन्‌ भगवत्प्रियः । 
सनातनसूपिं द्रं ययो नारायणाश्रमम्‌ ॥ ५ ॥ 
यो व भारतवर्पेऽखिन्‌ क्षमाय खस्तये च्रणाम्‌ 1 


धर्मज्ञानरामोपेतसाकस्पादासितस्तपः | ६ 1 


तत्रापविष्म्रपिभिः करापग्रामवासिभिः। 
प्रीतं प्रणतोऽप्रच्छदिदमेव कुरूढह 11 ७ ॥ 


तस्मे द्यवोचढ भगवानृषीणां श्रृष्वतामिदम्‌ | 
यो ब्रह्मवादः प््वेपां जनलाकनिवासिनाम्‌ ॥ ८ ॥ 
श्रीभगवानुवाच 
सखायम्थु् व्रहमपत्रं जनलोकेऽभवत्‌ पुरा । 
तत्रस्थानां मानसानां खनीनामृध्वरेतसाम्‌ ॥ ९ ॥ 
इवेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रुं तदीश्वरश्‌ । 
बहमवादः सुसंवृत्तः श्रतयो यत्र॒ शेरते 
तन हायमभूत्‌ प्रश्नस्त्वं मां यसनुपच्छसि १० 


उल्यश्रुततुप 'शीलास्तुल्यसवीयारिमध्यमाः । 


वन्धनके कारण समस्त उपाधिर्यो-भनात्मभावोसे मुक्त 
होकर अपने परम कल्याणखख्प परमात्माको प्राप्त हो 
जाता है॥३॥ इस विषयमे मै तुमं एक गाथा 
सुनाता द॑ । उस गाथक साथ खयं भगवान्‌ नारायणका 
सम्बन्ध है | वह गाथा देवर्षिं नारद ओर ऋषिर 
नारायणका संवाद है ॥ ¢ ॥ 
एक समयकी वात है, भगवान्‌के प्यारे भक्त देवर्षि 
नारदजी विभिन लोकम विचरण करते इए सनातन- 
ऋषिं भगवान्‌ नारायणका ददान करनेके च्य बदरि 
काश्रम गये ॥ ५ | भगवान्‌ नारायण मनुष्यो अभ्युदय 
( टखोकिक कल्याण ) ओर परम निःश्रेषसर ८ भगवत्ख- 
रूप अथवा मोश्चकी प्रापि ) के ल्य इस भारतवषमे कल्पने 
प्रारम्भसे दी धमं, ज्ञान ओर संयमके साथ महान्‌ 
तपस्या कर रे है ॥ & ॥ परीक्षित्‌ ! एक दिन वे 
कलपग्रामव्रासी सिद्ध ऋषियोके वीचमे वरेठे इए ये। 
उस समय नारदजीने उन्हं प्रणाम करके वडी नम्रतासे 
यही प्रन पृ, जो तुम सुञ्जसे पृ रहे हदो ॥ ७॥ 
भगवान्‌ नाएयणने कऋषियोकी उस भरी समामे नारद- 
जीको उनके प्र्नका उत्तर दिया भोर बह कथा सुनायी, 
जो “ पूर्वकाटीन जनलोकनिनासियोमे परस्पर बनेदोके 
तायं ओर ब्रह्मके खरूपके सुम्बन्धमे विचार करते 
समय कदी गथी थी] ८1 
भगवान्‌ नारायणने कहा-नारदजी ! प्राचीनः 
काल्की वात है । एक वार जनलोकं बह रहनेवाञे 
ब्रह्माके मानस पुत्र नैष्ठिकः ब्रह्मचारी सनक, सनन्दन, 
सनातन आदि परमरषियोका ब्रह्मपत्र ८ ब्रह्मवरिषयकर विचार 
या प्रवचन ) इआ था ॥ ९ 1 उस समय तुम मेरी खेत- 
दरीपाधिपति अनिरुद्र-मूतिका दशंन करनेके य्य उेत- 
द्रीप नचठे गये थे | उस्‌ समय वरहा उस ब्रह्मके सम्बन्ध- 
म बड़ी ही सुन्दर चर्चा इई थी, जिसके प्रियमे श्रुतियाँ भी 
| मोन धारण कर छती है, स्पष्ट वर्णन न करके तादपर्यूपसे 
| लक्षित कराती इई उसीमे सो जाती है । उस ब्रह्मसत्रमे 
यह प्रश्न उपस्थित क्या गया था, जो तुम सुञ्जसे 


पूछ रहे हो 1 १० ॥ सनक, सनन्दन, सनातन 


^. १४४ ह | । ५ ६५१५ 





त्वमसि यदात्मना समवरुद्रसमस्तभगः। 





&&७ श्रीमद्भागवत [ अ० ८७ 

अपि चक्रुः प्रनचनमेकं शुभरूषवोऽपरे ॥११॥ | सनक्कुमार-- ये चारो भाई शासखरीय ज्ञान, तपस्या ओर 
शीक-खमावमे समान हें । उन छोगोकी दष्टिमे शत्र, 
मित्र ओर उदासीन एक-से हैँ । फिर भी उन्होने अपने- 
मसे सनन्दनको तो वक्ता वना चछ्िया ओर देष माई 
सुननेके इच्छुक बनकर वेट गये ॥ ११ ॥ 





सनन्दन उवाच सनन्दनजीने छदा- जिस प्रकार प्रातःकाठ होने- 


प्र सोते इए सम्राट को जगानेके ट्य अनुजीवी वंदीजन 
| उसके पास्त अते हँ ओर सघ्राट्के पराक्रम तथा सुयश 
तदन्ते बोधयांचक्रस्तलिङ्खः श्तयः परम्‌ ।।१२॥ | का गान करके उसे जगते है, वैसे दी जव परमा 
र भ | ~ द ¢ क (क) [न ९ 

~ = । अपने वनाय हए सम्पण जगतको अपनेमं दीन करके 


| 
| 
खसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । | 


# 1 


अन्तम श्रियो उनका प्रतिपादन करनेवाे वचने 
उने इस प्रकार जगाती हैँ ॥ ए२-१३ ॥ 

प्रतय ऊचुः | श्रुतिर्या कदती ह--अजित ! अप ही सवशर है, 

= | आपपर कोई विजय नहीं प्राप्न कर सकता । आपकी 

| जय हो, जय हो । प्रभो } आप खमातरसरे ही समस्त 

| टेशर्येसि पृण है इसघ्यि चराचर प्राणिधोको फंसाने- 

| वाली मायाका नादा कर दीजिये | प्रभो! इस गुणमयी 

जय जय जद्यजामजित दापगृभीतगुणां | मायाने दोषके व्यि--जीवोके आनन्दादिमय सहज 

सखख्पका अच्छदन करके उन्हे. बन्धनम डालनेके 

च्य ही सादि गुणोको ग्रहण ~ किया है । जगतमें 

जितनी भी साधना, ज्ञान, त्रिया आदि राक्तिर्या हँ उन ` 

| सबको जगनेवाठे आप ही हैँ । इसि आपकर मिटाये 


प्रत्युपेऽभ्येत्य सुश्छोकर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥१३॥ | 


+) 


बिना यह माया मिट नदीं सकती । ८ इस विपरयमें यदि 
प्रमाण प्रा जाय, तो आपकी श्रासभूता श्रुतियोँ दी-- 
हम ही प्रमाण है | ) ययपि हम आपका खरूपतः वणन 
करने असमर्थ है, परंतु जव कमी आप मायके द्वारा 


। 
| 
| 


अगजगदोकसामखिलशचक्त्यवबोधक ते ठ 


जगत्की संष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसको 
निषेध करके खरूपसितिकी टीला करते है अथवा 
अपना सच्चिदानन्दखखू्प श्रीविग्रह प्रकट करके क्रीडा 
करते है, तभी हम यत्विचित्‌ आपका वर्णन करनेमे 


 . कचिदजयाऽऽत्मना च चरतोऽलुचरेनिगमः।।१७॥ । समर्थ होती है ॥ १४ ॥ इसमे संदेह नहीं कि हमार 


न 


# इन रे कोपर श्रीश्रीधरस्वामीने बहुत खुन्दर छक चिति है, वे अर्थसदित यहो दिये जति ह - 
जयजयाजित्‌ जह्यगजज्गमाट़ृतिमजामुपनीतग्रबाराणाम्‌ । 
न॒हि भवन्मते प्रभवन्त्यमी निगमगीतगुणार्णवता तव ॥ १ ॥ 
अजित । भापकरी जय हो, जय हो ! शच युग धारण करके चराचर जीवको आच्छादित करवा इ मायाो न 









क 


अ० ८७ ] | दलम्‌ स्कन्ध ६६५ 





बरहदुपरन्धमेतदबयन्त्यवशेषतया द्वारा इनदर, वरुण आदिं देवताओंका भी वर्णन किथां 

| जाता है, परंतु हमारे ८ श्रुतियेकिं ) सारे मन्त्र अथवा 

| सभी मन्तरद्ष्टा ऋषि प्रतीत होने इस सम्पूण जगत्‌- 

| को तब्रह्मघखूप ही अनुभव करते दहै । क्योकि जिस 

| समय यह सारा जगत्‌ नहीं रहता, उस समय भी अप 

| वच रहते है । जेसे धट, रार ८ मिट्रीका प्याखा- 

यत ॒उदयास्तमयो विकरतेगरदि वाविक्रतात्‌। | कसोरा ) आदि सभी विकार गिदयीसे ही उ्यलन 

ओर उसीमे टीन होते है, उसी प्रकार सम्पूर्णं जगतक्री 

उतपर्ति ओर प्रख्य आपमें ही होती है | तव क्या आप 

 प्रभ्वीके समान विकारी हें १ न्ही-नरी, आप तो एकरस- 

नित्रिकार है । इसीसे तो यह जगत. आपम उत्पन्न नही, 

| प्रतीत है | इसव्विि जंसे घट, उाराव्र आदिका वर्णन भी 

अत ऋषयो दुधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं  पिद्रीका ही वणन है, व्रेसे ही इन्द्र, वरुण आद्रि 

देवताओंका वणन भी आपका ही वर्णन है | यही 

कारण है किं विचारशील ऋषि, मनसे जो कुछ 

सोचा जाता है ओर बाणीसे जो कुछ कहा जाता है, 

उसे अपमें ही सित, आपका ही खर्प देखते हें । 

मनुष्य अपना पैर चाहे कहीं भी रक्खे--ईट, पल्थर्‌ 

या काठपर-होगा व्ह ॒प्रथ्वीपर दी; क्योकि वे सव 

प्र्वीखरूप ही देँ । इसस्मियि हम चाहे जिस नाम या 

। जि रूपका वर्णन करे, वह आपका ही नाम, आपका 
ही खूप है*# ॥ १५ ॥ 

भगवन्‌ ! लोग सच, रज, तम--इन तीन गुणेोकी 

इति तव॒ घरयरू्यधिपतेऽखिरलोकमल- । मायासे वने इए अच्छर-वुरे भावो या अच्छी-वुरी क्रियाओं- 

म उलञ्च जाया करते है; प्रतु आप तो उस माया- 

नटीके खामी--उसको नचानेवारे हैँ । इसी्यिये विचार 

रीट पुरूष आपकी खीखकथकरे अमृतसागरमे गोते टगातें 

रहते है ओर इस प्रकार अपने सारे पाप-तापको धो-बहा 


कथमयथा भवन्ति वि दत्तपदानि नृणाम्‌ 1१५] 


कषपणकथागृतान्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । देते है । ज्यो न हो, आपकी टीला-कथा सभी जीरके 
न = 


कर दीजिये । आपके विना बेचरे जीव इसको नहीं मार सकेगे- नदीं पार कर सकेगे । वेद इस बातक्रा गान करते रहते दै 
कि आप सक्र सद्रुणोके समुद्र ह ॥ १॥ 
# दुदिणवहिरवीनदरसुखामरा जगदिदं न भवेदछथगुस्थितम्‌ । 
| बहुमुखेरपि मन्त्रगणैरजस्त्वमुख्मूतिरतो विनिगधसे ॥। २ ॥ 
बरला अग्निः सूयः इन्द्र आदि देवता तथा यह सम्पूण जगत्‌ प्रतीत होनेपर भी आपपे प्रथक्‌ नहीं हे । इसि 
अनेक देवताओंका प्रतिपादन करनेवाञे वेदमन्त्र उन देवता्ओंकिं नामते परथकःध्रथक आपकी ही विभि मूर्तियोका वणन्‌ 
करते ह । वस्ततः आप अजन्मा है; उन मूतियेकि रूपम मी आपका जन्म नहं दता ॥ २ ॥ 


भा० स० खं० २. ८४- 


= चि 
४2 





वि ९९९ श्रीमद्भागवत [ अ० ८७ 


शकक म च्व 


1 = 4 शकर कणिक + + # क - [ि  } ॥ | ह 
2 
नि 


किंत पुनः स्वधामविधुताशयकारगुणाः मायामक्को नष्ट करनेत्राटी जो है । पुरषोत्तम ! जिन ` 
महापुरुषोने आम्मज्ञानके द्वारा अन्तःकरणके रागरष 
| आदि ओर शरीरके काठ्कृत जरा-मरण आदि दोष 
| मिटा दिये है ओर निरन्तर आपके उस खरूपकी अनु- 
भूतिम मग्न रहते है, जो अखण्ड आनन्दखरूप है, 
उन्होने अपने प्राप-ता्पोको सटाके व्यि शान्त, भस्म 
परम भजन्ति ये पदमजसरसुलालुभवम्‌ ।॥१६॥ | कर (९ = इसके भिपममं तो कना ही शया 
ॐ ॥ ‰‰ ॥ मगवन्‌ प्राणधारियोके जीवनकी 
| सफता इसीमें है किं वे आपका भजन-सेवन कर 
| आप्रकी आज्ञाका पालन करे; यदि ते रेता नहीं 
| करते तो उनका जीवन व्यर्भं है ओर उनके शरीरम 
 दवासका चञ्ना टीक वेसा ही है, जसा टृहाी 
तय इव उसन्त्यसुभृतो यदि तेऽनुविधा  धोकनीमें हवाका आना-नाना | महत्तख, अहंकार आदिन 
। | आपके अनुप्रडसे - -आपकरे उनमें प्रवे करनेपर ही इस 
| ब्रह्मण्डको सृष्टि की है | अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, 
विज्ञानमय ओर आनन्दमय--उन पचो कोशम पुरय- 
रूपसे रहनेवाठे, उनम भै की स्पत करनेवाठे भी 
यो |अप ही हं । अप्क्रे ही अस्तित्वसे उन कोरक 
षदहमादयाण्डमसृजन्‌ यदनुग्रहतः । | अस्ित्वका अनुभव होता है ओर उनक्रे न रहनेपर भी 
| अन्तिम अवधिरूपसे आप विराजमान रहते ह | 
| इस प्रकार सवम अन्वित ओर सव्रकी अव्रधि होनेपर भो 
| आप असंग ही हैँ । क्योकि वास्तवमें जो कुछ वृत्तयो 
द्वारा अस्ति अथवा नास्तिक्रे रूपमे अनुमव्र होता है, 
पुरपविधोऽन्वयोऽत्र चरमोऽन्नमयादिषु यः उन समस्त कार्य-करणोसे आप परे हैँ । नेति-नेति' के 
द्वारा इन सव्रका निषेव्रदहो जानेपर भी आप ही शेष 
रहते हे, क्योकि आप उस निषेधके भी साक्षी है ओर 
वास्तत्रमे आप ही एकमात्र सत्य ह | ८ इसलिे आपके 
भजनके विना जीवका जीवन व्यथ ही दहै; क्योकि वहं 
सदसतः पर त्वमथ यदेष्ववरोषम्रतम्‌ ॥१७॥ इस महान्‌ सत्यसे वच्चित है ) | ॥ १७ ॥ 
# सक्रख्वेद्गणेरितसद्रुणस्त्वमिति सवं मनी ष्रिजना रताः । 


स्न्‌ त्वयि  सुभद्रगुणश्रवणादिभिस्तव पदस्मरणेन गतक्लम[; | २ ॥ 
" सारे वेद आपके सृदर्णोकरा वर्णन करते है । इसच्यि संसारके समी विद्वान्‌ आपके मज्गरमय कल्याणकारी 


-गुणेकि श्रवणः स्मरण अादिके द्वारा आपसे ही प्रेम करते है ओर आपक्रे चरणोका स्मरण करके सम्पूणं क्ठेरोंसे मुक्त हो 


1 । 


~ 












ह 
जका 





क क 1 । (9 1 1 प 





~ नखघुः प्रतिश्या यदि सवयि भ्वग्रव्ैनसंसरणादिभिः। 
त नरहरे । न भजन्ति वृणामिदं हतिबदुच्छवसितं वित 








अ० ८७ | 


नानया [क 0 करण्यः 
व 0 पा नि -~ 


दशम स्कन्ध 


६६७ 








= = = = = = 


उदरमुपासते य ऋषिित्मसु करूपेद्याः 


परिसरपद्रति हृदयमारुणयो दहरम्‌ । 
तत॒ उदगादनन्त तव धाम शिरः परम 


पुनरिह यत्‌ समेत्य न पतन्ति कृतान्तमरुखे 1१८1 


सखकरृतविचित्रयोनिपु विशन्निव देत॒तया 
तरतमतश्वकरास्स्यनल्वत्‌ सकरतानुकृतिः। 


अथ वितथासखमृष्ववितथं तव धाम समं 
विरजधियाऽन्वयन्त्याभविपण्यव एकरसम्‌ ॥\१९। 


खकृतपुरेष्वमीष्ववहिरन्तरसंबरणं 


= = = 


पिरि ययन ~= 





ऋषियोने आपकी प्रापिके ल्य अनेकों मागं माने 
हं । उनमें जो स्थूठ दश्चिवाठे हँ, वे मणिपूरक चक्रमे 
अग्निरूपरसे आपकी उपासना करते दहै । अरृणवंदके 
ऋषिं समस्त नाडियोके निकट्नेके स्थान इयम आपके 
परम सूष्ष्मखस्पर दहर ब्रह्मकी उपासना कते दै । 
प्रमो | हृटयसे दी आपको प्राप्त करनेका श्रेष्ठ मार्गं 
सुषुम्ना नाडीं ब्रह्मरन्ध्रतक गयी हई है | जो पुरुप उस 
ञ्योतिमंय मार्गको प्राप्त कर छता है ओर उससे ऊपरवी 
ओर वदता हैँ, वह फिर जन्म-मृ्युके चक्रमे नहीं 
पडता ॥ १८ ॥ भावन्‌ ! आपने दी देता, मनुष्य 
ओर पञ्यु-पक्षी आदि योनि्यौँ वनायी है । सदा-सर्वत्र 
सव रूपमे आप हँ ही, इसन्थिये कारणखूपसे प्रवेदा न 
करनेपर भी आप एेसे जान पडते हँ, मानो उसमें 
प्रविष्ट दए हों । साथ ही व्रिभिनन आकृतियोंका अनुकरण 
करके कटी उत्तम, तो करीं अघमखूपसे प्रतीत 
होते ह, जसे आग ओोटी-बड़ी ल्कडियों ओर कमेक 
अनुसार प्रचुर अधवा अस्प परिमाणे या उत्तम-अधम- 
रूपमं प्रतीत होती है । इससे संत पुर्प लोकिंक- 
पाररोकिक कर्मोकी दूकानदारीसे, उनके फलसे विस्त 
हो जाते है ओर अपनी निमंक बुद्धिस सव्य-असत्य, 
आत्मा-अनात्माको पहचानकर जगतके ठे रूपमे नहीं 
फँसते, आपके सवत्र एकरस, समभावसे स्थित सत्य 
खरूपरका सान्नात्कार करते हं †‡ ॥ १९ ॥ 

प्रभो | जीव जिन रारीरोमे रहता है, वे उसके 
कम॑के द्वारा निर्मित होते है ओर वास्तवमे उन दारीरोके 
काय-कारणरूप आव्रणोंसे वह रहित है, क्योकि वस्तुतः 
उन आवरणोकी सत्ता दी नहीं है । तच्छज्ञानी पुरुष 
ेसा कहते हँ किं समस्त शक्तियोको धारण करनेवाञे 


आपका ही वह खरूप है । खरूप होनेके कारण अश 


` = = ~ ~~ ~ = 


नरहरे  मनुष्य-शरीर प्राप्त करके यदि जीव आपके श्रवणः; वर्णन ओर संस्मरण आदिके दवारा आपका भजन नहीं 
करते तो जीरवोका श्वास केना धोकनीके समान ही सर्वथा व्यर्थं हे ॥ ४ ॥ 


# उद्रादिषु यः पुंसां चिन्तितो मुनिवत्ममिः। 
हन्ति म्रत्युभयं देवो इद्वत तपुपास्महे ॥ ५ ॥ 


मनुष्य ऋषि-मुनियोके द्वारा बतरायी इर पद्धतिरयेसि उदर आदि स्थानम जिनका चिन्तन करते ई ओर जो प्रथु 
उनके चिन्तन करनेपर मरत्यु-भयकरा नाश कर देते है, उन ददयदेशमे विराजमान परसुकी हम उपासना करते ई ॥ ५ ॥ 


{[ खनि्ितेषु 
सवोनुस्यूतसन्मात्न 


कायषु 


तारतम्यविवजितम्‌ 1 


भगवन्त भजामहे 1} ६ 1} 





नः + मम ष 


८.1 ^ "(ननि ०) (4 
>. र + १ हि ` <~ 






1 ~~~ ~~~ ~~~ ~ ~~~ कि 9 2 + त 2 1 2 त त "कक कि त 2 2 आ श त कः चको कः चः कि ऋक ऋः कः चः = ॥ न 7 


इति गति विविच्य कवयो निगसाबपनं 


भवत्‌ उपासतेऽङ्धिमभवं थुवि विश्वसिता ।।२०॥। 
दुरगसात्मत्वनिगमाय तवात्ततनो- 
शरितिमहामृतान्धिपरिवतंपरिश्रमणाः | 


न परिलषन्ति केचिदपवगंमपीश्चर ते 


चरणसरोजहंसङ्लसङ्कविस॒ष्टगरहाः ।॥२१॥। 


सदचुपथं कुखायमिदमात्मसुहत्मरियव- 


रति तथोन्प्रखे त्वयि हिते प्रिय आत्मनि च । 





६६८ श्रीमद्भागवत [ अ० ८७ 


नकिं ज कः ` चः भः जः जः जः चः चक ज 





न हानेपर भी उसे अंश कहते है ओर निर्मित न होने. 
पर्‌ भा निमत कहते हं । इसीसे बुद्धिमान्‌ पुस्प जीवे 
वास्तत्रिक खरूपपर विचार करके परम विश्वासे साध 
आपके चरणकमल्मरेकी उपासना करते है । क्योकि 
आपके चरण दही समस्त वैदिक कमेकि समपंणथ्धान 
ओर मोक्षखरूय है# ॥ २० ॥ भगवन्‌ ! पूरमात्म- 
तच््रका ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है | उसीका 
ज्ञान करानेके लिये आप्‌ त्रिवि प्रकारके अवतार्‌ ग्रहण 
करते हं ओर उनके द्वारा रेसी टीला करते है, जो 
अग्रतक्रे महासागरसे भी मधुर ओर मादक होती हैँ। 
जो रोग उसका सेवन करते हैँ, उनकी सारी थकावट 
दूर हो जाती है, वे परमानन्दे मग्न हो जते हैं| 
कु प्रेमी भक्त तो रसे होते है. जो आपकी टीला 
कथाओंको छोडकर मोक्षकी भी अभिलापा नहीं करते-- 
खगं आदिकी तो वात ही क्या है | वे अपकरे चरण- 
कमच्के प्रेमी परमहंसोके सत्संगमं, जहाँ आपकी कथा 
होती है, इतना सुख मानते दै किं उसके व्िि इस 
जीवरनमं प्राप्त अपनी धर-गृहश्थीका भी पस्याग कर्‌ 


देते हं † ॥ २१। 

प्रभो | यह रारीर आपकी सेवका साधन होकर 
जव आपके पथक्रा अनुरागी हो जाता है, तव आत्मा, 
हितैषी, सुष्टद्‌ ओर प्रिय व्यक्तिके समान आचरण करता 
है । अप जीवके सच्चे हितेधी, प्रियतम ओर आत्मा 
है ओर सदा-सर्वदा जीव्रको अपनानेके च्य तैयार 
भी रहते हैँ । इतनी सुगमता होनेपर तथा अनुक्रूढ 
मानव-दारीरको पाकर भी ल्ग सख्यभाव आदिक द्रात 








अपनेद्रारा निर्मित सम्पूणं कार्थमिं जो न्यूनाधिक श्रेष्ठ-कनिष्टके भावे रित एवं सपमे भरपूर दः इतत सूप 
अवमभवमे आनेवाली निर्विशेष सत्ताके रूपमे स्थित है, उन मगवानका हम *भजन करते दं ॥ & ॥ 


# त्वदस्य ममेदान 
त्वद ङत्रिसेवा[मादिद्य 


मेर परमानन्दस्ल्प स्वामी । मे आपका अंडा द्रं | अपने चरर्णोकी सेवाका आदे देकर अपनी मायके दवारा 


निर्मित मेरे वन्धनकरो निघ्रत्त कर दो ॥ ७ ॥ 
 त्वत्कथाग्रतपाथोषौ 


कुवन्ति कृतिनः 


कोको विरक््यद्ान्तःकरण महापुख्ष आपके अग्धतमय कथा-समद्रम 
हैं ओर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष--इन चारो पुरुषार्थोको तृणके समान ठच्छ 


ष धि, 


त्वन्मायाकरतव्न्धनम्‌ । 
परानन्द निवतंय ॥ ७ ॥ 
विहरन्तो महायुद्‌ः । 
केचिच त्रणोपमम्‌ ॥ ८ ॥ 


बना देते ई॥ ८॥ 


भद्रम विहार करते हृ परमानन्दे मम्न रहते 


आपकी उपासना नदीं करते, आपे नहीं रमते, बत्कि ` 


च क > ऊ: 


. 





अ० ८७ ] दरम्‌ स्कन्ध ६६९॥ 





म णीये 
ज ` भः जिः ` कः = ` भः = = (ग क 


ए म 2 


न बत रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो इस वरिनारी ओर असत्‌ शरीर तथा उसके सम्बन्धे 
| ही रम जते है उन्हीकी उपासना करने च्छते दै 

ओर इस प्रकार अपने आत्माका हनन करते है, उसे 

अप्रोगतिमे पर्हैचाते हैँ | भधा, यह किंतने कष्टकी बात 

यदनुशया भ्रमन्त्युरुभये कुशरीरभृत ।। २२ | दै ! इसका फल यह होता है किं उनकी सारी इत्ि्यो, 
सारी वासना शरीर आदिमे दी ल्ग जाती हैँ ओर 
फिर उनके अनुसार उनको पञ्यु-पश्री आदिके न जाने 
कितने बुरे-चुरे शरीर ग्रहण करने पडते हैँ ओर इस 
प्रकार अत्यन्त भयावह जन्म-मृ्युखूप संसारम भटकना 
निभृतमरुन्मनोऽशषट्टयोगयुजो हदि य- पडता है# ॥ २२॥ प्रमो ! वड़े-वडे व्रिचारशी 
| योगी-यति अपने प्राण, मन ओर इद्दियोको वशम करके 
| दृढ़ योगाभ्यासके द्वारा हृदयम आपकी उपासना करते 
दै | परतु आद्चयंकी वात तो यह है कि उन्दं जिस 
पदकी प्राप्ति होती है, उसीकी प्राप्ति उन रातुओंको भी 
हो जाती है, जो आपसे वैर-भाव रखते है । क्योकि 
स्मरण तो वे भी करते ही हैँ | कर्टोतक करदे, भगवन्‌ | 
वे लियो, जो अज्ञानवदा आपको परिच्छिन्न मानती है 
| ओर आपकी दोपनागके समान मोटी, च्वी तथा सुकुमार 
। भुजाओके प्रति काममावसे आसक्त रहती हँ, जिस परम 
पदको प्रप्त करती हँ, वही पद हम श्रतियोको भी 
प्राप्त होता है--ययपरि हम आपको सदा-सवदा एकरसं 

| अनुभव करती हैँ ओर आपके चण्णारव्रिन्दका मकरन्द 
रस पान करती रहती हैँ । क्यों न हो, आप समद 
जो हैँ | आपकी टश्रिमं उपासकके परिच्छिन्न या 

अपरिच्छिन्न मावमे कोई अन्तर नहीं है{ ॥ २३ ॥ 

कृ इह यु वेद्‌ बतावरजन्मलयोऽग्रषरं भगवन्‌ ! आप॒ अनादि ओर अनन्त हैँ | जिसका 
। जन्म ओर मृल्यु कासे सीमित है, वह भला, आपको 

' कसे जान सकता है । खयं ब्रह्माजी, निदृत्तिपरायण 

। सनकादि तथा प्रवृत्तिपररयण मरीचि आदि भी वहत 

पीछे आपसे ही उत्पन्न इए हँ । जिस समय आपु 

` सव्रको समेटकर सो जते है, उस समय रसा कोई 


क = आकः 


नधुनय उपासते तद्रयोऽपि यमुः सरणात्‌ । 


खिय उरगेन्द्रभोगथुजदण्डविपक्तधियो 


वयमपि ते समाः समदृशोऽङधिसरोजसुधाः ॥२३॥ 





यत॒ उदगादपियंमनु देवगणा उभये । ` साघरन नहीं रह जाता, जिससे उनके साथ ही सोया 
% त्वय्यात्मनि जगन्नाथे मन्मनो रमतामिह । 2 
कदा ममेदं जन्म मानुषं सम्भविष्यति ॥ ९ ॥ 


आप जगत्क्े खामी द ओर अपनी आत्मा दही ह । इस जीवने ही मेरा मन आपम रम जाय । मेरे स्वामी । 
मेरा एेसा सोभाग्य कव दोगा जप मुञ्चे इस प्रकास्का मनुष्य-जन्म प्राप्त होगा १ 
 चरणस्मरणं परेम्णा तव देव सुदुकभम्‌ । 
यथाकथञ्चिनतरहरे मम भूयाद्हर्निशम्‌ ।॥ १० ॥ 


९७० श्रीमद्भागवत [ अ० ८७ 
तहिं न॒ सन्न चासदुभय ग॒ च कालजव, हआ जीव आपको जान सके । क्योकि उस समय न 
तो आकाशादि स्थूल जगत्‌ रहता है ओर न तो 
महत्त््रादि सूष्घम जगत्‌ । इन दोनांँसे वने इए शरीर ओर 
किमपि न तत्र शाख्रमवङृष्य शयीत यद्‌ ॥२४।। | उन निमित्त क्षणःसु्तं आदि कालके अग भी नहं 
रहते । उस समय कु भी नहीं रहता । यर्होतक किं 
शास्र भी आपम दी समा जाते हैँ ८ एेसी अत्रसथमं 
आप्रको जाननेकी चेष्टा न करके आपका भजन करना 
जनिमसतः सतो गृतिगुतात्मनि ये च भिदां | ही सर्वोत्तम मार्ग है । )# | २४ ॥ प्रमो ! कुछ छग 
मानते हं कि असत्‌ जगत्‌की उत्पत्ति होती है ओर कु 
खोग कहते हं कि सत्‌-ख्य दुःखोका नादा होनेपर सक्ति 
विषणग्रतं सरन्त्यपदिशन्ति त आरुपितै; । | मिलती है । दूस ग आत्मको अनेक मानते दै, तो 
$ कड टोग कमके द्वारा प्राप्त होनेवाठे खोक ओर परशोक- 
खूप व्यवहारको सत्य मानते दहं । इसमं संदेह नही 
किं ये सभी वाते श्ममूल्क हैँ ओर वे आरोप करके ही 
त्रियुणमयः पुमानिति भिदा यदबोधदृता सा उपदेश करते हे । पुस्पं त्रिगुणमय है--इस 
प्रकारका भेदभाव कैव अज्ञानसे ही होता है ओर आप 
4 अज्ञानसे सर्वथा परे है । इसयिये ज्ञानस्वरूप आपे 

त्वयि न ततः परत्र स भवेदवबोधरसे ॥२५॥ | किसी प्रकारका मेदभाव नह दे{ ॥ २५॥ 
सदि मनल्लिटृत्वयि विभात्यसदामनुजात्‌ यह त्रिगुणात्मक जगत्‌ मनकी कल्पनामात्र है । केवल 
यही नहीं, परमात्मा ओर जगतसे प्रथक्‌ प्रतीत होनेवातय 
पुरुष भी कल्पनामात्र ही है । इस प्रकार वास्तत्रमे 
असत्‌ होनेपर भी अपने सत्य अधिष्ठान आपकी स॒त्ताके 
कारण यह सत्य-सा प्रतीत हो रा है । इसने भोक्ता 
-सद्भिश्शन्त्यरेपमिदमात्मतयाऽऽत्मनिद्‌ः । | मोग ओर दोनोके समबन्थको सिदध करेवारी इन्िय 














कवि ^ § # 
६३५८ + 
५ 


> किर 2 9 
न्वध: 





८ | देव । आपके चरर्णोका प्रमपूर्वक सरण अत्यन्त दुर्लभम है । चदि ञसे-केमे भी होः दरसिंह | सुञ्चे तो आपके 
+ चरर्णोक्रा सरण दिन-रात वना रहे । 
= कादं बुद्धथादिसंरुद्धः क च  भूमन्महस्तव । 
= दीनवन्धो दयासिन्धो भक्ति मे नृहरे दिश ॥ ११॥ 
अनन्त ! का बुद्धि आदि परिच्छिन उपाधि धरर हुम मे ओर करटो आपका मनः वाणी _ आदिके अगोचर 
ध | ( आपका ज्ञान तो बहत दी कठिन है ) इतल्ि दीनबन्धु, दयासिन्धु | नरहरि देव । सुक्ञे तो अपनी भक्ति ही 
| | † मिथ्यातकुककरोरितिमहावादान्धकारान्तर- 
५ भ्राम्यन्मन्दमतेरमन्दमहिमस्त्वन्जञानवत्माँस्फुटम्‌ । 
^ ज श्रीमन्माधव वामन त्रिनयन श्रीराङ्कर श्रीपते 
रैः गोविन्देति खदा वदन्‌ मधुपते मुक्तः कदा स्मामहम्‌ ॥ ९२॥ 


अनन्त मदिमाशाटी प्रमो ! जो मन्दमति पुरुष श्रे तकेकिं दवारा प्रेरित अत्यन्त कक त श रः 
कारय भटक रहे है, उनके चिरि आपके ज्ञानक्रा मागं स्प सूञ्चना सम्भव नहीं हे । इसचि ध 4 
घड़ी कव अविगी करि मैं श्रीमन्माधव, वामन, तरिटोचनः श्रीशङ्करः श्रीपतेः गोविन्द्‌, मधुपते 


भरकर पुकारता हआ भुक्त हो जाऊगा । 








अ० ८७ | ` दरम्‌ स्कन्ध ६७१ . 








(क 











नहि विकरतिं व्यजन्ति कनक तदात्मतया । आदि जितना भी जगत्‌ है सव्रको आत्मज्ञानी पुरुष 

। आत्मरूपसे सत्य ही मानते हैँ । सोनेसे बने इए कड, 

 वुण्डक आदि ख्णेख्प ही तो हैँ; इसय्िये उनको इस 

खकरृतमनुग्रविष्टमिदमात्मतयावसितम्‌  ॥२६॥ सपम्‌ जाननेषातय उर्व उन्हे भक्ता नदा 

हिक यह भी सोना है | इसी प्रकार यह जगत्‌ 

आत्मामं ही कल्पित, आत्मासे दी व्याप्त है; इसब्विये 

आन्मज्ञानी पुरुष इसे आत्मरूप ही मानते है| २६ ॥ 

भगव्रन्‌ ! जो छोग यह समञ्जते हँ किं आप समस्त 

प्राणियों ओर पदा्ेकिं अधिष्ठान टै, सव्रके आधार हैँ 

ओर सर्वातमभावसे आपका भजन-सेवन करते हे, वे 

त उत पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरा नि्रते | | युको ८ त क. ० क 

अर्थात्‌ उसपर विजय प्राप्त कर ठेते है | जो त्रेग आपसे 

| विमुख है, वे चाहे जितने वड व्द्रान्‌ हो, उन्दं आप 

। कर्मोका प्रतिपादन करनेवाखी श्रुतियोसे पञ्ओके समान 

परिवयसे पदचनिव गिरा विवुधानपि तां-  वँवच्ते ह । इसके विपरीत जिन्ोने आपके साथ 

|  त्रेमका सम्बन्ध जोड़रखा है, वे न केव अपनेको 

। चल्कि दृसरोको भी पवित्र कर देते ह--जगतकरे बन्धनसे 

छुडा देते है । रेखा सौभाग्य भव, आप्रसे व्रिमुख 
खोगेको कंसे प्रात हो सकता है |॥ २७॥ 


~~~ = = 


तव॒ प्ररि ये चरन्त्यखिलसखनिकेततया 


स्त्वयि कृतसोहदाः खल पुनन्ति न ये विगुखाः॥\२७])। 


त्वमकरणः स्यराडखिलकारकराक्तिधर- प्रभो ! आप मन, वुद्धि ओर्‌ इन्द्रिय आदि करणो- 
से--चिन्तन, कम आदिकरे साधनोसे सवथा रहित हँ | 

। पिरि भी आप समस्त अन्तःकरण ओर वाथ करणोकी 

राक्तियोंसे सदा-सवैदा सम्पन्न है । आप खतःसिद्ध ज्ञान- 

वरान्‌ खयप्रकारा है; अतः कोई काम करनेके च्वि 

| आपको इन्दियोकी आ्रस्यकता नहीं है । जेसे छोटे-खटे 


राजा अपनी-अपनी प्रजासे कर ठेकर्‌ खय अपने 
| सम्राध्को कर देते ह, वैसे दी मलुष्योके प्य देवता 


स्तव बलिगुद्रहन्ति समदन्त्यजयानिमिपाः । 


[मो 








 यत्सच्चतः सदाभाति जगदेतदसत्‌ सतः । 
सदाभासमसव्यस्मिन्‌ भगवन्तं भजाम तम्‌ ॥ १३ ॥ 


यह जगत्‌ अपने खूप नाम गोर आङ्ृतिके रूपमे असत्‌ है, फिर भी जिल अधिष्ठान-सत्ताक्री सत्यताते यह सत्य 
जान पड़ता है तथा जो इस असय प्रपञ्चमं सत्यके सूपते सदा प्रकाशमान रहता ३, उस भगवानका इम भजन करते ३ । 
† तपन्तु तापे; प्रपतन्त पवैत।दन्तु तीर्थानि पठन्तु चागमान्‌ । 
| यजन्तु यगेरविवदन्तु वदेर्हरिं विना नैव मृतिं तरन्ति॥ १४ ॥ 
खोक पञ्चाभि आदि तपसे तप्त ह; पवते गिरकर आत्मघात कर ऊ, तीर्थोका षय॑टन करे, वेदोक्ता पाठ 


कर? यज्ञोके द्वारा यजन करं अथत्रा भिन्न-भिन्न मतवादोके द्वारा आपसमे विवाद करे, परंतु भगवानके निना इस 
मृ्युमय संसार-सागरते पार नहीं जाते । 


॥। 











नषंभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसजो ओर देवताओंके पूज्य ब्रह्मा आदि भी अपने अधिकृत 
प्राणिर्योसे पूजा खीकार करते हैँ ओर मायाके अधीन 

होकर आपकी पूजा करते रहते हैँ । वे इस प्रकार 

आपकी प्रूना करते हैँ किं आपने जहाँ जो कमं करनेके 

विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिता ।२८॥। | च्वि उन्हे नियुक्त कर दिया है, वे आपसे भयभीत 
रहकर वहीं वह काम करते रहते ह।।२८॥ नित्यमुक्त । 

आप मायातीत है; फिर भी जव अपने ईश्षणमात्रसे-- 

ब. संकल्पमात्रसे मायके साथ क्रीडा करते है, त्र आपका 

सिरचरजातयः स्पुरजयल्थानासत्तयुजा सकेत पाते ही जीवक सुक्ष्म इरीर ओर उनके सुप्त 


~ 


कमं-संस्कार जग जाते है ओर चराचर प्राणिर्योकी 
उत्पर्ति होती है । प्रभो ! आप परम दयाटु हँ । आकारके 
विहर उदीक्षया यदि परस वियुक्त ततः । समान सवम सम होनेके कारण न तो कोई आपका 
अपना है ओर नतो पराया } वास्तवे तो आपकर 
खर्म मन ओर वाणीकी गति ही नहीं है । आपे 
न॒हि परमस्य कथिदपरो न परश्च भवेद्‌ कायं-कारणख्प प्रपञ्चका अभाव होनेसे वाद्य द्टिसे 
आप हन्यके समान ही जान पडते ह; परंतु उस 
धर टृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण अप परम सत्य 
¢ वियत इवापदस्य तव शन्यतुरां दधतः ॥२९। | द † ॥ २९ ॥ 
अपरिमिता श्रवा्तनुभतो यदि सर्वगता- मगवन्‌ | आप नित्य एकरस ह । यदि जीव असं्य हां 
ओर सव-के-सव नित्य एवं सर्वेन्यापक हों ततो 
आपके समान ही हो जार्येगे, उस हाट्तमे वे शासित हँ 
ओर आप शासक--यह बात वन ही नहीं सकती, 
ओर तव आप उनका नियन्त्रण कर दही नहीं सकते | 
उनका नियन्त्रण आप तमी कर॒ सकते हे, जब वे आपसे 
उत्पन्न एवं आपकी अपेक्षा न्यून हां । इसमे सदेह 
नहीं कि ये सव-के-सव जीव तथा इनकी एकता या 
स्तषहिं न शास्यतेति नियमों धव नेतरथा । विभिनता आपसे ही उत्पल इई है । इसख्ि आप 


कै अनिन्दियोऽपि यो देवः सर्वकारकदक्तिधृक्‌ । 
सर्वज्ञः स्रेकतौ च सवैसेव्यं नमामि तम्‌॥ १५॥ 

जो श्रथ इन्दियरहित होनेपर भी समस्त बाह्म ओर आन्तरिक इन्दियकी शक्तिको धारण कप्ता ई ओर सर्व एवं 
है, उख सवके सेवनीय प्रञुको म नमस्कार करता हं । 

 त्वदीक्षणवदयक्षोभमायाबोधितकमेभिः | 
- जातान्‌ संसरतः बिन्नान्त्रहरे पाहि नः पितः॥ १&॥ 
। द्रि | आपके सष्ि-संकव्यते श्वुज्ध होकर मायाने कर्मोकि जाग्रत्‌ कर दिया ह । उन्दकिं कारण हम त्यो्गोका जन्म 
ॐ आवागमनकर चकर्मे मटककर हम दुली ह र्े ह । पिताजी ! आप हमारी रणा कीजिये । 





3 


















६७२ श्रीमद्भागवत ` | अ० ८७ र 


ति रिरि पिपी पिपी पिपी मीम 


नद क, 


_-4॥ 





अ० ८७ | दश्चम स्कन्ध ६७३ 

= 
अजनि च यन्मयं तदविच्य नियन्तृ भवेत्‌ उनमें कारणरूपसे रहते दए भी उनके नियामक ह । 
वास्तवे आप उनमें समखूपसे धित हैँ । परतु यह 

जाना नहीं जा सकता कि आपका बह खश्प कैसा है | 

क्योकि जो लोग रेसा समञ्ते हैँ कि हमने जान य्या, 

उन्होने वास्तवमे आपको नहीं जाना; उन्होने तो केव 

सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ।।२०1] | अपनी वुद्धिके विपरयको जाना है, जिससे आप परे हैँ | 
ओर साथ ही मतिके द्वारा जितनी वस्तुं जानी जाती 

हे, वे मतिर्योकी भिनताके कारण भिनन-भिन्न होती है; 

इसय्ि उनकी दुष्टता, एक मतके साथ दृसरे मतका 

विरोध प्रत्यक्ष ही है | अतएव आपका खख्य समम्त 

मतोके परे है* ॥ ३० ॥ खामिन्‌ ! जीव आपसे उत्पन्न 

होता हे, यह कहनेका एसा अथं नहीं है कि अप 

परिणामक द्वारा जीव वनते हैँ | सिद्धान्त तो यह है कि 

| प्रकृति ओर पुरुप्र दोनों ही अजन्मा हैँ | अर्थात्‌ उनका 
वास्तव्रिक खरूप- जो आप हैँ कभी वृत्तियेके अंदर 

| उतरता नदीं, जनम नहीं छेता | तत्र प्राणियोका जन्म कसे 
होता है १ अज्ञानके कारण प्रकृतिको पुरुष ओर पुरुषकों 
प्रकृति समञ्च ठेनेसे, एकका दूसरेके साथ संयोग हो जानेसे 
जसे शुव्ुतख' नामकी कोई खतन्त्र वस्तु नहीं है, 
प्रतु उपादान-कारण जल ओर निमित्त-कारण वायुके 
संयोगसे उसकी सशि हो जाती है । प्रकृतिमें पुरुष 
ओर पुरुषमे प्रकृतिका अध्यास ८ एकमे दूसरेकी कल्यना ) 
हो जनेके कारण ही जीोके विविध नाम ओर गुण 
प्व च्ि जते हैँ । अन्तम जंसे समुद्रमं नदियों ओर 
मधुमे समस्त पुष्पके रस समा जते है, वैसे हीते 
सव-के-सव उपापिरहित आपमें समा जाते है ! ( इसव्ि 
जीवरोंकी भिन्नता ओर उनका पृथक्‌ अस्तित्व आपके 
दारा नियन्त्रित है । उनकी प्रथक्‌ खतन्त्रता ओर सवे- 
व्यापकता आदि वास्तविक सत्यको न जाननेके कारण _ ^ 





न॒घटत उद्धवः प्रकृतिपरुपयोरजयो- 





रुभययुजा भवन्त्यसुभ्रतो जलबुद्बुदवत्‌ 


त्वयि त इमे ततो विविधनामगणेः परमे 


सरिति इवाणवे मधुनि रि्युरशेषरसाः ॥३१॥ | ही मानी जाती है ) † ॥ ३१ ॥ 





# अन्तर्यन्ता सर्वलोकस्य गीतः भ्ुत्या युक्त्या चैवमेवावसेयः । 
यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिनैसिंहः श्रीमन्तं तं चेतसेवावर्म्वे | १७ ॥ 
शुतिने समस्त टदयप्रपञ्चके अन्तयामीके रूपमे जिनका गान क्रिया है, ओर युक्तिसे भी वैसा ही निश्चय होता ह । जो 
सव, सवेशाक्ति ओर दर्सिह- पुरुषोत्तम हँ, उन्हीं सवंसोन्दय॑-माधु्यनिधि प्रसुका मे मन-ही-मन आभ्य हण करता हू । 
† यस्मिन्नुद्यद्‌ विख्यमपि यद्‌ भाति विश्वं ल्यादौ 
जीवोपेतं गुरुकरख्णया केवलात्मावनोषे | 
अत्यन्तान्त रजति सहसा सिन्घुवत्सिन्धुमध्ये 


 मध्येचित्तं तरियुवनगुसं भावये तं सिंहम्‌ ॥ १८॥ 
भग सर शवं >. ८०५- 


#) क्वि 


(4 
९७४ श्रीमद्भागवत [ अ० ८७ 





=== =-= ज द 8 त "त त तः चः चिः कः चः चः चः रि यः 





गी क क 2 त त । मि मीम मी क 2 त त कः ज क 


सषु तव॒ मायया श्रमममीष्ववगत्य भश मगव्रन्‌ ! सभी जीव आपकी मायासे भरमम भकं 
रहे टे, अपनेको आपसे पधक मानकर जन्म-पयुका 
चक्रर काट रहे हैँ । परंतु बुद्धिमान्‌ पुरुप इस भको 


१ 


सम्ञ ठेते हँ ओर सम्पूणं भक्तिभावसे आपकी शएणं 
प्रहरण करते हे 


(< = _ म ~< 

त्वयि सुधियोऽभवे दधति भावमनुप्रभवम्‌ । 
| क्योकि आप जन्म-मूद्यकरे चक्घसे 

छुडानेवटे हैँ । यद्यपे शीत, ग्रीष्म ओर वपां--इन 


¢^ + + ^ ॥ 

क {मलुनतेता भवभय तव यदू श्ुङ्ाटः तीन भार्गवाय काटचक्र आपका भव्रिदासमात्र है, 
वह सभीको भयभीत करता है, प्रतु वह उन्हीको 
वार्‌-कर भयभीत करता है, जो आपकी शरण नरह 

सृजति य॒हुस्िणे मिरभवच्छरणेषु भयम्‌ २२} | ठेते | जौ आकरे दारणागत भक्त है, उन्दं भला, जन्म- 
मृ्युख्य संसारका भय कैसे हो सकता है !* ॥३२॥ 
अजन्मा प्रभो ! जिन योगि्योने अपनी इद्धियों ओर 

विनित्‌ हषोकवायुभिरदान्त मनस्तुरगं प्रा्णोको वदाम कर च्ियादहे, वे भी, जव गुखदवरके 
| चरणणोकी शरण न टेकर उनर्कट एवं अध्यन्त च्च 
क | मन-तुरङ्गको अपने वराम करनेका यत करते है, त 
हि | य॒ इहं यतन्ति यन्तुमतिलोरम॒पायखिदः । अपने साधनम सफल नष्टीं होते । उन बार-बार खेद 
| ओर रौकडां विपत्तियोका सामना करना पडता हैः 
केवर श्रम ओर दुःख ही उनके हाथ लगता है । उनकी 
ठीक वही दशा होती है, जेसी सम॒द्रनं विना कंधी 
| नावप यत्रा करेवठे व्यपरसिंकी होती है। 
| ( ताप्यं यह कि जो मनको वाम करना चाहते हं 
बणिज इनाज सन्त्यङृतकर्णधरा जलधौ ॥२३॥ | उनके लि कणधरार -गुरुकी अनिवार्यं आबद 
है) ˆ ॥ ३३ ॥ | 

खजनसुतात्मदारधनधामधरासुरथे- | भगवन्‌ ! आप अलण्ड आनन्दखर्प ओर इरणा- 
गतोके आत्मा हे | आपके रहते खजन, पुत्र, दह, खी, 
धन, महर, प्रध्वी प्राण ओर रथ आद्िसे क्या प्रयोजन 
ध है१जोटोग इस सव्य सिद्धान्तको न जानकर ज्ञी 
यिसति कि चरणां श्रयत आत्मनि सर्वरसे । पुरुपके सम्बन्धसे होनेवाठे खखोमें ही रम रहे है, उन 
त जर्तं सथ ति उल हता इ मोर उति मादि मम्मति तज महल 
तथा भान होता ह, गुख्देवक्री करुणा प्रात होनेपर ज जद आत्माकरा ज्ञान ह्येता है, तत्र॒ स्रुद्रमै नदीके समान . सहसा यह 

जिनमें आत्यन्तिक श्रल्यको प्रप्त हो जाता है, उन्हीं त्रि्ुवनयर दरसिंह मगवान्‌की मै अपने हृदयम भावना करता हूं । 

# संसारचक्रक्रकचेर्विंदीणंसुदीणंनानामवतापततम्‌ 

कथच्चिदापन्नमिह प्रपन्नं व्वभ्रुद्धर श्रीद्रहरे खटोकम्‌ ॥ १९॥ | 
। रिंह । यह जीव षलारःचक्रके आरे इकडे-टकडे हो रदा ह ओर नाना प्रकारके सांसारिक पापी धधकती हई पसि 
च यट रहा हे । यह आपत्तिप्रस्त जीव किसी.रकार आपकी पासे आपकी शरणमे आया दे । आप इसका उद्धार कीजिये । 

यदा वरानन्दगुरो भवत्पदे पदं मनो मे भगर्वर्छभेत । 
तदा निरस्तालिलसाधनश्रमः श्रेय त्यं मवतः इपातः ॥ २० ॥ 


॥ ।  व्यसनशतान्विताः समवहाय गुरोश्चरणं 








अ० ८७ ] दशम स्कन्ध ९७4 
= 
इति सदजानतां मिधुनती रतये चरतां संसारम मव्य, रेसी कौन-सी व्स्तु है, जो सुधी कर्‌ 


सत्रे । क्योकि संसारकी सभी व््तुएं खमावसे दही 

विनारी हं, एक-न-एक दिन मच्ामेट हो जनेवाटी 

सुखयति को न्विह॒खविहते खनिरस्तभगे ॥३४॥ | 2 । 4९ त = १ खर्र 21 सपनि चर 

। सत्ताहान ह्‌; वे मदा, क्या सुख द्‌ सक्ता हं #॥३५॥ 

मात्रन्‌ ! जो रेश्चय, कमी, विया, जाति, तपस्या आदिक 

मडसे रहित ह, वे संतपुस्प इस प्रध्वीतच्पर परम 

पत्रित्र ओर सव्रको पित्र करनेवलि पुण्यपय सच्चे तीर्थ- 

स्थान हं | क्यकि उनके हृदयम आपके चरणारविन्द 

। सर््दा विराजमान रहते हँ ओर यदी कारण हैँ क्रि उनं 

स्त उत भवत्पदाम्बु जहदोऽघभिदड प्रिजला १। । संतपु्पां का चर्णागरत सुमप्त पू्पो ओर तार्पोको 

सदके ल्य नष्ट कर दनेत्राखा है | भगवन्‌ ! आप 

। निव्य-आननदरखख्प आत्मा दीह । जो एक वार भी 

दधति सङन्मनस्त्वयि य आत्मनि नित्यसुखे | अपको अपना मन समपित क देते है आपू मन 

| गणा दते हं -वे उन देह-गेडमिं कभी नहा फंसते जो 

| जीवक विवेक, वैराग्य, षयं, क्षता ओर शन्ति अदि 

न॒ पुनरुपासते परुपसारहरावसथान्‌ ॥ ३५]! । गुणका नश करनव्रटे हं । वे तो व्‌, आप ही 
वः रभ जतदहं | ॥ ~ ॥ 

सत दुत्त भगवन्‌ ! जपे भिद्नते बना दज घडा गिद्रीख्य ही 

दाता हं, वसे ही सतसे वना इअ जगत्‌ भी सत्‌ ही 

है.--यदह आत युक्तित नडीं है| क्योकि कारण ओर 

कार्यका निर्देश ही उनक्रे भेदका योतकर है | यदि 

 केव्रट येदका निप्रैव केकरे च्िही रेसा कडा जा रहा 

होतो पिता अर पुत्रमे, दण्ड ओर धटनडामं कार्य 

| कःरण-भाव होनेपर भी वे एकर दूसरेषे भिन्न हैँ । इस 


यवि पूुरुपुण्यतीथसदनान्युपयो विमदाः 


== ज~ = म ज क 


प्रकार काय-करणकरी एकता सर्वत्र एक-सी नहीं देखी ` 


जाती | यदि करण-दाब्से निपित्त-करण न केकर 
केवर उपादान-कारण च्या जाय- जैसे कुण्डकका 
। सोना-तो भी कड।-कहीं कायकी असत्यता प्रमाणित 


व्यभिचरति छतं च 


| होती है; जैसे रस्सीमं सोप । यँ उपादान-कारणकर 


। सत्य होनेपर भी उक्तका कार्यं सपं सर्वथा असत्य है । ` ` 


क्त च मृषा न तथोभययुक्‌ | यदि यह कड। जाय कि प्रतीत होनेबाठे सर्पका उपादान 





परमानन्दमय गुरुदेव ! मणवन्‌ ! जत्र मेरा मन भापक्रे चरणेमे स्थान प्रसत कर लेगा, तवर म आपकी पाते समस्त 


साघनोके परिश्रमसे छुटकारा पाकर परमानन्द प्राप्त करूगा । 


# भजता दहि भवान्‌ साक्षासरमानन्दचिद्घनः । 


अत्मिव क्रमत कृत्यं व॒च्छदारसुतादिभिः ॥ २१॥ 


जो आपक्रा भजन्‌ करते ह, उनके व्व भप खयं ाक्षात्‌ परमानन्दचिद्‌घन अत्मा ह है । इसय्यि उन्दे तच्छ खी; 
पुत्रः धन आदिसे क्या प्रयोजन ह 


| मञ्चन ज्गतदज्गसङ्गमनिशं त्वामेव सञ्चिन्तयन्‌ 
सन्त; सन्ति यतो यतो गतमदास्तानाश्रमानावघन्‌ | 




























&७8& | | श्रीमद्धामवत [ अ० ८७ ` 


व्यवहृतये विकर्ष कारण केवल रस्सी नहीं है, उसके साथ अ्रियाका-- 
| श्रमका मेल भी है, तो यह समञ्चना चाहिये कि अव्रिवा 

ओर सत्‌ वस्तुक संयोगसे ही ऽस जगत्‌की उत्पत्ति दई 

दं । इसव्य जसे रस्सीमे प्रतीत होनेवाटा सर्पं मिथ्या 

तिन) है, वेसे दी सत्‌ वस्तुमे अव्रियाके संयो गते प्रतीत होने- 

बाला नाम-खूपात्मक जगत्‌ भी मिध्या है | यदि केवठ 
न्यत्हास्की सिद्धिके छिये ही जगत्की सत्ता अभीष्ट हो, 
तो उसमें कोई आपत्ति नी; क्पोकि बह पारमार्थिक 
सत्य न होकर केवर व्याव्रहारिकि सत्य है | यह भ्रम 
व्यावहारिक जगत माने हए काल्की दिस अनादि 
हे ओर अङ्ञानीजन व्रिना त्रिचार विये पूर्यके भ्रमसे 
प्रित होकर अन्धपरम्परासे इसे मानते चदे आ रहे हैँ | 
एसी श्ितिमे कमफल सत्य बतकनेत्राटी श्रुति केवट 
उन्हीं छो्गोको भरमम डाठ्ती हैँ, जो कर्ममे जड होरे 
हे ओर यह नहीं समन्ते कि इनका तात्पर्य कर्मफल्वी 
नित्यता वतठकानेमं नही, वल्कि उनकी प्रशंसा करके उन 
कममिं खगानेमं है# ॥ २६॥ भगवन्‌ ! वास्तव्रिक वात 
न यदिदमग्र आघत न भविष्यदतो तिधन।- तो यह है कि यह जगत्‌ उत्पत्तिके पले नह था ओर 
ं प्रटयकरे वाद नहीं रक्ेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि 

यह बीचमें भी एकरस परमात्ममिं मिथ्या ही प्रतीत हो 

रहा है । इसीसे हम श्रुतिर्यो इस जगत्का वर्णन रेसी 

ु भ्रितमन्तरा स्यि विभाति प्षेकरसे | | उपमा देकर करती दँ कि जसे मिमं षड, वदेम 


भ्रमयति भारती त 


उरुढत्तिभिरुक्थजडान्‌ ।२६॥ 





नित्यं तन्मुखपङ्कजाद्विगङ्ितत्वत्पुण्यगायामत- 

सोतःसम्टवसंप्ठतो नरहरे न स्यामहं देहभ्यत्‌ ॥२२॥ १ 
1 ` मेंररीर ओर उसके सम्बरन्धियोंक़ी आसक्ति छोड़कर रात-दिन आपक्रा ही चिन्तन करलेगा । ओर जर -जक्ं 
। निरभिमान सन्त निवात करते ई, उन्ही-उनन्ही आत्रमोमे रहंगा | उन सप्पुर्षोके मुखक्रमलप्ने निःखत आपकी पुण्यमय 
कथा-खधाकी नदिर्थोकी धाराम प्रतिदिन स्नान करंगा ओर सिंह ! फिर मेँ कभी देहके बन्धनम नहीं पूगा । 


¢ 


क. # उद्धूतं भवतः सतोऽपि भुवनं सन्नेव सपं , खनः 
< कुवेत्‌ काय॑मपीह कूटकनकं वेदोऽपि नवपरः । 
अद्ेतं तव सत्पर त परमानन्दं पद तन्युदा 
रः वन्दे सुन्दरमिन्दिरानुत हरे मा मुञ्च॒ मामानतम्‌ ॥ २३ ॥ 
मालाः प्रतीयमान सप॑के समान सत्यख्रूप आपसे उदय होनेपर भी यदं ० 4 
न~~ 9 त 
[जारमे चल जानेपर भी सत्य नहीं हो जाता । वेर्दोका तात्य भी सी स 1) रगो 
प परमानन्दस्य अद्वैत सुन्दर पद ह दे इन्दिरावन्दित श्रीहरे ! = उ । 


१दडस । कष 


¢ ६ ¦ चै 


= ॐ “य + 
५ + . 4 ह~. च+“ 









4 १ क जी 
` , = ४, 






। |; व 
+ 4 १ 
ह [१ म ~+) ० ह 


ति 7 न 













† 1 च ६ ॥2८- ५ ६ 4; ह 14 ण छा ५ ६\ 
अ० ८७ दलमस्कन्धः + ` ~" अ 


ॐ क 





जत उपमीयते द्रषिणजातिविकसयपथै दाख ओर सोनम बुण्डल आदिं नाममात्र है, वास्तव 

५ | मद्री, गोहा ओर सोना ही है । वैसे दी परमात्मा 

विंतथमनोविरसमतमित्यवयन्त्यवुधा ४ ॥२७] । वर्णित जगत्‌. नाममात्र है,` सवथा मिध्या ओर मनकी 

कल्पना है । इसे नासमन्ञ मूख ही सत्य मानते ईै#३७। _ ` 

स॒यदजया त्वजामनुशयीत गुणांश जपन्‌ भगवन्‌ ¡ जत्र जीव मायासे मोहित होकर अ्रिया- 

को अपना केता है, उस समय उसके खख्पभूत 

आनन्दादि गुण ढक जाते है; बह गुणजन्य वृत्तिर्या, इच्दियो _ 

| ओर देहम फंस जाता है तथा उन्दीको अपना आपा 

भजति सरूपतां तदनु पस्रत्युमपेतभगः । मानकर उनकी सेवा करने चता है। अ उनकी 

॥ | जन्म-मृल्युमे अपनी जन्ममृत्यु मानकर उनके चक्रम ड 

पड़ जाता है । परंतु प्रभो | जसे सपर अपने केचुक्से 

कोई सम्बन्ध नहीं रखता, उसे छोड देता दहै वैसे 

त्वघ्रुत जहासि तामहिरिि स्चमात्तभगो | ही आप माया--अव्रिवासे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, 

| उसे सदा-सवदा छोड रहते हँ । इसीसे आपके सम्पूणं _ ` 

एवय सदा-सवंदां आपके साथ रहते हं । अणिमा आदि 
अष्टसिद्वियोसे युक्त परमेशर्थमे आपकी धिति है । 

इसीसे आपका रेश्व्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान ओर वैराग्य ` 
अपरिमित है, अनन्त है; वह देशा, काठ ओर वस्तुओं- 

की सीमासे आव्रद्र नहीं है † ॥३८]॥ मग्न्‌ । यदि 

मनुष्य योगी-यति होकर भी अप्रने इदयकी विषय 

वासनाओंको उखाड़ नदीं फकते तो उन असाधकोके 

यद न सयुद्ररान्त यत्तया हृदि कामजटा व्यि आप हृदयम रहनेपर भी वैसे दी दुन है, जैसे 

कोद अपने ग्म मणि पहने इर्‌ हो, परतु उसकी 

याद्‌ न रहनेपर उसे दढता रिरे इधर-उधर । जो साधक 

अपनी इन्दरियोको त्त करनेम ही खगे रहते है, विषयोसे . 

दुराधगमाऽमता दाद्‌ गताऽस्म्रतकण्डमणिः । विरक्त नहीं होते, उन्ह जीवनभर ओर जीवनके बाद 


|} 
क "ज 
‡- १ | > ~ 



















= 9 क-म क 


महसि मरहीयसेऽटगुणितेऽप रिमियभगः ॥२३८। 


भै 


0 क -कि १५। ˆ ` 


- £ मुकुटकुण्डलकङ्कणकिद्किणीपरिणतं कनकं परमाथतः । 
| मदददङ्कुतिलप्रमुखं तथा नरहरे न परं परमाथतः॥ २४1 
सोना मुकुटः कुण्डलः कङ्कण ओर किङ्किणीक रूपमे परिणत दोनेपर भी वस्तुतः सोना ही है । इसी प्रकार खरसिह ॥ 
` महत्त, अहङ्कार ओर आकाश, वायु आदिक रूपमे उपलब्ध होनेवाखा यह सम्पूण जात्‌ वस्तुतः अपरे भिन्न नहीं है । 



























| { गव्यन्ती तव वीक्षणाङ्गणगता कारुषभावादिमि 5 
> भौवान्‌ सत्वरजप्तमोगुणमयानुन्मीख्यन्ती वहू । ॐ 
< मामाक्रम्य पदा रिरस्यतिभर सम्मद्यन्त्यातुर्‌ २ य ॥ 
प माया ते शरणं गतोऽसि नृदरे व्यमेव तां बारय\ २५1) 
ममो ! आपकी यह माया आपकी दच्ठि अगन आकर नाच रदी ह ओर कार, खमाव आदिके दारा स्तगणी, 
गुणी आर तमोगुणी अनेकानेक भावो का प्रद्दन कर रदी दै 1 साथ दी यह्‌ र सवार होकर सुश्च आतुरो ब 


क राद्‌ रही हे । रि ह्‌ | मै आपकी शरणम आया ई आप दी इसे रोः दीज्यि। 


॥ ७ 
न्यम श्ट 


श्रीमद्भागवतं 


[ अ० ८७ 





| य ~ ----_-----------------______~-~_~_~~-_ ----- ---------~--------~--------- मी य ` श भ क ज भिका 1 ध का च = जा ज कका = 
8३ [~ 7 छ 1] 


"क ६ 
६७८ 
` असुत्तपयोगिनाखभयतोऽप्यसुखं 
ः 
न्ननपगतान्तकादनधिरूटपदाद्‌ 


भग्व्‌- 


भवतं; ॥३९।) 


त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थश्युभाद्यभयो- 














अनुयुगसन्वह 


श्रवणध्रतो 


नि # ॥ 
# छ 1 च 
न पे श्व 
न च जि ॥# 
री ~ # ~ 
"कु 4 


# भ 
[न 


७, 
च 


सगुण 


गणविगुणान्वयांस्त्िं देहभृतां च गिरः । 


गीतपरम्परया 


यतस्त्वमपवगंगतिर्मनुजेः ॥४०॥ 


पतय एव॒ ते न ययुरन्तमनन्ततया 


त्वमपि यदन्तराण्डनिचया नयु सावरणाः। 











क 


भो । : 






४: ज ट 


करे द] ( 
"=" "की 


प्रभो ! मँ दम्भपृण 
क्री स्चनाक्री 


[~ ` ` „क ~ सय त र कव दम्भः 
~ # दुम्भन्यासमिवेण 


` सम्मुद्यन्तमट्निंशं 
आज्ञाटङ्खिनमज्ञमज्ञजनतसिम्मानन।सन्मद्‌ 


दीनानाथ दयानिधान परमानन्द प्रभो पादि 3 
पृण सन्यास॒क्र बह्ने छोगोकरो ठगरहा ह| एकमत्र भोगी चिन्तमि ही आतुर हू तथा सत दिनि, नाना प्र 


थकावरसे व्याक्रुढ तथा बर-खुघ हो रहा हँ । मँ मपी अन्ता उस्लङ्खन कस्ता ह, अच = 


४ मे सन्त दं एसा बमण्ड कर बैठा हूँ । दीनानाथ, दयानिधानः 


। ध (1 "2111: ‰। 


गनिभावमधापि वा न 


कि. 
शि 
# ` ५ ह, 


५ --भ्मः > 8 








४: मे त्र. # त्र 







| विधिनिषेधके प्रतिपादक 





भी दुःखदी-दुःख भोगन। पडता है । क्योकि बे साधकं 
नी, दम्भी हे, एक तो अभी उन्हें म्युसे छुटकारा 
नहीं मिटा दहे, ठोगोंको रिश्चाने, धन कमाने आदिक 
क्लेटा उठाने पड रहे हे, ओर दूसरे आपका खरूप न 
जाननेके कारण अपने घमे-कर्मका उल्टद्लन करनेसे 
परटोकमे नरक आदि प्राक्त होनेका मय भी बना दही 
रहता है*# ॥ ३९ ॥ | 
भगवन्‌ ! आपक्रे वास्तविक खख्पको जाननेवाव् 
पुस्प आपके दिये इए पुण्य ओर पापकमेकरि फल सुखं 
एवं दु:खोको नहीं जानता, नदीं भोगता; वह भोग्य 
ओर भोक्तापनके भाव्रसे ऊपर उट जाता है । उस समय 
राख भी उससे निच्रत्त हो . 
जते हें; क्योकि वे देदामिमानिथोके व्यि दँ | उनकी 
ओर तो उसका ध्यान ददी नीं जाता | जिसे आपकर 
सखरूपका क्ञान नहीं दज हें वह भी यदि प्रतिदिन 
आपकी प्रत्येक युगम की इई ठीव्य, युणोका गान सुन- 
ुनकर उनके द्वारा आपको अपने हृदयम वं ठता है 
तो अनन्त, अचिन्त्य, दिव्यवुणगणेके निवाकषश्थान प्रमो | 


| आपका वह प्रेमी मक्त भी प्ाप-पुर्योके फर सुख-दुःखे 


ओंर विप्रि-निवेधोंसे अतीत हो जाता है । क्योकि आप. 
ही उनकी मो्षघ्खूय गति दहै | (प्ररत इन ज्ञानी 
ओर प्रेमियोको छोड़कर ओर सभी शाखवन्धनमें हैँ तथा 
वे उसका उतल्लद्खन करनेपर दुर्गतिको प्राप्त होते 
है) [1४ ०॥ मगतरन्‌ ! खर्गादि लोकोके अधिपति इन्दर 
ब्रह्मा प्रति भी आपकी धाह-आपका परार न पा 
सके; ओर आद्चय॑की बात तो यह है किं आपभी 
उसे नहीं जानते । क्योकि जत्र अन्त है ही नही, तवर 
कोई जानेगा कसे ? प्रभो ! जसे आकार हवासे धूल्के 
नन्हे नन्हें कण उडते रहते है वैसे ही आपमें काट्करे वेगसे 

भोगी 7 चिन्त तुरं 
विरचितोग्ोगक्छमैराकरुटम्‌ । 


माम्‌ ॥ ६ ॥ 


री ह ओर अज्ञानी 
परमानन्द | मेरी रक्षा कीजिप्रे | 


ॐ 6 


 विधिक्रङ्करः ॥ २७ ॥ 


+ # ङ 














अ द्म स्कन्ध ६७९ 
ख इव रजांसि वान्ति वयसा स॒ह यन्छरूतय- अपनेसे उत्तरोत्तर .दसगुने सात आव्रणेकरिं सहित 


असंख्य ब्रह्माण्ड एक साथ दही धमते रहते हँ । तव 

| मख, आपकी सीमा कँसे मिले । हम श्रतिर्यो भी आपके 
| खख्पका साक्षात्‌ वर्णन नदीं कर सकतीं, आपके 
अतिच्ति वस्तुर्ओका निषेध करते-करते अन्तम अपना 
| मी निपेध कर देती है ओर आपमें ही अपनी स॒त्ता 
खोकर सफल हो जाती हं# ॥ ४१ ॥ 





स्त्वयि हि फटन्त्यतननिरसनेन भवननिधनाः 1} ४१॥ 


गव णने कहा- देवर ! इस प्रकार 

श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ नायाय ने का । पर॑ | इस स र्‌ 

| सनकादि ऋषि्योनि आत्मा ओर्‌ तरहक एकता वतशनेव्राटा 

~ | उपदेश सुनकर आल्मखरूपको जाना ओर नित्य सिद्ध 


होनेपर भी इस उपदेशसे कृतङ्गत्य-से होकर उन 
9 ~ ._ ~ ल््गोने सनन्दनकी पूजा की ॥२॥ नारद्‌ ! सनकादि 

सनन्दनमधरनचुः सद्धा ज्ल्वाऽऽत्मना गात्‌ म्‌। ८२ 

पूर्वंन हैँ | उन आकारगामी महात्ाओने इस प्रकार 

समस्त वेद, पुराण ओर उपनिपर्दोका रस निचोड दिया 


चैति 


इत्यदरोपसमास्नायपुराणोपनिपद्रसः | 


च 


| है, यह सवका सार सवख दहै 1 ४३॥ द्रे |. तुम 
स ट्ष्रतः प्जातेर्व्योमियानेमहारममि ¦ || ४३॥ | मी उन्हीके समान त्रह्मके मानस-पुत्र हो-उनकी 
ज्ञान-सम्पत्तिकरे उत्तराधिकारी दो । तुम भी श्रद्राके साथ 
त्वं चत्‌ ब्रह्मदायाद्‌ शरद्धयाऽऽत्माजुशासनम्‌। दस ब्रह्मात्पवि्ाको धारण करो ओर खच्छन्दमावसे 
श्वम व्रिचरण करो । यह विद्या मनुर्ष्योको समस्त 

धारय गां कामं कामानां भजनं चृणाम्‌ ।४४॥। | बासनाओंको भस्म कर देनेवाी दे ॥ ४४ ॥ 
श्रीचक्र उवाच श्रीशुकदेवजी कहते ह--परीश्षित्‌! देतरपिं नारदः बडे 
- संयमी, ज्ञानी, पृणकाम ओर नैष्ठिक ब्रह्मचारी हँ । वे 
= जो बु सुनते है, उन उसकी ध्रारणा हयो जाती है । 
एव स ऋपणाऽ [द गृहत्व श्रद्रयाऽऽत्मवान्‌ । | भगवान्‌ नारायणने. उन्हें जवर इस प्रकार उपदेश किया 
र व तवर उन्होनि बड़ी श्रद्रासे उसे ग्रहण किया ओंर उनसे 

परणं; श्वुतधरो राजन्नाह वीरव्रतो स॒निः ॥४५॥ | यह कहा ॥ ४५ ॥ 


% 


--- 


माधव ! आप मुञ्चे अपने स्वरूपक्रा अनुभव कराइयेः जिते फिर सुल-दुःखके संयोगक्री स्छरति नदीं होती । अथव 


ुञ्ञे अपने गुगोके श्रवण ओर वर्णनकरा प्रेम दी दीजिये, जिससे कि मेँ [वधि-निपेधका किङ्कर न हो । 


%& ब्युपतयो विदुरन्तमनन्त ते 
न = भवान्न गिरः श्ुतिमोल्यः | 
त्वयि फटन्ति यतो नम इत्यतो 
जय जयेति भजे तव 


तत्पदम्‌ ॥ २८ ॥ 
= अ <| ह] > गं ~ 
_ दे अनन्त | व्रह्मा दि देवत। आका अन्त ना जानतः न आप दी जानते ओरन तो वेदौकी सुद्ुटमणि 
च्य नित्‌ ह्‌ जानती ठं; वृरभोकिं आप अनन्त ट | उपनिपरर "नमो नमः; (जय हो, जय होः यह कहकर आपे चरितार्थ 


त्यी द। इतदि म भी “नमो नमः, (जय हो, जथ हयः यदी ककर आपके चरण-कमलकरी उपासना कररता हू | 


ऋरि सृष्टिकरे आरम्म्मे उत्पन्न दए थे, अतएव वरे सुवरके ` 


|" ~ क = कु 





+ ` #§ 


शि १ 1) 1, 
१, क १ ॥, 
र 










० श्रीमद्भागवत [ अन ८७ 








नारद उवाच देवषि नारदने कहा--भगवन्‌ ! आप सच्चिदानन्द्‌- 
सरूप श्रीकृष्ण हँ । आपकी कीर्तिं परम पवित्र है । 

जत कृष्णायामल्कीत्तये 
नमस्तस्म भगवते कृष्णायामलकीत्तये । | आप समस्त प्राणियोके परम कल्याण--मोक्षके च्वि 


। कमनीय कलावतार धारण किया करते हैँ । मै आपको 
यो धत्ते सवेभूतानामभवायोषतीः कलाः ॥७६।। | नमस्कार करता दँ ॥ ४६ ॥ 


इत्याद्यस्रषिमानस्य ताच्छष्याश्च महात्मनः । । परीक्षित्‌ ! इस प्रकार महात्मा देवर्षिं नारद आदि- 
| ऋषि भगवान्‌ नारायणको ओर उनके श्िष्योँको नमस्कार 

3 र < करके खयं मेरे पिता श्रीढरब्णद्रपायनके आश्रमपर 
तताऽगदान्नम साक्षात्‌ पितुदैपायनख म ।८७)। गये ॥ ४७ ॥ भगवान्‌ वेदन्यासने उनका यथोचित 
। सत्कार किया । वे आसन खीकार करके वेट गये; इसके 
। वाद्‌ देवपि नारदने जो कुछ भगवान्‌ नारायणके मँदसे 
| सुना था) बह सव कुछ मेरे पिताजीको सुना 


तस्त तद्‌ वर्णयामास नारायणदचलाच्दरूतम्‌ 11४८1] | -¶॥ ४८॥ रजन्‌ ! इ प्रकर भ ठन नता 
४ ५ | कि मन-वाणीसे अगोचर ओर समस्त प्राकृत गुरणोसे 


रहित पररह परमात्माका वणन श्रुतियौँ किंस प्रकार 

इत्येतद्‌ वर्णितं राजन्‌ यन्‌; प्रक्षः कृतस्त्वया । | करती है ओर उसमे मनका वसे प्रवेश होता है १ यही तो 
| तम्हारा प्रदन था ॥ ४९ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ ही इस 

वश्वका सकस क्रतं ह तथा उसके आद्‌, मध्य तथा 

यथा ब्रह्मण्यनिदश्ये निगुणेऽपि मनवरेत्‌ ॥४९॥ | अन्तमे स्थित रहते ह । वे प्रति ओर जीव दोन 
सवामी हैँ । उन्दने ही इसकी सृष्टि करके जीवके साथ 


सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । 


। 
| 
चक | न 


योऽस्योत्ेक्षक आदिमध्यनिधने योऽव्यक्तजीवेश्वरो | इसमे प्रवेश किया टै ओर रारीरोका निर्माण करके वे 


| ही उनका नियन्त्रण करते हैँ | जेसे गाद निद्रा-- 
 सुषुकतिमे मग्न पुरुष अपने रारीरका अनुसन्धान छोड़ देता 

य, छुद्रदमयतब्रवस्य षणा चक्र पुरः शाबस्तताः।, है, वेसे ही भगवान्‌क्रा पाकर यद जव मायास मुक्त 
हो जाता है । भगवान्‌ एेसे विद्ुद्ध, केवल चिन्मात्र तच 

| है किं उनमें जगतके कारण माया अथवा प्रकृतिका 

यं सपद्य जहात्यजामलुशयी सुनः इलायं यथा  स्तीमर भी अस्ति नहीं ह । वे ही वास्तवमे अमय- 


| स्थान हैँ | उनका चिन्तन निरन्तर करते रहना 


कवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजसं हरिम्‌॥५०।॥ चादिये ॥ ५० ॥ 





इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे 


नारदनारायणसंवादे बेदस्तुतिर्नाम सप्तारीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥ 


ई १, ५ ५ 






~= ५ 
भ मः 
"न £ 


। + र कर 7 ~ . 
( क + 





क "इ ४ ५ 
। " अ. 





दूश्चम्‌ स्कन्व 





अथाष्टारीतितमोऽध्यायः 


दिवजीका सङ्करमोचन 


राजोवाच 


देवासुरमुष्येषु ये भजन्त्यशिवं शिवम्‌ 1 
प्रायस्ते धनिनो भोजा न तु लक्ष्म्याः पतिं हरिम्‌। १॥। 


एतद्‌ वेदितुमिच्छामः संदेदोऽत्र महान्‌ हिनः। 


विरुद्रशीर्योः प्रभ्वोविंद्रा भजतां गतिः | २॥ 


श्रीशुक उवाच 

रिवः शक्तियुतः शश्वत्‌ त्रिलिङ्गो गुणसं्रतः। 
वेकारि्स्तेनसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा ॥ ३॥ 
ततो विकारा अभवन्‌ पोडशामीषु कश्चन । 
उपधावन्‌ विभूतीनां सवांसामश्चुते गतिम्‌ । ४ ॥ 
रिटिं निगुणः साक्षात्‌ पुरुपः प्रकृतेः परः | 
== सवंदगुपद्रष्टा तं भजन्‌ निर्गुणो भवेत्‌ ॥ ५॥ 
=तेवृत्तेष्वखमेधेषु राजा युष्मतिपतामहः । 
-ण्वन्‌ भगवतो धपरनण़चछदिदमच्युतम्‌ ॥ ६ ॥ 


° ण 
आह भेगवांस्तस्म प्रीतः शुश्रुषे प्रथः । 


# 


कयां निःश्रेयसार्थाय योऽवतीर्णो यदोः कले | ७ ॥ 


श्री भगवानुवाच 
- हमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्वनं शनेः । 


` भा०सन्खं० २. द ष 


9 त । प ५ कल 


राजा परीक्षितने पूचा-भगवन्‌ ! भगवान्‌ शाकरने 
समस्त भोगोका परित्याग कर रक्खा है; परंतु देखा यह 
जाता है किं जो देवता, अघुर अथव्रा मनुष्य उनकी 
उपाप्तना करते है, वे प्रायः धनी ओर भोगप्तम्पनन 
हो जाते हैँ । ओर भगवान्‌ विण्णु लक्ष्मीपति दहै, परत 
उनकी उपासना करनेत्राठे प्रायः धनी ओंर भोगसम्पन 
नहीं होते | १ ॥ दोनों प्रमु व्याग ओर भोगकी दष्टिसे 
एक-दूसरेसे विरुद्ध खभावत्राले है, परंतु उनके उपासर्को- 
को उनके खरखूपके विपरीत फल मिलता है | मुञ्च 
इस विषयमे वडा संदेह दहै कि व्यागीकी उपासनासे 
भोग ओर ठक््मीपतिकी उपाप्तनासे व्याग केसे मिटता 
है १ मे आपसे यह जानना चाहता दह॑ ॥ २॥ 

श्रीद्यकदेवजी कहते है परीक्षित्‌ ! शिवजी सदा 
अपनी शक्तिसे युक्त रहते हैँ । वे सच आदि गुणोंसे युक्त 
तथा अहंकारके अधिष्ठाता हैँ । अहंकारके तीन मेद्‌ 
दै वेकारिकि, तेजस ओर तामप्त ॥३॥ त्रिवि 
अहंकारसे सोह विकार इर-- दस इन्द्रिया, पाच 
महाभूत ओर एक मन । अतः इन सवके अधिष्ठात्‌- 
देवता्ओमिंसे किसी एककी उपापतनना करनेपर समस्त 
रेशर्योकी प्राप्ति हो जाती है ॥ 9 ॥ परंतु परीक्षित्‌ , 
भगवान्‌ श्रीहरि तो प्रकृतिसे परे खय पुरुषोत्तम एवं प्राकृत 
गुणरहित हैँ | वे सवज्ञ तथा सवक्रे भन्तःकरणेके साक्षी 
है | जो उनका भजन करता दै, वह स्वयं भी गुणातीत 
हो जाता है॥ ५॥ परीक्षित्‌ ! जत्र तुम्हारे दादा 
धमराज युधिष्ठिर अश्मेध यज्ञ कर चुके, तत्र भगवानसे 
विविध प्रकारके धर्मोका वणन सुनते समय उन्होने भी 
यही प्रन किया या ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ ! मगतरान्‌ श्रीकृष्ण 
सवंशक्तिमान्‌ परमेश्वर है । मनुष्पोके कल्याणके च्ि ही 





कै के. 


क्न 


+ क 


ॐ 
9 


उन्होने यदुवंशे भवतार घारण किया था ] राजा युधिष्ठिर ` 


का प्रन सुनकर ओर उनको सुननेकी इच्छा देखकर 
उन्होने प्रसनताप्र्लक इस प्रकार उत्तर दिया था ॥७] 

भगवान्‌ श्रीरृष्णने कहा- राजन्‌ ! जिसपर मे 
कृपा करता ह, उसका सव धन धीरे-धीरे छीन ठेता 


; 2. %# 
= च ति कै ऋ = त ग्व 
~ त्रि -+ 
जगी 


ज क 
= ` ~ वः =" ज 


६८२ श्रीमद्भागवत ( अ० << 

१ ~~~ = (= 

ततो ऽधनं र्यजन्त्यसख खजना दुःखदुःखितम्‌॥ ८ । द्रं | जत्र वह निधन हे जाता दहै, तवर उसके सगे- 
सम्बन्धी उसके दु:ःखाकुरु चित्तकी प्रधा न करके उसे 
छोड़ देते हं ॥ ८ ॥ फिर वह धरनके टि उोग करने 





स यद्‌ा बितथोधोगो निविण्णः स्थाद्‌ धनेहया। 


( गता है, तवर मेँ उसका वह प्रयत्न भी निष्फक कर 
३ देता द्रं । इस प्रकार वार-वार असफर-होनेके कारण 


मत्परः तपैत्रख करिष्ये मदयुग्रहम्‌ ॥ ९ ॥ | जवर धन कमानेसे उसका मन विरिक्त हो जाता है, उसे 
` | दुःख समञ्ञकर वह उधरसे अपना मह मोड़ ठेता है 

ओर मेरे प्रेमी भक्तोका आश्रय लेकर उनसे मेट-नोट 

तद्ब्रह्म परमं सक्षम चिन्मात्रं सदनन्तकम्‌ । करता है, तवर यें उसपर अपरनी अहैतुकं करपाकी वर्षा 


9 


करता द्रं ॥९॥ मेरी करपासे उपे परम सक्षम अनन्त 


ह, कः सचिदानन्दश्वरूप परव्रह्यकी प्राप्ति हो जाती है | इस 
अता मां खदुराराध्य हेत्वान्यान्‌ भजते जनः | १०॥ | व्रकार मेरी प्रसनता, मेरी आराधना वदरत कथिन है | 
8.६ इसीसे साधारण रोग मुञ्चे छोडकर मेरे दी दृसरे रूप 
ॐ अन्यान्य देवताओंकी आराधना करते है ॥ १०॥ 
दूसरे देवता आश्चुतोष हैँ | वे अ्जटपट प्रिघट पडते हैं 
ओर अपने भक्तोंको साम्राज्य-लक्ष्मी दे देते हैँ । उसे 
| पाकर वे उच्छ्वल, प्रमादी ओर उन्मत्त हा उत्तेरे 
मत्ताः प्रमत्ता वरदाच्‌ विखरन्त्यंबजानते ॥११।॥ | ओर अपने वरदाता देवताओंको भी भू जते हें तथा 

ू उनका तिरस्कार कर कैरते हँ ॥ ११॥ 
श्रीश्युक उवाच श्राद्युकद्वजा कहत ह~ परोश्तित्‌ ¦ तह्या, विष्णु 


+ 
















ततस्त आश्तोषेभ्यो रन्धराज्यभ्रियोद्धताः । 


् 


ओर महादेव--ये तीनों शाप ओर वरदान देनेमे समथं 
हे, परंतु इनमे महादेव ओर ब्रह्मा शत्र ही प्रन या 
। , सद्यः यायप्सादोऽङ्ग रिवो रहमान चाय्युतः ।१२॥ | सट होकर बरदान १ ० 
भगवान्‌ त्से नहीं हं ॥ १२ ॥ इस विषयमे महात्मा- 
3 अत्र॒ चादाहरन्तीममितिदहासं पुरातनम्‌ । लोग एक प्राचीन इतिहास कष्टा करते हँ । भगवान्‌ 
< ~ दाकर एक वार्‌ व्रकाघुरको वर देकर संकटमें पड़ गये 
उकाराय गरिशो बर दत्वाऽऽप सङ्कटम्‌ ।॥१३॥ | थे ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ ! वकार शकुनिका पुत्र था । 
[र उसकी बुद्धि बहुत विगड़ी दृं शी । एक दिन कदी 
ए वका नामासुरः पुत्रः शकने; पथि नारदम्‌। जाते समय उसने दवर्पं नारको देख व्या ओर उनसे 
पूरा कि (तीनों देवताओमिं श्षटपट प्रसन होनेत्रारा कोन 
द्(ऽऽश॒तापं पप्रच्छ देवेषु त्रिषु दुमतिः ॥१४॥ | है ¢ ॥ १४ ॥ परीक्षित्‌! देवर्षिं नारदने क्ा--्ठुम 
ह ` देवं ग भगवान्‌ शंकरकी आराधना करो । इससे तम्हारा मनोरथ 
। स आह देवं गिरिशपाधावाश्च सिद्धवि । वहत जल्दी पररा हो जायगा | वे धोड़े ही गुणो 
ी शीघ्-से-रीव्र प्रसन्न ओर शोडे ही अपराधसे तरत क्रोध 
पाःखास्या युणदावभ्यिमाद् तुष्यते ङ्प्यति। १५ कर्‌ वहते है || १५ || रात्रण ओर ब्राणघुरने कवल 
` ` कुम . | वदरीजनोके समान शांकरजीक्री कुछ स्तुतिर्या की || 1. 


(„३ & 


खबाणयास्तुषटः वतवन्दनाख । इसीसे बे उनपर प्रसन्न हो गये ओर उन अतर्नीय 


ॐ शपप्रस।दयोरीशा ब्रह्म विष्णुशिवादयः | 





कभ - > 





निः र 
4 [1 ७ 


कि + की किः 1" #1 (ष, +. । ९ त 
॥ (* " ज = [ "छ = न कि # ` क # कैः च 3 (+ 


अ० ८८ | दम्‌ स्कन्ध ६८३ 
(ननन व्व्व्यन्व्व्व्व्व्य्य्य्ववव्व्व्व्व्ववववववव= चव्य 
ठेधर्यमतरं दां तत आप सुसङ्टम्‌ १ ६1 | देश्वयं दे दिया वादे रात्रणके कास उटान ओर 


वाणासुरकरे नगरकी रक्षाका भार नेसे वे उनके द्ये 
सङ्कटमे भी प्रड गये थे' | १६ ॥ 

| 

| 











द्त्य!दिष्टस्तमसुर उपाधावत्‌ खगत्रतः । नारदजीका उपदे पाकर वृकाघुर केदारकषैत्रमे गया 


केदार आत्मक्रग्येग जुह्वानोऽग्निं हरम्‌ ।१७॥ ओर अग्निको भगवान्‌ शांकरका मुख मानकर अपने 
र सः ३ दारीरका मांस काट-काटकर उसमें हवन करने टमा ॥ १७] 
देवोपरब्धिममराप्य निवदात्‌ सस॒मेऽहनि । इस प्रकार छः दिनतक उपासना करनेपर्‌ भी जव्र उसे 

भगवान्‌ शंकरके दर्शन न ए, तत्र उसे वडा दुःख 
| इआ । सात्र दिन केदरारतीधमे स्नान करके उसने 
| अपने भींगे वाद्व्राटे मस्तकको बुद्हादेसे काटकर्‌ 
: वि. | हवन करना चाहा ॥ १८ ॥ परीक्षित्‌ ! जंसे जगत्‌ 
यथा वय चाघ्रारवात्यता-नसात्‌ । | को दु :खव्रा आत्महत्या करने जाता है तो हमलोग 
करुणावा उसे वचा ठेते हैँ, वेसे ही परम दयाद्ु भगवान्‌ 
रांकरने बरकाघुरके आघातक पहले ही अग्निङुण्डसे 
तरस्पशेनाद्‌ भय उपस्छ्रताकरतिः 1१९) | अग्निदेधके समान प्रकट होकर अपने दोन हार्थो उसके 


शिरोऽन्रश्चत्‌ खधितिना तच्तीथङ्धिन्नम्रधेजम्‌ ।।१८॥ 


तदा महाकारुणिकः स ॒भूजंटि 


निगद्य दोभ्यौ अुजयोन्येवारयत्‌ 


क, | दोनों हाथ पकड़ ल्य ओर ग काटनेसे रोक दिया | 
ह्‌ न्च जठ द) वरभष्वर $ | 9 द = मवे यों 
१ कराए = च | उनका स्पर्श होते दी ब्रकासुरके अङ्ग अयो -केव्यो पूणे 
जभ का = =-= यरं । ह्‌ गः ९९. | गगवा राक्र ने चु से कदा 

पथाभिकामं वितरामि ते बरसष्‌। _ | गय ॥ 


। प्यारे बरृकासुर ! वस करो, वस करो, वहत हो गया । 
प्रीयेय तोयेन चणां प्रपद्यता- | नै तुम्दं वर देना चाहता हँ । तुम भुंह्मोगा बर मग 
लो | अरे भाई ! में तो अपने शरणागत भक्तोपर केवर 
सहा व्वयाऽऽत्मा रुशमे इथ 11२०1) | जल चदृनेसे ही संतुष्ट हो जाया करता दव । भ्या, 
व | तुम ्ूठम्‌८ अपने शरीरको क्यो ¶डा दे रहे हो १ ।२०॥ 
द्व सं तच पार्पायान्‌ चर्‌ ूतमघवर्ह्‌ | | परीक्षित्‌ ! अव्यन्त पापी व्रकाघुरने समस्त प्राणियोको 
सथभीत करनेवाटा यह वर मगा कि भे जिसके सिरर 
| हाथ रख दू, वदी मर जायः ॥२१॥ परीक्षित्‌ ! उसकी 
तच्छ्रत्वा भगवान्‌ रद्रो दुमंना इव भारत । | यह याचना घुनकर्‌ भगवान्‌ द्‌ पले तो कुछ अनमने- 
य ॑ | से हो गये र हसकर कह दिया--अच्छः, रसा ही 

१ वर्‌ ठ च मँ पको 
ओमिति प्रहसंस्तस्मं ददेऽहेरस्तं यथा ।२२॥ । 1 + उन्न मा सम 





यद्य यस्य कृरं शीष्नि धास्ये स भ्रियतामिति ॥२१॥ 


इत्यु्छः सोऽसुरो सून्‌ गोरीदरणलारसः । | | भगवान्‌ शांकरके इस्‌ प्रकार कह देनेपर ठृकाघुरके 


मनम यह लारुसा हो आयी कि क्षँ पावतीजीको ही हर 
टं ।› वह अघुर शंकरजीके वरकी परीक्षाके व्यि उन्ीके 
| सिरपर हाथ रखनेका उदोग करने र्गा । अब तो 


स॒तदरपरीक्षाथं शम्भोमूध्नि पिलासुरः 1 


खदस्तं धातुमारेभे सोऽबिभ्यत्‌ खट ताच्छिवः।॥ २२ | संकरजी अपने दिये इए बरदानसे ही भयभीत हयो 


च भ 11 1 


॥ 


<~ । । 


शक ("भ 
। ~ 


# 4 
(त च 


%॥। # 6 ¢ 44 1 


॥ 4 
4 # । 


&८ 9 











तेनोप्यष्टः संत्रस्तः पराधावन्‌ सवेपथुः । 
यावदन्तं दिवो भूमेः कष्टनाश्ुदगादुदक्‌ ।॥२४)। 
अजानन्तः प्रतिविर्धिं तुष्णीमासन्‌ सुरेशः । 

ततो वेङकण्डमगमद्‌ भाष्वरं तमसः परम्‌ ।\ २५ 
यत्र नारायणः साक्षान्न्यासिनां परमा गतिः । 
शान्तानां न्यस्तदण्डानां यतो नाबतंते गतः ।।२६॥ 
तं तथान्यसनं दृष्ट्रा भगवान्‌ बरजिनादंनः । 
दूरात्‌ ्रत्युदियाद्‌ भूत्वा बड्को योगमायया॥।२७) 
मेखलाजिनदण्डाकषैस्तेजसागनियि ज्वलन्‌ । 
अभिवादयामास् च तं ङशपाणिविनीतवत्‌ ॥२८।। 

श्रीभगवानुवाच 


लाङ्गनेय भवान्‌ व्यक्तं श्रान्तः किं द्रमागतः 


क्षणं विश्रम्यतां पुंस आत्मायं सवंकामधुक्‌ ॥२९॥ 


यदि नः श्रवणायां युष्मद्व्यवसितं विभा । 





भण्यतां प्रायशः पुम्मभिशतेः खार्थान्‌ समीहते।२०॥ 


श्रीक उवाच 


< 


छव ॥ 
$ । 


< 
तच; नवा्र 


श्रीमद्भागवत 





गये || २३ ॥ व्ह उनका पीछा करने कणा ओर वरे 
उससे डरकर कोपिते हए भागने खगे | तरे प्रश्वी, खगं 
ओर दिशाओंकरे अन्ततकः दौडते गये; परंतु फिर भी 
उसे पीला करते देखकर उत्तरकी ओर वदे ॥ २४ ॥ 
वडे-वड़े देवता इस संकगरको टरकनेका कोड उपराय न 
देखकर चुप रह गये । अन्तम बे प्राकृतिक अन्धक्रारसे 
प्रे परम प्रकाशमय व्कुण्ठल्ोकमे गये ॥२५॥ वेकुण्टमे 
खयं भगवान्‌ नारायण निघ्रास करते हँ । एकमात्र वे 
ही उन संन्यासियोँकी परम गति है, जो सारे जगतको 
अभयदान करके शान्तभावमें सित हो गये हँ | वरैकुण्मे 
जाकर जीवको फिर खौटना नदीं पडता ॥ २६ ॥ 
भक्तभयहारी भगवानने देखा किं राकरजी तो वड संकटमं 
पड़े हए है, तव वे अपनी योगमायासे व्रह्मचारी वनकर 
दूरसे ही धीरेधीरे बरकाघुरकी ओर अने टगे ॥ २७॥ 
मगवान्‌ूने मूजकी मेखला, काल्या मृगच्मं, दण्ड ओर 
रुद्राक्षकी माद्य धारण कर रक्ी थी | उनके एक-एक 
अङ्गसे एसी व्योति निकट रषी शी, मानो आग घ्रघरकः 
र्दी हो । वे हाथमे कुदा व्यि हए धे । वक्राघुररो 
देखकर ` उन्होने बडी नप्रतासे ककर प्रणाम 
किया ॥ २८ ॥ 

ब्रह्मचारी वेषधारी भगवानने कदा--रकुनि- 
नन्दन वृकाषुरजी ! आप्र स्पष्ट दही बहुत थके-से जान 
पडते हैँ । आज आप्र वहत दूरसे आ रहै है क्या ! 
तनिक विश्राम तो कर टीजिये । देलिये, यह शरीर ही 
सारे घुखोकी जड है । इसीसे सारी कामना पूरी होती 
है । इसे अधिक कष्ट न देना चाहिये ॥ २९ ॥ अप्‌ 
तो सव्र प्रकारसे समथं है । इस समय अप क्या करना 
चाहते हैँ १ यदि मेरे सुनने योग्य कोई बात हो तो 
बतल्हये । क्योकि संसारम देखा जाता है किं छोग 


सहायकोंके द्वारा बह्त-से काम बना च्या करते 


है ॥ ३० ॥ 

भ्रीद्यकदेवजी कते ह- परीक्षित्‌ । भगवानूके 
एक-एक शब्दसे अग्रत बरस रहा था । उनके इस 
प्रकार पूनेपर पहले तो उसने तनिक टदरकर अपनी 
थकावट दूर की, उसके बाद्‌ः क्रमशः. अपनी तपस्या, 
वरदान-प्ाप्षि तथा भगवान्‌ शंकरके पीछे दोडनेकी बात 


॥३१॥ । छ्र्से कद इनायी ॥ ३१॥ ` 


४ 


| अ० < 


अ० ८८ | 
श्रीभगवानुवाच श्रीभगवानने कहा-- अच्छा, एसी बात है १तव 
| एवं वेत्तहिं तद्वाक्यं न वयं श्रदधीमहि । तो भाई | हम उसकी वातपर व्रि्वास नदीं करते । आप ग 
& ० नहीं जानते हँ क्या ? वह तो दक्ष प्रजापतिके ापस्े 
यदि वक्त्र विश्रभ्भो दानवेन्द्र जमदूगुरो । ओर पिारचोँका सम्राट्‌ हँ ॥ ३२ ॥ द्नवराज ! आप 
| इतने बड़ होकर रेसी छोर्ट-छोटी बातोपर विश्वास कर्‌ 






























~ क # प (क हें (^ द्‌ ऋ 

तदयङ्गार खरिरसि हस्तं न्यस्य प्रतीयताम्‌ ।३३;¦ | स्ते ह १ आप्र यदि अव्र भी उसे जगद्वर मानते हों 
ं श ओर उसकी वातपर विश्वास करते हो, तो क्षवपट अपने 

यद्यसत्य वचः सम्मा: कष्य्वद्‌ दानवपम्‌ । सिरपर हाथ रखकर परीक्षा कर टीनियि ॥ ३३॥ 
, चं नयद्‌ भ , | दानविरोमणे ! यदि किसी प्रकार शंकरी बात असत्य 

तदनं जह्यसदू्ा्च न यदु वक्ताचतं पनः ॥२४।! | निकले तो उस असत्यवादीको मार ड्ध, जिससे - 
2 सतस = फेर कभी वह च्ूह न वोर सके क्षित्‌! 

इत्थं भगवतशितरै्वचोभिः घ सपेशके; । 42 ह: । न । 
मगवान्‌ने रेकी मोहित करनेत्राटी अद्भत अर मीठी बात 

^^ ~ दु घुरि । 

भिनधीर्विस्परत, शीण हस्तं ङुमतिव्यंभात्‌ | ३५} | कडी किः उसको विवेक-वुद्धि जाती रहो । उस दुघुद्धिने | 


भूलकर अपने दी पिरपर्‌ हाथ रख चा ॥ ३५॥ 
अथापतद्‌ भिन्नशषिरा वज्राद्‌ इव क्षणात्‌ । वस, उसी क्षण उस्तका सिर फट गया ओर वह वही 
धरतीपर गिर पडा, मानो उसपर विजली गिर प्रड़ी हो । 
उस समय आकाशम देवताकोग “जय-जय, नमो नमः, 
साधु-साधु 1, के नारे क्गने कगे ॥ ३६॥ प्राप वृकासुरकी 
| मृद्युसे देवता, ऋषि, पितर ओर गन्धे अत्यन्त ्॒रसन्न 
देवपिंपित्गन्धं मोचितः संकटाच्छिव; \: ३७] | होकर पुष्की वष करने कगे ओर मगवान्‌ शंकर उस 

विकट संकटसे सुक्त हो गये ॥ ३७ ॥ अव भगवान्‌ ` 
युक्तं गिरिशसम्याह भगयान्‌ पुरूपोत्तमः । पुरुषोत्तमे भयमुक्त शंकरजीसे कटा कि द्देवाधिदेव । 


ह ~" ५ वड़े हर्षकी वातै किं इस दुष्टको इसके पापोने ही. 
ह देव महादेव पापोऽयं स्वैन पराप्मना ।३८॥ | नष्ट कर दिया । परसेशवर ! भल, पेखा कौन प्राणी है ` 


इतः को लु महरखीश जन्तु कृतकिर्विपः । = | जो महापरुपोका अपराध कर्के इराक रहं सके । 
| | फिर खयं जगद्गुरु विंररेश्चर ! आपका अपराध करके तो 
क्षेमी खात्‌ करि विचवेश्चे कृतागस्को जगद्गुरौ! २९। कोई सकुराक रह दी कौसे सकता है १ ॥ ३८३९. ॥ 


जयशब्दा नमः चब्दः साधु लव्दाऽभवद्‌ दिषि।।३६॥ 


सयुः पुष्पवपाणि हते पापे वृकासुरे 1 









य॒ एवमन्य।दरतशकतयुदन्दतः मगवान्‌ अनन्त शक्तिके समुद्र हँ । उनकी एक 
एक शक्ति मन ओर वाणीकी सीमाके परे है । वे प्रकृतिसे, 
परख साक्षात्‌ परमात्मना हरेः । अतीत खयं परमात्मा दहै | उनकी रंकरजीको । 

रैः, 6 न 
~ क क नेकी यह लीव जो कोई कहता या खुनता हैः 
क गिशिभोक्षं कथयेच्छणोति वा ६ श ५ । 


| ट वह संसारके बन्धनो ओर शङुओंके मयसे सुक्त हो 

विगुच्थते संसुतिभिस्तथारिभिः ॥४०॥ |जाताहै॥ ० ॥ . 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां न्धे उत्तरां 4 

रुद्मोक्षणं नामा्ाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥ 


ध 9 
^ कः कः ॥ च 












क. चि ष्कः ॥ 
; - | +>, 4 १ अ+ कन चक 
अ त त ,. अह 4 

= कि क | १ न्ब । ४ 







श्रीमद्भागवत [ अ० ८९ 





अथेकोननवतितमोऽध्यायः 
रग॒ज्ञोके द्‌(रा जिदेषोको प ती्ञा तथा मणवानूका मरे हुए त्राह्मण-वाककांको वापस लाना 


श्रीक उवाच श्रीदयुकदेवजी कते है--परीक्षित्‌ ! एक वार 
सरखती नदीके पावन तटपर यज्ञ प्रारम्भ करनेवें व्ये वड़- 
वड़े ऋषि-मुनि एकत्र होकर वैटे । उन छोगोमें इस विषयपर्‌ 
वाद्‌-विवाद्‌ चखा किं ब्रह्मा, हिव ओर्‌ विष्णुम ससे वड़ा 
कौन है {| १॥ परीक्षित्‌ ! उन व्योगोने यह वात जाननेके 
व्ययि ब्रह्मा, विष्णु ओर रिव्रकी परीक्षा लेनैके उदेश्यसे 
ब्रह्माके पुत्र श्रगुजीको उनके प्राप्त मेजा | महपि श्रु 
सवसे पहले ब्रह्माजीकी समामे गये ॥ २ ॥ उन्होने व्रह्मा जीके 
धेयं आदिकी परीक्षा करनेके चयि न उन्दं नमस्कार किया 
ओंर न तो उनकी स्त॒ति दही की | इसपर रेसा माद्धम 
हआ कि ब्रह्माजी अपने तेजसे दहक रहै है । उन्हें 
क्रोध आ गया ॥ ३ ॥ परंतु जत्र समथ ब्रह्लाजीने देखा 
किं यह तोमेरापुत्रहीदहै, त्र अपने मन्म उटेद्भृए 
क्रोधको भीतर-दी-मीतर विवेकबुद्िसे द्वा ल्या; ठीक 
वेसे ही, जंसे कोई अरणिमन्थनसे उत्पन अग्निको जलसे 
बुञ्ञा दे ॥ ४ ॥ 

वहयंसे महष शरपु कैत्समे गये । देवाधिदेव भगवान्‌ 
शंकरने जव देखा कि मेरे माई ग्रणुजी आये है, तव 
उन्होने वड़े आनन्दसे खड होकर उनका आलिङ्न 
करनेके स्यि भुजा्रं फटा दीं॥ “५॥ प्रतु महिं 
भ्रगुने उनसे आलिङ्गन करना ख्ीकार न किया ओं 
कहा--पुम व्क ओर वेदकी मयांदाका उछछङ्खन 
करते हो, इसब्िये तुमसे नहीं मिलता ।' ` श्रगुजीकी 
बात सुनकर भगवान्‌ शंकर क्रोधके मारे तिमि 
उठे | उनकी अषि चद गयीं । उन्होने त्रिय उठाकर 
महर्षिं भृगुको मारना चाहा ॥ & ॥ परंतु उसी समय 
भगवती सतीने उनके चरणोपर गिरकर वहत॒ अखन. 
विनय की ओर किसी श्रकार उनका क्रोध शान्त करिया । 
अव महर्षिं भृगुजी भगवान्‌ विष्युके निषासस्यान वैकुष्ठं 
गये ॥ ७ ॥ उस समय मगवान्‌ विष्णु लक्मीजीकी गोदम्‌ 
अपन्न सिर सकर ण्ट इद थे । शयुनीनि जाक 





सरखत्यास्तदे राजश्चषयः सत्रमाक्चत । 














तिकः सममू त्तेषां त्रिष्वधीशेषु को महान्‌ ॥ १॥ 
 चतख्य जिज्ञासया ते वे भृगुं ब्रहमसुतं नृप्र । 

छ ; न्दे = = 

तञ्ज्ञप् प्रसयामासुः सोऽभ्यगाद्‌ ब्रह्मणः सभाम्‌। २। 
न तस्मे प्रहणं स्तोत्रं चक्रं सखपरीक्षया 1 

तस्म चुक्रोध भगवान्‌ प्रज्वलन्‌ स्वेन तेजक्षा ॥ ३॥ 


स आरपन्धुत्थितं मन्युमात्मजायात्मना परध, । 


अशीश्चमद्‌ था ब्रहि खयोन्या व(रिणीऽऽतमभरः।४। 





ततः कैलासमगमत्‌ स॒तं देवो महेश्वरः । 









परिरच्धुं समारेमे उत्थाय भ्रतरं छदा ॥ ५ ॥ 


ण 


` गच्छ्समरस्युत्पथगण इति देवरनुकोप ह । 


रवस्य तं हन्हमारेमे विनमलोचनः ॥ ६ ॥ 


५ 


पत्ति पाद्धोदृवी सान्खणामाकष तं प्रिर । 


भ जगाम 8 + देवो 
अथा जगाम वेडण्डं यत्र देवो जनार्दनः ॥ ७॥ 


भिय उत्सङ्गं परा वृषसयताडयत 


१, णा प्रभूः र ॐ ६: 





नी म क ` का क तं 


^ न््न्न्न्न्््ननन््ननराः 


अ० ८९ ] दशमं स्कन्ध 















वक्षःस्थ्पर्‌ एक खात कसकर जमा दी । भक्त- 
वत्सर भगवान्‌ विष्णु लदमीजीके साथ उट वटे ओर क्व्पट 
अपना रग्यासे नीचे उतरकर मुनिको सिर काया; 
प्रणाम किया | भगवानने कहा--श्रह्मन्‌ ! आपका 
सखागत है, आप मले पधारे । उस आसनपर बैठकर कुछ 
श्तण विश्राम कीजिये | प्रमो ! मुञ्चे आपक्रे ञ्युभागमनका 
पता न धा । इसीसे में आपकी अगवानी न कर सका | 

मेरा अपराध क्षमा कीजिये ॥ ८-९, ॥ महामुने ! आपके 
चरणकमल अत्यन्त कोमल हँ |: यों कहकर भगुजीकें 
चरणोको भगवान्‌ अपने हासे सहने ल्मे ॥ १० ॥ 
ओर बोले-'महर्षे ! आपक्रे चरणोका जल तीर्थाक्ो भी 
तीथं वनानेवाका है । आप उससे वेकुण्य्छोक, म॒हे ओर 
मेरे अंदर रहनेवाटे टोकपाखेको पवित्र कीजिये ॥११॥ 
भगवन्‌ ! आपके चरणकमल्छके स्परशश॑से मेरे सारे पाप धुक 
गये | आज मै ल्मीका एकमात्र आश्रय हो गया | 
अत्र॒ आपके चरणोसे चिहित मेरे वक्षःस्थक्पर स्शष्मी 
सदा-सवदा नित्रा करेगी ।॥ १२ ॥ 


तत उत्थाय भगवान्‌ सह लक्ष्म्या सतां गतिः ॥ ८ ॥ 


















सखतस्पादवरुद्याथ ननाम रिरसा युनिम्‌ 
आह ते खागतं व्रह्मन्‌ निपीदात्रासने क्षणम्‌ । 
अजानतामगतान्‌ बः क्षन्तुमहथ नः प्रभो ।॥ ९॥ 


अतीव कामलो ताते चरणो ते सह्ये । 


3 
"ॐ 
ज 
- 
~ 
.- 


इत्युक्त्वा चिग्रचरणौ मदयन्‌ स्वेन पाणिना 1१०॥ 
पुनीहि सहटोक्‌ं मां सोकपषालांश्च मटर तान्‌ । 
पादोदकेन भवतस्तीर्थानां वीथंकारिणा 1१९१) 
अद्याहं थगवस्लक्षम्या आसमेकान्तभाजनम्‌ 1 
वत्स्यत्युरमि मे भतिभवरणद्हतांहसः १२ 


श्रीग्ुक उवाच श्रीदुकदेवजी कहते हँ-जव मगवान्‌ने अव्यन्त 
गम्भीर वाणीसे इस्‌ प्रकार कडा, त श्गुजी परम सुखी 
ओर तृप्त हो गये | भक्तिकरे उद्रेकसे उनका गला भर 
आया, ओमि ओंसू छल्क अये ओर वे चुप हो 
गये ॥ १३॥ परीक्षित्‌ ! भ्रगुजी वहसे लोटकर ब्रह्मवादी ' 
मुनियोके सत्सङ्गमे अये ओर उन्हें ब्रह्मा, हिव ओर 
विष्णुभगवान्‌क्रे यहा जो कुछ अनुभव आ था, वह सत्र ` 
कह सुनाया ॥१४॥ भरगुजीका अनुभव सुनकर सभी 

ऋषि-पुनियोको वडा विस्मय इञ, उनका सदेह 
हो गया । तवसे त भगवान्‌ विष्णुको ही सवश्रे्ठ मानने 
लगे; क्योकि वे हीं शान्ति ओर अभयके उद्गमश्यान 
टै ॥ १५ ॥ भगवान्‌ विष्णुसे ही साक्षात्‌ धर्म, ज्ञान, 
बेराग्य, आठ प्रकारके रेर्य ओर चित्तो शद्ध करने- 
वाटा यश प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ शान्त, संमचिर 
अकिञ्चन ओर ॒सव्रको अभय देनेवाछे साधु-सुनियोकी वे 


 अकरचनानां साधूनां यमाहुः परमां गतिम्‌ 11१७ ५. | ही एकमात्र प्रम गति हैँ । रेसा सारे शाख कहते 
` । है॥ १७॥ उन॑ीं प्रिव मूरति हँ सलं ओर इषः 


स्वं यसय पिधा परतित्रीह्मणास्विष्टदेवताः 1 


ड ॥ 
१* अहो 1 २. मागमन क्षन्तु° । ३. गुस्त सान््रया । = 


~ कै 


एवं ब्रुवाणे वद्ण्डे भ्रगुतन्मन्द्रयो गिरा । 


निर्धृतस्तपितस्दृष्णीं भक्तयुत्कण्ठो ऽश्रुलो चनः १३॥ 







पुनर्च सत्रमा्रज्य यनीनां व्रहमवा दिनम्‌ | 
खानुभूतमरेषेण राजन्‌ भृगुरवर्णयत्‌ । १४] 
तन्निशम्याथ युनमरो भिसि सुक्तसंशंयाः । 





















शरयांसं श्रदधुविष्णुं यतः शान्तियतो ऽभयम्‌ । १५ 










धर्मः साक्षाद यतो ज्ञानं बेराग्यं च तदन्वित॑म्‌। 









देयं चाष्टधा यखाद्‌ यशश्चात्ममखापरहम्‌ 1 १६॥ 
| = सनीनां न्यस्तदण्डानां शान्तानां समचेतसाम्‌ 1 








नै 


¦  &<८८ श्रीमद्भागवत [ अ० ८९ 








न्त्यनारिषः शान्ता यं वा निपणबुद्धयः ॥९८।। है ब्राह्मण । निष्काम, रान्त ओर निपुणलुद्धि ८ विवेक 

सम्पन्न ) पुरुष उनका भजन करते हैँ ॥१८॥ भगवान्‌. 

त्रिविधाद्रतयस्तसय राक्षसा असुराः सराः । , की गुणमयी मायाने राक्षस, असुर ओर देवता-उनकी 

ये तीन मूर्तियां बना दी है | इनमे समयी देवमूर्ति 

गुणिन्या मायया यष्टाः सत्वं तत्तीथंसाधनम्‌ ॥१९।। | दी उनकी प्रातिका साधन है । वे खयं ही समस्त 
पुरुषाथखख्प ह ॥ १९ ॥ 





श्रदयुक उवाच श्रीटयुकदेवजी कते है- परीक्षित्‌ ! सरखतीतटके 
॥ । र क. ह ऋषिर्योने अपने व्यि नहीं, मनुष्योका संडाय मिटानेके 
। एव सस्ता वित्रा चणा स््यरुत्तय। च्य ही सी युक्ति रची थी । पुरुषोत्तम भगवान्‌के 














ते चरणकमलोंकी सेवा करके उन्होने उनका परमपद प्राप्त 
पुरुषस्य वया तद्वतं गताः ॥२०॥ | किया ॥ २० ॥ 


सूत उवाच खूतजौ कहते ह--शोनकादि ऋषियो ! भगवान्‌ 
= पुरुषोत्तमकी यह कमनीय कीर्ति-कथा जन्म-मृव्युरूप संसार- 

इत्येतं नतनयादस्यपब्नगन्य- ~ 9 है 
1 ततन सास्पप्चग क भयको मिटानेवाटी है । यह ॒व्यासनन्दन भगवान्‌ 


श्रीज्युकदेवजीके मुखारविन्दसे निकली दई सुरभिमयी 
मधुमयी सुधाधारा है । इस संसारके लवे पथका जो बटोही 
सुकं श्रवणपुरटेः पिबत्यभीक्ष्णं | अपने कानके दोनोँसे इसका निरन्तर पान करता रहता, 
< उसकी सारी थकावट, जो जरतमे इधर-उधर भटकनेसे 
पान्थोऽध्वभ्रमणपरिश्रमं जहाति ॥२१ । | होती है, दूर हो जाती है ॥ २१॥ 


पीयुषं भवभयभित्‌ परस्य पुंसः । 


श्रीञचुक उवाच भ्री्कदेवजी कहते हँ- परीक्षित ! एकः दिनकी 

+ ल 2 बात है, द्वारकापुरीमे किसी ब्राह्मणीके गभ॑से एक पुत्र 

एकदा इखत्या इ वमप्रपलन्याः ॥ = - ~ † होते 

` एकद्‌ क र्‌ ् तु विघ्रपः 4 मारकः । पैदा इ, परंत॒॒बह उसी समय पृथ्वीका स्पर्ख होते 
जातमात्रा अथव स्पृष्टा ममार कंठ भारत २२ | ही मर गया | २२॥ ब्राह्मण अपने वाठ्कका मूत दारीर ठेकर 
विप्रो गृहीत्वा मृतकं राज दायुंपधाय सः । राजमहचके द्रारपर गया ओर वहो उसे रखकर अत्यन्त 


[हि , ~ = आतुरता ओर दुखी मनसे विलाप करता हआ यह 
^ इदं प्रोवाच विख्यन्नातुरो दीनमानसः ॥२३॥ | शषुप्त = व & 
च शद्‌ ठ दो कहने कगा-|॥ २३ ईसम ९ नह्‌ कि ब्राह्मणद्रोही, 


।  ब्रहद्विषः शर्थियो डन्धसय विषयात्मनः । धूर्त, कृपण ओर विषयी राजाके कमदोषसे ही मेरे 
ई; बालकवी मृल्यु ई है ॥ २४ ॥ जो राजा हिंसापरायण, 


+ ¬ 


 क्षत्रबन्धोः कमंदोषात्‌ पश्चत्वं मे गतोऽभकः ॥२४॥ दुःशीक ओर अजितेन्द्रिय होता है, उसे राजा मानकर 


सेवा करनेवाखी प्रजा ददि होकर दुःखपरदुःख 
1 व ( ितिन्मम्‌ | भोगती रहती है ओर उसके सामने संकट-पर-संकट 


प्रजा भजन्त्यः सीदन्ति दश्दरा नित्यदुःखिता५॥।२५॥ | आते रहते हैँ ॥ २५॥ परीक्षित्‌ ! क प्रकार र 
दूसरे ओर तीसरे वाक्कके भी पैदा होते ही मर जानेपर 
वतीयं विमिव सवके च। = | ध राजमहल दरे 


युज्य स मुपद्वारि तां गाथां समगायत्‌ ॥२६॥ | डाक गया ओर वही बात कह गया ॥ २९ ॥ 


---ल्ण् -त दनु 
या त~ + कका - र. । 
॥ दर।॥ ५२८ "2" 
ए + १। 
क 9 „3 क नि 
तत च~ + । _ कक । न द ~>. 2 4 ॥ 
१५-थ ५ । क अन्> ^ 
# - द. = ~ क > > धयः न ह न अ" 
~= इ `` 
+ च "द कर = 
- ५ \ ष्म > "++ "छ +~ र  ¶- 
. ः 4.9 । ४ 
( # त = # 
नी 










क - ११ ॥ भम ॥ ॥ = क 4. नि ‡-' 
५ ऋ = = = =+# क्न 9 ^-^ + 
कै ध 









अ० ८९ | दशम स्कन्ध 
। च [५ द ङ | हि ४ चु 
तामर्खन उयश्वु्य कर्हिचित्‌ केरावान्तिके । | न्वे वाके मनप जव वह वरहो आया, तव उस समय 


| मगवान्‌ श्रीदृष्णक्रे पास अन भी वैठे इए जे । उन्दने 
परेते नवमे वारे ब्रह्मणं समापत्‌ ।॥२५॥ | त्राह्मणकी वात नकर उससे कदा--॥ २७ ॥ श्ह्न्‌ ! 
आपके निवासस्थान द्वारका कोद धलुषधारी क्षत्रिय 


किखिद्‌ बह्मस्खन्निभासे इह नासि धञधरः । नहीं है क्था १ मादरम होता है किये यदुवंशी ब्रामण 
~ ~ है ओर प्रजापाटनका पल्याग कर्के किसी गमे वेठे 
राजन्यबन्धुरेते वें बराह्मणाः सत्र आसते ॥२८॥ | - > 4 


| इए है ! ॥ २८ ॥ जिनके राञ्यमे धन, खी अथर 
ुत्रोसे वियुक्त होकर ब्राह्मण दुखी होते है, वे क्षत्रिय 
। नहीं है, श्षत्रियके वेष पेट पाठनेवाठे नट हैँ | उनका 
जीवन व्यथं है || २९ ॥ भगवन्‌ । मँ समञ्चता द्रं किं 
आप द्ी-पुरुष अपने पुत्रोकी मृव्युसे दीन हो रहे है । 
तै आपकी संतानकी रक्षा कख्गा । यदि मँ अपनी 
प्रतिज्ञा पूरी न कर सका, तो आगमे कूदकर जल मर्गा 
अनिस्तीणप्रतिज्ञोऽग्नि प्रवेक्ष्ये हतकट्मषः ॥३०॥) | ओर इस प्रकार मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जायगा? ।३०। 


धनदारात्मजापर्ा यत्र शोचन्ति बाह्मणाः | 


ते वें राजन्येपेण नय जीषन्त्यसुम्भराः ॥२९॥ 





अहं प्रजा वां भगवन्‌ रक्षिष्ये दीनयारिद । 


न्राह्मण उवाच | ब्राह्मणने कहा -अज्ज॑न | याँ वलरामजी, भगवान्‌ 
| श्ीृष्ण, धनुधररिरोमणि प्रुम्न, अद्वितीय योद्धा अनिरुद्ध ` 
®: _ (9५ ४ भ [+> भरे बाटकोकी ०५७ ) 
संकषणा वासुदेवः प्रद्युम्ना धन्विनां वरः} . । भी जव मेरे बाट रक्षा करनेमे समथं नहीं हँ; इन | 


अनिरुद्रोऽप्रतिरथो न त्रातुं राक्तुबन्ति यत्‌ ।॥३१॥ | जगदीश्वरोके च्वि भी यदह काम कठिन हो रहा है; तव 
तत्‌ कथं नु भवान्‌ कर्म दुष्करं जगदीश्वरः । | तम इसे कैसे करना चाहते हो १ सचशुच यह तुम्हारी 
चिकीर्षसि सवं बालिद्यात्‌ तत श्रदध्महे बयम्‌ ।।२२॥ | यूता दै । दम तब्दारी इस वातपर विलडुल विशरास 















व नहीं करते ॥ २१-३२॥ 

१८ । अञ्ुनने कहा- तर्मन्‌ ! नँ बलराम, श्रीकृष्ण अथवा ` 

9 ¢ © ० ए [९ भे. 
गाह्‌ कक्षम ब्रह्मन्‌ न कृष्मः कृ पिणेरेव च प्रद्युम्न नहीं दरू | मेहर अन, जिसका गाण्डीव नामक 3 


धनुष विश्वविष्यात है ॥) ३३ ॥ ब्राह्मणदेवता ! आप 
अहं वा अना नाम गाण्डीवं यस्य वं धनुः ॥३२॥। | मेरे वल-पररुषका तिरस्कार मत कीञज्यि । भप जानते ` 3 
| नही, म अपने पराक्रमसे भगवान्‌ शांकरको संतुष्ट कर ` 
चका द्व । भगवन्‌ ! मै आपसे अधिकक्याकर्हरःमे 
युद्धम साक्षात्‌ मृब्युको भी जीतकर आपकी संतान ख ` 
ट्गा ॥ ३४ ॥ [षः - 
एवं िश्रम्मितो विग्रः फाल्गुनेन परंतप । . | परीक्षित्‌ ! जब अ्जुनने उस ाक्षणको इस प्र 


स श्री [रय  _ | विश्वास दित्छया, तब वह लोगोँसे उनके नल-पोरुषका 
य ६ ५५५५ र॑ | १ । | 
स जगाम खगं प्रत; पाथ निशामयन्‌ ॥२५ व ल) ४ लय 


गया ॥ २५॥ प्रसवका नेकट आनिपर्‌ ध ब्रह्मण 


मागमखा मम बह्मन्‌ वीय जयम्बकतोपणम्‌ 


मरस्यु विजित्य प्रधने आनेष्ये ते प्रजां प्रभो ॥३५४॥ 



























 भ्रदरतिकाल आसन्ने भार्याया द्विजसत्तमः! 
_ € 4 होकर ` 
प्रा पाहि अजां श्तयोरित्यः शनमातुर; ॥२६॥ | इस बार तुः 


भार क्त ० २" €= 


«~ ` "क्च कक्ा च "कक कः पी, 2), , गक + स्दुक, क, अक ज 
॥ + 
४ 


(16 






= 
। 
॥ 


९९० 





स उपस्पृश्य ुच्यम्भो नमस्कृत्य महेश्वरम्‌ । 
दिव्यान्यच्ञाणि संस्मृत्य सज्यं गाण्डीवमाददे।।३७॥ 
न्यरुणत्‌ शतिकागारं शरेनानाख्रयो जितैः । 
तियंगुष्वंमधः पार्थश्चकार शरपञ्जरम्‌ ॥३८। 
ततः मारः संजातं विग्रपलन्या रुदन्‌ यहः । 
सद्योऽदशनमापेदे सशरीरो विहायसा ॥२३९॥ 
तदाऽऽह विप्रो विजयं विनिन्दन्‌ दृष्णसंनिधो। 

मोढयं परयत मे योऽहं दधे ्ीबकःथनम्‌ ।\४०॥ 
न प्रद्युम्नो नानिरुद्धो न रामो न च केशवः । 

यस्य रेकः परित्रातुं कोऽन्यरतद विति ; ॥७१॥ 
धिगजेनं खषाबादं धिगात्मश्छाधिनो धनुः । 

देबोपयृष्टं यो मोद्यादानिनीषति दुर्मतिः ।४२॥ 

एवं शपति विप्रो विद्यामाखाय फाल्णुनः। 

ययो संयमनीमाञ्यु यत्रास्ते भगवान्‌ यमः ॥४३॥ 
विप्रापत्यमचक्षाणस्तत रन्द्रीमगात्‌ पुरीम्‌ । 
आग्नेयीं नेचछतीं सोम्यां वायव्यां वारुणीमथ । 
रसातलं नाकष्ष्ठं धिष्ण्यान्यन्यान्युदायुधः ॥४४।। 
ततोऽलन्धद्विजसुतो धयनिस्तीणंप्रतिश्वुतः । 


अग्नि विविषठु छृष्ेन पर्यक्त प्रपषेध॑ता ॥४५॥ 


षि को दि 


६. व्याल्लाणि च संस्पृ । २. पेषितः। 


श्रीमद्भागवत 


अय ~ ~ - == ~~~ 


| अ० ८९ 


| यह छनकर अनने द्ध जक्से आचमन किया तथा 
भगवान्‌ शकरको नमस्कार किथा । फिर दिष्य असख्रोकां 
स्मरण किया ओर गाण्डीव धलुषपर डोरी चाकर उसे 
हाथमे ले छिया ॥ ३७ ॥ अर्जुनने वाणोको अनेक 
प्रकारके असख-मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके प्रसवगृहको 
चरो ओरसे घेर दिया । इस प्रकार उन्होने सृतिकागृहके 
ऊपर्‌-नीचे, अगल-बगक वाणोका एक पिंजड़ा-सता वना 
दिया ॥ २८ ॥ इसके बाद ब्राह्मणीके ग्भ॑से एक शिष्य 
पैदा हआ, जो वार्‌-वार रो रहा था । पतु देखते-ही 
देखते वह सशरीर आकारामे अन्तर्धान हो गया ॥३९॥ 
अव वह ब्राह्मण भगवान्‌ श्रीकृष्णके सामने ही अञ्युनकी 
निन्दा करने च्गा । वह वोल्ा-मेरी मूर्खता तो देखो, 
मैने इस नपुंसककी डीगमरी वातोपर विश्वास कर 
च्या | ४० ॥ भला जिसे प्रद्युम्न, अनिरुद्र यर्हातक 
किं बलराम ओर भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी न वचा सके 
उसकी रक्षा करनेमें ओर कोन समर्थ है १॥ ४१॥ 
मिथ्यावादी अञ्युनको पिक्तार है | अपने ह अपनी 
बड़ाई करनेवाठे अुनके धनुषको धिक्रार है !! इसकी 
दुबुद्धि तो देखो ! यह मूढतावडा उस वाट्कको लटा 
लाना चाहता है, जिसे प्रारब्धने हमसे अल्ग कर्‌ द्विया 
हैः ॥ ४२ ॥ 
जव वह ब्राह्मण इस प्रकार उन्हं मला-वुरा कहने 
गा, त॒ अयन योगवलसे त्कार संयमनीपुरीमें गये 
जहां भगवान्‌ यमराज निवास करते हैँ ॥ ४३ ॥ वहं 
उन्हे ब्राह्मणका वाक्क नहीं मिटा । फिर वे शाख्ञ लेकर 
क्रमशः इन्द्र, अग्नि, निति, सोम) धाय ओर वरुण 
आदिकी पुरिमे, अतव्दि नीचेके लोकमि, ख्गंसे 
ऊपरके महर््कादिमे एवं अन्यान्य स्थानोमे गये ॥ ४४ ॥ 
परतु कीं भी उन्हें ब्राह्मणका बाल्क न मिला । 
उनकी प्रतिज्ञा पूरी न हो सकी । अब उन्होने अग्ने 
्रवेा करनेका प्िचार किया । परंतु भगवान्‌ श्रडृष्णने 
उन्हे देसा करनेसे ोकते इए कदा--॥ ४५ ॥ (भाई 
अर्जुन ! तुम अपने-आप -अपना तिरस्कार मत करो । 


= दिजघ्रनस्ते माव्ञात्मानमात्मना । | भर तहं ्ामणके सतह अभी दिलाये देता ह । 








[त 1 त त ए 2 र 


अ० ८९ | दशम स्कन्ध 

























थे तेनः कीर्ति विमलां मनुष्याः खापयिष्यन्ति॥४६॥ जो लेग तहा निन्दा कर रदे है वे दी फिर हम- ऊच ए 


लोर्गोकी निमंर कीर्तिकी स्थापना करगे ॥ ४६ ॥ 
सवशक्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीढृष्ण इस प्रकार समञ्चा- 
्ञाकर अदुनके साथ अपने दिव्य रथपर सवार इए 
ओर पश्चिम दिदाको प्रस्थान किया | ७ ॥ उन्दनि 
सात-सात प्वतोवाठे सात द्वीप, सात सपुद्र ओर लोका- ` 
लोकपवंतको त्गंघकर धोर अन्धकारं प्रवेरा किया ॥४८॥ 
परीक्षित्‌ ! वह अन्धकार इतना धोर था कि उसमें 
रोन्य, सुम्रीव, मेघपुष्प ओर वत्छहक नामके चासो घोडे 
अपना मागं भूककर इधर-उधर भयटकने रगे । उन्दं कुछ 
सूञ्चतादही न था॥ ४९॥ योगेश्वरोके भी परमेश्वर 
मगवान्‌ श्रीकृष्णने धोडोकी यह दशा देखकर अपने 
सहस्र-सहस्र सूयेकि समान तेजखी चक्रको आगे चठ्नेकीं 
आज्ञा दी ॥ ५० ॥ सदशन चक्र अपने उ्योतिमंय 
तेजसे खयं भगवानके द्वारा उत्पन उस घने एवं महान्‌ 
अन्धकारको चीरता हआ मनके समान तीव्र गतिसे आगे- 
आगे चला । उस समय वह रेखा जान पड़ता था, मानो 
भगवान्‌ रामका बाण धनुषसे छुटकर राक्षसोकी सेनाम 
प्रवेश कर रहा हो ॥ ५१ ॥ इस्‌ प्रकार सुदशेन चक्रके 
दारा बतलये इए मागंसे चक्कर रथ अन्धकारकी 
अन्तिम सीमापर प्ैवा । उस अन्धकारे पार सवश्रष्ठ 
पारावाररहित व्यापक परम व्योति जगमगारदीथी। 
उसे देखकर अर्जुनकी अखं चौधिया गयीं ओर उन्होने 
विवर होकर अपने नेत्र वंद कर व्यि ॥ ५२ ॥ 
इसके वाद्‌ भगतव्रान्‌के रथने दिव्य जक्एारिमे प्रवेश 
किया । वडी तेज ओँधी चल्नेके कारण उस जलमे 
बड़ी-बड़ी तरङ्खं उठ रही थीं, जो बहुत दी भटी म्न 
होती थीं । वहं एक वडा सुन्दर महल था । उसमें 
मणियोके सहस्र-सहस्र खंभे चमक-चमककर 8 
शोभा वढ़ा रहे थे ओर उसके चारौ ओर बड़ी उञ्ञ्वल 
ज्योति फ रही थी ॥ ५३ ॥ उसी मगवान्‌ 
रोषजी विराजमान थे । उनका शारीर 3 भ यन्त॒ भयानक 
| ओर अदूसुत था । उनके सहत्त सिरि यथे ओर प्रत्येक 


भ 


| फणपर्‌ सुन्दर खुन्दर मणिर्या जगमग रदी थीं । प्रत्येक 








इति संभाष्य भगवान्॑नेन सदेशवरः । 
दिव्यं खरथमाद्याय प्रतीचीं दिश्ञमाधिंश्चत्‌ ॥४७॥ 
सप्त ीपान्‌ सप्त सिन्धून्‌ सप्रसप्रगिरीनथ । 
लोकालोकं ठथातीत्य विवेश्च सुमहत्तमः ॥४८।) 


, "ऋ ++) न 


{॥) 


तत्राश्चाः सेव्यसुग्रीषमेषपुष्पबलादकाः 


| 1) 


तमसि अरष्टगतयो बभूवुर्भरतर्षभ ।॥४९॥ 
तान्‌ दष्रा भगवान्‌ ष्णो महायोगेश्वरेशवरः 
सहस्रादित्यसंकारं खचक्र प्राहिणोत्‌ पुरः ॥५०॥। 


तसः सुघोरं गहनं कृतं महद्‌ 
विदारयद्‌ भूरितरेण रोचिषा 
मनोजवं निविंचि्चे सुदर्शनं 
गुणच्युतो राम्रो यथा चमूः ।५१॥ 
दारेण चक्रालुपथेन तत्तमः- 


प्रं प्रं ज्योतिरनन्तपारम्‌ 1 
पमरचुवानं प्रसमीक्ष्य फाद्युनः 

प्रताडिताक्षोऽपिदघेऽक्षिणी उमे ॥५२ 
तत्‌ः प्रविष्टः सलिकं नभषता 









बरीयसंजद्‌व्रहदूमिभूषणम्‌ । 
त॒त्राद्धुतं ये भवन द्युमत्तमं 
प्राजन्मणिस्तस्भसदहस्श्चोभितम्‌ ।॥५३॥ 













 तसिन्‌ महाभीममनन्तमद्धुतं 
सहस्रमधन्यफणामणिद्युभि 


अ = धू 





क्न 
क च 
१ + क्कि छ ध 
ि ^ ननु = ~ > 94 ` 
च 2. | न = १ थ न न ^ 
॥ ना 1 ~-~ ॐ 1 
६ 1 ह ~ कि ध) अ 


धः ५ दध %' 1 > $ 
ऋ) क 5 न 
[1 ॐ क== [व 7. 
क, ` धि च क 


~ = 


॥ ~ भ्रमद्धागवत [ भर ८९ 
| विभ्राजमानं दियुणोस्बणेक्षणं सिरमे दो-दो नेत्र थे ओर वे बड़े ही भयंकर थे। 
सिताचलाभं शितिकण्टंजिहम्‌ ॥५४।। | उनका सम्पूण शरीर कैवसके समान इवैतवणेका था 


आर गखा तधा जीभ 
द्दशं तद्धोगसुखासनं बिथ र जीभ नीले रंगकी धी ॥ ५४॥ 
| पराक्षित्‌ । अजुनने देखा किं शोषभगवान्‌की सुखमयी 


। कशखुगाति  पत्तमात्तमम्‌ । | शण्यापर सर्वव्यापक महान्‌ प्रमावशाठी परम पुर्भोत्तम 
। सन्द्राम्बुदमि सापश्यङ्कव।सस | भगवान्‌ विराजमान हं | उनके रारीरकी कान्ति वर्षा 


प्रसनेवकच्त्रं रुचिरायतेक्षणम्‌ ॥५५]] | कालीन मेधकरे समान दयाम है | अव्यन्त घुन्दर पीत 





महामणिव्रातकिरीरङ्कण्डर- व्र धारण किये इए हैँ । मुलपर प्रसनता खेल रही 
म्रभापरिधिप्रसहसङ्गन्तरम्‌ | | ह अर बड़-तड़ नेत्र बहत ही सुहावन च्गते हं ॥ १ | 
‡ ध. बहुमूल्य मणिर्योसरे जटित मुकुट ओर कुण्डलछंकी कान्तिते 
$ ग्रलस्बच्‌तर यज = 
। ख सकसतुम सहला धुधराटी अक्कं चमक रही है । च्वी-ख्वी 
त्सक्म॒चनमाङ्या इतम्‌ ।।4६॥ | घुन्द्र आठ सुजा है; गचेमे कौस्तुममणि है; वक्षः- 
नन्दम्र दे © | ^ [थ ॐ. खे [) 
सुनन्द्नन्दम्रमुखः सखषाषद - | स्थल्पर्‌ श्रीवत्सा चिह दहै ओर धुधर्नोतक वनमाला 
शक्रादिभिमृर्तिधरेनिजायुधैः 1: | व्क री है ॥ ५६ ॥ अर्जुने देखा कि उनके नन्द- 
=-= सुनन्द आद्रि अपने पाषद, चक्र-सुदर्शन आदि अप 
पष्टया भिया की्यजयाविलद्धिभि- नि 1. ना. 
मूतिमान्‌ आयुध तथा पुष्टि, श्री) कीर्तिं ओर अजा-- 


निषेव्यमाणं परमेष्ठिनां पतिम्‌ ॥५७॥ | ये चात शक्तय एवं सम्पूर्णं ऋद्धियोँ ब्रह्मादि टोकपाछेके 
ववन्द आत्मानमनन्तमच्युतों अधीश्वर भगवानक्ती सेत्रा कर रही है || ५७ ॥ परीक्षित्‌ ! 
जिष्णु तदर्थनजातसाध्वसः । भगवान्‌ श्रीढरष्णने अपने ही खरूप श्रीअनन्त॒मगवान्‌को 
प्रणाम किया | अज्जुन उनके दशनसे कुछ भयभीत हो 
तावाह भूमा परमेष्ठिनां भ- गये थे; श्रीकृष्णके वाद्‌ उन्होने भी उनको प्रणाम किया 
बद्राञ्ञली स्षसितमर्जया गिरा ।1५८। | ओर वे दोनो हाथ जोड़कर खड हो गये | अव ब्रह्मादि 
रोकपाककरि खामी भूमा पुरुषने मुसकराते इए मधुर 

द्विजात्मजा मे युवयो दिद्चुणा | एवं गम्भीर व्राणीसे कहा--]५८॥ श्रीकृष्ण ! ओर 
= मयोपनीता अवि धर्मगुप्तये । | अजुन ! मैने तुम दोनो देखनेके लि ही ब्राह्मणक 
१ । वाकक अपने पाप्त मगा य्यिथे | तुम दोनोने धमकी 
कलावतीर्णाववनेभेरासुरान्‌ । रक्ाके व्यि मेरी कलाक साथ प्रय्वीपर अवतार प्रहण 


किया है; `प्रथ्वीके भारश्प देत्योका संहार करके शीघ्र 
धतं | । 
इतवेद ९ मन्ति मे) (५ -रीघ्र त॒मखोग फिर मेरे पप लोट आओ ॥ ५९ ॥ 


प्रणंकरामावपि युवा न्रनररयणब्रुषा | तुम दोनों ऋष्रिवर नर ओर नरायण हो । यपि तुम 
पूणकाम ओर सवर्र हो, फिर भी जगतक्तीं स्थिति 


धर्ममाचरतां धित्ये ऋषभो लोकरसग्रहम्‌ ॥९०॥ | ओर लेके ल्मे धर्मक आचरण करोः ॥ ६० ॥ 
जव मगत्रान्‌ भूमा पुरुषने श्रीकृष्ण ओर अनक 
इत्यादिष्टौ भगवता तौ छृष्णी परमेष्ठिना । हस प्रकार अदेशा द्विया; तव उन लोगोनि उसे खीकार 


= | कटके उन्हे नमस्कार किा ओर बड़े आनन्दके साथ 


4 1 र ६२५ शाण व 
१. ण्ठश्रष्रणं । २. जं तमच्युतं । ३. घ चाह भूम्ना परण । ४. नौ) . क. 








शे 





अ० ९० ] | द्म स्छन्ध 








न्यवतेतां खकं धाम्‌ सम्परहष्टौ यथागतम्‌ । ये, उसीसे वैसे ही द्रारकामे छोट आये । ब्राह्मणकरे बाख्कं 
अपनी आयुके अनुसार बडे-वडे हो गये थे | उनका ` 


=) 


विप्राय ददतुः पुत्रान्‌ यथारूपं यथावयः ।६२॥। | स्प आर आहति वसी ही शी, जंसी उनके जन्मके 
| समय थी | उन्हं भगवान्‌ श्रङ्ृष्ण ओर अछ्नने उनके 


पिताको सोप दिया ॥ ६१-६२ ॥ मगवान्‌ वि्ुके उस 
, परमधामको देखकर अञ्नके आश्वयेकी सीमा न री । 
अनः य्‌ । उन्होने एसा अनुभव किया किं जीवम जो कुछ वक- 
यत्किचित्‌ पापं पसा मेने छृष्णातुकम्पतम्‌।(९२॥  प्रौरुष है, वह सव्र भगवान्‌ श्रीकृष्णकी ही कृपाका फल 
| है ॥ ६३ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवरानूने ओर भी रेसी अनेकों 
ै | ¢ रिपू लीव्यरपं लोकदष्िमें 
। इतीडशान्यनेकानि वीयाणीह प्रदशयन्‌ ।  देश्चयं ओर वीरतासे प टीत्एं कीं | खोकटृष्टिमं 
साधारण लोगोकिं समान सांसार्कि विषयोका भोग किया 
बु॒जे विषयान्‌ ग्राम्यानी ते चात्यूजितेमेखेः ॥६७)। | ओर वडे-वडे महाराजा्ओकि समान ब्रषठरेषठ यज्ञ॒ ` 
कयि ॥ ६४ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णने -आदङां महापुरु्षोका- 
प्रथवर्षीखिलान्‌ कामान्‌ प्रजासु ब्राह्मणादिषु \ । साः आचरण करते दए ब्राह्मण आदि समस्त प्रजावगेकिं 
सारे मनोरथ पूणं किये, टीक वैसे ही, जसे इन्र प्रजके 
व्यि समयानुसार वषा करते हैँ ॥ ६५ ॥ उन्ेनि 
बहुत-से अधर्मी राजार्ओको खयं मार डाला ओर वडतो- ` 
9 भ 2 दर | को अज्जुन आदिक द्वारा मरवा डा । इस प्रकार 
त्वा नृपानधेमिषठान्‌ घातयित्वाजुनादिभिः। | धर्मराज युधिष्ठिर आदि धार्भिक राजासि उन्होने ` 
। अनायास दी सारी पृथ्वीम धर्ममर्यादाकी स्थापना करा 
अज्ञसा वत॑यामास धम धमेसुतादिभिः ॥६६॥ । दी ॥ ६६ ॥ ्‌ 
----नय+न--- 

इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे 

द्िजकुमारानयनं नाम एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ 
~~: -->23 ~ -~------- ~ ~ ॐ 4 ५ ~+ 


अथ नवतितमोऽप्यायः 


भगवान्‌ छृष्णके खीखा-विहारका वणन 

श्रीद्युकदेवजी कहते ह--परीष्षित्‌ ! द्वारकानगरोकं) 
छटा अलोकिक थी । उसकी सडवे मद ते इए मत- 
वाले हाथियो, सुसन्ित योद्धाओं, घोड़ो ओर खणेमय 
रथोकी भीडसे सदा-सर्वदा। म | जिधर 
देखिये, उधर ही हरे  उपुत्रन ओर उान ख्हरा रहे 


च) 
# ॐ 


५ ##/ #। +#\।।॥# ५ क्ष 4 


निश्चाम्प वेष्णवं धाम पाथः परमदिसितः । 















यथाकाङं यथेवेन्द्र भगवज्छ्ेष्ठयमाखितः ॥६५॥ 







श्रीद्युक उवाच 








= सुखं खपुया निवसन्‌ द्वारकायां भियः पतिः 
 सर्बसंपतसमृद्धायां जष्टायां इृष्णिषृद्धवेः ॥ १॥ 
ल्लीभिशोत्तमवेषाभिर्नवयोबनकान्पिभिः । म 
"5 तीर - + है । पत-के्पौत दक्ष पसे रदे इए हे । उनपर 
कन्दुकः हि भेद्य घु क्रीडन ॥ द्दयुभिः।। २। । चैठक्‌ः ९ गुनगुना रहे 2. ९ त९८-तर्ट्न) 


१ 
ग्वगिक्क्यिकिककिकयेककणकोि 






+. 





=-= . । च 
-- 
==, 






अ ६९४ श्रीमद्भागवत [ अ० ९० 
। । नित्यं संलमागायां मदचु्धिर्ङ्लैः 


खलंकृतेभटेरखे रथैश्च कनकोञ्ञ्वङेः ॥ ३ । 














कलरव कर रहे हैँ । वह नगरी सव प्रकारकी सम्पत्तियोसे 
भरपूर थी । जगतके श्रेष्ठ वीर यदुवंशी उसका सेवन 
करनेमे अपना सोभाग्य मानते ये । वर्हकी लिया सुन्दर 
वेष-भूषासे विभूषित शीं ओर उनके अद्ग-अङ् 
जवानीकी छटा छिटकती रहती थी । वे जव अपने 
महम गेंद आदिके खे खेलतीं ओर उनका कोई अङ्ग 
कभी दीख जाता तो रेसा जान पड़ता, मानो व्रिजी चमक 
रही है । लक्ष्मीपति भगवानूकी यदी अपनी नगरी द्वारका 
थी । इसीमे वे निवास करते थे | भगवान्‌ श्रीकृष्ण 
सोलह हजारसे अधिक पल्नियोके एकमात्र प्राणवल्लम 
थे | उन पल्नियोके अल्ग-अच्गण मह भी परम रेश्र्थसे 
सम्पन्न थे | जितनी पत्नियों थी, उतने दी अद्धत ख्प 
धारण करके वे उनके साथ व्रिहार्‌ करते ये ॥ ९-*+ ॥ 
सभी पत्नियोके महलोमे खुन्दर-खुन्दर सरोवर ये | 
उनका निमंरु जठ चिल हए नीले, पीठे, सेत, खाख 
आदि मति-ोतिके कमलके परागसे मंहकता रहता था | 
उनमें श्चड-केछंड हंस, सारस आदि सुन्दर-खन्दर 
पक्षी चहकते रहते थे । भगवान्‌ श्रीकृष्ण उन जलारायोमें 
तथा कभी-कभी नदियोके जम भी प्रवेश कर 
अपनी पत्नियोके साथ जलविहार करते थे | भगवानके 
साथ विहार करनेवाटी पलियां जत्र॒उन्हं अपने भुज- 
पारमे वेध लेती, आलिङ्गन करतीं, तत्र॒ भगवानूके 
श्रीअङ्खोमे उनके वक्षःस्थव्की केसर चग जाती 
थी ॥ ६-७ | उस समय गन्धव उनके यदाका गान करने 
ख्गते ` ओर सूत; मागध एवं वंदीजन बड़े आनन्दसे मृदङ्ग, 
दोक) नगारे ओर वीणा आदि वाजे वजाने च्गते ॥ ८ ॥ 
भगवान्‌की पलिर्याँ कभी-कभी हंसते-हंसते पिच- 
कारियोसे उन भिगो देती थीं| वे भी उनको तर कर 
देते । इस प्रका भगवान्‌ अपनी पल्नियोके साथ क्रीडा 
करते; मानो यक्षराज कुबेर यक्षिणियोके साथ विहार कर 
षे हों ॥ ९ ॥ उस समय भगवानूकी पलियेके वक्षः- 
स्थल ओर जंघा आदि अङ्ग वल्लोके भीग जनेके कारण 


उनमेसे ्रल्कने ठगते | उनकी बड़ी-बड़ी चोधियों ओर 


ज्म धे इए शक गिरने कगते, वे उन भिगोते 


४ गी 


उचानोपवनाद्यायां पुष्पितद्वुमराजिषु 





|  निविशद्मृङ्गविहगेनादितायां समन्ततः ॥ ४। 


रेमे पोडशसादस्रपत्गीनामेकवबल्लभः । 


„1, ॥ ~ 
* 


तावद्विचित्ररूपोऽसौ तद्गरहेषु महद्विषु ॥ ५॥ 


१ ष्का किं ऋ 
१. कष 


 ॥ बत्फलोत्पलकहरङषुदाम्भोजरेण॒भिः । 
( बासितामलतोयेषुशजदद्विजङककेषु च ॥ ६॥ 


विजहार विगाह्याम्भो हदिनीषु महोदयः । 





कचङ्ङमिपाङ्गः परिरन्धश्च योषिताभ्‌ ॥ ७॥ 












उपगीयमानो गन्धधुदङ्गपणवोनकान्‌ । 


के 


बादयद्धिखदा वीणां हतमागधवन्दिभिः ॥ ८ ॥ 


न 
त 


पिच्यमानोऽच्युतस्तामिर्सन्तीभिः स रेचकैः । 


 ्रतिषिशन्‌ विचिक्रीडे पक्षीभिर्यक्षराडिव ॥ ९॥ 


जैः 


ताः दिनवखविव्रवोरुङचप्रदेशाः 


न 
४ 
च ^ 


सञ्चन्त्य उद्धरतच्हत्कमरप्रघ्नाः 
17101 * क 








ग्रययककणकाकष्यात्याष्यष्य्काक्यनकाकण्कष्यकागणग्याष्यााययगयगापकयययकाषकाययाययकययकागययरगगयानकाय्यायगययययाायनाय नया निरी 
त ए वि त 1 स त 1 2 1 1 त 1 क अयो क "सभय -भियकज्क तकनक 








कान्तं स॒ रेचकजिहीरषयोपगुद्य मिगोते पिचकारी छीन लेनेके व्यि उनके पास पैव ` 
ह त ओर इसी = अपने (५ ना द द 
तित (० छेतीं । उनके स्पर्श॑से प्रतनियोकरे दयम प्रेम-भाव 

जातसरात्सवरसद्रदना वषिरेज्ः ।१०॥) अभिन्रद्धि दो जाती, जिप्से उनका मुखकमल चिद 
उठता । एेसे अवद्रोपर उनकी शोभा ओर भी वद्‌ 
जाया करती ॥१ ०॥ उस समय भगवान्‌. श्रीङ्गष्णकरी वन- 
माला उन रानि्योके वक्षःदव्पर्‌ ठगी इई केसरके रगसे 
क्रीडाभिषङ्गधुतङ्कन्तटश्चन्दवन्धः रग जाती । विडारमें अत्यन्त मग्न हो जानेके कारण रधँषराी 
अलके उन्मुक्त भावसे क्हराने खगतीं । वे अपनी 
रानियोको वार-वार भिगो देते ओर रानियां भी उन्हें 
सरावोर कर ॒देतीं । भगवान्‌ श्री्रव्ण उनके साथ इस 
प्रकार विहार करते, मानो कोई गजराज हथिनि्यसे 
धिरकर उनके साथ क्रीडा कर रहा हो॥ ११॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर उनकी पल्निर्याँ करडा करनेके वादः 
क = अपने-अपने वच्राभूषण उतारकर उन नयो ओर नतकियो- 
नटानां नतेकोना च गीतवायोपजीबिनाम्‌ \ क्रो दे देते; जिनकी जीविका केव्रकु गाना-बजाना ही 
है ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ इसी प्रकार उनके 
क्रीडा छंकारवासां सि इष्णोऽदात्तस्य च क्ियः।\१२)) | साथ विहार करते रहते । उनकी चाक्टाट, बातचीत, 
चितवन-मुसकान, हास-विखस ओर आलिङ्गन आदिसे 
कृष्णस्वैवं निरतो गत्यालापेशितक्धतैः । रानिर्योकी चित्ततत उन्हीकी ओर सची रहती । उन्हें 
ओर किंसी वातका स्मरण दी न होता ॥ १३॥ 
त 3 म्‌ परीक्षित्‌ ! रानियोके जीवन-सवख, उनके एकमात्र 
नम वेलिपरिष्वङ्कः स्रीणां किं हता धियः ॥ १२ | हृदयेश्वर मगत्रान्‌ श्रीकृष्ण ही थे । वे कमलनयन इयाम- . 
पुन्दरके चिन्तनमें ही इतनी मग्न हो जातीं कि क 
हन्देकधियोऽरि ~ देरतक तो चुप हो रहती ओर पिर उन्मत्तक समानं 
[21  उन्मत्तवसड। असम्बद्र॒ वाते कहने कगतीं । कभी-कभी तो भगवान 
। श्रीकृष्णकी उपस्थिति ही प्रेमोन्मादके कारण उनके 
चिन्तयन्त्योऽरविन्दाक्षं तानि मे गदतः शृणु १५॥ विरहका अनुभव करने क्गतीं ओर न जाने क्या-क्या 
कहने कगतीं । मै उनकी बात तुम्हे सुनाता दँ ॥१५॥ 
मंहिष्य ऊचुः रानिर्यो कहती-अरी कुररी ! अब तो बड़ी रात 
तररपसि लं वे हो गयी है । संसारम सवर ओर स॒नाटा छ गया है । 
ङररि विरुपसि स्वं बीतनिद्रा न शेषे देख, इस समय खयं भगवान्‌ अपना अखण्ड बोध 
च्पाकर सो रहे ह ओर तञ्च नीद ही नहीं आती 
तू इस तरह रात-रातमर जगकर विलाप क्यों कर रदी 


कृष्णस्तु तत्स्तनविपजञितङ्कङ्कमसरक्‌ 


सिश्वन्‌ युदयुवतिभिः प्रतिपिच्यमानो 


रेमे करेणुभिर्विभपतिः परीतः ॥११॥ 

























खपिति जगति रात्यामीश्वरो गुप्तबोधः। 


क्कः वयमिव सखि कचिद्‌ गाढनिर्भिचेता = | दै १ सखी । की कमलनयन मगवानूके मधुर हास्य 
ग्भ - ओर लीलाम्शी उदार ( सीकृतिपूचक 2 [क्ति ल पचक ) चितवनसे तेरा 


नहासोदारलीलेक्षितेन 
_ निननय षिते 
` १. केकि० | २. छ्िय ऊचु ॥ अ 
त 4. न 
ॐ #) + क शि [वि ॐ + => 4 + ^ 3 4 > 
९ = । दकम - 


# ् ष = 
। च. 4 चैन न 


भीमद्धागवत [` अ० ९० 



























नत्र निमीरयसि नक्तमद्ष्टबन्धु- | अरी चकवी | तूने रातके समय अपने नेत्र क्यों 
| वंद कर च्वि है १ क्या- तेरे पतिदेव क्वं विदेश चल 
गये हं कितु इस प्रकार कर्ण खरसे पुकार रदी है १ 
हाय-हाय | तत्र तो-तू बड़ी दुःखिनी है ।.परंतु हो-न- 
हो तेरे हदयमें भी हमारे दी समान भगवानकी दासी 
होनेका माव जग गया है | क्या अव तू. उनके चरणोपर 
३६. करवा सरजं स्ण्हयसे कबरेण बोदधम्‌ ॥१६।। चदायी हर पुष्पोकी माला अपनी चोमे धारण करना 
। चाहती है ! ॥ १६ ॥ 
भोभोः सदा निष्टनसे उदन्व- | अहो समुद्र ! तुम निरन्तर गरजते दी रहते हो | 
| तुम्हे नीद नहीं आती क्या १ जान पड़ता है तुम्हं सदा 
| न्नरन्धतिद्रोऽधिगतप्रजागरः .. जागते रहनेका रोग कग गया है । परंतु नदी-नहीं 
३ त: ¦ ॥ । हम समन्ञ गयी, हमारे प्यारे ध्यामसुन्दरने तुम्हारे धैव, . 
|| - वा सङ्खन्दापहूतात्मखञ्छनः गाम्भीर्यं आदि खाभाविक गण छीन य्य है । क्या इसीसे 


म्राप्रां दशां त्वं च गती दुरत्ययाम्‌ ॥१७\} तुम हमारे ही समान रेखी व्याधिके रिकार हो गये हो 
जिसकी कोई दवा नहीं है ?॥ १७ ॥ 





स्त्वं रोरवीपि करुणं बत चक्रवाकि । 


दास्यं गता वयमिदाच्युतपादजुषटं 





9 ॐ का » १ [ पे + "~ +. कि - 4२. ¦ ~. ~ 1 1 क 
त~ # ५, £ १, ५ * = + 
की, | । 2 


चन्द्रदेव | तुम्हे बहत बडा रोग राजयक्ष्मा हो गया 
है | इसीसे तुम इतने क्षीण हो रहे हो । अरे राम-राम, 
अव तुम अपनी किरणोसे अंधेरा भी नदीं हटा सक्ते ! 


ए „नि = क्या हमारी ही मति हमारे प्यारे स्यामघुन्दरकी मीदी- 
 कचिन्धुङ्कन्दगदितानि यथावयंत्वं ` र = 
॥ "धडा मीठी रहस्यकी बातें भूल जनेके कारण तुम्हारी बोलती 


विस्प्रत्य भाः खगितगीरूपर्क्ष्यसे नः 1१८1} , कद हो गथी है ? ञ्य उसकी चिन्तासे तम मौन दहो 


ह, रहे हो ॥ १८ ॥ 
 किन्वावरितिमसा।मिर्मल्यानिल तेऽग्रियम्‌ । मलयानिल ! हमने तेरा क्या व्रिगाडा है, जो त्‌ 
हमारे हृदयम कामक संचार कर रहा है १ अरे (त्‌ नही 
गोविन्दापाङ्कनिभिन्ने हृदीरयसि न; सरम्‌ ॥१९॥ | जानता क्या १ भगवानकी तिरछी चितवनसे हमारा 
॥ हदय तो पहलेसे ही घायल हो गय। हैः | १९ ॥ 
ध श्री्मस्त्रमसि दयितो यादवेन्द्र नलं | श्रीमन्‌ मेव ! तम्हारे शरीरका सन्य तो हमरे 
| प्रियतम-जैसा दी है । अवध्य ही त॒म यदुवंशरिरोमणि ` 
भगवानके परम प्यारे हयो | तभी तो त॒म हमारी ही 
वयमिव भवान्‌ भ्यायति प्रेमबद्धः। ` | भति प्रेमपारामे बेधकर ` उनका ध्यान कर रहे हो । 
देखो-देखो । तम्दारा हृदय चिन्तासे भर रहा है, तुम 
„| उनके स्यि अत्यन्त उत्कण्ठित द्यौ रदे हो { तमी तो 
बाटबार उनकी याद कटके हमारी ही मति 





(4 स्वं यक्ष्मणा बलबतासि गृहीत इन्दो 
, श्षीणस्तमो न निजदीधितिभिक्षिणोषि। 









१ क ;खदसत्मसङ्गः॥२०॥ 


। क + ह, ह 


ह+ ः द = ् । 


\ पि ग ~ 
का ` = +) 
7 ऋ ~ ~ 
व न = 


स क 








धारा बद्वा रहे हो 1 `द्यामघन । सचमुच घनदयामसे 


अ० ९० |] 





च्व 


प्रियरावपदानि भाषसे मृतः 








संजीविकयानय गिरा। 


करवाणि किमद्य ते प्रियं 


वद्‌ मे वरखितकण्ठ कोकिल ॥२१॥ | 


न चरसि न बदस्युदारबुदध 
क्षितिधर चिन्तयसे महान्तमथम्‌ । 


अपि बत वसुदेवनन्दनाङ्पि 


वयमिव क।मयसे स्तने विधतुम्‌ ॥२२॥ 


` शुष्यदृध्रदाः करिता बत सिन्धुपरन्यः 
सम्प्रत्यपास्तकमरभिय इष्टभतुः । 


यद्वद्‌ वयं मधुपतेः प्रणयावरोक 


दशम स्कन्ध 


६९७ 


री कोय ! तेरा गल वडा ही घुरीठा है, मीदी 
बोटी वोलनेवले हमारे प्राण-प्यारेके समान दही मधुर 
| खरसे तु वोल्ती है । सचमुच तेरी बोकीमें घुधा धोद 
| हई है, जो प्यारेके विरहसे मरे इण प्रेमिर्योको जिलने- 
वाटीदहै। त्‌ ही वत, इस समयहम तेरा क्या प्रिय 
१॥२१९॥ 
प्रिय पवेत | तुम तो वड उदार विचारक हो| 
| तुभनेदही प्रथ्ीको भी धारण कर्‌ रक्खादहै। न तुम 
दहिर्ते-डोत्ते हो ओर न कुछ कहते-घुनते हो । जान 
पड़ता है कि किसी बडी वातकी चिन्तामे मगन होरे 
| हो । ठीक है, ठीक दहै; हम समञ्च गयीं । त॒म हमारी 
ही मति चाहते हो किं अपने स्तनोके समान बहतसे 
दिखरोपर मै भी भगवान्‌ स्यामघुन्द्रके चरणकमक धारण 
करः | २२] 
समुद्रपत्नी नदियो | यह श्री छतु है । तुम्हारे 
| कुण्ड सूखे गये है । अव्र तुम्हारे अंदर खिले इए कमल 
| का सौन्दये नहीं दीखता । तुम बहुत दुत्ली-पतली हो 
| गयी हो | जान पड़ता है, जसे हम अपने ग्रियतमं 
| स्यामसुन्दरकी प्रेमभरी चितवन न पाकर अपना हृदय 
| खो वैटी हैँ ओर अत्यन्त दुबली-पतखी हो गयी है, वैसे 
ही त॒म भी मेधोके द्वारा अपने प्रियतम स॒मुद्रका जल न 





मप्राप्य सुष्टहृदयाः पुरुकरिताः ख।।२३॥ | पाकर रेसी दीन-दीन हो गयी हो ॥ २३ ॥ 


हंस खागतमाद्यतां पिब पयो ब्रूयङ्ग शौरेः कथां 


# 


कं वा नथरसोहदः सरति तं कसाद्‌ भजामो वयं 


भो० स सन २. ८८ 





दृतं त्वां लु विदाम कचिदजितः खस्त्यास्त उक्तं पुरा 


| हंसत! आओ, आओ! मठे आये, खागत है । 
| आस्तनपर वरै; छो, दूध पियो | प्रिय हंस ! श्याम- 
| घुन्द्रकी कोई बात तो सुनाओ । हम समञ्लती हँ किं 
। तुम उनके दूत हो । किंसीके वमे न होनेवाठे श्याम- 
| सुन्दर सकुराल तो हैन १ अरे भाई 1 उनकी मित्रता 
तो बड़ी अस्थिर है, श्षणमङ्घर है । एक बात तो 
बताओ, उन्होने हमसे कहा था किं तुम्हीं हमारी पर | 
प्रियतमा हो । क्या अव उन्हं यह बात याद है १ जाओ, 
जाओ; हम तुम्हारी अनुनय-विनय नीं खुनतीं | जब 
वे हमारी परवा नहीं करते, तो हम उनके पीठे क्यो 
मरं १ क्षुदके दूत ! हम उनके पास न जातीं । क्या ` 
कडा १ वे हमारी इच्छा पणं करनेके व्यि ही जाना ` 
चाहते हैँ, अच्छा ! तब उन्हं तो यहा बुख जना, 
हमसे बाते कराना; परंतु कड़ी लक्ष्मीको साथ न छे 


म 
#। 


# 


अम | वाः क = आ प क = क ॐ जो क === 











॥ २८ + - श्रीमद्भागवत [ अ० ९० 


छ्षोद्रालापय कामदं भ्रियते सेवेकनिष्ठा द्ियाम्‌ ।। , आना । तत्र क्या वे ल्देमीको छोडकर यँ नहीं आना 
| चाहते १ यह कैसी वात है? क्या चिरयोमें क्म ही 
| एक रेसी है जिनका भगवान्‌से अनन्य त्रम है १ क्या 


| 
| 


इतीद्दोन भवेन दृष्णे योगेश्वरेश्वरे । 
क्रियमाणेन माधव्यो लेभिरे परमां गतिम्‌ ॥२५५॥। 


श्रुतमात्रोऽपि यः सीणां प्रसद्याकपषंते मनः 


उरुगायोरुगीतो वा पर््यन्तीनां इतः पुनः ॥२६॥ 


या, सम्पयं चरन्‌ त्रम्णा पादसंवाहनादिभिः 


जगद्शुरं भरतुद्धया तासां किं वण्यते तपः ।२७\ 
एवं वेदोदितं धर्ममनुतिष्ठन्‌ सतां मतिः । 
' गृहं धर्माथंकमानां युहथादशेयत्‌ पदम्‌ ॥२८॥ 
 आखितस्य परं धमं ङृष्णस्य गृहमेधिनाम्‌ । 
। आसन्‌ षोडशसाहस्रं महिष्यश्च शताधिकम्‌ ।॥२९॥ 
तासां स्रीरत्नभूतारामष्टो याः प्रायुदाहृताः । 
रकरिमिणीभरलां राजसततपुत्राशवाुपवंशः ॥३०॥ 
4  एकेकसा दश दश दृष्णोऽ ज्ीजन दात्मजान्‌ । 
` ५ आत्मने भार्यां अमोघगतिरीश्वरः \।२१॥ 
` तेषाषदामवीर्याणामशटादश महारथाः 
|  "आसन्वुदारयश्स्तेषां नामानि मे ण॒ ॥२२॥ 
^ ्र्युम्नश्वानिरुद्ध् दीप्तिमान्‌ भाजुरेव च । 
क. मधुर्बहद्भालुधित्रभा्रैकोऽरुण ; ॥२२॥ 
पुष्करो  वेदबाहुथ श्रतदेवः सखुनन्दनः । ` 


(+ डः कविरन्यग्रोध प क, ३ 
चत्रबाहषिरूपश्च ध॒ धव च ।॥२४॥ 








+~ ह - +) 
"कन भि ~. > र ~ रि ~, 
क म ॥ 1 = ५ 
~ ~ = र ४ [8 न ग 
क + > ४ क वि ` त >, 


[व 


हमर्मेसे कोई एक भी वेसी नीह १॥ २४॥ 

परीक्षित्‌ | श्रीकृष्ण-पतियों थोगेश्रेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण- 
मे एसा ही अनन्य प्रेम-माव रखती थीं । इसीसे उन्होने 
परमपद प्राप्त किया ॥ २५ ॥ भगवान्‌ श्रीक्रृष्णकीं 
टील्ाएं अनेकों प्रकारसे अनेकों गीतोद्वारा गान की गयी 
हैं | वे इतनी मधुर, इतनी मनोहर है कि उनके सुनने- 
मात्रसे लियोका मन बलात्‌ उनकी ओर च जाता 
है । फिर जो लिया उन अपने नेत्रोंसे देखती थीं, उनके 
सम्बन्धमे तो कहना ही क्या है  ॥ २६ ॥ जिन बड- 
भागिनी ज्ियोंने जगदृगुरू भगवान्‌ श्रीक्ृष्णको अपना 
पति मानकर परम प्रेमसे उनके च्रणकमलोको सहव्यया, 
उन्ं नहटाया-धुकाया, चलिया-पिदाया, तरह-तरहसे 
उनकी सेवा की, उनकी तपस्याक्रा वणन तो भला किया 
ही कैसे जा सकता है ॥ २७ ॥ 

परीक्षित्‌ | भगवान्‌ श्रीकर सत्पुरुषोके एकमात्र 
आश्रय हैँ । उन्होने वेदोक्त धमका वार्‌-बार्‌ आचरण 
करके छोगोको यह वात दिष्टा दीकि घर्‌ ही धमं, 
अथं ओर काम--साधनका स्थान है।॥ २८1 इसी- 
य्ि वे गृहस्थोचित श्रेष्ठ धमका आश्रय टेकर व्यव्रहयार 
कर रहे थे। परीक्षित्‌ । मै तुमसे कह दी चुका 
कि उनकी रानिर्थोकी संख्या शी सोलह हजार एक सौ 
आठ ॥ २९ ॥ उन श्रेष्ठ च्ियोर्मेसे स्करिमिणी आदि आट 
पटरानियों ओर उनके पुत्रका तो सैं पहले ही क्रमसे 
वर्णन कर चुका हँ ॥ ३० ॥ उनके अतिरक्त भगवान्‌ 
श्रीकृष्णकी ओर जितनी पत्निया थी, उनसे भी प्रव्येकके 
दसु-दस पुत्र उत्पनन किये । यङ कोई आश्वयकी बात 
नहीं है; क्योकि भगवान्‌ सर्वशक्तिमान्‌ ओर सत्यसङ्कल्प 
है ॥ ३१ ॥ मगवानके परम पराक्रमी पुत्रम अठारह 
तो महारथी थे, जिनका यश॒ सारे जगत फैत्ग इ 
था | उनके नाम सुञ्से खुनो ॥ ३२ ॥ प्रद्युम्न, अनि- 
रुद, दीतिमान्‌, भाजु, साम्ब, मधु? बहद्धायु, चित्रभानु, 
डक, अरुण, पुष्कर, वेदबा, श्रतेन, खुनन्दनः चित्र 
बाट्‌, विरूप, कवि नौर त्यो ॥३२-२४ ॥ रजेन | 

कः, 


1 # 








। । 


। | अ० ९० | ` दशम स्कन्ध ६९९ “^ 





ााााानानानाााााा ना 








श्रीङृ्णके इन पुत्रम भी सवसे श्रेष्ठ रुविंमणी- 
नन्दन प्रदयुम्नजी थे | वे समी धणोमें अपने पिताके समान 
ही थे ॥ ३५ ॥ महारथी प्र्युम्नने स्क्मीकी 
कन्यासे अपना विवाह किया धा । उक्षीकरे गर्भसे 
अनिरुद्रजीका जन्म हआ । उनमें दस हजार हाथिर्योका 
वक था | ३६ || सुक्मीके दोहित्र अनिरुद्रजीने अपने 
नानाकी पोतीसे विवाह किया । उसके गर्भसे वन्रका 
जन्म हआ । त्राहमणोके शापसे पैदा इए मूञव्के द्वारा 
यदुवंराका नाड हो जनेपर एकमात्र वे ही क्च रहे 
थे | ३७ ॥ वज्के पुत्र हँ प्रतिवाह, प्रतिवाहुके 
सुबाहु, सुव्रादरके शान्तसेन ओर शान्तसेनके शतसेन । ३८॥ 


एतेपासपि राजेन्द्र॒ ततुजानां मधुद्धिषः । 














मरद्युम्न आसीत्‌ प्रथमः पित्रवद्‌ रुकिमणीयुतः ।२५॥ 
स॒ रकिसिणो द्हितरयुपयेमे महारथः । 


तखात्‌ उताऽ नरूद्राऽ्रनागाशुतवबखान्वतः\ २६) 





सं दष ङचमणः पत्रा दहन्रा जगह ततः 


१ गि 


वज्स्तस्याभवद्‌ यस्तु मासरदवञ्चे पितः ।२७॥ 
प्रतिबाहुरभूत्तसात्‌ सखुशाहुस्त ञ्च चात्मजः । 


सुबाहोः चान्तङेनोऽभृच्छतसेनस्त्‌ तत्सतः ॥३८॥ 


( 





न हताश च्‌ इङ जता अधना अबहम्रजाः । परीक्षित्‌ ! इस वंशम कोई भी पुरुष रेसा न इआ जो 
8 बटत-सी संतानवाव्म न हो तथा जो निर्धन, अल्पायु 
अस्पायुवोऽस्पवीयाश्च अव्रहमभ्याश्च जज्ञिरे 1३९ | ह. & = 4 < 
ओर अ्पशाक्ति हो । वे सभी ब्राह्मणोके भक्त थे ॥३९॥ 

यदुनशत्रह्लाना खा व्वख्यातकर्मणाम्‌ | परीक्षित्‌ | यदुवंशे रेसे-रेसे यशसी ओर पराक्रमी 


संख्या न शचयते कृतमपि व्पायुतेनप ।४०।॥ 
तिलः कोध्यः सदश्चाणामष्ाशीतिक्षतानि च । 
7सन्‌ यदुद्कखाचायाः इमाराामिति श्रुतम्‌ ॥४१॥ 
संख्यानं यादवानां कः रिष्यति महात्मनाम्‌ 
यत्रायुतानामयुतसक्षेणास्ते स॒ आहुकः ॥४२॥ 
देवायुशहवहता देतेया ये खदास्णाः | 
ते रोत्पन्ना मयुष्येषु प्रजा शा बनाधिरे ॥४३॥ 
तज्निग्रहाय हरिणा प्रोक्ता देवा यदोः ङे | 
अधतीणः इर्षतं तेपामेकाधिकं॑चप ॥४५॥ 
देषां माणं भगवान्‌ म्रुत्वेनाभवद्धरिः । 
ये चादुवर्तिनस्तस्य वबुः सवंथादवाः ॥७५॥ 


शथ्यासनाटनालापक्रीडास्नानादिकर्भसु । 





पुरुष इए है,. जिनकी गिनती भी हजारो वमिं प्री 
नहीं हो सकती ॥ ४० ॥ मेने एसा घना है किं यदुर्ंशके 


बाल्कोको रिक्षा देनेके ल्य तीन करोड अटसी खख 
आचायं ये ॥ ४१ ॥ पेसी सतिम महात्मा यदुवरियोकीं 
संघ्या तो वतायी ही कैसे जा सकती है । खयं महाराज 
उग्रसेनके साथ एक नील ८ १००००००००००००० ) 
क कगभग सनक रहत थ॥ ५२॥ 


परीक्षित्‌ । प्राचीन कालम देवापुर-कम्रामके समय 
बहुत-से भयंकर अघुर मारे ग्ये ये 1 वे ही मनुष्योमे 
उत्पन इए ओर बड़े धमंडसे जनताको सताने त्मो।४३॥ ` 
उनका दमन करनेके ल्य मगवानूकी आज्ञासे देवताओनि _ 
दी यदुवंशामे अवतार ल्या था] परीक्षित्‌ । उनके ` 
कुत्करंकी सद्या एक सो एक थी 1 ४ ॥ वे सव भगवान्‌ ~ 
श्रीकृष्णको ही अपना खामी एवं आदश मानते थे । 
जो यदुवंशी उनके अनुयायी थे, उनकी सव्र प्रकारसे 
उन्नति इई ॥ ४५ ॥ यदुवंरियोका चित्त इस प्रकार 
मगवान्‌ श्रीकृष्णमे लगा रहता था किं उन्हे ६१ सोनेजैव्ने, ` 
ूमने-किरन, वोन-खेखने ओर नहानेधोने आदि कामे 


+ ६ [> 





प ७०० श्रीमद्भागवत [ अ० ९० 
ठः = -___----------------------_-_--_---_--~-~--~-~-_-~-~-~-~-~-~~-~-~-~-]-~-~-~-~-~-~-~-~-~~~~~-~-~-~~~ ~ = -------------- 








| न्‌ विदुः सन्तमात्मानं इष्णयः कृष्णचेतसः ॥४६। | अपने शरीरकी भी सुधि न रहती थी । वे जानते ही न 
थे किं हमारा शरीर क्या कर रहा है | उनकी समस्त 
राीरिक क्रियाएु यन्त्रकी भोति अपने-आप होती रहती 
थीं | ४६ ॥ 

` तीथं चक्र नृपोनं यदजनि यदु न ॥ 

“ च परीक्षित्‌ ! भगत्रान्‌का चरणधोषन गङ्गाजी अवद्य 
ही समस्त तीर्थम महान्‌ एवं पवित्र हैँ | परंतु जव 
खयं परमतीधंखख्प भगवानने दही यदुवंदाम अवतार 
विदि 8 प्रहण किया, तवर तो गङ्गाजल्की महिमा अपने-आप ही 

यूर्निग्धाः खरूपं युरजितपरा उनके सुयशातीर्थकी अपेक्षा कम दहो गयी | भगवान्‌के 
सखरूपकी यह कितनी बड़ी महिमा है किं उनसे प्रेम 
| श्रीयदर्थेऽन्ययत्नः । करनेवाले भक्त ओर देप करनेवाठे रात्र दोनों ही उनके 

। खरूपको प्राप्त हृए । जिस लश्ष्मीको प्राप्त करनेके व्ये 

बड़े-बड़े देवता यत्न करते रहते है, वे ही भगवान्‌की 

सेवा नित्य-निरन्तर ट्गी रहती हैँ । भगवान्‌का नाम 
एक वार्‌ सुनने अथवा उच्चारण कनेसे ही सारे अमङ्खच्येको 


खःसरित्पादश्चोचं 


यन्नामामङ्कलष्नं श्वुतमथ गदितं 


ष = ¢ 
यत्ता गत्रधमः नष्ट कर देता है | ऋषि्योके वंशजोमिं जितने भी धमं 
प्रचलित है, सवके संस्थापक भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही हैँ | 
कृष्णस्यैतन्न चित्रं क्षितिभरहरणं वे अपने हाथमे कालरूप चक्र दिये रहते हैँ । परीक्षित्‌ ! 


ठेसी स्थितिमें वे प्रथ्वीका भार उतार देते है, यह कौन 
बडी बात है ॥ 9७ | भगवान्‌ श्रीकृष्ण दही समस्त 
जीवोके आश्रयस्थान हैँ । यद्यपि वे सदा-सर्वदा सवत्र 
उपस्थित ही रहते है, फिर भी कहनेके च्य उन्होने 


काटचक्रायुधसख 1) ४७ 


जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो देवकी जीके गरभसे जन्म लिया है । यदुवंशी वीर पाषेदोके 

खूप उनकी सेवा करते रहते हैँ । उन्होने अपने 

यदुवरपर्षत्सवेदोभिरस्यनधरमम्‌ । भुजवल्ते अधर्मका अन्त कर दिया है । परीक्षित्‌ ! 

भगवरान्‌ खभावरसे ही चराचर जगत्‌का दुःख मियाते 

स्थिरचरब्रजिनघ्नः सुसितश्री्टखेन रहते हैँ । उनका मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त सुन्दर 


मुखारवरिन्द त्रजवाप्तियों ओर पुरल्ियोके हृदये प्रेम-भाव्रका 
सश्चार करता रहत। है । वास्तवमे सारे जगतपर बही 
विजयी है | उन्हीकी जय हो! जयदो! ॥ ४८॥ 

इत्थं परख निजवत्मरिरक्षयाऽऽत्त- परीक्षित्‌ ! प्रकृतिसे अतीत प्रमातमान अषने द्वारा 
र स्ापित धर्म-मर्यादाकी रश्चाके ल्व दिव्य टीटा-रारीर 
रहण किया ओर उसके अदुरूप अनेकों अदूमुत 
चसिोका अभिनय किया । उनकी एक-एक कमं स्मरण 


व्रजपुरवनितानां व्यन्‌ कामदेवम्‌ ॥४८।। 


7 


कः लीलातनोस्तदनुरूपविडम्बनानि । 
ऋ ५ 


_ „^ न 


। 
। 
। 


अ० ९० ] दश्चम स्कन्ध ७०१ 





कर्माणि क्मकपणानि यदुत्तमख्य | करनेवासके कमवन्धनको काट डलनेवाख दहै । जो 
3 | यदुवंशरिरोमणि भगवान्‌ श्रीढृ्णके चरणकमलोकी 

। सेवाका अधिकार प्राप्त करना चाहे, उसे उनकी टीकओं- 
| का ही श्रवण करना चाहिये ॥ ४९ ॥ परीक्षित्‌ | जब्र 
५ | मनुष्य प्रतिक्षण भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मनोद्ारिणी टीख- 
मस्यंस्तपानु सवमेधितया युङ्कन्द- | कयार्ओका अधिकाधिक श्रवण, कीर्तन ओर चिन्तन 
| करने चता है, तव उसकी यही भक्तिं उसे भगवान्‌के 
, परमधाममे पर्हचा देती है । यदपि काल्की गतिके परे 
| पूर्हुच जाना बहुत ही कठिन है, परतु भगवान्‌के धाममे 
। काख्की दाक नहीं गलती | वह वर्हातक्र पर्हच ही नहीं 
तद्धाम दस्तरङृतान्तजवापवगं | प्राता । उसी धामकी प्रापतिके ल्य अनेक सृन्रा्ोनि 
। अपना राजपाट छोडकर तपस्या करनेके उदेश्यसे जगल्की 

| यात्रा की है । इसल्ये मनुष्यको उनकी टी्य-कथाका 

ग्रामाद्‌ बनं क्षितिथ्चुजोऽपि ययुयंदथः।\५०। । ही श्रवण करना चादिये ॥ ५० ॥ 


- ---~-<ञ० 2८ -- 


भ्रृषाद मभ्य पदयारवुडृत्तिमिच्डन्‌ ॥४९॥। 


श्रीमत्कथाश्रवणकीतनचिन्तयेति । 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टाद शसाहस्रधां पारमहंस्यां 
संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धं श्रीकृष्णचरितानु- 
वर्णनं नाम॒ नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥ 





इति दशमस्कन्धोत्तराधेः सम्पूण 
~~ 
श्रीङष्णापेणमस्त्‌ 








„ , \ . ^~ ~ न) न ग ~) 9 
कु १. # =-4 |] ५ 


 । 





चै 


7 
(€> (क 13) 
१. *४ ऋ 
1 


श्रीराधाक्रप्णाभ्यां नसः 


प्ीमद्भागवतष्हापुराणस्‌ 


एकदा स्व्छर; 


टः ॐ त क ॐ न्नव च्छ * नन्द ~ + 
~ = च्छ (स 
(& (स 54.40 | + + {र 
> 9 ५९ = न~ 1.1. ++ (८ (९ प ^ 4 
स ८ ८.८. भद 
(१ २ -५ गे = चि क, ॥ --* 
र 2 न ‡ ५६ -> 
१ श्र | 1 +^ द, 

44 रः ४ [2 ^ 24 * .१ 

५4१८ | कैन # ॐ ह 9, 
(=> & 3 ^) (3 


0352: ` + 
॥ > (+ ५. 


निरस्तनिखिणाज्ञानं ज्ञानाज्ञानविलक्षणम्‌ । 
पूणौनन्द्‌ं किमपि तन्नीररतनमहं भजे ॥ 








4 ०. ` ~ , 4 क क ~ 






ॐ नमी भगवते वासुदेवाय 


श्रीसदद्धागवतमहापुराणम्‌ 


मीय 


एकाद; स्कन्धाः क 


अथ प्रथमोऽध्यायः 

यदुवंद्को षियोका शाप 
श्रीवाद्रायणिद्वाच व्यासनन्दन भगवान्‌ श्रीञयुकदेवजी कहते है-- 
परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्णने बवख्रामजी तथा अन्य 
यदुवंशियोके साथ मिलकर बहृत-से दैव्योका संहार 
थुबोऽवतारयद्‌ भारं जदं जनयन्‌ कलिम्‌ ॥ १ ॥ किया तथा कौर ओर पाण्डवम भी शीघ्र मार-काट 
४ मचनेवाटा अत्यन्त प्रवर ककड उत्न करके पृथ्वीका 
य कपत; वर्ह पाण्डुता; सपल- मार उतार दिया ॥ १॥ कौसेनि कपयप्रणं जूएसे, ` 
¢ तहे ह ~ क ~ त्रे मा नोँसे तश्रा प्रदीकरे वे रा खींचने ने - 
ुर्यतदेरनकचग्रहणादिभिलान्‌ । तरह-तगहके अपमा र तथा द्रौ क = 
# आदि अव्याचारोसे पाण्डबोको अच्यन्त क्रोधित कर दिया 
करत्वा निमित्तमितरेतरतः समेतान्‌ था | उन्डीं पाण्डंको निमित्त वनाकर्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णे 
दोनो पक्षोमे एकत्र इए राजा्ओंको मसा डाला ओर 
हत्वा षान्‌ [नर रत्‌ क्ितभरमा ॥ ॥ २ ॥ ॥ उस प्रकार पुथ्वाका भार हत्वा कर दया ॥ ९ ॥ । 


भूभारराजप्रतना यहुभिनिरसख अपने वाहूवकसे सुरक्षित यदुवंदियोके द्वारा रके ॥ 
भार--राजा ओर उनकी सेनाका विनाश करके, प्रार्णो- 
गुरः खबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः । के द्वारा ज्ञानके विषय न होनेवाञे भगवान्‌ श्रीकृष्णने ` 
विचार किया किं लोकटष्टिसे प्रथ्वीका भार दूर हो 
जनेपर भी वस्तुतः मेरी दष्टिसे अभीतक दूर नद्यं इआ 
हः यद्‌ यादवं इमो. अविषद्यमास्ते ॥ २ ॥ | क्योकि जिसपर कोई विजय नीं प्राप्त कर सकता बह्‌ | 
4 यदुवंश अभी पृध्वीपर बिमान है ॥२॥ यह यदुवंश मेरे ` 
>+ नेबान्यतः परस्मिवोऽख भवेत्‌ कथशि- आश्रित है ओर हाथी, घोडे, जनबल, धनबल आदिं 
। विशाल वैभवके कारण उच्छर्लल हो रहा है । अन्य 
 स्मत्सश्रयसख विभवोनहनख नित्यम्‌ । | किसी देवता आदिसे भी इसकी किसी प्रकार पराजय 
नहीं हो : कत्‌। । बोसकै वनम परस्पर संधेसे उत्प 

ग्निके समान इस यदुवंशामं भी परस्पर कठ्ह खडा 
स्तम्बस्य वह्धिमिव शान्तिषपेमि धाम ॥ ४ करके शान्ति प्राप्त कर सकंगा ओर इसके बाद अपने 





दत्वा दत्यत्रध दरष्ण्‌ः सरसा यदुमिटरतः) 





















मन्येऽनेने्ु गतोऽप्यगतं हि भारं 








क ह 
क क कद की 
8 1 








१: . €+ 


अन्त विधाय वेणु 





# भ == ~ 


भका सव सज २, ८२. 
अर स्र लम २. ८९- 


` जन्व्बदक्रक = 











`" कः ` 
७०६ श्रीमद्धागवत | अ० १ 
एव व्यवसितो राजच्‌ सत्यसङइल्प इश्वर ६ | , धाममें जागा | % ॥ राजन्‌ । भगवान्‌ सवशक्तिमान्‌ 


| ओर सत्यसंकल्प हैँ । उन्होने इस प्रकार अपने मनमें 
निश्चय करके ब्राह्मणोके शापकरे बहाने अपने ही वंशका 
ः ~ _ ५ ५ 3 (= | सहार कर डाला, सवको समेटकर अपने धाममे ठे 
शापव्याजेन बिभ्राणां सजहे खङ्लं विथः ॥ ५॥ ' गये ॥ ५॥ परित्‌! भगवानुत वह मूति तरियेकीके 
सोन्दयका तिरस्कार करनेत्राटी थी । उन्होने अपनी 
द नाल सोन्दये-माधुरीसे सवक्रे नेत्र अपनी ओर आकर्षित कर 
त्या सोकलावण्य निगुक्त्या रोचनं चणम्‌ । व्यि थे | उनकी वाणी, उनके उपदेश परम मधुर, 
दिव्यातिदिव्य थे | उनके द्वारा उन्द स्मरण करनेवातमरके 
चित्त उन्होने छीन चये थे | उनके चरणकमछ त्रिलोक- 
गीभिस्ताः सरतां चित्तं पदेस्तानीश्षतां क्रियाः ॥ ६ ॥ छन्दर थ । जिसने उनके एक चरणचिहका भी दशन 
कर ल्या, उसकी विर्मुखता दूर्‌ भाग गयी, वह कर्म 
प्रपञ्चसे ऊपर उठकर उन्हीकी सवाम ठग गया | 
य ~ | उन्होने अनायास ही प््वीम अपनी कीरतिका विततार 
आच्छिद्य कीति सुशछोकां वितत्य ह्यञ्जसा जु को } | कर्‌ दिया, निका वङ्-बड़ सुकाविोनि बडी ही सन्दर 
माषामें वणन क्रिया है । वह इसष्ि कि मेरे चे 
- जानेके वाद्‌ गोग मेरी इस १ गान, श्रवण ओर स्मरण 
~र ला च श्रः करके इस अज्ञानरूप अन्धकारसे सुगमतया पार्‌ हो जार्यगे | 
तमोऽनया तरिष्यन्तीसयगात्‌ खं पदमीश्वरः ॥ ७ ॥ इसके वाद परमेशर्यशाटी भगवान्‌ श्रीकृष्णे अपने 
धामको प्रयाण किया ॥ ६-७ ॥ 
राजा परीश्चित्‌ने परूा-मगव्रन्‌ ! यदुवंशी वड़े 
[व ब्राह्मणभक्त थे । उनम वड़ी उदारता भी धी ओर वे 
ब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्य व्द्धापसेवेनाम्‌ । अपने कुंखवृद्धोकी नित्य-निरन्तर सेवा करनेवाठे ये । 
सवसे बड़ी वात तो यह थी किं उनका चित्त 
| भगवान्‌ श्रीकृष्णे लगा रहता था; फिर उनसे ब्राह्मणोका 
। + विश्रशापः कथमभूद्‌ शष्णीनां कृष्णचेतसाम्‌ ॥ ८ । अपराध कैसे बन गया १ ओर क्यो ब्राहमणोने उन्हे शाप 
> दिया १॥८॥ मगवान्‌के परम ्रेभी विप्रवर ! उस शापका 
, ~ सक - = ग 6 कारणक्या था तथा क्या खख्प था ! समस्त यदु- 
अनिमित्तः स वे शापो यादृशां दविजसत्तम । वंशिर्योके आता, खामी ओर प्रियतम एकमात्र भगवान्‌ 
दः श्रीकृष्ण ही थे; फिर उनमें ट वैसे इई १ दूसरी टष्टिसे 
ई १ खं तो वे सव ऋषि अद्वेतदशौं ये, फिर उनको एसी 
 कथमेकात्मनां भेद एतत्‌ सवं बदशच मे ॥ ९ ॥ | मेददृष्टि कैसे इई १ यह सव भप कृपा करके सुच 
=: । नतलाहये ॥ ९ ॥ 
श्रीघ्रुक उवाच | धरीश्यकदेवजीने कदा--भगवान्‌ श्रीकृग्णने वह्‌ 
ल) शारीर धारण करके जिसमे समपूण सुन्दर पदार्थोका 
। सनिवेख था ८ नेत्रोमे गगनयन, कन्धोमं सिदस्कन्ध, 


& करोमे करिकर, चरणोमिं कमक आदिका विन्यास था । ) 
क्मीचरन्‌ चवि समद्गरमा्तकाम्‌ः। = | परष्वम मङ्गल्य कल्याणकाती कर्मका भाचरण किा । 





१" ® नके कनेक (क 7 क 
क" ^ ` 9 > 9, # त* 
कि +. 


राजोवाच 


























वे पू्णकाम ग्रमु द्रारकाधाममे रहकर क्रीडा कते रहे ` 
ओर उन्होने अपनी उदार कीर्तिकी स्थापना की। ` 
( जो कीतिं खयं अपने आश्रय तक्का दान कर स्के 
वह उदार है | ) अन्तर्मे श्रीदरिने अपने कुचे संहार 
उपसंहारकी इच्छा की; क्योकि अव पृथ्वीका भार उतरनेमे 
इतना ही कायं रोष रह गया या ॥१०॥ भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने रेसे परम मङ्गलमय ओर पुण्यप्रापक कर्म 
किये, जिनका गान करनेवाठे गकि सारे कटिमठ 
नष्ट दहो जाते हैँ | अत्र॒ मगान्‌ श्रीकृष्ण महाराज 
उग्रसेनकी राजधानी द्रारकापुरीमे वदुदेवजीके घर यादवो 
का संहार करनेके व्यि कालष्पसे ही निवास कर 
रहे थे । उस समय उनके बिदा कर देनेपर--वरिश्चामित्र, 
असित, कण्व, दुर्वासा, शगु, अङ्गिर, करयप, वामदेव, 
अत्रि, वसिष्ठ ओर नारद आदि वडे-वडे ऋषि द्रारकके 
पास ही पिण्डारकक्षेत्रमे जाकर निवास करने खगे 
थे ॥ ११-१२ ॥ ^ 
एक दिन यदुवंशके कुछ उदण्ड कुमार खेठते-खेलते 
उनके पास जा निकटे | उन्हाँने वबनावदी नम्रतासे 
उनके चरर्णोमें प्रणाम करके प्रजन किया ॥ १२॥ 
वे जाम्बवतीनन्दन साम्बको खीके वेषमे सजाकर ठऊेग्ये ` 
ओर कहने लगे, श्रादमणो ! यह कजरारी ओंँोवाटी ` 
घुन्दरी गर्भवती है । यह आपसे एक वात पूना चाहती 
हे । परत खयं परछनेमे सङुचाती है । आपोगोका ज्ञान ` 
अमोघ--अचाध दहै, आप सुव्रज्न हैँ | इसे पुत्रकी बड़ी 
लल्सा है ओर अब प्रस्वका समय निकट आ 
गया | आपरोग बताये, यह॒ कन्या जनेगी या 
पुत्र ¢ ॥ १४-१५ ॥ परीक्षित्‌ ! जवर उन कुभारोनि श्य 
प्रकार उन ऋषि-सुनिर्योको घरोखा देना चाहा, तब 
म^वघ्मरेरणासे क्रोधित हो उठे । उन्होने कडा--मूर्खो । 
यह एक एेसा मूसल पैदा करेगी, जो तुम्हारे कुल्का 
नारा करनेवाला होगा 11१६] सुनि्योकी यह बात घुनकर 
वे वाक वहत ही डर गये | उन्होने तुरंत साम्बका 
पेट खोलकर देखा तो सचपुच उसमे एक लेका 
मूसक मिक ॥ १७ ॥ तो वे प्रताने क्म आर्‌ 
क कृतं मन्दभाग्यनेः किं वदिष्यन्ति नो जनाः। कने क है । देखो, हमव्ेगेनि 


आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्तिः 
संहतुमेच्छत छं स्थितकृत्यशेषः ॥१०॥ 
कमीणि पुण्यनिवहानि सुमङ्गलानि 
गायज्ञगत्कलिमलपहराणि इत्वा । 
कालात्मना निवसता यदुदेवगेहे 
पिण्डारकं समगयत्‌ सुनयो निष्ठाः ।११॥ 
विश्वामित्रोऽसितः फष्बो दुर्वासा भृधुरङ्कि0ः 
कश्यपो वामदैवोऽत्रिर्बसिष्ठो यारदादयः ॥१२ 
क्रीडन्तस्तानुपव्ज्य मारा यदुनन्दनाः । 
उपसंगृह्य पग्रच्छुरषिनीता विनीतवत्‌ ॥\१३॥ 
ते वेषयित्वा खीवेषेः साम्बं जाम्बवतीसुतम्‌ । 
एषा पृच्छति वो विप्रा अन्तवैलन्यक्ितेक्षणा \१४। 
प्रष्टुं विरज्ञती साक्षात्‌ प्रनूतामोषदर्शनाः । 


प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा खित्‌ सञ्जनयिष्यति ॥१५॥ 









एवं प्रङञ्धा युनयस्तान्‌चुः पिता द्रप) 












जनयिष्यति वों मन्दा खरं इरनाक्षनम्‌ ॥१६॥ 







तच्छत्वा तेऽति्न्तरस्ता विच्य सहसोदरम्‌ । 


ह~ 
~ चव) न दुः 


| 4 श, - 
` साम्बख दद्शुस्तखिन्‌ मुखरं खल्वयखयम्‌ ॥१७] 


१ चं 





यायाय ~ 
क #` $ 


१, खस्वयामयम्‌ । 


ज~ सङक+ कु, 
[न 


~ दाद 
1 


७०८ श्रीमद्भागवत [अ०२ 
इति विह्ृलिता गेहानादाय यसलं यथु; ।।१८॥) | यह क्या अनथं कर डाला १ अव्र लोग हमे क्या करेगे ? 
स्स प्रकार वे वहत ही घवरा गये तथा मूठ छेक 
अपने निवासस्थानमै गये ॥ १८ ॥ उस समय उनके 
६ चेहरे फीके पड़ ग्य थे | मुख कुम्हला गयं थे | उन्हाने 
राज्ञ॒ आवेदयाश्क्रः सवंयादवसन्निधो ।।१९॥ | मरी समामे सव यादेक सामने छे जाकर वह मूसठ 
रख दिया ओर राजा उग्रसेनसे सारी धटना कह 
श्ुत्वामोघं विप्रशापं द्ष्रा च मसर नृप । | सुनायी ॥ १९ ॥ राजन्‌ | जवर सव च्छगोने ब्राह्मणोके 
| शापकी वात सुनी ओर अपनी ओंँखोँसे उस मूसस्को 
वेसि ६ | देखा, तव सव-के-घ् द्वारकावासी विस्मित ओर भयभीत 
विसित भयसन्त्रस्ला बभूबदरकीकसः ।।२०॥ | ही गये; क्योकि वे जानते थे कि ब्राह्मणोका शाप 
+न = | कभा लठ नहा होता ॥ २० ॥ यदुराज उ्रसेनने 
तच्चगधयत्वा असरु यदुराजः स आहुकः । | उस मूसक्को चूरा-चूरा करा डाव्य ओर उस चूरे तथा 
| छेके वचे इए छोटे दुकड़ेको समुद्रम फकतरा दिया । 
सथ॒द्रसलिरे प्रास्यरलोहं चास्यावरोपितम्‌ ।२१॥। ( इसके सम्बन्धमे उन्होने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे कोई सह 
। नटी;रसी दी उनकी प्रेरणा थी) ॥२१॥ 
। परीक्षित्‌ ! उस लोहैके टकडेको एकः मचछ्टी निगल 
। गयी ओर चूरा तरङ्गोके साथ वह-वहकर सपुद्रके किनारे 
उद्यमानानि वेलायां लभ्नान्यास्न्‌ कर्रका; ।*२२)। | आ च्गा | वह थोडे दिनोम एरक ८ विना गौँय्कवी एकं 
घास ) के खूप उग॒ आया ॥ २२ ॥ मचखटी मारने- 
मत्सो गृहीतो मत्खप्नेजलिनान्यैः सहाणवे । | वाले मद्ुओने समुद्रम दूसरी मश्व्योके साथ उस 
| मछटीको भी प्रकड़ च्या | उसके पदमे जो टोका 
तसयोद्रगतं लोहं स शल्ये छन्धकोऽकरोत्‌ ।॥२३॥ | टकडा था, उसको जरा नामक व्याधने अपने वाणे 
नोकमे र्गा छया ॥ २२ ॥ भगवान्‌ सवर कुछ जानते 
इस शापको उल्ट भी सक्ते थे । फिर भी 
। उन्होने एेसा करना उचित न समज्ञा । काठखूपवरारी 
कतु नच्छद्‌ विप्रश्चप काटकृप्यन्वसादत ॥२४॥ । प्रमुने ब्राह्मणोके रापका। अन॒मोदन ही करिणा ॥ २४ ॥ 








~ -- -~--- ~~~ - ~ कक > 
मिम ीी 
[मी भि 1 





ण 


तंचोपनीय सदसि परिम्खानयुखभियः 


षके 


कथिन्मत्स्योऽग्रसीश्रोहं चूणानि तररेस्ततः । 





0 ०९ 
भगवाज्ज्ञातसवांथं ईश्वरोऽपि तदन्यथा | 





इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्वे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ 
->->>*4^^<< € 


। @ प 
। अथ द्वितीयोऽध्यायः 
वसदेवजीके पास श्रीनारदजीका आना ओर उन्हे राजा जनक तथा नौ योगीश्चलेका संवाद खुनाना 
श्रीद्यकदेवजी कहते है- कुरुनन्दन ! देवि 
नारदके मनमे भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सन्निधिम रहनेकी 
बदी लटसा थी । इसल्थि वे श्रीकृके निज बाहुओसे 


श्रीद्युक उवाच 


-गोविन्द्जुतायां दात्या इस्दद ।__ | उदी लग्स थी । इवि व श दारवत्यां इरूढह । 
१. त चोपनीय | २. त चूण यित्वा | २. लेहं शूलेषु द्ु° | 


छ, _ 254. ९०५ 


क्रक ` 


अ०२। 











को यु राजन्निन्दरियवान्‌ यु्न्द चरणाम्बुजम्‌ । 


न॒भेञचेत्‌ सवतोमृत्युरुपास्ममरोत्तमेः 1} २ ॥ 


तसेकदा तु देवर्षिं वुदेवो गृहागतम्‌ । 
अचितं सुखमासीनमभिवादेदमत्रवीत्‌ ॥ ३॥। 


वृसुदेव उवाच 


भगवन्‌ भवतो यात्रा खस्तये सब॑देहिनाम्‌। 
पणानां यथा पित्रोरुत्तमश्टोकवत्मनाम्‌ ॥ ७ ॥ 
भूतानां देवचरितं दुःखाय च एुखाय च । 


सुखायेव हि साधूनां त्वादसामच्युतार्मनास्‌ ।। ५ ॥ 


` भजन्ति ये यथा देवान्‌ देवा अपिं तथेव तान्‌ । 


छायेव कर्मसचिवाः सधवो दीनवत्सलाः ॥ £ ॥ 


ब्र्ह॑स्तिथापि पच्छो धमौन्‌ भागवतांम्तव | 





अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं करष्णापा्नलखटसः ।। १ ॥ | स॒रक्षित दवारकाम जर्हा दश्च आदिक चापका 


, कल्याणके व्यि ही होता है ॥ ४ ॥ देवताअकिं चख 


| दशनसे ही कृतकृत्य हो गये हैँ ) तथ तथापि आपसे से उन 


यते सवतोभयात्‌।। ७ 1 । मनुष्य श्द्वसे 
४. ह तीन प्रतिमे म ‹ सुदेव उवाचः नहीं है । २ # मास्तास्तः 








को 
भय नहीं था; विदा कर देनेपर्‌ भी पुनःपुनः आकर 
प्रायः रहा दही करते ये॥ १॥ राजन्‌ ! रेसाकोन 
प्राणी है, जिसे इन्दिर्यौ तो प्राप्त हयौ ओर वह मगवानूके 
ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवताओके भी उपास्य चरणकमर्ने- 
की दिव्य गन्ध) मधुर मकरन्द-रस, अदधाकिक ख्यनाधुरी, 
सुकुमार स्पश ओर मङ्गलमय वनिका सेवन करना न 
चाहे ! क्योकि यह वेचारा प्राणी सव्र ओरसे गर्युसे ही 
धिराहआदहै।॥२॥ एक दिनकी वात है, देवर्षि 
नारद्‌ वछुदेवजीके यर्हा पधारे । बघुदेवजीने उनका 
अभिव्रादन किया तथा आरामसे वैठ जानेपर विधिपूर्वकं ` 
उनकी प्रूना की ओर इसके बाद पुनः प्रणाम करके 
उनसे यह वात कही ॥ ३ ॥ 

वसुदेवजीने कहा- संसारम माता-पिताका आगमन 
पुत्रके व्यि ओर भगवान्‌की ओर अग्रसर होनेवाञे 
साधु-संतोका पदापंण प्रप उक्ल हए दीन-दुिर्योके 
व्यि वडा ही सुखकर ओर बड़ा दी सङ्गटमय होता 
है । परंतु भगवन्‌ ! आप्र तो खयं मगवन्मय, भगवत्ख- 
खूप हैँ | आपका चट्ना-फिरना तो समस्त प्राणियेके 


। 
। 
। 
4 


+ हि ध 8 >, 





















भी कमी प्राणियोके व्िि दुःखके हेतु, तो कमी सुखके 

हेतु बन जाते हैँ | परतु जो आप-जेसे सगवघ्रेमी पुरुष 
है, जिनका हृदय, प्राण, जीवन, सव बुक भगवन्मय ` 
हो गया है--उनकी तो प्रवेक चेष्ट समस्त प्राणियेकि 
कट्थाणकरे च्ि ही होती है | ५ 1} जो कोग देवताओं- 

का जिस प्रकार भजन करते हैँ, देवता भी परछरैके ` 
समान ठीक उसी रीतिसे भजन करतेव्राखंको फल देते . 
है; क्योकि देवता कर्मके मन्त्री है, अधीन हैँ । प्रं 
सःपुरुप दीनवतसल होते हैँ अर्थात्‌ जो सांसारि सम्पत्ति . 
एव साधनसे भी हीन कै, उन्हें अपनाते 
ब्रह्न ! ( यपि हम आपके ञयभागनन ओर खम 








धमकि--साधनोके सम्बन्धे प्रदन रहे है, जिनको 

1. । १६ न तो ट्स ९1 ओरसे. भपदायकः 

गव = 
"2 


७१० अमद्भामवतं [ अ०२ 


"-----------------------~--~-~--~--~--~---~--~---~-~--~------------------------------~--~--~-------- ~ 


अहं किर पुरानन्तं परजार्थो थुवि य॒क्तिदम्‌ ।  संसासे सुक्त हो जाय ॥ ७ ॥ पहले जन्मे मने सुक्ति 
देनेवाले भगवानूकी आराधना तो की थी, परतु इसव्ि 
| नही किं सुच सुक्ति मि । मेरी आराधनाका उदेश्य था 
कि वे सुञ्चे पुत्रख्पमें प्राप्त हो । उस समय सै मगवानूकी 
से सुग हो रहा था ॥ ८ ॥ सुत्रत | अव आप 
मुषे एेसा उपदेशा दीजिये, जिससे मे इस जन्म-मृत्युरूप 
भयावह संसारसे-- जिसमे दुःख भी सुखका विचित्र 
हू ओर मोहक रूप धारण करके सामने आते है अना- 
च्येम हयजपेबाद्धा तथा नः शाधि सुव्रत ॥ ९ ॥ | यस्‌ ही पार हो ज़ । ९ ॥ 

भीयकदेवजी कहते है-राजन्‌ ! वुद्धिमान्‌ 
वुदेवजीने मगवानके खरूप ओर गुण आदिक श्रवणके 
अभिप्रायसे ही यह प्रन किया था | देवर्षिं नारद उनका 
प्रन सुनकर भगवान्‌के अचिन्त्य अनन्त कल्याणमय 
= गुणोके स्मरणम तन्मय हो गये ओर ब्रेम एवं आनन्दमें 

। , श्रीतस्तमाह देवपिहरेः संखारिषी गुणः \\१०॥ भरकर वसुदेवजीसे बो ॥ १० ॥ 
नारद उवाच । नारदजीने कटा-यदुव शारिरोमणे ! तुम्हारा यह 
ः सम्थेतद्‌ व्यवसितं भवता सात्वतर्षभ | | निश्चय बहुत ही न्द्र है; करयोकि यह भागवत ध्मके 
। सम्बन्धमे है, जो सारे विश्वको जीवन-दान देनेवात्म है, 
यत्‌ पृच्छसे भागवतान्‌ धमां विद्वभावनान्‌।।११॥ भविन करनेवाला दै ॥ ११ ॥ बुदेवजी ! यह भागवत- 
। धमं एक एसी वस्तु है, जिसे कानोसे घुनने, वाणीसे 
श्रुतोऽनुपठितो ध्यात आदृतो वानुमोदितः । । उच्चारण करने, चित्तसे स्मरण करने, हदयसे खीकार 
( „< | करने या कोई इसका पालन करने जा रहा होतो 
सद्यः पुनाति सद्धर्मो दवाववेखद्ुहीऽपे हि ॥१२॥ | उसका अनुमोदन करनेसे ही मनुष्य उसी क्षण पवित्र 
। हो जाता है-- चाषे बह भगव्रान्‌का एवं सारे संसारका द्रोही 
दी क्योंनदहो॥ १२॥ जिनके गुण, टीला ओर नाम 
आदिका श्रवण तथा कीतंन पतितोको भी पात्रन करनेवाला 
दै, उन्हीं परम कट्पाणखरूप मेरे आराध्यदेव भगवान्‌ 
नारायणका तुमने आज मुञ्चे स्मरण कराया है ॥ १३ ॥ 
वूपुदेषजी | तुमने सुञ्चसे जो प्रस्न किया है, = 
© ~+ हात्मनः सम्बन्धे सत पुरुष एक प्रचीन इतिहास कहा करते € | 
जापभाणां च संनादं विदेह महात्मनः ॥१४॥ द इतस है मके र नौ पगे नर 
।  परिय्रतो नाम खतो मनोः स्वायम्धुवख यः| | महात्मा विदेहका छम संवाद ॥ १४ ॥ ठम जानते ही 
= हो किं खायम्भुव मुके एक प्रसिद्ध पुत्र थ प्रियत्रत । 
 तखाग्नीधस्ततो नामि्ऋपभ्ततयुतः स्तः ॥१५॥ | परियतके आनी, आनीघ्रके नामि ओर नाभि छन 
` ` क इए ऋष्रम ॥ १५ ॥ शाने उन्डं भगवान्‌ नाखुदेवका 
मोक्षधरममविवक्षया ।  ।अंदयक्दाहै। मोक्षधर्मका उपदेशा करनेके व्यि उन्दने 











कत" चनि कक कण 


अपजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया ॥ ८ 1 





यथा विचित्रव्यसनाद्‌ भवद्धिविंशधतोभयात्‌ । 





श्री्युक उवाच 








राजन्नेवं कृतप्रर्नो वसुदेवेन धीमता | 


त्वया परमकल्याणः प्ण्य्रवणकीर्दनः | 


सारितो भगवानद्य देवो नारायणो मम ॥१३॥ 


अत्राप्युदाहरन्तीममितिहाप्तं पुरातनभ्र्‌ 








नि ^ । 


न श ॥। 








तान्‌ दष्टा खयसंकाशान्‌ महाभागवतान्‌ नृपः \ 


 अजमानोऽग्नयो विभा; सवं एबोपतस्थिर 





अ० २ तकादज्ञ स्कन्ध 


--------------~----न-न-न-न-न-न----- ~ ननन ----------------- --- ----- -------~- ---------- 


अवतीणं सतशतं तयखासीद्‌ ब्रह्मपारगम्‌ \\१६।) 








अवतार ग्रहण किया शा | उनके सौ पुत्र थे ओर सव- | ५ 
के-सव वेदोके प्रारदर्खा व्द्रान्‌ थे॥ १६ ॥ उनमें 
सवसे वड़े थे राजप्रं भरत | वे मगवान्‌ नारायणके 
परम प्रेमी मक्त थे । उन्दीके नामसे यह भूमिखण्ड, जो 
पहले अजना मवषेः कहता था, (मारतव्ष' कहखाया | 
यह भारतवर्षं भी एक अलोकिक स्थान है ॥ १७॥ 
राजिं भरतने सारी पृथ्वीका राञ्य-मोग क्रिया, परतु 
अन्तम इसे छोडकर वनम चे गये । वहाँ उन्होने 
तपस्यके द्वारा भाव्रानक्ती उपासन। कौ ओर तीन जन्मों 
वे भगवान्‌को प्राप्त इए ॥ १८ ॥ मगवान्‌ ऋषमदेव- 
जीके रोष निन्यानवे पुत्रोमें नौ पुत्र तो इस भारतवर्षके 
सब ओर खितनो द्रीपोके अधिपति इए ओर इक्यासी 
पुत्र कम॑काण्डके रचयिता ब्राह्मण दहो गये ॥ १९॥ 
रोपर नौ संन्यासी हो गये । वे बड़े ही माग्यवान्‌ ये । 
उन्होने आत्मविवाके सम्पादनमे बडा परिश्रम किया था 
ओर वास्तवमे वे उसमे बडे निपुण ये । वे प्रायः 
दिगम्बर दी रहते थे ओर अधिकाि्थाको परमार्थ व्तुका 
उपदेश करिया करते थे । उनके नाम ये--कवि, हरि, 
अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, दुमिक, चमस 
ओर करमाजन ॥ २०-२१ ॥ वे इस काय-कारण ओर 
व्यक्त-अभ्यक्त भगवद्रूप जगतको अपने आत्मासे अभिनं 
अनुभव करते इए प्रथ्ीपर खच्छन्द विचरण करते 
ये ॥ २२ ॥ उनके व्यि कहीं भी रोकटोक न थी । 
वे जहाँ चाहते, चले जाते । देवता, सिद्ध, साध्य, 
गन्धव, यक्ष, मनुष्य, किनर ओर नागेके लोकम तथा 
सुनि, चारण, भूतनाथ, विद्याधर, ब्राह्मण ओर गोओके 
स्थानोमे वे खच्छन्द विचरते थे । वघुद्छजी ! वे सब- 
केस जीवन्मुक्त ये ॥ २३ ॥ कः 
एक वारकी बात है, इस अजनाम ( मारत ) वर्षम 
विदेहराज महात्मा निमि बड़े-बड़े ऋषियोके दारा एक क 
महान्‌ यज्ञ करा रहे थे । पूर्वोक्त नो योगीश्वर खच्छन्द त 
विचरण करते इए उनके यज्ञम जा पठे ॥ २४ ॥ 
वूुदेवजी ! वे योगीश्वर मगवानूके परम प्रेमी मक्त ओर 
सूयके समान तेजखी ये । उन्दः देखकर राजा निमि 
आहवनीय आदि मूर्तिमान्‌ अग्नि ओर ऋत्विज आदि, 
ह्मण सव-केसब उनके खागतम ख्डे हो गये ॥ २५॥ 






























तेषां ये भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायणः | 
विख्यातं वपमेतद्‌ यन्नाम्ना भारतमद्धतम्‌ \\ १७) 
स युक्तभोगां त्यक्त्वेमां निगतस्तपक्ता हरिम्‌ । 
उपासीनस्तत्पदवीं ऊेमे वे जन्मभिख्िभिः ॥१८॥ 
तेषां नव॒ नवद्वीपपतयोऽद्य समन्ततः । 
कर्मतन्त्रप्रणेतार एकारीतिद्विजातयः ।\१९॥ 
नवाभवन्‌ महाभागा मनयो द्यथंश्चंभिनः 


श्रमणा वातर्ना आत्मविद्याविश्षारद!+ \\२०\) 





कविह रिरन्तरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः 1 
आविर्हत्रोऽथ दभिलथमसः करभाजनः ।२१॥ 
त एते भगवद्रूपं विश्वं सदसदात्मकश्र । 
आत्मनोऽव्यतिरेकेण पर्यन्तो व्यचरन्‌ महीम्‌।।२२॥ 
अन्याहतेष्टगतयः सुरसिद्रसाध्य- 
गन्धवेयक्षनरकरिन्नरनागरोकान्‌ । 
युक्ताश्चरन्ति युनिचारणभतनाथ- 
विद्याधरद्िजगवां युनानि कामम्‌ ॥२३॥ 
त॒ एकदा निमेः सत्रुपजग्धुयंर्च्छया 


वितायमानग्षिभिरजनामे महात्मनः ॥\२४।) 








४ वि 2 रका कु + 4 च्व ष्क ` "न्ह ए ~ ~+ न्क कक ~ ` 
> - १ 
कः न्द चकि 
॥ ~ 
१ चक्क 





--. ~ शरीमद्धागवतं [ अ ९ 
नि ~~~ 
बिदेहस्तानभित्रेत्य नारायणपरायणान्‌ । विदेहराज निमिने उन्हे भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त जानकर 


यथायोग्य आसनोपर वेठाया ओर प्रेम तथा आनन्दसे 

भ्रोतः सम्पूजयाश्चक्र आ्षनयखान्‌ यथाहंतः ॥२६। | भरकर विपिपूर्वक उनकी प्रजा की | २६ | वे नवे 
र & योगीश्वर अपने अंगोकी कान्तसे इस प्रकार चमक रहे 
तान्‌ रोचमानाच्‌ स्वरुचा बह्मपुत्रोपमाच्‌ नव । | थे, मानो साक्षात्‌ ब्र्माजीके पुत्र सनकादि मुनीश्वर ही 


पप्रच्छ परमप्रीतः प्रश्रयावनतो तरपः ॥२७॥ | हों । राजा निमिने वरिनयसे छककर परम प्रेभके साथ 
| उनसे प्रसन किया | २७ ॥ 


तिरेह उवाच | विदेहराजनिमिने कहा- भगवन्‌ ! मँ ठेसा समञ्जता 
३ | हव किं आपटोग मधघुमूदन भगवानूके पार्षद्‌ ही है 
मन्ये भगवतः साक्षात्‌ पापंदाच्‌ वा मघुद्िषः | | क्योकि भगवान्‌के पाद संसारी प्राणि्योको परत्र कनके 


व्यि विचरण किया करते हैँ || २८ ॥ जीवक व्यि 
विष्णोभूतानि लोकानां पानाय चरन्ति हि ॥२८॥ | मलुष्य-शरीरका प्रात होना दुर्म है । यदि यह्‌ प्रा 
भीहो जाता है तो प्रतिक्षण मृल्युक्रा मय सिरपर सवार 


दुरंभो मालुषो देहो देहिनां क्षणभङ्खरः 1 रहता है; क्योकि यह क्षणभङ्ग है । इसव्ि अनिश्चित 
र | मनुष्प-जीवनमे भगवान्‌ प्थारे ओर उनको प्यार करने- 


तत्रापि दुरभं॑मन्थे वेडण्ठभरयदरशनम्‌ ॥२९]। | वले मक्तननोका, संतोका द्रान तो ओर भी दुर्छभ 
है ॥ २९ ॥ इसलिये त्रिखोकपावन महात्मा ! हम 
आपल्मगोसे यह प्रन करते हैँ किं परम कल्याणक 
खर्प क्या है † ओर उसका साधन क्या है १ इस संसासें 
आघे क्षणका सत्सङ्ग भी मनुष्योके व्यि पटम निषि 
है | ३० ॥ योगीश्वते ! यदि हम सुननेके अप्रिक्ारी 
| ~ £ हों तो आप कृपा करके भागवत-धर्पोका उपदेशा कीजे, 
धम्‌ भागवतान्‌ बरूत यदि नः शचुतये शमम्‌ | क्योकि उनसे जन्मादि विकारे रहित, एकरस भगवान्‌ 
द श्रीकृष्ण प्रसन्न ह्येते हँ ओर उन धर्मक पाटन करने- 
य, अक्षन्‌ अपन्नय दद्यत्यात्मानमप्यजः ॥२९१॥ | वाले शरणागत भक्तोको अपने-आप तकका दान कर 
डाक्ते हँ ॥ ३१॥ 

देवपिं नारदजीने कहा वसुदेवनी ! जत्र राजा 
निमिने उन भगवस्रेमी संतोंसे यह प्रन किया, तव उन 
लोगोने बडे प्रेमसे उनका ओर उनके प्र्नका सम्मान 
भ्रतिपज्या्ठबन्‌ श्रीत्या ससदसखयजं नृपम्‌ ॥३२॥ | किया ओर सदस्य तथा ऋलिजंके साथ वेठे हए राजा 
चु ` निमिसे बटे ॥ ३२ ॥ 

पहले उन नौ योगीश्वसोमेसे कविजीने क्ा-- 
जन्‌ | भक्तजनोके हदयस कभी दूर न शनेवाले 
अच्युत भगवान्‌के चरणोकी नित्य निरन्तर उपासना ही 
इस संसासे परम कल्याण--आस्यन्तिक क्षेम द ओर 


अत आत्यन्तिक कषेमं पृच्छाप भवतोऽनघाः । 


पंसारेऽखिन्‌श्षणार्धोऽपि सतसद्गः शेवधिनणाम्‌।३०। 


ॐ श्रीनारद उवाच 


एवं ते निभिना पृष्टा बसुदेव महत्तमाः | 






किं 


+ ज क कक 
कः क 








5 
| 


अ० २ ] एकादन्च स्कन्ध ७१२ 


उदिभ्रब॒द्रेरसदा्मभावाद्‌ सवथा भयङ्ान्य है, रेसा मेरा निश्चित मत है । देह, गेह 
आदि तुच्छ एवं असत्‌ पदार्थेमिं अहंता एवं ममता हो 

विश्वात्मना यत्र॒ निवर्ते भीः ।३३। | जानेके कारण जिन खोगोकी चित्तवृत्ति उद्रिन हो रही 

है, उनका मय भी इस उपासनाका अनुष्ठान करनेपर्‌ 

ये बे भगवता प्रोक्ता उपाया द्यात्मरभ्धये । पूणतया निवृत्त हो जाता है ॥ ३३ ॥ भगवानने भो 
माठे अज्ञानी पुरुषोको भी सुगमतासे साक्षात्‌ अपनी 

अञ्चः पसामविदवां विद्धि भागवतान्‌ हि तान्‌।। ३७1 | प्राप्ते व्यि जो उपाय खयं श्रीमुखे वतय है, उन्हें 
ही (मागवत-धर्मः समञ्चो ॥ ३४ ॥ राजन्‌ ! इनं 
यानाखाय नरो रजन्‌ न प्रमाेत कर्हिचित्‌ । मागवतधर्मोका अवलम्बन करके मनुष्य कमी व्ि्नेसे 
पीडित नहीं होता ओर नेत्र वंद करके दौडनेपर भी 

धावन्‌ निभी्थ वा नेत्रे न्‌ स्खछेन्न परतेदिह ॥ २५1) | अर्थात्‌ विधि.्रिधानमे चरटि हो जानेपर भी न तो मार्गते 
स्वलित ही होतः है ओर न तो पतित -- फच्मे वच्चित 

कायेन वाचा सनसेद्दिेी ही होताहै | ३५ ॥ ८ भागव्रतधर्भका पाटन करनेवाखकें 
व्यि यह निथम नीं है किं वह एक विदोष प्रकारका 
कम॑ ही करे ) बह शरीरसे, बाभीसे, मनसे, इच्ियसे, 
बुद्धिस, अहंकारसे, अनेक जन्मों अथत्रा एक जन्मकीं 
आदतोंसे खमभावव्रश जो-जो करे, व्रह सव परमपुस्प 
भगवान्‌ नारायण्करे व्यि ही है--उस भावसे उन्हें 
समपण कर दे । (यदी सरल्-से-सरट, सीघा-सा 
भागवतधं है ) ||२६॥ ईश्ररसे त्रिमुख पुरूषको उनकी 
यासे अपने खरूपकी व्रिस्मृति हो जाती है ओर इस 
विस्परृतिसे ही भै देवता द, तै मनुष्य ह, इस प्रकारका 
भ्रम--विपययदहो जाता है | इस देह आदि अन्य 





हि) 








युद्याऽऽत्मना वालुृतस्वभावात्‌ \ 
करोति यद्‌ यत्‌ सकलं परस्प 
नारायणायेति समपेयेततत्‌ \३६।। 


भयं दितीयाभिनिवेशतः या- 


दौशदपेत्खय  विपयंयोऽस्मरतिः। वस्तुमं अभिनिवेदा, तन्मयता होनेके कारण दही बुढापा, 
मृत्यु, रोग आदि अनेकों भय होते हैँ । इसव्विि अपने 
तन्माययातो बुध आभजेत्तं गुरुको ही आराध्यदेव प्रम प्रियतम मानकर अनन्य 
भक्तिके द्वारा उस ईश्ररका भजन करना चहिये ॥३७॥ 
भक्त्येकयेशं गुरुदेवतात्मा ।1३७॥ | राजन्‌ ¦ सच पृषो तो भगवान वै, अतिरिक्त, आत्माके 
अतिरिक्त ओर कोई वस्तु है ही नहीं । परत न होनेपर्‌ 
अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो भी इसकी प्रतीति इसको चिन्तन करनेवाटेवतो उस 
चिन्तनके कारण, उधर मन क्गनेके कारण दी होती 
ध्यातुधिया खप्नमनोरथौ यथा | दै--जेसे खप्नके समय ख्नद्रष्टाकी कल्पनासे अथवा 
जाग्रत्‌-अनरस्थाम नाना प्रकारके मनोरथोसे एक विरक्षण 
तत्‌ कभेसंकस्पविकरपकं मनो दी खट दीखने लगती है । इसव्ि विचाखान्‌ परषको ` 


चाहिये किं सांसारिक केकि सम्बन्धमे सकषव्प-विकल्य . 


करगवार मनको रोक दे कैद कर ठे । वसत, एसा 
था ननरुनन्यादभय ततः खात्‌ 1३८] | करते ही उसे अभय पदकी, प्रमात्माकी प्राप्तिं हो 


भ जो को = काक -- माः क या 
सि कय 





योक कोय के कैः =, व क णकाक्यय म 
१. श्च । 


भा० सर खं० २. ९०- 














| ध श्रीमद्भागवत [ अ० २ 
¢ [न ----------~------------- | नन्तः ~त 

| ३ ४. शृण्वन्‌ सुभद्राणि रथाङ्गपाणे जायगो ॥३८॥ संसारम भ गवान्‌के जन्मकी ओर टीवकी 
1 बहृत-सी मङ्गलमयी कथा प्रसिद्ध है । उनको सुनते 
| जन्मानि कर्माणि च यानि रोके । रहना चाहिय । उन गुणों ओर ठीव्रओंका स्मरण 

। द्लानवाल भगवान्‌करे बह्रत-से नाम भी प्रसिद्ध है| 

0 = (~~ 
गीतानि नामानि तदथंकानि लाज-सकोच छोडकर उनका गान करते रहना चाहिये । 


इस प्रकार किसी भी व्यक्ति, वस्तु ओर सथानमे आसक्ति 
गायन्‌ विलजो विचरेदसङ्कः ॥।३९। | न करॐ़े विचरण करते रहना चाहिये | ३९ ॥ जो 
इस प्रकार विशुद्ध व्रत-नियम ठे टता है, उसके 


एवंव्रतः खप्रियनामकी्स्य हृदयम अपने परम प्रियतम प्रमुकरे नाम-कीर्तनते अनरागका 
| | प्रेमक्रा अङ्कूर उग आता है | उसका चित्त द्रवि 
जाताचुरागो दइतचित्त उच्चैः। | जाता हं | अव्र व्ह साव्ारण ल्टोगोंकी धितिसे ऊपर 


| उठ जाता है । ठोगोकी मान्यताओं, ध्रारणाअति पर 
हो जाता हे] दम्भसे नङ्णी, खभाव्रसे ही मतवाद्-सा 
होकर कभी सिल्यिव्यकर हते क्गता है तो कभी 
लोकबाह्यः | ४०॥| टकर रोने ठगता है । कभी ऊंचे खरस भगव्रानूको 
पुकारने ट्गता हं तो कभी मधुर स्वरसे उनके गणोका 
गान करने च्णता ह | कभी-कभी जवर व्ह अपे 
प्रियतमको अपने नेतरोके सामने अनुभव करता है, तवर 
उन्हें रिञचानेके च्यि चव्य भी करने च्गता है ॥४०५॥ 
राजन्‌ । यह आकारा, वायु, अग्नि, जक, पृध्वी, ग्रह-नक्षत्र, 
= शरीर प्राणी, दिशा, ब्रक्-वनस्पति, नदी, समुद्र-सव-के-सव 
साप्त हरेः र मगवान्‌के शरीर है । सभी रूपोमिं खयं भगवान्‌ प्रकट 
है | ेसा सम्ञकर वह, जो को$ भी उसके सामने 

यत्‌ किंच भूतं प्रणमेदनन्यः ॥४१॥ | आ जाता है-- चषि व्ह प्राणी.हो या अप्राणी-उसे 
अनन्यमावसे--भगव्रद्वाव्रसे प्रभाम करता है ॥४१॥ 


हसत्यथो रोदिति रीति गाय 


त्युन्मादवन्न॒त्यति 


| 


खं वायुमग्नि सलिलं महीं च 


ज्योतीषि सवानि दिशो द्मादीन्‌ । 










¦ ्‌ भक्तिः परेगायुभवो विरक्ति | जेसे भोजन करनेव्राठेको प्रत्येक ग्रासके साथ दही तुष्ट 
। ( तृषि अथत्रा सुख )) पुष्टि ( जीवनशक्तिका तचार ) 

रन्यत्र चेष त्रिक एककालः | ओर ्ुश्रा-निवृत्ति - ये तीनों एक साथ होते जते है, 
ध वैसे ही जो मनुष्य भगवानकी दारण टकर उनका भजन 
 श्रपद्मानलख यथाश्नतः स्यु- करने ताता है, उसे भजनके प्रत्येक क्षणे भगवान्‌के 


षट र | प्रति प्रेम, अपने व्रेमास्पद्‌ प्र्ुके खरूपका अन ण 
स्तुष्टः पुष्टिः इदपाय।ऽचुषाक्षम्‌ ॥४२॥ | उनके अतिरक्त अन्य वस्तुओमिं 1 की 
र एक साथ ही प्राति होती जाती है ॥४२॥ ग 
3. इत्यच्युताङपर 4 = ति र तिके दारा भग 

` इत्यच्युताङ््धरिं भजतोऽनुव्र्या जो प्रतिक्षण एक-एक च 


प्रि 
भक्तििरक्तिमगवत्प्रवोधः | प्रेममयी भक्ति, संसारके प्रति वरैर्य ओर भपन श्रवत्‌ 























अ० २] एकादश स्कन्ध 
- 


भवन्ति वें भागवतस्य राजं 


= = , "भनि 






मगवानके खख्यकी स्छर्ति-ये सव॒ अवद्य ही प्राप्त 
स्ततः परां शान्तिपैति साक्षात्‌ ॥४३॥ | प्राप्त हो जाते ह, तव बह खयं परम शन्तिका अनुभव 
करने ख्गता है ॥ ४३ ॥ । 
स) | राजा निमिने पूरा योगीश्वर | अव आप कपा 
करके भगवद्रक्तका ठक्षण वणन कीजिये । उसके क्या 
धर्म हँ १ ओर कैसा खमभाव होता है १ ह मनुष्येकिं 
साथ व्यवहार करते समय कैसा आचरण करता है १ 
यथा चरति यद्‌ ब्रूते रिङ्धेभगवस्परियः ।४७। | क्या बोलता है १ ओर किंन ठक्षणोकि कारण भगवान्‌क्ता 
प्यारा हाता हं १॥ ४४॥ 
हरिर्वा च अव नौ योगीश्वरोमेसे दूसरे हरिजी वोले-राजन्‌ 
आत्नखखूप भगवान्‌ समस्त प्राणिर्योमे आत्माख्पसे-- 
नियन्ताख्पसे सित हैँ । जो कहीं भी न्यूनाधिकता न 
| सवत्र परिपूर्ण भगवत्सत्ताको ही देखता है ओर 
साथ ही समस्त प्राणी ओर समस्त पदाथं आत्मरूप 
भगवान्मे ही आघेयू्पसे अथवा अब्यस्तखूपसे धित 
हे, अर्थात्‌ वास्तवमे भगवःशरूप ही है इस प्रकारका 
जिसका अनुभव्र है, एेसी जिसकी सिद्ध दष्ट है, उसे 
मगवान्‌का परमप्रनी उत्तम मागवत समञ्चना चाहिये॥ ४५ 
जो मगवानूसे प्रेम, उनके भक्तंसे मित्रता, दुखी ओर 
अज्ञानि्योपर कृपा तथा भगवानूसे द्वेष करनेवार्छोकी 
उपेश्ता करता है, वह मध्यम कोटिका भागवत है ॥४६॥ 
ओर जो भगवान्‌के अचौ-विगप्रह-मूतिं आदिकी पूना 
तो श्रद्रासे करता है, परंतु मगवानूके भक्तों या दूसरे 
ल्ोगोकी विशेष सेवा-शुश्रषा नहीं करता, वह साधारणः 
्रेणीका भगवद्भक्त है ॥ ४७ ॥ जो श्रोत्ननेत्न आदि 
इन्द्रियोके दारा शब्द-ख्प आदि विषययोका ग्रहण 
करता है; परंतु अपनी इच्छाके प्रतिकरूक विषयोसे द्वेष 
नहीं करता ओर अनुक विषर्योके मिल्नेपर हर्षित नही 
होता--उसकी यह दृष्टि बनी रहती है किं यह सब 
हमारे भगवानूकी माया है-- वहं पुरुष उत्तम भागवत 
है ॥ ४८ ॥ संसारके धमं है-- जन्म-वयु, भूखप्यास्‌ 
| श्रम-कष्ट, भय ओर तष्णा. ये क्रमशः इरीर, प्राण, 
| इन्द्रिय, मन ओर बुद्धिको प्रात होते दी रहते हँ । ज 
द जन्माप्ययक्चुद्धयतपेकृच्छेः । | पुरुष भगवानूकी स्ति इतना तन्मय रहता है किं 


अथर भागवतं ब्रूत यद्धरमो यादृशो चृणाम्‌ । 


सवभूतेषु यः पद्येद्‌ भगवद्धावमात्मनः 


[ गी 


भूतानि भगवत्यार्मन्येप भागवतोत्तमः ॥४५।॥ 
इश्वरे तदधीनेषु बालिदेषु द्विषत्स च । 
ग्रममेत्रीकरपोपे द ज क, (ष 

त्रीकृपापेक्षा यः कराति स मध्यमः ॥४६।) 


अचोयामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । 





न तद्धक्तंषु चान्येषु स भक्तः प्राङ्तः स्मरतः ।४७।॥। 














गृहीत्वापीन्द्रिथेरथान्‌ यो न देष्टि न हृष्यति । 





विष्णोमौयामिदं पश्यन्‌ स वे भागवतोत्तमः ।४८॥ 





थे 





देदेच्दियप्राणमनोधियां यो 








^ ~ ध ४ ६ ` "क [क क व क 
न # च 
नि क वः 


७९१६ श्रीमद्धामवत [अ० र 






इनके वार-वार होते-नाते रहनेपर्‌ भी उनसे मोहित नही 
होता, पराभूत नहीं होता, वह उत्तम भागवत है ॥४९॥ 
जिसके मनम विपय-भोगकी इच्छा, कर्म-मरवरृत्ति ओर 
उनके बीज-वासनाओंका उदय नहीं होता ओर जो एक- 
मात्र भगव्रान्‌ बासुदेतरमें ही निवास करता है, वह उत्तम 
भगवद्भक्त है | ५० ॥ जिनका इस दारीरमे नतो 
सत्कुटमे जन्म, तपस्या आदि कर्मसे तथा न वर्ण, आश्रम 
एवं जातिसे ही अहंमाव्र होता है, व्ह निश्चय ही 
भगवानका प्यारा है | "५१ ॥ जो ध्रन-सम्पत्ति अथवा 
रारीर आदिमे "ह अपना है ओर यह प्रराया- - इसु 
प्रकारका भेद-भाव नहीं रखता, समस्त पदा्थेमिं समखद्प 
परमात्माको देखता रहता है, सममाव्र रखता है तथा 
किसी भी घटना अथवा संकल्पसे विदित न होकर शान्त 
रहता है, वह भगवान्‌का उत्तम भक्त है ॥ ५२ ॥ 
राजन्‌ । वडे-डे देवता ओर ऋषि-मुनि भी अपने 
अन्तःकरणको भगव्रनमय वनते दर्‌ जिन्हं द्रत रहते 
ह--मगवानूके रेसे चरणकमव्यसे आवे श्ण, आधे 
पल्वे व्यि भी जो नहीं हता, निरन्तर उन चरकी 
संनिधि ओर सेवामे ही संव्मन रहता है; यर्हतक कि 
कोड खयं उसे त्रिुवनकी राज्यलक्ष्मी देतो भी वह 
भगवत्सप्रृतिका तार नहीं तोडता, उस राज्यलछ्मीकी ओर्‌ 
ध्यान ही नहीं देता; वही पुरुष वास्तवमें मगवद्धक्त 
| अग्रगण्य है, सव्रसे श्रे है ॥ ५३ ॥ रासु- 
टीाके अवसरपर च्त्य-गतिसे मांति-मातिके पाद्‌-बिन्यासु 
कटनेवाठे निखिल सोन्दय-माधुयनिधि भगवान्‌के चरणोके 
अङ्खुलि-नखकी मणि-चन्दरिकासे जिन शरणागत भक्तजनों 
हृदयका विरहजन्य संताप एक वार दूर हो चुका है; 
उनके हृदयम वह फिर कैसे आ सकता है, जेसे 





जाः ग व क नक == = = य नि 


संसारधर्मैरविद्यमानः 















स्मरत्या हरेभागवतप्रधानः ॥७९॥ 
न कामकर्मबीजानां यम्य चेतसि सम्भवः । 
बाखदेवैकनिख्यः स॒वं भागवतोत्तमः ।\५०॥। 


न यस जन्मकर्मभ्यां न वर्णाश्रमजातिभिः । 


सज्ञतेऽसिनहंभावो देदे वे स हरेः प्रियः ।\५१॥ 
न यसय खः पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा 1 
स्बभूतसमः शान्तः स वे भागवतोत्तमः ॥५२। 
| त्रि्चुवनविभवहेतवेऽप्यङ्कण्ठ- 
स्मरतिरनितात्मसुरादिभिविमृग्यात्‌ । 
न॒ चरति भगवत्पदारविन्दा- 


हवनिमिपाधमपि यः स वेष्णवाग्यः ।॥५३॥। 
भगवत उरुविक्रमाङ्परिश्ाखा- 


नखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे । 
हृदि कथयुपसीदतां पनः स 


(५ [१ ¢ 
प्रभवति चन्द्र ादितेऽकतापः ॥५४॥। 







| वदलुजाति हृद्य न यख साक्षा चन्द्रोदय हीनेपर सू्॑का ताप नहीं खग सक्ता ॥५४॥ 
49 न} विवशतासे नामोचारण करनेपर भी सम्पूणं अघ-राशिको 
3 त्र १ = = ~ ^ ज न 

॥ द्ररिरिविशाभिहितीऽप्यधाषनाशः । नष्ट कर देनेवारे खयं भगवान्‌ श्रीहरि जिसके हदयको 


क्षणभरके च्ि मी नहं छोडते है, क्योंकि उसने प्रेमकी 
रस्ीसे उनके चरण-कमलोको बाधि रक्खा है, वास्तवे 


श्रणयरदनया शरताड्धिपद्ः 
एसा पुरुष ही मगवान्‌के भक्तोमे प्रधान दै ॥ ५५ ॥ 


स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥५५५॥ 


॥ 


| <स - 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायमिकादशस्कन्ये दितीयोऽब्यायः ॥ < ॥ 





9 फ क च { 

क = ~ ^ न ` 9 । 

० ब < ५ द क, प २.४४ ; = ४ नक > 

~ नन व 5 
र 4 हे ज % ' ~ 9+ त, 
क~ ~ - च~ कु -- ह ग " इ १ न + = » 
४ 8 # " ॥, + ^ (+ + चनः ` क + हि ` ॐ 


जै 





अ०३| 


[गे न क प [क 


एकादश स्कन्ध 


७१७ 











अथ तृतीयोऽध्यायः 
माया, मायासे पार दोनेके उपाय तथा बह्म ओर कर्मयोगा निरूपण 
राजोवाच 














राजा निभिने पूचछा- भगवन्‌ ! सवंशाक्तिमान्‌ परम- 
व्रि्णु मगवानूकी माया बडे-वडे मायातवि्योको भी 
मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता; 
( ओर आप कहते हैँ किं भक्त उसे देखा करता दै । ) 
अतः अव मे उस मायाका खर्प जानना चाहता दर 
आपलोग कृपा करके वतकइये | १ ॥ योमीश्वते । मेँ 
एक मृ्युका दिकार मनुष्य द्र । संसारके तरह-तरहके 
तापोने मुञ्चे बहुत दिनँसे तपा रक्खा है । आपेग जो 
मगवत्कथारूम अमृतका पान करा रहे है, बह उन 
तापोको मिटनेकी एकमात्र ओषधि है; इसस्ियि मे 


परस्य विष्णोगीश्चख पायिनसपि मोहिनीम्‌ 1 


मायां बवेदितमिच्छासो भगवन्तो ुचन्तु नः | १1 


नानुत्रप्ये जुषन्‌ युष्मद्रचो हरिकथामृतम्‌ । 


[| | ^» 4 ~ म ,५ छ 
ससारतीषनस्तप्ता मत्यरस्तत्तापमपजम्‌ । २ ॥। | आप्रोगोकी इस वाणीका सेवन करते-करते तृप्त नहीं 
होता । आप कृपया ओर किये ॥ २ ॥ 
अन्तरिक्ष उवाच 


अव तीसरे योगीश्वर अन्तरिश्चजीने कदा- 
राजन्‌ ! ( भगवान्‌की माया खरूपतः अनिवेचनीय है, 
इसलिये उसके कायेकि द्वारा दी उसका निखूपण होता 
है । ) आदिपुरुष परमात्मा जिस ॒शक्तिसे सम्भूर्ण 
भूतोके कारण वनते है ओर उनके विषय-मोग तथा 
मोक्षकी सिद्धिके च्िि अथवा अपने उपासकोकी उत्कृष्ट 


द्विके च्य खनिर्भितः पञ्चभूतोके द्वारा नाना प्रकारके 


एभिभूतानि भ्रतात्मा महाभते्मदायुज 1 


ससजव्ावचान्याद्ः खमाव्रात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ 
सि 
देव, मनुष्य आदि शरीरोकी सृष्टि क्रते हैँ, उसीको 
'मायाः कहते ह ॥ ३॥ इस प्रकार पञ्च महाभूतोके 
दवारा बने हए प्राणि-शरीरौम उन्होने अन्तयांमीरूपसे 
प्रवेश किया ओर अपनेको ही पहर एक मनके रूपमे 
ओर इसके बाद परँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय-इन 

दस रूपोमे व्रिभक्त कर दिया तथा उन्हीके दारा विषरयोका 
भोग कराने कगे | ४ 1} वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामीके 
द्वारा प्रकाशित इन्दरियोके दारा विषयोका भोग करतां है 
ओर इस पच्चमूतोके द्वारा निमित ररीरको आतमा 
अपना खरूप मानकर उसीम आसक्त हो जाता है । 

( यह भगव्रानकी माया है ) ।॥५॥ अब वह कर्मन्द्रियोसे ` 
सकाम क्म करता है ओर उनके अनुसार भ कमेकां 
फर सुख ओर अशुभ कर्मका फल दुःख भोग क्रले 
लगता है ओर ररीरधारी होकर इस संसारम्‌ भग्क्ने 


एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पञ्चधातुभिः 1 

एकधा द्चधाऽऽत्मानं विभजञ्जपते गुणान्‌।॥। ४ ॥ 
के, (^ = क जर, 

गुणगणान्‌ स अज्ञान आत्मप्र्योतितेः प्रथः । 

मन्यमान इदं सष्टमात्मानमिह स्जते।॥ ५ ॥ 


कमौणि कमेभिः इवंन्‌ सनिमित्तानि देहभृत्‌ । 


तत्तत्‌ कमेफरं गृह्णन्‌ भमतीह सुखतरम्‌ ॥ & | ॥ 





९८ , श्रीमद्भागवत [ अ० 2 
इत्थ कमगतीगच्छन्‌ बह्वभद्रवहाः परमान्‌ । लगता है | यह भगव्रान्‌की माया है॥ ६॥ इस प्रकार 


यह जीव एसी अनेक अमङ्गकमय कर्मगतियोको, उनके 


आभूतसम्वात्‌ सगंप्रल्यावश्तुतेऽवशः ॥ ७ ॥ | फको प्रात होता है ओर महामूतोकि प्रच्यपर्न्त 
विवद होकर जन्मके बाद मृत्यु ओर मर्युके वाद्‌ जन्मको 

धातरषषव आसन्ने व्यक्त द्रव्यगुणात्मकम्‌ ] प्राप्त होता रहता है. --यह भगव्रान्‌की माया है ॥ ७ ॥ 
जव पञ्चभूतोके प्रटयका समय आता है, तत्र अनादिं 
ओर अनन्त कार स्थूल तथा सूम द्रव्य एवं गुणख्प 
इस समस्त व्यक्त सृष्टिको अ्यक्तकी ओर, उसके मूढ 
शंतवर्षा हनादृष्टर्भविष्यत्युल्बणा यवि । कारणक ओर लीचता है--यह भगवानूकी माया दे ॥८॥ 
4 उस समय पृथ्वीपर क्गातार सो वषतक भयंकर रखा 
(8 पचितो तमी -4 पड़ता है, वर्षा त्रिल्कुल नहीं होती, प्रख्यकाक्की राक्तिसे 
तत्कालापचितोष्णा्को लो तपिष्य ति।।९। की उष्णता ओर भी वद जाती है तया ये तीन 
र त्कोको तपाने लगते है यह भगवानूकी माया है ॥९॥ 

र तारतलमार्‌स्य सरकेषणञ्लानरः; । उस समय देषनाग--सङ्कर्षणके मंहसे आगकी प्रचण्ड 
१ कपटे निकल्ती हँ ओर वायुकी प्रेरणासे वर क्पे परताल 
दहन्नूध्वाशखा विष्वग्‌ वधेते वायुनेरितः ॥१०॥ | रेकसे जलाना आरम्भ करती हैँ तथा ओर भी ऊँची- 
ऊंची होकर चारों ओर पैट जाती है -यह भगवानूकी 
माया हे | १० ॥ इसके वाद्‌ प्रख्यकाटीन सांवर्तक 
मेधगण हाथीकी सूँडके समान मोटी-मोदी धाराओंसे सौ 
धाराभिरदसिहस्ताभिलीयते सलिके विरा ॥११। | वतक वसता रता दै । उससे यहं विराट्‌ हाण्ड 
त जलम इव जाता है-- यह भगवान्‌की माया है ॥ ११॥ 

= वत्य व = राजन्‌ | उस समय जंसे विना इईधनके आग बुञ्ज जाती 
ततो विराजधतछृज्य वेराजः पुरुषो चप । दै, वैसे ही व्रिराट्‌ पुरुप ब्रह्मा अपने ब्रह्माण्ड-शरीरको 
| छोडकर सुक्ष्षखखूप अव्यक्तमें खीन हो जते हं--यह 
अव्यक्तं विशते क्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥१२॥ | भगवान्‌की माया है ॥ १२ ॥ वायु प्रध्वीकी गन्ध खीच 
लेती है, जिससे वह जक्करे खूपमे हो जाती है ओर 
जव वही वायु जल्के रसको खीच ठेती है, तव्र वहू 
जल अपन। कारण अग्नि बन जाता है-- यह भगवानूकी 
1 1 माया है | १३ ॥ जब अन्धकार अग्निका रूप छीन 
सलि तदुशतरसं॒ज्योतिषठयोपकस्पते ॥१३॥ | क ह (न हयो जती जीर 
ध. | ज्योति जब अवकादारूप आकारा वादुकी स्पे-शक्ति रीन क्ता 
= पं तु तमसा बायो ज्योतिः प्रलीयते । है, तब वह आकारामे टीन हो जाता है--यह भगवान 
` माया है ॥ १४ ॥ राजन्‌ ! तदनन्तर कालरूप ईशर 
 हतस्पशोऽवकाडेन वायुनंभ्ि लीयते ॥१४॥ | आकाराके शब्द्‌ गणको हरण कर केता दै, जिससे 4: 
ह. तामस अहंकारम ठीन हो जाता है । न 
कालान्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते । | उदधि जस अहंकारम टीन होती ह । न ` _ 


"ग 





अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति ।॥ ८ ॥ 


सांव॑तेको सेवगणो वर्षति ख शातं समाः 





वायुना हृतगन्धा भ्रः सलिलत्वाय कटपते । 








> ण्यनद्ष्टि हका । 9 © वतक 
१, दातवप्राण्यनाब्रष्टिः । २. ; | 
` ' , "नन । 
` "= ~ बकाः 
' " "=" "क "ला का 
` 


) न्क क 
कव ॐ = मः + ६ ती ज =क्र 
0.4 = + 
† तं 













च 


न ~ कन 
`" "| 












क । ववा ॥ ॥ ^ (~ 
कं (| 
9) न वर 8 = 
ि क 


( अ० ३. एकाद स्कन्ध ` 





अहकारसे उत्पन देवताओकि साथ साचिक अहंकारम 
^. वाक | रेरा कट जाता है तथा अपने तीन प्रकारके कायकि 
प्रविशन्ति द्यहङ्कारं खगुणरहमात्मनि ॥१५॥ | साथ अहंकार महत्त्रमे छीन ह्यो जाता दै । महत्ख 
परकृतिम ओर प्रकृति ब्रह्मम ीन होती है । फिर इसीके _ 
उच्टे क्रमसे सृष्टि होती है । यह भगवानूक्ती माया ` 
है ॥ १५॥ यह सृष्टि, सिति ओर संहर करनेवराी ` 


तरिव्णावणिताखाभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि । १६। | त्रिगुणमय माया है । इसका हमने आपसे वणन किया । 
अव्र आप ओर क्या घुनना च।हते हैँ १॥ १६ ॥ 







एषा माया भगवतः सगस्थित्यन्तक्रारिणी । 


















राजोवाच राजानिमिने पूा- मर्जी ! इस भगवरान्‌की माया- । 
ॐ: ष 3 | को पार करना उन व्येगोकि व्यि तो बहत ही कणिनि है, । 
यथेतामेश्वरीं मायां दुस्तरामक्रताटमभिः ) | जो जपते मनको वशे नदी कर ववि त । 
| कृपा करके यह व्तादये कि जो लोग डरीर आदिमं १ 
तरन्त्यञ्ः स्थूरधियो महपं॑इदथन्यताम्‌ ।।१७॥| आमबुदनि रते ह तमा जिनकी सम मायी द, वे । 
| भी अनायास ही इसे कैसे पार कर सकते हँ १ ।॥१७॥ 
्रवद्ध उवाच | अत्र चौथे योगीश्वर भवुद्धजी बोे- राजन्‌ ! 
| सी-पुरुष-सम्बन्धय आदि बन्धननेमिं वैधे दए संसारी मचुष्य 
कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । | घखकी पराति ओ दुःखी निदृततिके लिये वडवे कम 


| करते रहते हँ । जो पुरुप्र मायाके पार जाना चाहता 
हे, उसको विचार्‌ करना चाहिये कि उनके कर्माका 
| फट किस प्रकार विपरीत होता जाता हँ । बे सुश्वके बदले 
पच्येत पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्‌ ॥१८॥| ःख पते हं ओर दुःख निकै स्थानपर ध 
| दुःख वदृता ही जातादह1 १८॥ एक धनकोदही 
| खो । इससे दिन-पर-दिन दुःख उदृता ही है, इसको 
| पाना भी कठिन है ओर यदि किसी प्रकार मिल भी जाय 
तो अत्मक्रे च्यितो यह मृध्युखख्य दहा है। जो 
। इसकी उलश्चनोमे पड़ जाता है, बह अपने -आपको भूल 
| जाता है । इसी प्रकार घर, पुत्र, खजन-सम्बन्धी, पञ्च- ` 
धन आदि भी अनित्य ओर नाशव्रान्‌ ही है; यदि कोड 
इन्दं जटा भी ठे तो इनसे क्या छुख-शन्ति मिक सक्ता 

| है१॥१९॥ इसी प्रकार जो मनुष्य मायासे पार 
गृहापत्याप्तपश्चभिः का प्रीतिः साधितश्चेः ॥१९॥। . जाना चाहता है, उसे यह भी समञ्च ना चाहिये कि 
५ मरनके बाद प्राप्त होनेवाले लोक-परक ५ प्सेदी 
नादावान्‌ हैँ क्योकि ल्टोककी वरस्तु ओव समान त्‌ 
भी क्छ त कमाके सीमित फलतात्र टै । वहा भा 


= मसे : धन 


2 | न क =| ह ण = ध म ग्द 
१1 1 5 र-छोटे राजाओके सपान वरात्ररवारोसे होड 


वो क क क 


नित्यातिदेन वित्तेन दुलभेनास्पमृस्युना । 





| ७ ९ 


नि -------- यथा मण्डलवतिनाम्‌ ॥२०। अथवा त्मग-डांट रहती है, अधिक देग्र्म ओर सुखवा््छोके 
प्रति चद्रान्वेषण तथा ईर्ष्य दरेषका भाव रहता दै, कम 

सुख ओर रेधर्यवालोंके प्रति धृणा रहती है एवं कर्मोका 

तसाद्‌ गुरं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्‌ । ९ पूरा हो जानेपर वहसे पतन तो होता ही है । उसका 
नारा निश्चित है| नारका मय वह्णौभी नहीं द्ट 

‰ ता ॥ २० ॥ इसव्े जो प्रम कल्याणका जिन्ञघु 
शान्दे परे च निष्णातं ब्हम्युपशमाभयम्‌ ।|२९।। | दैः ती सा न 
हो, जो शब्दत्रह-वेदोके पारद व्रदरान्‌ हो, जिससे वे 

ठीक-टीक समन्ञा सके; ओर साथ ही परत्रह्मे परिनिष्ठित 
तचछज्ञानी भी हों, ताक्रि अपने अनुमवकै दवारा ग्रह हुई 
रडस्यकी वातोको वता सुक । उनका चित्त शान्त हो, 
| व्यवहारके प्रपञ्चे विरोष प्रवृत्त न हो ॥ २१॥ 
| जिज्ञा्को चाहिये कि रुस्को ही अपना प्रम प्रिथतम 
अप्राययाचुचर्या येस्त॒ष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः॥॥२२॥ | आत्मा ओर इष्टदेव मनि | उनकी निष्कपटभावसे सेवा 
। करे ओर उनके पास रहकर भागवतभरमकी--मगवान्‌को 

| प्रात करनेवाले भक्तिभावके साधर्नोकी क्रियात्मकः शिक्षा 
। अ सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्खं च साधष | ग्रहण करे | दी साभनोसि सात्मा एवं भक्तको अपने 
¦ आन्माकरा दान करनेवाले भगवान्‌ प्रसन होते दै ॥२२॥ 
| पहले शारीर, संतान आदिमे मनकी अनासक्ति सीखे । 
 - - र्‌ | फिर भगवान्‌के भक्तोसि प्रेम कैसा करना चादिये-- यह 
॥ द्या भत्र श्रयं च त्वदा यथाचितम्‌ ।।२२॥ | सीखे । इस्तके पश्चात्‌ प्राणियोके प्रति यथायोग्य द्या, 
मत्री ओर विनयवी निष्कपटभावतते रिक्षा ग्रहण 
करे ॥ २३॥ मिद्वी, जल आदिसे बाह्य रारीरकी 
पवित्रता, छल-कपट आदिके व्यागसे भीतसकी पवित्रता, 
अपने धमका अनुष्ठान, सहनशक्ति, मौन, खाध्याय, 
सरक्त, ब्रह्मच, अर्हिसा तथा शीत-उण्ण, सुख-दुःख 
। नरम ःविप्रादसे रहित होना सीखे ॥ २४॥ 





, तत्र भागवतान्‌ धर्मान्‌ शिक्षेद्‌ गुर्वात्मदेवतः । 








ऋ ~ 
ह 









सः शचं तपल्ितिक्षां च मौनं खाध्यायमाज॑वम्‌ | 






नि [1 


 , महाचयमर्दिसां च समत्वं दन्दरसं्ो; ॥२४।। 


-५ सवत्र अर्थात्‌ समस्त देश, काल ओर वस्तुओमिं चेतनरूपते 
"। आत्मा ओर नियन्तारूपसे 'ईश्चरको देखना, एकान्त-सेवन, 


यही मेरा धर हैः टेसा भाव न रखना, गृहस्थ हो 
तो पवित्रे वक् पहनना ओर त्यागी हो तो फटे-पुराने 
पवित्र चिधड़, जो कुछ प्रारब्धके अनुसार मिल जाय, 
 उसीम संतोष करना सीखे॥ २५॥ भगवानूकीं प्रातिका 
मागं बतलनेवाले दामि श्रद्धा ओर दूसरे किंसी भी 
शाज्ञकी निन्दा न करना, प्राणायामके धय ५ 
मौनके द्वारा बाणीका ओर वासनादीनताके अन्वासत | 


६.9 
जल 
# 


 सर्वत्ात्मेखरान्ीक्षं कैवल्यमनिकेतताम्‌ 


भिविक्तचीरवत्तनं संतोषं येन केनवित्‌॥२५॥ 


नषु 8। 
~~ कः 






= = ॥ि क 
ली छ { 
् ज = क 
= ङ. (ि = 








८५ 


कि ज 





अटः [1 
१॥ 


[ 
न 
नि 


 --~स र 








अ०३ | एकादन्च स्कन्ध ७२१ 


| = = = न 
जाः या ज 


मनोवाकमंदण्डं च सत्यं शमदमावपि ।॥२६॥ | करमोका संयम करना, सत्य बोलना, इन्धिर्योको अपने- 
अपने गोलको स्थिर रखना ओर मनको कहीं बाहर न 
जाने देना सीखे ॥ २६ ॥ राजन्‌ ! भगवानक्री टीला 
अदधत दह | उनके जन्म-कर्म ओर गण दिन्य है। 
उन्हीका श्रत्रण, कीतंन ओर व्यान करना तथा दारीरसे 


ज जितनी भी चेष्टाएं हों, सव भगवानूके व्यि करना 
जन्मकमंगुणानां च तदथेऽखिरचेष्टितम्‌ ।२७]। | दी ॥ २७ ॥ य्न, दान, त न 











श्रवणं कीतेनं ध्यानं दरेरद्रतकर्मणः | 


| पाटन ओर खरी, पुत्र, घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो 

; | कुछ अपनेको प्रिय क्गता हो-- सव-का-सव भगवान्‌ के 

३८ दत्त तपा जप्त वृत्त चात्मनः प्रियम्‌ । लाति ~ कलना, = 
| जिन संत पुरुप्रोने सचिदानन्डसखरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णका 

दारान्‌ सुतान्‌ गृहान्‌ प्रणान्‌ यत्‌ परस्मै निवेदनम्‌२८ | अपने आत्मा ओर खामीके रूपम साक्षा्तार कर च्या 
| हो, उनसे प्रेम ओर स्थावर, जङ्गम दोनों प्रकारके 

 प्राणिर्योकी सेत्ा; व्िंशोेष करके मनुष्योकी, मयुष्यमिं भी 

एवं करष्णात्मना धेषु मृष्ये छु च्‌ सोहदम्‌ | | परोपकारी सजञ्जनोकी ओर उनर्मे भी भगवव्रेमी सतोकी 
करना सीखे ॥ २९ ॥ भगवान्‌के परम परावन यशकरे 

सम्बन्धमे दही एक-दूसरेसे बातचीत करना ओर इस 

परिचियां चोभयत्र महत्सु सृप साधुषु 11२९1) | प्रकारके साधकोका इक्ट होकर अपस्तम त्रम करना, 
आपसतमे सन्तुष्ट रहना ओर प्रपञ्चसे निच्ृत्त होकर 
आपरसमे ही आध्यासिक शान्तिका अनुभव करना 
सीखे ॥ ३० ॥ राजन्‌ ! श्रीकृष्ण राशि-रा्चि पापको 
एकः श्षणमे भस्म कर देते हैँ । सन उन्दीका स्मरण करे 
अ ग ओर एक-दृसरेको स्मरण करावें । इस प्रकार साधन- 
मिथा रतिमिथस्तुष्टिनितव्रत्तिमिथ आत्मनः ।२०॥ मलिका अचषान ककत 
जाता है ओर बे प्रेमोद्रेकसे पुटकित-रारीर ध्रारण करते 
सरन्तः सारयन्तश् मिथोऽघोधहरं हरिम्‌ | हैँ ॥ ३१ ॥ उनके हृदयकी वडी विटश्तण धिति होती 
है । कभी-कभी बे इस्‌ प्रकार चिन्ता करने क्गते हँ कि 
अबतक भगवान्‌ नहीं मिले, क्या करू, काँ जां, 
भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्र्युतपुलकां तुम्‌ ३१ | किससे प्ट, कोन सञ्चे उनकी प्रापि कराते १ इस तरं 
सोचते-सोचते वे रोने ठ्गते हँ तो कभी भगवानकी 


परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यश्चः | 


टीलाकी स्ति हो जानेसे रेसा देखकर किं परमेश्वय- ` ६ 


कचिद्‌ रुदन्त्यच्युतचिन्तया करचि- राटी भगवान्‌ गोपियोके डरसे छिपे इए ह, सिक्यित्कर ' 


हंसने लगते हैँ । कभी-कभी उनके प्रेम ओर दरोनकी 
द्रसन्ति नन्दन्ति बदन्त्यलकिकाः । अनुभूतिसे आनन्दमण्न हो जाते है तो कभी लोकातीत 


कि रोते == = 





अ न~ 
१. प्राणान्‌ परस्मै च । । 
1० सर लर २. ९.१- 


च, क 
प „+ क जक `" र ` पा # १ ऋ नि च ति #) 

































श्रीमद्भागवत ` [अ 





मावे सित होकर भगवान्‌के साथ वात-चीत करने ठगते 
हे । कभी मानो उन्हें सुना रे द्य, इस प्रकार उनके 
गुणोका गान छेड देते हँ ओर कभी नाच-नाचकर उन्हे 
रिञ्ञाने ठगने हं । कभी-कभी उन्हं अपने प्रास न पाङर 
षरर-उधर द्रूढने टगतेदहें तो कभी-कभी उनसे एक 
होकर, उनकी सन्निधिम स्थित होकर परम शान्तिका 
अ अनुमव्र करते ओर चुप हो जाते हैं| ३२ ॥ राजन्‌ | 
४1 | इति भागवतान्‌ धमान्‌ शिक्षन्‌ भक्त्या तद्त्थया । | जो इस प्रकार भागवतधर्मोकी शिक्षा ग्रहण करता है, 

~ उसे उनके द्वारा व्रेम-भक्तिकी प्राति ह्यो जाती है ओर वह 
भगवान्‌ नारायणकरे परायण होकर उस भायाको अनायास 
ही पार कर जाता है, निस्ते पजेसे निकख्ना वदरत ही 
कटिनि है | ३३ ॥ 


गायन्त्युशी खयन्त्यजं 


भवन्ति तुष्णीं परमेत्य निर्वृताः ॥३२॥ 


४. 

 „ नारायणपरो मायामञ्स्तरति दुस्तराम्‌ ॥३३॥। 
राजाच राजा निमिने पृछा महर्पियो ! अआप्टोग परमासमा- 
का वास्तविक खर्प जाननेवाटोमं सर्वशरे्र टें । इसय्ि 
मुञ्चे यह वतट्टये कि जिस परत्रह्न परमात्माका नारायण, 
नामसे वणन करिथा जता है, उनका खलख्पं क्या 


नारायणाभिधानश् बरह्मणः परमात्मनः 


निषठामदहेथ नो वक्तु यूयं हि ब्रह्मवित्तमाः ॥२४। 


हे ?॥ ३४॥ 
पिप्यटायन उवाच अव पचवें योगीश्वर पिष्पटायनजीने कदा- 
राजन्‌ ! जो इस संसारकी उत्पत्ति, स्थिति ओर प्रल्यका 
 खल्युद्धवप्रलयहेतुरहेतुरसख निमित्त-कारण ओर उपादान-कारण दोनों ही है, बनने- 


वादा भी है ओर वननेव्राच भी--परतु खयं कारण- 
है, जो खण्न, जाग्रत्‌ ओर पुपृर्ि-अव्रस्थाओमें 
उनके साक्षीके रूपमे विद्यमान रहता है ओर उनके 
अतिरिक्त समाधिम भी अ्यो-का-त्यो एकरस रता है 
जिसकी सत्तासे ही सत्तावान्‌ होकर शरीर, इद्धिय, प्राण 
ओर अन्तःकरण अपना-अपना काम कर्ने समथं होते 
है, उसी परम सत्थ वस्तुको आप (नारायण, समञ्िये ।२५। 
चसे चिनगास्यिँ न तो अग्निको प्रकारित ही कर सकती 
है ओर न जव दी सकती है ब्रेसे ही उस परमतच्यमे- 
आत्मखख्यमे न॒ तो मनकी गतिं है ओर न बाणीकी 
नेत्र उसे देख नहीं सकते ओर बुद्धि सीच नही सकती 
| प्राण ओर इन्दरिर्याँ तो उसके पासतक नही 
र ४ ४: पातीं । नेति-नेति- इत्यादि शवुतियोके ^ न ग 
8 ^ उसका वर्णन नहीं 4 | 


ष = १ 
† | क चदु. £ (५ 
र 1 ~ ॥ न्न इ 0.१ ॥ 
न + ध = 


यत्‌ खप्नजागरसुपु्षिपु सद्‌ बहिश्च । 


„  देेन्दरियायुहदयानि चरन्ति येन 


क + 1 र) 


५. 


~ 5 








ह, र = "ककः पि ^ ~, तिकि `, - दु क निवि 
ड दीः 


अ० ३ | एिकृदश्च स्कन्ध ७२३ 





शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्मप्रल- । उसको बोध करानेव्राटे जितने भी साधन है, उनका 
| निवरेध करके तात्पयरूपसे अपना मूल- निषेधका मूछ 
| ठक्षित करा देते हैँ क्योकि यदि निपेधके आधारकी, आत्माकी 
म्रोक्तमाह यदृते न निपेधसिद्रिः॥३६॥ | स्ता न दी तो निषे कौन कर रदा द, नेवी इति 
किक्षम हं-- नाका कोड उत्तर ही न रहं, निषरधकी 
+ (< सिद्वि न हो॥३६॥ जव खष्टि नहीं थी, तवं 
# । केवर एक वही था । सृष्टिका निरूपण करनेके घ्य 
सत्वं रजस्तम इत चडदकमद | उसीको त्रिगुण ( सच-रज-तम ) मयी प्रकृति कहकर 
| वर्णन किया गया । पिर उसीको ज्ानप्रधान होनेसे 
| महत्त, क्रियाप्रधान होनेसे सूत्रात्मा ओर जीवकी उपाधि 
| होनेसे अहंकारके ख्पमे वर्णन किया गया । वास्तवे 
। भी रक्तियां हं चदे वे इन्ियकिं अचिष्ठात्‌- 
देवताओके ख्ये हो, चष्ट इन्दि्थोकिं, उनके विषर्योके 
अथवा विषयोके प्रकारके ख्पमें हो-सव-का-सव वह 
ब्रहम ही है; क्योकि ब्रह्मदी शक्तं अनन्त है | कर्दातक 
कटर १जो कुछ दद्य-अद्द्य, कार्यकारण, सत्य ओर 
असत्य है-- सव कुछ ब्रह्म है । इनसे परे जो कुछ है, 
वह भी ब्रह्म ही है २७ ॥ वह ब्रह्मरूप आत्मा न 
तो कभी जन्म ताह ओरन मरता । वहन तो 
वृता है ओर न घटता ही हैँ | जितने भी पसितनसीक 
पदाथ है -चहि वे क्रिया, संकल्प ओर उनके अभावके 
रूपमे ही क्यो न हो--सवबकी मूत, मव्िष्यत्‌ ओर 
वतमान सताका वह साक्षी है । सत्रमे है । देदा-काख 
ओर वस्तुसे अपरिच्छिन्न है, अव्रिनासी है । बह उपर्च्धि ` 
करनेवाला अथवा उपटन्धिका विषय नहीं है । केवल 
उपठग्विखरूप-- ज्ञानरूप है । जसे प्राण तो एक 
ही रहता है, परंतु स्थानभेदसे उसके अनेक नाम हो ` 
जाते है वसे ही ज्ञान एक होनेपर भी इन्दियोके' 
सहयोगसे उसमे अनेकताकी कल्पना हो जाती है ॥ ३८ ॥ 
जगते चार प्रकारके जीव होते है -अंडा फोडकर 
पदा होनेवाठे पक्षी-सोप आदि, नालम बधे पेदा होनेवाठे 
पञ्य-मनुष्य, धरती फोडकर निकलनेवाठे ृ्षबन्यति 
ओर पसीनेसे उत्पन्न होनेप्राछे खटमल आदि । इन समी. . 
जीव-ररीरोम प्राणशक्ति जीवके पीछे ठगी रहती है । 
रारीरोके भिन-भिन होनेपर भी प्राण एक दी रहता है । 


घत्रं महानहमिति प्रबदन्ति जीवम्‌ । 
















ज्ञानक्रियार्थष्टलरूपतयस्शक्ति 

वरह भाति सदभच तयोः परं यत्‌।२७)। 
नामा जजान न मरिप्यति नेधतेऽसो 

न क्षीयते संवनविद्‌ व्यभिचारिणां दि। 


सर्वत्र शश्वदनपाय्युपरुष्िमात्र 


"=-= ककक क 


प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकद्पितं सत्‌ ।॥३८॥ 


~न = व क ज ० 


24 9 


अण्डेषु पे्चिषु तरुष्वविनिश्चितेषु 


ग्राणो हि जीवश्रपधावति तत्र तत्र । 
१, निधनविद्‌ व्यभिचारिणां । 


निके 


` चैकी 


।, + 
4-* 


कैः नभ 


~ ^ 


- ० + ~~ + ~ 





























| 
नत ति ७२ र - ट 4 = 
"4 \ > 
५ श्रीमद्भागवतं 
म "= जजचव्व्व्व्व्व्व्व्व्व्य्व्य्व्य्य्व्य्य्यय--------- =-= 


5 ध ए र 5 सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते 
= 9 हूटस्य आशयश्रते तद लुस्छतिनेः ॥३९॥ 
यद्यन्जनाभचरणेषणयोरुभक्त्या 

चेतामलानि विधमेद्‌ गुणकमंजानि । 
तसिन्‌ विशुद्ध उपलभ्यत आस्मतच्वं 

साक्षाद्‌ यथामरखच्शोः संवितप्रकाश्चः।।४०॥ 


राजोवाच 


` कमंयोगं बदत नः पुरुपो येन संस्कृतः । 


एवं प्रश्चमृपीच्‌ पव मप्रच्छं पितुरान्तके । 


क ¬~: 


आविरह्ेत्र उव।च 


वेदवादो न॒ लोकिकः | 


,  वेदश्य चेश्वरात्मत्वात्‌ तत्र अहयन्ति रयः ।४३॥ 


न है 


ए ~ 1 १. आश्रय मूते =. सविव ग्रकादाः | ५ अः 


| 89 § ९ 









। रखान्द 







न्क 


ओर ; (५१.५५ छ आर - उसे परोक्षवांद कहते ड। 


| अ० ३ 











सुशृक्ति-अवरस्थामें जव इद्दि्यौ निश्चेध हो जाती है, 
अहंकार भी सो जाता है- टीन हो जाता है अर्थात्‌. 
लिङ्गरारीर नहीं रहता, उस समय यदि कूटस्थ आत्मा भी 
नहो तो इस वातकी पीछेसे स्मृति ही कैसेद्टो किमे 
एुखसे सोया शा । रे होनेवाटी यह स्मरति ही उस 
समय आत्पाके अस्तिव्वको प्रमाणित करती है | ३९ ॥ 
| जव भगवान्‌ कमटनाभके चरणकमर्छोको प्राप्त करनेकी 
| इच्छासे तीव्र भक्ति की जाती है, तव वह भक्ति ही अननिकी 
माति गुण ओर करमेसि उत्पन्न हए चित्तके सारे मरको 
जल डाल्ती है | जव चित्त छुद्र हो जाता है, तवर 
आत्मतत्वका सान्नात्कार हो जाता है-- जेंसे नेत्रेके 
निविकार हो जनेपर सूर्थके प्रकाराकी प्रत्यक्ष अनुभूति 
होने लगती हे ॥ ० | 
राजा निमिने पृ्ा- योगीश्वरो | अव आपलोग हमे 
कमयोगका उपदेशा कीजिये, जिसके द्वारा द्ध होकर 
मनुष्य दीघ्रातिशीव्र प्रम नैष्कर्म्यं अर्थात्‌ कर्त, । 
कमं ओर कममफटकी निवृत्ति करनेषाटा ज्ञान प्रात करता 


१ क्रिज्ज्ि 1 117 ` ¶ बी शिका इ ` 


क्क =" र्ती | , कि 


विंधूयेहाश्च कमणि नष्कम्य विन्दत परमभ्‌ ।॥४९१॥ हे ॥ ४९१ ॥ एक वार्‌ यहा प्रशन मने अपने पिता 


महाराज इश्ष्वाकुके सामने ब्रह्माजीके मानसपुत्र सनकादि 
ऋषयस प्रा था, परतु उन्होने सर्यज्ञ होनेपर भी सेरे 
प्रदनका उत्तर न दिया । इसका क्या कारण था १ कृपा 


नात्रवन्‌ ह्मणः पुत्रास्तत्र कारणश्चच्यताभ्र ॥४२॥ | करके मुञ्चे बतलाहये ॥ ४२ ॥ 


अव छठे योगीश्वर आविदहदाच्रजीने कदा- 
राजन्‌ ! कमं ( राखरविहित ), अकर्म ( निषरिद्र ) ओर 
विकमं ( वरिहितका उल्लङ्कन )-- ये तीनों एकमात्र वेदके 
द्वारा जाने जाते हे, इनकी व्यत्रस्था लोकिकं रीतिसे 
नहं होती । वेद अपीरुष्रेय है ई श्वररूप हैँ; इसव्थयि 
उनके .तात्पयका निश्चय करना बहुत क्न हं । इसीसे 
बड़े-बड़े विद्वान्‌ भी उनके अभिप्रायका निणय करनेमें 
भूक कर बैठते है । ८( इसीसे तुम्हारे बचपनकी ओर 
देखकर-- तुम्हें अनधिकारी समञ्चकर सनकादि ऋषियोने 
तुम्हारे प्रशनका उत्तर नहीं दिया ) ॥ ४२ ॥ यह वेद्‌ 
पोक्षवादात्मकर है । यह कर्मोकी निधृत्तिके व्यिं कम॑का 
व्रिधान करता है, जसे बाल्कको मिलई आदिका लाल्च 


~~~ 





१८४ 0 - 2 क्कु 





+ व अः ॥ 
र 1 र | गङ्ग ~ । 
नि ३. क .# ‰ स 


१ त 


अ०र | पकदिञ्च इकन्ध्‌ 


------------- ~ --~------~--~--~------~--------- -- ------------ ------------------------------~-----~--~-- 





| ~ जकन 

















कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते गदं यथा ।\४४॥ | देकर ओघ सिते है वैसे ही यह अनमिञोको खं 
आदिका प्रलोभन देकर श्रेष्ठ कमम प्रवृत्त करता 
है ॥ ४४ ॥ जिसका अज्ञान निवृत्त नहीं आ है, 
जिसकी इन्द्र्यो वमे नहीं हैँ, बह यदि मनमाने ढंगसे 
| वेदोक्त कर्मोकि। परित्याग कर देता है, तो वह विहित 
` ध | कर्माका आचरण न करनेके कारण व्रिकर्मरूप अधमं 
| विकर्मणा द्यधर्तेण मृत्योभरयुमुपेति सः ॥४५॥ | ही करता है । इसय्यिये वह मृ्युके वाद रिरि मृध्युको 
॑ प्राप होता है ॥ ४५ ॥ इप्तन्यि फलकी अभिव्पघा 


| 
नाचरेद्‌ मस्तु वेदाक्तं खपमज्ञोऽनितेन्द्रियः 
| 
1 = व छोड़कर ओर विश्वात्मा मगवानूको समर्पित कर जो 
वेदाक्तमेव ङ्वागो निःसङ्खोऽपिंतमीश्वरे । हिः 


$ 








| वेदोक्त कमंका दी अनुश्रान करता दहै, उसे कर्पोकी 
| निबृ्तसे प्राप्त होनेवाटी ज्ञानरूप सिद्धि मिक जाती है | 
= धिः । जो वेदोमे खगादिरूप फलका वर्णन है, उसका तात्पर्य 
नेष्कम्या लभते सिद्धि रोचनाथा एरश्रुतिः ॥४६॥ पालकी सत्यता नहा ३, व 
करानेके च्य है | ४६ ॥ ॑ 
| राजन्‌ ! जो पुरुप चाहता है कि शीव्र-से-शीत्र मेरे 
ं आत्माकी इदय-ग्रन्यि- मै ओर मेरेकी कल्पित 
गाठ सुक जाय, उसे च्िये कि वह वैदिक ओर 
तान्त्रिक दोनों ही पद्रतियोसे भगव्रानूकती आरा्ना 
करे ॥ ४७ ॥ पहले सेवा आदिक द्वारा गरुदेवकी 
दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके द्वारा अनुश्ठानकी विधि 
सीखे; अपनेको भगवान्‌की जो मूतिं प्रिय लगे, अभीष्ट 
जान पडे, उसीके द्वारा पुरुषोत्तम भगवान्‌की पूजा 
करे ॥ ८ ॥ पटे स्नानादिसे उरीर ओर संतोष 
आदिसे अन्तःकरणको शुद्ध करे, इसके बाद भगत्रान्‌कती 
मूतिके सामने वेव्कर प्राणायाम आदिके द्वारा मूत- 
शुद्वि--नाडी-रोधन करे, तदश्चात्‌ व्िधिपू्ैक मन्त्र, 
देवता आदिके न्याससे अद्गरश्ना करके भगवान पूजा 
करे ॥ ४९ ॥ पहञे पुष्प आदि पदार्था जन्तु आदि 
निकालकर, प्रध्वीको सम्भाजन आदिसे, अपनेको अव्यग्र 
होकर ओर भगवानकी मूर्तिको पहलेहीकी प्रूजाके लगे 
इए पदार्थोके श्षाक्न आदिसे पूजाके योग्य बनाकर पिर ` 
आसनपर मन्त्रोचयारणपूवैक जलं चछिडककर पाय, अध्य 
आदि पात्रोको स्थापित करे । तदनन्तर एकाग्रचित्त 
होकर हृदयम्‌ भगवानकता ध्यान करके फिर उसे सामनेकी 
्रीमूतिम्‌ चिन्तन करे । तदनन्तर हृदय, सिर 
शिखा ( इयाय नमः, शिरसे खाहा ) इ्यदि मन्त्रेसे ` 





य आद्य हृदयग्रन्थिं निजिरीषैः परात्मनः । 


















विधिनोपचरेद्‌ देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्‌ ॥४७।॥। 
रू्धाचुग्रह आचायात्‌ तेन संदरितागमः । 
महापुरूपमभ्यचन्पत्याभिमतयाऽऽत्मनः ॥४८॥ 
शुचिः सम्पुलमासीनः प्राणसंयमनादिभिः। 
पिण्डं विशोष्य सन्न्यासकृतरक्षोऽचयेद्ररिम्‌ ॥४९॥ 
अचादो हृदये चापि यथारन्धोपचारकेः । 


द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रक्ष्य चासनम्‌॥५०। 


पाव्रादीनुपकर्प्याथ संनिधाप्य समाहितः 








। ७ श्रीमद्भागवत [अ० ४. 








हृदादिभिः छृतन्यासो मूलमन्त्रेण चाचैयेत्‌ ॥५१॥ | न्यास करे ओर अपने इष्टदेवके मू मन्त्रके द्वारा देशः 
र. काल आदिके अनुकरूठ प्राप्त पूजा-सामग्रीसे प्रतिमा 
साङ्गापाङ्गां सपषेदां तां तां मति खमन्त्रतः । । आदिमे अथत्रा हृदयम मगवान्‌की प्रूजा करे ॥५५८-५१॥ 
नीये त | अपने-अपने उपास्यदेवके विग्रहकी दृदयादि अङ्ग, 
 पद्या्याचमनीयोयेः सननासो विभूषणः ।॥५२'  आयुभादि उपाङ्ग ओर पारमदोसहित उसके मूलमन्त्र 
। पाच, अव्य, आचमन, मघुपकं, स्नान, व्ल, आमूषण, 


¢ पदीपोपहारये ~ 
गृन्धमाद याक्षतस्भिभि -त 
 गन्धमाल्याक्षतक्लग्िध । | गन्ध, पुण, दपि-अश्तके तिरक, मात, पू, दीप 





;# साङ्गं सम्पज्य विधिवत्‌ स्तवः स्तुत्वा नमेद्धरिम्‌।५ २। अर्‌ नत्रद्य आदद्सं वात्रवत्‌ पूजा करं तथा फर स्तत्र 
£ | हारा स्तुति करके सपसिार भगवान्‌ श्रीइरिको नमस्कार 
॥- आत्मानं तन्मयं ध्यायन्‌ रति सम्पजयेद्धरेः । करे ॥ ५५२-५३ ॥ अपने आपको भगवन्मय व्यान 
; च | करतें इए हा भगवान्‌का मूत्रा पूजन करना चाहिय | 


‡ र शेषामाधाय शिरसि खधाम्न्धुद्रासख सत्कृतम्‌ ।\५४।। | निमाल्थको अपने सिरपर रक्खे ओर आदरके साध 
४ भगवद्भिम्रहको यथास्थान स्थापित कर प्रूना समाप्त कना 
| चाहिये ॥ ५४ ॥ इस प्रकार जो पुरुप अग्नि, पूय, 
जक, अतिथि ओर्‌ अपने हृदयमं आत्मरूप श्रोहरिकी पूजा 
यजतीश्वरमात्मानमचिरान्पुच्यते हि सः ॥५५॥ | करता है, बह खीघ्र ही मुक्त हो जाता है ॥ ५५ ॥ 
--क्-- 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकाद शस्कन्वे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ 















एवमग्न्यकंतोयादाबतिथो हदये च यः। 


-- ---५ ९2” 


अथ चठुर्थोऽध्यायः 


भगवानकरे अवतारांका वणेन 


राजोवाच राजा निमिने पू्ा-पोगीश्वरो ! भगवान्‌ खतन्त्रता- 
से अपने मक्तकी भक्तिके वश होकर अनेकों प्रकारक 
यानि यानीह कममांणि यये; खच्छन्दजन्मभिः। अवतार ग्रहण करते हैँ ओर अनेकों टीठर्पँ करते है । 


. आपच््ेग कृपा करके मगवान्‌की उन टीटाओंका वणन 
ह कक ` चक्रे करोति कर्ता बा हरिस्तानि चवन्तु नः ॥ १॥ कीन जो वे अत्रतक कर चुके है, कररहेदहै, या 
अ क ~: करेगे ॥ १॥ 

दुभि उवाच अव्‌, सातवें योगीश्वर द्रमिरजीने कदहा-- 
= राजन्‌ | भगवान्‌ अनन्त है | उनके गुण भी अनन्त 
या वा अनन्तसख युणाननन्ता- 
= ४ है | जो यह सोचता है किं मै उनके गुर्णोको गिन 
। ` नजुक्रमिष्यन्‌ स तु बारबद्धिः। | ठंग ष मं दै, वच्क है । ण्ड तो समभव है वि 


, 
न्वा क. => ~ ~~ "क 


~~~ 


त . य्वैर्नानावाक्षोविमभूषणेः। २. यजेदी । ३. द्रविड । 
 % विष्णुभगवान्‌की पूजाम अश्षरतोकरा प्रयोग केव तिल्करालंकारम ही करना चादियेः पूजाम न्दी “ताकत स्यद्‌ 


विष्णुनं  केतक्य महेश्वरम्‌ ।2 













क) क 












7 ¢ 7¶# 


| 


| 
। 


४. 


अ० ४ | 


नक भि 
ज त ज क भ 


रजांसि भूमेगणयेत्‌ कथंचित्‌ 


~ -~-~- 





कालेन नेवालिरशंक्तिधाश्चः | २ ॥ 
भूतेयदा पश्चभिरात्मसुष्टैः 


पुरं विराजं पिरचय्य तसिन्‌ । 


चवांरोन विष्टः पुकूपाभिधान- 


मवाप नारायण दिदैः 11३1 


५ 


यत्काय थुव्नत्रयसंनि शो 


एप्‌ 

यस्थेन्दियेस्तचभृताभयेन्द्रिसाणि 1 

ज्ञानं स्वतः खसनने बरूमोज रहा 
स्वादिभिःखितिटये इव आदिकतता।।४॥ 


अ'दाव॒भ्रच्छतध्रती रजसाख सर्गे 
विष्णुः थतो क्रतुपतिद्धिंजधर्मसेतुः। 
रद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य 
इत्यु्धवस्थितिर्याः सततं प्रजासु ।॥ ५ ॥ 


धमेश्च॒दष्वदुदितयजनिष्ट॒मू्या 


नारायणो नर ऋषिप्रवरः प्रशान्तः । 


ने्कम्यर^णञ्रुवाच चचार कमं 


एकादश स्कन्व्‌ 





७२७ 








कोई किंसी प्रकार पृध्वीके धूलि-कर्णोको गिन ठे; परंतु 
समस्त शक्तियोकि आश्रय भगवानूकरे अनन्त गु्णोका 
कोई कभी किकी प्रकार पार नहीं पा सकता ॥ २॥ 
भगवान्‌ने ही प्रथवी) जक, अग्नि, वायु, आकादा--इन 
पोच भूतोकी अपने-आपसे अपने-आपमें सृष्टि की है | 
जवर वे इनके द्वारा व्रिराट्‌ दारीर, ब्रह्मण्डका निमाण 
करके उसमे टीचखसे अपने अंडा अन्तर्यामीख्पसे प्रवेश 
करते हैँ, ( भोक्तारूपसे नही, क्योकि भोक्ता तो अपने 
पुण्योक्रे फललखूप जीवर ही होता है ) तवर उन आदि- 
देवर नारापणक्रो पुरुपः नामसे कहते हैँ, यही उनका 
पहरा अवतार दहै ॥ ३ ॥ उन्हीके इस विराट्‌ ब्रह्माण्ड 
दारीरमें तीनों खोक धित हैँ | उन्हीकी इच्दियसि समस्त 
देहास्यिंकी. ज्ञानेन्द्रिय ओर कर्मेन्दियौँ बनी है । 
उनक्रे खरूपसे दी खतःसिद्ध ज्ञानका सञ्चार होता है, 
उनके श्वास्‌-प्रश्वाससे सव शरीरोमे वक आता है तथा 
इन्दियोमे ओज ८ इन्दिर्योकी राक्ति ) ओर कमं करनेकी 
दाक्ति प्रप्त होती है । उन्दीकरे सच . आदि गुर्णोसे 
संसःरफी स्थिति, उत्पत्ति ओर प्रख्य होते हें । इस 
विर।ट शरीरके जो शरीरी है, वे ही आदिकतां नारायण 
दै ॥ 9 ॥ प्हले-पहर जगत्‌की उत्पत्तिके च्य उनके 
रजोगुणके अशसे व्या इए, फिर बे आदिपुरुष ही 
संसारकी तिके व्यि अपने सच्वांशसे धमं तथा 
ब्राह्म के रक्षक यज्ञपति विष्णु वन गये । पिरि वे हीं 
तमोगुणकरे अंशसे जगते संहारके च्य रुद्र बने । इस 
प्रकार निरन्तर उन्दीसे पसितन्चीक प्रजाकी उत्पत्ति, 
शिति ओर संहार होते रहते ह ॥ ५ ॥ 


दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम था मूति । 
वह धर्मकी पतनी थी 1 उसके गभेसे भगवानने ऋषिश्े्ठ 
रान्ताव्मा (नरः ओर (नारायणके रूपमे अवतार च्या | 
उन्होने आलमतच्का साक्षात्कार करनेवाले उस 
मगवदाराधनरूप कमक उपदेशा किया, जो वास्तवे 


कमेबन्धनसे चछुडनेवाला ओर नेष्कम्ये सितिको ग्राप्त 


करानेग्राख है । उन्होने खयं भी वैसे ही कर्म॑का अचु- 
छान किथा |, वड़े-बडे ऋषि-सुनि उनके चरणकमर्छकी 
सेवा करते रहते है । बे आज भी बदर्किश्चममे उसी 


योऽद्यापि चास्त ऋषिवयं निषेविताङघि;॥ ६ 1) | कम॑का आचरण क्रते इए विराजमान दै ॥ ६ ॥ 


१. सच्वधाम्नः । २. निविष्टः । ३. मूल्या । 





 , . 


“ १ 


७२८ भरीमद्भागचत [ अ० 








= ज ववव्वज----~~~~-~-ज-व्व्व्व्व्व्य्यव्व्ववववव्व्व्वय------------------- 


इन्द्रो बिशङ्य मम धाम जिधरक्षतीति ये अपनी घोर तपस्यके दारा मेरा धाम छीनना चाहते दै 


इन्द्रने एेसी आशंका करके स्री, वसन्त आदि दल-बल्े 
साथ कामदेवको उनकी तपष्या्मे विघ्न डानेकरे व्यि 
भेजा । कामदेवको भगवानूकी महिमाका ज्ञान न था; इसव्य 
वह अप्सरागण, वसन्त तथा मन्द-सुगन्ध वायुके साथ 
वदरिकाश्रममें जाकर ल्ियोके कयाक्ष-बाणोँसे उन्ं धायकं 
करनेकी चेष्टा करने ्गा ॥ ७ ॥ आदिद्छ नर नारायणने 
यह जानकर्‌ कि यह इन्द्रका कुचक्र है, भयसे कोपते हए 
काम आदिकोंसे हंसकर क्वा--उस समय उनके मनमें 
किसी प्रकारका अभिमान या आश्चर्य नकी यथा| 
| मलयमारुत ओर देधाङ्गनाओ ! तुम खोग डरो 
मतः; हमारा अतिध्य खीकरा करो | अभी यद्वीं ठरो, 
दमारा आश्रम सूना मत करो ॥ ८ | राजन्‌ | जव 
नर-नारायण ऋषिने उन्हें अभमयदान देते दए इस प्रकार 
कहा, तव्र॒ कामदेव आद्रिके चिर ठजनासे अक्त गये | 
उन्होने दयालु भगव्रान्‌ नर-नारायणसे कदा----श्रमो ! 
आपके व्यि यह कोई आश्र्यकी बात नहीं है; क्योकि 
आप मायासे परे ओर नित्रिकार हैँ । वडे-बडे आत्माराम 
ओर धीर पुरुष निरन्तर आपके चरणके प्रणाम 
करते रहते हैँ ॥ ९ ॥ आपके भक्त आपकी भक्तिके 
प्रमावसे देवताओंकी राजधानी अमरावतीका उल्लक्गन 
करके आपके परमपदको प्राप्त होते हैँ । इसि जवर 
वे भजन करने ठगते है, तत्र देवताल्योग तरदह-तरहसे 
उनकी साधनम विन्न उक्ते हैँ। रवितं जो छो 
केवर कमंकण्डमें कगे रहकर यज्ञादिके द्रारा देवताओंको 
वलिक ख्पमे उनका भाग देते रहते है, उन लोगोके 


कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बद्ुपाख्यम्‌ । 


 गत्वाप्सरोणणवसन्तसुमन्दवातैः 








ज्ीप्क्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७॥ 

विज्ञाय शक्रङ्रतमक्रममादिदेवः 

प्राह प्रहस्य गतविसय एजमानान्‌ । 
मा भष्ट भो सदन मारुत देववध्वो 
= गृह्णीत नो बिमशल्धमिमं इरुष्वम्‌।। ८ ॥ 
इत्थं दुवत्यभयद्र नरदेव देवाः 

सव्रीडनम्रशिरसः सघरणं तसचुः 1 
नैतद्‌ विभो तयि परेऽविृते विचित्रं 


ङ स्वारामधीरनिकरानतपादपग्ने ॥ ९॥ 


त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः 


स्वोको विल्व परमं जतां पदं ते। मार्गमे वे किसी प्रकारका किन नहीं डालते ! परतु 
प्रभो | आपके भक्तजन उनके द्वारा उपस्ित की इई 
नान्यद बहिषि बलीन्‌ ददतः स्वभागान्‌ विध्न-बाधाओंसे गिरते नहीं, बल्कि आपके कर्‌- 


कमलोंकी छन्रशछछायामेँ रहते इए वे विष्नोके सिरपर 
पैर रखकर अगे बढ़ जाते है, अपने ख्सषयसे च्युत 
नहीं ह्येते ॥ १०॥ बहृत-से लोग तो स होते 
है जो भूख-प्यास, गमी-सदीं एवं ओंधी-पानीके कटको 
तथा रसनेन्दिय ओर जननेन्दियके वेगोको, 1 
समुदोके समान है, सह लेते ह --पार कर्‌ =, ह । 





¬  धत्तेपदंत्ममविता यदि विमू्नि॥१०॥ 


त्तत्रिकालयुणमारुतनेहयरोरन्या- 


ष 
1 
ध 






= क =. चये 
नाः < ^~ "> करत म > = 
क व्‌ 51 ~ न ऋ ˆ ` + ` ~ हक 
~ ऋक {त ण न * ॥ न । + 6 ऋ + + ति 
33 व ६ क > ४: हैक +. * 


चै छ ॥ # 
> ~ 
४ +) ऋ 
॥) 








ऋ) ] 


 अ० ४] 











क्रोधस्य यान्ति विफल वचं पदे गो- परंतु फिर भी वे उस क्रोधके वदाम हयो जते ई 
जो गायके एुरसे बने गड्डेके समान दै ओर जिससे 

म॑जन्ति दुश्वरतपश्च व्रथोत्सृजन्ति ॥॥११॥ | कोई लभ नहीं दै--आत्मनाशक दै । ओर प्रमो | 
वे इस प्रकार अपनी कठिन तपस्याको खो बैठते 
हैः ॥ ११॥ ज्र कामदेव, वसन्त आदिं देवतानि 
इस प्रकार स्तुति की तव सर्वशक्तिमान्‌ भगवानने 
अपने योगवलसे उनके सामने वहूत-सी रेसी रमणिरया 
प्रकट करके दिखच्यीं, जो अद्धत खूप-खावण्यसे सम्प 
| ओर विचित्र वल्रालङ्कारोसे घुसननित शीं तथा भगवानूकी 
ते देवायुचरा द्रा खियः शओ्रीखि रूपिणीः । सेवा कर री थीं ॥ १२॥ जव देवराज इनदरके 
अनुचरोने उन लकष्मीजीके समान रूपवती चिरयोको 
देखा, तत्र उनके महान्‌ सोन्दर्यके सामने उनका चेहरा 
फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे 
निकलनेव्राटी दिव्य सुगन्धसे मोहित हो गये ॥ १३ ॥ 
अव उनका सिर छक गया । देवदेवेरा भगवान्‌ नारायण 
हते इए-से उनसे वोले--तुमलोग इन्मेसे किसी ` ` 
एक सरीको, जो तुम्हारे अनुरूप हो, ग्रहण कर खो | वह 


110 . ॥ 


इति प्रगृणतां तेषां स्ियोऽत्यद्धुतदशेनाः । 


दशयामास शुश्रूषां ख्चिताः इवं तीरिंथुः ॥१२॥ 


५. ~~ 
[ष 
“क 
+ 


















गन्धेन युुहस्तासां रूपौदायंहतधियः ।१३॥ 
तानाह देवदेवेशः प्रणतान्‌ प्रहसन्निव } 


आसामेकतमां बर्ध्वं सवणौ ख्गभृषणाभ्‌ ॥१४। 


~ तुम्हारे खगलोककी शोभा बद़ानेवाटी होगी ॥ १४॥ देवराज स 
आसत्याद॑श्मादाय नत्व। त ॒सुरवान्दनः। ह्दके अुचरोने (जो आज्ञाः ककर भगवानूके ` 


आदेशको खीकार किया तथा उन्हें नमस्कार किया | 
उवंशीमप्सर्र्ठं पुरस्छृत्य दिवं ययुः ॥१५॥ | भर उनके द्वण बनायी इई कियेभसे शरे अस्रा 
क उवंशीको आगे करके वे खगखोकम गये ॥ १५ ॥ ` 
ृन्द्रायानम्य सदसि श्र्वतां त्रिदिवौकसाम्‌ । वहा प्ुचकर उन्होने इन्द्रको नमस्कार किया तथा 
सभाम देवताओंके सामने भगवान्‌ नर-नारायणकरे वल ` 
ओर प्रमावका वर्णन क्रिया । उसे सुनकर देवराज ` 
| इन्द्र अत्यन्त भयभीत ओर चकित हो गये ॥ १६ ॥ 
न कयत भगवान्‌ विष्णुने अपने खरूपमे एकरस शित रहते 
हंसखरूप्यवदद्च्युत आत्मयोगं हए भी सष्ूणं जगते कल्याणक ल्मे बहत-से 
ॐ च ठ कल्मवतार ग्रहण किय है 1 बिदेहराज ! हंस, दत्तात्रेय, 
दत्तः कुमार ऋषभो भगवान्‌ पिता नः। सनक-सनन्दन-सनातन-सनल्ुमार ओर हमारे 
कः | षमके रूपमे अवतीणे होकर उन्होने आत्मसाक्षात्कारः 
| के साधनाका उपदेश किया है उन्न ही हयप्रीव- 
~ त | अवतार छेकर मधु-कौटम नामक अघुरोका संहार उ 
हता मधुभिदा श्तयो हयास्ये ॥१७॥ | उ वेगत ध्रा चये इर चोका उर कि 


ऊचुनारायणबलं शक्रसतत्रास॒षिसितः ॥१६॥ 
















६ {६ < विष्णु शिवाय जगतां करयावतीण- ` 





न ॥ 1 कृ [र 
५ = = ४. र 
क ॥। लि 9. क, 
॥ व 
3 १५ ज य" क 
= जः ॐ: 
क # ` च भ 


भा० स० ल० २. ९२.२-- 


` "अछ 


० भीमद्भागवत [ अ० ४ 
- नच 
गुप्ोऽप्यये मजुरिरोषधयश्च मात्स्ये । है ॥ १७ ॥ प्रल्यके समय मत्स्यावतार ऊेकर उन्होने 


भावी मनु सत्यव्रत, प्रध्वी ओर ओषधियोकी-- घान्यादि- 

क्रोडे हतो दितिज उद्धरताम्भसः क्षमाम्‌ | की रक्षा को ओर वराहावतार प्रहण करके पूष्वीका 
रसातलसे उद्धार करते समय हिरण्याक्षका संहार किया | 
कूमांवतार ग्रहण करके उन्हीं भगवानूने अमृत-मन्थनका 
कायं सम्पनल करनेके व्यि अपनी पीठपर मन्दराचछ 
8 धारण किया ओर उन्हीं भगवान्‌ विष्णुने अपने शरणागतं 
ग्राहयत्‌ ब्रपन्नासभराजमष्ठज्दातम्‌ ।१८॥ एत आतं मक्त गजेन्द्रको ग्राहसे दछुडाया ॥ १८ ॥ 
| एक वार बाठखिल्य ऋषि तपस्या करते-करते अत्यन्त 
{ सस्त॒न्वतोऽब्धिपतिताज्छमणानृषींशच | दुवेछहो गये ये | वे जव क्यप ऋषिक य्य 
। समिधा खा रहे थे, तत्र॒ थककर गायके घए्वुरसे वने हए 
शक्रं च चतरवथतस्तमसि प्रविष्टम्‌ । गडढेम गिर पड़े, मानो समुद्रम गिर॒ गये ् । उन्होने 
जवर स्तुति की; तव॒ भगवान्‌ने अवतार टेर उनका 

[8 देवसिमो न उद्धार किया । त्रासो मारनेके कारण जत्र इन्द्को 
क ऽषुरणगृहे पिहिता अनाथा ्रहहत्या ठगी ओर वे उसके भयसे मागवर छिप गये, 
। > तत्र॒ भगवानने उस हत्यासे इन्द्रकी रक्षा की; ओर 
। > जष्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां ससिंहे ।॥१९॥ | जब अघुरोने अनाथ देवाङ्गनाओंको वन्दी वना ल्या, 
। = तव भी भगवानने ही उन्दं अघुरोके चंगुटसे चुडाया । 
देवासुरे युधि च देत्यपतीन्‌ सुरां जब हिरण्यकरिपुके कारण ग्रहाद आदि संत पुरुषोको 
भय पर्चने क्गा, तव उनको निर्भय करनेकरे च्य 

^  हतान्तरेषु शुवनान्यदधात्‌ कसाभिः 1 भगवान्‌न दृसिंहावतार्‌ प्रहण्‌ किया ओर दिरण्यकरिपुको । 
१ मार डला ॥ १९ ॥ उन्होने देवताओंकी रक्चाके य्य 
भूत्वाथ वामन इमामहरद्‌ बे ‡ ह्मां देवासुरसपराममं देत्यपतियोका स्स्‌ ‰ किया ओर विमिन 
मन्वन्तरमै अपनी शक्तिसे अनेकों कलटावतार धारण 

करके त्रिभुवनकी रक्षा की । फिर वामन-अवतार ग्रहण 
करके उन्होने याचनाके बहाने इस्त प्रथ्वीको दैत्यराज 
{क्षत्रिया च तिः = विसे छीन छया ओर अदितिनन्दन देवताओंको दे 
निशवत्रिमामहृत गां च त्िःसतकृतो दिया ॥ २० ॥ परञ्यराम-अवतार ग्रहण कर्के उन्होनि 


६१ ही परथ्यीको इकीस वार क्षत्रियद्ीन किया । परञ्यरामजी तो 





छर, करर क, = (त त ९ 
काम धताऽद्रिरम्तोन्मथने खपे 







दिनः 


॥ अ २ 









$ याच्जाच्छलेन समदाददितेः सुतेभ्यः) २०1] 


थ -क- ह ¢ + 
ध त द ्ममभागवाः | हैहयवंशका प्रख्य करनेके ल्व मानो शगुवंशामे अग्नि- 
ऋ शर ह्पसे ही अवतीर्णं इए ये | उन्हीं मगवान्‌ने रामावतारमें 
ह ताञ्च जवन ५ ङ समुदरपर पुरु बधा एवं राण ओर उसकी राजधानी 
~ छङ्काको मय्यामेट कर दिया । उनकी कीतिं समस्त 


सीतापतिजंयति लोकमरुघकीतिः ॥२१॥ -लोकोके मको नष्ट करनेवाली है । सीतापति भगवान्‌ 

[- | राम सदा-स्वदा, सर्वत्र विजयी-दी-विजयी टै ॥ २१ ॥ 
` | स्यि ही भगवान्‌ यदुवंशमे जन्म ५ एसे-रसे 

- = क ¢. = । 
तः करिष्यति सुरैर दुष्कराणि । = | क करे, निदं डच दन्त * ^ सकते । 


॥ = 
 ; (न 
१ ( र र ८, ४.५५ 
| ^ # ५ ~. >> 
" = 









कि च 
= न ` ^ ग 
१ न्क, ि 
(~ „ऋनि नि |, [^ न न्क = 
र ~> ऋष ` न्ड +> 
> की. ~ - 
> करि : ५. 9 न कक अ 






छ" 
कि 


।॥ 
क ॐ: 
















वादैरविंमोहयति यज्ञकृतोऽतदहयन्‌ र आग] चलकर मान्‌ दी दके सम गक श 
ओर यज्ञके अनधिकारिको यज्ञ करते देखकर अनेक ` ` 
प्रकारके तकं-वितकसि मोहित कर ठेगे ओर कटियुगके 
अन्तमं कल्कि-अवतार ठेकर वरे ही शूद्र राजाओंका 
वथ करेगे ॥ २२ ॥ महावाह विदेहान ! भगवानूकवी ` 
एवंविधानि कमणि जन्मानि च जगत्पतेः । कीतिं अनन्त {है । महात्माओनि जगत्पति भगवान्‌के ` 

एेसे-एेसे अनेकों जन्म ओ" कर्मोका प्रचुरतासे गान भी 
भ्रीणि भूरियशसो वणितानि महाज ॥२३॥ । किया है ॥ २३ ॥ 


शद्रान्‌ कल कितिथ॒जो स्यहनिष्यदन्ते।।२२॥ 





इति श्रीमद्भागवते महपुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादरस्कन्वे चतुर्थोऽव्यायः ॥ % ॥ 





£ 
+ 
अथ पञ्चमोऽध्यायः 
भक्तिदीन पुर्पंकी गति ओर भगवान्की पूजाविधिका वर्णन 
राजोवाच राजा निमिने पृचा- योगीश्वरो । आपव्ेग तो 
र्ठ आत्मज्ञानी ओर भगवानूके परमभक्त हैँ । कृपा 
करक यह बतलाइये किं जिनकी कामना शान्त नहीं 
दई है, लोकिक-पारोकिक भोर्गोकी लल्षा मिदी नही 
है ओर मन एवं इन्द्रियं भी वशम नहीं हँ तथा जो 
प्रायः भगवान्‌का मजन भी नहीं करते, एेसे ठोर्गोकी 
क्या गति होती है १॥ १॥ 
अव आटवे योगीश्वर चमसजीने कहा- राजन्‌ 
विराट्‌ पुरुषके सुखसे सचप्रधान ब्राह्मण, सुजाअओसे 
स्व-रजप्रधान क्षत्रिय, जघोंसे रज-तमप्रघान वेश्य ओर 
चरणोसे तमःप्रधान शुदधकी उत्पत्ति इई है । उन्दीकी 
जोधोसे गृहस्थाश्रम, दयसे ब्रह्मचर्ये, वक्षःस्थक्से वान- 
प्रथ ओर मस्तकसे संन्यास-- ये चार आश्रम प्रकटः 


इए दह । इन चारों वर्णो ओर आश्रमोके जन्मदाता 











भगवन्तं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमाः । 


तेषामशान्तकामानां का निष्टाविजितात्मनाम्‌।। १ 











पमस उवाच 
युखनव्राहरुपरदेभ्यः पुरूषस्याध्रमेः सह । 






चत्वारो जज्ञिरे वणां गुणेर्विप्रादयः पृथक्‌ ॥ २ ॥ 

















| है; उसका अधःपतन दहो जाता है ॥ २-३॥ 
| = 9. 

द्र॒ आदि भगवानूयी कथा 

मकीतंन आदिसे कुछ दूर पड़ गय 


----------------------~--------------- 
~ न य क कव स -कनव्क्कषडकर ॐ 6 = + 


= सख्यं भगवान्‌ ही हँ । वही इनके खामी, नियन्ता ओर 
= य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्‌ । आत्मा भी हैँ । इसच्ि इन वण ओर आश्रमम रहने- 
~ 4 वाला जो मनुष्य भगवानूका जन नहीं करता, बल्कि 
छ उक्टा उनका अनादर करता है, वह अपने स्थानः 
नभजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्‌ र्टाः पतन्त्यधः 1\३॥ | वर्ण, आश्रम ओर मनुष्य-योनिसे भी च्युत हो जा 


२. स्थानभ्रष्टाः । 


सर्वेषु च्धत्तनुभृत्खवसितं 


क 





क 


न 


क, 
५ षद 
॥ छ 4 च. 
" क क र 
वि * 
इ ^. 
नि 
==ॐ £ 1 8 
न्न 8 - 
"कणित 
नि 


वेदोपगीतं च न शृण्वतेऽबुधा वे ही अपने आत्मा ओर प्रियतम है । परंतु वे मूं 


च 


+ 


७३२ श्रीमद्भागवत [ अ० ५ 


~~~ ~~ 











ख्ियः शद्रादयश्चेव तेऽनुकम्प्या भवादृशाम्‌ ॥  ॥ , दै । ब आप-जैसे भगवद्वक्तोकी दयाके पात्र है । 
की ६ | | आपखोग उन्हें कथा-कीतंनकी सुविधा देकर उनका 
विप्रो राजन्यवेश्यो च हरेः प्राप्ताः पदान्तिकम्‌ । उद्धार करें ॥ ¢ ॥ ब्राह्मण, क्षत्निय ओर वैद्य जन्मसे, 
वेदाव्ययनसे तथा यज्ञोपत्रीत आदि संस्कारोसे भगवानकते 

श्रतेन जन्मनाथापि स॒दयन्त्याञ्नायवादिनः ॥ ५।। | चरणोकि निकटतक प्च चुके दै । पिरि भी वे 
वेदोका असली ताप्य न समञ्ञकर अर्थवादमे कगकर 
मोहित हो जाते हैँ ॥ ५॥ उन्हें कर्मका रहस्य 
| मादरम नहीं है । मूखं होनेपर भी वे अपनेको पण्डित 
मानते हँ ओर अभिमानमे अकड़ रहते हैँ । बे मीटी- 
रजसा धोरसङ्टपाः काका अहिमन्यवः । मीटी वातमे मूक जाते हँ ओर कवठ वस्तु-दयन्य 
दाब्द-माघुरीके मोहम पड़कर चटकीटी-मडकीटो वातं 

दाम्भिका मानिनः पापा बिहसन्त्यच्युतम्रियान्‌।\७॥ | कहा करते है ॥ ६ ॥ रजोगुणी अधिकताके कारण 
& 03 उनके सङ्कल्प बड़े घोर दोते हैँ | कामनार्ओकी तो 

बदन्ति तेऽन्योन्यञुपासितस्तियो सीमा दी नटीं रहती, उनका क्रोध भी रेसा होता 
= न है, जेसे सोपका, वनावट ओर घमंडसे उन प्रेम होता 
गष मंपुन्यपरेषु चाशिषः । है । वे पापीटोग भगवान्‌के प्यारे भक्तोकी सी उड़ाया 
यजन्त्यसुष्टानविधानदक्षिणं करते हँ ॥ ७ ॥ वे मूं वड़-र्टोकी नही, बिरयोकी 
वि उपासना करते हँ । यही नही, वे परस्पर इकट्‌ठे होकर 

२ र भन्ति पशूनताष्टद्‌; ॥ < ॥ | उस धर-गृहस्थीके सम्बन्धमे ही बड़े-बड़े मनसे बधते 

५६ है जहाका सव्रसे बड़ा सुख ी-सहधासमे ही सीमित है । 

श्रिया विभूत्याभिजनेन बिद्या वे यदि कभी यज्ञ भी करते है तो अन-दान नहीं 
< करते, विधिका उतल्लञ्घन करते ओर दक्षिणातक नही 

त्यागेन सूपेण बङेन कर्मणा देते । वे कर्म॑का रहर न॒ जाननेवाले मूख केवल 
अपनी जीमको सन्तुष्ट करने ओर पेटकी भूख मिटने-- 
जातसयेनान्धधियः सदहैशवरान्‌ दारीरको पुष्ट करनेके च्य बेचारे पञ्यओंकी हत्या 
करते हं ॥ ८ ॥ धन-वैमव, कुलीनता, विवा, दान, 
सोन्दयं, बल ओर कर्म आदिके धमंडसे अघे हो जते 
है तथा वे दुष्ट उन भगव्त्ेभी संतों तथा ईरका 
भी अपमान करते रहते ह ॥ ९ ॥ राजन्‌ ¦ वेदोने 
इस बातको बार-बार दुहराया है किं भगवान्‌ आकाराके 
समान नित्य-निरन्तर समस्त शरीरधापयिमे शित हे । 








कमेण्यकोविदाः स्तन्धा मूर्खाः पण्डितमानिनः । 


बदन्ति चाटकान्‌ मढा यया माध्व्या गिरोत्सुकाः।।६॥ 


सतोऽवमन्यन्ति हरिप्रियान्‌ खलाः ॥ ९॥ 


यथा  खंमात्मानमभीष्टमीश्वरम्‌ 1 


किक 
कः 

[च क । 
र 


। इस वेदवाणीको तो घुनते दी नही ओर केवर बड़े-बड़े 
मनोरथानां भ्रवदन्ति बातंया ॥१०॥ मनोरथोकी बात आपसम कहते खुनते रहते ह ॥ १० ॥ 


किः - 5 
ब्‌ 
१ कः 
> । 
॥॥ 
= क 
गः ~+ न ऊक 
2, ल ©. = ५९१ प 
च ० । } # 
भद च, वि ~ क ॥ि ह न: 


४. नाः * ए बद ज 2---------~ ~----~-- = सी ` 
॥ भय 


अ० ५4 | एकादश्च स्कन्ध ७३२ 


लोके व्यवायाभिपमधसेवा ( वेद-व्िधिके खूप ेसे दी कपेकिं करनेकी आज्ञा 
देता है कि जिनमे मनुष्यकी सखाभाव्रिक्र प्रवृत्ति नहीं 

नित्यास्तु जन्तोनंहि तत्र चोदना । होती ।) संसारम देखा जाता है किं जैथुन, 

| माप्त ओर मदयकी ओर प्राणीकी सखाभाविक 
व्यवस्ितिस्तेषु विवाहयज्ञ- प्रवृत्ति हो जाती है | त्र उसे उक्षम प्रवर्त करनेके 

| व्यि व्रिधान तो हो ही नहीं सकता । रेसी सिथतिमे 

सराग्रैरासु निव्र्तिरिष्टा ।।११॥ विवाह, यज्ञ ओर सौत्रामणी यज्ञकर द्वारा ही जो उनके 

| सेवनकी व्यवस्था दी गथी है, उसका अर्थं है छोगोकी 
उच्छुह्लर प्रवृत्तिका नियन्त्रण, उनका म्यादामें स्थापन । 
वास्तवमे उनकी ओरसे खोगोंको हटाना दी श्रुतिको 
ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रश्ान्ति । अभीष्ट है॥ ११॥ धनका एकमात्र फल है धमे; 
क्योकि धम॑से ही प्रमत्वका ज्ञान ओर उसकी निष्ठा- 
अपरोक्ष अनुभूति सिद्ध होती है ओर निष्ठामं ही 
परम रान्ति है । परंतु यह कितने खेदकी वात है कि 
मृत्युं न परयन्ति दुरन्तवीयंम्‌ १२; | रोग उस धनका उपयोग घर-गृहस्थीके स्वरा्थमिं या 
कामभोगमें दी करते हैँ ओर यह नहीं देखते किं हमारा 








धनं च धर्मकषफलं यतो वें 





गृहेपु युजञ्न्ति  कठेवरख 


यद्‌ प्राणभक्षो विष्ठितः सराया- यह उारीर यका रिकार है ओर वह य किसी प्रकार 
¦ भी टी नदीं जा सकती ॥ १२ ॥ सौत्रामणी यज्ञम 
् . भी सुराको संघनेका ही विधान है, पीनेका नहीं । यज्ञमे 

स्तथा परारारभनं न दहिंसा। 


पडुका आक्मन ८ स्पशंमात्र ) दही विहित दहै, हिंसा 
नहीं । इसी प्रकार अपनी धमंपत्नीके साथ मैथुनकी आज्ञां 
भी विषयभोगवे ल्य नहीं, धार्मिक परम्पराकी रश्षाके 
निमित्त संतान उत्पन्न करनेके च्वि ही दी गयी है| 
इमं विशुद्धं न विदुः खधर्मम्‌ ॥१३। | परत जो लोग अरथवादके वचरनोमिं फंसे है, निषयी है 
| वे अपने इस विद्ुद्ध धमम॑को जानते दी नहीं ॥ १३ ॥ 

| ये त्वनेवंविदोऽसन्त ¦ सन्धा; सदभिमानिन ,] जो २स्‌ विङुद्ध धमंको नहीं जानते, वे घमंडी वास्तवमे 
तो दुष्ट है, परंतु समञ्लते हैँ अपनेको श्रेष्ठ । बे धोखेमं 

व: = पड़े इए लेग पञ्यओंकी हिंसा करते है ओर मरनेके वाद्‌ 
पशून्‌ दुह्यन्ति विसखन्धाः प्रत्य खादन्ति त च तान्‌१४ | > पञ्च दी उन मारजेाको खते ह ॥ ९४ ॥ चहं 
शरीर गृतक-शरीर है । इसके सम्बन्धी भी इसके साथ 
ही छूट जाते है । जो लोग इस शरीरसे तो प्रेमकी गौठ 
. वध ठेते ह ओर दूसरे ररीरोमे रहनेवाठे अपने दी आता 
स तत एवं सवेशक्तिमान्‌ भगवानूसे द्वेष करते है, उन मूका 
म्रतके साचबन्धेऽसिन्‌ बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः ।.१५॥ भपतन्‌ निशित 21 


सम्पादन करके कौवल्य-मोक्ष नहीं प्राप्त किया है ओर जो 
थे केवस्यमसम्प्रप्ता ये चतीताश्च मूढताम्‌! । पूर मूढ भी नहीं है, वे अधूरे न इषरके ई ओर न 


एवं व्यवायः प्रजया न रत्या 


द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्‌ । 


; ङ्व | ह 






















"ण ] 
ऋ ५ 9. 


उ हि समेभसः॥२२ उपाङ्ग, घुदर्हान आदि अल ओर घुनन्द प्रति पाषदोसे 
3. श | सयुक्त रहते है । कच्युगमे शष्ठ बुद्धिसम्पन्न पुरुषरेसे . 
| येकि द्वारा उनकी आराधना करते हैँ, जिनमे नाम, 
गुण, ठी आदिके की्तनकी प्रधानता रहती है | 
॥ ३२ ॥ वे लोगं शावानवी स्तुति इस प्रकार करते 
है श्रमो । आप रारणागतरक्षकं दै । आपके चरणारविन्द 
सदा-सर्वदा ध्यान करनेयोम्य, माया-मोहके कारण । 
हौनेवारे सांसार्कि पराजयोंका अन्त कर देनेवाङे तथा | 
मक्तोवी समस्त अभीष्ट ॒वस्तुओंका दान करनेवाछे | 
कामचैुखद्य ह वे तीर्थोको भी तीथं बनानेवार ९ 
खयं परम तीर्थखखूप है; शिव, ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े ¦ 
देवता उन्हे नमस्कार करते है ओर चाषे जो को$ 
उनकी शरणमे आ जाय, उसे खीकार कर ठेते है | 
सेवकोकी समस्त आति ओर व्रिपत्तिके नारक तथा - 
संसार-सागरसे पार जानेके च्ि जहाज हे । महापुरुष ! 
तै आपके उन्हीं चरणारविन्दोकी बन्दना करता द 
॥*२२॥ मगवन्‌ ! आपके चरणकमत्की महिमा कौन 
कहे १ रामावतारम अपने पिता दश्षरथजीके ` वचने 
 धम्रष्ठ आयंबचसा यदगाद्रण्यम्‌। देवताअक ल्य भी वाञ्छनीय ओर दुस्त्यज राश्यल्ष्मीको 
2 छ प . छोडकर आपके चरणकमल वन-वन॒ धूमते-रिरि । 
[क . ` सचमुच आप धर्मनिष्ठताकी सीमा है । ओर महापुरुष ! 
| माया्रगं द्यितयेष्ितमन्वधावद्‌ अपनी प्रेयसी सीताजीके चाहनेपर जान-बृक्चकर आपके 
क ~ चरणकमक मायामृगके पीछे दौडते रहे | सचमुच आप 


प्रेमी सीमा है | प्रमो ! मै आपके उन्हीं चरणारविन्दोकी 
बन्द महापुरुष ते चरणारविन्दम्‌ ॥३४॥ | बन्दना करता ड ॥ २४ ॥ 


अपने युगवे अनुरूप नाम-रूगदयारा विभिन्न प्रकारसे 


मगवान्‌की आराधना कसते हँ । इसमे सन्देह नहीं किं 
धप, अथ, काम, मोक्ष- सभी पुरुषार्थेके एकमात्र 
। खामी भगवान्‌ श्रीहरि ही है ॥ २५ ॥ कल्ियुगमे केवक . 
तवमा रग्ञाः सारभागिनः सङ्कीतनसे दी सारे खाथं ओर प्रमाथं बन जाते है | ` 
अ न इसव्थि इस युगका गुण जाननेबाटे सारग्राही श्रेष्ठ पुरुष ध 
9 सवः स्वार्थोऽभिंरभ्यते ३६ कच्यगकी बदी प्रशंसा करते है, इससे बडा प्रेम करते । 
ए... & ॥ २६ ॥ देहाभिमानी जीव संसास्चक्रमे अनादि 
काल्ये मटक रे ई 1 उनके "ल्य भगवान्‌की टीला 


ध्येयं सदा परिभिवसमभी्दोहं 
तीास्पदं शिषिरिश्रिलतं शरण्यम्‌ । 
° शाति प्रणतपाल भवाभ्धिपोतं 
बन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्‌ २३ 


त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितरान्यरक्ष्मीं 


राजन्‌ श्रेयसामीश्वरो हरिः ॥२५॥ 


=-= 1 9 ५. 


=. "कठ @ ` = काकः = 
1 


५ एकाद स्कन्ध ७२७ 
--स्न्न्यन्व्य्व्य्य्य्य्ण्ण्थ्व्य्य----------------------------------- (यज्व 


यतो विन्देत परमां शान्तिं नह्यति संति; 11911 | गण ओर नामके कीर्तने बढ़कर ओर कोई परम स्म 
नहीं है; क्योकि इसये संसारम मटकना मिट जाता 
है ओर परम शान्तिका अनुभव होता है ॥ २७ ॥ 
~ राजन्‌ ! सव्ययुग, त्रेता ओर द्वापरकी प्रजा चाहती है 
प खट भविष्यरि रायणपरयमणा! | क - 
७ भविष्यन्ति नारायगपरायनाः 1३८} | विः हमारा जन्म क्म हो; क्योकि कलियुगे 
कचित्‌ कचिम्महाराज द्रविडेषु च सूरिः । | कही-कहीं भगवान्‌ नारायणकरे चरणागत-उन्हीके आश्रय 
५ । एहनेबाठे बहूत-से मक्त उन हग । महारज विदेह । 

ताश्रपणीं नदी य॒त्र कृतमारा पयश्िनी ॥३९}] ¦ कल्मिगमं 7विदेशम अधिक भक्त पाये जाते &, जं 
र । ताम्रपर्णी, कृतपाख, पयख्िनी, परम पत्रि्र कवरी; 
कारा च महापुण्या श्रतीची च महानदी । ` महानदी ओर प्रतीची नामकी नदिया वहती है । 
~ 2 | राजन्‌ ! जो मनुष्य इन नदिथोका जख पीते है, प्रायः 
थ ॥पवन्तं जर तासां मलुजा मनुजेश्वर । | उनका अन्तःकरण द्र हो जाता है ओर वे भगवान्‌ 
रायो भक्ता भगवति वासुदेवेऽपराशयाः १1४०} | गडदेवके भक्त हो जते ह ॥ ३८-४० ॥ राजन्‌ । 
| जो मनुष्य ध्यह करना बाकी है, वह करना आवदयक 











छृतादिपु प्रजा राजन्‌ कराविच्छन्ति छम्भ्वप्‌ । 





देवपिंभूताप् नृणां पितृणां ८ --इत्यादि कमं-वासनाओंका अथवा मेदबुद्धिका 
पर्त्याग करके सर्वाममावसे शरणागतवत्सल, प्रेमके 
> ~ ४ वर्दानी मगवान्‌ सुकुन्दकी शरणम आ गया है, वह 
न किङ्करो नायण्रणी च राजन्‌ । 6 त ह 
देवताओं, ऋषिथो, पितरो, प्राणियों, बुटुम्बियो ओर 
¢ 


सधीत्मरा यः शरणं शरण्यं अतिथियोके ऋणसे उ्रण हो जाता है; वह क्रिसीके 


६ ६ अधीन, किसीका सेवक, किंीके वन्धनमे नहीं रहता 
गता इन्द्‌ परत्यं कतस ॥४९॥ |॥ ४१॥ जो प्रेमी भक्त अपने प्रियतम मगवांूके 
2 ~ चरणकमल््ैका अनन्यमाव्रसे--दूसरी भावनाओं, ` 
र ९५९७ अ३९।॥१ गं = ~~ मको 

अवस्थाओं, वृत्तियो ओर प्रडृत्तियोको छोडकर--मजन 

ह & 

्यक्तान्यभावख हरिः परेशः । | कता &, उसे पटी वात तो च है किं पापकं 

होते ही नही; परतु यदि कभी किसी प्रकार हो भी 
| जायं तो परमपुरुष भगवान्‌ श्रीहरि उसके दयम वैघ्कर 


= बह सव धो-बहा देते ओर उसके इदयको शद्ध 
धुनोति सवं हाद ससिषिष्ठः ॥८२) | कर देते है ॥ ४२ ॥ | 


नारएदजी कहते है-वसुदेवजी ! मिथित्मनरेश यजा 
निमि नो योगीश्ररोसे इस प्रकार मागवतधर्मोकां वणेन 
धमोन्‌ भागवतानित्थं ९४५ मिथिलेश्वरः | सुनकर नहत ही आनन्दित इए | उन्होने अपने तलिज 
जायन्तेयान्‌ यरमीन्‌ प्रीत्‌ \ सोपाण्यायो हयपजयत्‌।४३। ओर चायकि साथ ऋषमनन्दन नो योगीश्रोकी पूजा 

ऽन्तरीमिरे ह त कग |, २.1 इसके बाद सब लोगोके सामने ही वे 
1 तदार स राक पत सिद्ध अन्तर्धान `हो गये । विदद . निमिने उनसे सुने 
राजा धेमाजुपातिष्ठनवाप प्रमां गतिम्‌ ॥४४॥ | इए मागवतधर्ोका आचरण किया लर परमगति प्रा 


विकमं यच्चोत्पतितं कथश्िद्‌ 


गारद्‌ उवाच 


^ । ॥ 
ए] #- "ऋ, [न क अ = 
क - चकत + ^. = । 7 
५ क 
र * क? 
ह ह 


# 8१ 


[ना =-= 








लम्येतान्‌ महाभाग धर्मान्‌ भाणवता्छुान्‌ । 


आस्थितः र्भया ुक्तो निःसङ्गो याखसे परम्‌।४५५॥ 


क 9 = ् र +. + न "11 #, ( 
५ "+> १2११ 
गं ॥ , 9 = ‡ # 
वि ष 
क तननि ^ ~= ~ > धि ग ष्‌ ऽका, त (8 
। ~~ > श्र,“ 8 न ४ 
^ ८ + # १ 
ति, - > 
4 त 4 
1 


युवयो; खल दम्यत्योयशसा परितं जगत्‌ । 
ुत्रतामगमद्‌ यद्‌ वां भगवानीश्वरो हरिः ॥४६९॥ 
्नारिङ्गनालापैः हंयनासनभोजनेः । 
आत्मा बां पावितः कष्णे पत्रस्नेहं पर्वं तोः ॥४७॥। 
वैरेण यं नृपतयः चिंशपारपोण्ड्‌- 
शाल्वादथो गतिविरासविलेकनाचेः । 
ध्यायन्त भ कृतधियः ेयनासनादौ 


तत्साम्यमापुरलुर्तधियां पुनः किम्‌॥४८॥ 





' मापत्यवुद्धिमृथाः ङृष्णे स्ात्मनीशवर । 


मायामनुष्यभावेन गूदेश्चयं परेऽव्यये ॥४९॥ 











भूभाराखुरराजन्यहन्ते गु्ये सताम्‌ । 
अतीणस्य नित्ये यशो रोके वितन्यते ॥५०॥ 


की ` & 
` श्रीर्चुक उवाच 
। महाभागो वसुदेवो ऽतिविखित्‌ 
क ध. ` चं महाभागा जहतुमोहमात्मनः ॥५१॥ 


५.८१ चै र भव ॥ 
ॐ + ^, 
क्यः । ध = 
^) द ~, 4 न, 
“==. (६ > क ` ॥ 
 । पति । 9 कि 888. 4 @ र 
= छ # पुण्य | 
क + (६ (० छ | 4 + 
च" चंच ९ ह। प । . 3. । 4 च समाहित 
2८* ^ (क द = 0 ४.4 ५ । १ ९ ¶ 
का क, ८4 ५ „ म, ~अ. 4 
दन 
नि च 
। 
शि्पाल्शास्नपोण्डादयो # 
ध * 





ॐ 
1६ | |१ ( (~ 


५० "त्म मह्‌ 


॥ 


कानवा नि 


क्री ॥ ४४ ॥ महामाग्यवान्‌ वुदेवजी | मेने तुम्हारे . 


| अ० ५ 








आसे जिन मागवतपर्मोका वणन क्रिया हैः तुम भी यदि 
्रद्धके साथ इनका आचरण करोगे तो अन्तम सब 
आसक्तियंसे छटकर मगवानका परमपद प्राप्त कर्‌ 
लगे ४५ ॥ वघुदेवजी ! तम्डारे ओर देवकीके यशसे 
तो सारा जगत्‌ मरधूर हो रहा है; क्योकि सवाक्ति- 
मान्‌ मगवान्‌ श्रीकृष्ण तुम्हारे पुत्रके रूपमे अवतीणं 
हृए है ॥ ४६ ॥ त॒मलोगोनि मगवान्‌के दशन, आलिङ्गन 
तथा बातचीत करने एवं उन्हें सुत्ने, बैठाने, लित्मने 
आदिके द्वारा वात्सल्य-स्नेह करके अपना हदय छयुद्ध कर्‌ 
च्या है; तुम परम पवित्र हो गये हो ॥ ४७ ॥ वसुदेवजी | 
रिश्पाल, पैण्डूक ओर शाल्व आदि राजाओनि तो 
वैरभावसे श्रीकृष्णकी चाक-ढाक, गीला-विलास्‌; चितवन- 
बोढन आदिका स्मरण किया था । वह भी नियमानुसार 
नही, सोते, बैठते, चलते, पिरते--खाभाविकख्पसे 
ही | फिर भी उनकी चित्तवृत्ति श्रीकृष्णाकार्‌ हो गयी 
ओर वे साखप्य-सुक्तिके अधिकारी इए । फिर जो छोग 
प्रेममाव ओर अनुरागसे श्रीृष्णका चिन्तन करते है, 
उन्हे श्रीकृष्णकी प्रापि होनेमे कोई संदेह है क्या १।४८॥ 
वघुदेवजी ! तुम श्रीकृष्णको केवल अपना पुत्र दी मत 
खमञ्चो । वे सर्वात्मा, स्वेश्चर, कारणातीत ओर अविनी 
है | उन्होने टीव्मके ल्य मनुष्यरूप प्रकट करके अपना 
देयं छिपा रक्खा है ॥ ४९. ॥ ते पृथ्वीके भारभूत 
राजवेषधारी अघुरोका नाश ओर संतोंकी रक्षा करमेके व्िि 
तथा जीबोको परम शान्ति ओर सुक्ति देनेके व्ही 
अवतीणं इए हँ ओर इसीके व्यि जगतमे उनकी कीतिं 
भी गायी जाती है ॥ ५० ॥ 


भीद्यकदेवजी कहते है प्रिय परीक्षित्‌ नारदजीके ` 


मुखसे यह सव सुनकर परम माग्यवान्‌ वसुदेवजी ओर 
प्म भाग्यवती देवकीजीको बड़ा ही विस्मय हआ । उनमें 
जो उछ माया-मोह अवरोष था, उसे उन्होनि ताक्षण 
छोड़ दिया ॥ ५१ ॥ राजन्‌ | यह इतिहास परम पित्र 


है । जो एकामप्रचित्तसे इसे धारण करता है, वह अपना 








अ० ६] 


॥ ड" 
नि न - ~ 
=" क. ऋ 


| एकाद स्कन्प ७२०९ 


र -----------------~ 


स॒विधूयेह शमलं ब्रह्मभूयाय कल्यते ५२ | 


सारा शोक-मोह दूर करके ब्रहपदको प्रा होता 
दै ॥ ५२॥ 


[गीर 


इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादरस्कन्ये पञ्चमोऽव्यायः ॥ "~ ॥ 





1. ~ यिं 


अथ षष्ठोऽध्यायः 
देवताकी भगवानसे खधाम सिधारनेके स्यि प्राना तथा याद्बोको प्रभाखश्चे् 
जलिक्री तैयारी करते देखकर उद्धवका भगवानके पास आना 


श्रीदं क उवाच 
अथ ब्रह्माऽऽत्मजैदवैः प्रजेशेरावृतोऽम्यगात्‌ । 


भवश्च भरतमभव्येशो ययौ श्रतगणेगरेतः ।॥ १ ॥ 
इन्द्रो मरुद्धिर्भगवानादित्या बसबोऽद्विनो । 
चछभवोऽङ्धिरसो श्ट्रा विस्वे साध्याश्च देवताः २ ॥ 
गन्धवाप्सरसो नागा; सिद्धचारणगुद्यकाः 1 
षयः पितरश्चेव सवियाधरकिनराः ॥ ३ ॥ 
दारकापसंजगुः स्थे कृष्णदिश्षवः । 
वएुषा येन॒ भगवान्‌ नरलोकमनोरमः । ` 
यद्लो वितेने रोकेषु सवंरोकमलापहम्‌ ॥ ४ ॥ 
तसां विभ्राजमानायां समृद्धायां महद्धिभिः। 


व्यवकषताविवृप्ताक्षः दृष्णमद्ुतदशेनम्‌ ॥ ५ ॥ 


स्वमोचयानोपरोमीस्येदछादयन्तों यदुत्तमम्‌ । 







> च्‌ कै 2 | थ ४ । + च । + ~ # हक > भु प ¶ = ॥ 

॥ ४ न) ४ श 4 भ ५ + "ननन्द. छ ५ कनके ~ ५ 

द. ~>" (1) नै अ 9 ‡ =. ~ अ ~= ~ - ४ न, 
94 . च  - ~ 4 " त 


श्रीदयाक्देवजी कहते ह--परीक्षित्‌ ! जव देवष 
नारद्‌ बहुदेवजीको उपदेश कसक चले गये, तत अपने 
पुत्र सनकादिकों, देवताओं ओर प्रजापतियेकि साथ 
ब्रह्माजी, मूतग्णोके साथ सर्वैश्च महादेवजी ओर 
मर्द्रणेके साथ देवराज इन्द्र द्वारकानगरीं अये । साथ 
ही सभी आदित्यगण, आढ वषु, अश्विनीकुमारः, ऋ 
अङ्किराके वंशज ऋषि, ग्यारह र, विखेदे, साव्यगण 
गन्धर्व, अप्सरा नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यकः ऋषि पितर 
वि्ाधर ओर किलर मी वहीं पर्वे । इन लोगे आगमनका 
उदेश्य यह्‌ था वि मनुष्यका-सा मनोहर वेष धारण कएनेवास 
जोर अपने श्यामघुन्दः विगरहसे सभी छोगोँका मन अपनी 
ओर खींचकर रमा लेनेवाे भगवान्‌ श्रीडष्णका दशन 
करे; क्योकि इस समय उन्होनि अपना श्रीविग्रह प्रकट , 


वरे उसे दारा तीनो लकोमि देसी पतत्र कीरतिका ` 


विस्तार किया है, जो समस्त लोकोकि पाप-तापकीो सदाके 
व्यि मिय देती है ॥ १-४ 1 द्ारकापुरी सब प्रकारवी 
सम्पत्ति ओर रेश्वयेसि समृद्ध तथा अलोक दीपिसे 


देदीप्यमान हो रही थी । वहो आकर उन लरोगेने अन्‌ही 


छविसे युक्त भगवान्‌ ्रीकुष्णके दशन -किये । मगत्रान्‌- 
की खूप-माघुरीका निर्निमेष नयनोँसे पान करनेपर भी 
उनवे नेत तृप्तन होते ये] वे एकटकः बहत देशतः 
उन्हं देखते ही रहे ॥ ~\11 उन टोगेने खगंकें उद्यान, ` र 
नन्द्नभवन, चैत्ररथ आदिके दिव्य पुष्पसे जगदीशरर ` 
भगवान्‌ श्रकरष्णवो ठकः दिया ओर चित्र विचित्र पनं 





| | तथा अरभेसे युक्त वाणीके द्वार उनकी स्त॒ति करने 
मी्िथितपदाथोमलदप्‌ ॥९॥ = 1१ खरम्‌ ॥ ६ १ । को॥६॥ १ 




















^ भीमद्धायवत >: 6 
॥-- ¢ ` = ~ -------------- -------=-्व्-- = 
४ व देवतान भाथना की- लाभी | कमोके विज्य 
: फटोसे छनेकी इच्छावाले मुसुक्षुजन मक्ति-मात्रसे अपने 
4. तताः स ते नाथ पदारविन्दं हदथमे जिसका चिन्तन करते रहते &ै, आपके उसी 
< | चणकमल्करो हमरोगोने अपनी बुद्धिः इन्द, प्राण, 
र बुद्धीन्दियप्राणममोवचोभिः | मन ओर्‌ वाणीम साक्षात्‌ नमस्कार किया है | अहो | 
. | ई आश्चयं है |] ७] अजित | आप मायिक रज आदि गुणोमे 
 यजिन्त्थतेऽन्तहंदि भावड्क्ती धित होकर इस अचिन्य नाम-रूपाःमक प्रपन्चकी 
र | र ५४ ¢ र्ममोरपायात्‌ ७ ॥ त्रिगुणप्रणी मायके - द्वार अपने-आपमें ही रचना करते 


| है, प्रालन करते ओर रहार करते हैँ ¦ यह सुव करते 
खं मायया त्रिशुगयाऽऽस्वनि दुविभान्यं हए भी श्न कर्मसि आप च्छि नहीं होते है; क्योकि 
| | आप राग्ेषादि दोषांसे सवथा मुक्त है ओर अपने 

















व्यक्तं सृजखवसि टम्पसि तद्युणखः । | निरावरण अलण्ड ख्पः भूत ॒परमानन्दमे मग्न रहते 
3 भ है ॥ ८ ॥ स्त॒ति करनेथोग्य परमास्पन्‌ } जिन मनुष्योकी 


नतेभवानमित कपरभिरज्यते वें चित्ति रागेषादरिसे कलुषित है, ३ उपासना, वेदा- 


यत्‌ सत्रे सुखेऽव्यवष्ितेऽधिर्तोऽनकय 9 ॥ | # | | व्यन्‌, ठन्‌, तप स्या आर सज्ञ अद्‌ कम मई =| द्‌ र १ 
¦ परतु उनकी वंसी शुद्धि नहीं हो सकती, जेसी श्रवणके 
शद्विचरणां न त॒ तथ्य दुराशयानां दारा संतष्ट॒ शुद्धान्तःकरण सञ्जन पुरुषरकी आपकी 
< लीलकथा, कीतिके विषयमे दिनोदिन बढ़कर परर्णं 
 त्रिचयष्चताध्ययनदानतपःक्रियाभिः । होनेवाटी श्रद्रासे होती है ॥ ९॥ मननरीठ सुमुक्ुजन 
ख भ मोश्ष-प्रापिके ल्य अपने प्रेभसे पिले इए हृदयके द्वारा 
श सलस्िनानरषभ ते यश्रति अरः जिन्हें च्थिख्यि फिरते है, पाञ्चरात्र विषिसे उपासना 
 सच्छरद्या श्रवणसम्भृतया यथ। सयात्‌॥९॥ | करतार १ पराके चयि व 
ए | सङ्क"ण, प्रदुत्त अ।र अनिरुद्र--इस चतु्व्यहवे ख्प 
हि ~ खान्यत्तनाङ्प्ररभाशयधूमकषेत जिनका पूजन करते हैँ ओर जितेन्द्रिय धीरपुरूष खर्म. 
[द च ५ ९ यरनिरि | ट कक = ति 1] ~ गु रः (> भ 
कषेमाय थो र्हदोहयमानः ।  अतिक्रममं करके मगवद्धामकी प्राप्तिके व्यि 
६ तान) समय जिनकी पूजा किंथा करते है, याज्ञिक खोग 
यः सात्वत; समविभरतय आ्मवद्धि- | तीनों वेदोके द्वारा बतत्मयी हई विधिते अपरे संपत 
गु हाथामे इवरि्य देकर यद्बुडमे आहरति देते ओर उन्हयका 
ऽचितः सवनशः | 

ध ५* सरापक्रमाय।।१०॥ | चिन्तन करते ह ! आपकी आत्मश्वरूपरिणी मायके 
यश्चिन्त्यते प्यप्पाणिभिरध्वरगनौ | भिज्ञाषु योगीजन हृदयके अन्तदेशमे दहरविबा आदिक 

४ हारा आपके चर्णकमलोका हयी व्यान कति है-ओर 
' आप व्हे-बडे प्रेमी भक्तजन उन्हीको अपना प्रम इष्ठ 


एङ्ख-प्रप्राम्रव तायं हे-- 


॥ 2 पादाभ्यां जानुभ्वापुरसा रिरता घ्या | मनवा व्रा चेति प्रणामोऽष्टाङ्ग ईरितः ॥ 
भ 
व वुटनोणिः वक्षस, शिरे, नेत्रसि, मनषि ओर वाणीते--इन आठ अगो करिया गया प्रणाम 


ध्शताद |. 


= 





अ० ६] 
--ज्ज्न्य्य ` (1--(-{[--------्््व्प्व्व्य्य्य्य्य्यच््-------------- 


अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायां 





एकदस स्कन्ध 


७४८१ 











| आराध्यदेव मानते हँ । प्रमो ! आपकर वे ही चरणकमल 
' हमारी समस्त अद्युभ वासनाओं--विंषयत्रास्तना्भको 


जिज्ञासुभिः परमभागवतैः परीष्टः \११।। | मस्म करणेकर व्यि अग्निल्द्प हों । तरे अननक समान 


पय ¢ (^ > $ 
व्या तव॒ विभो वनमाखये्ं 


ससपर्धिनी भपवती ्रतिपलिनवच्छीः 


ए ~ 


यः सु्रणीतमणयार्दणमाददन्नो 


रयात्‌ सदारध्ररछभारयधूमकेतु; ॥१२। 
केतुक्जियिक्रमथुतस्चिपतत्पताको 


यस्ते भयाभयकरोऽसुरदेवचभ्योः 


¬~ 


स्वगाय साधुषु खङेषितताय भूमन्‌ 

पाद्‌; पुनातु भगवच्‌ भजतामघं नः ॥१३॥ 
नस्योतगाव इव यद्य वशे भवन्ति | 
मिथुरमानाः । 


ब्रह्मादयस्तसुभृता 


काल्य ते प्द्रतिपृरपयोः पस्य 


१ 


श॒ नस्तं 


9 


त चरणः पुरुपोत्तमख ॥१४॥ 
अस्या दैतुरुदयस्थितिसंयमाना- 
मव्यक्तजीवषहतषपि कारमाहुः । 


सोऽयं त्रिणाभिरलिरपयये ्रदतः 


८: कालो गभीररय उत्तमपूर्षस्तयम्‌ ॥*५॥। ही हं । अपकी गति अबाध 


हमारे पाप-तापोको भस्म कर दे ॥ १०-११॥ प्रमो । 
यह भगवती क्कष्मी आपके वश्चःस्थव्पर मुर्मायी इई 
वासी वनमास््से भी सौतकी तरह स्पद्रा रखती हं । फिर 
भी अप उनकी प्खान कर भक्तकि दारा इस वासी 
मात्मसे की इई पूजा भी प्रेमसे खीकार कत्ते है । एसे 
भक्तवत्सक ्रसुके चरणकमलं स्वद्‌/ हमारी तरिषय- 
वासनाओंको जलनेवाठे अग्निखसूप हो ॥१२॥ अनन्त ! 
वामनाव्रतारमे दैप्यराज बच््की दी इई पृरथ्वीको नापनेवेः 
लिये जब आपने अपना पग उठाया था ओर वह सत्यलेक- 
म पटच गया था, तब यह टेसा जान पडता था, मानो 
कोई बहुत वड़ा विजयध्यज हो । ब्रह्माजीके पखारमेकें 
बाद उससे गिरती इई गङ्गाजीके जल्दी तीन धारापं 
एसी जान पडती थी, मानो उसमे लगी इई तीन पताका 
फठरा रही हों । उसे देखकर अघुरकी सेना भयभीत 
हो गयी थी ओर देवसेना निर्भय. आपका वह चरण- 
कमठ साधुखमाव पुरूषो ल्यि आपके धाम वैकुण्ठलोक 
की प्राप्तिका ओर दुषटके स्यि अधोगतिका. कारण है । 
भगवन्‌ | आपका वही पादपम हम भजन करनेवास्के 
सारे पाप-ताप धो-ब्हा दे ॥ १३ ॥ ब्रह्मा आदि जितने 
भी शरीरधागी है, बे सख, रज, तम- इन तीनों गणकं 
परस्पर विधी त्रिविध मवोकी रक्करसे जीते-मरते रहते 
है । वे पुख-दुःखके थपेड़ोसे बाहर नहीं हैँ ओर ठीक 
वैसे ही आपके वराम है जसे नये इए वैर अपने 
खामीके रामे होते है । आप उनके च्वि भीं कारुखख्य 
हैँ | उनके जीवनका आदि, मध्य ओर अन्त आपके ही ~ 
अधीन है | इतना ही नहीं, आप प्रकृति ओर पुरुषसे भी 
प्रे खयं पुरूषोत्तम ह । आपके चरणकमल हमरोगोका 
क्स्याण करे ॥ १४] प्रमो ! आप इष जगतकी 
उत्पत्ति, सिति ओर प्रल्यके परम कारण है; क्योकि 
रासन पेखा कहा है कि आप प्रति, पुरूष ओर 
महत्त्वे भी नियन्त्रण करने कारु हं । ओत, 
रीष ओर वर्पीकाठह्म तीन नभिषोवाले सवहर्के ` 

ख्पम सरको क्षयकी ओर ठे जनेवलि काल आप ` 

ओर गम्भीर है। आप ` 


॥ 3 





= 9 १, र <," ५५ न 

+ त ८. स क ^ 
। ह । कि 1 + र. न, क, म्र ^ ह ^ ५4 न 
४4 च ~ ~ न 











७४२ भीमदधागनृत ० 


लनः पुमान्‌ संमधिगम्य थया खवीय 
धत्ते महान्तमिव गर्भममोषवीयंः । 
सोऽयं तयालगत आत्मन आण्डकोशं 
हैमं ससजं॒बहिरावरणेरुपेतम्‌ ॥१६। 
तत्तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो 
यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीताच्‌ । 
अथाञ्जुप्नपि हृषीकपते न रित 
येऽन्ये खतः परिहृतादपि षिभ्यतिस।।१७॥ 
सायावलाकखबदशितभावहारि 
भमण्डलम्रहितसोरतमन््रशतण्डेः । 
पल्यस्तु॒ षोडशसहखमनङ्गबाणै- 
यस्येन्द्रियं विमथितुं करणे विभ्व्यः १८ 
विभ्ब्यस्तवामरतकथोदवहाख्िलोक्याः 
पादावनेजसरितः शंमलानि हन्तुम्‌। 
आचुभ्रवं शुतिभिरड्ग्रिनमङ्गसङ्ञ 
सतीथद्वयं शुचिषदस्त उपरधन्ति ॥१९॥। 
बाद्रायणिल्वाच 
 ह्यमिष्ट्य विधेः सेदः शतध्रिररिष 
| अभ्यमापत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाधितः ॥२०॥ 
बह्मीवाच 





` < - 4 


न ---------------- ज~ चाः चाव चद, क 


खयं पुरुषोत्तम है ॥ १५ ॥ यह पुरुष आपसे शक्ति 
प्राप्त करके अमोधघवी्यं हो जाता है ओर पिर मायके साथ 
संयुक्त होकर विंछके महत्त्रूम॒गभेका स्थापन करता 
है | इसके वाद वह महत्त त्रिगुणमयी मायाका 
अनुसरण करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकारा, 
अहङ्कार ओर मन्य सात आवरणं ८ परतो › बाले 
हस ॒घुवरणवणं ब्रह्माण्डकी रचना करता है ॥ १६ ॥ 
इसलिये हृषीकेरा । आप समस्त चराचर जगतूकें 
अधीश्वर है । यही कारण है किं मायाकी गुण-किषमतके 
कारण बननेवाठे विभिन्न पदार्थोका उपमोग करते हए 
भी आप उनमें च्प्ि नहीं होते | यह केवर आपकी 
ही बात है । आपके अतिर्क्ति दूसरे तो स्वयं 
उनका त्याग करके भी उन विषयोसे उरते रहते 

॥ १७ ॥ सोक हजारसे अधिक रानिर्यो आपके 
साथ रहती हँ । वे सव अपनी मन्द्-मन्द्‌ मुसकान 
ओर तिरी चितवनसे युक्त मनोहर भीहके इरारेसे 
ओर पुरताल्मपोँसे प्रौढ सम्मोहक कामबाण चरती 
है ओर कामकलाकी विव्रिध रीतियोसे आपका मन 
आकषित करना चाहती है; परंतु फिर भी वे अपने 
परिपुष्ट कामव्राणोंसे आपका मन तनिक भी न डिगा सकी, 
वे असफक ही रही ॥ १८ ॥ आपने त्रिलोकीकी 
पाप-रारिको धो बहानेके घ्ि दो प्रकारकी पि 
नदियां बहा रक्वी है-एक तो आपकी अगृतमयी 
लीलासे भरी कथानदी ओर दूसरी आपके पाद-रक्षालनकें 
जलसे भरी गङ्गाजी । अतः सत्सङ्गसेवी विवेकीजन 
कानोके दवारा आपकी कथा-नदीमे ओर शरीरके द्वारा 
गङ्गाजीमें गोता चाकर दोनों ही तीर्थोका सेवन करते 
हं ओर अपने पाप-ताप मिय देते है ॥ १९ ॥ 


भीश्यकदेवजी कहते है प्रीकषित्‌ ! समस्त देवताओं 
ओर॒मगत्रान्‌ शंकरके साथ ब्रह्माजीने इस प्रकार 
भगतानूकी रतुति की । इसके वाद वे प्रणाम करके 
अपने धाममे जनिके स्थि आकाशम सित होकर 
भगवान्‌से इस प्रकार कहने च्गे ॥ २० ॥ 


ब्रह्माजीने कश्-सवत्मन्‌ प्रमो | पहले हमलोगेनि 
आपसे अत्रतार चकर पर्वा भार उतारनेकरे ल्य 


| भा चम = जाया चो कक === = `" चना चकः कका = > क ऊ कक = = = = 


¢ 





भा पकक भच्क्ोनः श कण 





~ ¬ यि दन ८ 9 
+ र न्क 1 
त 





०. एकादश स्कन्धं ४६ | 
समसाभिरशेषात्मंलत्तथैमोपपादितम्‌ ॥२९१॥ | प्रार्थना की थी । सो बह काम आपने हमारी पार्थनाके 
¢ {= अनुकार द्वी यथोचितख्यसे प्रय कर दिया ॥ २१॥ 
४। ‡ सह त्य्‌ 1 =| करि ¢ (^ 
" सातः सत्सु सत्यसंेषु वै त्वया । आपने सत्यपरायण साधुपुरुपेकरे क्ल्याणार्थं॑धर्मकी 

कोति दिषु विशि्ठा सर्वरोकमलापडा ।।२२ 


स्थापना भी कर दी ओर दसं दिशामि रेसी 
1 = ९० र 
अनतयं॑यदोवंशे बिभ्रद्‌ रूपमरुत्तमम्‌ । 




















कीतिं फेल दी; जिसे सुन-खुनाकर सव्र छोग अपने 
मनका मेल भिदा देते हैँ ॥२२॥ आपने यह 
सर्वात्तम रूप धारणं करके यदुवंशमे अवतार ल्या 
ओर जगत्‌करे हितके ्यि उदारता ओर पराक्रमसे भरी 
अनेकों टीकां की ॥ २३ ॥ प्रमो ! कथ्ुगमें जो 
साधुखमभाव मनुष्य आपकी इन लीलार्ओका श्रवण 
कीतेन करगे, वे सुगमतासे ही इस अ्नानरूप अन्धकारसे 
पार हो जायगे ॥ २४ ॥ पुररोत्तम स्व॑शक्तिमान्‌ 
परमो | आपको यदुवंदामे अवतार ग्रहण किये एक सौ 
पचस वभे बीत गये है ॥ २५॥ सर्वाधार ! अव 
हमलोगोका पूसा कोई काम वाकी नदी है, जिसे पूरणं. ` 
कएनेके ल्यि आपके यँ रहनेकी आदयकता हो । 

ब्राहमणोके शापके कारण आपका यह कुल भी एक 
परकारसे नष्ट हो दी चुका है ॥२६॥ इसव्थयि 
वेङुण्ठनाय | यदि आप उचित समङ्ग तो अपने ५रम- 
धाममे पार्ये ओर अपने सेवक हम लोक्पालंकां 
तथा हमारे लोकोका पालन-पोषण कीजिये ॥ २७ ॥ 


कमाग्युदामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः ।२३॥ 
यानि ते चरितानीशच भवुष्याः साधवः कलो । 
भृष्बन्तः कीतंयन्तश्च तर्ष्यन्त्यज्चसा तमः ।।२४। 
युवंशेऽवतीणेस्य भवतः पुरषोत्तम । 
शरच्छतं व्यतीयाय पश्चविंश्लापिकं प्रभो ॥२५॥ 
नाधुना तेऽखिलाधार देवकायावरेषितम्‌ । 
करं च विप्रशापेन नष्ट्रायमभूदिदम्‌ २६) 


तत; स्वधाम्‌ प्रमं विशस्व यदि मन्यसे । 


सजोकोलोकपालान्‌ नः पाहि बैङण्ठ क्रिकरान्‌॥।२७ 


# = 1 
। 9 क (} । 
78 + > त 3 +> + {त 
0 त >~ 4, 1 ^ क (क ९ 


श्रीभगवानुवाच भगवान्‌. श्रीरृष्णने कदा-त्रह्माजी ! आप जैसा 


कते है मे पहलेसे ही वेसा निश्चय कर चुका द| 
मेने आपलोगोका सव काम पूरा करके प्रष्वीका मार $ 
उतार दिया ॥ २८ ॥ परंतु अभी एक काम बकी ` 
दै; वह यह कि यदर्वेशी बलविकरम्‌, बीरता-डूरता ` 
ओर धन-सम्पत्तिसे उन्मत्त हो रहे है । ये सारी प्थ्वीको ` ` 
प्रस लेनेपर तुले इए है | हन्द मैने ठीक वैसेह्ी ` 
रोक रक्ला है, जेसे समुद्रको उसके तटकी भूमि ॥२९॥ ` 
यदि मे घमंडी ओर उच्छृ यदव रिर्योका यहः विशाल 
वंशा नष्ट क्ये बिना दी चला जाऊंगा तो ये सब 
मयादाका उल्लङ्खन करके सारे ठोकोका संहार करः 


अवधासितिमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर । 
कृतं वः कायंमखिलं भूमेभारोऽवतारितः ॥२८॥ 
तदिदं यादवकुलं वीर्यशञोयंभियोद्रतम्‌ । 
लोकं जिधृ्षद्‌ रुद्रं मे वेरुयेव महाणेवः ।॥२९॥। 
यद्यसंहत्य दप्रानां यदूनां विप्रं इर्‌ । 
गन्तास्म्यनेन रोकोऽयमु्ैेन बिनङ्कयति ॥२०॥ 
इदानीं नाच आरब्धः रुख द्विजशापतः 





श्रीमद्भागवत | [ अ० ६ 

=-= 

शर्यकदेवजी कते है-उरीक्षित्‌ ! . जव अखिल- 

टोकाधिपति भगवन्‌ श्रीकृष्णने इस प्रकार कह, तव 

इत्युक्ता लोकनाथेन स्वयम्भूः अरणिप्त्य तम्‌ । ब्रह्माजीने उन प्रणाम किया ओर देता साथ वें 

अपने धामको चले गये ॥ ३२ ॥ उनके जते ही 

द्रारकाएरीमे वड-बडे अपदाकुन, वड-वड उत्पात उठ 

अथ त्यां महोत्यातान्‌ दाखत्यां स्ुत्थितान्‌ । खड़े इए । उन देखकर यदुवंशके वडरूदे मगान्‌ 

|“ श्ष्णके पास अये । मगत्रान्‌ श्रीकृष्णने उनसे यहः 
| । विलोकय भपवानाह यदुबद्धान्‌ समाशतान्‌ ।।२२॥ | बात कही ॥ २३ ॥ 



























क भक क चि 


श्रीद उवाच 


सह देवगणेदबः; स्वधम समपद्यत ।॥२२। 


श्रीभगवानुवाच | भगवान्‌ श्रीरृष्णने कद्य--तुरुजनो } आजकल 
्रारकामे जिधर देखिये, उधर ही वडे-वडे अपदाकुन 
एते वे सुमहोत्याता व्युततिषठन्तीद संवतः ओर उत्पात हो रहे ह ¦ आपल्योेग जानते ही है कि 


ब्राह्मणोने हमारे वंशको पेखा शाप दे दिया है, जिसे 
टाल सकना वहत ही कठिन है । मेरा ठेस विचार 
है कि यदि हमलोग अपने प्राणोकी रक्षा चाहते हा 
| तो हमे यहाँ नी रहना चाहिये । अव विटम्ब करनेकी 
“~ ऽव मा विरम्‌ आवद्यकता नहीं है । हमलोग आन ही परम 
ध 1 0 सलामत मा चरम्‌ ॥र ५ पवित्र प्रभासक्षे्रके च्य - निकर पडं ॥ ३४-३५५ ॥ 
4 प्रभासक्षेत्रकी महिमा बहुत प्रसिद्ध है । जिस समय दक्ष 
प्रजापतिके शापसे चन्द्रमाको राजयक्ष्मा रोगने ग्रस ल्या 
था, उस समय उन्होने प्रमासक्षेत्रमे जाद्गर खान क्षिया 
ओर वे ततक्षग उस पापजन्य रोगसे दृट॒गये | साथ 
हा उन्ह कलक अभ्लद्धि भी प्रत्त हो गयी ॥३६॥ 
वयं च तसिन्नाष्डत्य तपयिस्वा पितन्‌ युराव्‌ | मलोग भी प्रभासक्षेत्रमं चख्कर सान करेगे, देवता 
| | एवं पितरश तप॑ करेगे ओर साथ दही अनेकों 
गुणवार पकवान तयार करके श्रे ब्राह्मणोको 
भोजन करायेगे । वँ हम्येग उन सवात्र ब्राह्मणो 
^ तेष दकानि पत्रे भद्रयोप्त्वा महान्तिवे। | परी श्रद्रासे व़ी-्डी दान-दक्षिगा देशे ओर इस 
| £ ल प्रकार उनके ट्‌।रा। अपने वड-त्रडे सक्र गक वेसे ही 
~ निना तरिष्ये दतेर्नोभिस्ि्णवम्‌ ॥३८॥ | पर कर जाब, जसं कोई जहानके द्वारा समुद्र पार 
न र = कए जाय । ॥ ३७-३८ ॥ 
` युक उवाच ` ` ` र भी्वकदेवजी कते हे जुलनम्दन ¡ जन मगव्रान्‌ 
 भगवताऽऽदिष्टा यादाः  छलनन्दन। | शरी्ृणते इस प्रकार आज्ञा दी, तन यदुवंरियोने एक 
मतसे प्रभास जनेका निश्चय कर च्य ओर सव 
अपने-अपने ¦ रथ॒ सजाने-जोतने कगे | ३९. ॥ 


शापथ नः कलयासीड जाहम्ेम्यो दुरत्ययः ॥२४॥ 


न वव्यमिहयसाभिनिजीविषुभिरायकाः । ` 


. 


^ यत्रखात्वा दश्शापाद्‌ गृहीतो यक्ष्मगोडराट । 


4: ४ 


च, 


ब 


 क्ड्क्तः पिस्निषात्‌ रयो भेजे भूयः कसोदयम्‌।३६॥ 


५, ~ न्न 
दैक -# ह [न 
विः ~ 


# ~ 


ष 


। . भोजयित्योशिजी विप्रान्‌ नानागुणवतान्धसा। ७॥ 












> 








भि ऊक ऋ = क त्र 


भ 4 ॐ $. ~ ~ भ ४, ( ५ ए ॥ १ | 
*{न क ताध [< 1 ` श ण्‌ € समब ॥ युज्‌ |[३९॥ 
^ 1 ~ 
= (व >5 9» = ॥ ~ हि १ = 
1 ~ ~ ४ . ॥ सवशः हिः ८४ र । | नपि 
डः य हा 


अ० & | 
तननिरीक्ष्योदधवो राजन्‌ शत्रा भगवतोदितम्‌ । 
दृष्रारिशटानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुव्रतः ॥४०॥ 
वाघक्त उपसंगम्य जगतामीश्वरेधरम्‌ । 


णम्य शिरसा पादौ प्राञ्लिस्तमभाषत 11४ १॥ 


उद्धव उवाच 
देवदेवेश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन | 
संहत्येतत्‌ इं सनं रोकं संतयक्ष्यते भभा | 


विप्रशापं समर्थोऽपि प्रत्यहनन यदीश्वरः ॥9 २॥ 


[ क 


नाहं ॒तवाड्धिकमरं क्षणार्धमपि केशव | 


र 


त्यक्त, सञुत्सहे नाथं खधाम नय मामपि ॥४३॥ 


4 (> (+ # 


तच ॥५ ऋत कृष्णं नृणां प्रममङ्गरुप्‌ । 


कणपीयषमाखाद्य त्यंजत्यन्यस्पहां जनः ॥५४।॥ 


एकदस स्कन्ध 


न प --------------------- | ~~~ - 





७८८५ 





परीक्षित्‌ । उद्धतरजी मगान्‌ श्रीकृष्णके वड व्रेभी ओर सेवक 
थे। उन्हनि जव्रयदुघंशियोको यात्राकी तैयारी करते देखा, 
भगवान्‌की आज्ञा सुनी ओर अत्यन्त धर अपशकुन 
देखे, तत्र वे जगतकरे एकमात्र अधिपतिं भगत्रन्‌ श्रीकभाक्रे 
पास एकन्तमें गये, उनके चरर्णोपर अपना सिर 
रखकर प्रणाम क्रिया ओर हाथ जोड़कर उने प्रार्थना 
करने खगे ॥ ४०-४१ ॥ 

उद्धवजीने कहा- येःरोशवर ! आप देधाधिदेवेकिं 
भी अधीश्वर है । आपकी टीव्रकिं श्रवण कीर्तनचे 
जीव पवित्र हो जाता है । आप सर्वशक्तिमान्‌ परमेश्वर 
ह । आप चाहते, ते ब्राहमणोके शाको मिया सकते 
थे । परंतु आपने वैसा किया नही । ससे तै यह 
समञ्ञ गया किं अव्र आप्‌ यदु्वंशका संहार करके, स्से 
समेटकर अवद्य ही इस लोक्का पल्याग कर्‌ 
द्गे ॥ ४२ ॥ परंतु षंधराली अव्वोवारे स्यामघुन्दर । 
म आधे क्षणकरे व्यि भी आपके चरणक्रमलविं त्यागकी 
बात सोच भी नहीं सकता । मेरे जीवनसर्वख ! मेरे 
खामो | आप॒ मुञ्चे भी अपने धाममे ऊ चय्यि ॥४३॥ 
प्यारे क्ष्ण । आप्री एक-एक कील मनुष्योके च्िं परम 
मङ्गलमयी ओर कानोके ण्यि अप्रतखद्पं है | जिते 
एकं वार उस रसका चस्तका ल्ग जाता है, उसके 
मनम फर क्रिसी दूसरी वस्तुक व्यि त्रस ही नह 
एद जाती । प्रभो | हम तो उठते-वैऽते, सोते-जागते, 
धूमते-षिते आपके साथ रहे है, हमने आपके साथ 
लान किया, खेक खेले, मोजन किया; कङ्ञंतक गिन 


। हमारी एक-एक चेटा अपकरे साथ होती रदी । आप 


| हमारे प्रियतम है ओर तो क्षा अप हमारे आत्मा 
| ही ह । एसी धितिमें हम आप्ये व्रेभी भक आपको 
| कसे छोड सकते है १ ॥ ४४-४५ ] हमने आप्री 


शय्याक्षनाटनसानस्लानकरोडाश्चनादिषु 1 
कथं त्वां परिषभात्मानं वयं भक्तास्स्यज्ञेमहि ॥७५॥ 


~ ए । हम. आपकी जूठन खनेवारे सेनक है । 

तयोपशक्तसतगन्धवासोऽलंकारवचिताः | ५ 

उच्छिष्टभोजिनो दासासव मायां जयेमहि ॥४६॥ 
९* माचीन तिमे नही है । २. स्यजन्वन्यखहां जनाः । ` 
भी० सं० 1 व्ण ट्छ 


धारण की हई माव पहनी, आपके लगाये हए चनदन ` 
ख्गाये, आपके उतारे इए वद पहने ओर आपके ` 
धारण किये इए गहनस अपने-आपको सजति | 


इसण्यि हम आपकी मायापर अवदय ही विजय | 
प्रात कर कगे | ( अतः प्रमो | हमे आपकी मायाक्ता 
डर नहँ है, डर है तो केषर आपकर वियोगका )\॥ ४६॥ 





चै १ 
जकिषिकित तक = कको ते ऋ ऋ + जने ३ 


= 
१. ++, क 


४२ श्रीमद्धागवत्‌ [ अ० ७ 


वात॒रशना य ऋषयः न्रमणा उष्वेमान्थनः । हम जानते हँ किं मायाको पार कर छेना बहुत ही कठिन 

हे । वङ़्-वड़े ऋषि-मुनि दिगम्बर रहकर ओर आजीवन 

नैष्टिक ब्रह्मचर्यका पाटन करके अध्यात्मवि्यके च्ि 

ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः४७| अत्यन्त परिश्रम करते है । इस प्रकारकी कठिन साधना- 

से उन संन्यासियोके हृदय निर्मल हो पाते है ओर तव 

कहीं वे समस्त वृत्तियोकी शान्तिखूप नैष्करम्य-अवस्थामें 

बथं सिह महायोगिन्‌ भ्रमन्तः कमेवत्मंसु । स्थित होकर आपके ब्रह्मनामक धामको प्राप्त होते है ॥ ४७॥ 

महायोगेश्वर ! हमलोग तो कमं मार्गमे ही ्रम-भटक रहे 

६ ट हे । परतु इतना निश्चित है कि दम आपके मक्तजनोके 

त्बदातया तरिष्यामस्तावकेदटुस्तरं तमः ॥४७८॥ | साथ आपके गुणों ओर टीव्यओंकी च्चा करेगे तथा 

मनुष्यकी-सी टीव कते हर आपने जो कुछ किया 

या कहा है, उसका स्मरण-कीतन करते रगे । साथ 

ख!न्तः कीतेयन्तस्ते कृतानि गदितानि च । ही आपकी चाल-ढाठ, सुसकान-चितवन ओर हास- 

परिहासकी स्मरृतिमें तस्टीन हो जायगे | केव इसीसे 

हम दुस्तर मायाको पार कर टेगे । ( इसय्िये हमें मायासे 

गव्युत्सितेक्षणक्ष्वेसि यन्नृरोकविडम्बनम्‌ ॥४९॥ | पार जनिकी नह, आपके व्िरहकी चिन्ता है | अप 
हमें छोडिये नही, साथ ठे च्य ) ॥ ८-४९ ॥ 

श्रीशुक उवाच श्रीद्युकदेवजी कते हं परीक्षित्‌ ! जव उद्रवजीने 

देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्राना की, 

तवर उन्होने अपने अनन्यप्रेभी सखा एवं सेवक उद्धव- 

एकान्तन प्रियं भत्ययुद्रवं समभाषत ॥५०॥ । जीसे कहा ॥ ५० ॥ 





5 8. ॥। 4 ॥ ॥ 
५ कः # = 9४३ = व + “ "य 41, ष 9 ॥ 0.4 3.1 9 - 
= १ ॥ ९ क > ^ 4 { ष ५ ॥ 
त + कै । त 

















र 


एवं विज्ञापितो राजन्‌ भगवान्‌ देवकीसुतः | 


--"-.य्टऽञ्ञ्2-"-- 
इति श्रीमद्धागत्रते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ 
न ननन 


अथ सप्तमोऽध्यायः 
अवधूतोपाख्यान-प्रथ्वीसे छेकर कबूतरतक आट गुखुओंकी कथा 
क श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा-महामाग्यवान्‌ उद्धव । 
मै वही करना 
^ यदात्थ मां महाभाग तिकीषितमेव मे । | ् व त 
ब्रह्मा भवो छोकपालाः खर्वासं मेऽभिकाष्विणः ॥।१॥ | चाहते हँ कि मै उनके लोको होकर अपने धामको 
चता जाऊं ॥ १ ॥ प्र्वीपर देवतार्ओंका जितना काम 
निष्यादितं त्र देवकायंमरोषतः । करना था, उसे नैं ध्रा कर चुका । इसी कामवे चयि 


~ र्ोऽहमंोन ब्रह्मणार्थितः ॥ २ ॥ | ब्रमाजीकी प्रानासे मै बल्रामजीके साथ अवतीर्ण इभा 


प्राचीन प्रतिमे नदीं है 1 





# "" त क क 
+. 


अ० ७ | एकादश्च स्कन्ध ७४७ ,. 





कुलं वें शापनिदंग्ध नह्कयत्यन्योन्यविग्रहात्‌ । | था ॥ २ ॥ अव्र यह यदुवंशा, जो तब्राह्मणोकिं शापसे 
भस्म हो चुका है, पारस्परिक श्रुट ओर युद्रसे नष्ट हो 
संयुद्रः सप्रमेऽहयेतां पुरीं नच फावयिष्यतिं | ३ ॥} | जायगा । आजके सातवें दिन समुद्र इस पुरी-द्वारकाको 
इवो देगा ॥ ३॥ प्यारे उद्धव! जिस क्षण तै मव्य- 
यर्ेवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमङ्गलः । टोकका परित्याग कर दगा, उसी क्षण इसके सारे मङ्खल 
न्ट हो जार्येगे ओर थोडे दी दिनोमे प्रथ्वीपर कटिधुग- 
भविष्यत्यचिरात्‌ साधो कलिनापि निराकृतः ।। ४ 1 | का बवदा हयौ जायगा || ४ ॥ जव भे इस नीका 
व्याग कर दूँ, तव तुम इसपर मत रहना; क्योकि साधु 
अ = उद्भव ! कलिुगम अधिकांश ठोर्गोकी रुचि अधमं ही 
न वस्तव्यं त्वयेवेह मया त्यक्ते महीतके । दोणी । ५ ॥ अब तुम अपने भालीय लजन नौर बतु 
| स्नेह-सम्बन्ध छोड दो ओर अनन्यवरेमसे 
मुञ्चमे अपना मन लगाकर समदष्टिसे प्रथ्वीमे खच्छन्द 
विचरण करो ॥ ६ ॥ इस जगतम जो कुछ मनसे सोचा 
जाता है, वाणीसे कहा जाता है, ने्रोंसे देखा जाता है 
ओर श्रवण आदि इन्दरियोंसे अनुभव किया जाता है, बह 
सव॒ नाराव्रान्‌ है । सपनेकी तरह मनका वित्यस॒ है, 
इसव्ि मायामात्र है, मिथ्या है--रेसा समञ्च खो ॥७॥ 
जिस पुरुषका मन अशान्त है, अस्यत दहै, उसीको 
पागलक्ी तरह अनेकों वस्तु माम पड़ती है; वास्तवमें 
यह्‌ चित्तका श्रम ही है | नानाल्का श्म हो जानेपर्‌ 
ही यह गुण हैः ओर ध्यह दोषः इस प्रकारकी कल्पना 
करनी पडती है । जिसकी बुद्धिम गुण ओर दोषकां 
सेद्‌ वैठ गथा है, दृदमूल हयो गया है, उसीके च्थियि कमं,# 
अकम ओर वरिकमंख्प प मेदका प्रतिपादन इभ है 1८॥ 
इसव्िये उद्धव ! तुम ॒पहठे अपनी समस्त इन्दरियोको 
अपने वशम कर खो, उनकी बागडोर अपने हाथमे छे 
खो ओः केवर इद्धिर्योको दी नहीं, चित्तकी समस्त 
वृत्तियोको भी रोक खो ओर फिर रसा अनुमव्र करो 
कि यह सारा जगत्‌ अपने आत्मामे ही फौत इआ है 
ओर आध्मा मुञ्च सर्वात्मा इन्द्रियातीत ब्रह्मसे एक है, 
अभिनन है ॥ ९ ॥ जव वेदोौके मुख्य तात्पथ-निश्चय- 
रूप ज्ञान ओर अनुभव्ररूप विज्ञानसे मलीभेंति सम्प 
होकर तुम अप्रने आत्माके अनुभवमे ही आनन्दमग्न 
रोगे ओर सम्पूणं दवता आदि शरीरधारियेके आत्मा 
हो जाओगे ! इसव्वि किसी भी विध्नसे तुम पीडित नहीं 
नान्तराप्रविहन्यसे 1) १०॥ | हो सकोगे; वथोकि उन व्रि्नों ओर विध्न केवाली 






















जनोऽधमरुचिर्भद्र भविष्यति करो युगे । ५॥ 
स्वं तु सवं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु 1 
मय्यावेश्य सनः सम्यक्‌ समदम्‌ विचरख गाम्‌।\&। 
यदिदं मनसा वाचा चक्षुभ्यां भ्रवणादिभिः । 
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि माया मनोमयम्‌ । ७ ॥ 
पुंसोऽयुक्तख नानार्थो भ्रमः स गुणदोषभाक्‌ | 
कर्मकमविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८1 
तखाद्‌ युक्तन्द्ियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्‌ । 
आत्मनीश् विततमात्मानं मस्यधीश्वरे 1 ९ 1 
ज्ञानविज्ञानसंयुक्त त शरीरिणाम्‌ | 
आत्माञुभवतारमा 


१. स्वजन्‌व्रनधनम्‌ । ओ 
# विदित कमं । | विहित कर्मका लोप । ‡ निषिद्ध कर्म | 











+ 






| ७७८ 


श्रीमद्भागवत [ अ० ७ 

षि न ~~~ [~~ ~~~ ~~~ ~ ~-~-- ~ 
क, क, [4 [९ ५। 

दोषबुद्धयोभयातीतो निषेधान्न निवतंते | आत्मा भी तुम्हीं होगे ॥ १० ॥ जो पुरुष गुण ओर 

दोष-बुद्धिसे अतीत हो जाता है, वह वाल्कके समान 

निषिद्ध कसे निवर्त होता है, परंतु दोष-बुद्विसे नही । 

गुणबुद्रया च विहितं न करोति यथाभेकः ॥११।] | वह विदित वमक अनुष्ठान भी करता है, परंतु गुण- 


४ | बुद्धिसे नहीं ॥ ११ ॥ जिने श्ुतिर्योके ताप्पयका 
इ | यथाथं ज्ञान ही नहीं प्राप्त कर च्या, बल्कि उनका 
| साश्नात्कार भीकर चिया है ओर इस प्रकार जो अटक 
निश्वयसे सम्पन्न हौ गया है, वह समक्त प्राणि्योका 
| हितेषी सुष्टद्‌ होता है ओर उसकी वृत्तिथों सवरथा शन्त 
| रहती हं । वह समस्त प्रतीयमान विद्वको मेश दी 
४ परयन्‌ मदात्म़ विच्वं न विपश्चेन वें एनः ॥ १२1 । खषूप--आत्मश्वरूम देखता है; इसय्यि उसे कभी 
: । जन्स-ग्रत्युकरे चक्रमे नदीं पड़ना पडता ॥ १२ ॥ 
श्रीञ्युक उदाच । श्रीशुक्देवजी कहते द--परीक्षित्‌ ! जत्र भगवान्‌ 
इत्यादि भगवता महाभागवतो नृप । । श्रीकृष्णने इस प्रकार आदेश दिया, तवर भगवानूकरे परम 


ठन ^ भ  व्रेषी उद्धवजीने उन्हे प्रणाम कारक्र तचज्ञानकी प्राप्तिकी 
3 4 | 1 ~ षृ ~ ६ | 
‰*“ {4 ह तलाजज्ञासुरच्युतम्‌ ॥१२।। इच्छसे यह प्रस्न किया ॥ १३ ॥ 


५ ५ [९ [%4 
सवभ्ूतसह्च्छान्ता ज्ञान वज्ञाननश्चयः 


मी 










उद्ध> उवाच उद्धवजीने कहा--मगवन्‌ ! आप दी सप्त 
यो गिर्योकी गुप्त एजी, योगोके कारण ओर योगेश्वर हं | आप 

योगे तु ०.९ 4 र 
श्च योगविन्यास योगात्मन्‌ योगसम्भव । ही समस्त योगोके अःधार, उनके कारण ओर योगसख्प 


सी हैँ | आपने मेरे परमक्रस्पागके चि उश्च संन्यासख्प 
निःश्रेयसाय प्रोक्तस्त्यगः संन्यासलक्षणः॥।१४॥ । यागका उपदेशा किया है ॥ १४ ॥ परंतु अनन्त ! जो 
रेण विष्योंके चिन्तन ओर सेवन धुख-मिक गये है, 
त्यागोऽयं दुष्करो धृमन्‌ कामानां विषयान्सभिः | व्िषयात्मा हो गये है, उनके च्य वरिषय-मोगों ओर 
कामनार्थोका त्याग अत्यन्त कठ्नि है ¦ सव॑खद्य ! 
॥ सुतरां त्वयि सर्वान्ममभक्तैरिति मे मतिः १९५] उनम मी जो लोग आपसे वुल ह, उनके चि तो 
(` दप प्रकारका व्याग सवथा अपघम्भव ही है--रेसा मेरा 
सोऽहं ममाहमिति शरदमतिविंगाद- ए / 1 
द मति इननी मूढ हयो गयी है कि ध्यहमें हं = मेरा 
ठै, इस माव्रसे मै आपश्री मायाके खे) देडई ओर देहके 

स्त्वन्मायया विरचितात्मनि साञुबन्थे । सम्बन्धी खी, पुत्र, धन जादि छ रहा ह । 
मगत्रन्‌ ! आपने निस संन्यासका उपदेरा क्रिया है, 
उसका तच सुज्ज सेवकको इस प्रकार समक्षाद्ये किं 
सुगमतापूर्वक उक्षका साधन कर सक्र ॥ १६ ॥ मेरे 
साधयामि भगवन्नड्शाधि श्रत्यस्‌॥।१६॥ | प्रमो ! आप भूत) भविष्य, वतंमान--इन तीनों काल्ञसे 
चः अत्राधित, एकरस स्य है । आप दृक्षरके द्वारा प्रकाशित 
नही, खयंप्रकाशा आत्मखख्य हं । श्रमो । मेँ समञ्चता 
रं कि मेरे व्यि आत्मतत्वकां उपदेश करनेवाक। आपकर 
| | अतिस्क्ति देवता्ओंमि भी कोद नक्ष है । ब्रह्मा आदि 


तत्वज्ञक्ना लमत भेच्रता यथाह 


ष = | 0 
"ह ३888१ 
७9 # 








॥ चच क्कः ` =^ = कक 
# "व~. व 
कै व । | 
च्छः न # 
> 






र चै 







अ०७] एकादश सन्ध 


कवं विभोहितधियस्तवं माययेमे 























वड-बडे दधता है, वे सव दारीराभिमानी होनेके ` 
कारण आपकी मायासे मोहित हो रहे है । उनकी बुद्धि ` 
मायके वामं हो गयी दहै । यी कारण हैक्रिवे ५ 
इन्दिरे अनुभव क्रिये जानता वाद्य विषयकं सत्य 
मानते हं } इसीलिये मुञ्चे तो जप ही उपदश् कीजिव्‌॥ १७ _ 
मगवन्‌ ! इसीसे चारों ओरसे दुःखकरो दावान्निसे जल- 
कर ओर विरक्त होकर मै आपकी शरणमे आया द्रं | 
आप निर्दोष देश-कालसे अपरिच्छिन, सर्वज्ञ, सवशक्ति- 
मान्‌ ओर अव्रिनारी वेक्ुण्ठलोकके निवासी एवं नरके 
नित्य सखा नारायण दहै 1 (अतः आप दही सुब्ञे उपदेदा 


बरह्मादयस्तनुभ्रतो वहिरथं भावाः | १७॥ 
तखाह भचन्तसनवद्यसनन्तपररं 


सदत्तीश्रमष्षण्डविद्खण्डधिष्ण्यम्‌ । 





निरिष्नधीरह इ वरजिनाभितको 


नारायणं सरसखं छरणं प्रपचे ॥\१८॥) | कीन्यि ) ॥ १८ ॥ 

| | श्रीसयवानुवाच ` भगवान्‌ श्रीकृष्णने कदा-उद्रव ! संसारं जो 
| भं ५ मनुष्य यदहं जगत्‌ क्या है १ इसमे क्या हो रहा है ¢ इत्यादि 

ौ भाण मनुजा लोके लाक्रतत्वबिचक्ष्भाः। | अते शा विचार करनेमे निधुण है, वे चित्तम मरी इ 


अद्युम वासनाओंसे अपने-आपक्रो खयं अपनी विवेक- 
राक्तिसे ही प्रायः वचा छेते हैँ।॥ १९॥ समक्त 
प्राणियोका विशेषकर मनुष्यका आत्मा अपने हित ओर 
अहितक्रा उपदेशक गुरु है । क्योकि मनुष्य अपने 
प्रत्यक्ष अनुभव ओर अनुमाने द्वारा अपने हित-अहित- ` ॑ । 
का नि्णैय करनेमे पूर्णतः समर्थं है ॥ २० ॥ सौख्य 
योगविशारद धीर पुरुष इस मनुष्ययोनिमं इन्दरियराक्ति, ` । । 
मनःराक्ति आदिके आश्रयमूत सुञ्च आत्मतखको प्णंतः 
प्रकट्पसे साश्चात्कार कर छेते ॥ २१] मेने एक 
पैरखे, दो पैर, तीन पैरवाठे, चार पेखलि चारसे 
अभिक पैसे ओर भिना पैरफे-- इत्यादि अनेक प्रकार- ` 
के शरीोका निर्माण किया है । उनम सज्ञे सबसे 
अभिक प्रिय मनुष्यका ही इरीर है ॥२२॥ इस्‌ 
मनुष्य-दारीरमं एकाग्रचित्त तीर्णबुद्धि पुरुष बुद्धि आदिं 
ग्रहण किये जनेवाटे हे तुओं घ जिनसे किः अनुमा 
होता है, अनुमानसे अग्राह्य अथात्‌ { आदि 
विपयोसे भिन सञ्च सवेप्रवत्तकः ईश्वरको साक्षात्‌ अनुभव 
करते है # ॥२३॥ इस महात्मारोगं एक 
| प्र्चन इतिहास कडा करते है । वह इतिहास परम 


ध < ~~ 


 उत्राष्युदाहरन्तीमभितिहासं पुरातनम्‌ । 
7, 41 क - -- --------- -- ----- 


१. रिदं बुः क. 

च र <= ~ 3 अति --3 = नह ५७ हो च 

 # अनुस १ के दो प्रकर ई--( १ ) पक स्वप्रकाश तस्कर भिना बुद्धि आदि जड पदाथा श प्रकार नहा हो सकता । 
£ आदि किर्सं ए होते [~ (५५ त ऋ. 

वाख जाद्‌ आजार ककरसा कतके द्वारा प्युक्तं दाते इद] इसो प्रकार यह्‌ 


५ रथापत्तिवे || ९ । २. ५ = 


। # 
। = सथरद्रन्त श्त्मानमात्मनवाश्भारयात्‌ ॥१९॥ 


आत्मनो शुर्रास्मेब पुरुःसख शिरेषतः । 





यत्‌ मत्यक्षानुमानाभ्यां भेयोऽसावुषिन्दते ।२०। 


पुरुषत्वे च सां धीराः सांख्ययोगविशयरदाः | 





+, | 


आविस्तरां प्रपश्यन्ति एवसकत्युपचहितस्‌ ॥२१। 









एकद्वित्रिचतुष्पादौ बहुपादस्तथापदः | 





बह्वयः सन्ति पुरः स॒ष्टास्तासां से पोरूषी प्रिषा।२२॥ 


अत्र मों मागयन्त्यद्धा युक्ता हेत॒भिरीश्रम्‌ । 





गृह्यमाणे पंणेलिदधेरग्र्यमदमानतः ` ॥२३॥ 



















त ऋ 

























७4५० 





श्रीमद्भागवत 


[ अ० ७ 





अवधृतखय संवादं 

अबधूतं द्विजं कंचिच्वरन्तमङतोभयम्‌। 

कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पभ्रच्छ धर्मवित्‌ ।२५॥। 
यदुरुवाच 

ङतो बुद्धिरियं बह्मनकतुः सुधिशारदा । 


यामासाद्य भरवा्टोकं विद्वां रति बालवत्‌ ।२६॥ 


प्रायो ध्माथंकामेषु विवित्सायां च मानवाः । 


हेतुनेव समीहन्ते आयुषो यशसः भियः ।।२७।॥ 


त्वं त॒ कस्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः। 


न कतां नेहसे किंचिजडोन्त्तपिशाचवत्‌ ॥२८॥। 


जनेषु दद्यमानेषु कामलोभद्वाभिना । 


न तप्यसेऽथिना क्तो गङ्धाम्भःख इव दिपः॥।२९॥ 


त्व हि नः प्रच्छतां ब्रह्मन्ात्मन्यानन्दक्रारणम्‌ | 


अहि स्शविदीनसख भवतः केवरात्मन्‌ः।२०॥ 


श्रीभगवानुवाच 


यदुनेवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा । 


। । क चः 


२. कर्णम्‌ | २. प्राचः धरति न्दी दै। 


पृष्ठ; सभाजितः ग्राह प्रश्रयावनतं दविजः ॥२१॥ | अव दत्तत्रेयजीने कहा ॥ ३१ ॥ 


यदोरमिततेजसः ॥२७॥ | तेजखी अवधूत दत्तात्रेय ओर राजा यदुके संवादकें 


ख्पमें है ॥ २४ ॥ एक बार धर्मके मर्मज्ञ राजा यदुने 
देखा किं एक त्रिकाक्दर्श तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय 
विचर रहै हैँ । तत्र उन्होने उनसे यह प्रश्च क्रिया ॥२५५॥ 

राजा यदुने पूा-- ब्रह्मन्‌ ! आप क्म तो करते 
नही, फिर आपको यह अत्यन्त निपुण बुद्धि करसि 
पराप्त इई १ जिसका आश्रय केकर आप परम विद्वान्‌ होनेपर्‌ 
भी वारुकके समान संसारम विचरते रहते हैँ | २६॥ रेसा 


| देखा जाता है कि मनुष्य आयु, यडा अथवा सौन्दयं 
| सम्पत्ति आदिकी अभिलाषा केकर दही धर्म, अथ) काम 


अथवा तच -जिज्ञासामे प्रवृत्त होते हैँ; अकारण कहीं 
किंसीकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती ॥ २७॥ में देख 
रहा रकि आप कर्थं करनेमे समर्थ, विद्वान्‌ ओर निपुण हैँ । 
आपका माम्य ओर सौन्दर्यं भी प्रशं्नीय दहै | 
आपकी वाणीसे तो मानो अग्रृत टपक रा है | फिर 
भी आप जड़, उन्मत्त अथवा पिशाचके समान रहते 
है;नतो कु करते हँ ओर न चाहते दीदहैँ॥२५८] 
संसारके अधिकांश लोग काम ओर लोभके दावानलसे 
जल रहे है, परंतु आपको देखकर रसा माद्धम होता 
है कि आप मुक्त है, आपतक उसकी ओंच भी नहीं 
प्च पाती; ठीक वसे ही जसे कोई हाथी वनमें दावाग्नि 
ल्गनेपर उससे छ्ुटकर गद्गाजल्मे खडा हः ॥ २९ ॥ 
ब्रह्मन्‌! आप पुत्र, खी, धन आदि संसारके स्पसे शीरहित 
हे । आप सदा-सर्वदा अपने केव्रक खख्पमे ही शित 
रहते हैँ | हम आपसे यह पना चाहते हँ किं आपको 
अपने आत्मामें ही रसे अनिव चनीय आनन्दका अनुभव 
वैसे होता हे १ आप कृपा करके अवदय बतलादये ॥३०॥ 

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कदा-उद्भव ! हमारे पूर्व॑ 
महाराज यदुकी बुद्धि छद्ध थी ओर उनके हृदयमें 
ब्राह्मणभक्ति थी । उन्होने परमभाग्यत्रान्‌ दत्तात्रेयजीका 
अत्यन्त सत्कार करके यह प्रदन पूछा ओर वड़े विनम्र 
भावसे सिर काकशर वे उनके सामने खड़े हो गये | 





ऋ (किकी जा जा ज 


------------_ 


द्धि आदि आजार किसी वतकि द्रायाही प्रयुक्तं हो रद । परंतु इतका यह अर्थं र्दी दे कि आत्मा आनुमानिकं 


1।-9। 


न्न 
अ, म 


तवं पदार्थे योधनकी युक्तिमत्र है । 


+ 17. ! 
1 


2 ५ च~ 4 1 
~ [न । 0 ् ६ रथं + „य । 
विहि 0 7 


व ५, ने म न नतय 9 = 
~~ -. 4--न ~ ~ 





ह ~ ह 


क 


-1॥..॥41॥॥ 











` भ्राणव्स्येव संतुष्येन्पुनिनेवेन्द्रियप्रियैः । 


४ 
श्र 
ह, ५ व कक 6 ~ 





अ० ७ | एकाद्च स्कन्धं 


भ ग ~~~ ---~-~-~-----~--- ~~~ -- 
= रि का क व ~ त क भि 1 भः काः च जकः क कः भको चा जकः भ ` आ को = जो 


बराह्मण उवाच ब्रह्मवेत्ता दत्ता्ेयजीने कहा- राजन्‌ ! तने अयनी 


सन्ति मे गुरवो राजन्‌ बहवो बुद्धयपाभिताः । द्िसे हत से गुरुओका आश्रय दिवा दै, उनसे दिक्षा 


= < ¢ ८ ग्रहण करके मैं इस जगतमें मुक्तभावसे खच्छन्द विचरता 
यतो बुद्धिमुपादाय गुक्तोऽटामीह ताञ्छृणु ॥६२॥ द । ठम उन गुरुथोकि नाम ओर उनसे ग्रहण की इ 


परथिवी वायुराकाशमापोऽभिश्न्द्रमा रविः । रिक्षा एनो ॥ ३२ ॥ मेरे गुरुओकि नाम द पृथ्वी, 
कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृद्‌ गजः ॥३३॥ | वायु, आकाश, जकः अग्नि, चन्द्रमा, सूय, कवत, 

रिणो मीनः पिङ्ला ङरसोऽर्भकः । अजगर, समुद्र, पतंग, भरा या मधुमक्खी, हाथी, शहद 
मधुहा हारणा र 1 ला क भकः  निकालनेवाखा, हरनि, मठी, पिङ्गल वेदा, कुरर श्वी, 
मारी शरत्‌ सपं उुणनाभिः सुपेशकृत्‌ ॥३४॥ | वाक्कः कंभारी कल्या, नाण वनानेवात, सर्प, मकड़ी 
एते मे गुरवो राजंधतुर्विशतिराभिताः । ओर भङ्गी कीट ॥ ३३-३४ ॥ राजन्‌ ! मने इन 


(८ भरेते = - चौबीस गुरुओंका आश्रय लिया है ओर इन्दीके आचरणसे 
शिक्षा व्त्तिभिरेतेषामन्वरिक्षमिहात्मनः ।२५॥ | इस लोकम अपने व्यि शिक्षा ग्रहण की हे | २५५ ॥ 


यतो यद लुशिक्षामि यथा वा नाहुषात्मज 1 वीर ययातिनन्दन ! मैने जिससे जिस प्रकार जो कुछ 
ए मि ते ।॥२६॥ सीखा है, वह सव्र ज्यो-कात्यों तुमसे कडता द, 

तत्तथा पुरुषव्याघ्र निबोध कथयामि ते धनो 

भूतेराक्रम्यमाणोऽपि धीरो देववक्लानगे ¦ | मेने प्रथवीसे उसके धेयंकी, क्षमाकी चिक्षाखीदहै। 


रोग पृथ्वीपर्‌ कितना आघात ओर क्या-क्या उत्पात नहीं 
| करते; परंतु वह न तो किसीसे बदला लेती है ओर 
| न रोती-चि्ठाती है । संसास्के सभी प्राणी अपने-अपने 


तद्‌ विद्वान्न चलेन्मार्गादन्वशिष्षं किते््रतम्‌ ।२७॥। | प्राण्पके असार चेश कर रे है, वे समयसमयपर्‌ । 


भिन-भिन प्रकारसे जान या अनजाने आक्रमण कर 


बैठते हैँ । धीर ॒पुरुपको चादिये किं उनकी विविराता ` 
| समन्ञे, न तो अपना धीरज खोवे ओर नक्रोधकरे। 
मागपर ज्यो -का-व्यों चक्ता र्दे ॥ ३७ ॥ पवी ` 
के ही विकार पव॑त ओर वृक्षसे मेने यह शिक्षा ग्रहण 
की है किं जसे उनकी सारी चेदं सदा-स्वदा दूसरो- 
| के हितके च्वि ही होती है, बल्कि यों कहना चाहिये ` 





धः ¢ = स्थ 
शश्त्पराथस्वहः पराथक्रान्तसम्भवः । 


किं उनका जन्म ही एकमात्र दूसरोका हित करने 
व्यिही इभा है, साधु पुरुषको चादिये किं उनरक॑ 
रिष्यता खीकार करके उनसे परोपकारी रिक्षा ग्रहण 


चै न 


करे ॥ ३८ ॥ | 


# अ न ४ । १३ क 






साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगरिष्यः परात्मताम्‌ ॥२८। 










मैने शरीरके भीतर बायु-- प्राणवायुसे 
यह रिक्ता ग्रहण की है कि जसे वह आहारमात्रकी 










द ईच्छा रखता है ओर उसकी प्रा्तिसे ही संतुष्ट हो 


9 
|. 
च ^ न 


। = न 3 





















"ते 
नके 


है नसे ही साधर्षवे 7॥ भी नाह्त न्‌ जितनेसे 


| ष ७५२ भ्रीभद्धागवत्‌ | [ अ> ७ 














` ज्ञानं यथान नयेत नादकी्येत वाङ्मनः ॥२९॥ | जीवन निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ठे । इन्र्यो- 
|. ॐ | को तृप्त करनेके व्ये वदत-से विषय न चाहे | स॒क्षेपमें 
उतने ही विषर्योका उपयोग करना चाहिये, जिनसे 
बुद्धिं वरङृत न हो, मन चञ्चल न हो ओर वाणी व्यर्थ 
की बातोमे न खग जाय ॥ ३९ ॥ दारीरके बाहर 
रहनेवाठे वायुसे मैने यह सीखादहै किं जसे वायुको 
अनेक स्थानोमं जाना प्रडता है, परस्तु वह कीं भी 
आसक्त नहीं होता, किसीका भी गुण-दोष नदीं अप- 
नाता, वैसे ही साधक पुरूष भी आवकद्यकता होनेप्‌ 
विभिन्न प्रकारके धमं ओर खभाववाटे विष्रयोमे जाय, 
परंतु अपने ठक्ष्यपर्‌ सिर रहे । किंसीके गुण या दोष 
की ओर दुक न जाय, किसीसे आसक्तियाद्वेपन कर्‌ 
वेठे || ४० ॥ गन्ध वायुका गुण नही, प्रश्वीका गुण 
है । परतु वायुको गन्धका वहन करना पडता है | 
एसा करनेपर भी वायु युद्ध ही रहता है, गन्धे उसका 
सम्पकं नहीं होता । वैसे ही साधकका जवतक इस 
दारीरसे सम्बन्ध है, तवतक उसे इसकी व्याधि- 
पीड़ा ओर भूखभ्यास आदिका भी वहन करना पडता 
है | परंतु अपनेको शरीर नही, आत्माके ख्पमे देखने- 
वाटा साधक दारीर ओर उसके गुणोका आश्रय होनेपर्‌ 
भी उनसे सर्वथा निर्ित्त रता है ॥ ४१॥ 

राजन्‌ ! जितने भी घट-मट आदि प्रदा्थंदहै वे 
चहे चरक हों या अचर, उनके कारण भिन-मिन्न 
प्रतीत होनेपर भी वास्तवमे आकाश एक ओर अपरिच्छिन 
( अखण्ड ) ही है । वसे ही चर-अचर जितने भी 
सूम-स्थक दारीर है, उनमें आत्माखूपसे सर्वत्र स्थित 
होनेके कारण ब्रह्म सभीमे है । साघकको चाहिये कि 
सूतके मनियोमे व्यःप्त सूतके समान आत्माको अखण्ड 
ओर असङ्गरूपसे देखे । बह इतना व्स्तत है कि 
| उसकी तुलना कुछ-कुछ आकारासे ही की जा सकती 
है । इसल्यि साधकको आत्माकी आकाशरूपताकी 
भावना करनी चाये | ४२ ॥ आग ॒च्गती है, पानी 
बरसता है, अन्न आदि पैदा होते ओर नष्ट होते है, 
वायुकी प्ररणासे बादल आदि आते ओर चले जाते है; 
पर भी आका अता रहता है । आकादाकी 


३ 









विषयेष्वाविशन्‌ योगी नानाधर्मेषु सर्वतः 





गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत्‌ ॥७०॥ 







 पाथिवेषिह देषु प्रविश्स्तद्गुणाश्रयः 


~. ऋ, 


= चज 










॥ 
क 
ब ~> 
# 
र, 


त गुणेन युज्यते योगी ` गन्धेवायुशिवात्मद्व ।४१॥। 


। १ ॥ 
छ ~= | 
४1 







अन्तरित यिरजङ्मेषु 














र १ 
+ 
क ~ 





१. 


 अनिनमस्त्वं विततस्य भाव्रयेत्‌ ॥४२॥ 






ॐ 











० ५ पिकादस्च स्कन्ध 


नि 






न स्प्रद्यते नभस्तदत्‌ कारघुष्टेगुणेः पुमान्‌ ॥४३॥ | दृष्टिसे यह सव कुछ है दी न्दी | इसी प्रकार भूत 
र वर्तमान ओर भवरिष्यकेे चक्तरमं न जनि किन-किन 
| नाम-ख्पोकी सषि ओर प्रच्य होते है; परंतु आत्माकरे साथ 
| उनका को संस्परा नहीं है ॥ ४३ ॥ 

खच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधूरयस्तीथेभूरैणाभ्‌ । | जिस प्रकार जक खभावसे. ही खच्छः, चिकना; 
| मधुर ओर पवित्र करनेवाव्य होता है तथा गङ्गा आदि 
तीर्थोके दर्शन, स्पदां ओर नामोचारणसे भी स्ेग पित्र 
दो जते है तैसे ही साधकको भी खमवरसे दी छद्ध; 
स | स्निग्ध, मघुरभाषी ओर लोकपावन होना चहिये । जख- 
निः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पक्चकोतेनं ¦ ॥७४॥ | से शिक्षा ग्रहण करमेवाटा अपने दर्शन, स्प . ओर 

नामोच्ारणसे लोगोको पवित्र कर देता है ॥ ४४ ॥ 
राजन्‌ ! मैने अग्निसे यह रिष्षाटी दहै कि जंसे 
| बह तेजखी ओर ञ्योतिप॑य होती है, जैसे उसे कोई 
| अपने तेजसे दवा नीं सकता, जैसे उसके पास सग्रह 
| परिम्रहके व्यि कोई पात्र नही- सव कुछ अपने पे 
१ 3 वे प्व लेती है ओर जैसे सत्र ङु खा-पी लेनेपर्‌ भी 
सव॑भक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मरमश्रिवत्‌ ॥४७५]) | विभिन्न वस्तुक दोसे बह ट्थि नहीं होती, वैसे 


तेजखी तपसा दीपो दुधर्षोद्रभाजनः । | 


ही साधक भी परम तेजस्वी, तपस्यासे देदीप्यमान, 
इन्द्ियोसे अपराभूत, भोजनमात्रका संग्रही ओर यथायोग्य 
समी विष्योका उपमोग करता इआ भी अपने मन ओर 
< = इन्द्ियको वरामं रक्खे, किंसीका दोष अपनेमे न आने 
छ [चच्छन्नः कात्‌ स्प उपा, श्रय इच्छताम्‌ ॥ दे ॥ ४५ ॥ जैसे अग्नि कही ( ख्कडी आदि ) अप्र 
कट रहती है ओर कहीं प्रकट, वैसे दी साधक भी 
। कहीं गुप्त रदे ओर कीं प्रकट हो जाय । वहं की 
। कहीं एसे ख्पमे भी प्रकट हो जाता है, जिससे कल्याण- 
य॒ङक्ते सर्वत्र दातणां दहन्‌ प्रागु्तराशचभग्‌ ॥४६॥ | कामी परुष उसकी उपासना कर सके । वह अभिके 
४ = समान ही भिक्षाखूप हवन करनेवाकोके अतीत ओर 
सावी अ्ुभको भस्म कर्‌ देता है तथा सवत्र अन्न ग्रहण 
| करता है ॥ ४६ ॥ साधक पुस्पको इसका विचार 
करना चाहिये किं जैसे अग्रि लबी-चोडी, टेदी-सीधी 

खपायया सृष्टमिदं सदसस्छक्षणं विभुः । 


चोड दिखायी पड़ती है वास्तवमे वह वैसी है नही, 


वैसे दी सवेग्यापक आत्मा भी अपनी मायसे सचे इए 
काय-कारणरूम जगत्‌मे व्याप्त होनेके कारण उन-उन ` 


` | वस्तुओके नाम-खूमसे को$ सम्बन्ध न होनेपर भी उनके 
प्रविष्ट ईयते तत्तरखरूपोऽग्निरिविधसि ।\७७।। | रूपमे प्रतीत होने कता है 1 ७ ॥ 


भार खथ खलं | २. | ९.५५ 


क ~: कौ 


कुकडियोमे रहकर उनके समान दही सीधी-टेदी या च्बी- ^ 


भा 






श्रीमद्भागवत [ अ० ७ 



























विसगाद्याः रमदानान्ता भावा देदख नात्मनः । मैने चन्द्रमसे यह रिश्चा प्रहण की ह कि यचपि 
जिसकी गति नहीं जानी जा सकती, उस कालके 
प्रभावसे चन्द्रमाकी कल्पै घटती-बदृती रहती है, 
तथापि चन्द्रमा तो चन्द्रमा दही है, वह न घटता है ओर 
करानामिव चन्द्र कालेनीव्यक्तवत्मना ॥४८॥ | न वदता ही है; वैते ही जन्मसे लेकर परलयुपर्न्त 
जितनी भी अवस्थां है, सव दारीरकी है, आत्मासे 


- 5 = उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है | ४८ ॥ जसे आगकी 
- 
4 कलन दोषे ; ६ कपट अथवा दौपककी दो क्षण-क्षणमे उ्पन्न ओर्‌ नष्ट 
[त पतान भभवाप्यव।। होती रहती है--उनका यह क्रम निरनतर्‌ चट्ता रहता 


दै, परंतु दील नदीं पड़ता- तैसे दी जच्प्रवाहके 

| समान वेगवान्‌ क्के द्रा क्षण-क्षणमे प्राणियोके 

नित्यादपि न च्येतेआत्मनोऽगेर्यथारचिषाम्‌।४९। | श्तारकी उपति ओर तिना दता ता &, पर 
अज्ञानवश बह दिखायी नदीं पडता | ४९. ॥ 

गुेयंणादुपादत्ते यंथाक्लं वियश्चति । | राजन्‌ । भने सु्त्ते यह शिक्षा ग्रहण की है कि 

जसे वे अपनी किरणोसे परश्वीका जठ लीचते ओर 

समयपर उसे बरसा देते हँ, वेषे ही योगी पुस इन्दियौके 

दारा समयपर विषयोका ग्रहण करता है ओर समय 

अनेपट्‌ उनका व्याग--उनका दान भी कर देता है, 

तेषु भुज्यते योग मोभिगौ इव गोपतिः ।\५०)) | किती भो समय उसे इन्दि किरी भी विषयमे 

आसक्तिं नहीं होती ॥ ५० ॥ स्थृट्घुद्धि पुरुषोको 

जके विभिन प्रमे प्रतिव्रिम्वित इथ सयं उन्दीमि 

प्रविष्ट-सा होकर भिन-मिन दिखायी पडता है । परंतु 

बुध्यते स्वेन भेदेन व्यक्तिख इव तद्वतः इससे खख्यतः सूर्य अनेक नहीं हो जाता; वैसे ही 

चल-अचछ उपाधियेके मेदसे एेसा जान पडता है कि 

प्रत्येक व्यक्तिमे आत्मा अल्ग-अच्ग हैँ | प्रतु जिनको 

सा माद्धम होता है, उनकी बुद्धि मोटी है । असक 


[+ 


श ततय न, बात तो यह है कि आत्मा सूर्यके समान एक दी है । 
 इ्षयतेस छमतिभिरारमा चावखितोऽकवत्‌ ।।५१॥ | लरत; उनम 5 
नातिस्नेहः प्रसङ्गो वा कतेन्यः क्रापि केनचित्‌ । राजन्‌ | कटी किंसीके साथ अत्यन्त स्नेह अथवा 
"स आसक्ति न करनी चाहिये, अन्यथा उसकी बुद्धिं अपना 
क  दिन्देत तायं कपोत इव दीनधीः ॥५२॥ | खातन्य खोकर दीन हो जायगी ओर उसे कद्रूतस्की 
~ . - तरह अत्यन्त क्ठेरा उठाना पडेगा ॥ ५२ ॥ राजन्‌ । 
पातः क रण्ये छतनीडो वनस्पती । किंसी जग्मे एक कबरूतर्‌ रहता था । उसने एक पेड़प 
=. - अपना धोसला बना रक्खा था । अपनी मादा कत्रूतरीके 
यया सर्दवास कतिचित्‌ समाः॥॥५३॥ | साथ वह कई वर्तक उसी घोंसरेमे एदा ॥ ५३॥ 


क 





क 9) काक कः ज 
जः ज 





| { [ ^ 
ध १ ॥ * + ध क) ~ । 1 । (4 1 





अ० ७ | एकादच्च स्कन्ध ९५८५ 


 @ ® भ जपि जक वा ककः 
व्क = 


(म की) 21 


~~ नेहगणिवटदयो अहधर्भिणो । उस कवरूतरके जोडके हृदयम निरन्तर एक-दृ्षरेके प्रति 
स्नेहकी इद्धि होती जाती थी । वे गृहस्यधमर्मे इतने 
च्याञ्चमङ्गन बुद्धिं बुद्धया बघन्धतुः 1|५४॥ | आसक्त हो गये ये कि उन्होनि एक दृसरेकी दि-ते-द्टि 
अङ्ग-से-अङ्ग ओर बुद्धि-से-वुद्धिको वाधि रक्डा था ॥५४॥ 
उनका एक-दूसरेपर इतना विश्वास हयो गया थाकिंवे 
भिधुनीपूय विसव्धौ देरतुनरानिषु १।५५॥। | निःश हकर वरहकी इावीनं पक साय सोते 
0 बैटते, धुमते-किरते, टदरते, बातचीत करते, खेकते ओर 
यं यं बाज्छत्ति सा सै्॑स्तपयःत्यलुकम्पिता । खाते ीते ये ॥ ५५ ॥ राजन्‌. ! कूपर करूतरका 
इतना त्रम था किं वह जो ङुछ बाहती, कवरूतर्‌ बड़- 

तं त॒ समानयत्‌ कामं ङच्छरेणाप्यजितेन्द्रियः 1) ५६॥ से-वड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना प्रग क्रता; वह 
कवूतरी भी अपने कामुक पतिकी कामनारं पणं 
| करती ॥ ५६ ॥ समय आनेपर कबरूतरीको पल्य गभं 
| रहा । उसने अपने पतिके पास ही धोँसलेमे अंडे 

शण्डानि दुषुदे नीडे रवपस्युः संनिधौ सती \\५७1) | दिवे 1५७1} मगवान्‌की अचिन्त्य दाक्तिसे समय आनेपर्‌ 
वे अड षट गये ओर उनमेसे हाथ-पैसाले वच्चे निकल 
| आये । उनका एक-एक अङ्ग ओर रोए अत्यन्त कोमटं 


| थे ॥ ५८ ॥ अब उन कबूतर-कवरूतरीकी आंख अपने 
रा भटदमाल्या नि; सामलाङ्खतन्‌रुहा; 14८11 | बर्न्वोपर्‌ र्ग गयीं, वे बडे त्रेम ओर्‌ आनन्दसे अपने 








कि 





य? 


1 


0१ 


(4 
# 1 


शस्यासनाटनखानवाल॑क्रीडाशनादिक्ञ । 


कपोती प्रथसं शमे ग्ह्तती काल आगते । 


तेषु ङे व्यञायन्त उचिताथयवा हरेः । 


छ ष  वच्चौका लाटन-पाक्न, व्यड्-प्यार करते ओर उनकी 
म्रजाः पुपुषतुः भ्रीतौ दभ्पती पुत्रवत्सस । । मीठी बोली, उनकी राटर-गूं घुन-घुनकर आनन्दमग्न 
पम हो जाते ॥ ५९] वच्ये तो सदा-सर्वंदा प्रसन रहते 


श्रृण्मन्ती जत तासां लिश्रेती कर भापितेः ।५९॥ | ही ह; वे जव अपने सुकुमार पंष्ठोसे मा-वापका स्पशं 


क्रते, कूजते, भोखी-माटी चेष्टा्प करते ओर फदक- 
फुदकक्तर अपने मा-वापके पास दौड़ आते तत्र करूतर्‌ 
=-= ं कवरूतरी अनन्दमग्न हो जाते | &° 1] राजन्‌ ! सच 

तात स 
प्रत्युदमरदीनानां पितरो अदमापतुः ।\६०॥। न तो व व 
हो रहे ये । उनका. हृदय एकःदूसरेके स्नेहबन्धनसे 

| वन्यान्यं विष्णुमायया 1 . 
सनेहसुब्रदरह्दय < | नध रहा था । वे अप्रने नन्हे-नन्हे वचचचोके पाटन-पो णमे 
मोहितौ दीनधियौ शिक्षन्‌ पुपुषतुः प्रजाः ॥६१।॥ इतने न्यप्र रहते कि उन्दं दौनःदुनिया, व्येकपरगोककी ` 
याद ही न आती ॥६१॥ एक दिन दोनों नरपादा 
एढद्‌ा जग्तु्तासासन्नथं तौ इडम्बिनौ 1 अपने वचचोकरे छि चारा लने जंगस्मै गये इए ये. 
£ क्योकि अव्र उनका कुटुम्ब बहत बद्‌ गया था । बे चि 
परितः कानने तखिन्नथिनां चेरदुधिरम्‌ ॥६२॥ व्यि चिरकाल्तक जंगक्मे चात ओर विचरते 
न ६ रहै ॥ ६२ 1 इधर एक बहेलिया धूमता-चूमता संयोग- 
द्रा तँस्छञ्धकः कश्चिद्‌ यद्च्छातो वनेचरः । वर] उनके घोसलेकी ओर आ निकर । उसने देखा 
क न्वा क  --~ - ----------------------- ------------ 
१. राजन्नत्यथमनु° । 


तासां पतत्रे सस्परशेः जिते यग्धचेष्टितैः 1 


कपोतश्च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकरौ | 


गती पोषणमादाय स्मनीडयुषजग्मतुः ॥६४। 





कपोती स्वात्मजान्‌ गीक्ष्य बारुकाञ्ज!लसंइृतार्‌ । 


(` तानभ्यधावत्‌ क्रोचन्ती कोशतो भृशदुःखिता।।६५॥ 

















सासद्धरस्नेहयुणिता दीन वित्ताजमायया ¦ 
स्वयं चाबध्यत रिचा बद्धान्‌ पर्यन्त्यपस्परतिः।।६६॥ 
अ  कपोतशथात्मजान्‌ बद्वानात्परनोऽप्यधिकाच्‌ भ्रिषान्‌ । 
र 3 भाया चात्मसमं दीनौ विखरपातिदुःखितः।६७॥ 
{8 ॥ अहो मे पञ्यतापायमस्पपुण्यस्य दुर्मतेः 1 


अतप्तखाक्रताथेस्य गृहखेव्भिश्ो हतः ॥६८॥ 


च यसय ये पतिदेवता 





न्ये गहे मां संत्यज्य पूत्रःस्वर्याति साधुभिः ॥६९॥ 


$ ` सोऽदं शृ गृहे दीनां मतदार मपप्रजः। 


॥ = 3 ~ 


जिजीविषे क्रिमथं बा विधुरो दुःखजीवितः ॥७०॥ 


तां तथेवारताज्छिभििशतयुग्रल्ान्‌ षिवेषटतः 


9 ऋ, 


$ $ , क 
क ~ 4 
ह द 


(2 च ं १५।* 
१, प्रजापोषणकरोच्छुकरो । : नगप्प्रण० | ३. दानाम्‌ 


श्रीमद्भागवत 


+ 43 3 £ । न ~ 
| जगृहे जालमातत्य असतः स्वाखयान्तिके ॥६३॥ । कि धोसञेके आस-पास कबूतरके वस्चे पदक रहे है; 





| अ० ७ 





उसने जाक फेटलाकर्‌ उन्दं पकड़ लिया ॥ ६३ ॥ 
क्रूतर-कबूतरी बञ्योको विखने-पितानेकरे च्वि हर समय 
उत्षुक रहा करते थे । अ वे चारा लेकर अपने 
घोसलेके पास अये ॥ ६४ ॥ कवरूतरीने देखा कि 
उसके नन्हे-नन्हे बच्चे, उनके हृदयके ट्कड़े जामे 
फसे हए हँ ओर द्ःख्से चच कर रहे हैँ उन्हें एसी 
स्थितिमें देखकर कत्रूतरीके दुःखकी सीमा न री। 
वह रोती-चि्वाती उनके पास दौड गयी ॥ ६५ ॥ 
भगवान्‌की मायासे उसका चित्त अत्यन्त दीन-दु्टी हो 
रदा था | वह उमड़ते हए स्नेहकी रस्सीसे जक्डी हई 
थी; अपने वचचोको जामे फसा देखकर उसे अपने 
ठारीरफी भी सुध-वुध न रदी ओर वह खयं ही 
जाकर जामे फस गयी ॥ ६६ ॥ जब क्वृतरने देखा 
कि मेरे प्राणोँसे भी प्यारे बच्चे जामे पँ गये ओर 
मेरी प्राणप्रिया पत्नी भी उसी दशाम प्च गयी, तव 
वह अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने च्गा । सचमुच 
उस समय उसकी दशा अत्यन्त दयनीय थी ॥ ६७ ॥ 
नतिं अभागा ह, दुमंति ह| हाय, हाय । मेरा तो सत्या- 
नादा हो गया । देखो, देखो, न मुञ्चे अभी तपि हई ओर 
नमेरी आदा ही प्री इदं । तवतक मेरा धर्म, अर्थ 
ओर कामका मूल यह गृहस्थाश्रम ही नष्ट ह्यो 
गया ॥ ६८ ॥ हाय ! मेरी प्राणप्यारी स॒ञ्चे ही अपना 
हृदेव समञ्जती थी; मेरी एक-एक वात मानती थी, मेरे 
हृदारेपर नाचती थी, सव तरहसे मेरे योग्य धी | आज 
वह सुञ्ञे सूने धरम छोडकर हमारे सीघे-सादे निद 
वर्चोके साथ खरग सिधार रही है ॥ ६९ ॥ मेरे वच्चे 
मर गये । मेरी पतनी जाती रही । मेरा अब संस्ासे 
क्या काम है ¶ मुश्च दीनका यह व्रिधुर्‌ जीवन--तरिना गृहिणी- 
का जीवन जटनका--व्यथाका जीवन है | अवमे 
इस सूने धरम किसके व्यि जी १ ॥ ७० ॥ राजन्‌ । 


कतरूतरके कन्वे जाल्म फेसकर तड़फडा रहे थे । स्‌ 


दीलरहाथा किं वे मौतक्रे पजेम है परतु बह मू 
कतरूतर यह सव्र देखते इए भी इतना दीन हो रदा था 


ठु पर्यननप्यश्ीऽपतत्‌ ॥७१॥ कि खयं जानच्चकर जा कूद पड़ा ॥ ७१ ॥ 








2 
¢ ः 4 क बः मते .* न "व श्वः द 


न्व्‌ - क १ 





५.4 | ह ~ ह्न >+ ~ 
+ ` नीति (* थ ई त न्वः. र 
एना १ च 


॥ ५.1 ह ् 
ज + ८ 8 डे" ऋ १ 
९ # "0 ३ ज 


9 + य = ~ 


अ० € | 











तं रुध्वा छञ्धः करः कपोतं गृहमेधिनम्‌ । 
कपोतकान्‌ कयोतीं च्‌ सिद्धाः प्रययो मृहम्‌।\७२। 
एवं इटुञ्यशरान्तात्मा हन्दपरामः पतस्तरिवत्‌। 


पष्णर्‌ छुट्स्बं कृपणः दुबन्धोऽचसीदति 1\७३। 


यः प्राप्य मारं लोकं दुक्तिद्रारमपादृतम्‌ । 


र~ 
९५९६ ~ 


गृहेषु 


एकादश्च स्कन्ध 


| राजन्‌ ! बह बहेलिया वड़ा रूर था | त कवूत्‌- 
। कवूतरी ओर उनके वचोके मिट जानेसे उसे बडी प्रसनता 


लोगोकि सङ्ग-साथम ही जि सुख भिव्ता है परं अपने 
 कुटुम्वके मरण-पोषणमें ही जो सारी घुध-बुघ्र खो वेठ 
। है, उसे कमी चान्ति नहीं मिक सकती 1 वह उसी 


७4७ 


हई; उसने स॒मश्ना मेरा काम वन गया ओर वह उन्दं 
लेकर चटता वना ॥ ७२ ॥ जो कुट्म्ती है, विषर्यो ओर 





कवरूतरके समान अपने कुटुम्बक साथ कश्ट॒पाता 


। है 1 ७२ ॥ यह मनुष्य-ररीर मुक्तिका खुख इआ द्वार 
| है। इसे पाकर भी जो कवरूतरकी तरह अपनी धर- 
| गृहस्थीम दही फसा इआ दहै, 
| चकर गिर रहा है । शाखकी भाषामे वह “आख्दच्युतः 
पक्स्तमाङ्ढच्युतं वपरिदुः 11७८1 दहै ॥ ७४ ॥ 


वृह वहत॒ रत्वेतक 





ति श्रीमद्वागवते महापुरणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे 
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ 


~ थ-- ५ 


अथाष्टमोऽध्यायः 


अवध्रुतोपाख्यान-अजगरसे छेकर पिङ्गलातक नौ गुरओंकमै कथा 


नराण उवाच 


सुखसंन्द्रिय्ं राजस्‌ खं नरक एव च । 


हिनां यड्‌ पथा दुःखं तखान्नेच्छेत्‌ तद्‌ बुधः ।\१॥ 


„6४2 


ग्रसं सुमष्टं विरक्तं महान्तं स्तोकमेव वा । 
टृच्छयवापहितं ग्रसेदाजगरोऽग्रियः }। २1 


शयीताहानि भूरीणि गनिरादारोऽनुपक्रमः । 


यर नोपनभेद्‌ ग्रासो महादिखि दिष्ट \ २ ॥ 


अवधूत दत्तात्रेयजी कते है-राजन्‌ ! प्राणिर्यो- 
को जेसे बिना इच्छाके, व्रिना किसी प्रयततके रोक्नेकीं 
चेश करनेपर भी पूर्वकमानुसार दुःख प्राप्त होते ई, 
वेसे ही खगम या नरकमे-- कहीं भी रहं, उन्हे इन्दरिय- 
सम्बन्धी सुख भी प्राप्त होते दी है । इसव्िि सुख ओर 
दुःखका रहस्य जाननेवाठे बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये 
कि इनके ल्य इच्छा अथवा किसी प्रकारका प्रयत्न न 
करे ॥ १॥ व्रिना मग, तिना इच्छा कयि खयं ही 
अनायास जो कुछ मिक जाय - वह चह रूरा-सूखा 
हो, चाहे वहत मधुर ओर खादिष्ट, अधिक हो या थोड़ा- 
बुद्धिमान्‌ पुरुष अजगरे समान उसे ही खाकर जीवन- 
निर्वाह कर > ओर उदासीन रहे ॥ २ ॥ यदिः भोजन 
न मिले तो उसे भी प्रारव्ध-मोग समञ्चकर किसी प्रकारकी 
चेटा न करे, बहुत दिनोतकः भूख! ही पड़ा रहै । उसे 
चाहिये किं अजगरके समान केवर प्रारब्धे अनुसार 
प्रति इए भोजनम ही स्तुष्ट रदे ॥२१ 





। +न 4 
` ७५८ 
न ज्ज्ज्व्य्य्व्य्यव्य्य्य्य्य्य्य्य्व्व्व्व्व्य्य्य्य्य्य्व्य्य्य्व्य्व्व्व्व्व्व्य्व्व्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्व्य्व्व्व्व्व्व्व्व्च्व्व्ववव्व्व्व= 


 ओजःसहोबलयुतं विञ्रद्‌ देह्मकर्मकम्‌ । 


॥ शयानो बीतनिद्रथ नेहेतेन्द्रियवानपि ॥ ४। 
यनि प्रसन्नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्ययः 





अनन्तपारो क्षोभ्य; स्िमितोद इवार्णवः । ५॥ 
1 स्द्रकामो हीनो .वा नारायणपरो स॒निः । 















नोत्सपत न श्ष्येत रिद्धिखि सागरः ।॥ ६॥ 


टृषटरा ्ियं देवमायां तद्धावेरजितेन्दरियः 
प्रलोभितः पतत्यन्धे तमलग्रौ पतङ्गवत्‌ । ७ ॥ 
-  योषिद्धिरष्याभरणाम्बरादि- 

द्रव्येषु मायारचितेषु मढः । 
^ ६ प्रलोभितात्मा दुपभोशबुद्धया 


 पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥ 





कं स्तोकं ग्रसेद्‌ ग्रासं देहो वतत यावता । 


गृहानर्हिसन्नातिष्ठेद्‌ इत्ति माधुकरीं निः । ९॥ 


म्य यथ महद्भवशच शाजेभ्ः ङशलो नरः । 
` नही तो शक ही कमलके गन्धम भासक्त 





* 4 













छर्ख र्‌ ईत्‌ [९५।4 


श्रीमद्वागवत 





अ० ८ 








उसके शरीरम मनोवल, इन्द्रियवक ओर देहवल तीनों होँ 
तव भी वह निश्वेष्ट ही रहे । निद्रारहित होनेपर भी सोया 
हुआ-सा रहे भौर कर्मेन्दियोके होनेपर्‌ भी उनसे को चेष्ट 
न करे । राजन्‌ ! मैने अजगरसे यही रिक्षा ग्रहण की 
है ॥ ४॥ 

समुद्रसे मैने यह सीखा है कि साधकको सवदा 
प्रसन ओर गम्भीर रहना चाहिये, उसका भाव अथाह, 
अपार ओर असीम होना चादिये तथा किसी भी निमित्त- 
सेउसे क्षोभ न होना चादिये। उसे ठीक वसेद 
रहना चाहिये, जैसे ज्वार-भाटे ओर तरङ्गोसे रहित चान्त 
ससुद्र ॥ ५ ॥ देखो, समुद्र वर्पाकऋतुमे नदियोकी वादके 
कारण वढता नहीं ओर न भ्रीण-ऋतुरमे घटता ही है, वेषे दी 
भगवत्परायण साधकको भी सांसास्कि पदार्थोकी प्रा्तिसे 
प्रफुल्ठित न होना चाहिये ओर न उनके घटनेसे उदास 
ही होना चाहिये ॥ ६ ॥ 

राजन्‌ ! मने पर्तिगेसे यह शिशा ग्रहण की है कि 
जेसे वह रूपपर मोहित होकर आगमे कूद पड़ता है 
ओर जल मरता है, वैसे ही अपनी इन्दरियोको वदाम न 
रखनेवात्य पुरुष जव सख्ीको देखता है तो उसके हाव- 
भावपर च्य्‌द्र छो जाता है ओर घोर अन्धकारमे, नरकं 
गिरकर्‌ अपना सत्याना कर केता है । सचमुच खी 
देवताओंकी वह माया है, जिससे जीव मगवान्‌ या मोक्ष- 
की प्राप्तिसे वञ्चित रह जता है ॥७॥ जो मूढ 
कामिनी-कञ्चन), गहने-कपड़े आदि नारवान्‌ मायिकं 
पदार्थोमिं फसा इआ है ओर जिसकी सम्पूणं चित्तवति 
उनके उपमोगके च्य ही काकायित है, वह अपनी विवेक- 
बुद्धि खोकर पर्तिगेके समान न्ट हो जाता है ॥ ८॥ 

राजन्‌ । संन्यासीको. चाये किं गृहस्थोंको किसी 
प्रकारका कष्ट न देकर भँरेकी तरह अपना जीवन- 
निर्वाह करे | वह अपने शरीरके व्यि उपयोगी रोठीके 
कु टुकड़े कई धरोसे माग ठे# ॥ ९ ॥ जिप्त प्रकार 
भरा विभिन्न पुष्पोसे-- चष्टे वे छोटे हों य वड़-- 


| उनका सार संग्रह करता है, वैसे ही बुद्धिमान्‌ पुशुषको 


५८१३ भ्रमर जैसे रात्रिके समय उस्म बरद हो जानेसे नष्ट हो जाता हः 


एक दी टस्थका अन्न लानेते उसके सांसर्गिक मोहम फैसकर यति भी नष्ट हो जायगा | 





|| 


ण भ क क क 2, 1 


अं० ८ | 


-न्य्व्य्य्य्यय्य्य्य्य्य्व्य्व्य्=्=च्व्य्च्व्यव्य्य्यव्व्वच्य च्च्य 





एकाद्‌न्च स्कन्धं 


७५९ 











सर्वतः सारमादव्यात्‌ पुष्यभ्य इव षट्पदः ।१०। 
सायंतनं श्वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षितम्‌ 1 
पाणिषात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न संग्रही ।११॥ 
सायंतन स्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षुकः! 


मक्षिका इव संगृह्णन्‌ सह तेन विनश्यति ॥१२॥ 


[९ 0 


पदापि युवतीं भ्िष्चुने स्पृशेद्‌ दारवीमपि । 

स्प्शस्‌ करीव बध्येत करिण्या अङ्गसङ्गतः ॥१३॥ 

नाधिगच्छेत्‌ लियं प्राज्ञः कर्दिचिन्सृत्युमात्मनः । 
< णभ प द, शठे, अ, 

बराधिकः स. हन्येत गजेरन्यंगंजों यथा ॥१४॥ 


नं देयं नोपभोग्यं च छन्धेयद्‌ दुःखसंचितम्‌ । 
यङ्क्तं तदपि तान्य मधुेधा्थविन्मघु ।१५॥ 


क जेः (^ 


सुदुःखोपाजितर्विततराशासानां गृहारिषः । 
धि ना 








ज पम 





य 


चाहिये कि छोटे-वडे सभी शा््लोसे उनका सार-- 
उनका रस निचोड ठे ॥ १० ॥ राजन्‌ । मैने मघु- 
मक्लीसे यह शिक्षा ग्रहण की है किं सन्यासीको 
सायका अथवा दूसरे दिनके व्यि भिक्षाका संग्रह न करना 
चाहिये । उसके पास भिक्षा ऊेनेको कोई पात्र हो तो 
केवल हाथ ओर रखनेके य्यि कोई वर्तन हो तो पेट । 
वह कहीं संग्रह न कर बैठे, नहीं तो मधुमक्रिखयोके 
समान उसका जीवन दही दूभर हो जायगा ॥ ११॥ 
यह वात खूव समञ्च छेनी चादिये किं संन्यासी स्वेरे- 
रामके च्य किसी प्रकारका संग्रह न करे; यदि संम्रह 
करेगा, तो मघुमक्िर्योके समान . अपने संग्रहके साथ 
ही जीवन भी गँवा वैटेगा ॥ १२॥ 


राजन्‌ ! मेने हाथीसे यह ॒ सीखा कि संन्यासीको 
कभी पैरसे भी काठ्की वनी इई ल्ीका भी स्परंन 
करना चाहिये । यदि वह रसा करेगा तो जेसे हथिनी- 
के अङ्-सङ्गसे हाथी वध जाता है, वसे दही वह भी वध 
जायगा | १३ ॥ षिवेकी पुरुष किसी भी खीको कमी 
भी मोग्यख्पसे खीकार न करे; क्योकि यह उसकी मूति- 
मती मृत्यु है । यदि वह खीकार करेगा तो दाथिर्योसे 
हाथीकी तरह अधिक बक्वान्‌ अन्य पुरुषेके द्वारा मारा 
जायगा ॥ १४ ॥ 


मेने मधु निकाकनेवाठे पुरुषसे यह शिश्ना ग्रहण 
कीहै कि संसारके व्मभी पुरुप बड़ी कठिनाईसे धनज्ञा 
संचय तो करते रहते है, किंतु बह संचित धन न 
किसीको दान करते ह ओर न खयं उसका उपमोग 
दी क्रते ह । बस, जेंसे मधु निकारनेवाला मधु- 
मक्खियोदरारा संचित रसको निकाल ठे जाता है, वैसे 
ही उनके संचित धनको भी उसकी टोह रखनेवाला 
कोरे दूसरा पुरुष ही भोगता है ॥ १५ ॥ तुम देखते 
हो न क्रि मघुहारी मधुमविंखयोका जोडा इआ मघ 
उनके खानेसे पहले ही साफ़ कर जाता है; वैसे ही 





कः = क = क # भि भीः का 0 


# हाथी पकड़नेवाठे तिनकौसे ठके हए गडढेषर कागजक्ी हथिनी खड़ी कर देते है । उसे देखकर हाथी व्ह आता दै 


ओर गडढेम गिरकर फस जाता है । 


गृहस्थोके बहुत कटिनाईसे संचित किये पदार्थोको, जिनसे 


 ; + ~~ ^ न + „न 


॥॥ 
















| \ ६० | | श्रीमद्भागवतं | अ० ८ 


13 1 1 1 त 1 1 ~= जजर कक = = भक 
कि भि 











॥ = "च 





-=----------------------------- जय्य 





ए [9 १ कः क 


॥ ।  मधदेवाग्रतो अङ्क्ते यति गृहमेधिनाम्‌ ।।१६॥ | व घुलमोगकी अभिया रते है, उससे भी पले 
[व यासी ओर ब्रह्मचारी भोगतेदहै; क्योकि गृहस्य तो 
'- = र प्रहे अतिधि-अम्यागतोंको भोजन कराकर दहा खय 
भोजन करेगा ॥ १६ ॥ 


ग्राम्यगीतं न शृणुयाद्‌ यति्ंनचरः कचित्‌ । मैने हरिनसे यह सीखा है किं वनवासी संन्यासीको 
कभी विषय-सम्बन्धी गीत नहीं सननं चाहिये । वह इस्‌ 
वातकी रिक्षा उस हस्निसे ग्र्टण कर जो व्याघके 
गीतसे मोहित होकर वै जाता है ॥ १७ ॥ तु्ं इस 
& < बातका पता है कि हरिनीके गर्म॑से पैदा इए ऋष्यश्चङ्ग ` 
सृत्यवादित्रगीतानि जुषन्‌ प्राम्याणि योषिताम्‌ । |>. लियो निय रव्न्धी गाना.वजाना = 


| चै 


रित हरिणाद्‌ बद्धान्परगयोगीतमोषितात्‌ ।\१७॥ 


॥ 9 1 


मुनि सिर्योका विपय-सम्बन्धी गाना-वजाना, नाचना आदि 
देख-घुनकर उनके वरामं हो गये थे ओर्‌ उनके दाथकी 
कटपुतटी बन गये थे} १८ ॥ 
जिहययातिग्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः । अव मँ तुम्हं मदटीकी सीख घुनाता द । जसे 
मछटी कर्मं ट्गे इए मांसके ट्कडके लोभे अपने 
त्राण गेँवा देती है, वेसे दी खादका छोयी दुहुद्धि मनुष्य भी 
अपनी मनको मथकर्‌ व्याकु कर्‌ देनव्ाटी जिद्ाकरे वमे 
ॐ णि मनीपरि हो जाता है ओर मारा जाता है | १९ ॥ विवेकी पुरुष 
 ; इन जयन्स्याञ्चु निराहारा मनीषिणः । भोजन वंद करके दूसरी इृन्दियोपर ता वहत डीत्र विजय 
- प्रात कर जते है परत इससे उनकी रखना-इन्दिय 
वजेयित्वा तु रसनं तान्न्रनख बधते ॥(२०॥ | वशमे नहीं होती | वह्‌ तो भोजन वे नेसे ओर भी 
र ४ प्रर हो जाती हं ॥ २० ॥ मनुष्य ओर सव इन्दियो- 
` ` तावजञितेन्द्रियो न स्याद्‌ दिजितान्येन्द्रियः पमान्‌ । | पर विजय प्राप्त कर ठेनेपर भी तवतक जितेन्द्रिय नही 
प हो सकता, जनतकः रसनेन्ियक अपने वरामं नहीं कर 


त रसनं यावज्जितं सवं जिते रसे ॥२१॥ | स्ताः ओर यदि रसनेन्दरियको वर्ष्यं षर ल्या, तवर 
= ४ ४4 क - ~ ग्‌ 3 
| तो मानो समी इन्द्रियो वरम हो गयीं ॥ २१॥ 


४ |, 
| | 


आसां ऋीडनकों वर्य ऋष्यशृङ्खो सगीखुतः ॥१८॥ 


व 


भ (व ध । 
^ /१७ & ^ ¶कति ई 1. $$ ( "क = ट 
ट त र. (4 ॥. ‡ च +». "7 न) #., 
॥॥ + । 1 नई # (४, ॥ ४५ 
^. त व 1 >> ++ 011 १५ ॥, 
क # † 9 च 
1 ^ ॥ $. 
१). ह ५ 
व 4 र 7 
1 
॥ %, र 


मरत्युश्रच्छत्यसद्बुद्विमीनस्त॒ बाडरयथा ॥१९॥ 


च 


छ 0 


चेद्याऽऽसीद्‌ विदेहनगरे पुरा । नृपनन्दन | प्राचीन काव्य्की बात है कि विदेहनगरी 
त मिथिलाम एक वेद्या रहती थी । उसका नाम था 
क त विधित किञ्िलनिबरोध चपनन्द्न ॥२२॥ पिङ्ग । मेने उससे जो कुछ शिव्चा प्रण की, वह 
` तर" मे = म तदे नाता द्व; साववान होकर सुनो ॥ २२ ॥ बह 
| स्वे्छाचारिणी तो थी ही, रूपवती भी थी । एक दिन 
रात्रिके समय किसी पुरुषको अपने रमणस्थानमें लाने - 


क. - हः | लि सत॒ बन-छनक्र उत्तम वस्ामूषणोंसे सजकर 
भूत्‌ काले बिरार बिभ्रती रूपछतमभ्‌ २२ | दत देक अपने षके बाहौ द्रजः ध 


^ 
५ ज च, ^ ^ भ क + + {4 चकन, 
ष्दी २३ ॥ ` ॥* उसे = 
् 17 4 ९ ॥ # --1| 1 + र पुरुषकी 
# 4 ५ ह 1: ध ~ गररत्न च 8 = - 
| च ` ५ ` पक 9 त # ग्वै ` पि -+4 + ४ भ 9 क इ + ३ 
` चू" [ अ #॥ = च ~ * > १ न. ५ कक तु च 
9 = ^ ~. हिक ९, ५ त्र ^ १ ~ {क ५. 
# 4 व 1 ५ च ह = क ते 
~ । ऋ) | [५ ~ प्र 
= च+ # न ९ ४ 
- ॥ नव | ०५ ज + ° 
¶ । ५. 
| |. 
- ॥] 


पुरुषान्‌ पर्प । 


= 


रिण्येकदा कान्तं संकेत उपनेष्यती । 





अ० ८ ]  एकदश्च इकन्ध ७६१ 








कोने ना नि नि पिं री 





ताज्छुल्कदान्‌ वित्तवतः कान्तान्‌ मेनेऽथकाुका। २७ गयी शी क्रि वह किसी भी पुरपको उधरसे अति- 
जाते देखकर यही सोचती थी किं यह कोई धनी है भौर 
मद्ये धन देकर उपभोग करनेके व्यि ही आ रहा 
है ॥ २४ ॥ जव आने-जानेवाठे अगे वदढ़ जाते, तन 
फिर वह॒ सकेतजीविनी वेद्या यदी सोचती कि अवद्य 
ही अवकी वार कोई एेसा धनी मेरे पस आवेगा जो 
मुञ्चे वहत-सा धन देगा | २५५ ॥ उसके चित्तकीं यह 
दुराशा बढती ही जाती थो । वह दराजेपर्‌ बहत 
देरतक टगी रदी } उसकी नींद भी जाती रही । वह 
कभी वाहर आती; तो कमी भीतर जाती | इस प्रकार 
आधी रात हो गयी ॥ २६ ॥ राजन्‌ । सचमुच आडा 
ओर सो भी धनकी- बहत बुरी है! धनीकी बाट 
जोहते-जाहते उसका संह सूख गया, चित्त व्याङ्ुक हो 
गया । अव उसे इस वृत्तिसे बडा वैराग्य इआ । उसमे 
दुःख-बुद्धि हो गयी । इसमे संदेह नहीं कि इस वेराम्य- 
का कारण चिन्ता ही थी । परंतु रेसा वैराग्यभी दहै 
तो सुखका ही हेतु ॥ २७ ॥ जव पिङ्गखके च्म 
इस प्रकार वैराग्यकी भावना जाग्रत्‌ इई तव उसने एक 
गीत गाया । वह मेँ तुम्हं घुनाता द्र । राजन्‌ 1 मनुष्य 
आराकी फंसीपर कटक रहा है । इसको तच्वारकीं 
तरह काटनेवाटी यदि कोई वस्तु है, तो वह केवल 
वैराग्य है ॥ २८ ॥ प्रिय राजन्‌ 1 जिसे वैराग्य नहीं 
इआ है, जो इन वखेडोसे ऊवा नहीं है, वह रारीर 
ओर इसके बन्धनसे उसी प्रकार सुक्त नहीं होना 
चाहता, जसे अज्ञानी पुरुष ममता छोडनेकी इच्छा मी ` | 
नहीं करता ॥ २९ ॥ ४ 
पिङ्गखाने यह गीत गाया था-हाय ! हाय ! तै 
इन्द्रियो के अधीन हो गयी । सला मेरे मोहका विस्तार 
तो देखो, मँ इन दुष्ट पुरुषस, जिनका कोई अस्तित्व ही 
नहीं है, विषयसुखकी लक्सा करती द । कितने 
दुःखकी बात है ! म सचमुच मूख॑ ह ॥ ३० ॥ देके ` 
तो सही, मेरे निकट-से.निकट हृदयमे ही मेरे सच्चे खामी ` 
भगवान्‌ विराजमान हैँ । वे वास्तविक प्रेम-खुख ओर 
परमा्थका सचा धन भी देनेवाले ह । जगतके पुरुष 
अनित्य है ओर वे नित्य है । हाय ! हाय ! सैन उनको 



















आगतेष्वपयातेषु सा ंकेतोपजीविनी 1 


अप्यन्यो वित्तवान्‌ कोऽपि माुपैष्यति भूरिदः॥।२५। 


एवं दुश्ञया ध्वस्तनिद्रा द्वायेवसंम्बती । 
निर्गच्छन्ती प्रविश्चदी निश्चीथं समपद्यत ॥२६।। 


तस्या वित्ताश्चया शष्यद्वक्त्र।या दीनचेतसः 


निर्वेदः परमो जज्ञे चिन्ताहेतुः सुखाय &ः ॥२७] 


तंस्या निर्विंण्णचित्ताया गीतं श्रृणु यथा मम । 
निर्वेद आश्लापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः ॥२८॥ 


न द्यङ्गाजातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति । 





यथा विज्ञानरदहितो सयुजो ममतां चप ॥२९॥ 


पिक्कटलीवाच 
अहो मे मोहविततिं पश्यताविनितात्मनः । 


या कान्तादसतः कामं कामये येन वारिल्ला ॥३०॥ 
सन्तं समीपे रमणं रतिप्रद्‌ 


वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय । 





त > श क अ, ह 9 = ऋन-^ 0 + , 
त, ९ न्य 
निति, । 
ह पि ॥, न्न्‌ जदि अ नोत .# कहि `= ~ 
र च | 


त | न च 
नि : "चीन श) (नि 1, | 
।) 
* ॥ि 


॥ द न्दुः किरति स्क ०, % 





निर्तोऽयं दुराश्चाया यन्मे जात्‌; खतराधहः ॥२७] 


७६२ 


ऋ चके कि 3 त 7 7 त प 7 मीम गमरी 


अकामदं दुःखभयाधिशोकः 





मोहप्रदं तच्छमहं भजेऽज्ञा ॥३१॥ 
अहो मयाऽऽत्मा परितापित्ते ब्रथा 

साङ्केत्यव्रत्थातिविग्यवातया । 
सेणान्नराद्‌ याथंतषोऽलखोच्यात्‌ 

रतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती ॥३२॥ 
यद सििभिनिंमिंतवंशवंश्य- 

स्थुणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम्‌ । 
्षरन्नवदारमगारभेतद्‌ 


वि्पत्रपणं मदुपेति कान्या ।३३॥। 


विदेहानां पुरे - ्सिन्नदमेकेव मृटधीः । 


श्रीमद्धाग्बत 


जो = क च ज १ कोक = 





| अ° < 
तो छोड दिया ओर उन तुच्छ मनुष्योका सेवन किया, 
जो मेरी एक भी कामना पूरी नहीं कर सकते; उच्टे 
दुःखभय, आधि-व्याधि, शोक ओर मोह दही देते है| 
यह मेरी मूखंताकी हद है कि म उनका सेवन करती 
ह्र ॥ २१ ॥ बड़े खेदकी बात है, मैने अत्यन्त निन्दनीय 
आजीविका वेर्यादृत्तिका आश्रय लिया ओर व्यरथमे 
अपने रारीर ओर मनको क्ठेरा दिया, पीडा प्चायी | 
मेरा यह दारीर विक गया है| लम्पट, लोभी ओर 
निन्दनीय मनुष्योने इसे खरीद च्या है ओर मै इतनी 
मूखं द्व किं इसी शरीरसे धन ओर रति-खुख चाहती 
द्रं । सुस धिक्तार है ¡ ॥ ३२ ॥ यह शरीर एक धर है । 
इसमे हड्धियोके टेदे-तिरछे वस ओर खंमे लगे इए है; 
चाम, रों ओर नाखूरनोसे यह छाया गया है । इसमें 
नौ दरवाजे है, जिनसे मल निकक्ते ही रहते है । 
इसमे संचित सम्पत्तिके नामपर क्रेवल मल ओर मूत्र है | 
मेरे अतिण्क्ति एसी कौन खी है, जो इस स्थूटशरीरको 
अपना प्रिय समश्चकर सेवन करेगी ॥ ३३ ॥ योँतो 
यह विदेहोकी--जीवन्सुक्तोकी नगरी है, परेतु इसमें 
मे ही सनसे मूं ओर दु ह; स्योकि अकेटी मेदी 
तो आत्मदानी, अविनाशी एवं परमप्रियतम परमाताको 
छोडकर दूसरे पुरुषकी अभिका करती हँ ॥ ३४ ॥ 





मान्धमिच्छन्त्यस्त्यसादात्मदात्‌ काममच्युतात्‌। २ मेरे हृदयम विराजमान प्रमु, समस्त प्राणियोके हितेषी 


सुह परष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्‌ । ` 
तं बिक्रोयात्मनेवाहं रमेऽनेन _ यथा रमा ३५ 


कियत्‌ प्रियं ते व्यभजन्‌ कापा, म कामदा नराः 1 ,- 


नस । 5 तिपः रार निऽलामगसे ,4 


आद्यातवन्तोभायायादेवाःबाः कालविंताः 1\२९॥। 


1 1555 उतनः 


जनं मे भगवान्‌ प्रीती विष्णः केनापि कर्म॑णा 1 


। ¢ ~ 
‡ <> 1 


= र 2 


# १ 


सुहृद्‌, प्रियतम, खामी ओर आत्मा हँ | अव्र मँ अपने 
आपको देकर हन्द खरीद दंगी ओर इनके साथ वैसे 
ही विहार करूगी, जैसे च्छ्ष्मीजी करती है ॥ ३५ ॥ 
मेरे मूं चित्त ! तू बता तो, सदी, जगत्‌के विषय- 
मोगोने, ओर्‌.उनकरोदेनव्राले..पुरुषोने तञ्च. कितना सुख 
दिया है । अरे | वेतो खयं ही पैदा होते ओर 
रतोः वेनीः दी तातः नदी. कती, 
केरल मनुष्योकी भी नही; क्या देवताओंनि भी भोगों 
दारा अपनी पलियोंकूःसंतु्ट किया दै १ ते नेचारे तो;खयं 


| काठके गामे पडे.पड़े कराद रहे ह ॥२६॥ भवस्य ही मेर 


किंसी छमक्म॑से विष्युभरत्रान्‌ सुदरपरः प्रसेन दै, तमी 
त शे ह व्रजःम इश 1 भन ही 


{४ {६ {^ | . १ =? 





) 4. सद 
न्य्व ¢ ० 
वि जै 













अ०९ | | एकादश स्कन्य 


न= 











कि 








यह वैराग्य सुख देनेवाव्य होगा ॥ ३७ ॥ यदि मै ` 
मन्दभागिनी होती तो मुञ्चे रेसे दुःख ही न उठाने पडते, ` 
जिनसे वैराग्य होता है । मनुष्य वैरग्यके द्वाराहदीषर्‌ ` 
आदिके सव्र बन्धनोको काटकर शान्तिकम्‌ करता 
है ॥ ३८ ॥ अव भँ भगवान्‌का यह उपकार आदरपवक 
सिर द्काकर सखीकार करती द्र ओर विषयमोगोकी 
दुराा छोडकर उन्हीं जगदीश्वरकी शरण ग्रहण करती 
ह | २९. 1 अव मुञ्चे प्राट्धके अनुसार जो कुछ मिक ` 
जायगा, उसीसे निर्वाह कर दंगी ओर बड़े संतोष तथा 
श्रद्धाके साथ रर्हगी । म अन किसी दूसरे पुरुषकी ओर 
न ताककर अपने हदयेश्वर, आत्मखख्प प्र्ुके साथ ही 
विहार करंगी ॥ ४० ॥ यह जीव संसारके कूएमे गिरा 
इआ है । विषर्योने इसे अधा बना दिया है, कालख्पीं 
अजगरने इसे अपने मुंह दबा रक्खा है | अव भगव्रानकतो 
छोडकर इसकी रक्षा करनेम दूसरा कौन समथ है ॥ ४१॥ 
जिस समय जीव समस्त ॒विषयोसे विस्क हो जाता हे, 
उस्‌ समय वह खयं ही अपनी रक्षा कर ठेता है। 
इसव्थियि बडी सावधानीके साय यह देखते रहना चाहिये 
किं सारा जगत्‌ कालखूपी अजगरसे ग्रस्त है 1 ४२ ॥ 
अवधूत दत्ताज्नेयजी कहते हं-राजन्‌ ! पिङ्गल 
वेरयाने ठेसा निश्चय करके अपने प्रिय धनिर्योकी दुराशाः. 4 
उनसे मिल्नेकी लठ्साका पस्त्याग कर दिया ओर 
शान्तमावसे जाकर वह अपनी सेजपर सो रदी ॥ ४३॥ 
सचमुच आदा ही सव्रसे बडा दुःख दै ओर निराशा ही 
सबसे बड़ा सुख है; क्योकि पिङ्गला वेदयाने जत्र पुरक 
यथा संछिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला।।७४॥ | आदा व्याग दी, तभी वह खसे सो सकी ॥ ४४ ॥ 
~~-*~----<--0"@ 4 


इति श्रीमद्वागवते महापुरणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ 1 
स 
अथ नवमोऽध्यायः 


(र अबधूतोपाख्यान --ऊुररसे छेकर श्वगीतक सात गुरखुओंकी कथा 
> ब्राह्मण उवाच 


स्युर्मन्दभाग्यायाः क्लेशा. निवेदहेतवः 


















येनानुबन्धं निर्य पुरुषः शममृच्छति ।२८॥ 


तेनोपदरतमादाय शिरसा ्राम्यषङ्खताः । 





त्यक्त्वा दुरा्चाः शरणं व्रजामि तमधीश्चरम्‌।।२९॥ 
संतुष्टा श्रदधत्येत्यथालामेन जीवती । 
विहराम्ययनेवाहमात्मना रमणेन वै ।॥४६०॥ 


संसारक्रपे पतितं विषयेशपितेक्षणम्‌ । 





ग्रस्तं काराहिनाऽऽरमानं कोऽन्यसातुमधीश्वरः ४१। 





च 


आस्मेव द्यारमनो मोप्ता निविचयेत यदाखिकात्‌ । 











अप्रमत्त इदं पश्येद्‌ ग्रस्तं कालाहिना जगत्‌ ॥ ४२) 
र १ 
नाह्नण उवाच 
एवं व्यवसितमतिदुराश्ां कान्ततषेजाम्‌ । 
छिच्वोयशममासाय शय्यायुपविवेश सा । ४२॥ 
आशा हि परमं दुःखं नेराश्यं परमं सुखम्‌ । 

















४ > क # ५ | + प ५, (9४ - 1 क गै # {१ १ 
४ | २. [ | । 





धं 


श्रीमद्भागबत 


| अ० ९ 


' ननन्जन्व्व्च्च्य्व्य्यव्य्य्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्य्व्व्व्व्व्च्च्च्च्च्व्च्च्च्च्च्च्च्व्व जज जज्जजज---------- 
अनन्तं सुखमाप्नोति तद्‌ विद्वान्‌ यस्त्वर्किचनः॥ १॥ | बात समन्नकर अर्चन भावसे रहता है--ररीरकी तो 





सामिषं कुररं जध्ुलिनो ये निरामिषाः । 
तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत ।॥ २॥ 
न मे मानावमानो स्तो न चिन्ता गेदपुत्रिणाम्‌ । 


आत्मक्रीड आत्मरतिविंचरामीह बालवत्‌ ॥ २ ॥ 


द्वावेव चिन्तया भुक्तो परमानन्द आष्टुतौ । 


यो विश्रग्धो जडा ब।लो यो गुणेभ्यः परं गतः} ४॥ 
क्रचित्‌ कुमारी त्वात्मानं व्रणानान्‌ गृहमागतान्‌ । . 


स्वयं तानहेयामास कापि यतेषु बन्धुषु ।॥ ५॥ 


तेषामभ्यवहाराथं शारीन्‌ रहसि पार्थिव । 


अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाशचक्कः शद्धा; स्वनं महत्‌।। & ॥ 
सा तंज्ज॒गुष्छितं मरवा महती वीडिता ततः । 
बभञ्ेकेकशः शङ्खान्‌ ढो ढो पाण्योरशेषयत्‌ ॥ ७ ॥ 


् `  उभयोरप्यभूद घोषो यवघ्नन्त्याः ख श्वयो; । 
` तत्राप्येकं निरमिद देकसान्नाभवद्‌ ध्वनिः ॥ ८ , 
। अन्वरिक्षमिमं तखा 


उपदेशमरिन्दम । 





बात ही अल्ग, मनसे भी किसी वस्तुका संग्रह नहीं 
करता--उसे अनन्त सुखखष्प परमात्माकी प्राप्ति होती 
है ॥ १ ॥ एक कुरर पश्ची अपनी चौचमे मांसका टुकड़ा 
व्यि हए था । उस समय दूसरे वल्ाान्‌ पक्षी, जिनके 
पास मांस नहीं था, उससे छीननेके व्यि उसे घेरकर 
चोच मारने लगे । जव कुरर पक्षीने अपनी चोचसे 
मांसका टुकड़ा फक दिया, तभी उसे सुख मिद ॥ २ ॥ 

मुञ्ञे मान या अपमानका कोई ध्यान नहीं है ओर 
धर एवं परिारवार्छोको जो चिन्ता होती है, वह सञ्च 
नहीं है । मै अपने आल्मामे ही रमता द्र ओर अपने 
साथदही क्रीडा करता दर| यह शिक्षा मेने वाख्कसे टी 
है | अतः उसीके समान मे भी मौजसे रहता हँ ॥ २ ॥ 
इस जगते दो ही प्रकारके व्यक्ति निधिन्त ओर परमानन्दे 
मगन रहते है एक तो मोखानाथ निश्चेष्ट नन्हा-सा 
नाक्क ओर दूसरा वह पुरुष जो गुणातीत हो गया 
हो ॥ ४ ॥ 


एक वार किसी कुमारी कन्यके घर उसे वरण 
करनेवे व्यि कई ल्येग आये हए थे । उस दिन उसके 
घरके ल्येग कहीं बाहर गये हृए थ । इसय्थिये उसने 
खय ही उनका आतिध्यसत्कार किया ॥ ५॥ 
राजन्‌ ! उनको भोजन करानेके व्ये वह धरके भीतर 
एकान्तम धान कूटने ची । उस समय उसकी कल्ई- 
म पड़ी शंखकी चूडया जोर-से बज रही थीं ॥ & ॥ 
इस शब्दको निन्दित समञ्कर कुमारीको बड़ी च्ञ्जा 
माद्धम इई+# ओर उसने एक-एक करके सव चूडया 
तोड़ डाटीं ओर दोनों हाथोमे केवल दो-दो चूडो 
रहने दीं ॥ ७ ॥ अव वह पिरि धान कटने व्री | 
प्रतु वे दो-दो चूडया भी बजने वग, त्र उसने 
एक-एक चूड़ी ओर तोड़ दी | जब दोनों कलादृयोमें केवर 
एक-एक चूड़ी रष्ट गयी, तब किसी प्रकारकी आवाज 


नहीं इई ॥ ८ ॥ रपिपुशमन ! उस समय लोगोका 


आचार-विचार निरखने-परखनेके लिये इधर-उधर धूमता- 


१, म नापमानौ । २. आत्मरतो विचरामि । ३. तम्‌ । 


 # क्योकि उषसे उसका स्वयं धान कूटना सूचित होता था, जो कि उकी दर्दरिताका द्योतकं था । 


> 


[ पि रा 1 


| | नकद ^ जो 


न अ ्काष्छण्ककः = - {3 श च ~ "= न ॥ क कक 


अ०९| एकादश स्कन्ध ७६५५ 








लोकानयुचरन्नेतान्‌ टोकतच्विवित्सया ॥ ९ ॥ 
वासे बहूनां करुहो भवेद्‌ वाता द्वयोरपि । 
एक एव चरेत्तसात्‌ मायां इव ऊङ्कणः ॥१०॥ 
मन एकत्र संयुञ्याज्ञितश्चासो जितासनः । 
वेराग्याभ्यासयोगेन धियमाणमतन्दरितः ॥१२॥ 
यसिन्‌ मनो छब्धपद्‌ं यदेत- 
च, न्दे, + क (च 
च्छनेः शनेयश्चति कमरेणून्‌ । 
सच्वेन ्ृद्रन रजस्तमथ 
[स [क भ [ह 
विधूय नि्वांणसुपेत्यनिन्धनम्‌ ।।१२॥ 
तदेवमात्मन्यवरुद्र चित्तो 
न वेद्‌ किचिद्‌ बहिरन्तरं वा) 
यथेषुकारो सपति व्रजन्त- 


मिपो गतात्मा न ददशं पार्शे ॥१२॥ 


एकचायनिकेतः खादप्रमत्तो गुहाशयः 1 
अलक्ष्यमाण आ वारेुनिरेकोऽल्पभाषणः ॥१४॥ 
गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलशाधुवारमनः । 
सपः परकृतं वेशम प्रविश्य सुखमेधते ॥१९५॥ 


एको नारायणो देषः पूर्वसृष्टं खमायया । 


संहृत्य कालकख्या कल्पान्त इदमीश्वरः ।॥१६॥ 





धामता मँ भी वहं पर्हूच गया था: मैने उससे यहः 
रिश्ता ग्रहण की किं जवर बहत चत््रेग एक साथ रहते 
है, तव कलह होता है ओर दो आदमी साथ रढते है, 
तव भी बातचीत तो होती ही है; इसग्थियि कुमारी कन्याकी 
चूडके समान अकेले ही विचरना चाये ॥ ९-१०॥ 
राजन्‌ । मने बाण वनानेवाठेसे यह सीखा है कि 
आसन ओर श्वासको जीतकर वैराग्य ओर अभ्थासके 
दवारा अपने मनको वकश्मे कर ठे ओर पिरि बडी 
सावधानीके साथ उसे एक क्क्यमे च्गादे॥ ११॥ 
जव ॒परमानन्दसखखूप परमात्मा मन स्थिर हो जाता 
है, तत्र॒ वह धीरे धीरे कर्मवासनाओंकी धूल्को धो 
बहाता है । स्च .णकी ब्रद्िसे रजोगुणी ओर तमोगुणी 
बृत्तियोका त्याग करके मन वेसे ही शान्त हो जाता 
है, जेसे इधनके विना अग्नि ॥ १२॥ इस प्रकार 
जिसका चित्त अपने अत्मामे ही धिर निरुद्ध हो 
जाता है, उसे बाहर-भीतर कहीं किसी पदाथ॑का भमान 
नहीं होता । मने देखा था किं एक बाण बनानेवाव्म 
कारीगर वाण बनानेमें इतना तन्मय हो रहा था किं उसके 
पाससे ही दच््रर्के साथ राजाकी सवारी निकल गयी 
ओर उसे पतातक न चला ॥ १३ ॥ 


राजन्‌ ! मैने सोपसे यह शिक्षा ग्रहण की है किं 
सन्यासीको सपंकी मंति अकेठे ही विचरण करना 
चाहिये, उसे मण्डली नहीं बोधनी चाहिये । मठ तो 
बनाना ही नहीं चाहिये । वह एक स्यान्मे न रहे, 
प्रमाद न करे, गुहा आदिमे पड़ा रहे, ब्राहरी आचारो- 
से पहचाना न जाय । किंसीसे सहायता न ठे ओर 
बहुत कम बोडे ॥ १४ ॥ इस अनित्य शरीरके च्वि 
घेर बनानेके वखेडेम पड़ना व्यथं ओर दुःखकी जड़ 
है । सोप दूसरोके बनाये धरम धुसकर बडे आरामसे 
अपना समय काटता है ॥ १५ ॥ 


अब मकडीसे ठी इई शिक्षा सुनो । सबके प्रकारक 
ओर अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ने पूर्वकल्पमे बिना 


किसी अन्य सहायकके अपनी ही मायासे सचे इए 


जगत्को कल्पके अन्तम ८ प्रलयकाल रप्थित 








त "नकः 























[ | ५ भरीमद्धागतत [ अ० ९ 
५ | ~ 

१ / ~ एक ऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः। । होनेपर ) कालराक्तिके द्वारा नष्ट कर दिया---उसे 
$ | | अपनेमे लीन कर व्या ओर सजातीय, विजातीय 
^  काठेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु । (॥ खगतमेदसे शून्य अकेले ही शेष रह गये । वै 


सवके अधिष्ठान है, सवके आश्रय है; परंतु खयं 
| अपने आश्रय--अपने ही आधारसे रहते है, उनका 
| कोहं दूसरा आधार नहीं है । वे प्रकृति ओर पुरुष 
दो्नोके नियामक, कार्यं ओर कारणालमक जगतके 
| आदिकारण परमात्मा अपनी शक्ति काके प्रभावसे 
सत्व-रज आदि समस्त राक्तियोंको साम्यावस्थामे पर्हुचा 
कैवलालुभवानन्दसन्दोहो निरुपाधिकः ॥१८।। | देते ह भौर खयं कैवल्यरूपसे एक ओर अद्वितीयर्य 
विराजमान रहते है । वे केव अनुभवश्वख्प ओर 
आनन्दघनमात्र हँ । किसी भी प्रकारकी उपाधिका 
उनसे सम्बन्ध नदीं है | वे हयी प्रभु केव अपनी राक्ति 
संधोमयन्‌ २ | काके द्वारा अपनी त्रिगुणमयी मायाको श्चुब्ध करते 
संक्षोभयन्‌ खछजत्याद्‌ा तया श्रमरिदम ।१९॥ | है ओर उससे पहटे क्रियाशाक्तिप्रधान सूत्र ( महत्त ) 
| की रचना करते है | यह॒सुत्रहूप महत्त दही तीनों 
तामाहुिगुणव्यक्रि सृजन्तीं विश्वतोयुखम्‌ । | गुणोकी पहली अभिग्यक्ति है, वही स्र प्रकारकी सृष्टि 
का मूल कारण है | उसीमे यह सारा विश्व, सुतम 
यसिन्‌ प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पमान्‌ ।२०॥ | ताने-बानेकी तरह ओतप्रोत है ओर इसीके कारण 
जीवको जन्म-मृत्युके चक्रमे पडना पडता है ॥ १६-२०॥ 
| जैसे मकड़ी अपने हृदयसे म॒ंहके द्वारा जला फैठाती 
है, उसीमे व्रिहार करती है ओर शिर उसे निगल जाती 
है, वैसे ही परमेश्वर भी इस जगत्‌को अपनेमसे उत्पनन 
करते है, उसमे जीवूपसे विहार करते है भोर फिर 
| उसे भपनेमे लीन कर कते है ॥ २१॥ 
य॒त्र यत्र मनो देही धारयेत्‌ सकलं धिया । | राजन्‌ ! तने श्वी ( बिकनी ) कीडेते यद रिक्ष 
| | ्रहण की है कि यदि प्राणी स्नेहसे, दधसे अथवा 
| भयसे भी जान-रूञ्चकर एकाग्रखूपसे अपना मन किंसीमे 
स्नेहाद्‌ दवद भयाद्‌ वापि याति तत्तत्सरूपताम्‌।२२। | खगा दे तो उसे उसी वस्तुका खरूप प्राप्त हो जाता 
है ॥ २२ ॥ राजन्‌ | जैसे भृद्गी एक कीडेको ठे 


कीशः पेशस्कृतं ध्यायन्‌ कुव्यां तेन प्रवेशितः । जाकर दीवारपर अपने रहनेकी जगह बंद कर देता है 
५ ओर वह कीड़ा भयसे उसीका चिन्तन करते-करते 
0 । अपने पहले शरीर्का व्याग किये विना ही उसी शरीरसे 
याति तःसात्मतां राजन्‌ पवरूपर्मसंत्यजन्‌ ॥२२॥ तद्रूप हो जाता ३# ॥ २३ ॥ 

क 2 प्रधानः पुख्वेश्वरः । २. गुणां व्यक्तिम्‌ । ३. मपि त्यजन्‌ | 


ति चन 


६ , # जव्रउसी दारीरघे चिन्तन क्रिये र्पकी प्राचि हो जातीं टः तव दूसरे दारीस्ते तो कना दी क्या हे ? इसलिये मनुष्यको 
अन्य वस्तुक चिन्तन न करके केवल परमात्माका ही चिन्तन करना चाहिये । . ` ४ 


ज स्थैः 


सत्वादिष्वादिपुरुषः प्र॑भानपुरुपेश्वरः ॥ १७. 


परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः 


केवलात्माजुभावेन खमायां त्रिगुणास्मिकाम्‌ । 


यथोणनाभिरेदयाद्णौ संतत्य वक्त्रतः 





तया विहत्य भरयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः ।२१। 









१ ८ ~ ह $ 
छै ग पचः “+ [ ह्रे श ४ 
न 0 
= र = र # + 






¶ 
"~ ¬ * चैः 


° ` ` 
1 

























अ० ९ | एकादश स्कन्ध ७६७ | 
एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिता मतिः । राजन्‌ | इस प्रकार मैने इतने गुरुभसि ये शिक्षा 
प्रदण कीं | अब र्मेने अपने शरीरसे जो कुछ सीखा । 


है, वह तुमं बताता द्र, सावधान होकर घनो ॥२५॥ 

यह ठारीर भी मेरा गुरु दीद; क्योकि यह मुङ्गे विवेक 

ओर वेराग्यकी रिक्षा देता है । मरना ओर जीना तो 
इसके साथ व्गादही रहतादहै। इस रदरीरकतो पकड़ 
रएखनेका फल यह है किं दुःख-पर-दुःख भोगते जाओ । 
यद्यपि इस दारीरसे तच्छविचार कटनेमे सदयायता मिख्ती है, 
तथापि मै इसे अपना कभी नहीं समञ्चता; सर्वदा यदी 
निश्चय रखता द कि एक दिन इसे सियार-कुत्ते खा 
जार्यगे । इसीव्यि मै इससे असङ्ग होकर कचरा 
|| २५ ॥ जीव जिस इारीरका प्रिय कनके व्थि दही 
अनेकं प्रकारकी कामनार्प ओर कमं करता दै तथा खी- | 
पुत्र, धन-दोल्त, हाथी-घोडे, नोकर-चाकर्‌, घट्वार ओर | 
भाई-बन्धुओका विस्तार कते इए उनके पाल्न-फोषणमे 
लगा रहता है । बड़ी-बड़ी कठिनादर्यो सहकर धन-स्चय 
करता है, आयुष्य परी होनेपर वही शरीर खयं तो 
नष्ट होता ही है, वृक्षके समान दूसरे शरीरके व्ययि बीज 
बोकर्‌ उसके व्यि भी दुःखकी व्यवस्था कर जाता 

है ॥ २६ ॥ जसे बहृत-सी सोतं अपने एक पतिको . 
अपनी-अपनी ओर खीचती ईह, वैसे ही जीवको जीम 
एक ओर-खादिष्ट पदार्थोकी ओर षखींचती है तो 
प्यास दसरी ओर-जल्की ओर; जननेन्दिय एक 
ओर-सीसंमोगकी. ओर ठे जाना चाहती है तो 
तचा; पेट ओर कान दूसरी ओर-कोपेक स्पशं, 
भोजन ओर मधुर. शब्द्की ओर खीचने . लगते ह । 
नाक कहीं सुन्दर गन्ध सुंघनेके व्यि ऊ जाना 
चाहती है तो चश्च नेत्र कीं दुसरी . ओर . सुन्द्र 
ख्प देखनेके व्यि । इस प्रकारं कर्मनो भौर 
बह्वयः. सपलत्म इव गेहपतिं छनन्त्‌।२.७]) | ज्ञनेन्द्रियां दोनों दी उसे. सताती रहती. ॥ २.७ ॥ 


खात्मोपशि्ितां बुद्धिं शृणु मे वदतः प्रभो।।२४॥ 
देहो गुरु्मम विरक्तिविवेकटेतु- 
विभ्रत्‌ स सच्वनिधनं सततात्युंदकंम्‌ । 
तच्यान्यनेन विगश्ामि यथा तथापि 
पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥२५। 
जायात्मजाथपडुभूर्यगृहापवगौन्‌ 
पुष्णाति यत्मियचिकीषया वितन्वन्‌ | 
खान्ते सङ्च्छरमवरुद्रधनः स देहः 
सुष्राख बीजमवसीदति वक्षधमां ॥२६॥। 
जिदहधंकतोऽयुमपकर्पति कटिं तर्षा 
शिश्चीऽन्यतस्त्वगुद्र भ्रवणं ऊतशित्‌ । 


- धाणोऽन्यतश्पलचक्‌ क च कमशक्तेः . ~ ` 


वसे तो भगनान्‌ने अपनी अचिन्त्यं र्तिमयासे इ 


सष्ठ पुराणि विबिधान्यजयाऽऽत्मशाक्त्याः. | सप्‌. ( रगनेवाले जन्तु ), पञ्च, पक्षी, ओंस भौर 
। .“ !। ::| मछली. आदि अनेकों प्रकारकी योनिरयोँ स्वी; परत 
_ इष्ाम्‌ सरीसुपपञन्‌ लंगदंशमत्खान्‌ “` ।'उनसे उन्दं संतोष न इश । तन उन्दनि मलुष्य 


` र, खगदन्दश्यकान्‌ । 





७६८ श्रीमद्धागवत [ अ० ९ 
= 
तस्तेरत॒ष्टहदयः पुरुषं विधाय ररीरकी खषटि की । यह सी बुद्धिस युक्त है, जो 

| रह्मका साक्षात्कार कर सकती है । इसकी रचना करके 
ब्हावलोकधिषणं सुदमाप देवः ।२८। वै बहत आनन्दित इए ॥ २८ ॥ यथपि यह मुष 

रारीर है तो अनित्य ही-मृत्यु सदा इसके पीछे च्गी 
रहती है । परंतु इससे परमपुरुपार्थकी प्रापि हो सकती 
दै; इसव््े अनेक जन्मोके वाद्‌ यह अत्यन्त दुर्लभ 
मनुष्य-दारीर पाकर बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि शीघ्र 








लब्ध्वा सुदुलभमिदं बहुसम्भवान्ते 


थंदमनित्यमपीह (र 
मा -वमथद्मानः धीरः । से-शीघ्र, मृल्युके पे ही मेोक्ष-प्रा्तिका प्रयत कर 
ठे । इस जीवनका मुख्य उदेश्य मोक्ष ही है । विषय- 
तृणं यतेत न पतेदनुसत्यु याव- ` | भोगतो सभी योनिरयोमें प्राप्त हो सकते है, इसव्थि 


उनके संम्रहमे यह अमूल्य जीवन नहीं खोना 
चाहिये ॥ २९ ॥ राजन्‌ । यही सव्र सोच-विचारकर 
सुश्च जगतसे वैराग्य दहो गया | मेरे हृदयमें ज्ञान- 
विज्ञानकी ्योति जगमगाती एहती है | न तो कही 
मेरी आसक्ति है ओर न कहीं अहंकार ही । अव मँ 
ह. खच्छन्दरूपसे इस पृथरीमे विचरण करता दँ ॥ ३० ॥ 
विचरामि महीमेतां ॒क्तसङ्गोऽनदछृतिः ॥३०॥ राजन्‌ | अकेले गुरसे ही यथेष्ट ओर घुट बोध नहीं 
होता, उसके लिये अपनी बुद्धिसे भी वहत कुछ सोचने- 

न द्येकसाद्‌ गुरोज्ञानं सुसिरं स्थात्‌ सुपुष्कलम्‌ । समञ्चनेकी आवद्यकता है । देखो, ऋषियोने एक ही 

् | अद्वितीय ब्रह्मका अनेकों प्रकारसे गान किया है | 


जरह्मेतददितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥३१॥ | ८ यदि तुम खयं विचारकर निर्णय न करोगे, तो ब्रहके 
वास्तविक खरूपको केसे जान सकोगे १) ॥ ३१ ॥ 


निश्रेयसाय बिषयः खट सर्वतः स्ात्‌॥।२९॥ 


एवं संजातवेरग्यो विज्ञानालोक आमनि । 


श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीरृष्णने कहा- प्यारे उद्धव ! गम्भीर- 
बुद्धि अवधूत दत्तात्रेयने राजा यदुको इस प्रकार उपदे 
विप्रस्त प्रातः गभीरधी $ ३ 
क त भ्य गभीरधीः । किया | यदुने उनकी प्रूजा ओर बन्दना की, दत्तात्रेयजी 


वन्दितो 8 = उनसे अनुमति लेकर बडी प्रसनतासे इच्छानुसार 
ऽभ्यथितो राज्ञा यय प्रतो यथागतम्‌॥२२॥ | पार गये ॥ ३२ ॥ हमर नि आवन 
= -: सक यदु अवधूत दत्तात्रेयकी यह बात चुनकर समस्त 
अवधूतवचः श्चुता पूवेषां नः स एूवेजः। आसक्तियोंसे द्ुटकारा पा गये ओर समदरीं हो गये । 
। ( इसी प्रकार तुम्दं भी समस्त आसक्तियोका परित्याग 
सर्वसङ्गविनि्क्तः समचित्तो बभूव॒ ह ॥ ` २॥ करके समदरीं हो जाना चाहिये ) ॥ ३३ ॥ 
र “गदर. 
~. इतिं श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकाद सस्कत्वे 
`" सल कः । नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ । 





अं० १० | | एकादश्च स्कन्ध 


---~ [१ = स ज जा य ज = क न 
नि नि ४४१४ भि कि कि मिनि कीज 


अथ दरामोऽध्यायः 


छोकिकः तथा पारलोक्िकः भोगोंकी असारताका निरूपण 


७६९ 








भीभरावानुवाच | भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहत है-ध्यारे उद्भव ! साधक- 
` | क्रो चाहिये कि सव॒ तरहसे मेरी दारणमं रहकर 
। | ( गीता, पाञ्चरत्र आदिमे ) मेरे द्वारा उपदिष्ट अपने 
सधर्मबु मदाश्रयः | | धर्मोका सावधानीसे पालन करे । साथ ही जर्होतक 
| उनसे विरोध न हो वर्हातक निष्कामभावसे अपने वर्ण, 
| आश्रम ओर कुरुके अनुसार सदाचारका भी अनुष्ठान 
समाचरेत्‌ ॥ १॥ | करे ॥ १॥ निष्काम होनेका उपायं यह ठं किं ^ 
सखधर्मोका पालन करनेसे शुद्ध इए अपने चित्तमें यह 
| विचार करे कि जगत्‌के व्रिषयी प्राणी राब्द्‌, स्पा, 
| ख्य आदि विषर्ोको सत्य समञ्चकर उनकी प्रापिके 
कथि जो प्रयत्न करते है, उसमें उनका उदेश्य तो यह 
होता है कि घुख मिले; परंतु मिल्ता है दुःख ॥२॥ 
गुणेषु तच्वभ्यानेन स्थीरम्भविपर्थयम्‌ ।। २ ॥ | इसके सु्बन्धमं पा विचार करना चाहिये कि खप्न- 
अवस्थामे ओर मनोरथ करते समय जाग्रत्‌-अव्थामे भी 
मनुष्य मन-ही-मन अनेकों प्रकारके विषयोका अुभव 
सुरस बिपयालोको ध्यायतो बा मनोरथः । | करता ह, परतु उसकी वह साट कल्पना चस्तुन्य 
| होनेके कारण व्यथं है । वैसे ही इन्द्ियोके द्वारा 
होनेवाटी मेदयुद्धि भी व्यथं ही है, क्योकि यह भी 
नानात्मकलवद्‌ विफरस्तथा भदात्मधी्ुमैः। ३ ॥। | इन्दयजन्य ओर नाना नस्ुनिषयक होनेके ऋाएण 
पूववत्‌ असत्य ही हं ॥२॥ जो पुरुष मेरी रारणमें 
है, उसे अन्तमुख करनेवाठे निष्काम अथवा नित्यकं 
निवृत्तं कम सेवेत अवततं मत्थरस्त्यनेत्‌ । | द ध ॐ ५ ४ 
| दे हेय, जो बहिसुख बननेवाठे अथवा सकाम 
| हों | जव आत्मज्ञानकी उत्कट इच्छा जाग उठे, तवं 
€ "2-1-01 । तो कमसम्बन्धी विधि-विधानोका भी आद्र नहीं करना 
जेज्ञसायां संमता नादयत्‌ कमचादनाम्‌ ।। ४॥ । चाहिये ॥ ४ ॥ अहिंसा आदि यमका तो आदरपूर्वकं 
| सेवन करना चाहिये, परंतु शोच ८ पवित्रता ) आदिः 
नियमोका पालन शक्तिके अनुसार ओर आसन्ञानके ` 
विरोधी न होनेपर ही करना चािये । जिज्ञर पुरुषके 
च्य यम ओर नियमोके पालनसे भी बढ़कर आवस्यक 
। | वात यह हे किः वह अपने गुरुकी, जो मेरे खख्पको ` 
मदभिज्ञं गुरं शन्तक्चपा्षीत्‌ मदात्मकम्‌ ।। ५.1 | जाननेवाे ओर शान्त हो, भेरा ही खरूप समञ्जकर्‌ 
| ० सं° खं० २. ९७ 


मयोदितेष्ववदहितः 
व्णाश्रमङ्कलाचारमकामात्मा 


अन्वीक्षेत विशुद्धात्मा देहिनां विषयात्मनाम्‌। 


यमानभी्णं सेवेत नियमान्‌ मत्परः कचित्‌ 1 


न, 


= ॥ 
= व + कि (क ५ शष क 
4 क - क ~ कक शक ष क ` ` कीक + नति + "7 ज व व 





भमद्कागवते | अं० ८ 
वव 

| सेवा करे ॥५॥ श्िष्यको अभिमान न करना चाहिये । 
| बह कमी किसीसे उह न कर किसीका रा न 
| सोचे । बह प्रत्येक कायमे कुराल हौ--उसे आच्स्य 
छर न जाय | उसे कहीं भी ममता न हो, गुरुके 
असत्वरोऽ्थजिज्ञासुरनघ्वयुरमोषवाक्‌ ॥ ९ ॥ | चरेम टद अनुराग हो । कोई काम दड्वडाकर न 
| करे--उसे सावधानीसे "पूरा करे । सदा परमार्थे 
सम्बन्धे ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा बनाये रक्े | 

रलसनदविणािडु | किंसीके गणेमिं दोष न निकाले ओर व्य्थकी बात न 
जायापत्यगृहशषे्रखजनद्रविणादि करे ॥ ६ ॥ जिज्ाद्का परम धन है आत्मा; इसलिये 
वह ल्ञी-पुत्र, घर-खेत, खजन ओर धन आदि सम्पूणं 
पदाथेमिं एक सम॒ आत्माको देखे ओर किंसीमें कुछ 

| | विरेषताका आरोप करके उससे ममता न करे, 
उदासीन रषे ॥७॥ उद्धब । जसे जलनेवाटी ज्कंडीसे 
उसे जल्यने ओर प्रकादित करनेवाली आग सर्वथा 
अल्ग है । टीक वैसे ही विचार करनेपर जान पडता 





 अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो द्टसीहदः । 


इ ` ५ । 
चद्‌ 
= 
~ ४ 
¢ कि 
गक. 
४ 
3 ॥ 
व, 
नि # 
~ एन॑ 
[1 
& त 
प 
ए) 
४1 9 1, 
र ®. 
| ९३ 
क 
1 व 
.च ५. 
१, ; 
| च 
ष. 
# 
+ 
ह 
क 


उदासीनः समं पश्यन्‌ सर्वेष्वथंमिवात्मनः ॥ ७। 





। ` विरधणः स्थूलद्व््माद देहदात्मेषिताखडक्‌ । | दै कि पञ्चमूतोका बना स्थूलरारीर ओर मन-ञुद्ध 
॥ भ ध | आदि स॒त्रह तत्वोका बना सुहमरारीर दोनों ही द्य 
क ~ | ओर जड दहै । तथा उनको जानने ओर प्रकारित 
: | करनेवाला आत्मा साक्षी एवं खयंप्रकाश है । शरीर 
ॐ यथाग्निदरुणो दाह्याद्‌ दाहकाऽन्यः प्रकाशकः) <८। अनित्य, अनेक एवं जड हे । आत्मा नित्य, एक एवं 


| चेतन है । इस प्रकार ॒देहकी अपेक्षा आत्मामे महान्‌ 
& विलक्षणता है । अतएव देहसे आत्मा भिन्न है ॥ ८ ॥ 
क जब आग ल्कड़ीमं प्रचित होती है, तव ककड़ीके 
4 निरोधोतयत्यण॒कृहन्नानालं ततान्‌ गुणान । उत्पत्ति-विनारा, बदा ओर अनेकता | आदि 
सभी गुण वह खयं ग्रहण कर ठेती है । परंतु सच 

छो, तो ल्कड़ीके उन गुणोसे आगका कोई सम्बन्ध 
नहीं है । वैसे ही जब आत्मा अपनेको रारीर मान 
ल क लेता है, तब वह॒ देहके जडता, अनित्यता, स्थूकता, 
44 देहगुणान्‌ परः ॥ ९ ॥ | अनेकता आदि गुणोसे सर्वथा रहित कञनेपर मी उनसे 
~ स यक्त जान पडता है ॥ ९ ॥ ईशवरके द्वारा नियन्त्रित 

| मायाके गुणोने ही सूक्ष्म ओर स्थूरं शरीरका निर्माण 
` शमितो | | किया है| जीवको शरीर ओर शरीरकी जीव समञ् 
चाऽस्‌। ण निरचितो देहोऽयं पुरुषख हि | | ठेनेके कारण ही स्थूख्शरीरके जन्म-मरण ओर सुक्ष- 







शरीरके आवागमनका आत्मापर आरोप किया जाता 
. है | जीवको जन्म-मृत्युरूप संसार इसी भरम अथवा 
` क अध्यासके कारण प्राप्त होता है । आत्मावे खरूपका 

^ 1 च्छदत्मन्‌ ॥९०॥ | हान होनेपर उसकी जड़ कट जाती है ॥ १० ॥ 








व ~ ------------------ 1 








तसाजञिज्ञाषयाऽऽत्मानमात्म स्थं केवरं परम्‌। । प्यारे उद्धव ! इस जन्म-मृब्युरूप संसारका कोई दूसरा 


कारण नहीं, केव अज्ञान ही मूढ कारण है । इसण्यि 
अपने वास्तविक खरूपको, आत्माको जाननेकी इच्छा 
तर्ज्ञस्य निरसेदेतदस्तुबुदि यथाक्रमम्‌ ॥११॥ करनी चाहिये । अपना यह वास्तविक खद्प समस्त 
प्रकृति ओर प्राकृत जगतूसे अतीत, द्रैतकी गन्धे 
रित एवं अपने आपमे ही स्थित है । उसका ओर 
आचार्योऽरणिरा्यः स्यादन्तेवास्युत्तरारणिः। को आार नहीं ह । उसे जानकर धीरभीर स्यूढ 
शरीर, सूद्ष्म शरीर आदिम जो सत्यत्वबुद्धिं हो री है, 
उसे क्रमशः मिद देना चाहिये ॥ ११1 ( यज्ञम जब 
न अरणिमन्थन करके अग्नि उत्पन्न करते है, तो उसमे 
तत्संधानं प्रवचनं विद्यासन्धिः सुखावहः ॥१२॥  सीचे-उप्‌ दो च्व रती है जर वीचय मन्यन- 
रहता है; वैसे ही ) विंधयारूप अग्निकी उत्पत्ति 
व्यि आचार्य ओर शिष्य तो नीचे-ऊपरकी अरणि 
है तथा उपदेश मन्थनकाष्ठ है । इनसे जो ज्ञानान्न 
प्रज्वलित होती है, वह विलक्षण सुख देनेवाडी है । 
इस यज्ञम बुद्धिमान्‌ शिष्य स॒द्वुरुके द्वार॒ जो अत्यन्त 
विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करता है, वह गुर्णोसे बनी इ 
विषयोकी मायाको भस्म कर देता है । तत्पश्चात्‌ वे 
गुण मी भस्म हो जाते हँ, जिनसे कि यह संसार बना 
हआ है । इस प्रकार सबके भस्म॒ हो जानेपर जब 
आत्माके अतित्कि ओर कोई वस्तु शेष॒ नहीं रह जाती, 
तब वह्‌ ज्ञानाग्नि भी ठीक वैसे ही अपने वास्तविक 
खखूपमे शान्त हो जाती है, जेसे समिधा न रइनेपर 
आग बुञ्च जाती है# ॥ १२-१३ ॥ 
















वेशारदी सातिविशुद्धुद्धि- 
धनोति मायां गुणसम्प्रघतास्‌ । 


गुणांश्च सन्दह्य यदात्ममेतत्‌ 


स्व्यं च शाम्यत्यसमिद्‌ यथाभिः ।।१२॥ 


प्यारे उद्धव ! यदि तुम कदाचित्‌ कमेकि कतां ओर 
घुख-दुःखेकि भोक्ता जीवको अनेक तथा जगत्‌, 
काल, वेद ओर आत्माओंको नित्य मानते हो; साथ ` 
ही समस्त पदारथोकी सिति प्रवासे नित्य ओर यथाय 


अथैषां कमक्तणां भोक्तृणां सुखदुः {खयोः । 


नानात्वमथ नित्यत्वं लोककालागमात्मनाम्‌ ॥५४।। 


आदि बाह्य आङ्ृति्योके भेदसे उनके अनुसार ज्ञान ही ` 


मन्यसे सवंभवानां स्या हयोतत्तिकी यथा) माननेसे बडा अनथ हो जायगा, ( क्योकि इस प्रकार = 


जञानखरूप निः आत्मा ३ । करल, मोकत्व आदि धर्मं 
कि खयप्रकार त्य एकं ही आत्मा हे । क तत्व आदि ध 
यौतक यह बात स्पष्ट हो गथी वा 
जे कु दे, सत अनित्य ओर मायामय है; इसि आत्मज्ञान होते षः खमस विपत्तिर्योषे 
देके कारण ई । आत्मके अतिरिक्त | स; 
मुक्ति भिक प ४ जाती त । है ५ ह ~ । । + क्‌ | ४ र ठ = ` -‡ = 5 -. ~ = ध >] 


"3 क" ०.०५ १ १ | ष 
~ 2 + नकर. 9 = ~ र { ३ १ 4 
र इ णनी › &- 9 1 > स सु 0 ^= 1 = क स ~ ~ १ ५५ ९ र 3 द 
~ ५ र नी १ ४.८ ४ क व १५ च्‌ ५३ ¶ कु चि व कः २: ४ ५२) 4  ) 4 
= ४) = = ऋ “४ च १ % क # ४ # त-क । क # च र 5 2 *- = थ 
य # "कः क~ ~ ५ ए ध # ~ <~ व 


+ 





| (24. 
6 ^ 
ह ह~ ५ 








खीकार करते हयो तथा यह समञ्जते हो कि वल्य ` 


उत्पन्न होता ओर बदल्ता रहता है, तो एसे मतके = 









| ( ७७२ श्रीमद्भागवत [ अ० १० 
५. हि [क 
=. व ~~ स 


४ | | । 
द करहि भिद्यत #; ॥१५॥ | जगत्क कतां आत्माकी नित्य सत्ता ओर जन्म-पृतयुके 
षः हि 1 द भूप च ५ | चक्षरसे सुक्ति भी सिद्ध न हो सकेगी । ) यदि कदाचित्‌ 
 रेसा खीकार भी कर लिया जाय तो देह ओर संवत्सरादि 
व क | काल।वयतोके सम्धन्धसे हानेवाटी जीवोकी जन्म-मरण 
एवमप्यज्ग सर्वेषां देहिनां देहयोगतः । | आदि अवस्था्प मी नित्य होनेके कारण दूर. न हो 
| सर्गी; वर्योकि तुम देहादि पदाथं ओर काल्की नित्यता 
खी कार करते हो । इसके सिवा, यषा भी कर्मोका कर्ता 
कालाचयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽप्तकृत्‌॥१६॥ | तथा दुख-दुःखका मोक्ता जीव परतन्त्र ही दिखायी 
| देता है, यदि वह खतन्त्र हो तो दुःखका फल क्यो 
भोगना चहेगा १ इस प्रकार सुख-मोगकी समस्या सुलश्च 
जानेपर भी दुःख-मोगकी समस्या तो उलक्नी ही रहेगी । 
अतः इस मतके अनुसार जीवको कभी सुक्ति या 
खतन्त्रता प्रप्त न हो सकेगी । ज जीव खश्पतः 
परतन्त्र है, विवश है, तब तो खार्थंया परमार्थं कोई 
भी उसका सेवन न करेगा, अर्थात्‌ वह खार्थ 
ओर परमार्थ दोनोंसे ही वञ्चित रह जायगा ॥ १५४--१७॥ 
( यदि यह कहा जाय किं जो मीति कमं करना 
नं देहिनां सुखं फिंचिद्‌ विद्यते विदुषामपि । जानते है, वे सुखी रहते है ओर जो नटीं जानते, 
उन्हं दुःख भोगना पडता है तो यह कहना भी ठीक 
& नही; क्कि ) ेसा देखा जाता है कि बड़े-बड़े कर्म- 
. तथा च दुःखं परानां एृथाहंकरणं परम्‌ १ ८ | करक ॒विदरानोको भी §छ सुल नही मिक्ता ओर 
मूका भी कभी दुःखसे पाख नहीं पड़ता । इसन्ि जो 
` ~. | लोग अपनी बुद्धि या कम॑से घुख पानेका धमंड करते 
न है उनका वह अभिमान व्यर्थ है || १८ ॥ यदि यह 
। यदि प्रधि बिधातं व जानन्ति सुखटःखयोः। खीकार कर ल्या जाय कि वे खोग की प्राप्ति ओर 
`~ | दुःखके नारका टीक-टीक उपाय जानते है तो भी 
धः यह तो मानना ही पड़ेगा किं उन्हे भी रेसे उपायक्रा पता 
नहीं है, जिससे मृत्यु उनके ऊपर कोई प्रभाव न डा 
सके ओर वे कभी मरे ही नही ॥ १९॥ जब्र भूत्यु उनके 
सिरपर नाच रही है, तत्र रेसी कोन-सी भोग-सामग्री 
. या भोग-कामना है, जो उन्हे सुखी कर सके १ मल 
^ ओ त्थः सलय्ें कामो वा सल्ुर्तके |. | निप गयको सीप चकानके मि वपसानपर ले 
[~ जाया जा इहा है, उसे क्या श्रल-चन्दन-कली आदि 
अ = ^ 101८.4 
2 स्थन न तुष्टिदः ॥२०॥ | ओर न जीत्का बु पुरमा ही रेणा ) ॥ २० | 


१ द ~ # | 
। # ४; बथ्यद 
तद्य ब#४ 
वि @\ 6 ॐ | न्दी धैः नदि. 
व 
प ~ 2 - 
9 ^ --- 9, व = ५ 
88 ` [~ | < । 3 "अ 4. ` 44 ह = 
| ‰ जानु नह 


शे ¢ ए 
सक ऊ 
7) य 
नन ~ 4 2: + 


अत्रापि कमणां कतेरस्वातन्त्यं च लक्ष्यते । 


भोक्त दु;खस्खयोः को न्वर्थो षिव भजेत्‌ ॥१७॥। 


। # 









1. 
-=+ 


98 


ध तेऽप्यद्रा न विदर्योगं प्रलय प्रभवेद्‌ यथा ॥१९॥ 


+ ` (= {५ 
पो 
च 
५ के 
- 
।*ऊॐ {८ ~ न 
४ ष क > 
४. 
व क 


१ र) 
ति 


थ श 
> १ + 
क, ॥ 


क~ +. ^ ६ 
~ ह द = 






९ 


४4 


ग 


"व 
थत्‌ 


> 





¦, ¢ १ + 





च भ = 9 + 9 यिकः क [1 


[ति = क त ~- 
क 


सा ककय "छ. हि ~ ` 3 


कय 

















अ० १० ] त १ 
एकादश स्कन्व 


ठत च द्वद्‌ दुष्टे स्पधासरया्ययन्यभेः । 





मी दोषधुक्त ही है; क्योकि वह मी बरावरीवासि वाम | -4 
बहन्तराभ स होड चलती है, अधिक सुख मेोगनेवाछकि प्रति असया 
कामत्वात्‌ कृषिविचचापि निष्फलम्‌ ।२१॥ 
छोयेसे घणा होती है । प्रतिदिन पुण्य क्षीण होनेके ` 
साथ ही वहेकि सुख भी श्षयके निकट पर्दैचते रहते 
है ओर एक दिन नष्ट हो जते हैँ । वर्होकी कामना । ५ 
पूर्णं होनेम मी यजमान, ऋविज ओर कर्म आदिकी 
येके कारण बडे-वडे विष्नोकी सम्भावना रहती है । _ ` 
जसे हरी-म्ी खेती भी अतिबृषि-अनावृष्टि आदिक ` 
कारण नष्ट हो जाती है, वैसे ही खगं भी प्रप्त होते-होते ` 
्रि्नोके कारण नही मिक पाता ॥ २१ ॥ यदि यज्ञ- ` 
यागादि धम बिना किसी विष्नके परा हयो जाय, तो उसे 
दारा जो खर्गादि लोक मिलते है, उनकी प्रातिका प्रकार 
तै वतलता दर सुनो ॥ २२॥ यज्ञ करनेवाव पुर 
यज्ञके दवारा देवताओंकी आराधना करके खगम जाता ` 
है ओर वह अपने पुण्यकमेकिं द्वारा उपाजित दिव्य -4 £ 
मेगेको देवताओंके समान भोगता है ॥ २३ ॥ उसे 
उसके पुण्योके अनुसार एक चमकीला तरिमान मिक्ता 
है ओर वह उपर स्वार होकर सुर-ुन्दरिेके साथ . 
बिहार करता है । गन्धर्वेगण उसके गुर्णोका गान क्रते 
है ओर उसके रूप-वण्यको देखकर दूसरोका मन छमा 
जाता है ॥ २४ ॥ उसका विमान वह जहां ॐ जानां ` 
चाहता है, वहीं चतय जाता है ओर उसकी धेटो | 
घनधनाकर दिशाओंको राजापि करती. है । बह 
अप्पराओके साथ नन्दनवन आदिः देवता्ओकी विहार ` 
स्थचि त्रीदापं करते-करते इतना बेघुध हो जाता 
कि उपे इस बातका पता ही नहीं चख्ता कि अब मेरे 
पुण्य समाप्त हो जा्थ॑गे ओर मै यसि दके दिय 


जाऊंगा ॥ २५५ ॥ जबतक उसके पुण्य ४. शोष रहते 
तबतक वह खगम चैनकी वंशी बजाता रतां है; 


सहनेपर नं भक च+ * 
न्व ८ [ने 
न 


च्छा नं रहर्प्र्‌ भा ऊ 


; काल्वी ` । चाल हीरेसी 


अन्तरायेरविष्टतो यदि धर्षः खनुष्टितः । 


तेनापि निजितं सानं यथा गच्छति तच्छृणु ॥२२॥ 













षट देवता यज्ञैः खर्लोकं याति याक्ञिकः । 


शुज्ञीत देववत्तत्र भो भास्‌ दिव्यान्‌ निजाजितान्‌।२३। 






खपुण्योपचिते शुभ्रे विमान उपथीषते | | 





गन्धवैरविहरद्‌ सध्ये देवीनां हृदेव ।। २७ 
















सीभिः कामगेन करिङ्किणीजालपालिना ) 






क्रीडन्‌ न वे ऽस्पपातं सुराक्रीडेषु निवृतः । |२५॥ 


तावत्‌ परोद खगं यत्रतु पुण्य समाप्यते । 

















= क 

७७४ भमद्भागवत [ अ० १० 

४ 1 यद्यधमेरतः सङ्गादसतां बाजितेन्द्रियः । यदि कोई मनुष्य दुष्टोकी संगतिमे पड़कर अधर्म - 
6 । परायण हो जाय, अपनी इन्दरियोके वामे होकर मनमानी 


६ स करने कगे, लोमवशा दाने-दानेम कृपणता करने त्म, 
कामात्मा दषणा इन्ध; जणो भूतविर्ि्क १।।५॥ लम्पट हो जाय अथवा प्राणिर्योको सताने लगे ओर 
विधि-विरुद्र पञ्ओंकी बलि देकर भूत ओर ्रेतोकी 
उपासनामे ल्ग जाय, तब तो वह परद्यओंसे भी गया बीता 
हो जाता है ओर अवदय ही नरकमे जाता है । उसे 
अन्तम घोर अन्धकारे, खा्थं ओर परमाथसे रहित 
अज्ञाने ही मटकना पडता है ॥ २७-२८ ॥ जितने 
भी सकाम ओर बहिर्मुख करनेवाठे करम है, उनका 
फक दुःख ही है । जो जीव रारीरमे अहंता-ममता करके 
उन्हीमे चग जाता है, उसे बार-बार जन्म-पर-जन्म ओर 
मृत्यु-पर्‌-मृत्यु प्राप्त होती रहती है । रेसी सथितिमें मृ्यु- 
धमां जीवको क्या सुख हो सकता है १ ॥ २९ ॥ सारे 
लोक ओर कोकपालोकी आयु भी केरल एक कल्प है, 
इसलिये मुञ्चसे मयभीत रहते हँ । ओरोकी तो बात दही 
क्या, खयं ब्रह्मा मी सुङ्जसे भयभीत रहते ई; क्योकि 
उनकी आयु भी काल्से सीमित-केवल दो पराद्र 
है ॥ २० ॥ सत्व, रज ओर तम- ये तीनों गुण 
इन्दरियोको उनके कर्मोमिं प्रेरित करते है ओर इन्दि 
कमं करती हैँ । जीव अज्ञानवड स्व, रज आदि गुणो 
ओर इन्दियोको अपना खरूप मान वैठता है ओर उनके 
किये हए कर्मोका फल छुख-दुःख मोगने लगता 
है ॥ २१ ॥ जबतक गुणोकी विषमता है, अर्थात्‌ 
दारीरादिमं मै ओर मेरेपनका अभिमान है, तभीतकं 
आत्माके एकलकी अनुभूति नहं होती- वह अनेकं 
जान पड़ता है; ओर जबतक आत्माकी अनेकता है, 
तबतक तो उन्हं कारु अथवा क्म किंसीके अधीन 
रहना ही पड़ेगा ॥ ३२९ ॥ जबतक परतन्त्रता है, तन- 
तक इश्वरसे भय बना ही रहता है। जो भै ओर 
मेरेपनके भावसे भ्रस्त रहकर आत्माकी अनेकता, पर्‌- 
तन्त्रता आदि मानते ह ओर वैराग्य न भ्रहण करके 
बहिमुख करनेवाठे कर्मोका ही सेवन करते रहते है, 
उन्हं शोक ओर मोहवी प्रापि होती है ॥ ३३ ॥ 
प्यारे उद्धव | जब मायाके गुणोमे क्षोभ होता है, तब 
मुञ्च आत्माको ही काल, जीव, वेद) लोक, खभाव ओर धमं 

3 आदि अनेक नामोसे निरूपण करने कते है | (ये 
३४॥ | सब मायामय हँ । वास्तविक स्य मँ भामा ही ह )॥| १ ४ 


परानविधिनाऽऽलभ्य प्रेतभूतगणान्‌ यजन्‌ । 













रो जन्तुगंत्वा यात्युर्बणं तमः ॥२८॥। 
कर्माणि दुःखोदर्काणि करवन्‌ देहेन तेः पुनः । 
देहमाभजते तत्र फं सुखं मत्यधमिणः ।*२९॥ 
ध लोकानां लोकपालानां मदु भयं करपजी विनाम्‌। 


|  ब्रहाणोऽपि भयं मत्तो दविपरार्थपरायुषः ॥३०॥ 





| ५ शणाः सूजन्ति कमणि गुणोऽतुसृजते गुणान । 





ध ^ जीवस्तु गुणसंयक्तो ङ्के कर्मफरान्यसौ ॥२१॥ 


ह "नभ, "विः 





वि | उद्धबजीने पूछा भगवन्‌ ! यह जीव देह आदिं ` ॥ 
रूप गुणोमे ही रह रा है । फिर देहसे होनेवाठे कर्मो 
गुणेषु बत॑मानोऽपि या घुख-दुःख आदि खूप फ्रेम क्यो नही वधता है १ ` 
८ दहमेणनपाहतः। । अथत्रा यह आत्मा गुणेसि निरि है, देह आदिके ` 
 सम्पव॑से सर्वया रहित है, इसे बन्धनकी प्राति = 


2 ¢ | 
युणन बद्ध्यते देदी बद्धयते वा कथं बिभो॥ २५) | कैत होती है १॥ ३५ ॥ वद्ध अथवा मुक्त पुरुष कैसा 


वर्ताव करता है, बह कैसे विहार करता हैया वहः 

कथं वतत विहरेत्‌ कैव ज्ञायेत लक्षणैः। | किन व्छणोसे पहचाना जाता है, कौसे भोजन करता 
है १ ओर मल-त्याग आदि कैसे करता है १ कौसे सोता है, 

ञीतो बिसुजेच्छयीतासीव याति वा ॥३६॥ | कैसे कैठ्ता दै ओर कैसे चरता है १॥ ३६॥ 
अच्युत । प्रसनका म्म जाननेवाल्म आप श्रेष्ठ है । 

एतद इसल्व्ये आप मेरे इस प्ररनका उत्तर दीज्यि--एक ही 
च्युत मे बूहि प्ररनं प्ररनविदां वर । आत्मा अनादि गु्ोके संसर्गसे निवयबद्ध मी माद्धम पड़ता है 
ओर असङ्ग होनेके कारण नित्यप्रुक्त भी । इस बातको 

नित्यमुक्तो निस्यबद्ध एक एवेति मे भ्रमः ॥३७॥ | केकर सुने भम हो रहा है ॥ २७॥ | 

८९9 
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्षे 
भगवदुद्धवसंवादे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ 


अथैकादशोऽध्यायः 


वद्ध, मुक्त ओर भक्तजनों के लक्षण ५ 
भगवान्‌ भरीकृभ्णने कहा-प्यारे उद्धव ! आः 
| है यासुक्त दै, इस प्रकारकी व्या्या या 
मेरे अधीन रहनेवारे स्वादि गर्णोकी उपाधिसे ही 
होता है । वस्तुतः- त्वदष्टिसे नशं । समी 
मायामू्क है--इन्द्रजार ह--जादूके लेख्वे समान है । 
इसल्मि न मेरा मोक्ष है, न तो मेरा बन्धन दी है ॥ १॥ 
जैसे लप्र बुद्धिका विते है--उसमे बिना इए ` ही 
मासता है-- मिथ्या है, वैसे ही सोक-मोह, घुख्‌-द्‌{ख 
ारीरकी उत्पत्ति ओर मृत्यु--यह सब ससारका बलेडा ` 
। माया ( अव्रि्या ) के कारण प्रतीत भी वास्तविक 
| सवम यथाऽऽत्मनः स्याति, संवुतिन तु बास्तबी॥२॥ नहीं है | ॥ उद्धव | शरीरा सु 

ह ` | कराननार। अति १ बन्ननका व | अनुभव व्‌ 


















श्रीभगवानुवाच 





| बद्धो सुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । 










गुणस्य मायामसत्वाज्न मे मोश्वो न बन्धनम्‌ ॥ ९ ॥ 





यरोकमोरौ सुखं दुःखं दहापतति मायया 1 






\\} 


क २ व 


७७६ भरोमद्भागेबत [ अ० ११ 


 ककयानका्ः जककि @क = ^ चयी कके कः # 1 





क 





मोश्बन्धकरी आये मायया मे पिनिभिते।॥ २॥ | मायासे ही इनकी स्वना इई है । इनका कोई वास्तविक 


„ एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते । 
` बन्धोऽस्याधिदयानादिनिं्यया च तथेतरः ।। ४॥ 


अथ बद्धस सुक्तसख वैरकषण्यं बदामि ते । 



























विरुदधधभिणोसतात स्थतयोरेकधर्भिणि ॥ ५॥ 
 सुपणीवेती सद्यो सखायौ 


यद्च्छयेतौ छृतनीडो च शके । 


क |, ४ । ि " व 
४ "१. 1, 4 +. 
(न ९ ११ 7 
क नं 


एकतो खादति पिप्यरन्न- 
2. 


4 ^ ॥। कै 
"क: +~ 4. ॐ र 
8 व त ४ 
1; "क ॥ 
[कि  : "द क्कि 


मन्थो निरन्नोऽपि बलेन भूधान्‌ ॥ ६ ॥ 


~ 1 ५ त 
21२ 
[न जे 
= 


# 
= { 
१. ~ ह + 
५» "9 अमि 
# = [क 
च्व 
१ 


र 





४१ 
9, 


ध ८ 


& > 
ऊर 4 
५ च 
अर गदे ? 
नक । 
"9 च 


क. 


क 


नेषिप्यलादा न तु पिप्पलादः 


+ नम्‌ 
कि # क 
भि कछ चै 
~ £~ = ^ 
# नि ॐ 
क ॥ 1 4 1 ह चै ४ 
"> ~: ऋः नि # 
„3 + +> 


ट = ज त 
कश. क~ 1७ ~+ ~ ४ 7 ॐ | 
र ‰ ~= 3 छ । ् ४ नि 
"क्‌ चं ५२ ड ५ क) 
~ ~ ७ (9 त # क । नि + न 
" क ६ प शद 9 ॐ यब ऋ ^ 
* ` -चै। ५ १ चु (- ५ ५ क 
४ ४) ट ~ . &+ त ४ # ~ 
५१ ह „५ ६ ८4 ॥ द्य ५ 1 भ हि ६ र ध नह 
भ विक ` ४ 2 4 ~ ४ र |+ श, न पि रि 
र ˆ 2१ ६. च 1 त ५ - 
# ५ "= द +# ॐ च 
कि आ नहि ॐ += = ५ ५ * ॥ ~, ~ = 
क "ऋः ~ ९, 9 
- क न 
+ चभ ति र = 


+ र 
च | ४; 
 विदयामयो यः स तु नित्यञुक्तः। ७॥ 
च १.२. "त + ऋ - ~ ॥ । 


, ~ ट ‹ 

(न इत 

= ई स 
र ५.६ 


> 4 => र 


। सन गड्‌ यथात्थ ॥ 


अस्ति नहीं 2 ॥ २ ॥ भाई ! तुम तो खयं बड़े 
सद्धिमान्‌ हो, विचार करो--जीव तो एक ही है । 


. | वह व्यवहारके लिथि ही मेरे अरावे पमे कल्पित इभा 


है, वस्तुतः मेरा खर्प दी - है । आन्मन्ञानसे सम्पच्च 
होनेपर्‌ उसे सुक्त कहते है ओर आत्माका ज्ञान न 
होनेसे बद्ध । यह अज्ञान अनादि होनेसे बन्धन 


भी अनादि कहता है॥ 9.॥ इस प्रकार मुञ्ज एक ` 


ही धर्मामिं रहनेपर भी जो रोक ओर आनन्दरूप विरुद्ध 
ध्मवाले जान पड़ते है, उन बद्ध ओर मुक्त जीवका 
मेद म बताता हँ ॥ ५ ॥ ( वह मेद दो प्रकालका है- 
एक तो नित्यमुक्त ईश्ररसे जीषरका मेद ओर दूसरा 
सक्त-बद्ध॒ जीवका मेद । पत्म सुनो--¬) जीव. भर ईशर 
बद्ध ओर मुक्तके भेदसे भिन-मिन हीनेपर भी एक ही 
शारीरम नियन्ता ओर नियन्तरितके रूपसे सित ह । एेसा 
समञ्ञो किं शरीर एक वृक्ष है, ईइसम हृदयका घोसस 
बनाकर जीव ओर शश्र नामके दो पक्षी रहते हे । 
वे दोनों चेतन होनेके कारण समान हँ ओर कमी न 
बिद्ुडनेके कारण सखा हँ । इनके निवाप करनेका 
कारण केव लीला दही है | इतनी समानता होनेपर 
भी जीव तो शरीररूप बरक्षके फर सुख-दुःख आदि भोगता 
है, परतु ईर उन्हे न भोगकर कमफल सुखं-दुःख आदि- 
से असङ्ग ओर उनका साक्षीमात्र रहता है । अभोक्ता 
होनेपर भी ईश्वरकी यह विलक्षणता है कि वह्‌ ज्ञान 
शर्य, आनन्द ओ सामथ्यं आदिमे मोक्ता जीवसे बद 
कर है ॥ ६ ॥ साथी एक यह भी विलक्षणता है 
कि अमोक्ता ईश्वर तो अपने वास्तविक खख्य ओर इसके 
अतिरिक्तं जगतो भी जानता है, पस्तु भोक्ता जीव 
न॒ अपने वास्तविक रूपको जानता है ओर न अपनेसे 
अतिचर्किको । इन दोनो जीव तो अविद्यासे युक्त होनेक्े 
कारण नित्यनद्ध है ओर ईश्वर विद्याखख्प होनेके कारण 


नित्यमुक्तं है ॥ ७ ॥ प्यारे उद्धव | ज्ञानसम्पन पुरुष ` 


मी सुक्त ही है; जैसे खप्न द्रूट जनेपर जगा हथा पुरुष 


खप्तके स्मयंमाण ररीरसे कोई सम्बन्ध नही रखता, वैसे 


ही ज्ञानी पुरुष सुक्ष्म ओर स्थूर शरीरम रहने भी 


उनसे विंसी प्रकार का सम्बन्ध नही रखता, पतु अन्नानी 





| +~ ६८४३००५ 


॥ णि 









4 





































अदेहस्थोऽपि देहः छमतिः खभदग्‌ यथा 11८ | पुरुष वास्तवे शरीर्ते को$ 
अङ्नानके कारण शरीस्य ही धित रहता है, जसे खप्न 
देखनेवादा पुरुप श्न देखते समय खान्निक शरीरम बधं 
। जाता है ॥ ८ ॥ व्यवहामं इन्द्रियो दाब्द-स्पशदि 
= ्रिपयोको ग्रहण करती दै; क्योकि य्ह तो नियम ही 

गृ्यमाणष्वहंङयान्‌ विद्धान्‌ यस्तविक्रिय; !। ९ ॥ | है क्ति गुण ही गुणको प्रहण करते है, आत्मा नहीं + 


गद्रयाथषु गुणेरपि गुणेषु य) 


 इसय्यि जिसने अपने निर्विकार -आत्मखल्पको समञ्च ¦ 
| चवा है, वह उन विपये परदणत्यागमे किंसी प्रका 


स्वाीने करीरेऽसिन्‌ शुगभव्येन कर्पणा । . | का अमिमान नहीं करता ॥ ९ ॥ यह शरीर प्रारछके 

| | अधीन है । इससे शाररिकि ओर मानसिक जितने भी 
कर्म होति है, सव॑ गणकी प्ररणासे ही होते है । अज्ञानी 4 
पुरुप श्चूठ-मूड अपनेको उन प्रहणस्याग आदि कंर्माका 
कर्ता मान वस्ता है ओर इसी अभिमानके कारणं वहं 


बतसानोऽडधस्तत्र॒कतीसखीति निषद्धयते \\१०॥ 


(^ ॥ १०॥ "¢ 
एवं विरक्तः शयने आरुनाटनम्ञ्जने 1 प्यारे उद्भव ! पूर्वोक्त पद्वतिसे विचार करके विवेकी 
| पुरुषं समस्त विषयोँसे विरक्त रहता है ओर सोने-वेठने, 
दशेनस्प्चनघाणभोजनशभवमादिपु ११] | परूमने-पिरन, नहाने, देखने, दन, सघने, खाने ओर 


सुनने आदिः त्रियाओंमे अपनेको कर्ता नहीं मानता, `` ` 
वल्कि गुणोको ही कर्त मानता है । रुण दी समी ह 
| कमेकि करता-मोक्ता है --रेसा जानकर विद्वान्‌ पुरुष 
| कर्मवासना ओर फर्स नहीं वंवते । वे प्रकृतिमं रहकर 
` प्रतिष्योऽप्य्ंस्तो यथा खं सवितानिरः ॥१२॥ । भी असे ही अङ्ग रहते है, जेसे स्प आदिते जकार, 
ं जल्वी आर्रता आदिखे सु ओर गन्ध आदिसे वायु । 
वेशारये्षयासङ्गलितया ` छिन्नघंशयः ! | उनकी विमल बुद्धिकी तचार असङ्ग-मावनाकी सानसे 

| : | ओर गी तीवी हो जाती है, ओर वे उससे अपने सरे ` 

सुंशाय-सन्दहोको काट-कूटवर फक देते है 1 जेसे को$ 
खप्नसे जाग उठा हो, उसी प्रकार े इस भेदबुद्धिके 
भरम मुक्त हो जते है ॥ ११-१३ ॥ जिनके प्राण. _ 
अः | इन्दिय, मन ओर वुद्धिकी समस्त चेष्टां बिना संकल्पे 
` अत्तयःं वितिध्तो देहस्थोऽपि दि तदशुणैः 11१४ | हती है! ब दहमं शित रहकर भी उसके रुण स्क 
4 है ॥ १४ ॥ उन तज्ञ मुक्त पुरुषेकि शरीरकं े चादि ॥ 
हिसकः तेग पीड पैचाये ओर ६ हे की र, तर दैवः. 
योगसे पूजा करने रोवे न तो किसीके सतनिसे . 
वी हेते ई ओर न भूल के खी ॥ ९५॥ 


न तथा बद्धचते विरासत तत्रादयस्‌ गुणात्‌ । 


` : प्रतिबद्ध शच खमाननानातवाद्‌ विनिवरते ।१२॥ 


यख स्युचीतष्कस्पाः प्रणेन्द्रिमनोधियाम्‌ । 




















# -्===------------ 3 समदा मदात्मा गुण ओर दोषकी मेदे उपर = र भिक न= जो समदा महात्मा गुण ओर दोषकी मेददृ्टिसे ऊपर 
| ` न स्तुवीत द < तैर देत ~ [ध्वस्रा ता र ्‌ १९ न 

|| नस्ु्रीत न निन्देत इव॑तः साध्वस उट गये ह वेन तो अच्छे काम करेवा्की स्तुति 
| करते है ओर न बुरे काम करनेवाटेकी निन्दा; न वे 


द 


ओर न बुरी बात सुनकर किसीको क्षिडकते ही हैँ ॥ १६॥ 
 नडर्या्नवदेत्‌ किंचिन्न ध्यायेत्‌ साध्वसाधु बा । जीवन्मुक्त पुरुष न तो कुछ भत्म या बुरा काम करते 
ह ` | है, नकु भाया बुरा कहते हँ ओर न सोचते ही 
| है । वे व्यबहारमे अपनी समान इत्ति रदकर आत्मा- 
नन्दे ही मग्न रहते है ओर जडके समान मानो को$ 
र मूख हो इस प्रकार विचरण करते रहते है ॥ १७ ॥ 
। शब्दब्रह्मणि निष्णातोन निष्णायात्‌ परे यंदि | प्यारे उद्भव | जो पुरुष वेदोका तो पारगामी विद्वान्‌ 
भ्रमस्त अमफलो ह्यधेनुमिव रक्तः ।१८]। | हो, परंतु प्रहके ज्ञानसे शल्य हो, उसके परिश्रमका 


। आत्मारामोऽनया स्या विचरेजडचन्धुनिः १५ 


+^ ; 
`आ इषदामसत। च ष्‌ दूधकी गायका पाक्नेवास्र ॥ १८ ॥ दघ न देनेवाठी 
देहं पराधीनमससरजां च | गाय; व्यभिचारिणी खी; पराधीन शरीर, दुष्ट पुत्र, 
सत्पात्रके प्राप्त होनेपर भी दान न किया इआ घन ओर्‌ 


क ` 
नद 


। 
† र 
। । < १ 
0६१. 
- 7 ० 
विः ` 
४ 


हीनां मया र्ति दुःखटुःखी ।।१९॥ | रखवारी करेवा दुःख-परदुःख ही भोगता रहता 















सिलयुदधव्रागनिरोधमसख | लोकपावन लीत्मका वर्णन न हो ओर टीकावतारोमें 
भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादिः अवतारोका जिसमे यञो- 


चाहिये कि देसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न 


- ५५ | बन्भ्यां गिरं तां मिभरयान्न धीरः ॥२०॥ करे ॥ २० ॥ 


इष ॑ मेत विरजं मनो मय्य््य स्वगे ॥२१॥ | का रम है उसे दूर कर दे ओर सुश्च सर्वव्यापी परमासा- 
८ ए धारं मतो अदि निर्‌ म अपना निम मन ठ्गा दे तथा संसारके व्यवहारोसे 
स्व सर्वाणि र्माणि निरयष्ठः समाचर ।२२॥ सिर न कर्‌ सको, तो सारे कम निरपेक्ष होकर मेरे व्यि 
ही करो ॥ २२ ॥ मेरी कथा समस्त लोकोको परत्र 
लोकीवनी; । कनवाटी एवं कल्याणखरूपिणी है । श्रद्रके साथ उन्हे 
एुनना चाहिये । बार-बार मेरे अवतार ओर रीखओंका 

१ उन्म चाभनयच्‌ य॒हुः ॥२२॥ ' गान, स्मएण ओर अभिनय करना चाहिये ॥ २३ ॥ 
"वान्‌ । २. सुभद्राम्‌ | ४, पावनीम्‌ @ > क ॥ 











| वदतो गुणदोषाभ्यां नितः समद छन ॥ ^ ९ | किसीकी अष्ठी वात घुनकर उसकी सराहना करते ह 


कोई फल नहीं है, व्ह तो वैसाहीदहै, जेसे विना 


वित्तं त्वतीथींकृतमङ्ग वाचं ` मेरे गुणस. रित वाणी व्यर्थ है, इन वस्तुओंकी 


5. ~. है ॥ १९ ॥ इसव्यि उद्धव | जिस वाणीम 
ध यसां न मे. पावनमङ्ग जगत्की उत्पत्ति, सिति ओर प्रव्यख्प मेरी 
~ 4 कः 


0 
३. 


३ ६ | लीरवतारेप्सितजन्म वा खाद्‌ | गान न हो, वह वाणी वन्ध्या है | बुद्धिमान्‌ पुरुषरक | 


| जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि । प्रिय उद्धव | जेसा कि ऊपर वर्णन किया गया है,. 
(= ४ आतनजिज्ञासा ओर विचारके द्वारा आत्माम जो अनेकता- 


उपराम हो जाय ॥ २१ ॥ यदिः तुम अपना मन परखरहममे 





सः 
$ + > वि + 3 


म 4 1. | 
॥ षि =" श + ऊँ 





{ रि 


~~ । 
- ८ + द 


9 ने [व त 


"न [+ 
0 


व = न श 


न्क ॥ 4 


भषननाय च कथ्यताम्‌! । ४. य सलोकाधे पराचीन प्रतिः नही ह । 





1 तः ष ह म " "कं ह । १, ० ॥ > "क । 
1 # ˆ गक 9 +" | र ४ न , 

अश १ १ ] * । ¦ ॥ + => थ ४ 3 = व ऊन (< & + = 
एकादश स्कन्ध ७७९ 





= न्च्च्व्व्व्व्य्व्व्य्य्य्य्य-------------------------------- === 











डय 


9 भ 

मदथ ध्मकामाथां ताचरच्‌ . मदपाश्रयः 1 रे आश्रित रहकर मेरे ही चयि धर्म, काम ओर अथका 
४ सेवन करना चाहिये । प्रिय उद्भव ! जो एसा करता 
लभतते निशसा द. है, उसे मुञ्च अविनासी पुरुषकरे प्रति अनन्य प्रेममयी 
लभते निबलां भक्ति मय्युद्ध सनातने ।२४॥ | मक्ति प्रात हो जाती है ॥२४॥ भक्तिकौ प्रपि स्सङ्गसे 
होती है; जिसे मक्ति प्राप्त हो जाती हैः वह मेरी उपासना 
करता है, मेरे सानिष्यक्षा अनुम कएता है । ईस 

| प्रकार जव उसुक्ञा अन्तःकएण द्र हो जता है, 
वह सुतोके उपदेशोके अनुसर उनके द्वायं वताय इए 
स ब मे दितं सद्धिरज्नसा विन्दते पदम्‌ ॥२५॥ मेरे परमपदश्तो-ब्रप्तविक्र खल्यको सड जहीम प्राप्त 

हो जाता है ॥ २५ ॥ 

उद्धव उवाच उद्धवजीने पूच्जा--भगवन्‌ ! बडे-बडे संत आपकी 
. कीविका गान कते है । आप कृपया वतकद्ये कि 
साधुस्तवात्तमश्छोक मतः कीटम्विधः प्रभो । आपके विचारे संत पुरुषका क्या रक्षण है १ अपके 1 | 
| प्रति कैसी मक्ति करनी चाहिये, जिसका सतखेग ` ~ 
भक्तिस्त्व्युपयुज्येत कीसी सुड्धिराहता ।२६॥ | आद कते & १ ॥ २६ | भगवन्‌ ! आप द्यी ब्रह्य 
9 आदि शरेष्ठ देवता, सत्यादि गेक ओर चराचर जगतके 
एतन्मे पुर्पाध्यक्च॒रोकाध्यश् जगसरभो । खामी & । नै आपका विनीत, प्रेमी ओर शरणागत 4 
| भक्त | आप सुच मक्ति ओर मक्तका रहस्य बतकद्ये ।२७। 
प्रणतायालुश्कताय प्रपन्नाय च कथ्यताम्‌ ॥२९७ | भगवन्‌. / १ जानता # विः आप्‌ प्रकृतिसे परे पुरुषोत्त ^ 
| एवं विदाकाशखरूप व्रह्म है । आपसे भिन्न कुछ भी 
त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरूषः ग्रतः परः । | नहीं है; पिरि मी आपने लीककि च्य स्वेच्छासे ही यह 
अलग शारीर धरण करके अवतार च्या है । इसच्धिये 


सतगख्व्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता 


अवतीर्भोऽसि भगवन्‌ स्वेच्छोपात्पृथग्बपु; २८ | बासतबमे आप ही भक्ति ओर मक्तका रस्यं बतला सकते ५ 
द ॥२८॥ 4 
श्रीमगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृष्णे कहा--प्यारे उद्धव ! मेरा मक्त ॐ 


ठ 


कृपावी मूरति होता है । वह किसी भी प्राणीसे वैरमाव. 


ध ६ नहीं रखता ओर षोरसे-षोर दुःख भी प्रसनतूेक . 
कपाठुरकृतद्रोदसिितिष्षः सबेदे्िनाम्‌ । सहता है । उसके जीवनका सार है स्य, ओर उसके ` 


मनम किरी प्रकार्की ' पापवासना कमी नही आती । ˆ 
बह समद ओर सवका भत करनेवाच होता है ।२९। 
उसकी बुद्धि कामनाओंसे करटुषित नदय होती । वह 
= संयमी, मघुरखमाव ओर पवित्र होता है । सम्रहपहस 

कानैरहतधीर्दान्तो भदः शुचिरविचनः। _ । सया दर रहता दै । कि * ब्तुके व्यि वह करद 
९. {तमो । २. त्वि प्मुन्येत । ३. मराचीन पतिम यहं इकारं इसं प्रकार दै--“एतन्मे पुरुषेशाघ 


सत्यसारोऽनवधयात्मा समः सर्वापकारफः ॥ २९ 

















्ीमद्भागवत [ अ० ११ 











क 


अनीहो मितभुक्‌ शान्तः स्थिरो मच्छरणो युनिः॥\२०॥ | चेष्टा नहीं करता । परिमित मोजन करता है ओर शान्त 
९ एता है । उसकी बुद्धि शिर होती है | उसे केवलः 
6 | मेश ही भसा होता है ओर वह आत्मतत्वके चिन्तनमे 
अभ्रमत्तो गभीरात्मा धतिमाद्धितपडगुणः 1 | सदा क्षखन रहता है ॥ २० ॥ वह व्रमादरहित. 
गम्भीर खमाव ओर धैयवान्‌ होता है । भूख-प्यास, शोक 
मोह ओर्‌ जन्म-मृव्यु--ये छो उप्तके वमे रहते ह । 
अमानी मानदः कपो सैत्रः कारुणिकः कविः \( ३१] | कड खयं ते कभी किसीसे किसी प्रकारका सम्मान नहं 
| चाहता, परतु दूसरयका सम्मान करता रहता है । मेर 
सम्बन्धी बतं दूसरोको समश्चानेमे बडा निपुण होता 
हि तानि काय) है ओर समीके साथ मित्रताका व्ववहार्‌ करता है | उसे 
वि हृदयम करुणा मरी होती है । मेरे त्का उसे यथाथ 
| | ज्ञान होता है ॥ ३१ ॥ प्रिय उद्धव! भने वेर्दो भौर 
हि ्‌ | शाके ख्पमें मुष्योके धमका उपदेश किया है, उनके 
ध धमोन्‌ संत्यञ्य यः सर्वान्‌ मां भजेत स सत्तमः॥।२२॥ | पाटनसे अन्तःकरणञयद्धि शादि शुण ओर्‌ उल्क्घनसे 
ठ - | नसकादि दुःख प्राप्त होते क; परंतु मेरा जो भक्त उने 
भी अपने ध्यान आदिमे विक्षेप समज्ञकर व्याग देता ह! 
ओर केवल मेरे ही भजनम च्गा रहता है, बह प्रम 
संत है ॥ २२ ॥ मैकोन दँ कितना वडा दसः 
` | हव-स्न बातोंको जाने, चाहे न जने; थित जे 
+ अनन्यभावसे मेरा भजन करते है वे मेरे विचारसे रेरे 
भजन्त्यनन्यभवेन ते मे भक्ततमा मताः ॥२३॥ 
परम भक्त है ॥ २२ ॥ | 
मदिङ्गमद्धक्तजनदशंेनस्यशनाच॑नम्‌ । प्यारे उद्धव ! मेरी मूरति ओर मेरे भक्तजनोका दछन. 
। 4 य „| स्पश, प्रजा; सेवा-द्शरुषा, स्तुति ओर प्रणाम करे तया 
+. स्तिः अहगुगकमालकीतनम्‌ ॥९४।। | मेर ८ कर्मोका कीर्तन कर ॥ ३४ ॥ उद्धव ! 
मत्कथाश्रवणे शद्धा मददुध्यानघ्रद्रब । मदय क्था सुनने श्रद्धा रक्खे ओर निरन्तर मेरा ध्यानः 
करता रहे । जो कुछ मिले, वह ॒मुचे समर्पित कर दे ` 
सुवलाभपहरण दास्येनात्मनिवेदनम्‌ ।(२५]। | ओर दास्यभावसे मुञ्चे आत्मनिवेदन करे ॥ ३५ ॥ मर 
। ४ ह दिव्य जन्म ओर कर्मोकी चचां करे । जन्माष्टमी, राम- 
| क क पवालुमोदनम्‌ । नवमी आदि पर्वोपर आनन्द मनावे ओर संगीत, चत्यः. 
गीतताण्डव्‌ र त्रगोष्ठीभिमेदगहोत्सबः ।॥३६।। ` वाजे ओर समाजोदारा मेरे मन्दिर उत्सव करे 
~) | करावे ॥ ३६ ॥ वार्षिक त्योहारोके दिन मेरे स्थानोकी 
यात्रा करे, जुस निकले तथा विविध उपहारोसे मेरी. 
पूजा करे । वैदिक अथवा तान्त्रिक पद्धतिसे दीक्षा प्रहण 
करे | मेरे त्रतोका पाठन करे ॥ २७ ॥ मन्दिरोमे मेदी 
सहत्य चोद्यम्‌ तियोकी स्थापनामे श्रद्धा रक्खे । यदि यह काम अवेत्य 
ह ~ र ¢ ॥ | नकर सके तो ओरोके साथ. मिलकर उद्योग करे | 
॥ | ३ ^| | मैरे टये पष्यवाटिका) बगीचे क्रोड़वे स्थान, नग 


। 3 धि 42 = 
५ 
। त न 9 # ~ चरर 
र 0 ~~, = > र । ^ 












ज्ञालाज्ञातवाथ ये वे मां यावान्‌ यशासि याद्वः । 


















3 "~~ 
ह, १ 2 4. ^~ 90 ४ 2 4. 


 # अनी, 


== क १ र 
१1. ॐ चकै न्क 
4. ~र छ 
ज 4 





अ० ११] 





=== च । 
पम्मजनोपलेपाम्यां सेकमण्डलबतं 


अमानित्वमदभ्भित्व कृतस्यापरिकीतेनम्‌ । 
मपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्याभ्निवेदितम्‌\ ४०) 
यद्‌ यदिष्टतमं रोके यच्ातिप्रियमात्मनः 


तत्तनिवेदयेन्मद्यं तदानन्त्याय कर्पते \*९१।। 
घयाऽभितरासणो गावो वैष्णवः खं मरुजलमू। 


[ब क णी 


भूरात्मा सदभूतानि भद्र पजापदानि मे 1४२) 


शये तु विद्यया त्रय्या हबिषाम्नौ येत माप । 


आतिथ्येन तु विप्राय गोष्वङ्क यवसादिना ॥४३॥ | ` 


वेष्णवे बन्धुसत्छृत्या हदि खे ध्याननिष्ठया । 

वायो भख्यधिया तोये द्र्येस्तोयपुरस्छृतेः ॥४४॥ 
खण्डिले मन्तरहदयेभेगिरात्मानमात्मनि। 
 शषत्रजञं सवभूतेषु समत्वेन यजेत माम्‌ ।\४५। 


धिष्णयेष्े ष्विति मद्रूपं श्चक्रगदाम्बुजेः। 


क्तं चतु्ैलं शन्तं ध्यायन्न्चेत्‌ समाहितः ॥४६।। 


ष्टपेन मामेवं यो यजेत समाहितः । 


, लभते मयि सद्धक्ति मस्स्परतिः साधुसेवया ॥४७॥ | र 


श्रवेण भक्तियोगेन सत्सङ्गेन विनोद \ 


१. ष्वेतेषु म । 





एकादश स्कन्ध 


त्क क ` आ = 
कि जि क = क = य 


ओर मन्दिर बनवावे ॥ २३८ ॥ सेवकक्री भाति श्रद्वा- 








भक्तिके साथ निष्कपट भावसे मेरे मन्दिरोकी सेवा-छ्श्रुपा 


ह-तदहके चौक पूरे ॥ ३९ ॥ अभिमान न कर 
दम्भ न करे । साथ ही अपने ञ्युम कर्माक्रा दिदोय भी 
न पीट । प्रिय उद्धव ! मेरे चदव्रेकी अपने काममं 
ठगनेकी बत तो दूर्‌ रही; सुञ्चे समर्पित दीपकके 
प्रकाशसे भी अपना काम न ठे । किसी दृसरे देवताकी 
चद़ायी इई वस्तु मुञ्चे न चढ़ावे ॥ ४०॥ संसारम 
जो वत्तु अपनेको सबसे प्रिय, सवसे अभीष्ट जान 
डे, वह मुञ्चे समपित कर दे । रेषा करनेषे वह 
वस्तु अनन्त फ देनेवाटी हो जाती है ॥ ४१ ॥ 
भद्र | सयं अग्नि, ब्राहमण, गो, वेष्णत्र, आकाराः 
वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा ओर समस्त प्राणी- ये सव॒. ` 
मे पूजके स्थान हैँ ॥ ४२ ॥ प्यारे उद्रव ! ऋबेद;, ` 





यजुवद ओर सामतरेदके मन्त्रद्रारा सूयमे मेरी पूना 
करनी चाहिये । हवनके दारा अग्निर्मे, आतिध्यद्रारा 

रेष ब्रा्मणमे ओर हरी-हरी घास आदिके द्वारा गोम 

री पूजा करे ॥ ४३ ॥ माई-बन्धुके समान स्त्कार्के ` 
दारा वैष्णवे, निरन्तर ध्यानम जगे रहनेपे हदयाकारम्‌ 

मुष्य प्राण समञ्ञनेसे वायुम ओर जठपुष्प आदि ` 
सामग्निरयोद्रा ज्म मेरी आराधना की जाती ह 













है ॥ ४४ ॥ गुप्तमन्त्रोद्रारा न्यास करके मिद्रीकी वेदीरम, क 
उपयुक्त मेोगद्रारा\ आत्मा ओर समट्ष्द्ारा सम्पूणं ` ` 


मी स्यानोमि श्ख-चक्रगदा-पद्म धारण कयि चार ` 
| सुजाओंब्ञे शान्तमूति शरीमगवान्‌ विराजमान ई, पसा ` ` 
ध्यान करते इए एकाप्रतके साथ मेरी पूजा कनी ` 
चाहिये ॥ ५६ 1 इस प्रकार जो मनुभ्य एकाग्र चित्तसे 
यज्ञ-यःगादि इष्ट ओर कुओं-बावटी बनवाना आदि 
पूत्तकमेकि द्वारा मेरी पूजा करता ह, उसे मेरी श्रष्ठ सक्ति ` 
रपत हयेती है तथा संत पुरुषोकी सेवा करनेसे मेरे खश्पकाः 
न भी दहो जाता है ॥ ४७॥ प्यारे उद्धव 
मेए रसा निश्चय है कि सत्सङ्ग ओर भक्तियोग--इन 


| दो साधनोका एक साथ ही अनुष्ठान करते रहना 





~. ~, [ अ० १२ 
स हि च्======----------२ । भायः इन दोनोक अतिरि संशरधागरते पर ` ¦ इन दोनोंके अतिरिक्त सं्ारक्षागध्पे पार १ 
वा ॥४८॥ | चाहिय । भावः ‹ 
6 पायो तरिद्यते सध्यङ प्रायणं हि सतामहम्‌ होनेका ओर कोई उपाय नहीं है; क्योकि संतपुरुष 
ष. | सज्ञे अपना आश्रय मानते ह ओर मैं सद(-पतरदा उनके 
| | | तमे एक अत्यन्त गोपनीय परभ रहस्य की वात वतव्यजंगा; | 
¦ अ | क्योकि तुम मेरे प्रिय सेवक, हितैषी, खद्‌ ओर व्रेमी | 
।  उगोप्यमपिषश्यामि तवमे गृत्यः सुहृत्‌ घखा॥४९॥ । सखा हो; साय ही खननेके भी इच्छक हो ॥ ४९ ॥ । 
इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादरदष्कन्धे | 
एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ 
= ~ ~ ~< -------- | 
अथ दशोऽध्यायः 
सत्सङ्गकी महिमा ओर कर्मं तथा कर्मत्यागकी विधि 
ओ: श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते ह-प्रिय उद्व 1 
` न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च! | जगत्म जितनी आसक्त्या ई, उद सत्सङ्ग नट कर 


. <. देता है | यही कारण है श्नि सत्सङ्ग ञे 
। न खाभ्यायसतपसत्यागो नेषटापूतं न दक्षिणा ॥ १ ॥ नित पो 






















ह. 9 वशम कर ठेता है, वेसा साधन न योग है न सांख्य, न 
< | । ओं १ 
# वरतानियज्ञस्छन्दांसि तीथोनि नियमा यमाः। | धर्मपालन ओर न खाध्याय्‌ | तपस्या, व्याग, इषटपूं 


` 


¦ छ, सः ९ [भ पै भ) ¢ \ 
¢  यथावरन्धे' सत्सङ्गः सव॑सङ्गापहो हि माम्‌ ॥ २१ | ओर दक्षिणसे पै वैता प्रतन न्ख होता । कञ्च 
ब. = + + - वे ~ ९ = ‡ . £ सः 
| ` सलसङ्गन हि दैतेया यातुधाना खगाः खगाः । १ ध ९ 9 11 सके 
[थ वशम करनेमे समर्थं नहीं हैँ ॥ १-२॥ 
4 धवाप्परसो नागाः सिद्राथारणगुद्यङाः ॥ ३ ॥ | निणाप उद्रवनी ! यह एक युणकषी नही, सभी युगोकी 

दि . ` क +. नुष्ये ॥ 1 ९ एक्‌  &। स॒ ९ 

विद्याधर मुष्येष वेश्याः शद्रा; द्वियोऽन्स्यजाः । | एक सी बात हे । ससङ्गे द्वारा ही दैः्य-राक्षस, पञ्- 
ॐ ॐ ¦ पक्षी, गन्धव-अप्तर्‌) नाग-सिद्ध, चारण.गुद्यक ओर । 
तत्‌, अशतयल्मलसिन्‌ धुगेऽनष ॥ ४ ॥ | विवापरेको भतो प्राति इई है । मलु्ोम बैश, शद, 


; 


न नि 







वो मदं आ्ाषकयापवाद्यः । = शी, ५, अन्यन गदि रगीोयगो प्रहि 
.. = ४ इत-से जीवने मेरा परमपद प्राप्त किया है । बत्राठुर, 
षपते। बलित्राणा सयश्चाथ विभीषणः ॥ ५ ॥ | प्रहार, दृषपवा, बि, बाणाुर, मयदानव, विभीषण, 
वि सुपर, ह्युमान्‌, जाम्बवान्‌, गजेन्द्र, जययु, तुत्मधार 
८ वसय, धर्मव्याध, कुज्जा, त्रजकी गोपिया, यज्ञपिथां ओर 
.& । | दूसरे वेग भी सतसङ्गके प्रभावसे ही सके प्रात कर सके 
| ६॥ ३-६॥ उन गोगोने न तो वेदोका खध्याय किया 
| था ओर न विधिपूैक महापुर्पोकी उपासना की थीं । 





































| इसी उन्होने कच्छ चान्द्रायण 
त ऋ: ष कार्‌ । प । | थ दि तरत ओर्‌ कों 
¢ (4 ह. ५ 9 {34 (1 ~ तपस्या भीं \ ¢ ५ \ - 1. श ~. ~ £ ° 
| ७ | |. नहीं की यी। बस, केवढ 
जन्मयपागताः ॥ ७ ॥ | तपला मी नही कीथी बस्‌, वेवर्‌ 2 
~ ^~ ^ | तपस्या मा नहं की थी | बस केः म्रभ | 
२ च ~ द \ व +. व 4 ०,५ भ १, भ &: १ ~> त दकः 8 ^ ि 
ॐ + क > & ~+, - 4 4 ‡ क त ॥ णतो ~ ४ १५ अ ् [१ क दु र 
। द. ~ ~ ह यः ~ वकु ५ क 
द ~. < क क - ६२ 
» कि 9 [ ४ > + ~ च ॥ # \५. 4 नद 4 र~ 4 ८ त ५१ 


४ न 7 
न छ कै = +" र 
= ष व 
१ च £ वा 
र 





४ । 
् 
, च च 
= 4 0 क 
सर ज क 
मी ठ भ द ह 4 > कै ज ^ ३ 
| अ ८: ४ न > क च ॥ 
कि ह म । ~ 
* क > ड 
„+ 1 त 
+ म 4 क + > ~ ६४ ¶. "४ 
च # +न+ नम्‌ जत १. "- ~ गकु, केर च चे (+ 


ररि पि 


| 





जहम मां परमं प्राः सङ्गाच्छतसदसशः ।।१२ 




























 । एकादश स्कन्ध ७८३ 
व्च्व्व्व्व्ववचवव जच 

केवङेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मगाः 1 |वेसुद्चे प्रा्ठदहो गये ॥ ७ ॥ गोपि, गायं 
स यमल््न आदि वृक्ष, व्रजके हरिनि आदिं पञ्च, काटि 

येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्ञसा \\ < ॥\ | आदि नाग-- ये तो साधन-साष्यके सम्बन्ध सर्वथा 
; = | ही मूढलुद्धि ये 1 इतने ही नही, ेसे-देसे ओर भी 
यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरेः । . | बहुत हो गये है, जिन्हनि वेल प्रमधूं वके द्वार 
न क ही अनायास मेरी प्राति कर टी ओर कृतकृत्य हयो गये 

यायसन्याकः प्राप्लुयाद्‌ यल्वानप )९ ॥ ८ ॥ उद्धव ! बड़े-बडे व्रयलनश्चीठ साधक योग, सांख्य, 
दान, त्रत, तपस्या, यज्ञ, श्रतिर्योकी व्याख्या, खाच्याय 
जर सन्यास आदिः साधनकि द्वारा मुञ्चे नहीं प्राप्त कर्‌ 
सकते, परतु सत्सङ्ग द्वारा तो मे अत्यन्त घुम हौ 
जाता द ॥ ९ ॥ उद्धव । जिस समय अक्रूरजी भैया 
बल्रामजीके साय मुञ्चे व्रजसे मथुरा ठे आये, उस समय 
गोपियोका हृदय गाढ ब्रेभके कारण मेरे अयुरागके ^ 
रग रेगा इभ था । मेरे वियोगकी तीव्र व्याधिसे वे “` 
यकु हो रदी थीं जौर मेरे अतिरिक्त को$ भी दूस . ` 
वस्तु उन्हें घुखकारक नहीं जान पडती थी ॥ १० ॥ 
तुम जानते हो किं मै ही उनका एकमात्र प्रियतम इ । 
जब भँ वृन्दावनम्‌ था, तब उन्होने बहत-घी रात्रिर्या-- ` । 
वे रासकी रात्रि मेरे साथ अघे क्षणवे समान विता । ` 
दी थी; परतु प्यारे उद्धव | मेरे बिनावे ही रात्रिया ` 0.1 
उने ल्ि एक-एक कल्पके समान हो गयीं ॥ ११॥ ` ` 
सेते बड़े-बड़े ऋषि सनि समाधिम सित होकर तया ` 
गङ्खा आदि बदी-बडी नदिर्यो समुद्रम मिख्कर अपने 
नाम-ख्प खो देती &, वैसे ही वे गोपि पत्म त्रेमके ` 
द्वारा सक्षम इतनी तन्मय हो गयी थीं कि उन्हे गेक- ` ` ` 
परटोक, शरीर ओर अपने कहनेवाके पतिःपुत्रादिकी ` 
भी घुध-बुध नही रह गयी थी ॥ १२ ॥ उद्धव ! उन्‌ 
नो पिमं बडत-सी तो रेखी थी, जो मेरे वास्तविकं 
खरूपको नहीं जानती थीं । वे मुञ्चे भगवान्‌ न स | 
केवल प्रियतम ही समञ्जती थीं ओर जारमात्रसे 
मिलनेकी आकाङ्खा किया करती थी | उन साधनदीन 
सैकडं, हजारो, अत्रलर्ओंने वेवलं सङ्गके प्रमावसे ही 


॥ 


रामेण साधं मथुरां प्रणीते 
श्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ताः । 
विगाढभावेन न मे वियोग 
तीव्ाधयोऽन्यं दद्श्चुः सुखाय 1१० 
तास्ताः क्षपाः ग्रषठतमेन नीता 
मयेव वर्दाबनगोचरेण 
णार्थवत्ताः पुनरङ्ग तासां 
हीना मया कर्पसमा बभूवुः ॥१६।। 


ता नाविदन्‌ मय्यनुषङ्खबद्ध 
धियः ` खमात्मानमदस्तथेदम्‌ 











.. यथा समाधौ अुनयोऽन्धितोये 











नयः प्रविष्टा इव नामरूपे \)१२॥ 





मत्कामा रमणं जारमखरूपविदोऽबाः । 







" श्रवु 
[9 
क 


(१ ४». ध 1 ॐ ४ ~~~ ५ 

) न त. ८ 

| ॐ >: & लक त ९ ६] ~ द 

व 2 3 प म ¦ च। १४ ॥ 

}; , भक ~ ~ ~ (- || । 

। ` अ्रृत्तंच तमेव च \\ १४१ 
वु इतत \| ५8 (1 च्च तव्य चु च ॐ 0 
' " (क ` ३ 

(५ च १ न रः £ { 
॥ ; = भे = ~ < 9 








द त - -------------- शप तमं रूः ¦ ; = {देहिना म्‌ । आत्मश्चख्प यच त-क ही शरण 
मामेकमेव हरणमात्मानं सवे हिना ग वरः क्योकि मेरी रारणमे आ 3 तुम स्वया 


च 9 १, ४ 
^ 
= 





(~ र <~ 
५ - ड 
+ कि क 
भः ^ वीः 


„मादन मया खा तोमः ॥॥१५॥ | निमय दो जाने ॥ १४.९५ ॥ 


ध उद्धवजीने कहा-सनकादि योगेशवरोके भी | | 
ड (४ परसेश्र प्रभो | यां ती म आपका उपदे सुन रदा | | 
६ शु प्रतु इसे मेरे मनका संदह मिट नह सड दै । | 
सदयः शृण्वतो वाच तव योगेरेधर । ` मञ्चे खधर्म॑का पाठन करना चाहिय या सव उ छोडकर 8 
5 अपी चरण ग्रहण करनी चादिये, मेत मन हसी | 3 
न नि॑त॑त आत्ससखो येन आम्यति मे मनः ॥ ६॥ | दुविषामे चटक एय है । अप कृपा करके सुच मर ८' 
1 | माति समज्य ॥ १६ ॥ - प | 
4 श्रीभगवानुवाच भगवाय्‌ शरीर्ष्णने कहा--ग्रिय उद्धव . जस 

[8 ` = ` | प्रमात्माका परोक्षरूपसे वर्णन किया जाता है, वे साक्षाद्‌ | 
^ र एव जनो विबख्ि अपरक्ष-प्रयक्ष ही है; क्योकि वे ही नििल वस्तुको | 
# ~ | सत्ता-सटति --जीवन-दान करनेवाले ई, वे ही पले 


















अनाहत नादखरूप परा वाणी नामक प्राणे साथ 
र | मूलाधास्वक्रमे प्रवेश करते है । उसके वाद्‌ मणिपूरक- 
अ मनोमयं दष्मधुपेत्य . सूपं | चक्र ८ नामिस्थान ) म आकर पयन्ती वाणीका मनोमय 
 . सूमरूप धारण करते ह । तदनन्तर कण्ठदेशमे 

| विद्युद नामक चक्रमे आति है ओर बँ मध्यमा वाणीके 


~ 


#  श्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्ट 





मात्रा खरो बणं इति खनि; \\१७\ 


०. । रूपम व्यक्त हते हैँ । फिर क्रमशः सुखम आक | 
„~ वेऽनिरबन्धु हश्व-दीर्थादिं मात्रा, उदात्त-अनुदात्त आदि खर तथा - | 
क~. यथान ^ श ष्प्रा ¢. ^ 
- ० कार्वारादि वणरूप स्थूढ-- वैखरी वाणीका ₹प ग्रहण 

| अ = त्‌ । कर छेते हँ ॥ १७ ॥ अग्नि अकरारशमे ऊष्मा अधवा 9. 

दारुण्याधमथ्यमानः । | विद्युते ख्पप्रे अग्यक्तखूपमे स्थित है । जवर वलमूर्क | 
का्टमन्थन किया जाता है, तत्र वाप्रुकी सहायतासे वंह 4 
प्रजातो हविषा समिध्यते ; 


४ पहले अव्यन्त सूक्म चिनगारीके ख्पमे प्रकट होती है = `" 
+ ओर फिर आहति देनेपर प्रचण्ड रूप धारण कर्‌ छती 
तथत्‌ मे व्यक्तिरियं हि बाणी ॥१८॥ है, वैसे ही मे मी शब्दघ्रहलरूपते ऋमश्षः परा, ` ` | 





2 4 क कैः गितम पयन्ती, मच्यमा ओर वैखरी वाणीके ख्पमे प्रकट होता ` 
‡ एव 4 ग्‌९.२तग्‌ ह ॥ १८ ॥ शस प्रकार बोलना, हार्थोसे काम करना, 


ध ५ पैरोसे चलना, मूतेनिय तथा गुदासे मल-मूत त्यागना, 
` घ्राणो रसो च्क्‌ सपशः श्रुतिश्च । सुधना, चखना, देखना, दूना, घुनना+ मनसे संकस्प 
क विकस्य करना, बुद्धिसे समश्चना, अहकारके द्वारा अभिमाने 





समस्त कर्ता, कारण ओर कर्म॒ ही 


धि त ५4 ५ + ॥ क (वः. - ~ ॥ > ३ = र 2 [> # आ ध ॥ =, 4 - नन १) जन "~ = ^ {+ षाणा श्र कः ऋणो 
क्कि _ += । ` ॥ि र के ल 9 ॥ त ऋ. १९ 4५ ३ ४ भ क = 4 9 => व ५. (| 4 * पिरि का ककम ज 
[श ¢ ++ 1 क न ~+ = त [2 † न न्व 








| अ० १२ ए 


कादश्च स्कन्ध ७८५ 














-व्च्य्व्ववववव--~---------------------न जज === 


अभिन्यक्तियौ है ॥ १९ ॥ यह ॒सुत्रकौ जीवित करने 
वाख पसेश्वर ही इस॒ त्रिपुणमय ब्रह्मण्ड-कमख्का करण 
रण्यक्त एफा वयसा स आदयः । .. | दै । यह आदिपुरुष पहले एक ओौर अव्यक्त था | 
जसे उपजाऊ खेतमे बोया हआ वीज शाखा-पत्रपुष्पादिं 

विश्ि्टशक्तिवहुथेव भाति अनेक रूप धारण कर छेत है, वैसे दी कात्ातिसे 

. मायाका आश्रय ठेकर राक्ति-विमाजनके द्वारा परमेश्वर 
= ही अनेक रूपेम प्रतीत होने त्माता है ॥ २० ॥ जसे 

बीजानि योनिं प्रतिपच यत्‌ ॥२०) | तागेकि ताने-बनेमे वज्ञ ओतप्रोत रहता है, वैसे ही 

यह सारा वि परमातमामे ही ओतप्रोत है । जसे सूतके 
विना ष्का अस्तित्व नदीं है, वितु सूत वल्के क्रि 
भी रह सकता है, वैसे ही इस जगते न रनेपर भी 
पटो यथा तन्तुषितानसंस्थः । । परमात्मा रहता है; वितु यह जगत्‌ परमात्मखख्प ही 
ह परमात्माके बिना इसका कोई अस्ति नयी है 1 ` 








अयं हि जीवखिब्रदब्जयोनि- 





यसिन्निदं प्रोतमरोषमोतं 


य॒ एप संसारतरुः पुराणः । यह संसार अनादि ओर प्रवाइ्पसे नित्य दै । 
इसका खरूप ही है--कर्मकी परम्परा तथा इस के 
है मोक्ष ओर भेग ॥२१॥ इस संसार 

/ कपौरमकः 


पुष्पफले प्रषलते ॥२१॥ के दो बीज है पाप ओर पुण्य । असंख्य वासना 

जडं है ओर तीन गुण तने दहै । पाँच मूत इसकी 

= मोटी-मोदी प्रषान शाखा हँ ओर शब्दादि पाच विषय रस्‌ 

५ ७५१ नाऽ ¦ ह, ग्यारह इन्दिय शाखा है तथा जीव ओर ईशर--दो 

पक्षी इसमे ्घोसला बनाकर निवास करते हं । इस्‌ 

| वृक्षम वात, पित्त ओर कफख्थ तीन तरइकी छलं 

है। इसमे दो तरकष्के फक च्गते है -घुख ओर 

दशेकल्चासलो दिरुपणंनीड- दुःख । यह विरा दृष सूरयमण्डकतक पौ इभा है (इस 

सूर्थमण्डल्का भेदन कर जानेवाले सुक्तं पुरुष रिरि 

रलो ९ च्रविश्ः संसार-चक्रमे नही पडते ) ॥ २२ ॥ जो गृहस्थ उष्द्‌- 

खिवस्कलो द्विफरोऽकं प्रविष्टः ।॥२२॥ व ५ ग. 

| =: - हृए होनेके कारण गरीषके समान दै । वे इस बृ्षका 
. अदन्ति चकं फरमख गप्रा | दुःखलूप प भेगते है; क्योिः.वे अनेकं प्रकारके ` 

° अ | केविं बन्धनम फंसे रहते है । जो अरण्यवासी परभ 

` ` ग्रामेवरा एकमरण्यवासाः । यसि विरक्त है, वे इस इषम राजसे समान हे 
~ ` | जरे इसका रूप फल मगते हे । प्रिय उद्व \ ` 
हसा य एवं बहरूपभिन्ये- ` | बसव तै एक दी ह ! यह मे जो अनेकों प्रकारका * 
` | ख्य है, वह तो. केवर मायामय दै । जो इस बातक्े 

यामयं चेद घ वेद चेदम्‌ ५२३ । यरि दए सम स्ता दै, वदी वास्तवम्‌ समस्त 
भण्सन्क्ष० २, ९ . | 


+नः ४ 


पञ्चस्कन्धः पश्चरसरघ्ूतिः। 





। उ क $ - ष्ट 
"ऋ । 9 ई भल च { ~न १ (५ {ण 4 





= श्रीमद्कागवत [ अ० १२ 








एवं गुरूपासनयेकभक्त्या वेदोका रहस्य जानता है ॥ २२ ॥ अतः उद्धव | 
तुभ इस प्रकार ॒गुरुदेक्की उपासनारूप अनन्य भक्तिके 

विदयाङ्कडारेण रतेन धीरः। द्वारा अपने ज्ञानी ठुददाडीको तीखी कर टो ओर 
उसके द्वारा धैय एवं सावधानीसे जीवभावको काट 


बिब्क्च्य जीवाञ्चयमप्रमत्तः डालो | फिर परमात्मखसख्प होकर उस वृत्तिखूप अर्ञो- 
| को भी छोड दो ओर अपने अखण्ड खरूपे ही सित 
। सम्पद्य चात्मानमथ त्यजाञ्चम्‌ ॥२४॥ दहो रहो ॥ २४ ॥# 
-्््नर9अ्ड्््् 


इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे 
दादसोऽध्यायः ॥ १२ ॥ 





अथ जयोदशोऽध्यायः 


हंखरूपसे सनकादिको दिये हप उपदेदाका वर्णन 





(=+ श्रीभगवानुवाच | भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते है--ग्रिय उद्धव ! सक्छ, 
ह र | रज ओर तम--ये तीनों बुद्धि ( प्रकृति) के गुण 
स्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धन चात्मनः । । हे, आत्मके नहीं | सत्ते द्वारा रज ओर तम--इन 


¶ ~" ककः क ऋ = 


| दो गुर्णोपर विजय प्राप्त कर लेनी चाये । तदनन्तर 
१ सच्वेनान्यतमो हन्यात्‌ सं सरवेन चैव हि १॥ | सत्वगुणकी शान्तद्ृत्तिके द्वारा उसकी दया आदि 
क  वृत्तिर्योको भी शान्त कर देना चाहिये ॥ १ ॥ जवर 
(€ > {~ । | सच्वगुणकी बृद्धि होती है, तभी जीवको मेरे भक्तिरूप 
५ (दत्‌ सा ग्ध र्णः | । खधर्मकी प्राति होती है । निरन्तर साच्िक वस्तुओंका 
= प वरति | सेवन करनेसे ही सत्वगुणकी ब्द्धि होती है ओर तव 
सालिक्नोपासया स्वं ततो धमः प्रवतंते ॥ २ ॥ | भरे भक्तिरप खर्म रहति होने लगती है ॥ २ ॥ 
4 8 जिस धर्मके पाठ्नसे सत्वगुणकी इद्धि हो, वही सवसे 
जक , भमा रजस्तमा हन्यात्‌ सन्वद्द्िरदत्तमः । ष्ठ है । वह धमं रजोगुण ओर तमोगुणको नष्ट 
` उ 4 कर देता है| जव वे दोनों न्ट हो जाति है तब 
आश नस्यति तन्प्रलो ध्यधमे उभये हते ॥ ३ ॥ | उन्हीके कारण होनेवाखा अधमं भी शीघ्र ही मिट जाता 
[> ~ ~. है ॥ २ ॥ शाख, जठ, प्रजाजन, देशा, समय, क्म, 

। _ आगमोऽपः भरना देशः कालः कम च जन्म च । । ना देशः कालः कम च जन्म च । । जन्म ध्यान, मन्त्र शर संस्का--ये दरा वसत यदि 
(भ ईश्वर अपनी मायाके द्वारा प्रपञ्चरूपले प्रतीत हो रहा ई । इस प्रपञ्चे अध्यासे कारण ही जीवको अनादि 
अविद्या कतपन आदिकी भरन्ति होती दै । फिर यह करो, यह मत करोः इस प्रकारके विधि-निषेधका अधिकार 
= 9 द्धिके व्यि कमं करोः यह वात कदी जाती है। जब्र अन्तःकरण शुद्ध हो जाता 
न ज मिटानेके लि यह बात कही जाती है कि मक्तिम विक्षेप ॐरनेवाे कमोकि प्रति 
ह _ ` इद श्वास भजन करो | तत्लान हो जानेपर कुछ भी कलत॑म्य रोष नहीं रह जाता । यही 


भसङ्गका अभिप्राय हे | 








अ° १३ | 


एकादश स्कन्ध 


५७८७ 








ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्काणे दशते गुणहेत्रः ॥ ४! | साखिक हों तो सत्वगुणकी, राजसिक हो तो रजोगुणकी 


तत्तत्‌ साचिकरमेषेषां यद्‌ यद्‌ बद्धाः प्रचक्षते । 
निन्दन्ति तामं तत्तद्‌ राजसं तदुपेक्षितम्‌ । ५॥ 
सारिविकान्येव सेत्ेत पुमान्‌ सखविच्रद्धये । 
ततो धमस्ततो ज्ञानं यावत्‌ स्मृतिरपोहंनम्‌ ॥ ६ ॥ 
वेणसंर्षजो बहिरदग्ध्वा शाम्यति तदनम्‌ । 


एव गुणव्यस्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः ॥ ७ ॥ 


उद्धव उवाच 


विदन्ति मर्था; प्रायेण विषयान्‌ पदमापदाम्‌ । 


तथापि अुञ्ञते कृष्ण तत्‌ कथं श्वखराजवत्‌ ॥ ८ ॥ 


श्रीमगवानुवाच 
अहमित्यन्यथाबुद्धिः प्रमत्तश्च यथा हृदि । 
उत्सपंति रजो घोरं ततो वैकारिङं मनः ॥ ९॥ 
रजोयुक्तख मनक्तः संकरपः सविकस्पकः । 
) गुणध्यानाद्‌ दुस्पह्‌ःस्याद्वि दुमेतेः 1१०) 


करोति कामवशगः कशण्यविजितेन्दरियः 


¦ खोद कणि सम्पर्यस्‌ रजोवेगधिमोदितः ॥११॥ । 





ओर तामसिक हो तो तमोगुणकी वृद्धि करती है॥ ४॥ 
इनमेसे शाखज्ञ महात्मा जिनकी प्रशंसा करतेर्है, वे साचिक 
है, जिनक्री निन्दा करते है, वे तामसिक हैँ ओर जिनकी 
उपेक्षा करते है, वे वस्तुएं राजसिक दै ॥. ५ ॥ जव- 
तक अपने आत्माका साक्षात्कार तथा स्थूल-सुक्ष्म 
शरीर ओर उनके कारण तीनों गुणोकी निवृत्ति 
न हो, तत्रतक्र मनुष्यको चाहिये किं सचगुणकी 
बृद्धिके च्म साच्तिक शाच् आदिका ही सेवन करे; 
क्योकि उससे धमकी बृद्धि होती है ओर धर्मी 
बरद्धिसे अन्तःकरण शद्ध होकर आत्मतच्वका ज्ञान होता 
है ॥ ६ ॥ बोँसोकी रगड़से आग पैदा होती है ओर वह 
उनके सारे वनको जल्रकर शन्त हो जाती है | वैसे 
ही यह शारीर गुणोके वैषम्यसे उत्पन इ दहै । 
विचारद्यारा मन्थन करनेपर इससे ज्ञानागनि प्रज्रिति 
होती है ओर वह समस्त शारीरो एवं गुणोको भस्म 
करके खयं भी खान्त हो जाती है ॥ ७ ॥ 

उद्धवजीने पूा-भगवन्‌ ! प्रायः सभी मनुष्य 
इस बातको जानते है किं विषय विपत्तियोके धर है; 
फिर भी वे कुत्ते, गधे ओर बकरेके समान दुःख सहन 
करके भी उन्हीको ही भोगते रहते है । इसका क्या 
कारण है १॥ ८॥ 

भगवान्‌ श्रीरकृष्णने कहा-प्रिय उद्धव ! जीव 
जव अज्ञानवरा अपने खद्पको भूकर इदयसे सुक्ष्म- 
स्थूलदि रारीरोमे अहंयुद्धि कर वैठता है--जो कि 








सवथा श्रम ही है-- तब उसका स्छप्रधान मन घोर 


रजोगुणक्री ओर ञ्क जाता है, उपे व्याप्त ह्यो जाता 
है ॥ ९ ॥. बस; जहौ मनम रजोगुणकी प्रधानता इई 
किं उसमे संकल्प-विकल्पोका तता वैष जाता दहै। 


अब वह विषयोका चिन्तन करने लगता है ओर अपनी 


दुबद्धिके कारण कामके फदेमे पस जातां है, जिससे 
फर्‌ छुटकारा होना बहत दी कठिन दहै ॥ १० ॥ 
अव वह अज्ञानी कामवरा अनेकों प्रकारके कमं करने 


लगता है ओर इन्द्ियोके वडा होकर, यह जानकर भी क 


किं इन कर्माका अन्तिम फल दुःख ही है, उन्ींको 
करता है । उस समय ~ तः ॥९६॥ ! करता है । उस समय वह रजोगुणके तीव्र वेगसे अयन्त तीव्र वेगसे अव्यन्त 


७८ € श्रीसद्धागबत [ अ० १३ 
=-= 
रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान्‌ विक्षिप्तभीः पुनः । मोहित रहता है ॥ ११ ॥ यपि विवेकी पुरुषका चित्त 
भी कभी-कभी रजोगुण ओर तमोगुणके वेगसे विक्षिप्त 
होता है, तथापिं उसकी विषयमे दोषदृष्टि बनी रहती 
है; इसव्ि वह वड़ी साव्रधानीसे अपने चित्तको एकप्र 
करनेकी चेष्टा करता रहता है, जिसे उसकी विषयोमिं 
आसक्ति नहीं होती ॥ १२ ॥ साधकको चाहिये कि 
आसन ओर प्राणवायुपर विजय प्राप्त कर अपनी राक्ति 
ओर समयके अनुसार वड़ी सावधानीसे धीरे धीरे सुमे 
अपना मन ल्गावे ओर इस प्रकार अभ्यास करते समय 
अपनी असफलता देखकर तनिक भी उवे नही, बल्कि 
ओर भी उत्साहसे उसीमे जुड़ जाय ॥ १३ ॥ प्रिय 
उद्धव | मेरे शिष्य सनकादि परमर्धियोने योगा यही 
खर्प बताया है कि साधक्र अपने मनको सव ओर- 
से खींचकर विराट्‌ आदिमे नहीं साक्षात्‌ मुक्षमे ही 
पूणंरूपसे व्गा दँ ॥ १४ ॥ 

उद्धवजीने कदा--श्रीकृष्म ! आपने जिस समय 
जिस ॒खूपरसे, सनकादि परमर्षियोको योगका अआदेदां 
दिया था, उस रूपक मै जानना चाहता हँ ॥ १५ ॥ 

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--ग्रिय उद्धव ! सनकादि 
ब्रह्माजीके मानक पुत्र है | उन्ष्ठौने एक बार 
अपने पितासे योगकी सुक्ष्म अन्तिम सीमाके सम्बन्धमें 
इस प्रकार प्रन किया था | १६॥ 

सनकादि परमर्षियोने परखा--पिताजी ! चित्त 
गुणों अर्थात्‌ विषयो घुसा ही रहता है ओर गुण भी 
चित्तकी एक-एक वृत्तिम प्रविष्ट रहते ही हैँ । अर्थात्‌ 
चित्त ओर गुण आपसमे मिले-ज॒>े ही रहते हैँ । देसी 
स्थितिमे जो पुरुष इस संपारसागरसे पार होकर सुक्ति- 
पद्‌ प्राप्त करना चाहता है, वह इन दोनोंको एक 
दूसरेसे अल्ग कंसे कर सकता है १ ॥ १७ ॥ 

भगवान्‌ श्रीरृष्ण कहते है--प्रिय उद्धव | यपि 
ब्रह्माजी सव॒ देवताओके रिरोमणि, ` खयम्भू ओर 
प्राणियोके जन्मदाता हैँ । फिर भी सनकादि परमर्पियोके 
इस प्रकार पूञनेपरं ध्यान करके भी वे इस प्रदनका 












अतन्द्रितो मनो युज्ञन्‌ दोषदृ्टिनं सञ्जते ।\१२॥ 
अप्रमत्तोऽलुयुज्ञीत मनो मथ्यर्पयज्छनैः | 
अनिविण्णो यथाकालं जितश्वासो जितासनः \\१३॥ 


शतावान्‌ योग आदिष्टो मच्छिष्येः सनकादिभिः। 


सवेतो मन आश्कष्य मय्यद्वाऽऽवेश्यते यथा ! १४। 


7) ` 
4 शिः 


उद्धत उवाच 
य॒इा त सनकादिभ्यो येन सूपेभं केराव । 
योगमादिष्वानेतद्‌ सूपमिच्छामि वेदितुम्‌ ।१५॥ 
श्रीभगवानुब्ाच 
त्रा हिरण्गभेसख मानसाः सनक्रादयः | 
पश्रच्छुः पितरं ह्म योगस्ये कान्तिं गतिम्‌ ।१६। 


सनकादय ऊचुः 


शुणव्वत्रिरते चेतो युणाथेतसि च प्रभो । 


» ` = 
र. न 
+^ , 
ू 


¦  कथमन्थोन्यक््यागो धु्ोरतितितीर्पोः ।१७॥ 


| 4 श्रीभगवानुवाच 







एवं प्ष्टो महादेवः खप्रभूभभूतमावनः | 


धराय न नः परशचवीजं नास्यप्यत कर्मधीः ॥१८॥ मूलकारण न समञ्च सके; क्थोकि उनकी बुद्धि कर्म. 


~~ ~ 
य ~ग च 7 अ 
"नङ्क न्द्‌ व (६ 


„ यथाक्रम तीया 1 


च क नव ~ क । 
क प 








"ब्र 





अ० १३ | 


एकादश्न स्कन्ध 


७८९ 





ॐ न~~ ~~~ ~~~ ~ - 





स मामचिन्तयद्‌ दैवः प्रभपारतितीषंया । 
तखाहं दहंकूपेण सकाशचमगमं तद्‌ ॥१९॥ 
दष्ट्वा मां त उपव्रज्य कता पादाभिवन्दनम्‌ । 


ब्रह्माणपग्रतः करत्वा पप्रच्छुः को भवानिति 11२०1] 


इत्यहं निभिः परष्टस्तत्वजिज्ञासुभिस्तदा । 


यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे।॥२१॥ 


वस्तुनो अद्यनानास्वमात्मनः प्रन ईदशः । 
कथं घटेत वो विप्रा वक्तवा मे क आश्रयः \\२२॥ 


पञ्चात्सङ्केषु भूतेषु सप्रानेपु च वस्तुतः; । 
को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो हयनर्थकः।।२३। 
मनसा वयक्ता दशया गृ्यतेऽन्येरपीन्दरियेः। 


अहमेव न सत्तोऽन्ष्दिति बुध्यष्वभ्रज्सा ॥२४)) 
गुणेष्वायिश्रते चेऽ गुणाशथेतसि च प्रजाः | 
जीबश्य देह उभयं गुणाश्चेतो सदात्मनः ।(२५॥ 
गुणेषु चाविराचित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया 1. 
गुणाश्च चित्तभ्रभवा सद्रूप उभयं त्यजेत्‌ ॥२६॥ 
जाग्रत्‌ खप्नः सुप्तं च गुणतो बुद्धित्तयः । 


| २७) 







तासां विरखक्षणा जीवः साशित्वेन्‌ ५ 


प्ररण शी] १८॥ उद्भव | उस समय ब्रह्माजीने इस्‌ 
प्रशनका उत्तर देनेके य्यि भक्ति-भावसे मेरा चिन्तन 
किया ] तवर मैं हंसका ख्य धारण करके उनके सामने 
प्रकट इञ ॥ १९ ॥ सुश्ने देखकर सनकादि ब्रह्माजी- 
को आगे करके मेरे पास आये ओर उन्होने मेरे 
चरणोकी बन्दना करके मुञ्चसे परछा कि (अप कीन 
हैँ १ ॥ २० ॥ प्रिय उद्भव ! सनकादि परमाथंतच्के- 
जिज्ञासु ये; इसब्ियि उनके पूछनेपर उश्च समय मेने जो 
कुछ कहा वह तुम मुक्चसे सुनो -॥ २१ ॥ ब्राह्मणो ' 
यदि परमार्थखूप वस्तु नानात्वसे सवथा रहित है, तव 
आत्माके सम्बन्धे आप लोर्गोका रेसा प्रन कैसे युक्ति- 
संगत हौ सकता है १ अथवा मँ यदि उत्तर देनेके 
व्यि वो मी तो किंस जाति, गुण, त्रिया ओर सम्बन्ध 


आदिका आश्रय लेकर उत्त दूँ १॥ २२ ॥ देवता? 
मनुष्य, पद्यु, पक्षी आदि सभी शरीर पच्चभूतात्क 


होनेके कारण अमिन ही दहै ओर परमाथख्यसे भी 
अभिन हैँ । पेषी सतिम (आप कौन हैँ ! आप ठोर्गोका 
ह प्ररन ही केवल वाणीका व्यवहार है } विचारपूैक 
नहीं है, अतः निरथंक है ॥ २३ ॥ मनसे, वाणीसे 
दृष्टिसे तथा अन्य इन्दियोसे श्र जो कुछ ग्रहण क्रिया 
जाता दहै, वह सव मै ही हँ मुञ्जसे भिन ओर कुछ 
नहीं है । यह सिद्धान्त आप लोग तत्वविचारके द्वारा 
समञ्च लीजिये ॥ २४ ॥ पुत्रो ! यह चित्त चिन्तन 


करते-करते विषयाकार हो जाता है ओर विषय चित्तम ` 
्र्रि्ट हो जते है, यह वात सत्य है, तथापि विषय 
ओर चित्त ये दोनों दी मेरे खखूपमूत जीषके 
देह है उपाधि दहै । अर्थात्‌ आत्माका चित्त ओर ` 


विषयवे साथ को$ सम्बन्ध ही नहीं है\॥ २५1. 


इसष्िये बार-बार विर्योका सेवन करते रहनेसे जो चित्त 


विषयमे आसक्त हो गया है ओर विषय भी चित्तमे ¦ 


प्रविष्ट हो गये है, इन दोनोक्तो अपने वास्तविकसे 





धमिन मुञ्च परमात्माका साक्षात्कार क्के व्याग देना 


चहिये | २६ । जाग्रत्‌, खमप्न ओर खुटपि--ये तीनां 
अवरश्थाँ सादि गु्णोके अनुसार होती दँ ओर बु द्विकी 


वृत्तिर्या है, सचिदानन्दका स्वभाव नहीं । इन इृत्तिपों 
का सश्वी होनेके कारण जीव उनके विलक्षण है ¦ यह 


\9 के 
(५) 


अः नर ङः ~ द. 
् क ४८ च न ॐ चके 
4 ५ 


सिद्धान्त रति, युक्ति ओर अलुभतिसे युक्त है ॥ 





ट | 4 ह भीमदभागबत ४ 


यंहि संयृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणबृत्तिदः। क्योकि बुद्धि-इृत्तियोकि द्वारा होनेवात्म यह बन्धन ही 
नद आत्मामें त्रिगुणमयी इत्तिर्योका दान करता है । इसव्वि 
तीनों अवस्थाओंसे विलक्षण ओर उनम अनुगत मुञ्च 
मयि तुयं सितो ज्यात्‌ त्यागस्तद्‌ गुणचेतसाम्‌॥ २ ||| तुरीय तत्त्वम सित होकर इस बुद्धिके बन्धनका 
पतत्याग कर दे | तब विषय ओर चित्त दोनोका युगपत्‌ 
त्याग हो जाता है ॥ २८ ॥ यह बन्धन अहंकारकी 
ही रचना दै ओर यदी आत्माके परिपूर्णतम सत्य, 
अखण्डज्ञान ओर परमानन्दखखूपको छिपा देता है । इस 
नातको जानकर विरक्त हो जाय ओर अपने तीन 
अवरध्याओंमे अनुगत ॒तुरीयखल्पम होकर संसारकी 
चिन्ताको छोड़ दे ॥ २९ ॥ जबतक पुरुषकी भिन-मिन्न 
पदाथमिं सत्यत्वबुद्धि, अबुद्धि ओर ममबुद्धि युक्तिर्योके 
द्वारा निदत्त नहीं हो जाती, तवतक वह अज्ञानी यद्यपि 
जागता है तथापि सोता हृआ-सा रहता है- जैसे 
खभ्नावस्थामे जान पड़ता है किं मँ जाग रहा 
दं ॥ ३० ॥ आत्मासे अन्य देह आदि प्रतीयमान नाम- 
रूपात्मकं प्रपञ्चक कुछ भी अस्तित्व नहीं है । इसव्यि 
उनके कारण होनेवाले वर्णाश्रमादि भेद, खर्गादि फल 
ह ओर उनके कारणभूत कर्म--ये सव-के-सव इस आत्मके 
` गया देतवश्च।स्य मृषा खप्नद्शो यथा ॥२१॥ | व्यि वैते ही मिथ्या है; जसे खम्नदरीं पुरुषके द्वारा 
= देखे हए सव-केसव पदाय ॥ ३१ ॥ __ 

जागरे बहिरचुक्षणधर्मिंणोऽर्थान्‌ जो जाम्रत्‌-अवस्थामं समस्त इन्द्रियाके द्वारा बाहर 
कः ` दीषनेवि सम्पण क्षणभङ्गुर पदार्थोको अनुभव्र करता है 
ह ओर ख्नावध्ामे हृदयम ही जाग्रते देखे हए पदा्थोकि 
धङ्क समस्तकरणेहंदि तत्सदक्षान्‌ । समान ही वासनामय विषरयोका अनुभव करता है ओर 

सुषुति-अवस्थामे उन सब ॒वषिषयोंको समेटकर उनके 
ख्यको भी अनुभव करता है, वह एक ही दहै । जाग्रत्‌- 

अविस्थके इन्दिय, ख^नावश्याके मन ओर सुधु्िकी 

सस्कारवती बुद्धिका भी वही खामी है; क्योकि वह 

तरिगुणमयी तीनों अवस्थाओंका साक्षी है । "जिस मैने 

| खप्न देखा, जो में सोया, वही में जाग रहा "इस 

स्मृतिके बट्पर एक ही आतमाका समस्त अवस्थाओमें 

होना सिद्ध हो जाता है॥ २२ ॥ फेसा विच।रकर्‌ मन- 

की ये तीनों अवस्था गुणेकि द्वारा मेरी मायासे भेर 

| अशखरूप जीवमे कल्पित की गयी कै ओर आत्मामं ये 


कः 










( अहंकारङृतं बन्धमात्मनोऽथंतिपर्ययम्‌ । 


^ >~, ००/59 


र 


नि 


विद्यान्‌ निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थतस्त्यजेत्‌।२९। 







करै 





' यवन्नानाथंभीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिमिः। 







 जापत्यंपि स्वंपन्ज्ञः खण्ने जागरणं यथा ॥३०॥ 






। असत्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा । 









> 


खघ्ने सुपु! उपसंहरते स॒ एकः 










ङ्य शुणतो मनसस्यसथा 






" - नीम 





४ ए 
४ 


न्मा या यि 


पे 













श्िंतार्थाः। 6 
प ~: | ४. स्थाम्‌ । ५ , § ४४] = 
१. यो हि । २. स्वप्नयुक्तः । ३. 1ककत (= ~ त = 


9. 4 
क 
(4 


कि 







` ग व 
कक १ क 
व - 
# ¢^ ह 
क ~ क र, 











पि 


~ अ, 
# (तन 


अ० १३ | एफादन्च स्कन्ध ७९१ 














संछिद्य हाद॑मनुमानसदुक्तितीकष्ण- | नितान्त अमव्य है, सा निश्चय करके तुमलोग 

| अनुमान, सत्पुहपोद्रारा किये गये उपनिप्रदोके श्रवण 

| ओर तीक्षण ज्ञान-खङ्गके द्वारा सक्रढ संरायोके अधार 

ज्ञानातिना भजत माखिलसंशयाधिम्‌ ॥३३। । अहंकारका छेदन करके हृदयम स्थित सुञ्च परमात्माका 
भजन करो ॥ ३२ ॥ 


ईक्षेत विश्रममिदं मनसो विरसं यह जगत्‌ मनका विस है, दीखनेषर भी नष्ट- 


दृष्टं विनष्टमतिलोलमरातचक्रमू । प्राय है, अलातचक्र ( टुकारिर्योकी बनेटी ) के समान 
-. विभाति । अत्यन्त चञ्चल है ओर भ्रममात्र दै-रेसा समञ्च । 
विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया द 7 


ज्ञाता ओर ज्ञेयके मेदसे रदित एक ज्ञानखलूप आत्मा 
॥२४॥ | ही अनेकसा प्रतीत हो रहा है । यह स्थूल शरीर 
| इन्द्रिय ओर अन्तःकरणरूप तीन प्रकारका विकल्प 
| गुणेकि परिणामकी रचना है ओर खप्नके समान माया- 
का लेल है, अज्ञानसे कल्पित है ॥ २० ॥ इसव्यि 
| उस्‌ देहादिरूप इश्यसे दृष्टि हटाकर तृष्णारहित इन्दियेकि ` 
| व्यापारसे बीन ओर निरीह होकर आत्मानन्दके अनुभवे 
| मान हो जाय । यद्यपि कभी-कभी आहार आदिके 
। समय यह देहादिक प्रपञ्च देखनेमे आता है, तथापि 
त्यक्तं ्रमायन भवेत्‌ स्मृतिरानिपातात्‌। २५ | यह पह ही आत्मवस्तुसे अतिरि ओर मिथ्या 
। समक्षकर छोड़ा जा चुका है । इसव्थियि वह पुनः 
| श्रान्तिमू्क मोद उन्न करनेमे समथं नहीं हो सकता । 
। देहपातपयन्त केवर संस्कारमात्र उसकी प्रतीति होती 
। है ॥ २५ ॥ जसे मदिरा पीकर उन्मत्त पुरुष यह्‌ 
। नही देखता किं मेरे द्वारा पहना इभा वख शरीरपर है 
देवादपेतयुत देववश्ादुपेतं | या गिर गया, वैसे ही सिद्ध पुरुष जिस शरीरसे उसने 
| अपने खूपका साक्षात्कार किया दै, वह प्रारन्धवा 
वासा यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥३६॥ | खड़ा है, बैठा है या दैववरा कहीं गया या आया है-- 
नश्वर उारीरसम्बन्धी इन नार्तोपर्‌ दृष्टि नहीं डाक्ता ॥३६॥ 
प्राण ओर इन्द्योके साथ यह शरीर भी प्रारन्धके ` 
अधीन है । इसल्थिये अपने आरम्भक ( क्ननेवाले ) 
खारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः । कमं जबतक है, तबतक उनकी प्रतीक्षा करता ही 
रहता है । परंतु आत्मवस्तुका साक्षात्कार करनेवाखा 
तथा समाधिपयन्त योगम आख्द पुरुष जी, पुत्र, 


आदिः प्रपश्छके सहित उस शरीरको फिर कभी सखीकार 
खाप्नं पुनन भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥२७॥ । नदीं करता, अपना नही मानता, जैसे जगा इथ 


१. वि्ातमे° । २. त्यक्तुम्‌ । 


स्वप्नच्िधा गुणविसगंङृतो विकल्पः 
दृष्टं ततः प्रतिनिवत्यं निवृत्तव्ष्ण- 


स्तृष्णीं भवेन्निजसुखाुभवो निरीहः 


ह 


संदर्यते क च यदीदमवस्तुबुद्धया 


देहं च नश्वरमवस्थितयुत्थितं वा 


सिद्धो न पस्यति यतोऽध्यगमत्‌ खरूपम्‌ । 


देहोऽपि दैववशगः खल कमं यावत्‌ 


तं सप्रपश्चमधिषूटसमाधियोगः 


(= + < 


। 


। 


। 


| सुहृदं प्रियमात्मानं सास्यासङ्गादयोऽशुणाः ॥४०॥। 


७९९२ श्रीमद्भागवत [ अन १४ 





मये तदुक्तं बो विप्रा गुद्यं यत्‌ सांख्ययोगयोः! । परुष खप्नावस्थाके शरीर आदिको ॥ २७ ॥ सनकादि 
| । ऋष्रियो ! मेने तुमसे जो कुछ कहा &ै, वह सास्य 
जानीत समागतं यज्ञं॒युप्मद्र्मबिवक्या ॥\३८॥। | ओर योग दोनोका गोपनीय रसय दै । मै खयं भगवान्‌ 
› तुमलोगोको तच्छज्ञानका उपदेश करनेके च्वि ही 
| यहा आया द पेसा समञ्नो ॥ ३८ ॥ विप्रवरो ! मँ 
| योग, सांख्य, सत्य, ऋत ८ मधुरभाषण ), तेज, श्री, 
~ _ हः कीतिं ओर दम ८ इन्द्रियनिग्रह ) इन सवकी परम 
प्रायण हजश्रष्ठाः ल्यः कीतदेमख च ।२९॥ | गति- प्रम अधिष्ठान रै |॥ ३२ ॥ में समस्त गुणोंसे 
रहित द्र ओर किसीकी अपेश्ना नीं रखता । फिरि मी 
मां भजन्ति गुणाः सर्वे निशुंणं निरपेक्षकम्‌ । साम्य, असङ्गता आदि सभी गुण मेरा ही सेवन करते है, 
| सुञ्चमे ही प्रतिष्ठित है; क्योकि मे सवका हितेषी सुद्‌, 
प्रियतम ओर आत्मा ह्व |। सच प्री; तो उन्हं गुण 
कहना भी ठीक नहीं है; क्योकि वे स्वादि गुणक 
परिणाम नहीं हँ ओर नित्य हँ ॥ ४० ॥ 











अहं योगस्य सांख्यस्य सत्यस्यतंस्य तेजक्तः । 


` इति मे छिन्नसन्देहा नयः सनकादयः , | 0 सनकादि दुनिया 


४१ | षंशय भिय दिये । उन्होने परम भक्तिसे मेरी पूजा की 
। ओर स्तुतिर्या मेरी महिमाका गन किया ॥ ४१ ॥ 
तेरहं पूजितः सम्यक संस्तुतः परमर्षिभिः । । जवर उन परमर्धियोने भीर्मौति मेरी पूजा ओर स्तुति 


| | कृर्‌ टी, तब में ब्रह्माजीके सामने ही अद्दय होकर अपने 


सभाजयित्वा एरया भक्त्याग्रणत संस्तवः 





| + | ^  भ्र॑त्येयाय खक धाम पर्यतः परञष्ठिनः ॥४२॥ धाममे ठट आया ॥ ४२ ॥ 


न्फ 11 






। 
॥ 


इति श्रीमद्धागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहिंतायामेकाद स्कन्धे 
त्रयोदयोऽव्यायः | १३ ॥ 


~ "नर --र-----~ 
© तो ६ 
अथ चतुरा व्ययः 
भक्तियोगक्छी महिमा तथा ध्यानविधिक्रा वणेन 


। | + 
उद्धव उवाच ` उद्धवजीने पृडा--श्रीकृष्ण ! ब्रह्मवारी महात्मा 


च ह: वदन्ति ङष्ण शरेयांहि बहूनि वादिन; । । आत्मकल्याणके अनेकों साधन वतवते है । उनमें अपनी- 


| बति अपनी दष्टिके अनुसार समी शे है अथवा किसी एककी 
तेषां विकल्यप्राधान्यघताही एकस्यता ॥ १ ॥  प्रभानता है १ ॥ १ ॥ेरे खामी ! आपने तो अभी-अभी 


8२ ^ भक्तियोगको ही निरपेक्ष एवं खतन्त्र साधन बतटाया 
तिरख सर्वतः सङ्गं येन त्वय्याविशेन्मनः ॥ २ ॥ ' आपये दी तन्मय हो जाता है ॥ २॥ 
१, प्रतीयाय । क ल ----------- 





44. 





। ॥, ऋ क 3 
 „ "4 न्क ज 


अ> १४ | 





एकादश्च स्कन्ध 


७९२ 


ता 
=-= न 





श्रीभगवानुवाच 


कालेन नष्ट प्रञ्ये वाणीयं वेदसंज्ञिता । 


मयाऽऽदौ बह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां सदात्मकः।२॥। 
तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे परवेजाय सा 
ततो भृग्वादयोऽगृह्णन्‌ सप्त॒ बहामहषेयः ॥ ४ ॥ 
तेभ्यः पितरभ्यस्ततपुत्रा देवदानवगुद्यकाः , 
मनुष्या; सिद्धगन्धवाः सविद्याधरचारणाः ॥ ५॥ 
क्रिदेवाः किंनरा नागा रक्षः किम्पुरुषादयः । 
बह्यर्रेषां प्रकृतयो रजः सच्वतमोुवः ।। ६ । 
योभिभूतानि भिचन्ते भरतानां मतयस्तथा | 
यथाग्रङ्ृति सर्वेषां चित्रा वाचः स्रवन्ति हि ॥ ७॥ 
एवं प्रकृतिबेचत्ाद्‌ भिथ्रन्ते मतयो सृणाम्‌। 
पारम्पर्येण केषाश्ित्‌ पाछण्डमतयोऽपरे । ८ ॥ 
मन्मायामोहितधियः पुरुपाः पुरुप्षभ । 
श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकमं यथाशचि ॥ ९॥ 


धर्ममेके यशशान्ये कामं सत्यं दमं शमम्‌ । 


` अन्ये वदन्ति खाथं बो यं त्यागभोजनथ्‌॥।१०॥ 


केचिद्‌ यज्ञतपोदानं व्रतानि नियमान्‌ यमाम्‌ । 
१. ताभिः । २. वे। 


निवासी मनष्य । 









भगवान्‌ श्रीकृष्णने कदा-- प्रिय उद्धव ! यह वेद्‌- 
वाणी समयक्रे फेरसे प्रख्यके अवसरपर प्त हो गयी 
थी; फिर जवर सृष्टिका समय आया, तब मेने अपने 
संकल्पसे ही इसे ब्रह्माको उपदेश किया, इसमे मेर 
भागवतधर्म॑का ही वर्णन है| ३ ॥ ब्रह्माने अपने ज्येष्ठ 
पुत्र खायम्मुव मनुको उपदेडा किया ओर उनसे भृगु, 
अङ्खिरा, मरीचि, पुलह, अत्रि, पुलस्त्य ओर क्रतु--इन 
सात प्रजापति-महरषियोने ग्रहण किया ॥ % ॥ तदनन्तर्‌ 
इन ब्रहमर्धियोक। सन्तान देवता, दानव, गृद्यक, मनुष्य, 
सिद्ध, गन्धवं, विद्याधर, चारण, किन्देव# किरा, 
नाग, राक्षप्त ओर किम्पुरुष [ आदिने इसे अपने प्रज इन्दी 
ब्रहमर्षियोसे प्राप्त किया । सभी जातियों ओर व्यक्तियोके 
खमाव-उनकी वासनां सच, रज ओर तमोगुणके 
कारण भिन-भिन हैँ; इसव्ि उनम ओर उनकी बुद्धि- 
वृत्तियोमे भी अनेकों भेद दह । इसव्ि वे समी 
अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उस वेदवाशीका मिन- 
भिन्न अर्थ ्रहण करते हैँ । वह वाणी हं रेस अलकरिक 
है कि उससे विभिन्न अथं निकट्ना खामाविक ही 
है ॥ ५-७ ॥ इसी प्रकार खमभावभेद तथा परम्परागत 
उपदेराके मेदसे मनुष्योकी बुद्धिम भिनेता आ जाती है 
ओर कुछ लोग तो बिना किसी विचारके वेदविरुद् 
पाखण्डमतावल्म्भी हो जते है ॥ ८ ॥ प्रिय उद्धव ! 
सभीकी बुद्धि मेर। मायासे मोहित हो री है; इसीसे 
वे अपने-अपने कमे-संस्कार ओर अपनी-अपनी रुचिके 
अनुक्षार आत्मकल्याणके साधन भी एक नहीं अनेकों 
बतठाते है ॥ ९ ॥ पूरं मीमांसक धर्मको, साहित्याचायं 
यराको, कामशाञ्जी कामको, योगवेत्ता सत्य ओर शम- 
दमादिको, दण्डनीतिकार रेश्चयंको, त्यागी त्याग्को ओर 
लोकायतिक. भोगको ही मनुष्य-जीवनका खां - परम 
खाभ बताते है ॥ १० ॥ क्ेयोग जोग यज्ञ, तप, 
दान, त्रत तथा यम-नियम आदिको पुरुषाथं बतखाते 
दै । परंतु ये समी कमं है; इनके फल्खसरूप जो रोक 


नो 2 १ 





श्रम भोर स्वेदादि दुर्गन्धते रित होनेके कारण जिनके विषयमे ‹ये देवत। हैया मनुष्यः एेस। संदेह हो, बे द्वीपान्तर- 


मुख तथा शरीरकी आज्ृतिसे कु-कुछ मनुष्यकरे समान प्राणी । 
मान प्रतीत होनेबाडे बानरादि । 












[र -- --------------------- को, स आ काकः कोक कय जि करिका क केः %> = 





| पितो, ३ ६ मिकते है वे उत्पत्ति ओर नादावाले है । कर्मोका फक 
समाप्त ह्यो जानेपर उनसे दुःख ही मिल्ता है ओर 
सच पो, तो उनकी अन्तिम गति घोर अज्ञान ही 


आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कमेविनिर्भिताः । 





(8 ~ । है । उनसे जो छख मिलता है, वह तुच्छ है--नगण्य 
इक | है ओर वे स्क भोगके समय भी असूया आदि दोषोके 
| खोदकास्तमोनिषठाः श्द्रानन्दाः छंचापिंताः।१६। | कारण शोकसे परध है । ८ इतव्ि इन विभिन 
5 साघनोंके फेरे न पडना चाहिये ) ॥ ११ ॥ | 


॑ ६ प्रिय उद्धव | जो सब ओर निरपेक्ष-बेपरबाह 
मय्यपितात्मनः सभ्य निरपेक्षस्य सच॑त 
















1 हो गया है, किसी मी कमं या फ आदिक आवईयकता 
६, नहीं रखता ओर अपने अन्तःकरणको सब प्रकारसे 


चे ही समपित कर चुका है, परमानन्दखख्प मेँ उसकी 
आत्के ख्पमे सुरि होने वगता ह्र । इससे वह जिस 
६ सुखका अनुभव करता है, उह विषयो प्राणिर्याको 
अिचनख दान्तख शान्तस समचेतसः । किसी प्रकार मिल नहं सकता ॥ १२ ॥ जो सब 
ह प्रकारके संप्रह-पसपरहसे रित -अर्विचन है, जो 
/ मया संतुष्टमनसः सवाः सुखमया दिशः ॥१३॥ । अपनी इनदयोपर विजय प्राप्त करके शान्त ओर समदर्शी 
१. हो गया है, जो मेरी प्रापिसे ही मेरे सानिध्यका अनुभव 
न पारसेष्ठथं न महेन्द्रधिष्ण्यं । करके ही सदा-सर्वदा पूण संतोषका अनुमव्र करता है 

` | उसके च्वि आक्ाशाका एक-एक कोना. आनन्दसे भरा 
हआ है ॥ १३॥ जिप्नने अपनेको सुश्च सोप दिया 
है, वह सुश्च छोडकर न तो ब्रह्माका पद च।हता है ओर 


मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत्‌ तःस्ाद्‌ विषयात्मनाम्‌ १२ 


4 न सा्भौमं न रसाधिपत्यम्‌। | 


म , | = ^ ^, = 4 र 
न योगधिद्धीरशपुनभवं वा बननेफरी इच्छाहोती है ओर न वह खसे भी श्रेष्ठ 
रसातल्का दही खामी होना चाहता हैँ | वह योगकी 


मय्यपितात्मेच्छति मह विनान्यत्‌ ॥१४। बड़ी-वड़ी सिद्वियो आर मोक्षतककी अभिखा नही 
(क करता ॥ १४॥ उद्धव | मुञ्चे तुम्हारे-जैसे प्रेमी भक्त 
नते ध मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः जितने प्रियतम है, उतने प्रिय मेरे पुत्र ब्रह्मा, आत्मा 
` अ रशंकर, सगे माई वल्रामजी, खयं अधाङ्िनी सष्मीजी 
ओर मेरा अपना आत्मा भी नदीं है ॥ १५॥ जिसे 
किंसीकी अपेक्षा नह, जो जगतके चिन्तनसे सवथा 


गतं धि तः उपरत होकर भेरे ही मनन-चिष्तनमे तल्डीन रहता है 
पिरप ध. श्त संमदशनम्‌ ओर रागद्वेष न रखकर सबवे प्रति समान दृष्टि रखता 


| |, उस महात्माके पीछपीछे मै निरन्तर यह सोचकर 


# यह तितं पयेेत्यङ्पिरेणभिः ॥१६॥ | धूमा कता द कि उसके चरणोकी पूर उदक भेर 





~ 


= 3 


१ नूप ,॥ त (५ % ॐ न 


^ च ज अ+: 


श्रीमद्भागवतं | | अ ९ ् 





न देवराज इन्द्रका, उसके मनम न तो सावभौम सम्राट्‌ 








| 

| १ 

४1 
+ चि ॥ । । 

| 

६। 

॥ 






















` अ० १४1] एकादश स्कन्ध 


। उपर पड़ जाय ओर मै पक्त्र ही =-= व ज ॥ १६॥ जे ॥ १६॥ जो. 
तव प्रकारके संगरह-पसिहसे रदित है -य्होतक रि 
आदिम भी अहंता-ममता नही रखते, जिनका 
चित्त मेरे ही प्रेमके रंगे रग गया है, जो संसार्की | 
वासनाओंसे शान्त--उपरत हो चके है ओर 
अपनी-महत्ता-उदारताके कारण खभावसे ही समस्त 
| प्राणियेके प्रति दया ओर प्रेमा भाव रखते ढै, किंसी ` 
प्रकारकी कामना जिनकी बुद्धिका स्पदां नहीं कर पाती 
उन्हें मेरे जिस ॒परमानन्दखरूपका अनुमव होता है, 
उसे ओर कोई नी जान सकता, क्योकि वहन परमानन्द 
तो केवर निरपेक्षतासे ही प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ 


उद्धवजी ! मेरा जो भक्त कमी जितेन्द्रिय नहीं ह 
सका है ओर संसारके विषय बार-बार उसे बाधा पटंचति | 
रहते है अपनी ओर खीच च्या करते हे, वहभी ` ४ | । 
| क्षण-क्षणसे बढनेवाली मेरी प्रगस्म भक्तिके प्रमावसे प्रायः ` ` 
बिषयोँसे पराजित नही होता 1 १८॥ उद्भव ! जेसे धधकती 
इई आग ल्कडर्योके बड़े ठेरको भी जलाकर खाक करं 
देती है, वैसे ही मेरी भक्ति भी समस्त पापरारिको ` 
पूर्णतया ज्म डाक्ती है ॥ १९ ॥ उद्भव ! योग- _ ` 
साधनः ज्ञान-निज्ञान, धर्मानुष्ठान, जप-पाठ ओर तप-त्याग ॥ 
सने प्राप्त करानेम उतने समथं नहं है, जितनी दिर्न- ` क ः 
दिन बदनेवाी अनन्य प्रेममयी मेरी भक्ति ॥ २० ॥ 
म संतोका प्रियतम आत्मा द, म अनन्य श्रद्धा ओर कः । ्ः 
अनन्य भक्तिसे ही पकड्मे आता द । मु प्राप्त करनेका ` । 
यह एक दी उपाय है । मेरी अनन्य भक्ति उन लोर्गोको ` ` 
भी पवित्र--जातिदोषसे सयुक्त क्र देती दहै, जो ध 
जन्मसे ही चाण्डाल ह | २१ ॥ इसके विपरीत जो मेरी 
भक्तिसे वद्चित है, उनके चित्तको सत्य ओर दयासे युक्त 
धमं ओर तपस्यासे युक्त विया भी माति पु पक्र 
कएनेमं असमथं है ॥ २२.1 जबतक सारा शरीर पुकि 
नहीं हो जाता, चित्त पि य गद्गद नहीं हो जाता, 

नन्दके ओँसू ओंखसे -नषीं चमत तथा अन्त- 
दिरङ्ग भक्तिवी बादमं चित्त इबने-उतर 
ह क ` लगता, तब तका इसके शद्ध हानेको - कोड सम्भावना 





निष्किचना मय्युरक्तचेतसः 





शान्ता महान्तोऽखिलजीववस्छलाः । 
कामेरनालन्धधियो जुषन्ति यत्‌ 


तन्नैरपेकष्यं न विदुः सुखं मम ॥१७॥ 


€ भरजिते 


बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयरजितेन्द्रियः \ 

८ अ, 0 भभू 
प्रायः प्रगर्भेया भक्तया विष धैनाभिभूयते \१८॥ 
यथामिः सुसम्द्ाविः करोत्येधांसि भससात्‌। 


तथा मद्विषया भक्तिरुदवेनांसि कर्खल्ः \\१९। 








न साधयति मां योगो न सांख्यं धमं उद्व । 
न खाध्यायश्तपस्त्यागो यथा भक्तिमसोजिता।।२०॥) 


भक्त्याहमेकया ग्राह्यः ्रद्रयाऽऽत्मा प्रियः सताम्‌ । 











भक्तिः पुनाति मलिष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्‌ ।२१॥ 





धमः सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता । 


|  मद्धक्त्यापेतमात्मानं न सम्य प्रपुनाति हि ।॥२२॥ 


[| 








है, चित्त पिवल्कर एक ओर बहता. रहता है, एक क्षणके 
च्वि मी नेका तोता नहीं द्रूठता, परंतु जो कभी-कभी 
लिलविल्मवर हसने भी लगता है, कीं लाज खडकर 
ऊचे खरसे गाने लगता है, तो कहीं नाचने ख्गता है, 
मैया उद्धव | मेरा बह भक्त न केवर अपनेको बल्कि 












= ५ । 
न र 
अन = ~~ ए, विछज्ज । ४ | 
स उद्वायति चृत्यते 
क ~ 14९७ 
क ~र ८4 = ३ 
+= : ~ षा, देश 1 





५ (2 च 
क 9 "द 7 0 ॥ 


` मदक्तियक्तो वनं पुनाति ॥२४ 


= 
"2 0 
च न्नी) 










१६ 
८4 






2 
जन्‌ १ 
44. 






यथागरिना हेम मरं जहाति सारे संसारको पवित्र कर देता है ॥ २४ ॥ जैसे आगमे 
3 र ध्मातं पुनः सवं भजते च रूपम्‌ । तपानेपर सोना मैक छोड देता है--निषखर जाता है 





~ ४५३ र ४ 
- अः "+" क = 
` क ~ ~ 
#* द्धि ~} ^ 3 क 

क को, => ^ 


। # 
छ ` _ ड विधूय 
६ . व आत्मा ् । कमव शय 
त न" ~ ९ ह 
^ आत्मा च कमानुश्चयं विधूय 
9 ५५ ~ 3 
५ ~क भ > क ~ 
2 ~ ~. मद्धक्तियो म 
=: क्तियागेन भजत्यथो माम्‌ ॥२५५॥ 
प 1 ०, € 
+ षद $< र 9 ट 
, व 


। यथा यथाऽऽत्मा परिशन्यतेऽपौ 
मदुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः । 


मैः अमे जरस अ प सित हो जता दै, र 
ही मेरे भक्तियोगके द्वारा आत्मा कम-बासनाओंसे सुक्त 
होकर मुञ्चको दही प्राप्त हो जातादहै, क्योकिरैँही 
उसका वास्तविक खर्प हँ ॥ २५ ॥ उद्धवजी ! मेरी 
परमपावन लीत्-कथाके श्रवण-कीतनसे ज्यो -उ्यों चित्तका 
मैक धुख्ता जाता है, त्यो-त्यों उसे पक्ष्मवस्तुके-- 
वास्तविक तच्वके दन होने लगते है जेसे अञ्जनकं 
दवारा नेतरोका दोष मिटनेपर उन्म सुक््म वस्तुओंको 
देखनेकी शक्ति आने ल्णती है ॥ २६ ॥ 

जो पुरुष निरन्तर ॒विषय-चिन्तन किया करता है, 
उसका चित्त विषर्योमिं फंस जाता है ओर जो मेरा स्मरण 
करता है, उसका चित्त सुञ्षमे तद्टीन ष्ठो जाता 
है।२.७॥ इसव्मि तुम दूसरे साधनों ओर फलका चिन्तन 
छोड़ दो | अरे माई ! मेरे अतिरिक्त ओर कुछ है ही 
नही, जो कुछ जान पडता है, वह ठीक वैसा ही है 
जेसे खप्न अथत्रा मनोरथक्रा राञ्य । इस्ि मेर 
चिन्तनसे तुम अपना चित्त शुद्ध कर चे ओर उसे पूरी 
तरहसे--एकाप्रतासे मुदम ही ल्गा दो ॥ २८॥ 
सयमी पुरुष कजियां ओर उनके प्रमियोका सङ्ग दूरसे ही 
छोडकर, पवित्र एकान्त स्थानम बैठकर बडी सावधानीसे 
मेरा ही चिन्तन करे ॥ २९ ॥ प्यारे उद्धव ! ज्ि्योके 
सङ्गसे ओर चीस्तियोके-रुम्पोके सङ्गसे पुरुषको 
जे क्लेशा ओर बन्धनम पड़ना पडता है, वैसा क्टेरा ओर 
फसावट ओर किपीके भी सङ्गसे नहीं होती ॥ ३० ॥ 
११ उद्धवजीने पूा- कमलनयन श्यामघुन्द्र ¡ आपं 
त 4 कि ५ ६७ ॥ ऋ यहं बतहय मि सुमु धरुम आपका किस 







- ~+" 3. 
"न र, ~ 
त्था तथा पश्यति तस्तु ह्म 
~: ^ 
~" 
क चश्ुयथेवाञ्जनसम्परयुक्तम्‌ ॥२६॥ 
8 ~ "वक < ध ‹ र 1 ॥ 
५५१३६. [बू ध्यायतभित्तं ९. घु * विष | 
~ ^ => [३ 
क ५ 4.  # "धल । = 
` "च द => 
~ ५६ क ~ 
4" क ~~ क 
"=° ] 9 
ट | 1 रि ॥ 
त्तं मय्येव प्रविलीयते ॥२७॥ 
~ द्धः र क 4४ ८. त ॥ ॥ ~, 
पू ब क -8 # ी । । 
8 द्‌ “+ ॥ि = 



















तसादसमभिष्यानं यथा खप्नमनोरथम्‌ । 


६ र 
ा 
। ण्वि ध 
= ५.१ ( *ह. 
त = २ (ज 
व सदि , > ( > 1 
ठ "वि 
+ ॥ : क # द # क श 
४ ह व ज न क 8 
वै" न थ.4 [1 
# क 1; न 
०9 ‡ # 
॥ि ग 8 + ५ 





॥ 
५५ 


# शु, ~ "न ~ "क १.५ 
ने $~ मयि रः क 
हव क ~ न त च ख, 
र ] ॥ । समाधत्ख { । ८ ॥ | मद्भावभावितम्‌ । । | 4 
९) ९ ची. ५ । मना | 
६ ^¢ ल्य, (^ ब 9 & १9 च । | | | तम्‌ | | ८ | | 
"(^ ~ प † । 
ऋ क ~ ् व 
१ +" # ॥ नि ष 
(५ 














रं र ० 

~ (क 4 क 9 द्लीसङ्खिनां ध र > - 
~ ४ ¢ ४3 क (~ त [ । ७ 

न त त्यक द्रत 
४ ॥ @ि ॥ 0 > (4 6 सङ्ग | ब्रा आत्मवान्‌ 

#१ । “4 भ +~ 9 ह ६८ 2 ॥ ई 9 

( + ` क~ १ भ । 
र + 9 । 


क्षम विविक्तं आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्दरितः ॥२९॥ 
। 2 ५ (स न 5 










# 
५ 
= 


प 


चदन 






क 
१५ 
२4 
क 
+£ र॑ 
न 


च 





4 ४५ ४, कै 
५. 
व, २, ॥ २.५ 4 गरो ु 
न । 9 ॐ के भवेत्‌ 9 स क च, ९५५ १ “ द, न ५ ् 
& ^+ 4, बर 
1 [ि. । निशः थ 
+ ©. 4 ि 3: जी ८“ न + , + १. 
ॐ रं । नी थ भ क क {9 ह # 
- ज्मृ ~ र~ 4 क > ह 
५ ट कन = 







०  , जि + >+ 
ने ध ४ # ॥ (र ¢ 
८ -* ड ४ ७ र 
१ = ५.५. (7) षे भ ~ 
(4 # “= ७ \ [ | ~= ५ 
# १९ जेः प ~ गन द ८ उन छ. ६ ध) 
[ष्‌ थ यथा र ॥ यथा । 
§ १ पसा / ४ + # 
न ् ) ट ४ स्न तल्घ 4 ॥ © 
५ + ॥ ग्र ॥ = 3 नि ९ ॥ न १ ५ 4 ५ | ङ्गिसङ्त ^ । ै 1 = 
~अ 4 । ॥ । 
३ 3 क 4 
+ व चः १.18 1 1 ४, ॥ न ~ न 









४२ 
= 


वक्तमहति ॥३ १ | हमसे रिस प्रकार ओर किंस मावसे ध्यान करे १॥३ ९॥ 









[= 
[लत | न नही है ॥ २३ ॥ जिसकी वाणी प्रेमसे गद्गद हो रही 





| । 
3 । (भे 
4 
४ 
द 
न 
-#+ 
= 


4 


. 


ह त. 
, ४ ५>/ 


अ० १४ एकादशा स्कन्ध 


श्रीभगवानुवाच भगवान्‌ श्रीकृर्णने कहा-प्रिय उद्धव । जो न 
तो बहुत चा हो ओर न. बहत नीचा दी-रेसे 
आसनपर शरीरको सीधा रखकर आरामसे वेठ जाय, 
हार्थोको अपनी गोदमें रख ऊ ओर दृष्ट अपनी नासिकाके 
अग्रमागपर जभवे ॥ २२ ॥ इसके बाद प्रक. कुम्भक 
ओर रेचक तथा रेचक, कुम्भक ओर पूरक-इन प्राणायार्मो- 
के दारा नादिर्योका शोधन करे । प्राणायामका अभ्यासं 
धीरे-धीरे बढाना चाहिये ओर उसके साथ-साथ इन्दर्योको 
| जीतनेका भी अभ्यास करना चाहिये ॥२३॥ हृदयम कमल 
नागत पतङे सूतके समान ॐ कारका चिन्तन करे, 
प्राणके द्वारा उसे ऊपर ठे जाय ओर उसमे धण्टानादके 
समान खर स्थिर करे । उस स्वरका तता टरटने न 
पावे ॥३४॥ इस्‌ प्रकार प्रतिदिन तीन समय दस-दस 
बार ॐ्कारसहित प्राणायामका अभ्यास करे । रेसा 
करनेसे एक महीनेके अंदर ही प्राणवायु वशम हो जाता 
है ॥२५॥ इसके बाद एेसा चिन्तन करे कि हदय एक 
कमल है, वहन रारीरके भीतर इस प्रकार स्थित है, मानो 
उसकी डंडी तो ऊपरकी ओर है ओर संह नीचेवी ओर । 
अब ध्यान करना चाहिये किं उसका सुख ऊपरी ओर 
होकर लिल गया है, उसके आठ दल ८ प॑षुडियँ › है 
ओर उनके बीचोवीच पीगी-पीटी अत्यन्त सुकुमार कर्णिका 
गदी ) है ॥ ६६ ॥ कर्णिकार क्रमराः सू, चन्द्रमा 
ओर अग्निका न्यास करना चाहिये । तदनन्तर अग्निक 







सम आसन आसीनः समक्रायो यथासुखम्‌ । 
दस्ताबुत्सङ्ग आधाय खनासाग्रकृतेक्षणः ॥३२॥ 
पराणख शोधयेन्माग रङर्भकरेचवैः | 
विपयंयेणापि शनैरभ्यसेनिनितेन्दरियः ॥३३॥ 
हयविच्छिन्मो्ारं षण्टानादं तोद | 
पराणेनोदीयं तत्राथ पुनः संवेशयेत्‌ स्वरम्‌ ।।३४॥ 
एवं प्रणवसयुक्तं॑प्राणमेव समभ्यसेत्‌ । 
द्शत्वस्निषवणं मासा्वाग्‌ जितानिरः ॥३५॥ 
हरपण्डरीकमन्तःस्थभृष्वेनारमधोघखभ्‌ । 


ध्यात्वोध्वेणुलयुन्नद्रष्पतरं सकणिकम्‌ ॥३६॥ 






कर्णिकया न्यसेत्‌ श्रथंसोमाभीलत्तरोत्तरम्‌ । 






बहिमध्ये सरेद्‌ रूपं ममेतद्‌ ध्यानमङ्गलम्‌ ॥३७॥ 





सुन्दर है । धुटनोतक्र ल्बी मनोहर चार सुजापं 


समं प्रशान्तं सुयुखं दीषंचारुचतु्थ॑नम्‌ । बडी ही सुन्दर ओर मनोहर गरदन है । मर 





सुचारुषुन्दरग्रीवं सुकपोलं शुचि सितम्‌ २८ अनोखी ही छटा है । दोनो ओरके कान बराबर है आर्‌ 


 समानकर्णविन्यलस्फुरन्भकाङण्डरम्‌ 





थ १) 
# विरा १ 
हेमाम् व ॥ कटक ७ क क ~ रे 
` 1 |, { । जमन । 
५ श | 
=) ‡ घस्य ध ५ १९ 
[- प ९ # + च [भैः 1. ॥ (= += ध (ष (४२ जै क~ ब 
[; ५ 1 कैक ् 17. 
= + 4 = -द-# क" = १. भव क प 
< ^ क = -9 9 
५ न +.4 च. ५ व भ 4 
9 न्कप 1 व ह ~ == की क ध. नै प्त म 
म ~ न, ~ 
<© ` $ 9 क । # 
१ ध # # क, [व 
श~ च्व च ॥ि कु 


(र) 
नः 
1 


८ 


। 
~ 4 #, ॥ ¶ * 
(4 १ ् १३ + = ¢ 1 ॥. ^ 
| # # कि, | 1 + ४, ^ 9 (१4 च 
+ १ च) 9.1 - र, + ` ० र स्मर (# += 
क. = 2 1. क, नी १८१ 
। "4 > र ^ 4" {११ प १६ "ह; 
ति + । +. 8. ^ 4 ॥ = > + ¢ 
भ „ ५. । =! + ह (२६ १६-५+), 3 - 65, ४ = १ 52 





- 3 
ड 


उने मकराकृत कुण्डल क्ञिरमिल क्चिलमिल कं र रहे्ैवर्षाः ` 
























~=. 





= "चि 


अद्र मेरे इस ख्पका स्मरण करना चाहिये । मेरा यह ` 
ल्प ध्यानके व्यि बड़ा ही मङ्गलमय है ॥ ३७ ॥ __ ` 
मेरे अवयर्वोकी गठन बड़ी ही घुडक है । रोम-रेमसे ` 
शान्ति टपकती है । सुखक्षमर अत्यन्त प्रफुरित ओर र क अ ह 











समान सुल्लिग्ध कपोल है । सुखपर मन्द-मन्द्‌ सुसकानकी ` ` 














क कक कक पी 
६ ॥ # ति हि श ॥ 9 
ख.) (॥ ~" "न ह प ॥ भ ~ १ # 
4 १ क ~ * + = १ ॥ 
1 = "$ > [न 9 १ ५ (६. [न 
१ 8 ॥ धन 4 4 ८ 
न >+) । ~ 
= 1 त ऋय थ अ 4 ८4 
। 4. ए. नद 
। ॥ ३ ` न ४ 
{ ५ ऊ + ~ # | 
वि) ¦ ७९८ 
(1 ४ +॥ * र 
३ धन । [~ ---------------------------- वि 8) य 
र # ॐ + ` च कर कोक 
ककय ॐ कका | अक चाण पन क वक 
। । ज्य 77277 1 77 1 1) जः १ अका ज कः त जो दक निकम्‌ सो 





# ` 
1.1. 5.9.781 71, 1११ केकि 


व ूषि तथ्‌ | एवं पद्म धारण किये इए हैँ । गले वनमात ख्टक रही 
्वचकरगदापञ्चवनमाराविमू(पतम्‌ है । चरणोमे नूपुर शोभा दे रहे है गलेमे कौस्तुममणि 


नूपुर बिलसत्यादं को्त किरीट, कंगन, करनी ओर बाजूलंद शोभायमान हो 


 " दयुभत्किरीटकटशकरिश्त्नाङ्गदायुतम्‌ हे है । मेरा एक-एक अङ्ग अत्यन्त सुन्दर एवं हृदयहारी 
क है । सुन्दर मुख ओर प्यारी चितवन ङृपा-प्रसादकी 
¡ह्यं प्रसादसुखेक्षणम्‌ । वर्षा कर रही है | उद्धव । मेरे इस सुकुमार रूपका 


स्ति भनी | ध्यान करना चाहिये ओर अपने मनको एक-एक अङ्खमें 
मनां दधत्‌ ।॥५९। हिय 
समारममिष्यायेत्‌ सवज मनो दधत्‌ ख्गाना चाहिये ॥ ३८.४१ ॥ 























उनके विषयोसे खींच ठे ओर मनको बुद्धिरूप सारथीकी 

बुद्धा सारथिना धीरः प्रणयेन्मयि सवतः ॥४२॥ | सहायतासे सुषम ही लगा दे, चाहे मेरे किसी भी जङ्गमे 
क्यों न लगे ॥ ४२ ॥ जब सारे इरीरका व्यान होने 
त्गे, तब अपने चित्तको खींचकर एक स्थानम स्थिर 
करे ओर अन्य अङ्खोका चिन्तन न करके केवल मन्द- 
मन्द समुसकानकी छटासे युक्त मेरे मुखका ही ध्यान 
= त द करे ॥ ४२ | जब चित्त मुखारविन्दे ठहर जाय, तब 
तत्र रुन्धपदं चित्तमाङृष्य उधोम्नि धारयेत्‌ उसे वरहोसे हकर आकारामे स्थिर करे ¡ तदनन्तर 
ि -. क आकाराका चिन्तन भी त्याग कर मेरे स्वरूपम आरूढ 
^ ` तच त्यक्त्वा मदारोही न चिदपि चिन्तयेत्‌।४७॥ | हो जाय ओर मेरे सिवा किसी भी वस्तुका चिन्तन न 
< ~ क ष करे || ४४ || जव ईस प्रकार चित्त समाहित हो जाता 
एव हेतमतिमामेवात्मानमो त्मनि । दै, त जेसे एक अयोति दूसरी ज्योतिसे मिख्कर एक 
(व हो जाती है, वैसे ही अपनेमे मुषे ओर सञ्ज सर्वात्म 
विचष्टेमयि सवात्मन्‌ज्योतिन्योतिषि संयुतम्‌।।४५। शपेको अनुमब करने ठगता है ॥ ख) 
. . 1 इस प्रकार तीव्र ध्यानयोगके द्वारा सुञ्मे ही अपने 
सुतीव्रेण युञ्जतो योभिनो मनः चित्तका संयम करता है, उसके चितसे वस्तुकी अनेकता, 
1 ततसम्बन्धी ज्ञान ओर उनकी प्रा्तिके चयि होनेवाले 
पथाखतया निवाणं दरव्यज्ञानक्रियाभनमः ॥४६॥ |. कर्मोका भम शीघ्र ही निकृत हो जाता है ॥ ४६ ॥ 

~ ~ ------2-2र ~ 
इति श्रीमद्भगवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे 
| चतुदंशोऽध्थायः | १४ ॥ 


; तत्‌ सर्वव्यापकं चित्तमाश्ष्येकत्र धारयेत्‌ । 


नान्यानि चिन्तयेद्‌ शूयः सुसितं भावयेन्धम्‌।४३। 








अथ पश्दशोऽष्यायः 
( ५ भिन्न-भिन्न सिद्धियके नाम ओर लक्षण 
% ८ नुवाच = | भगवान्‌ श्रीरुप्ण कते प्रिय उद्धव | जन 





निव ~ ७९ ` ब ९. $ र 
1 [मन्‌ ` | 
४ 


० 
* 
(3 
५ 


र ऋः य, पराण भोर मनको अपने वरम कके 


गद 1 भ 
॥ ध 04 ^ 3 =, 0 
४/ क (व । ऋ ग , * 
[1 क 0 र. < "= ` >, क = नि 


"प ¢ ज = च ॥ = 
' # ए 4 न , - भ शर 4 
नन म. 
 # 1 * 








जगमगा रही है | अपने-भपने स्थानपर चमचमाते हए 


इन्दरियाणीन्दियार्थेम्यो मनसाऽऽकृष्य तन्मनः । बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि मनके द्वारा इन्दिर्योको ` 


व नक 
ककः = क = = क्व # 


र 


= १ ~ ल 
कै जन अ + 


9 म च 9, " क ककत ऋ: # क्यौ क > = न > ^ ८ क क, -2| 1" ` र, कः 
6 कक ~ ` - ॥ | = "नः 
९ 3 4 न ज „के, ५९ ज 


अ० १५ | एकार्दश्च स्कन्धं | ७९७ च | द 
~ -------------------------------=------- र ¢ 
मपि धारयतशेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः 1 १ 1 , अपना चित्त मुञ्जमे चाने लगता है, मेरी धारणा कटने. 
| कगता है, तब उसके सामने बहुत-सी सिद्वियां उपस्थित 
| होती हँ ॥ १॥ 
उद्धव उवाच उद्धवजीने कहा-अच्युत ! कोन-सी धारणा करनेसे 
किस प्रकार कौन-सी सिद्धि प्राप्त होती है ओर उनकी | 
संख्या कितनी है, अप दही योगियोको सिद्धि देते हे, | 
कतिवा सिद्धयो ब्रहि योगिनां सिद्धिदो भबान्‌ २ ॥। | अतः आप दृनका वर्णन कीनिये ॥ २ 




























४ ३ | क । < # \ ् श्‌ 9 न) + ५ 
1. ब. 


कया धारणया काखित्‌ कथं खित्‌ सिद्धिरच्युत 1 


श्रीमगवानुवाच भगवान्‌ श्रीरकृष्णने कहा-ग्रिय उद्धव ! धारणायोग~ 
के पारगामी योगिर्यने अठारह प्रकारकी सिद्धियां बतव्यी । 


है | उनमें आठ सिद्धियाँ तो प्रधानखूपसे मुद्चमे ही 
रहती हैँ ओर दूसरम न्यून; तथा दसं सचगुणके 
~ ५ विकाससे भी मिल जाती हैँ ॥| ३ ॥ उन्म. तीन सिद्धिरयो 
ताश्ामष्टो मत्प्रधाना दश्व गुणहेतवः ॥२1| तो शरीरकी है (अणिमा „ हिमाः ओर (छुधिमाः । 
इन्दियोकी एक सिद्धि है---्राप्ि ! लोकिक ओर पार- 

लोकि पदार्थोका इच्छनुक्ार अनुभव करनेवाली चिद्वि 
प्राकाम्य, है । माया ओर उसके कार्योको इच्छायुसार 

संचालित करना हिताः नापकी सिद्धि दै॥9॥ 

प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तप्ररणमीशिता 1\ ४ ॥ | विषरयेमि रहकर भी उनम आसक्त न होना धिता ` 

है ओर जिस-जिस सुखकी कामना करे, उसकी सीमा- 

गुणेष्ववङ्गो वशिता यत्कामस्तदवस्यति । तक प्च जाना कामावसायिता नामकी अव्वीं सिद्धिं | = 

: | है । ये आलें सिद्धिं सुङ्गमे खभावसे ही रहती है ओर ` 

जिन्हं म देता द्व, उन्हीको अंदातः प्राप्त होती है ॥ ५॥ ` 


७ “भ न यै + 9 ॐ 


पिद्धयोऽष्टादक्च प्रोक्ता धारणा योगपारगेः । 


"1 41 ,९© ५ + 6 9. ५" सक | # 
छ ५६ ४१६ 1 


चे (3 ॥ 
0.) 
४9, 1 


^ 4. 


अणिमा महिमा सतरंषिमा प्राभिरिन्द्रियेः। 


' (8 
+र ५ 1१ 


# १ ~ [॥ 
४०२. (10 
५ त 
५ [न प * ४,१ 
ङ {, 
# 
^+ मि 


133. 
¢ ५६1. 


१,। 


 - 


चै ॥ "क । + ॥। 
1.09 1 
{441.: 

(> । 





0 4: 





हन । 
त 418 |; + ¢ 
£ १? 

ध + 





8१ 


५ 


इनके अतिरिक्तं ओर मी कई सिद्धयो है । शरीरम 
| भूख प्यास आदि बेगोका न होना, बहत दूरी वस्तु 
अनुमिंम्वं देहेऽसिन्‌ दूरश्रवणदश्चनम्‌। | देख ऊना ओर बहुत दूरकी बात सुन ऊना, मनके साय ` 


ही शरीरका उस स्थानपर पर्हच जाना, जो इच्छा हो, _ 
मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम्‌ !। ६ ॥ | व्ही रूप बना छना; दूसरे शरीरम प्रवेश करना; जब 


ह ` 


इच्छा हो तभी ररीर छोडनाः. अप्सराओंवे साय होनेवाली 


4 चः 4, [ "(^ 4. 4 6.4 
१114 1.44. 
। {345 4. ८4 


एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टो चौत्पत्तिष्छा मताः॥ ५ ॥ 


4 
रे 


४ 





= देवाना ध. नुद्‌  , | देवक्रीदाका दशन, संकस्पकी सिद्धि, सब जगह 
 सच्छनदयुदेवानां सहकीडानुदशोनम्‌ । न्क _ ` 
ध: 1 निना नसुनचके 3 श्ापाट ये व्स्‌ स्द्धया 


क णद विरेष ऋ 
स्गुणरं विरष विकाससे हाती ह ॥ ६-७ ॥ भूत्‌, 
र पानक बात जन खना; यात-उष्ण्‌, ख्‌- 





4. [8 ० न्क ४ = । । $ = छ १ रकः $ ४१ , ( = 4 ई ष (हि 

अ 1-3क ~ व (न © ^ ६ राग = इरण ` 

स 2 | | अ~ अर ९1 -8 ९ ग हान्‌, दृसरंके 
8 २ सभ | 


य ॥ क) ५५ द ६ + । मन + क, 3. 
`  तरिकारन्ञत्वमदन्द द॑ परचित्ता्यभिज्ञता। | मन आदिकी 


| आदिकी शक्तिको स्तम्भित कर देना ओर किससे भी 
६ पराजित न ्ोना--ये पाँच सिद्धियाँ भी योगियोको 
| 3 प्रात होती है ॥ ८ ॥ प्रिय उद्धव ! योग-धारणा करनेसे 
न रक्त योगधारणसिद्धयः जो सिद्धियँ प्रप्त होती है उनका मैने नाम-निदेशके 


ह. 

ध. साथ वणन कर दिया | अब किंस धारणासे कौन-सी 
` ययाधारणया या खाद्‌ यथावा खान्निबोध मे॥। ९ ॥ | सिद्ि कैसे प्रा होती दै, यह बताता दै, इनो ॥९॥ 
+  भूतदमात्मनि मि तन्मात्रं धारयेन्मनः ्रिय उद्धव | पञ्मूरतोकी सूक्ष्मतम मात्नाए मेरा ही 


शरीर है । जो साधक केवल मेरे उसी शरीरकी उपाक्षना 
क्रता है ओर अपने मनको तदाकार वनाकर उसीमें 
गा देता है अर्थात्‌ मेरे तन्मात्राप्मक शरीरके अतिरिक्त 
ओर किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे अणिमा 
नामकी सिद्धिं अर्थात्‌ पत्थरकी चदन आदिमे भी प्रवेश 
करने की राक्ति-अणुता प्रप्त हो जाती है॥ १०॥ 
महत्तत्त्वे रूपमे भी मै ही प्रकाशित हो रहा हँ ओर 
उस दख्पम समस्त व्यावहाचिि ज्ञानोका केन्द्र ह | जो 
मेर उस रूपमे अपने मनको महत्तत्वाक्षार करके तन्मय 
कर्‌ देता है, उसे (हिमाः नामकी सिद्धि प्राप्त होती है, 
ओर इसी प्रकार आकारादि पञ्चमूतोमे-- जो मेरे ही 
शरीर है-अव्ण-अक्ग मन खगानेसे उन-उनकी महत्ता 
पराप्त ह्यो जाती है, यह भी भमहिभा' सिद्धिके ही अन्तर्गत 
है॥ ११॥ जो योगी वायु आदि चार भूतोके पमाणुओंको 
मेरा ही रूम समन्नकर चित्तको तदाकार कर देता है, 
छधिमा' सिद्धि प्रात हो जाती है--उसे परमाणुश्प 
काठ्केन# समान सूष्ष्म वस्तु बननेका साम्यं प्राप्त 
हो जता है ॥ १२॥ जो साचिक अहंकारको भेरा 
खरूप समक्षकर मेरे उसी रूपमे चित्ती धारणा करता 
है, वह समस्त इन्धियोका अधिष्ठाता हो जाता है । मेरा 
चिन्तन करनेवाग भक्त इस प्रकार प्राप्तिः नामकी सिद्धि 
्ा्त कर लेता ॥ १३॥ जो पुरुष सुच महत्तत्वाभिमानी 
` | त्राता अपना चित्त स्थिर करता है, उसे सुञ्च अव्यक्त 
| जन्मा ( सुत्रामा ) की श्राकाम्यः नामकी सिद्धि प्राप 








अणिमानमवामोति तन्मात्रोपासको मम ॥१०॥ 





महत्याटमन्मयि परे यथास्य मनो दधत्‌ 








महिमानमवाभोति भृतानां च पथक्‌ पथ्‌ ॥११॥ 





चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन्‌ । 







 कार्वश्माथंतां योगी रषिभानमवाप्तुयात्‌। १२ 







धारयन्‌ मय्यहत्वे मनो वंकारिकैऽखिरम्‌ । 





















। 
। 





न° १५ | 


विष्णौ ज्यधीश्वरे चित्तं धारयेत्‌ कालविग्रहे । 





छ ०) ॐ 


स इईशित्वमवाप्नोति शत्रसेत्रज्ञवोदनाम्‌ ॥१५॥ 
नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते । 
मनो मय्यादधद्‌ योभी मद्धमां वक्ितामियात्‌॥१६। 
निगुणे बह्मणि मयि धारयन्‌ विशदं मनः । 
प्रमानन्दमाप्नोति यत्र॒ कामोऽचसीयते ॥१७॥। 
इवेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धम॑मये मयि । 
धारयजञ्क्रेततां याति षडूमिरहितो नरः 11१८1) 
मग्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषषुद्रहन्‌ । 


तत्रोपरुन्धा भ्रतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ ॥१९। 


चक्षस्त्वष्टरि संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि । 


मां तत्र मनसा ध्यायन्‌ षिखं परयति बकष्मक्‌।।२०॥। 


मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनु बायुना । 


मद्वारणाल्वभावेन तत्रात्मा यत्र वे मनः ॥२१॥ 


` यदा मन उपादाय यद्‌ यद्‌ सूपं बुभूषति । 


८ ध स भाग्सणग्खभ् रः © १८ 


एकादश्च स्कन्ल्‌ 


| है ओर दोनोके संयोग मन-दी-मन मेरा व्यान करता 


| इसका कारण यह्‌ है कि उः . 
< | । दिया है | ~> 11 - यो न 
| जोड़ 9 हे ॥ २२॥ जो योगी दूसरे शरीरम प्रवेश 


८०१ 





8 ॥ १४ ॥ जो त्रिगुणमयी मायाके खामी मेरे का- 
खरप विधरूपकी धारणा करता है, वह शरीरो जर ` 
जीर्ोको अपने इच्छानसार प्रेति करनेकी सामथ्यं प्राप्त | 
कर ठेता है । इस सिद्विका नाम (रिवः हं ॥ ९५ ॥ 
योगी मेरे नारायण-खरूपमे --जिसे तरीय ओर 
मगवान्‌ भी कहते है मनको ल्गा देता है 
खामावरिक गुण उसमे प्रकट होने कगते हँ ओर उसे 
वरिताः नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती € ॥ ९६ ॥ 
निर्गुण ब्रहम भी वही दर| जो अपना निर्मल मन मेरे 
इस्‌ ब्रहमखखूपमे स्थित कर ठेता है, उसे परमानन्द- | 
खरूपिणी 'कामावसापिताः नामकी सिद्धि प्राप्त होती 
है । इसके मिलनेपर उसकी सारी कामना पूणं हो र 
जाती है, समाप्त हो जाती हैँ ॥ १७ ॥ प्रिय उद्धव 
मेरा वह रूप, जो खेतद्रीपका खामी है, अत्यन्त द्ध 
ओर धर्ममय है | जो उसकी धारणा करता है, वह भूख- 
प्यास, जन्ममृत्यु ओ रोकमोह--इन छः ऊमिंयोसे 
मुक्त हो जाता है ओर उसे शद्ध खखूपकी प्राति होती _ ` 
है ॥ १८ ॥ नै ही समशि-प्राणखूप आकाशात्मा द्रं । 
जो मेरे इस्‌ खरूपमे मनके दारा अनाहत नादका चिन्तन 
करता है, वह॒ 'दुरश्रणः नामकी सिद्विसे सम्पन्न हो 
जाता है ओर आकाशम उपय्ब्ध होनेत्राटी विविध 
प्राणियोकी बोटी सुन-समञ्च सकता है ॥ १९ ॥ जो 
योगी ने््रोको सूर्यम ओर सयंको नेत्रम संयुक्त कर देता 





१ > 1२. ॥ (न 4 । 
„ `. 11.04 





५१ १, 1 च 
1111. 1 1104 (4 0 


+ १ ^ ॥ ङ र #, क 







पि 
1 २, क्र 
५ न 4 
90. 6 (१ +, 
| 


द. ०8 । | 

"^ व. ४५ ॥ क्र ॥ ॥ : ॥ +3 

वि, 40 | ५4 + ८4५ 
१ “५1 > ११५ 


ए 
५ 





है, उसकी दृष्टि सद्म हो जाती है, उसे (दूरद्न" ` . 
नामकी सिद्धि प्राप्त होती है ओर वह सारे संसारको 
देख सकता है ॥ २० ॥ मन ओर शरीरको प्राणवरायुक्रे _ ` 
सहित मेरे साथ संयुक्त कर दे ओर मेरी धारणा करे तो _ ` 
इससे 'मनोजव' नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है } इसके 
प्रमावसे वह योगी जँ मी जनेका संकल्प करता है, ` 
वहीं उसका शरीर उसी क्षण परहुच जाता है ॥ २१ ॥ . 2 
जिस समय योगी.मनको उपादान-कारण बनाकर किसी 
देवता आदिका रूप धारण करना चाहतां है तो बह. 


अपने मनके अनुकूल वैसा ही रूप ध कर लेता है 


चिन्त रो ष 


` अपने चित्तको मेरे साथ 
















ररी 


२ा९।२्य 









` वा्याऽऽपीब्य गुदं प्राणं हृदुरकष्ठ पृष | 


(^ ददर्ष्यर्‌ पुराकीड मत्स्थं सतव विभावयेत्‌ । 


यो वै मद्धावमापन्नो ईशितवंशितः पुमान्‌ । 


, क 


किः, ^ "भवै == 2 4 र ॥ 4 
14 की 4 >+ क +>) + -7 कै ^ ~ य कका क $ ~“ १ _ नग्न 
|| # %% च क 99 ~ ~ 3 (1) ४ ¶ + त (न. त्र 4 ८ # त - ^ 
+ ११५, 1 । 4 च $ “ र 1 
9.1. (4 ~+ 3 1 1} न+ 9 

१ ह: 16 १५८ ५.४ ॥ "^^" 9 "शक का , ` । 


कष 
५५ १ 
४। 


^ ॥ च 
' #4+\ 
॥१ 141 न 
+ न+ ० ५ - 1१५ ५२ क, +> + च 
( ५ 09 कैः ह ५ > क 


4) 
क न + क| # # 
< =,191 जब 












च १ 
“नन नी 
3, 
~. 
नि 
षः (क । 
१ 
4 
५ 


न 
%= ~) ष * 
210२ ~ 


^  मद्विभूतीरभिष्यायन्‌ श्रीवत्सास्रविभूषितीः । 


= ह» ++ ४. 9.9 । 
= १, * 
0.71 . 
१५.८.५५ 3३ ६५ ४ 
व, 9१२५. 1 
1 9 >^ च , चण च 


9 + क) ॥ 2, 
च 4 { 4 च (1 
न 

पि #: ए 8 4 4 [त. ; त 2 ५9 
ऋ. (अ › 


कः 


आरोप्य बरहमरन्धेण न्ह नीत्वातसुजेचदम्‌ ॥ ° ४] 


विमनिनोपतिष्ठन्ति स्बृत्तीः सर्नियः ।२५।। 
॥ यथा संकरपयेद्‌ बुद्धया य॑दा वा मरपरः पुमान्‌ । 


# भयिस मनोयुञ्जंस्तथा तत्‌ सथुपाश्चुते ॥२६। 


इतम्‌ विहन्येत त्य चाज्ञ। यथा मम्‌ ॥२७॥ 


मद्भक्त्या शुदधस्स्य योगिनो धारणाविदः 1 
तख त्रैकारिकी बुद्विजन्ममूत्युपदंहिता ॥२८। 
` अर्त्यादिभिनं हन्येत अने्योगमयं वपुः । 


भधोगश्रान्तचित्तय यादसाधठदफ़ यथा ॥२९॥ 





न ता आण भदर्प वरण क प्राण बायुखूप धारण कैर ऊेता 
हे ओर अह एक श्रलसे दूसरे श्वच्पर जानेवाे भरेके 
समान अपना शरीर छोडकर दूसरे शरीरमे प्रवेश कर जाता 
है ॥ २३ ॥ योगीको यदि शरीरका परित्याग करना हो 
तो एडीसे गुदाद्वासको दबाकर प्राणवायुको क्रमराः 
हदय, वक्षःस्थल, कण्ठ ओर मस्तकरमे ठे जाय । पिर 
्रहमरनधके द्वारा उसे ब्रह्मम टीन करके शरीरका परियाग 
कर दे ॥ २४ ॥ यदि उसे देवताओके विहारस्थव्येभं 
क्रीडा करनेकी इच्छा हो, तो मेरे द्र स्वम खरूपकी 
भावनां करे । रसा करनेसे सच्गुणकी अंशखख्पा 
सुर-सुन्दरियिाँ विमानपर चदृकर्‌ उसके पास प्च जाती 
है ॥ २५ ॥ जिस पुरुषने मेरे सत्यसंकश्वरूपमे 
अपना वित्त सिर कर दिया है, उसीके ध्यानम सखन 
हे, वह अपने मनसे जिस समय जसा संकल करता 
है, उसी समय उसका वह संक्रस्प सिद्ध हो जाता 
है ॥ २६ ॥ भँ शिवः ओर धशिल्ः--इन दोना 
सिद्धियोका खामी ई; इसब्मयि कभी कोई मेरी आज्ञा 
टाक नहीं सकता । जो मेरे उस रूपका चिन्तन करके 
उसी मावसे युक्त हो जाता है, मेर समान उसकी आज्ञाभो 
भी वोई टल नहीं सकता ॥ २७ ॥ जिस ॒योगीका 
चित्त मेरी धारणा करते करते मेरी मक्तिके प्रभावसे जुद्ध 
हो गया है, उसकी बुद्धि जन्म-ग्र्यु आदि अदर त्रिषयोको 
भी जान कती है | ओर तो क्या--मूत, मिष्य ओर 
वर्तमानकी सभी बातं उसे माद्धम हो जाती है ॥ २८ ॥ 
जैसे जच्े दवारा जलम रहनेवाठे प्राणिोका नारा नहीं 
होता, वैसे ही जिस योगीने अपना चित्त स॒ञ्चमे कगाक 
रथि कर दिया है, उस्वे योगमय रारीरको अग्नि 
जठ आदि कोई भी पदाथ नष्ट नही कर सक्ते ॥ २९॥ 
जो पुरुष श्रीवत्स आदि चिह ओर राज्घ-गद्‌ा-चक्र-पद्म 
आदि आयुधोंसे विभूषित तथा ध्वजा-छत्र-चंवर आदिसे 
सम्पत्न मेरे अवतारोका ध्यान करता है, बह अजेय हो 
जाता है ॥ ३० ॥ 


इस प्रकार जो विचारकशीक पुरुष मे उपासना 
करता है ओर योगधारणके द्वारा मेरा चिन्तन करता है, 


को तकः चकि चे को ऋक = तक 











सिद्धयः 
जितेन्द्रियख दान्तख जितश्वासारमनो स॒नेः । 
मद्वारणां धारयतः का सा सिद्धिः सुदुरेभा ॥३९॥ 


अन्तरायान्‌ बदन्त्येता युञ्जतो योगघुत्तमम्‌ । 


नक ~ _ 


एकादशं ईकरन्य 


उपतिष्न्स्यशेषतः 


पूवं कथिता 


वर्णन तने किया है॥ ३१ ॥ प्यारे उद्व ! जिसने 


है, जो संयमी है ओर मेरे ही खद्ूपकी धारणा कर्‌ 
एवा है, उसके ल्ि देसी कोई भी सिद्धि नही, जो दुख्भ 
हो । उसे तो सभी सिद्धि्या प्रप्त दी ह ॥ ३२॥ 
परंतु श्रेष्ठ पुरुष कहते हैँ किं जो लोग भक्तियंग अधरा 
ज्ञानयोगादि उत्तम योगोका अम्थास कर रहे हें, जो सुञ्चसे 
एक हो रहे है, उनके च्यि इन सिंद्धियोका प्राप्त होना 


मया सम्पद्यमानख काटक्षपणदतवः ॥\ ३३) | एकः विन्न ही है; क्योकि इनके कारण व्यर्थं ही उनके 
समयका दुरुपयोग होता है ॥ ३३ ॥ जगतमं जन्मः 
जन्मौपधितपोमन्त्रेयावतीश्हि सिद्धयः | ओषधि, तपस्या ओर मन्त्रादिकं द्वारा जितनी सिद्धियां 


योगेनाप्नोति ताः सवां नान्यर्योगगरतिं व्जञेत्‌\२४॥ 


सवासामपि सिद्धीनां हेतः पतिरहं प्रथः । 


प्राप्त होती है, बे सभी योगकें हारा परु जाती है; परतु 
योगकी अन्तिम सीमा-ेरे साष्प्य, सारोक्य आदिकी 
प्राप्ति बिना सुञ्मे चित्त च्गाये किसी भी साधनसे नही 


| बतकये है योग, सास्य ओर धमं आदि ¡ उनका 
| एवं समस्त सिद्धियोका एकमात्र मेँ ही हेतु, खामी ओर 


अहं योगस्य सांख्यस्य धमेख बह्मवादिनाम्‌।। २५ , प्रयु ह ॥ २५ ॥ जसे स्थूल पञ्चभूता बाहर, भीतर 


अहमात्माऽऽन्तरो बाश्षोऽनादृतः सबदेहिनाम्‌ । 


त्वं ब्रह्म परमं साक्षादनाद्यन्तमपाव्रतम्‌ \ 


सवत्र सुम पञ्च-महाभूत ही है, सुदम भूतोके अतिरिक्त 
स्थूल मूतोकी कोई सत्ता ही नहीं है, वैसे ही मै समस्त 
प्राणियोके भीतर द्र्रूपसे ओर बाहर दृ्यख्पसे स्थितं 


हं । मुदम बाहर-भीतरका- भेद भी नही है; क्योकि तै ध 


था भूतानि मूतेषु बहिरन्तः खयं तथा ॥३६॥। निरबरण, एक--अद्वितीय आत्मा द ॥ ३६ ॥ 


~क | 
इति श्रीमद्वागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्वे पञ्चदयोऽध्यायः ॥ १५.1८ ~ 


ध 


छ 


£ 


ने 


प 





अथ षोडशोऽध्यायः 
भगवानकी विभूतियोका वणेन 
उद्धवजीने कहा भगवन्‌ ! आप ख 
न आपका आदिः है ओर न अन्त ( आ 
अद्वितीय तत्व है । समस्त प्राणियों 


क 
हेर% 


उद्वे उवाच 


8 
[रि च 


~ द ©, 


॥३१॥ उतरे वे सी सिद्ियौ रणतः प्रा ह जाती है, जिनका 


॥ ॥ [१ १ ४ £ 


{^ 


८ ( = 4 य 
^~ +. 


अपने प्राण, मन ओर इद्धि्योपर विजय प्राप कर ली 


प्राप्त हो सकती ॥ ३४ ॥ बऋवादियोने बहत-से साधन ` 


"= 
च ज छ 
र ह न 
१ न. त 
त = क 
= 9 नकि + १ 
क, चये 6 क 9 # 
रै क ५ "ज द 
न 


- 5 2 नः 
=, 9 


~~ 


द 
भ 3 त --1 
भ 


८८२ ~ 


ि १... ४॥ +), 
















। 0 १" {4 
1४ „१ ॐ ५.1 । 1 | प 
# 62 


"ङ्क ॥ 
~ (,. न ) 
५ १-3-५६ १ 
१: